श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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त्याग करता है, ज्ञानयोगमें स्वयं ही स्वयंको जानता है और भक्तियोगमें स्वयं ही भगवान्के शरण होता है।
गीताकी इस 'साधक-संजीवनी' टीकामें भी साधनकी
टीकाके सम्बन्धमें
छोटी अवस्थामें ही मेरी गीतामें विशेष रुचि रही है। गीताका गम्भीरतापूर्वक मनन-विचार करनेसे तथा अनेक सन्त-महापुरुषोंके संग और वचनोंसे मुझे गीताके विषयको समझनेमें बड़ी सहायता मिली। गीतामें महान् संतोष देनेवाले अनन्त विचित्र-विचित्र भाव भरे पड़े हैं। उन भावोंको पूरी तरह समझनेकी और उनको व्यक्त करनेकी मेरेमें सामर्थ्य नहीं है। परन्तु जब कुछ गीताप्रेमी सज्जनोंने विशेष आग्रह किया, हठ किया, तब गीताके मार्मिक भावोंका अपनेको बोध हो जाय तथा और कोई मनन करे तो उसको भी इनका बोध हो जाय—इस दृष्टिसे गीताकी व्याख्या लिखवानेमें प्रवृत्ति हुई।
सबसे पहले एक बारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३०में 'गीताका भक्तियोग' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके कुछ वर्षोंके बाद तेरहवें और चौदहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जिसको संवत् २०३५ में 'गीताका ज्ञानयोग' नामसे प्रकाशित किया गया। इसको लिखवानेके बाद ऐसा विचार हुआ कि कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन योग हैं, अतः इन तीनों ही योगोंपर तीन पुस्तकें तैयार हो जायें तो ठीक रहेगा। इस दृष्टिसे पहले बारहवें अध्यायकी व्याख्याका संशोधन-परिवर्धन किया गया और उसके साथ पंद्रहवें अध्यायकी व्याख्याको भी सम्मिलित करके संवत् २०३९ में 'गीताका भक्तियोग' (द्वितीय संस्करण) नामसे प्रकाशित किया गया। फिर तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताका कर्मयोग' नामसे दो खण्डोंमें प्रकाशित किया गया। इसका प्रकाशन विलम्बसे संवत् २०४० में हुआ।
उपर्युक्त 'गीताका भक्तियोग', 'गीताका ज्ञानयोग' और 'गीताका कर्मयोग'—इन तीनों पुस्तकोंमें लिखनेकी शैली कुछ और रही अर्थात् पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक, फिर भावार्थ, फिर अन्वय और फिर पद-व्याख्या—इस शैलीसे लिखा गया। परन्तु इन तीनों पुस्तकोंके बाद लिखनेकी शैली बदल दी गयी अर्थात् पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक और फिर व्याख्या—इस शैलीसे लिखा गया। इसमें दूसरोंकी प्रेरणा भी रही। शैली बदलनेमें भाव यह रहा कि पाठ कुछ कम हो जाय और जल्दी लिखा जाय, जिससे पाठकोंको
करण-निरपेक्ष-शैलीको ही मुख्यता दी गयी है; क्योंकि साधकोंका शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक कल्याण कैसे हो—इस बातको सामने रखते हुए ही यह टीका लिखी गयी है।
पढ़नेमें अधिक समय न लगे और पुस्तक भी जल्दी तैयार होकर साधकोंके हाथ पहुँच जाय। इसी शैलीसे पहले सोलहवें और सत्रहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३९ में 'गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके बाद अठारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको संवत् २०३९ में 'गीताका सार' नामसे प्रकाशित किया गया।
जब सोलहवें, सत्रहवें और अठारहवें अध्यायकी व्याख्या छप गयी, तब किसोने कहा कि अगर श्लोकोंके अर्थ भी दे दिये जायें तो ठीक रहेगा; क्योंकि पहले पाठक श्लोकका अर्थ समझ लेगा, तो फिर व्याख्या समझनेमें सुविधा रहेगी। अतः 'गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा' के दूसरे संस्करण (संवत् २०४०)—में श्लोकोंके अर्थ भी दे दिये गये। श्लोकोंके अर्थ देनेके साथ-साथ पदोंकी व्याख्या करनेका क्रम भी कुछ बदल गया।
इसके बाद दसवें और ग्यारहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताकी विभूति और विश्वरूप-दर्शन' नामसे प्रकाशित किया गया। फिर सातवें, आठवें और नवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जिसको 'गीताकी राजविद्या' नामसे प्रकाशित किया गया। इसके बाद छठे अध्यायकी व्याख्या लिखवायी, जो 'गीताका ध्यानयोग' नामसे प्रकाशित की गयी। अन्तमें पहले और दूसरे अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। इसको 'गीताका आरम्भ' नामसे प्रकाशित किया गया। ये चारों पुस्तकें संवत् २०४९ में प्रकाशित हुई।
इस प्रकार भगवत्कृपासे पूरी गीताकी टीका अलग-अलग कुल दस खण्डोंमें गीताप्रेससे प्रकाशित हुई। इनको प्रकाशित करनेके कार्यमें कागज आदिकी कई कठिनाइयाँ आती रहीं, फिर भी सत्संगी भाइयोंके उद्योगसे इनको प्रकाशित करनेका कार्य चलता रहा। लोगोंने भी इन पुस्तकोंको उत्साह एवं प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया, जिससे कई पुस्तकोंके दो-दो, तीन-तीन संस्करण भी निकल गये।
इस टीकाको एक जगह बैठकर नहीं लिखवाया गया है और इसको पहले अध्यायसे लेकर अठारहवें अध्यायतक क्रमसे भी नहीं लिखवाया गया है। इसलिये इसमें पूर्वापरकी दृष्टिसे कई विरोध आ सकते हैं। परन्तु इससे साधकोंको कहीं
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भी बाधा नहीं लगेगी। कहीं-कहीं सिद्धान्तोंके विवेचनमें भी फरक पड़ा है; परन्तु कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीनों स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करानेवाले हैं—इसमें कोई फरक नहीं पड़ा है। टीका लिखवाते समय ‘साधकोंको शीघ्र लाभ कैसे हो’—ऐसा भाव रहा है। इस कारण टीकाकी भाषा, शैली आदिमें परिवर्तन होता रहा है।
इस टीकामें बहुत-से श्लोकोंका विवेचन दूसरी टीकाओंके विपरीत पड़ता है। परन्तु इसका तात्पर्य दूसरी टीकाओंको गलत बतानेमें किंचिन्मात्र भी नहीं है, प्रत्युत मेरेको जैसा निर्विवादरूपसे उचित, प्रकरण-संगत, युक्ति-युक्त, संतोषजनक और प्रिय मालूम दिया, वैसा ही विवेचन मैंने किया है। मेरा किसीके खण्डनका और किसीके मण्डनका भाव बिलकुल नहीं रहा है।
श्रीमद्भगवद्गीताका अर्थ बहुत ही गम्भीर है। इसका पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और विचार करनेसे बड़े ही विचित्र और नये-नये भाव स्फुरित होते रहते हैं, जिससे मन-बुद्धि चकित होकर तृप्त हो जाते हैं। टीका लिखवाते समय जब इन भावोंको लिखवानेका विचार होता, तब एक ऐसी विचित्र बाढ़ आ जाती कि कौन-कौन-से भाव लिखवाऊँ और कैसे लिखवाऊँ—इस विषयमें अपनेको बिलकुल ही अयोग्य पाता। फिर भी मेरे जो साथी हैं, आदरणीय मित्र हैं, उनके आग्रहसे कुछ लिखवा देता। वे उन भावोंको लिख लेते और संशोधित करके उनको पुस्तकरूपसे प्रकाशित करवा देते। फिर कभी उन पुस्तकोंको देखनेका काम पड़ता तो उनमें कई जगह कर्मियाँ मालूम देतीं और ऐसा मालूम देता कि पूरी बातें नहीं आयीं हैं, बहुत-सी बातें छूट गयीं हैं! इसलिये उनमें बार-बार संशोधन-परिवर्धन किया जाता रहा। अतः पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे पहले लिखे गये विषयकी अपेक्षा बादमें लिखे गये विषयको ही महत्त्व दें और उसीको स्वीकार करें।
पूरी गीताकी टीकाके अलग-अलग कई खण्ड रहनेसे
उनके पुनर्मूद्रणमें और उन सबके एक साथ प्राप्त होनेमें कठिनाई रहती है—ऐसा सोचकर अब पूरी गीताकी टीकाको एक जिल्दमें प्रस्तुत ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित किया गया है। ऐसा करनेसे पहले पूर्व-प्रकाशित सम्पूर्ण टीकाको एक बार पुनः देखा है और उसमें आवश्यक संशोधन, परिवर्तन और परिवर्धन भी किया है। तेरहवें और चौदहवें अध्यायकी व्याख्या भी दुबारा लिखवायी गयी है। भाषा और शैलीको भी लगभग एक समान बनानेकी चेष्टा की गयी है। कई बातोंको अनावश्यक समझकर हटा दिया है, कई नयी बातें जोड़ दी हैं और कई बातोंको एक स्थानसे हटाकर दूसरे यथोचित स्थानपर दे दिया है। जिन बातोंकी ज्यादा पुनरुक्तियाँ हुई हैं, उनको यथासम्भव हटा दिया है, पर सर्वथा नहीं। विशेष ध्यान देनेयोग्य बातोंकी पुनरुक्तियोंको साधकोंके लिये उपयोगी समझकर नहीं हटाया है। इस कार्यमें बहुत-सी भूलें भी हो सकती हैं, जिसके लिये मेरी पाठकोंसे करबद्ध क्षमा-याचना है। साथ ही पाठकोंसे यह प्रार्थना है कि उनको जो भूलें दिखायी दें, उनको वे सूचित करनेकी कृपा करें। इससे आगेके संस्करणमें उनका सुधार करनेमें सुविधा रहेगी।
गीतासे सम्बन्धित कई नये-नये विषयोंका, खोजपूर्ण निबन्धोंका एक संग्रह अलगसे तैयार किया गया है, जिसको ‘गीता-दर्पण’ नामसे प्रकाशित किया गया है।
गीताका मनन-विचार करनेसे और गीताकी टीका लिखवानेसे मुझे बहुत आध्यात्मिक लाभ हुआ है और गीताके विषयका बहुत स्पष्ट बोध भी हुआ है। दूसरे भाई-बहन भी यदि इसका मनन करेंगे, तो उनको भी आध्यात्मिक लाभ अवश्य होगा—ऐसी मेरी व्यक्तिगत धारणा है। गीताका मनन-विचार करनेसे लाभ होता है—इसमें मुझे कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।
कृष्णानुग्रहदायिका सकरुणा गीता समाराधिता
कर्मज्ञानविरागभक्तिरसिका मर्मार्थसंदर्शिका।
सोल्कण्ठ किल साधकैरनुदिनं पेपीयमाना सदा
कल्याणं परदेवतेव दिशती संजीवनी वर्धताम्॥*
विनीत—
स्वामी रामसुखदास
- कर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे परिपूर्ण इस करुणामयी गीताकी भलीभाँति उपासना की जाय (मनन किया जाय, अर्थको गहराईसे समझा जाय) तो यह भगवान् श्रीकृष्णकी कृपा प्रदान करनेवाली है। साधकोंके द्वारा उल्कण्ठापूर्वक सदा बार-बार पान की जानेवाली, गीताके पदोंका मार्मिक अर्थ दिखानेवाली और इष्टदेवके समान कल्याण प्रदान करनेवाली यह ‘साधक-संजीवनी’ निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
श्रीमद्भगवद्गीता
(साधक-संजीवनी हिन्दी-टीकासहित)
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपिस्थजम्बूलकचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।१ ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं कालिन्दीपुलिनोदरे किमपि यनीलं महो धावति।२ यावनिर्ऋजनमजं पुरुषं जरन्तं संचित्तयामि निखिले जगति स्फुरन्तम्। तावद् बलात् स्फुरति हन्त हृदन्तरे मे गोपस्य कोऽपि शिशुरऋजनपुञ्जमञ्जुः।३
१-जो गजके मुखवाले हैं, भूतगण आदिके द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुनके फलोंका बड़े सुन्दर ढंगसे भक्षण करनेवाले हैं, शोकका विनाश करनेवाले हैं और भगवती उमाके पुत्र हैं, उन विघ्नेश्वर गणेशजीके चरणकमलोंमें मैं प्रणाम करता हूँ।
२-योगीलोग ध्यानद्वारा वशीभूत मनसे किसी निर्गुण और निष्क्रिय परम ज्योतिको देखते हैं तो देखते रहें, पर हमारे लिये तो यमुनाके तटपर जो कोई नील तेज दौड़ रहा है, वही नेत्रोंमें चिरकालतक चकाचौंध पैदा करता रहे।
३-अहो! जब मैं सम्पूर्ण जगत्में स्फुरित होनेवाले निरंजन, अजन्मा और पुरातन पुरुषका चिन्तन करता हूँ, तब मेरे हृदयमें अंजनसमूहके समान काले वर्णवाला कोई गोपशिशु बलात् स्फुरित होने लगता है।
- श्रीमद्भगवद्गीता *
न विद्या येषां श्रीनं शरणमपीषन् च गुणाः परित्यक्ता लोकैरपि वृजिनयुक्ताः श्रुतिजडाः । शरणं यं तेऽपि प्रसृतगुणमाश्रित्य सुजना विमुक्तास्तं वन्दे यदुपतिमहं कृष्णममलम् ॥१ यस्य श्रीकरुणार्णवस्य करुणालेशेन बालो ध्रुवः स्वेष्टं प्राप्य समार्थधाम समगाद्रङ्गोऽप्यविन्दिच्छ्रयम् । याता मुक्तिमजामिलादिपतिताः शैलोऽपि पूज्योऽभवत् तं श्रीमाधवमाश्रितेष्टदमहं नित्यं शरणं भजे ॥२ वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥३ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥४
१-जिनके पास न विद्या है, न धन है, न कोई सहारा है; जिनमें न कोई गुण है, न वेद-शास्त्रोंका ज्ञान है; जिनको संसारके लोगोंने पापी समझकर त्याग दिया है, ऐसे मनुष्य भी जिन शरणागतपालक प्रभुकी शरण लेकर सन्त बन जाते और मुक्त हो जाते हैं, उन विश्वविख्यात गुणोंवाले अमलात्मा यदुनाथ भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।
२-जिन करुणासिन्धु भगवान्की करुणाके लेशमात्रसे बालक ध्रुवने अपनी इष्ट वस्तुको प्राप्त करके श्रेष्ठ पुरुषोंके लोकको प्राप्त किया, दरिद्र सुदामाने लक्ष्मीको प्राप्त किया, अजामिल आदि पापियोंने मुक्तिको प्राप्त किया और गोवर्धन पर्वत भी पूज्य बन गया, उन शरणागत भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले शरण्य भगवान् माधवका मैं नित्य भजन करता हूँ।
३-जो वसुदेवजीके पुत्र, दिव्यरूपधारी, कंस एवं चाणूरका नाश करनेवाले और देवकीजीके लिये परम आनन्दस्वरूप हैं, उन जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।
४-भगवान् श्रीकृष्ण और मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुनको तथा सरस्वती और वेदव्यासजीको नमस्कार करके फिर महाभारतका कथन करना चाहिये।
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
अथ प्रथमोऽध्यायः
अवतरणिका—
पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास समाप्त होनेपर जब प्रतिज्ञाके अनुसार अपना आधा राज्य माँगा, तब दुर्वाधनेने आधा राज्य तो क्या, तीखी सूईकी नोक-जितनी जमीन भी बिना युद्धके देनी स्वीकार नहीं की। अतः पाण्डवोंने माता कुन्तीकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पाण्डवों और कौरवोंका युद्ध होना निश्चित हो गया और तदनुसार दोनों ओरसे युद्धकी तैयारी होने लगी।
महर्षि वेदव्यासजीका धृतराष्ट्रपर बहुत स्नेह था। उस स्नेहके कारण उन्होंने धृतराष्ट्रके पास आकर कहा कि 'युद्ध होना और उसमें क्षत्रियोंका महान् संहार होना अवश्यम्भावी है, इसे कोई टाल नहीं सकता। यदि तुम युद्ध देखना चाहते हो तो मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे सकता हूँ, जिससे तुम यहीं बैठे-बैठे युद्धको अच्छी तरहसे देख सकते हो।' इसपर धृतराष्ट्रने कहा कि 'मैं जन्मभर अन्धा रहा, अब अपने कुलके संहारको मैं देखना नहीं चाहता; परन्तु युद्ध कैसे हो रहा है—यह समाचार जरूर सुनना चाहता हूँ।' तब व्यासजीने कहा कि 'मैं संजयको दिव्य दृष्टि देता हूँ, जिससे यह सम्पूर्ण युद्धको, सम्पूर्ण घटनाओंको, सैनिकोंके मनमें आयी हुई बातोंको भी जान लेगा, सुन लेगा, देख लेगा और सब बातें तुम्हें सुना भी देगा।' ऐसा कहकर व्यासजीने संजयको दिव्य दृष्टि प्रदान की।
निश्चित समयके अनुसार कुरुक्षेत्रमें युद्ध आरम्भ हुआ। दस दिनतक संजय युद्ध-स्थलमें ही रहे। जब पितामह भीष्म बाणोंके द्वारा रथसे गिरा दिये गये, तब संजयने हस्तिनापुरमें (जहाँ धृतराष्ट्र विराजमान थे) आकर धृतराष्ट्रको यह समाचार सुनाया। इस समाचारको सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ा दुःख हुआ और वे विलाप करने लगे। फिर उन्होंने संजयसे युद्धका सारा वृत्तान्त सुनानेके लिये कहा। भीष्मपर्वके चौबीसवें अध्यायतक संजयने युद्ध-सम्बन्धी बातें धृतराष्ट्रको सुनायीं। पचीसवें अध्यायके आरम्भमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछते हैं—
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—३
| सञ्जय | = | हे संजय।३ | युयुत्सवः | = | युद्धकी | पाण्डवाः | = | पाण्डुके पुत्रोंने |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धर्मक्षेत्रे | = | धर्मभूमि | इच्छावाले | एव | = | भी | ||
| कुरुक्षेत्रे | = | कुरुक्षेत्रमें | मामकाः | = | मेरे | किम् | = | क्या |
| समवेताः | = | इकट्ठे हुए | च | = | और | अकुर्वत | = | किया ? |
१-महाभारतमें कुल अठारह पर्व हैं। उन पर्वोंके अन्तर्गत कई अवान्तर पर्व भी हैं। उनमेंसे (भीष्मपर्वके अन्तर्गत) यह 'श्रीमद्भगवद्गीतापर्व' है, जो भीष्मपर्वके तेरहवें अध्यायसे आरम्भ होकर बयालीसवें अध्यायमें समाप्त होता है।
२-वैशम्पायन और जनमेजयके संवादके अन्तर्गत 'धृतराष्ट्र-संजय-संवाद' है और धृतराष्ट्र तथा संजयके संवादके अन्तर्गत 'श्रीकृष्णार्जुन-संवाद' है।
३-संजयका जन्म गवल्पाण नामक सूतसे हुआ था। ये मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे—'सञ्जयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्पाणात्' (महाभारत, आदि० ६३।१७)। ये धृतराष्ट्रके मन्त्री थे।
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
व्याख्या—‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’—कुरुक्षेत्रमें देवताओंने यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है।
यहाँ ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ पदोंमें ‘क्षेत्र’ शब्द देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है, प्रत्युत तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते—जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय—ऐसा विचार करके एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये यह भूमि चुनी गयी है।
संसारमें प्रायः तीन बातोंको लेकर लड़ाई होती है—भूमि, धन और स्त्री। इन तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देनेका तात्पर्य भी जमीनको लेकर लड़नेमें है। कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात् राजा कुरुकी जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवोंद्वारा पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके लिये लड़ाई करने आये हुए हैं।
यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये ‘कुरुक्षेत्रे’ पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही होता है। युद्ध—जैसा कार्य भी धर्मभूमि—तीर्थभूमिमें ही करते हैं, जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय, कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ पद आया है।
यहाँ आरम्भमें ‘धर्म’ पदसे एक और बात भी मालूम होती है। अगर आरम्भके ‘धर्म’ पदमेंसे ‘धर’ लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके ‘मम’ पदमेंसे ‘म’ लिया जाय, तो ‘धर्म’ शब्द बन जाता
है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है, अर्थात् धर्मका पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्य—कर्म करनेसे धर्मका अनुष्ठान हो जाता है।
इन ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ पदोंसे सभी मनुष्योंको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये, केवल अपने सुख—आरामकी दृष्टिसे नहीं; और कर्तव्य—अकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।
‘समवेता युयुत्सवः’—राजाओंके द्वारा बार—बार सन्धिकका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, भगवान् श्रीकृष्णके कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना युद्धके मैं तीखी सूर्यकी नोक—जितनी जमीन भी पाण्डवोंको नहीं दूँगा। तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र—दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं।
दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य राज्य—प्राप्तिका ही था। वह राज्य—प्राप्ति धर्मसे हो चाहे अधर्मसे, न्यायसे हो चाहे अन्यायसे, विहित रीतिसे हो चाहे निषिद्ध रीतिसे, किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना चाहिये—ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात् युद्धकी इच्छावाला था।
पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था कि हम चाहे जैसा जीवन—निर्वाह कर लेंगे, पर अपने धर्ममें बाधा नहीं आने देंगे, धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु जिस माँकी आज्ञासे युधिष्ठिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे विवाह किया था, उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी अर्थात् केवल माँके
१—यावद्भिर्दक्षिणया सूच्या विध्वेदग्रेण केशव। तावदध्वपरित्याभ्यं भूमेनः पाण्डवान् प्रति॥ (महाभारत, उडोगो १२७। २५) २—माता कुन्ती बड़ी सहिष्णु थी। कष्टसे बचकर सुख, आराम, राज्य आदि चाहना—यह बात उसमें नहीं थी। वहाँ एक ऐसी विलक्षण माता थी, जिसने भगवान्से विपत्तिका ही वरदान माँगा था। उसमें सुख—लोलुपता नहीं थी। परन्तु उसके मनमें दो बातोंको लेकर बड़ा दुःख था। पहली बात, राज्यके लिये कौरव—पाण्डव आपसमें लड़ते, चाहे जो करते, पर मेरी प्यारी पुत्रवधू द्रौपदीको इन दुर्योधनादि दुष्टोंने सभामें नग्न करना चाहा, अपमानित करना चाहा—ऐसी घृणित चेष्टा करना मनुष्यता नहीं है। यह बात माता कुन्तीको बहुत बुरी लगी।
श्लोक १ ]
- साधक-संजीवनी *
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आज्ञा-पालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुए हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे।
‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’ —पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचित-अनुचितका विचार न करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ ‘मामकाः’ ‘पदके अन्तर्गत कौरव’ और पाण्डव दोनों आ जाते हैं। फिर भी ‘पाण्डवाः’ पद अलग देनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमें समान भाव नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे, पर पाण्डवोंको अपना नहीं मानते थे।१ इस कारण उन्होंने अपने पुत्रोंके लिये ‘मामकाः’ और पाण्डुपुत्रोंके लिये ‘पाण्डवाः’ पदका प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह अपने घरोंमें, मुहल्लोंमें, गाँवोंमें, प्रान्तोंमें, देशोंमें, सम्प्रदायोंमें द्वैधीभाव अर्थात् ये अपने हैं, ये दूसरे हैं—ऐसा भाव न रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम, स्नेह नहीं होता, प्रत्युत कलह होती है।
यहाँ ‘पाण्डवाः’ पदके साथ ‘एव’ पद देनेका तात्पर्य है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया?
दूसरी बात, भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी ओरसे सन्धिकका प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आये तो दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, शकुनि आदिने भगवान्को पकड़कर कैद करना चाहा। इस बातको सुनकर कुन्तीके मनमें यह विचार हुआ कि अब इन दुष्टोंको जल्दी ही खत्म करना चाहिये। कारण कि इनके जीते रहनेसे इनके पाप बढ़ते ही चले जायेंगे, जिससे इनका बहुत नुकसान होगा। इन्हीं दो कारणोंसे माता कुन्तीने पाण्डवोंको युद्धके लिये आज्ञा दी थी।
१-यद्यपि ‘कौरव’ शब्दके अन्तर्गत धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधन आदि और पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिर आदि सभी आ जाते हैं, तथापि इस श्लोकमें धृतराष्ट्रने युधिष्ठिर आदिके लिये ‘पाण्डव’ शब्दका प्रयोग किया है। अतः व्याख्यामें ‘कौरव’ शब्द दुर्योधन आदिके लिये ही दिया गया है।
२-धृतराष्ट्रके मनमें द्वैधीभाव था कि दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि मेरे पुत्र नहीं हैं, प्रत्युत पाण्डुके पुत्र हैं। इस भावके कारण दुर्योधनका भीमको विष खिलाकर जलमें फेंक देना, लाक्षागृहमें पाण्डवोंको जलानेका प्रयत्न करना, युधिष्ठिरके साथ छलपूर्वक जुआ खेलना, पाण्डवोंका नाश करनेके लिये सेना लेकर वनमें जाना आदि कार्योंके करनेमें दुर्योधनको धृतराष्ट्रने कभी मना नहीं किया। कारण कि उनके भीतर यही भाव था कि अगर किसी तरह पाण्डवोंका नाश हो जाय, तो मेरे बेटोंका राज्य सुरक्षित रहेगा।
३-यहाँ आये ‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’का अलग-अलग वर्णन करनेकी दृष्टिसे ही आगे संजयके वचनोंमें ‘दुर्योधनः’ (१।१२) और ‘पाण्डवः’ (१।१४) शब्द प्रयुक्त हुए हैं।
['मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ —३ इनमेंसे पहले ‘मामकाः’ पदका उत्तर संजय आगेके (दूसरे) श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधनने पाण्डवोंकी सेनाको देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्य-मुख्य सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी सेनाके मुख्य-मुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रण-कौशल आदिकी प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर कौरव-सेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक ‘पाण्डवाः’ पदका उत्तर देंगे कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय भगवान् श्रीकृष्णने शंख बजाया। उसके बाद अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव आदिने अपने-अपने शंख बजाये, जिससे दुर्योधनकी सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी संजय पाण्डवोंकी बात कहते-कहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका प्रसंग आरम्भ कर देंगे।]
‘किमकुर्वत’ —‘किम्’ शब्दके तीन अर्थ होते हैं—विकल्प, निन्दा (आक्षेप) और प्रश्न।
युद्ध हुआ कि नहीं ? इस तरहका विकल्प तो यहाँ लिया नहीं जा सकता; क्योंकि दस दिनतक युद्ध हो चुका है, और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद संजय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना रहे हैं।
‘मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने यह क्या किया, जो कि युद्ध कर बैठे! उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था’—ऐसी निन्दा या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता; क्योंकि युद्ध तो
१८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक पूछनेका भाव नहीं था। है। धृतराष्ट्र संजयसे भिन्न-भिन्न प्रकारकी छोटी-बड़ी सब घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जाननेके
यहाँ ‘क्लिम्’ शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता लिये ही प्रश्न कर रहे हैं।
परिशिष्ट भाव— ‘मेरे पुत्र (मामकाः) और ‘पाण्डुके पुत्र’ (पाण्डवाः)—इस मतभेदसे ही राग-द्वेष पैदा हुए, जिससे लड़ाई हुई, हलचल हुई। धृतराष्ट्रके भीतर पैदा हुए राग-द्वेषका फल यह हुआ कि सौ-के-सौ कौरव मारे गये, पर पाण्डव एक भी नहीं मारा गया!
जैसे दही बिलोते हैं तो उसमें हलचल पैदा होती है, जिससे मक्खन निकलता है, ऐसे ही ‘मामकाः’ और ‘पाण्डवाः’ के भेदसे पैदा हुई हलचलसे अर्जुनेके मनमें कल्याणकी अभिलाषा जाग्रत् हुई, जिससे भगवद्गीतारूपी मक्खन निकला!
तात्पर्य यह हुआ कि धृतराष्ट्रके मनमें होनेवाली हलचलसे लड़ाई पैदा हुई और अर्जुनेके मनमें होनेवाली हलचलसे गीता प्रकट हुई!
सम्बन्ध—धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर संजय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं।
सज्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
संजय बोले—
| तदा | = उस समय | दृष्ट्वा | = देखकर | राजा | = राजा |
|---|---|---|---|---|---|
| व्यूढम् | = वज्रव्यूहसे | ||||
| खड़ी हुई | तु | = और | दुर्योधनः | = दुर्योधन (यह) | |
| पाण्डवानीकम् | = पाण्डव-सेनाको | आचार्यम् | = द्रोणाचार्यके | वचनम् | = वचन |
| उपसङ्गम्य | = पास जाकर | अब्रवीत् | = बोला। |
व्याख्या— ‘तदा’—जिस समय दोनों सेनाएँ युद्धके लिये खड़ी हुई थीं, उस समयकी बात संजय यहाँ ‘तदा’ पदसे कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्रका प्रश्न ‘युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इस विषयको सुननेके लिये ही है।
‘दृष्ट्वा’ पाण्डवानीकं व्यूढम्—पाण्डवोंकी वज्रव्यूह-से खड़ी सेनाको देखनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना बड़ी ही सुचारुरूपसे और एक ही भावसे खड़ी थी अर्थात् उनके सैनिकोंमें दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था। उनके पक्षमें धर्म और भगवान् श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्षमें धर्म और भगवान् होते हैं, उसका दूसरोंपर बड़ा असर
पड़ता है। इसलिये संख्यामें कम होनेपर भी पाण्डवोंकी सेनाका तेज (प्रभाव) था और उसका दूसरोंपर बड़ा असर पड़ता था। अतः पाण्डव-सेनाका दुर्योधनपर भी बड़ा असर पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्यके पास जाकर नीतियुक्त गंभीर वचन बोला है।
‘राजा दुर्योधनः’—दुर्योधनको राजा कहनेका तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रका सबसे अधिक अपनापन (मोह) दुर्योधनमें ही था। परम्पराकी दृष्टिसे भी युवराज दुर्योधन ही था। राज्यके सब कार्यकी देखभाल दुर्योधन ही करता था। धृतराष्ट्र तो नाममात्रके राजा थे। युद्ध होनेमें भी मुख्य हेतु दुर्योधन ही था। इन सभी कारणोंसे संजयने दुर्योधनके लिये
१-इस अध्यायमें तीन बार ‘दृष्ट्वा’ (देखकर) पदका प्रयोग हुआ है—पाण्डव-सेनाको देखकर दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास जाना (१।२); कौरव-सेनाको देखकर अर्जुनका धनुषको उठाना (१।२०); और अपने स्वजनों- (कुटुम्बियों-) को देखकर अर्जुनका मोहाविष्ट होना (१।२८)। इन तीनोंमेंसे दो ‘दृष्ट्वा’ तो आपसमें सेना देखनेके लिये आये हैं और एक ‘दृष्ट्वा’ स्वजनोंको देखनेके लिये आया है, जिससे अर्जुनका भाव बदल जाता है।
२-कौरव-सेनामें मतभेद था; क्योंकि दुर्योधन, दुःशासन आदि तो युद्ध करना चाहते थे, पर भीष्म, द्रोण, विकर्ण आदि युद्ध नहीं करना चाहते थे। यह नियम है कि जहाँ आपसमें मतभेद होता है, वहाँ तेज (प्रभाव) नहीं रहता—काँच कटोरो कुम्भ पय मोती मिनत् अवास। ताल घाव तिरिया कटक फाटा करे बिनास॥
श्लोक ३ ]
- साधक-संजीवनी *
२९
‘राजा’ शब्दका प्रयोग किया है।
‘आचार्यमुपसङ्ग्य’—द्रोणाचार्यके पास जानेमें मुख्यतः तीन कारण मालूम देते हैं—
(१) अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये अर्थात् द्रोणाचार्यके भीतर पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करके उनको अपने पक्षमें विशेषतासे करनेके लिये दुर्योधन द्रोणाचार्यके पास गया।
(२) व्यवहारमें गुरुके नाते आदर देनेके लिये भी द्रोणाचार्यके पास जाना उचित था।
(३) मुख्य व्यक्तिका सेनामें यथास्थान खड़े रहना बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। इसलिये दुर्योधनका द्रोणाचार्यके पास खुद जाना उचित ही था।
यहाँ शंका हो सकती है कि दुर्योधनको तो पितामह भीष्मके पास जाना चाहिये था, जो कि सेनापति थे। पर दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्यके पास ही क्यों गया? इसका समाधान यह है कि द्रोण और भीष्म—दोनों उभय-पक्षपाती थे अर्थात् वे कौरव और पाण्डव—दोनोंका ही पक्ष रखते थे। उन दोनोंमें भी द्रोणाचार्यको ज्यादा राजी करना था; क्योंकि द्रोणाचार्यके साथ दुर्योधनका गुरुके नाते तो स्नेह था, पर कुटुम्बके नाते स्नेह नहीं था; और अर्जुनपर द्रोणाचार्यकी विशेष कृपा थी। अतः उनको राजी
करनेके लिये दुर्योधनका उनके पास जाना ही उचित था। व्यवहारमें भी यह देखा जाता है कि जिसके साथ स्नेह नहीं है, उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये मनुष्य उसको ज्यादा आदर देकर राजी करता है।
दुर्योधनके मनमें यह विश्वास था कि भीष्मजी तो हमारे दादाजी ही हैं; अतः उनके पास न जाऊँ तो भी कोई बात नहीं है। न जानेसे अगर वे नाराज भी हो जायेंगे तो मैं किसी तरहसे उनको राजी कर लूँगा। कारण कि पितामह भीष्मके साथ दुर्योधनका कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था ही, भीष्मका भी उसके साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध और स्नेह था। इसलिये भीष्मजीने दुर्योधनको राजी करनेके लिये जोरसे शंख बजाया है (पहले अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।
‘वचनमब्रवीत्’—यहाँ ‘अब्रवीत्’ कहना ही पर्याप्त था; क्योंकि ‘अब्रवीत्’ क्रियाके अन्तर्गत ही ‘वचनम्’ आ जाता है अर्थात् दुर्योधन बोलेगा, तो वचन ही बोलेगा। इसलिये यहाँ ‘वचनम्’ शब्दकी आवश्यकता नहीं थी। फिर भी ‘वचनम्’ शब्द देनेका तात्पर्य है कि दुर्योधन नीतियुक्त गम्भीर वचन बोलता है, जिससे द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा हो जाय और वे हमारे ही पक्षमें रहते हुए ठीक तरहसे युद्ध करें। जिससे हमारी विजय हो जाय, हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाय।
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधन क्या वचन बोला—इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्यं महतीं चमूम्। व्यूहां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥ ३ ॥
| आचार्य | = हे आचार्य! | धृष्टद्युम्नके | पाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डवोंकी |
|---|---|---|---|
| तव | = आपके | द्वारा | एताम् = इस |
| धीमता | = बुद्धिमान् | व्यूहरचनासे | महतीम् = बड़ी भारी |
| शिष्येण | = शिष्य | खड़ी | चमूम् = सेनाको |
| द्रुपदपुत्रेण | = द्रुपदपुत्र | की हुई | पश्य = देखिये! |
व्याख्या—‘आचार्य’—द्रोणके लिये ‘आचार्य’ सम्बोधन देनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि आप हम सबके—कौरवों और पाण्डवोंके आचार्य हैं। शस्त्रविद्या सिखानेवाले होनेसे आप सबके गुरु हैं। इसलिये आपके मनमें किसीका पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये।
दुर्योधनका भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने मारनेके लिये पैदा होनेवाले धृष्टद्युम्नको भी आपने अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टद्युम्न इतना बुद्धिमान् है कि उसने आपको मारनेके लिये आपसे ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है।
‘तव शिष्येण धीमता’—इन पदोंका प्रयोग करनेमें
‘द्रुपदपुत्रेण’—यह पद कहनेका आशय है कि आपको
३०
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
मारनेके उद्देश्यको लेकर ही द्रुपदने याज और उपयाज नामक ब्राह्मणोंसे यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न पैदा हुआ। वही यह द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आपके सामने (प्रतिपक्षमें) सेनापतिके रूपमें खड़ा है।
यद्यपि दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्र'के स्थानपर 'धृष्टद्युम्न' भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्यके साथ द्रुपद जो वैर रखता था, उस वैरभावको याद दिलानेके लिये दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्रेण' शब्दका प्रयोग करता है कि अब वैर निकालनेका अच्छा मौका है।
'पाण्डुपुत्राणाम् एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य'—द्रुपदपुत्रके द्वारा पाण्डवोंकी इस व्यूहाकार खड़ी हुई बड़ी भारी सेनाको देखिये। तात्पर्य है कि जिन पाण्डवोंपर आप स्नेह रखते हैं, उन्हीं पाण्डवोंने आपके प्रतिपक्षमें खास आपको मारनेवाले द्रुपदपुत्रको सेनापति बनाकर व्यूह-रचना करनेका अधिकार दिया है। अगर पाण्डव आपसे स्नेह रखते तो कम-से-कम आपको मारनेवालेको तो अपनी सेनाका मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार तो नहीं देते। परन्तु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसीको सेनापति बनाया है।
यद्यपि कौरवोंकी अपेक्षा पाण्डवोंकी सेना संख्यामें कम थी अर्थात् कौरवोंकी सेना ग्यारह अक्षौहिणी* और पाण्डवोंकी सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी बता रहा है। पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी कहनेमें दो भाव मालूम देते हैं—
(१) पाण्डवोंकी सेना ऐसे ढंगसे व्यूहाकार खड़ी हुई थी, जिससे दुर्योधनको थोड़ी सेना भी बहुत बड़ी दीख रही थी और (२) पाण्डव-सेनामें सब-के-सब योद्धा एक मतके थे। इस एकताके कारण पाण्डवोंकी थोड़ी सेना भी बलमें, उत्साहमें बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेनाको दिखकर दुर्योधन द्रोणाचार्यसे यह कहना चाहता है कि युद्ध करते समय आप इस सेनाको सामान्य और छोटी न समझें। आप विशेष बल लगाकर सावधानीसे युद्ध करें। पाण्डवोंका सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपदपुत्र ही; अतः उसपर विजय करना आपके लिये कौन-सी बड़ी बात है!
'एतां पश्य' कहनेका तात्पर्य है कि यह पाण्डव-सेना युद्धके लिये तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः हमलोग इस सेनापर किस तरहसे विजय कर सकते हैं—इस विषयमें आपको जल्दी-से-जल्दी निर्णय लेना चाहिये।
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यसे पाण्डवोंकी सेना देखनेके लिये प्रार्थना करके अब दुर्योधन उन्हें पाण्डव-सेनाके महारथियोंको दिखाता है।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४ ॥
धृष्टकेतुश्चैकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ५ ॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
| अत्र | = यहाँ (पाण्डवों-की सेनामें) | धनुष है | (सात्यकि), |
|---|---|---|---|
| शूराः | = बड़े-बड़े शूरवीर हैं, | च | = तथा (जो) |
| महेष्वासाः | = (जिनके) बहुत बड़े-बड़े | युधि | = युद्धमें |
| भीमार्जुनसमाः | = भीम और अर्जुनके समान हैं। (उनमें) | ||
| युयुधानः | = युयुधान | ||
| विराटः = राजा विराट | |||
| च = और | |||
| महारथः = महारथी | |||
| द्रुपदः = द्रुपद (भी हैं।) | |||
| धृष्टकेतुः = धृष्टकेतु |
- एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०१,३५० पैदल सैनिक होते हैं। (महाभारत, आदि० २। २३—२६)
श्लोक ४—६ ]
- साधक-संजीवनी *
३१
च = और चेकितानः = चेकितान च = तथा वीर्यवान् = पराक्रमी काशिराजः = काशिराज (भी हैं।) पुरुजित् = पुरुजित् च = और कृन्तिभोजः = कृन्तिभोज (—ये
च दोनों भाई) च = तथा नरपुङ्गवः = मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्यः = शैब्य (भी हैं।) विक्रान्तः = पराक्रमी युधामन्युः = युधामन्यु च = और वीर्यवान् = पराक्रमी
उत्तमौजाः = उत्तमौजा (भी हैं।) सौभद्रः = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु च = और द्रौपदेयाः = द्रौपदीके पाँचों पुत्र (भी हैं।) सर्वे, एव = (ये) सब-के-सब महारथाः = महारथी हैं।
व्याख्या—‘अत्र शूरा महेष्वास भीमार्जुनसमा युधि’— जिनसे बाण चलाये जाते हैं, फेंके जाते हैं, उनका नाम ‘इष्वास’ अर्थात् धनुष है। ऐसे बड़े-बड़े इष्वास (धनुष) जिनके पास हैं, वे सभी ‘महेष्वास’ हैं। तात्पर्य है कि बड़े धनुषोंपर बाण चढ़ाने एवं प्रत्यंचा खींचनेमें बहुत बल लगता है। जोरसे खींचकर छोड़ा गया बाण विशेष मार करता है। ऐसे बड़े-बड़े धनुष पासमें होनेके कारण ये सभी बहुत बलवान् और शूरवीर हैं। ये मामूली योद्धा नहीं हैं। युद्धमें ये भीम और अर्जुनके समान हैं अर्थात् बलमें ये भीमके समान और अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये अर्जुनके समान हैं।
‘युयुधानः’— ‘युयुधान-(सात्यकि-) ने अर्जुनसे अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी थी। इसलिये भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा दुर्योधनको नारायणी सेना देनेपर भी वह कृतज्ञ होकर अर्जुनके पक्षमें ही रहा, दुर्योधनके पक्षमें नहीं गया। द्रोणाचार्यके मनमें अर्जुनके प्रति द्वेषभाव पैदा करनेके लिये दुर्योधन महारथियोंमें सबसे पहले अर्जुनके शिष्य युयुधानका नाम लेता है। तात्पर्य है कि इस अर्जुनको तो देखिये! इसने आपसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा है और आपने अर्जुनको यह वरदान भी दिया है कि संसारमें तुम्हारे समान और कोई धनुर्धर न हो, ऐसा प्रयत्न करूँगा*। इस तरह आपने तो अपने शिष्य अर्जुनपर इतना स्नेह रखा है, पर वह कृतघ्न होकर आपके विपक्षमें लड़नेके लिये खड़ा है, जबकि अर्जुनका शिष्य युयुधान उसीके पक्षमें खड़ा है।
[युयुधान महाभारतके युद्धमें न मरकर यादवोंके आपसी युद्धमें मारे गये।]
‘विराटश्च’— जिसके कारण हमारे पक्षका वीर सुशर्मा अपमानित किया गया, आपको सम्मोहन-अस्त्रसे मोहित
होना पड़ा और हमलोगोंको भी जिसकी गायें छोड़कर युद्धसे भागना पड़ा, वह राजा विराट आपके प्रतिपक्षमें खड़ा है।
राजा विराटके साथ द्रोणाचार्यका ऐसा कोई वैरभाव या द्वेषभाव नहीं था; परन्तु दुर्योधन यह समझता है कि अगर युयुधानके बाद मैं द्रुपदका नाम लूँ तो द्रोणाचार्यके मनमें यह भाव आ सकता है कि दुर्योधन पाण्डवोंके विरोधमें मेरेको उकसाकर युद्धके लिये विशेषतासे प्रेरणा कर रहा है तथा मेरे मनमें पाण्डवोंके प्रति वैरभाव पैदा कर रहा है। इसलिये दुर्योधन द्रुपदके नामसे पहले विराटका नाम लेता है, जिससे द्रोणाचार्य मेरी चालाकी न समझ सकें और विशेषतासे युद्ध करें।
[राजा विराट उत्तर, श्वेत और शंख नामक तीनों पुत्रोंसहित महाभारत-युद्धमें मारे गये।]
‘द्रुपदश्च महारथः’— आपने तो द्रुपदको पहलेकी मित्रता याद दिलायी, पर उसने सभामें यह कहकर आपका अपमान किया कि मैं राजा हूँ और तुम भिक्षुक हो; अतः मेरी-तुम्हारी मित्रता कैसी? तथा वैरभावके कारण आपको मारनेके लिये पुत्र भी पैदा किया, वही महारथी द्रुपद आपसे लड़नेके लिये विपक्षमें खड़ा है।
[राजा द्रुपद युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।]
‘धृष्टकेतुः’— यह धृष्टकेतु कितना मूर्ख है कि जिसके पिता शिशुपालको कृष्णने भरी सभामें चक्रसे मार डाला था, उसी कृष्णके पक्षमें यह लड़नेके लिये खड़ा है!
[धृष्टकेतु द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।]
‘चेकितानः’— सब यादवसेना तो हमारी ओरसे लड़नेके लिये तैयार है और यह यादव चेकितान पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है!
- प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः। त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥
(महाभारत, आदि० १३१। २७)
३२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
[ चैकितान दुर्योधनके हाथसे मारे गये । ]
‘काशिराजश्च वीर्यवान्’—यह काशिराज बड़ा ही शूरवीर और महारथी है। यह भी पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा है। इसलिये आप सावधानीसे युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा पराक्रमी है।
[ काशिराज महाभारत-युद्धमें मारे गये । ]
‘पुरुजित्कुन्तिभोजश्च’—यद्यपि पुरुजित् और कुन्तिभोज—ये दोनों कुन्तीके भाई होनेसे हमारे और पाण्डवोंके मामा हैं, तथापि इनके मनमें पक्षपात होनेके कारण ये हमारे विपक्षमें युद्ध करनेके लिये खड़े हैं।
[ पुरुजित् और कुन्तिभोज—दोनों ही युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये । ]
‘शैब्यश्च नरपुद्गवः’—यह शैब्य युधिष्ठिरका श्वशुर है। यह मनुष्योंमें श्रेष्ठ और बहुत बलवान् है। परिवारके नाते यह भी हमारा सम्बन्धी है। परन्तु यह पाण्डवोंके ही पक्षमें खड़ा है।
‘युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्’—पांचालदेशके बड़े बलवान् और वीर योद्धा युधामन्यु तथा उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुनके रथके पहियोंकी रक्षामें नियुक्त किये गये हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना।
[ रातमें सोते हुए इन दोनोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]
‘सौभद्रः’—यह कृष्णकी बहन सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भमें ही चक्रव्यूह-भेदनकी विद्या सीखी है। अतः चक्रव्यूह-रचनाके समय आप इसका खयाल रखें।
[ युद्धमें दुःशासनपुत्रके द्वारा अन्यायपूर्वक सिरपर गदाका प्रहार करनेसे अभिमन्यु मारे गये । ]
‘द्रौपदेयाश्च’—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन पाँचोंके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे क्रमशः प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा हुए हैं। इन पाँचोंको आप देख लीजिये। द्रौपदीने भरी सभामें मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदयको जलाया है, उसीके इन पाँचों पुत्रोंको युद्धमें मारकर आप उसका बदला चुकायें।
[ रातमें सोते हुए इन पाँचोंको अश्वत्थामाने मार डाला । ]
‘सर्व एव महारथाः’—ये सब-के-सब महारथी हैं। जो शास्त्र और शास्त्रविद्या—दोनोंमें प्रवीण हैं और युद्धमें अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धरी योद्धाओंका संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुषको ‘महारथी’ कहते हैं*। ऐसे बहुत-से महारथी पाण्डव-सेनामें खड़े हैं।
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अतः वे पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है, तो उनके साथ तू सन्धि क्यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंमें अपनी सेनाकी विशेषता बताता है।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्जार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
| द्विजोत्तम | = हे द्विजोत्तम ! | तान् | = उनपर (भी आप) | मम | = मेरी |
|---|---|---|---|---|---|
| अस्माकम् | = हमारे पक्षमें | निबोध | = ध्यान दीजिये । | सैन्यस्य | = सेनाके (जो) |
| तु | = भी | ते | = आपको | नायकाः | = नायक हैं, |
| ये | = जो | सञ्जार्थम् | = याद दिलानेके लिये | तान् | = उनको (मैं) |
| विशिष्टाः | = मुख्य (हैं), | ब्रवीमि | = कहता हूँ। |
व्याख्या—‘अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम’—दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ ! जैसे पाण्डवोंकी सेनामें श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। तीसरे श्लोकमें ‘पश्य’ और यहाँ ‘निबोध’ क्रिया देनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये उसको देखनेके लिये दुर्योधन ‘पश्य’ (देखिये) क्रियाका प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात्
- एको दशसहस्राणि योधयेद् यस्तु ध्वनिनाम् । शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः ॥
श्लोक ८ ]
- साधक-संजीवनी *
३३
अपनी सेनाकी तरफ द्रोणाचार्यकी पीठ है, इसलिये उसको देखनेकी बात न कहकर उसपर ध्यान देनेके लिये दुर्योधन 'निबोध' (ध्यान दीजिये) क्रियाका प्रयोग करता है।
'नायका मम सैन्यस्य सज्जार्थं तान्ब्रवीमि ते'—मेरी सेनामें भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलानेके लिये, आपकी दृष्टि उधर खींचनेके लिये ही कह रहा हूँ।
'सज्जार्थम्' पदका तात्पर्य है कि हमारे बहुत-से सेनानायक हैं, उनके नाम मैं कहौंताक कहूँ; इसलिये मैं उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको जानते ही हैं।
इस श्लोकमें दुर्योधनका ऐसा भाव प्रतीत होता है कि हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परन्तु राजनीतिके अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्थामें भी शत्रुपक्षको कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपनेमें उपेक्षा, उदासीनता आदिकी भावना किंचिन्मात्र भी नहीं
आने देनी चाहिये। इसलिये सावधानीके लिये मैंने उनकी सेनाकी बात कही और अब अपनी सेनाकी बात कहता हूँ।
दूसरा भाव यह है कि पाण्डवोंकी सेनाको देखकर दुर्योधनपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मनमें कुछ भय भी हुआ। कारण कि संख्यामें कम होते हुए भी पाण्डव सेनाके पक्षमें बहुत-से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान् थे। जिस पक्षमें धर्म और भगवान् रहते हैं, उसका सबपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट व्यक्तिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। कारण कि धर्म और भगवान् नित्य हैं। कितनी ही ऊँची-से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य ही। इसलिये दुर्योधनपर पाण्डव-सेनाका बड़ा असर पड़ा। परन्तु उसके भीतर भौतिक बलका विश्वास मुख्य होनेसे वह द्रोणाचार्यको विश्वास दिलानेके लिये कहता है कि हमारे पक्षमें जितनी विशेषता है, उतनी पाण्डवोंकी सेनामें नहीं है। अतः हम उनपर सहज ही विजय कर सकते हैं।
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिज्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥
भवान् | = आप (द्रोणाचार्य) | कर्णः | = कर्ण | एव | = ही ---|---|---|---|---|--- च | = और | च | = और | अश्वत्थामा | = अश्वत्थामा, भीष्मः | = पितामह | समितिज्जयः | = संग्रामविजयी | विकर्णः | = विकर्ण भीष्म | | कृपः | = कृपाचार्य | च | = और च | = तथा | च | = तथा | सौमदत्तिः | = सोमदत्तका पुत्र | | तथा | = वैसे | | भूरिश्रवा।
व्याख्या— 'भवान् भीष्मश्च'—आप और पितामह भीष्म—दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनोंके समकक्ष संसारमें तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप दोनोंमेंसे कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करे, तो देवता, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी नहीं है, जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनोंके पराक्रमकी बात जगत्में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो आबाल ब्रह्मचारी हैं, और इच्छामृत्यु हैं अर्थात् उनकी इच्छाके बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता।
[महाभारत-युद्धमें द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके द्वारा मारे गये
और पितामह भीष्मने अपनी इच्छासे ही सूर्यके उत्तरायण होनेपर अपने प्राणोंका त्याग कर दिया।]
'कर्णश्च'—कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्षमें है। [कर्ण महाभारत-युद्धमें अर्जुनके द्वारा मारे गये।]
'कृपश्च समितिज्जयः'—कृपाचार्यकी तो बात ही क्या है! वे तो चिरंजीवी हैं,* हमारे परम हितैषी हैं और सम्पूर्ण पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
- अश्वत्थामा, बलि, वेदव्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय—ये आठ चिरंजीवी हैं। शास्त्रमें लिखा है—
अश्वत्थामा बलिव्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः ॥ (पद्मपुराण ४९।७)
३४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १
यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको
कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको
कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था।
इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा।
द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ
लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको 'संग्रामविजयी' विशेषण
देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है।
'अश्वत्थामा'—ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही
पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र-
शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े
चतुर हैं।
'विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च'—आप यह न
समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी
मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही
हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाहीकके पौत्र तथा
सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी-
बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और
महारथी हैं।
[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके
द्वारा मारे गये।]
यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव
मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म,
कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान् पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे
पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें
कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि
पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें
धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये
डरनेकी कोई बात नहीं है।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥
अन्ये = इनके अतिरिक्त इच्छाका भी त्याग वाले हैं
बहवः = बहुत-से कर दिया है, (तथा जो)
शूराः = शूरवीर हैं, च = और सर्वे = सब-के-सब
(जिन्होंने) नानाशस्त्रप्रहरणाः = जो अनेक युद्धविशारदाः = युद्धकलामें
मदर्थे = मेरे लिये प्रकारके अस्त्र- अत्यन्त चतुर
त्यक्तजीविताः = अपने जीनेकी शस्त्रोंको चलाने- हैं।
व्याख्या—'अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त-
जीविताः'—मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके
नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाहीक,
शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं,
जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लड़नेके लिये अपने
जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी
विजयके लिये मर भले ही जायँ, पर युद्धसे हटेंगे नहीं।
उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ?
'नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः'—ये सभी
लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल
आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और
हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि
अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये;
किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना
चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि
युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं।
सम्बन्ध—दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले, तब अपनी चालाकी न चल सकनेसे
दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है—इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं*।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमताष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥
- संजय व्यासप्रदत्त दिव्य दृष्टिसे सैनिकोंके मनमें आयी बातको भी जान लेनेमें समर्थ थे—
प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति सञ्जयः॥
(महाभारत, भीष्म० २।११)
श्लोक १० ]
- साधक-संजीवनी *
३५
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
द्रोणाचार्यको चुप देखकर दुर्योधनके मनमें विचार हुआ कि वास्तवमें—
अस्माकम् = हमारी तत् = वह बलम् = सेना (पाण्डवोंपर विजय करनेमें) अपर्याप्तम् = अपर्याप्त है, असमर्थ है; (क्योंकि) | भीष्माभिरक्षितम् = उसके संरक्षक (उभयपक्षपाती) भीष्म हैं। तु = परन्तु एतेषाम् = इन पाण्डवोंकी इदम् = यह बलम् = सेना (हमपर) | विजय करनेमें) पर्याप्तम् = पर्याप्त है, समर्थ है; (क्योंकि) भीमाभिरक्षितम् = इसके संरक्षक (निजसेनापक्षपाती) भीमसेन हैं। ---|---|---
व्याख्या—‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’ —अर्थ—अन्यायके कारण दुर्योधनके मनमें भय होनेसे वह अपनी सेनाके विषयमें सोचता है कि हमारी सेना बड़ी होनेपर भी अर्थात् पाण्डवोंकी अपेक्षा चार अक्षौहिणी अधिक होनेपर भी पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेमें है तो असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेनामें मतभेद है। उसमें इतनी एकता (संगठन), निर्भयता, निःसंकोचता नहीं है, जितनी कि पाण्डवोंकी सेनामें है। हमारी सेनाके मुख्य संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात् उनके भीतर कौरव और पाण्डव—दोनों सेनाओंका पक्ष है। वे कृष्णके बड़े भक्त हैं। उनके हृदयमें युधिष्ठिरका बड़ा आदर है। अर्जुनपर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिये वे हमारे पक्षमें रहते हुए भी भीतरसे पाण्डवोंका भला चाहते हैं। वे ही भीष्म हमारी सेनाके मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशामें हमारी सेना पाण्डवोंके मुकाबलेमें कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं हो सकती।
‘पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्’ —परन्तु यह जो पाण्डवोंकी सेना है, यह हमारेपर विजय करनेमें समर्थ है। कारण कि इनकी सेनामें मतभेद नहीं है, प्रत्युत सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेनाका संरक्षक बलवान् भीमसेन है, जो कि बचपनसे ही मेरेको हराता आया है। यह अकेला ही मेरेसहित सौ भाइयोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात् यह हमारा नाश करनेपर तुला हुआ है! इसका शरीर वज्रके समान मजबूत है। इसको मैंने
जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन पाण्डवोंकी सेनाका संरक्षक है, इसलिये यह सेना वास्तवमें समर्थ है, पूर्ण है।
यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधनने अपनी सेनाके संरक्षकके लिये भीष्मजीका नाम लिया, जो कि सेनापतिके पदपर नियुक्त हैं। परन्तु पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं हैं। इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियोंकी बात नहीं सोच रहा है; किन्तु दोनों सेनाओंकी शक्तिके विषयमें सोच रहा है कि किस सेनाकी शक्ति अधिक है? दुर्योधनपर आरम्भसे ही भीमसेनकी शक्तिका, बलवत्ताका अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अतः वह पाण्डव-सेनाके संरक्षकके लिये भीमसेनका ही नाम लेता है।
विशेष बात
अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर किसीके पास न जाकर हाथमें धनुष उठाते हैं (गीता—पहले अध्यायका बीसवाँ श्लोक), पर दुर्योधन पाण्डवसेनाको देखकर द्रोणाचार्यके पास जाता है और उनसे पाण्डवोंकी व्यूहरचनायुक्त सेनाको देखनेके लिये कहता है। इससे सिद्ध होता है कि दुर्योधनके हृदयमें भय बैठा हुआ है*। भीतरमें भय होनेपर भी वह चालाकीसे द्रोणाचार्यको प्रसन्न करना चाहता है, उनको पाण्डवोंके विरुद्ध उकसाना चाहता है। कारण कि दुर्योधनके हृदयमें अर्थम है, अन्याय है, पाप है। अन्यायी, पापी व्यक्ति कभी निर्भय और सुख-शान्तिसे नहीं रह सकता—
- जब कौरवोंकी सेनाके शंख आदि बाजे बजे, तब उनके शब्दका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं पड़ा। परन्तु जब पाण्डवोंकी सेनाके शंख बजे, तब उनके शब्दसे दुर्योधन आदिके हृदय विदीर्ण हो गये (१।१३,१९)। इससे सिद्ध होता है कि अर्थम—अन्यायका पक्ष लेनेके कारण दुर्योधन आदिके हृदय कमजोर हो गये थे और उनमें भय बैठा हुआ था।
३६
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
यह नियम है। परन्तु अर्जुनके भीतर धर्म है, न्याय है। इसलिये अर्जुनके भीतर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये चालाकी नहीं है, भय नहीं है; किन्तु उत्साह है, वीरता है। तभी तो वे वीरतामें आकर सेना-निरीक्षण करनेके लिये भगवान्को आज्ञा देते हैं कि 'हे अच्युत! दोनों सेनाओंके मध्यमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये' (पहले अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)। इसका तात्पर्य है कि जिसके भीतर नाशवान् धन-सम्पत्ति आदिका आश्रय है, आदर है और जिसके भीतर अधर्म है, अन्याय है, दुर्भाव है, उसके भीतर वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतरसे खोखला होता है
परिशिष्ट भाव —अर्जुनने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान् श्रीकृष्णको स्वीकार किया था* और दुर्घोधनने भगवान्को छोड़कर उनकी नारायणी सेनाको स्वीकार किया था। तात्पर्य है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्पर थी और दुर्घोधनकी दृष्टि वैभवपर थी। जिसकी दृष्टि भगवान्पर होती है, उसका हृदय बलवान् होता है; क्योंकि भगवान्का बल सच्चा है। परन्तु जिसकी दृष्टि सांसारिक वैभवपर होती है, उसका हृदय कमजोर होता है; क्योंकि संसारका बल कच्चा है।
सम्बन्ध—अब दुर्घोधन पितामह भीष्मको प्रसन्न करनेके लिये अपनी सेनाके सभी महारथियोंसे कहता है—
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ ११ ॥
| च | = दुर्घोधन बाह्यदृष्टिसे | लोग | रहते हुए |
|---|---|---|---|
| अपनी सेनाके | सर्वेषु | = सभी | हि = निश्चितरूपसे |
| महारथियोंसे | अयनेषु | = मोर्चांपर | भीष्मम् = पितामह भीष्मकी |
| बोला— | यथाभागम् | = अपनी-अपनी | एव = ही |
| भवन्तः | = आप | जगह | अभिरक्षन्तु = चारों ओरसे रक्षा |
| सर्वे, एव | = सब-के-सब | अवस्थिताः | = दृढ़तासे स्थित करें। |
व्याख्या —'अयनेषु च सर्वेषु....भवन्तः सर्व एव हि'—जिन-जिन मोर्चांपर आपकी नियुक्ति कर दी गयी है, आप सभी योद्धालोग उहाँ मोर्चांपर दृढ़तासे स्थित रहते हुए सब तरफसे, सब प्रकारसे भीष्मजीकी रक्षा करें।
भीष्मजीकी सब ओरसे रक्षा करें—यह कहकर दुर्घोधन भीष्मजीको भीतरसे अपने पक्षमें लाना चाहता है। ऐसा कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब भीष्मजी युद्ध करें, तब किसी भी व्यूहद्वारसे शिखण्डी उनके सामने न आ जाय—इसका आपलोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उसपर शस्त्रास्त्र नहीं
और वह कभी निर्भय नहीं होता। परन्तु जिसके भीतर अपने धर्मका पालन है और भगवान्का आश्रय है, वह कभी भयभीत नहीं होता। उसका बल सच्चा होता है। वह सदा निश्चित और निर्भय रहता है। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकोंको अधर्म, अन्याय आदिका सर्वथा त्याग करके और एकमात्र भगवान्का आश्रय लेकर भगवत्प्रीत्यर्थ अपने धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। भौतिक सम्पत्तिको महत्त्व देकर और संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें फँसकर कभी अधर्मका आश्रय नहीं लेना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंसे मनुष्यका कभी हित नहीं होता, प्रत्युत अहित ही होता है।
चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्ममें भी स्त्री था और इस जन्ममें भी पहले स्त्री था, पीछे पुरुष बना है। इसलिये भीष्मजी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है। यह शिखण्डी शंकरके वरदानसे भीष्मजीको मारनेके लिये ही पैदा हुआ है। अतः जब शिखण्डीसे भीष्मजीकी रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बातको लेकर दुर्घोधन सभी महारथियोंसे भीष्मजीकी रक्षा करनेके लिये कह रहा है।
- एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः। अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम् ॥ (महा, उद्योग ७।२१)
'श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र धनंजयने संग्रामभूमिमें (अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एक अक्षौहिणी नारायणी सेनाको छोड़कर) युद्ध न करनेवाले निःशस्त्र उन भगवान् श्रीकृष्णको ही (अपना सहायक) चुना।'
लोक १२]
- साधक-संजीवनी *
३७
सम्बन्ध—द्रोणाचार्यके द्वारा कुछ भी न बोलनेके कारण दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हुआ देखकर उसके प्रति भीष्मजीके किये हुए स्नेह-सौहार्दकी बात संजय आगेके श्लोकमें प्रकट करते हैं।
तस्य सज्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्वौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
| तस्य | = उस (दुर्योधन)-के | कुरुवृद्धः | = कौरवोंमें वृद्ध | विनद्य | = गरजकर |
|---|---|---|---|---|---|
| हर्षम् | = (हृदयमें) हर्ष | प्रतापवान् | = प्रभावशाली | उच्चैः | = जोरसे |
| सज्जनयन् | = उत्पन्न करते | पितामहः | = पितामह भीष्मने | शङ्खम् | = शंख |
| हुए | सिंहनादम् | = सिंहके समान | दध्वौ | = बजाया। |
व्याख्या —‘तस्य सज्जनयन् हर्षम्’—यद्यपि दुर्योधनके हृदयमें हर्ष होना शंखध्वनिका कार्य है और शंखध्वनि कारण है, इसलिये यहाँ शंखध्वनिका वर्णन पहले और हर्ष होनेका वर्णन पीछे होना चाहिये अर्थात् यहाँ ‘शंख बजाते हुए दुर्योधनको हर्षित किया’—ऐसा कहा जाना चाहिये। परन्तु यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि ‘दुर्योधनको हर्षित करते हुए भीष्मजीने शंख बजाया’। कारण कि ऐसा कहकर संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्मकी शंखवादन क्रियामात्रसे दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न हो ही जायगा। भीष्मजीके इस प्रभावको द्योतन करनेके लिये ही संजय आगे ‘प्रतापवान्’ विशेषण देते हैं।
‘कुरुवृद्धः’ —यद्यपि कुरुवंशियोंमें आयुकी दृष्टिसे भीष्मजीसे भी अधिक वृद्ध बाह्यीक थे (जो कि भीष्मजीके पिता शान्तनुके छोटे भाई थे), तथापि कुरुवंशियोंमें जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सबमें भीष्मजी धर्म और ईश्वरको विशेषतासे जाननेवाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होनेके कारण संजय भीष्मजीके लिये ‘कुरुवृद्धः’ विशेषण देते हैं।
‘प्रतापवान्’ —भीष्मजीके त्यागका बड़ा प्रभाव था। वे कनक-कामिनीके त्यागी थे अर्थात् उन्होंने राज्य भी स्वीकार नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र-शस्त्रको चलानेमें बड़े निपुण थे और शास्त्रके भी बड़े जानकार थे। उनके इन दोनों गुणोंका भी लोगोंपर बड़ा प्रभाव था।
जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्यके लिये
परिशिष्ट भाव —दुर्योधनके साथ द्रोणाचार्यका विद्याका सम्बन्ध था और भीष्मजीका जन्मका अर्थात् कौटुम्बिक सम्बन्ध था। जहाँ विद्याका सम्बन्ध होता है, वहाँ पक्षपात नहीं होता, पर जहाँ कौटुम्बिक सम्बन्ध होता है, वहाँ स्नेहवश पक्षपात हो जाता है। अतः दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कहे गये वचन सुनकर द्रोणाचार्य चुप रहे, जिससे दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हो गया। परन्तु दुर्योधनको उदास देखकर कौटुम्बिक स्नेहके कारण भीष्मजी शंख बजाते हैं।
काशिराजकी कन्याओंको स्वयंवरसे हरकर ला रहे थे, तब वहाँ स्वयंवरके लिये इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उनपर टूट पड़े। परन्तु अकेले भीष्मजीने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म अस्त्र-शस्त्रकी विद्या पढ़े थे, उन गुरु परशुरामजीके सामने भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की। इस प्रकार शस्त्रके विषयमें उनका क्षत्रियोंपर बड़ा प्रभाव था।
जब भीष्म शर-शस्त्रापर सोये थे, तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराजसे कहा कि ‘आपको धर्मके विषयमें कोई शंका हो तो भीष्मजीसे पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञानका सूर्य अस्ताचलको जा रहा है अर्थात् भीष्मजी इस लोकसे जा रहे हैं।’* इस प्रकार शास्त्रके विषयमें उनका दूसरोंपर बड़ा प्रभाव था।
‘पितामहः’ —इस पदका आशय यह मालूम देता है कि दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कही गयी बातोंका द्रोणाचार्यने कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन चालाकीसे मेरेको ठगना चाहता है, इसलिये वे चुप ही रहे। परन्तु पितामह (दादा) होनेके नाते भीष्मजीको दुर्योधनकी चालाकीमें उसका बचपना दीखता है। अतः पितामह भीष्म द्रोणाचार्यके समान चुप न रहकर वात्सल्यभावके कारण दुर्योधनको हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं।
‘सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्वौ’ —जैसे सिंहके गर्जना करनेपर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करनेमात्रसे सभी भयभीत हो जायें और दुर्योधन प्रसन्न हो जाय—इसी भावसे भीष्मजीने सिंहके समान गरजकर जोरसे शंख बजाया।
- तस्मिन्स्तमिते भोष्ये कौरवाणां धुरंधरे। ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात् त्वां चोदयाम्यहम् ॥ (महाभारत, शान्ति० ४६।२३॥)
३८
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
सम्बन्ध—पितामह भीष्मके द्वारा शंख बजानेका परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगेके श्लोकमें कहते हैं।
ततः शङ्खाश्च भैर्यश्च पणवानकगोमुखः।
सहसैवाभ्यहन्वन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १३ ॥
| ततः | = उसके बाद | पणवानकगोमुखः =: ढोल, | अभ्यहन्वन्त = बज उठे। (उनका) |
|---|---|---|---|
| शङ्खाः | = शंख | मृदंग और | सः = वह |
| च | = और | नरसिंघे बाजे | शब्दः = शब्द |
| भैर्यः | = भेरी (नगाड़े) | सहसा = एक साथ | तुमुलः = बड़ा भयंकर |
| च | = तथा | एव = ही | अभवत् = हुआ। |
व्याख्या—‘ततः शङ्खाश्च भैर्यश्च पणवानक-गोमुखः’ —यद्यपि भीष्मजीने युद्धारम्भकी घोषणा करनेके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत दुर्वाधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव-सेनाने भीष्मजीके शंखवादनको युद्धकी घोषणा ही समझा। अतः भीष्मजीके शंख बजानेपर कौरव-सेनाके शंख आदि सब बाजे एक साथ बज उठे।
‘शंख’ समुद्रसे उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुरजीकी सेवा-पूजामें रखे जाते हैं और आरती उतारने आदिके काममें आते हैं। मांगलिक कार्योंमें तथा युद्धके आरम्भमें ये मुखसे फूँक देकर बजाये जाते हैं। ‘भेरी’ नाम नगाड़ोंका है (जो बड़े नगाड़े होते हैं, उनको नौबत कहते हैं)। ये नगाड़े लोहेके बने हुए और भैंसेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं, तथा लकड़ीके ढंढेसे बजाये जाते हैं। ये मन्दिरोंमें एवं राजाओंके किलोंमें रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक कार्योंमें ये विशेषतासे बजाये जाते हैं। राजाओंके यहाँ ये रोज बजाये जाते हैं। ‘पणव’ नाम ढोलका है। ये लोहेके अथवा लकड़ीके बने हुए और बकरेके चमड़ेसे मढ़े हुए
होते हैं तथा हाथसे या लकड़ीके ढंढेसे बजाये जाते हैं। ये आकारमें ढोलकीकी तरह होनेपर भी ढोलकीसे बड़े होते हैं। कार्यके आरम्भमें पणवोंको बजाना गणेशजीके पूजनके समान मांगलिक माना जाता है। ‘आनक’ नाम मृदंगका है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकारमें ये लकड़ीकी बनायी हुई ढोलकीके समान होते हैं। ये मिट्टीके बने हुए और चमड़ेसे मढ़े हुए होते हैं तथा हाथसे बजाये जाते हैं। ‘गोमुख’ नाम नरसिंघेका है। ये आकारमें साँपकी तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गायकी तरह होता है। ये मुखकी फूँकसे बजाये जाते हैं।
‘सहसैवाभ्यहन्वन्त’ *—कौरव-सेनामें उत्साह बहुत था। इसलिये पितामह भीष्मका शंख बजते ही कौरव-सेनाके सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजनेमें देरी नहीं हुई तथा उनको बजानेमें परिश्रम भी नहीं हुआ।
‘स शब्दस्तुमुलोऽभवत्’ —अलग-अलग विभागोंमें, टुकड़ियोंमें खड़ी हुई कौरव-सेनाके शंख आदि बाजोंका शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात् उनकी आवाज बड़ी जोरसे गूँजती रही।
सम्बन्ध— इस अध्यायके आरम्भमें ही धृतराष्ट्रने संजयसे पूछा था कि युद्धक्षेत्रमें मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया? अतः संजयने दूसरे श्लोकसे तेरहवें श्लोकतक ‘धृतराष्ट्रके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर दिया। अब आगेके श्लोकसे संजय ‘पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया’—इसका उत्तर देते हैं।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४ ॥
- कर्मको अत्यन्त सुगमतापूर्वक छोटन करनेके लिये जहाँ कर्म आदिको ही कर्ता बना दिया जाता है, उसको ‘कर्मकर्तृ’ प्रयोग कहते हैं। जैसे कोई लकड़ीको चीर रहा है, तो इस कर्मको सुगम बतानेके लिये ‘लकड़ी चीरी जा रही है’ ऐसा प्रयोग किया जाता है। ऐसे ही यहाँ ‘बाजे बजाये गये’ ऐसा प्रयोग होना चाहिये; परन्तु बाजे बजानेमें सुगमता बतानेके लिये, सेनाका उत्साह दिखानेके लिये ‘बाजे बज उठे’ ऐसा प्रयोग किया गया है।
श्लोक १४ ]
- साधक-संजीवनी *
३९
| ततः | = उसके बाद | स्यन्दने | = रथपर | पाण्डवः | = पाण्डुपुत्र अर्जुनने |
|---|---|---|---|---|---|
| श्वेतैः | = सफेद | स्थितौ | = बैठे हुए | एव | = भी |
| हयैः | = घोड़ोंसे | माधवः | = लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण | दिव्यौ | = दिव्य |
| युक्ते | = युक्त | च | = और | शङ्खौ | = शंखोंको |
| महित | = महान् | प्रदध्मत्तुः | = बड़े जोरसे बजाया। |
व्याख्या—‘ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते’— चित्ररथ गन्धर्वने अर्जुनको सौ दिव्य घोड़े दिये थे। इन घोड़ोंमें यह विशेषता थी कि इनमेंसे युद्धमें कितने ही घोड़े क्यों न मारे जायें, पर ये संख्यामें सौ-के-सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानोंमें जा सकते थे। इन्हीं सौ घोड़ोंमेंसे सुन्दर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुनके रथमें जुते हुए थे।
‘महित स्यन्दने स्थितौ’— यज्ञोंमें आहुतिरूपसे दिये गये घीको खाते-खाते अग्निको अजीर्ण हो गया था। इसीलिये अग्निदेव खाण्डववनकी विलक्षण-विलक्षण जड़ी-बूटियाँ खाकर (जलाकर) अपना अजीर्ण दूर करना चाहते थे। परन्तु देवताओंके द्वारा खाण्डववनकी रक्षा की जानेके कारण अग्निदेव अपने कार्यमें सफल नहीं हो पाते थे। वे जब-जब खाण्डववनको जलाते, तब-तब इन्द्र वर्षा करके उसको (अग्निको) बुझा देते। अन्तमें अर्जुनकी सहायतासे अग्निने उस पूरे वनको जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ बैलगाड़ियोंमें जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र-शस्त्र इस रथमें पड़े रहते थे। यह सोनेसे मढ़ा हुआ और तेजोमय था। इसके पहिये बड़े ही दृढ़ एवं विशाल थे। इसकी ध्वजा बिजलीके समान चमकती थी। यह ध्वजा एक योजना (चार कोस) तक फहराया करती थी। इतनी लम्बी होनेपर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और न कहीं वृक्ष आदिमें अटकती ही थी। इस ध्वजापर हनुमानजी विराजमान थे।
‘स्थितौ’ कहनेका तात्पर्य है कि उस सुन्दर और तेजोमय रथपर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण और उनके प्यारे भक्त अर्जुनके विराजमान होनेसे उस रथकी शोभा और तेज बहुत ज्यादा बढ़ गया था।
‘माधवः पाण्डवश्चैव’— ‘मा’ नाम लक्ष्मीका है और ‘धव’ नाम पतिका है। अतः ‘माधव’ नाम लक्ष्मीपतिके है। यहाँ ‘पाण्डव’ नाम अर्जुनका है; क्योंकि अर्जुन सभी पाण्डवोंमें मुख्य हैं—‘पाण्डवानां धनञ्जयः ’
(गीता १०।३७)।
अर्जुन ‘नर’ के और श्रीकृष्ण ‘नारायण’ के अवतार थे। महाभारतके प्रत्येक पर्वके आरम्भमें नर (अर्जुन) और नारायण (भगवान् श्रीकृष्ण)—को नमस्कार किया गया है—‘नारायणां नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ’। इस दृष्टिसे पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन—ये दोनों मुख्य थे। संजयने भी गीताके अन्तमें कहा है कि ‘जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन रहेंगे, वहाँपर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी’ (१८।७८)।
‘दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मत्तुः’— भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके हाथोंमें जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। उन शंखोंको उन्होंने बड़े जोरसे बजाया।
यहाँ शंका हो सकती है कि कौरवपक्षमें मुख्य सेनापति पितामह भीष्म हैं, इसलिये उनका सबसे पहले शंख बजाना ठीक ही है; परन्तु पाण्डव-सेनामें मुख्य सेनापति भृष्टयुग्मके रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान् श्रीकृष्णने सबसे पहले शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान् सारथि बनें चाहे महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं सकती। वे जिस किसी भी पदपर रहें, सदा सबसे बड़े ही बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही नहीं। पाण्डव-सेनामें भगवान् श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्थामें थे, उस समय भी नन्द, उपनन्द आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो उन्होंने बालक श्रीकृष्णके कहनेसे परम्परासे चली आयी इन्द्र-पूजाको छोड़कर गोवर्धनकी पूजा करनी शुरू कर दी। तात्पर्य है कि भगवान् जिस किसी अवस्थामें, जिस किसी स्थानपर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही रहते हैं। इसीलिये भगवान्ने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले शंख बजाया।
जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थानपर नियुक्त होनेसे बड़ा माना जाता है। अतः जो ऊँचे स्थानके कारण अपनेको बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तवमें छोटा ही होता है। परन्तु
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १ ]
जो स्वयं बड़ा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण वह स्थान भी बड़ा माना जाता है। जैसे भगवान् यहाँ सारथि
बने हैं, तो उनके कारण वह सारथिका स्थान (पद) भी ऊँचा हो गया।
सम्बन्ध—अब संजय आगेके चार श्लोकोंमें पूर्वश्लोकका खुलासा करते हुए दूसरोंके शंखवादनाका वर्णन करते हैं।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥
| हृषीकेशः = अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्णने | देवदत्तम् = देवदत्त नामक (शंख बजाया और) | वृकोदरः = वृकोदर भीमने |
|---|---|---|
| पाञ्चजन्यम् = पांचजन्य नामक (तथा) | भीमकर्मा = भयानक कर्म करनेवाले | पौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक |
| महाशङ्खम् = महाशंख | ||
| दध्मौ = बजाया। |
व्याख्या—‘पाञ्चजन्यं हृषीकेशः’— सबके अन्तर्यामी अर्थात् सबके भीतरकी बात जाननेवाले साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके पक्षमें खड़े होकर ‘पांचजन्य’ नामक शंख बजाया। भगवान्ने पंचजन नामक शंखरूपधारी दैत्यको मारकर उसको शंखरूपसे ग्रहण किया था, इसलिये इस शंखका नाम ‘पांचजन्य’ हो गया।
‘देवदत्तं धनञ्जयः’— राजसूय यज्ञके समय अर्जुनने बहुत-से राजाओंको जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। इस कारण अर्जुनका नाम ‘धनंजय’ पड़ गया*। निवातकवचादि दैत्योंके साथ युद्ध करते समय इन्द्रने अर्जुनको ‘देवदत्त’ नामक शंख दिया था। इस शंखकी ध्वनि बड़े जोरसे होती
थी, जिससे शत्रुओंकी सेना घबरा जाती थी। इस शंखको अर्जुनने बजाया।
‘पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः’— हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरों तथा कीचक, जरासन्ध आदि बलवान् वीरोंको मारनेके कारण भीमसेनका नाम ‘भीमकर्मा’ पड़ गया। उनके पेटमें जठराग्निके सिवाय ‘वृक’ नामकी एक विशेष अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस कारण उनका नाम ‘वृकोदर’ पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा वृकोदर भीमसेनने बहुत बड़े आकारवाला ‘पौण्ड्र’ नामक शंख बजाया।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
| कुन्तीपुत्रः = कुन्तीपुत्र | नामक (शंख बजाया तथा) | सहदेवः = सहदेवने |
|---|---|---|
| राजा = राजा | सुघोषमणिपुष्पकौ = सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)। | |
| युधिष्ठिरः = युधिष्ठिरने | नकुलः = नकुल | |
| अनन्तविजयम् = अनन्तविजय | च = और |
व्याख्या—‘अनन्तविजयं राजा’……………‘सुघोषमणि-पुष्पकौ’— अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर—ये तीनों कुन्तीके पुत्र हैं तथा नकुल और सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हैं, यह विभाग दिखानेके लिये ही यहाँ युधिष्ठिरके लिये ‘कुन्तीपुत्र’ विशेषण दिया गया है।
युधिष्ठिरको ‘राजा’ कहनेका तात्पर्य है कि युधिष्ठिरजी
वनवासके पहले अपने आधे राज्य-(इन्द्रप्रस्थ-)के राजा थे, और नियमके अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवासके बाद वे राजा होने चाहिये थे। ‘राजा’ विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलके राजा होंगे।
- सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमादाय केवलम्। मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहर्मा धनञ्जयम् ॥ (महाभारत, विराट० ४४।१३)