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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२१

देनेकी सामर्थ्य रहते हुए भी उसके अपराधको सह लेना और उसको माफ कर देना 'क्षमा' है। यह क्षमा मोह-ममता, भय और स्वार्थको लेकर भी की जाती है; जैसे—पुत्रके अपराध कर देनेपर पिता उसे क्षमा कर देता है, तो यह क्षमा मोह-ममताको लेकर होनेसे शुद्ध नहीं है। इसी प्रकार किसी बलवान् एवं क्रूर व्यक्तिके द्वारा हमारा अपराध किये जानेपर हम भयवश उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा भयको लेकर है। हमारी धन-सम्पत्तिकी जाँच-पड़ताल करनेके लिये इन्स्पेक्टर आता है, तो वह हमें धमकाता है, अनुचित भी बोलता है और उसका ठहरना हमें बुरा भी लगता है तो भी स्वार्थ-हानिके भयसे हम उसके सामने कुछ नहीं बोलते, तो यह क्षमा स्वार्थको लेकर है। पर ऐसी क्षमा वास्तविक क्षमा नहीं है। वास्तविक क्षमा तो वही है, जिसमें 'हमारा अनिष्ट करनेवालेको यहाँ और परलोकमें भी किसी प्रकारका दण्ड न मिले'—ऐसा भाव रहता है।

क्षमा माँगना भी दो रीतिसे होता है—

(१) हमने किसीका अपकार किया, तो उसका दण्ड हमें न मिले—इस भयसे भी क्षमा माँगी जाती है; परन्तु इस क्षमामें स्वार्थका भाव रहनेसे यह ऊँचे दर्जेंकी क्षमा नहीं है।

(२) हमसे किसीका अपराध हुआ, तो अब यहाँसे आगे उग्रभ्रर ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा—इस भावसे जो क्षमा माँगी जाती है, वह अपने सुधारको दृष्टिको लेकर होती है और ऐसी क्षमा माँगनेसे ही मनुष्यकी उन्नति होती है।

मनुष्य क्षमाको अपनेमें लाना चाहे तो कौन-सा उपाय करे? यदि मनुष्य अपने लिये किसीसे किसी प्रकारके सुखकी आशा न रखे और अपना अपकार करनेवालेका बुरा न चाहे, तो उसमें क्षमाभाव प्रकट हो जाता है।

'धृति:—'किसी भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिमें विचलित न होकर अपनी स्थितिमें कायम रहनेकी शक्तिका

नाम 'धृति' (धैर्य) है (गीता—अठारहवें अध्यायका तैत्तिरीयश्लोक)।

वृत्तियाँ सात्त्विक होती हैं तो धैर्य ठीक रहता है और वृत्तियाँ राजसी-तामसी होती हैं तो धैर्य वैसा नहीं रहता। जैसे बद्दीनारायणके रास्तेपर चलनेवालेके लिये कभी गरमी, चढ़ाई आदि प्रतिकूलताएँ आती हैं और कभी ठण्डक, उतराई आदि अनुकूलताएँ आती हैं, पर चलनेवालेको उन प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओंको देखकर ठहरना नहीं है, प्रत्युत 'हमें तो बद्दीनारायण पहुँचना है'—इस उद्देश्यसे धैर्य और तत्परतापूर्वक चलते रहना है। ऐसे ही साधकको अच्छी-मन्दी वृत्तियाँ और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंकी ओर देखना ही नहीं चाहिये। इनमें उसे धीरज धारण करना चाहिये; क्योंकि जो अपना उद्देश्य सिद्ध करना चाहता है, वह मार्गमें आनेवाले सुख और दुःखको नहीं देखता—

मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम्॥

(भर्तृहरिनीतिशतक)

'शौचम्'—बाह्यशुद्धि एवं अन्तःशुद्धिका नाम 'शौच' है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखनेवाला साधक बाह्यशुद्धिका भी खयाल रखता है; क्योंकि बाह्यशुद्धि रखनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि स्वतः होती है और अन्तःकरण शुद्ध होनेपर बाह्य-अशुद्धि उसको सुहाती नहीं। इस विषयपर पतंजलि महाराजने कहा है—

शौचात् स्वांगजुगुप्सा परैरसंसर्गः।

(योगदर्शन २।४०)

'शौचसे साधककी अपने शरीरमें घृणा अर्थात् अपवित्र-बुद्धि और दूसरोंसे संसर्ग न करनेकी इच्छा होती है।'

तात्पर्य यह है कि अपने शरीरको शुद्ध रखनेसे शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होता है। शरीरकी अपवित्रताका ज्ञान होनेसे 'सम्पूर्ण शरीर इसी तरहके हैं'—इसका बोध होता है। इस बोधसे दूसरे शरीरोंके प्रति जो आकर्षण होता है, उसका अभाव हो जाता है अर्थात् दूसरे शरीरोंसे सुख

१-क्षमा और अक्रोधमें क्या अन्तर है? क्षमामें जिसने अपराध किया है, उसपर विशेषतासे यह दृष्टि रहती है कि उसको कभी किसी प्रकारका दण्ड न हो और अक्रोधमें अपनी तरफ दृष्टि रहती है कि हमारेमें क्रोध न हो, जलन न हो, किसी प्रकारकी हलचल न हो। यद्यपि क्षमाके अन्तर्गत अक्रोध भी आ जाता है, तथापि क्षमाशील कह देनेपर उसके लिये क्रोधरहित कहनेकी आवश्यकता नहीं है, जब कि क्रोधरहित कहनेपर यह क्षमाशील है, ऐसा कहनेकी आवश्यकता रह जाती है। अतः ये दोनों गुण (क्षमा और अक्रोध) भिन्न-भिन्न हैं।

२-यहाँ 'शौचम्' पदसे बाह्यशुद्धि ही लेनी चाहिये; क्योंकि अन्तःशुद्धि 'सत्त्वसंशुद्धिः' पदसे इसी अध्यायके पहले श्लोकमें आ चुकी है।

१०२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

लेनेकी इच्छा मिट जाती है।

बाह्यशुद्धि चार प्रकारसे होती है—(१) शारीरिक, (२) वाचिक, (३) कौटुम्बिक और (४) आर्थिक।

(१) शारीरिक शुद्धि —प्रमाद, आलस्य, आरामतलबी, स्वाद-शौकीनी आदिसे शरीर अशुद्ध हो जाता है और इनके विपरीत कार्य-तत्परता, पुरुषार्थ, उद्योग, सादगी आदि रखते हुए आवश्यक कार्य करनेपर शरीर शुद्ध हो जाता है। ऐसे ही जल, मृत्तिका आदिसे भी शारीरिक शुद्धि होती है।

(२) वाचिक शुद्धि —झूठ बोलने, कड़ुआ बोलने, वृथा बकवाद करने, निन्दा करने, चुगली करने आदिसे वाणी अशुद्ध हो जाती है। इन दोषोंसे रहित होकर सत्य, प्रिय एवं हितकारक आवश्यक वचन बोलना (जिससे दूसरोंकी पारमार्थिक उन्नति होती हो और देश, ग्राम, मोहल्ले, परिवार, कुटुम्ब आदिका हित होता हो) और अनावश्यक बात न करना—यह वाणीकी शुद्धि है।

(३) कौटुम्बिक शुद्धि —अपने बाल-बच्चोंको अच्छी शिक्षा देना; जिससे उनका हित हो, वही आचरण करना; कुटुम्बियोंका हमपर जो न्याययुक्त अधिकार है, उसको अपनी शक्तिके अनुसार पूरा करना; कुटुम्बियोंमें किसीका पक्षपात न करके सबका समानरूपसे हित करना—यह कौटुम्बिक शुद्धि है।

(४) आर्थिक शुद्धि —न्याययुक्त, सत्यतापूर्वक, दूसरोंके हितका बर्ताव करते हुए जिस धनका उपार्जन किया गया है, उसको यथाशक्ति, अरक्षित, अभावग्रस्त, दरिद्री, रोगी, अकालपीडित, भूखे आदि आवश्यकतावालोंको देनेसे एवं गौ, स्त्री, ब्राह्मणोंकी रक्षामें लगानेसे द्रव्यकी शुद्धि होती है।

त्यागी-वैरागी-तपस्वी सन्त-महापुरुषोंकी सेवामें लगानेसे एवं सदृग्रन्थोंको सरल भाषामें छपवाकर कम मूल्यमें देनेसे तथा उनका लोगोंमें प्रचार करनेसे धनकी महान् शुद्धि हो जाती है।

परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य हो जानेपर अपनी (स्वयंकी) शुद्धि हो जाती है। स्वयंकी शुद्धि होनेपर शरीर, वाणी, कुटुम्ब, धन आदि सभी शुद्ध एवं पवित्र होने लगते हैं। शरीर आदिके शुद्ध हो जानेसे वहाँका स्थान, वायुमण्डल आदि भी शुद्ध हो जाते हैं। बाह्यशुद्धि और पवित्रताका खयाल रखनेसे शरीरकी वास्तविकता अनुभवमें आ जाती

है, जिससे शरीरसे अहंता-ममता छोड़नेमें सहायता मिलती है। इस प्रकार यह साधन भी परमात्मप्राप्तिमें निमित्त बनता है।

‘अद्वोहः’ —‘बिना कारण अनिष्ट करनेवालेके प्रति भी अन्तःकरणमें बदला लेनेकी भावनाका न होना ‘अद्वोहः’ है। साधारण व्यक्तिका कोई अनिष्ट करता है, तो उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति द्वेषकी एक गॉठ बँध जाती है कि मौका पड़नेपर मैं इसका बदला ले ही लूँगा; किन्तु जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका है, उस साधकका कोई कितना ही अनिष्ट क्यों न करे, उसके मनमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति बदला लेनेकी भावना ही पैदा नहीं होती। कारण कि कर्म-योगका साधक सबके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करता है, ज्ञानयोगका साधक सबको अपना स्वरूप समझता है और भक्तियोगका साधक सबमें अपने इष्ट भगवान्को समझता है। अतः वह किसीके प्रति कैसे द्वोह कर सकता है।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध ॥

(मानस ७। ११२ ख)

‘नातिमानिता’ —एक ‘मानिता’ होती है और एक ‘अतिमानिता’ होती है। सामान्य व्यक्तियोंसे मान चाहना ‘मानिता’ है और जिनसे हमने शिक्षा प्राप्त की, जिनका आदर्श ग्रहण किया और ग्रहण करना चाहते हैं, उनसे भी अपना मान, आदर-सत्कार चाहना ‘अतिमानिता’ है। इन मानिता और अतिमानिताका न होना ‘नातिमानिता’ है—स्थूल दृष्टिसे ‘मानिता’ के दो भेद होते हैं—

(१) सांसारिक मानिता —धन, विद्या, गुण, बुद्धि, योग्यता, अधिकार, पद, वर्ण, आश्रम आदिको लेकर दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें एक श्रेष्ठताका भाव होता है कि ‘मैं साधारण मनुष्योंकी तरह थोड़े ही हूँ, मेरा कितने लोग आदर-सत्कार करते हैं! वे आदर करते हैं तो यह ठीक ही है; क्योंकि मैं आदर पानेयोग्य ही हूँ’—इस प्रकार अपने प्रति जो मान्यता होती है, वह सांसारिक मानिता कहलाती है।

(२) पारमार्थिक मानिता —प्रारम्भिक साधनकालमें जब अपनेमें कुछ दैवी-सम्पत्ति प्रकट होने लगती है, तब साधकको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें कुछ विशेषता दीखती है। साथ ही दूसरे लोग भी उसे परमात्माकी ओर चलनेवाला साधक मानकर उसका विशेष आदर करते हैं और साथ-ही-साथ ‘ये साधन करनेवाले हैं, अच्छे सज्जन

  • क्रोध और द्वोह—दोनोंमें अन्तर है। अपना अनिष्ट करनेवालेके प्रति तत्काल जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है; और क्रोधका जो भीतरी भाव बैठता है अर्थात् मौका मिलनेपर उसका अनिष्ट करनेकी जो वैरभावना बैठती है, उसका नाम ‘द्वोह’ है।

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२३

हैँ’—ऐसी प्रशंसा भी करते हैं। इससे साधकको अपने विशेषता मालूम देती है, पर वास्तवमें यह विशेषता अपने साधनमें कमी होनेके कारण ही दीखती है। यह विशेषता दीखना पारमार्थिक मानिता है।

जबतक अपनेमें व्यक्तित्व (एकदेशीयता, परिछिन्नता) रहता है, तभीतक अपनेमें दूसरोंकी अपेक्षा विशेषता दिखायी दिया करती है। परन्तु ज्यों-ज्यों व्यक्तित्व मिटता चला जाता है, त्यों-ही-त्यों साधकका दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषताका भाव मिटता चला जाता है। अन्तमें इन सभी मानिताओंका अभाव होकर साधकमें दैवी-सम्पत्तिका गुण ‘नातिमानिता’ प्रकट हो जाती है।

दैवी-सम्पत्तिके जितने सदगुण-सदाचार हैं, उनको पूर्णतया जाग्रत् करनेका उद्देश्य तो साधकका होना ही चाहिये। हाँ, प्रकृति-(स्वभाव-) की भिन्नतासे किसीमें किसी गुणकी कमी, तो किसीमें किसी गुणकी कमी रह सकती है। परन्तु वह कमी साधकके मनमें खटकती रहती है और वह प्रभुका आश्रय लेकर अपने साधनको तत्परतासे करते रहता है; अतः भगवत्कृपासे वह कमी मिटती जाती है। कमी ज्यों-ज्यों मिटती जाती है, त्यों-त्यों उत्साह और उस कमीके उत्तरोत्तर मिटनेकी सम्भावना भी बढ़ती जाती है। इससे दुर्गुण-दुराचार सर्वथा नष्ट होकर सदगुण-सदाचार अर्थात् दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है।

‘भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत’—भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! ये सभी दैवी-सम्पत्तिका प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं।

परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेपर ये दैवी-सम्पत्तिके लक्षण साधकमें स्वाभाविक ही आने लगते हैं। कुछ लक्षण पूर्वजन्मोंके संस्कारोंसे भी जाग्रत् होते हैं। परन्तु साधक इन गुणोंको अपने नहीं मानता और न उनको अपने पुरुषार्थसे उपाजित ही मानता है, प्रत्युत गुणोंके आनेमें वह भगवान्की ही कृपा मानता है। कभी खयाल करनेपर साधकके मनमें ऐसा विचार होता है कि मेरेमें पहले तो ऐसी वृत्तियाँ नहीं थीं, ऐसे सदगुण नहीं थे, फिर ये कहाँसे आ गये? तो ये सब भगवान्की कृपासे ही आये हैं—ऐसा अनुभव होनेसे उस साधकको दैवी-सम्पत्तिका अभिमान नहीं आता।

साधकको दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपने नहीं मानना

चाहिये; क्योंकि यह देव—परमात्माकी सम्पत्ति है, व्यक्तिगत (अपनी) किसीकी नहीं है। यदि व्यक्तिगत होती, तो यह अपनेमें ही रहती, किसी अन्य व्यक्तिकी नहीं रहती। इसको व्यक्तिगत माननेसे ही अभिमान आता है। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मुख्य लक्षण है। अभिमानकी छायामें ही आसुरी-सम्पत्तिके सभी अवगुण रहते हैं। यदि दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति (अभिमान) पैदा हो जाय, तो फिर आसुरी-सम्पत्ति कभी मिटेगी ही नहीं। परन्तु दैवी-सम्पत्तिसे आसुरी-सम्पत्ति कभी पैदा नहीं होती, प्रत्युत दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके साथ-साथ आसुरी-सम्पत्तिके जो अवगुण रहते हैं, उनसे ही गुणोंका अभिमान पैदा होता है अर्थात् साधनके साथ कुछ-कुछ असामर्थ्य रहनेसे ही अभिमान आदि दोष पैदा होते हैं। जैसे, किसीको सत्य बोलनेका अभिमान होता है, तो उसके मूलमें वह सत्यके साथ-साथ असत्य भी बोलता है, जिसके कारण सत्यका अभिमान आता है। तात्पर्य यह है कि दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको अपना माननेसे एवं गुणोंके साथ अवगुण रहनेसे ही अभिमान आता है। सर्वथा गुण आनेपर गुणोंका अभिमान हो ही नहीं सकता।

यहाँ दैवी-सम्पत्ति कहनेका तात्पर्य है कि यह भगवान्की सम्पत्ति है। अतः भगवान्का सम्बन्ध होनेसे, उनका आश्रय लेनेसे शरणागत भक्तमें यह स्वाभाविक ही आती है। जैसे शबरीके प्रसंगमें रामजीने कहा है— नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥

..... नव महुँ एकउ जिन्हें के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ सोइ अतिसय प्रिय भाभिनि मोरै। सकल प्रकार भगति दूढ़ तोरै॥

(मानस ३। ३५-३६)

मनुष्य-देवता, भूत-पिशाच, पशु-पक्षी, नारकीय जीव, कीट-पतंग, लता-वृक्ष आदि जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी हैं, उन सबमें अपनी-अपनी योनिके अनुसार मिले हुए शरीरोंके रूण एवं जीर्ण हो जानेपर भी ‘मैं जीता रहूँ, मेरे प्राण बने रहें’—यह इच्छा बनी रहती है*। इस इच्छाका होना ही आसुरी-सम्पत्ति है।

त्यागी-वैरागी साधकमें भी प्राणोंके बने रहनेकी इच्छा रहती है; परन्तु उसमें प्राणपोषण-बुद्धि, इन्द्रिय-लोलुपता नहीं रहती; क्योंकि उसका उद्देश्य परमात्मा होता है, न कि शरीर और संसार।

  • यज्जीर्यत्यपि देहेऽस्मिन् जीविताशा बलीयसी ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता १०।१४।५३)

१०२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

जब साधक भक्तका भगवान्में प्रेम हो जाता है, तब उसको भगवान् प्राणोंसे भी प्यारे लगते हैं। प्राणोंका मोह न रहनेसे उसके प्राणोंका आधार केवल भगवान् हो जाते हैं। इसलिये वह भगवान्को 'प्राणनाथ! प्राणेश्वर! प्राणप्रिय!' आदि सम्बोधनोंसे पुकारता है। भगवान्का वियोग न सहनेसे उसके प्राण भी छूट सकते हैं। कारण कि मनुष्य जिस वस्तुको प्राणोंसे भी बढ़कर मान लेता है, उसके लिये यदि प्राणोंका त्याग करना पड़े तो वह सहर्ष प्राणोंका त्याग कर देता है; जैसे—पतिव्रता स्त्री पतिको प्राणोंसे भी बढ़कर (प्राणनाथ) मानती है, तो उसका प्राण, शरीर,

वस्तु, व्यक्ति आदिमें मोह नहीं रहता। इसीलिये पतिके मरनेपर वह उसके वियोगमें प्रसन्नतापूर्वक सती हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि जब केवल भगवान्में अनन्य प्रेम हो जाता है, तो फिर प्राणोंका मोह नहीं रहता। प्राणोंका मोह न रहनेसे आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है और दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है। इसी बातका संकेत गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने इस प्रकार किया है—

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥

(मानस ७। ४१। ३)

सम्बन्ध—अबतक एक परमात्माका ही उद्देश्य रखनेवालोंकी दैवी-सम्पत्ति बतायी; परन्तु सांसारिक भोग भोगना और संग्रह करना ही जिनका उद्देश्य है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंकी कौन-सी सम्पत्ति होती है—इसे अब आगेके श्लोकमें बताते हैं।

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!क्रोधः= क्रोध करनाएव= भी—(ये सभी)
दम्भः= दम्भ करना,= तथाआसुरीम्= आसुरी
दर्पः= घमण्ड करनापारुष्यम्= कठोरता रखनासम्पदम्= सम्पदाको
= और= औरअभिजातस्य= प्राप्त हुए मनुष्यके
अभिमानः= अभिमान करना,अज्ञानम्= अविवेकका होना(लक्षण) हैं।

व्याख्या—'दम्भः'—मान, बड़ाई, पूजा, ख्याति आदि प्राप्त करनेके लिये, अपनी वैसी स्थिति न होनेपर भी वैसी स्थिति दिखानेका नाम 'दम्भ' है। यह दम्भ दो प्रकारसे होता है—

(१) सद्गुण-सदाचारोंको लेकर—अपनेको धर्मात्मा, साधक, विद्वान्, गुणवान् आदि प्रकट करना अर्थात् अपनेमें वैसा आचरण न होनेपर भी अपनेमें श्रेष्ठ गुणोंको लेकर वैसा आचरण दिखाना, थोड़ा होनेपर भी ज्यादा दिखाना, भोगी होनेपर भी अपनेको योगी दिखाना आदि दिखावटी भावों और क्रियाओंका होना—यह सद्गुण-सदाचारोंको लेकर 'दम्भ' है।

(२) दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर—जिसका आचरण, खान-पान स्वाभाविक अशुद्ध नहीं है, ऐसा व्यक्ति भी जिनके आचरण, खान-पान अशुद्ध हैं—ऐसे दुर्गुण-दुराचारी लोगोंमें जाकर उनको राजी करके अपनी इज्जत जमानेके लिये, मान-आदर आदि प्राप्त करनेके लिये, अपने मनमें बुरा लगनेपर भी वैसा आचरण, खान-पान

कर बैठता है—यह दुर्गुण-दुराचारोंको लेकर 'दम्भ' है। तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य प्राण, शरीर, धन, सम्पत्ति, आदर, महिमा आदिको प्रधानता देने लगता है, तब उसमें दम्भ आ जाता है।

'दर्पः'—घमण्डका नाम 'दर्प' है। धन-वैभव, जमीन-जायदाद, मकान-परिवार आदि ममतावाली चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़प्पनका अनुभव होता है, वह 'दर्प' है। जैसे—मेरे पास इतना धन है; मेरा इतना बड़ा परिवार है; मेरा इतना राज्य है; मेरे पास इतनी जमीन-जायदाद है; मेरे पीछे इतने आदमी हैं; मेरी आवाजके पीछे इतने आदमी बोलते हैं; मेरे पक्षमें बहुत आदमी हैं; धन-सम्पत्ति-वैभवमें मेरी बराबरी कौन कर सकता है? मेरे पास ऐसे-ऐसे पद हैं, अधिकार हैं; संसारमें मेरा कितना यश, प्रतिष्ठा हो रही है! मेरे बहुत अनुयायी हैं; मेरा सम्प्रदाय कितना ऊँचा है! मेरे गुरुजी कितने प्रभावशाली हैं! आदि-आदि।

'अभिमानः'—अहंतावाली चीजोंको लेकर अर्थात् स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर अपनेमें जो

श्लोक ४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२५

बड़पनका अनुभव होता है, उसका नाम 'अभिमान' है। जैसे—मैं जाति-पाँतमें कुलीन हूँ; मैं वर्ण-आश्रममें ऊँचा हूँ; हमारी जातिमें हमारी प्रधानता है; गाँवभरमें हमारी बात चलती है अर्थात् हम जो कह दूँगे, उसको सभी मानेंगे; हम जिसको सहरा देंगे, उस आदमीसे विरुद्ध चलनेमें सभी लोग भयभीत होंगे और हम जिसके विरोधी होंगे, उसका साथ देनेमें भी सभी लोग भयभीत होंगे; राजदरबारमें भी हमारा आदर है, इसलिये हम जो कह दूँगे, उसे कोई टालेगा नहीं; हम न्याय-अन्याय जो कुछ भी करेंगे, उसको कोई टाल नहीं सकता, उसका कोई विरोध नहीं कर सकता; मैं बड़ा विद्वान् हूँ, मैं अणिमा, महिमा, गरिमा आदि सिद्धियोंको जानता हूँ, इसलिये सारे संसारको उथल-पुथल कर सकता हूँ, आदि-आदि।

‘क्रोधः’ —दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये अन्तः-करणमें जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, उसका नाम ‘क्रोध’ है।

मनुष्यके स्वभावके विपरीत कोई काम करता है तो उसका अनिष्ट करनेके लिये अन्तःकरणमें उत्तेजना होकर जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है, वह क्रोध है। क्रोध और शोभमें अन्तर है। बच्चा उद्दण्डता करता है, कहना नहीं मानता, तो माता-पिता उत्तेजनामें आकर उसको ताड़ना करते हैं—यह उनका ‘शोभ’ (हृदयकी हलचल) है, क्रोध नहीं। कारण कि उनमें बच्चेका अनिष्ट करनेकी भावना होती ही नहीं, प्रत्युत बच्चेके हितकी भावना होती है। परंतु यदि उत्तेजनामें आकर दूसरेका अनिष्ट, अहित करके उसे दुःख देनेमें सुखका अनुभव होता है, तो यह ‘क्रोध’ है। आसुरी प्रकृतिवालोंमें यही क्रोध होता है।

क्रोधके वशीभूत होकर मनुष्य न करनेयोग्य काम भी कर बैठता है, जिसके फलस्वरूप स्वयं उसको पश्चाताप करना पड़ता है। क्रोधी व्यक्ति उत्तेजनामें आकर दूसरोंका अपकार तो करता है, पर क्रोधसे स्वयं उसका अपकार कम नहीं होता; क्योंकि अपना अनिष्ट किये बिना क्रोधी व्यक्ति दूसरेका अनिष्ट कर ही नहीं सकता। इसमें भी एक मर्मकी

बात है कि क्रोधी व्यक्ति जिसका अनिष्ट करता है, उसका किन्हीं दुष्कर्मोंका जो फल भोगरूपसे आनेवाला है, वही होता है अर्थात् उसका कोई नया अनिष्ट नहीं हो सकता; परंतु क्रोधी व्यक्तिका दूसरेका अनिष्ट करनेकी भावनासे और अनिष्ट करनेसे नया पाप-संग्रह हो जायगा तथा उसका स्वभाव भी बिगड़ जायगा। यह स्वभाव उसे नरकोंमें ले जानेका हेतु बन जायगा और वह जिस योनिमें जायगा, वही उसे दुःख देगा।

क्रोध स्वयंको ही जलाता है। क्रोधी व्यक्तिकी संसारमें अच्छी ख्याति नहीं होती, प्रत्युत निन्दा ही होती है। खास अपने घरके आदमी भी क्रोधसे डरते हैं। इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्रोधको नरकोंका दरवाजा बताया है। जब मनुष्यके स्वार्थ और अभिमानमें बाधा पड़ती है, तब क्रोध पैदा होता है। फिर क्रोधसे सम्मोह, सम्मोहसे स्मृतिविश्रम, स्मृतिविश्रमसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे मनुष्यका पतन हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक)।

‘पारुष्यम्’ —कठोरताका नाम ‘पारुष्य’ है। यह कई प्रकारका होता है; जैसे—शरीरसे अकड़कर चलना, टेढ़े चलना—यह शारीरिक पारुष्य है। नेत्रोंसे टेढ़ा-टेढ़ा देखना—यह नेत्रोंका पारुष्य है। वाणीसे कठोर बोलना, जिससे दूसरे भयभीत हो जायें—यह वाणीका पारुष्य है। दूसरोंपर आफत, संकट, दुःख आनेपर भी उनकी सहायता न करके राजी होना आदि जो कठोर भाव होते हैं, यह हृदयका पारुष्य है।

जो शरीर और प्राणोंके साथ एक हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंको यदि दूसरोंकी क्रिया, वाणी बुरी लगती है, तो उसके बदलेमें वे उनको कठोर वचन सुनाते हैं, दुःख देते हैं और स्वयं राजी होकर कहते हैं कि ‘आपने देखा कि नहीं? मैंने उसके साथ ऐसा कड़ा व्यवहार किया कि उसके दाँत खुट्टे कर दिये! अब वह मेरे साथ बोल सकता है क्या?’ यह सब व्यवहारका पारुष्य है।

स्वार्थबुद्धिकी अधिकता रहनेके कारण मनुष्य अपना

१-जहाँ अभिमान और दर्प—दोनोंमेंसे कोई एक आता है, वहाँ अभिमानके ही अन्तर्गत दर्प और दर्पके ही अन्तर्गत अभिमान आ जाता है। परन्तु जहाँ ये दोनों एक साथ स्वतन्त्ररूपसे आते हैं, वहाँ दोनोंमें थोड़ा अन्तर हो जाता है। ‘ममता’ की चीजोंको लेकर ‘दर्प’ और ‘अहंता’ की चीजोंको लेकर ‘अभिमान’ कहा जाता है अर्थात् बाहरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘दर्प’ है और विद्या, बुद्धि आदि भीतरी चीजोंको लेकर अपनेमें जो बड़पन दीखता है, वह ‘अभिमान’ है।

२-क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां देहस्थितो देहविनाशनाय। यथास्थितः काष्ठगोते हि वहिनः स एव वहिन्दर्हते शरीरम्॥ ‘क्रोध ही मनुष्यका प्रथम शत्रु है, जो देहमें स्थित होकर देहका ही विनाश करता है। जैसे लकड़ीमें स्थित अग्नि लकड़ीको ही जलाती है, ऐसे ही देहमें स्थित क्रोधरूपी अग्नि देहको ही जलाती है।’

१०२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

मतलब सिद्ध करनेके लिये, अपनी क्रियाओंसे दूसरोंको कष्ट होगा, उनपर कोई आफत आयेगी—इन बातोंपर विचार ही नहीं कर सकता। हृदयमें कठोर भाव होनेसे वह केवल अपना मतलब देखता है और उसके मन, वाणी, शरीर, बर्ताव आदि सब जगह कठोरता रहती है। स्वार्थभावकी बहुत ज्यादा वृत्ति बढ़ती है, तो वह हिंसा आदि भी कर बैठता है, जिससे उसके स्वभावमें स्वाभाविक ही क्रूरता आ जाती है। क्रूरता आनेपर हृदयमें सौम्यता बिलकुल नहीं रहती। सौम्यता न रहनेसे उसके बर्तावमें, लेन-देनमें स्वाभाविक ही कठोरता रहती है। इसलिये वह केवल दूसरोंसे रुपये ऐंठने, दूसरोंको दुःख देने आदिमें लगा रहता है। इनके परिणाममें मुझे सुख होगा या दुःख—इसका वह विचार ही नहीं कर सकता।

‘अज्ञानम्’ —यहाँ ‘अज्ञान’ नाम अविवेकका है। अविवेकी पुरुषोंको सत्-असत्, सार-असार, कर्तव्य-अकर्तव्य आदिका बोध नहीं होता। कारण कि उनकी दृष्टि नाशवान् पदार्थोंके भोग और संग्रहपर ही लगी रहती है। इसलिये (परिणामपर दृष्टि न रहनेसे) वे यह सोच ही नहीं सकते कि ये नाशवान् पदार्थ कबतक हमारे साथ रहेंगे और हम कबतक इनके साथ रहेंगे। पशुओंकी तरह केवल प्राणपोषणमें ही लगे रहनेके कारण वे क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य है—इन बातोंको नहीं जान सकते और न जानना ही चाहते हैं।

वे तात्कालिक संयोगजन्य सुखको ही सुख मानते हैं और शरीर तथा इन्द्रियोंके प्रतिकूल संयोगको ही दुःख मानते हैं। इसलिये वे उद्योग तो सुखके लिये ही करते हैं, पर परिणाममें उनको पहलेसे भी अधिक दुःख मिलता है। फिर भी उनको चेत नहीं होता कि इसका हमारे लिये नतीजा क्या होगा? वे तो मान-बड़ाई, सुख-आराम, धन-सम्पत्ति आदिके प्रलोभनमें आकर न करनेलायक काम भी करने लग जाते हैं, जिनका नतीजा उनके लिये तथा दुनियाके लिये भी बड़ा अहितकारक होता है।

१-कर्मणिारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च। पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३।१८) राजन्! स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध आदि बन्धनोंसे बँधे हुए पुरुष तो सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्तिके लिये कर्म करते रहते हैं। परन्तु जो पुरुष मायासे तरना चाहता है, उसको विचार करना चाहिये कि उसके कर्मोंका फल किस प्रकार उलटा होता जाता है। वे सुखके बदले दुःख पाते हैं और दुःख दूर होनेके बदले उनका दुःख बढ़ता जाता है!

२-यहाँ ‘आसुरी’ शब्दमें देवताओंका विरोधवाचक ‘नञ्’ समास नहीं है, प्रत्युत ‘असुषु प्राणेषु रमन्ते इति असुरः’ के अनुसार जो मनुष्य केवल इन्द्रियों और प्राणोंका पोषण करनेमें ही लगे हुए हैं अर्थात् जो केवल संयोगजन्य सुखमें ही आसक्त हैं, उन मनुष्योंका वाचक यहाँ ‘असुर’ शब्द है। तात्पर्य यह है कि जिनका उद्देश्य परमात्माको प्राप्त करना नहीं है और जो शरीर धारण करके केवल भोग भोगना चाहते हैं, वे असुर हैं। उन असुरोंकी सम्पत्तिका नाम ‘आसुरी-सम्पत्ति’ है।

‘अभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्’ —हे पार्थ! ये सब आसुरी सम्पत्ति’ को प्राप्त हुए मनुष्योंके लक्षण हैं। मरणधर्मा शरीरके साथ एकता मानकर ‘मैं कभी मरूँ नहीं; सदा जीता रहूँ और सुख भोगता रहूँ’—ऐसी इच्छावाले मनुष्यके अन्तःकरणमें ये लक्षण होते हैं।

अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कोई भी साधारण प्राणी प्रकृतिके गुणोंके सम्बन्धसे सर्वथा रहित नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक जीव परमात्माका अंश होते हुए भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध लेकर ही पैदा होता है। प्रकृतिके साथ सम्बन्धका तात्पर्य है—प्रकृतिके कार्य शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध (तादात्म्य) और पदार्थोंमें ममता, आसक्ति तथा कामनाका होना। शरीरमें ‘मैं-मेरे’ का सम्बन्ध ही आसुरी-सम्पत्तिका मूलभूत लक्षण है। जिसका प्रकृतिके साथ मुख्यतासे सम्बन्ध है, उसीके लिये यहाँ कहा गया है कि वह आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त हुआ है।

प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जीवका अपना माना हुआ है। अतः वह जब चाहे इस सम्बन्धका त्याग कर सकता है। कारण कि जीव (आत्मा) चेतन तथा निर्विकार है और प्रकृति जड़ तथा प्रतिक्षण परिवर्तनशील है, इसलिये चेतनका जड़से सम्बन्ध वास्तवमें है नहीं, केवल मान रखा है। इस सम्बन्धको छोड़ते ही आसुरी-सम्पत्ति सर्वथा मिट जाती है। इस प्रकार मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्तिको मिटानेकी पूरी योग्यता है। तात्पर्य है कि आसुरी-सम्पत्तिको प्राप्त होते हुए भी वह प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद करके आसुरी-सम्पत्तिको मिटा सकता है।

प्राणोंमें मनुष्यका ज्यों-ज्यों मोह होता जाता है, त्यों-ही-त्यों आसुरी-सम्पत्ति अधिक बढ़ती जाती है। आसुरी-सम्पत्तिके अत्यधिक बढ़नेपर मनुष्य अपने प्राणोंको रखनेके लिये और सुख भोगनेके लिये दूसरोंका नुकसान भी कर देता है। इतना ही नहीं, दूसरोंकी हत्या कर देनेमें भी वह नहीं हिचकता।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२७

मनुष्य जब अस्थायीको स्थायी मान लेता है, तब आसुरी-सम्पत्तिके दुर्गुण-दुराचारोंके समूह-के-समूह उसमें आ जाते हैं। तात्पर्य है कि असत्का संग होनेसे असत्

आचरण, असत् भाव और दुर्गुण बिना बुलाये तथा बिना उद्योग किये अपने-आप आते हैं, जो मनुष्यको परमात्मासे विमुख करके अधोगतिमें ले जानेवाले हैं।

सम्बन्ध—अब भगवान् दैवी और आसुरी—दोनों प्रकारकी सम्पत्तियोंका फल बताते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायसुरी मता।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥५॥

दैवी= दैवीनिबन्धाय= बन्धनके लियेअभिजातः= प्राप्त हुए
सम्पत्= सम्पत्तिमता= मानी गयी है।असि= हो,
विमोक्षाय= मुक्तिके लियेपाण्डव= हे पाण्डव!(इसलिये तुम)
(और)(तुम)मा, शुचः= शोक
आसुरी= आसुरीदैवीम्= दैवी(चिन्ता)
सम्पत्तिसम्पदम्= सम्पत्तिकोमत करो।

व्याख्या—‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’—मेरेको भगवान्की तरफ ही चलना है—यह भाव साधकमें जितना स्पष्टरूपसे आ जाता है, उतना ही वह भगवान्के सम्मुख हो जाता है। भगवान्के सम्मुख होनेसे उसमें संसारसे विमुखता आ जाती है। संसारसे विमुखता आ जानेसे आसुरी-सम्पत्तिके जितने दुर्गुण-दुराचार हैं, वे कम होने लगते हैं और दैवी-सम्पत्तिके जितने सदुगुण-सदाचार हैं, वे प्रकट होने लगते हैं। इससे साधककी भगवान्में और भगवान्के नाम, रूप, लीला, गुण, चरित्र आदिमें रुचि हो जाती है।

इसमें विशेषतासे ध्यान देनेकी बात है कि साधकका उद्देश्य जितना दृढ़ होगा, उतना ही उसका परमात्माके साथ जो अनादिकालका सम्बन्ध है, वह प्रकट हो जायगा और संसारके साथ जो माना हुआ सम्बन्ध है, वह मिट जायगा। मिट क्या जायगा, वह तो प्रतिक्षण मिट ही रहा है! वास्तवमें प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है नहीं। केवल इस जीवने सम्बन्ध मान लिया है। इस माने हुए सम्बन्धकी सद्भावनापर अर्थात् ‘शरीर ही मैं हूँ और शरीर ही मेरा है’—इस सद्भावनापर ही संसार टिका हुआ है। इस सद्भावनाके मिटते ही संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिट जायगा और दैवी-सम्पत्तिके सम्पूर्ण गुण प्रकट हो जायेंगे, जो कि मुक्तिके हेतु हैं। दैवी-सम्पत्ति केवल अपने लिये ही नहीं है, प्रत्युत मात्र प्राणियोंके कल्याणके लिये है। जैसे गृहस्थमें छोटे,

बड़े, बूढ़े आदि अनेक सदस्य होते हैं, पर सबका पालन-पोषण करनेके लिये गृहस्वामी (घरका मुखिया) स्वयं उद्योग करता है, ऐसे ही संसारमात्रका उद्धार करनेके लिये भगवान्ने मनुष्यको बनाया है। वह मनुष्य और तो क्या, भगवान्की दी हुई विलक्षण शक्तिके द्वारा भगवान्के सम्मुख होकर, भगवान्की सेवा करके उन्हें भी अपने वशमें कर सकता है। ऐसा विचित्र अधिकार उसे दिया है! अतः मनुष्य उस अधिकारके अनुसार यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, व्रत, जप, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग आदि जितना साधन-समुदाय है, उसका अनुष्ठान केवल अनन्त ब्रह्माण्डोंके अनन्त जीवोंके कल्याणके लिये ही करे और दृढ़तासे यह संकल्प रखते हुए प्रार्थना करे कि ‘हे नाथ! मात्र जीवोंका कल्याण हो, मात्र जीव जीवनमुक्त हो जायें, मात्र जीव आपके अनन्य प्रेमी भक्त बन जायें; पर हे नाथ! यह होगा केवल आपकी कृपासे ही। मैं तो केवल प्रार्थना कर सकता हूँ और वह भी आपकी दी हुई सद्बुद्धिके द्वारा ही!’ ऐसा भाव रखते हुए अपनी कहलानेवाली शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन-सम्पत्ति आदि सभी चीजोंको मात्र दुनियाके कल्याणके लिये भगवान्के अर्पण कर दे*। ऐसा करनेसे अपनी कहलानेवाली चीजोंकी तो संसारके साथ और अपनी भगवान्के साथ स्वतःसिद्ध एकता प्रकट हो जायगी। इसे भगवान्ने ‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय’ पदोंसे कहा है।

  • मात्र जीवोंके कल्याणका जो भाव है, वह भाव भी भगवान्की ही दी हुई विभूति (दैवी-सम्पत्ति) है, अपना नहीं है। अपने तो केवल भगवान् ही हैं।

१०२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

‘निबन्धायासुरी मता’—जो जन्म-मरणको देनेवाली है, वह सब आसुरी-सम्पत्ति है।

जबतक मनुष्यकी अहंताका परिवर्तन नहीं होता, तबतक अच्छे-अच्छे गुण धारण करनेपर वे निरर्थक तो नहीं जाते, पर उनसे उसकी मुक्ति हो जायगी—ऐसी बात नहीं है। तात्पर्य यह है कि जबतक ‘मेरा शरीर बना रहे, मेरेको सुख-आराम मिलता रहे’ इस प्रकारके विचार अहंतामें बैठे रहेंगे, तबतक ऊपरसे भरे हुए दैवी-सम्पत्तिके गुण मुक्तिदायक नहीं होंगे। हाँ, यह बात तो हो सकती है कि वे गुण उसको शुभ फल देनेवाले हो जायेंगे, ऊँचे लोक देनेवाले हो जायेंगे, पर मुक्ति नहीं देंगे।

जैसे बीजको मिट्टीमें मिला देनेपर मिट्टी, जल, हवा, धूप—ये सभी उस बीजको ही पुष्ट करते हैं; आकाश भी उसे अवकाश देता है; बीजसे उसी जातिका वृक्ष पैदा होता है और उस वृक्षमें उसी जातिके फल लगते हैं। ऐसे ही अहंता-(मैं-पन-) में संसारके संस्काररूपी बीज रखते हुए जिस शुभ-कर्मको करेंगे, वह शुभ-कर्म उन बीजोंको ही पुष्ट करेगा और उन बीजोंके अनुसार ही फल देगा। तात्पर्य यह है कि सकाम मनुष्यकी अहंताके भीतर संसारके जो संस्कार पड़े हैं, उन संस्कारोंके अनुसार उसकी सकाम साधनामें अणिमा, गरिमा आदि सिद्धियाँ आयेंगी। उसमें और कुछ विशेषता भी आयेगी, तो वह ब्रह्मलोक आदि लोकोंमें जाकर वहाँके ऊँचे-ऊँचे भोग प्राप्त कर सकता है, पर उसकी मुक्ति नहीं होगी (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)।

अब प्रश्न यह होता है कि मनुष्य मुक्तिके लिये क्या करे? उत्तर यह है कि जैसे बीजको भून दिया जाय या उबाल दिया जाय, तो वह बीज अंकुर नहीं देगा*। उस बीजको बोया जाय तो पृथ्वी उसको अपने साथ मिला लेगी। फिर यह पता ही नहीं चलेगा कि बीज था या नहीं! ऐसे ही मनुष्यका जब दृढ़ निश्चय हो जायगा कि मुझे केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है, तो संसारके सब बीज (संस्कार) अहंतामेंसे नष्ट हो जायेंगे।

शरीर-प्राणोंमें एक प्रकारकी आसक्ति होती है कि मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ, मेरेको मान-बड़ाई मिलती रहे, मैं भोग भोगता रहूँ, आदि। इस प्रकार जो व्यक्तित्वको रखकर चलते हैं, उनमें अच्छे गुण आनेपर भी आसक्तिके कारण उनकी मुक्ति नहीं हो सकती; क्योंकि ऊँच-नीच

योनियोंमें जन्म लेनेका कारण प्रकृतिका सम्बन्ध ही है (गीता—तेरहवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह है कि जिसने प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध जोड़ा हुआ है, वह शुभ-कर्म करके ब्रह्मलोकतक भी चला जाय तो भी वह बन्धनमें ही रहेगा।

मार्मिक बात

भगवान्ने इस अध्यायमें आसुरी-सम्पदाके तीन फल बताये हैं, जिनमेंसे इस श्लोकमें ‘निबन्धायासुरी मता’ पदोंसे बन्धनरूप सामान्य फल बताया है। दूसरे अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकोंमें वर्णित और नवें अध्यायके बीसवें-इक्कीसवें श्लोकोंमें वर्णित सकाम उपासक भी इसीमें आ जाते हैं। जिनका उद्देश्य केवल भोग भोगना और संग्रह करना है, ऐसे मनुष्योंकी बहुत शाखाओंवाली अनन्त बुद्धियाँ होती हैं अर्थात् उनकी कामनाओंका कोई अन्त नहीं होता। जो कामनाओंमें तन्मय हैं और कर्मफलके प्रशंसक वेदवाक्योंमें ही प्रीति रखते हैं, वे वैदिक यज्ञादिको विधि-विधानसे करते हैं, पर कामनाओंके कारण उनको जन्म-मरणरूप बन्धन होता है (गीता—दूसरे अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)। ऐसे ही जो यहाँके भोगोंको न चाहकर स्वर्गके दिव्य भोगोंकी कामनासे शास्त्रविहित यज्ञ करते हैं, वे यज्ञके फलस्वरूप (स्वर्गके प्रतिबन्धक पाप नष्ट होनेसे) स्वर्गमें जाकर दिव्य भोग भोगते हैं। जब उनके (स्वर्ग देनेवाले) पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब वे वहाँसे लौटकर आवागमनको प्राप्त हो जाते हैं (गीता—नवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक)।

अब यहाँ शंका यह होती है कि जिस कृष्णमार्ग (गीता—आठवें अध्यायका पचीसवाँ श्लोक)—से उपर्युक्त सकाम पुरुष जाते हैं, उसी मार्गसे योगभ्रष्ट पुरुष (गीता—छठे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक) भी जाते हैं; अतः दोनोंका मार्ग एक होनेसे और दोनों पुनरावर्ती होनेसे सकाम पुरुषोंके समान योगभ्रष्ट पुरुषोंको भी ‘निबन्धायासुरी मता’ वाला बन्धन होना चाहिये। इसका समाधान यह है कि योगभ्रष्टोंको यह बन्धन नहीं होता। कारण कि पूर्व-(मनुष्यजन्ममें की हुई) साधनामें उनका उद्देश्य अपने कल्याणका रहा है और अन्त समयमें वासना, बेहोशी, पीड़ा आदिके कारण उनको विघ्नरूपसे स्वर्गादिमें जाना पड़ता है। अतः इन योगभ्रष्टोंके इस मार्गसे जानेके

  • भर्जिता क्वथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (श्रीमद्भा० १०। २२। २६)

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०२९

कारण ही (गीता—आठवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें) सकाम पुरुषोंके लिये भी 'योगी' पद आया है, अन्यथा सकाम पुरुष योगी कहे ही नहीं जा सकते।

आसुरी-सम्पत्तिका दूसरा फल है—'पतन्ति नरकेऽशुचौ' (गीता १६।१६)। जो कामनाके वशीभूत होकर पाप, अन्याय, दुराचार आदि करते हैं, उनको फलस्वरूप स्थानविशेष नरकोंकी प्राप्ति होती है।

आसुरी-सम्पत्तिका तीसरा फल है—'आसुरीष्वेव योनिषु', 'ततो यान्यधर्मा गतिम्' (गीता १६।१९-२०)। जिनके भीतर दुर्गुण-दुर्भाव रहते हैं और कभी-कभी उनसे प्रेरित होकर वे दुराचार भी कर बैठते हैं, उनको दुर्गुण-दुर्भावके अनुसार पहले तो आसुरी योनिकी प्राप्ति और फिर दुराचारके अनुसार अधम गति-(नरकों-) की प्राप्ति बतायी गयी है।

'मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव'—केवल अविनाशी परमात्माको चाहनेवालेकी दैवी-सम्पत्ति होती है, जिससे मुक्ति होती है और विनाशी संसारके भोग तथा संग्रहको चाहनेवालेकी आसुरी-सम्पत्ति होती है, जिससे बन्धन होता है—इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें कहीं यह शंका पैदा न हो जाय कि मुझे तो अपनेमें दैवी-सम्पत्ति दीखती ही नहीं! इसलिये भगवान् कहते हैं कि 'भैया अर्जुन! तुम दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुए हो; अतः शोक-संदेह मत करो।'

दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हो जानेपर साधकके द्वारा कर्मयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोगका साधन स्वाभाविक ही होता है। कर्तव्य-पालनसे कर्मयोगीके और ज्ञानगिनसे ज्ञानयोगीके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं (गीता—चौथे अध्यायका तेईसवाँ और सैंतीसवाँ श्लोक); परंतु भक्तियोगीके सभी पाप भगवान् नष्ट करते हैं (गीता—अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक) और संसारसे उसका उद्धार करते हैं (गीता—बारहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)।

'मा शुचः'—*—तीसरे श्लोकमें 'भारत', चौथे श्लोकमें 'पार्थ' और इस पाँचवें श्लोकमें 'पाण्डव'—इन तीन सम्बोधनोंका प्रयोग करके भगवान् अर्जुनको उत्साह दिलाते हैं कि 'भारत! तुम्हारा वंश बड़ा श्रेष्ठ है; पार्थ! तुम उस माता-(पृथा-) के पुत्र हो, जो वैरभाव रखनेवालोंकी भी सेवा करनेवाली है; पाण्डव! तुम बड़े धर्मात्मा और श्रेष्ठ पिता-(पाण्डु-) के पुत्र हो'। तात्पर्य

है कि वंश, माता और पिता—इन तीनों ही दृष्टियोंसे तुम श्रेष्ठ हो; अतः तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति भी स्वाभाविक है। इसलिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

गीतामें दो बार 'मा शुचः' पद आये हैं—एक यहाँ और दूसरा अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें। इन पदोंका दो बार प्रयोग करके भगवान् अर्जुनको समझाते हैं कि तुझे साधन और सिद्धि—दोनोंके ही विषयमें चिन्ता नहीं करनी चाहिये। साधनके विषयमें यहाँ यह आश्वासन दिया कि तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त हुआ है और सिद्धिके विषय (अठारहवें अध्यायका छाछठवाँ श्लोक)—में यह आश्वासन दिया कि मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तात्पर्य यह है कि साधकको अपने साधनमें जो कमियाँ दीखती हैं, उनको तो वह दूर करता रहता है, पर कमियोंके कारण उसके अन्तःकरणमें नम्रताके साथ एक निराशा-सी रहती है कि मेरेमें अच्छे गुण कहाँ हैं, जिससे साध्यकी प्राप्ति हो! साधककी इस निराशाको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको साधकमात्रका प्रतिनिधि बनाकर उसे यह आश्वासन देते हैं कि तुम साधन और साध्यके विषयमें चिन्ता-शोक मत करो, निराश मत होओ।

दैवी-सम्पत्तिवाले पुरुषोंका यह स्वभाव होता है कि उनके सामने अनुकूल या प्रतिकूल कोई भी परिस्थिति, घटना आये, उनकी दृष्टि हमेशा अपने कल्याणकी तरफ ही रहती है। युद्धके मौकेपर जब भगवान् अर्जुनका रथ दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा किया, तब उन सेनाओंमें खड़े अपने कुटुम्बियोंको देखकर अर्जुनमें कौटुम्बिक स्नेहरूपी मोह पैदा हो गया और वे करुणा तथा शोकसे व्याकुल होकर युद्धरूप कर्तव्यसे हटने लगे। उन्हें विचार हुआ कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे मुझे पाप ही लगेगा, जिससे मेरे कल्याणमें बाधा लगेगी। इन्हें मारनेसे हमें नाशवान् राज्य और सुखकी प्राप्ति तो हो जायगी, पर उससे श्रेय-(कल्याण-) की प्राप्ति रुक जायगी। इस प्रकार अर्जुनमें कुटुम्बका मोह और पाप-(अन्याय, अधर्म-) का भय—दोनों एक साथ आ जाते हैं। उनमें जो कुटुम्बका मोह है, वह आसुरी-सम्पत्ति है और पापके कारण अपने कल्याणमें बाधा लग जानेका जो भय है, वह दैवी-सम्पत्ति है।

इसमें भी एक खास बात है। अर्जुन कहते हैं कि हमने जो युद्ध करनेका निश्चय कर लिया है, यह भी एक महान् पाप है—'अहो बत महत्यापं कर्तुं व्यवसिता वयम्'

  • यहाँ 'मा शुचः' क्रिया दिवादिगणकी 'शुचिर् पूतीभावै' धातुके लुङ् लकारका रूप है।

१०३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

(१।४५)। वे युद्ध-क्षेत्रमें भी भगवान्से बार-बार अपने कल्याणकी बात पूछते हैं—‘यच्छ्रेयः स्यानिश्चितं बृहि तन्मे’ (२।७); ‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमानुयायम्’ (३।२); ‘यच्छ्रेय एतयोरैकं तन्मे बृहि सुनिश्चितम्’ (५।१)। यह उनमें दैवी-सम्पत्ति होनेके कारण ही है। इसके विपरीत जिनमें आसुरी-सम्पत्ति है, ऐसे दुर्गंधन आदिमें राज्य और धनका इतना लोभ है कि वे कुटुम्बके नाशसे होनेवाले पापकी तरफ देखते ही नहीं (पहले अध्यायका अड़तीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अर्जुनमें दैवी-सम्पत्ति आरम्भसे ही थी। मोहरूप आसुरी-सम्पत्ति तो उनमें आगन्तुक रूपसे आयी थी, जो आगे चलकर भगवान्की कृपासे नष्ट हो गयी—‘नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रासादामयाच्युत’ (१८।७३)। इसलिये यहाँ भगवान् कहते हैं कि ‘भैया अर्जुन! तू चिन्ता मत कर; क्योंकि तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है।’

अर्जुनको अपनेमें दैवी-सम्पत्ति नहीं दीखती, इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति प्रकट है। कारण कि जो श्रेष्ठ पुरुष होते हैं, उनको अपनेमें अच्छे गुण नहीं दीखते और अवगुण उनमें रहते नहीं। अपनेमें गुण न दीखनेका कारण यह है कि उनकी गुणोंके साथ अभिन्नता होती है। जैसे आँखमें लगा हुआ अंजन आँखको नहीं दीखता; क्योंकि वह आँखके साथ एक हो जाता है, ऐसे ही दैवी-सम्पत्तिके साथ अभिन्नता होनेपर गुण नहीं दीखते। जबतक अपनेमें गुण दीखते हैं, तबतक गुणोंके साथ एकता नहीं हुई है। गुण तभी दीखते हैं, जब वे अपनेसे कुछ दूर होते हैं। अतः भगवान् अर्जुनको आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वाभाविक है, भले ही वह तुम्हें न दीखे; इसलिये तुम चिन्ता मत करो।

मार्मिक बात

भगवान्ने कृपा करके मानवशरीर दिया है, तो उसकी सफलताके लिये अपने भावों और आचरणोंका विशेष ध्यान रखना चाहिये। कारण कि शरीरका कुछ पता नहीं कि कब प्राण चले जायें। ऐसी अवस्थामें जल्दी-से-जल्दी अपना उद्धार करनेके लिये दैवी-सम्पत्तिका आश्रय और

आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करना बहुत आवश्यक है।

दैवी-सम्पत्तिमें ‘देव’ शब्द परमात्माका वाचक है और उनकी सम्पत्ति ‘दैवी-सम्पत्ति’ कहलाती है—‘देवस्येयं दैवी’। परमात्माका ही अंश होनेसे जीवमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक है। जब जीव अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर जड़ प्रकृतिके सम्मुख हो जाता है अर्थात् उत्पत्ति-विनाशशील शरीरादि पदार्थोंका संग (तादात्म्य) कर लेता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है। कारण कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ, द्वेष आदि जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे सब-के-सब नाशवान्के संगसे ही पैदा होते हैं। जो प्राणोंको बनाये रखना चाहते हैं, प्राणोंमें ही जिनकी रति है, ऐसे प्राणपोषणपरायण लोगोंका वाचक ‘असुर’ शब्द है—‘असुरा प्राणेषु रमन्ते इति असुराः’। इसलिये ‘मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ’—यह इच्छा आसुरी-सम्पत्तिका खास लक्षण है।

दैवी और आसुरी-सम्पत्ति सब प्राणियोंमें पायी जाती है (गीता—सोलहवें अध्यायका छठा श्लोक)। ऐसा कोई भी साधारण प्राणी नहीं है, जिसमें ये दोनों सम्पत्तियाँ न पायी जाती हों। हाँ, इसमें जीवनमुक्त, तत्त्वज्ञ महापुरुष तो आसुरी-सम्पत्तिसे सर्वथा रहित हो जाते हैं*, पर दैवी-सम्पत्तिसे रहित कभी कोई हो ही नहीं सकता। कारण कि जीव ‘देव’ अर्थात् परमात्माका सनातन अंश है। परमात्माका अंश होनेसे इसमें दैवी-सम्पत्ति रहती ही है। आसुरी-सम्पत्तिकी मुख्यता होनेसे दैवी-सम्पत्ति दब-सी जाती है, मिटती नहीं; क्योंकि सत्-वस्तु कभी मिट नहीं सकती। इसलिये कोई भी मनुष्य सर्वथा दुर्गुणी-दुराचारी नहीं हो सकता, सर्वथा निर्दयी नहीं हो सकता, सर्वथा असत्यवादी नहीं हो सकता, सर्वथा व्यभिचारी नहीं हो सकता। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे किसी भी व्यक्तिमें सर्वथा हो ही नहीं सकते। कोई भी, कभी भी, कितना ही दुर्गुणी-दुराचारी क्यों न हो, उसके साथ आंशिक सदगुण-सदाचार रहेंगे ही। दैवी-सम्पत्ति प्रकट होनेपर आसुरी-सम्पत्ति मिट जाती है; क्योंकि दैवी-सम्पत्ति परमात्माकी होनेसे अविनाशी है और आसुरी-सम्पत्ति संसारकी होनेसे नाशवान् है।

  • जीवनमुक्त महापुरुष नाशवान्से असंग होकर अविनाशी परमात्मामें स्थित हो जाते हैं। इसलिये उनमें जीनेकी आशा और मरनेका भय नहीं रहता। सत्स्वरूप परमात्मामें स्थित होनेसे उनमें सदगुण-सदाचार स्वतः-स्वाभाविक रहते हैं। वे सिद्ध महापुरुष तो दैवी-सम्पत्तिसे ऊपर उठे रहते हैं। अतः उनमें दैवी-सम्पत्तिके गुण स्वाभाविक होते हैं, जो साधकोंके लिये आदर्श होते हैं।

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३१

सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्माका अंश होनेसे 'मैं सदा जीता रहूँ अर्थात् कभी मरूँ नहीं; मैं सब कुछ जान लूँ अर्थात् कभी अज्ञानी न रहूँ; मैं सर्वदा सुखी रहूँ अर्थात् कभी दुःखी न होऊँ'—इस तरह सत्-चित्-आनन्दकी इच्छा प्राणिमात्रमें रहती है। पर उससे गलती यह होती है कि 'मैं रहूँ तो शरीरसहित रहूँ; मैं जानकार बर्नूँ तो बुद्धिको लेकर जानकार बर्नूँ; मैं सुख लूँ तो इन्द्रियों और शरीरको लेकर सुख लूँ'—इस तरह इन इच्छाओंको नाशवान् संसारसे ही पूरी करना चाहता है। इस प्रकार प्राणोंका मोह होनेसे आसुरी-सम्पत्ति रहती ही है*। इसमें एक मार्मिक बात है कि प्राणीमें नित्य-निरन्तर रहनेकी इच्छा होती है, तो यह नित्य-निरन्तर रह सकता है और मैं मरूँ नहीं, यह इच्छा होती है, तो यह मरता नहीं। जीता रहना अच्छा लगता है, तो जीते रहना इसका स्वाभाविक है और मरनेसे भय लगता है, तो मरना इसका स्वाभाविक नहीं है। ऐसे ही अज्ञान बुरा लगता है, तो अज्ञान इसका साथी नहीं है। दुःख बुरा लगता है, तो दुःख इसका साथी नहीं है। इससे सिद्ध होता है कि इसका स्वरूप 'सत्' है। 'असत्' इसका स्वरूप नहीं है। सत्-स्वरूप होकर भी यह असत्को क्यों चाहता है? कारण कि इसने नष्ट होनेवाले असत् शरीरादिको 'मैं' तथा 'मेरा' मान लिया है और उनमें आसक्त हो गया है। तात्पर्य यह कि असत्को स्वीकार करनेसे स्वयं सत् होते हुए भी सत्की इच्छा होती है; जड़ताको स्वीकार करनेसे स्वयं ज्ञानस्वरूप होते हुए भी ज्ञानकी इच्छा होती है; दुःखरूप संसारको स्वीकार करनेसे स्वयं सुखस्वरूप होते हुए भी सुखकी इच्छा होती है। पर उसकी पूर्ति भी असत्-जड़-दुःखरूप संसारके द्वारा ही करना चाहता है। तादात्म्यके कारण यह शरीरको ही रखना चाहता है, बुद्धिसे ही ज्ञानी बनना चाहता है, शरीरसे ही श्रेष्ठ और सुखी बनना चाहता है, अपने नाम और रूपको ही स्थायी रखना चाहता है। अपने नामको तो मरनेके बाद भी स्थायी रखना चाहता है, इस प्रकार असत्के संगसे आसुरी-सम्पत्ति आती है। ऐसे ही असत्के संगका त्याग करनेसे आसुरी-सम्पत्ति नष्ट हो जाती है और दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो जाती है।

जब सत्संग, स्वाध्याय आदिके द्वारा मनुष्यमें परमात्मप्राप्ति

  • देहाभिमानमें 'मैं सुखपूर्वक जीता रहूँ' इस प्रकार प्राणोंका मोह रहता है। इसलिये देहाभिमानसे आसुरी-सम्पत्ति पैदा होती है। अतः गीतामें 'देहबद्धः' (१२।५), 'देहिन्मत्' (३।४०; १४।५,७) आदि पदोंसे जिन देहाभिमानियोंकी बात आयी है, उन्हें आसुरी-सम्पत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये।

करनेका विचार होता है, तब वह इसके लिये दैवी-सम्पत्तिको धारण करना चाहता है। दैवी-सम्पत्तिको वह कर्तव्यरूपसे उपाजित करता है कि मुझे सत्य बोलना है, मुझे अहिंसक बनना है, मुझे दयालु बनना है, आदि-आदि। इस प्रकार जितने भी दैवी-सम्पत्तिके गुण हैं, उन गुणोंको वह अपने बलसे उपाजित करना चाहता है। यह सिद्धान्त है कि कर्तव्यरूपसे प्राप्त की हुई और अपने बल-(पुरुषार्थ- ) से उपाजित की हुई चीज स्वाभाविक नहीं होती, प्रत्युत कृत्रिम होती है। इसके अलावा अपने पुरुषार्थसे उपाजित माननेके कारण अभिमान आता है कि मैं बड़ा सत्यभाषी हूँ, मैं बड़ा अच्छा आदमी हूँ, आदि। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, सब-के-सब अभिमानकी छायामें रहते हैं और अभिमानसे ही पुष्ट होते हैं। इसलिये अपने उद्योगसे किया हुआ जितना भी साधन होता है, उस साधनमें अहंकार ज्यों-का-त्यों रहता है और अहंकारमें आसुरी-सम्पत्ति रहती है। अतः जबतक वह दैवी-सम्पत्तिके लिये उद्योग करता रहता है, तबतक आसुरी-सम्पत्ति छूटती नहीं। अन्तमें वह हार मान लेता है अथवा उसका उत्साह कम हो जाता है, उसका प्रयत्न मंद हो जाता है और मान लेता है कि यह मेरे वशकी बात नहीं है। साधककी ऐसी दशा क्यों होती है? कारण कि उसने अभीतक यह जाना नहीं कि आसुरी-सम्पत्ति मेरेमें कैसे आयी? आसुरी-सम्पत्तिका कारण है—नाशवान्का संग। इसका संग जबतक रहेगा, तबतक आसुरी-सम्पत्ति रहेगी ही। वह नाशवान्के संगको नहीं छोड़ता, तो आसुरी-सम्पत्ति उसे नहीं छोड़ती अर्थात् 'आसुरी-सम्पत्ति' से वह सर्वथा रहित नहीं हो सकता। इसलिये यदि वह दैवी-सम्पत्तिको लाना चाहे, तो नाशवान् जड़के संगका त्याग कर दे। नाशवान्के संगका त्याग करनेपर दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट होगी; क्योंकि परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी सम्पत्ति उसमें स्वतःसिद्ध है, कर्तव्यरूपसे उपाजित नहीं करनी है।

इसमें एक और मार्मिक बात है। दैवी-सम्पत्तिके गुण स्वतः-स्वाभाविक रहते हैं। इन्हें कोई छोड़ नहीं सकता। इसका पता कैसे लगे? जैसे कोई विचार करे कि मैं सत्य ही बोलूँगा तो वह उग्रभर सत्य बोल सकता है। परन्तु कोई विचार करे कि मैं झूठ ही बोलूँगा, तो वह आठ पहर

१०३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

भी झूठ नहीं बोल सकता। सत्य ही बोलनेका विचार होनेपर वह दुःख भोग सकता है, पर झूठ बोलनेके लिये बाध्य नहीं हो सकता। परन्तु झूठ ही बोलूँगा—ऐसा विचार होनेपर तो खाना-पीना, बोलना-चलनातक उसके लिये मुश्किल हो जायगा। भूख लगी हो और झूठ बोले कि भूख नहीं है, तो जीना मुश्किल हो जायगा। यदि वह ऐसी प्रतिज्ञा कर ले कि झूठ बोलनेसे बेशक मर जाऊँ, पर झूठ ही बोलूँगा, तो यह प्रतिज्ञा सत्य हो जायगी। अतः या तो प्रतिज्ञा भंग होनेसे सत्य आ जायगा या प्रतिज्ञा सत्य हो जायगी। सत्य कभी छूटेगा नहीं; क्योंकि सत्य मनुष्यमात्रमें स्वाभाविक है। इस तरह दैवी-सम्पत्तिके जितने भी गुण हैं, सबके विषयमें ऐसी ही बात है। वे तो नित्य रहनेवाले और स्वाभाविक हैं। केवल नाशवान्के संगका त्याग करना है। नाशवान्का संग अनित्य और अस्वाभाविक है।

आसुरी-सम्पत्ति आगन्तुक है। दुर्गुण-दुराचार बिलकुल ही आगन्तुक हैं। कोई आदमी प्रसन्न रहता है, तो लोग ऐसा नहीं कहते कि तुम प्रसन्न क्यों रहते हो? पर कोई आदमी दुःखी रहता है, तब कहते हैं कि दुःखी क्यों रहते हो? क्योंकि प्रसन्नता स्वाभाविक है और दुःख अस्वाभाविक (आगन्तुक) है। इसलिये अच्छे आचरण करनेवालेको कोई नहीं कहता कि तुम अच्छे आचरण क्यों करते हो? पर बुरे आचरणवालेको सब कहते हैं कि तुम बुरे आचरण क्यों करते हो? अतः सदुर्गुण-सदाचार स्वतः रहते हैं और दुर्गुण-दुराचार संगसे आते हैं, इसलिये आगन्तुक हैं।

अर्जुनमें दैवी-सम्पत्ति विशेषतासे थी। जब उनमें कायरता आ गयी, तब भगवान्ने आश्चर्यसे कहा कि तेरेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी (दूसरे अध्यायका दूसरा-तीसरा श्लोक)? तात्पर्य यह है कि अर्जुनमें यह दोष स्वाभाविक नहीं, आगन्तुक है। पहले उनमें यह दोष था नहीं। अर्जुन आगे कहते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो, ऐसी बात कहिये (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरेका दूसरा और पाँचवेंका पहला श्लोक)। युद्धके प्रसंगमें भी अर्जुनमें 'मेरा कल्याण हो जाय' यह इच्छा है। तो इससे प्रतीत होता है कि अर्जुनके स्वभावमें पहलेसे ही दैवी-सम्पत्ति थी, नहीं तो उर्वशी-जैसी अप्सराको एकदम दुकरा देना कोई मामूली आदमीकी बात नहीं थी। वे अर्जुन विचार करते हैं कि मेरेको दैवी-सम्पत्ति प्राप्त है कि नहीं? मैं उसका अधिकारी हूँ कि नहीं? अतः उसे आश्वासन देते हुए भगवान् कहते हैं कि तू शोक मत कर;

तू दैवी-सम्पत्तिको प्राप्त है—'मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव' (१६।५)।

सत् (चेतन) और असत्-(जड-) के तादात्म्यसे 'अहम्'-भाव पैदा होता है। मनुष्य शुभ या अशुभ, कोई भी काम करता है, तो अपने अहंकारको लेकर करता है। जब वह परमात्माकी तरफ चलता है, तब उसके अहंभावमें सत्-अंशकी मुख्यता होती है और जब संसारकी तरफ चलता है, तब उसके अहंभावमें नाशवान् असत्-अंशकी मुख्यता होती है। सत्-अंशकी मुख्यता होनेसे वह दैवी-सम्पत्तिका अधिकारी कहा जाता है और असत्-अंशकी मुख्यता होनेसे वह उसका अनधिकारी कहा जाता है। असत्-अंशको मिटानेके लिये ही मानवशरीर मिला है। अतः मनुष्य निर्बल नहीं है, पराधीन नहीं है, प्रत्युत यह सर्वथा सबल है, स्वाधीन है। नाशवान्, असत्-अंश तो सबका मिटता ही रहता है, पर वह उससे अपना सम्बन्ध बनाये रखता है। यह भूल होती है। नाशवान्से सम्बन्ध बनाये रखनेके कारण आसुरी-सम्पत्तिका सर्वथा अभाव नहीं होता।

अहंभाव नाशवान्, असत्के सम्बन्धसे ही होता है। असत्का सम्बन्ध मिटते ही अहंभाव मिट जाता है। प्रकृतिके अंशको पकड़नेसे ही अहंभाव है। अहम्में जड-चेतन दोनों हैं। तादात्म्य होनेसे पुरुष-(चेतन-) ने जडके साथ अपनेको एक मान लिया। भोगपदार्थोंकी सब इच्छाएँ असत्-अंशमें ही रहती हैं। परन्तु सुख-दुःखके भोक्तानपनमें पुरुष हेतु बनता है—'पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरच्यते' (१३।२०)। वास्तवमें हेतु है नहीं; क्योंकि वह प्रकृतिस्थ होनेसे ही भोक्ता बनता है—'पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते' (१३।२१)। अतः सुख-दुःखरूप जो विकार होता है, वह मुख्यतासे जड-अंशमें ही होता है। परन्तु तादात्म्य होनेसे उसका परिणाम ज्ञाता चेतनपर होता है कि मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ। जैसे विवाह होनेपर स्त्रीकी जो आवश्यकता होती है, वह अपनी आवश्यकता कहलाती है। पुरुष जो गहने आदि खरीदता है, वह स्त्रीके सम्बन्धसे ही (स्त्रीके लिये) खरीदता है, नहीं तो उसे अपने लिये गहने आदिकी आवश्यकता नहीं है। ऐसे ही जड-अंशके सम्बन्धसे ही चेतनमें जडकी इच्छा और जडका भोग होता है। जडका भोग जड-अंशमें ही होता है, पर जडसे तादात्म्य होनेसे भोगका परिणाम केवल जडमें नहीं हो सकता अर्थात्

श्लोक ५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३३

सुख-दुःखका भोक्ता केवल जड-अंश नहीं बन सकता। परिणामका ज्ञाता चेतन ही भोक्ता बनता है। जितनी क्रियाएँ होती हैं, सब प्रकृतिमें होती हैं (तीसरे अध्यायका सताईसवाँ और तेरहवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक), पर तादात्म्यके कारण चेतन उन्हें अपनेमें मान लेता है कि मैं कर्ता हूँ। तादात्म्यमें चेतन (परमात्मा)-की इच्छामें चेतनकी मुख्यता और जड-(संसार- ) की इच्छामें जडकी मुख्यता रहती है। जब चेतनकी मुख्यता रहती है, तब दैवी-सम्पत्ति आती है और जब जडकी मुख्यता रहती है, तब आसुरी-सम्पत्ति आती है। जडसे तादात्म्य रहनेपर भी सत्, चित् और आनन्दकी इच्छा चेतनमें ही रहती है। संसारकी ऐसी कोई इच्छा नहीं है, जो इन तीन (सदा रहना, सब कुछ जानना और सदा सुखी रहना) इच्छाओंमें सम्मिलित न हो। इससे गलती यह होती है कि इन इच्छाओंकी पूर्ति जड-(संसार- ) के द्वारा करना चाहता है।

जडको और आसुरी-सम्पत्तिको स्वयं-(चेतन- ) ने स्वीकार किया है। जडमें यह ताकत नहीं है कि वह स्वयंके साथ स्थिर रह जाय। जडमें तो हरदम परिवर्तन होता रहता है। चेतन उसको न पकड़े, तो वह अपने-आप छूट जायगा। कारण कि चेतनमें कभी विकार नहीं होता। वह सदा ज्यों-का-त्यों रहता है। पर असत् प्रकृति नित्य-निरन्तर, हरदम बदलती रहती है। वह कभी एकरूप रह ही नहीं सकती। चेतनने प्रकृतिके साथ सम्बन्ध स्वीकार कर लिया। उस सम्बन्धकी सत्ता यह 'मैं' और 'मेरे'-रूपसे स्वीकार कर लेता है। अतः जडका सम्बन्ध और उससे पैदा होनेवाली आसुरी-सम्पत्ति आगन्तुक है। यदि यह स्वयंमें होती, तो इसका कभी नाश नहीं होता; क्योंकि स्वयंका कभी नाश नहीं होता और आसुरी-सम्पत्तिके त्यागकी बात ही नहीं होती। अनित्य होनेपर भी चेतनके सम्बन्धसे यह नित्य दीखने लगती है। अविनाशीके सम्बन्धसे विनाशी भी अविनाशीकी तरह दीखने लगता है। इसलिये जिस मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्ति होती है, वह आसुरी-सम्पत्तिका त्याग कर सकता है और कल्याणका आचरण करके परमात्माको प्राप्त हो सकता है (सोलहवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक)।

परमात्माके सम्मुख होते ही आसुरी-सम्पत्ति मिटने

लगती है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस ५। ४४। ११)

कारण कि 'जन्म कोटि अघ' प्रकृतिसे सम्बन्ध स्वीकार करनेसे ही हुए हैं। प्रकृतिको स्वीकार न करें, तो फिर कैसे जन्म-मरण होगा? जन्म-मरणमें कारण प्रकृतिसे सम्बन्ध ही है—'कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिजन्मसु' (गीता १३। २१)। परन्तु जीवात्मा प्रकृतिकी क्रियाको अपनेमें मान लेता है और प्रकृतिके कार्य शरीरमें मैं-मेरापन कर लेता है, जिससे जन्मता-मरता रहता है। वास्तवमें यह कर्ता भी नहीं है और लिप्त भी नहीं है—'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' (१३। ३१)। इस वास्तविकताका अनुभव करना ही 'कर्ममें अकर्म' तथा 'अकर्ममें कर्म' देखना है। इन दोनों बातोंका अभिप्राय यह है कि कर्म करते हुए भी यह सर्वथा निलिप्त तथा अकर्ता है और निलिप्त तथा अकर्ता रहते हुए ही यह कर्म करता है अर्थात् कर्म करते समय और कर्म न करते समय यह (आत्मा) नित्य-निरन्तर निलिप्त तथा अकर्ता रहता है। इस वास्तविकताका अनुभव करनेवाला ही मनुष्योंमें बुद्धिमान् है (चौथे अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। जिसमें कर्तापनका भाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें लिप्तता नहीं है अर्थात् कोई भी कामना नहीं है, वह यदि सब प्राणियोंको मार दे, तो भी पाप नहीं लगता (अठारहवें अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक)। अर्जुनने पूछा कि मनुष्य किससे प्रेरित होकर पाप करता है? तो भगवान्ने कहा—कामनासे (तीसरे अध्यायका छत्तीसवाँ-सैंतीसवाँ श्लोक)। कामनाके कारण ही सब पाप होते हैं। शरीरके तादात्म्यसे भोग और संग्रहकी कामना होती है*। अतः जडका संग (महत्त्व) ही सम्पूर्ण पापोंका—आसुरी-सम्पत्तिका कारण है। जडका संग न हो, तो दैवी-सम्पत्ति स्वतःसिद्ध है।

अर्जुन साधकमात्रके प्रतिनिधि है। इसलिये अर्जुनके निमित्तसे भगवान् साधकमात्रको आश्वासन देते हैं कि चिन्ता मत करो; अपनेमें आसुरी-सम्पत्ति दीख जाय, तो घबराओ मत; क्योंकि तुम्हारेमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक विद्यमान है—

  • कोई भी मनुष्य अपनेको दोषी बनाना पसंद नहीं करता; क्योंकि इस लोकमें दोषीका अपमान, तिरस्कार और निन्दा होती है तथा परलोकमें चौरासी लाख योनियाँ तथा नरक भोगने पड़ते हैं। परन्तु मनुष्य नाशवान् जडके संगसे पैदा हुई कामनाके वशीभूत होकर न करनेलायक शास्त्र-निषिद्ध क्रिया कर बैठता है। अतः उस क्रियाका परिणाम कर्ता ( मनुष्य )-की रुचिके ( मैं निर्दोष रहूँ—इसके ) अनुसार नहीं होता और कर्ता—( अपनी रुचिके विरुद्ध ) दोषी तथा पापी बन जाता है।

१०३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।

(१६।५)

तात्पर्य यह हुआ कि साधकको पारमार्थिक उन्नतिसे कभी निराश नहीं होना चाहिये; क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेसे मनुष्यमात्रमें परमात्माकी सम्पत्ति (दैवी-सम्पत्ति) रहती ही है। परमात्मप्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है।

परिशिष्ट भाव— जीवके एक ओर भगवान् हैं और एक ओर संसार है। जब वह भगवान्की ओर चलता है, तब उसमें दैवी-सम्पत्ति आती है और जब वह संसारकी ओर चलता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आती है। दैवी-सम्पत्तिमें आस्तिक भाव रहता है और आसुरी-सम्पत्तिमें नास्तिक भाव रहता है। यद्यपि मुक्तिके सभी साधन (कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग आदि) दैवी-सम्पत्तिके अन्तर्गत आ जाते हैं—‘दैवी-सम्पद्भिर्मोक्षाय ’, तथापि दैवी-सम्पत्तिमें मुख्यता भक्तिकी ही है। इसीलिये भगवान्ने भक्तिके प्रकरणमें कहा है—

महत्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिव्यव्यम्॥

(गीता १।१३)

‘हे पृथानन्दन! दैवी प्रकृतिके आश्रित अनन्यमनवाले महत्मालोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियोंका आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।’

आगे भी भगवान्ने कहा है—‘मामप्राप्यैव कौन्तेय— ’ (१६।२०)। भक्तिके अन्तर्गत मुक्तिके सभी साधन आ जाते हैं। जिनको अपने प्राणोंसे प्यार होता है, वे प्राणपोषणपरायण मनुष्य आसुरी-सम्पत्तिवाले होते हैं। परन्तु जो भगवान्को अपने प्राणोंसे भी बढ़कर प्यार मानते हैं, वे दैवी-सम्पत्तिवाले होते हैं।

दूसरोंके सुखके लिये कर्म करना अथवा दूसरोंका सुख चाहना ‘चेतनता’ है और अपने सुखके लिये कर्म करना अथवा अपना सुख चाहना ‘जड़ता’ है। भजन-ध्यान भी अपने सुखके लिये, शरीरके आराम, मान-आदरके लिये करना जड़ता है। चेतनताकी मुख्यतासे दैवी-सम्पत्ति आती है और जड़ताकी मुख्यतासे आसुरी-सम्पत्ति आती है।

मूल दोष एक ही है, जिससे सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्ति पैदा होती है और मूल गुण भी एक ही है, जिससे सम्पूर्ण दैवी-सम्पत्ति प्रकट होती है। मूल दोष है—शरीर तथा संसारकी सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उससे सम्बन्ध जोड़ना। मूल गुण है—भगवान्की सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उनसे सम्बन्ध जोड़ना। यह मूल दोष और मूल गुण ही स्थानभेदसे अनेक रूपोंमें दीखता है।

जबतक गुणोंके साथ अवगुण रहते हैं, तभीतक गुणोंकी महत्ता दीखती है और उनका अभिमान होता है। कोई भी अवगुण न रहे तो अभिमान नहीं होता। अभिमान आसुरी-सम्पत्तिका मूल है। अभिमानके कारण मनुष्यको दूसरोंकी अपेक्षा अपनेमें विशेषता दीखने लगती है—यह आसुरी-सम्पत्ति है। अभिमान होनेके कारण दैवी-सम्पत्ति भी आसुरी-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाली बन जाती है। जब गुणोंके साथ अवगुण नहीं रहते, तब गुणोंकी महत्ता नहीं दीखती और उनका अभिमान नहीं होता। गुणोंकी महत्ता न दीखनेसे साधककी दृष्टि अपने गुणोंकी तरफ नहीं जाती, जिससे वह घबरा जाता है*। अपने गुणोंकी तरफ दृष्टि न जानेसे ही अर्जुन घबरा जाते हैं कि मेरेमें दैवी-सम्पत्ति है ही नहीं! ऐसी दशामें उनकी चिन्ताको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं—‘मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।

  • एक बार एक साधु बड़े व्याकुल होकर बोले कि गीतामें मेरी श्रद्धा नहीं है, मेरी क्या दशा होगी! क्योंकि भगवान्ने कहा है—‘अञ्जश्चाश्रद्धानञ्च संशयात्मा विनश्यति’ (४।४०)। मैंने कहा कि श्रद्धा न करनेवालेका नाश हो जाता है—यह बात लिखी किसमें है? वे बोले—गीतामें। मैंने कहा कि गीतामें लिखी बातसे आपको घबराहट हुई तो यह गीतापर श्रद्धा नहीं तो क्या है? यह बात सुनते ही वे प्रसन्न हो गये!

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३५

सम्बन्ध—सम्पूर्ण प्राणियोंमें चेतन और जड़—दोनों अंश रहते हैं। उनमेंसे कई प्राणियोंका जड़तासे विमुख होकर चेतन-(परमात्मा-) की ओर मुख्यतासे लक्ष्य रहता है और कई प्राणियोंका चेतनसे विमुख होकर जड़ता-(भोग और संग्रह-) की ओर मुख्यतासे लक्ष्य रहता है। इस प्रकार चेतन और जड़की मुख्यताको लेकर प्राणियोंके दो भेद हो जाते हैं, जिनको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

द्वौ भूतसर्गौं लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥६॥

अस्मिन्= इसदैवः= दैवीप्रोक्तः= कह दिया,
लोके= लोकमें= और(अब)
द्वौ= दो तरहकेआसुरः= आसुरी।पार्थ= हे पार्थ! (तुम)
एव= हीदैवः= दैवीको तोमे= मुझसे
भूतसर्गौं= प्राणियोंकी(मैंने)आसुरम्= आसुरीको (विस्तारसे)
सृष्टि है—विस्तरशः= विस्तारसेशृणु= सुनो।

व्याख्या— ‘द्वौ भूतसर्गौं लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च’—आसुरी-सम्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये उसका उपक्रम करते हुए भगवान् कहते हैं कि इस लोकमें प्राणिसमुदाय दो तरहका है—दैव और आसुर। तात्पर्य यह है कि प्राणिमात्रमें परमात्मा और प्रकृति—दोनोंका अंश है। (गीता—दसवें अध्यायका उन्तालीसवाँ और अठारहवें अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)। परमात्माका अंश चेतन है और प्रकृतिका अंश जड़ है। वह चेतन अंश जब परिवर्तनशील जड़-अंशके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें आसुरी-सम्पत्ति आ जाती है और जब वह जड़ प्रकृतिसे विमुख होकर केवल परमात्माके सम्मुख हो जाता है, तब उसमें दैवी-सम्पत्ति जाग्रत् हो जाती है।

‘देव’ नाम परमात्माका है। परमात्माकी प्राप्तिके लिये जितने भी सदगुण-सदाचार आदि साधन हैं, वे सब दैवी-सम्पदा हैं। जैसे भगवान् नित्य हैं, ऐसे ही उनकी साधन-सम्पत्ति भी नित्य है। भगवान्ने परमात्माप्राप्तिके साधनको ‘अव्यय’ अर्थात् अविनाशी कहा है—‘इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्’ (गीता ४।१)।

‘द्वौ भूतसर्गौं’ में ‘भूत’ शब्दसे मनुष्य, देवता, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, लता आदि सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणी लिये जा सकते हैं। परन्तु आसुर स्वभावका त्याग करनेकी विवेकशक्ति मुख्य-रूपसे मनुष्यशरीरमें ही है। इसलिये मनुष्यको आसुर स्वभावका सर्वथा त्याग करना चाहिये। उसका त्याग होते ही दैवी-सम्पत्ति स्वतः प्रकट हो जाती है।

मनुष्यमें दैवी और आसुरी—दोनों सम्पत्तियाँ रहती हैं—

सुमति कुमति सब के उर रहहीं।

नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥

(मानस ५।४०।३)

क्रूर-से-क्रूर कसाईमें भी दया रहती है, चोर-से-चोरमें भी साहूकारी रहती है। इसी तरह दैवी-सम्पत्तिसे रहित कोई हो ही नहीं सकता; क्योंकि जीवमात्र परमात्माका अंश है। उसमें दैवी-सम्पत्ति स्वतः-स्वाभाविक है और आसुरी-सम्पत्ति अपनी बनायी हुई है। सच्चे हृदयसे परमात्माकी तरफ चलनेवाले साधकोंको आसुरी-सम्पत्ति निरन्तर खटकती है, बुरी लगती है और उसको दूर करनेका वे प्रयत्न भी करते हैं। परन्तु जो लोग भजन-स्मरणके साथ आसुरी-सम्पत्तिका भी पोषण करते रहते हैं अर्थात् कुछ भजन-स्मरण, नित्यकर्म आदि भी कर लेते हैं और सांसारिक भोग तथा संग्रहमें भी सुख लेते हैं और उसे आवश्यक समझते हैं, वे वास्तवमें साधक नहीं कहे जा सकते। कारण कि कुछ दैव स्वभाव और कुछ आसुर स्वभाव तो नीच-से-नीच प्राणीमें भी स्वाभाविक रहता है।

एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि अहंताके अनुरूप प्रवृत्ति होती है और प्रवृत्तिके अनुसार अहंताकी दृढ़ता होती है। जिसकी अहंतामें ‘मैं सत्यवादी हूँ’ ऐसा भाव होगा, वह सत्य बोलेगा और सत्य बोलनेसे उसकी सत्यनिष्ठा दृढ़ हो जायगी। फिर वह कभी असत्य नहीं बोल सकेगा। परन्तु जिसकी अहंतामें ‘मैं संसारी हूँ और संसारेके भोग भोगना और संग्रह करना मेरा काम है’ ऐसे भाव होंगे, उसको झूठ-कपट करते देरी नहीं लगेगी। झूठ-कपट करनेसे उसकी अहंतामें ये भाव दृढ़ हो जाते हैं कि ‘बिना

१०३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

झूठ-कपट किये किसीका काम चल ही नहीं सकता, जिसमें भी आजकलके जमानेमें तो ऐसा करना ही पड़ता है, इससे कोई बच नहीं सकता' आदि। इस प्रकार अहंतामें दुर्भाव आनेसे ही दुराचारोंसे छूटना कठिन हो जाता है और इसी कारण लोग दुर्गुण-दुराचारको छोड़ना कठिन या असम्भव मानते हैं।

परमात्माका अंश होनेसे सद्भावसे रहित कोई नहीं हो सकता और शरीरके साथ अहंता-ममता रखते हुए दुर्भावसे सर्वथा रहित कोई नहीं हो सकता। दुर्भावोंके आनेपर भी सद्भावका बीज कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि सद्भाव 'सत्' है और सत्का कभी अभाव नहीं होता—'नाभावो विद्यते सतः' (२।१६)। इसके विपरीत दुर्भाव कुसंगसे उत्पन्न होनेवाले हैं और उत्पन्न होनेवाली वस्तु नित्य नहीं होती—'नासतो विद्यते भावः' (२।१६)।

मनुष्योंकी सद्भाव या दुर्भावकी मुख्यताको लेकर ही प्रवृत्ति होती है। जब सद्भावकी मुख्यता होती है, तब वह सदाचार करता है और जब दुर्भावकी मुख्यता होती है, तब वह दुराचार करता है। तात्पर्य है कि जिसका उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका हो जाता है, उसमें सद्भावकी मुख्यता हो जाती है और दुर्भाव मिटने लगते हैं और जिसका उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रहका हो जाता है, उसमें दुर्भावकी मुख्यता हो जाती है और सद्भाव छिपने लगते हैं।

'लोकेश्मिन्' का तात्पर्य है कि नये-नये अधिकार पृथ्वीमण्डलमें ही मिलते हैं। पृथ्वीमण्डलमें भी भारत-क्षेत्रमें विलक्षण अधिकार प्राप्त होते हैं। भारतभूमिपर जन्म लेनेवाले मनुष्योंकी देवताओंने भी प्रशंसा की है*। कल्याणका मौका मनुष्यलोकमें ही है। इस लोकमें आकर मनुष्यको विशेष सावधानीसे दैवी-सम्पत्ति जाग्रत् करनी चाहिये। भगवान्ने विशेष कृपा करके ही यह मनुष्यशरीर दिया है—

कवहूंक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

(मानस ७।४४।३)

जिन प्राणियोंको भगवान् मनुष्य बनाते हैं, उनपर भगवान् विश्वास करते हैं कि ये अपना कल्याण (उद्धार) करेंगे। इसी आशासे वे मनुष्यशरीर देते हैं। भगवान्ने विशेष कृपा करके मनुष्यको अपनी प्राप्तिकी सामग्री और योग्यता दे रखी है और विवेक भी दे रखा है। इसलिये 'लोकेश्मिन्' पदसे विशेषरूपसे मनुष्यकी ओर ही लक्ष्य है। परन्तु भगवान् तो प्राणिमात्रमें समानरूपसे रहते हैं—'समोऽहं सर्वभूतेषु' (गीता ९।२९)। जहाँ भगवान् रहते हैं, वहाँ उनकी सम्पत्ति भी रहती है, इसलिये 'भूतसगौ' पद दिया है। इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राणिमात्र भगवान्की तरफ चल सकता है। भगवान्की तरफसे किसीको मना नहीं है।

मनुष्योंमें जो सर्वथा दुराचारोंमें लगे हुए हैं, वे चाण्डाल और पशु-पक्षी, कीट-पतंगदि पापयोनियालोंकी अपेक्षा भी अधिक दोषी हैं। कारण कि पापयोनियालोंका तो पहलेके पापोंके कारण परवशतासे पापयोनिमें जन्म होता है और वहाँ उनका पुराने पापोंका फलभोग होता है; परन्तु दुराचारी मनुष्य यहाँ जान-बूझकर बुरे आचरणोंमें प्रवृत्त होते हैं अर्थात् नये पाप करते हैं। पापयोनियाले तो पुराने पापोंका फल भोगकर उन्नतिकी ओर जाते हैं और दुराचारी नये-नये पाप करके पतनकी ओर जाते हैं। ऐसे दुराचारियोंके लिये भी भगवान्ने कहा है कि यदि अत्यन्त दुराचारी भी मेरे अनन्य शरण होकर मेरा भजन करता है, तो वह भी सदा रहनेवाली शान्तिको प्राप्त कर लेता है (नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ श्लोक)। ऐसे ही पापी-से-पापी भी ज्ञानरूपी नौकासे सब पापोंको तरकर अपना उद्धार कर लेता है (चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह कि जब दुराचारी-से-दुराचारी और पापी-से-पापी व्यक्ति भी

  • (१) अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्वितु स्वयं हरिः।

यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवीपयिकं स्पृहा हि नः॥ (श्रीमद्भा ५।११।२१)

'अहो! जिन जीवोंने भारतवर्षमें भगवान्की सेवाके योग्य मनुष्य-जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये हैं? इस परम सौभाग्यके लिये तो हम भी निरन्तर तरसते रहते हैं।'

(२) गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्यादमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥ (श्रीविष्णुपुराण २।३।२४)

'देवगण भी निरन्तर यही गान करते हैं कि जिन्होंने स्वर्ग और अपवर्गके मार्गभूत भारतवर्षमें जन्म लिया है, वे पुरुष हम देवताओंकी अपेक्षा भी अधिक धन्य (बड़भागी) हैं।'

श्लोक ६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३७

भक्ति और ज्ञान प्राप्त करके अपना उद्धार कर सकता है, तो फिर अन्य पापयोनियोंके लिये भगवान्की तरफसे मना कैसे हो सकता है? इसलिये यहाँ 'भूत' (प्राणिमात्र) शब्द दिया है।

मानवेतर प्राणियोंमें भी दैवी प्रकृतिके पाये जानेकी बहुत बातें सुनने, पढ़ने तथा देखनेमें आती हैं। ऐसे कई उदाहरण आते हैं, जिसमें पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी दैवी गुण होनेकी बात आती है*। कई कुत्ते ऐसे भी देखे गये हैं, जो अमावस्या, एकादशी आदिका व्रत रखते हैं और उस दिन अन्न नहीं खाते। सत्संगमें भी मनुष्येतर प्राणियोंके आकर बैठनेकी बातें सुनी हैं। सत्संगमें साँपको भी आते देखा है। गोरखपुरमें जब बारह महीनोंका कीर्तन हुआ था, तब एक काला कुत्ता कीर्तन-मण्डलीके बीचमें चलता और जहाँ सत्संग होता, वहाँ बैठ जाता। ऋषिकेश-(स्वर्गाश्रम-) में वटवृक्षके नीचे एक साँप आया करता था। वहाँ एक सन्त थे। एक दिन उन्होंने साँपसे कहा 'ठहर' तो वह ठहर गया। सन्तने उसे गीता सुनायी, तो वह चुपचाप बैठ रहा। गीता पूरी होते ही साँप वहाँसे चला गया और फिर कभी वहाँ नहीं आया। (इस तरहके पशु-पक्षियोंमें ऐसी प्रकृति पूर्वसंस्कारवश

स्वाभाविक होती है।)

इस प्रकार पशु-पक्षियोंमें भी दैवी-सम्पत्तिके गुण देखनेमें आते हैं। हाँ, यह अवश्य है कि वहाँ दैवी-सम्पत्तिके गुणोंके विकासका क्षेत्र और योग्यता नहीं है। उनके विकासका क्षेत्र और योग्यता केवल मनुष्यशरीरमें ही है।

पशु, पक्षी, जड़ी, बूटी, वृक्ष, लता आदि जितने भी जंगम-स्थायर प्राणी हैं, उन सभीमें दैवी और आसुरी-सम्पत्तिवाले प्राणी होते हैं। मनुष्यको उन सबकी रक्षा करनी ही चाहिये; क्योंकि सबकी रक्षाके लिये, सबका प्रबन्ध करनेके लिये ही यह मनुष्य बनाया गया है। उनमें भी जो सात्त्विक पशु, पक्षी, जड़ी, बूटी आदि हैं, उनकी तो विशेषतासे रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी रक्षासे हमारेमें दैवी-सम्पत्ति बढ़ती है। जैसे, गोमाता हमारी पूजनीया है तो हमें उसकी रक्षा और पालन करना चाहिये; क्योंकि गाय सम्पूर्ण सृष्टिका कारण है—'गावो विश्वस्य मातरः।' गायके घीसे ही यज्ञ होता है; भैंस आदिके घीसे नहीं। यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न और अन्नसे प्राणी पैदा होते हैं। उन प्राणियोंमें खेतीके लिये बैलोंकी जरूरत होती है। वे बैल गायोंके होते हैं। बैलोंसे खेती होती है अर्थात् बैलोंसे

  • महाभारतके शान्तिपर्वमें इसी प्रसंगकी एक कथा आती है। शकुनिलुब्धक नामका एक बधिक था। उसका मुख्य काम पशु-पक्षियोंको मारना ही था। एक दिन वह शिकारके लिये जंगलमें गया। दिनभर घूमता रहा, पर खानेको कुछ मिला नहीं। अकस्मात् आकाश बादलोंसे भर गया और ज़ोरोंसे आँधी-वर्षा होने लगी। वह बधिक एक वृक्षके नीचे आकर बैठ गया।

उसी वृक्षपर दम्पती कपोत और कपोती रहते थे। चुरागा चुरानेके लिये दोनों बाहर गये हुए थे। बरसातके कारण कपोती जल्दी आ गयी। पंख गीले होनेसे वह टिठुरकर नीचे गिर पड़ी, तो बधिकने उसको पकड़कर अपने पिंजड़में बंद कर लिया। जब कपोत घरपर आया, तो कपोतीको वहाँ न देखकर विलाप करने लगा। उसके विलापको सुनकर कपोती बोली कि 'हे प्राणनाथ! आप मेरे लिये इतना विलाप क्यों करते हैं? आप अपने कर्तव्यका पालन कीजिये। हमारे स्थानपर आये हुए अतिथिकी आप रक्षा कीजिये। अतिथिका सत्कार करना गृहस्थका खास कर्तव्य है। इसका किसी तरह जाड़ा छूटे, भूख मिटे—ऐसा आपको प्रबन्ध करना चाहिये। मैं तो पिंजड़में पड़ी हूँ।' अपनी स्त्रीकी बात सुनकर कपोतने अपनी चोंचसे सूखे पत्ते एवं छोटी-छोटी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं। फिर किसी घरसे जलती हुई लकड़ी लाकर अग्न कर दी। वह बधिक सरदीसे टिठुर रहा था। अग्निकी गरमीसे जब कुछ ठीक हुआ, तो उसने कपोतसे कहा कि 'मुझे भूख लग रही है, क्या करूँ?' कपोत बोला कि 'आप चिन्ता न करें। आप मेरे अतिथि हो; अतः मैं आपकी भूख मिटानेका प्रबन्ध करूँगा।' कपोतने थोड़ी देर विचार किया। परन्तु उसे अपने-आपको अग्नियँ गिरानेके अलावा कोई दूसरा उपाय सूझा नहीं। अतः वह अग्निकी तीन परिक्रमा करके उसमें कूद पड़ा। उसको अग्नियँ जलते हुए देखकर बधिकके मनमें विचार आया कि इस कपोतने मुझे कितना आराम दिया है! भोजनके लिये तो इसने अपने-आपको ही दे दिया है! हाय-हाय! मैं कितना क्रूर, निर्दयी पापी हूँ! यह पक्षी होकर भी इतना आदर करता है और मैं मनुष्य होकर भी ऐसा क्रूर काम करता हूँ! आजसे मैं कभी ऐसा पापकर्म नहीं करूँगा। ऐसा निश्चय करके उसने पिंजड़मेंसे कपोतीको छोड़ दिया। अपने पतिदेवके अभावमें वह कपोती विलाप करने लगी कि पतिदेवके बिना मैं रहकर क्या करूँगी? ऐसे विलाप करते हुए वह भी अग्नियँ कूद पड़ी। इतनेमें उन दोनों (कपोत और कपोती)-को लेने विमान आया और वे दोनों उस विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको चले गये।

उन्को इस प्रकार विमानमें जाते हुए देखकर बधिकने अपने सब अस्त्र-शस्त्र फेंक दिये। उसने विचार किया कि अब मैं भजन-स्मरण करूँगा और त्याग-तपस्या करके शरीरको सुखा डालूँगा—कुछ खाऊँगा-पिऊँगा नहीं। इस तरहका विचार करके वह कांटोंसे भरे जंगलमें चला गया! कांटोंसे उसका शरीर छिल गया! आगे वनमें चारों ओरसे आग (दावानि) लगी हुई थी। उसी आगमें घुसकर वह जलकर मर गया। अन्त समयमें भजन-स्मरण करनेसे उसको सद्गति हो गयी।

१०३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

हल आदि जोतकर तथा कूर्प आदिके जलसे सौंचकर खेती की जाती है। खेतीसे अन्न, वस्त्र आदि निर्वाहकी चीजें पैदा होती हैं, जिनसे मनुष्य, पशु आदि सभीका जीवन-निर्वाह होता है। निर्वाहमें भी गायके घी-दूध हमारे खाने-पीनेके काम आते हैं। उन घी-दूधसे हमारे शरीरमें बल और अन्तःकरणमें सात्त्विक भाव बढ़ते हैं। इसी तरहसे जितनी जड़ी-बूटियाँ हैं, उनमेंसे सात्त्विक जड़ी-बूटीसे कायाकल्प होता है, रोग दूर होता है और शरीर पुष्ट होता है। इसलिये हमलोगोंको सात्त्विक पशु, पक्षी, जड़ी-बूटी आदिकी विशेष रक्षा करनी चाहिये, जिससे हमारे इहलोक और परलोक दोनों सुधर जायँ।

‘दैवो विस्तारशः प्रोक्तः’ —भगवान् कहते हैं कि दैवी-सम्पत्तिका मैंने विस्तारसे वर्णन कर दिया। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें नौ, दूसरे श्लोकमें ग्यारह और

तीसरे श्लोकमें छः—इस तरह दैवी-सम्पत्तिके कुल छब्बीस लक्षणोंका वर्णन किया गया है। इससे पहले भी गुणातीतके लक्षणोंमें (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक), ज्ञानके बीस साधनोंमें (तेरहवें अध्यायके सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक), भक्तोंके लक्षणोंमें (बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक), कर्मयोगीके लक्षणोंमें (छठे अध्यायके सातवेंसे नवें श्लोकतक) और स्थितप्रज्ञके लक्षणोंमें (दूसरे अध्यायके पचपनवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक) दैवी-सम्पत्तिका विस्तारसे वर्णन हुआ है।

‘आसुरं पार्थ मे शृणु’ —भगवान् कहते हैं कि अब तू मुझसे आसुरी-सम्पत्तिको विस्तारपूर्वक सुन अर्थात् जो मनुष्य केवल प्राण-पोषणपरायण होते हैं, उनका स्वभाव कैसा होता है—यह मेरेसे सुन।

परिशिष्ट भाव —दैवी और आसुरी—यह दो तरहके प्राणियोंकी सृष्टि मनुष्यलोकमें होनेसे लौकिक है। अलौकिक तत्त्वमें ये दोनों ही नहीं हैं। साधन भी लौकिक और अलौकिक दोनों होते हैं, पर साध्य अलौकिक ही होता है। अलौकिक तत्त्व व्यापक, अनन्त-अपर है। लौकिक भी उसीके अन्तर्गत है। वास्तवमें लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। सब कुछ अलौकिक ही है। जीवने ही लौकिकको धारण किया है—‘ययेदं धारयते जगत् ’ (गीता ७।५)। तात्पर्य है कि जबतक जीवकी दृष्टिमें संसारकी सत्ता है, तभीतक ‘लौकिक’ है। संसारकी सत्ता न रहनेपर सब ‘अलौकिक’ ही है—‘वासुदेवः सर्वम् ’, ‘सदसच्चाहम् ’।

सम्बन्ध —भगवान्से विमुख मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्ति किस क्रमसे* आती है, उसका आगेके श्लोकमें वर्णन करते हैं।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥

आसुराः= आसुरी प्रकृतिवाले= नहींआचारः= श्रेष्ठ
जनाः= मनुष्यविदुः= जानतेआचरण
प्रवृत्तिम्= किसमें प्रवृत्त होना चाहिये= और= तथा
= औरतेषु= उनमें= न
निवृत्तिम्= किससे निवृत्त होना चाहिये (—इसको)= न तोसत्यम्= सत्य-पालन
शौचम्= बाह्य शुद्धि,अपि= ही
= नविद्यते= होता है।
  • आरम्भमें ही अच्छी शिक्षा न मिलनेसे वे आसुर प्राणी क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये, शरीरकी शुद्धि क्या होती है और अशुद्धि क्या होती है, खान-पान क्या शुद्ध होता है और क्या अशुद्ध होता है, बड़ों और छोटोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये और कैसा नहीं करना चाहिये, वाणी आदिका सत्य क्या होता है और असत्य क्या होता है—इन सब बातोंको नहीं जानते अर्थात् अच्छी शिक्षाके अभावमें वे प्रवृत्ति और निवृत्तिको, शौचको, सदाचारको और सत्यको नहीं जानते। इस कारण वे सत्य तत्त्व परमात्मासे विमुख हो जाते हैं। परमात्मासे विमुख होनेसे वे न ईश्वर, धर्म आदिको मानते हैं और न उनकी मर्यादाको ही मानते हैं। वे स्त्री-पुरुषके संगसे ही संसारकी उत्पत्ति मानते हैं। इस प्रकार नास्तिक दृष्टिका आश्रय लेकर वे दूसरोंको दुःख देते हैं और अपना महान् पतन कर लेते हैं।

श्लोक ७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१०३९

व्याख्या—'प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः'—आजकलके उच्छृंखल वातावरण, खान-पान, शिक्षा आदिके प्रभावसे प्रायः मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्तिको अर्थात् किसमें प्रवृत्त होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये—इसको नहीं जानते और जानना चाहते भी नहीं। कोई इसको बताना चाहे, तो उसकी मानते नहीं, प्रत्युत उसकी हँसी उड़ाते हैं, उसे मूर्ख समझते हैं और अभिमानके कारण अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझते हैं। कुछ लोग (प्रवृत्ति और निवृत्तिको) जानते भी हैं, पर उनपर आसुरी-सम्पदाका विशेष प्रभाव होनेसे उनकी विहित कार्योंमें प्रवृत्ति और निषिद्ध कार्योंसे निवृत्ति नहीं होती। इस कारण सबसे पहले आसुरी-सम्पत्ति आती है—प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे।

प्रवृत्ति और निवृत्तिको कैसे जाना जाय? इसे गुरुके द्वारा, ग्रन्थके द्वारा, विचारके द्वारा जाना जा सकता है। इसके अलावा उस मनुष्यपर कोई आफत आ जाय, वह मुसीबतमें फँस जाय, कोई विचित्र घटना घट जाय, तो विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है। किसी महापुरुषके दर्शन हो जानेसे पूर्वसंस्कारवश मनुष्यकी वृत्ति बदल जाती है अथवा जिन स्थानोंपर बड़े-बड़े प्रभावशाली सन्त हुए हैं, उन स्थलोंमें, तीर्थोंमें जानेसे भी विवेकशक्ति जाग्रत् हो जाती है।

विवेकशक्ति प्राणिमात्रमें रहती है। परन्तु पशु-पक्षी आदि योनियोंमें इसको विकसित करनेका अवसर, स्थान और योग्यता है एवं मनुष्यमें उसको विकसित करनेका अवसर, स्थान और योग्यता भी है। पशु-पक्षी आदिमें वह विवेकशक्ति केवल अपने शरीर-निर्वाहतक ही सीमित रहती है पर मनुष्य उस विवेकशक्तिसे अपना और अपने परिवारका तथा अन्य प्राणियोंका भी पालन-पोषण कर सकता है, और दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सद्गुण-सदाचारोंको भी ला सकता है। मनुष्य इसमें सर्वथा स्वतन्त्र है; क्योंकि वह साधन-योनि है। परन्तु पशु-पक्षी इसमें स्वतन्त्र नहीं हैं; क्योंकि वह भोग-योनि है।

जब मनुष्योंकी खाने-पीने आदिमें ही विशेष वृत्ति रहती है, तब उनमें कर्तव्य-अकर्तव्यका होश नहीं रहता। ऐसे मनुष्योंमें पशुओंकी तरह दैवी-सम्पत्ति छिपी हुई रहती है, सामने नहीं आती। ऐसे मनुष्योंके लिये भी भगवान्ने 'जनाः' पद दिया है अर्थात् वे भी मनुष्य

कहलानेके लायक हैं; क्योंकि उनमें दैवी-सम्पत्ति प्रकट हो सकती है।

विशेष बात

विशेष बात

'जनाः' (१६।७) से लेकर 'नराधमान्' (१६।१९) पदतक बीचमें आये हुए श्लोकोंमें कहीं भी भगवान्ने मनुष्यवाचक शब्द नहीं दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि मनुष्यमें आसुरी-सम्पत्तिका त्याग करनेकी तथा दैवी-सम्पत्तिको धारण करनेकी योग्यता है, तथापि जो मनुष्य होकर भी दैवी-सम्पत्तिको धारण न करके आसुरी-सम्पत्तिको बनाये रखते हैं, वे मनुष्य कहलानेलायक नहीं हैं। वे पशुओंसे और नारकीय प्राणियोंसे भी गये-बीते हैं; क्योंकि पशु और नारकीय प्राणी तो पापोंका फल भोगकर पवित्रताकी तरफ जा रहे हैं और ये आसुर स्वभाववाले मनुष्य जिस पुण्यसे मनुष्यशरीर मिला है, उसको नष्ट करके और यहाँ नये-नये पाप बटोरकर पशु-पक्षी आदि योनियों तथा नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। अतः उनकी दुर्गतिा वर्णन इसी अध्यायके सोलहवें और उन्नीसवें श्लोकोंमें किया गया है।

भगवान्ने आसुर मनुष्योंके जितने लक्षण बताये हैं, उनमें उनको पशु आदिके विशेषण न देकर 'अशुमान्', 'नराधमान्' विशेषण दिये हैं। कारण यह कि पशु आदि इतने पापी नहीं हैं और उनके दर्शनसे पाप भी नहीं लगता, पर आसुर मनुष्योंमें विशेष पाप होते हैं और उनके दर्शनसे पाप लगता है, अपवित्रता आती है। इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें 'नरः' पद देकर यह बताते हैं कि जो काम-क्रोध-लोभरूप नरकके द्वारोंसे छूटकर अपने कल्याणका आचरण करता है, वही मनुष्य कहलानेलायक है। पाँचवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें भी 'नरः' पदसे इसी बातको पुष्ट किया गया है।

'न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते'—प्रवृत्ति और निवृत्तिको न जाननेसे उन आसुर स्वभाववालोंमें शुद्धि-अशुद्धिका ख्याल नहीं रहता। उनको सांसारिक बर्तावका, व्यवहारका भी ख्याल नहीं होता अर्थात् माता-पिता आदि बड़े-बूढ़ोंके साथ तथा अन्य मनुष्योंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये और कैसा नहीं करना चाहिये—इस बातको वे जानते ही नहीं। उनमें सत्य नहीं होता अर्थात् वे असत्य बोलते हैं और आचरण भी असत्य ही करते हैं। इन सबका तात्पर्य यह है कि वे पुरुष असुर हैं। खाना-पीना, आरामसे रहना तथा 'मैं जीता रहूँ',

१०४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १६ ]

संसारका सुख भोगता रहूँ और संग्रह करता रहूँ' आदि उद्देश्य होनेसे उनकी शौचाचार और सदाचारकी तरफ दृष्टि ही नहीं जाती।

भगवान्ने दूसरे अध्यायके चौवालीसवें श्लोकमें बताया है कि वैदिक प्रक्रियाके अनुसार सांसारिक भोग और संग्रहमें लगे हुए पुरुषोंमें भी परमात्माकी प्राप्तिका एक

परिशिष्ट भाव— ज्यों-ज्यों आसुरी-सम्पत्ति आती है, त्यों-त्यों विवेक लुप्त होता जाता है। भोगोंके परायण होनेसे आसुर मनुष्य 'क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये'—इसको नहीं जान सकते। उनकी निष्ठा तो लौकिक भी नहीं होती, अलौकिक तो दूर रही! उनकी निष्ठा नरकोंमें ले जानेवाली होती है।

आसुर मनुष्य पिण्डप्राणपोषणपरायण होते हैं। इसलिये वे केवल अपना सुख-आराम, अपना स्वार्थ देखते हैं। जिससे अपनेको सुख मिलता दीखे, उसीमें उनकी प्रवृत्ति होती है और जिससे दुःख मिलता दीखे, स्वार्थ सिद्ध होता न दीखे, उसीसे उनकी निवृत्ति होती है। वास्तवमें प्रवृत्ति और निवृत्तिमें शास्त्र ही प्रमाण है (गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक); परन्तु अपने शरीर और प्राणोंमें मोह रहनेके कारण आसुर मनुष्योंकी प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्रको लेकर नहीं होती। आसुर स्वभावके कारण वे शास्त्रकी बात सुनते ही नहीं और अगर सुन भी लें तो उसको समझ सकते ही नहीं—'यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः' (गीता १५।११)।

सम्बन्ध— जहाँ सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती, वहाँ सद्भावोंका भी निरादर होता है अर्थात् सद्भाव दबते चले जाते हैं—अब इसको बताते हैं।

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।

अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥

ते= वेअनीश्वरम्= बिना ईश्वरकेइसका कारण है,
आहुः= कहा करते हैं किअपरस्पर-सम्भूतम्= अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे पैदा हुआ है।अन्यत् = इसके सिवाय और
जगत्= संसारकामहैतुकम्= (इसलिये) काम हीकिम् = क्या कारण है ? (और कारण हो ही नहीं सकता।)
असत्यम्= असत्य,
अप्रतिष्ठम्= बिना मर्यादाके (और)

व्याख्या— 'असत्यम्'—आसुर स्वभाववाले पुरुष कहा करते हैं कि यह जगत् असत्य है अर्थात् इसमें कोई भी बात सत्य नहीं है। जितने भी यज्ञ, दान, तप, ध्यान, स्वाध्याय, तीर्थ, व्रत आदि शुभकर्म किये जाते हैं, उनको वे सत्य नहीं मानते। उनको तो वे एक बहकावा मानते हैं।

'अप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्'—संसारमें आस्तिक

निश्चय नहीं होता। भाव यह है कि आसुरी-सम्पदाका अंश रहनेके कारण जब ऐसे शास्त्र-विधिसे यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए पुरुष भी परमात्माका एक निश्चय नहीं कर पाते, तब जिन पुरुषोंमें आसुरी-सम्पदा विशेष बढ़ी हुई है अर्थात् जो अन्यायपूर्वक भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं, उनकी बुद्धिमें परमात्माका एक निश्चय होना कितना कठिन है!

पुरुषोंकी धर्म, ईश्वर, परलोक१ (पुनर्जन्म) आदिमें श्रद्धा होती है। परन्तु वे आसुर मनुष्य धर्म, ईश्वर आदिमें श्रद्धा नहीं रखते; अतः वे ऐसा मानते हैं कि इस संसारमें धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदिको कोई प्रतिष्ठा—मर्यादा नहीं है। इस जगत्को वे बिना मालिकका कहते हैं अर्थात् इस जगत्को रचनेवाला, इसका शासन करनेवाला, यहाँपर किये हुए पाप-पुण्योंका फल भुगतानेवाला कोई (ईश्वर)

१-पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥ (मानस ५।४४।२)

२-मरनेके बाद जो जन्म होता है, वह चाहे मृत्युलोकमें हो, चाहे किसी अन्य लोकमें हो, चाहे मनुष्य, पशु-पक्षी आदि किसी योनिविशेषमें हो, वह सब 'परलोक' ही है।