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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ४७ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२९

चेतावनी मिलती है कि अब हम सुखभोगके लिये पाप करंगे तो आगे भी इसी प्रकार दुःखदायी परिस्थिति आयेगी। इसलिये सुखभोगकी इच्छासे अब कोई काम करना ही नहीं है, प्रत्युत प्राणिमात्रके हितके लिये ही काम करना है।

तात्पर्य यह हुआ कि पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि योनियोंके लिये पुराने कर्मोंका फल और नया कर्म—ये दोनों ही भोगरूपमें हैं और मनुष्यके लिये पुराने कर्मोंका फल और नया कर्म (पुरुषार्थ)—ये दोनों ही उद्धारके साधन हैं।

‘मा फलेषु कदाचन’ —फलमें तेरा किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है अर्थात् फलकी प्राप्तिमें तेरी स्वतन्त्रता नहीं है; क्योंकि फलका विधान तो मेरे अधीन है। अतः फलकी इच्छा न रखकर कर्तव्य-कर्म कर। अगर तू फलकी इच्छा रखकर कर्म करेगा तो तू बँध जायगा—‘फले सत्तो निबध्यते’ (गीता ५। १२)। कारण कि फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्वपर ही कर्तृत्व टिका हुआ है अर्थात् भोक्तृत्वसे ही कर्तृत्व आता है। फलेच्छा सर्वथा मिटनेसे कर्तृत्व मिट जाता है और कर्तृत्व मिटनेसे मनुष्य कर्म करता हुआ भी नहीं बँधता। भाव यह हुआ कि वास्तवमें मनुष्य कर्तृत्वमें उतना फँसा हुआ नहीं है, जितना फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्वमें फँसा हुआ है*।

दूसरी बात, जितने भी कर्म होते हैं, वे सभी प्राकृत पदार्थों और व्यक्तियोंके संगठनसे ही होते हैं। पदार्थों और व्यक्तियोंके संगठनके बिना स्वयं कर्म कर ही नहीं सकता; अतः इनके संगठनके द्वारा किये हुए कर्मोंका फल अपने लिये चाहना ईमानदारी नहीं है। अतः कर्मोंका फल चाहना मनुष्यके लिये हितकारक नहीं है।

फलमें तेरा अधिकार नहीं है— इससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि फलके साथ सम्बन्ध जोड़नेमें अथवा न जोड़नेमें मात्र मनुष्य स्वतन्त्र हैं, सबल हैं। इसमें वे पराधीन और निर्बल नहीं हैं।

‘फलेषु’ पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि मनुष्य कर्म तो एक करता है, पर उस कर्मके फल अनेक चाहता है। जैसे, मैं अमुक कर्म कर रहा हूँ तो इससे मेरेको पुण्य हो जाय, संसारमें मेरी कीर्ति हो जाय, लोग मेरेको अच्छा समझें, मेरा आदर-सत्कार करें, मेरेको इतना धन प्राप्त हो जाय आदि-आदि।

निष्काम होनेके उपाय—(१) कामना पैदा होनेसे अभाव होता है, कामनाकी पूर्ति होनेसे परतन्त्रता और पूर्ति न होनेसे दुःख होता है तथा कामना-पूर्तिका सुख लेनेसे नयी कामनाकी उत्पत्ति होती है और सकामभावपूर्वक नये नये कर्म करनेकी रुचि बढ़ती चली जाती है—ऐसा ठीक-ठीक समझ लेनेसे निष्कामता स्वतः आ जाती है।

(२) कर्म नित्य नहीं हैं; क्योंकि उनका आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंका फल भी नित्य नहीं है; क्योंकि उनका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु स्वयं नित्य है। अनित्य कर्म और कर्मफलसे नित्य स्वरूपको कोई लाभ नहीं होता। ऐसा ठीक समझ लेनेसे निष्कामता आ जाती है। निष्काम होनेसे संसारका सम्बन्ध छूट जाता है और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।

कर्मोंमें निष्काम होनेके लिये साधकमें तेजीका विवेक भी होना चाहिये और सेवाभाव भी होना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंके होनेसे ही कर्मयोग ठीक तरहसे आचरणमें आयेगा, नहीं तो ‘कर्म’ हो जायेंगे, पर ‘योग’ नहीं होगा। तात्पर्य है कि अपने सुख-आरामका त्याग करनेमें तो ‘विवेक’ की प्रधानता होनी चाहिये और दूसरोंको सुख-आराम पहुँचानेमें ‘सेवाभाव’ की प्रधानता होनी चाहिये।

‘मा कर्मफलहेतुर्भूः’ —तू कर्मफलका हेतु भी मत बन। तात्पर्य है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि कर्म-सामग्रीके साथ अपनी किंचिन्मात्र भी ममता नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि इनमें ममता होनेसे मनुष्य कर्म-फलका हेतु बन जाता है। आगे पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ ‘केवलैः’ पद देकर बताया है कि शरीर आदिके साथ किंचिन्मात्र भी ममता नहीं होनी चाहिये।

शुभ क्रियाओंमें फलकी इच्छा न होनेपर भी ‘मेरे द्वारा किसीका उपकार हो गया, किसीका हित हो गया, किसीको सुख पहुँचा’—ऐसा भाव हो जाता है तो यह कर्मफलका हेतु बनना है। कारण कि ऐसा भाव होनेसे शुभ कर्मके साथ और मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्ध हो जाता है, जो कि असत्का संग है। वास्तवमें अन्तःकरण, बहिःकरण और क्रियाओंके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। इनका सम्बन्ध समष्टि संसारके साथ है। जैसे दूसरे किसी व्यक्तिके

  • अन्तःकरणमें भोक्तृत्व (फलेच्छा, फलासक्ति) अधिक रहनेके कारण ही मनुष्य भगवत्प्राप्ति, तत्त्वज्ञान, प्रेमप्राप्ति आदिमें कर्मोंको कारण मानता है। वास्तवमें भगवत्प्राप्ति आदि कर्मोंपर निर्भर नहीं है, प्रत्युत भाव और बोधपर ही निर्भर है। कारण कि अप्राप्त पदार्थोंकी प्राप्ति तो कर्मोंपर निर्भर है, पर नित्यप्राप्त तत्त्वकी प्राप्ति कर्मोंपर निर्भर नहीं है।

१३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

द्वारा दूसरे किसीका हित होता है, तो उसमें हम अपना सम्बन्ध नहीं मानते, उसमें अपनेको निमित्त नहीं मानते। ऐसे ही अपने कहलानेवाले शरीर आदिसे किसीका हित हो जाय, तो उसमें अपनेको निमित्त न माने। जब अपनेको किसी भी क्रियामें निमित्त, हेतु नहीं मानेंगे, तो कर्म-फलका हेतु भी नहीं बनेंगे।

‘मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि’ —कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। कारण कि कर्म न करनेमें आसक्ति होनेसे आलस्य, प्रमाद आदि होंगे। कर्मफलमें आसक्ति रहनेसे जैसा बन्धन होता है, वैसा ही बन्धन कर्म न करनेमें आलस्य, प्रमाद आदि होनेसे होता है; क्योंकि आलस्य-प्रमादका भी एक भोग होता है अर्थात् उनका भी एक सुख होता है, जो तमोगुण है—‘निद्रालस्यप्रमादोत्थं ततामसमुदाहतम्’ (गीता १८।३९) और जिसका फल अधोगति होता है—‘अधो गच्छन्ति तामसाः’ (गीता १४।१८)। तात्पर्य यह हुआ कि राग, आसक्ति कहीं भी होगी तो वह बाँधनेवाली हो ही जायगी—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योजिनम्सु’ (गीता १३।२१)। कर्मरहित होनेसे हमें लौकिक लाभ होगा, संसारमें हमारी प्रसिद्धि होगी आदि कोई सांसारिक प्रयोजन भी नहीं होना चाहिये और समाधि लग जानेसे आध्यात्मिक तत्त्वमें हमारी स्थिति होगी आदि कोई पारमार्थिक प्रयोजन भी नहीं होना चाहिये। तात्पर्य है कि ‘कर्म न करनेसे सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति होगी’—यह भी कर्म न करनेमें आसक्ति है; क्योंकि वास्तविक तत्त्व कर्म करने और न करनेसे अतीत है।

परिशिष्ट भाव —एक कर्म-विभाग है और एक फल-विभाग है। मनुष्यका कर्म-विभागमें ही अधिकार है, फल-विभागमें नहीं। कारण कि नया पुरुषार्थ होनेसे कर्म-विभाग (करना) मनुष्यके अधीन है और पूर्वकृत कर्मोंका भोग होनेसे फल-विभाग (होना) प्रारब्धके अधीन है। कर्मयोगकी दृष्टिसे देखें तो मनुष्यको जो साधन-सामग्री (वस्तु, योग्यता और सामर्थ्य) मिली है, वह ‘प्रारब्ध’ है और उसका सदुपयोग करना अर्थात् उसको अपना और अपने लिये न मानकर, प्रत्युत दूसरोंका और दूसरोंके लिये मानकर उनकी सेवामें लगाना ‘पुरुषार्थ’ है।

कर्मयोगमें मुख्य बात है—अपने कर्तव्यके द्वारा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करना और कर्मफलका अर्थात् अपने अधिकारका त्याग करना। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेसे पुराना राग मिट जाता है और अपने अधिकारका त्याग करनेसे नया राग पैदा नहीं होता। इस प्रकार पुराना राग मिटनेसे और नया राग पैदा न होनेसे कर्मयोगी वीतराग हो जाता है। वीतराग होनेपर उसको तत्त्वज्ञान हो जाता है। कारण कि तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिमें नाशवान् असत् वस्तुओंका राग ही बाधक है—

रागो लिङ्गबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु। कृतः शाद्वलता तस्य यस्याग्निः कोटरे तरोः ॥

तात्पर्य है कि वस्तु, व्यक्ति और क्रियामें मनका जो राग, खिंचाव है, यह अज्ञानका खास चिहन है। जैसे किसी वृक्षके कोटरमें आग लगी हो तो वह वृक्ष हरा-भरा नहीं रहता, सूख जाता है, ऐसे ही जिसके भीतर राग-रूपी आग लगी हो, उसको शान्ति नहीं मिल सकती।

इस श्लोकमें भगवान्का यह तात्पर्य मालूम देता है कि परिवर्तनशील वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया, घटना, परिस्थिति, अवस्था, स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर आदिके साथ साधककी सर्वथा निलिप्तता होनी चाहिये। इनके साथ किंचिन्मात्र भी किसी तरहका सम्बन्ध नहीं होना चाहिये।

इस श्लोकके चार चरणोंमें चार बातें आयी हैं—(१) कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, (२) फलमें कभी तेरा अधिकार नहीं है, (३) तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और (४) कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो। इनमेंसे पहले और चौथे चरणकी बात एक है तथा दूसरे और तीसरे चरणकी बात एक है। पहले चरणमें कर्म करनेमें अधिकार बताया है और चौथे चरणमें कर्म न करनेमें आसक्ति होनेका निषेध किया है। दूसरे चरणमें फलकी इच्छाका निषेध किया है और तीसरे चरणमें फलका हेतु बननेका निषेध किया है।

तात्पर्य यह हुआ कि अकर्मण्यतामें रुचि होनेसे प्रमाद, आलस्य आदि ‘तामसी वृत्ति’ के साथ तेरा सम्बन्ध हो जायगा। कर्म एवं कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे तेरा ‘राजसी वृत्ति’ के साथ सम्बन्ध हो जायगा। प्रमाद, आलस्य, कर्म, कर्मफल आदिका सम्बन्ध न रहनेपर जो विवेकजन्य सुख होता है, प्रकाश मिलता है, ज्ञान मिलता है, उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ‘सात्त्विकी वृत्ति’ के साथ सम्बन्ध हो जायगा। इनके साथ सम्बन्ध होना ही जन्म-मरणका कारण है। अतः साधक कर्म, कर्मफल और इनके त्यागका सुख—इनमेंसे किसीके भी साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, इनमें राग या आसक्ति न करे। कर्म करते हुए इनके साथ सम्बन्ध न रखना ही कर्मयोग है।

लोक ४८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३१

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें कर्म करनेकी आज्ञा देनेके बाद अब भगवान् कर्म करते हुए सम रहनेका प्रकार बताते हैं।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥

धनञ्जय= हे धनंजय !असिद्धिमेंकर्माणि= कर्मोंको
(तू)समः= समकुरु
सङ्गम्= आसक्तिकाभूत्वा= होकरसमत्वम्
त्यक्त्वा= त्याग करकेयोगस्थः= योगमें स्थितयोगः
सिद्ध्यसिद्धयोः= सिद्धि-हुआउच्यते

व्याख्या—‘सङ्गं त्यक्त्वा’ —किसी भी कर्ममें, किसी भी कर्मके फलमें, किसी भी देश, काल, घटना, परिस्थिति, अन्तःकरण, बहिःकरण आदि प्राकृत वस्तुमें तेरी आसक्ति न हो, तभी तू निलिप्ततापूर्वक कर्म कर सकता है। अगर तू कर्म, फल आदि किसीमें भी चिपक जायगा, तो निलिप्तता कैसे रहेगी ? और निलिप्तता रहे बिना वह कर्म मुक्तिदायक कैसे होगा ?

‘सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा’ —आसक्तिके त्यागका परिणाम क्या होगा ? सिद्धि और असिद्धिमें समता हो जायगी।

कर्मका पूरा होना अथवा न होना, सांसारिक दृष्टिसे उसका फल अनुकूल होना अथवा प्रतिकूल होना, उस कर्मको करनेसे आदर-निरादर, प्रशंसा-निन्दा होना, अन्तःकरणकी शुद्धि होना अथवा न होना आदि-आदि जो सिद्धि और असिद्धि है, उसमें सम रहना चाहिये*।

कर्मयोगीकी इतनी समता अर्थात् निष्कामभाव होना चाहिये कि कर्मोंकी पूर्ति हो चाहे न हो, फलकी प्राप्ति हो चाहे न हो, अपनी मुक्ति हो चाहे न हो, मुझे तो केवल कर्तव्य-कर्म करना है। साधकको असंगताका अनुभव न हुआ हो, उसमें समता न आयी हो, तो भी उसका उद्देश्य असंग होनेका, सम होनेका ही हो। जो बात उद्देश्यमें आ

जाती है, वही अन्तमें सिद्ध हो जाती है। अतः साधनरूप समतासे अर्थात् अन्तःकरणकी समतासे साध्यरूप समता स्वतः आ जाती है—‘तदा योगमवाप्यसि ’ (२।५३)।

‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ —सिद्धि-असिद्धिमें सम होनेके बाद उस समतामें निरन्तर अटल स्थित रहना ही ‘योगस्थ’ होना है। जैसे किसी कार्यके आरम्भमें गणेशजीका पूजन करते हैं, तो उस पूजनको कार्य करते समय हरदम साथमें नहीं रखते, ऐसे ही कोई यह न समझ ले कि आरम्भमें एक बार सिद्धि-असिद्धिमें सम हो गये तो अब उस समताको हरदम साथमें नहीं रखना है, राग-द्वेष करते रहना है, इसलिये भगवान् कहते हैं कि समतामें हरदम स्थित रहते हुए ही कर्तव्य-कर्मको करना चाहिये।

‘समत्वं योग उच्यते’ —समता ही योग है अर्थात् समता परमात्माका स्वरूप है। वह समता अन्तःकरणमें निरन्तर बनी रहनी चाहिये। आगे पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि ‘जिनका मन समतामें स्थित हो गया है, उन लोगोंने जीवित अवस्थामें ही संसारको जीत लिया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है; अतः उनकी स्थिति ब्रह्ममें ही है।’

‘समताका नाम योग है’ —यह योगकी परिभाषा है। इसीको आगे छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें कहेंगे कि

  • इस विषयमें श्रीशंकराचार्यजी महाराज (गीता २।४८ की व्याख्या करते हुए) कहते हैं—

‘योगस्थः सन् कुरु कर्माणि केवलमीश्वरार्थं तत्रापीश्वरो मे तुष्यन्ति सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ! फलतृष्णाशून्येन क्रियमाणे कर्माणि सत्त्वशुद्धिज्ञा ज्ञानप्राप्तिलक्षणं सिद्धिस्तद्व विपर्ययज्ञा असिद्धिस्तयोः सिद्ध्यसिद्धयोरपि समस्तुत्यो भूत्वा कुरु कर्माणि। कोऽसौ योगो यत्रस्थः कुर्वित्युक्तमिदमेव तत् सिद्ध्यसिद्धयोः समत्वं योग उच्यते।’

‘हे धनंजय ! योगमें स्थित होकर केवल ईश्वरके लिये कर्म कर। उसमें भी ‘ईश्वर मेरेपर प्रसन्न हो जाय’—इस संग (कामना) को छोड़कर कर्म कर। फलतृष्णारहित पुरुषके द्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरणकी शुद्धिसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्तिका न होना) असिद्धि है। ऐसी सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर। वह कौन-सा योग है, जिसमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहा है ? यही जो सिद्धि और असिद्धिमें सम होना है, इसीको योग कहते हैं।’

१३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

'दुःखोंके संयोगका जिसमें वियोग है, उसका नाम योग है।' ये दोनों परिभाषाएँ वास्तवमें एक ही हैं। जैसे दादकी बीमारिमें खुजलीका सुख होता है और जलनका दुःख होता है, पर ये दोनों ही बीमारी होनेसे दुःखरूप हैं, ऐसे ही संसारके सम्बन्धसे होनेवाला सुख और दुःख—दोनों ही वास्तवमें दुःखरूप हैं। ऐसे संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदका नाम ही 'दुःख-संयोग-वियोग' है। अतः चाहे दुःखोंके संयोगका वियोग अर्थात् सुख-दुःखसे रहित होना कहें; चाहे सिद्धि-असिद्धिमें अर्थात् सुख-दुःखमें सम होना कहें, एक ही बात है।

इस श्लोकका तात्पर्य यह हुआ कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाओंको केवल संसारकी सेवारूपसे करना है, अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे ही समता आयेगी।

बुद्धि और समता-सम्बन्धी विशेष बात

बुद्धि दो तरहकी होती है—अव्यवसायात्मिका और व्यवसायात्मिका। जिसमें सांसारिक सुख, भोग, आराम, मान-बड़ाई आदि प्राप्त करनेका ध्येय होता है, वह बुद्धि 'अव्यवसायात्मिका' होती है (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। जिसमें समताकी प्राप्ति करनेका, अपना कल्याण करनेका ही उद्देश्य रहता है, वह बुद्धि 'व्यवसायात्मिका' होती है (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)। अव्यवसायात्मिका बुद्धि अनन्त होती है और व्यवसायात्मिका बुद्धि एक होती है। जिसकी बुद्धि अव्यवसायात्मिका होती है, वह स्वयं अव्यवसायी (अव्यवसित) होता है—'बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्' (२।४१) तथा वह संसारी होता है। जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है, वह स्वयं व्यवसायी (व्यवसित) होता है—

परिशिष्ट भाव —पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तिनिरोध-रूप साधनको 'योग' कहा गया है—'योगश्चित्तवृत्ति-निरोधः' (१।२)। इस योगके परिणामस्वरूप द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१।३)। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीता 'योग' कहती है—'समत्वं योग उच्यते', 'तं विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्' (६।२३)। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वतःसिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको 'योग' कहती है। इस योग अर्थात् समतामें स्थित होनेपर फिर कभी इससे वियोग अर्थात् व्युत्थान नहीं होता, इसलिये इसको 'नित्ययोग' भी कहते हैं। चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 'निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर 'निर्विकल्प बोध' (सहजावस्था) होता है। निर्विकल्प बोध अवस्था नहीं है, प्रत्युत सम्पूर्ण अवस्थाओंसे अतीत तथा उनका प्रकाशक एवं सम्पूर्ण योग-साधनोंका फल है। अवस्था तो निर्विकल्प और सविकल्प दोनों होती है, पर बोध निर्विकल्प ही होता है। इस प्रकार गीताका योग पातंजलयोगदर्शनके योगसे बहुत विलक्षण है।

'व्यवसितो हि सः' (१।३०) तथा वह साधक होता है।

समता भी दो तरहकी होती है—साधनरूप समता और साध्यरूप समता। साधनरूप समता अन्तःकरणकी होती है और साध्यरूप समता परमात्मस्वरूपकी होती है। सिद्धि-असिद्धि, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदिमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें राग-द्वेषका न होना साधनरूप समता है, जिसका वर्णन गीतामें अधिक हुआ है। इस साधनरूप समतासे जिस स्वतःसिद्ध समताकी प्राप्ति होती है, वह साध्यरूप समता है, जिसका वर्णन इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें 'तदा योगमवाप्यसि' पदोंसे हुआ है।

अब इन चारों भेदोंको यों समझें कि एक संसारी होता है और एक साधक होता है, एक साधन होता है और एक साध्य होता है। भोग भोगना और संग्रह करना—यही जिसका उद्देश्य होता है, वह संसारी होता है। उसकी एक व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत कामनारूपी शाखाओंवाली अनन्त बुद्धियाँ होती हैं।

मेरेको तो समताकी प्राप्ति ही करनी है, चाहे जो हो जाय—ऐसा निश्चय करनेवालेकी व्यवसायात्मिका बुद्धि होती है। ऐसा साधक जब व्यवहारक्षेत्रमें आता है, तब उसके सामने सिद्धि-असिद्धि, लाभ-हानि, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आदि आनेपर वह उनमें सम रहता है, राग-द्वेष नहीं करता। इस साधनरूप समतासे वह संसारसे ऊँचा उठ जाता है—'इहैव तैजितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः' (गीता ५।१९ का पूर्वार्ध)। साधनरूप समतासे स्वतःसिद्ध समरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है—'निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः' (गीता ५।१९ का उत्तरार्ध)।

श्लोक ४९ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३३

पातंजलयोगदर्शनके योगका अधिकारी वह है, जो मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला नहीं है, प्रत्युत विशिप्त वृत्तिवाला है। परन्तु भगवान्की प्राप्ति चाहनेवाले सब-के-सब मनुष्य गीताके योगके अधिकारी हैं। इतना ही नहीं, जो मनुष्य भोग और संग्रहको महत्त्व न देकर इस योगको ही महत्त्व देता है और इसको प्राप्त करना चाहता है—ऐसा योगका जिज्ञासु भी वेदोंमें वर्णित सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है—‘जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते’ (गीता ६।४४)।

सम्बन्ध—उत्तालीसवेंसे अडतालीसवें श्लोकतक जिस समबुद्धिका वर्णन हुआ है, सकामकर्मकी अपेक्षा उस समबुद्धिकी श्रेष्ठता आगेके श्लोकमें बताते हैं।

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्भनञ्जय।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥

बुद्धियोगात्= बुद्धियोग (समता)धनञ्जय= हे धनंजय! (तू)हि= क्योंकि
की अपेक्षाबुद्धौ= बुद्धि (समता)फलहेतवः= फलके हेतु
कर्म= सकामकर्मकाबननेवाले
दूरेण= दूरसे (अत्यन्त) हीशरणम्= आश्रयकृपणाः= अत्यन्त
अवरम्= निकृष्ट हैं। (अतः)अन्विच्छ= ले;दीन हैं।

व्याख्या—‘दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात्’— बुद्धियोग अर्थात् समताकी अपेक्षा सकामभावसे कर्म करना अत्यन्त ही निकृष्ट है। कारण कि कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं तथा उन कर्मोंके फलका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु योग (समता) नित्य है; उसका कभी वियोग नहीं होता, उसमें कोई विकृति नहीं आती। अतः समताकी अपेक्षा सकामकर्म अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।

सम्पूर्ण कर्मोंमें समता ही श्रेष्ठ है। समताके बिना तो मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं तथा उन कर्मोंके परिणाममें जन्मते-मरते और दुःख भोगते रहते हैं। कारण कि समताके बिना कर्मोंमें उद्धार करनेकी ताकत नहीं है। कर्मोंमें समता ही कुशलता है। अगर कर्मोंमें समता नहीं होगी तो शरीरमें अहंता-ममता हो जायगी और शरीरमें अहंता-ममता होना ही पशुबुद्धि है। भागवतमें शुक्देवजीने राजा परीक्षितसे कहा है—‘त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।’ (१२।५।२) अर्थात् हे राजन्! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा।

‘दूरेण’ कहनेका तात्पर्य है कि जैसे प्रकाश और

अन्धकार कभी समकक्ष नहीं हो सकते, ऐसे ही बुद्धियोग और सकामकर्म भी कभी समकक्ष नहीं हो सकते। इन दोनोंमें दिन-रातकी तरह महान् अन्तर है। कारण कि बुद्धियोग तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकामकर्म जन्म-मरण देनेवाला है।

‘बुद्धौ शरणमन्विच्छ’— तू बुद्धि (समता) की शरण ले। समतामें निरन्तर स्थित रहना ही उसकी शरण लेना है। समतामें स्थित रहनेसे ही तुझे स्वरूपमें अपनी स्थितिका अनुभव होगा।

‘कृपणाः फलहेतवः’— कर्मोंके फलका हेतु बनना अत्यन्त निकृष्ट है। कर्म, कर्मफल, कर्मसामग्री और शरीरादि करणोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना ही कर्मफलका हेतु बनना है। अतः भगवान्ने सैतालीसवें श्लोकमें ‘मा कर्मफलहेतुर्भूः’ कहकर कर्मोंके फलका हेतु बननेमें निषेध किया है।

कर्म और कर्मफलका विभाग अलग है तथा इन दोनोंसे रहित जो नित्य तत्त्व है, उसका विभाग अलग है। वह नित्य तत्त्व अनित्य कर्मफलके आश्रित हो जाय—इसके समान निकृष्टता और क्या होगी ?

परिशिष्ट भाव— योगकी अपेक्षा कर्म दूरसे ही निकृष्ट हैं अर्थात् कल्याणकारक नहीं हैं। जैसे पर्वतसे अणु बहुत दूर है अर्थात् अणुको पर्वतके पास रखकर दोनोंकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसे ही योगसे कर्म बहुत दूर है अर्थात् योग और कर्मकी तुलना नहीं की जा सकती। कर्मोंमें योग ही कुशलता है—‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (गीता २।५०),

१३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

इसलिये योगके बिना कर्म निकृष्ट हैं, निरर्थक हैं* और बाधक हैं—‘कर्मणा बध्यते जन्तुः।’

कर्मयोगमें ‘कर्म’ करणसापेक्ष है, पर ‘योग’ करणनिरपेक्ष है। योगकी प्राप्ति कर्मसे नहीं होती, प्रत्युत सेवा, त्यागसे होती है। अतः कर्मयोग कर्म नहीं है। कर्मयोग करणनिरपेक्ष अर्थात् विवेकप्रधान साधन है। अगर सेवा, त्यागकी प्रधानता न हो तो कर्म होगा, कर्मयोग होगा ही नहीं।

समता तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करानेवाली है, पर सकामकर्म जन्म-मरण देनेवाला है। इसलिये साधकको समताका ही आश्रय लेना चाहिये, समतामें ही स्थित रहना चाहिये। समतामें स्थित होनेसे वह दीन नहीं रहेगा, प्रत्युत कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जायगा। परन्तु जो सकामभावपूर्वक (अपने लिये) कर्म करता है, वह सदा दीन, बद्ध ही रहता है।

गीतामें कर्मयोगके लिये तीन शब्द आये हैं—बुद्धि, योग और बुद्धियोग। कर्मयोगमें कर्मकी प्रधानता नहीं है, प्रत्युत ‘योग’ की प्रधानता है। योग, बुद्धि और बुद्धियोग—तीनोंका एक ही अर्थ है। कर्मयोगमें व्यवसायात्मिका बुद्धिकी प्रधानता होनेसे इसको ‘बुद्धि’ कहा गया है और विवेकपूर्वक त्यागकी प्रधानता होनेसे इसको ‘योग’ या ‘बुद्धियोग’ कहा गया है।

ध्यानयोगमें ‘मन’ की और कर्मयोगमें ‘बुद्धि’ की प्रधानता है। मनके निरोधमें स्थिरता और चंचलता दोनों बहुत दूरतक रहती है; क्योंकि इसमें साधक मनको संसारसे हटाना और परमात्मामें लगाना चाहता है। मनको संसारसे हटानेपर संसारकी सत्ता बनी रहती है। यह सिद्धान्त है कि जबतक दूसरी सत्ताकी मान्यता रहती है, तबतक मनका सर्वथा निरोध नहीं हो सकता। इसलिये समाधितक पहुँचनेपर भी समाधि और व्युत्थान—ये दो अवस्थाएँ रहती हैं। परन्तु बुद्धिकी प्रधानता रहनेपर कर्मयोगमें विवेककी मुख्यता रहती है। विवेकमें सत् और असत्—दोनों रहते हैं। कर्मयोगी असत् वस्तुओंको सेवा-सामग्री मानकर उनको दूसरोंकी सेवामें लगा देता है, जिससे असत्का त्याग शीघ्र और सुगमतापूर्वक हो जाता है।

मनका निरोध करना निरन्तर नहीं होता, प्रत्युत समय-समयपर और एकान्तमें होता है। परन्तु व्यवसायात्मिका बुद्धि अर्थात् बुद्धिका एक निश्चय निरन्तर रहता है।

सम्बन्ध—पूर्व श्लोकमें जिस बुद्धिके आश्रयकी बात बतायी, अब आगेके श्लोकमें उसी बुद्धिके आश्रयका फल बताते हैं।

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥

बुद्धियुक्तः= बुद्धि (समता) से युक्त (मनुष्य)उभे= दोनोंकायुज्यस्व= लग जा; (क्योंकि)
इह= यहाँ (जीवित-अवस्थामें ही)जहाति= त्याग कर देता है।कर्मसु= कर्ममें
सुकृतदुष्कृते= पुण्य और पापतस्मात्= अतः (तू)योगः= योग (ही)
योगाय= योग (समता) मेंकौशलम्= कुशलता है।

व्याख्या—‘बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते’— समतायुक्त मनुष्य जीवित-अवस्थामें ही पुण्य-पापका त्याग कर देता है अर्थात् उसको पुण्य-पाप नहीं लगते, वह उनसे रहित हो जाता है। जैसे संसारमें पुण्य-पाप होते ही रहते हैं, पर सर्वव्यापी परमात्माको वे पुण्य-पाप नहीं लगते, ऐसे ही जो समतामें निरन्तर स्थित रहता है, उसको पुण्य-पाप नहीं लगते (गीता—दूसरे अध्यायका अङ्गीतसर्वां श्लोक)।

समता एक ऐसी विद्या है, जिससे मनुष्य संसारमें रहता हुआ ही संसारसे सर्वथा निर्लिप्त रह सकता है। जैसे कमलका पत्ता जलसे ही उत्पन्न होता है और जलमें ही रहता है, पर वह जलसे लिप्त नहीं होता, ऐसे ही समतायुक्त पुरुष संसारमें रहते हुए भी संसारसे निर्लिप्त रहता है। पुण्य-पाप उसका स्पर्श नहीं करते अर्थात् वह पुण्य-पापसे असंग हो जाता है।

  • योगके बिना कर्म और ज्ञान—दोनों निरर्थक हैं, पर भक्ति निरर्थक नहीं है। कारण कि भक्तिमें भगवान्के साथ सम्बन्ध रहता है; अतः भगवान् स्वयं भक्तको योग प्रदान करते हैं—‘ददामि बुद्धियोगं तम्’ (गीता १०।१०)

श्लोक ५० ]

  • साधक-संजीवनी *

१३५

वास्तवमें यह स्वयं (चेतन-स्वरूप) पुण्य-पापसे रहित है ही। केवल असत् पदार्थ—शरीरादिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही पुण्य-पाप लगते हैं। अगर यह असत् पदार्थके साथ सम्बन्ध न जोड़े, तो यह आकाशकी तरह निलिप्त रहेगा, इसको पुण्य-पाप नहीं लगेंगे।

‘तस्माद्योगाय युज्यस्व’ —इसलिये तुम योगमें लग जाओ अर्थात् निरन्तर समतामें स्थित रहो। वास्तवमें समता तुम्हारा स्वरूप है। अतः तुम नित्य-निरन्तर समतामें ही स्थित रहते हो। केवल राग-द्वेषके कारण तुम्हारेको उस समताका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर तुम हरदम समतामें स्थित न रहते, तो सुख और दुःखका ज्ञान तुम्हें कैसे होता; क्योंकि ये दोनों ही अलग-अलग हैं। जब इन दोनोंका तुम्हें ज्ञान होता है तो तुम इनके आने-जानेमें सदा समरूपसे रहते हो। इसी समताका तुम अनुभव करो।

‘योगः कर्मसु कौशलम्’ —कर्मोंमें योग ही कुशलता है अर्थात् कर्मोंकी सिद्धि-असिद्धिमें और उन कर्मोंके फलकी प्राप्ति-अप्राप्तिमें सम रहना ही कर्मोंमें कुशलता है। उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंमें योगके सिवाय दूसरी कोई महत्वकी चीज नहीं है।

परिशिष्ट भाव— इस श्लोकमें आये ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ पदोंपर विचार करें तो इनके दो अर्थ लिये जा सकते हैं—

(१) ‘कर्मसु कौशलं योगः’ अर्थात् कर्मोंमें कुशलता ही योग है।

(२) ‘कर्मसु योगः कौशलम्’ अर्थात् कर्मोंमें योग ही कुशलता है।

अगर पहला अर्थ लिया जाय कि ‘कर्मोंमें कुशलता ही योग है’ तो जो बड़ी कुशलतासे, सावधानीसे चोरी, ठगी आदि कर्म करता है, उसका कर्म ‘योग’ हो जायगा! परन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और यहाँ निषिद्ध कर्मोंका प्रसंग भी नहीं है। अगर यहाँ शुभ कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम ‘योग’ मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक सांगोपांग किये हुए शुभ कर्मोंके फलसे बँध जायगा—‘फले सत्तो निबध्यते’ (गीता ५।१२)। अतः उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी और उसके दुःखोंका नाश नहीं होगा।

शास्त्रमें आया है—‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ अर्थात् कर्मोंसे मनुष्य बँध जाता है। अतः जो कर्म स्वभावसे ही मनुष्यको बाँधनेवाले हैं, वे ही मुक्ति देनेवाले हो जायें—यही वास्तवमें कर्मोंमें कुशलता है। मुक्ति योग (समता) से होती है, कर्मोंमें कुशलतासे नहीं। योग (समता) का आदि और अन्त नहीं होता। परन्तु कर्म कितने ही बढ़िया हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फलका भी संयोग तथा वियोग होता है। जिसका आरम्भ और अन्त, संयोग तथा वियोग होता है, उसके द्वारा मुक्तिकी प्राप्ति कैसे होगी? नाशवान्के द्वारा अविनाशीकी प्राप्ति कैसे होगी? समता तो परमात्माका स्वरूप है—‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म’ (गीता ५।१९)। अतः महत्त्व योगका है, कर्मोंका नहीं।

अगर पहला अर्थ ही ठीक माना जाय तो भी ‘कुशलता’ के अन्तर्गत समता, निष्कामभावको ही लेना पड़ेगा। अगर कर्मोंमें कुशलता ही योग है तो कुशलता क्या है? इसके उत्तरमें यह कहना ही पड़ेगा कि योग (समता) ही कुशलता है। ऐसी स्थितिमें ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाय? जब ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ पदोंमें ‘योग’ शब्द आया ही है, तो फिर ‘कुशलता’ का अर्थ योग लेनेकी जरूरत ही नहीं है।

अगर प्रकरणपर विचार करें तो योग (समता) का ही प्रकरण चल रहा है, कर्मोंकी कुशलताका नहीं। भगवान्

इन पदोंमें भगवान्ने योगकी परिभाषा नहीं बतायी है, प्रत्युत योगकी महिमा बतायी है। अगर इन पदोंका अर्थ ‘कर्मोंमें कुशलता ही योग है’ —ऐसा किया जाय तो क्या आपत्ति है? अगर ऐसा अर्थ किया जायगा तो जो बड़ी कुशलतासे, सावधानीपूर्वक चोरी करता है, उसका वह चोररूप कर्म भी योग हो जायगा। अतः ऐसा अर्थ करना अनुचित है। कोई कह सकता है कि हम तो विहित कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानते हैं। परन्तु ऐसा माननेसे मनुष्य कुशलतापूर्वक सांगोपांग किये गये कर्मोंके फलमें बँध जायगा, जिससे उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी। अतः यहाँ ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’ —ऐसा अर्थ लेना ही उचित है। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी जिसके अन्तःकरणमें समता रहती है, वह कर्म और उनके फलमें बँधेगा नहीं। इसलिये उत्पत्ति-विनाशशील कर्मोंको करते हुए सम रहना ही कुशलता है, बुद्धिमान्नी है।

दूसरी बात, पीछेके दो श्लोकोंमें तथा इस श्लोकके पूर्वार्धमें भी योग (समता) का ही प्रसंग है, कुशलताका प्रसंग ही नहीं है। इसलिये भी ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’ —यह अर्थ लेना प्रसंगके अनुसार युक्तियुक्त है।

१३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

‘समत्वं योग उच्यते’ कहकर योगकी परिभाषा भी बता चुके हैं। अतः इस प्रकरणमें योग ही विधेय है, कर्मोंमें कुशलता विधेय नहीं है। योग ही कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् कर्मोंको करते हुए हृदयमें समता रहे, राग-द्वेष न रहे—यही कर्मोंमें कुशलता है। इसलिये ‘योगः कर्मसु कौशलम्’—यह योगकी परिभाषा नहीं है, प्रत्युत योगकी महिमा है।

इसी (पचासवें) श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने कहा है कि समतासे युक्त मनुष्य पुण्य और पाप दोनोंसे रहित हो जाता है। अगर मनुष्य पुण्य और पाप दोनोंसे रहित हो जाय तो फिर कौन-सा कर्म कुशलतासे किया जायगा? अतः पुण्य और पापसे रहित होनेका यह अर्थ नहीं है कि वह कोई भी क्रिया नहीं करता; क्योंकि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)। अतः यहाँ पुण्य और पाप दोनोंसे रहित होनेका अर्थ है—उनके फलसे रहित (मुक्त) होना। आगे इक्यावनवें श्लोकमें भी भगवान्ने ‘फलं त्यक्त्वा’ पदोंसे फलके त्यागकी बात कही है।

गीतामें ‘कुशल’ शब्दका प्रयोग अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी हुआ है। वहाँ ‘अकुशल कर्म’ के अन्तर्गत सकामभावसे किये जानेवाले और शास्त्रनिषिद्ध कर्म आये हैं तथा ‘कुशल कर्म’ के अन्तर्गत निष्कामभावसे किये जानेवाले शास्त्रविहित कर्म आये हैं। अकुशल और कुशल कर्मोंका तो आदि-अन्त होता है, पर योगका आदि-अन्त नहीं होता। बाँधनेवाले राग-द्वेष हैं, कुशल-अकुशल कर्म नहीं। अतः रागपूर्वक किये गये कर्म कितने ही श्रेष्ठ क्यों न हों, वे बाँधनेवाले हैं ही; क्योंकि उन कर्मोंसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति भी हो जाय तो भी वहाँसे लौटकर पीछे आना पड़ता है (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। इसलिये जो मनुष्य अकुशल कर्मका त्याग द्वेषपूर्वक नहीं करता और कुशल कर्मका आचरण रागपूर्वक नहीं करता, वही वास्तवमें त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है (गीता—अठारहवें अध्यायका दसवाँ श्लोक)।

उपर्युक्त विवेचनसे सिद्ध हुआ कि ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ पदोंका अर्थ ‘कर्मोंमें योग ही कुशलता है’—ऐसा ही मानना चाहिये। भगवान् भी योगमें स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं—‘योगस्थः कुरु कर्माणि’ (२।४८)। तात्पर्य है कि कर्मोंका महत्त्व नहीं है, प्रत्युत योग (समता) का ही महत्त्व है। अतः कर्मोंमें योग ही कुशलता है।

सम्बन्ध—अब पीछेके श्लोकको पुष्ट करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उदाहरण देते हैं।

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥

हि= कारण किफलम्= फलका अर्थात्मुक्त होकर
बुद्धियुक्ताः= समतायुक्तसंसारमात्रकाअनामयम्
मनीषिणः= बुद्धिमान्त्यक्त्वा= त्याग करकेपदम्
साधकजन्मबन्ध-गच्छन्ति= प्राप्त हो
कर्मजम्= कर्मजन्यविनिर्मुक्ताः= जन्मरूप बन्धनसे

व्याख्या—‘कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः’—‘जो समतासे युक्त है, वे ही वास्तवमें मनीषी अर्थात् बुद्धिमान् हैं। अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी कहा है कि जो मनुष्य अकुशल कर्मोंसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्मोंमें राग नहीं करता, वह मेधावी (बुद्धिमान्) है।

कर्म तो फलके रूपमें परिणत होता ही है। उसके फलका त्याग कोई कर ही नहीं सकता। जैसे, कोई खेतोंमें निष्कामभावसे बीज बोये, तो क्या खेतोंमें अनाज नहीं

होगा? बोया है तो पैदा अवश्य होगा। ऐसे ही कोई निष्कामभावपूर्वक कर्म करता है, तो उसको कर्मका फल तो मिलेगा ही, पर वह बन्धनकारक नहीं होगा। अतः यहाँ कर्मजन्य फलका त्याग करनेका अर्थ है—कर्मजन्य फलकी इच्छा, कामना, ममता, वासनाका त्याग करना। इसका त्याग करनेमें सभी समर्थ हैं।

‘जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः’—समतायुक्त मनीषी साधक जन्मरूप बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कारण कि समतामें स्थित हो जानेसे उनमें राग-द्वेष, कामना, वासना, ममता

श्लोक ५२]

  • साधक-संजीवनी *

१३७

आदि दोष किंचिन्मात्र भी नहीं रहते; अतः उनके पुनर्जन्मका कारण ही नहीं रहता। वे जन्म-मरणरूप बन्धनसे सदाके लिये मुक्त हो जाते हैं।

‘पदं गच्छन्त्यनामयम्’ —‘आमय’ नाम रोगका है। रोग एक विकार है। जिसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारका विकार न हो, उसको ‘अनामय’ अर्थात् निर्विकार कहते हैं। समतायुक्त मनीषीलोग ऐसे निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं। इसी निर्विकार पदको पन्द्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें ‘अव्यय पद’ और अठारहवें अध्यायके छ्पनवें श्लोकमें ‘शाश्वत अव्यय पद’ नामसे कहा गया है।

यद्यपि गीतामें सत्त्वगुणको भी अनामय कहा गया है (१४।६), पर वास्तवमें अनामय (निर्विकार) तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व ही है; क्योंकि वह गुणातीत तत्त्व है, जिसको प्राप्त होकर फिर किसीको भी जन्म-मरणके चक्करमें नहीं आना पड़ता। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें हेतु होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी अनामय कह दिया है।

अनामय पदको प्राप्त होना क्या है? प्रकृति विकारशील

परिशिष्ट भाव —कर्मोंमें योग (समता) ही कुशलता क्यों है—इसका कारण ‘हि’ पदसे इस श्लोकमें बताते हैं। सात्त्विक कर्मका फल निर्मल है, राजस कर्मका फल दुःख है और तामस कर्मका फल मूढ़ता है (गीता—चौदहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)—इन तीनों प्रकारके फलोंका समतायुक्त मनुष्य त्याग कर देता है। कर्मजन्य फलके त्यागके दो अर्थ हैं—फलकी इच्छाका त्याग करना और कर्मके फलस्वरूप अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होनेपर सुखी-दुःखी न होना।

वास्तवमें उत्पत्ति-विनाशशील सम्पूर्ण संसार कर्मफलके सिवाय और कुछ है ही नहीं। कर्मफलका त्याग कर दें तो फिर कोई भी बन्धन बाकी नहीं रहता।

‘मनीषी’ शब्दका अर्थ है—बुद्धिमान्। पूर्वश्लोकके अनुसार समतापूर्वक कर्म करना ही बुद्धिमत्ता है—‘स बुद्धिमान्मुण्येषु’ (गीता ४।१८)।

‘पदं गच्छन्त्यनामयम्’ —‘गच्छन्ति’ पदके तीन अर्थ होते हैं—१-ज्ञान होना, २-गमन करना और ३-प्राप्त होना। यहाँ निर्विकार पदकी प्राप्तिका अर्थ है—जन्म-मरणसे रहितपनेका और निर्विकार पदकी स्वतःसिद्ध प्राप्तिका ज्ञान हो जाना। कारण कि नित्य-निवृत्तकी ही निवृत्ति होती है और नित्यप्राप्तकी ही प्राप्ति होती है।

इस श्लोकसे यह सिद्ध होता है कि कर्मयोग मुक्तिका, कल्याणप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है। कर्मयोगसे संसारकी निवृत्ति और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति—दोनों हो जाते हैं।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें बताये अनामय पदकी प्राप्तिका क्रम क्या है—इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिव्यतिरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥

यदा= जिस समयव्यतिरिष्यति= भलीभाँति तरश्रोतव्यस्य= सुननेमें
ते= तेरीजायगी,आनेवाले
बुद्धिः= बुद्धितदा= उसी समय (तू)(भोगोंसे)
मोहकलिलम्= मोहरूपीश्रुतस्य= सुने हुएनिर्वेदम्= वैराग्यको
दलदलको= औरगन्तासि= प्राप्त हो जायगा।

१३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

व्याख्या—‘यदा ते मोहकलिलं बुद्धिव्यति-तिरिष्यति’ —शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीर-सम्बन्धी माता-पिता, भाई-भौजाई, स्त्री-पुत्र, वस्तु, पदार्थ आदिमें ममता करना ‘मोह’ है। कारण कि इन शरीरादिमें अहंता-ममता है नहीं, केवल अपनी मानी हुई है। अनुकूल पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदिके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना और प्रतिकूल पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति आदिके प्राप्त होनेपर उद्विग्न होना, संसारमें—परिवारमें विषमता, पक्षपात, मात्सर्य आदि विकार होना—यह सब-का-सब ‘कलिल’ अर्थात् दलदल है। इस मोहरूपी दलदलमें जब बुद्धि फँस जाती है, तब मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। फिर उसे कुछ सूझता नहीं।

यह स्वयं चेतन होता हुआ भी शरीरादि जड़ पदार्थोंमें अहंता-ममता करके उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। पर वास्तवमें यह जिन-जिन चीजोंके साथ सम्बन्ध जोड़ता है, वे चीजें इसके साथ सदा नहीं रह सकतीं और यह भी उनके साथ सदा नहीं रह सकता। परन्तु मोहके कारण इसकी इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती, प्रत्युत यह अनेक प्रकारके नये-नये सम्बन्ध जोड़कर संसारमें अधिक-से-अधिक फँसता चला जाता है। जैसे कोई राहगीर अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचनेसे पहले ही रास्तेमें अपना डेरा लगाकर खेल-कूद, हँसी-दिल्लगी आदिमें अपना समय बिता दे, ऐसे ही मनुष्य यहाँके नाशवान् पदार्थोंका संग्रह करनेमें और उनसे सुख लेनेमें तथा व्यक्ति, परिवार आदिमें ममता करके उनसे सुख लेनेमें लग गया। यही इसकी बुद्धिका मोहरूपी कलिलमें फँसना है।

हमें शरीरमें अहंता-ममता करके तथा परिवारमें ममता करके यहाँ थोड़े ही बैठे रहना है ? इनमें ही फँसे रहकर अपनी वास्तविक उन्नति-(कल्याण-) से वंचित थोड़े ही रहना है ? हमें तो इनमें न फँसकर अपना कल्याण करना है—ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाना ही बुद्धिका मोहरूपी दलदलसे तरना है। कारण कि ऐसा दृढ़ विचार होनेपर बुद्धि संसारके सम्बन्धोंको लेकर अटकेगी नहीं, संसारमें चिपकेगी नहीं।

मोहरूपी कलिलसे तरनेके दो उपाय हैं—विवेक और सेवा। विवेक (जिसका वर्णन दूसरे अध्यायके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक हुआ है) तेज होता है, तो वह असत् विषयोंसे अरुचि करा देता है। मनमें दूसरोंकी सेवा करनेकी, दूसरोंको सुख पहुँचानेकी धुन लग जाय तो

अपने सुख-आरामका त्याग करनेकी शक्ति आ जाती है। दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव जितना तेज होगा, उतना ही अपने सुखकी इच्छाका त्याग होगा। जैसे शिष्यकी गुरुके लिये, पुत्रकी माता-पिताके लिये, नौकरकी मालिकके लिये सुख पहुँचानेकी इच्छा हो जाती है, तो उनकी अपने सुख-आरामकी इच्छा स्वतः सुगमतासे मिट जाती है। ऐसे ही कर्मयोगीका संसारमात्रकी सेवा करनेका भाव हो जाता है, तो उसकी अपने सुख-भोगकी इच्छा स्वतः मिट जाती है।

विवेक-विचारके द्वारा अपनी भोगेच्छाको मिटानेमें थोड़ी कठिनता पड़ती है। कारण कि अगर विवेक-विचार अत्यन्त दृढ़ न हो, तो वह तभीतक काम देता है, जबतक भोग सामने नहीं आते। जब भोग सामने आते हैं, तब साधक प्रायः उनको देखकर विचलित हो जाता है। परन्तु जिसमें सेवाभाव होता है, उसके सामने बढ़िया-से-बढ़िया भोग आनेपर भी वह उस भोगको दूसरोंकी सेवामें लगा देता है। अतः उसकी अपने सुख-आरामकी इच्छा सुगमतासे मिट जाती है। इसलिये भगवान्ने सांख्य-योगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ (पाँचवें अध्यायका दूसरा श्लोक), सुगम (पाँचवें अध्यायका तीसरा श्लोक) एवं जल्दी सिद्धि देनेवाला (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक) बताया है।

‘तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च’ —मनुष्यने जितने भोगोंको सुन लिया है, भोग लिया है, अच्छी तरहसे अनुभव कर लिया है, वे सब भोग यहाँ ‘श्रुतस्य’ पदके अन्तर्गत हैं। स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक आदिके जितने भोग सुने जा सकते हैं, वे सब भोग यहाँ ‘श्रोतव्यस्य’* पदके अन्तर्गत हैं। जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, तब इन ‘श्रुत’—ऐहलौकिक और ‘श्रोतव्य’—पारलौकिक भोगोंसे, विषयोंसे तुझे वैराग्य हो जायगा। तात्पर्य है कि जब बुद्धि मोहकलिलको तर जाती है, तब बुद्धिमें तेजीका विवेक जाग्रत् हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण बदल रहा है और मैं वही रहता हूँ; अतः इस संसारसे मेरेको शान्ति कैसे मिल सकती है ? मेरा अभाव कैसे मिट सकता है ? तब ‘श्रुत’ और ‘श्रोतव्य’ जितने विषय हैं, उन सबसे स्वतः वैराग्य हो जाता है।

यहाँ भगवान्को ‘श्रुत’ के स्थानपर भुक्त और ‘श्रोतव्य’ के स्थानपर भोक्तव्य कहना चाहिये था। परन्तु ऐसा न कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो परोक्ष-अपरोक्ष विषयोंका आकर्षण होता है, वह सुननेसे ही होता है। अतः

  • यहाँ ‘श्रुतस्य’ और ‘श्रोतव्यस्य’ पद शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँचों विषयोंके उपलक्षण हैं।

श्लोक ५३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१३१

इनमें सुनना ही मुख्य है। संसारसे, विषयोंसे छूटनेके लिये जहाँ ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्गका वर्णन किया गया है, वहाँ भी 'श्रवण' को मुख्य बताया गया है। तात्पर्य है कि संसारमें और परमात्मामें लगनेमें सुनना ही मुख्य है। यहाँ 'यदा' और 'तदा' कहनेका तात्पर्य है कि इन

'श्रुत' और 'श्रोतव्य' विषयोंसे इतने वर्षोंमें, इतने महीनोंमें और इतने दिनोंमें वैराग्य होगा—ऐसा कोई नियम नहीं है, प्रत्युत जिस क्षण बुद्धि मोहकलिलको तर जायगी, उसी क्षण 'श्रुत' और 'श्रोतव्य' विषयोंसे, भोगोंसे वैराग्य हो जायगा। इसमें कोई देरीका काम नहीं है।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥

यदा = जिस कालमें श्रुतिविप्रतिपन्ना = शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई ते = तेरी

बुद्धिः = बुद्धि निश्चला = निश्चल स्थास्यति = हो जायगी (और) समाधी = परमात्मामें

अचला = अचल ( हो जायगी), तदा = उस कालमें (तू) योगम् = योगको अवाप्स्यसि = प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या—[लौकिक मोहरूपी दलदलको तरनेपर भी नाना प्रकारके शास्त्रीय मतभेदोंको लेकर जो मोह होता है, उसको तरनेके लिये भगवान् इस श्लोकमें प्रेरणा करते हैं।]

'श्रुतिविप्रतिपन्ना ते ..... तदा योगमवाप्स्यसि'—अर्जुनके मनमें यह श्रुतिविप्रतिपत्ति है कि अपने गुरुजनोंका, अपने कुटुम्बका नाश करना भी उचित नहीं है और अपने क्षात्रधर्म-(युद्ध करने-) का त्याग करना भी उचित नहीं है। एक तरफ तो कुटुम्बकी रक्षा हो और एक तरफ क्षात्रधर्मका पालन हो—इसमें अगर कुटुम्बकी रक्षा करें तो युद्ध नहीं होगा और युद्ध करें तो कुटुम्बकी रक्षा नहीं होगी—इन दोनों बातोंमें अर्जुनकी श्रुतिविप्रतिपत्ति है, जिससे उनकी बुद्धि विचलित हो रही है।* अतः भगवान् शास्त्रीय मतभेदोंमें बुद्धिको निश्चल और परमात्मप्राप्तिके विषयमें बुद्धिको अचल करनेकी प्रेरणा करते हैं।

पहले तो साधकमें इस बातको लेकर सन्देह होता है कि सांसारिक व्यवहारको ठीक किया जाय या परमात्माकी प्राप्ति की जाय? फिर उसका ऐसा निर्णय होता है कि मुझे तो केवल संसारकी सेवा करनी है और संसारसे लेना कुछ नहीं है। ऐसा निर्णय होते ही साधककी भोगोंसे उपरति होने लगती है, वैराग्य होने लगता है। ऐसा होनेके बाद जब साधक

परमात्माकी तरफ चलता है, तब उसके सामने साध्य और साधन-विषयक तरह-तरहके शास्त्रीय मतभेद आते हैं। इससे 'मेरेको किस साध्यको स्वीकार करना चाहिये और किस साधन-पद्धतिसे चलना चाहिये'—इसका निर्णय करना बड़ा कठिन हो जाता है। परन्तु जब साधक सत्संगके द्वारा अपनी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यताका निर्णय कर लेता है अथवा निर्णय न हो सकेनेकी दशामें भगवान्के शरण होकर उनको पुकारता है, तब भगवत्कृपासे उसकी बुद्धि निश्चल हो जाती है। दूसरी बात, सम्पूर्ण शास्त्र, सम्प्रदाय आदिमें जीव, संसार और परमात्मा—इन तीनोंका ही अलग-अलग रूपोंसे वर्णन किया गया है। इसमें विचारपूर्वक देखा जाय तो जीवका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर जीव मैं हूँ—इसमें सब एकमत हैं और संसारका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर संसारको छोड़ना है—इसमें सब एकमत हैं और परमात्माका स्वरूप चाहे जैसा हो, पर उसको प्राप्त करना है—इसमें सब एकमत हैं। ऐसा निर्णय कर लेनेपर साधककी बुद्धि निश्चल हो जाती है। मेरेको केवल परमात्माको ही प्राप्त करना है—ऐसा दृढ़ निश्चय होनेसे बुद्धि अचल हो जाती है। तब साधक सुामतापूर्वक योग—परमात्माके साथ नित्ययोगको प्राप्त हो जाता है।

शास्त्रीय निर्णय करनेमें अथवा अपने कल्याणके

  • जाल दो प्रकारका है—संसारी और शास्त्रीय। संसारके मोहरूपी दलदलमें फँस जाना संसारी जालमें फँसना है और शास्त्रोंके, सम्प्रदायोंके द्वैत-अद्वैत आदि अनेक मत-मतान्तरोंमें उलझ जाना शास्त्रीय जालमें फँसना है। संसारी जाल तो उलझने हुए छटाँक सूतके समान है और शास्त्रीय जाल उलझने हुए सौ मन सूतके समान है। अतः भगवान् यहाँ यह बताते हैं कि संसारी और शास्त्रीय—इन दोनों जालोंमें बुद्धि निश्चल (एक निश्चयवाली) होनी चाहिये और परमात्मामें बुद्धि अचल होनी चाहिये कि हमें तो परमात्माकी ही प्राप्ति करनी है, चाहे जो हो जाय।

१४०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

निश्चयमें जितनी कमी रहती है, उतनी ही देरी लगती है। परन्तु इन दोनोंमें जब बुद्धि निश्चल और अचल हो जाती है, तब परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये बुद्धि 'निश्चल' होनी चाहिये, जिसको छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें 'दुःखसंयोगवियोगम्' पदसे कहा गया है और परमात्मासे सम्बन्ध जोड़नेके लिये बुद्धि 'अचल' होनी चाहिये, जिसको दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें 'समत्वं योग उच्यते' पदोंसे कहा गया है।

यहाँ 'तदा योगमवाप्न्यसि' पदोंसे जो योगकी प्राप्ति बतायी है, वह योग ऐसा नहीं है कि पहले परमात्मासे वियोग था, उस वियोगको मिटा दिया तो योग हो गया, प्रत्युत असत् पदार्थोंके साथ भूलसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा वियोग हो

जानेका नाम 'योग' है अर्थात् मनुष्यकी सदासे जो वास्तविक स्थिति (परमात्मासे नित्ययोग) है, उस स्थितिमें स्थित होना योग है। वह वास्तविक स्थिति ऐसी विलक्षण है कि उससे कभी वियोग होता ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं। उसमें संयोग, वियोग, योग आदि कोई भी शब्द लागू नहीं होता। केवल असत्से माने हुए सम्बन्धके त्यागको ही यहाँ योग संज्ञा दे दी है। वास्तवमें यह योग नित्ययोगका वाचक है। इस नित्ययोगकी अनुभूति कर्मोंके (सेवाके) द्वारा की जाय तो 'कर्मयोग', विवेक-विचारके द्वारा की जाय तो 'ज्ञानयोग', प्रेमके द्वारा की जाय तो 'भक्तियोग', संसारके लय-चिन्तनके द्वारा की जाय तो 'लययोग', प्राणायामके द्वारा की जाय तो 'हठयोग' और यम-नियमादि आठ अंगोंके द्वारा की जाय तो 'अष्टांगयोग' कहलाता है।

परिशिष्ट भाव —मोहके दो विभाग हैं—'मोहकलिल' अर्थात् सांसारिक मोह और 'श्रुतिविप्रतिपत्ति' अर्थात् शास्त्रीय (दार्शनिक) मोह। शरीर, स्त्री-पुत्र, धन-सम्पत्ति आदिमें राग होना 'सांसारिक मोह' है और द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि दार्शनिक मतभेदोंमें उलझ जाना 'शास्त्रीय मोह' है। इन दोनोंका त्याग करनेपर मनुष्यका भोगोंसे वैराग्य हो जाता है और उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। बुद्धि स्थिर होनेपर योगकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् परमात्मासे दूरी मिट जाती है और समीपता हो जाती है। कर्मयोगसे समीपता होती है, ज्ञानयोगसे अभेद होता है और भक्तियोगसे अभिन्नता होती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंमेंसे एककी सिद्धि होनेपर साधक दोनोंके फलको प्राप्त कर लेता है (गीता—पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक)।

मनुष्यका केवल अपने कल्याणका उद्देश्य हो और धन-सम्पत्ति, कुटुम्ब-परिवार आदिसे कोई स्वार्थका सम्बन्ध न हो तो वह सांसारिक मोहसे तर जाता है। पुरतकोंकी पढ़ाई करनेका, शास्त्रोंकी बातें सीखनेका उद्देश्य न हो, प्रत्युत केवल तत्त्वका अनुभव करनेका उद्देश्य हो तो वह शास्त्रीय मोहसे तर जाता है। तात्पर्य है कि साधकको न तो सांसारिक मोहकी मुख्याता रखनी है और न शास्त्रीय (दार्शनिक) मतभेदकी मुख्याता रखनी है अर्थात् किसी मत, सम्प्रदायका कोई आग्रह नहीं रखना है। ऐसा होनेपर वह योगका, मुक्तिका अथवा भक्तिका अधिकारी हो जाता है। इससे अधिक किसी अधिकार-विशेषकी जरूरत नहीं है।

सम्बन्ध—मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्ति दूर होनेपर योगको प्राप्त हुए स्थिर बुद्धिवाले पुरुषके विषयमें अर्जुन प्रश्न करते हैं।

अर्जुन उवाच

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥

अर्जुन बोले—

केशव= हे केशव !भाषा= लक्षण होते हैं ?किम्= कैसे
समाधिस्थस्य= परमात्मामें स्थितस्थितधीः= (वह) स्थिरआसीत= बैठता है (और)
स्थितप्रज्ञस्य= स्थिर बुद्धिवालेबुद्धिवाला मनुष्यकिम्= कैसे
मनुष्यकेकिम्= कैसेव्रजेत= चलता है अर्थात्
का= क्याप्रभाषेत= बोलता है,व्यवहार करता है ?

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४१

व्याख्या —[ यहाँ अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें जो प्रश्न किये हैं, इन प्रश्नोंके पहले अर्जुनके मनमें कर्म और बुद्धि (दूसरे अध्यायके सैंतालीसवेंसे पचासवें श्लोकतक) को लेकर शंका पैदा हुई थी। परन्तु भगवान्ने बावनवें-तिरपनवें श्लोकोंमें कहा कि जब तेरी बुद्धि मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिको तर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा—यह सुनकर अर्जुनके मनमें शंका हुई कि जब मैं योगको प्राप्त हो जाऊँगा, स्थितप्रज्ञ हो जाऊँगा तब मेरे क्या लक्षण होंगे? अतः अर्जुनने इस अपनी व्यक्तिगत शंकाको पहले पूछ लिया और कर्म तथा बुद्धिको लेकर अर्थात् सिद्धान्तको लेकर जो दूसरी शंका थी, उसको अर्जुनने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंका वर्णन होनेके बाद (तीसरे अध्यायके पहले-दूसरे श्लोकमें) पूछ लिया। अगर अर्जुन सिद्धान्तका प्रश्न यहाँ चौवनवें श्लोकमें ही कर लेते तो स्थितप्रज्ञके विषयमें प्रश्न करनेका अवसर बहुत दूर पड़ जाता। ]

‘समाधिरथस्य’ १—जो मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो चुका है, उसके लिये यहाँ ‘समाधिरथ’ पद आया है।

‘स्थितप्रज्ञस्य’ —यह पद साधक और सिद्ध दोनोंका वाचक है। जिसका विचार दृढ़ है, जो साधनसे कभी विचलित नहीं होता, ऐसा साधक भी स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिवाला) है और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है, ऐसा सिद्ध भी स्थितप्रज्ञ है। अतः यहाँ ‘स्थितप्रज्ञ’ शब्दसे साधक और सिद्ध दोनों लिये गये हैं। पहले इकतालीसवेंसे पैंतालीसवें श्लोकतक और सैंतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक साधकोंका वर्णन हुआ है; अतः आगेके श्लोकोंमें सिद्धके लक्षणोंमें साधकोंका भी वर्णन हुआ है।

यहाँ शंका होती है कि अर्जुनने तो ‘समाधिरथस्य’ पदसे सिद्ध स्थितप्रज्ञकी बात ही पूछी थी, पर भगवान्ने

स्थितप्रज्ञके लक्षणोंमें साधकोंकी बातें क्यों कहीं? इसका समाधान है कि ज्ञानयोगी साधककी तो प्रायः साधन-अवस्थामें ही कर्मसे उपरति हो जाती है। सिद्ध-अवस्थामें वह कर्मसे विशेष उपराम हो जाता है। भक्तियोगी साधककी भी साधन-अवस्थामें जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेकी रुचि होती है और इनकी बहुलता भी होती है। सिद्ध-अवस्थामें तो भगवत्सम्बन्धी कर्म विशेषतासे होते हैं। इस तरह ज्ञानयोगी और भक्तियोगी—दोनोंकी साधन और सिद्ध-अवस्थामें अन्तर आ जाता है, पर कर्मयोगीकी साधन और सिद्ध-अवस्थामें अन्तर नहीं आता। उसका दोनों अवस्थाओंमें कर्म करनेका प्रवाह ज्यों-का-त्यों चलता रहता है। कारण कि साधन-अवस्थामें उसका कर्म करनेका प्रवाह रहा है और उसके योगपर आरूढ़ होनेमें भी कर्म ही खास कारण रहे हैं। अतः भगवान्ने सिद्धके लक्षणोंमें, साधक जिस तरह सिद्ध हो सके, उसके साधन भी बता दिये हैं और जो सिद्ध हो गये हैं, उनके लक्षण भी बता दिये हैं।

‘का भाषा’ २—परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यको किस वाणीसे कहा जाता है अर्थात् उसके क्या लक्षण होते हैं? (इसका उत्तर भगवान्ने आगेके श्लोकमें दिया है।)

‘स्थितधीः किं प्रभाषेत’ —वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है? (इसका उत्तर भगवान्ने छप्पनवें-सत्तावनवें श्लोकमें दिया है।)

‘किमासीत’ —वह कैसे बैठता है अर्थात् संसारसे किस तरह उपराम होता है? (इसका उत्तर भगवान्ने अट्टावनवें श्लोकसे तिरसठवें श्लोकतक दिया है।)

‘व्रजेत किम्’ —वह कैसे चलता है अर्थात् व्यवहार कैसे करता है? (इसका उत्तर भगवान्ने चौंसठवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक दिया है।)

सम्बन्ध—अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके पहले प्रश्नका उत्तर देते हैं।

श्रीभगवानुवाच

प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्यार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥

१-यहाँ ‘समाधि’ पद परमात्माका वाचक है। इसीको पहले चौवालीसवें श्लोकमें ‘समाधी न विधीयते’ पदोंसे कहा है।

२-‘क्या भाषया ( वाणया ) भाष्यत इति भाषा।’

१४२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

श्रीभगवान् बोले—

पार्थ= हे पृथानन्दन !प्रजहाति= भलीभाँतितुष्टः= सन्तुष्ट रहता है,
यदा= जिस कालमें
(साधक)त्याग कर
देता है (और)तदा= उस कालमें
(वह)
मनोगतान्= मनमें आयीआत्मना= अपने-आपसेस्थितप्रज्ञः= स्थिरबुद्धि
सर्वान्= सम्पूर्णआत्मनि= अपने-आपमेंउच्यते= कहा
जाता है।
कामान्= कामनाओंकाएव= ही

व्याख्या—[गीताकी यह एक शैली है कि जो साधक जिस साधन (कर्मयोग, भक्तियोग आदि) के द्वारा सिद्ध होता है, उसी साधनसे उसकी पूर्णताका वर्णन किया जाता है। जैसे, भक्तियोगमें साधक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं—ऐसे अनन्य-योगसे उपासना करता है (बारहवें अध्यायका छठा श्लोक); अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें द्वेष-भावसे रहित हो जाता है (बारहवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। ज्ञानयोगमें साधक स्वयंको गुणोंसे सर्वथा असम्बद्ध एवं निलिप्त देखता है (चौदहवें अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक); अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण गुणोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है (चौदहवें अध्यायके बाईसवेंसे पचीसवें श्लोकतक)। ऐसे ही कर्मयोगमें कामनाके त्यागकी बात मुख्य कही गयी है; अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है—यह बात इस श्लोकमें बताते हैं।]

‘प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्’—इन पदोंका तात्पर्य यह हुआ कि कामना न तो स्वयंमें है और न मनमें ही है। कामना तो आने-जानेवाली है और स्वयं निरन्तर रहनेवाला है; अतः स्वयंमें कामना कैसे हो सकती है? मन एक कारण है और उसमें भी कामना निरन्तर नहीं रहती, प्रत्युत उसमें आती है—‘मनोगतान्’; अतः मनमें भी कामना कैसे हो सकती है? परन्तु शरीर-इन्द्रियों-मन-बुद्धिसे तादात्म्य होनेके कारण मनुष्य मनमें आनेवाली कामनाओंको अपनेमें मान लेता है।

‘जहाति’ क्रियाके साथ ‘प्र’ उपसर्ग देनेका तात्पर्य है कि साधक कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देता है, किसी भी कामनाका कोई भी अंश किंचिन्मात्र भी नहीं रहता। अपने स्वरूपका कभी त्याग नहीं होता और जिससे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, उसका भी त्याग नहीं होता। त्याग उसीका होता है, जो अपना नहीं है, पर उसको अपना मान लिया है। ऐसे ही कामना अपनेमें नहीं है, पर उसको अपनेमें मान लिया है। इस मान्यताका त्याग करनेको ही यहाँ ‘प्रजहाति’ पदसे कहा गया है।

यहाँ ‘कामान्’ शब्दमें बहुवचन होनेसे ‘सर्वान्’ पद उसीके अन्तर्गत आ जाता है, फिर भी ‘सर्वान्’ पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी कामना न रहे और किसी भी कामनाका कोई भी अंश बाकी न रहे।

‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’—जिस कालमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है अर्थात् अपने-आपमें सहज स्वाभाविक सन्तोष होता है।

सन्तोष दो तरहका होता है—एक सन्तोष गुण है और एक सन्तोष स्वरूप है। अन्तःकरणमें किसी प्रकारकी कोई भी इच्छा न हो—यह सन्तोष गुण है और स्वयंमें असन्तोषका अत्यन्ताभाव है—यह सन्तोष स्वरूप है। यह स्वरूपभूत सन्तोष स्वतः सर्वदा रहता है। इसके लिये कोई अभ्यास या विचार नहीं करना पड़ता। स्वरूपभूत सन्तोषमें प्रज्ञा (बुद्धि) स्वतः स्थिर रहती है।

‘स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते’—स्वयं जब बहुशाखाओंवाली अनन्त कामनाओंको अपनेमें मानता था, उस समय भी वास्तवमें कामनाएँ अपनेमें नहीं थीं और स्वयं स्थितप्रज्ञ ही था। परन्तु उस समय अपनेमें कामनाएँ माननेके कारण बुद्धि स्थिर न होनेसे वह स्थितप्रज्ञ नहीं कहा जाता था अर्थात् उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव नहीं होता था। अब उसने अपनेमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर दिया अर्थात् उनकी मान्यताको हटा दिया, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है अर्थात् उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव हो जाता है।

साधक तो बुद्धिको स्थिर बनाता है। परन्तु कामनाओंका सर्वथा त्याग होनेपर बुद्धिको स्थिर बनाना नहीं पड़ता, वह स्वतः-स्वाभाविक स्थिर हो जाती है।

कर्मयोगमें साधकका कर्मसे ज्यादा सम्बन्ध रहता है। उसके लिये योगमें आरूढ़ होनेमें भी कर्म कारण हैं—‘आरूढक्षोभुनैर्योगं कर्म कारणमुच्यते’ (गीता ६।३)। इसलिये कर्मयोगीका कर्मके साथ सम्बन्ध साधक-अवस्थामें भी रहता है और सिद्धावस्थामें भी। सिद्धावस्थामें

श्लोक ५५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४३

कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार कर्म होते रहते हैं, जो दूसरोंके लिये आदर्श होते हैं (गीता—तीसरे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसी बातको भगवान्ने चौथे अध्यायमें कहा है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए निर्लिप्त रहता है और निर्लिप्त रहते हुए ही कर्म करता है—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ’ (४।१८)।

भगवान्ने तिरपनवें श्लोकमें योगकी प्राप्तिमें बुद्धिकी दो बातें कही थीं—संसारसे हटनेमें तो बुद्धि निश्चल हो और परमात्मामें लगनेमें बुद्धि अचल हो अर्थात् निश्चल कहकर संसारका त्याग बताया और अचल कहकर परमात्मामें स्थिति बतायी। उन्हीं दो बातोंको लेकर यहाँ ‘यदा ’ और ‘तदा ’ पदसे कहा गया है कि जब साधक कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाता है और अपने स्वरूपमें ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। तात्पर्य है कि जबतक कामनाका अंश रहता है, तबतक वह साधक कहलाता है और जब कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब वह सिद्ध कहलाता है। इन्हीं दो बातोंका वर्णन भगवान्ने इस अध्यायकी समाप्तिक्रिया है; जैसे—यहाँ ‘प्रजहति यदा कामान्सर्वान् ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और फिर ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। छप्पनवें श्लोकके पहले भागमें (तीन चरणोंमें)

परिशिष्ट भाव —एक विभाग अस्थिर बुद्धिवालोंका है और एक विभाग स्थिर बुद्धिवालोंका है। अस्थिर बुद्धिवालोंकी बात तो पहले इकतालिसर्वसे चौवालीसवें श्लोकतक कह दी, अब स्थिर बुद्धिवालोंकी बात पचपनवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक कहते हैं। जिस समय साधक सांसारिक रुचिका त्याग करके अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उस समय वह स्थिर बुद्धिवाला कहा जाता है।

जिसका परमात्माका उद्देश्य होता है, उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली होती है; क्योंकि परमात्मा भी एक ही है। परन्तु जिसका संसारका उद्देश्य होता है, उसकी बुद्धि असंख्य कामनाओंवाली होती है; क्योंकि सांसारिक वस्तुएँ असंख्य हैं (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालिसवाँ श्लोक)।

समताकी प्राप्तिके लिये बुद्धिकी स्थिरता बहुत आवश्यक है। पातंजलयोगदर्शनमें तो मनकी स्थिरता (वृत्तिनिरोध) को महत्त्व दिया गया है, पर गीता बुद्धिकी स्थिरता (उद्देश्यकी दृढ़ता) को ही महत्त्व देती है। कारण कि कल्याणप्राप्तिमें मनकी स्थिरताका उतना महत्त्व नहीं है, जितना बुद्धिकी स्थिरताका महत्त्व है। मनकी स्थिरतासे लौकिक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, पर बुद्धिकी स्थिरतासे पारमार्थिक सिद्धि (कल्याणप्राप्ति) होती है। कर्मयोगमें बुद्धिकी स्थिरता ही मुख्य है। अगर मनकी स्थिरता होगी तो कर्मयोगी कर्तव्य-कर्म कैसे करेगा? कारण कि मन स्थिर होनेपर बाहरी क्रियाएँ रुक जाती हैं। भगवान् भी योग (समता) में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं—‘योगस्थः कुरु कर्माणि ’ (२।४८)।

प्रजहति ’ और ‘कामान्सर्वान् ’ पद देनेका तात्पर्य है कि किंचिन्मात्र भी कामना न रहे, पूरा-का-पूरा त्याग हो जाय। कारण कि यह कामना ही परमात्मप्राप्तिमें खास बाधक है।

सम्बन्ध—अब आगेके दो श्लोकोंमें ‘स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है?’ इस दूसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

संसारका त्याग और ‘स्थितधीर्मुनिः ’ पदसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सत्तावनवें और अठ्ठावनवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उनसठवें श्लोकके पहले भागमें संसारका त्याग बताया और ‘परं दृष्ट्वा ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। साठवें श्लोकसे इकसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘युक्त आसीत मत्परः ’ आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बासठवेंसे पैसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। छाल्ठवेंसे अड़सठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उनहत्तरवें श्लोकमें ‘या निशा सर्वभूतानाम् ’ तथा ‘यस्यां जाग्रति भूतानि ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और ‘तस्यां जाग्रति संयमी ’ तथा ‘सा निशा पश्यतो मुनेः ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सत्तरवें और इकहत्तरवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर ‘स शान्तिमधिगच्छति ’ पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बहत्तरवें श्लोकमें ‘नैनौ प्राप्य विमुहति ’ पदोंसे संसारका त्याग बताया और ‘ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ’ आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी।

१४४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥

दुःखेषु= दुःखोंकी प्राप्ति होनेपरविगतस्पृहः= जिसके मनमें स्मृहा नहीं होती (तथा)सर्वथा रहित हो गया है, (वह)
अनुद्विग्नमनाः= जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता (और)वीतरागभयक्रोधः= जो राग, भय और क्रोधसेमुनिः = मननशील मनुष्य
स्थितधीः = स्थिरबुद्धि
उच्यते = कहा जाता है ।
सुखेषु= सुखोंकी प्राप्ति होनेपर

व्याख्या —[ अर्जुनने तो ‘स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है ?’

ऐसा क्रियाकी प्रधानताको लेकर प्रश्न किया था, पर भगवान् भावकी प्रधानताको लेकर उत्तर देते हैं; क्योंकि क्रियाओंमें भाव ही मुख्य है। क्रियामात्र भावपूर्वक ही होती है। भाव बदलनेसे क्रिया बदल जाती है अर्थात् बाहरसे क्रिया वैसी ही दीखनेपर भी वास्तवमें क्रिया वैसी नहीं रहती। उसी भावकी बात भगवान् यहाँ कह रहे हैं* ]

‘दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः’ —‘दुःखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता अर्थात् कर्तव्य-कर्म करते समय कर्म करनेमें बाधा लग जाना, निन्दा-अपमान होना, कर्मका फल प्रतिकूल होना आदि—आदि प्रतिकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता।

कर्मयोगीके मनमें उद्वेग, हलचल न होनेका कारण यह है कि उसका मुख्य कर्तव्य होता है—दूसरोंके हितके लिये कर्म करना, कर्मोंको सांगोपांग करना, कर्मोंके फलमें कहीं आसक्ति, ममता, कामना न हो जाय—इस विषयमें सावधान रहना। ऐसा करनेसे उसके मनमें एक प्रसन्नता रहती है। उस प्रसन्नताके कारण कितनी ही प्रतिकूलता आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता।

‘सुखेषु विगतस्पृहः’ —सुखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके भीतर स्मृहा नहीं होती अर्थात् वर्तमानमें कर्मोंका सांगोपांग हो जाना, तात्कालिक आदर और प्रशंसा होना, अनुकूल फल मिल जाना आदि—आदि अनुकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें ‘यह परिस्थिति ऐसी ही बनी रहे; यह परिस्थिति सदा मिलती रहे’—ऐसी स्मृहा नहीं होती। उसके अन्तःकरणमें अनुकूलताका कुछ भी

असर नहीं होता।

‘वीतरागभयक्रोधः’ —‘संसारके पदार्थोंका मनपर जो रंग चढ़ जाता है उसको ‘राग’ कहते हैं। पदार्थोंमें राग होनेपर अगर कोई सबल व्यक्ति उन पदार्थोंका नाश करता है, उनसे सम्बन्ध-विच्छेद कराता है, उनकी प्राप्तिमें विघ्न डालता है, तो मनमें ‘भय’ होता है। अगर वह व्यक्ति निर्बल होता है, तो मनमें ‘क्रोध’ होता है। परन्तु जिसके भीतर दूसरोंको सुख पहुँचानेका, उनका हित करनेका, उनकी सेवा करनेका भाव जाग्रत् हो जाता है, उसका राग स्वाभाविक ही मिट जाता है। रागके मिटनेसे भय और क्रोध भी नहीं रहते। अतः वह राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो जाता है।

जबतक आंशिकरूपसे उद्वेग, स्मृहा, राग, भय और क्रोध रहते हैं, तबतक वह साधक होता है। इनसे सर्वथा रहित होनेपर वह सिद्ध हो जाता है।

[ वासना, कामना आदि सभी एक रागके ही स्वरूप हैं। केवल वासनाका तारतम्य होनेसे उसके अलग-अलग नाम होते हैं; जैसे अन्तःकरणमें जो छिपा हुआ राग रहता है, उसका नाम ‘वासना’ है। उस वासनाका ही दूसरा नाम ‘आसक्ति’ और प्रियता है। मेरेको वस्तु मिल जाय—ऐसी जो इच्छा होती है, उसका नाम ‘कामना’ है। कामना पूरी होनेकी जो सम्भावना है, उसका नाम ‘आशा’ है। कामना पूरी होनेपर भी पदार्थोंके बढ़नेकी तथा पदार्थोंके और मिलनेकी जो इच्छा होती है, उसका नाम ‘लोभ’ है। लोभकी मात्रा अधिक बढ़ जानेका नाम ‘तृष्णा’ है। तात्पर्य है कि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंमें जो खिंचाव है,

  • गीतामें अर्जुनने जहाँ-कहीं भी क्रियाकी प्रधानताको लेकर प्रश्न किया है, उसका उत्तर भगवान्ने भाव और बोधकी प्रधानताको लेकर ही दिया है। कारण कि क्रियाओंमें भाव और बोध ही मुख्य हैं। भाव और बोधके अनुसार ही क्रियाएँ होती हैं। जैसे, अर्जुनने चौदहवें अध्यायमें पूछा कि गुणातीत पुरुषके आचरण कैसे होते हैं ? तो भगवान्ने भावकी मुख्यताको लेकर उत्तर दिया कि उसके आचरण समतापूर्वक होते हैं।

श्लोक ५७]

  • साधक-संजीवनी *

१४५

श्रेष्ठ और महत्त्व-बुद्धि है, उसीको वासना, कामना आदि नामोंसे कहते हैं।]

‘स्थितधीर्मुनिरुच्यते’—ऐसे मननशील कर्मयोगीकी बुद्धि स्थिर, अटल हो जाती है। ‘मुनि’ शब्द वाणीपर लागू होता है, इसलिये भगवान्ने ‘किं प्रभाषेत्’ के उत्तरमें ‘मुनि’ शब्द कह दिया है। परंतु वास्तवमें ‘मुनि’ शब्द केवल वाणीपर ही अवलम्बित नहीं है। इसीलिये भगवान्ने सत्रहवें अध्यायमें ‘मौन’ शब्दका प्रयोग मानसिक तपमें किया है,

वाणीके तपमें नहीं (सत्रहवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। कर्मयोगका प्रकरण होनेसे यहाँ मननशील कर्मयोगीको मुनि कहा गया है। मननशीलताका तात्पर्य है— सावधानीका मनन, जिससे कि मनमें कोई कामना-आसक्ति न आ जाय। निरन्तर अनासक्त रहना ही सिद्ध कर्मयोगीकी सावधानी है; क्योंकि पहले साधक-अवस्थामें उसकी ऐसी सावधानी रही है (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और इसीसे वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुआ है।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तप्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥

सर्वत्र = सब जगह अनभिस्नेहः = आसक्तिरहित हुआ यः = जो मनुष्य तत्, तत् = उस-उस

शुभाशुभम् = शुभ-अशुभको प्राप्य = प्राप्त करके न = न तो अभिनन्दति = प्रसन्न होता है (और)

न = न द्वेष्टि = द्वेष करता है, तस्य = उसकी प्रज्ञा = बुद्धि प्रतिष्ठिता = स्थिर है।

व्याख्या—[पूर्वश्लोकमें तो भगवान्ने कर्तव्यकर्म करते हुए निर्वाकार रहनेकी बात बतायी। अब इस श्लोकमें कर्मके अनुसार प्राप्त होनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें सम, निर्वाकार रहनेकी बात बताते हैं।]

‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’—जो सब जगह स्नेहरहित है अर्थात् जिसकी अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि एवं स्त्री, पुत्र, घर, धन आदि किसीमें भी आसक्ति, लगाव नहीं रहा है।

वस्तु आदिके बने रहनेसे मैं बना रहा और उनके बिगड़ जानेसे मैं बिगड़ गया, धनके आनेसे मैं बड़ा हो गया और धनके चले जानेसे मैं मारा गया—यह जो वस्तु आदिमें एकात्मताकी तरह स्नेह है, उसका नाम ‘अभिस्नेह’ है। स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीका किसी भी वस्तु आदिमें यह अभिस्नेह बिलकुल नहीं रहता। बाहरसे वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदिका संयोग रहते हुए भी वह भीतरसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है।

‘तत्तप्राप्य शुभाशुभं नाभिनन्दति न द्वेष्टि’—जब उस मनुष्यके सामने प्रारब्धवशात् शुभ-अशुभ, शोभनीय-अशोभनीय, अच्छी-मन्दी, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, तब वह अनुकूल परिस्थितिको लेकर अभिनन्दित नहीं होता और प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर द्वेष नहीं करता।

अनुकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो प्रसन्नता आती है और वाणीसे भी प्रसन्नता प्रकट की जाती है तथा

बाहरसे भी उत्सव मनाया जाता है—यह उस परिस्थितिका अभिनन्दन करना है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो दुःख होता है, खिन्नता होती है कि यह कैसे और क्यों हो गया! यह नहीं होता तो अच्छा था, अब यह जल्दी मिट जाय तो ठीक है—यह उस परिस्थितिसे द्वेष करना है। सर्वत्र स्नेहरहित, निर्लिप्त हुआ मनुष्य अनुकूलताको लेकर अभिनन्दन नहीं करता और प्रतिकूलताको लेकर द्वेष नहीं करता। तात्पर्य है कि उसको अनुकूल-प्रतिकूल, अच्छे-मन्दे अवसर प्राप्त होते रहते हैं, पर उसके भीतर सदा निर्लिप्ता बनी रहती है।

‘तत्, तत्’ कहनेका तात्पर्य है कि जिन-जिन अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे विकार होनेकी सम्भावना रहती है और साधारण लोगोंमें विकार होते हैं, उन-उन अनुकूल-प्रतिकूल वस्तु आदिके कहीं भी, कभी भी और कैसे भी प्राप्त होनेपर उसको अभिनन्दन और द्वेष नहीं होता।

‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’—उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है, एकरस और एकरूप है। साधनावस्थामें उसकी जो व्यवसायात्मिका बुद्धि थी, वह अब परमात्मामें अचल-अटल हो गयी है। उसकी बुद्धिमें यह विवेक पूर्णरूपसे जाग्रत् हो गया है कि संसारमें अच्छे-मन्देके साथ वास्तवमें मेरा कोई भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि ये अच्छे-मन्दे

१४६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २

अवसर तो बदलनेवाले हैं, पर मेरा स्वरूप न बदलनेवाला

है; अतः बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका सम्बन्ध

कैसे हो सकता है?

वास्तवमें देखा जाय तो फर्क न तो स्वरूपमें पड़ता

है और न शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिमें। कारण कि अपना

जो स्वरूप है, उसमें कभी किंचिन्मात्र भी कोई परिवर्तन

नहीं होता और प्रकृति तथा प्रकृतिके कार्य शरीरादि

स्वाभाविक ही बदलते रहते हैं। तो फर्क कहाँ पड़ता है?

शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण बुद्धिमें फर्क पड़ता है। जब

यह तादात्म्य मिट जाता है, तब बुद्धिमें जो फर्क पड़ता था,

वह मिट जाता है और बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

दूसरा भाव यह है कि किसीकी बुद्धि कितनी ही तेज

क्यों न हो और वह अपनी बुद्धिसे परमात्माके विषयमें

कितना ही विचार क्यों न करता हो, पर वह परमात्माको

अपनी बुद्धिके अन्तर्गत नहीं ला सकता। कारण कि बुद्धि

सीमित है और परमात्मा असीम-अनन्त हैं। परन्तु उस

असीम परमात्मामें जब बुद्धि लीन हो जाती है, तब उस

सीमित बुद्धिमें परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं

रहती-यही बुद्धिका परमात्मामें प्रतिष्ठित होना है।

कर्मयोगी क्रियाशील होता है। अतः भगवान्ने छप्पनवें

श्लोकमें क्रियाकी सिद्धि-असिद्धिमें अस्पृहा और उद्वेग-

रहित होनेकी बात कही तथा इस श्लोकमें प्रारब्धके

अनुसार अपने-आप अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त

होनेपर अभिनन्दन और द्वेषसे रहित होनेकी बात कहते हैं।

सम्बन्ध-अब भगवान् आगेके श्लोकसे 'स्थितप्रज्ञ कैसे बैठता है?' इस तीसरे प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥

इव, च = जिस तरह

कूर्मः = कछुआ

अङ्गानि = (अपने)

अंगोंको

सर्वशः = सब ओरसे

संहरते = समेट लेता है,

(ऐसे ही)

यदा = जिस कालमें

अयम् = यह (कर्मयोगी)

इन्द्रियार्थेभ्यः = इन्द्रियोंके

विषयोंसे

इन्द्रियाणि = इन्द्रियोंको (सब

प्रकारसे हटा

लेता है, तब)

तस्य = उसकी

प्रज्ञा = बुद्धि

प्रतिष्ठिता = स्थिर हो

जाती है।

व्याख्या-'यदा संहरते.....प्रज्ञा प्रतिष्ठिता'-यहाँ

कछुएका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जैसे कछुआ चलता

है तो उसके छः अंग दीखते हैं-चार पैर, एक पूँछ और

एक मस्तक। परन्तु जब वह अपने अंगोंको छिपा लेता

है, तब केवल उसकी पीठ ही दिखायी देती है। ऐसे ही

स्थितप्रज्ञ पाँच इन्द्रियाँ और एक मन-इन छहोंको अपने-

अपने विषयसे हटा लेता है। अगर उसका इन्द्रियों आदिके

साथ किंचिन्मात्र भी मानसिक सम्बन्ध बना रहता है, तो

वह स्थितप्रज्ञ नहीं होता।

यहाँ 'संहरते' क्रिया देनेका मतलब यह हुआ कि वह

स्थितप्रज्ञ विषयोंसे इन्द्रियोंका उपसंहार कर लेता है अर्थात्

वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन नहीं करता।

इस श्लोकमें 'यदा' पद तो दिया है, पर 'तदा' पद

नहीं दिया है। यद्यपि 'यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः' के अनुसार

जहाँ 'यदा' आता है, वहाँ 'तदा' का अध्याहार लिया जाता

है अर्थात् 'यदा' पदके अन्तर्गत ही 'तदा' पद आ जाता

है, तथापि यहाँ 'तदा' पदका प्रयोग न करनेका एक गहरा

तात्पर्य है कि इन्द्रियोंके अपने-अपने विषयोंसे सर्वथा हट

जानेसे स्वतःसिद्ध तत्त्वका जो अनुभव होता है, वह कालके

अधीन, कालकी सीमामें नहीं है। कारण कि वह अनुभव

किसी क्रिया अथवा त्यागका फल नहीं है। वह अनुभव

उत्पन्न होनेवाली वस्तु नहीं है। अतः यहाँ कालवाचक 'तदा'

पद देनेकी जरूरत नहीं है। इसकी जरूरत तो वहाँ होती

है, जहाँ कोई वस्तु किसी वस्तुके अधीन होती है। जैसे

आकाशमें सूर्य रहनेपर भी आँखें बंद कर लेनेसे सूर्य नहीं

दीखता और आँखें खोलते ही सूर्य दीख जाता है, तो यहाँ

सूर्य और आँखोंमें कार्य-कारणका सम्बन्ध नहीं है अर्थात्

आँखें खुलनेसे सूर्य पैदा नहीं हुआ है। सूर्य तो पहलेसे

ज्यों-का-त्यों ही है। आँखें बंद करनेसे पहले भी सूर्य वैसा

ही है और आँखें बंद करनेपर भी सूर्य वैसा ही है। केवल

आँखें बंद करनेसे हमें उसका अनुभव नहीं हुआ था। ऐसे

ही यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेसे स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका

जो अनुभव हुआ है, वह अनुभव मनसहित इन्द्रियोंका

विषय नहीं है। तात्पर्य है कि वह स्वतःसिद्ध तत्त्व

श्लोक ५९ ]

  • साधक-संजीवनी *

१४७

भोगों-(विषयों-) के साथ सम्बन्ध रखते हुए और सम्बन्धरूप परदा रहनेसे उसका अनुभव नहीं होता और भोगोंको भोगते हुए भी वैसा ही है। परन्तु भोगोंके साथ यह परदा हटते ही उसका अनुभव हो जाता है।

सम्बन्ध—केवल इन्द्रियोंका विषयोंसे हट जाना ही स्थितप्रज्ञका लक्षण नहीं हैं—इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥

निराहारस्य= निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले)रसवर्जम्= रस निवृत्त नहीं होता। (परन्तु)रसः= रस
देहिनः= मनुष्यके (भी)परम्= परमात्मतत्त्वकाअपि= भी
विषयाः= विषय तोदृष्ट्वा= अनुभव होनेसेनिवर्तते= निवृत्त हो जाता है
विनिवर्तन्ते= निवृत्त हो जाते हैं,अस्य= इस स्थितप्रज्ञअर्थात् उसकी संसारमें रसबुद्धि नहीं रहती।

व्याख्या—‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जम्’ —मनुष्य निराहार दो तरहसे होता है—(१) अपनी इच्छासे भोजनका त्याग कर देना अथवा बीमारी आनेसे भोजनका त्याग हो जाना और (२) सम्पूर्ण विषयोंका त्याग करके एकान्तमें बैठना अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेना।

यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले साधकके लिये ही ‘निराहारस्य’ पद आया है।

रोगीके मनमें यह रहता है कि क्या कर्तु, शरीरमें पदार्थोंका सेवन करनेकी सामर्थ्य नहीं है, इसमें मेरी परवशता है; परन्तु जब मैं ठीक हो जाऊँगा, शरीरमें शक्ति आ जायगी, तब मैं पदार्थोंका सेवन करूँगा। इस तरह उसके भीतर रसबुद्धि रहती है। ऐसे ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेपर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर साधकके भीतर विषयोंमें जो रसबुद्धि, सुखबुद्धि है, वह जल्दी निवृत्त नहीं होती।

जिनका स्वाभाविक ही विषयोंमें राग नहीं है और जो तीव्र वैराग्यवान् हैं, उन साधकोंकी रसबुद्धि साधनावस्थामें

ही निवृत्त हो जाती है। परन्तु जो तीव्र वैराग्यके बिना ही विचारपूर्वक साधनमें लगे हुए हैं; उन्हीं साधकोंके लिये यह कहा गया है कि विषयोंका त्याग कर देनेपर भी उनकी रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती।

‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ —इस स्थितप्रज्ञकी रसबुद्धि परमात्माका अनुभव हो जानेपर निवृत्त हो जाती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेसे वह स्थितप्रज्ञ हो ही जाता है—यह नियम नहीं है। परन्तु स्थितप्रज्ञ होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती—यह नियम है।

‘रसोऽप्यस्य’ पदसे यह तात्पर्य निकलता है कि रसबुद्धि साधककी अहंतामें अर्थात् ‘मैं’-पनमें रहती है। यही रसबुद्धि स्थूलरूपसे रागका रूप धारण कर लेती है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपनी अहंतासे ही रसको निकाल दे कि ‘मैं तो निष्काम हूँ; राग करना, कामना करना मेरा काम नहीं है’। इस प्रकार निष्कामभाव आ जानेसे अथवा निष्काम होनेका उद्देश्य होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे रसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है।

परिशिष्ट भाव— भोगोंकी सत्ता और महत्ता माननेसे अन्तःकरणमें भोगोंके प्रति एक सूक्ष्म खिंचाव, प्रियता, मिठास पैदा होती है, उसका नाम ‘रस’ है। किसी लोभी व्यक्तिको रुपये मिल जायँ और कामी व्यक्तिको स्त्री मिल जाय तो भीतर-ही-भीतर एक खुशी आती है, यही ‘रस’ है। भोग भोगनेके बाद मनुष्य कहता है कि ‘बड़ा मजा आया’—यह उस रसकी ही स्मृति है। यह रस अहम् (चिञ्चडग्रन्थि) में रहता है। इसी रसका स्थूल रूप राग, सुखासक्ति है।

जबतक संयोगजन्य सुखमें रसबुद्धि रहती है, तबतक प्रकृति तथा उसके कार्य (क्रिया, पदार्थ और व्यक्ति) की पराधीनता रहती ही है। रसबुद्धि निवृत्त होनेपर पराधीनता सर्वथा मिट जाती है, भोगोंके सुखकी परवशता नहीं रहती, भीतरसे भोगोंकी गुलामी नहीं रहती।

१४८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय २ ]

जबतक अन्तःकरणमें किंचिन्मात्र भी भोगोंकी सत्ता और महत्ता रहती है, भोगोंमें रसबुद्धि रहती है, तबतक परमात्माका अलौकिक रस प्रकट नहीं होता। परमात्माके अलौकिक रसकी तो बात ही क्या, परमात्माकी प्राप्ति करनी है—यह निश्चय भी नहीं होता (गीता—दूसरे अध्यायका चौवालीसवाँ श्लोक)। बाहरसे इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर अर्थात् भोगोंका त्याग करनेपर भी भीतरमें रसबुद्धि बनी रहती है। तत्त्वबोध होनेपर यह रसबुद्धि सूख जाती है, निवृत्त हो जाती है—‘परं दृष्ट्वा निवर्तते ’। तात्पर्य है कि जब संसारसे अपनी भिन्नता तथा परमात्मासे अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है, तब नाशवान् (संयोगजन्य) रसकी निवृत्ति हो जाती है। नाशवान् रसकी निवृत्ति होनेपर अविनाशी (अखण्ड) रसकी जागृति हो जाती है।

तत्त्वबोध होनेपर तो रस सर्वथा निवृत्त हो ही जाता है, पर तत्त्वबोध होनेसे पहले भी उसकी उपेक्षासे, विचारसे, सत्संगसे, संतकृपासे रस निवृत्त हो सकता है। जिनकी रसबुद्धि निवृत्त हो चुकी है, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके संगसे भी रस निवृत्त हो सकता है।

कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग—तीनों साधनोंसे नाशवान् रसकी निवृत्ति हो जाती है। ज्यों-ज्यों कर्मयोगमें सेवाका रस, ज्ञानयोगमें तत्त्वके अनुभवका रस और भक्तियोगमें प्रेमका रस मिलने लगता है, त्यों-त्यों नाशवान् रस स्वतः छूटता चला जाता है। जैसे बचपनमें खिलौनोंमें रस मिलता था, पर बड़े होनेपर जब रूप्योंमें रस मिलने लगता है, तब खिलौनोंका रस स्वतः छूट जाता है, ऐसे ही साधनका रस मिलनेपर भोगोंका रस स्वतः छूट जाता है।

रसबुद्धिके रहते हुए जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब मनुष्यका चित्त पिघल जाता है तथा वह भोगोंके वशीभूत हो जाता है। परन्तु रसबुद्धि निवृत्त होनेके बाद जब भोगोंकी प्राप्ति होती है, तब तत्त्वज्ञ महापुरुषके चित्तमें किंचिन्मात्र भी कोई विकार पैदा नहीं होता (गीता २।७०)। उसके भीतर ऐसी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती, जिससे भोग उसको अपनी ओर खींच सकें। जैसे, पशुके आगे रूप्योंकी थैली रख दें तो उसमें लोभ-वृत्ति पैदा नहीं होती और सुन्दर स्त्रीको देखकर उसमें काम-वृत्ति पैदा नहीं होती। पशु तो रूप्योंको और स्त्रीको जानता नहीं, पर तत्त्वज्ञ महापुरुष रूप्योंको भी जानता है और स्त्रीको भी (गीता—दूसरे अध्यायका उनहत्तरवाँ श्लोक), फिर भी उसमें लोभ-वृत्ति और काम-वृत्ति पैदा नहीं होती। जैसे हम अंगुलीसे शरीरके किसी अंगको खुजलाते हैं तो खुजली मिटनेपर अंगुलीमें कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई विकृति नहीं आती, ऐसे ही इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन होनेपर भी तत्त्वज्ञके चित्तमें कोई विकार नहीं आता, वह ज्यों-का-त्यों निर्वाकार रहता है। कारण कि रसबुद्धि निवृत्त हो जानेसे वह अपने सुखके लिये किसी विषयमें प्रवृत्त होता ही नहीं। उसकी प्रत्येक प्रवृत्ति दूसरोंके हित और सुखके लिये ही होती है। अपने सुखके लिये किया गया विषयोंका चिन्तन भी पतन करनेवाला हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका बासठवाँ-तिरसठवाँ श्लोक) और अपने सुखके लिये न किया गया विषयोंका सेवन भी बन्धनकारक नहीं होता (गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ-पैंसठवाँ श्लोक)।

नाशवान् रस तात्कालिक होता है, अधिक देर नहीं ठहरता। स्त्री, रुपये आदिकी प्राप्तिके समय जो रस आता है, वह बादमें नहीं रहता। भोजनके मिलनेपर जो रस आता है, वह प्रत्येक ग्रासमें कम होते-होते अन्तमें सर्वथा मिट जाता है और भोजनसे अरुचि पैदा हो जाती है। परन्तु अविनाशी रस कभी कम नहीं होता, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों (अखण्ड) रहता है। नाशवान् रसका भोग करनेसे परिणाममें जड़ता, अभाव, शोक, रोग, भय, उद्देग आदि अनेक विकार पैदा होते हैं। इन विकारोंसे भोगी मनुष्य बच नहीं सकता; क्योंकि यह भोगोंका अवश्यम्भावी परिणाम है। इसलिये भगवान्ने दुःखोंका दर्शन करनेकी बात कही है—‘दुःखदोषानुदर्शनम् ’ (गीता १३।८)। कामादि दोषोंसे मुक्त होनेपर ही मनुष्य अपने कल्याणका आचरण करता है (गीता—सोलहवें अध्यायका इक्कीसवाँ-बाईसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—रसकी निवृत्ति न हो तो क्या आपत्ति है? इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।

इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥