भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

जिसे दादा का निदिध्यासन रहता है, उसके सारे ताले खुल जाते हैं। दादा के निदिध्यासन का साक्षात् फल मिलता है।

जगत् कल्याण का निमित्त बनने का जिसने बीड़ा उठाया है, उसे दुनिया में कौन रोक सकता है? देवी-देवता भी पुष्पवृष्टि करते हैं।

जब से इस मार्ग में आगे बढ़े हैं, तभी से पूर्णाहुति हो सकती है। अगर आप चोखे हो तो आपका नाम देनेवाला कोई नहीं है।

१७. अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक

मोक्ष और ब्रह्मचर्य का क्या लेना-देना? काफी कुछ लेना-देना है। ब्रह्मचर्य के बिना आत्मा के अनुभव का पता ही नहीं चलता। यह जो सुख महसूस हो रहा है, वह आत्मा का है या पुद्गल का है, वह पता ही नहीं चलता न। अब, कितने ही अब्रह्मचारी मोक्ष में गए हैं। वहाँ क्या होता है कि ब्रह्मचर्य के लिए पॉजिटिव होना चाहिए। नेगेटिववाले को कभी भी आत्मा प्राप्त नहीं होगा। शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करें, वह उच्च है या शादी नहीं करके? ज्ञानियों ने शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करने को उच्च कहा है। फिर भी मोक्ष में जानेवालों को आखिरी दस-पंद्रह साल तो सर्वसंग परित्याग बरतना ही चाहिए। ब्रह्मचर्य के बिना तो मोक्ष में जाया ही नहीं जा सकता।

ब्रह्मचर्य के लिए किसी पर दबाव नहीं डालना चाहिए। ब्रह्मचर्य व्रत एकदम से किसी को नहीं दे सकते। एकाध साल के लिए देकर धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं। आपका निश्चय और हमारा वचनबल विषय को खत्म कर देगा। अंतराय तोड़ देगा।

अक्रम मार्ग में आश्रम जैसा नहीं होता। लेकिन जो ब्रह्मचारी बने हैं, उनके लिए होना चाहिए। ब्रह्मचारियों के संग में रहना पड़ेगा।

दादाश्री खुद के बारे में बताते हैं कि हमें ब्रह्मचर्य पालन नहीं करना होता, हमें तो वह बर्ताता है। विषय जैसी कोई चीज है भी, ऐसा याद तक नहीं आता। शरीर में वे परमाणु ही नहीं हैं न! और खुद भी पूर्वजन्मों से यह माल खाली करते हुए आए हैं। इसलिए बचपन से ही विषय में रुचि नहीं थी।

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पहले के जमाने में बाल-विवाह होते थे। इसलिए अन्य कहीं दृष्टि बिगड़ने का सवाल ही नहीं रहता था न। जीवन कितना सुंदर और पवित्र बीतता था। उसका असर बच्चों पर कितना सुंदर पड़ता था। बच्चे भी संस्कारी और एक जैसे होते थे।

शादी करने में इतने सारे जोखिम हैं, फिर भी शौक से घोड़े पर चढ़कर शादी करते हैं, क्या यही आश्चर्य नहीं है? इसका कारण यही है कि वह इसके परिणामों को जानता ही नहीं है। थोड़ा सा दुःख लेकिन अंततः तो सुख ही है, ऐसी मान्यता के आधार पर ही सभी शादी करते हैं।

जिसे पुद्गलसार (ब्रह्मचर्य) और अध्यात्मसार (शुद्धात्मा) दोनों प्राप्त हो गए, उसका तो कल्याण ही हो गया न!

ब्रह्मचर्य आत्मा के स्वाभाविक गुणों को प्रकट होने देता है, आत्मानुभव होने देता है, आत्मा के गुणों का अनुभव होने देता है।

ब्रह्मचर्य और परफेक्ट व्यवहार दोनों साथ में होंगे तो ब्रह्मचारी जगत् का कल्याण करने में बहुत ही हितकारी हो सकेंगे।

खुद का व्यवहार कैसा है यह बताते हुए दादाश्री ने कहा है, ‘हमारी एक दहाड़ से तुरंत ही महात्माओं के रोग निकल जाते हैं। इनका हाथ छू जाए तो भी सामनेवाले का काम बन जाता है। ऐसी सारी सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं।’

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि आपका निश्चय और हमारा वचनबल, अगर एक साथ ये दोनों होंगे तो पूरा ‘व्यवस्थित’ बदल सकता है। यहीं पर एक अपवाद सर्जित होता है।

ब्रह्मचारियों को पैंतीस साल तक विषय के सामने निरंतर सतर्क रहना पड़ता है। वर्ना मोह का वातावरण ‘रिज पॉइन्ट’ पर आ जाए तो उसे उड़ा देता है! तब ज्ञान बीज को भी उड़ा देता है। लेकिन अगले जन्म में यह ज्ञान सहायक होगा।

शादी करने के लिए मना करने से क्या अंतराय कर्म बंधते हैं?

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मुंबई जाते हैं, उससे क्या बाकी शहरों से अंतराय डाला ऐसा कहा जाएगा ?

ब्रह्मचर्य पालन करने से कर्म बंधते हैं ?

अज्ञानदशा में ब्रह्मचर्य पालन करने से पुण्य बंधता है और अब्रह्मचर्य से पाप बंधता है। लेकिन अक्रम ज्ञान से तो कर्म ही नहीं बंधता। दोनों डिस्चार्ज ही माना जाता है। इसमें कर्ता बनकर ज्ञानी की आज्ञा सहित पालन करते हैं, उतना ही चार्ज है। ब्रह्मचर्य इटसेल्फ डिस्चार्ज है, लेकिन उसके पीछे जो भाव है, वह 'चार्ज' माना जाता है। आज्ञा पालन करने जितना चार्ज माना जाता है। इसका फल सम्यक पुण्य मिलता है। जिससे सीमंधर स्वामी के नजदीक रहने की सहूलियतें आसानी से मिल जाएँगी। यह सब वैज्ञानिक खोज है दादा की !

संपूज्य दादाश्री ब्रह्मचर्य की मजबूती के लिए हर रविवार को पूरी तरह से उपवास करने का नियम देते थे, जिससे विषय का विरोधी बने और ब्रह्मचर्य में बहुत पुष्टि मिले।

जिसे लक्ष्मी या विषय से संबंधित विचार ही नहीं आते, देह से अलग रहता है, उसे जगत् भगवान कहे बगैर नहीं रहेगा !

१८. दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को

परम पूज्य दादाश्री ने बहनों को पुष्टि देकर ब्रह्मचर्य के मार्ग पर मोड़ा है। उनके हाथों आप्तपुत्रियाँ तैयार हुई हैं।

अच्छे कपड़े पहने हुए, अप टू डेट युवक को देखकर लड़कियाँ मूर्छित हो जाती हैं, लेकिन अंदर माल कितना कचरेवाला होगा, वह नहीं देख सकतीं! सुंदरता देखकर ही मूर्छित हो जाती हैं। वहाँ पर फँसना नहीं, वरना वह जन्म बिगाड़ देगा। अगले जन्म की गाँठ पड़ जाएगी। दादाश्री ने ऐसा बताया है कि लड़कियों के लिए ब्रह्मचर्य पालन करने में ज्यादा मुश्किलें हैं। अगर निश्चय नहीं डगमगाए तो गारन्टी से ब्रह्मचर्य पालन कर पाएँगी। श्री विजन की जागृति रहेगी तो वह मोह को निकाल पाएँगी।

युवाओं को शादी करने के लिए कहें तो वे मना करते हैं। घर

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पर माँ-बाप का सुख(!) देखकर उन्हें जबरदस्त वैराग्य आ जाता है।

भले ही कितना भी आकर्षण हो, लेकिन खूब प्रतिक्रमण करते रहने पर उसमें से छूट सकते हैं।

आजकल पति कैसे होते हैं? पति तो उसे कहते हैं कि एक क्षण भी पत्नी को न भूले! यह तो सारा कचरा! बाहर कितनी ही स्त्रियों के साथ सौदे करते फिरते हैं। इस काल में प्रेम नहीं लेकिन आसक्ति ही देखने को मिलती है। प्रेम भूखे नहीं लेकिन विषय भूखे होते हैं। यह एक तरह की संडास ही कहलाती है, विषय यानी शादी की इसलिए घर का संडास आ गया, वना बाहर जहाँ-तहाँ जाते फिरेंगे! उसके बिना चारा ही नहीं है न, इसलिए!

जिसे एकावतारी पद प्राप्त करके मोक्ष में ही जाना है, उसे सबसे पहले ज्ञानी से आत्मज्ञान प्राप्त करना पड़ेगा। फिर आज्ञा में आकर ब्रह्मचर्य पालन करेंगे तभी हो पाएगा। स्त्रियों को इसके अलावा मोह और कपट से पूर्णतः मुक्त होना पड़ेगा। परपुरुष के लिए विचार तक नहीं आना चाहिए। और यदि आ जाए तो तुरंत ही प्रतिक्रमण करके धो देना पड़ेगा। जो मिश्र-चेतन से सावधान रहा, उसका कल्याण हो गया! मिश्रचेतन के साथ यदि विकारी संबंधों की लपेट में आ गए तो जानवर गति में खींच ले जाएगा!

ज्ञानीपुरुष के पास खुद का कल्याण कर लेना है। खुद कल्याण स्वरूप हो जाए तो उससे बिना कुछ बोले दूसरों का कल्याण हो जाएगा। बोलते रहने से या भाषण देने से कुछ नहीं होता। चात्रि की मूर्ति देखते ही सभी भावों का शमन हो जाता है! इसलिए प्योर बनना है, शीलवान बनना है!

- डॉ. नीरुबहन अमीन - जय सच्चिदानंद

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चेत रे ब्रह्मचारी...

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, दगा जैसा है संसार, हँसकर बात मत लगा, मोक्ष के लिए हो जा तैयार, नजर से नजर मत मिला, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चटनी के लिए खोया थाल नखराली नजरे हो तुच्छकार, विषय में तृप्ति नहीं जरा भी, कड़ी नजर में है उपकार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, गाफिल होना नहीं जरा भी, स्त्री सदा दावा करना, दृष्टि दोष से कायम संसार, नौ गज से कर रे नमस्कार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, शादी की फाइल है तैयार, नैनों के लागे गोलीबार, कसौटी का यह तेरा काल, हथियार कुंद होते हार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय कीचड़ में डूबनेवाले, कड़ी नजर के रख हथियार, विश्व में नहीं मिलते हाथ पकड़नेवाले, टूटते पहले बाँध ले बाड़, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, निश्चय क्यों डिगाना, चेतना स्त्री के तिरस्कार से, आंधी तो आए बार-बार। छिपा उसमें विषय का रणकार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
विषय अंत में धिक्कार,विषय से बंधे नर्कांगार,
अणहक्क बाँधे नर्कांगार,आलोचना एक ही उबारनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
अग्नि और पेट्रोल मिलनसार,भयंकर विषय दोष का बोझ,
मिलते विषयी भीषण झाल,आलोचना करके उतार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
विषय है जलानेवाला,दृष्टि आकर्षित हो जहाँ पलभर,
निर्विषयी दादा जैसा बननेवाला,बीज पड़े होते ही तम्याकार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
शील का ग्रही ले अलंकार,बीज दो पत्तियों से फूटनार,
कल्याणी हेतु आकर्षनार,उखेड़ तत्क्षण दूर फेंकनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
श्री विज्ञन से विषय जीतनार,दो पत्तियाँ फिर तेरी हार,
दादापुत्र बनो आप होनहार,सूक्ष्म में वीर्य स्वल्पन थनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।
चेतन कर ले विचार,चेतन कर ले विचार,
स्पर्श दोष जहरीला अपार,दृष्टि से सूक्ष्म गलन थनार,
चेत नहीं तो तू फिसलनार,स्थूल में फिर न कोई रोकनार,
इसलिए चेतकर चल।इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, उखाड़ कॉपल तत्वार, विषयों चित् उपचार, अटके स्वल्पन था होशियार, निदिध्यासन एक ही सार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय विचारे तन्मयाकार, बुद्धि से माना सुखसार, मंथन से वीर्य स्वल्पनार, विषय में कहाँ सुख तलभार? इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, मन कमजोर पड़े फिर भी मत हार, ब्रह्मचर्य का क्या आधार? दादाई कृपा अपरंपार, समझ से या अहंकार? इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त से खींचे फोटो बार-बार, वीर्य है पुद्गलसार, प्रतिक्रमण करके धोना कोटि बार, वह जीतने से प्राप्त समयसार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त को बिखरने मत देना, खुद जैसा जग करनार, आत्म ऐश्वर्य लूटनार, कैसे चले ध्येय तोड़नार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, चित्त का ऐसा है धिरधार, अखंड ब्रह्मचर्य की धार, एक बार टिके, वहीं जनार, मर जाना, लेकिन न चुकनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

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चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, स्थूल दोष चले नहीं एक भी बार, स्पष्ट वेदन किसे मिलेगा, एक बार डूबा तो क्या विचार? ब्रह्मचर्य धारण करना, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, ध्येय का महान है चितार, विषयों की अब क्या मदार, कदम छोटे और प्रमाद अपार, दादा कृपा अपरंपार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विषय तो भोगे अनंतबार, ब्रह्मचर्य बिना नहीं है उद्धार, ज्ञानी नहीं आए हाथ दोबारा, मोक्ष गए सर्वसंग त्यागनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, विश्व में विषय अंधकार, ब्रह्मचारी विश्वे अचरजकार, दीप बनकर तू जग तार, क्रम-अक्रम को आप जोड़नार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, कब निकलोगे विषय पार, जग कल्याणी ध्येय सवार, तभी झगमगाएगा ज्ञान अपार, शील से कष्ट कंपावनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

चेतन कर ले विचार, चेतन कर ले विचार, ब्रह्मचर्य ही सर्वाधार, आपोपु गए पूर्ण थनार, भगवंत पद पर पहुँचानेवाला, निरालंब स्व में बर्तनार, इसलिए चेतकर चल। इसलिए चेतकर चल।

(साधक को 'चेतन' की जगह पर खुद का नाम लेना है)

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अनुक्रमणिका

खंड : १ | | ---|---|--- विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से | वासना, वस्तु नहीं, लेकिन रस ज्ञानी ही छुड़वाते हैं, वासना... विषय और कथा की भेदरेखा | ३९ ४० ४१

[ १ ]

[ ३ ]

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का | माहात्म्य ब्रह्मचर्य का | ---|---|--- कीचड़ में टंडक का मजा | १ विषय की कीमत कितनी? | ४३ इस जहर को जहर जाना? | ३ विषय से जर्जरित हुए जीवन | ४३ परवशताएँ कैसे पुसाए? | ४ ब्रह्मचर्य पालन करने की सीढ़ियाँ | ४४ शादी करने के परिणाम तो देखो | ६ व्रत के परिणाम | ४५ पूरी दुनिया की है वह जूटन | ८ आज्ञासहित व्रत ही सही | ४६ सुख के साधन या अशुचित् का... | १० ब्रह्मचर्य तो कैसा होना चाहिए? | ४७ सच्चा आम का भोग, विषय... | १२ अभिप्राय बदलते ही निकलना... | ५१ सभी इन्द्रियों ने निंदा की... | १३ गजब के वे ब्रह्मचारी | ५१ बुद्धि से सोचा है विषय... | १५ | निरा गंदगी दिखे विषय में | १६ 'शादी नहीं करने' के निश्चयवालों | खरा सुख किस में? | के लिए राह | चल रहे हैं कहाँ? दिशा... | १८ | समझो ब्रह्मचर्य की कमाई | १९ | किफायत करो वीर्य और... | २१ किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है? | अक्रम विज्ञान प्राप्ति करवाए... | २३ शादी नहीं करने के निश्चयवाले... | ५३ इतना आवश्यक है, ब्रह्मचर्य... | २३ समझकर दाखिल होना इसमें | ५५ ज्ञान कितने अधिक रहता है,... | २५ बार-बार करना निश्चय दृढ़ | ५७ शरीर का राजा कौन? | २६ हे विषय! अब तेरे पक्ष में नहीं | ५८

[ २ ]

विकारों से विमुक्त की राह | | ---|---|--- विकारों को हटाना है? | २९ आँखें गड़ाएँगे तो दृष्टि... | ६३ ब्रह्मचर्य, प्रोजेक्ट का परिणाम | ३० प्रतिक्रमण के बाद, दंड... | ६५ उसके हेतु पर आधारित है | ३२ देखना, सामान्य भाव से | ६७ नहीं समझा जगत् ने, स्वरूप... | ३३ उस मिठास का पृथक्करण... | ६८ अज्ञान की गलतियों की सजा... | ३४ फिर भी आकर्षण क्यों? | ७० विषय का शौक, बढ़ाए विषय | ३५ राजा जीतने से, जीतेंगे पूरा राज | ७१ नहीं रोकना चाहिए मन को | ३६ टले ज्ञान और ध्यान... | ७४

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लिंग जारी, उसका जोखिम७६जुदापन से जीत सकते हैं१३५
हार-जीत, विषय की या...७७सत्संग में भी सतर्क रहना है१३८
उसके सेवन से पात्रता७८मन की पोलों के सामने...१३९
मजबूरी से पाशवता८१बुद्धि की वकालत, बिना फौस...१४५

[ २ ]

दृष्टि उखड़े, 'श्री विजन' से

'रेसमी चार' के पीछे

अदभुत प्रयोग, श्री विजन का

खरा ब्रह्मचर्य, जागृतिपूर्वक का

उपयोग जागृति से, टलता है मोह...

मोह राजा का अंतिम व्यूह

विषय में 'छिपी हुई रूचि'...

[ ३ ]

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार

जो कभी न डगमगाए, वही...

पकड़े रखे निश्चय को ठेठ तक...

समझो निश्चय के स्वरूप को...

निश्चय के परिपोषक

इतना ही सँभाल लेना जरा

कहीं पोल को पोषण तो नहीं...

नहीं चल सकता अपवाद...

पुरुषार्थ ही नहीं, लेकिन पराक्रम...

निश्चय मांगे सिन्सियारिटी

'रिज पॉइन्ट' पर रहे जोखिम...

दृढ़ निश्चयी पहुँच सकते हैं

अधूरी समझ, वहाँ निश्चय कच्चा

क्यों गाड़ियों से नहीं टकराता?

जहाँ चोर नीयत, वहाँ नहीं हैं...

विषय के विष की परख क्यों...

'उदय' की परिभाषा तो समझो

पद्व निश्चय को कैसे अंतराय?

[ ४ ]

विषय विचार परेशान करें तब...

वह तो है भरा हुआ माल

जुदापन से जीत सकते हैं

सत्संग में भी सतर्क रहना है

मन की पोलों के सामने...

बुद्धि की वकालत, बिना फौस...

बढ़ता है विषय की लिंग से...

कला से काम निकालो

[ ५ ]

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार

ज्ञान से करो स्वच्छ, मन को

वना मन हो जाए ढीला

विरोधी के पक्षकार?

मन चलाए, मंडप तक...

ध्येय का ही निश्चय

सामायिक में चलन, मन का

ध्येय अनुसार चलाओ...

भले ही शोर मचाएँ

नहीं चलेगा बेवरिग माइन्ड...

जहाँ सिद्धांत है ब्रह्मचर्य का...

चलो, सिद्धांत के अनुसार

निश्चय, ज्ञान और मन के

आपत्तियों की पात्रता

[ ६ ]

'खुद' अपने आपको को डाँटना

खुद को डाँटकर सुधारो

पूरा करो प्रकृति को पटाकर

[ ७ ]

पछतावे सहित प्रतिक्रमण

प्रत्यक्ष आलोचना से, नकद...

जहाँ इन्टेरेस्ट, वहाँ करो...

विषय से संबंधित सामायिक...

विषयों में सुखबुद्धि किसे?

हे गॉलों! हम नहीं या तुम...

विषय बीज निर्मूल शुद्ध...

50

[ ८ ]

स्पर्श सुख की भामक मान्यता देखते ही जुगुप्सा १९२ रोंग बिलीफें, रूट कॉज में १९३ वह आवाज, मन की ही १९४ स्पर्श सुख के जोखिम १९६ स्त्री का स्पर्श लगे विष समान १९७ दोनों स्पर्शों के असर में भिन्नता २०० आकर्षण, वह है मोह २०३ जहाँ आकर्षण है, वहाँ... २०५ नियम आकर्षण - विकर्षण के २०८ एक बार भोगा कि गया २१० मुक्त दशा का थर्मामीटर २१२ भटकती वृत्तियाँ चित की २१३ चित की पकड़, छूटती... २१४

[ ९ ]

'फाइल' के सामने सख्ती विकारी दृष्टि के सामने ढाल २१६ विकारी चंचलता २१८ फाइल बन गई, वहाँ... २१८ सामने 'फाइल' आए, तब... २२० लकड़ी की पुतली अच्छी २२१ अग्नि और 'फाइल' एक से २२२ काटो सख्ती से 'उसे' २२३ वहाँ है चोर नीयत २२५ सखा, इस तरह हो सकते हैं २२७ तोड़ा जा सकता है लफड़ा... २२८ अपना बनाया कहकर डियर... २३०

[ १० ]

विषयी आचरण? तो डिसमिस यहाँ किए हुए पाप से मिले... २३३ नहीं शोभा देता वह २३४ फिसलना सहज, यदि एक... २३५ न हो संग संयोगी २३५

वहाँ पर दादा की मौन सख्ती २३८ आपत्तियों के लिए दफाएँ २४०

[ ११ ]

सेफ साइड तक की बाड़

आवश्यकताएँ, ब्रह्मचर्य के... २४३ संग, कुसंग के परिणाम २४४ लश्कर तैयार करके उतरो... २४५ विषयी वातावरण से फैला... २४८ नहीं सुननी चाहिए विषयी... २४९ समभावियों का समूह २५० संगबल की सहायता... २५१

[ १२ ]

तितिक्षा के तप से गढ़ो मन-देह

सीखो पाठ तितिक्षा के २५४ विकसित होता है मनोबल... २५७ उपवास-उणोदरी मात्र... २५९ ज्ञानियों ने नवाजा है उणोदरी... २६१ आहार जागृति से रक्षा करना... २६३ आहार में घी-शक्कर करवाते... २६४ नहाना भी है, निमंत्रण... २६६ जीना है, ध्येय अनुसार २६८ कंदमूल पोषण दें विषय को २६९

[ १३ ]

न हो असार, पुद्गलसार

पुद्गलसार है, ब्रह्मचर्य २७१ अहो, अहो! उन आत्मवीर्यवालों... २७३ बरते वीर्य, जहाँ जहाँ रुचि २७४ उपाय करना, स्वप्नदोष टालने... २७५ वीर्यशक्ति का ऊर्ध्वगमन कब? २७७ जोखिम, हृष्ट-पुष्ट शरीर के २७९ निरोगी से भागें विषय २८२ ज्ञानी की सूक्ष्म बातें २८५ उल्टी हो गई तो क्या मर... २८९ विचार : मंथन : स्खलन २९१

51

[ १४ ]

नहीं डालना चाहिए दबाव... ३५४

ब्रह्मचर्य प्राप्त करवाए ब्रह्मांड का आनंदराजा-रानी का तलाक, शादी... ३५५
इससे क्या नहीं मिल सकता?३९९ व्रत की विधि से, टूटते हैं... ३५७
समझो गंभीरता, ब्रह्मचर्य व्रत...३०२ साधना, 'संयमी' के संग ३५९
आजीवन ब्रह्मचर्य, शुरू करवाए...३०३ अक्रम में ऐसे आश्रम की... ३६१
चारित्र का सुख कैसा बरते३०६ ब्रह्मचर्य के बिना नहीं जा... ३६२
फायदा उठाएँ या नुकसान रोके?३०८ मन बिगड़े तब ३६४

[ १५ ]

'विषय' के सामने विज्ञान सेजागृति सपने के भोग का पूर्वापर... ३६५
आकर्षण के सामने चाहिए...३११ दावावाणी निकली ब्रह्मचारियों... ३६८
पूर्व में चूके, उसके ये फल हैं३१४ ब्रह्मचर्य का एक और... ३६९
वहाँ पर देखो शुद्धात्मा ही३१६ दृष्टि से ही बिगड़ता है... ३७०
पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से...३१७ किसी की बहन पर दृष्टि... ३७१
दृष्टि निर्मल कर सकते हैं ऐसे३१८ प्रतिक्रमण ही एक उपाय ३७२
विचार ध्यान में तो परिवर्तित...३२० कैसा मोह, कि शौक से... ३७४
देखने से पिघलें, गँठि विषय३२१ 'जवानी' सँभल जाए तो ३७५
'देखना' 'जानना' आत्मस्वरूप से३२६ आनंद की अनुभूति वहाँ ३७८
जहाँ जागृति में झोंका, वहाँ ...३२८ व्यवहार गढ़ता है ब्रह्मचारियों... ३८०
अंत में तो आत्मरूप ही...३३१ निश्चय के साथ में वचनबल... ३८३

[ १६ ]

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ातेहैं इसमें कर्मबंधन के नियम ३८८
सिर-माथे पर रखना ज्ञानी को...३३४ ब्रह्मचर्य, चार्ज या डिस्चार्ज ? ३९०
जानो गुनाह के फल को पहले३३५ विषय टूटे, विरोधी बनने पर ३९१
व्यापार में खो गए कि खोए...३३५ आलोचना, आपत्तपुरुष से ही ३९५
एक ध्येय, एक ही भाव३३७ अब तो उधार चुका दो ३९७
जिस राह पर चले, बताई ...३४० वह पाए परमात्म पद ३९७

[ १८ ]

'दादा' बोलते ही दादा हाजिरदादा देते पुष्टि, आपत्तपुत्रियों को ३९९
ध्येयी का हाथ थामें, दादा...मोह ढक देता है जागृति को ३९९
ज्ञानी मिटाए अनंतकाल के रोगशादी करने का आधार निश्चय... ४०२

[ १७ ]

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यकदोष, आँखों का या अज्ञानता... ४०३
बिना निराई किए हुए खेतइस विवाह-संबंध के स्वरूप... ४११
नूर झलकता है ब्रह्मचर्य काआकर्षण कुछ के प्रति ही... ४१२
दोनों में से उच्च कौन सा?ऐसी 'समझ' कौन देगा? ४२०
चारित्रबल से कांपती हैं स्त्रियाँकल्याण करना है या कल्याण... ४२३

52

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

(पूर्वार्ध)

खंड : १

विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से

[ १ ]

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का

कीचड़ में ठंडक का मजा

मनुष्य होकर भी इस पाँच इन्द्रियों के कीचड़ में क्यों पड़ा है, वही आश्चर्य है! भयंकर कीचड़ है यह तो! लेकिन इतना नहीं समझने से, जगत् अभानता में चल रहा है। यदि थोड़ा सा सोचे तब भी, ऐसा समझ में आ सकता है कि कीचड़ है लेकिन लोग सोचते ही नहीं हैं न?! निरा कीचड़ है। तो मनुष्य क्यों ऐसे कीचड़ में पड़े हुए हैं? तो इसलिए कि ‘और किसी जगह पर साफ-सुथरा नहीं मिलता। इसलिए ऐसे कीचड़ में सो गया है।’

प्रश्नकर्ता : यानी कीचड़ के प्रति अज्ञानता ही है न?

दादाश्री : हाँ, उसके प्रति अज्ञानता है। इसीलिए कीचड़ में पड़ा है। फिर यदि इसे समझने का प्रयत्न करे तो समझ में आए ऐसा है, लेकिन खुद समझने का प्रयत्न ही नहीं करता न!

कोई पूछे कि क्या जानवरों को ये विषय प्रिय हैं? तो मैं

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

कहूँगा कि नहीं, जानवरों को ये विषय बिल्कुल पसंद नहीं हैं लेकिन फिर भी उन्हें 'नैचुरल' उत्तेजना होती है। बाकी, इस विषय को तो कोई पसंद ही नहीं करे। सच्चा पुरुष हो तो पसंद ही न करे। तो ये मनुष्य क्यों इस विषय में पड़ते हैं? क्योंकि पूरे दिन भागदौड़, भागदौड़ करता है। थका हुआ होता है इसलिए उसे भान नहीं रहता कि यह कीचड़ है, इसलिए फिर पड़ जाता है उसमें। बाकी, जब बिल्कुल ही 'सेन्स' खत्म हो जाए तब यह कीचड़ याद आता है। वर्ना 'सेन्सिबल' इंसान को तो यह कीचड़ अच्छा ही नहीं लगेगा न! यह तो भागदौड़ की मेहनत और उसकी जलन है, उसका शमन करने के लिए इस कीचड़ में गिरता है। गड़दे में गिरने से यह जलन कहीं शांत नहीं हो जाती। थोड़ा-बहुत संतोष महसूस होता है, बस उतना ही और नींद आ जाती है। बाकी, उसके बाद तो मरने जैसा लगता है। इस विषय के कीचड़ से ज्यादा तो बांद्रा की खाड़ी का कीचड़ अच्छा है। सिर्फ दुर्गंध आती है, उतना ही है। बाकी कुछ नहीं। जबकि यह तो बेहद दुर्गंध है और निरे कितने ही जीव मर जाते हैं, लेकिन भान नहीं है और ऊपर से कहता है कि, 'मैं जैन हूँ।' अरे, जैन तो ऐसा नहीं होता। इसमें तो करोड़ों जीव खत्म हो जाते हैं!

ऐसा है, निर्विषय विषय किसे कहा गया है? इस जगत् में निर्विषयी विषय हैं। इस शरीर की जरूरत के लिए जो कुछ दाल-चावल-सब्जी-रोटी, जो कुछ मिले वह खाओ। वह विषय नहीं है। विषय कब कहा जाता है? कि जब तुम लुब्धमान हो जाओ तब विषय कहलाता है, वर्ना वह विषय नहीं है, वह निर्विषयी विषय है। अतः जो कुछ इस जगत् में आँखों से दिखाई देता है, वह सारा विषय नहीं है। लुब्धमान हो जाए, तभी विषय है। हमें कोई विषय छूता ही नहीं। विषय की जरूरत क्या है, यही मैं नहीं समझ पाता। ये जानवर भी जिससे तंग आ चुके हैं, उसी विषय में मनुष्यों को मजा आता है, यह कैसा आश्चर्य है?! क्यों इस कीचड़ में फँसता है, इसका विचार ही नहीं आता, ऐसे 'ब्लंट' हो गए हैं!

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

इसलिए भगवान महावीर ने पाँचवाँ महाव्रत, ब्रह्मचर्य का दिया कि आज के मनुष्यों को विषय के कीचड़ का भान ही नहीं रहेगा, इसलिए जो चार महाव्रत थे, उसके पाँच कर दिए। उनके मन में यह था कि लोग थोड़ा-बहुत सोचेंगे और इसकी जोखिमदारी समझेंगे। यह तो भयंकर विकृति है। इसके बजाय तो नर्क का दुःख अच्छा, नर्क की वेदना अच्छी, लेकिन यह वेदना तो बहुत भयंकर है!

मुझसे कुछ लोग कहते हैं कि, 'इस विषय में ऐसा क्या है कि विषयसुख चखने के बाद मैं मरणतुल्य हो जाता हूँ, मेरा मन मर जाता है, वाणी मर जाती है?' मैंने कहा कि, ये सब मेरे हुए ही हैं, लेकिन आपको भान नहीं आता और वापस वही की वही दशा उत्पन्न हो जाती है। वर्ना ब्रह्मचर्य यदि संभल जाए तो एक-एक मनुष्य में तो कितनी शक्ति है! आत्मा के ज्ञान में रहना, उसे समयसार कहते हैं। आत्माज्ञान प्राप्त करे और जागृति रहे तो समय का सार उत्पन्न होता है और ब्रह्मचर्य, वह पुद्गलसार (जो पूर्ण और गलन होता है) है। अतः इस विषय में तो एक दिन भी नहीं बिगाड़ना चाहिए। वह तो जंगली अवस्था कहलाती है।

मन, वचन, काया से ब्रह्मचर्य पालन करे तो कितना अच्छा मनोबल रहेगा, कितना अच्छा वचनबल रहेगा और कितना अच्छा देहबल रहेगा! अपने यहाँ भगवान महावीर के समय तक कैसा व्यवहार था? एक-दो बच्चों तक 'व्यवहार' रखते थे लेकिन इस काल में वह व्यवहार बिगड़ जाएगा, ऐसा भगवान जानते थे, इसलिए उन्हें पाँचवाँ महाव्रत देना पड़ा।

इस जहर को जहर जाना?

विषय को जहर समझा ही नहीं। जहर समझे तो उसे छूएगा ही नहीं न! इसलिए भगवान ने कहा है कि ज्ञान का फल है

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

विरति! समझने का फल क्या? कि रुक जाए। विषयों के जोखिम को समझ ही नहीं, इसलिए वैसा करने से रुका नहीं।

यदि कोई भय रखने जैसा हो तो वह इस विषय का भय रखने जैसा है। इस जगत् में अन्य कोई भय रखने जैसी जगह है ही नहीं। इसलिए सावधान हो जाओ। इन साँप, बिच्छू और बाघ से सावधान नहीं रहते? सावधान रहते हैं न? जब बाघ की बात आए, तब हमें उससे भय नहीं रखना हो, फिर भी उससे भय लगता है न? उसी तरह जब विषय की बात आए तो भय लगना चाहिए। जहाँ पर भय लगे, वहाँ पर क्या मजे से खाना खाते हैं? नहीं। अतः जहाँ पर भय हो, वहाँ मजा नहीं होता। जगत् के लोग इस विषय को भयसहित भोगते होंगे? नहीं। लोग तो यह मजे से भोगते हैं। जहाँ भय हो, वहाँ भोग ही नहीं सकते।

कोई पूछे कि जलेबी खाऊँ? तो मैं कहूँगा कि वह अच्छी है, खाना आराम से। दहीबड़े खाना, सब खाना। इन सभी में स्वाद आता है। ज्ञानी को स्वाद समझ में आता है, लेकिन उन्हें इस स्वाद में, अच्छा या बुरा है, ऐसा नहीं होता कि यह होगा तभी चलेगा। विषय का तो ज्ञानीपुरुष को सपने में भी विचार नहीं आता। वह तो पाशवी विद्या है। मनुष्य में खुली पाशवता कहनी हो तो वह इतनी ही है। मनुष्यपन तो मोक्ष के लिए ही होना चाहिए।

अनंत जन्मों तक कमाई करे, तब जाकर उच्च गोत्र, उच्च कुल में जन्म होता है लेकिन फिर लक्ष्मी और विषय के पीछे अनंत जन्मों की कमाई खो देता है!!

परवशताएँ कैसे पुसाए?

मोक्ष की इच्छा तो बहुत है, लेकिन मोक्ष का रास्ता नहीं मिल पाता। इसीलिए अनंत जन्मों से भटकते ही रहे हैं और बिना अवलंबन के जी नहीं पाते। इसीलिए उसे स्त्री वगैरह, सभी कुछ

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

चाहिए। शादी करता है, वह भी इसलिए कि आधार दृढ़ता है। इसलिए शादी करता है न। इंसान निराधार रह ही नहीं सकता न! निरालंब नहीं रह सकता न! ज्ञानीपुरुष के अलावा अन्य कोई निरालंब रह ही नहीं सकता, कुछ न कुछ अवलंबन दृढ़ता ही है!

यह मकड़ी जाला बुनती है, फिर खुद ही उसमें फँस जाती है। उसी तरह यह संसार का जाल भी खुद ने ही खड़ा किया है। पिछले जन्म में खुद ने माँग की थी। बुद्धि के आशय में टेंडर भरा था कि एक स्त्री तो चाहिए ही। दो-तीन कमरे होंगे, एकाध बेटा और एकाध बेटी और नौकरी, इतना ही चाहिए। उसके बदले में वाइफ तो दी सो दी, लेकिन सास-ससुर, साला-साली, मौसैरी सास, चचेरी सास, फूफी सास, ममेरी सास... अरे फँसाव, फँसाव! इतना सारा फँसाव साथ में आएगा, यदि ऐसा पता होता तो ऐसी माँग ही नहीं करते! टेंडर तो भरा था सिर्फ वाइफ का, तो फिर यह सब क्यों दिया? तब कुदरत कहती है, 'भाई, वह अकेला तो नहीं दे सकते, ममेरी सास, फूफी सास वह सब देना पड़ता है। आपको उसके बिना अच्छा नहीं लगेगा। यह तो जब पूरा लंगर होगा, तभी असली मज़ा आएगा।' एक इतना सा लेने जाऐं, उसके साथ तो कितने बंधन, कितनी सारी परवशताएँ। वह परवशता फिर सहन नहीं होती।

प्रश्नकर्ता : ये मन, वचन, काया के लफड़े ही अच्छे नहीं लगते न अब तो!

दादाश्री : इसमें तो छः भागीदार है। शादी की तो उसमें और छः की भागीदारी, मतलब बारह भागीदारों का कोर्पोरेशन खड़ा हो गया ऊपर से। छः के बीच तो कितने लड़ाई-झगड़े चल ही रहे थे, वहाँ फिर बारह की लड़ाई खड़ी हो जाती है। फिर हर एक संतान के साथ छः नये भागीदार जुड़ते जाते हैं। यानी कितना फँसाव खड़ा हो जाता है!

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

शादी करने के परिणाम तो देखो

अब, तुझे संसार में क्या-क्या चाहिए? वह बता न।

प्रश्नकर्ता : मुझे तो शादी ही नहीं करनी है।

दादाश्री : यह देह ही निरी उपाधि (बाहर से आनेवाला दुःख) है न! जब पेट में दर्द होता है, तब इस देह पर कैसा होता है? तो दूसरे की दुकान तक व्यापार बढ़ाएँगे, तो क्या होगा? कितने दुःख देती है? और फिर दो-चार बच्चे हों तो। सिर्फ बीवी हो तो ठीक है, वह सीधी रहेगी लेकिन ये तो चार बच्चे! तो क्या होगा? बेहद परेशानी! निरी 'फाइलें' ही बढ़ जाती हैं। इसलिए भगवान ने ऐसा कहा है कि औपचारिक मत करना। अनुपचार मतलब आपने जिसका उपचार तक नहीं किया, वैसी है यह देह। इसका तो कोई चारा ही नहीं है लेकिन वह तो उपचार करता है। शादी करता है, व्यापार करता है, वह मत करना, जबकि और इसे अब उपचार करने की इच्छा नहीं है, इसलिए कह रहा है कि शादी ही नहीं करनी है।

योनी में से जन्म लेता है। योनी में तो इतने भयंकर दुःखों में रहना पड़ता है और बड़ी उम्र के होने पर वापस योनी पर ही जाता है। इस जगत् का व्यवहार ही ऐसा है। किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं है न! माँ-बाप भी कहते हैं कि शादी कर लो अब, और माँ-बाप का फर्ज भी तो है न? लेकिन कोई सही सलाह नहीं देता कि इसमें ऐसा दुःख है। वे तो कहेंगे, 'शादी करवा दो अब। ताकि उसके वहाँ बच्चा हो तो मैं दादा बन जाऊँ।' बस, उन्हें इतनी ही उत्कंठा होती है। 'अरे, लेकिन दादा बनने के लिए मुझे क्यों इस कुएँ में धकेल रहे हो?' पिता जी को दादा बनना होता है, इसलिए हमें कुएँ में धकेल देते हैं। शादी में तो कितने ही ऐक्सिडेंट होते हैं, फिर भी कितनी ही शादियाँ होती हैं न? यह तो, शादी के कुएँ में गिरना पड़ता है। कुछ

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

न हो तो अंत में माँ-बाप भी उठाकर उस कुएँ में डाल देते हैं। वे लोग नहीं डालेंगे तो मामा उठाकर डाल देगा। ऐसा है यह फँसाववाला जगत्!

शादी तो सचमुच में बंधन है। भैंस को डिब्बे में भरने जैसी दशा हो जाती है। उस फँसाव में नहीं फँसें, वही उत्तम है, फँस गए हों तो फिर निकल जाएँ तो और भी उत्तम और न हो तो अंत में फल चखने के बाद निकल जाना चाहिए! शादी से पहले, दस दिन पहले लड़की अगर गाड़ी में मिल जाए तो वह धक्का मारता है। उसी को फिर खुद ने पसंद किया। लो, वह वाइफ बन गई! किसकी बेटी, किसका बेटा, कुछ लेना-देना नहीं है! वाइफ मर जाए तो फिर रोता है। क्यों रोता है? वह कहाँ अपनी रिश्तेदार थी? माँ का रिश्ता सचमुच में रिश्ता कहलाता है, भाई का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, पिता जी का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, लेकिन वाइफ का कौन सा रिश्ता है? पराए घर की बेटी, उसे देखने गया था तब तो यों घूमो, यों घूमो कर रहा था, मर्जी में आए तो सैंकशन करता है। घर पर लाता है। उसके बाद यदि मेल न खाए तो फिर कहेगा कि ‘डाइवोर्स लो।’

एक भाई ने मुझसे कहा कि ‘मेरी वाइफ के बिना मुझे ऑफिस में अच्छा नहीं लगता।’ अरे, एक बार हाथ में पीप हो जाए तो तू चाटेगा? नहीं तो क्या देखकर स्त्री पर मोह कर रहा है? पूरा शरीर पीप से ही भरा है। यह पोटली किसकी है, इसका विचार नहीं आता? भले आचार नहीं छूटे लेकिन क्या ऐसा विचार नहीं आना चाहिए? जितना प्रेम मनुष्य को अपनी स्त्री पर होता है, उससे अधिक प्रेम तो सूअर को सूअरनी पर है। यह क्या कोई प्रेम कहलाता होगा? यह तो पाशवता है निरी! प्रेम तो किसे कहते हैं, कि जो बड़े नहीं, घटे नहीं, उसे प्रेम कहते हैं। यह सब तो आसक्ति है। बढ़ गई तो आसक्ति और कम हो गई, वह विकर्षण शक्ति। यदि अच्छे इयरिंग लाकर दिए, हीरे के टोप्स

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लाकर दे दिए तो बीबी आसक्ति में ही खुश और यदि नहीं लाकर दिए तो, 'आप ऐसे हो, आप वैसे हो', फिर झगड़े नहीं होते? मतभेद नहीं होते? इसमें कौन सा सुख है जो पड़े हुए हो? क्या माना है तुमने? अनंत जन्मों से भटक रहे हो, तो अभी भी क्या तुम्हें भटकने का शौक है? क्या हुआ है तुम्हें?

वीतराग भगवान के भक्तों को भी चिंता? जब शास्त्र पढ़ता है, उतने समय तक थोड़ी अंदर टंडक रहती है। उसमें भी फिर पढ़ते-पढ़ते याद तो आ ही जाता है कि आज कारखाने में तो बारह सौ का नुकसान हो गया है। वह फिर उसे चुभता (कचोटा) है! पूरे दिन चुभन, चुभन और चुभन। भीतर यह कचोटा है और बाहर मकोड़े, मच्छर जो भी हों, वे काटते हैं। रसोई में बीबी काटती है। मैंने एक जने से पूछा, 'क्यों तंग आ गए हो?' तब उसने कहा कि 'यह पत्नी नागिन की तरह काटती है।' कुछ लोगों को ऐसी भी पत्नियाँ मिलती हैं न? पूरे दिन 'आप ऐसे और आप वैसे' करती रहती है, वह शांति से खाने भी नहीं देती बेचारे को! अब वह औरत कौन सा सुख दे देनेवाली है? वह क्या 'परमानेन्ट' सुख देगी? तो क्यों खुद दबा हुआ बैठा रहता है? विषय-भूखा है इसलिए। वर्ना निर्विषयी को डरानेवाला कौन? सिर्फ विषय के लिए पड़े रहना और खुद की स्वतंत्रता खो देनी? बीबी-बच्चों का जंगल और वह अनंत जन्म बिगाड़ देता है। जो इसमें से कुदरती रूप से छूट गया, उसकी तो बात ही क्या करनी?

पूरी दुनिया की है वह जूठन

बाकी, विषय भोग तो निरी जूठन ही है। पूरी दुनिया की जूठन है। आत्मा का कहीं ऐसा आहार होता होगा? आत्मा को बाहर की किसी भी चीज की जरूरत नहीं है, निरालंब है। किसी भी अवलंबन की उसे जरूरत नहीं है। परमात्मा ही है खुद। निरालंब अनुभव में आ जाए तो परमात्मा ही हो गया! उसे कुछ भी नहीं