श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
१००२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
यहाँ ‘अन्यः’ पद परमात्माको अविनाशी अक्षर- (जीवात्मा-) से भिन्न बतानेके लिये नहीं, प्रत्युत उससे विलक्षण बतानेके लिये आया है। इसीलिये भगवान्ने आगे अठारहवें श्लोकमें अपनेको नाशवान् क्षरसे ‘अतीत’ और अविनाशी अक्षरसे ‘उत्तम’ बताया है। परमात्माका अंश होते हुए भी जीवात्माकी दृष्टि या खिंचाव नाशवान् क्षरकी ओर हो रहा है। इसीलिये यहाँ भगवान्को उससे विलक्षण बताया गया है।
‘परमात्मेत्युदाहृतः’—उस उत्तम पुरुषको ही ‘परमात्मा’ नामसे कहा जाता है। ‘परमात्मा’ शब्द निर्गुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—परम (श्रेष्ठ) आत्मा अथवा सम्पूर्ण जीवोंकी आत्मा। इस श्लोकमें ‘परमात्मा’ और ‘ईश्वर’—दोनों शब्द आये हैं, जिसका तात्पर्य है कि निर्गुण और सगुण सब एक पुरुषोत्तम ही हैं।
‘यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः’—वह उत्तम पुरुष (परमात्मा) तीनों लोकोंमें अर्थात् सर्वत्र समानरूपसे नित्य व्याप्त है।
यहाँ ‘विभर्ति’ पदका तात्पर्य यह है कि वास्तवमें परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियोंका भरण-पोषण करते हैं, पर जीवात्मा संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण भूलसे सांसारिक व्यक्तियों आदिको अपना मानकर उनके भरण-पोषणादिका भार अपने ऊपर ले लेता है। इससे वह व्यर्थ ही दुःख पाता रहता है।
भगवान्को ‘अव्ययः’ कहनेका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण लोकोंका भरण-पोषण करते रहनेपर भी भगवान्का कोई
व्यय (खर्चा) नहीं होता अर्थात् उनमें किसी तरहकी किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती। वे सदा ज्यों-के-त्यों रहते हैं।
‘ईश्वरः’ शब्द सगुणका वाचक माना जाता है, जिसका अर्थ है—शासन करनेवाला।
मार्मिक बात
यद्यपि माता-पिता बालकका पालन-पोषण किया करते हैं, तथापि बालकको इस बातका ज्ञान नहीं होता कि मेरा पालन-पोषण कौन करता है, कैसे करता है और किसलिये करता है? इसी तरह यद्यपि भगवान् मात्र प्राणियोंका पालन-पोषण करते हैं, तथापि अज्ञानी मनुष्यको (भगवान्पर दृष्टि न रहनेसे) इस बातका पता ही नहीं लगता कि मेरा पालन-पोषण कौन करता है। भगवान्का शरणागत भक्त ही इस बातको ठीक तरहसे जानता है कि एक भगवान् ही सबका सम्यक् प्रकारसे पालन-पोषण कर रहे हैं।
पालन-पोषण करनेमें भगवान् किसीके साथ कोई पक्षपात (विषमता) नहीं करते। वे भक्त-अभक्त, पापी-पुण्यात्मा, आस्तिक-नास्तिक आदि सभीका समानरूपसे पालन-पोषण करते हैं। प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि भगवान्द्वारा रचित सृष्टिमें सूर्य सबको समानरूपसे प्रकाश देता है, पृथ्वी सबको समानरूपसे धारण करती है, वैश्वानर-अग्नि सबके अन्नको समानरूपसे पचाती है, वायु सबको (श्वास लेनेके लिये) समानरूपसे प्राप्त होती है, अन्न-जल सबको समानरूपसे तृप्त करते हैं, इत्यादि।
‘जिस ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, छिपे हुए, असौम और परम अक्षर परमात्मामें विद्या और अविद्या दोनों स्थित हैं, वही ब्रह्म है। विनाशशील जड़वर्ग तो अविद्या नामसे कहा गया है और अविनाशी जीवात्मा विद्या नामसे। जो इन विद्या और अविद्या दोनोंपर शासन करता है, वह परमेश्वर इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है।’
(२) क्षर प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेताश्वतरोपनिषद् १।१०)
‘प्रकृति तो विनाशशील है और इसे भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अविनाशी है। इन दोनों-(क्षर और अक्षर-) को एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’
१-भरण-पोषणकी बात भक्तिमार्गमें ही आ सकती है, ज्ञानमार्गमें नहीं। कारण कि भक्तिमार्गमें जीव और परमात्मामें भिन्नता मानी जाती है। इसलिये इस प्रकरणको भक्तिका ही मानना चाहिये।
२-अयमुत्तमोऽयमधमो जात्या रूपेण सम्पदा वयसा। श्लाघ्योऽश्लाघ्यो वेत्थं न वेत्ति भगवाननुग्रहावसरे॥
अन्तःस्वभावभोक्ता ततोऽन्तरात्मा महामेघः। खदिरश्चम्पक इव वा प्रवर्षणं किं विचारयति॥
(प्रबोधसुधाकर २५२-२५३)
‘किसीपर कृपा करते समय भगवान् ऐसा विचार नहीं करते कि यह जाति, रूप, धन और आयुसे उत्तम है या अधम? स्तुत्य है या निन्द?’
‘यह अन्तरात्मा-रूपी महामेघ आन्तरिक भावोंका ही भोक्ता है। मेघ क्या वर्षाके समय इस बातका विचार करता है कि यह खदिर (खैर) है अथवा चम्पक (चम्पा)?’
श्लोक १८ ]
- साधक-संजीवनी *
१००३
परिशिष्ट भाव —पुरुषोत्तमको 'अन्य' कहनेका तात्पर्य है कि क्षर और अक्षर तो लौकिक हैं, पर पुरुषोत्तम दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं। अतः परमात्मा विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासके विषय हैं। परमात्माके होनेमें भक्त, सन्त-महात्मा, वेद और शास्त्र ही प्रमाण हैं। 'अन्य' का खुलासा भगवान्ने आगेके श्लोकमें किया है।
'यो लोकत्रयमाविश्य'' —इन पदोंमें बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतकका भाव आ गया है। मनुष्यका कर्तव्य तो मनुष्यलोकमें है, पर भगवान्का कर्तव्य तीनों लोकोंमें है। वास्तवमें भगवान्का अपना कोई कर्तव्य नहीं है, फिर भी वे केवल जीवोंके हितके लिये कर्तव्य करते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका बाईसवाँ, तेईसवाँ और चौबीसवाँ श्लोक)।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें वर्णित उत्तम पुरुषके साथ अपनी एकता बताकर अब साकाररूपसे प्रकट भगवान् श्रीकृष्ण अपना अत्यन्त गोपनीय रहस्य प्रकट करते हैं।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
| यस्मात् | = कारण कि | अक्षरात् | = अक्षरसे | च | = और |
|---|---|---|---|---|---|
| अहम् | = मैं | अपि | = भी | वेदे | = वेदमें |
| क्षरम् | = क्षरसे | उत्तमः | = उत्तम हूँ, | पुरुषोत्तमः | = 'पुरुषोत्तम' (नामसे) |
| अतीतः | = अतीत हूँ | अतः | = इसलिये | प्रथितः | = प्रसिद्ध |
| च | = और | लोके | = लोकमें | अस्मि | = हूँ। |
व्याख्या—'यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्' —इन पदोंमें भगवान्का यह भाव है कि क्षर (प्रकृति) प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मैं नित्य-निरन्तर निर्विकाररूपसे ज्यों-का-त्यों रहनेवाला हूँ। इसलिये मैं क्षरसे सर्वथा अतीत हूँ।
शरीरसे पर (व्यापक, श्रेष्ठ, प्रकाशक, सबल, सूक्ष्म) इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियोंसे पर मन है और मनसे पर बुद्धि है (गीता—तीसरे अध्यायका बयालीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार एक-दूसरेसे पर होते हुए भी शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि एक ही जातिके, जड़ हैं। परन्तु परमात्मतत्त्व इनसे भी अत्यन्त पर है; क्योंकि वह जड़ नहीं है, प्रत्युत चेतन है।
'अक्षरादपि चोत्तमः' —यद्यपि परमात्माका अंश होनेके कारण जीवात्मा-(अक्षर-) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है, तथापि यहाँ भगवान् अपनेको जीवात्मासे भी उत्तम बताते हैं। इसके कारण ये हैं—(१) परमात्माका अंश होनेपर भी जीवात्मा क्षर-(जड़ प्रकृति-) के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक) और प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाता है, जबकि परमात्मा (प्रकृतिसे अतीत होनेके कारण) कभी मोहित नहीं होते (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। (२) परमात्मा प्रकृतिको अपने अधीन करके लोकमें
आते, अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका छठा श्लोक), जबकि जीवात्मा प्रकृतिके वशमें होकर लोकमें आता है (गीता—आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। (३) परमात्मा सदैव निलिप्त रहते हैं, (गीता—चौथे अध्यायका चौदहवाँ और नवें अध्यायका नवाँ श्लोक), जबकि जीवात्माको निलिप्त होनेके लिये साधन करना पड़ता है (गीता—चौथे अध्यायका अठारहवाँ और सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)।
भगवान्द्वारा अपनेको क्षरसे 'अतीत' और अक्षरसे 'उत्तम' बतानेसे यह भाव भी प्रकट होता है कि क्षर और अक्षर—दोनोंमें भिन्नता है। यदि उन दोनोंमें भिन्नता न होती, तो भगवान् अपनेको या तो उन दोनोंसे ही अतीत बताते या दोनोंसे ही उत्तम बताते। अतः यह सिद्ध होता है कि जैसे भगवान् क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हैं, ऐसे ही अक्षर भी क्षरसे अतीत और उत्तम है।
'अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः' —यहाँ 'लोके' पदका अर्थ है—पुराण, स्मृति आदि शास्त्र। शास्त्रोंमें भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।
शुद्ध ज्ञानका नाम 'वेद' है, जो अनादि है। वही ज्ञान आनुपूर्वीरूपसे ऋक्, यजुः आदि वेदोंके रूपसे प्रकट हुआ है। वेदोंमें भी भगवान् 'पुरुषोत्तम' नामसे प्रसिद्ध हैं।
१००४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षर और अक्षर—दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है। वह उत्तम पुरुष कौन है—इसको बताते हुए भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि वह उत्तम पुरुष—‘पुरुषोत्तम ’ में ही हूँ।
विशेष बात
(१) भौतिक सृष्टिमात्र ‘क्षर’ (नाशवान्) है और परमात्माका सनातन अंश जीवात्मा ‘अक्षर’ (अविनाशी) है। क्षरसे अतीत और उत्तम होनेपर भी अक्षरने क्षरसे अपना सम्बन्ध मान लिया—इससे बढ़कर और कोई दोष, भूल या गलती है ही नहीं। क्षरके साथ यह सम्बन्ध केवल माना हुआ है, वास्तवमें एक क्षण भी रहनेवाला नहीं है। जैसे बाल्यावस्थासे अबतक शरीर बिल्कुल बदल गया, फिर भी हम कहते हैं कि ‘मैं वही हूँ।’ यह भी हम नहीं बता सकते कि अमुक दिन बाल्यावस्था खत्म हुई और युवावस्था शुरू हुई। कारण कि नदीके प्रवाहकी तरह शरीर निरन्तर ही बहता रहता है, जब कि अक्षर (जीवात्मा) नदीमें स्थित शिला-(चट्टान-) की तरह सदा अचल और असंग रहता है। यदि अक्षर भी क्षरकी तरह निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् होता तो इसकी आफत मिट जाती। परन्तु स्वयं (अक्षर) अपरिवर्तनशील और अविनाशी होते हुए भी निरन्तर परिवर्तनशील और नाशवान् क्षरको पकड़ लेता है—उसको अपना मान लेता है। होता यह है कि अक्षर क्षरको छोड़ता नहीं और क्षर एक क्षण भी ठहरता नहीं। इस आफतको मिटानेका सुगम उपाय है—क्षर-(शरीरादि-) को क्षर-(संसार-) की ही सेवामें लगा दिया जाय—उसको संसाररूपी वाटिकाकी खाद बना दी जाय।
मनुष्यको शरीरादि नाशवान् पदार्थ अधिकार करने अथवा अपना माननेके लिये नहीं मिले हैं, प्रत्युत सेवा करनेके लिये ही मिले हैं। इन पदार्थोंके द्वारा दूसरोंकी सेवा करनेकी ही मनुष्यपर जिम्मेवारी है, अपना माननेकी
बिल्कुल जिम्मेवारी नहीं।
(२) पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने पहले क्षर—संसार-वृक्षका वर्णन किया। फिर उसका छेदन करके परम पुरुष परमात्माके शरण होने अर्थात् संसारसे अपनापन हटाकर एकमात्र परमात्माको अपना माननेकी प्रेरणा की। फिर अक्षर—जीवात्माको अपना सनातन अंश बताते हुए उसके स्वरूपका वर्णन किया। उसके बाद भगवान्ने (बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक) अपने प्रभावका वर्णन करते हुए बताया कि सूर्य, चन्द्र और अग्निमें मेरा ही तेज है; मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे चराचर सब प्राणियोंको धारण करता हूँ; मैं ही अमृतमय चन्द्रके रूपसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंको पुष्ट करता हूँ; वैश्वानर अग्निके रूपमें मैं ही प्राणियोंके शरीरमें स्थित होकर उनके द्वारा खाये हुए अन्नको पचाता हूँ; मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें अन्तर्गामीरूपसे विद्यमान हूँ; मेरेसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (भ्रम, संशय आदि दोषोंका नाश) होता है; वेदादि सब शास्त्रोंके द्वारा मैं ही जाननेयोग्य हूँ; और वेदोंके अन्तिम सिद्धान्तका निर्णय करनेवाला तथा वेदोंको जाननेवाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार अपना प्रभाव प्रकट करनेके बाद इस श्लोकमें भगवान् यह गुह्यतम रहस्य प्रकट करते हैं कि जिसका यह सब प्रभाव है, वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) ‘पुरुषोत्तम ’ में (साक्षात् साकाररूपसे प्रकट श्रीकृष्ण) ही हूँ।
भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनपर बहुत विशेष कृपा करके ही अपने रहस्यकी बात अपने मुखसे प्रकट की है; जैसे—कोई पिता अपने पुत्रके सामने अपनी गुप्त सम्पत्ति प्रकट कर दे अथवा कोई आदमी किसी भूल-भटके मनुष्यको अपना परिचय दे दे कि जिसके लिये तू भटक रहा है, वह मैं ही हूँ और तेरे सामने बैठता हूँ!
परिशिष्ट भाव —अपनी अलौकिकताकी तरफ दृष्टि करानेके लिये यहाँ भगवान्ने ‘यस्मात् ’ पद दिया है।
‘अक्षरादपि चोत्तमः ’—‘अक्षर’ शब्द जीवात्माके लिये भी आता है और ब्रह्मके लिये भी—‘अक्षरं ब्रह्म परमम् ’ (गीता ८।३)। यह शब्द सब जगह चेतनका वाचक ही आता है, जड़का वाचक कहीं नहीं आता।
क्षर और अक्षरकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, पर परमात्माकी स्वतन्त्र सत्ता है। क्षर और अक्षर दोनों परमात्मामें ही रहते हैं। परन्तु अक्षर अर्थात् जीव क्षरके साथ सम्बन्ध जोड़कर उसके अधीन हो जाता है—‘यदेदं धार्यते जगत् ’ (गीता ७।५)। परमात्मा स्वतः असंग रहते हैं, वे क्षरके अधीन नहीं होते—‘यस्मात्क्षरमतीतोऽहम् ’। इसलिये परमात्मा अक्षर (जीव) से भी उत्तम हैं। अगर जीव जगत्के साथ सम्बन्ध न जोड़कर उसके स्वामी परमात्माके साथ सम्बन्ध जोड़े तो वह परमात्मासे अभिन्न (आत्मीय) हो जायगा—‘ज्ञानी त्वात्मेव मे मतम् ’ (गीता ७।१८)।
श्लोक ११ ]
- साधक-संजीवनी *
१००५
मुक्तिमें तो अक्षर (स्वरूप)में स्थिति होती है, पर भक्तिमें अक्षरसे भी उत्तम पुरुषोत्तमकी प्राप्ति होती है। स्वरूप अंश है, पुरुषोत्तम अंशी है।
सम्बन्ध—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात कही थी और जिसको प्राप्त करानेके लिये इस पन्द्रहवें अध्यायमें संसार, जीव और परमात्माका विस्तृत विवेचन किया गया, उसका अब आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ॥ ११ ॥
भारत | = हे भारतवंशी अर्जुन! | माम् | = मुझे | सर्वभावेन | = सब प्रकारसे ---|---|---|---|---|--- एवम् | = इस प्रकार | पुरुषोत्तमम् | = पुरुषोत्तम | माम् | = मेरा ही यः | = जो | जानाति | = जानता है, | भजति | = भजन करता है। असम्मूढः | = मोहरहित मनुष्य | सः | = वह | | | | सर्ववित् | = सर्वज्ञ | |
व्याख्या—‘यो मामेवमसम्मूढः’ —जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश है। अतः अपने अंशी परमात्माके वास्तविक सम्बन्ध-(जो सदासे ही है-) का अनुभव करना ही उसका असम्मूढ (मोहसे रहित) होना है।
संसार या परमात्माको तत्त्वसे जाननेमें मोह (मूढ़ता) ही बाधक है। किसी वस्तुकी वास्तविकताका ज्ञान तभी हो सकता है, जब उस वस्तुसे राग या द्वेषपूर्वक माना गया कोई सम्बन्ध न हो। नाशवान् पदार्थसे राग-द्वेषपूर्वक सम्बन्ध मानना ही मोह है।
संसारको तत्त्वसे जानते ही परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जानते ही संसारसे अपनी भिन्नताका अनुभव हो जाता है। तात्पर्य है कि संसारको तत्त्वसे जाननेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद हो जाता है और परमात्माको तत्त्वसे जाननेसे परमात्मासे वास्तविक सम्बन्धका अनुभव हो जाता है।
संसारसे अपना सम्बन्ध मानना ही भक्तिमें व्यभिचार-दोष है। इस व्यभिचार-दोषसे सर्वथा रहित होनेमें ही उपर्युक्त पदोंका भाव समझना चाहिये।
‘जानाति पुरुषोत्तमम्’ —जिसकी मूढ़ता सर्वथा नष्ट हो गयी है, वही मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जानता है। क्षरसे सर्वथा अतीत पुरुषोत्तम-(परमपुरुष परमात्मा-) को ही सर्वोपरि मानकर उनके सम्मुख हो जाना, केवल
उन्हींको अपना मान लेना ही भगवान्को यथार्थरूपसे ‘पुरुषोत्तम’ जानना है।
संसारमें जो कुछ भी प्रभाव देखने-सुननेमें आता है, वह सब एक भगवान्-(पुरुषोत्तम-) का ही है—ऐसा मान लेनेसे संसारका खिंचाव सर्वथा मिट जाता है। यदि संसारका थोड़ा-सा भी खिंचाव रहता है, तो यही समझना चाहिये कि अभी भगवान्को दृढ़तासे माना ही नहीं।
‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत’ —जो भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है और इस विषयमें जिसके अन्तःकरणमें कोई विकल्प, भ्रम या संशय नहीं रहता, उस मनुष्यके लिये जाननेयोग्य कोई तत्त्व शेष नहीं रहता। इसलिये भगवान् उसको ‘सर्ववित्’ कहते हैं*।
भगवान्को जाननेवाला व्यक्ति कितना ही कम पढ़ा-लिखा क्यों न हो, वह सब कुछ जाननेवाला है; क्योंकि उसने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया। उसको और कुछ भी जानना शेष नहीं है।
जो मनुष्य भगवान्को ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है, उस ‘सर्ववित्’ मनुष्यकी पहचान यह है कि वह सब प्रकारसे स्वतः भगवान्का ही भजन करता है।
जब मनुष्य भगवान्को ‘क्षरसे अतीत’ जान लेता है, तब उसका मन (राग) क्षर-(संसार-) से हटकर भगवान्में लग जाता है और जब वह भगवान्को ‘अक्षरसे
- तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ (प्रश्नोपनिषद् ४।११)
‘हे सोम्य! उस अविनाशी परमात्माको जो कोई जान लेता है, वह सर्वज्ञ है। वह सर्वरूप परमेश्वरमें प्रविष्ट हो जाता है।’
१००६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
उत्तम' जान लेता है, तब उसकी बुद्धि (श्रद्धा) भगवान्में लग जाती है*। फिर उसकी प्रत्येक वृत्ति और क्रियासे स्वतः भगवान्का भजन होता है। इस प्रकार सब प्रकारसे भगवान्का भजन करना ही 'अव्यभिचारिणी भक्ति' है। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सांसारिक पदार्थोंसे जबतक मनुष्य रागपूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है, तबतक वह सब प्रकारसे भगवान्का भजन नहीं कर सकता। कारण कि जहाँ राग होता है, वृत्ति स्वतः वहीं जाती है।
'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् ही मेरे हैं'—इस वास्तविकताको दृढ़तापूर्वक मान लेनेसे स्वतः सब प्रकारसे भगवान्का भजन होता है। फिर भक्तकी मात्र क्रियाएँ (सोना, जागना, बोलना, चलना, खाना-पीना
आदि) भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होती हैं, अपने लिये नहीं।
ज्ञानमार्गमें 'जानना' और भक्तिमार्गमें 'मानना' मुख्य होता है। जिस बातमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो, उसे दृढ़तापूर्वक 'मानना' ही भक्तिमार्गमें 'जानना' है। भगवान्को सर्वोपरि मान लेनेके बाद भक्त सब प्रकारसे भगवान्का ही भजन करता है (गीता—दसवें अध्यायका आठवाँ श्लोक)।
भगवान्को 'पुरुषोत्तम' (सर्वोपरि) माननेसे भी मनुष्य 'सर्ववित्' हो जाता है, फिर सब प्रकारसे भगवान्का भजन करते हुए भगवान्को 'पुरुषोत्तम' जान जाय—इसमें तो कहना ही क्या है!
परिशिष्ट भाव—'यो मामेवमसम्भूदो जानाति पुरुषोत्तमम्'—'जो भगवान्को जानता है, वही वास्तवमें 'असम्भूद' है (गीता—दसवें अध्यायका तीसरा श्लोक)। परन्तु जो भगवान्को नहीं जानता, वह 'मूढ़' है—'अवजानन्ति मां मूढाः' (गीता ९।११)।
'स सर्वविदुर्भवति मां सर्वभावेन भारत'—क्षर और अक्षर दोनों ही समग्र भगवान्के अंग हैं; अतः इनको जाननेवाला मनुष्य सर्ववित् (सर्वज्ञ) नहीं होता। जो क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम पुरुषोत्तमको जानता है, वही मनुष्य 'सर्ववित्' अर्थात् समग्रको जाननेवाला है। ऐसा सर्ववित् भक्त सब प्रकारसे भगवान्में ही लगा रहता है—'सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते' (गीता ६।३१); क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक भगवान्के सिवाय दूसरा कोई होता ही नहीं।
गीतामें 'सर्ववित्' शब्द केवल भक्तके लिये ही आया है। भक्त समग्रको अर्थात् लौकिक और अलौकिक दोनोंको जानता है, इसलिये वह सर्ववित् होता है। लौकिकके अन्तर्गत अलौकिक नहीं आ सकता, पर अलौकिकके अन्तर्गत लौकिक भी आ जाता है। अतः निर्गुण तत्त्व (अक्षर) को जाननेवाला ब्रह्मज्ञानी सर्ववित् नहीं होता, प्रत्युत समग्र भगवान्को जाननेवाला भक्त सर्ववित् होता है।
सम्बन्ध—'अरुन्धती-दर्शन-न्याय'-(स्थूलसे क्रमशः सूक्ष्मकी ओर जाने-) के अनुसार भगवान्ने इस अध्यायमें पहले 'क्षर' और फिर 'अक्षर' का विवेचन करनेके बाद अन्तमें 'पुरुषोत्तम' का वर्णन किया—अपने पुरुषोत्तमत्वको सिद्ध किया। ऐसा वर्णन करनेका तात्पर्य और प्रयोजन क्या है—इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
इति गृह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतदबुद्ध्वा बुद्धिमानस्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
| अनघ | = हे निष्पाप | मया | = मेरे द्वारा | बुद्धिमान् | = ज्ञानवान् |
|---|---|---|---|---|---|
| अर्जुन! | उक्तम् | = कहा गया है। | (ज्ञात-ज्ञातव्य) | ||
| इति | = इस प्रकार | भारत | = हे भरतवंशी | च | = (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) |
| इदम् | = यह | अर्जुन! | और | ||
| गृह्यतमम् | = अत्यन्त गोपनीय | एतत् | = इसको | कृतकृत्यः | = कृतकृत्य |
| शास्त्रम् | = शास्त्र | बुद्ध्वा | = जानकर (मनुष्य) | स्यात् | = हो जाता है। |
- किसी विशेष महत्त्वपूर्ण बातपर मन रागपूर्वक तथा बुद्धि श्रद्धापूर्वक लगती है।
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
१००७
व्याख्या—‘अनघ’—अर्जुनको निष्पाप इसलिये कहा गया है कि वे दोष-दृष्टि-(असूया-) से रहित थे। दोष-दृष्टि करना पाप है। इससे अन्तःकरण अशुद्ध होता है। जो दोष-दृष्टिसे रहित होता है, वही भक्तिका पात्र होता है।
गोपनीय बात दोष-दृष्टिसे रहित मनुष्यके सामने ही कही जाती है*। यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय बात कह दी जाय, तो उस मनुष्यपर उस बातका उलटा असर पड़ता है अर्थात् वह उस गोपनीय बातका उलटा अर्थ लगाकर वक्तमें भी दोष देखने लगता है कि यह आत्मशलाधी है; दूसरोंको मोहित करनेके लिये कहता है इत्यादि। इससे दोष-दृष्टिवाले मनुष्यकी बहुत हानि होती है।
दोष-दृष्टि होनेमें खास कारण है—अभिमान। मनुष्यमें जिस बातका अभिमान हो, उस बातकी उसमें कमी होती है। उस कमीको वह दूसरोंमें देखने लगता है। अपनेमें अच्छाईका अभिमान होनेसे दूसरोंमें बुराई दीखती है; और दूसरोंमें बुराई देखनेसे ही अपनेमें अच्छाईका अभिमान आता है।
यदि दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने भगवान् अपनेको सर्वोपरि ‘पुरुषोत्तम’ कहें, तो उसको विश्वास नहीं होगा, उलटे वह यह सोचेगा कि भगवान् आत्मशलाधी (अपने मुँह अपनी बड़ाई करनेवाले) हैं—
‘निज अग्यान राम पर धरहीं।’ (मानस ७।७३।५)
भगवान्के प्रति दोष-दृष्टि होनेसे उसकी बहुत हानि होती है। इसलिये भगवान् और संतजन दोष-दृष्टिवाले अश्रद्धालु मनुष्यके सामने गोपनीय बातें प्रकट नहीं करते (गीता—अठारहवें अध्यायका सङ्गठवाँ श्लोक)। वास्तवमें देखा जाय तो दोष-दृष्टिवाले मनुष्यके सामने गोपनीय (रहस्ययुक्त) बातें मुखसे निकलती ही नहीं!
अर्जुनके लिये ‘अनघ’ सम्बोधन देनेमें यह भाव भी हो सकता है कि इस अध्यायमें भगवान्ने जो परमगोपनीय प्रभाव बताया है, वह अर्जुन-जैसे दोष-दृष्टिसे रहित सरल पुरुषके सम्मुख ही प्रकट किया जा सकता है।
‘इति गुह्यतमं शास्त्रमिदम्’—चौदहवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें अत्यभिचारिणी भक्तिकी बात कहनेके बाद भगवान्ने पन्द्रहवें अध्यायके पहले श्लोकसे उन्नीसवें
श्लोकतक जिस (क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमके) विषयका वर्णन किया है, उस विषयकी पूर्णता और लक्ष्यका निर्देश यहाँ ‘इति इदम्’ पदोंसे किया गया है।
इस अध्यायमें पहले भगवान्ने क्षर (संसार) और अक्षर-(जीवात्मा-) का वर्णन करके अपना अप्रतिम प्रभाव (बारहवेंसे पंद्रहवें श्लोकतक) प्रकट किया। फिर भगवान्ने यह गोपनीय बात प्रकट की कि जिसका यह सब प्रभाव है, वह (क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम) ‘पुरुषोत्तम’ मैं ही हूँ।
नाटकमें स्वाँग धारण किये हुए मनुष्यकी तरह भगवान् इस पृथ्वीपर मनुष्यका स्वाँग धारण करके अवतरित होते हैं और ऐसा बताव करते हैं कि अज्ञानी मनुष्य उनको नहीं जान पाते (गीता—सातवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। स्वाँगमें अपना वास्तविक परिचय नहीं दिया जाता, गुप्त रखा जाता है। परन्तु भगवान्ने इस अध्यायमें (अठारहवें श्लोकमें) अपना वास्तविक परिचय देकर अत्यन्त गोपनीय बात प्रकट कर दी कि मैं ही पुरुषोत्तम हूँ। इसलिये इस अध्यायको ‘गुह्यतम’ कहा गया है।
‘शास्त्र’ में प्रायः संसार, जीवात्मा और परमात्माका वर्णन आता है। इन तीनोंका ही वर्णन पंद्रहवें अध्यायमें हुआ है, इसलिये इस अध्यायको ‘शास्त्र’ भी कहा गया है।
सर्वशास्त्रमयी गीतामें केवल इसी अध्यायको ‘शास्त्र’ की उपाधि मिली है। इसमें ‘पुरुषोत्तम’ का वर्णन मुख्य होनेके कारण इस अध्यायको ‘गुह्यतम शास्त्र’ कहा गया है। इस गुह्यतम शास्त्रमें भगवान्ने अपनी प्रापतिके छः उपायोंका वर्णन किया है—
(१) संसारको तत्त्वसे जानना (पहला श्लोक)।
(२) संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करके एक भगवान्के शरण होना (तीसरा-चौथा श्लोक)।
(३) अपनेमें स्थित परमात्मतत्त्वको जानना (ग्यारहवाँ श्लोक)।
(४) वेदाध्ययनके द्वारा तत्त्वको जानना (पन्द्रहवाँ श्लोक)।
(५) भगवान्को पुरुषोत्तम जानकर सब प्रकारसे उनका भजन करना (उन्नीसवाँ श्लोक)।
- नवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने अर्जुनको दोष-दृष्टिसे रहित कहते हुए ही गुह्यतम ज्ञान बतानेकी प्रतिज्ञा की थी—‘इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूययै।’ इस पंद्रहवें अध्यायमें तो नवें अध्यायसे भी अधिक गोपनीय विषय बताया गया है। अतः यहाँ ‘अनघ’का तात्पर्य ‘अनसूया’ मानना उचित ही है।
१००८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
(६) सम्पूर्ण अध्यायके तत्त्वको जानना (बीसवों श्लोक)।
जिस अध्यायमें भगवत्प्राप्तिके ऐसे सुगम उपाय बताये गये हों, उसको 'शास्त्र' कहना उचित ही है।
'मया उक्तम् '—इन पदोंसे भगवान् यह कहते हैं कि सम्पूर्ण भौतिक जगत्का प्रकाशक और अधिष्ठान, समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित, वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य एवं क्षर और अक्षर दोनोंसे उत्तम साक्षात् मुझ पुरुषोत्तमके द्वारा ही यह गुह्यतम शास्त्र अत्यन्त कृपापूर्वक कहा गया है। अपने विषयमें जैसा मैं कह सकता हूँ, वैसा कोई नहीं कह सकता। कारण कि दूसरा पहले (मेरी ही कृपाशक्तिसे) मेरेको जानेगा*, फिर वह मेरे विषयमें कुछ कहेगा, जबकि मेरेमें अनजानपना है ही नहीं।
वास्तवमें स्वयं भगवान्के अतिरिक्त दूसरा कोई भी उनको पूर्णरूपसे नहीं जान सकता (गीता—दसवें अध्यायका दूसरा और पन्द्रहवाँ श्लोक)। छठे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से कहा था कि आपके सिवाय दूसरा कोई भी मेरे संशयका छेदन नहीं कर सकता। यहाँ भगवान् मानो यह कह रहे हैं कि मेरे द्वारा कहे हुए विषयमें किसी प्रकारका संशय रहनेकी सम्भावना ही नहीं है।
'एतद्वबुद्ध्या बुद्धिमानस्याकृतकृत्यश्च भारत '—पूरे अध्यायमें भगवान्ने जो संसारकी वास्तविकता, जीवात्माके स्वरूप और अपने अप्रतिम प्रभाव एवं गोपनीयताका वर्णन किया है, उसका (विशेषरूपसे उन्नीसवें श्लोकका) निर्देश यहाँ 'एतत् ' पदसे किया गया है। इस गुह्यतम शास्त्रको जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह ज्ञानवान् अर्थात् ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। उसके लिये कुछ भी
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने इस अध्यायमें अपने-आपको पुरुषोत्तमरूपसे अर्थात् अलौकिक समग्ररूपसे प्रकट किया है, इसलिये इसको 'गुह्यतम शास्त्र' कहा गया है।
मनुष्य कर्मयोगसे कृतकृत्य, ज्ञानयोगसे ज्ञात-ज्ञातव्य और भक्तियोगसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। मेरेको अपने लिये कुछ नहीं करना है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। शरीर मेरा नहीं है, शरीरपर मेरा अधिकार नहीं है तथा शरीरसे मेरा सम्बन्ध नहीं है—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। मेरेको कुछ नहीं चाहिये—ऐसा अनुभव होनेसे मनुष्य प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। इस श्लोकमें आये 'बुद्धिमान् ' पदमें ज्ञात-ज्ञातव्य होनेका भाव आया है। पूर्वश्लोकमें 'स सर्वविद्वजति मां सर्वभावेन भारत ' पदोंमें प्राप्त-प्राप्तव्य होनेका भाव आया है। प्रस्तुत श्लोकमें आये 'च ' पदसे भी अनुक्त समुच्चय अर्थ—प्राप्त-प्राप्तव्य ले सकते हैं। लौकिक क्षर और अक्षर तो प्राप्त हैं; अतः अलौकिक
जानना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने जाननेयोग्य पुरुषोत्तमको जान लिया।
परमात्मतत्त्वको जाननेसे मनुष्यकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। परमात्मतत्त्वको जाने बिना लौकिक सम्पूर्ण विद्याएँ, भाषाएँ, कलाएँ आदि क्यों न जान ली जायँ, उनसे मूढ़ता नहीं मिटती; क्योंकि लौकिक सब विद्याएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली तथा अपूर्ण हैं। जितनी लौकिक विद्याएँ हैं, सब परमात्मासे ही प्रकट होनेवाली हैं; अतः वे परमात्माको कैसे प्रकाशित कर सकती हैं? इन सब लौकिक विद्याओंसे अनजान होते हुए भी जिसने परमात्माको जान लिया है, वही वास्तवमें ज्ञानवान् है।
उन्नीसवें श्लोकमें सब प्रकारसे भजन करनेवाले जिस मोहरहित भक्तको 'सर्ववित् ' कहा गया है, उसीको यहाँ 'बुद्धिमान् ' नामसे कहा गया है।
यहाँ 'च ' पदमें पूर्वश्लोकमें आयी बातके फल- (प्राप्त-प्राप्तव्यता-) का अनुकर्षण है। पूर्वश्लोकमें सर्वभावसे भगवान्का भजन करने अर्थात् अव्यभिचारिणी भक्तिकी बात विशेषरूपसे आयी है। भक्तिके समान कोई लाभ नहीं है—'लाभु कि किञ्च ह्री भगति समाना ' (मानस ७। ११२। ४)। अतः जिसने भक्तिको प्राप्त कर लिया, वह प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।
भगवतत्त्वकी यह विलक्षणता है कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनोंमेंसे किसी एककी सिद्धिसे कृतकृत्यता, ज्ञात-ज्ञातव्यता और प्राप्त-प्राप्तव्यता—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये जो भगवतत्त्वको जान लेता है, उसके लिये फिर कुछ जानना, पाना और करना शेष नहीं रहता। उसका मनुष्यजीवन सफल हो जाता है।
- सोड़ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हिरि कृपां तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥ (मानस २।१२७।२)
श्लोक २० ]
- साधक-संजीवनी *
१००९
परमात्मा ही प्राप्तव्य है। इस श्लोकसे यह भाव निकलता है कि भक्तको ज्ञानयोग और कर्मयोग—दोनोंका फल प्राप्त हो जाता है अर्थात् वह ज्ञात-ज्ञातव्य और कृतकृत्य भी हो जाता है (गीता—सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ और दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार ॐ, तत्, सत्—इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतापनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ‘पुरुषोत्तमयोग’ नामक पंद्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
इस अध्यायमें कहे हुए विषयको यथार्थरूपसे समझ लेनेपर पुरुषोत्तम-(भगवान्-) के साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। इसलिये इस अध्यायका नाम ‘पुरुषोत्तमयोग’ रखा गया है।
पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच
(१) इस अध्यायमें ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के तीन, ‘श्रीभगवानुवाच’ के दो, श्लोकोंके दो सौ अट्ठासी और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग तीन सौ छः है।
(२) ‘अथ पंचदशोऽध्यायः’ के आठ, ‘श्रीभगवानुवाच’ के सात, श्लोकोंके सात सौ एक और पुष्पिकाके छियालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग सात सौ बासठ है। इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, चौथा, पाँचवाँ और पंद्रहवाँ—ये चार श्लोक चौवालीस अक्षरोंके और तीसरा श्लोक पैतालीस
अक्षरोंका है। शेष पंद्रह श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं।
(३) इस अध्यायमें एक उवाच है—‘श्रीभगवानुवाच।’
पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द
इस अध्यायके बीस श्लोकोंमेंसे दूसरा, तीसरा और चौथा—ये तीन श्लोक ‘उपजाति’ छन्दवाले हैं; और पाँचवाँ तथा पंद्रहवाँ—ये दो श्लोक ‘इन्द्रवज्रा’ छन्दवाले हैं। बचे हुए पंद्रह श्लोकोंमेंसे—सातवें श्लोकके प्रथम और तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘जातिपक्ष-विपुला’; नवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा बीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘रगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘र-विपुला’; अठारहवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘मगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘म-विपुला’; और उन्नीसवें श्लोकके तृतीय चरणमें ‘नगण’ प्रयुक्त होनेसे ‘न-विपुला’ संज्ञावाले छन्द हैं। शेष दस (१, ६, ८, १०—१४, १६—१७) श्लोक ठीक ‘पध्यावक्त्र’ अनुष्टुप् छन्दके लक्षणोंसे युक्त हैं।
पन्द्रहवें अध्यायका सार
भगवान्ने सातवें अध्यायमें अपनी दो प्रकृतियोंका वर्णन किया था—अपरा और परा (७।४-५)। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार—यह आठ प्रकारके भेदोंवाली ‘अपरा प्रकृति’ है और जिसने जगत्को धारण किया हुआ है, वह जीवरूप बनी हुई ‘परा प्रकृति’ है। अपरा और परा—दोनों ईश्वरकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव हैं। अपरा, परा और ईश्वर—इन तीनोंका विस्तारसे वर्णन भगवान् पन्द्रहवें अध्यायमें करते हैं। पन्द्रहवें अध्यायमें पहले संसार-वृक्षके रूपमें ‘अपरा’ का वर्णन करते हैं, फिर सातवें ग्यारहवें श्लोकतक अपने अंश-रूपसे ‘पराका वर्णन करते हैं, फिर बारहवेंसे पन्द्रहवें श्लोकतक अपने प्रभावका वर्णन करते हैं। अन्तमें अपरा, परा और ईश्वर—तीनोंका क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम नामसे वर्णन करके अध्यायका उपसंहार करते हैं।
सातवें अध्यायमें तो भगवान्ने अपरा और परा— दोनोंको अपनी प्रकृति अर्थात् अपनेसे अभिन्न बताया है—‘इतीयं मे’ (७।४), ‘मे पराम्’ (७।५)। परन्तु पन्द्रहवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें अपनेको अपरा (क्षर) से अतीत और परा (अक्षर) से उत्तम बताया है। इसका तात्पर्य है कि जबतक साधक अपरा (संसार) और परा (स्वयं)—दोनोंकी स्वतन्त्र सत्ता मानता है, तबतक भगवान् अपरासे अतीत और परासे उत्तम हैं। परन्तु जब उसकी मान्यतामें अपरा और पराकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती, तब अपरा, परा और भगवान्—तीनों एक ही होते हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (९।१९)।
पन्द्रहवें अध्यायके मध्यमें अक्षर (जीवात्मा) के वर्णनका तात्पर्य है कि जीवके एक तरफ क्षर (संसार) है और एक तरफ पुरुषोत्तम (परमात्मा) है। जीवका सम्बन्ध परमात्माके साथ है—‘ममैवांशो जीवलोकै’; क्योंकि जैसे
१०१०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १५ ]
परमात्मा चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील हैं, ऐसे ही जीव भी चेतन, अविनाशी और अपरिवर्तनशील है। शरीरका सम्बन्ध संसारके साथ है—‘मनः षष्ठीनीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि ’; क्योंकि जैसे संसार जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है, ऐसे ही शरीर भी जड़, नाशवान् और परिवर्तनशील है। जीवको परमात्मासे कभी अलग नहीं कर सकते और शरीरको संसारसे कभी अलग नहीं कर सकते।
परमात्मा उसको कहते हैं, जो अभी हो, सबमें हो, सबका हो, सर्वसमर्थ हो, परम दयालु हो और अद्वितीय हो। अभी होनेके कारण उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी आशा नहीं करनी पड़ेगी। सबमें होनेसे वह अपनेमें भी है; अतः उनको ढूँढ़नेके लिये कहीं जाना नहीं पड़ेगा। सबका होनेसे वह अपना भी है; अतः उसमें स्वतः प्रेम होगा। सर्वसमर्थ होनेसे हमें भयभीत होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। परमदयालु होनेसे हमें निराश होनेकी जरूरत नहीं रहेगी। अद्वितीय होनेसे हमें उसको पहचाननेकी, उसका वर्णन करनेकी जरूरत नहीं रहेगी।
परमात्माकी प्राप्ति न होनेका कारण यही है कि हम उसकी सत्ता और महत्ता स्वीकार नहीं करते और उसको अपना नहीं मानते। अगर हम उसकी सत्ता, महत्ता और अपनेपनको स्वीकार करते तो फिर वह हमें अप्राप्त नहीं लगता। वह हमें स्वतः प्यारा लगता; क्योंकि परमात्माको अपना माननेके सिवाय प्रेम-प्राप्तिका और कोई उपाय है ही नहीं। प्रेम यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत आदि बड़े-बड़े पुण्यकर्मोंसे नहीं मिलता, प्रत्युत भगवान्को अपना माननेसे मिलता है। भगवान्ने कहा है—‘ममैवांशो जीवलोकैः ’ (१५।७)। इसका तात्पर्य है कि जीव केवल मेरा (भगवान्का) ही अंश है, इसमें अन्य किसीका मिश्रण नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि केवल भगवान्का ही अंश होनेके कारण हमारा सम्बन्ध केवल भगवान्के ही साथ है। जब हम भगवान्के ही अंश हैं, तो फिर प्रकृतिका कार्य शरीर अपना कैसे हुआ? अतः भगवान् ही अपने हैं, दूसरा कोई भी अपना नहीं है। भगवान्का ही अंश होनेके कारण हम भगवान्से अलग नहीं हो सकते, उनको छोड़ नहीं सकते। सर्वसमर्थ भगवान् भी जीवसे अलग नहीं हो सकते, जीवको छोड़ नहीं सकते। अगर भगवान् जीवको छोड़ दें तो जीव एक नया भगवान् हो जायगा अर्थात् भगवान् एक नहीं रहेंगे, प्रत्युत अनेक हो जायेंगे, जो कभी सम्भव नहीं है। जिसको हम छोड़ नहीं सकते, उसके विषयमें यह प्रश्न ही नहीं उठता कि वह कैसा है? अतः भगवान् कैसे हैं, क्या हैं, यह विचार न करके उनमें प्रेम करना चाहिये। जब मनुष्य संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है और जब परमात्माके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब मुक्त होकर भक्त हो जाता है। मनुष्यसे सबसे बड़ी गलती यह होती है कि जो शरीर संसारका है, उसको अपना मान लेता है और जो वास्तवमें अपना है, उस परमात्माको भूल जाता है। जब साधक इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि शरीर मेरा नहीं है और मेरे लिये भी नहीं है, तब उसके द्वारा स्वतः संसारकी ‘सेवा’ होती है। जब वह इस सत्यको स्वीकार कर लेता है कि भगवान् मेरे हैं और मेरे लिये हैं, तब उसका स्वतः भगवान्में ‘प्रेम’ होता है। सेवाके बदलेमें साधकको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि संसारकी ही वस्तु संसारको दे दी तो अपना क्या खर्च हुआ? नया उद्योग क्या हुआ? प्रेमके बदलेमें भी उसको कुछ नहीं चाहिये; क्योंकि जो सदासे ही अपना है, उसमें प्रेमसे बढ़कर ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसकी उसको आवश्यकता हो। प्रभु मेरे लिये हैं, इसलिये अपनेको उनके अर्पित करना है, उनसे कुछ लेना नहीं है। उनसे कुछ चाहनेसे हम उनसे अलग हो जायेंगे और अपनेको देनेसे उनसे अभिन्न हो जायेंगे।
सेवासे मुक्ति होती है और प्रेमसे पराभूतिक प्राप्त होती है। मुक्तिसे निरपेक्ष जीवनकी और भक्तिसे सरस जीवनकी प्राप्ति हो जाती है।
—◆◆◆—
॥ ॐ श्रीप्रमात्मने नमः ॥
अथ षोडशोऽध्यायः
अवतरणिका—
श्रीभगवान्ने सातवें अध्यायके पंद्रहवें श्लोकमें 'दुष्कृतिनो मूढाः आसुरं भावमाश्रिताः मां न प्रपद्यन्ते' (बुरे कर्म करनेवाले तथा आसुरी प्रकृतिको धारण करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरा भजन नहीं करते) पदोंसे आसुरी सम्पत्तिलाँका और सोलहवें श्लोकमें 'सुकृतिनः मां भजन्ते' (पुण्यकर्म लोग मेरा भजन करते हैं) पदोंसे दैवी सम्पत्तिलाँका संकेतरूपसे वर्णन किया। सातवें अध्यायके अन्तिम दो श्लोकोंपर अर्जुनने आठवें अध्यायके आरम्भमें सात प्रश्न किये। उन प्रश्नोंके उत्तरमें आठवाँ अध्याय पूरा हुआ।
भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसी विज्ञानसहित ज्ञानको कहनेके लिये नवें अध्यायका विषय आरम्भ किया। इस नवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी 'राक्षसीमासुरी चैव प्रकृतितं मोहिनीं श्रिताः' पदोंसे आसुरी सम्पदावालोंका और तेरहवें श्लोकमें 'दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः मां भजन्ते' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका संक्षेपसे वर्णन करके दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकतक ज्ञान-विज्ञानका विषय कहा।
दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकके बाद भगवान्को दैवी-आसुरी-सम्पदाका विस्तारसे वर्णन करना चाहिये था, पर भगवान्के प्रभावसे प्रभावित होकर अर्जुनने भगवान्की स्तुति की एवं पुनः विभूति कहनेके लिये उनसे प्रार्थना की। विभूतियोंका वर्णन करते हुए भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें अर्जुनसे कहा कि 'तुझे अधिक जाननेसे क्या मतलब? मैं तो सारे संसारको एक अंशमें व्याप्त करके स्थित हूँ।' इसपर उस स्वरूपको (जिसके एक अंशमें सारा संसार स्थित है) देखनेके लिये उत्सुक हुए अर्जुनने ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्से अपना विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की।
अर्जुनको अपना विश्वरूप दिखाकर भगवान्ने ग्यारहवें अध्यायके चौवनवें-पचपनवें श्लोकोंमें अनन्य-भक्तिकी महिमा एवं उसका स्वरूप बताया। इसपर सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताके विषयमें अर्जुनने बारहवें अध्यायके पहले श्लोकमें प्रश्न किया। अतः भगवान्ने बारहवें अध्यायमें सगुण-उपासकोंका वर्णन करके तेरहवें अध्यायसे चौदहवें अध्यायके बीसवें श्लोकतक निर्गुण-विषयका वर्णन किया। फिर अर्जुनने चौदहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीतके लक्षण, आचरण एवं गुणातीत होनेका उपाय पूछा। उन प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवान्ने छब्बीसवें श्लोकमें 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते' पदोंसे अव्यभिचारिणी भक्तिको गुणातीत होनेका उपाय बताया अर्थात् अव्यभिचारसे दैवी सम्पत्तिका और व्यभिचारसे आसुरी सम्पत्तिका संकेत किया। वह अव्यभिचारी भक्ति कैसे प्राप्त हो—यह बतानेके लिये पन्द्रहवें अध्यायका आरम्भ हुआ।
पंद्रहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने 'असंगशस्त्रेण दृढेन छिन्त्वा' पदोंसे आसुरी सम्पत्तिके कारणरूप 'संग'-(संसारकी आसक्ति-) का त्याग करके असंगतासे प्रकट होनेवाली दैवी सम्पत्तिकी बात कही। फिर चौथे श्लोकमें 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' पदोंसे शरणागतिरूप दैवी सम्पत्तिका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो शरण नहीं होते, उन आसुरी सम्पत्तिलाँका संकेत किया। फिर उन्नीसवें श्लोकमें 'स सर्वविदु असम्भूदः मां सर्वभावेन भजति' पदोंसे दैवी सम्पदावालोंका अर्थात् अधिकारियोंका वर्णन किया और अर्थान्तरमें जो भगवान्का भजन नहीं करते, उन आसुरी सम्पदावालोंका अर्थात् अनधिकारियोंका वर्णन किया।
इस प्रकार अर्जुनके अन्य प्रश्नोंके कारण अबतक भगवान्को दैवी और आसुरी सम्पदापर विस्तारसे कहनेका अवसर प्राप्त नहीं हुआ। अब अर्जुनका कोई प्रश्न न रहनेसे भगवान् इस सोलहवें अध्यायमें दैवी और आसुरी सम्पदाका विस्तारसे वर्णन आरम्भ करते हैं।
१०१२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले—
अभयम् | = भयका सर्वथा अभाव, | योगमें दृढ़ स्थिति, | स्वाध्यायः | = स्वाध्याय, ---|---|---|---|--- सत्त्वसंशुद्धिः | = अन्तःकरणकी अत्यन्त शुद्धि, | च | = और | लिये कष्ट सहना ज्ञानयोग- | | दानम् | = सात्त्विक दान, | च | = और व्यवस्थितिः | = ज्ञानके लिये | दमः | = इन्द्रियोंका दमन, | आर्जवम् | = शरीर-मन-वाणीकी सरलता। | | यज्ञः | = यज्ञ, | |
व्याख्या—[पंद्रहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि 'जो मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकारसे मेरा ही भजन करता है अर्थात् वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है।' इस प्रकार एकमात्र भगवान्का उद्देश्य होनेपर साधकमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होने लग जाती है। अतः भगवान् पहले तीन श्लोकोंमें क्रमशः भाव, आचरण और प्रभावको लेकर दैवी-सम्पत्तिका वर्णन करते हैं।]
'अभयम्'—अनिष्टकी आशंकासे मनुष्यके भीतर जो घबरहट होती है, उसका नाम भय है और उस भयके सर्वथा अभावका नाम 'अभय' है।
भय दो रीतिसे होता है—(१) बाहरसे और (२) भीतरसे।
(१) बाहरसे आनेवाला भय—
(क) चोर, डाकू, व्याघ्र, सर्प आदि प्राणियोंसे जो भय होता है, वह बाहरका भय है। यह भय शरीरनाशकी आशंकासे ही होता है। परन्तु जब यह अनुभव हो जाता है कि यह शरीर नाशवान् है और जानेवाला ही है, तो फिर भय नहीं रहता।
बीडी-सिगरेट, अफीम, भाँग, शराब आदिके व्यसनोंको छोड़नेका एवं व्यसनी मित्रोंसे अपनी मित्रता टूटनेका जो भय होता है, वह मनुष्यकी अपनी कायरतासे ही होता है। कायरता छोड़नेसे यह भय नहीं रहता।
(ख) अपने वर्ण, आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्य-पालन करते हुए उसमें भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई काम न हो जाय; हमें विद्या पढ़ानेवाले, अच्छी शिक्षा देनेवाले आचार्य, गुरु, सन्त-महात्मा, माता-पिता आदिके वचनोंकी आज्ञाकी अवहेलना न हो जाय; हमारे द्वारा शास्त्र और कुलमर्यादाके विरुद्ध कोई आचरण न बन जाय—इस प्रकारका भय भी बाहरी भय कहलाता है। परन्तु यह भय वास्तवमें भय नहीं है, प्रत्युत यह तो अभय बनानेवाला भय है। ऐसा भय तो साधकके जीवनमें होना ही चाहिये। ऐसा भय होनेसे ही वह अपने मार्गपर ठीक तरहसे चल सकता है। कहा भी है—
हरि-डर, गुरु-डर, जगत-डर, डर करनी में सार।
रज्जब डर्या सो ऊबर्या, गाफिल खायी मार ॥
(२) भीतरसे पैदा होनेवाला भय—
(क) मनुष्य जब पाप, अन्याय, अत्याचार आदि निषिद्ध आचरण करना चाहता है, तब (उनको करनेकी भावना मनमें आते ही) भीतरसे भय पैदा होता है। मनुष्य निषिद्ध आचरण तभीतक करता है, जबतक उसके मनमें 'मेरा शरीर बना रहे, मेरा मान-सम्मान होता रहे, मेरेको सांसारिक भोग-पदार्थ मिलते रहें', इस प्रकार सांसारिक जड़ वस्तुओंकी प्राप्तिका और उनकी रक्षाका उद्देश्य रहता है'। परन्तु जब मनुष्यका एकमात्र उद्देश्य चिन्मय-तत्त्वको
१-यहाँ दैवी सम्पत्तिमें सबसे पहले 'अभयम्' पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर सर्वभावसे भगवान्का भजन करता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है। भगवान् श्रीराम कहते हैं—
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येत्तद् ब्रतं मम ॥ (वाल्मीकिः ६।१८।३३)
२-भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैत्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।
शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्॥
(भर्तृहरिवैराग्यशतक)
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१३
प्राप्त करनेका हो जाता है, तब उसके द्वारा अन्याय, दुराचार छूट जाते हैं और वह सर्वथा अभय हो जाता है। कारण कि उसके लक्ष्य परमात्मत्वमें कभी कभी नहीं आती और वह कभी नष्ट नहीं होता।
(ख) जब मनुष्यके आचरण ठीक नहीं होते और वह अन्याय, अत्याचार आदिमें लगा रहता है, तब उसको भय लगता है। जैसे, रावणसे मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि सभी डरते थे, पर वही रावण जब सीताका हरण करनेके लिये जाता है, तब वह डरता है। ऐसे ही कौरवोंकी ग्यारह अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तो उसका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं हुआ (गीता—पहले अध्यायका तेरहवाँ श्लोक), पर जब पाण्डवोंकी सात अश्वीहिणी सेनाके बाजे बजे, तब कौरव-सेनाके हृदय विदीर्ण हो गये (पहले अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह कि अन्याय, अत्याचार करनेवालोंके हृदय कमजोर हो जाते हैं, इसलिये वे भयभीत होते हैं। जब मनुष्य अन्याय आदिको छोड़कर अपने आचरणों एवं भावोंको शुद्ध बनाता है, तब उसका भय मिट जाता है।
(ग) मनुष्य-शरीर प्राप्त करके यह जीव जबतक करनेयोग्यको नहीं करता, जाननेयोग्यको नहीं जानता और पानेयोग्यको नहीं पाता, तबतक वह सर्वथा अभय नहीं हो सकता; उसके जीवनमें भय रहता ही है।
भगवान्की तरफ चलनेवाला साधक भगवान्पर जितना-जितना अधिक विश्वास करता है और उनके आश्रित होता है, उतना-ही-उतना वह अभय होता चला जाता है। उसमें स्वतः यह विचार आता है कि मैं तो परमात्माका अंश हूँ; अतः कभी नष्ट होनेवाला नहीं हूँ, तो फिर भय किस बातका? और संसारके अंश शरीर आदि सब पदार्थ प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, तो फिर भय किस बातका? ऐसा विवेक स्पष्टरूपसे प्रकट होनेपर भय स्वतः नष्ट हो जाता है और साधक सर्वथा अभय हो जाता है।
भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेपर, भगवान्को ही
अपना माननेपर शरीर, कुटुम्ब आदिमें ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे मरनेका भय नहीं रहता और साधक अभय हो जाता है।
‘सत्त्वसंशुद्धिः’—अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धिको सत्त्वसंशुद्धि कहते हैं। सम्यक् शुद्धि क्या है? संसारसे राग रहित होकर भगवान्में अनुराग हो जाना ही अन्तःकरणकी सम्यक् शुद्धि है। जब अपना विचार, भाव, उद्देश्य, लक्ष्य केवल एक परमात्माकी प्राप्तिका हो जाता है, तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। कारण कि नाशवान् वस्तुओंकी प्राप्तिका उद्देश्य होनेसे ही अन्तःकरणमें मल, विक्षेप और आवरण—ये तीन तरहके दोष आते हैं। शास्त्रोंमें मल-दोषको दूर करनेके लिये निष्कामभावसे कर्म (सेवा), विक्षेप-दोषको दूर करनेके लिये उपासना और आवरण-दोषको दूर करनेके लिये ज्ञान बताया है। यह होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये सबसे बढ़िया उपाय है—अन्तःकरणको अपना न मानना।
साधकको पुराने पापको दूर करनेके लिये या किसी परिस्थितिके वशीभूत होकर किये गये नये पापको दूर करनेके लिये अन्य प्रायश्चित्त करनेकी उतनी आवश्यकता नहीं है। उसको तो चाहिये कि वह जो साधन कर रहा है, उसीमें उत्साह और तत्परतापूर्वक लगा रहे। फिर उसके ज्ञात-अज्ञात सब पाप दूर हो जायेंगे और अन्तःकरण स्वतः शुद्ध हो जायगा।
साधकमें ऐसी एक भावना बन जाती है कि साधन-भजन करना अलग काम है और व्यापार-धंधा आदि करना अलग काम है अर्थात् ये दोनों अलग-अलग विभाग हैं। इसलिये व्यापार आदि व्यवहारमें झूठ-कपट आदि तो करने ही पड़ते हैं—ऐसी जो छूट ली जाती है, उससे अन्तःकरण बहुत ही अशुद्ध होता है। साधनके साथ-साथ जो असामान्य होता रहता है, उससे साधनमें जल्दी उन्नति नहीं होती। इसलिये साधकको सदा सावधान रहना चाहिये अर्थात् नया पाप कभी न बने—ऐसी सावधानी सदा-सर्वदा बनी रहनी चाहिये।
‘भोगोंमें रोगका भय, ऊँचे कुलमें गिरनेका भय, धनमें राजाका भय, मानमें दीनताका भय, बलमें शत्रुका भय, रूपमें बुढ़ापेका भय, शास्त्रमें वाद-विवादका भय, गुणमें दुर्जनका भय और शरीरमें मृत्युका भय है। इस प्रकार संसारमें मनुष्योंके लिये सम्पूर्ण वस्तुएँ भयावह हैं, एक वैराग्य ही भयसे रहित है।’
तात्पर्य यह है कि ये सांसारिक वस्तुएँ कहीं नष्ट न हो जायें—इसका मनुष्यको सदा भय रहता है, इसलिये वह अभय नहीं हो पाता।
१-उद्देश्य तो पहलेसे ही बना हुआ है। उसके बाद हमें मनुष्य-शरीर मिला है। अतः उद्देश्यको केवल पहचानना है, बनाना नहीं है।
२-राम मेरे तो मैं मरूँ, नहीं तो मेरे बलाय। अविनाशी का बालका, मेरे न मारा जाय।
१०१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
साधक भूलसे किये हुए दुष्कर्मोंके अनुसार अपनेको दोषी मान लेता है और अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिको भी दोषी मान लेता है, जिससे उसका अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। उस अशुद्धिको मिटानेके लिये साधकको चाहिये कि वह भूलसे किये हुए दुष्कर्मको पुनः कभी न करनेका दृढ़ व्रत ले ले तथा अपना बुरा करनेवाले व्यक्तिके अपराधको क्षमा माँगें बिना ही क्षमा कर दे और भगवान्से प्रार्थना करे कि 'हे नाथ! मेरा जो कुछ बुरा हुआ है, वह तो मेरे दुष्कर्मोंका ही फल है। वह बेचारा तो मुफ्तमें ही ऐसा कर बैठा है। उसका इसमें कोई दोष नहीं है। आप उसे क्षमा कर दें।' ऐसा करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है।
'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः' —ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना अर्थात् परमात्मतत्त्वका जो ज्ञान (बोध) है, वह चाहे सगुणका हो या निर्गुणका, उस ज्ञानके लिये योगमें स्थित होना आवश्यक है। योगका अर्थ है—सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें, मान-अपमानमें, निन्दा-स्तुतिमें, रोग-नीरोगतामें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हर्ष-शोकादि न होकर निर्विकार रहना।
'दानम्' —लोकदृष्टिमें जिन वस्तुओंको अपना माना जाता है, उन वस्तुओंको सत्पात्रका तथा देश, काल, परिस्थिति आदिका विचार रखते हुए आवश्यकतानुसार दूसरोंको वितर्ण कर देना 'दान' है। दान कई तरहके होते हैं; जैसे भूमिदान, गोदान, स्वर्णदान, अन्नदान, वस्त्रदान आदि। इन सबमें अन्नदान प्रधान है। परन्तु इससे भी अभयदान प्रधान (श्रेष्ठ) है। उस अभयदानके दो भेद होते हैं—
(१) संसारकी आफतसे, विघ्नोंसे, परिस्थितियोंसे भयभीत हुएको अपनी शक्ति, सामर्थ्यके अनुसार भयरहित करना, उसे आश्वासन देना, उसकी सहायता करना। यह अभयदान उसके शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको लेकर होता है।
(२) संसारमें फँसे हुए व्यक्तिको जन्म-मरणसे रहित करनेके लिये भगवान्की कथा आदि सुनाना। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थोंको एवं उनके भावोंको सरल भाषामें छपवाकर सस्ते दामोंमें लोगोंको देना अथवा कोई समझना चाहे तो उसको समझाना, जिससे उसका कल्याण हो जाय। ऐसे दानसे भगवान् बहुत राजी होते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका अङ्गसठवाँ-उनहत्तरवाँ श्लोक); क्योंकि भगवान् ही सबमें परिपूर्ण हैं। अतः जितने अधिक जीवोंका कल्याण होता है, उतने ही अधिक भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ अभयदान है। इसमें भी भगवत्-सम्बन्धी बातें दूसरोंको सुनाते समय साधक वक्ताको यह सावधानी रखनी चाहिये कि वह दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता न माने, प्रत्युत इसमें भगवान्की कृपा माने कि भगवान् ही श्रोताओंके रूपमें आकर मेरा समय सार्थक कर रहे हैं।
ऊपर जितने दान बताये हैं, उनके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़कर साधक ऐसा माने कि अपने पास वस्तु, सामर्थ्य, योग्यता आदि जो कुछ भी है, वह सब भगवान्ने दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मुझे निमित्त बनाकर दी है। अतः भगवत्प्रतीत्यर्थ आवश्यकतानुसार जिस-किसीको जो कुछ दिया जाय, वह सब उसीका समझकर उसे देना 'दान' है।
'दमः' —इन्द्रियोंको पूरी तरह वशमें करनेका नाम 'दम' है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियों, अन्तःकरण और शरीरसे कोई भी प्रवृत्ति शास्त्रनिषिद्ध नहीं होनी चाहिये। शास्त्रविहित प्रवृत्ति भी अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये ही होनी चाहिये। इस प्रकारकी प्रवृत्तिसे इन्द्रियलोलुपता, आसक्ति और पराधीनता नहीं रहती एवं शरीर और इन्द्रियोंके बर्ताव शुद्ध, निर्मल होते हैं।
साधकका उद्देश्य इन्द्रियोंके दमनका होनेसे अकर्तव्यमें तो उसकी प्रवृत्ति होती ही नहीं और कर्तव्यमें स्वाभाविक
१-न गोप्रदानं न महीप्रदानं न चान्द्रदानं हि तथा प्रधानम्। यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं सर्वप्रदानेष्वभयप्रदानम्॥
(पंचतन्त्र, मित्रभेद ३१३)
'गोदान, भूमिदान और अन्नदान भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कि अभयदान है। विद्वान्लोग अभयदानको सब दानोंसे श्रेष्ठ कहते हैं।'
२-तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्पषापहम्। श्रवणमंगलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
(श्रीमद्भा० १०। ३१। १)
'हे प्रभो! आपका कथामृत संसारमें जो संतप्त प्राणी हैं, उनको जीवन देनेवाला, शान्ति देनेवाला है, अच्छे-अच्छे महापुरुष भी उसका हृदयसे वर्णन करते हैं, वह सम्पूर्ण पापोंका अर्थात् भगवद्विमुखताका नाश करनेवाला है, कानोंमें पड़ते ही सब तरहसे मंगल-ही-मंगल देनेवाला है, संत-महापुरुषोंके द्वारा उसका विस्तारसे वर्णन किया गया है। ऐसे कथामृतका पृथ्वीपर जो कथन करते हैं, वे संसारको बहुत विशेषतासे दान देनेवाले हैं अर्थात् संसारका सबसे अधिक उपकार, हित करनेवाले हैं।'
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१५
प्रवृत्ति होती है, तो उसमें स्वार्थ, अभिमान, आसक्ति, कामना आदि दोष नहीं रहते। यदि कभी किसी कार्यमें स्वार्थभाव आ भी जाता है, तो वह उसका दमन करता चला जाता है, जिससे अशुद्धि मिटती जाती है और शुद्धि होती चली जाती है और आगे चलकर उसका दम अर्थात् इन्द्रिय-संयम सिद्ध हो जाता है।
‘यज्ञः’—‘यज्ञ’ शब्दका अर्थ आहुति देना होता है। अतः अपने वर्णाश्रमके अनुसार होम, बलिवेश्वदेव आदि करना ‘यज्ञ’ है। इसके सिवाय गीताकी दृष्टिसे अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति आदिक अनुसार जिस-किसी समय जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितकी भावनासे या भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। इसके अतिरिक्त जीविका-सम्बन्धी व्यापार, खेती आदि तथा शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी खाना-पीना, चलना-फिरना, सोना-जागना, देना-लेना आदि सभी क्रियाएँ भगवत्प्रीत्यर्थ करना ‘यज्ञ’ है। ऐसे ही माता-पिता, आचार्य, गुरुजन आदिकी आज्ञाका पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको मन, वाणी, तन और धनसे सुख पहुँचाकर उनकी प्रसन्नता प्राप्त करना और गौ, ब्राह्मण, देवता, परमात्मा आदिका पूजन करना, सत्कार करना—ये सभी ‘यज्ञ’ हैं।
‘स्वाध्यायः’— अपने ध्येयकी सिद्धिके लिये भगवन्नामका जप और गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदिके पठन-पाठनका नाम ‘स्वाध्याय’ है। वास्तवमें तो ‘स्वस्य अध्यायः (अध्ययनम्) स्वाध्यायः’ के अनुसार अपनी वृत्तियोंका, अपनी स्थितिका ठीक तरहसे अध्ययन करना ही ‘स्वाध्याय’ है। इसमें भी साधकको न तो अपनी वृत्तियोंसे अपनी स्थितिकी कसौटी लगानी है और न वृत्तियोंके अधीन अपनी स्थिति ही माननी है। कारण कि वृत्तियाँ तो हरदम आती-जाती रहती हैं, बदलती रहती हैं। तो फिर स्वाभाविक यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी वृत्तियोंको शुद्ध न करें? वास्तवमें तो साधकका कर्तव्य वृत्तियोंको शुद्ध करनेका ही होना चाहिये और वह शुद्धि अन्तःकरण तथा उसकी वृत्तियोंको अपना न माननेसे बहुत जल्दी हो जाती है; क्योंकि उनको अपना मानना ही मूल अशुद्धि है। साक्षात् परमात्माका अंश होनेसे अपना स्वरूप
कभी अशुद्ध हुआ ही नहीं। केवल वृत्तियोंके अशुद्ध होनेसे ही उसका यथार्थ अनुभव नहीं होता।
‘तपः’— भूख-प्यास, सरदी-गरमी, वर्षा आदि सहना भी एक तप है, पर इस तपमें भूख-प्यास आदिको जानकर सहते हैं। वास्तवमें साधन करते हुए अथवा जीवन-निर्वाह करते हुए देश, काल, परिस्थिति आदिको लेकर जो कष्ट, आफत, विघ्न आदि आते हैं, उनको प्रसन्नतापूर्वक सहना ही ‘तप’ है; * क्योंकि इस तपमें पहले किये गये पापोंका नाश होता है और सहनेवालेमें सहनेकी एक नयी शक्ति, एक नया बल आता है।
साधकको सावधान रहना चाहिये कि वह उस तपोबलका प्रयोग दूसरोंको वरदान देनेमें, शाप देने या अनिष्ट करनेमें तथा अपनी इच्छापूर्ति करनेमें न लगाये, प्रत्युत उस बलको अपने साधनमें जो बाधाएँ आती हैं, उनको प्रसन्नतासे सहनेकी शक्ति बढ़ानेमें ही लगाये।
साधक जब साधन करता है, तब वह साधनमें कई तरहसे विघ्न मानता है। वह समझता है कि मुझे एकान्त मिले तो मैं साधन कर सकता हूँ, वायुमण्डल अच्छा हो तो साधन कर सकता हूँ इत्यादि। इन सब अनुकूलताओंकी चाहना न करना अर्थात् उनके अधीन न होना भी ‘तप’ है। साधकको अपना साधन परिस्थितियोंके अधीन नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत परिस्थितिके अनुसार अपना साधन बना लेना चाहिये। साधकको अपनी चेष्टा तो एकान्तमें साधन करनेकी करनी चाहिये, पर एकान्त न मिले तो मिली हुई परिस्थितिको भगवान्की भेजी हुई समझकर विशेष उत्साहसे प्रसन्नतापूर्वक साधनमें प्रवृत्त होना चाहिये।
‘आर्जवम्’— सरलता, सीधेपनको ‘आर्जव’ कहते हैं। यह सरलता साधकका विशेष गुण है। यदि साधक यह चाहता है कि दूसरे लोग मुझे अच्छा समझें, मेरा व्यवहार ठीक नहीं होगा तो लोग मुझे बढिया नहीं मानेंगे, इसलिये मुझे सरलतासे रहना चाहिये, तो यह एक प्रकारका कपट ही है। इससे साधकमें बनावटीपन आता है, जब कि साधकमें सीधा, सरल भाव होना चाहिये। सीधा, सरल होनेके कारण लोग उसको मूर्ख, बेसमझ कह सकते हैं, पर उससे साधककी कोई हानि नहीं है। अपने उद्धारके लिये
- आगते स्वागतं कुर्याद् गच्छन्तं न निवारयेत्। यथाप्राप्तं सहेतस्व सा तपस्योत्तमोत्तमा ॥ (बोधसार)
‘प्रारब्धवश परिस्थितिरूपसे जो कुछ आ जाय, उसका स्वागत करे, जानेवालेको रोके नहीं और जो जैसे प्राप्त हो, उसे वैसे ही सहन करे, यही उत्तम-से-उत्तम तप है।’
१०९६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
तो सरलता बड़े कामकी चीज है—
कपट गाँठ मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव।
‘नारायन’ ता भक्त की, लगी किनारे नाव॥
इसलिये साधकके शरीर, वाणी और मनके व्यवहारमें कोई बनावटीपन नहीं रहना चाहिये*। उसमें स्वाभाविक सीधापन हो।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्थ्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्तं मार्दवं हीरचापलम् ॥ २ ॥
अहिंसा = अहिंसा, सत्यम् = सत्यभाषण, अक्रोधः = क्रोध न करना, त्यागः = संसारकी कामनाका त्याग, शान्तिः = अन्तःकरणमें राग-
द्वेषजनित हलचलका न होना, अपैशुनम् = चुगली न करना, भूतेषु = प्राणियोंपर दया = दया करना, अलोलुप्तम् = सांसारिक विषयोंमें
न ललचाना, मार्दवम् = अन्तःकरणकी कोमलता, ह्रीः = अकर्तव्य करनेमें लज्जा, अचापलम् = चपलताका अभाव।
व्याख्या —‘अहिंसा’—शरीर, मन, वाणी, भाव आदिके द्वारा किसीका भी किसी प्रकारसे अनिष्ट न करनेको तथा अनिष्ट न चाहनेको ‘अहिंसा’ कहते हैं। वास्तवमें सर्वथा अहिंसा तब होती है, जब मनुष्य संसारकी तरफसे विमुख होकर परमात्माकी तरफ ही चलता है। उसके द्वारा ‘अहिंसा’ का पालन स्वतः होता है। परन्तु जो रागपूर्वक, भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है; वह कभी सर्वथा अहिंसक नहीं हो सकता। वह अपना पतन तो करता ही है, जिन पदार्थों आदिको वह भोगता है, उनका भी नाश करता है।
जो संसारके सीमित पदार्थोंको व्यक्तिगत (अपने) न होनेपर भी व्यक्तिगत मानकर सुखबुद्धिसे भोगता है, वह हिंसा ही करता है। कारण कि समष्टि संसारसे सेवाके लिये मिले हुए पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिमेंसे किसीको भी अपने भोगके लिये व्यक्तिगत मानना हिंसा ही है। यदि मनुष्य समष्टि संसारसे मिली हुई वस्तु, पदार्थ, व्यक्ति आदिको संसारकी ही मानकर निर्ममतापूर्वक संसारकी सेवामें लगा दे, तो वह हिंसासे बच सकता है और वही अहिंसक हो सकता है।
जो सुख और भोग-बुद्धिसे भोगोंका सेवन करता है, उसको देखकर, जिनको वे भोग-पदार्थ नहीं मिलते—ऐसे अभावग्रस्तोंको दुःख-संताप होता है। यह उनकी हिंसा ही
है; क्योंकि भोगी व्यक्तिमें अपना स्वार्थ और सुख-बुद्धि रहती है तथा दूसरोंके दुःखकी लापरवाही रहती है। परन्तु जो संत-महापुरुष केवल दूसरोंका हित करनेके लिये ही जीवन-निर्वाह करते हैं, उनको देखकर किसीको दुःख हो भी जायगा, तो भी उनको हिंसा नहीं लगेगी; क्योंकि वे भोग-बुद्धिसे जीवन-निर्वाह करते ही नहीं—‘शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बषम्’ (गीता ४।२१)।
केवल परमात्माकी ओर चलनेवालेके द्वारा हिंसा नहीं होती; क्योंकि वह भोग-बुद्धिसे पदार्थ आदिका सेवन नहीं करता। परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक शरीर, मन, वाणीके द्वारा कभी किसीको दुःख नहीं पहुँचाता। यदि उसकी बाह्य क्रियाओंसे किसीको दुःख होता है, तो यह दुःख उसके खुदके स्वभावसे ही होता है। साधककी तो भीतरसे कभी किसीको किंचिन्मात्र भी दुःख देनेकी भावना नहीं होनी चाहिये। उसका भाव निरन्तर सबका हित करनेका होना चाहिये—‘सर्वभूतहिते रताः।’
साधककी साधनामें कोई बाधा डाल दे, तो उसे उसपर क्रोध नहीं आता और न उसके मनमें उसके अहितकी भावना (हिंसा) ही पैदा होती है। हाँ, परमात्माकी ओर चलनेमें बाधा पड़नेसे उसको दुःख हो सकता है, पर वह दुःख भी सांसारिक दुःखकी तरह नहीं होता। साधकको बाधा लगती है, तो वह भगवान्को पुकारता है कि
- मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्। मनस्यन्यद् वचस्यन्यद् कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम्।।
‘महात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें एक ही बात होती है; परन्तु दुरात्माओंके मन, वचन और कर्म—तीनोंमें ही अलग-अलग बातें होती हैं।’
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१७
'हे नाथ! मेरी कहीं भूल हुई, जिससे बाधा लग रही है।' ऐसा विचार करके उसे रोना आ सकता है; पर बाधा डालनेवालेके प्रति क्रोध, द्वेष नहीं हो सकता। बाधा लगनेपर साधकमें तत्परता और सावधानी आती है। यदि उसमें बाधा डालनेवालेके प्रति द्वेष होता है, तो जितने अंशमें द्वेष-वृत्ति रहती है, उतने अंशमें तत्परताकी कमी है, अपने साधनका आग्रह है।
साधकमें एक तत्परता होती है और एक आग्रह होता है। तत्परता होनेसे साधनमें रुचि रहती है और आग्रह होनेसे साधनमें राग रहता है। रुचि होनेसे अपने साधनमें कहीं-कहीं कमी है, उसका ज्ञान होता है और उसे दूर करनेकी शक्ति आती है तथा उसे दूर करनेकी चेष्टा भी होती है। परन्तु राग होनेसे साधनमें विघ्न डालनेवालेके साथ द्वेष होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो साधनमें हमारी रुचि कम होनेसे ही दूसरा हमारे साधनमें बाधा डालता है। अगर साधनमें हमारी रुचि कम न हो तो दूसरा हमारे साधनमें बाधा नहीं डालेगा, प्रत्युत यह सोचकर उपेक्षा कर देगा कि यह जिद्दी है, मानेगा नहीं; अतः जैसा चाहे, वैसा करने दो।
जैसे पुण्यसे सुगन्ध स्वतः फैलती है, ऐसे ही साधकसे स्वतः पारमार्थिक परमाणु फैलते हैं और वायुमण्डल शुद्ध होता है। इससे उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक प्राणिमात्रका बड़ा भारी उपकार एवं हित होता रहता है। परन्तु जो अपने दुर्गुण-दुराचारोंके द्वारा वायुमण्डलको अशुद्ध करता रहता है, वह प्राणिमात्रकी हिंसा करनेका अपराधी होता है।
'सत्यम्' —अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे जैसा सुना, देखा, पढ़ा, समझा और निश्चय किया है, उससे न अधिक और न कम—वैसा-का-वैसा प्रिय शब्दोंमें कह देना 'सत्य' है। सत्यस्वरूप परमात्माको पाने और जाननेका एकमात्र उद्देश्य हो जानेपर साधकके द्वारा मन, वाणी और क्रियासे असत्य-व्यवहार नहीं हो सकता। उसके द्वारा सत्य-व्यवहार, सबके हितका व्यवहार ही होता है। जो सत्यको जानना चाहता है, वह सत्यके ही सम्मुख रहता है। इसलिये उसके मन-वाणी-शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं, वे सभी उत्साहपूर्वक सत्यकी ओर चलनेके लिये ही होती हैं।
'अक्रोधः' —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह 'क्रोध' है। पर जबतक अन्तःकरणमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी भावना पैदा नहीं होती, तबतक वह 'क्षोध' है, क्रोध नहीं।
परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे साधन करनेवाला मनुष्य अपना अपकार करनेवालेका भी अनिष्ट नहीं करना चाहता। वह इस बातको समझता है कि अनिष्ट करनेवाला व्यक्ति वास्तवमें हमारा अनिष्ट कभी कर ही नहीं सकता। यह जो हमें दुःख देनेके लिये आया है, यह हमने पहले कोई गलती की है, उसीका फल है। अतः यह हमें शुद्ध कर रहा है, निर्मल कर रहा है। जैसे, डॉक्टर किसी रूग्ण अंगको काटता है, तो उसपर रोगी क्रोध नहीं करता, प्रत्युत उसे अच्छा मानता है, ठीक मानता है। उसके रूग्ण अंगको काटना तो उसे ठीक करनेके लिये ही है। ऐसे ही साधकको कोई अहितकी भावनासे किसी तरहसे दुःख देता है, तो उसमें यह भाव पैदा होता है कि वह मेरेको शुद्ध, निर्मल बनानेमें निमित्त बन रहा है; अतः उसपर क्रोध कैसे? वह तो मेरा उपकार कर रहा है और भविष्यके लिये सावधान कर रहा है कि जो गलती पहले की है, आगे वैसी गलती न करें।
जो लोग साधकका हित करनेवाले हैं, उसकी सेवा करनेवाले हैं, वे तो साधकको सुख पहुँचाकर उसके पुण्योंका नाश करते हैं। पर साधकको उनपर (उसके पुण्योंका नाश करनेके कारण) क्रोध नहीं आता। उनपर साधकको यह विचार आता है कि वे जो मेरी सेवा करते हैं, मेरे अनुकूल आचरण करते हैं, यह तो उनकी सज्जनता है, उनका श्रेष्ठ भाव है। परन्तु पुण्योंका नाश तो तब होता है, जब मैं उनकी सेवासे सुख भोगता हूँ। इस प्रकार साधककी दृष्टि सेवा करनेवालोंकी अच्छाई, शुद्ध नीयतपर ही जाती है। अतः साधकको न तो दुःख देनेवालोंपर क्रोध होता है और न सुख देनेवालोंपर।
'त्यागः' —संसारसे विमुख हो जाना ही असली त्याग है। साधकके जीवनमें बाहरका और भीतरका—दोनोंका ही त्याग होना चाहिये। जैसे, बाहरसे पाप, अन्याय, अत्याचार, दुराचार आदिका और बाहरी सुख-आराम आदिका त्याग भी करना चाहिये, और भीतरसे सांसारिक नाशवान् वस्तुओंकी कामनाका त्याग भी करना चाहिये। इसमें भी बाहरके त्यागकी अपेक्षा भीतरकी कामनाका त्याग श्रेष्ठ है। कामनाका सर्वथा त्याग होनेपर तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है—'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' (गीता १२।१२)।
साधकके लिये उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंकी कामना ही वास्तवमें सबसे ज्यादा बाधक होती है। अतः कामनाका सर्वथा त्याग करना चाहिये। त्याग कब होता है?
१०१८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
जब साधकका उद्देश्य एकमात्र परमात्मप्राप्तिका ही हो जाता है, तब उसकी कामनाएँ दूर होती चली जाती हैं। कारण कि सांसारिक भोग और संग्रह साधकका लक्ष्य नहीं होता। अतः वह सांसारिक भोग और संग्रहकी कामनाका त्याग करते हुए अपने साधनमें आगे बढ़ता रहता है।
‘शान्तिः’—अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना ‘शान्ति’ है; क्योंकि संसारके साथ राग-द्वेष करनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति आती है और उनके न होनेसे अन्तःकरण स्वाभाविक ही शान्त, प्रसन्न रहता है।
अनुकूलतासे पुराने पुण्योंका नाश होता है और उसमें अपना स्वभाव सुधरनेकी अपेक्षा बिगड़नेकी सम्भावना अधिक रहती है। परन्तु प्रतिकूलता आनेपर पापोंका नाश होता है और अपने स्वभावमें भी सुधार होता है। इस बातको समझनेपर प्रतिकूलतामें भी स्वतः शान्ति बनी रहती है।
किसी परिस्थिति आदिको लेकर साधकमें कभी राग-द्वेषका भाव हो भी जाता है तो उसके मनमें अशान्ति पैदा हो जाती है और अशान्ति होते ही वह तुरंत सावधान हो जाता है कि राग-द्वेषपूर्वक कर्म करना मेरा उद्देश्य नहीं है। इस विचारसे फिर शान्ति आ जाती है और समय पाकर स्थिर हो जाती है।
‘अपैशुनम्’—किसीके दोषको दूसरेके आगे प्रकट करके दूसरोंमें उसके प्रति दुर्भाव पैदा करना पिशुनता है और इसका सर्वथा अभाव ही ‘अपैशुन’ है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधक कभी किसीकी चुगली नहीं करता। ज्यों-ज्यों उसका साधन आगे बढ़ता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों उसकी दोषदृष्टि और द्वेषवृत्ति मिटकर दूसरोंके प्रति उसका स्वतः ही अच्छा भाव होता चला जाता है। उसके मनमें यह विचार भी नहीं आता कि मैं साधन करनेवाला हूँ और ये दूसरे (साधन न करनेवाले) साधारण मनुष्य हैं, प्रत्युत तत्परतासे साधन होनेपर उसे जैसी अपनी स्थिति (जड़तासे सम्बन्ध न होना) दिखायी देती है, वैसी ही दूसरोंकी स्थिति भी दिखायी देती है कि वास्तवमें उनका भी जड़तासे सम्बन्ध नहीं है, केवल सम्बन्ध माना हुआ है। इस तरह जब उसकी दृष्टिमें किसीका भी जड़तासे सम्बन्ध है ही नहीं, तो वह किसीका
दोष किसीके प्रति क्यों प्रकट करेगा?
भक्तिमार्गवाला सर्वत्र अपने प्रभुको देखता है, ज्ञानमार्गवाला केवल अपने स्वरूपको ही देखता है और कर्मयोगमार्गवाला अपने सेव्यको देखता है। इसलिये साधक किसीकी बुराई, निन्दा, चुगली आदि कर ही कैसे सकता है?
‘दया भूतेषु’—दूसरोंको दुःखी देखकर उनका दुःख दूर करनेकी भावनाको ‘दया’ कहते हैं। भगवान्की, संत-महात्माओंकी, साधकोंकी और साधारण मनुष्योंकी दया अलग-अलग होती है—
(१) भगवान्की दया—भगवान्की दया सभीको शुद्ध करनेके लिये होती है। भक्तलोग इस दयाके दो भेद मानते हैं—कृपा और दया। मात्र मनुष्योंको पापोंसे शुद्ध करनेके लिये उनके मनके विरुद्ध (प्रतिकूल) परिस्थितिको भेजना ‘कृपा’ है और अनुकूल परिस्थितिको भेजना ‘दया’ है।
(२) संत-महात्माओंकी दया—संत-महात्मालोग दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं—‘पर दुख दुख सुख सुख देखे पर’ (मानस ७।३८।१)। पर वास्तवमें उनके भीतर न दूसरोंके दुःखसे दुःख होता है और न अपने दुःखसे ही दुःख होता है। कारण कि तत्त्वमें न सुख है, न दुःख। जैसे समुद्रके ऊपर लहरें उठती दीखती हैं, पर समुद्रके भीतर कोई लहर नहीं होती, भीतरसे समुद्र शान्त (सम) रहता है, ऐसे ही व्यवहारमें सन्त दुःखी होते हुए दीखते हैं, पर उनके भीतर न सुख है, न दुःख। तात्पर्य है कि वास्तवमें वे दुःखी नहीं होते, प्रत्युत उनके द्वारा दूसरेका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होती है। अपनेपर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर वे उसमें भगवान्की कृपाको देखते हैं, पर दूसरोंपर दुःख आनेपर उन्हें सुखी करनेके लिये वे उनके दुःखको स्वयं अपनेपर ले लेते हैं। जैसे, इन्द्रने क्रोधपूर्वक बिना अपराधके दधीचि ऋषिका सिर काट दिया था, पर जब इन्द्रने अपनी रक्षाके लिये उनकी हड्डियाँ माँगीं, तब दधीचिने सहर्ष प्राण छोड़कर उन्हें अपनी हड्डियाँ दे दीं। इस प्रकार संत-महापुरुष दूसरेके दुःखको सह नहीं सकते, प्रत्युत उन्हें सुख पहुँचानेके लिये अपनी सुख-सामग्री और प्राणतक दे देते हैं, चाहे दूसरा उनका अहित करनेवाला ही क्यों न हो!* इसलिये संत-
- कर्णस्वचं शिबिर्यासं जीवं जीमूतवाहनः। ददौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेयं महात्मनाम्॥
‘कर्णने अपनी त्वचा, शिबिने अपना मांस, दधीचिने अपनी हड्डियाँ और जीमूतवाहने अपना जीवन (शरीर) दे दिया। सच है, महात्माओंके लिये (परहितके लिये) कुछ भी अदेय नहीं है।’
श्लोक २ ]
- साधक-संजीवनी *
१०१९
महात्माओंकी दया विशेष शुद्ध, निर्मल होती है।
(३) साधकोंकी दया —साधक अपने मनमें दूसरोंका दुःख दूर करनेकी भावना रखता है और उसके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा भी करता है। दूसरोंको दुःखी देखकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है; क्योंकि वह अपनी ही तरह दूसरोंके दुःखको भी समझता है। इसलिये उसका यह भाव रहता है कि सब सुखी कैसे हों? सबका भला कैसे हो? सबका उद्धार कैसे हो? सबका हित कैसे हो? अपनी ओरसे वह ऐसी ही चेष्टा करता है; परन्तु मैं सबका हित करता हूँ, सबके हितकी चेष्टा करता हूँ—इन बातोंको लेकर उसके मनमें अभिमान नहीं होता। कारण कि दूसरोंका दुःख दूर करनेका सहज स्वभाव बन जानेसे उसे अपने इस आचरणमें कोई विशेषता नहीं दीखती। इसलिये उसको अभिमान नहीं होता।
जो प्राणी भगवान्की ओर नहीं चलते, दुर्गुण-दुराचारोंमें रत रहते हैं, दूसरोंका अपराध करते हैं और अपना पतन करते हैं—ऐसे मनुष्योंपर साधकको क्रोध न आकर दया आती है। इसलिये वह हरदम ऐसी चेष्टा करता रहता है कि ये लोग दुर्गुण-दुराचारोंसे ऊपर कैसे उठें? इनका भला कैसे हो? कभी-कभी वह उनके दोषोंको दूर करनेमें अपनेको निर्बल मानकर भगवान्से प्रार्थना करता है कि 'हे नाथ! ये लोग इन दोषोंसे छूट जायँ और आपके भक्त बन जायँ।'
(४) साधारण मनुष्योंकी दया —साधारण मनुष्यकी दयामें थोड़ी मलिनता रहती है। वह किसी जीवके हितकी चेष्टा करता है, तो यह सोचता है कि 'मैं कितना दयालु हूँ। मैंने इस जीवको सुख पहुँचाया, तो मैं कितना अच्छा हूँ। हरेक आदमी मेरे-जैसा दयालु नहीं है, कोई-कोई ही होता है, इत्यादि।' इस प्रकार लोग मुझे अच्छा समझेंगे, मेरा आदर करेंगे आदि बातोंको लेकर, अपनेमें महत्त्वबुद्धि रखकर जो दया की जाती है, उसमें दयाका अंश तो अच्छा है, पर साथमें उपर्युक्त मलिनताएँ रहनेसे उस दयामें अशुद्धि आ जाती है।
इनसे भी साधारण दर्जेके मनुष्य दया तो करते हैं, पर उनकी दया ममतावाले व्यक्तियोंपर ही होती है। जैसे, ये हमारे परिवारके हैं, हमारे मत और सिद्धान्तको माननेवाले हैं, तो उनका दुःख दूर करनेकी इच्छासे उन्हें सुख-आराम
देनेका प्रयत्न करते हैं। यह दया ममता और पक्षपातयुक्त होनेसे अधिक अशुद्ध है।
इनसे भी घटिया दर्जेके वे मनुष्य हैं, जो केवल अपने सुख और स्वार्थकी पूर्तिके लिये ही दूसरोंके प्रति दयाका बर्ताव करते हैं।
'अलोलुप्तवम् '—इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध होनेसे अथवा दूसरोंको भोग भोगते हुए देखनेसे मनका (भोग भोगनेके लिये) ललचा उठनेका नाम 'लोलुप्ता' है और उसके सर्वथा अभावका नाम 'अलोलुप्त' है।
अलोलुप्ताके उपाय —(१) साधकके लिये विशेष सावधानीकी बात है कि वह अपनी इन्द्रियोंसे भोगोंका सम्बन्ध न रखे और मनमें कभी भी ऐसा भाव, ऐसा अभिमान न आने दे कि मेरा इन्द्रियोंपर अधिकार है अर्थात् इन्द्रियाँ मेरे वशमें हैं; अतः मेरा क्या बिगड़ सकता है?
(२) 'मैं हृदयसे परमात्माकी प्राप्ति चाहता हूँ, अगर कभी हृदयमें विषय-लोलुप्ता हो गयी, तो मेरा पतन हो जायगा और मैं परमात्मासे विमुख हो जाऊँगा।'—इस प्रकार साधक खूब सावधान रहे और कहीं अचानक विचलित होनेका अवसर आ जाय, तो 'हे नाथ! बचाओ; हे नाथ! बचाओ' ऐसे सच्चे हृदयसे भगवान्को पुकारे।
(३) स्त्री-पुरुषोंकी तथा जन्तुओंकी कामविषयक चेष्टा न देखे। यदि दीख जाय, तो ऐसा विचार करे कि 'यह तो बिलकुल चौरासी लाख योनियोंका रास्ता है। यह चीज तो मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, राक्षस-असुर, भूत-प्रेत आदि मात्र जीवोंमें भी है। पर मैं तो चौरासी लाख योनियों अर्थात् जन्म-मरणसे ऊँचा उठना चाहता हूँ। मैं जन्म-मरणके मार्गका पथिक नहीं हूँ। मेरेको तो जन्म-मरणादि दुःखोंका अत्यन्त अभाव करके परमात्माकी प्राप्ति करना है।' इस भावको बड़ी सावधानीके साथ जाग्रत् रखे और जहाँतक बने, ऐसी काम-चेष्टा न देखे।
'मार्दवम् '—बिना कारण दुःख देनेवालों और वैर रखनेवालोंके प्रति भी अन्तःकरणमें कठोरताका भाव न होना तथा स्वाभाविक कोमलताका रहना 'मार्दव' है*।
साधकके हृदयमें सबके प्रति कोमलताका भाव रहता है। उसके प्रति कोई कठोरता एवं अहितका बर्ताव भी करता है, तो भी उसकी कोमलतामें अन्तर नहीं आता। यदि साधक कभी किसी बातको लेकर किसीको कठोर जवाब
- शरीरकी प्रधानताको लेकर 'आर्जव' और अन्तःकरणकी प्रधानताको लेकर 'मार्दव' कहा जाता है—यही इन दोनोंमें अन्तर है।
१०२०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १६ ]
भी दे दे, तो वह कठोर जवाब भी उसके हितकी दृष्टिसे ही देता है। पर पीछे उसके मनमें यह विचार आता है कि मैंने उसके प्रति कठोरताका व्यवहार क्यों किया ? मैं प्रेमसे या अन्य किसी उपायसे भी समझा सकता था—इस प्रकारके भाव आनेसे कठोरता मिटती रहती है और कोमलता बढ़ती रहती है।
यद्यपि साधकोंके भावोंमें और वाणीमें कोमलता रहती है, तथापि उनकी भिन्न-भिन्न प्रकृति होनेसे सबकी वाणीमें एक समान कोमलता नहीं होती। परन्तु हृदयमें साधकोंका सबके प्रति कोमल भाव रहता है। ऐसे ही कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आदिका साधन करनेवालोंके स्वभावमें विभिन्नता होनेसे उनके बर्ताव सबके प्रति भिन्न-भिन्न होते हैं; अतः उनके आचरणोंमें एक-जैसी कोमलता नहीं दीखती, पर भीतरमें बड़ी भारी कोमलता रहती है।
‘ह्रीः’—शास्त्र और लोक-मर्यादाके विरुद्ध काम करनेमें जो एक संकोच होता है, उसका नाम ‘ह्रीः’ (लज्जा) है। साधकको साधन-विरुद्ध क्रिया करनेमें लज्जा आती है। वह लज्जा केवल लोगोंके देखनेसे ही नहीं आती, प्रत्युत उसके मनमें अपने-आप ही यह विचार आता है कि ‘राम-राम, मैं ऐसी क्रिया कैसे कर सकता हूँ? क्योंकि मैं तो परमात्माकी तरफ चलनेवाला (साधक) हूँ। लोग भी मुझे परमात्माकी तरफ चलनेवाला समझते हैं।
अतः ऐसी साधन-विरुद्ध क्रियाओंको मैं एकात्ममें अथवा लोगोंके सामने कैसे कर सकता हूँ?’—इस लज्जाके कारण साधक बुरे कर्मोंसे बच जाता है एवं उसके आचरण ठीक होते चले जाते हैं। जब साधक अपनी अहंता बदल देता है कि मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भक्त हूँ, तब उसे अपनी अहंताके विरुद्ध क्रिया करनेमें स्वाभाविक ही लज्जा आती है। इसलिये पारमार्थिक उद्देश्य रखनेवाले प्रत्येक साधकको अपनी अहंता ‘मैं साधक हूँ, मैं सेवक हूँ, मैं जिज्ञासु हूँ, मैं भगवद्भक्त हूँ’—इस प्रकारसे यथार्थचि बदल लेनी चाहिये, जिससे वह साधन-विरोधी कर्मोंसे बचकर अपने उद्देश्यको जल्दी प्राप्त कर सकता है।
‘अचापलम्’—कोई भी कार्य करनेमें चपलताका अर्थात् उतावलापनका न होना ‘अचापल’ है। चपलता (चंचलता) होनेसे काम जल्दी होता है, ऐसी बात नहीं है। सात्त्विक मनुष्य सब काम धैर्यपूर्वक करता है; अतः उसका काम सुचारुरूपसे और ठीक समयपर हो जाता है। जब कार्य ठीक हो जाता है, तब उसके अन्तःकरणमें हलचल, चिन्ता नहीं होती। चपलता न होनेसे कार्यमें दीर्घसूत्रताका दोष भी नहीं आता, प्रत्युत कार्यमें तत्परता आती है, जिससे सब काम सुचारुरूपसे होते हैं। अपने कर्तव्य-कर्मोंको करनेके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा न होनेसे उसका चित्त विशिप्त और चंचल नहीं होता (गीता—अठारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
| तेजः | = तेज (प्रभाव), | (और) | सम्पदम् | = सम्पदाको |
|---|---|---|---|---|
| क्षमा | = क्षमा, | नातिमानिता | = मानको न चाहना, | अभिजातस्य |
| धृतिः | = धैर्य, | भारत | = हे भरतवंशी अर्जुन ! | मनुष्यके |
| शौचम् | = शरीरकी शुद्धि, | (ये सभी) | (लक्षण) | |
| अद्रोहः | = वैरभावका न होना | दैवीम् | = दैवी | भवन्ति |
व्याख्या—‘तेजः’—महापुरुषोंका संग मिलनेपर उनके प्रभावसे प्रभावित होकर साधारण पुरुष भी दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सदुगुण-सदाचारोंमें लग जाते हैं। महापुरुषोंकी उस शक्तिको ही यहाँ ‘तेज’ कहा है। ऐसे तो क्रांथी आदमीको देखकर भी लोगोंको उसके स्वभावके विरुद्ध काम करनेमें भय लगता है; परन्तु यह क्रोधरूप दोषका तेज है।
साधकमें दैवी-सम्पत्तिके गुण प्रकट होनेसे उसको देखकर दूसरे लोगोंके भीतर स्वाभाविक ही सौम्यभाव आते हैं अर्थात् उस साधकके सामने दूसरे लोग दुराचार करनेमें लज्जित होते हैं, हिचकते हैं और अनायास ही सद्भावपूर्वक सदाचार करने लग जाते हैं। यही उन दैवी-सम्पत्तिवालोंका तेज (प्रभाव) है।
‘क्षमा’—बिना कारण अपराध करनेवालेको दण्ड
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
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देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराधको सह लेना और उसको माफ कर देना 'क्षमा' है। यह क्षमा मोह-ममता, भय और स्वार्थको लेकर भी की जाती है; जैसे—पुत्रके अपराध कर देनेपर पिता उसे क्षमा कर देता है, तो यह क्षमा मोह-ममताको लेकर होनेसे शुद्ध नहीं है। इसी प्रकार किसी बलवान् एवं क्रूर व्यक्तिके द्वारा हमारा अपराध किये जानेपर हम भयवश उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा भयको लेकर है। हमारी धन-सम्पत्तिकी जाँच-पड़ताल करनेके लिये इन्स्पेक्टर आता है, तो वह हमें धमकाता है, अनुचित भी बोलता है और उसका ठहरना हमें बुरा भी लगता है तो भी स्वार्थ-हानिके भयसे हम उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा स्वार्थको लेकर है। पर ऐसी क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो वही है, जिसमें 'हमारा अनिष्ट करनेवालेको यहाँ और परलोकमें भी किसी प्रकारका दण्ड न मिले'—ऐसा भाव रहता है।
क्षमा माँगना भी दो रीतिसे होता है—
(१) हमने किसीका अपकार किया, तो उसका दण्ड हमें न मिले—इस भयसे भी क्षमा माँगी जाती है; परन्तु इस क्षमामें स्वार्थका भाव रहनेसे यह ऊँचे दर्जेंकी क्षमा नहीं है।
(२) हमसे किसीका अपराध हुआ, तो अब यहाँसे आगे उग्रभ्रर ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा—इस भावसे जो क्षमा माँगी जाती है, वह अपने सुधारको दृष्टिको लेकर होती है और ऐसी क्षमा माँगनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है।
मनुष्य क्षमाको अपनेमें लाना चाहे तो कौन-सा उपाय करे? यदि मनुष्य अपने लिये किसीसे किसी प्रकारके सुखकी आशा न रखे और अपना अपकार करनेवालेका बुरा न चाहे, तो उसमें क्षमाभाव प्रकट हो जाता है।
'धृति:—'किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका
नाम 'धृति' (धैर्य) है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैत्तिरीयश्लोक)।
वृत्तियाँ सात्त्विक होती हैं तो धैर्य ठीक रहता है और वृत्तियाँ राजसी-तामसी होती हैं तो धैर्य वैसा नहीं रहता। जैसे बद्दीनारायणके रास्तेपर चलनेवालेके लिये कभी गरमी, चढ़ाई आदि प्रतिकूलताएँ आती हैं और कभी ठण्डक, उतराई आदि अनुकूलताएँ आती हैं, पर चलनेवालेको उन प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओंको देखकर ठहरना नहीं है, प्रत्युत 'हमें तो बद्दीनारायण पहुँचना है'—इस उद्देश्यसे धैर्य और तत्परतापूर्वक चलते रहना है। ऐसे ही साधकको अच्छी-मन्दी वृत्तियाँ और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंकी ओर देखना ही नहीं चाहिये। इनमें उसे धीरज धारण करना चाहिये; क्योंकि जो अपना उद्देश्य सिद्ध करना चाहता है, वह मार्गमें आनेवाले सुख और दुःखको नहीं देखता—
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥
(भर्तृहरिनीतिशतक)
'शौचम्'—बाह्यशुद्धि एवं अन्तःशुद्धिका नाम 'शौच' है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखनेवाला साधक बाह्यशुद्धिका भी खयाल रखता है; क्योंकि बाह्यशुद्धि रखनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि स्वतः होती है और अन्तःकरण शुद्ध होनेपर बाह्य-अशुद्धि उसको सुहाती नहीं। इस विषयपर पतंजलि महाराजने कहा है—
शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।
(योगदर्शन २।४०)
'शौचसे साधककी अपने शरीरमें घृणा अर्थात् अपवित्र-बुद्धि और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा होती है।'
तात्पर्य यह है कि अपने शरीरको शुद्ध रखनेसे शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होता है। शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होनेसे 'सम्पूर्ण शरीर इसी तरहके हैं'—इसका बोध होता है। इस बोधसे दूसरे शरीरोंके प्रति जो आकर्षण होता है, उसका अभाव हो जाता है अर्थात् दूसरे शरीरोंसे सुख
१-क्षमा और अक्रोधमें क्या अन्तर है? क्षमामें जिसने अपराध किया है, उसपर विशेषतासे यह दृष्टि रहती है कि उसको कभी किसी प्रकारका दण्ड न हो और अक्रोधमें अपनी तरफ दृष्टि रहती है कि हमारेमें क्रोध न हो, जलन न हो, किसी प्रकारकी हलचल न हो। यद्यपि क्षमाके अन्तर्गत अक्रोध भी आ जाता है, तथापि क्षमाशील कह देनेपर उसके लिये क्रोधरहित कहनेकी आवश्यकता नहीं है, जब कि क्रोधरहित कहनेपर यह क्षमाशील है, ऐसा कहनेकी आवश्यकता रह जाती है। अतः ये दोनों गुण (क्षमा और अक्रोध) भिन्न-भिन्न हैं।
२-यहाँ 'शौचम्' पदसे बाह्यशुद्धि ही लेनी चाहिये; क्योंकि अन्तःशुद्धि 'सत्त्वसंशुद्धिः' पदसे इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आ चुकी है।