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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

प्राक्कथन

वंशीधरं तोत्त्रधरं नमामि मनोहरं मोहहरं च कृष्णम्। मालाधरं धर्मधुरन्धरं च पार्थस्य सारथ्यकरं च देवम्॥ कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिं च। ददाति गीता करुणार्द्रभूता कृष्णेन गीता जगतो हिताय॥ संजीवनी साधकजीवनीयं प्राप्तिं हेरैवं सरलं ब्रवीति। करोति दूरं पथविघ्नबाधां ददाति शीघ्रं परमात्मसिद्धिम्॥*

गीताकी महिमा

श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा अगाध और असीम है। यह भगवद्गीताग्रन्थ प्रस्थानत्रयमें माना जाता है। मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये तीन राजमार्ग 'प्रस्थानत्रय' नामसे कहे जाते हैं—एक वैदिक प्रस्थान है, जिसको 'उपनिषद्' कहते हैं; एक दार्शनिक प्रस्थान है, जिसको 'ब्रह्मसूत्र' कहते हैं और एक स्मार्त प्रस्थान है, जिसको 'भगवद्गीता' कहते हैं। उपनिषदोंमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्रमें सूत्र हैं और भगवद्गीतामें श्लोक हैं। भगवद्गीतामें श्लोक होते हुए भी भगवान्की वाणी होनेसे ये मन्त्र ही हैं। इन श्लोकोंमें बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ होनेसे इनको सूत्र भी कह सकते हैं। 'उपनिषद्' अधिकारी मनुष्योंके कामकी चीज है और 'ब्रह्मसूत्र' विद्वानोंके कामकी चीज है; परन्तु 'भगवद्गीता' सभीके कामकी चीज है।

भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है। वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें नित्य-निरन्तर एकरस-एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियोंमें राग-द्वेषके कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित

होनेपर उसका स्वतः अनुभव हो जाता है।

भगवद्गीताका उपदेश महान् अलौकिक है। इसपर कई टीकाएँ हो गयीं और कई टीकाएँ होती ही चली जा रही हैं, फिर भी सन्त-महात्माओं, विद्वानोंके मनमें गीताके नये-नये भाव प्रकट होते रहते हैं। इस गम्भीर ग्रन्थपर कितना ही विचार किया जाय, तो भी इसका कोई पार नहीं पा सकता। इसमें जैसे-जैसे गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे इसमेंसे गहरी बातें मिलती चली जाती हैं। जब एक अच्छे विद्वान् पुरुषके भावोंका भी जल्दी अन्त नहीं आता, फिर जिनका नाम, रूप आदि यावन्मात्र अन्त है, ऐसे भगवान्के द्वारा कहे हुए वचनोंमें भरे हुए भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है ?

इस छोटे-से ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हेरक दर्शनके अलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।

भगवद्गीतामें साधनोंका वर्णन करनेमें, विस्तारपूर्वक समझानेमें, एक-एक साधनको कई बार कहनेमें संकोच नहीं किया गया है, फिर भी ग्रन्थका कलेवर नहीं बढ़ा है। ऐसा संक्षेपमें विस्तारपूर्वक यथार्थ और पूरी बात बतानेवाला दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं दीखता। अपने कल्याणकी उत्कट अभिलाषावाला मनुष्य हेरक परिस्थितिमें परमात्मतत्त्वको

  • 'जो अपने हाथोंमें वंशी तथा चाबुक और गलेमें दिव्य माला धारण किये हुए हैं एवं जो प्राणियोंके मनका तथा मोहका हरण करनेवाले हैं, उन पार्थसारथि धर्मधुरन्धर दिव्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।'

'भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गायी हुई करुणार्द्रभूता गीता जगत्के हितके लिये कर्तव्यकी दीक्षा, समताकी शिक्षा, ज्ञानकी भिक्षा और शरणागतिका तत्त्व प्रदान करनेवाली है।'

'परमात्मप्राप्तिको सरल बनानेवाली और साधकोंका जीवन यह 'साधक-संजीवनी' साधन-पथकी विघ्न-बाधाओंको दूर करके शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप परमसिद्धिको प्रदान करनेवाली है।'

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प्राप्त कर सकता है; युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी अपना कल्याण कर सकता है—इस प्रकार व्यवहारमात्रमें परमार्थकी कला गीतामें सिखायी गयी है। अतः इसके जोड़ेका दूसरा कोई ग्रन्थ देखनेमें नहीं आता।

गीता एक प्रासादिक ग्रन्थ है। इसका आश्रय लेकर पाठ करनेमात्रसे बड़े विचित्र, अलौकिक और शान्तिदायक भाव स्फुरित होते हैं। इसका मन लगाकर पाठ करनेमात्रसे बड़ी शान्ति मिलती है। इसकी एक विधि यह है कि पहले गीताके पूरे श्लोक अर्थसहित कण्ठस्थ कर लिये जायें, फिर एकान्तमें बैठकर गीताके अन्तिम श्लोक ‘यत्र

गीताका खास लक्ष्य

गीता किसी वादको लेकर नहीं चली है अर्थात् द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, विशुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि किसी भी वादको, किसी एक सम्प्रदायके किसी एक सिद्धान्तको लेकर नहीं चली है। गीताका मुख्य लक्ष्य यह है कि मनुष्य किसी भी वाद, मत, सिद्धान्तको माननेवाला क्यों न हो, उसका प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याण हो जाय, वह किसी भी परिस्थितिमें परमात्मप्राप्तिसे वंचित न रहे; क्योंकि जीवमात्रका मनुष्ययोनियें जन्म केवल अपने कल्याणके लिये ही हुआ है। संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मतत्त्व प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान है। अतः साधकके सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका केवल सदुपयोग करना है। सदुपयोग करनेका अर्थ है—दुःखदायी परिस्थिति आनेपर सुखकी इच्छाका त्याग करना; और सुखदायी परिस्थिति आनेपर सुखभोगका तथा ‘वह बनी रहे’ ऐसी इच्छाका त्याग करना और उसको दूसरोंकी सेवामें लगाना। इस प्रकार सदुपयोग करनेसे मनुष्य दुःखदायी और सुखदायी—दोनों परिस्थितियोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है।

सुष्टिसे पूर्व परमात्मामें ‘मैं एक ही अनेक रूपोंमें हो जाऊँ’ ऐसा संकल्प हुआ। इस संकल्पसे एक ही परमात्मा प्रेमवृद्धिकी लीलाके लिये, प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये स्वयं ही श्रीकृष्ण और श्रीजी (श्रीराधा)—इन दो

गीताका योग

गीतामें ‘योग’ शब्दके बड़े विचित्र-विचित्र अर्थ हैं। उनके हम तीन विभाग कर सकते हैं—(१) ‘युजिर् योगे’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—समरूप परमात्माके साथ

योगेश्वरः कृष्णः.....’—यहाँसे लेकर गीताके पहले श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे.....’—यहाँतक बिना पुस्तकके उलटा पाठ किया जाय तो बड़ी शान्ति मिलती है। यदि प्रतिदिन पूरी गीताका एक या अनेक बार पाठ किया जाय तो इससे गीताके विशेष अर्थ स्फुरित होते हैं। मनमें कोई शंका होती है तो पाठ करते-करते उसका समाधान हो जाता है।

वास्तवमें इस ग्रन्थकी महिमाका वर्णन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। अनन्तमहिमाशाली ग्रन्थकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है ?

रूपोंमें प्रकट हो गये। उन दोनोंपर स्पष्ट लीला करनेके लिये एक खेल रचा। उस खेलके लिये प्रभुके संकल्पसे अनन्त जीवोंकी (जो कि अनादिकालसे थे) और खेलके पदार्थों—(शरीरादि—) की सृष्टि हुई। खेल तभी होता है, जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र हों। इसलिये भगवान्ने जीवोंको स्वतन्त्रता प्रदान की। उस खेलमें श्रीजीका तो केवल भगवान्की तरफ ही आकर्षण रहा, खेलमें उनसे भूल नहीं हुई। अतः श्रीजी और भगवान्में प्रेमवृद्धिकी लीला हुई। परन्तु दूसरे जितने जीव थे, उन सबने भूलसे संयोगजन्य सुखके लिये खेलके पदार्थों—(उत्पत्ति-विनाशशील प्रकृतिजन्य पदार्थों—)के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया, जिससे वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गये।

खेलके पदार्थ केवल खेलके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु वे जीव खेल खेलना तो भूल गये और मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरादिको व्यक्तिगत मानने लग गये। इसलिये वे उन पदार्थोंमें फँस गये और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गये। अब अगर वे जीव शरीरादि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें, तो वे जन्म-मरणरूप महान् दुःखसे सदाके लिये छूट जायें। अतः जीव संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें और भगवान्के साथ अपने नित्ययोग—(नित्य सम्बन्ध—)को पहचान लें—इसीके लिये भगवद्गीताका अवतार हुआ है।

नित्यसम्बन्ध; जैसे—‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८) आदि। यही अर्थ गीतामें मुख्यतासे आया है।

(२) ‘युज् समाधी’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—चित्तकी स्थिरता अर्थात् समाधिमें

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स्थिति; जैसे—'यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया' (६।२०) आदि।

(३) 'युजु संयमने' धातुसे बना 'योग' शब्द, जिसका अर्थ है—संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव; जैसे—'पश्य मे योगमेश्वरम्' (९।५) आदि।

गीतामें जहाँ कहीं 'योग' शब्द आया है, उसमें उपर्युक्त तीनोंमेंसे एक अर्थकी मुख्यता और शेष दो अर्थोंकी गौणता है; जैसे—'युजिर् योगे' वाले 'योग' शब्दमें समता-(सम्बन्ध-) की मुख्यता है, पर समता आनेपर स्थिरता और सामर्थ्य१ भी स्वतः आ जाती है। 'युजु समाधी' वाले 'योग' शब्दमें स्थिरताकी मुख्यता है, पर स्थिरता आनेपर समता और सामर्थ्य भी स्वतः आ जाती है। 'युजु संयमने' वाले 'योग' शब्दमें सामर्थ्यकी मुख्यता है, पर सामर्थ्य आनेपर समता और स्थिरता भी स्वतः आ जाती है। अतः गीताका 'योग' शब्द बड़ा व्यापक और गम्भीरार्थक है।

पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तियोंके निरोधको 'योग' नामसे कहा गया है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१।२) और उस योगका परिणाम बताया है—द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाना—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१।३)। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीतामें 'योग' नामसे कहा गया है (दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ और छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वतःसिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको योग कहती है। उस समतामें स्थिति (नित्ययोग) होनेपर फिर कभी उससे वियोग नहीं होता, कभी वृत्तिरूपता नहीं होती, कभी व्युत्थान नहीं होता। वृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 'निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्थिति होनेपर 'निर्विकल्प बोध' होता है। 'निर्विकल्प बोध'

१-भगवान्में संसारमात्रकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदिकी जो सामर्थ्य है, वह सामर्थ्य योगीमें नहीं आती—'जगदव्यापारवर्जम्' (ब्रह्मसूत्र ४।४।१७)। योगीमें जो सामर्थ्य आती है, उससे वह संसारमात्रपर विजय प्राप्त कर लेता है (गीता ५।१९) अर्थात् कैसी ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता।

२-श्रीमद्भागवतमें भगवान्को कहा है—

योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्तु कुत्रचित् ॥ (११।२०।६)

'अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके सिवा दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।'

यही बात अध्यात्मरामायण और देवीभागवतमें भी आयी है—

(क) मार्गस्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षापित्साधकाः। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥ (अध्यात्म ७।७।५९)

(ख) मार्गस्त्रयो मे विख्याता मोक्षप्राप्ती नगाधिप। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च सत्तम ॥ (देवी ७।३७।३)

अवस्थातीत और सम्पूर्ण अवस्थाओंका प्रकाशक है।

समता अर्थात् नित्ययोगका अनुभव करानेके लिये गीतामें तीन योग-मार्गोंका वर्णन किया गया है—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंका संसारके साथ अभिन्ना सम्बन्ध है। अतः इन तीनोंको दूसरोंकी सेवामें लगा दे—यह कर्मयोग हुआ; स्वयं इनसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय—यह ज्ञानयोग हुआ; और स्वयं भगवान्के समर्पित हो जाय—यह भक्तियोग हुआ। इन तीनों योगोंको सिद्ध करनेके लिये अर्थात् अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ प्राप्त हैं—(१) करनेकी शक्ति (बल), (२) जाननेकी शक्ति (ज्ञान) और (३) माननेकी शक्ति (विश्वास)। करनेकी शक्ति निःस्वार्थभावसे संसारकी सेवा करनेके लिये है, जो कर्मयोग है; जाननेकी शक्ति अपने स्वरूपको जाननेके लिये है, जो ज्ञानयोग है और माननेकी शक्ति भगवान्को अपना तथा अपनेको भगवान्का मानकर सर्वथा भगवान्के समर्पित होनेके लिये है, जो भक्तियोग है। जिसमें करनेकी रुचि अधिक है, वह कर्मयोगका अधिकारी है। जिसमें अपने-आपको जाननेकी जिज्ञासा अधिक है, वह ज्ञानयोगका अधिकारी है। जिसका भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास अधिक है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। ये तीनों ही योग-मार्ग परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं। अन्य सभी साधन इन तीनोंके ही अन्तर्गत आ जाते हैं१।

सभी साधनोंका खास काम है—जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करना। अतः जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी प्रणालियों-(साधनों- ) में तो फरक रहता है, पर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सभी साधन एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सभी साधनोंसे एक ही समरूप परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इस समरूप परमात्मतत्त्वकी

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प्राप्तिको ही गीताने 'योग' नामसे कहा है, और इसीको 'नित्ययोग' कहते हैं।

गीतामें केवल कर्मयोगका, केवल ज्ञानयोगका अथवा केवल भक्तियोगका ही वर्णन हुआ हो—ऐसी बात भी नहीं है। इसमें उपर्युक्त तीनों योगोंके अलावा यज्ञ, दान, तप, ध्यानयोग, प्राणायाम, हठयोग, लययोग आदि साधनोंका भी वर्णन किया गया है। इसका खास कारण यही है कि गीतामें अर्जुनके प्रश्न युद्धके विषयमें नहीं हैं, प्रत्युत कल्याणके विषयमें हैं और भगवान्के द्वारा गीता कहनेका उद्देश्य भी युद्ध

साधनकी दो शैलियाँ

जीवमें एक तो चेतन परमात्माका अंश है और एक जड़ प्रकृतिका अंश है। चेतन-अंशकी मुख्यतासे वह परमात्माकी इच्छा करता है और जड़-अंशकी मुख्यतासे वह संसारकी इच्छा करता है। इन दोनों इच्छाओंमें परमात्माकी इच्छा तो पूरी होनेवाली है, पर संसारकी इच्छा कभी पूरी होनेवाली है ही नहीं। कुछ सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति होती हुई दीखनेपर भी वास्तवमें उनकी निवृत्ति नहीं होती, प्रत्युत संसारकी आसक्तिके कारण नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं। वास्तवमें सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति अर्थात् सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति इच्छाके अधीन नहीं है, प्रत्युत कर्मके अधीन है। परन्तु परमात्माकी प्राप्ति कर्मके अधीन नहीं है। स्वयंकी उत्कट अभिलाषामात्रसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक कर्मका आदि और अन्त होता है; इसलिये उसका फल भी आदि-अन्तवाला ही होता है। अतः आदि-अन्तवाले कर्मोंसे अनादि-अनन्त परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? परन्तु साधकोंने प्रायः ऐसा समझ रखा है कि जैसे क्रियाकी प्रधानतासे सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति होती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्ति भी उसी प्रकार क्रियाकी प्रधानतासे ही होगी और जैसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी उसी प्रकार शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ेगी। इसलिये ऐसे साधक जडता-(शरीरादि)-की सहायतासे अभ्यास करते हुए परमात्माकी तरफ चलते हैं।

जैसे ध्यानयोगमें दीर्घकालतक अभ्यास करते-करते अर्थात् परमात्मामें चित्तको लगाते-लगाते जब चित्त निरुद्ध हो जाता है, तब उसमें संसारकी कोई इच्छा न रहनेसे और स्वयं जड़ होनेके कारण परमात्माको ग्रहण न कर सकनेसे वह (चित्त) संसारसे उपराम हो जाता है। चित्तके उपराम

करानेका बिलकुल नहीं है। अर्जुन अपना निश्चित कल्याण चाहते थे (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। इसलिये शास्त्रोंमें जितने कल्याणकारक साधन कहे गये हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंका गीतामें संक्षेपसे विशद वर्णन मिलता है। उन साधनोंको लेकर ही साधक-जगत्में गीताका विशेष आदर है। कारण कि साधक चाहे किसी मतका हो, किसी सम्प्रदायका हो, किसी सिद्धान्तको माननेवाला हो, पर अपना कल्याण तो सबको अभीष्ट है।

होनेसे साधकका चित्तसे अर्थात् जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह स्वयंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है (गीता—छठे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो साधक आरम्भसे ही परमात्माके साथ अपना स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्ध मानकर और जडतासे अपना किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न मानकर साधन करता है, उसको बहुत जल्दी और सुगमतापूर्वक परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।

इस प्रकार परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधकोंके लिये साधनकी दो शैलियाँ हैं। जिस शैलीमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक जडताकी सहायता लेकर साधन करता है, उसको 'करण-सापेक्ष-शैली' नामसे और जिस शैलीमें स्वयंकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक आरम्भसे ही जडताकी सहायता न लेकर स्वयंसे साधन करता है, उसको 'करण-निरपेक्ष-शैली' नामसे कह सकते हैं। यद्यपि इन दोनों ही साधन-शैलियोंसे परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति कारण-निरपेक्षतासे अर्थात् स्वयंसे (जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर) ही होती है, तथापि 'करण-सापेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति देरीसे होती है और 'करण-निरपेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति शीघ्रतासे होती है। साधनकी इन दोनों शैलियोंमें चार मुख्य भेद हैं—

(१) कारण-सापेक्ष-शैलीमें जडता-(शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-का) आश्रय लेना पड़ता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें जडताका आश्रय नहीं लेना पड़ता, प्रत्युत जडतासे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करना पड़ता है।

(२) कारण-सापेक्ष-शैलीमें एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें अवस्थाओंसे सम्बन्धविच्छेद होकर अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव होता है।

(३) कारण-सापेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियों-(सिद्धियों-)की प्राप्ति होती है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियोंसे

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‘सम्बन्ध-विच्छेद होकर सीधे परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है।’

(४) करण-सापेक्ष-शैलीमें कभी तत्काल सिद्धि नहीं मिलती, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर, अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर अथवा भगवान्के शरण होनेपर तत्काल सिद्धि मिलती है।

पातंजलयोगदर्शनमें तो योगकी सिद्धिके लिये करण-सापेक्ष-शैलीको महत्त्व दिया गया है, पर गीतामें योगकी सिद्धिके लिये करण-निरपेक्ष-शैलीको ही महत्त्व दिया गया है। परमात्मामें मन लग गया, तब तो ठीक है, पर मन नहीं लगा तो कुछ नहीं हुआ—यह करण-सापेक्ष-शैली है। परमात्मामें मन लगे या न लगे, कोई बात नहीं, पर स्वयं परमात्मामें लग जाय—यह करण-निरपेक्ष-शैली है। तात्पर्य यह है कि करण-सापेक्ष-शैलीमें परमात्माके साथ मन-बुद्धिका सम्बन्ध है और करण-निरपेक्ष-शैलीमें मन-बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्माके साथ स्वयंका सम्बन्ध है। इसलिये करण-सापेक्ष-शैलीमें अभ्यासके द्वारा क्रमसे सिद्धि होती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है। कारण कि स्वयंका परमात्माके साथ स्वतःसिद्धि नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग) है। अतः भगवान्ने सम्बन्ध मानने अथवा जाननेमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है; जैसे—विवाह होनेपर स्त्री पुरुषको अपना पति मान लेती है, तो ऐसा माननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता। इसी तरह किसीके बतानेपर ‘यह गंगाजी हैं’—ऐसा जाननेके लिये भी कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता१। करण-सापेक्ष-शैलीमें तो अपने लिये साधन करने—(क्रिया-) की मुख्यता रहती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जानने (विवेक) और मानने—(भाव-) की मुख्यता रहती है।

‘मेरा जड़ता—(शरीरादि-—)से सम्बन्ध है ही नहीं’—ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक इसको आरम्भसे

ही दृढ़तापूर्वक मान लेता है, तब उसे ऐसा ही स्पष्ट अनुभव हो जाता है। जैसे वह ‘मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है’—इस प्रकार गलत मान्यता करके बँधा था, ऐसे ही ‘मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है’—इस प्रकार सही मान्यता करके मुक्त हो जाता है; क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे मिट जाती है—यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवान्ने गीतामें कहा है कि अज्ञानी मनुष्य शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर उससे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३। २७)। परन्तु ज्ञानी मनुष्य उन क्रियाओंका कर्ता अपनेको नहीं मानता—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (५। ८)। तात्पर्य यह हुआ कि अवास्तविक मान्यताको मिटानेके लिये वास्तविक मान्यता करनी जरूरी है।

‘मैं हिन्दू हूँ’, ‘मैं ब्राह्मण हूँ’, ‘मैं साधु हूँ’ आदि मान्यताएँ इतनी दृढ़ होती हैं कि जबतक इन मान्यताओंको स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक इनको कोई दूसरा नहीं छोड़ा सकता। ऐसे ही ‘मैं शरीर हूँ’, ‘मैं कर्ता हूँ’ आदि मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो जाती हैं कि उनको छोड़ना साधकको कठिन मालूम देता है। परन्तु ये लौकिक मान्यताएँ अवास्तविक, असत्य होनेके कारण सदा रहनेवाली नहीं हैं, प्रत्युत मिटनेवाली हैं। इसके विपरीत ‘मैं शरीर नहीं हूँ’, ‘मैं भगवान्का हूँ’ आदि मान्यताएँ वास्तविक, सत्य होनेके कारण कभी मिटती ही नहीं, प्रत्युत उनकी विस्मृति होती है, उनसे विमुखता होती है। इसलिये वास्तविक मान्यता दृढ़ होनेपर मान्यतारूपसे नहीं रहती, प्रत्युत बोध—(अनुभव-—)में परिणत हो जाती है।

यद्यपि गीतामें करण-सापेक्ष-शैलीका भी वर्णन किया गया है (जैसे चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवेंतक तथा चौतीसवों श्लोक, छठे अध्यायके दसवेंसे अठ्ठाईसवेंतक, आठवें अध्यायके आठवेंसे सोलहवेंतक और पन्द्रहवें

१-अगर करण-सापेक्ष-शैली—(चित्तवृत्तिनिरोध-—)से सीधे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती, तो पातंजलयोगदर्शनका ‘विभूतिपाद’ (जिसमें सिद्धियोंका वर्णन है) व्यर्थ हो जाता। करण-सापेक्ष-शैलीसे जिन सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है, वे तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विघ्न हैं। पातंजलयोगदर्शनमें भी उन सिद्धियोंको विघ्नरूपसे माना गया है—‘ते समाधावृत्तिसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः’ (३। ३७) अर्थात् वे (सिद्धियाँ) समाधिकी सिद्धिमें विघ्न हैं और व्युत्थान—(व्यवहार-—)में सिद्धियाँ हैं; ‘स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गमयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्’ (३। ५१) अर्थात् लोकपाल देवताओंके द्वारा (अपने लोकोंके भोगोंका लालच देकर) बुलानेपर न तो उन भोगोंमें राग करना चाहिये और न अभिमान करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट (पतन) होनेकी सम्भावना है।

२-वास्तवमें परमात्माको मानने अथवा जाननेके विषयमें संसारका कोई भी दृष्टान्त पूरा नहीं घटता। कारण कि संसारको मानने अथवा जाननेमें तो मन-बुद्धि साथमें रहते हैं, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेमें मन-बुद्धि साथमें नहीं रहते अर्थात् परमात्माका अनुभव स्वयंसे होता है, मन-बुद्धिसे नहीं। दूसरी बात, संसारको मानने अथवा जाननेका तो आरम्भ और अन्त होता है, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेका आरम्भ और अन्त नहीं होता। कारण कि वास्तवमें संसारके साथ हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध है ही नहीं, जबकि परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध सदासे ही है और सदा ही रहेगा।

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अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक आदि) तथापि मुख्यरूपसे करण-निर्पेक्ष-शैलीका ही वर्णन हुआ है। (जैसे दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ तथा पचपनवाँ, तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ, चौथे अध्यायका अड़तीसवाँ, पाँचवें अध्यायके बारहवेंका पूर्वार्ध, छठे अध्यायका पाँचवाँ, नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ, बारहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवें अध्यायका बासठवाँ, छाछठवाँ तथा तिहतरवाँ श्लोक आदि-आदि)। इसका कारण यह है कि भगवान् साधकोंको शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक अपनी प्राप्ति कराना चाहते हैं। दूसरी बात, अर्जुनने युद्धकी परिस्थिति प्राप्त होनेके समय अपने कल्याणका उपाय पूछा है। अतः उनके कल्याणके लिये करण-निर्पेक्ष-शैली ही काममें आ सकती है; क्योंकि करण-निर्पेक्ष-शैलीमें मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें और सम्पूर्ण शास्त्रविहित कर्म करते हुए भी अपना कल्याण कर सकता है। इसी शैलीके अनुसार (अभ्यास किये बिना) अर्जुनका मोह नाश हुआ और उनको स्मृतिकी प्राप्ति हुई (अठारहवें अध्यायका तिहतरवाँ श्लोक)।

साधनकी करण-निर्पेक्ष-शैली सबके लिये समानरूपसे उपयोगी है; क्योंकि इसमें किसी विशेष योग्यता, परिस्थिति आदिकी आवश्यकता नहीं है। इस शैलीमें केवल परमात्म-प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होनेसे ही तत्काल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होकर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। जैसे कितने ही वर्षोंका अँधेरा हो, एक दियासलाई जलाते ही वह नष्ट हो जाता है, ऐसे ही जड़ताके साथ कितना ही पुराना (अनन्त जन्मोंका) सम्बन्ध हो, परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही वह मिट जाता है। इसलिये उत्कट अभिलाषा करण-सापेक्षतासे होनेवाली समाधिसे भी ऊँची चीज है। ऊँची-से-ऊँची निर्विकल्प समाधि हो, उससे भी व्युत्थान होता है और फिर व्यवहार होता है अर्थात् समाधिका भी आरम्भ और अन्त होता है। जबतक आरम्भ और अन्त होता है, तबतक जड़ताके साथ सम्बन्ध है। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधनका आरम्भ और अन्त नहीं होता, प्रत्युत परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है*।

वास्तवमें देखा जाय तो परमात्मासे वियोग कभी हुआ ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं। केवल संसारसे माने हुए संयोगके कारण परमात्मासे वियोग प्रतीत हो रहा है। संसारसे माने हुए संयोगका त्याग करते ही परमात्मतत्त्वके अभिलाषी मनुष्यको तत्काल नित्ययोगका अनुभव हो जाता है और उसमें स्थायी

स्थिति हो जाती है।

अन्तःकरणको शुद्ध करनेकी आवश्यकता भी करण-सापेक्ष-शैलीमें ही है, करण-निर्पेक्ष-शैलीमें नहीं। जैसे कलम बढ़िया होनेसे लिखाई तो बढ़िया हो सकती है, पर लेखक बढ़िया नहीं हो जाता, ऐसे ही करण (अन्तःकरण) शुद्ध होनेसे क्रियार्थ तो शुद्ध हो सकती है, पर कर्ता शुद्ध नहीं हो जाता। कर्ता शुद्ध होता है—अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे; क्योंकि अन्तःकरणसे अपना सम्बन्ध मानना ही मूल अशुद्धि है।

नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वके साथ जीवका नित्ययोग स्वतःसिद्ध है; अतः उसकी प्राप्तिमें करणकी अपेक्षा नहीं है। केवल उधर दृष्टि डालनी है, जैसा कि श्रीरामचरितमानसमें आया है—‘संकर सहज सरूपु सम्हारा’ (१।५८।४) अर्थात् भगवान् शंकरने अपने सहज स्वरूपको सँभाला, उसकी तरफ दृष्टि डाली। सँभाली चीज वह होती है, जो पहलेसे ही हमारे पास हो और केवल दृष्टि डालनेसे पता लग जाय कि यह है। ऐसे ही दृष्टि डालनेमात्रसे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। परन्तु सांसारिक सुखकी कामना, आशा और भोगके कारण उधर दृष्टि डालनेमें, उसका अनुभव करनेमें कठिनता मालूम देती है। जबतक सांसारिक भोग और संग्रहकी तरफ दृष्टि है, तबतक मनुष्यमें यह ताकत नहीं है कि वह अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि डाल सके। अगर किसी कारणसे, किसी खास विवेचनसे उधर दृष्टि चली भी जाय, तो उसका स्थायी रहना बड़ा कठिन है। कारण कि नाशवान् पदार्थकी जो प्रियता भीतरमें बैठी हुई है, वह प्रियता भगवान्के स्वतःसिद्ध सम्बन्धको समझने नहीं देती; और समझमें आ जाय तो स्थिर नहीं रहने देती। हाँ, अगर उत्कट अभिलाषा जाग्रत हो जाय कि उस तत्त्वका अनुभव कैसे हो? तो इस अभिलाषामें यह ताकत है कि यह संसारकी आसक्तिका नाश कर देगी।

गीतोक्त कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधन करण-निर्पेक्ष अर्थात् स्वयंसे होनेवाले हैं। कारण कि क्रिया और पदार्थ अपने और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत दूसरोंके और दूसरोंकी सेवाके लिये हैं; मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है, मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं—इस प्रकार विवेकपूर्वक क्रिया गया विचार अथवा मान्यता करण-सापेक्ष (अभ्यास) नहीं है; क्योंकि इसमें जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद है। अतः कर्मयोगमें स्वयं ही जड़ताका

  • जबतक जड़ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक दो अवस्थाएँ रहती हैं; क्योंकि परिवर्तनशील होनेसे जड़ प्रकृति कभी एकरूप नहीं रहती। अतः समाधि और व्युत्थान—ये दोनों अवस्थाएँ जड़ताके सम्बन्धसे ही होती हैं। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘सहजावस्था’ होती है, जिसे सन्तोने ‘सहज समाधि’ कहा है। इससे फिर कभी व्युत्थान नहीं होता।

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त्याग करता है, ज्ञानयोगमें स्वयं ही स्वयंको जानता है और भक्तियोगमें स्वयं ही भगवान्के शरण होता है।

गीताकी इस 'साधक-संजीवनी' टीकामें भी साधनकी

टीकाके सम्बन्धमें

छोटी अवस्थामें ही मेरी गीतामें विशेष रुचि रही है। गीताका गम्भीरतापूर्वक मनन-विचार करनेसे तथा अनेक सन्त-महापुरुषोंके संग और वचनोंसे मुझे गीताके विषयको समझनेमें बड़ी सहायता मिली। गीतामें महान् संतोष देनेवाले अनन्त विचित्र-विचित्र भाव भरे पड़े हैं। उन भावोंको पूरी तरह समझनेकी और उनको व्यक्त करनेकी मेरेमें सामर्थ्य नहीं है। परन्तु जब कुछ गीताप्रेमी सज्जनोंने विशेष आग्रह किया, हठ किया, तब गीताके मार्मिक भावोंका अपनेको बोध हो जाय तथा और कोई मनन करे तो उसको भी इनका बोध हो जाय—इस दृष्टिसे गीताकी व्याख्या लिखवानेमें प्रवृत्ति हुई।

सबसे पहले एक बारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३०में 'गीताका भक्तियोग' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके कुछ वर्षोंके बाद तेरहवें और चौदहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जिसको संवत् २०३५ में 'गीताका ज्ञानयोग' नामसे प्रकाशित किया गया। इसको लिखवानेके बाद ऐसा विचार हुआ कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन योग हैं, अतः इन तीनों ही योगोंपर तीन पुस्तकें तैयार हो जायें तो ठीक रहेगा। इस दृष्टिसे पहले बारहवें अध्यायकी व्याख्याका संशोधन-परिवर्धन किया गया और उसके साथ पंद्रहवें अध्यायकी व्याख्याको भी सम्मिलित करके संवत् २०३९ में 'गीताका भक्तियोग' (द्वितीय संस्करण) नामसे प्रकाशित किया गया। फिर तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताका कर्मयोग' नामसे दो खण्डोंमें प्रकाशित किया गया। इसका प्रकाशन विलम्बसे संवत् २०४० में हुआ।

उपर्युक्त 'गीताका भक्तियोग', 'गीताका ज्ञानयोग' और 'गीताका कर्मयोग'—इन तीनों पुस्तकोंमें लिखनेकी शैली कुछ और रही अर्थात् पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक, फिर भावार्थ, फिर अन्वय और फिर पद-व्याख्या—इस शैलीसे लिखा गया। परन्तु इन तीनों पुस्तकोंके बाद लिखनेकी शैली बदल दी गयी अर्थात् पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक और फिर व्याख्या—इस शैलीसे लिखा गया। इसमें दूसरोंकी प्रेरणा भी रही। शैली बदलनेमें भाव यह रहा कि पाठ कुछ कम हो जाय और जल्दी लिखा जाय, जिससे पाठकोंको

करण-निरपेक्ष-शैलीको ही मुख्यता दी गयी है; क्योंकि साधकोंका शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक कल्याण कैसे हो—इस बातको सामने रखते हुए ही यह टीका लिखी गयी है।

पढ़नेमें अधिक समय न लगे और पुस्तक भी जल्दी तैयार होकर साधकोंके हाथ पहुँच जाय। इसी शैलीसे पहले सोलहवें और सत्रहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३९ में 'गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके बाद अठारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३९ में 'गीताका सार' नामसे प्रकाशित किया गया।

जब सोलहवें, सत्रहवें और अठारहवें अध्यायकी व्याख्या छप गयी, तब किसोने कहा कि अगर श्लोकोंके अर्थ भी दे दिये जायें तो ठीक रहेगा; क्योंकि पहले पाठक श्लोकका अर्थ समझ लेगा, तो फिर व्याख्या समझनेमें सुविधा रहेगी। अतः 'गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा' के दूसरे संस्करण (संवत् २०४०)—में श्लोकोंके अर्थ भी दे दिये गये। श्लोकोंके अर्थ देनेके साथ-साथ पदोंकी व्याख्या करनेका क्रम भी कुछ बदल गया।

इसके बाद दसवें और ग्यारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताकी विभूति और विश्वरूप-दर्शन' नामसे प्रकाशित किया गया। फिर सातवें, आठवें और नवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जिसको 'गीताकी राजविद्या' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके बाद छठे अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जो 'गीताका ध्यानयोग' नामसे प्रकाशित की गयी। अन्तमें पहले और दूसरे अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताका आरम्भ' नामसे प्रकाशित किया गया। ये चारों पुस्तकें संवत् २०४९ में प्रकाशित हुई।

इस प्रकार भगवत्कृपासे पूरी गीताकी टीका अलग-अलग कुल दस खण्डोंमें गीताप्रेससे प्रकाशित हुई। इनको प्रकाशित करनेके कार्यमें कागज आदिकी कई कठिनाइयाँ आती रहीं, फिर भी सत्संगी भाइयोंके उद्योगसे इनको प्रकाशित करनेका कार्य चलता रहा। लोगोंने भी इन पुस्तकोंको उत्साह एवं प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया, जिससे कई पुस्तकोंके दो-दो, तीन-तीन संस्करण भी निकल गये।

इस टीकाको एक जगह बैठकर नहीं लिखवाया गया है और इसको पहले अध्यायसे लेकर अठारहवें अध्यायतक क्रमसे भी नहीं लिखवाया गया है। इसलिये इसमें पूर्वापरकी दृष्टिसे कई विरोध आ सकते हैं। परन्तु इससे साधकोंको कहीं

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भी बाधा नहीं लगेगी। कहीं-कहीं सिद्धान्तोंके विवेचनमें भी फरक पड़ा है; परन्तु कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीनों स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करानेवाले हैं—इसमें कोई फरक नहीं पड़ा है। टीका लिखवाते समय ‘साधकोंको शीघ्र लाभ कैसे हो’—ऐसा भाव रहा है। इस कारण टीकाकी भाषा, शैली आदिमें परिवर्तन होता रहा है।

इस टीकामें बहुत-से श्लोकोंका विवेचन दूसरी टीकाओंके विपरीत पड़ता है। परन्तु इसका तात्पर्य दूसरी टीकाओंको गलत बतानेमें किंचिन्मात्र भी नहीं है, प्रत्युत मेरेको जैसा निर्विवादरूपसे उचित, प्रकरण-संगत, युक्ति-युक्त, संतोषजनक और प्रिय मालूम दिया, वैसा ही विवेचन मैंने किया है। मेरा किसीके खण्डनका और किसीके मण्डनका भाव बिलकुल नहीं रहा है।

श्रीमद्भगवद्गीताका अर्थ बहुत ही गम्भीर है। इसका पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और विचार करनेसे बड़े ही विचित्र और नये-नये भाव स्फुरित होते रहते हैं, जिससे मन-बुद्धि चकित होकर तृप्त हो जाते हैं। टीका लिखवाते समय जब इन भावोंको लिखवानेका विचार होता, तब एक ऐसी विचित्र बाढ़ आ जाती कि कौन-कौन-से भाव लिखवाऊँ और कैसे लिखवाऊँ—इस विषयमें अपनेको बिलकुल ही अयोग्य पाता। फिर भी मेरे जो साथी हैं, आदरणीय मित्र हैं, उनके आग्रहसे कुछ लिखवा देता। वे उन भावोंको लिख लेते और संशोधित करके उनको पुस्तकरूपसे प्रकाशित करवा देते। फिर कभी उन पुस्तकोंको देखनेका काम पड़ता तो उनमें कई जगह कर्मियाँ मालूम देतीं और ऐसा मालूम देता कि पूरी बातें नहीं आयीं हैं, बहुत-सी बातें छूट गयीं हैं! इसलिये उनमें बार-बार संशोधन-परिवर्धन किया जाता रहा। अतः पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे पहले लिखे गये विषयकी अपेक्षा बादमें लिखे गये विषयको ही महत्त्व दें और उसीको स्वीकार करें।

पूरी गीताकी टीकाके अलग-अलग कई खण्ड रहनेसे

उनके पुनर्मूद्रणमें और उन सबके एक साथ प्राप्त होनेमें कठिनाई रहती है—ऐसा सोचकर अब पूरी गीताकी टीकाको एक जिल्दमें प्रस्तुत ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित किया गया है। ऐसा करनेसे पहले पूर्व-प्रकाशित सम्पूर्ण टीकाको एक बार पुनः देखा है और उसमें आवश्यक संशोधन, परिवर्तन और परिवर्धन भी किया है। तेरहवें और चौदहवें अध्यायकी व्याख्या भी दुबारा लिखवायी गयी है। भाषा और शैलीको भी लगभग एक समान बनानेकी चेष्टा की गयी है। कई बातोंको अनावश्यक समझकर हटा दिया है, कई नयी बातें जोड़ दी हैं और कई बातोंको एक स्थानसे हटाकर दूसरे यथोचित स्थानपर दे दिया है। जिन बातोंकी ज्यादा पुनरुक्तियाँ हुई हैं, उनको यथासम्भव हटा दिया है, पर सर्वथा नहीं। विशेष ध्यान देनेयोग्य बातोंकी पुनरुक्तियोंको साधकोंके लिये उपयोगी समझकर नहीं हटाया है। इस कार्यमें बहुत-सी भूलें भी हो सकती हैं, जिसके लिये मेरी पाठकोंसे करबद्ध क्षमा-याचना है। साथ ही पाठकोंसे यह प्रार्थना है कि उनको जो भूलें दिखायी दें, उनको वे सूचित करनेकी कृपा करें। इससे आगेके संस्करणमें उनका सुधार करनेमें सुविधा रहेगी।

गीतासे सम्बन्धित कई नये-नये विषयोंका, खोजपूर्ण निबन्धोंका एक संग्रह अलगसे तैयार किया गया है, जिसको ‘गीता-दर्पण’ नामसे प्रकाशित किया गया है।

गीताका मनन-विचार करनेसे और गीताकी टीका लिखवानेसे मुझे बहुत आध्यात्मिक लाभ हुआ है और गीताके विषयका बहुत स्पष्ट बोध भी हुआ है। दूसरे भाई-बहन भी यदि इसका मनन करेंगे, तो उनको भी आध्यात्मिक लाभ अवश्य होगा—ऐसी मेरी व्यक्तिगत धारणा है। गीताका मनन-विचार करनेसे लाभ होता है—इसमें मुझे कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।

कृष्णानुग्रहदायिका सकरुणा गीता समाराधिता

कर्मज्ञानविरागभक्तिरसिका मर्मार्थसंदर्शिका।

सोल्कण्ठ किल साधकैरनुदिनं पेपीयमाना सदा

कल्याणं परदेवतेव दिशती संजीवनी वर्धताम्॥*

विनीत—

स्वामी रामसुखदास

  • कर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे परिपूर्ण इस करुणामयी गीताकी भलीभाँति उपासना की जाय (मनन किया जाय, अर्थको गहराईसे समझा जाय) तो यह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा प्रदान करनेवाली है। साधकोंके द्वारा उल्कण्ठापूर्वक सदा बार-बार पान की जानेवाली, गीताके पदोंका मार्मिक अर्थ दिखानेवाली और इष्टदेवके समान कल्याण प्रदान करनेवाली यह ‘साधक-संजीवनी’ निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥

श्रीमद्भगवद्गीता

(साधक-संजीवनी हिन्दी-टीकासहित)

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपिस्थजम्बूलकचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनोदरे किमपि यनीलं महो धावति।२ यावनिर्ऋजनमजं पुरुषं जरन्तं संचित्तयामि निखिले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरऋजनपुञ्जमञ्जुः।३

१-जो गजके मुखवाले हैं, भूतगण आदिके द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुनके फलोंका बड़े सुन्दर ढंगसे भक्षण करनेवाले हैं, शोकका विनाश करनेवाले हैं और भगवती उमाके पुत्र हैं, उन विघ्नेश्वर गणेशजीके चरणकमलोंमें मैं प्रणाम करता हूँ।

२-योगीलोग ध्यानद्वारा वशीभूत मनसे किसी निर्गुण और निष्क्रिय परम ज्योतिको देखते हैं तो देखते रहें, पर हमारे लिये तो यमुनाके तटपर जो कोई नील तेज दौड़ रहा है, वही नेत्रोंमें चिरकालतक चकाचौंध पैदा करता रहे।

३-अहो! जब मैं सम्पूर्ण जगत्में स्फुरित होनेवाले निरंजन, अजन्मा और पुरातन पुरुषका चिन्तन करता हूँ, तब मेरे हृदयमें अंजनसमूहके समान काले वर्णवाला कोई गोपशिशु बलात् स्फुरित होने लगता है।

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

न विद्या येषां श्रीनं शरणमपीषन् च गुणाः परित्यक्ता लोकैरपि वृजिनयुक्ताः श्रुतिजडाः । शरणं यं तेऽपि प्रसृतगुणमाश्रित्य सुजना विमुक्तास्तं वन्दे यदुपतिमहं कृष्णममलम् ॥१ यस्य श्रीकरुणार्णवस्य करुणालेशेन बालो ध्रुवः स्वेष्टं प्राप्य समार्थधाम समगाद्रङ्गोऽप्यविन्दिच्छ्रयम् । याता मुक्तिमजामिलादिपतिताः शैलोऽपि पूज्योऽभवत् तं श्रीमाधवमाश्रितेष्टदमहं नित्यं शरणं भजे ॥२ वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥३ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥४

१-जिनके पास न विद्या है, न धन है, न कोई सहारा है; जिनमें न कोई गुण है, न वेद-शास्त्रोंका ज्ञान है; जिनको संसारके लोगोंने पापी समझकर त्याग दिया है, ऐसे मनुष्य भी जिन शरणागतपालक प्रभुकी शरण लेकर सन्त बन जाते और मुक्त हो जाते हैं, उन विश्वविख्यात गुणोंवाले अमलात्मा यदुनाथ भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।

२-जिन करुणासिन्धु भगवान्की करुणाके लेशमात्रसे बालक ध्रुवने अपनी इष्ट वस्तुको प्राप्त करके श्रेष्ठ पुरुषोंके लोकको प्राप्त किया, दरिद्र सुदामाने लक्ष्मीको प्राप्त किया, अजामिल आदि पापियोंने मुक्तिको प्राप्त किया और गोवर्धन पर्वत भी पूज्य बन गया, उन शरणागत भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले शरण्य भगवान् माधवका मैं नित्य भजन करता हूँ।

३-जो वसुदेवजीके पुत्र, दिव्यरूपधारी, कंस एवं चाणूरका नाश करनेवाले और देवकीजीके लिये परम आनन्दस्वरूप हैं, उन जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।

४-भगवान् श्रीकृष्ण और मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुनको तथा सरस्वती और वेदव्यासजीको नमस्कार करके फिर महाभारतका कथन करना चाहिये।

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ प्रथमोऽध्यायः

अवतरणिका—

पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास समाप्त होनेपर जब प्रतिज्ञाके अनुसार अपना आधा राज्य माँगा, तब दुर्वाधनेने आधा राज्य तो क्या, तीखी सूईकी नोक-जितनी जमीन भी बिना युद्धके देनी स्वीकार नहीं की। अतः पाण्डवोंने माता कुन्तीकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पाण्डवों और कौरवोंका युद्ध होना निश्चित हो गया और तदनुसार दोनों ओरसे युद्धकी तैयारी होने लगी।

महर्षि वेदव्यासजीका धृतराष्ट्रपर बहुत स्नेह था। उस स्नेहके कारण उन्होंने धृतराष्ट्रके पास आकर कहा कि 'युद्ध होना और उसमें क्षत्रियोंका महान् संहार होना अवश्यम्भावी है, इसे कोई टाल नहीं सकता। यदि तुम युद्ध देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे सकता हूँ, जिससे तुम यहीं बैठे-बैठे युद्धको अच्छी तरहसे देख सकते हो।' इसपर धृतराष्ट्रने कहा कि 'मैं जन्मभर अन्धा रहा, अब अपने कुलके संहारको मैं देखना नहीं चाहता; परन्तु युद्ध कैसे हो रहा है—यह समाचार जरूर सुनना चाहता हूँ।' तब व्यासजीने कहा कि 'मैं संजयको दिव्य दृष्टि देता हूँ, जिससे यह सम्पूर्ण युद्धको, सम्पूर्ण घटनाओंको, सैनिकोंके मनमें आयी हुई बातोंको भी जान लेगा, सुन लेगा, देख लेगा और सब बातें तुम्हें सुना भी देगा।' ऐसा कहकर व्यासजीने संजयको दिव्य दृष्टि प्रदान की।

निश्चित समयके अनुसार कुरुक्षेत्रमें युद्ध आरम्भ हुआ। दस दिनतक संजय युद्ध-स्थलमें ही रहे। जब पितामह भीष्म बाणोंके द्वारा रथसे गिरा दिये गये, तब संजयने हस्तिनापुरमें (जहाँ धृतराष्ट्र विराजमान थे) आकर धृतराष्ट्रको यह समाचार सुनाया। इस समाचारको सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ा दुःख हुआ और वे विलाप करने लगे। फिर उन्होंने संजयसे युद्धका सारा वृत्तान्त सुनानेके लिये कहा। भीष्मपर्वके चौबीसवें अध्यायतक संजयने युद्ध-सम्बन्धी बातें धृतराष्ट्रको सुनायीं। पचीसवें अध्यायके आरम्भमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछते हैं—

धृतराष्ट्र उवाच

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले—३

सञ्जय=हे संजय।३युयुत्सवः=युद्धकीपाण्डवाः=पाण्डुके पुत्रोंने
धर्मक्षेत्रे=धर्मभूमिइच्छावालेएव=भी
कुरुक्षेत्रे=कुरुक्षेत्रमेंमामकाः=मेरेकिम्=क्या
समवेताः=इकट्ठे हुए=औरअकुर्वत=किया ?

१-महाभारतमें कुल अठारह पर्व हैं। उन पर्वोंके अन्तर्गत कई अवान्तर पर्व भी हैं। उनमेंसे (भीष्मपर्वके अन्तर्गत) यह 'श्रीमद्भगवद्गीतापर्व' है, जो भीष्मपर्वके तेरहवें अध्यायसे आरम्भ होकर बयालीसवें अध्यायमें समाप्त होता है।

२-वैशम्पायन और जनमेजयके संवादके अन्तर्गत 'धृतराष्ट्र-संजय-संवाद' है और धृतराष्ट्र तथा संजयके संवादके अन्तर्गत 'श्रीकृष्णार्जुन-संवाद' है।

३-संजयका जन्म गवल्पाण नामक सूतसे हुआ था। ये मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे—'सञ्जयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्पाणात्' (महाभारत, आदि० ६३।१७)। ये धृतराष्ट्रके मन्त्री थे।

२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

व्याख्या—‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’—कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।

यहाँ ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ पदोंमें ‘क्षेत्र’ शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है, प्रत्युत तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते—जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय—ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।

संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है—भूमि, धन और स्त्री। इन तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर लड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवोंद्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्ध—जैसा कार्य भी धर्मभूमि—तीर्थभूमिमें ही करते हैं, जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय, कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ पद आया है।

यहाँ आरम्भमें ‘धर्म’ पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके ‘धर्म’ पदमेंसे ‘धर’ लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके ‘मम’ पदमेंसे ‘म’ लिया जाय, तो ‘धर्म’ शब्द बन जाता

है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है, अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्य—कर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।

इन ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये, केवल अपने सुख—आरामकी दृष्टिसे नहीं; और कर्तव्य—अकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।

‘समवेता युयुत्सवः’—राजाओंके द्वारा बार—बार सन्धिकका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूर्यकी नोक—जितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र—दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्य—प्राप्तिका ही था। वह राज्य—प्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे, न्यायसे हो चाहे अन्यायसे, विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे, किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये—ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवन—निर्वाह कर लेंगे, पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे, धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था, उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी अर्थात् केवल माँके

१—यावद्भिर्दक्षिणया सूच्या विध्वेदग्रेण केशव। तावदध्वपरित्याभ्यं भूमेनः पाण्डवान् प्रति॥ (महाभारत, उडोगो १२७। २५) २—माता कुन्ती बड़ी सहिष्णु थी। कष्टसे बचकर सुख, आराम, राज्य आदि चाहना—यह बात उसमें नहीं थी। वहाँ एक ऐसी विलक्षण माता थी, जिसने भगवान्से विपत्तिका ही वरदान माँगा था। उसमें सुख—लोलुपता नहीं थी। परन्तु उसके मनमें दो बातोंको लेकर बड़ा दुःख था। पहली बात, राज्यके लिये कौरव—पाण्डव आपसमें लड़ते, चाहे जो करते, पर मेरी प्यारी पुत्रवधू द्रौपदीको इन दुर्योधनादि दुष्टोंने सभामें नग्न करना चाहा, अपमानित करना चाहा—ऐसी घृणित चेष्टा करना मनुष्यता नहीं है। यह बात माता कुन्तीको बहुत बुरी लगी।

श्लोक १ ]

  • साधक-संजीवनी *

२७

आज्ञा-पालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुए हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।

‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’ —पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचित-अनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ ‘मामकाः’ ‘पदके अन्तर्गत कौरव’ और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी ‘पाण्डवाः’ पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे, पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे।१ इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये ‘मामकाः’ और पाण्डुपुत्रोंके लिये ‘पाण्डवाः’ पदका प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें, मुहल्लोंमें, गाँवोंमें, प्रान्तोंमें, देशोंमें, सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं, ये दूसरे हैं—ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम, स्नेह नहीं होता, प्रत्युत कलह होती है।

यहाँ ‘पाण्डवाः’ पदके साथ ‘एव’ पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया?

दूसरी बात, भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी ओरसे सन्धिकका प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आये तो दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, शकुनि आदिने भगवान्को पकड़कर कैद करना चाहा। इस बातको सुनकर कुन्तीके मनमें यह विचार हुआ कि अब इन दुष्टोंको जल्दी ही खत्म करना चाहिये। कारण कि इनके जीते रहनेसे इनके पाप बढ़ते ही चले जायेंगे, जिससे इनका बहुत नुकसान होगा। इन्हीं दो कारणोंसे माता कुन्तीने पाण्डवोंको युद्धके लिये आज्ञा दी थी।

१-यद्यपि ‘कौरव’ शब्दके अन्तर्गत धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदि और पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिर आदि सभी आ जाते हैं, तथापि इस श्लोकमें धृतराष्ट्रने युधिष्ठिर आदिके लिये ‘पाण्डव’ शब्दका प्रयोग किया है। अतः व्याख्यामें ‘कौरव’ शब्द दुर्योधन आदिके लिये ही दिया गया है।

२-धृतराष्ट्रके मनमें द्वैधीभाव था कि दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि मेरे पुत्र नहीं हैं, प्रत्युत पाण्डुके पुत्र हैं। इस भावके कारण दुर्योधनका भीमको विष खिलाकर जलमें फेंक देना, लाक्षागृहमें पाण्डवोंको जलानेका प्रयत्न करना, युधिष्ठिरके साथ छलपूर्वक जुआ खेलना, पाण्डवोंका नाश करनेके लिये सेना लेकर वनमें जाना आदि कार्योंके करनेमें दुर्योधनको धृतराष्ट्रने कभी मना नहीं किया। कारण कि उनके भीतर यही भाव था कि अगर किसी तरह पाण्डवोंका नाश हो जाय, तो मेरे बेटोंका राज्य सुरक्षित रहेगा।

३-यहाँ आये ‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’का अलग-अलग वर्णन करनेकी दृष्टिसे ही आगे संजयके वचनोंमें ‘दुर्योधनः’ (१।१२) और ‘पाण्डवः’ (१।१४) शब्द प्रयुक्त हुए हैं।

['मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ —३ इनमेंसे पहले ‘मामकाः’ पदका उत्तर संजय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेनाको देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्य-मुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रण-कौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरव-सेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक ‘पाण्डवाः’ पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय भगवान् श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव आदिने अपने-अपने शंख बजाये, जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी संजय पाण्डवोंकी बात कहते-कहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसंग आरम्भ कर देंगे।]

‘किमकुर्वत’‘किम्’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—विकल्प, निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।

युद्ध हुआ कि नहीं ? इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता; क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है, और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद संजय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।

‘मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया, जो कि युद्ध कर बैठे! उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था’—ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता; क्योंकि युद्ध तो

१८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था। है। धृतराष्ट्र संजयसे भिन्न-भिन्न प्रकारकी छोटी-बड़ी सब घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जाननेके

यहाँ ‘क्लिम्’ शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।

परिशिष्ट भाव— ‘मेरे पुत्र (मामकाः) और ‘पाण्डुके पुत्र’ (पाण्डवाः)—इस मतभेदसे ही राग-द्वेष पैदा हुए, जिससे लड़ाई हुई, हलचल हुई। धृतराष्ट्रके भीतर पैदा हुए राग-द्वेषका फल यह हुआ कि सौ-के-सौ कौरव मारे गये, पर पाण्डव एक भी नहीं मारा गया!

जैसे दही बिलोते हैं तो उसमें हलचल पैदा होती है, जिससे मक्खन निकलता है, ऐसे ही ‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ के भेदसे पैदा हुई हलचलसे अर्जुनेके मनमें कल्याणकी अभिलाषा जाग्रत् हुई, जिससे भगवद्गीतारूपी मक्खन निकला!

तात्पर्य यह हुआ कि धृतराष्ट्रके मनमें होनेवाली हलचलसे लड़ाई पैदा हुई और अर्जुनेके मनमें होनेवाली हलचलसे गीता प्रकट हुई!

सम्बन्ध—धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर संजय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।

सज्जय उवाच

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥

संजय बोले—

तदा= उस समयदृष्ट्वा= देखकरराजा= राजा
व्यूढम्= वज्रव्यूहसे
खड़ी हुईतु= औरदुर्योधनः= दुर्योधन (यह)
पाण्डवानीकम्= पाण्डव-सेनाकोआचार्यम्= द्रोणाचार्यकेवचनम्= वचन
उपसङ्गम्य= पास जाकरअब्रवीत्= बोला।

व्याख्या— ‘तदा’—जिस समय दोनों सेनाएँ युद्धके लिये खड़ी हुई थीं, उस समयकी बात संजय यहाँ ‘तदा’ पदसे कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्रका प्रश्न ‘युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इस विषयको सुननेके लिये ही है।

‘दृष्ट्वा’ पाण्डवानीकं व्यूढम्—पाण्डवोंकी वज्रव्यूह-से खड़ी सेनाको देखनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना बड़ी ही सुचारुरूपसे और एक ही भावसे खड़ी थी अर्थात् उनके सैनिकोंमें दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था। उनके पक्षमें धर्म और भगवान् श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्षमें धर्म और भगवान् होते हैं, उसका दूसरोंपर बड़ा असर

पड़ता है। इसलिये संख्यामें कम होनेपर भी पाण्डवोंकी सेनाका तेज (प्रभाव) था और उसका दूसरोंपर बड़ा असर पड़ता था। अतः पाण्डव-सेनाका दुर्योधनपर भी बड़ा असर पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्यके पास जाकर नीतियुक्त गंभीर वचन बोला है।

‘राजा दुर्योधनः’—दुर्योधनको राजा कहनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका सबसे अधिक अपनापन (मोह) दुर्योधनमें ही था। परम्पराकी दृष्टिसे भी युवराज दुर्योधन ही था। राज्यके सब कार्यकी देखभाल दुर्योधन ही करता था। धृतराष्ट्र तो नाममात्रके राजा थे। युद्ध होनेमें भी मुख्य हेतु दुर्योधन ही था। इन सभी कारणोंसे संजयने दुर्योधनके लिये

१-इस अध्यायमें तीन बार ‘दृष्ट्वा’ (देखकर) पदका प्रयोग हुआ है—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास जाना (१।२); कौरव-सेनाको देखकर अर्जुनका धनुषको उठाना (१।२०); और अपने स्वजनों- (कुटुम्बियों-) को देखकर अर्जुनका मोहाविष्ट होना (१।२८)। इन तीनोंमेंसे दो ‘दृष्ट्वा’ तो आपसमें सेना देखनेके लिये आये हैं और एक ‘दृष्ट्वा’ स्वजनोंको देखनेके लिये आया है, जिससे अर्जुनका भाव बदल जाता है।

२-कौरव-सेनामें मतभेद था; क्योंकि दुर्योधन, दुःशासन आदि तो युद्ध करना चाहते थे, पर भीष्म, द्रोण, विकर्ण आदि युद्ध नहीं करना चाहते थे। यह नियम है कि जहाँ आपसमें मतभेद होता है, वहाँ तेज (प्रभाव) नहीं रहता—काँच कटोरो कुम्भ पय मोती मिनत् अवास। ताल घाव तिरिया कटक फाटा करे बिनास॥

श्लोक ३ ]

  • साधक-संजीवनी *

२९

‘राजा’ शब्दका प्रयोग किया है।

‘आचार्यमुपसङ्ग्य’—द्रोणाचार्यके पास जानेमें मुख्यतः तीन कारण मालूम देते हैं—

(१) अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये अर्थात् द्रोणाचार्यके भीतर पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करके उनको अपने पक्षमें विशेषतासे करनेके लिये दुर्योधन द्रोणाचार्यके पास गया।

(२) व्यवहारमें गुरुके नाते आदर देनेके लिये भी द्रोणाचार्यके पास जाना उचित था।

(३) मुख्य व्यक्तिका सेनामें यथास्थान खड़े रहना बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। इसलिये दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास खुद जाना उचित ही था।

यहाँ शंका हो सकती है कि दुर्योधनको तो पितामह भीष्मके पास जाना चाहिये था, जो कि सेनापति थे। पर दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्यके पास ही क्यों गया? इसका समाधान यह है कि द्रोण और भीष्म—दोनों उभय-पक्षपाती थे अर्थात् वे कौरव और पाण्डव—दोनोंका ही पक्ष रखते थे। उन दोनोंमें भी द्रोणाचार्यको ज्यादा राजी करना था; क्योंकि द्रोणाचार्यके साथ दुर्योधनका गुरुके नाते तो स्नेह था, पर कुटुम्बके नाते स्नेह नहीं था; और अर्जुनपर द्रोणाचार्यकी विशेष कृपा थी। अतः उनको राजी

करनेके लिये दुर्योधनका उनके पास जाना ही उचित था। व्यवहारमें भी यह देखा जाता है कि जिसके साथ स्नेह नहीं है, उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये मनुष्य उसको ज्यादा आदर देकर राजी करता है।

दुर्योधनके मनमें यह विश्वास था कि भीष्मजी तो हमारे दादाजी ही हैं; अतः उनके पास न जाऊँ तो भी कोई बात नहीं है। न जानेसे अगर वे नाराज भी हो जायेंगे तो मैं किसी तरहसे उनको राजी कर लूँगा। कारण कि पितामह भीष्मके साथ दुर्योधनका कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था ही, भीष्मका भी उसके साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था। इसलिये भीष्मजीने दुर्योधनको राजी करनेके लिये जोरसे शंख बजाया है (पहले अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।

‘वचनमब्रवीत्’—यहाँ ‘अब्रवीत्’ कहना ही पर्याप्त था; क्योंकि ‘अब्रवीत्’ क्रियाके अन्तर्गत ही ‘वचनम्’ आ जाता है अर्थात् दुर्योधन बोलेगा, तो वचन ही बोलेगा। इसलिये यहाँ ‘वचनम्’ शब्दकी आवश्यकता नहीं थी। फिर भी ‘वचनम्’ शब्द देनेका तात्पर्य है कि दुर्योधन नीतियुक्त गम्भीर वचन बोलता है, जिससे द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा हो जाय और वे हमारे ही पक्षमें रहते हुए ठीक तरहसे युद्ध करें। जिससे हमारी विजय हो जाय, हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाय।

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधन क्या वचन बोला—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्यं महतीं चमूम्। व्यूहां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥

आचार्य= हे आचार्य!धृष्टद्युम्नकेपाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डवोंकी
तव= आपकेद्वाराएताम् = इस
धीमता= बुद्धिमान्व्यूहरचनासेमहतीम् = बड़ी भारी
शिष्येण= शिष्यखड़ीचमूम् = सेनाको
द्रुपदपुत्रेण= द्रुपदपुत्रकी हुईपश्य = देखिये!

व्याख्या—‘आचार्य’—द्रोणके लिये ‘आचार्य’ सम्बोधन देनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि आप हम सबके—कौरवों और पाण्डवोंके आचार्य हैं। शस्त्रविद्या सिखानेवाले होनेसे आप सबके गुरु हैं। इसलिये आपके मनमें किसीका पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये।

दुर्योधनका भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारनेके लिये पैदा होनेवाले धृष्टद्युम्नको भी आपने अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान् है कि उसने आपको मारनेके लिये आपसे ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है।

‘तव शिष्येण धीमता’—इन पदोंका प्रयोग करनेमें

‘द्रुपदपुत्रेण’—यह पद कहनेका आशय है कि आपको

३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

मारनेके उद्देश्यको लेकर ही द्रुपदने याज और उपयाज नामक ब्राह्मणोंसे यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न पैदा हुआ। वही यह द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आपके सामने (प्रतिपक्षमें) सेनापतिके रूपमें खड़ा है।

यद्यपि दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्र'के स्थानपर 'धृष्टद्युम्न' भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्यके साथ द्रुपद जो वैर रखता था, उस वैरभावको याद दिलानेके लिये दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्रेण' शब्दका प्रयोग करता है कि अब वैर निकालनेका अच्छा मौका है।

'पाण्डुपुत्राणाम् एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य'—द्रुपदपुत्रके द्वारा पाण्डवोंकी इस व्यूहाकार खड़ी हुई बड़ी भारी सेनाको देखिये। तात्पर्य है कि जिन पाण्डवोंपर आप स्नेह रखते हैं, उन्हीं पाण्डवोंने आपके प्रतिपक्षमें खास आपको मारनेवाले द्रुपदपुत्रको सेनापति बनाकर व्यूह-रचना करनेका अधिकार दिया है। अगर पाण्डव आपसे स्नेह रखते तो कम-से-कम आपको मारनेवालेको तो अपनी सेनाका मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार तो नहीं देते। परन्तु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसीको सेनापति बनाया है।

यद्यपि कौरवोंकी अपेक्षा पाण्डवोंकी सेना संख्यामें कम थी अर्थात् कौरवोंकी सेना ग्यारह अक्षौहिणी* और पाण्डवोंकी सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी बता रहा है। पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी कहनेमें दो भाव मालूम देते हैं—

(१) पाण्डवोंकी सेना ऐसे ढंगसे व्यूहाकार खड़ी हुई थी, जिससे दुर्योधनको थोड़ी सेना भी बहुत बड़ी दीख रही थी और (२) पाण्डव-सेनामें सब-के-सब योद्धा एक मतके थे। इस एकताके कारण पाण्डवोंकी थोड़ी सेना भी बलमें, उत्साहमें बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेनाको दिखकर दुर्योधन द्रोणाचार्यसे यह कहना चाहता है कि युद्ध करते समय आप इस सेनाको सामान्य और छोटी न समझें। आप विशेष बल लगाकर सावधानीसे युद्ध करें। पाण्डवोंका सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपदपुत्र ही; अतः उसपर विजय करना आपके लिये कौन-सी बड़ी बात है!

'एतां पश्य' कहनेका तात्पर्य है कि यह पाण्डव-सेना युद्धके लिये तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः हमलोग इस सेनापर किस तरहसे विजय कर सकते हैं—इस विषयमें आपको जल्दी-से-जल्दी निर्णय लेना चाहिये।

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यसे पाण्डवोंकी सेना देखनेके लिये प्रार्थना करके अब दुर्योधन उन्हें पाण्डव-सेनाके महारथियोंको दिखाता है।

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥

धृष्टकेतुश्चैकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।

पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ५ ॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥

अत्र= यहाँ (पाण्डवों-की सेनामें)धनुष है(सात्यकि),
शूराः= बड़े-बड़े शूरवीर हैं,= तथा (जो)
महेष्वासाः= (जिनके) बहुत बड़े-बड़ेयुधि= युद्धमें
भीमार्जुनसमाः= भीम और अर्जुनके समान हैं। (उनमें)
युयुधानः= युयुधान
विराटः = राजा विराट
च = और
महारथः = महारथी
द्रुपदः = द्रुपद (भी हैं।)
धृष्टकेतुः = धृष्टकेतु
  • एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०१,३५० पैदल सैनिक होते हैं। (महाभारत, आदि० २। २३—२६)

श्लोक ४—६ ]

  • साधक-संजीवनी *

३१

= और चेकितानः = चेकितान = तथा वीर्यवान् = पराक्रमी काशिराजः = काशिराज (भी हैं।) पुरुजित् = पुरुजित् = और कृन्तिभोजः = कृन्तिभोज (—ये

दोनों भाई) = तथा नरपुङ्गवः = मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्यः = शैब्य (भी हैं।) विक्रान्तः = पराक्रमी युधामन्युः = युधामन्यु = और वीर्यवान् = पराक्रमी

उत्तमौजाः = उत्तमौजा (भी हैं।) सौभद्रः = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु = और द्रौपदेयाः = द्रौपदीके पाँचों पुत्र (भी हैं।) सर्वे, एव = (ये) सब-के-सब महारथाः = महारथी हैं।

व्याख्या—‘अत्र शूरा महेष्वास भीमार्जुनसमा युधि’— जिनसे बाण चलाये जाते हैं, फेंके जाते हैं, उनका नाम ‘इष्वास’ अर्थात् धनुष है। ऐसे बड़े-बड़े इष्वास (धनुष) जिनके पास हैं, वे सभी ‘महेष्वास’ हैं। तात्पर्य है कि बड़े धनुषोंपर बाण चढ़ाने एवं प्रत्यंचा खींचनेमें बहुत बल लगता है। जोरसे खींचकर छोड़ा गया बाण विशेष मार करता है। ऐसे बड़े-बड़े धनुष पासमें होनेके कारण ये सभी बहुत बलवान् और शूरवीर हैं। ये मामूली योद्धा नहीं हैं। युद्धमें ये भीम और अर्जुनके समान हैं अर्थात् बलमें ये भीमके समान और अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये अर्जुनके समान हैं।

‘युयुधानः’— ‘युयुधान-(सात्यकि-) ने अर्जुनसे अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी थी। इसलिये भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा दुर्योधनको नारायणी सेना देनेपर भी वह कृतज्ञ होकर अर्जुनके पक्षमें ही रहा, दुर्योधनके पक्षमें नहीं गया। द्रोणाचार्यके मनमें अर्जुनके प्रति द्वेषभाव पैदा करनेके लिये दुर्योधन महारथियोंमें सबसे पहले अर्जुनके शिष्य युयुधानका नाम लेता है। तात्पर्य है कि इस अर्जुनको तो देखिये! इसने आपसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा है और आपने अर्जुनको यह वरदान भी दिया है कि संसारमें तुम्हारे समान और कोई धनुर्धर न हो, ऐसा प्रयत्न करूँगा*। इस तरह आपने तो अपने शिष्य अर्जुनपर इतना स्नेह रखा है, पर वह कृतघ्न होकर आपके विपक्षमें लड़नेके लिये खड़ा है, जबकि अर्जुनका शिष्य युयुधान उसीके पक्षमें खड़ा है।

[युयुधान महाभारतके युद्धमें न मरकर यादवोंके आपसी युद्धमें मारे गये।]

‘विराटश्च’— जिसके कारण हमारे पक्षका वीर सुशर्मा अपमानित किया गया, आपको सम्मोहन-अस्त्रसे मोहित

होना पड़ा और हमलोगोंको भी जिसकी गायें छोड़कर युद्धसे भागना पड़ा, वह राजा विराट आपके प्रतिपक्षमें खड़ा है।

राजा विराटके साथ द्रोणाचार्यका ऐसा कोई वैरभाव या द्वेषभाव नहीं था; परन्तु दुर्योधन यह समझता है कि अगर युयुधानके बाद मैं द्रुपदका नाम लूँ तो द्रोणाचार्यके मनमें यह भाव आ सकता है कि दुर्योधन पाण्डवोंके विरोधमें मेरेको उकसाकर युद्धके लिये विशेषतासे प्रेरणा कर रहा है तथा मेरे मनमें पाण्डवोंके प्रति वैरभाव पैदा कर रहा है। इसलिये दुर्योधन द्रुपदके नामसे पहले विराटका नाम लेता है, जिससे द्रोणाचार्य मेरी चालाकी न समझ सकें और विशेषतासे युद्ध करें।

[राजा विराट उत्तर, श्वेत और शंख नामक तीनों पुत्रोंसहित महाभारत-युद्धमें मारे गये।]

‘द्रुपदश्च महारथः’— आपने तो द्रुपदको पहलेकी मित्रता याद दिलायी, पर उसने सभामें यह कहकर आपका अपमान किया कि मैं राजा हूँ और तुम भिक्षुक हो; अतः मेरी-तुम्हारी मित्रता कैसी? तथा वैरभावके कारण आपको मारनेके लिये पुत्र भी पैदा किया, वही महारथी द्रुपद आपसे लड़नेके लिये विपक्षमें खड़ा है।

[राजा द्रुपद युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।]

‘धृष्टकेतुः’— यह धृष्टकेतु कितना मूर्ख है कि जिसके पिता शिशुपालको कृष्णने भरी सभामें चक्रसे मार डाला था, उसी कृष्णके पक्षमें यह लड़नेके लिये खड़ा है!

[धृष्टकेतु द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।]

‘चेकितानः’— सब यादवसेना तो हमारी ओरसे लड़नेके लिये तैयार है और यह यादव चेकितान पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है!

  • प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः। त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥

(महाभारत, आदि० १३१। २७)

३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १ ]

[ चैकितान दुर्योधनके हाथसे मारे गये । ]

‘काशिराजश्च वीर्यवान्’—यह काशिराज बड़ा ही शूरवीर और महारथी है। यह भी पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है। इसलिये आप सावधानीसे युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा पराक्रमी है।

[ काशिराज महाभारत-युद्धमें मारे गये । ]

‘पुरुजित्कुन्तिभोजश्च’—यद्यपि पुरुजित् और कुन्तिभोज—ये दोनों कुन्तीके भाई होनेसे हमारे और पाण्डवोंके मामा हैं, तथापि इनके मनमें पक्षपात होनेके कारण ये हमारे विपक्षमें युद्ध करनेके लिये खड़े हैं।

[ पुरुजित् और कुन्तिभोज—दोनों ही युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये । ]

‘शैब्यश्च नरपुद्गवः’—यह शैब्य युधिष्ठिरका श्वशुर है। यह मनुष्योंमें श्रेष्ठ और बहुत बलवान् है। परिवारके नाते यह भी हमारा सम्बन्धी है। परन्तु यह पाण्डवोंके ही पक्षमें खड़ा है।

‘युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्’—पांचालदेशके बड़े बलवान् और वीर योद्धा युधामन्यु तथा उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुनके रथके पहियोंकी रक्षामें नियुक्त किये गये हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना।

[ रातमें सोते हुए इन दोनोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]

‘सौभद्रः’—यह कृष्णकी बहन सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भमें ही चक्रव्यूह-भेदनकी विद्या सीखी है। अतः चक्रव्यूह-रचनाके समय आप इसका खयाल रखें।

[ युद्धमें दुःशासनपुत्रके द्वारा अन्यायपूर्वक सिरपर गदाका प्रहार करनेसे अभिमन्यु मारे गये । ]

‘द्रौपदेयाश्च’—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन पाँचोंके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे क्रमशः प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा हुए हैं। इन पाँचोंको आप देख लीजिये। द्रौपदीने भरी सभामें मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदयको जलाया है, उसीके इन पाँचों पुत्रोंको युद्धमें मारकर आप उसका बदला चुकायें।

[ रातमें सोते हुए इन पाँचोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]

‘सर्व एव महारथाः’—ये सब-के-सब महारथी हैं। जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण हैं और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धरी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुषको ‘महारथी’ कहते हैं*। ऐसे बहुत-से महारथी पाण्डव-सेनामें खड़े हैं।

सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अतः वे पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू सन्धि क्यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंमें अपनी सेनाकी विशेषता बताता है।

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।

नायका मम सैन्यस्य सञ्जार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥

द्विजोत्तम= हे द्विजोत्तम !तान्= उनपर (भी आप)मम= मेरी
अस्माकम्= हमारे पक्षमेंनिबोध= ध्यान दीजिये ।सैन्यस्य= सेनाके (जो)
तु= भीते= आपकोनायकाः= नायक हैं,
ये= जोसञ्जार्थम्= याद दिलानेके लियेतान्= उनको (मैं)
विशिष्टाः= मुख्य (हैं),ब्रवीमि= कहता हूँ।

व्याख्या—‘अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’—दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ ! जैसे पाण्डवोंकी सेनामें श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोकमें ‘पश्य’ और यहाँ ‘निबोध’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखनेके लिये दुर्योधन ‘पश्य’ (देखिये) क्रियाका प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात्

  • एको दशसहस्राणि योधयेद् यस्तु ध्वनिनाम् । शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः ॥

श्लोक ८ ]

  • साधक-संजीवनी *

३३

अपनी सेनाकी तरफ द्रोणाचार्यकी पीठ है, इसलिये उसको देखनेकी बात न कहकर उसपर ध्यान देनेके लिये दुर्योधन 'निबोध' (ध्यान दीजिये) क्रियाका प्रयोग करता है।

'नायका मम सैन्यस्य सज्जार्थं तान्ब्रवीमि ते'—मेरी सेनामें भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलानेके लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचनेके लिये ही कह रहा हूँ।

'सज्जार्थम्' पदका तात्पर्य है कि हमारे बहुत-से सेनानायक हैं, उनके नाम मैं कहौंताक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं।

इस श्लोकमें दुर्योधनका ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परन्तु राजनीतिके अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्थामें भी शत्रुपक्षको कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपनेमें उपेक्षा, उदासीनता आदिकी भावना किंचिन्मात्र भी नहीं

आने देनी चाहिये। इसलिये सावधानीके लिये मैंने उनकी सेनाकी बात कही और अब अपनी सेनाकी बात कहता हूँ।

दूसरा भाव यह है कि पाण्डवोंकी सेनाको देखकर दुर्योधनपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मनमें कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्यामें कम होते हुए भी पाण्डव सेनाके पक्षमें बहुत-से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान् थे। जिस पक्षमें धर्म और भगवान् रहते हैं, उसका सबपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्तिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान् नित्य हैं। कितनी ही ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधनपर पाण्डव-सेनाका बड़ा असर पड़ा। परन्तु उसके भीतर भौतिक बलका विश्वास मुख्य होनेसे वह द्रोणाचार्यको विश्वास दिलानेके लिये कहता है कि हमारे पक्षमें जितनी विशेषता है, उतनी पाण्डवोंकी सेनामें नहीं है। अतः हम उनपर सहज ही विजय कर सकते हैं।

भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिज्जयः।

अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥

भवान् | = आप (द्रोणाचार्य) | कर्णः | = कर्ण | एव | = ही ---|---|---|---|---|--- च | = और | च | = और | अश्वत्थामा | = अश्वत्थामा, भीष्मः | = पितामह | समितिज्जयः | = संग्रामविजयी | विकर्णः | = विकर्ण भीष्म | | कृपः | = कृपाचार्य | च | = और च | = तथा | च | = तथा | सौमदत्तिः | = सोमदत्तका पुत्र | | तथा | = वैसे | | भूरिश्रवा।

व्याख्या— 'भवान् भीष्मश्च'—आप और पितामह भीष्म—दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनोंके समकक्ष संसारमें तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप दोनोंमेंसे कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करे, तो देवता, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनोंके पराक्रमकी बात जगत्में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, और इच्छामृत्यु हैं अर्थात् उनकी इच्छाके बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता।

[महाभारत-युद्धमें द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये

और पितामह भीष्मने अपनी इच्छासे ही सूर्यके उत्तरायण होनेपर अपने प्राणोंका त्याग कर दिया।]

'कर्णश्च'—कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्षमें है। [कर्ण महाभारत-युद्धमें अर्जुनके द्वारा मारे गये।]

'कृपश्च समितिज्जयः'—कृपाचार्यकी तो बात ही क्या है! वे तो चिरंजीवी हैं,* हमारे परम हितैषी हैं और सम्पूर्ण पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

  • अश्वत्थामा, बलि, वेदव्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय—ये आठ चिरंजीवी हैं। शास्त्रमें लिखा है—

अश्वत्थामा बलिव्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥ (पद्मपुराण ४९।७)

३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १

यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको

कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको

कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था।

इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा।

द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ

लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको 'संग्रामविजयी' विशेषण

देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।

'अश्वत्थामा'—ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही

पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र-

शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े

चतुर हैं।

'विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च'—आप यह न

समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी

मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही

हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाहीकके पौत्र तथा

सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-

बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और

महारथी हैं।

[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके

द्वारा मारे गये।]

यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव

मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म,

कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे

पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें

कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि

पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें

धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये

डरनेकी कोई बात नहीं है।

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।

नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥

अन्ये = इनके अतिरिक्त इच्छाका भी त्याग वाले हैं

बहवः = बहुत-से कर दिया है, (तथा जो)

शूराः = शूरवीर हैं, च = और सर्वे = सब-के-सब

(जिन्होंने) नानाशस्त्रप्रहरणाः = जो अनेक युद्धविशारदाः = युद्धकलामें

मदर्थे = मेरे लिये प्रकारके अस्त्र- अत्यन्त चतुर

त्यक्तजीविताः = अपने जीनेकी शस्त्रोंको चलाने- हैं।

व्याख्या—'अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त-

जीविताः'—मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके

नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाहीक,

शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं,

जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लड़नेके लिये अपने

जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी

विजयके लिये मर भले ही जायँ, पर युद्धसे हटेंगे नहीं।

उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ?

'नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः'—ये सभी

लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल

आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और

हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि

अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये;

किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना

चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि

युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।

सम्बन्ध—दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकनेसे

दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है—इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं*।

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमताष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥

  • संजय व्यासप्रदत्त दिव्य दृष्टिसे सैनिकोंके मनमें आयी बातको भी जान लेनेमें समर्थ थे—

प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति सञ्जयः॥

(महाभारत, भीष्म० २।११)