समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
अध्याय - 1 शिष्य पुनः शंका करता है - जदि जीवो ण सरीरं तित्थयरायरियसंथुदी चेव। सव्वा वि हवदि मिच्छा तेण दु आदा हवदि देहो॥ (1-26-26) (कोई अज्ञानी शिष्य कहता है कि-) यदि जीव शरीर नहीं है तो तीर्थंकरों और आचार्यों की स्तुति करना सभी मिथ्या हो जाएगा, इसलिए (हम मानते हैं कि) आत्मा देह ही है। (An ignorant disciple proclaims –) If the soul does not constitute the body, then worshipping the Tīrthaṃkaras and the Āchāryas will all be deceitful and, therefore, the soul must indeed be the body. आचार्य उत्तर देते हैं - ववहारणओ भासदि जीवो देहो य हवदि खलु ऍक्को। ण दु णिच्छयस्स जीवो देहो य कदावि ऍक्कट्ठो॥ (1-27-27) (शिष्य का समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं-) व्यवहार नय कहता है कि जीव और देह वस्तुतः एक हैं और निश्चय नय के अभिप्राय के अनुसार तो जीव और देह कभी एक पदार्थ नहीं हैं। (The Āchārya responds–) The empirical point of view (vyavahāra naya) indeed holds that the soul and the body are the same, however, from the transcendental point of view (niṣchaya naya) the soul and the body are never the same (as they are made up of different substances). 16
अध्याय - 1 व्यवहार नय से केवली की स्तुति - इणमण्णं जीवादो देहं पोग्गलमयं थुणित्तु मुणी। मण्णदि हु संथुदो वंदिदो मए केवली भयवं। (1-28-28) जीव से भिन्न इस पुद्गलमय देह की स्तुति करके मुनि ऐसा मानता है कि मैंने केवली भगवान की स्तुति की और वंदना की। By making obeisance to the body, which comprises physical matter and is different from the soul, the ascetic presumes that he has adored and worshipped the Omniscient Lord. निश्चयनय से केवली की स्तुति - तं णिच्छये ण जुंजदि ण सरीरगुणा हि होंति केवलिणो। केवलिगुणे थुणदि जो सो तच्चं केवलिं थुणदि॥ (1-29-29) वह स्तुति निश्चय नय में उचित नहीं है क्योंकि शरीर के (शुक्ल कृष्णादि) गुण केवली भगवान के नहीं होते। जो केवली भगवान के गुणों की स्तुति करता है, वह परमार्थ से केवली भगवान की स्तुति करता है। From the transcendental point of view (niṣchaya naya), this adoration is not proper as the attributes of the body (like its colouration) do not exist in the Omniscient Lord. Therefore, one who adores the divine attributes of the Omniscient Lord truly worships Him. 17
अध्याय - 1 देह-स्तुति गुण-स्तुति नहीं है - णयरम्मि वण्णिदे जह ण वि रण्णो वण्णणा कदा होदि। देहगुणे थुव्वंते ण केवलिगुणा थुदा होंति॥ (1-30-30) जैसे नगर का वर्णन करने पर भी राजा का वर्णन किया हुआ नहीं होता, इसी प्रकार देह के गुणों की स्तुति करने पर केवली भगवान के गुणों की स्तुति नहीं होती। Just as the description of a city does not entail the description of its king, in the same way, eulogizing the body of the Omniscient Lord does not entail the adoration of His divine attributes. आत्मज्ञानी ही जितेन्द्रिय है - जो इंदिये जिणित्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं। तं खलु जिदिंदियं ते भणंति जे णिच्छिदा साहू॥ (1-31-31) जो इन्द्रियों को जीतकर ज्ञानस्वभाव से अधिक (शुद्धज्ञानचेतना गुण से परिपूर्ण) आत्मा को जानता है (अनुभव करता है) उस पुरुष को जो निश्चय नय में स्थित साधु हैं, वे निश्चय ही जितेन्द्रिय कहते हैं। The ascetic who, subjugating his senses, realizes his Real Self which is of the nature of pure knowledge-consciousness, is verily called a ‘conqueror of the senses’ by the saints who know the transcendental point of view (niṣchaya naya). 18
अध्याय - 1 मोहविजेता साधु - जो मोहं तु जिणित्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं। तं जिदमोहं साहुं परमट्ठवियाणया विंति॥ (1-32-32) जो (साधु) मोह को जीतकर ज्ञान स्वभाव से अधिक (शुद्धज्ञानचेतना गुण से परिपूर्ण) आत्मा को जानता है (अनुभव करता है), उस साधु को परमार्थ के जानने वाले पूर्वाचार्य मोहविजेता कहते है। The ascetic who, subjugating his delusion, realizes his Real Self which is of the nature of pure knowledge-consciousness, is verily called a ‘conqueror of delusion’ by the saints who know the ultimate truth. क्षीणमोह साधु - जिदमोहस्स दु जइया खीणो मोहो हवेज्ज साहुस्स। तइया हु खीणमोहो भण्णदि सो णिच्छयविदूहिं॥ (1-33-33) जब जिसने मोह जीत लिया है ऐसे साधु का मोह क्षीण हो जाता है, तब निश्चय के जानने वाले उस साधु को निश्चय ही क्षीणमोह कहते हैं। When the deluding karma of the ascetic who has already conquered delusion is eradicated, he attains full knowledge of the ultimate truth, and is to be known as a ‘destroyer of delusion (kṣīṇmoha)’. 19
अध्याय - 1 प्रत्याख्यान ज्ञान है - सव्वे भावे जम्हा पच्चक्खादी परे त्ति णादूण। तम्हा पच्चक्खाणं णाणं णियमा मुणेदव्वं॥ (1-34-34) यतः सब भावों को पर हैं यह जानकर त्याग देता है। इस कारण प्रत्याख्यान ज्ञान ही है, ऐसा निश्चय से (मननपूर्वक) जानना चाहिए। ज्ञानी द्वारा परभावों का त्याग - जह णाम को वि पुरिसो परदव्वमिणं ति जाणिदुं मुयदि। तह सव्वे परभावे णादूण विमुंचदे णाणी॥ (1-35-35) जैसे लोक में कोई पुरुष यह पर द्रव्य है ऐसा जानकर उसे त्याग देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परभावों को, ये परभाव हैं ऐसा जान कर उन्हें छोड़ देता है। 20
अध्याय - 1 मोह से निर्ममत्व - णत्थि मम को वि मोहो बुज्झदि उवओग एव अहमिक्को। तं मोहणिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विंति॥ (1-36-36) जो ऐसा जानता है कि मोह मेरा कुछ भी नहीं है, एक ज्ञान-दर्शनोपयोग रूप ही मैं हूँ, इस प्रकार जानने को सिद्धान्त या आत्मस्वरूप के ज्ञाता पूर्वाचार्य मोह से निर्ममत्व कहते हैं। The one who knows that delusion does not in any way belong to him, he is only knowledge- and faith-consciousness, is called ‘free from delusion’ by the saints well-versed in scriptural knowledge or who know the ultimate truth. धर्मद्रव्य से निर्ममत्व - णत्थि हि मम धम्मादी बुज्झदि उवओग एव अहमिक्को। तं धम्मणिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विंति॥ (1-37-37) जो ऐसा जानता है कि धर्म आदि द्रव्य निश्चय ही मेरे नहीं हैं, एक ज्ञान- दर्शनोपयोग रूप ही मैं हूँ। इस प्रकार जानने को सिद्धान्त या आत्मतत्त्व के जानने वाले पूर्वाचार्य धर्मद्रव्य से निर्ममत्व कहते हैं। The one who knows that substances such as medium of motion (dharma) do not in any way belong to him, he is only knowledge- and faith-consciousness, is called ‘unconnected to dharma’ by the saints well versed in scriptural knowledge or who know the ultimate truth. 21
अध्याय - 1 उपसंहार - अहमेक्को खलु सुद्धो दंसणणाणमइओ सयारूवी। ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि अण्णं परमाणुमेत्तं पि॥ (1-38-38) (ज्ञानी आत्मा यह जानता है कि) मैं एक हूँ, निश्चय ही शुद्ध हूँ, दर्शन ज्ञानमय हूँ, (रूप, रस, गंध, स्पर्श के अभाव के कारण) सदा अरूपी हूँ, कोई भी अन्य परद्रव्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है। The enlightened Self knows that he is unique, absolutely pure, of the nature of knowledge- and faith-consciousness, eternally non-material (due to the absence of attributes of matter like colour, taste, smell, and touch), and as such not even an atom of alien objects, whatsoever, belongs to him. इदि पढमो जीवाधियारो समत्तो 22
अध्याय - 2 दुदियो जीवाजीवाधियारो THE SOUL AND THE NON-SOUL जीव के सम्बन्ध में विभिन्न मान्यतायें - अप्पाणमयाणंता मूढा दु परप्पवादिणो केई। जीवं अज्झवसाणं कम्मं च तहा परूवंति॥ (2-1-39) अवरे अज्झवसाणेसु तिव्वमंदाणुभावगं जीवं। मण्णंति तहा अवरे णोकम्मं चावि जीवो त्ति॥ (2-2-40) कम्मस्सुदयं जीवं अवरे कम्माणुभागमिच्छंति। तिव्वत्तणमंदत्तण गुणेहि जो सो हवदि जीवो॥ (2-3-41) जीवो कम्मं उभयं दोण्णि वि खलु के वि जीवमिच्छंति। अवरे संजोगेण दु कम्माणं जीवमिच्छंति॥ (2-4-42) एवंविहा बहुविहा परमप्पाणं वदंति दुम्मेहा। ते ण परमट्ठवादी णिच्छयवादीहि णिद्दिट्ठा॥ (2-5-43) आत्मा को न जानते हुए परद्रव्य आत्मा को कहने वाले मूढ़ अज्ञानी तो रागादि अध्यवसान को और कर्म को जीव कहते हैं। अन्य कुछ लोग रागादि अध्यवसानों में तीव्र-मन्द तारतम्य स्वरूप शक्ति-माहात्म्य को जीव मानते हैं; तथा अन्य कोई नोकर्म-शरीरादि को भी जीव है ऐसा मानते हैं। अन्य कुछ लोग कर्म के उदय को जीव मानते हैं। कुछ लोग जो तीव्रता-मन्दता रूप गुणों से भेद को प्राप्त होता है, वह 23
अध्याय - २ जीव है, इस प्रकार कर्मों के अनुभाग को जीव है ऐसा इष्ट करते हैं - मानते हैं। कोई जीव और कर्म दोनों मिले हुओं को ही जीव मानते हैं। और दूसरे कर्म के संयोग से जीव मानते हैं। इस प्रकार के तथा अन्य भी बहुत प्रकार के मूढ़ लोग पर को आत्मा कहते हैं। ऐसे एकान्तवादी परमार्थवादी नहीं हैं, ऐसा निश्चयवादियों ने कहा है। Ignorant people, not knowing the true nature of the soul, maintain that the Self is but the non-self, and some uniformed people even say that the soul is identical with passions such as attachment and that it is indistinguishable from the karmic matter. Some others say that the psychic potency which determines the high or low intensity of passions, and their consequent effect on the conscious state, is the soul. Still others regard the soul as the quasi-karmic matter (nokarma). Some consider the fruition of karma as the soul and some consider the sensation resulting from the strength of the fruition – intense or mild – as the soul. Some believe that jīva and karma, taken together, constitute the soul, and some others consider the soul to be the result of the association of karma. In these and many other ways, ignorant people identify the Self with the non-self. Such absolutists are ignorant of the truth; say those who know the ultimate point of view.
अध्यवसानादि जीव नहीं हैं - एदे सव्वे भावा पोग्गलदव्व-परिणामणिप्पण्णा। केवलिजणेहि भणिदा किह ते जीवो त्ति वुच्चंति॥ (2-6-44) ये पूर्वोक्त अध्यवसानादिक समस्त भाव पुद्गल द्रव्यकर्म के परिणाम से उत्पन्न हुए ......................... 24
अध्याय - 2 हैं, इस प्रकार केवली जिनेन्द्र भगवान ने कहा है। वे जीव हैं, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है। The above mentioned affective states are all result of the manifestation of karmic matter, so says the Omniscient Lord. How can these be called the jīva or Pure Self? आठों कर्म पुद्गलमय हैं - अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पोग्गलमयं जिणा विंति। जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं ति विपच्चमाणस्स॥ (2-7-45) आठों प्रकार के समस्त कर्म पुद्गलमय हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। पक कर उदय में आने वाले जिस कर्म का फल प्रसिद्ध दुःख है, ऐसा कहा है। As pronounced by the Omniscient Lord, all the eight kinds of karmas are subtle material particles, and that the fruition of these karmas results into suffering that everyone recognizes. व्यवहार नय से रागादि भाव जीव हैं - ववहारस्स दरीसणमुवदेसो वण्णिदो जिणवरेहिं। जीवा एदे सव्वे अज्झवसाणादओ भावा॥ (2-8-46) ये समस्त अध्यवसानादिक भाव जीव हैं ऐसा जिनेन्द्रदेवों ने जो उपदेश दिया है, वह व्यवहार नय का कथन है। 25
२. अजीव अधिकार (पुद्गल व जड़ द्रव्य भेद)
अध्याय - 2 It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that the Omniscient Lord has declared all these affective states to be of the nature of the Self. व्यवहार और निश्चय से जीव का कथन- राया खु णिग्गदो त्ति य एसो बलसमुदयस्स आदेसो। ववहारेण दु वुच्चदि तत्थैक्को णिग्गदो राया॥ (2-9-47) एमेव य ववहारो अज्झवसाणादि अण्णभावाणं। जीवो त्ति कदो सुत्ते तत्थैक्को णिच्छिदो जीवो॥ (2-10-48) सेना के समूह को (निकलते देखकर) 'राजा ही निकला है' इस प्रकार का जो कथन है, वह व्यवहार नय से किया जाता है। वास्तव में तो वहाँ एक ही राजा निकला है। इसी प्रकार जीव से भिन्न अध्यवसानादि भाव जीव हैं, परमागम में यह व्यवहार किया गया है (व्यवहार नय से कहा गया है), किन्तु निश्चय नय से उन रागादि परिणामों में जीव तो एक ही है। On seeing the royal entourage, if one says, “The king has come out,” this statement is made from the empirical point of view (vyavahāra naya). In reality, only one person in the whole entourage is the king. In the same way, scriptures declare, from the empirical point of view (vyavahāra naya), that these affective states pertain to the Self, although they truly are different from the Self. From the transcendental point of view (niścaya naya), the Self is one, different from these passions (attachment etc.). 26
अध्याय - 2 परमार्थ जीव का स्वरूप - अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं। जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं॥ (2-11-49) जो रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है, इन्द्रियों के अगोचर है, चेतना गुण से युक्त है, शब्दरहित है, किसी चिह्न या इन्द्रिय द्वारा ग्रहण नहीं होता और जिसका आकार बताया नहीं जा सकता, उसे जीव जानो। वर्णादि भाव जीव के परिणाम नहीं हैं - जीवस्स णत्थि वण्णो ण वि गंधो ण वि रसो ण वि य फासो। ण वि रूवं ण सरीरं ण वि संठाणं ण संहणणं॥ (2-12-50) जीवस्स णत्थि रागो ण वि दोसो णेव विज्जदे मोहो। णो पच्चया ण कम्मं णोकम्मं चावि से णत्थि॥ (2-13-51) जीवस्स णत्थि वग्गो ण वग्गणा णेव फड्डया केई। णो अज्झप्पट्ठाणा णेव य अणुभागठाणा वा॥ (2-14-52) 27
अध्याय - 2 जीवस्स णत्थि केई जोगट्ठाणा ण बंधठाणा वा। णोव य उदयट्ठाणा ण मग्गणट्ठाणया केई॥ (2-15-53) णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा। णोव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिट्ठाणा वा॥ (2-16-54) णोव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स। जेण दु एदे सव्वे पोग्गलदव्वस्स परिणामा॥ (2-17-55) जीव के वर्ण नहीं है, गंध भी नहीं है, रस भी नहीं है, स्पर्श भी नहीं है, रूप भी नहीं है, शरीर भी नहीं है, संस्थान (आकार) भी नहीं है, संहनन भी नहीं है। जीव के राग नहीं है, द्वेष भी नहीं है, मोह भी नहीं हैं, आस्रव भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, उसके नोकर्म भी नहीं है। जीव के वर्ग नहीं है, वर्गणा नहीं है, कोई स्पर्धक भी नहीं है, अध्यात्मस्थान भी नहीं है और अनुभागस्थान भी नहीं है। जीव के कोई योगस्थान नहीं है, बंधस्थान भी नहीं है और उदयस्थान भी नहीं है, कोई मार्गणास्थान भी नहीं है। जीव के स्थितिबंधस्थान भी नहीं है, संक्लेशस्थान भी नहीं है, विशुद्धिस्थान भी नहीं है, संयमलब्धिस्थान भी नहीं है और जीवस्थान भी नहीं है और जीव के गुणस्थान नहीं है, क्योंकि ये सब पुद्गल के परिणमन हैं।
अध्याय - 2 जीव का नयसापेक्ष स्वरूप - ववहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वण्णमादीया। गुणठाणंता भावा ण दु केई णिच्छयणयस्स॥ (2-18-56) ये वर्ण से लेकर गुणस्थानपर्यन्त भाव व्यवहार नय से जीव के होते हैं, परन्तु निश्चय नय के मत में उनमें से कोई भी जीव के नहीं हैं।
अध्याय - 2 जीव का पुद्गल के साथ सम्बन्ध - एदेहि य संबंधो जहेव खीरोदयं मुणेदव्वो। ण य होंति तस्स ताणि दु उवओगगुणाधिगो जम्हा॥ (2-19-57) इन वर्णादिक भावों के साथ जीव का सम्बन्ध दूध और जल के समान (संयोग-सम्बन्ध) मननपूर्वक जानना चाहिये; और वे वर्णादिक भाव जीव के नहीं हैं क्योंकि जीव उपयोगगुण से परिपूर्ण है। The association of the soul with these attributes, like colour etc., must be understood as the mixing of milk with water. These attributes are not part of the soul as the soul's characteristic is consciousness. जीव में वर्णादि का कथन व्यवहार नय से है - पंथे मुस्संतं पस्सिदूण लोगा भणंति ववहारी। मुस्सदि एसो पंथो ण य पंथो मुस्सदे कोई॥ (2-20-58) तह जीवे कम्माणं णोकम्माणं च पस्सिदुं वण्णं। जीवस्स एस वण्णो जिणेहि ववहारदो उत्तो॥ (2-21-59) गंधरसफासरूवा देहो संठाणमाइया जे य। सव्वे ववहारस्स य णिच्छयदण्हू ववदिसंति॥ (2-22-60) मार्ग में किसी को लुटता हुआ देखकर व्यवहारी जन कहते हैं कि यह मार्ग लुटता है, 30
अध्याय - 2 किन्तु कोई मार्ग नहीं लुटता (वस्तुतः पथिक लुटते हैं), इसी प्रकार जीव में कर्मों और नोकर्मों का वर्ण देखकर जीव का यह वर्ण है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने व्यवहार से कहा है। इसी प्रकार गंध, रस, स्पर्श, रूप, शरीर और जो संस्थान आदि जीव के हैं, वे सब व्यवहार से निश्चयदर्शी कहते हैं। संसारी जीवों के वर्णादि का सम्बन्ध - तत्थ भवे जीवाणं संसारत्थाण होंति वण्णादी। संसारपमुक्काणं णत्थि दु वण्णादओ केई॥ (2-23-61) संसार अवस्था में संसारी जीवों के वर्णादि भाव होते हैं। संसार से मुक्त जीवों के तो कोई वर्णादि नहीं हैं। 31
अध्याय - 2 जीव और वर्णादि का तादात्म्य मानने में दोष - जीवो चेव हि एदे सव्वे भाव त्ति मण्णसे जदि हि। जीवस्साजीवस्स य णत्थि विसेसो दु दे कोई॥ (2-24-62) जीव का वर्णादि से तादात्म्य सम्बन्ध मानने वालों को समझाते हुए कहते हैं- यदि तू ऐसा मानता है कि ये समस्त भाव वास्तव में जीव ही हैं तो तेरे मत में जीव और अजीव के मध्य कोई भेद नहीं रहता। (Refuting those who assume that the soul and its colour etc. are but the same, the Āchārya says –) If you maintain that all these attributes really pertain to the soul itself, then, in your opinion, there would be no difference, whatsoever, between the soul and the non-soul. पूर्वोक्त कथन का और स्पष्टीकरण - अह संसारत्थाणं जीवाणं तुज्झ होंति वण्णादी। तम्हा संसारत्था जीवा रूवित्तमावण्णा॥ (2-25-63) एवं पोग्गलदव्वं जीवो तहलक्खणेण मूढमदी। णिव्वाणमुवगदो वि य जीवत्तं पोग्गलो पत्तो॥ (2-26-64) अथवा यदि तेरे मत में संसार में स्थित जीवों के वर्णादिक (तादात्म्य रूप से) होते हैं तो इस कारण संसार में स्थित जीव रूपीपने को प्राप्त हो गये। इस प्रकार हे मूढ़मते! रूपित्व लक्षण पुद्गल द्रव्य का होने से पुद्गल द्रव्य ही जीव कहलाया और (संसार दशा में ही नहीं) निर्वाण प्राप्त होने पर भी पुद्गल ही जीवत्व को प्राप्त हो गया। 32
अध्याय - 2 Or else, if you maintain that the colour etc. of worldly beings are indistinguishable from the attributes of the souls, then these souls will be assumed to be endowed with physical form. In this way, O deluded person, a soul endowed with physical form will be made up of physical matter and then, not only in its worldly existence but also in its emancipated state, physical matter will acquire the status of ajīva. जीवस्थान जीव नहीं है - ऍक्कं च दोण्णि तिण्णि य चत्तारि य पंचइंदिया जीवा। बादरपज्जत्तिदरा पयडीओ णामकम्मस्स॥ (2-27-65) एदाहि य णिव्वत्ता जीवट्ठाणा दु करणभूदाहिं। पयडीहिं पोग्गलमइहि ताहि किह भण्णदे जीवो॥ (2-28-66) एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तीनइन्द्रिय, चारइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, बादर, पर्याप्त और इनसे इतर सूक्ष्म और अपर्याप्त जीव ये नामकर्म की प्रकृतियाँ हैं। इन करणभूत प्रकृतियों से, जो पौद्गलिक हैं उनमें तो जीवस्थान रचे गये हैं। तब वे जीव किस प्रकार कहे जा सकते हैं? Living beings with one, two, three, four, and five senses, gross and fully developed, and their opposite, subtle and undeveloped, are classes based on their physique-making karma (nāma karma). The classes of living beings (jīvasthāna) are the result of physique-making karma (nāma karma) and since the causal conditions are physical in nature, how can these be identified with the nature of the soul? 33
अध्याय - 2 देह की जीव संज्ञा व्यवहार से है - पज्जत्तापज्जत्ता जे सुहुमा बादरा य जे जीवा। देहस्स जीवसण्णा सुत्ते ववहारदो उत्ता॥ (2-29-67) जो पर्याप्त तथा अपर्याप्त और जो सूक्ष्म तथा वादर जीव कहे गये हैं, वे देह की अपेक्षा जीव संज्ञाएँ हैं। वे सब परमागम में व्यवहार नय से कही गई हैं। गुणस्थान जीव नहीं हैं - मोहणकम्मस्सुदया दु वण्णिदा जे इमे गुणट्ठाणा। ते किह हवंति जीवा जे णिच्चमचेदणा उत्ता॥ (2-30-68) जो ये गुणस्थान हैं, वे मोहनीय कर्म के उदय से बतलाये गये हैं। जो नित्य अचेतन कहे गये हैं, वे जीव किस प्रकार हो सकते हैं? इदि दुदियो जीवाजीवाधियारो समत्तो 34
अध्याय - 3 तिदियो कत्तिकम्माधियारो THE DOER AND THE KARMA जीव के कर्म-बन्ध कैसे होता है - जाव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासवाण दोण्हं पि। अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो॥ (3-1-69) कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि। जीवस्सेवं बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं॥ (3-2-70) जीव जब तक आत्मा और आस्रव दोनों के ही (भिन्न-भिन्न) लक्षण और भेद को नहीं जानता है, तब तक वह अज्ञानी क्रोधादिक आस्रवों में प्रवृत्त रहता है। क्रोधादिक आस्रवों में वर्तते हुए उसके कर्मों का संचय होता है। वास्तव में जीव के इस प्रकार कर्मों का बन्ध सर्वज्ञदेवों ने बताया है। So long as the soul (jīva) does not recognize the differences in the attributes of the Self and the influx of karmas, it remains ignorant, and indulges in baser emotions like anger. The Omniscients declare that while indulging in anger etc., the soul accumulates karmic matter and, in this manner, bondage takes place. 35