श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
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श्रीमद्
भगवद्गीता
सचित्र साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित) हिन्दी-टीका
स्वामी रामसुखदास
सं० २०७५ पंचानबेवाँ पुनर्मुद्रण १०,०००
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॥ श्रीहरिः ॥
नम्र निवेदन
विश्व-साहित्यमें श्रीमद्भगवद्गीताका अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान्के श्रीमुखसे निःसृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवान्ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवान्ने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं पा सका और न पा ही सकता है।
हमारे परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उत्तरकर अनेक गुह्यतम अमूल्य रत्न दृढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस 'साधक-संजीवनी' हिन्दी-टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ उदारहृदयसे वितरित किया है। गीताकी यह टीका हमें अपनी धारणासे दूसरी टीकाओंकी अपेक्षा बहुत विलक्षण प्रतीत होती है। हमारा गीताकी दूसरी सब टीकाओंका इतना अध्ययन नहीं है, फिर भी इस टीकामें हमें अनेक श्लोकोंके भाव नये और विलक्षण लगे; जैसे— पहले अध्यायका दसवाँ, उन्नीसवाँ-बीसवाँ और पचीसवाँ श्लोक; दूसरे अध्यायका उन्तालीसवाँ-चालीसवाँ श्लोक; तीसरे अध्यायका तीसरा, दसवाँ, बारहवाँ-तेरहवाँ और तैंतालीसवाँ श्लोक; चौथे अध्यायका अठारहवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक; छठे अध्यायका बीसवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; सातवें अध्यायका पाँचवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक; आठवें अध्यायका छठा श्लोक; नवें अध्यायका तीसरा और इकतीसवाँ श्लोक; दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक; ग्यारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ और पैतालीसवाँ-छियालीसवाँ श्लोक; बारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक; तेरहवें अध्यायका पहला और उन्नीसवाँ-बीसवाँ-इककीसवाँ श्लोक; चौदहवें अध्यायका तीसरा, बारहवाँ, सत्रहवाँ और बाईसवाँ श्लोक; पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक; सोलहवें अध्यायका पाँचवाँ और बीसवाँ श्लोक; सत्रहवें अध्यायका सातवाँ, आठवाँ, नवाँ, दसवाँ श्लोक; अठारहवें अध्यायका सतीसवा और तिहत्तरवाँ श्लोक आदि-आदि। अगर पाठक गम्भीर अध्ययन करें तो उसे और भी कई श्लोकोंमें आंशिक नये-नये भाव मिल सकते हैं।
वर्तमान समयमें साधनका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका प्रायः अभाव-सा दीखता है, जिससे साधकोंको सही मार्ग-दर्शनके बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थितिमें परमात्मप्राप्तिके अनेक सरल उपायोंसे युक्त, साधकोपयोगी अनेक विशेष और मार्मिक बातोंसे अलंकृत तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित प्रस्तुत ग्रन्थका प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो—इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोंके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।
परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
—प्रकाशक
तैंतीसवें संस्करणका नम्र निवेदन
श्रीमद्भगवद्गीताकी 'साधक-संजीवनी' टीका लिखनेके बाद गीताके जो नये भाव उत्पन्न हुए, उन्हें परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजने परिशिष्टके रूपमें लिख दिया। पहले यह परिशिष्ट अलग-अलग तीन भागोंमें प्रकाशित किया गया। अब उसे साधक-संजीवनी टीकामें सम्मिलित करके प्रकाशित किया जा रहा है। परिशिष्टके साथ-साथ साधक-संजीवनी टीकामें भी कहीं-कहीं आवश्यक संशोधन किया गया है। परिशिष्टमें गीताके अत्यन्त गुह्य एवं उत्तमोत्तम भावोंका प्राकट्य हुआ है। अतः आशा है कि पाठकगण साधक-संजीवनीके इस संशोधित तथा संवर्धित संस्करणसे अधिकाधिक लाभ उठानेकी चेष्टा करेंगे।
—प्रकाशक
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
साधक-संजीवनी परिशिष्टका
नम्र निवेदन
भगवान् अनन्त हैं, उनका सब कुछ अनन्त है, फिर उनके मुखारविन्दसे निकली हुई गीताके भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है ? अलग-अलग आचार्योंने गीताकी अलग-अलग टीका लिखी है। उनकी टीकाके अनुसार चलनेसे मनुष्यका कल्याण तो हो सकता है, पर वह गीताके अर्थको पूरा नहीं जान सकता। आजतक गीताकी जितनी टीकाएँ लिखी गयी हैं, वे सब-की-सब इकट्ठी कर दें तो भी गीताका अर्थ पूरा नहीं होता! जैसे किसी कुएँसे सैकड़ों वर्षांतक असंख्य आदमी जल पीते रहें तो भी उसका जल वैसा-का-वैसा ही रहता है, ऐसे ही असंख्य टीकाएँ लिखनेपर भी गीता वैसी-की-वैसी ही रहती है, उसके भावोंका अन्त नहीं आता। कुएँके जलकी तो सीमा है, पर गीताके भावोंकी सीमा नहीं है। अतः गीताके विषयमें कोई कुछ भी कहता है तो वह वास्तवमें अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है—‘सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥ ’ (मानस, बाल० १३।१)।
भगवान्की वाणी बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंकी वाणीसे भी ठोस और श्रेष्ठ है; क्योंकि भगवान् ऋषि-मुनियोंके भी आदि हैं—‘अहमादिहि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ’ (गीता १०।२)। अतः कितने ही बड़े ऋषि-मुनि, सन्त-महात्मा क्यों न हों और उनकी वाणी कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह भगवान्की दिव्यातिदिव्य वाणी ‘गीता’ की बराबरी नहीं कर सकती।
पगडण्डीको ‘पद्धति’ कहते हैं और राजमार्ग, घण्टापथ अथवा चौड़ी सड़कको ‘प्रस्थान’ कहते हैं। गीता, उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र—ये तीन प्रस्थान हैं, शेष सब पद्धतियाँ हैं। प्रस्थानत्रयमें गीता बहुत विलक्षण है; क्योंकि इसमें उपनिषद् और ब्रह्मसूत्र दोनोंका ही तात्पर्य आ जाता है।
गीता उपनिषदोंका सार है, पर वास्तवमें गीताकी बात उपनिषदोंसे भी विशेष है। कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष गुण होता है; जैसे—आकाशमें केवल एक गुण ‘शब्द’ है, पर उसके कार्य वायुमें दो गुण ‘शब्द और स्पर्श’ हैं।
वेद भगवान्के निःश्वास हैं और गीता भगवान्की वाणी है। निःश्वास तो स्वाभाविक होते हैं, पर गीता भगवान्ने योगमें स्थित होकर कही है*। अतः वेदोंकी अपेक्षा भी गीता विशेष है।
सभी दर्शन गीताके अन्तर्गत हैं, पर गीता किसी दर्शनके अन्तर्गत नहीं है। दर्शनशास्त्रमें जगत् क्या है, जीव क्या है और ब्रह्म क्या है—यह पढ़ाई होती है। परन्तु गीता पढ़ाई नहीं कराती, प्रत्युत अनुभव कराती है।
गीतामें किसी मतका आग्रह नहीं है, प्रत्युत केवल जीवके कल्याणका ही आग्रह है। मतभेद गीतामें नहीं है, प्रत्युत टीकाकारोंमें है। गीताके अनुसार चलनेसे सगुण और निर्गुणके उपासकोंमें परस्पर खटपट नहीं हो सकती। गीतामें भगवान् साधकको समग्रकी तरफ ले जाते हैं। सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि सब रूप समग्र परमात्माके ही अन्तर्गत हैं। समग्ररूपमें कोई भी रूप बाकी नहीं रहता। किसीकी भी उपासना करें, सम्पूर्ण उपासनाएँ समग्ररूपके अन्तर्गत आ जाती हैं। सम्पूर्ण दर्शन समग्ररूपके अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः सब कुछ परमात्माके ही अन्तर्गत है, परमात्माके सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है—इसी भावमें सम्पूर्ण गीता है।
गीताका तात्पर्य ‘वासुदेवः सर्वम् ’ में है। एक परमात्मतत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ताकी मान्यता रहनेसे प्रवृत्तिका उदय
- न शक्यं तनया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः॥
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तनया। (महाभारत, आश्व० १६।१२-१३)
भगवान् बोले—‘वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात नहीं है। उस समय मैंने योगयुक्त होकर परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।’
योगयुक्त अर्थात् योगमें स्थित होकर गीता कहनेका तात्पर्य है कि सुननेवालेका हित किसमें है ? उसके हितके लिये क्या कहना चाहिये ? भविष्यमें भी जो सुनेगा अथवा पढ़ेगा, उसका हित किसमें होगा ?—इस प्रकार सभी साधकोंके हितमें स्थित होकर गीता कही है।
[ ६ ]
होता है और दूसरी सत्ताकी मान्यता मिटनेसे निवृत्तिकी दृढ़ता होती है। प्रवृत्तिका उदय होना 'भोग' है और निवृत्तिकी दृढ़ता होना 'योग' है। गीता 'सब कुछ परमात्मा है'—ऐसा मानती है और इसीको महत्त्व देती है। संसारमें कार्यरूपसे, कारणरूपसे, प्रभावरूपसे, सब रूपोंसे मैं-ही-मैं हूँ—यह बतानेके लिये ही भगवान्ने गीतामें चार जगह (सातवें, नवें, दसवें और पन्द्रहवें अध्यायमें) अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त जीव), अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ), अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांच भौतिक जगत्), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातु देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर््यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—ये सब-के-सब 'वासुदेव: सर्वम्' के अन्तर्गत आ जाते हैं (सातवें अध्यायका उन्तीसवाँ-तीसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि सत्, असत् और उससे परे जो कुछ भी है, वह सब परमात्मा ही हैं—'त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्' (गीता ११।३७)। संसार अपने रागके कारण ही दीखता है। रागके कारण ही दूसरी सत्ता दीखती है। राग न हो तो एक परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है। जैसे, भगवान्ने कहा है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' (गीता १५।१५) 'मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ'। जिस हृदयमें भगवान् रहते हैं, उसी हृदयमें राग-द्वेष, हलचल, अशान्ति होते हैं। हृदयमें ही सुख होता है और हृदयमें ही दुःख आता है। समुद्र-मन्थनमें वहीसे विष निकला, वहीसे अमृत निकला। भगवान् शंकरने विष पी लिया तो अमृत निकल आया। इसी तरह राग-द्वेषको मिटा दें तो परमात्मा निकल आयेंगे। सन्त-महात्माओंके हृदयमें राग-द्वेष नहीं रहते; अतः वहाँ परमात्मा रहते हैं।
सब कुछ परमात्मा ही हैं—यह खुले नेत्रोंका ध्यान है। इसमें न आँख बन्द करने (ध्यान)—की जरूरत है, न कान बन्द करने (नादानुसन्धान)—की जरूरत है, न नाक बन्द करने (प्राणायाम)—की जरूरत है ! इसमें न संयोगका असर पड़ता है, न वियोगका; न किसीके आनेका असर पड़ता है, न किसीके जानेका। जब सब कुछ परमात्मा ही है तो फिर दूसरा कहाँसे आये ? कैसे आये ?
गीता समग्रको मानती है, इसीलिये गीताका आरम्भ और अन्त शरणागतिमें हुआ है। शरणागतिसे ही समग्रकी प्राप्ति होती है। परमात्माके समग्र-रूपमें सब रूप होते हुए भी सगुणकी मुख्यता है। कारण कि सगुणके अन्तर्गत तो निर्गुण भी आ जाता है, पर निर्गुणमें (गुणोंका निषेध होनेसे) सगुण नहीं आता। अतः सगुण ही समग्र हो सकता है।
भगवान् श्रीकृष्ण समग्र हैं—'असंशयं समग्रं माम्' (गीता ७।१)। गीता समग्रकी वाणी है, इसलिये गीतामें सब कुछ है। जो जिस दृष्टिसे गीताको देखता है, गीता उसको वैसी ही दीखने लगती है—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४।११)।
कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—ये तीन ही योग हैं। शरीर (अपरा)—को लेकर कर्मयोग है, शरीरी (परा)—को लेकर ज्ञानयोग है और शरीर-शरीरी दोनोंके मालिक (भगवान्)—को लेकर भक्तियोग है। भगवान्ने गीताके आरम्भमें पहले शरीरीको लेकर और फिर शरीरीको लेकर क्रमशः ज्ञानयोग और कर्मयोगका वर्णन किया। फिर ध्यानयोगका वर्णन किया; क्योंकि वह भी कल्याण करनेका एक साधन है। फिर सातवें अध्यायसे भक्तिका विशेषतासे वर्णन किया, जो भगवान्का खास ध्येय है। मनुष्य कर्मयोगसे जगत्के लिये, ज्ञानयोगसे अपने लिये और भक्तियोगसे भगवान्के लिये उपयोगी हो जाता है।
गीतामें समताको 'योग' कहा गया है—'समत्वं योग उच्यते' (गीता २।४८)। वास्तवमें 'योग' की आवश्यकता कर्ममें ही है, ज्ञानमें भी योगकी आवश्यकता नहीं है और भक्तिमें तो योगकी बिलकुल आवश्यकता नहीं है। ज्ञान और भक्ति वास्तवमें 'योग' ही हैं। कर्म जड़ हैं, बाँधनेवाले हैं और विषय हैं, इसलिये उनमें योगकी आवश्यकता है—'योगस्यः कुरु कर्माणि' (गीता २।४८)। कर्मोंमें योग ही मुख्य है—'योगः कर्मसु कौशलम्' (गीता २।५०)। योगके सिवाय कर्म कुछ नहीं है—'दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्ब्रह्मज्यय' (गीता २।४९)। कर्तृत्व भी कर्म करनेसे ही आता है। इसलिये गीतामें 'योग' शब्द विशेषकर 'कर्मयोग' का ही वाचक आता है। गीताकी पुष्पिकामें भी 'योगशास्त्रे' पदका अर्थ कर्मयोगकी शिक्षा है।
कर्मयोगमें दो विभाग हैं—कर्मविभाग और योगविभाग। कर्मविभाग पूर्वार्ध है और योगविभाग उत्तरार्ध है। कर्म करणसापेक्ष है और योग करणनिरपेक्ष है। कर्मविभागमें कर्तव्यपरायणता है और योगविभागमें स्वाधीनता, निर्विकारता, असंगता, समता है। संसारमें हमारा जो कर्तव्य होता है, वह दूसरेका अधिकार होता है। इसलिये व्यक्ति का जो कर्तव्य है, वह परिवारका, समाजका और संसारका अधिकार है। जैसे, वक्ताका जो कर्तव्य है, वह श्रोताका अधिकार है और श्रोताका जो कर्तव्य है, वह वक्ताका अधिकार है। वक्ता बोलकर श्रोताके अधिकारकी रक्षा करता है और श्रोता सुनकर वक्ताके अधिकारकी रक्षा करता है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेसे मनुष्य ऋणमुक्त हो जाता है और उसको
[ च ]
‘योग’ की प्राप्ति हो जाती है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेका तात्पर्य है—शरीर, वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यको अपनी न समझकर, प्रत्युत दूसरोंकी ही समझकर दूसरोंकी सेवामें अर्पित कर देना।
संसारमें वस्तु और व्यक्तिके साथ हमारा संयोग होता है। जहाँ संयोग होता है, वहाँ कर्तव्यका पालन करनेकी आवश्यकता होती है। वस्तुका संयोग होनेपर उस वस्तुमें ममता न करके उसका सदुपयोग करना, उसको दूसरोंकी सेवामें लगाना हमारा कर्तव्य है। व्यक्तिका संयोग होनेपर उस व्यक्तिमें ममता न करके उसकी सेवा करना, उसको सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। कामना और ममतासे रहित होकर कर्तव्यका पालन करनेसे शरीर—संसारके संयोगका वियोग हो जाता है और योगकी प्राप्ति हो जाती है—‘तं विद्याद्वुःखसंयोगवियोगं योगसञ्जितम्’ (गीता ६।२३)। संयोगका तो वियोग होता है, पर योगका कभी वियोग नहीं होता। योगकी प्राप्ति होनेपर मनुष्य राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है और उसको स्वाधीनता, निर्विकारता, असंगता, समताकी प्राप्ति हो जाती है।
प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरूँ नहीं; मैं सब कुछ जान जाऊँ, कभी अज्ञानी न रहूँ; मैं सदा सुखी रहूँ, कभी दुःखी न रहूँ। परन्तु मनुष्यकी यह चाहना अपने बलसे अथवा संसारसे कभी पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य जो चाहता है, वह संसारके पास है ही नहीं। वास्तवमें मनुष्यको जो चाहिये, वह उसको पहलेसे ही प्राप्त है। उससे गलती यह होती है कि वह उन वस्तुओंको चाहने लगता है, जिनका संयोग और वियोग होता है, जो मिलने और अरि बिछुड़नेवाली हैं। यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु कभी भी हमारेसे अलग होती है, वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी (वर्तमानमें) भी हमारेसे अलग है। जैसे, शरीर कभी भी हमारेसे अलग होगा तो वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी भी हमारेसे अलग है। इसी तरह जो वस्तु (परमात्मा) कभी भी हमारेसे अलग नहीं होती, वह सदा ही मिली हुई है और अभी भी हमारेको मिली हुई है। तात्पर्य यह निकला कि वास्तवमें संसारका सदा ही वियोग है और परमात्माका सदा ही योग है।
कोई आचार्य पहले कर्मयोग, फिर ज्ञानयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम मानते हैं और कोई आचार्य पहले कर्मयोग, फिर भक्तियोग, फिर ज्ञानयोग—यह क्रम मानते हैं। परन्तु गीता पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम मानती है। गीता कर्मयोगको ज्ञानयोगकी अपेक्षा विशेष मानती है—‘तयोस्तु कर्मसन्त्यासात्मकर्मयोगो विशिष्यते’ (५।२)। कारण कि ज्ञानयोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है—‘कर्मणैव हि संसिद्धिमारिथ्यता जनकादयः’ (३।२०), ‘यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४।२३), पर कर्मयोगके बिना ज्ञानयोग होना कठिन है—‘सन्त्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्नुमयोगतः’ (५।६)। श्रीमद्भागवतमें भी पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग—यह क्रम कहा गया है*। एक विलक्षण बात और है कि गीता कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंको समकक्ष और लौकिक बताती है—‘लोकैऽस्मिन्द्रविधा निष्ठाः’ (३।३)। क्षर (जगत्) और अक्षर (जीव)—दोनों लौकिक हैं—‘द्वविभौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता १५।१६), पर भगवान् अलौकिक हैं—‘उत्तमः पुरुषस्तन्यः’ (१५।१७)। क्षरको लेकर कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; अतः कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक हैं। परन्तु भक्तियोग भगवान्को लेकर चलता है; अतः भक्तियोग अलौकिक है।
गीताने भक्तिको सर्वश्रेष्ठ बताया है (छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक)। गीताकी भक्ति भेदवाली नहीं है, प्रत्युत अद्वैत भक्ति है। वास्तवमें देखा जाय तो ज्ञानमें द्वैत है और भक्तिमें अद्वैत है। कारण कि ज्ञानमें तो जड़-चेतन, जगत्-जीव, शरीर-शरीरी, असत्-सत्, प्रकृति-पुरुष आदि दो-दो हैं, पर भक्तिमें केवल भगवान् ही हैं—‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७।१९), ‘सदसच्चाहम्’ (गीता ९।१९)। भगवान्ने ज्ञानके साधनोंमें भी भक्ति बताया है—‘मयि चानन्ययोगेन०’ (१३।१०) और गुणातीत होनेका उपाय भी भक्ति बताया है—‘मां च योऽव्यभिचारेण०’ (१४।२६)। ज्ञानकी परानिष्ठासे भी पराभक्तिकी प्राप्ति होती है—‘मद्भक्तिं लभते पराम्’ (१८।५५)। इस पराभक्तिसे जानना, देखना और प्रवेश करना—तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक)। भगवान् अपने भक्तको कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनोंकी प्राप्ति करा देते हैं (दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक)। भगवान्ने अपने भक्तको सबसे उत्तम योगी बताया है—‘स मे युक्तमतो मतः’ (६।४७), ‘ते मे युक्ततमा मताः’ (१२।२), ‘स योगी परमो मतः’ (६।३२)। ध्यानयोगमें भी भक्ति आयी है—‘युक्त आसीत मत्परः’ (६।१४)। कर्मयोगमें भी भगवान्ने भक्ति बताया है—‘युक्त आसीत मत्परः’ (२।६१)। भगवान्ने सभी योगोंमें अपनी भक्ति (परायणता) बताया है, यह भक्तिकी विशेषता है।
- योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्॥ (श्रीमद्भा० ११।२०।६)
[ ७ ]
अर्जुनका प्रश्न भक्तिविषयक नहीं था, फिर भी भगवान्ने अपनी तरफसे भक्तिका वर्णन किया (अठारहवें अध्यायके छप्पनवेंसे छालठवें श्लोकतक)। भक्तिये समग्र परमात्माकी प्राप्ति होती है (सातवें अध्यायका उन्तीसवों-तीसवों श्लोक)।
गीताका सातवों, नवों और पन्द्रहवों अध्याय, दसवें अध्यायका आरम्भ तथा अठारहवें अध्यायके छप्पनवेंसे छालठवेंतकके श्लोक हमें बहुत विलक्षण दीखते हैं। इनमें 'अर्जुन उवाच' नहीं है अर्थात् ये भगवान्ने अपनी तरफसे अत्यन्त कृपा करके कहे हैं।
गीतामें कर्मयोगके वर्णनमें ज्ञानयोग-भक्तियोगकी, ज्ञानयोगके वर्णनमें कर्मयोग-भक्तियोगकी और भक्तियोगके वर्णनमें कर्मयोग-ज्ञानयोगकी बात भी आ जाती है। इसका तात्पर्य है कि साधक कोई भी योग करे तो उसको तीनों योगोंकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात् उसको मुक्ति और भक्ति—दोनों प्राप्त हो जाते हैं। कारण कि परा और अपरा—दोनों प्रकृतियाँ भगवान्की ही हैं। ज्ञानयोग पराको लेकर और कर्मयोग अपराको लेकर चलता है। इसलिये किसी एक योगकी पूर्णता होनेपर तीनों योगोंकी पूर्णता हो जाती है। परन्तु इसमें एक शर्त यह है कि साधक अपने मतका आग्रह न रखे और दूसरेके मतका खण्डन या निन्दा न करे, दूसरेके मतको छोटा न माने। अपने मतका आग्रह रहनेसे और दूसरेके मतको छोटा मानकर उसका खण्डन या निन्दा करनेसे साधकको मुक्ति (तत्त्वज्ञान)-की प्राप्ति तो हो सकती है, पर भक्ति (परमप्रेम)-की अर्थात् समग्रताकी प्राप्ति नहीं हो सकती।
परिशिष्टके सम्बन्धमें
श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रन्थ है, जिसका आजतक न तो कोई पार पा सका, न पार पाता है, न पार पा सकेगा और न पार पा ही सकता है। गहरे उत्तरकर इसका अध्ययन-मनन करनेपर नित्य नये-नये विलक्षण भाव प्रकट होते रहते हैं। गीतामें जितना भाव भरा है, उतना बुद्धिमें नहीं आता। जितना बुद्धिमें आता है, उतना मनमें नहीं आता। जितना मनमें आता है, उतना कहनेमें नहीं आता। जितना कहनेमें आता है, उतना लिखनेमें नहीं आता। गीता असीम है, पर उसकी टीका सीमित ही होती है। हमारे अन्तःकरणमें गीताके जो भाव आये थे, वे पहले 'साधक-संजीवनी' टीकामें लिख दिये थे। परन्तु उसके बाद भी विचार करनेपर भगवत्कृपा तथा सत्तकृपासे गीताके नये-नये भाव प्रकट होते गये। उनको अब 'परिशिष्ट भाव' के रूपमें 'साधक-संजीवनी' टीकामें जोड़ा जा रहा है।
'साधक-संजीवनी' टीका लिखते समय हमारी समझमें निर्गुणकी मुख्यता रही; क्योंकि हमारी पढ़ाईमें निर्गुणकी मुख्यता रही और विचार भी उसीका किया। परन्तु निष्पक्ष होकर गहरा विचार करनेपर हमें भगवान्के सगुण (समग्र) स्वरूप तथा भक्तिकी मुख्यता दिखायी दी। केवल निर्गुणकी मुख्यता माननेसे सभी बातोंका ठीक समाधान नहीं होता। परन्तु केवल सगुणकी मुख्यता माननेसे कोई सन्देह बाकी नहीं रहता। समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं। भगवान्ने भी सगुणको ही समग्र कहा है—'असंशयं समग्रं माम्' (गीता ७।१)।
परिशिष्ट लिखनेपर भी अभी हमें पूरा सन्तोष नहीं है और हमने गीतापर विचार करना बन्द नहीं किया है। अतः आगे भगवत्कृपा तथा सत्तकृपासे क्या-क्या नये भाव प्रकट होंगे—इसका पता नहीं! परन्तु मानव-जीवनकी पूर्णता भक्ति (प्रेम)-की प्राप्तिमें ही है—इसमें हमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है।
पहले 'साधक-संजीवनी' टीकामें श्लोकोंके अर्थ अन्वयपूर्वक न करनेसे उनमें कहीं-कहीं कमी रह गयी थी। अब श्लोकोंका अन्वयपूर्वक अर्थ देकर उस कमीकी पूर्ति कर दी गयी है। अन्वयार्थमें कहीं अर्थको लेकर और कहीं वाक्यकी सुन्दरताको लेकर विशेष विचारपूर्वक परिवर्तन किया गया है।
पाठकोंको पहलेकी और बादकी (परिशिष्ट) व्याख्यामें कोई अन्तर दीखे तो उनको बादकी व्याख्याका भाव ही ग्रहण करना चाहिये। यह सिद्धान्त है कि पहलेकी अपेक्षा बादमें लिखे हुए विषयका अधिक महत्त्व होता है। इसमें इस बातका विशेष ध्यान रखा गया है कि साधकोंका किसी प्रकारसे अहित न हो। कारण कि यह टीका मुख्यरूपसे साधकोंके हितकी दृष्टिसे लिखी गयी है, विद्वताको दृष्टिसे नहीं।
साधकोंको चाहिये कि वे अपना कोई आग्रह न रखकर इस टीकाको पढ़ें और इसपर गहरा विचार करें तो वास्तविक तत्त्व उनकी समझमें आ जायगा और जो बात टीकामें नहीं आयी है, वह भी समझमें आ जायगी!
विनीत—
स्वामी रामसुखदास
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
नब्बेवाँ संस्करणका नम्र निवेदन
साधक महानुभावोंकी सेवामें 'साधक-संजीवनी' का संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है! इस ग्रन्थके अन्तमें एक नया विषय—'साधक-संजीवनी-कोश' को सम्मिलित किया गया है। इस कोशका कार्य परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजकी इच्छासे उनके सशरीर विद्यमान रहते ही आरम्भ हो चुका था। इस कोशको सम्मिलित करनेसे ग्रन्थकी उपयोगितामें और अधिक वृद्धि हो गयी है।
आशा है कि पाठकगण 'साधक-संजीवनी'के इस संवर्धित संस्करणसे अधिक लाभान्वित होंगे और इस ग्रन्थमें आये हुए विभिन्न विषयोंका और अधिक गहराईसे अध्ययन-मनन कर सकेंगे।
—प्रकाशक
॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या प्राकथन ..... ६-५
पहला अध्याय
१-११ पाण्डव और कौरव-सेनाके मुख्य-मुख्य महारथियोंके नामोंका वर्णन (विशेष बात ३५) ..... २५-३६ १२-१९ दोनों पक्षोंकी सेनाओंके शंखवादनका वर्णन ..... ३७-४२ २०-२७ अर्जुनके द्वारा सेना-निरीक्षण ..... ४३-४८ २८-४७ अर्जुनके द्वारा कायरता, शोक और पश्चातापयुक्त वचन कहना तथा संजयद्वारा शोकाविष्ट अर्जुनकी अवस्थाका वर्णन ..... ४८-६३ (विशेष बात ५५, ६१) पहले अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... ६४ पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... ६४
दूसरा अध्याय
१-१० अर्जुनकी कायरताके विषयमें संजय-द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादका वर्णन ..... ६५-७६ (विशेष बात ७०) ११-३० सांख्ययोगका वर्णन ..... ७६-१११ (विशेष बात ८०, ८७; मार्मिक बात ८९; विशेष बात ९३, ९३, ९९, १०२; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात १०९) ३१-३८ क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन ..... १११-११७ (प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ११६) ३९-५३ कर्मयोगका वर्णन ..... ११७-१४० (समता-सम्बन्धी विशेष बात १२०; विशेष बात १२४; मार्मिक बात १२८; बुद्धि और समता-सम्बन्धी विशेष बात १३२) ५४-७२ स्थितप्रज्ञके लक्षणों आदिका वर्णन ..... १४०-१६६ (मार्मिक बात १५३; अहंता-ममतासे रहित होनेका उपाय १६१; विशेष बात १६४) दूसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... १६६ दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... १६६
तीसरा अध्याय
१-८ सांख्ययोग और कर्मयोगकी दृष्टिसे
श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या
कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता-का निरूपण ..... १६८-१८२ (मार्मिक बात १७१, १७३; विशेष बात १७५; साधन-सम्बन्धी मार्मिक बात १८१) ९-१९ यज्ञ और सृष्टिचक्रकी परम्परा सुरक्षित रखनेके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण ..... १८२-२०८ (मार्मिक बात १८४; कर्तव्य और अधिकार-सम्बन्धी मार्मिक बात १८८; कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात १९१; मार्मिक बात २०१; विशेष बात २०२, २०५; मार्मिक बात २०८)
२०-२९ लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकताका निरूपण ... २०८-२२८ (परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी मार्मिक बात २०९; विशेष बात २१३, २१८, २१९, २२२, २२३; गुण-कर्मविभागको तत्वसे जाननेका उपाय २२५; प्रकृति-पुरुष-सम्बन्धी मार्मिक बात २२६; विशेष बात २२७)
३०-३५ राग-द्वेषरहित होकर स्वधर्मके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा. २२९-२५१ (अर्पण-सम्बन्धी विशेष बात २२९; कामना-सम्बन्धी विशेष बात २३०; विशेष बात २३२; राग-द्वेषपर विजय पानेके उपाय २४०; सेवा-सम्बन्धी मार्मिक बात २४३; मार्मिक बात २४८; स्वधर्म और परधर्म-सम्बन्धी मार्मिक बात २५०)
३६-४३ पापोंके कारणभूत 'काम'को मारनेकी प्रेरणा ..... २५१-२७१ (कामना-सम्बन्धी विशेष बात २५३; विशेष बात २५६, २५९, २६२; मार्मिक बात २६७, २६९) तीसरे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... २७१ तीसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... २७१
चौथा अध्याय
१-१५ कर्मयोगकी परम्परा और भगवान्के जन्मों तथा कर्मोंकी दिव्यताका वर्णन ..... २७४-३१०
( ज )
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| (विशेष बात २७६; मार्मिक बात २८१; विशेष बात २८७; अवतार-सम्बन्धी विशेष बात २८९; मार्मिक बात २९८; विशेष बात ३०४) | ||
| १६—३२ | कर्मिके तत्त्वका और तदनुसार यज्ञोंका वर्णन ..... | ३१०—३३६ |
| (विशेष बात ३१२; मार्मिक बात ३१२; विशेष बात ३२६; मार्मिक बात ३२८; विशेष बात ३३३) | ||
| ३३—४२ | ज्ञानयोग और कर्मयोगकी प्रशंसा तथा प्रेरणा ..... | ३३७—३५२ |
| (ज्ञानप्राप्तिकी प्रचलित प्रक्रिया ३३७; विशेष बात ३४५, ३४७, ३४९) | ||
| चौथे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच..... | ३५२ | |
| चौथे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ३५२ | |
| पाँचवाँ अध्याय | ||
| १—६ | सांख्ययोग तथा कर्मयोगकी एकताका प्रतिपादन और कर्मयोगकी प्रशंसा ..... | ३५३—३६६ |
| (मार्मिक बात ३५९; विशेष बात ३६३) | ||
| ७—१२ | सांख्ययोग और कर्मयोगके साधनका प्रकार ..... | ३६६—३८० |
| (विशेष बात ३६७, ३७२; मार्मिक बात ३७८) | ||
| १३—२६ | फलसहित सांख्ययोगका विषय .... | ३८०—४०४ |
| (समता-सम्बन्धी विशेष बात ३८९) | ||
| २७—२९ | ध्यान और भक्तिका वर्णन..... | ४०५—४०९ |
| पाँचवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच .... | ४०९ | |
| पाँचवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ४०९ | |
| छठा अध्याय | ||
| १—४ | कर्मयोगका विषय और योगारूढ़ मनुष्यके लक्षण ..... | ४११—४२० |
| (विशेष बात ४१३) | ||
| ५—९ | आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा और सिद्ध कर्मयोगीके लक्षण ..... | ४२०—४३१ |
| (उद्धार-सम्बन्धी विशेष बात ४२९; विशेष बात ४२९) | ||
| १०—१५ | आसनकी विधि और फलसहित सगुण-साकारके ध्यानका वर्णन..... | ४३१—४३८ |
| (विशेष बात ४३२) | ||
| १६—२३ | नियमोंका और फलसहित स्वरूपके ध्यानका वर्णन ..... | ४३८—४५० |
| (विशेष बात ४४०, ४४२, ४४४) |
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| २४—२८ | फलसहित निर्गुण-निराकारके ध्यानका वर्णन ..... | ४५०—४५९ |
| (ध्यान-सम्बन्धी मार्मिक बात ४५२; परमात्मामें मन लगानेकी युक्तियाँ ४५६) | ||
| २९—३२ | सगुण और निर्गुणके ध्यान-योगियोंका अनुभव..... | ४५९—४६५ |
| ३३—३६ | मनके निग्रहका विषय..... | ४६५—४७१ |
| (मार्मिक बात ४७०) | ||
| ३७—४७ | योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन और भक्ति-योगीकी महिमा..... | ४७१—४८८ |
| (विशेष बात ४७३, ४७९, ४८१; मार्मिक बात ४८३, विशेष बात ४८७) छठे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ४८८ | |
| छठे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ४८८ | |
| सातवाँ अध्याय | ||
| १—७ | भगवान्के द्वारा समग्ररूपके वर्णनकी प्रतिज्ञा करना तथा अपरा-परा प्रकृतियोंके संयोगसे प्राणियोंकी उत्पत्ति बताकर अपनेको सबका मूल कारण बताना ४८९—५१० | |
| (विशेष बात ४९१; शरणागतिके पर्याय ४९१; ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात ४९४; विशेष बात ५०३) | ||
| ८—१२ | कारणरूपसे भगवान्की विभूतियोंका वर्णन ..... | ५१०—५२० |
| (विशेष बात ५१३, ५१८) | ||
| १३—१९ | भगवान्के शरण होनेवालोंका और शरण न होनेवालोंका वर्णन .... | ५२१—५४८ |
| (विशेष बात ५२६, ५३१; मार्मिक बात ५३२, ५४२; महात्माओंकी महिमा ५४४) | ||
| २०—२३ | अन्य देवताओंकी उपासनाओंका फलसहित वर्णन ..... | ५४८—५५४ |
| (विशेष बात ५५३) | ||
| २४—३० | भगवान्के प्रभावको न जाननेवालों-की निन्दा और जाननेवालोंकी प्रशंसा तथा भगवान्के समग्ररूपका वर्णन . | ५५४—५७७ |
| (विशेष बात ५५५, ५६४; भगवान्के समग्ररूप-सम्बन्धी विशेष बात ५६८; अध्याय-सम्बन्धी विशेष बात ५७०) सातवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ५७६ | |
| सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ५७६ |
( ८ )
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| सातवें अध्यायका सार ..... | ५७६-५७७ | |
| आठवाँ अध्याय | ||
| १-७ | अर्जुनके सात प्रश्न और भगवान्के द्वारा उनका उत्तर देते हुए सब समयमें अपना स्मरण करनेकी आज्ञा देना ..... | ५७९-५९३ |
| (विशेष बात ५८३; मार्मिक बात ५८७; विशेष बात ५८९; स्मरण-सम्बन्धी विशेष बात ५९२) | ||
| ८-१६ | सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार और सगुण-साकारकी उपासनाका फलसहित वर्णन ..... | ५९४-६०५ |
| (विशेष बात ६०२, ६०४, ६०४) | ||
| १७-२२ | ब्रह्मलोकतककी अवधिका और भगवान्की महत्ता तथा भक्तिका वर्णन ..... | ६०५-६१३ |
| (विशेष बात ६१२) | ||
| २३-२८ | शुक्ल और कृष्ण-गतिका वर्णन और उसको जाननेवाले योगीकी महिमा ..... | ६१३-६२१ |
| (विशेष बात ६१६) | ||
| आठवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ... | ६२१ | |
| आठवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ६२१ | |
| नवाँ अध्याय | ||
| १-६ | प्रभावसहित विज्ञानका वर्णन ..... | ६२३-६३६ |
| (ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष बात ६२४; विशेष बात ६२८; मार्मिक बात ६३३; विशेष बात ६३५) | ||
| ७-१० | महासर्ग और महाप्रलयका वर्णन ... | ६३६-६४२ |
| ११-१५ | भगवान्का तिरस्कार करनेवाले एवं आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंका कथन तथा दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले भक्तोंके भजनका वर्णन ..... | ६४२-६४९ |
| १६-१९ | कार्य-कारणरूपसे भगवत्स्वरूप विभूतियोंका वर्णन ..... | ६४९-६५४ |
| २०-२५ | सकाम और निष्काम उपासनाका फलसहित वर्णन ..... | ६५४-६६३ |
| (विशेष बात ६५९, ६६२) | ||
| २६-३४ | पदार्थों और क्रियाओंको भगवदर्पण करनेका फल बताकर भक्तिके अधिकारियोंका और भक्तिका वर्णन ..... | ६६३-६९० |
| (विशेष बात ६६४, ६६६, ६६८; |
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| मार्मिक बात ६७७; विशेष बात ६८१; मार्मिक बात ६८२, ६८४; विशेष बात ६८८; सातवें और नवें अध्यायके विषयकी एकता ६८८) | ||
| नवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ६९० | |
| नवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ६९० | |
| नवें अध्यायका सार ..... | ६९१-६९२ | |
| दसवाँ अध्याय | ||
| १-७ | भगवान्की विभूति और योगका कथन तथा उनको जाननेकी महिमा ६९३-७०४ (विशेष बात ६९९, ७०२) | |
| ८-११ | फलसहित भगवद्भक्ति और भगवत्कृपाका प्रभाव ..... | ७०४-७११ |
| (विशेष बात ७०५, ७१०) | ||
| १२-१८ | अर्जुनके द्वारा भगवान्की स्तुति और योग तथा विभूतियोंको कहनेके लिये प्रार्थना ..... | ७१२-७१८ |
| १९-४२ | भगवान्के द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगका वर्णन ..... | ७१८-७४२ |
| (विशेष बात ७३५, ७३९) | ||
| दसवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ७४२ | |
| दसवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ७४२ | |
| ग्यारहवाँ अध्याय | ||
| १-८ | विराट्रूप दिखानेके लिये अर्जुनकी प्रार्थना और भगवान्के द्वारा अर्जुनको दिव्यचक्षु प्रदान करना ..... | ७४३-७५२ |
| (विशेष बात ७५०, ७५१) | ||
| ९-१४ | संजयद्वारा धृतराष्ट्रके प्रति विराट्रूपका वर्णन ..... | ७५२-७५६ |
| १५-३१ | अर्जुनके द्वारा विराट्रूपको देखना और उसकी स्तुति करना ..... | ७५६-७७१ |
| (विशेष बात ७५६; मार्मिक बात ७६२) | ||
| ३२-३५ | भगवान्के द्वारा अपने अत्युग्र विराट्रूपका परिचय और युद्धकी आज्ञा ..... | ७७१-७७६ |
| (विशेष बात ७७५) | ||
| ३६-४६ | अर्जुनके द्वारा विराट्रूप भगवान्की स्तुति-प्रार्थना ..... | ७७६-७८८ |
| (ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका वर्णन ७८५, विशेष बात ७८६) | ||
| ४७-५० | भगवान्के द्वारा विराट्रूपके दर्शनकी |
( ७ )
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| दुर्लभता बताना और भयभीत अर्जुनको आश्वासन देना..... | ७८८—७९५ | |
| (विशेष बात ७८९; संजय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रही? ७९२) | ||
| ५१—५५ | भगवान्के द्वारा चतुर्भुजरूपकी महत्ता और उसके दर्शनका उपाय बताना..... | ७९५—८०२ |
| (विशेष बात ८००, ८०१) | ||
| ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ... | ८०२ | |
| ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ८०२ | |
| बारहवाँ अध्याय | ||
| १—१२ | सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी श्रेष्ठताका निर्णय और भगवत्प्राप्तिके चार साधनोंका वर्णन ..... | ८०३—८३६ |
| (विशेष बात ८११; विशेष बात—सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और निर्गुण-उपासनाकी कठिनताएँ ८१६; विशेष बात ८२३; भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात ८२५; कर्मफलत्याग-सम्बन्धी विशेष बात ८३३; साधन-सम्बन्धी विशेष बात ८३५) | ||
| १३—२० | सिद्ध-भक्तोंके उन्तालीस लक्षणोंका वर्णन ..... | ८३६—८५७ |
| (मामिक बात ८५१; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ८५२) | ||
| बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच... ८५७ | ||
| बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ८५७ | |
| तेरहवाँ अध्याय | ||
| १—१८ | क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा), ज्ञान और ज्ञेय (परमात्मा)-का भक्ति-सहित विवेचन ..... | ८५९—८९२ |
| (मामिक बात ८६१; विशेष बात ८६८, ८६९, ८७२, ८८०) | ||
| १९—३४ | ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका विवेचन ८९२—९१४ | |
| (मामिक बात ९०४) | ||
| तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ९१४ | |
| तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ९१४ | |
| चौदहवाँ अध्याय | ||
| १—४ | ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत्की उत्पत्ति ..... | ९१५—९१९ |
| ५—१८ | सत्त्व, रज और तम—इन तीनों |
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| गुणोंका विवेचन ..... | ९१९—९३९ | |
| (विशेष बात ९२०, ९२६; मामिक बात ९३१; विशेष बात ९३६, ९३८) | ||
| १९—२७ | भगवत्प्राप्तिका उपाय एवं गुणातीत पुरुषके लक्षण..... | ९३९—९५० |
| (विशेष बात ९४३) | ||
| चौदहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | ९५० | |
| चौदहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | ९५० | |
| पंद्रहवाँ अध्याय | ||
| १—६ | संसार-वृक्षका तथा उसका छेदन करके भगवान्के शरण होनेका और भगवद्भ्रामका वर्णन ..... | ९५१—९७१ |
| (विशेष बात ९५९; वैराग्य-सम्बन्धी विशेष बात ९६०; संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय ९६१; विशेष बात ९६७, ९६८) | ||
| ७—११ | जीवात्माका स्वरूप तथा उसे जानने-वाले और न जानेवालेका वर्णन... ९७२—९९० | |
| (विशेष बात ९७४, ९८१, ९८२; मामिक बात ९८४, ९८७) | ||
| १२—१५ | भगवान्के प्रभावका वर्णन..... | ९९०—९९९ |
| (परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात ९९५; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ९९७; मामिक बात ९९९) | ||
| १६—२० | क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका वर्णन तथा अध्यायका उपसंहार... ९९९—१००९ | |
| (मामिक बात १००२; विशेष बात १००४) पंद्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... | १००९ | |
| पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... | १००९ | |
| पंद्रहवें अध्यायका सार..... | १००९—१०१० | |
| सोलहवाँ अध्याय | ||
| १—५ | फलसहित दैवी और आसुरी सम्पत्तिका वर्णन..... | १०१२—१०३४ |
| (मामिक बात १०२८, १०३०) | ||
| ६—८ | सत्कर्मोंसे विमुक्त हुए आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंकी मान्यताओं-का कथन ..... | १०३५—१०४१ |
| (विशेष बात १०३९) | ||
| ९—१६ | आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके दुराचारों और मनोरथोंका फल-सहित वर्णन ..... | १०४१—१०४९ |
| १७—२० | आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके |
( ३ )
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| दुर्भाव और दुर्गतिका वर्णन ..... १०४९—१०५५ | ||
| (विशेष बात १०५४) | ||
| २१—२४ | आसुरी-सम्पत्तिके मूलभूत दोष— | |
| काम, क्रोध और लोभसे रहित | ||
| होकर शास्त्रविधिके अनुसार कर्म | ||
| करनेकी प्रेरणा ..... १०५५—१०६० | ||
| सोलहवें अध्यायके पद, अक्षर | ||
| और उवाच ..... १०६० | ||
| सोलहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... १०६० | ||
| सत्रहवाँ अध्याय | ||
| १—६ | तीन प्रकारकी श्रद्धाका और आसुर | |
| निश्चयवाले मनुष्योंका वर्णन ... १०६१—१०६९ | ||
| (मार्मिक बात १०६४; विशेष बात १०६९) | ||
| ७—१० | सात्विक, राजस और तामस | |
| आहारीकी रुचिका वर्णन ..... १०६९—१०७५ | ||
| (प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात १०७३; | ||
| भोजनके लिये आवश्यक विचार १०७४) | ||
| ११—२२ | यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन | |
| भेदोंका वर्णन ..... १०७६—१०९२ | ||
| (सात्विकताका तात्पर्य १०७६; मनकी | ||
| प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय १०८३; | ||
| दान-सम्बन्धी विशेष बात १०९१; कर्म- | ||
| फल-सम्बन्धी विशेष बात १०९१) | ||
| २३—२८ | 'अ' तत्सत्'के प्रयोगकी व्याख्या | |
| और असत्-कर्मका वर्णन..... १०९३—१०९९ | ||
| सत्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच १०९९ | ||
| सत्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... १०९९ | ||
| अठारहवाँ अध्याय | ||
| १—१२ | संन्यास और त्यागके विषयमें | |
| मतान्तर और कर्मयोगका वर्णन ११०२—११३२ | ||
| (मार्मिक बात १११६; कर्म-सम्बन्धी | ||
| विशेष बात १११९) | ||
| १३—४० | सांख्ययोगका वर्णन ..... ११३२—११७१ | |
| (मार्मिक बात ११४३; विशेष बात |
| श्लोक-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|
| ११५२, ११६०, ११६७, ११६८) | ||
| ४१—४८ | कर्मयोगका भक्तिसहित वर्णन.. ११७१—११९३ | |
| (विशेष बात ११७२; गोरक्षा-सम्बन्धी | ||
| विशेष बात ११७६; स्वाभाविक | ||
| कर्मोंका तात्पर्य ११७८; जाति जन्मसे | ||
| मानी जाय या कर्मसे ११७८; विशेष | ||
| बात ११८४, ११८७, ११९०) | ||
| ४९—५५ | सांख्ययोगका वर्णन ..... ११९३—१२०२ | |
| (विशेष बात १२००) | ||
| ५६—६६ | भगवद्भक्तिका वर्णन ..... १२०२—१२४३ | |
| (प्रेम-सम्बन्धी विशेष बात | ||
| १२०६; विशेष बात १२१०, | ||
| १२१३, १२१६; शरणागति- | ||
| सम्बन्धी विशेष बात १२२८; | ||
| शरणागतिका रहस्य १२३६) | ||
| ६७—७८ | श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा ..... १२४३—१२६३ | |
| (मार्मिक बात १२५५) | ||
| अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और | ||
| उवाच ..... १२६३ | ||
| अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ..... १२६३ | ||
| आरती ..... १२६४ | ||
| साधक-संजीवनी-कोश ..... १२६५—१२९६ | ||
| विषयानुक्रमणिका ..... १२६५—१२७९ | ||
| साधक-संजीवनीमें आयी | ||
| गीता-सम्बन्धी मुख्य बातें..... १२८० | ||
| साधक-संजीवनीमें आयी | ||
| व्याकरण-सम्बन्धी बातें ..... १२८१ | ||
| 'साधक-संजीवनी' में मूल गीताके पाठभेद . १२८१ | ||
| साधक-संजीवनीमें आयी कहानियाँ..... १२८२ | ||
| उद्भुत श्लोकानुक्रमणिका ..... १२८३—१२८८ | ||
| हिन्दी पद्यानुक्रमणिका..... १२८९—१२९१ | ||
| नामानुक्रमणिका ..... १२९२—१२९३ | ||
| पारिभाषिक शब्दावली | ||
| (साधक-संजीवनीके अनुसार) .. १२९३—१२९६ |
( रेखाचित्र )
| क्रम-संख्या | पृष्ठ-संख्या | क्रम-संख्या | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १ | २७२ | ४ | ६२२ |
| २ | ४१० | ५ | ८५८ |
| ३ | ५७८ | ६ | ११०० |
[ ४ ]
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
कृष्णां वन्दे जगदगुरुम्
पराकृतनमद्वन्धं परं ब्रह्म नराकृति। सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं महः ॥ प्रपन्नपारिजाताय तोत्रवेत्रैकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः ॥ वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णां वन्दे जगदगुरुम् ॥
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वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् पीताम्बरादरुणविम्बफलधरोष्ठात् । पूर्णन्दुसुन्दरमुखारविन्दनेत्रात् कृष्णात् परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥
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भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्घोषनावर्तिनी सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः ॥
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एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव। एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ॥
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
प्राक्कथन
वंशीधरं तोत्त्रधरं नमामि मनोहरं मोहहरं च कृष्णम्। मालाधरं धर्मधुरन्धरं च पार्थस्य सारथ्यकरं च देवम्॥ कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिं च। ददाति गीता करुणार्द्रभूता कृष्णेन गीता जगतो हिताय॥ संजीवनी साधकजीवनीयं प्राप्तिं हेरैवं सरलं ब्रवीति। करोति दूरं पथविघ्नबाधां ददाति शीघ्रं परमात्मसिद्धिम्॥*
गीताकी महिमा
श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा अगाध और असीम है। यह भगवद्गीताग्रन्थ प्रस्थानत्रयमें माना जाता है। मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये तीन राजमार्ग 'प्रस्थानत्रय' नामसे कहे जाते हैं—एक वैदिक प्रस्थान है, जिसको 'उपनिषद्' कहते हैं; एक दार्शनिक प्रस्थान है, जिसको 'ब्रह्मसूत्र' कहते हैं और एक स्मार्त प्रस्थान है, जिसको 'भगवद्गीता' कहते हैं। उपनिषदोंमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्रमें सूत्र हैं और भगवद्गीतामें श्लोक हैं। भगवद्गीतामें श्लोक होते हुए भी भगवान्की वाणी होनेसे ये मन्त्र ही हैं। इन श्लोकोंमें बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ होनेसे इनको सूत्र भी कह सकते हैं। 'उपनिषद्' अधिकारी मनुष्योंके कामकी चीज है और 'ब्रह्मसूत्र' विद्वानोंके कामकी चीज है; परन्तु 'भगवद्गीता' सभीके कामकी चीज है।
भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है। वास्तविक तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमें नित्य-निरन्तर एकरस-एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियोंमें राग-द्वेषके कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित
होनेपर उसका स्वतः अनुभव हो जाता है।
भगवद्गीताका उपदेश महान् अलौकिक है। इसपर कई टीकाएँ हो गयीं और कई टीकाएँ होती ही चली जा रही हैं, फिर भी सन्त-महात्माओं, विद्वानोंके मनमें गीताके नये-नये भाव प्रकट होते रहते हैं। इस गम्भीर ग्रन्थपर कितना ही विचार किया जाय, तो भी इसका कोई पार नहीं पा सकता। इसमें जैसे-जैसे गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे इसमेंसे गहरी बातें मिलती चली जाती हैं। जब एक अच्छे विद्वान् पुरुषके भावोंका भी जल्दी अन्त नहीं आता, फिर जिनका नाम, रूप आदि यावन्मात्र अन्त है, ऐसे भगवान्के द्वारा कहे हुए वचनोंमें भरे हुए भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है ?
इस छोटे-से ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हेरक दर्शनके अलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।
भगवद्गीतामें साधनोंका वर्णन करनेमें, विस्तारपूर्वक समझानेमें, एक-एक साधनको कई बार कहनेमें संकोच नहीं किया गया है, फिर भी ग्रन्थका कलेवर नहीं बढ़ा है। ऐसा संक्षेपमें विस्तारपूर्वक यथार्थ और पूरी बात बतानेवाला दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं दीखता। अपने कल्याणकी उत्कट अभिलाषावाला मनुष्य हेरक परिस्थितिमें परमात्मतत्त्वको
- 'जो अपने हाथोंमें वंशी तथा चाबुक और गलेमें दिव्य माला धारण किये हुए हैं एवं जो प्राणियोंके मनका तथा मोहका हरण करनेवाले हैं, उन पार्थसारथि धर्मधुरन्धर दिव्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।'
'भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा गायी हुई करुणार्द्रभूता गीता जगत्के हितके लिये कर्तव्यकी दीक्षा, समताकी शिक्षा, ज्ञानकी भिक्षा और शरणागतिका तत्त्व प्रदान करनेवाली है।'
'परमात्मप्राप्तिको सरल बनानेवाली और साधकोंका जीवन यह 'साधक-संजीवनी' साधन-पथकी विघ्न-बाधाओंको दूर करके शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप परमसिद्धिको प्रदान करनेवाली है।'
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प्राप्त कर सकता है; युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी अपना कल्याण कर सकता है—इस प्रकार व्यवहारमात्रमें परमार्थकी कला गीतामें सिखायी गयी है। अतः इसके जोड़ेका दूसरा कोई ग्रन्थ देखनेमें नहीं आता।
गीता एक प्रासादिक ग्रन्थ है। इसका आश्रय लेकर पाठ करनेमात्रसे बड़े विचित्र, अलौकिक और शान्तिदायक भाव स्फुरित होते हैं। इसका मन लगाकर पाठ करनेमात्रसे बड़ी शान्ति मिलती है। इसकी एक विधि यह है कि पहले गीताके पूरे श्लोक अर्थसहित कण्ठस्थ कर लिये जायें, फिर एकान्तमें बैठकर गीताके अन्तिम श्लोक ‘यत्र
गीताका खास लक्ष्य
गीता किसी वादको लेकर नहीं चली है अर्थात् द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, विशुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद आदि किसी भी वादको, किसी एक सम्प्रदायके किसी एक सिद्धान्तको लेकर नहीं चली है। गीताका मुख्य लक्ष्य यह है कि मनुष्य किसी भी वाद, मत, सिद्धान्तको माननेवाला क्यों न हो, उसका प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याण हो जाय, वह किसी भी परिस्थितिमें परमात्मप्राप्तिसे वंचित न रहे; क्योंकि जीवमात्रका मनुष्ययोनियें जन्म केवल अपने कल्याणके लिये ही हुआ है। संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मतत्त्व प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान है। अतः साधकके सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका केवल सदुपयोग करना है। सदुपयोग करनेका अर्थ है—दुःखदायी परिस्थिति आनेपर सुखकी इच्छाका त्याग करना; और सुखदायी परिस्थिति आनेपर सुखभोगका तथा ‘वह बनी रहे’ ऐसी इच्छाका त्याग करना और उसको दूसरोंकी सेवामें लगाना। इस प्रकार सदुपयोग करनेसे मनुष्य दुःखदायी और सुखदायी—दोनों परिस्थितियोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है।
सुष्टिसे पूर्व परमात्मामें ‘मैं एक ही अनेक रूपोंमें हो जाऊँ’ ऐसा संकल्प हुआ। इस संकल्पसे एक ही परमात्मा प्रेमवृद्धिकी लीलाके लिये, प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये स्वयं ही श्रीकृष्ण और श्रीजी (श्रीराधा)—इन दो
गीताका योग
गीतामें ‘योग’ शब्दके बड़े विचित्र-विचित्र अर्थ हैं। उनके हम तीन विभाग कर सकते हैं—(१) ‘युजिर् योगे’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—समरूप परमात्माके साथ
योगेश्वरः कृष्णः.....’—यहाँसे लेकर गीताके पहले श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे.....’—यहाँतक बिना पुस्तकके उलटा पाठ किया जाय तो बड़ी शान्ति मिलती है। यदि प्रतिदिन पूरी गीताका एक या अनेक बार पाठ किया जाय तो इससे गीताके विशेष अर्थ स्फुरित होते हैं। मनमें कोई शंका होती है तो पाठ करते-करते उसका समाधान हो जाता है।
वास्तवमें इस ग्रन्थकी महिमाका वर्णन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। अनन्तमहिमाशाली ग्रन्थकी महिमाका वर्णन कर ही कौन सकता है ?
रूपोंमें प्रकट हो गये। उन दोनोंपर स्पष्ट लीला करनेके लिये एक खेल रचा। उस खेलके लिये प्रभुके संकल्पसे अनन्त जीवोंकी (जो कि अनादिकालसे थे) और खेलके पदार्थों—(शरीरादि—) की सृष्टि हुई। खेल तभी होता है, जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र हों। इसलिये भगवान्ने जीवोंको स्वतन्त्रता प्रदान की। उस खेलमें श्रीजीका तो केवल भगवान्की तरफ ही आकर्षण रहा, खेलमें उनसे भूल नहीं हुई। अतः श्रीजी और भगवान्में प्रेमवृद्धिकी लीला हुई। परन्तु दूसरे जितने जीव थे, उन सबने भूलसे संयोगजन्य सुखके लिये खेलके पदार्थों—(उत्पत्ति-विनाशशील प्रकृतिजन्य पदार्थों—)के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया, जिससे वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गये।
खेलके पदार्थ केवल खेलके लिये ही होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु वे जीव खेल खेलना तो भूल गये और मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके खेलके पदार्थोंको अर्थात् शरीरादिको व्यक्तिगत मानने लग गये। इसलिये वे उन पदार्थोंमें फँस गये और भगवान्से सर्वथा विमुख हो गये। अब अगर वे जीव शरीरादि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें, तो वे जन्म-मरणरूप महान् दुःखसे सदाके लिये छूट जायें। अतः जीव संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायें और भगवान्के साथ अपने नित्ययोग—(नित्य सम्बन्ध—)को पहचान लें—इसीके लिये भगवद्गीताका अवतार हुआ है।
नित्यसम्बन्ध; जैसे—‘समत्वं योग उच्यते’ (२।४८) आदि। यही अर्थ गीतामें मुख्यतासे आया है।
(२) ‘युज् समाधी’ धातुसे बना ‘योग’ शब्द, जिसका अर्थ है—चित्तकी स्थिरता अर्थात् समाधिमें
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स्थिति; जैसे—'यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया' (६।२०) आदि।
(३) 'युजु संयमने' धातुसे बना 'योग' शब्द, जिसका अर्थ है—संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव; जैसे—'पश्य मे योगमेश्वरम्' (९।५) आदि।
गीतामें जहाँ कहीं 'योग' शब्द आया है, उसमें उपर्युक्त तीनोंमेंसे एक अर्थकी मुख्यता और शेष दो अर्थोंकी गौणता है; जैसे—'युजिर् योगे' वाले 'योग' शब्दमें समता-(सम्बन्ध-) की मुख्यता है, पर समता आनेपर स्थिरता और सामर्थ्य१ भी स्वतः आ जाती है। 'युजु समाधी' वाले 'योग' शब्दमें स्थिरताकी मुख्यता है, पर स्थिरता आनेपर समता और सामर्थ्य भी स्वतः आ जाती है। 'युजु संयमने' वाले 'योग' शब्दमें सामर्थ्यकी मुख्यता है, पर सामर्थ्य आनेपर समता और स्थिरता भी स्वतः आ जाती है। अतः गीताका 'योग' शब्द बड़ा व्यापक और गम्भीरार्थक है।
पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तियोंके निरोधको 'योग' नामसे कहा गया है—'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' (१।२) और उस योगका परिणाम बताया है—द्रष्टाकी स्वरूपमें स्थिति हो जाना—'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' (१।३)। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो परिणाम बताया गया है, उसीको गीतामें 'योग' नामसे कहा गया है (दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ और छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। तात्पर्य है कि गीता चित्तवृत्तियोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वतःसिद्ध सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको योग कहती है। उस समतामें स्थिति (नित्ययोग) होनेपर फिर कभी उससे वियोग नहीं होता, कभी वृत्तिरूपता नहीं होती, कभी व्युत्थान नहीं होता। वृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 'निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्थिति होनेपर 'निर्विकल्प बोध' होता है। 'निर्विकल्प बोध'
१-भगवान्में संसारमात्रकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदिकी जो सामर्थ्य है, वह सामर्थ्य योगीमें नहीं आती—'जगदव्यापारवर्जम्' (ब्रह्मसूत्र ४।४।१७)। योगीमें जो सामर्थ्य आती है, उससे वह संसारमात्रपर विजय प्राप्त कर लेता है (गीता ५।१९) अर्थात् कैसी ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता।
२-श्रीमद्भागवतमें भगवान्को कहा है—
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधितस्या। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्तु कुत्रचित् ॥ (११।२०।६)
'अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन तीनोंके सिवा दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।'
यही बात अध्यात्मरामायण और देवीभागवतमें भी आयी है—
(क) मार्गस्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षापित्साधकाः। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः ॥ (अध्यात्म ७।७।५९)
(ख) मार्गस्त्रयो मे विख्याता मोक्षप्राप्ती नगाधिप। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च सत्तम ॥ (देवी ७।३७।३)
अवस्थातीत और सम्पूर्ण अवस्थाओंका प्रकाशक है।
समता अर्थात् नित्ययोगका अनुभव करानेके लिये गीतामें तीन योग-मार्गोंका वर्णन किया गया है—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंका संसारके साथ अभिन्ना सम्बन्ध है। अतः इन तीनोंको दूसरोंकी सेवामें लगा दे—यह कर्मयोग हुआ; स्वयं इनसे असंग होकर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाय—यह ज्ञानयोग हुआ; और स्वयं भगवान्के समर्पित हो जाय—यह भक्तियोग हुआ। इन तीनों योगोंको सिद्ध करनेके लिये अर्थात् अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ प्राप्त हैं—(१) करनेकी शक्ति (बल), (२) जाननेकी शक्ति (ज्ञान) और (३) माननेकी शक्ति (विश्वास)। करनेकी शक्ति निःस्वार्थभावसे संसारकी सेवा करनेके लिये है, जो कर्मयोग है; जाननेकी शक्ति अपने स्वरूपको जाननेके लिये है, जो ज्ञानयोग है और माननेकी शक्ति भगवान्को अपना तथा अपनेको भगवान्का मानकर सर्वथा भगवान्के समर्पित होनेके लिये है, जो भक्तियोग है। जिसमें करनेकी रुचि अधिक है, वह कर्मयोगका अधिकारी है। जिसमें अपने-आपको जाननेकी जिज्ञासा अधिक है, वह ज्ञानयोगका अधिकारी है। जिसका भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास अधिक है, वह भक्तियोगका अधिकारी है। ये तीनों ही योग-मार्ग परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं। अन्य सभी साधन इन तीनोंके ही अन्तर्गत आ जाते हैं१।
सभी साधनोंका खास काम है—जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करना। अतः जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी प्रणालियों-(साधनों- ) में तो फरक रहता है, पर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सभी साधन एक हो जाते हैं अर्थात् अन्तमें सभी साधनोंसे एक ही समरूप परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इस समरूप परमात्मतत्त्वकी
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प्राप्तिको ही गीताने 'योग' नामसे कहा है, और इसीको 'नित्ययोग' कहते हैं।
गीतामें केवल कर्मयोगका, केवल ज्ञानयोगका अथवा केवल भक्तियोगका ही वर्णन हुआ हो—ऐसी बात भी नहीं है। इसमें उपर्युक्त तीनों योगोंके अलावा यज्ञ, दान, तप, ध्यानयोग, प्राणायाम, हठयोग, लययोग आदि साधनोंका भी वर्णन किया गया है। इसका खास कारण यही है कि गीतामें अर्जुनके प्रश्न युद्धके विषयमें नहीं हैं, प्रत्युत कल्याणके विषयमें हैं और भगवान्के द्वारा गीता कहनेका उद्देश्य भी युद्ध
साधनकी दो शैलियाँ
जीवमें एक तो चेतन परमात्माका अंश है और एक जड़ प्रकृतिका अंश है। चेतन-अंशकी मुख्यतासे वह परमात्माकी इच्छा करता है और जड़-अंशकी मुख्यतासे वह संसारकी इच्छा करता है। इन दोनों इच्छाओंमें परमात्माकी इच्छा तो पूरी होनेवाली है, पर संसारकी इच्छा कभी पूरी होनेवाली है ही नहीं। कुछ सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति होती हुई दीखनेपर भी वास्तवमें उनकी निवृत्ति नहीं होती, प्रत्युत संसारकी आसक्तिके कारण नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती रहती हैं। वास्तवमें सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति अर्थात् सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति इच्छाके अधीन नहीं है, प्रत्युत कर्मके अधीन है। परन्तु परमात्माकी प्राप्ति कर्मके अधीन नहीं है। स्वयंकी उत्कट अभिलाषामात्रसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक कर्मका आदि और अन्त होता है; इसलिये उसका फल भी आदि-अन्तवाला ही होता है। अतः आदि-अन्तवाले कर्मोंसे अनादि-अनन्त परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? परन्तु साधकोंने प्रायः ऐसा समझ रखा है कि जैसे क्रियाकी प्रधानतासे सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति होती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्ति भी उसी प्रकार क्रियाकी प्रधानतासे ही होगी और जैसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी उसी प्रकार शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ेगी। इसलिये ऐसे साधक जडता-(शरीरादि)-की सहायतासे अभ्यास करते हुए परमात्माकी तरफ चलते हैं।
जैसे ध्यानयोगमें दीर्घकालतक अभ्यास करते-करते अर्थात् परमात्मामें चित्तको लगाते-लगाते जब चित्त निरुद्ध हो जाता है, तब उसमें संसारकी कोई इच्छा न रहनेसे और स्वयं जड़ होनेके कारण परमात्माको ग्रहण न कर सकनेसे वह (चित्त) संसारसे उपराम हो जाता है। चित्तके उपराम
करानेका बिलकुल नहीं है। अर्जुन अपना निश्चित कल्याण चाहते थे (दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला श्लोक)। इसलिये शास्त्रोंमें जितने कल्याणकारक साधन कहे गये हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंका गीतामें संक्षेपसे विशद वर्णन मिलता है। उन साधनोंको लेकर ही साधक-जगत्में गीताका विशेष आदर है। कारण कि साधक चाहे किसी मतका हो, किसी सम्प्रदायका हो, किसी सिद्धान्तको माननेवाला हो, पर अपना कल्याण तो सबको अभीष्ट है।
होनेसे साधकका चित्तसे अर्थात् जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और वह स्वयंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है (गीता—छठे अध्यायका बीसवाँ श्लोक)। परन्तु जो साधक आरम्भसे ही परमात्माके साथ अपना स्वतःसिद्ध नित्य-सम्बन्ध मानकर और जडतासे अपना किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध न मानकर साधन करता है, उसको बहुत जल्दी और सुगमतापूर्वक परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।
इस प्रकार परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधकोंके लिये साधनकी दो शैलियाँ हैं। जिस शैलीमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक जडताकी सहायता लेकर साधन करता है, उसको 'करण-सापेक्ष-शैली' नामसे और जिस शैलीमें स्वयंकी प्रधानता रहती है अर्थात् जिसमें साधक आरम्भसे ही जडताकी सहायता न लेकर स्वयंसे साधन करता है, उसको 'करण-निरपेक्ष-शैली' नामसे कह सकते हैं। यद्यपि इन दोनों ही साधन-शैलियोंसे परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति कारण-निरपेक्षतासे अर्थात् स्वयंसे (जडतासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर) ही होती है, तथापि 'करण-सापेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति देरीसे होती है और 'करण-निरपेक्ष-शैली'से चलनेपर उसकी प्राप्ति शीघ्रतासे होती है। साधनकी इन दोनों शैलियोंमें चार मुख्य भेद हैं—
(१) कारण-सापेक्ष-शैलीमें जडता-(शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-का) आश्रय लेना पड़ता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें जडताका आश्रय नहीं लेना पड़ता, प्रत्युत जडतासे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करना पड़ता है।
(२) कारण-सापेक्ष-शैलीमें एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें अवस्थाओंसे सम्बन्धविच्छेद होकर अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव होता है।
(३) कारण-सापेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियों-(सिद्धियों-)की प्राप्ति होती है, पर कारण-निरपेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियोंसे
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‘सम्बन्ध-विच्छेद होकर सीधे परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है।’
(४) करण-सापेक्ष-शैलीमें कभी तत्काल सिद्धि नहीं मिलती, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जड़तासे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर, अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर अथवा भगवान्के शरण होनेपर तत्काल सिद्धि मिलती है।
पातंजलयोगदर्शनमें तो योगकी सिद्धिके लिये करण-सापेक्ष-शैलीको महत्त्व दिया गया है, पर गीतामें योगकी सिद्धिके लिये करण-निरपेक्ष-शैलीको ही महत्त्व दिया गया है। परमात्मामें मन लग गया, तब तो ठीक है, पर मन नहीं लगा तो कुछ नहीं हुआ—यह करण-सापेक्ष-शैली है। परमात्मामें मन लगे या न लगे, कोई बात नहीं, पर स्वयं परमात्मामें लग जाय—यह करण-निरपेक्ष-शैली है। तात्पर्य यह है कि करण-सापेक्ष-शैलीमें परमात्माके साथ मन-बुद्धिका सम्बन्ध है और करण-निरपेक्ष-शैलीमें मन-बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्माके साथ स्वयंका सम्बन्ध है। इसलिये करण-सापेक्ष-शैलीमें अभ्यासके द्वारा क्रमसे सिद्धि होती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है। कारण कि स्वयंका परमात्माके साथ स्वतःसिद्धि नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग) है। अतः भगवान्ने सम्बन्ध मानने अथवा जाननेमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं है; जैसे—विवाह होनेपर स्त्री पुरुषको अपना पति मान लेती है, तो ऐसा माननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता। इसी तरह किसीके बतानेपर ‘यह गंगाजी हैं’—ऐसा जाननेके लिये भी कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता१। करण-सापेक्ष-शैलीमें तो अपने लिये साधन करने—(क्रिया-) की मुख्यता रहती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जानने (विवेक) और मानने—(भाव-) की मुख्यता रहती है।
‘मेरा जड़ता—(शरीरादि-—)से सम्बन्ध है ही नहीं’—ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक इसको आरम्भसे
ही दृढ़तापूर्वक मान लेता है, तब उसे ऐसा ही स्पष्ट अनुभव हो जाता है। जैसे वह ‘मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है’—इस प्रकार गलत मान्यता करके बँधा था, ऐसे ही ‘मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है’—इस प्रकार सही मान्यता करके मुक्त हो जाता है; क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे मिट जाती है—यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवान्ने गीतामें कहा है कि अज्ञानी मनुष्य शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर उससे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है—‘अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३। २७)। परन्तु ज्ञानी मनुष्य उन क्रियाओंका कर्ता अपनेको नहीं मानता—‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (५। ८)। तात्पर्य यह हुआ कि अवास्तविक मान्यताको मिटानेके लिये वास्तविक मान्यता करनी जरूरी है।
‘मैं हिन्दू हूँ’, ‘मैं ब्राह्मण हूँ’, ‘मैं साधु हूँ’ आदि मान्यताएँ इतनी दृढ़ होती हैं कि जबतक इन मान्यताओंको स्वयं नहीं छोड़ता, तबतक इनको कोई दूसरा नहीं छोड़ा सकता। ऐसे ही ‘मैं शरीर हूँ’, ‘मैं कर्ता हूँ’ आदि मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो जाती हैं कि उनको छोड़ना साधकको कठिन मालूम देता है। परन्तु ये लौकिक मान्यताएँ अवास्तविक, असत्य होनेके कारण सदा रहनेवाली नहीं हैं, प्रत्युत मिटनेवाली हैं। इसके विपरीत ‘मैं शरीर नहीं हूँ’, ‘मैं भगवान्का हूँ’ आदि मान्यताएँ वास्तविक, सत्य होनेके कारण कभी मिटती ही नहीं, प्रत्युत उनकी विस्मृति होती है, उनसे विमुखता होती है। इसलिये वास्तविक मान्यता दृढ़ होनेपर मान्यतारूपसे नहीं रहती, प्रत्युत बोध—(अनुभव-—)में परिणत हो जाती है।
यद्यपि गीतामें करण-सापेक्ष-शैलीका भी वर्णन किया गया है (जैसे चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवेंतक तथा चौतीसवों श्लोक, छठे अध्यायके दसवेंसे अठ्ठाईसवेंतक, आठवें अध्यायके आठवेंसे सोलहवेंतक और पन्द्रहवें
१-अगर करण-सापेक्ष-शैली—(चित्तवृत्तिनिरोध-—)से सीधे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती, तो पातंजलयोगदर्शनका ‘विभूतिपाद’ (जिसमें सिद्धियोंका वर्णन है) व्यर्थ हो जाता। करण-सापेक्ष-शैलीसे जिन सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है, वे तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विघ्न हैं। पातंजलयोगदर्शनमें भी उन सिद्धियोंको विघ्नरूपसे माना गया है—‘ते समाधावृत्तिसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः’ (३। ३७) अर्थात् वे (सिद्धियाँ) समाधिकी सिद्धिमें विघ्न हैं और व्युत्थान—(व्यवहार-—)में सिद्धियाँ हैं; ‘स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गमयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्’ (३। ५१) अर्थात् लोकपाल देवताओंके द्वारा (अपने लोकोंके भोगोंका लालच देकर) बुलानेपर न तो उन भोगोंमें राग करना चाहिये और न अभिमान करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः अनिष्ट (पतन) होनेकी सम्भावना है।
२-वास्तवमें परमात्माको मानने अथवा जाननेके विषयमें संसारका कोई भी दृष्टान्त पूरा नहीं घटता। कारण कि संसारको मानने अथवा जाननेमें तो मन-बुद्धि साथमें रहते हैं, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेमें मन-बुद्धि साथमें नहीं रहते अर्थात् परमात्माका अनुभव स्वयंसे होता है, मन-बुद्धिसे नहीं। दूसरी बात, संसारको मानने अथवा जाननेका तो आरम्भ और अन्त होता है, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेका आरम्भ और अन्त नहीं होता। कारण कि वास्तवमें संसारके साथ हमारा (स्वयंका) सम्बन्ध है ही नहीं, जबकि परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध सदासे ही है और सदा ही रहेगा।
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अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक आदि) तथापि मुख्यरूपसे करण-निर्पेक्ष-शैलीका ही वर्णन हुआ है। (जैसे दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ तथा पचपनवाँ, तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ, चौथे अध्यायका अड़तीसवाँ, पाँचवें अध्यायके बारहवेंका पूर्वार्ध, छठे अध्यायका पाँचवाँ, नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ, बारहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवें अध्यायका बासठवाँ, छाछठवाँ तथा तिहतरवाँ श्लोक आदि-आदि)। इसका कारण यह है कि भगवान् साधकोंको शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक अपनी प्राप्ति कराना चाहते हैं। दूसरी बात, अर्जुनने युद्धकी परिस्थिति प्राप्त होनेके समय अपने कल्याणका उपाय पूछा है। अतः उनके कल्याणके लिये करण-निर्पेक्ष-शैली ही काममें आ सकती है; क्योंकि करण-निर्पेक्ष-शैलीमें मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें और सम्पूर्ण शास्त्रविहित कर्म करते हुए भी अपना कल्याण कर सकता है। इसी शैलीके अनुसार (अभ्यास किये बिना) अर्जुनका मोह नाश हुआ और उनको स्मृतिकी प्राप्ति हुई (अठारहवें अध्यायका तिहतरवाँ श्लोक)।
साधनकी करण-निर्पेक्ष-शैली सबके लिये समानरूपसे उपयोगी है; क्योंकि इसमें किसी विशेष योग्यता, परिस्थिति आदिकी आवश्यकता नहीं है। इस शैलीमें केवल परमात्म-प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होनेसे ही तत्काल जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होकर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। जैसे कितने ही वर्षोंका अँधेरा हो, एक दियासलाई जलाते ही वह नष्ट हो जाता है, ऐसे ही जड़ताके साथ कितना ही पुराना (अनन्त जन्मोंका) सम्बन्ध हो, परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही वह मिट जाता है। इसलिये उत्कट अभिलाषा करण-सापेक्षतासे होनेवाली समाधिसे भी ऊँची चीज है। ऊँची-से-ऊँची निर्विकल्प समाधि हो, उससे भी व्युत्थान होता है और फिर व्यवहार होता है अर्थात् समाधिका भी आरम्भ और अन्त होता है। जबतक आरम्भ और अन्त होता है, तबतक जड़ताके साथ सम्बन्ध है। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधनका आरम्भ और अन्त नहीं होता, प्रत्युत परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है*।
वास्तवमें देखा जाय तो परमात्मासे वियोग कभी हुआ ही नहीं, होना सम्भव ही नहीं। केवल संसारसे माने हुए संयोगके कारण परमात्मासे वियोग प्रतीत हो रहा है। संसारसे माने हुए संयोगका त्याग करते ही परमात्मतत्त्वके अभिलाषी मनुष्यको तत्काल नित्ययोगका अनुभव हो जाता है और उसमें स्थायी
स्थिति हो जाती है।
अन्तःकरणको शुद्ध करनेकी आवश्यकता भी करण-सापेक्ष-शैलीमें ही है, करण-निर्पेक्ष-शैलीमें नहीं। जैसे कलम बढ़िया होनेसे लिखाई तो बढ़िया हो सकती है, पर लेखक बढ़िया नहीं हो जाता, ऐसे ही करण (अन्तःकरण) शुद्ध होनेसे क्रियार्थ तो शुद्ध हो सकती है, पर कर्ता शुद्ध नहीं हो जाता। कर्ता शुद्ध होता है—अन्तःकरणसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेसे; क्योंकि अन्तःकरणसे अपना सम्बन्ध मानना ही मूल अशुद्धि है।
नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वके साथ जीवका नित्ययोग स्वतःसिद्ध है; अतः उसकी प्राप्तिमें करणकी अपेक्षा नहीं है। केवल उधर दृष्टि डालनी है, जैसा कि श्रीरामचरितमानसमें आया है—‘संकर सहज सरूपु सम्हारा’ (१।५८।४) अर्थात् भगवान् शंकरने अपने सहज स्वरूपको सँभाला, उसकी तरफ दृष्टि डाली। सँभाली चीज वह होती है, जो पहलेसे ही हमारे पास हो और केवल दृष्टि डालनेसे पता लग जाय कि यह है। ऐसे ही दृष्टि डालनेमात्रसे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। परन्तु सांसारिक सुखकी कामना, आशा और भोगके कारण उधर दृष्टि डालनेमें, उसका अनुभव करनेमें कठिनता मालूम देती है। जबतक सांसारिक भोग और संग्रहकी तरफ दृष्टि है, तबतक मनुष्यमें यह ताकत नहीं है कि वह अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि डाल सके। अगर किसी कारणसे, किसी खास विवेचनसे उधर दृष्टि चली भी जाय, तो उसका स्थायी रहना बड़ा कठिन है। कारण कि नाशवान् पदार्थकी जो प्रियता भीतरमें बैठी हुई है, वह प्रियता भगवान्के स्वतःसिद्ध सम्बन्धको समझने नहीं देती; और समझमें आ जाय तो स्थिर नहीं रहने देती। हाँ, अगर उत्कट अभिलाषा जाग्रत हो जाय कि उस तत्त्वका अनुभव कैसे हो? तो इस अभिलाषामें यह ताकत है कि यह संसारकी आसक्तिका नाश कर देगी।
गीतोक्त कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों ही साधन करण-निर्पेक्ष अर्थात् स्वयंसे होनेवाले हैं। कारण कि क्रिया और पदार्थ अपने और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत दूसरोंके और दूसरोंकी सेवाके लिये हैं; मैं शरीर नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है, मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं—इस प्रकार विवेकपूर्वक क्रिया गया विचार अथवा मान्यता करण-सापेक्ष (अभ्यास) नहीं है; क्योंकि इसमें जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद है। अतः कर्मयोगमें स्वयं ही जड़ताका
- जबतक जड़ताका सम्बन्ध रहता है, तबतक दो अवस्थाएँ रहती हैं; क्योंकि परिवर्तनशील होनेसे जड़ प्रकृति कभी एकरूप नहीं रहती। अतः समाधि और व्युत्थान—ये दोनों अवस्थाएँ जड़ताके सम्बन्धसे ही होती हैं। जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ‘सहजावस्था’ होती है, जिसे सन्तोने ‘सहज समाधि’ कहा है। इससे फिर कभी व्युत्थान नहीं होता।