सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
३३४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नोच, शत्रु गृही, कूर अंश या करूर वर्ग में हो बांये पैर में रोग हो । इसी प्रकार धन
भाव में हो तो बांये पैर में रोग हो ।
हाथ कटे १--शनि गुरु सहित नवम या तृतीय स्थान में हो, सूर्य अष्टम या द्वादश
स्थान में हो तो हांथ कटे ।
२--चन्द्र ७ या ८ घर में हो मंगल या गुरु से युक्त हो ।
३--नवम में शनि, तीसरे में गुरु हो ।
४--शनि अष्टम और गुरु द्वादश में हो ।
५-दशम भाव में राहु शनि और बुध हो ।
६--षष्ठेण जब शुक्र और सूर्य युक्त हो या शनि राहु युक्त कूर षष्ठ्यंश में हो
(स० चि०)।
७- शनि सूर्य की राशि में और मंगल गुरु की राशि में हो शुभ ग्रह से युक्त न
हो तो भुजदंड का छेदन हो (जा० स०)।
शनि, मंगल या सूय की राशि में पाप युक्त हो तो भुजदण्ड का खण्ड हो
जा० सं०) ।
र हस्त पीड़ा १--छग्न से ६ या ८ घर में सूयं चन्द्र शनि तीनों हों तो हाथ में
पीड़ा हो (जा० लं०) ।
लूला--छठ स्थान में सूर्य मंगल शनि हो ।
कुनखी हाथ पर चोट--तीसरे घर में राहु शनि युक्त हो तो कुनखी हो या
दाहिने हाथ पर लकड़ी की चोट या वायु से पीड़ा हो (शंभु०) 1
हाथ पैर कटे १--कृष्ण पक्ष का चन्द्रमा सप्तम में हो तो हाथ कटाये (स०चि)।
२--शनि युक्त शुक्र छठे भाव में हो और शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो एक भुजा
और एक पाँव का खण्डन हो (जा सं०) ।
३--बुध मंगल बलवान् हो छठे भाव में हो तो वह चोर हो और इस काम में
उसके हाथ पर काटे जावें (शंभु) ।
४--कर्के में शनि, मकर में मंगल हो वह चोरी के प्रसंग में दण्ड से हाथ पैर
काटे जावें (शंभु०) ।
५--राहु सूर्य मंगल चन्द्र अष्टम में हो तो सब हाथ पाँव से खंडित हो (जा०सं०)
६-छग्न या छठे घर में बुध और मंगल हो तो चोर हो, हाथ पैर नष्ट हो
(मान०) ।
हाथ पैर दुगुने--बुध लग्न से त्रिकोण में हो और सब ग्रह जहाँ कहीं निबेल हो
सो २ मुंह ४ पेर ४ हाथ वाला हो (जा० पारि०) |
बिना हाथ पेर सिर १--पंचम नवम और लग्न का द्रेष्काण पाप ग्रह युक्त हो तो
जातक क्रम से बिना हाथ, पैर, सिर का होवे (जा? पारि०) ।
बिना सिर--छच्न के द्रेष्काण में मंगळ हो, शनि सूर्य और चन्द्र उसे देखते हों सी बिना सिंर वाला हो (जा० पारि०)।
नीरोगता : ३३५
हस्तहीन--यही योग पंचम में हो तो हस्तहीन हो (जा० पारि०) ।
सिर कटे १--क्रूर षष्ठ्यंश में शनि लग्न में हो सप्तम भाव राहु से युक्त हो
दशम में शुक्र हो ऐसा योग हो तो सिर कटे ।
१--क्षीण चन्द्र हो, राहु से दृष्ट शनि हो तो सिर कटे (स० चि०) ।
३--राहु शनि की राशि में हो और चन्द्रमा सूर्य की राशि में हो तो फरसा से
सिर का घात हो (जा० स०)।
४ राहु ककं राशि पर चन्द्रमा सिंह राशि पर हो तो सिर कटे (जार सं०) ।
५-अष्टम में सूर्यं चंद्र दोनों हों तो सिर कटे या अपने अङ्ग को काटने वाला हो (जा० सं०)।
पेट फटे--कृष्ण पक्ष का चंद्र राहु बुध से युक्त हो सूयं से भी अस्त हो (स०चि०) कुक्षि छेदन--शनि लग्न में, शुभ दृष्टि रहित, राहु सूर्य से युक्त क्षीण चन्द्रमा होवे तो कुक्षिं फटे (स० चिं०) ।
जंघा कृश १--दशम में पाप ग्रह हो तो जंघा या घुटना कृश अर्थात् कमजोर हों (स० चिं) ।
अँगुली जुड़ी १--लग्न में पाप युवत चन्द्र हो तो पैर की भेंगुलियां वाम पद का कोई भाग जुड़ा हो या बाँये हाथ मे ऐसा हो (शंभु०) ।
अंग विकल १--सूयं से दूसरे स्थान में शनि, दशम में चन्द्र सप्तम मंगल हो तो अंग विकल हो (स० चिं०) ।
२--दशम में चन्द्रमा, सप्तम में बुध, दूसरे में शनि हो तो शरीर विकलांग (अंग
कला रहित) हो (स० चिं०) ।
३--केतु या राहु लग्न में हो छग्नेश दुष्ट स्थान में हो तो उसकी दशा में जब उसके ६ स्थान के स्वामी की अन्तदंशा हो तो अंग में विकलता हो (जा० पारि०) 1
४--पाप ग्रह शुभ ग्रह के नवांश में होकर षष्ठ भाव में हो और पाप ग्रह से
दृष्ट हो तो उसकी मृत्यु हो या उसे विकल शरीर वाला करे (जा० सं०) ।
५--व्ययेश बली होकर क्र या नीच अंश में हो तो शरीर में विकलता या
कुरूपता हो (स० चिं०) ।
६---व्यय में बहुत पाप ग्रह होवें, व्ययेश शनि, राहु या माँदि से युक्त हो तो
शरीर में विकलता हो (स० चिं०)
७--गुरु शनि के साथ हो, अद्ध चंद्र दशम में हों, सप्तम में मंगल हो तो विकल
हो (जा० पारि०) ।
८--केन्द्र में क्रूर ग्रह या सूर्य चन्द्र हों ।
कुव्ज १--चन्द्रमा पहिले या पिछले नवांश में तीसरे भाव में हो, शनि चोथा हो,
रूम्तेश शत्रु गृही हो, मंगल क्षीण चन्द्रमा के साथ हो तो कुब्ज (कुबड़ा) हो (शंभु०) ।
२--चन्द्रमा अपनी राशि का होकर लग्न में हो उस पर शनि ओर मंगल की
दृष्टि हो तो कुबड़ा हो (जा० पारि०) 1
३३६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
वामन १--चन्द्रमा राशि के पहिले या पिछले नवांश में हो शनि चतुर्थ दृष्टि से
देखे, शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो और लग्नेश अल्पराशि में हो तो उसका वामन (छोटा)
शरीर हो (शंभु०) ।
२--पृष्टोदय राशियों में स्थित चन्द्र को लग्न से चतुर्थ में स्थित शनि देखता हो
और लग्नेश मेष राशि में हो तो शरीर वामन हो (पृष्टोदय राशि-मेष वृष कक, धनु,
मकर) (जा० लं०) ।
३--मकर का अन्त्य का (९ रा-२७-० से ३०-०) लग्न हो उसे शनि चन्द्र और
सूर्य देखते हों तो वामन हो (जा० पारि०) ।
ऊँचा शरीर १--मंगल बुध ये दोनों परस्पर सातवीं दृष्टि से देखते हों अर्थात्
मंगल को बुध, बुध को मंगल सप्तम दृष्टि से देखता हो तों लम्बी देह वाला हो
(जा० लं०) ।
पतला शरीर १--क्रूर ग्रह केन्द्र में हो तो विकट अर्थात् पतले शरीर का हो ।
२--एक ही राशि में सूरय केन्द्र में हों तो पतले शरीर का हो ।
३--लग्न में शक्र हो, शनि से दृष्ट हो तो कटि के नीचे का भाग पतला हो ।
४--चतुर्थ में शुक्र हो ओर गुरु युक्त होकर शनि या मंगल या बुध कहीं होतो
कटि के नीचे का अंश व बाहु व पेर पतले हों (जा० ल॑०) ।
दुबला १--सूर्य चन्द्रमा एक दूसरे के घर या नवांश में हों तो शरीर में दुबलापन
हो (स० चि०) ।
२- जन्म राशि का स्वामी, लग्नेश के साथ लग्न से त्रिक स्थान में हो तो दुर्वछ हो (जा० ल०) ।
३-दूसरे में सूर्यं शनि हो, दशम चन्द्र, सप्तम मंगल हो तो वह हीन देह का
हो (जा० म०) ।
४--मेष का चन्द्र शनि युक्त हो बारहवां सूर्य हो लग्न में वक्री ग्रह न हो, मंगल
केन्द्र में न हो तो शरीर कृश हो (शंभु०) ।
५--छग्नेश गुरु हो और अष्टम में शनि हो तो बहुत दुबला पतला हो जीवन
कष्ट में बीते ।
६--शनि राशि स्थान में हो तो दुबला हो ।
३ह में दुर्गन्ध १--शुक्र शनि की राशि में हो तो देह से दुर्गन्ध आवे । २--पषष्ठेश मिथुन कन्या या मकर राशि में हो तो देह में दुर्गन्ध हो । ३- केन्द्र में बुध युक्त शुक्र मिथुन या कन्या राशि में हो । ४-शुक्र व शनि दोनों अपने त्रिशांश में हों या हृद्दा में हों तो देह से दुर्गन्ध आवे ४<-मेष लग्न में चन्द्र हो तो मुख से दुर्गन्ध आवे । ग्रहों की दीप्तादि अवस्था का भी विचार कर फल कहना (जा० लं०) । ६--शुक्र पाप राशि पाप हृद्दा में या चन्द्र क्षेत्र में हो चन्द्रमा मेष का षष्ठेश बुध लग्न में हो तो उसके मुख से दुर्गेन्ध आवे । (शंभु०) ।
नीरोगता : ३३७
भय विचार अरिष्ट
भय विचार--अष्टम घर भय का द्योतक है और लग्न शारीरिक बनावट का
आधार है, षष्ठ घर कर्जे, रोग ओर शत्रु का है । इस कारण सब भय इन घरों से
और इनके स्वामियों से प्रगट होते हें ।
अनेक भय--लग्न में क्रूर ग्रह को लग्नेश बल रहित होकर उसके पीछे कहीं हो
तो अनेक भयों से युक्त हो । देह या मन की व्यथा से युक्त हो (जा० ल॑०) ।'
विष भय १--यदि दूसरा भाव पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो या दूसरा भाव क्रांश
में हो या उसका स्वामी पाप युक्त यां पाप दुष्ट हो तो विषली औषधियों से धोखा
दिया जायगा (स० चि०) ।
२--तीसरे भाव में कोई ग्रह नीच, शत्रु गृही, अस्तंगत, पाप दृष्ट हो तो विष
प्रयोग से या विष भक्षण से विष का प्रभाव हो इसके अभाव में धन का नाश हो
(जा० पारि०) ।
३-राहु से युक्त लग्नेश हो तो निश्चय ठगेदी से विष का भय हो (जा० पारि०)
सर्प भय १--राहु सपं बताता है । "जस राशि में राहु है उसके स्वामी के सहित
तृतीयेश लग्न में राहु युक्त हो तो सर्प भय हो (स० नि०)।
२--ढितीयेग जहाँ हो उसका स्वामी लग्न में राहु युक्त हो तो सर्प का भय हो
(स० चिं० ) ।
३--तृतीय स्थान में राहु गुलिक से युक्त या दृष्ट हो तो सपं का भय हो
(स० चिं० )। ।
४--तीसरे भाव में शुक्र हो राहु से दृष्ट हो उसमें यदि शनि की भी दृष्टि हो
तो सहोदर भगिनी दुविष से मरे और सपं का भी भय हो ( जा० सं० ) । /
५--तीसरे भाव में शक्र हो शनि से दृष्ट हो तो सर्प भय हो ( शंभु० ) 1
इन योगों में बलवान् शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो काटने से अच्छा हो जायगा ।
६--अष्टम में चन्द्र और मंगल शत्रु गृही हो तो सर्प भय ।
७--लग्नेश षष्ठेश राहु या केतु युक्त हो तो सर्प को पीड़ा, चोटादि भय हो
( जा० पारि० ) ।
शवान भय १--धन स्थान में पाप युक्त या पाप दृष्ट शनि हो कुत्ता काटने का
भय हो ( स० चिं० ) ||
२--द्वितीयेश शनि युक्त या दृष्ट हो तो कुत्ता काटने का भय हो ( स० चिं० )॥
३--शनि मंगल युक्त हो तो कुत्ते से भय हो ( स० चिं० ) 1
४--षष्ठेश मंगल युक्त हो तो कुत्ते से भय ( स० चिं० ) ।
५--लाभ में शनि, राहु, बुध हो तो कुत्ते के काटने की व्यथा हो ( शंभु० ) ।
६- लग्नेश और षष्ठेश दोनों ६ भाव में हों तो १० और १९ वर्ष में कुत्ते का
भय हो ( वू० पा० ) ।
(] २२
३३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
कीट भय १--चन्द्रमा त्रिकोण में सूर्य युक्त हो तो विषले कीड़े के काटने का
अय हो ( स० चिं० ) ।
हाथी भय १--षष्ठेश गुरु से युक्त हो तो हाथी का भय हो ।
२--शनि गुरु युक्त हो तो हाथी का भय हो ( स० चिं०. ) ।
चौपाया भय १--तृतीयेश युक्त गुरु लग्न में हो तो चौपाया (पशु) से भय हो।
२--शनि षष्ठेश हो और राहु या केतु युक्त हो तो पशु से भय हो (स० चिं०) ।
३--तृतीयेश और गुरु लज में राहु से युक्त हों या राहु जिस राशि में हो उसके
स्वामी से युक्त हों तो गाय बैल आदि पशु से भय हो ( जा० पारि० )।
श्युंगी पशु भय १--पष्ठेश शनि सूर्य युवत हो तो सींग बाले पशु से भय हो
( स० चिं० )।
अश्व भय १--षषण्ठेश चन्द्र से युक्त हो तो घोड़ा से भय हो ( स० चिं० )।
मृग से भय १-षष्ठेश, शनि राहु या केतु युक्त हो तो मृग से भय हो (स. चिं.) ।
२--अष्टमेश षष्ट में और द्वादशेश लग्न में हो ओर चन्द्र षष्ठेश के साथ हो
तो ८ वर्ष में मृग से भय हो ( बु० पा० ) ।
वाहन भय १-अष्टमेश लग्नेश चतुर्थेश से युक्त हो तो वाहन से मृत्यु हो
(स० चिं०) ।
२--मंगल युक्त चन्द्र केन्द्र या अष्टम में हो या क्षीण चन्द्र चोथे हो ओर अष्टम
भाव में भी कोई ग्रह हो तो वाहन से भय हो ( स० चिं० )
वृक्ष भय---चन्द्रमा सप्तम में हो और तीसरे में मंगल हो तो १८ वर्ष में वृक्ष से
गिरे ( जा० सं० )।
पक्षी से भय व अग्नि भय १---६-८ भाव में राहु हो उससे ८ वें शनि हो १-२
वर्ष में अग्नि से भय हो तथा तीसरे वर्ष में पक्षी से भय हो ( वृ० पा० ) ।
विचार---इन सब योगों में योगकर्ता ग्रह अपने उच्च का या स्वगृही न हो तब
उवत फल होगा । ग्रह में उच्चादि अच्छी स्थिति होने पर एवं शुभ ग्रह से सम्बन्ध
होने पर उनके फल में ग्रह बल के अनुसार कमी हो जायगी ।
जल में डूबे १--चतुर्थेश जिसकी राशि में है वह चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो
तो कुआँ नदी आदि में गिरे ।
२--निर्बेछ्ठ छग्नेश चतुर्थ में हो, नीच के सूर्य से या पाप ग्रह से युक्त तथा जलचराधिप ग्रह से युक्त हो चतुर्थेश बलहीन हो तो जल में डूबे ( स० चिं० ) ।
३--चतुथं में कोई नीच का ग्रह पाप युक्त हो, छट भाव में पाप यकत नीच का
ग्रह हो और ये जळ राशि में हो चतुर्थेश बळ हीन हो तो ताछाब कुआँ आदि जला- शय में गिरे ।
४--निबेल ळानेश चतुर्थ में हो या वह पाप युक्त होकर अपने नीच में हो ओर सूर्य युक्त हो बलहीन चतुर्थश जळ राशि में हो तो जळ में डबे। :
नीरोगता : ३२९
५--सप्तमेश लग्नेश युक्त चतुर्थं में हो और दशमेश से दुष्ट हो तो कुआँ तांछाब
जदी आदि में गिरे ।
६---चतुर्थेश का नवांश स्वामी सप्तमेश या चतुर्थेश युक्त या दृष्ट हो तो भी उपरोक्त फल हो ( स० चिं० ) ।
७--कन्या राशि में सूर्य चन्द्र दोनों हों ओर पाप ग्रह से दुष्ट हों तो जल में
डूबने से मरण हो ( जा० सं० ) ।
८--कर्क पर शनि और मकर पर चंद्र हो तो उपरोक्त फल ( जा० स० )।
६--चतुरस्थ ग्रह नीच राशि में या अस्त हो तो कूप ताळाब आदि में गिरे
( जा० पा०) 1
१०--चतुर्थेश नीच का, अस्त, चतुर्थ भाव में शत्रुगृढी जल राशि का हो
चतुर्थेश हीन बल हो तो कुआँ के किनारे जल समूह में गिरे ( स० चि० ) ।
१ --तृतीयेश गुरु युक्त लग्न में हो ओर जल राश का लग्न हो तो जल से
भय हो ( स० चि० ) ।
१२--धन भाव में चन्द्र हो तो जळ से भय हो ( शंभु० ) ।
१३--छमग्नेश और षष्ठेश चन्द्र के साथ हो तो जल से भय हो ( स० चि० ) ।
१४ -व्यय में चन्द्रमा से युक्त शनि व राहु या केतु हो तो जळ से पीड़ा हो
( जा० सं० ) ।
१५--शनि मंगल राहु से युक्त हो या शनि चतुर्थ भाव में हो तो जल से भय
हो (स० चि० ) ,
१६--लग्न में चन्द्र पाप राशि का पाप ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो जछ से भय हो
(शंभु० )।
१७--जलचर लग्न हो तो जल भें डूबने का भय हो ( जा० पारि० ) ।
१८--चतुर्थ में शनि राहु हो तो वाँध व जछ से व ऊपर से गिरने से व अपने
शरीर से मृत्यु ( जा० सं० ) । ;
१९--यदि शनि अष्टम में क्षीण चन्द्र युक्त हो तो पिशाच पीड़ा हो और पानी
में बहने का भय हो ।
२०--६ या ८ भाव में सूर्य हो और उससे १२वें चन्द्र हो तो ५ और ९ वर्ष में
जल भय हो ( वृ० पा० ) ।
अग्नि भय या विष आदि भय १--छाभ में मंगळ सूर्य हो तो वह अग्नि विष या
अस्त्र चोट से युक्त या पीड़ित हो ( शंभु? ) ।
२--मंगल नवम हो तो अग्नि व विष से पीड़ित हो ( शंभु० )।
३--व्यय में सूर्य व मंगल हो तो अग्नि पीड़ा हो ।
४---गुरु षष्ठ भाव में, शनि अष्टम हो सूयं कक में हो जित पर मंगल की दृष्टि
हो तो अग्नि भय हो ( जा० सं० ) ।
५--लगन में पाप ग्रह पाप राशि का पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अग्नि से दग्ध हो (शंभु)।
३४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६--लर्त द्रेष्काण के विभाग में सिर स्थान में राहु मंगल या शनि होवे तो सिर स्थान में अग्नि, शस्त्र व काष्ठ से भय हो ( शंभु० ) ।
७--९,७,८,२ भाव में सूर्य से युक्त द्वितीयेश हो मंगल से दुष्ट हो या पाप ग्रह मंगल उपरोक्त राशि में होकर सूर्य से दृष्ट हो तो विस्फोट (ब्रण) या अग्नि का भय हो ( स० चि० ) ।
८--तीसरे भाव में सूर्य या मंगल हो तो हड्डी ट्टे, विष का भय, अग्नि दाह आदि का भय हो।
यदि शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस स्थान के चर्म में भिन्नता कर देता है (शंभु.) ।
९--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र की पीड़ा हो संतान वराबर मरती रहे, मनुष्य दुःखित रहे ( शंभु० ) ।
१०--नवमेश षष्ठ में हो, षष्ठेश से दृष्ट हो, और षष्ठेश के साथ शनि व मंगल हो तो चोर व अग्नि से पीड़ित रहे ( स० चिं० )। ११--१ ओर ६ के स्वामी राहु युक्त या केन्द्रमै हो तो सिर ददं भय, सिर में चक्कर आने की शिकायत या चोर अग्नि या दाँत का भय हो ( स० चि० )1
१२--छग्नेश शनि से युक्त या दृष्ट हो तो अग्नि शस्त्र का या गिरने से सिर में ब्रण हो ( स० चि० )।
पत्थर की चोट शस्त्र आदि से पीड़ित १--नवम में सूर्य चन्द्र हो तो काष्ठ से पत्थर से तथा शस्त्र से पीड़ा हो (शंभु० )।
२-चतुर्थेश सूर्यं और शनि युक्त हो मंगल से दृष्ट हो, शुभ दृष्ट न हो तो पत्थर से चोट लगने का योग है ( स० चिं० ) 1
३--लग्नेश मंगल लग्न में पाप युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट या खंड ` आदि से सिर में ब्रण हो (स० चि० )। ४ व्यय भाव बुध से युक्त हो तो शत्रु से व पत्थर काष्ट, लोह, श्वूग वाले जीव या पवन आदि से वाधा हो ( जा० सं० )1 चोर ठग या राज भय १--लग्नेश शनि से युक्त य! दृष्ट हो तो निश्चय ठग चोर व राजा से भय हो ।
२--छग्न में राहु शनि मंगल युक्त हो । ३-- लग्नेश अष्टम में राहु या केतु युक्त हो । ४-लग्न में राहु त्रिकोण में गुलिक और अष्टम में मंगल केतु युक्त या मंगल शनि युक्त हो या इसमें वृहज्जीव हो या अष्टमेश स्थित राश्यंशेश राहु युक्त हो तो ठग चोर या राजा से भय हो । (वृहज्जीव-शनि मंगल युत राहु को कहते हैं) ( स० चि० ) । ५-- द्वितीयेश के साथ पाप युवत सूर्य हो तो राजा के कोप का भय हो (सर्णच) ७- लग्नेश पाप युक्त हो रून में राहु हो तो ठग चोरों से भय हो।
_ नीरोगता : ३४१
| ८--छग्न में पाप ग्रह गुलिक त्रिकोण में हो या लग्न व लग्नेश गुलिक युक्त हो
तो ठग और चोरों से भय हो (स चिं)।
चोर दुःख--लग्नेश, बुध, गुरु, शुक्र व चन्द्र यदि नीच के, अस्तंगत, पराजित,
पापाक्रांत, वक्री, अनुवक्री, आगे वक्री होने वाला हो और त्रिक में हो तो चोर दुःख,
पीड़ा, दरिद्र, रोग, भ्रमण, शत्र भय, वस्त्रहीन आदि अपनी दशा में करें । चोर और प्रेत भय १--लग्न में बुध केतु हो पाप दृष्टि हो तो चोर और प्रेत
आत्माओं से भय हो (स० चिं०) ।
पिशाच पीड़ा १--राहु और शनि यें पिशाच के सूचक हैं जिस पर पिशाच हो
वह उदास बलहीन, भयानक स्वप्न से पीडित, लगातार मानसिक भय, उत्तेजना,
अजीर्ण कभी-कभी दस्त और चक्कर आते हैं।
२-ण्लग्त में शनि राहु हो तो पिशाच की पीड़ा हो (स० चि०) ।
३--द्वितीय में शमि व राहु हो तो भूत पिशाच आदि कृत रोग हो (जा०स०) । ४--पष७ठ में राहु केतु पाप दृष्ट होकर क्रूर नवांश में हो तो पिशाच पीड़ा हो (स० चिं०) ।
५--चन्द्र लगन में हो और राहु ग्रस्त हो (ग्रहण का समथ हो) और त्रिकोण में
पाप ग्रह शनि मंगल हो तो उस पर पिशाच की वाधा लगी रहे (वृ० जा०) ।
६--अष्टम में निवळ चन्द्र, शनि सहित होवे तो पिशाच और जल से उत्पन्न
पीड़ा हो ।
७--क्षोण चन्द्र अष्टम में मंगल, राहु य! शनि में से किसी से युक्त हो तो भी
उपरोक्त फल हो (स० चि०) ।
८--उपरोक्त प्रकार से क्षीण चन्द्र दुष्ट स्थान में हो तो पिशाच की पीड़ा हो
और मृत्यु हो ( स० चि० ) ।
अर्थात् क्षीण चन्द्र मंगल राहु या शनि युक्त होकर ६-८*१२स्थान में हो तो
पिशाच पीडा या पागलपन से मृत्यु हो ।
९--क्षीण चन्द्र अष्टम में राहु युक्त हो और दूसरा भाव पाप युक्त हो तो
पिशाच पीड़ा से मरे ( स० चि० ) 1
अध्याय ११
राजयोग
राज योग का अर्थ--राज कुल में या . दुसरे कुल में जन्मा मनुष्य राज्य करे
अर्थात् अधिकार प्राप्त करे या राज्य का कारवार करे अति द्रव्यवान् हो ।
राजा का अर्थ--मुखिया या अधिकारी, कई मनुष्यों के ऊपर जिसका राजा के
समान अधिकार प्राप्त हो, शक्ति धन बल आदि जिसके पास हो ।
राज योग का अभि प्राय--राज योग का यह अभिप्राय नहीं है कि वह अवश्य ही
राजा हो जाएगा । परन्तु राज योग का अर्थ यह है कि जिसके जन्म काल में राजयोग
पड़ा है वह भाग्यवान् होता है ।
जो भाग्य भाव फल कहे हैं वह सब ऐश्वयं आदि का निश्चय राज्य योग से होता
है । उन योगों के कारण जन्म की सफलता होती है ऐसे योग राज योग में वतलाये हैं।
राज योग कारक ग्रहों का जेसा वल हो उसी योग्यतानुसार अधिकार या सरकारी
अधिकार या राज घराने में नोकर या व्यापारी होगा ।
किसी दरिद्र के घर में जन्मे किसी बालक को राज योग हो तो उसका आशय यह नहीं है कि वह राजा ही होगा परन्तु वह भाग्यवान होगा खाने पीने से तंग न रहेगा अपने कुल में श्रेष्ठ होगा । राजा का अर्थ यहाँ अधिकारी लेना चाहिये । राजा तो
अब होते ही नहीं परन्तु राज्य के बड़े-बड़े अधिकारी होते हैं ।
यवनाचार्य का मत है कि किसी गरीब के घर में किसी सन्तान को राजयोग हो तो उसे अरिष्ट होगा नहीं जीवेगा । यदि वच गया तो राजा के समान अधिकारी होगा ।
यवन एवं इतर आचायो ने कई राजयोग कहे हैं जिनमें राजा के समान अधिकार और शक्ति मिलती है । वह केवल उन्हीं लोगों को मिलती है जो राज घराने के हैं । परन्तु यदि ऐसा राजयोग पाप ग्रहों का ऐसे लोगो को प्राप्त हो जो राज घराने के नहीं हैं, उनकी मृत्यु होती है ।
जीवशर्मा का कहना है कि पाप ग्रह उच्चवर्ती होने से राजा नहीं होता किन्तु धनवान् होता है।
राज योग कई प्रकार के हँ । राजयोग कारकांश और जन्म लग्न दोनों से विचा- रना, एक आत्मकारक और पुत्र कारक से दूसरा लग्नेश और पंचमेश ते । इन दोनों के परस्पर सम्वन्ध और बल के अनुपार ही पूर्ण आधा या चतुर्थांश फल होता है । १ उच्च के ग्रह का फल
१ ग्रह उच्च का--कदयं ।
२ ग्रह उच्च का--बड़ा उत्कट काम करता है ।
राजयोग : ३४३
३ ग्रह उच्च का--राजा के समान ।
३ग्रह उच्च का--राजपुत्र राजा. हो अन्य मंत्री हो ( शंभु० ) ।
३ पाप ग्रह उच्च के- क्रूर बुद्धि राजा।
३ शुभ ग्रह उच्च के--सत बुद्धि राजा ।
मिश्र ग्रह से--मिश्र स्वभाव वाला हो ( वृ० जा० ) ।
३ ग्रह उच्च, स्वक्षेत्रीय मूल त्रिकोण के--राज्य कुल में उत्पन्न राजा, अन्य
कुल में उत्पन्न मंत्री हो ( जा० भ० ) ।
४ ग्रह उच्च के--राजा हाथियों युक्त पुल बाँधने में समभं बड़ी कीति (जा.भ.)।
४ ग्रह उच्च के और कुंभ नवांश में शुक्र हो--पृथ्वी का राजा (स०चि$) ।
पाप नवांश या कूर नवांश में न हो तब राजा होता है। '
४ ग्रह उच्च के हों कुंभ लग्न में शनि हो तो पृथ्वी का राजा हो (आा०प।रि०)
४ से अधिक ग्रह उच्च के हों तो दिव्य पुरुष हो ( शंभु० )। -
५ ग्रह उच्च के--सावे भौम राजा ( जा० भ०)।
५ ग्रह उच्च के गुरु लग्न में हो--समस्त जन समुदाय का राजा (जा०पारि०) 1
६ ग्रह उच्च के--सब राजाओं का सम्राट् (जो० पारि०) 1
६ ग्रह चन्द्र सहित उच्च के हों वृष लग्न में चन्द्र हो--राजा हो (स० चि०) |
समस्त ग्रह उच्च के--निश्चय राजा ( शंभु० ) ।
२--३२ प्रकार के राजयोग
१--शनि, मंगल, सूर्ये, गुरु ये चारों उच्च के हों तो--४ भेद हुए ।
२--३ ग्रह उच्च के हो ओर इनमें से १ ग्रह लग्न में हों तो--१२ भेद होंगे ।
३--कर्क में चन्द्र और मंगल सूर्य शनि गुरु में से २ ग्रह उच्च के हो तो--१२
भेद होंगे ।
४- इन्ही में से १ ग्रह उच्च राशि में लग्न गत हो तो--४ भेद होंगे ।
सव ३२ प्रकार के योग हुए :
उदाहरण १--मेष का सूरय, ककं का गुरु, तुला का शनि, मकर का मंगल इनकेः
१,४,७,१० से ४ भेद हुए ।
(१)
३४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२--जब ३ ग्रह उच्च के हों इनमें से एक ग्रह रूग्न में हो तो लग्न भेद से १२ अकार के हुए।
अ--लग्न में सूर्य, तुळा का शनि, कर्क का गुरु--ठग्न १,४,७ से ३ भेद हुए ।
राजयोग : ३४५
मेष लग्न में सूर्य, ककं का गुरु, मकर का मंगल-छग्त १,४,७ से ३ भेद हुए
(४)
३४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
स--कक में गुरु, तुला में शनि, मकर का मंगल--४,७,१० लग्न से ३ भेद ।
(९) (१०)
३--अब २ ग्रह स्त्रगृही उच्चगत केन्द्र में हों और ककं का चन्द्र हो तो १२ राज
. योग । मेष में सूये, १ ककं में चन्द्र गुरु, लग्न १,४ से २ भेद ।
'राजयोग : ३४७
२--मेष का सूयं, कर्के का चन्द्र तुला का शनि लग्न १,७ से २ भेद ।
३ ४
४--कर्क का चन्द्र और गुरु, तुला का शनि लग्न ४,७ से २ भेद ।
छ |
३४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फॉलित खण्ड
` ५--कर्क का चन्द्र गुर, मकर का मंगळ लग्त ४७ से २ भेद ।
६, तुला का शनि, मकर का मंगल कर्क का गुरु, छर्न ७,१० से २ भेद ।
११ १२
४--छग्न १, चंद्र सूर्य लग्न (गुरु चंद्र) लग्न शनि चंद्र लग्न मंगल चंद्र
४ १४ ४ ७७४१० १० ४
२ क
राजयोग ! ३४९.
३--जन्म लग्न में वर्गोत्तम हो ( जो लग्न हो वही नवांश में भी हो ) और चन्द्र को छोड़कर ४,५ या ६ ग्रह देखें तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इसी प्रकार चन्द्र वर्गोत्तम हो और ४ आदि ग्रहों से दृष्ट हो तो २२ प्रकार के राजयोग होते हैं । इस प्रकार ४४ प्रकार के राजयोग हो जाते हैं । द्रष्टा ग्रहों की संख्या के अनुसार भेद नीचे दिये हैं :-- |
(अ) ४ द्रष्टा ग्रह के १५ भेद (१) सूर्य, मंगळ, बुध, गुरु (६) सूर्य मंगळ शुक्र शनि (११) मंगळ बुध गुरु शुक्र
(२) सूयं, मंगल, वुध, शुक्र (७) सूर्य बुध गुरु शुक्र (२२) मंगल बुध गुरु शनि (३) सूर्य, मंगल, बुध, शनि (८) सूर्य बुध गुरु शनि (१३) मंगल बुध शुक्र शनि (४) सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र (९) सूर्य बुध शुक्र शनि (१४) मंगल गुरु शुक्र शनि (५) सूर्य, मंगल, गुरु, शनि(१०) सूयं गुरु शुक्र शनि (१५) बुध गुरु शुक्र शनि
ब__५ द्रष्टा ग्रह के ६ भेद
१-सू्यं मंगल बुध गुरु शुक्रः २-सूयं मंगल बुध शुक्र शनि ५-सूर्यं बुध गुरु शुक्र शनि २-सूर्य मंगल बुध गुरु शनि ३-सूर्यं मंगल गुरु शुक्र शनि 5-मंगल, बुध गुरु शुक्र शनि क--६ द्रष्टा ग्रह का १ भेद
१- सूर्य, मंगल, बुघ, गुरु, शुक्र, शनि ।
इस प्रकार १५य- ६+ १=२२ भेद हुए ।
इसका उदाहरण आगे दिया है।
३५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

(चित्र / चक्र पृष्ठ 361)
३५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
जब चन्द्रमा लग्न में न हो और लग्न को न देखता हो और ४,५ या ६ ग्रह लग्न
को देखते हों तो इसी प्रकार के और २२ योग (राजयोग) होते हैं ।
४--शनि | सूर्य हि | बुध [गुरु | मंगल |भौर सूयं चन्द्र में सेलग्न ३ भेद
अ--हुंभ । मेष विष मिथुन [सिह |वृश्चिकएक ग्रह लग्न में हो ria
R isn nen aps dy
राजयोंग:. ३५३
ब--शनि चन्द्र | सूर्य बुध | शुक्र | मंगल | गुरु | लग्न २,७ से २ भेद उच्च | कन्या में। तुला | मेष | कर्के राजयोगके
इस प्रकार के ५ राजयोग हुए ।
उच्चादि ग्रह से राजयोग १--एक भी ग्रह उच्च का मित्र ग्रह से दुष्ट हो तो
राजा हो, बहुत धन एवं मित्र मण्डली से युक्त और अच्छी ख्याति हो (स? चि०) |
२-पाप ग्रह उच्च का हो तो पाप बुद्धि राजा हो, जीव शर्मा के मत से वह राजा
नहीं होता धनवान् होता है (वृ. जा.) ।
३-यदि एक या दो ग्रह अपने उच्च या मूक त्रिकोण में हों तो धनवान् हो.
(जा० सं०) ।
४-एक ग्रह उच्च का हो और अन्य सब ग्रह स्वगृही या मित्र गृही हों तो उसका
भाग्य राजा के समान हो (जा० पारि०)।
ए-अकेला ग्रह परमोच्च में हो और मित्र ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो राजा हो
(फल दीप०)। .
६-नीच स्थित ग्रह, उच्च नवांश में हो तो राजा के समान भाग्य हो (जैमिनि),
यदि उच्च राशि में होकर नीच नवांश में हो तो छाभ कारक नहीं होते ।