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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 9 कर्म-बन्ध के क्षय से मोक्ष होता है - जह बंधे छेत्तूण य बंधणबद्धो दु पावदि विमॉक्खं। तह बंधे छेत्तूण य जीवो संपावदि विमॉक्खं॥ (9-5-292) जिस प्रकार बन्धन में पडा हुआ कोई पुरुष बन्धनों को काटकर अवश्य ही मुक्ति प्राप्त करता है, उसी प्रकार जीव कर्म-बन्ध को काटकर मोक्ष प्राप्त करता है। Just as a man, bound in shackles, can surely get rid of the bondage by breaking the shackles, similarly, a man can get liberated if he makes efforts to get rid of the karmic bondage. भेद-विज्ञान से मोक्ष होता है - बंधाणं च सहावं वियाणिदुं अप्पणो सहावं च। बंधेसु जो विरज्जदि सो कम्मविमॉक्खणं कुणदि॥ (9-6-293) बन्धों के स्वभाव को और आत्मा के स्वभाव को जानकर जो पुरुष बन्धों के प्रति विरक्त होता है, वह कर्मों से मुक्त होता है। After knowing the nature of the karmic bondages and also the nature of the Self, the man who keeps at bay all karmic bondages, gets liberated. 140

अध्याय - 9 प्रज्ञा से भेद-विज्ञान होता है - जीवो बंधो य तहा छिज्जंति सलक्खणेहि णियदेहिं। पण्णाछेदणएण दु छिण्णा णाणत्तमावण्णा॥ (9-7-294) जीव तथा बन्ध ये दोनों अपने-अपने निश्चित लक्षणों के द्वारा पृथक् किये जाते हैं। प्रज्ञा रूपी छुरी के द्वारा छेदे हुए (पृथक् किये हुए) ये नानारूप हो जाते हैं (पृथक् हो जाते हैं)। The Self and the karmic bondage are differentiated on the basis of their own intrinsic nature. These two are chiselled (separated) with the help of the instrument of self- discrimination. भेद-विज्ञान होने पर जीव का कर्त्तव्य - जीवो बंधो य तहा छिज्जंति सलक्खणेहि णियदेहिं। बंधो छेदेदव्वो सुद्धो अप्पा य घेंत्तव्वो॥ (9-8-295) जीव तथा बन्ध अपने-अपने निश्चित लक्षणों के द्वारा पृथक् किये जाते हैं। वहाँ बन्ध को तो (आत्मा से) पृथक् कर देना चाहिये और शुद्ध आत्मा को ग्रहण करना चाहिये। The Self and the karmic bondage are differentiated (and separated) on the basis of their own intrinsic nature. The karmic bondage should be discarded and the pure soul ought to be realized. 141

अध्याय - 9 प्रज्ञा के द्वारा ही आत्मा को ग्रहण करना चाहिये - किह सो घेप्पदि अप्पा पण्णाए सो दु घेप्पदे अप्पा। जह पण्णाइ विहत्तो तह पण्णाएव घेत्तव्वो॥ (9-9-296) (शिष्य गुरू से पूछता है) वह शुद्ध आत्मा कैसे ग्रहण किया जा सकता है? (आचार्य उत्तर देते हैं) वह शुद्ध आत्मा प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण किया जाता है। जैसे (पहले) प्रज्ञा के द्वारा विभक्त किया था, उसी प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ही ग्रहण करना चाहिये। (The disciple asks –) “How can one realize that pure soul?” (The Āchārya replies –) “That pure soul can be realized through self- discrimination. As earlier the pure soul was separated from the karmic bondage through self-discrimination, in the same way, the pure soul is realized through self-discrimination.” मैं चिदात्मा हूँ - पण्णाए घेत्तव्वो जो चेदा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-10-297) प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो चिदात्मा है, निश्चय से वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये। Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really the ‘pure consciousness’; and, further, that all other dispositions are not part of oneself. ....................... 142

अध्याय - 9 मैं दृष्टा मात्र हूँ - पण्णाए घेत्तव्वो जो दट्ठा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-11-298) प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो देखने वाला दृष्टा है, निश्चय से वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये। Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really the ‘seer’ who sees; and, further, that all other dispositions are not part of oneself. मैं ज्ञातामात्र हूँ - पण्णाए घेत्तव्वो जो णादा सो अहं तु णिच्छयदो। अवसेसा जे भावा ते मज्झ परे त्ति णादव्वा॥ (9-12-299) प्रज्ञा के द्वारा इस प्रकार ग्रहण करना चाहिये कि जो जानने वाला ज्ञाता है, निश्चय से वह मैं हूँ; शेष जो भाव हैं, वे मुझसे पर हैं, यह जानना चाहिये। Through self-discrimination, one must realize that ‘I’ is really the ‘knower’ who knows; and, further, that all other dispositions are not part of oneself. 143

अध्याय - 9 चिन्मात्र भाव ही अपने हैं - को णाम भणेज्ज बुहो णादुं सव्वे पराइए भावे। मज्झमिणं ति य वयणं जाणंतो अप्पयं सुद्धं॥ (9-13-300) आत्मा को शुद्ध जानता हुआ, शेष सब भावों को पर जानकर कौन बुद्धिमान ‘ये भाव मेरे हैं' ऐसे वचन कहेगा। Knowing the Self to be pure, and all dispositions to be alien, which knowledgeable person will utter these words, ‘These dispositions belong to me.’? सापराध और निरपराध आत्मा - थेयादी अवराहे कुव्वदि जो सो ससंकिदो होदि। मा बज्झे हं केण वि चोरो त्ति जणम्हि वियरंतो॥ (9-14-301) जो ण कुणदि अवराहे सो णिस्संको दु जणवदे भमदि। ण वि तस्स बज्झिदुं जे चिंता उप्पज्जदि कया वि॥ (9-15-302) एवं हि सावराहो बज्झामि अहं तु संकिदो चेदा। जो पुण णिरावराहो णिस्संको हं ण बज्झामि॥ (9-16-303) 144

अध्याय - 9 जो पुरुष चोरी आदि अपराधों को करता है, वह पुरुष सशंकित रहता है कि मनुष्यों के बीच घूमते हुए ‘चोर है’ ऐसा जानकर किसी के द्वारा मैं बाँध न लिया जाऊँ। जो पुरुष अपराध नहीं करता, वह तो देश में निःशंक घूमता है क्योंकि उसके मन में बँधने की चिन्ता कभी उत्पन्न नहीं होती। इसी प्रकार अपराधी आत्मा शंकित रहता है कि मैं (ज्ञानावरणादि कर्मों से) बन्ध को प्राप्त होऊँगा। यदि वह निरपराध हो तो निःशंक रहता है कि मैं नहीं बँधूँगा। निरपराध आत्मा निःशंक होता है - संसिद्धिराधसिद्धं साधिदमाराधिदं च एयट्ठं। अवगदराधो जो खलु चेदा सो होदि अवराधो॥ (9-17-304) जो पुण णिरावराधो चेदा णिस्संकिदो दु सो होदि। आराहणाइ णिच्चं वट्टदि अहमिदि वियाणंतो॥ (9-18-305) संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित ये सब एकार्थक हैं। जो आत्मा राधरहित है (निज शुद्धात्मा की आराधना से रहित है), वह आत्मा अपराध होता है; और जो 145

अध्याय - 9 आत्मा निरपराध होता है, वह निःशंक होता है। ऐसा आत्मा 'मैं (उपयोग-स्वरूप एक शुद्ध आत्मा) हूँ' इस प्रकार जानता हुआ (शुद्धात्मसिद्धिरूप) आराधना से सदा ही वर्तता है। विषकुम्भ और अमृतकुम्भ - पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य। णिंदा गरुहा सोही अट्ठविहो होदि विसकुंभो॥ (9-19-306) अपडिकमणमपडिसरणमप्पडिहारो अधारणा चेव। अणियत्ती य अणिंदागरुहासोही अमयकुंभो॥ (9-20-307) प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गर्हा और शुद्धि - यह आठ प्रकार का विषकुम्भ है (क्योंकि इसमें कर्तृत्व बुद्धि होती है)। अप्रतिक्रमण, अप्रतिसरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिन्दा, अगर्हा और अशुद्धि - ये आठ अमृतकुम्भ हैं (क्योंकि इसमें कर्तृत्व का निषेध है)। 146

अध्याय - 9 Repentance (of past sins), pursuit (of virtue), abandonment (of attachment etc.), concentration, abstinence, self-censure, confession, and purification (by expiation), these eight constitute the poison-pot (because in these the soul is comprehended to be a doer). Non-repentance, non-pursuit, non-abandonment, non- concentration, non-abstinence, non-self-censure, non- confession, and non-purification, these eight constitute the nectar-pot (because these forbid the soul to be a doer). ────── इदि णवमो मॉक्खाधियारो समत्तो ........................ 147

अध्याय - 10 दहमो सव्वविसुद्धणाणाधियारो THE ALL-PURE KNOWLEDGE जीव अपने परिणामों का कर्ता है - दवियं जं उप्पज्जदि गुणेहि तं तेहि जाणसु अणण्णं। जह कडयादीहिं दु य पज्जएहि कणयमणण्णमिह॥ (10-1-308) जीवस्साजीवस्स य जे परिणामा दु देसिदा सुत्ते। तं जीवमजीवं वा तेहिमणण्णं वियाणाहि॥ (10-2-309) ण कुदोचि वि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो आदा। उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण सो होदि॥ (10-3-310) कम्मं पडुच्च कत्ता कत्तारं तह पडुच्च कम्माणि। उप्पज्जंते णियमा सिद्धी दु ण दिस्सदे अण्णा॥ (10-4-311) जो द्रव्य जिन गुणों से उत्पन्न होता है, उसे उन गुणों से अनन्य जानो। जैसे लोक में कटक आदि पर्यायों से स्वर्ण भिन्न नहीं है। जीव और अजीव के जो परिणाम सूत्र में कहे हैं, उन परिणामों से उस जीव और अजीव को अनन्य जानो; क्योंकि वह आत्मा किसी से उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिए वह किसी का कार्य नहीं है; किसी अन्य को 148

अध्याय - 10 उत्पन्न नहीं करता, इस कारण वह किसी का कारण भी नहीं है। नियम से कर्म का आश्रय करके कर्ता होता है तथा कर्ता का आश्रय करके कर्म उत्पन्न होते हैं। कर्ता-कर्म की अन्य कोई सिद्धि नहीं देखी जाती। आत्मा और कर्म-प्रकृति का निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध - चेदा दु पयडीयट्ठं उप्पज्जदि विणस्सदि। पयडी वि चेदयट्ठं उप्पज्जदि विणस्सदि॥ (10-5-312) एवं बंधो य दोण्हं पि अण्णोण्णपच्चया हवे। अप्पणो पयडीए य संसारो तेण जायदे॥ (10-6-313) यह आत्मा प्रकृति के निमित्त से उत्पन्न होता है और नष्ट होता है तथा वे कर्म-प्रकृतियाँ भी आत्मा के निमित्त से उत्पन्न होती हैं और विनाश को प्राप्त होती 149

अध्याय - 10 हैं। इस प्रकार एक दूसरे के निमित्त से आत्मा और कर्म-प्रकृतियाँ - दोनों का बन्ध होता है। उस बन्ध से संसार होता है। The (psychic states of) soul are produced and destroyed by the operation of various species of karmas. Also, various species of karmas are produced and destroyed by the (psychic states of) soul. In this way, the soul and various species of karmas get bonded to each other. This bond is the cause of worldly cycle of births and deaths. ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ज्ञाता, दृष्टा, मुनि कैसे होता है? जा एस पयडीयट्ठं चेदगो ण विमुंचदि। अयाणगो हवे तावं मिच्छादिट्ठी असंजदो॥ (10-7-314) जदा विमुंचदे चेदा कम्मफलमणंतयं। तदा विमुत्तो हवदि जाणगो पस्सगो मुणी॥ (10-8-315) जब तक यह आत्मा कर्मप्रकृति के निमित्त से होने वाले उत्पत्ति और विनाश को नहीं छोड़ता, तब तक वह अज्ञानी, मिथ्यादृष्टि और असंयत (रहता) है। जब आत्मा अनन्त कर्मफल को छोड़ देता है, तब वह बन्ध से मुक्त हुआ ज्ञाता, दृष्टा और संयत (हो जाता) है। So long as the Self does not renounce this cycle of origination and destruction due to his association with various species of •••••••••••••••••••••• 150

अध्याय - 10 karmas, till then he remains ignorant, wrong believer, and unrestrained. When the Self renounces the infinite fruits of karmas, he becomes free from karmas – knowledgeable, right believer, and restrained. ज्ञानी कर्म-फल को जानता है - अण्णाणी कम्मफलं पयडिसहावट्ठिदो दु वेदेदि। णाणी पुण कम्मफलं जाणदि उदिदं ण वेदेदि॥ (10-9-316) अज्ञानी प्रकृति के स्वभाव में स्थित हुआ (हर्ष, विषाद से तन्मय हुआ) कर्म के फल को भोगता है और ज्ञानी उदय में आये हुए कर्म के फल को जानता है, भोगता नहीं है। The ignorant, engrossed in the nature of various species of karmas, enjoys the fruits of karmas (in the form of pleasure and pain), and the knowledgeable is aware of the fruits of karmas but does not enjoy them. अभव्य अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता - ण मुयदि पयडिमभव्वो सुट्ठु वि अज्झाइदूण सत्थाणि। गुडदुद्धं पि पिबंता ण पण्णया णिव्विसा होंति॥ (10-10-317) ••••••••••••••••••••• 151

अध्याय - 10 अभव्य जीव शास्त्रों को भलीभाँति पढ़कर भी प्रकृति स्वभाव को नहीं छोड़ता। जैसे सर्प गुड़मिश्रित दूध को पीते हुए विषरहित नहीं होते। The one incapable of attaining liberation, even though well- versed in scriptures, does not give up his attachment for various species of karmas, like a snake does not give up its poisonous nature even after drinking sweetened (jaggery-mixed) milk. ज्ञानी कर्म-फल को नहीं भोगता - णिव्वेयसमावण्णो णाणी कम्मप्फलं वियाणादि। महुरं कडुयं बहुविहमवेदगो तेण सो होदि॥ (10-11-318) वैराग्य को प्राप्त ज्ञानी मधुर, कटुक अनेक प्रकार के कर्म-फल को जानता है, इसलिए वह कर्म-फल का भोक्ता नहीं हैं। The knowledgeable, fixed in non-attachment, knows the sweet- bitter nature of the fruition of karmas; he, therefore, remains a non-enjoyer. ज्ञानी पुण्य, पाप को जानता है - ण वि कुव्वदि ण वि वेददि णाणी कम्माइ बहुप्पयाराइं। जाणदि पुण कम्मफलं बंधं पुण्णं च पावं च॥ (10-12-319) 152

अध्याय - 10 ज्ञानी बहुत प्रकार के कर्मों को न तो करता है, न भोगता ही है; किन्तु वह पुण्य और पापरूप कर्म-बन्ध को और कर्म-फल को जानता है। The knowledgeable does neither produce nor enjoy the fruits of various kinds of karmas, but he knows the karmic bondages involving merit or demerit, and the results of their fruition. ज्ञानी कर्ता भोक्ता नहीं है - दिट्ठी सयं पि णाणं अकारयं तह अवेदयं चेव। जाणदि य बंधमोक्खं कम्मुदयं णिज्जरं चेव॥ (10-13-320) (जैसे) नेत्र (दृश्य से भिन्न होने से वह दृश्य को न करता है, न अनुभव करता है) उसी प्रकार ज्ञान (कर्म से भिन्न होने के कारण) स्वयं कर्मों का कर्ता नहीं है और उनका भोक्ता भी नहीं है। (वह तो) बन्ध, मोक्ष, कर्म के उदय और निर्जरा को जानता है। विशेष - अब इससे आगे ग्रन्थ के अन्त तक चूलिका का व्याख्यान करते हैं। (विशेष व्याख्यान, उक्त, अनुक्त व्याख्या अथवा उक्तानुक्त अर्थ का संक्षिप्त व्याख्यान (सार) चूलिका कहलाती है।) Just like an eye, being different from the scene it is viewing, neither performs the scene nor enjoys it, similarly, knowledge, being different from the karmas, neither performs the karmas nor enjoys them. It only knows bondage, liberation, rise of karmas and their shedding. 153

अध्याय - 10 Note: Now onwards, till the end of this scripture, is contained the chūlikā. (A synopsis of explicit or inexplicit explanations and meanings of the subject matter is termed a chūlikā.) ─────────────── कर्तृत्व मानने वालों को मोक्ष नहीं - लोगस्स कुणदि विण्हू सुरणारयतिरियमाणुसे सत्ते। समणाणं पि य अप्पा जदि कुव्वदि छव्विहे काये॥ (10-14-321) लोगसमणाणमेवं सिद्धंतं पडि ण दिस्सदि विसेसो। लोगस्स कुणदि विण्हू समणाणं अप्पओ कुणदि॥ (10-15-322) एवं ण को वि मोक्खो दिस्सदि लोगसमणाणं दोण्हं पि। णिच्चं कुव्वंताणं सदेवमणुयासुरे लोगे॥ (10-16-323) लोक के मत में सुर, नारक, तिर्यञ्च और मनुष्य प्राणियों को विष्णु करता है और यदि श्रमणों के मतानुसार भी आत्मा छह काय के जीवों को (जीवों के कार्यों को) करता है तो इस प्रकार लोक ओर श्रमणों में सिद्धान्तों की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं दीखता। लोक के मत में विष्णु करता है और श्रमणों के मत में आत्मा करता है। इस प्रकार देव, मनुष्य और असुर लोकों को सदा करते हुए (कर्ताभाव से प्रवर्त्तमान) लोक और श्रमण दोनों का भी कोई मोक्ष दिखाई नहीं देता। According to ordinary people, Viṣṇu is the creator of celestial-, •••••••••••••••••••••• 154

अध्याय - 10 infernal-, subhuman-, and human-beings. If the monks also believe that soul is the creator of six kinds of organic bodies (earth, water, fire, air, plants, and mobile beings), then there is no difference in the viewpoints of ordinary people and monks. In the opinion of ordinary people, Viṣṇu is the creator, and in the opinion of monks, soul is the creator. Thus, there seems to be no liberation for any of the two – ordinary people and monks – as they are ever engaged in the creation (karmic dispositions) of worlds – celestial, human, or infernal. ज्ञानी की मान्यता - ववहारभासिदेण दु परदव्वं मम भणंति विदित्था। जाणंति णिच्छयेण दु ण य मह परमाणुमेत्तमवि किंचि॥ (10-17-324) (अज्ञानी जन) व्यवहार नय से 'परद्रव्य मेरा है' ऐसा कहते हैं और पदार्थ के स्वरूप को जानने वाले ज्ञानी जन तो जानते हैं कि निश्चयनय से इस संसार में परमाणुमात्र कुछ भी मेरा नहीं है। From the empirical point of view, (the ignorant) people call the non-self substance as their own, but knowledgeable people, who know the real nature of substances, say that, in reality, even an atom of alien substance is not theirs. 155

अध्याय - 10 परद्रव्य को अपना मानने वाला ज्ञानी मिथ्यादृष्टि है - जह को वि णरो जंपदि अम्हाणं गामविसयणयरट्ठं। ण य होंति ताणि तस्स दु भणदि य मोहेण सो अप्पा॥ (10-18-325) एमेव मिच्छादिट्ठी णाणी णिस्संसयं हवदि एसो। जो परदव्वं मम इदि जाणंतो अप्पयं कुणदि॥ (10-19-326) तम्हा ण मे त्ति णच्चा दोण्हं एदाण कत्तिववसाओ। परदव्वे जाणंतो जाणेज्जा दिट्ठिरहिदाणं॥ (10-20-327) जैसे कोई पुरुष कहता है कि यह हमारा ग्राम, जनपद, नगर और राष्ट्र है किन्तु वस्तुतः वे उसके नहीं हैं, तथापि वह आत्मा मोह से ऐसा कहता है। इसी प्रकार जो ज्ञानी 'परद्रव्य मेरा है' यह जानता हुआ परद्रव्य को निजरूप कर लेता है, वह ज्ञानी निःसन्देह मिथ्यादृष्टि है; इसलिए 'ये परद्रव्य मेरे नहीं हैं' यह जानकर लोक और श्रमण इन दोनों के परद्रव्य में कर्तृत्व के व्यवसाय को जानते हुए समझो कि यह व्यवसाय मिथ्यादृष्टियों का है। A person may say that this village, town, city, or nation, is his, but, in reality, these do not belong to him; he utters such words only due to his delusion. In the same way, a person, who considers an alien substance to be his own, and then identifies himself with it, is, without doubt, a wrong believer. Therefore, believe that these alien substances do not belong to you, and that the involvement of the Self in creation of non-self substances, as •••••••••••••••••••• 156

अध्याय - 10 asserted by ordinary people and monks, is the view of the wrong believers. ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ भाव कर्म का कर्ता जीव है - मिच्छत्तं यदि पयडी मिच्छादिट्ठी करेदि अप्पाणं। तम्हा अचेदणा दे पयडी णणु कारगा पत्ता॥ (10-21-328) अहवा एसो जीवो पोग्गलदव्वस्स कुणदि मिच्छत्तं। तम्हा पोग्गलदव्वं मिच्छादिट्ठी ण पुण जीवो॥ (10-22-329) अह जीवो पयडी तह पोग्गलदव्वं कुणंति मिच्छत्तं। तम्हा दोहि कदं तं दोण्हि वि भुंजंति तस्स फलं॥ (10-23-330) अह ण पयडी ण जीवो पोग्गलदव्वं करेदि मिच्छत्तं। तम्हा पोग्गलदव्वं मिच्छत्तं तं तु ण हु मिच्छा॥ (10-24-331) यदि (मोहनीय कर्म की) मिथ्यात्व प्रकृति आत्मा को मिथ्यादृष्टि करती है, इस मान्यता से तेरे मतानुसार अचेतन प्रकृति निश्चय ही मिथ्यात्व भाव की कर्ता हो गई; अथवा यह जीव पुद्गल द्रव्य के मिथ्यात्व को करता है, ऐसा माना जाए तो पुद्गल द्रव्य मिथ्यादृष्टि सिद्ध होगा, जीव नहीं; अथवा जीव तथा प्रकृति - ये दोनों पुद्गल द्रव्य को मिथ्यात्वरूप करते हैं, ऐसा मानने से दोनों के द्वारा किये गये मिथ्यात्व के •••••••••••••••••••• 157

अध्याय - 10 फल को वे दोनों ही भोगेंगे; अथवा न तो प्रकृति और न जीव पुद्गल द्रव्य को मिथ्यात्वरूप करता है, ऐसा मानने से पुद्गल द्रव्य को (मिथ्यात्व भाव का प्रसंग आ जाएगा); क्या वह वास्तव में मिथ्या नहीं है? If you believe that karmic matter (of the nature of deluding karmas) makes the Self a wrong believer, then your belief amounts to attributing the non-conscious karmic matter the ability to create delusion in the Self. Or if you believe that the Self creates delusion in the physical substance, then your belief amounts to attributing wrong belief to the physical substance and not to the Self. If you believe that both, the Self and the nature of the karmic matter, create delusion in the physical substance, then they both must enjoy the fruits of their action. Further, your contention that neither the Self nor the nature of the karmic matter creates delusion in the physical substance will amount to attributing wrong belief to the physical substance; is it not really an erroneous belief? कर्म ही कर्ता है, जीव नहीं, यह मिथ्या है - कम्मेहि दु अण्णाणी किज्जदि णाणी तहेव कम्मेहिं। कम्मेहि सुवाविज्जदि जग्गाविज्जदि तहेव कम्मेहिं॥ (10-25-332) कम्मेहि सुहाविज्जदि दुक्खाविज्जदि तहेव कम्मेहिं। कम्मेहि य मिच्छत्तं णिज्जदि य असंजमं चेव॥ (10-26-333) •••••••••••••••••••••••••• 158

अध्याय - 10 कम्मेहि भमाडिज्जदि उड्ढमहं चावि तिरियलोयं च। कम्मेहि चेव किज्जदि सुहासुहं जेत्तियं किंचि॥ (10-27-334) जम्हा कम्मं कुव्वदि कम्मं दे दि हरदि त्ति जं किंचि। तम्हा सव्वे जीवा अकारगा होंति आवण्णा॥ (10-28-335) (पूर्व पक्ष-) 'कर्मों के द्वारा जीव अज्ञानी किया जाता है, उसी प्रकार कर्मों के द्वारा ज्ञानी होता है। कर्मों के द्वारा जीव सुलाया जाता है, उसी प्रकार कर्मों के द्वारा जगाया जाता है। कर्मों के द्वारा जीव सुखी होता है, उसी प्रकार कर्मों के द्वारा दुखी होता है। कर्मों के द्वारा जीव मिथ्यात्व और असंयम को प्राप्त होता है; और कर्मों के द्वारा जीव ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और तिर्यग्लोक में भ्रमण करता है। कर्मों के द्वारा ही जो कुछ जितना शुभ और अशुभ है वह होता है; क्योंकि कर्म करता है, कर्म देता है, इस प्रकार जो कुछ है, उसे कर्म ही हरता है; इसलिए सभी जीव अकर्ता सिद्ध होते हैं।' (The aforementioned belief amounts to -) 'The Self is made ignorant by the karmas and, likewise, he is made knowledgeable by the karmas. Karmas send the Self to sleep and, likewise, he is awakened by the karmas. Karmas make the Self happy and, likewise, he is made miserable by the karmas. It is by the karmas that the Self is brought to wrong belief and non-discipline, and is made to wander in the upper, middle, and lower worlds. All virtuous or wicked happenings are the handiwork of the karmas. Because the karma does, karma gives, and it is the karma that takes away; therefore, all souls are proved to be without any action.' 159