भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

कल्याण


राजा बलि और शुक्राचार्य

राजा बलि और शुक्राचार्य
(उपशम-प्रकरण सर्ग ४५-४६)

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निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना * ६१३


रुचि नहीं हो रही है। अहो ! यह संसार कितना मूढ़ है ? यह मानव-समुदाय स्वभावसे ही विषयोंके वशीभूत है । इसीलिये एक दूसरेकी स्त्री और धनका अपहरण करनेके लिये लोलुप हो रहा है। जब वह मुमुक्षु होकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करता है, तब यथार्थ दृष्टि ( तत्त्व-साक्षात्कार ) प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो जाता है ।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! जब वसिष्ठ मुनि इतना उपदेश दे चुके, तब वह दिन बीत गया। भगवान् सूर्य अस्ताचलको चले गये । इधर उस राज-सभाके लोग सायंकालिक कृत्यके हेतु स्नान करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठको नमस्कार करके उठ गये तथा रात बीतनेपर सूर्यदेवकी किरणोंके उदयके साथ ही फिर उस सभामें लौट आये ।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—कर्त्तव्यका ज्ञान रखनेवाले रघुनन्दन ! यह मैंने तुमसे पाषाणोपाख्यान कहा । इस आख्यायिकासे जो विज्ञानदृष्टि प्राप्त होती है, उससे यही समझना चाहिये कि सारी सृष्टियाँ चेतनाकाशमें ही स्थित हैं। यहाँ जो कुछ भी दीखता है, उसे चिन्मय ब्रह्म ही समझना चाहिये । जैसे स्वप्न-दर्शनके समय जो नगर प्रकट होता है, वह अपने चिन्मय स्वरूपसे कदापि भिन्न नहीं है। वस्तुतः यह सृष्टि नहीं है, एकमात्र चैतन्य-शक्ति ही विराज रही है। जैसे सोनेके आभूषणोंमें सोना ही सत्य है, अंगूठी आदिके नाम और आकार नहीं। जैसे स्वप्नमें निर्विकार चिति-शक्ति ही पर्वतके रूपमें प्रकाशित होती है, उसी तरह निराकार ब्रह्म ही सृष्टिके रूपमें भासित हो रहा है। ब्रह्मके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। यह सारा दृश्य चिन्मय आकाशरूप, अनन्त, अजन्मा और अविनाशी ब्रह्म ही है। वस्तुतः सहस्रों महाकल्पोंमें भी न तो यह उत्पन्न होता है और न इसका नाश ही होता है। पुरुष चेतनाकाश-रूप ही है। यह जो आप पुरुषोत्तम बैठे हैं, चेतना-काशरूप ही हैं। मैं भी अजर-अमर चेतनाकाश ही हूँ

और ये तीनों लोक चेतनाकाश ही हैं । 'मैं अद्वितीय चिन्मात्र ब्रह्म ही हूँ । ये शरीर आदि मेरे नहीं हैं।' जब ऐसा बोध प्राप्त हो जाता है, तब जन्म-मरण आदि अनर्थ कहाँ रह सकते हैं ? मैं 'चिन्मात्र निर्मल ब्रह्म हूँ।' इस आत्मानुभवको जो स्वयं ही कुतर्कोंद्वारा खण्डित करते हैं वे आत्महत्यारे हैं। उन्हें विपत्तियोंके महासागरमें डूबना पड़ता है। 'मैं आकाशसे भी स्वच्छ, नित्य अनन्त एवं निर्विकार चेतन हूँ, ऐसी दशामें क्या मेरा जीना, क्या मरना अथवा क्या सुख-दुःख भोगना है ? मैं परमाकाशस्वरूप चेतन ब्रह्म हूँ। ये शरीर आदि मेरे कौन होते हैं !' इस तरह विद्वानोंके द्वारा अन्त:करणमें किये गये अनुभवका जो कुतर्कोंद्वारा अपलाप या खण्डन करता है, वह पुरुष आत्मघाती है। उसे बारंबार धिक्कार है। 'मैं स्वच्छ चेतनाकाश हूँ।' जिस पुरुषका यह स्पष्ट अनुभव नष्ट हो गया हो, उसे विद्वान् पुरुष जीवित शव समझते हैं अर्थात् वह जीता हुआ भी मुर्देके समान है। 'मैं ज्ञानस्वरूप परब्रह्म परमात्मा हूँ। देह और इन्द्रियाँ मेरी कौन होती हैं।' इस प्रकार अपरोक्षज्ञानके द्वारा जिसने आत्माको उपलब्ध कर लिया है, अविद्या आदि मलोंसे रहित उस विशुद्ध पुरुषको मृत्यु आदि आपदाएँ विमोहित नहीं कर पातीं। जो शुद्ध चिन्मय परमात्माका आश्रय लेकर सुस्थिर हो गया है, उस महापुरुषको मानसिक चिन्ताएँ उसी तरह मोहित नहीं कर पाती हैं, जैसे महान् पत्थरको तुच्छ बाण । जिन पुरुषोंने अपने चिन्मय स्वभावको भुलाकर नश्वर शरीरपर ही आस्था बाँध रखी है, उन्होंने वास्तवमें सुवर्णको त्यागकर भस्मको ही सोना मानकर ग्रहण किया है । 'मैं देहरूप ही हूँ' इस भावनासे पुरुषके बल, बुद्धि और तेजका नाश हो जाता है तथा 'मैं चेतन आत्मा हूँ' इस दृढ़ निश्चयसे उसके बल, बुद्धि और तेजकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती है । 'मैं न तो छेदा जाता हूँ और न जलाया ही जाता हूँ; क्योंकि मैं वज्रके समान सुदृढ़ चिन्मय परमात्मा हूँ । मेरी

६१४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ।

अपने चिन्मय स्वरूपमें ही नित्य स्थिति है। मैं देहाभिमानी नहीं हूँ।' जिस पुरुषको ऐसा निश्चय हो गया है, उसके लिये यमराज भी तृणके समान तुच्छ है। चेतनपुरुष इस जगत्में जिस-जिस वस्तुको जिस रूपसे देखता या समझता है, उस वस्तुका उसी रूपसे अनुभव करने लग जाता है। यह अनुभवसिद्ध बात है। इसलिये ये सब पदार्थ विषामृत (विषको अमृत-) दृष्टिसे देखे गयेके समान स्थित हैं। अतः कोई भी वस्तु चेतन आत्मासे भिन्न नहीं है, यह बात पूर्णतः सिद्ध हो चुकी है।

(सर्ग ९४—९६)


परमपदके विषयमें विभिन्न मतवादियोंके कथनकी सत्यताका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! 'यह जगत् परमात्माका स्वप्न है, इसलिये चिन्मय है, ब्रह्माकाशरूप है, अतः सब कुछ ब्रह्म ही है।' इस दृष्टिसे सबको सत्य जगत्का ही अनुभव होता है, असत्यका नहीं। 'पुरुष चिन्मय एवं अकर्ता है। अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व आदि-के क्रमसे इस जगत्की उत्पत्ति होती है।' ऐसी दृष्टि रखनेवाले आचार्य महानुभावोंके मतको भी सत्य ही समझना चाहिये; क्योंकि इस भावका चिन्तन करनेसे ऐसा ही अनुभव होता है। 'यह सारा दृश्य ब्रह्मका विवर्त है—ब्रह्म ही इस दृश्यजगत्के रूपमें भासित हो रहा है' ऐसी बातें कहनेवाले महापुरुषोंका मत भी सत्य ही है; क्योंकि इस तरह आलोचना करनेपर इसी रूपमें समस्त पदार्थोंका अनुभव होता है। इसी प्रकार जो लोग 'सम्पूर्ण जगत्को परमाणुओंका समूहरूप' ही मानते हैं, उनका वह मत भी सत्य ही है; क्योंकि उन्हें जिस-जिस पदार्थके विषयमें जैसा-जैसा अनुभव हुआ, उस-उस अनुभवके अनुसार की गयी उनकी कल्पना भी ठीक ही है। 'इस लोक या परलोकमें जो कुछ जैसा देखा गया है, वह वैसा ही है। उसे न सत् कह सकते हैं, न असत्। वास्तविक तत्त्व इन दोनोंसे विलक्षण एवं अनिर्वचनीय है।' इस तरहका जो प्रौढ आध्यात्मिक मत है, वह भी सत्य ही है; क्योंकि वे वैसा ही अनुभव करते हैं। कुछ लोगोंका कहना है कि 'बाह्य—पृथ्वी आदि चार भूतोंका समुदाय ही जगत् है। इससे भिन्न अन्तर्यामी आत्माकी सत्ता नहीं है।' ऐसा कहनेवाले जो नास्तिक हैं परंतु वे भी अपनी दृष्टिसे ठीक ही कहते हैं; क्योंकि वे इन्द्रियातीत आत्माको अपने स्थूल देहमें ही ढूँढ़ते हैं, परंतु उसे पाते नहीं हैं। क्षणिक विज्ञानवादी जो 'प्रत्येक पदार्थको क्षणभङ्गुर' बताते हैं, उनका वह मत भी युक्ति-संगत ही है; क्योंकि सभी पदार्थोंका निरन्तर परिवर्तन एवं उलट-फेर देखनेमें आता है।

परमपद सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त है। इसलिये उसके विषयमें जो जैसा कहता है, वह सभी सम्भव है। 'जैसे घड़ेके भीतर बंद हुआ गौरैया घड़ेका मुँह खोल देनेपर उड़कर बाहर चला जाता है, वैसे ही देहके भीतर बंद और देहके बराबर आकारवाला जीव कर्मक्षय हो जानेपर उड़कर परलोकमें चला जाता है।' इस मतको माननेवाले लोगोंकी कल्पना भी उनके मतानुसार ठीक है। इसी तरह म्लेच्छोंका यह मत है कि 'जीव देहके बराबर ही बड़ा है। उसे ईश्वरने उत्पन्न किया है। जहाँ शरीर गाड़ा जाता है, वह वहीं रहता है। ईश्वर कालान्तरमें उसके विषयमें विचार करते हैं। तब उन्हीं-की इच्छासे उसकी मुक्ति होती है अथवा वह स्वर्ग या नरकमें डाला जाता है।' आत्मसिद्धिके लिये की हुई म्लेच्छोंकी यह कल्पना उनके भावके अनुसार ठीक कही जा सकती है और उनके देशोंमें वह दूषित नहीं मानी जाती है। जो संत महात्मा हैं, वे 'ब्राह्मण, अग्नि, विष, अमृत, मरण और जन्म आदिमें भी समभाव' रखते हैं। यह भी ठीक ही है; क्योंकि विभिन्न विचारधाराके विद्वानोंका जो मत है, वह सब सर्वात्मा ब्रह्मसे भिन्न नहीं है।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्संगका महत्त्व * ६१५


इसलिये अपने-अपने मतके अनुसार साधन करनेपर उन्हें तदनुसार सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। आस्तिकोंके मतमें 'जैसे यह लोक है, वैसे परलोक भी है। अतः पारलौकिक लाभके लिये किये गये तीर्थ-स्नान और अग्निहोत्र आदि निष्फल नहीं हैं।' ऐसी जो उनकी भावित भावना है, उसे सत्य ही समझना चाहिये। 'यह जगत् न तो शून्य है और न अशून्य ही है, किंतु अनिर्वचनीय है' इस प्रकार माननेवाले वादियोंका मत भी असत्य नहीं है; क्योंकि सर्वशक्तिमान् ब्रह्मकी जो मायाशक्ति है, वह न तो शून्यरूप है और न सत्य ही है किंतु उसे अनिर्वचनीय समझना चाहिये। इसलिये जो अपने जिस निश्चयमें दृढ़तापूर्वक स्थित है, वह यदि बालोचित चपलता या मूढ़ताके कारण उस निश्चयसे हटे नहीं तो उसका फल अवश्य पाता है।

बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि सबसे पहले श्रेष्ठ वस्तुके विषयमें विद्वानोंके साथ विचार कर ले, विचारके बाद जो निश्चित सिद्धान्त स्थापित हो, उसीको ग्रहण करे। दूसरे जैसे-तैसे निश्चयको नहीं ग्रहण करना चाहिये। शास्त्रोंके स्वाध्याय और सद्व्यवहारकी दृष्टिसे जिस देशमें जो भी उत्तम बुद्धिसे युक्त हो, उस देशमें वही विद्वान् या पण्डित है। अतः सद्ज्ञानकी प्राप्तिके लिये उसीका आश्रय लेना चाहिये। उत्तम शास्त्रके अनुसार व्यवहार करनेवाले तथा तत्त्वज्ञानके लिये परस्पर वाद-विवाद करनेवाले सत्पुरुषोंमें जो सबको आह्लाद प्रदान करनेवाला और अनिन्दनीय हो, वही श्रेष्ठ है। अतः उसीका आश्रय लेना चाहिये। रघुनन्दन ! प्रत्येक जातिमें कुछ ऐसे नामी विद्वान् होते हैं, जिनके सूर्यतुल्य प्रकाशसे दिन प्रकाशित एवं सार्थक होते हैं। जो मूढ़ हैं, वे सभी मोहरूपी महासागरमें संसारचक्रके आवर्तन-प्रत्यावर्तन-से ऊपर-नीचे होते हुए तृणके समान बहते रहते हैं।

(सर्ग ९७)


तत्त्वज्ञानी संतोंके शील-स्वभावका वर्णन तथा सत्संगका महत्त्व

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो विवेकी पुरुष संसारसे विरक्त हो परम पद परब्रह्म परमात्मामें विश्राम कर रहे हैं, उनके लोभ, मोह आदि शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं। वे तत्त्वज्ञानी महात्मा न कोई अनुकूल वस्तु पाकर हर्षित होते हैं, न किसीके प्रतिकूल बर्तावसे कुपित होते हैं। न आवेशमें आते हैं, न आहारका संग्रह करते हैं, न लोगोंसे उद्विग्न होते हैं और न स्वयं ही लोगोंको उद्वेगमें डालते हैं। वे किसी भी बुरी-अच्छी कामनासे हठपूर्वक कष्टसाध्य वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें नहीं प्रवृत्त होते हैं। उनका आचरण मनोरम और मधुर होता है। वे प्रिय और कोमल वचन बोलते हैं। चन्द्रमाकी किरणोंके समान अपने सङ्गसे अन्तःकरणमें आह्लाद प्रदान करते हैं। कर्तव्योंका विवेचन करते और क्षणभरमें ही विवादका निर्णय कर देते हैं। उनका आचरण दूसरोंको उद्वेगमें डालनेवाला नहीं होता है। वे सबके प्रति बन्धुभाव रखते हैं और बुद्धिमानोंके समान समुचित बर्ताव करते हैं। बाहरसे उनका आचरण सबके समान ही होता है, किंतु भीतरसे वे सर्वथा शीतल होते हैं। तत्त्वज्ञानी महात्मा शास्त्रोंके अर्थोंमें बड़ा रस लेते हैं। जगत्में क्या उत्तम, अधम अथवा भला-बुरा है, इसका उन्हें अच्छी तरह ज्ञान होता है। त्याज्य और ग्राह्यका भी वे ज्ञान रखते हैं तथा प्रारब्धवश जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसका अनुसरण करते हैं। लोक और शास्त्रके विरुद्ध कार्योंसे वे सदा विरत रहते हैं। सज्जनोंके बीच रहने या सत्संग करनेके रसिक होते हैं। घरपर आये हुए याचकरूपी भ्रमरका वे प्रफुल्ल कमलोंके समान अपने ज्ञानका अनावृत सुगंध फैलाकर तथा उत्तम आश्रय एवं सुखद भोजन

६१६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

,देकर आदर-सत्कार करते हैं । जनताको अपनी ओर खींचते हैं और लोगोंके पाप-ताप हर लेते हैं । वर्षाकालके मेघोंकी भाँति वे स्निग्ध एवं शीतल होते हैं । धीर स्वभाववाले ज्ञानी पुरुष राजाओंके नाशक और देशको छिन्न-भिन्न करनेवाले व्यापक जन-क्षोभको उसी प्रकार रोक देते हैं, जैसे पर्वत भूकम्पको ।

ज्ञानी पुरुष चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर अङ्गवाली गुणशालिनी पत्नीके समान विपत्तिकालमें उत्साह एवं धैर्य प्रदान करते हैं और सम्पत्तिके समय सुख पहुँचाते हैं । साधुपुरुष वैशाख मास या वसन्तके समान अपने सुयशरूपी पुण्यसे सम्पूर्ण दिशाओंको निर्मल बनाते, उत्तम फलकी प्राप्तिमें कारण बनते और कोकिलके समान मीठी वाणी बोलते हैं । आपदाओंमें, बुद्धिनाशके अवसरोंपर भूख-प्यास, शोक-मोह तथा जरा-मरण—इन छः ऊर्मियोंके प्राप्त होनेपर, व्याकुलताकी दशामें तथा घोर संकट आनेपर साधु पुरुष ही सत्पुरुषोंके आश्रयदाता होते हैं । काल-सर्पसे भरे हुए अत्यन्त भयंकर संसार-सागरको सत्संगरूपी जहाजके बिना दूसरी किसी नौकासे पार नहीं किया जा सकता । उपर्युक्त उत्तम गुणोंमेंसे एक भी गुण जिसमें उपलब्ध हो, उसके उसी गुणको सामने रखकर उसमें दीखनेवाले सब दोषोंकी उपेक्षा करके उसका आश्रय लेना चाहिये । सारे कामोंको छोड़कर सत्पुरुषोंका सङ्ग करे; क्योंकि यह सत्संगरूपी कर्म निर्वाधरूपसे इहलोक और परलोक दोनोंका साधक होता है । किसी समय कहीं भी सत्पुरुषसे अधिक दूर नहीं रहना चाहिये । विनययुक्त बर्ताव करते हुए सदा साधुपुरुषोंका सेवन करना चाहिये; क्योंकि सत्-पुरुषके समीप जानेवाले मनुष्यका उसके शान्ति आदि प्रसरणशील उत्तम गुण अनायास ही स्पर्श करते हैं, जैसे सुगन्धित पुष्पवाले वृक्षके निकट जानेसे उसके पुष्प-पराग बिना यत्नके ही सुलभ हो जाते हैं ।

(सर्ग ९८)

सत्‌का विवेचन और देहात्मवादियोंके मतका निराकरण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जो वस्तु शास्त्रीय विचारसे उपलब्ध होती है तथा जिसकी सत्ता हेतुओ और युक्तियोंद्वारा सिद्ध है, वही सत् कही गयी है । शेष सभी वस्तुएँ प्रतीतिमात्र हैं । जो तीनों कालोंमें कभी हुई ही नहीं, वह वस्तु सत् कैसे हो सकती है ? मूर्खोकी दृष्टिमें इस संसारका जैसा स्वरूप है, उसे वही जानता है । हमलोगोंको उसका अनुभव नहीं है । मृग-तृष्णाकी नदीके जलमें जो मछली रहती है, वही उसकी मिथ्या चञ्चल लहरोंके आवर्तन-प्रत्यावर्तनको जानती होगी । तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें तो केवल एकमात्र चेतनाकाश ही बाहर-भीतर, तुम-मैं इत्यादि सब कुछ बनकर प्रकाशित हो रहा है ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिन लोगोंका यह पक्ष (मत) है कि 'जबतक जीवे, तबतक सुखसे जीवे, मृत्यु अप्रत्यक्ष नहीं है । जो शरीर जलकर भस्म होकर बुझ गया, उसका पुनः आगमन कहाँसे हो सकता है ?' उनके लिये इस संसारमें दुःख-शान्तिका क्या उपाय है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! संवित्‌का जो-जो निश्चय होता है, वह अपने भीतर अखण्डरूपसे उसीका अनुभव करती है । इस बातका सब लोगोंको प्रत्यक्ष अनुभव है । अन्तःकरणमें नित्य-निरन्तर जैसी बुद्धिका उदय होता है, मनुष्य वैसा ही हो जाता है । यदि संवित्‌के बोधसे पुरुष दुखी हुआ है तो जबतक यह विरुद्ध बोध रहेगा, तबतक जीव दुःखमय बना रहेगा । यह जगत् सच्चिदानन्दरूप ब्रह्माकाशका स्फुरणमात्र ही है, ऐसी भावना दृढ़ हो जाय तो वह दुःखका बोध कैसे हो सकेगा ? जो जगत् वस्तुतः कूटस्थ अद्वितीय चेतनाकाशरूप

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन * ६१७


है, उस जगत्से किसको कैसे दुःखका बोध हो सकता है । जीवकी जैसी दृढ़ भावना होती है, उसीके अनुसार वह सुखी या दुखी होता है, ऐसा निश्चय है । जिनके मतमें चेतनसे शरीरोंकी कल्पना हुई है, वे श्रेष्ठ पुरुष वन्दनीय हैं; परंतु जिनके मतमें शरीरसे चेतनकी उत्पत्ति होती है, उन नराधमोंसे बाततक नहीं करनी चाहिये । ( ऐसे लोग दुःखसे कैसे छूट सकते हैं । )

( सर्ग ९९-१०० )


सबकी चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! चिन्मात्र ही पुरुष है, वही इस प्रकार नाना रूपोंमें अवस्थित है । उस चिन्मात्र परम पुरुष परमात्माके सिवा दूसरी किम वस्तुकी सत्ता यहाँ सम्भव हो सकती है ? मेरे सारे अङ्ग चूर-चूर होकर परमाणुके तुल्य हो जायँ अथवा बढ़कर सुमेरु पर्वतके समान विशाल हो जायँ, इससे मेरी क्या क्षति हुई अथवा क्या वृद्धि हुई ? क्योंकि मेरा वास्तविक स्वरूप तो सच्चिदानन्दमय है । हमारे पितामह आदिके शरीर मर गये, किंतु उनका चैतन्य तो नहीं मरा है । यदि वह भी मर जाता तो मृत आत्मावाले उनका तथा हमलोगोंका फिर जन्म नहीं होता । किंतु पुरुष अविनाशी चिन्मय ही है । वह आकाशके समान नित्य है । उसका कभी नाश नहीं होता है । 'मैं नष्ट होता हूँ या मरता हूँ' इस तरहका जो शोक है, वह सर्वथा व्यर्थ है । इसलिये न तो मरण दुःखरूप है और न जीवित रहना सुखरूप । यह सब कुछ नहीं है । केवल अनन्त चेतन परमात्मा ही इस तरह स्फुरित हो रहा है ।

श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! आदि और अन्तसे रहित परमतत्त्व परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो जानेपर उत्तम पुरुष कैसा—किन-किन लक्षणोंसे सम्पन्न हो जाता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जिसे ज्ञेय वस्तु परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो गया है, ऐसा जीवन्मुक्त श्रेष्ठ पुरुष कैसा होता है तथा वह जीवनपर्यन्त कैसे स्वभावसे युक्त हो किस आचारका पालन करता रहता है, यह बताया जाता है, सुनो । ऐसा पुरुष यदि जंगलमें रहता हो तो वहाँ पत्थर भी उसके मित्र हो जाते हैं । वनके वृक्ष बन्धु-बान्धव और वन्य मृगोंके बच्चे उसके स्वजन बन जाते हैं । यदि वह विशाल राज्यमें रहता हो तो वहाँ जनसमुदायसे भरा हुआ स्थान भी उसके लिये शून्य-सा ही हो जाता है । विपत्तियाँ बड़ी भारी सम्पत्तियों हो जाती हैं और नाना प्रकारके व्यसन ही उसके लिये सुन्दर उत्सव बन जाते हैं । उसके लिये असमाधि भी समाधि है । दुःख भी महान् सुख ही है । वाणीका व्यवहार भी मौन है और कर्म भी अकर्म ही है । वह जाग्रत्-अवस्थामें रहकर भी सुषुप्तिमें ही स्थित है (क्योंकि निर्विकल्प आत्मामें उसकी सुदृढ़ स्थिति है) । वह जीवित रहता हुआ भी देहाभिमानसे शून्य होनेके कारण मृतकके ही तुल्य है । वह समस्त आचार-व्यवहारका पालन करता है, तो भी कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होनेके कारण कुछ भी नहीं करता है । वह रसिक होकर भी अत्यन्त विरक्त है । करुणारहित होकर भी सबको अपना बन्धु मानकर सबके प्रति स्नेह रखता है । निर्दय होकर भी अत्यन्त करुणासे भरा हुआ है और स्वयं तृष्णासे शून्य होकर भी पराये हितके लिये तृष्णा रखता है । उसके आचारका सभी अभिनन्दन करते हैं तथापि वह सभी आचारोंसे बहिष्कृत है । शोक, भय और आयाससे शून्य होनेपर भी वह दूसरोंका दुःख देखकर शोकयुक्त-सा दिखायी देता है । उस पुरुषसे जगत्के प्राणियोंको कभी उद्वेग नहीं प्राप्त होता तथा वह भी उनसे कभी उद्विग्न नहीं होता । संसारमें (ब्रह्मा-

६१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

नन्दका ) रसिक होकर भी वह संसारी मनुष्योंसे अत्यन्त विरक्त होता है । वह प्राप्त हुई वस्तुका न तो अभिनन्दन करता है और न अप्राप्त वस्तुकी अभिलाषा ही । अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थका अनुभव होनेपर भी वह हर्ष और विषादमें नहीं पड़ता । वह दुखी पुरुषके पास दुखियोंकी ही चर्चा करता है, सुखीके पास सुखकी ही कथा कहता है और स्वयं सभी अवस्थाओंमें हार्दिक दुःख-सुखसे पराजित न होकर सदा एक-सा स्थित रहता है । शास्त्रविहित शुभकर्मसे भिन्न दूसरा कोई निषिद्ध कर्म उसे किंचिन्मात्र भी अच्छा नहीं लगता । महात्मा पुरुषोंका यह स्वभाव ही है कि वे शास्त्रविपरीत चेष्टा कभी नहीं करते हैं ।

जीवन्मुक्त महात्मा न तो कहीं आसक्त होता है और न किसीसे अकस्मात् विरक्त ही होता है । वह धनके लिये याचक होकर नहीं घूमता है और भीतरसे वीतराग होकर भी ऊपरसे रागयुक्त-सा जान पड़ता है । शास्त्रके अनुसार व्यवहार करते हुए क्रमशः जो सुखदुःख प्राप्त होते हैं, उनसे वस्तुतः वह अछूता रहता है तो भी उनका स्पर्श-सा करता जान पडता है । वह उन सुख-दुःखोंसे हर्ष और विषादके वशीभूत नहीं होता । अवश्य ज्ञानी महात्मा दूसरोंके सुखसे प्रसन्न और दूसरोंके ही दुःखसे दुखी देखे जाते हैं, परंतु वे भीतरसे अपने समतापूर्ण स्वभाव-का परित्याग कभी नहीं करते; क्योंकि वे संसाररूपी नाट्यशालाके नट हैं । अपने कहे जानेवाले पुत्र आदि जितने पदार्थसमूह हैं, वे सब वस्तुतः पानीके बुलबुलोंके समान मिथ्या हैं । अतः तत्त्वदर्शी महात्माका उनके प्रति ( मोहरूप ) स्नेह नहीं होता है । पर वह ज्ञानी महात्मा स्नेहरहित होनेपर भी घनीभूत स्नेहसे आर्द्र हृदयवाले पुरुषकी भाँति यथायोग्य वात्सल्य-वृत्तिका दर्शन कराता हुआ व्यवहार करता है । वह बाहरसे समस्त शिष्टाचारोंके पालनमें संलग्न रहकर भी भीतर सर्वथा शान्त बना रहता है । उसके अन्तःकरणमें किसी प्रकारका आवेश नहीं होता तो भी बाहरसे कभी-कभी आविष्ट-सा दिखायी देता है ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुनीश्वर ! अन्धके सदृश ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए कलुषित चित्तवाले दम्भी मनुष्य भी तो झूठमूठमें अपनी तपस्याकी दृढ़ता दिखलानेके लिये ऐसे लक्षणोंसे युक्त हो सकते हैं । फिर, कौन सच्चे महात्मा हैं और कौन दम्भी, इसे कौन जान सकता है ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! ये लक्षण सत्य हों या असत्य, किंतु ऐसे लक्षणोंसे युक्त स्वरूपका होना हर हालतमें अच्छा ही है ( इन लक्षणोंसे सम्पन्न पुरुष दम्भी हो तो भी आदरणीय ही है ) । जो वेदार्थ-तत्त्व—परमात्माके ज्ञाता हैं, उनमें तो ये गुणसमूह स्वाभाविक अनुभवके बलसे ही प्रतिष्ठित रहते हैं । वे जीवन्मुक्त पुरुष वीतराग तथा क्रियाके फलोंमें आसक्तिसे शून्य होते हुए ही रागयुक्त पुरुषोंके समान चेष्टा करते हैं । वे दुखियोंको देखकर सहसा करुणासे भर जाते हैं । चित्त-रूपी दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुए समस्त दृश्यप्रपञ्चको वे कपटभूमिके समान असत् देखते हैं । स्वप्नमें हस्तगत हुए सुवर्णको जैसे जाग्रत्कालमें असत् माना जाता है, वैसे ही वे इस जगत्को असत् समझते हैं ।

जिन्हें ज्ञेय पदार्थ—परमात्माका भलीभाँति ज्ञान हो चुका है और जो उन ज्ञानी महात्माओंके समान ही पवित्र अन्तःकरण-वाले हैं, वे ही उन महात्माओंके महत्त्वको ठीक-ठीक जान पाते हैं, जैसे साँपके पदचिह्नोंको साँप ही समझ पाते हैं । श्रेष्ठ पुरुष तो अपने सर्वोत्तम भावको छिपाये फिरते हैं । भला, गाँव और नगरोंके धनोंसे जिसका खरीदा जाना असम्भव है, ऐसी कौन-सी चिन्तामणि बाजारमें बिकनेके लिये आती है ? उन तत्त्वज्ञानी महात्माओंका भाव अपने गुणोंको छिपाये रखनेमें ही होता है, दूसरोंके सामने प्रदर्शन करनेमें नहीं; क्योंकि वे वासनासे शून्य, द्वैत-

[ निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सब की चिन्मात्ररूपताका निरूपण तथा ज्ञानी महात्माके लक्षणोंका वर्णन * ६१९

हीन एवं अभिमानसे रहित होते हैं।* श्रीराम ! उन महात्माओंको एकान्तसेवन, असम्मान, बुरी स्थिति तथा साधारण लोगोंद्वारा की गयी अवहेलना—ये सब चीजें जैसा सुख पहुँचाती हैं, वैसा सुख उन्हें बड़ी-बड़ी समृद्धियाँ भी नहीं दे सकतीं।

तत्त्वज्ञानका सारभूत जो निरतिशय आनन्द है, वह एकमात्र अपने अनुभवसे ही जाननेयोग्य है, उसे दूसरेको दिखाया नहीं जा सकता । तत्त्वज्ञ पुरुष भी उसे नहीं देखता, केवल स्वप्रकाशरूपसे उसका अनुभव करता है। 'लोग मेरे इस गुणको जानें और मेरी पूजा करें' ऐसी इच्छा अहंकारियोंको ही होती है। जिनका चित्त अहंकारसे मुक्त है, उनके भीतर ऐसी इच्छाका उदय नहीं होता है।† रघुनन्दन ! आकाशमें गमन आदि जो क्रियाफल हैं, वे तो मन्त्र और औषधके प्रभावसे अज्ञानियोंके लिये भी सिद्ध (सुलभ) हो जाते हैं। कोई ज्ञानी हो या अज्ञानी, जो लक्ष्यसिद्धिके लिये जैसा क्लेश सहन करनेमें समर्थ हो, वह वैसा ही फल कर्मानुसार अवश्य प्राप्त कर लेता है। चन्दनकी सुगन्धकी भाँति विहित और निषिद्ध कर्मोंका फल सभीके हृदयमें अपूर्व रूपसे विद्यमान है। समय पाकर प्रकट हुए उस फलको उसका अधिकारी जीव अवश्य पाता है। 'यह आकाशगमन आदि फल कुछ भी नहीं है—अत्यन्त तुच्छ है अथवा मनका भ्रममात्र है, या अधिष्ठानभूत चिदाकाशमात्र है'—जिसे ऐसा ज्ञान हो गया है, वह वासनाशून्य तत्त्वज्ञ


* भावं निगूहन्त्येते तमुत्तममनुत्तमाः ।
ग्राम्यैर्धनैः किलानर्थ्यः कश्चिन्तामणिरापणे ॥
तस्मिन्निगूढने भावो यतस्तेषा न दर्शने ।
निर्वासना गतद्वैता गतमानाः किलाङ्गते ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । २७-२८)

† गुणं ममेमं जानातु जनः पूजां करोतु मे ।
इत्यहंकारिणामीहा न तु तन्मुक्तचेतसाम् ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । ३१)


पुरुष कर्मके बवंडररूप उन मन्त्रौषधि-साध्य क्रियाओंका साधन कैसे करेगा ? उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही किसी भी प्राणीमें उसका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता । इस पृथ्वीपर, स्वर्गमें अथवा देवताओंके यहाँ भी कहीं कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उस उदारचेता परमात्मज्ञानीको लुभा सके।* जिसके लिये सारा संसार ही तिनकेके समान तुच्छ हो गया है, जिसमें रजोगुणका लेश भी नहीं है, उस ज्ञानी महात्माके लिये एकमात्र परमात्मासे भिन्न दूसरी कौन-सी वस्तु उपादेय हो सकती है ?

लोकसंग्रहके लिये जिसने जगत्के व्यवहारोंका पूर्णरूपसे निर्वाह किया है, जिसका हृदय परिपूर्ण ( निष्काम ) है, वह मननशील जीवन्मुक्त पुरुष अपने स्वरूपमें ज्यों-का-त्यों स्थिर रहकर यथाप्राप्त शिष्टाचारका अनुसरण करता है । जो भीतरसे नित्य शान्त और मौनी है तथा जिसकी मनोभूमि सत्त्वगुणमय हो गयी है, वह महात्मा भरे हुए महासागरके समान सब ओरसे पूर्ण होता है। तथा उसका आशय गम्भीर होनेके साथ ही सुस्पष्ट होता है । तत्त्वज्ञानी पुरुष अमृतसे भरे हुए सरोवरके समान अपने आत्मामें स्वयं ही आनन्दकी हिलोरें लेता है तथा निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान दूसरोंको भी आह्लाद प्रदान करता है ।

'यह सारा विश्व भ्रममात्र है, मिथ्या इन्द्रजाल है'—ऐसे दृढ़ निश्चयके कारण ज्ञानी पुरुष इच्छाओंसे सर्वथा रहित हो जाता है । ज्ञानी महात्मा अपने शरीरके सर्दी-गरमी आदि दुःखोंको भी इस तरह अवहेलना-पूर्वक देखता है, मानो वे दूसरेके शरीरमें हों ।


* न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा क्वचित् ।
यदुदारमनोवृत्तेर्लोभाय विदितात्मनः ॥
(नि० प्र० उ० १०२ । ३८)

७७—विपश्चितोंके विहारका तथा जीवन्मुक्तोंकी सर्वात्मरूप स्थितिका वर्णन

६२० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

केवल परहितके लिये फल-फूल धारण करनेवाली लताके समान धीर वृत्तिसे तथा करुणाके कारण उदार वृत्तिसे वह महात्मा दुखी प्राणियोंका परिपालन करता है। वह संसारसे विरक्त होकर ऐसी सारभूत स्थितिको अपनाता है, जिसमें जलमात्र ग्रहण करके भी संतोष माना जाता है। साधारण लोगोंके समान यथाप्राप्त व्यवहारका सम्पादन करता हुआ वह महात्मा चराचर भूतोंके ऊपर (परब्रह्म परमात्मामें) ही स्थित होता है।

कोई महात्मा पर्वतकी गुफाको ही घर मानकर उसमें रहता है। कोई पवित्र आश्रममें निवास करता है। कोई गृहस्थाश्रमी होता है और कोई प्रायः इधर-उधर घूमता रहता है। कोई भिक्षाचर्यासे निर्वाह करता है, कोई एकान्तमें बैठकर तपस्या करता है, कोई मौनव्रत धारण किये रहता है, कोई परमात्माके ध्यानमें संलग्न होता है, कोई प्रख्यात पण्डित होता है, कोई श्रुतियोंका श्रोता होता है, कोई राजा, कोई ब्राह्मण और कोई मूढ़के समान स्थित रहता है, कोई सिद्ध गुटिका, अंजन और खङ्ग आदिसे सिद्ध होकर आकाशगामी बना रहता है, कोई शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह करता है, कोई पामरके समान रूप धारण किये रहता है। कोई सारे वैदिक आचारोंका परित्याग कर देता है तो कोई कर्मकाण्डियोंका सरदार बना रहता है, किसीका चरित्र उन्मत्तोंके समान होता है और कोई संन्यास-मार्गका आश्रय लेता है।

शरीर आदि और चित्त आदि कुछ भी पुरुषका स्वरूप नहीं है। केवल चेतन-तत्त्व ही पुरुष है। उसका कभी नाश नहीं होता है। यह आत्मा अच्छेद्य है—इसे कोई काट नहीं सकता। यह अदाह्य है—इसे कोई जला नहीं सकता। यह अक्लेद्य है—इसे कोई पानीसे भिगो या गला नहीं सकता। यह अशोष्य है—इसे कोई सुखा नहीं सकता। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है। तत्त्वज्ञ पुरुष पातालमें समा जाय, आकाशको लाँघकर उसके ऊपर चला जाय अथवा सम्पूर्ण दिशाओंमें वेगपूर्वक भ्रमण करे, जिससे पर्वत आदिसे टकराकर वह पिस जाय या चूर-चूर हो जाय, परंतु उसका जो चिन्मात्र स्वरूप है वह अजर-अमर बना रहता है, वह कभी नष्ट नहीं होता; क्योंकि वह आकाशके समान अनन्त सदा शान्त, अजन्मा और कल्याणमय परमात्मस्वरूप ही है।

(सर्ग १०१, १०२)


इस शास्त्रके विचारकी आवश्यकता तथा इससे होनेवाले लाभका प्रतिपादन, वैराग्य और आत्मबोधके लिये प्रेरणा तथा विचारद्वारा वासनाको क्षीण करनेका उपदेश

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! शम, दम आदि साधनसे सम्पन्न पुरुषको चाहिये कि वह उद्वेग छोड़कर प्रतिदिन गुरु-शुश्रूषा आदि नियमपूर्वक करता हुआ इस महारामायण नामक शास्त्रका विचार करे। यह शास्त्र इहलोक और परलोक दोनोंके लिये हितकर तथा कल्याणकारी है। आप सब सभासद् भाँति-भाँतिकी असम्भावना एवं विपरीतभावना आदिको अपने हृदयमें स्थान दिये हुए हैं। इसलिये मिल-जुलकर अभ्यास न करनेसे आप लोगोंका जाना हुआ भी यह आत्मज्ञान भूल जानेके कारण अनजाना-सा हो रहा है। जो जिस वस्तुको चाहता है, वह उसके लिये यत्न करता है। वह यदि थककर उस प्रयत्नसे निवृत्त न हो जाय तो अपनी अभीष्ट वस्तुको अवश्य प्राप्त कर लेना है। इस शास्त्रके सिवा कल्याणका सर्वश्रेष्ठ साधन आजतक न तो हुआ है और न आगे होगा ही। इसलिये परम श्रेयकी प्राप्तिके लिये इसीका बारंबार विचार एवं मनन करना चाहिये। इस शास्त्रका भलीभाँति विचार करके स्थित हुए पुरुषको स्वयं ही उत्तम परमात्मतत्त्वका बोध एवं अनुभव होने लगता है। वरदान और शापकी भाँति यह विलम्बसे अपना फल नहीं प्रकट करता।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण * ६२१

यह परमात्मबोध संसार-मार्गके भ्रमको हर लेनेवाला है। जो न तो पिताने, न माताने और न शुभ कर्मोंने ही अबतक सिद्ध किया है, वही आपका परम कल्याण यह महारामायण-शास्त्र तत्काल सिद्ध कर देगा, यदि आप अभ्यासपूर्वक इसे भलीभाँति जान लें। साधुशिरोमणे ! यह संसार-बन्धनमयी विषूचिका (हैजा) बड़ी भयंकर है और दीर्घकालतक टिकी रहनेवाली है। आत्मज्ञानके सिवा दूसरी किसी दवासे यह कभी शान्त नहीं होती।

मनुष्यो ! आपातमधुर, शून्य एवं निस्सार विषयोंका आस्वादन करते हुए तुमलोग खाली हवा चाटनेवाले सर्पोंके समान आकाशरूपी अनन्त संसारकी ओर पैर न बढ़ाओ। बड़े कष्टकी बात है कि तुम्हारे दिन केवल लौकिक व्यवहारमें ही इस तरह बीत रहे हैं कि वे कब आये और कब गये, इसका तुम्हें पता ही नहीं लगता। इन्हीं बीतते हुए दिनोंके द्वारा तुमलोग केवल अपनी मौतकी राह देख रहे हो। लोगो ! तुम मान और मोहसे रहित होकर तत्त्वज्ञानके द्वारा उत्तम मोक्ष-पदको प्राप्त करो। अधम संसार-गतिमें न पड़ो। आत्मज्ञानके द्वारा बड़ी-से-बड़ी आपत्तियोंका मूलोच्छेद कर दिया जाता है। जो आज ही मरणरूपी आपत्तिसे बचनेका उपाय नहीं करता है, वह मूढ़ रुग्णावस्थामें, जब मौत सिरपर सवार हो जायगी, तब क्या करेगा ?

आदरणीय सभासदो ! मैं न तो मनुष्य हूँ, न गन्धर्व हूँ, न देवता हूँ, न राक्षस ही हूँ, अपितु आप लोगोंका सूक्ष्म संविद्रूप विशुद्ध आत्मा हूँ और इस प्रकार उपदेश देनेके लिये यहाँ बैठा हूँ। आपलोग भी शुद्ध चैतन्यमात्र ही हैं। अत्यन्त निर्मल चिन्मात्रस्वरूप मैं आपलोगोंके पुण्यसे ही यहाँ उपस्थित हूँ। आपकी आत्मासे भिन्न नहीं हूँ। जबतक मौतके काले दिन नहीं आ रहे हैं, तभीतक सब वस्तुओंमें वैराग्यरूपी पहला सार पदार्थ समेटकर रख लो। जो इस शरीरमें रहते हुए ही नरकरूपी रोगकी चिकित्सा नहीं कर लेता, वह औषधशून्य प्रदेश (परलोक) में पहुँचकर उस रोगसे पीड़ित होनेपर क्या करेगा ? जबतक समस्त पदार्थोंकी ओरसे वैराग्य नहीं प्राप्त होता, तबतक उन पदार्थोंकी वासना क्षीण नहीं होती है। महामते ! आत्माका पूर्णरूपसे उद्धार करनेके लिये वासनाको क्षीण करनेके सिवा दूसरा कोई उपाय कभी सफल नहीं होता। पदार्थोंकी सत्ता होती है, तभी उनमें अनुकूलता बुद्धि होनेसे वासना होती है। किंतु ये पदार्थ तो खरगोशके सींग आदिकी भाँति हैं ही नहीं। (फिर उनमें वासना बनी रहनेका क्या कारण है ?) जगत्के सभी पदार्थ तभीतक मनोहर प्रतीत होते हैं, जबतक कि उनके स्वरूपपर सम्यक् विचार नहीं किया जाता। विचार करनेपर उनकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती। अतः वे जीर्ण-शीर्ण होकर न जाने कहाँ विलीन हो जाते हैं। (सर्ग १०३)

मोक्षके स्वरूप तथा जाग्रत् और स्वप्नकी समताका निरूपण

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—निर्मल आत्मस्वरूपका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर जो लौकिक दुःख और सुखसे रहित अक्षय परमानन्दरूपता प्राप्त होती है, वही मोक्ष है। वह शरीरके रहने या न रहनेपर भी समानरूपसे ही उपलब्ध होता है। उसी मोक्ष-सुखमें सबका पूर्ण विश्राम हो।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—स्वप्न और जाग्रत्-दोनों एक समान कैसे हो सकते हैं ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें स्वप्नगत बन्धुजनोंके साथ विहार करनेके पश्चात् वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है। स्वप्न-शरीरकी निवृत्ति ही स्वप्नद्रष्टाकी मृत्यु है। स्वप्न-संसार

७८—मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका तथा उत्तर दिशागामी विपश्चित्‌के भ्रमणका विशेष रूपसे वर्णन

६२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मरकर जीव जब स्वप्नगत प्राणियोंसे वियुक्त होता है, तब इस जाग्रत्-संसारमें जागता है और निद्रासे मुक्त कहलाता है। जो स्वप्नका द्रष्टा है, वह स्वप्न-संसारमें अनेकानेक सुख-दुःख-दशाओंका, मोहका तथा रात और दिनके उलट-फेरका अनुभव करके वहाँ मरता—स्वप्न-शरीरका त्याग करता है। फिर निद्रा टूट जानेके कारण निद्राके अन्तमें वह यहाँ शयनस्थानमें मानो नया जन्म लेता है और जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है। तदनन्तर 'ये स्वप्नमें देखे गये बन्धु-बान्धव सत्य नहीं थे' इस विश्वाससे युक्त होता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर अर्थात् स्वप्न-शरीरका त्याग करके दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनः जन्म लेता या जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्न देखनेवाला पुरुष जाग्रत्-संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनर्जन्म ग्रहण करता है। जैसे एक जाग्रत्‌में मरकर दूसरे जाग्रत्‌में उत्पन्न हुआ पुरुष पूर्व जाग्रत् प्रपञ्चके विषयमें 'वह स्वप्न एवं असत् था' ऐसी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, उसी तरह एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नको प्राप्त हुआ पुरुष बादवाले स्वप्नमें स्वप्नकी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, वरं जाग्रत्‌की ही प्रतीति ग्रहण करता है। यह उसकी बुद्धिकी मूढ़ताका ही परिणाम है। जैसे बादवाले स्वप्नमें जाग्रत्‌की प्रतीति भ्रममात्र ही है, वैसे ही पूर्व-जाग्रत्‌को स्वप्न और असत् न समझना भी मूढ़ता ही है। स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वप्नमें भी फिर अन्य स्वप्न-दर्शनका अनुभव करता हुआ उस स्वप्नको ही जाग्रत्-रूपसे ग्रहण करता है। इस प्रकार जाग्रत् और स्वप्न नामकी दो अवस्थाओंमें जीव न तो स्वतः उत्पन्न होता है और न मरता ही है। किंतु उन-उन जाग्रत् और स्वप्नके शरीरोंमें अभिमान करता और छोड़ता है। यही उसका जन्म लेना और मरना है। स्वप्न-द्रष्टा जीव स्वप्नमें मरकर इस जागरण अवस्थामें जागा हुआ कहलाता है और इस जाग्रत्‌में मरा हुआ जीव अन्यत्र जाग्रत्रूप स्वप्नमें जागा हुआ कहा जाता है, (इस तरह स्वप्न और जाग्रत्‌की समता ही सिद्ध होती है)। एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थिति होनेपर दूसरा स्वप्न ही पहले स्वप्नकी अपेक्षा वर्तमान होनेसे जाग्रत् समझा जाता है। इसी प्रकार जाग्रत्‌में मरकर दूसरे जाग्रत्रूप स्वप्नमें जगे हुए पुरुषके लिये पहली जाग्रदवस्था अवश्य ही स्वप्न हो जाती है। इस दृष्टिसे जाग्रत् और स्वप्न—दोनों ही अतीत घटनाके समान हैं। वर्तमानकालमें दोनोंमेंसे किसीकी भी सत्ता नहीं है। इस कारण वे परस्पर एक दूसरेके उपमान और उपमेय बने हुए हैं। वर्तमान अवस्थामें तो स्वप्न भी जाग्रत्‌के समान ही प्रतीत होता है और बीता हुआ जाग्रत् भी स्वप्नके समान ही है। वास्तवमें दोनों ही असत् हैं। केवल चिदाकाश ही स्वप्न और जाग्रत्‌के रूपमें स्फुरित होता है। सौभाग्यशाली रघुनन्दन ! जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले नगर, पर्वत और गृह आदि चिन्मय आकाश ही हैं, उसी तरह जाग्रत्‌में भी ये नगर, पर्वत आदि चिदाकाशमय ही हैं। स्वप्न और जाग्रत्—दोनों अन्तमें विकल्प-शून्य, शान्त, अनन्त, एक चिन्मात्र ही शेष रह जाते हैं। इस प्रकार तत्त्वके विषयमें वादियोंका विवाद व्यर्थ है। (सर्ग १०४-१०५)


चिदाकाशके स्वरूपका प्रतिपादन तथा जगत्‌की चिदाकाश-रूपताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चेतनाकाशरूप जो परब्रह्म है, वह कैसा है ? यह कृपापूर्वक फिर बताइये। आपके मुखारविन्दसे इस अमृतमय उपदेशको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्‌के सामन्तोंका वध * ६२३

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे समान रूप-रंगवाले दो जुडवें भाइयोंके व्यवहारके लिये दो पृथक् नाम रखे जाते हैं, वैसे ही अखण्ड सच्चिदानन्दघन स्फटिक शिलामें प्रतिबिम्बकी भाँति स्थित हुए जो दो प्रपञ्च हैं, उनके व्यवहारके लिये दो नाम रख दिये गये हैं—जाग्रत् और स्वप्न । जैसे दो जलोंमें भेद नहीं होता, उसी प्रकार इन जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें भी वास्तविक भेद नहीं है; क्योंकि वे दोनों ही एक, निर्मल चिन्मात्र आकाशरूप ही हैं। जिसमें सब कुछ लीन होता है, जिससे सबका प्रादुर्भाव होता है, जो सर्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है तथा जो नित्य सर्वमय है, उस परब्रह्म परमात्माको ही चेतनाकाश या चिदाकाश कहते हैं। स्वर्गमें, भूतलमें, बाहर-भीतर तथा दूसरेमें जो सम नामक ज्योतिःस्वरूप परमतत्त्व प्रकाशित हो रहा है, वह चिदाकाश कहलाता है। सम्पूर्ण विश्व जिसका अङ्ग है, जिस नित्य सर्वव्यापी परमात्मामें यह मूर्त और अमूर्त जगत् उसी तरह प्रकट है, जैसे मजबूत तागेमें माला, उसीको चिदाकाश कहते हैं। सुषुप्ति और प्रलयरूप निद्राकी निवृत्ति होनेपर जिससे विश्व प्रकट होता है और जिसकी विक्षेपशक्तिके शान्त होनेपर उसका लय हो जाता है, उस परब्रह्म परमात्माको चिदाकाश कहते हैं। जिसके उन्मेष और निमेषसे (पलकोंके उठाने और गिरानेसे ) जगत्‌की सत्ताके लय और उदय होते हैं, जो स्वानुभवरूप होकर अपने हृदयमें स्थित है,उसे चेतनाकाश समझना चाहिये। श्रुतिने 'यह नहीं, यह नहीं' इस प्रकार निषेधमुखसे सबका निराकरण करके जिसे उस निषेधकी अवधि बताकर उसके तटस्थ लक्षणका सर्वथा निर्णय कर दिया है तथा जो सदा सब कुछ होकर भी वस्तुतः कुछ नहीं है, वह सर्वाधार परमात्मा चिदाकाश कहलाता है। बाह्य और आभ्यन्तर त्रिगोंसे युक्त यह इस तरह दृष्टिगोचर होनेवाला सारा विश्व जैसा है, उसी रूपमें चेतनाकाशमय ही है। अतः इन्द्रियोंसे विषयोंका अनुभव करते हुए भी अन्तःकरणको वासनाशून्य रखकर तत्त्वज्ञानद्वारा शुद्ध-बुद्ध एकमात्र सच्चिदानन्दघनरूप हो सुषुप्तिकी भाँति स्थित रहना चाहिये। वासनाशून्य शान्तचित्त हो जीवित रहते हुए भी पाषाणके समान मौन धारणकर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें निमग्न रहते हुए ही बोलना, चलना और खाना-पीना चाहिये।<br><br>पृथ्वी आदिसे रहित जो स्वप्न-जगत् है और पृथ्वी आदिसे युक्त जो जाग्रत्‌कालका जगत् है—ये दोनों ही प्रकारके जगत् चिदाकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न आदि अवस्थाओंमें केवल चिन्मयमणि (आत्मा) ही विभिन्न वस्तुओंके रूपमें भासित होती है, उसी प्रकार इस जाग्रत्‌कालिक दृश्यप्रपञ्चके रूपमें केवल चिदाकाश ही स्फुरित हो रहा है। इस चिदाकाशका जो स्वानुभवैकगम्य निराकार रूप है, वही भूतल आदिके रूपसे दृश्य नाम धारण करके प्रतीतिका विषय हो रहा है। (सर्ग १०६-१०७)

राजा विपश्चित्‌के सामन्तोंका वध, उत्तर दिशाके सेनापतिको घायल होकर आना तथा शत्रुओंके आक्रमणसे राजपरिवार और प्रजामें घबराहट

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतल आदिके रूपसे दृश्यकी प्रतीति होना ही अविद्या है। जिन अज्ञानियोंके अन्तःकरणमें अविद्या विद्यमान रहती है, उनकी उस अविद्याका (ज्ञानके बिना) कोई अन्त नहीं है, जिस प्रकार ब्रह्मका कोई अन्त नहीं है। इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा कहता हूँ, सुनो। लोकालोक पर्वतकीकिसी स्वर्णमयी-सी शिलाके भीतर विद्यमान चिदाकाशके एक कोनेमें किसी प्रदेशके अन्तर्गत एक त्रिलोकी बसी हुई है, जो इसी त्रैलोक्यके समान है और वहाँ भी यहाँकी व्यवस्थाके अनुसार देश, काल आदिकी मर्यादा नियत है। वहाँ जम्बूद्वीप नामक एक भूभाग है, जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भूषणरूप है। वहाँकी समतल भूमिपर जहाँ गमनागमनादि

७९—शेष दो विपश्चितोंके वृत्तान्तका वर्णन तथा मृगरूपमें श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त हुए एक विपश्चित्‌का राजसभामें लाया जाना

६२४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

व्यवहार सुगमतापूर्वक होते हैं, एक नगरी थी, जिसका नाम था ततमिति। उस नगरीमें विपश्चित् नामसे विख्यात कोई राजा थे, जो अपनी विद्वत्ताके कारण श्रेष्ठ सभासदोंसे सुशोभित अपनी राजसभामें विशेष शोभा पाते थे। राजा विपश्चित् बड़े स्वाभिमानी नरेश थे। उनकी बुद्धि सदा ब्राह्मणोंके हित-चिन्तनमें लगी रहती थी। इसीलिये वे देवताओंमें ब्राह्मणस्वरूप अग्निदेवका ही भक्तिपूर्वक पूजन करते थे। अग्निके सिवा दूसरे किसी देवताको वे नहीं मानते थे। राजा विपश्चित्के मन्त्रियोंमें चार प्रधान थे, जो चारों दिशाओंमें स्थित चार महासागरोंके समान मर्यादा-पालनके लिये नियुक्त थे। समुद्र मत्स्यों और मगरोंके समूहमे युक्त होते हैं तो वे मन्त्री हाथी और घोड़ोंके समुदायसे सम्पन्न थे। समुद्रोंमें आवर्तो (भँवरों) का व्यूह होता है तो इनके मन्त्रीलोग सैनिकोंके चक्रव्यूहसे युक्त थे। समुद्र तरङ्गमालाओंसे व्याप्त होते हैं तो मन्त्रीलोग सैनिकोंकी श्रेणियोंसे घिरे हुए थे। समुद्रोंमें निष्कम्प पर्वतोंके बलकी अधिकता होती है तो ये मन्त्रीलोग अडिग सैनिकोंकी शक्तिसे सर्वथा बढ़े-चढ़े थे।

एक दिन उनके पास पूर्वदिशासे एक चतुर गुप्तचर आया। उसने एकान्तमें राजासे मिलकर यह बड़ी भयंकर बात सुनायी—'महाराज! पूर्वदिशाके सामन्तकी ज्वरसे मृत्यु हो गयी है, मानो वे शत्रुविजयी आपकी आज्ञा पाकर यमराजको जीतनेके लिये गये हैं। उनके मरनेके बाद आपके दूसरे सामन्त दक्षिण देशके नायक सब ओरसे पूर्व और दक्षिण दिशाको जीतनेके लिये आगे बढ़े, परंतु शत्रुने पूर्व और पश्चिमकी सेनाओंद्द्वारा आक्रमण करके उन्हें भी मार डाला। उनके मरनेपर आपके तीसरे सामन्त जो पश्चिम दिशाके शासक थे, अपनी सेनाके साथ दक्षिण और पूर्व दिशाओंको शत्रुओंसे छुड़ानेके लिये प्रस्थित हुए, इतनेमें ही शत्रुओंने पूर्व और दक्षिण देशके राजाओंके साथ मिलकर बीच रास्तेमें ही युद्ध करके उन्हें भी स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया।'

वह गुप्तचर इस प्रकार कह ही रहा था कि एक दूसरा गुप्तचर प्रलयकालके जल-प्रवाहकी भाँति राजमहलमें प्रविष्ट हुआ। वह बड़ी उतावलीके साथ आया था और अत्यन्त पीड़ित जान पड़ता था।

उस नये गुप्तचरने कहा—देव ! उत्तर दिशाके सेनाध्यक्षपर शत्रुओंने आक्रमण कर दिया है। वे बाँध टूटनेपर वेगसे बहनेवाले जल-प्रवाहकी भाँति सेना-सहित इधर ही आ रहे हैं।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! यह सुनकर राजाने अब समय बिताना व्यर्थ समझा और अपने सुन्दर महलसे बाहर निकलते हुए इस प्रकार कहा—'सामन्त-नरेशों और मन्त्रियोंको कवच आदिसे सुसज्जित करके शीघ्र बुलाया जाय, शस्त्रागार खोल दिये जायँ, भयानक अस्त्र-शस्त्र बाँटे जायँ, समस्त योद्धा अपने-अपने शरीरमें कवच बाँध लें, पैदल सैनिक शीघ्र तैयार होकर आ जायँ, सेनाओंकी तुरंत गणना की जाय, श्रेष्ठ सैनिकोंको प्रोत्साहित किया जाय, सेनापतियोंकी नियुक्ति हो और सब ओर गुप्तचर भेजे जायँ।'

राजा विपश्चित् रोषावेशमें भरे थे। वे बड़ी उतावलीके साथ जब इस प्रकार आज्ञा दे रहे थे, उसी समय द्वारपाल भीतर आकर महाराजको प्रणाम करके घबराये हुए स्वरमें बोला।

द्वारपालने कहा—देव ! उत्तर दिशाके सेनापति दरवाजेपर खड़े हैं और जैसे कमल सूर्यके दर्शनकी इच्छा करता है, उसी प्रकार वे राजाधिराज महाराजका दर्शन चाहते हैं।

राजा बोले—द्वारपाल ! जल्दी जाओ। पहले सेनापतिको ही भीतर ले आओ। उनसे सब वृत्तान्त

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करना * ६२५

सुनकर मैं यह जान सकूँगा कि दिगन्तोंमें कैसी घटना घटित हुई है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! राजाके इस प्रकार आदेश देनेपर द्वारपालने सेनापतिको तत्काल भीतर भेजा। राजाने देखा, उत्तर दिशाके नायक सामने खड़े होकर मुझे प्रणाम कर रहे हैं। इनका सारा शरीर क्षत-विक्षत हो गया है। प्रत्येक अङ्गमें बाण धँसे हुए हैं, जोर-जोरसे साँस चल रही है, मुँहसे खून निकल रहा है, निर्बल होनेपर ही ये शत्रुसे पराजित हुए हैं। सेनापतिने लगातार साँस लेते हुए भी धैर्यपूर्वक अपने शरीरकी व्यथाको सहन करके महाराजको प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

सेनाध्यक्ष बोले—देव ! आपके तीन दिशाओंके सामन्त बहुत बड़ी सेनाके साथ मानो आपकी आज्ञासे ही यमराजको जीतनेके लिये यमलोकको चले गये। तदनन्तर उनके देशोंकी रक्षा आदि करनेमें मुझे असमर्थ समझकर बहुत-से भूपाल मेरा पीछा करते हुए बलपूर्वक यहाँ आ पहुँचे हैं। महाराजके इस राज्यमें शत्रुओंकी बहुत बड़ी सेना आ गयी है। अब जो कर्तव्य प्राप्त है, उसे कीजिये। शत्रुओंको मार भगाइये। महाराजके लिये किसीपर भी विजय पाना कठिन नहीं है।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत होनेसे अत्यन्त पीड़ित हुए उत्तर दिशाके सेनानायक जिस समय उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उसी समय सहसा दूसरा पुरुष भीतर आकर यों बोला—'नरेश्वर ! इस मण्डलके बहुत-से लोग पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहे हैं। चारों ओर शत्रुओंकी बड़ी भारी सेनाएँ खड़ी हैं। जैसे लोकालोक पर्वतके तट सारी वसुधाको घेरे हुए हैं, वैसे ही हमारे शत्रुओंने इस भूमिको घेर लिया है। उनके हाथोंमें चक्र, गदा, प्रास और भालोंके समूह चमक रहे हैं। पताकाओं, अस्त्र-शस्त्रों, अन्य चपल सामग्रियोंसे तथा योद्धाओंसे युक्त रथ इधर-उधर दौड़ रहे हैं। वे उड़नेवाले त्रिपुरसमूहोंके समान जान पड़ते हैं।'

यों कहकर प्रणाम करके वह पुरुष तुरंत लौट गया, मानो समुद्रकी लहर कोलाहल करके शान्त हो गयी हो। राजाके महलमें खलबली मच गयी। उसकी दशा प्रचण्ड आँधीसे व्याप्त हुए विशाल वनके समान हो गयी थी। मन्त्री, राजा, योद्धा, आज्ञाकारी सेवक, हाथी, घोड़े, रथ, स्त्रियाँ, परिचारकवर्ग और नागरिकोंके समुदाय सभी घबराये हुए थे। सबने भयके कारण आत्मरक्षाके लिये अपने हाथोंमें हथियार उठा लिये थे।

(सर्ग १०८)


राजा विपश्चित्का अपने मस्तककी आहुतिसे अग्निदेवको संतुष्ट करके चार दिव्यरूपोंमें प्रकट होना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इसी बीचमें जिनके अन्तरिक्ष लोकपर दैत्योंने आक्रमण किया हो, उन देवराज, इन्द्रके समीप जैसे मुनि आते हैं, उसी प्रकार राजा विपश्चित्के पास उनके अन्य सब मन्त्री आये और इस प्रकार बोले—'देव ! हमने यही निर्णय किया है कि अब हमारे शत्रु साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंद्वारा वशमें किये जाने योग्य नहीं रह गये हैं। इसलिये उनपर दण्डका ही प्रयोग कीजिये।

राजा बोले—अच्छा, अब आपलोग शीघ्र ही युद्धके लिये जाइये और नगररक्षा एवं व्यूहरचना (मोर्चाबंदी) की व्यवस्था कीजिये। मैं स्नान करके अग्निदेवका पूजन करनेके पश्चात् समराङ्गणमें आऊँगा।

ऐसा कहकर राजाने गङ्गाजलसे भरे हुए घड़ोंद्वारा स्नान किया। तत्पश्चात् वे अग्निशालामें गये। वहाँ शास्त्रीय विधिसे अग्निदेवका आदरपूर्वक पूजन करके उन्होंने इस प्रकार विचार किया—'मैं विजय प्रदान करनेवाले

६२६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

देवता अग्निको यहीं अपने मस्तककी आहुति दे दूँ।'

ऐसा निश्चय करके राजा बोले—देवेश्वर अग्निदेव ! मेरा यह मस्तक आपको आहुतिके रूपमें समर्पित है। आज मेरे द्वारा यह अपूर्व पुरोडाश दिया जा रहा है। भगवन् ! यदि मेरे द्वारा दी हुई मस्तककी इस आहुति-से आप संतुष्ट हों तो आपके इस कुण्डसे मेरे चार शरीर प्रकट हों। वे चारों भगवान् नारायणकी चार भुजाओंके समान बलवान् और शोभासे दीप्तिमान् हों। उन चार शरीरोंद्वारा मै चारों ही दिशाओंमें बिना किसी विघ्न-बाधाके शत्रुओंका वध करूँ। प्रभो ! मेरे मनमें आपके दर्शनकी इच्छा है; अतः आप मुझे दर्शन देनेकी भी कृपा करें।

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर उन महीपालने तलवार हाथमें लेकर अपने मस्तकको उसी प्रकार शीघ्र काट डाला, जैसे किसी बालकने खेल-खेलमें ही कुछ हिलते हुए कमलको तोड़ लिया हो। फिर उन्होंने अग्निदेवके उद्देश्यसे कटे हुए उस मस्तककी ज्यों ही आहुति दी, त्यों ही वे नरेश अपने शरीरके साथ ही अग्निमें गिर पड़े। उस शरीरको अपना आहार बनाकर अग्निदेवने उसे चौगुना करके उन्हें लौटा दिया। सच है, महापुरुषोंके उपयोगमें आयी हुई वस्तु तत्काल ही वृद्धिको प्राप्त हो जाती है। तदनन्तर वे पृथ्वीनाथ चार शरीर धारण करके अग्नि-कुण्डसे बाहर निकले। उस समय वे तेजःपुञ्जसे प्रज्वलित हो रहे थे और क्षीरसागरसे प्रकट हुए तेजस्वी नारायणदेवके समान जान पड़ते थे। राजाके वे चारों शरीर सूर्यकी-सी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे और साथ ही उत्पन्न हुए उत्तम मुकुट, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्रोंसे सम्पन्न थे। कवच, शिरस्त्राण, किरीट-रत्न, कङ्कण, बाजूबंद, हार और बड़े-बड़े कुण्डलके साथ ही वे चारों शरीर प्रकट हुए थे। वे सबकी रक्षा करनेमें समर्थ और उच्च आशयवाले थे। सबकी आकृति एक-सी थी। वे समान अवयवोंसे सुशोभित थे और सब-के-सब चञ्चल उच्चैःश्रवाके समान उत्तम अश्वोंपर आरूढ़ थे। उन सबके पास सुनहरे बाणोंसे भरे हुए तरकस थे। वे चारों महामनस्वी थे और सभी एक समान डोरीवाले धनुष धारण किये हुए थे। उन सबके शरीरोंमें सर्वथा समानता थी और वे सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे। वे पुरुष जिस हाथी, रथ और घोड़ेपर सवार होते थे, वह शत्रुओंद्वारा प्रयुक्त मन्त्र, तन्त्र, ओषधि, यन्त्र तथा अस्त्र-शस्त्र आदि दोषोंका लक्ष्य नहीं होता था। वे चारों चन्द्रमाकी प्रभाके समान अपनी हास्य-छटासे चारों ओर प्रकाश बिखेरते थे और आहुति पाकर प्रज्वलित हुए अग्निदेवसे सुन्दर विग्रहधारी चार विष्णु, चार समुद्र अथवा चार वेदोंके समान प्रकट हुए थे।

(सर्ग १०९)


चारों विपश्चितोंका शत्रुओंके साथ युद्ध, भागती हुई शत्रुसेनाका पीछा करते हुए उनका समुद्रतटतक जाना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर नगरके समीप पहुँचे हुए शत्रुओंके साथ चारों दिशाओंमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। चारों विपश्चित् चारों ओर शत्रुओंसे लोहा लेनेके लिये चतुरङ्गिणी सेनाके साथ समराङ्गणमें जा पहुँचे। उन्होंने शत्रुओंकी सेनाको समुद्रके समान उमड़ती देख उसे पी जानेका विचार किया और सब ओर वायव्यास्त्रका संधान किया, उसके साथ ही पर्जन्यास्त्रको भी छोड़ा। फिर तो उनके भीषण धनुषोंसे बाण आदि अस्त्रोंकी नदियाँ बहने लगीं। साथ ही तलवार आदिकी वर्षा होने लगी। उस महान् युद्धमें शत्रुओंकी सेनाका घोर संहार हुआ। समस्त सैनिक, जो मरनेसे बच गये थे, भागने लगे। वे चारों

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२७

विपश्चित् इस तरह भागते हुए शत्रुओंकी सेनाका पीछा करते-करते बहुत दूर चले गये । सम्पूर्ण शक्तियोंसे परिपूर्ण एकमात्र चेतन परमेश्वरसे प्रेरित हो समान अभिप्रायवाले उन चारों वीरोंने सम्पूर्ण दिशाओंमें विजय प्राप्त कर ली । जैसे नदियोंके प्रवाह समुद्रतक जाते हैं, वैसे ही उन्होंने समुद्रके किनारेतक शत्रुओंका पीछा किया । दूरतक बिना विश्राम किये चलते रहनेसे विपश्चित्के सैनिकोंके जीवन-निर्वाह और युद्ध आदिके सारे साधन प्रतिदिन छोटी-छोटी नदियोंके जलकी भाँति क्षीण होते गये । उनके शत्रुओंका भी यही हाल हुआ । प्रतिदिन दौड़ते हुए उनकी और शत्रुओंकी सारी सेनाएँ मुमुक्षुओंके पुण्य और पापकी भाँति निरन्तर नष्ट होने लगीं । जब सारे सैनिक नष्ट हो गये, तब उनके वे दिव्यास्त्र सफल होकर आकाशमें ही शान्त हो गये, जैसे जलाने योग्य ईंधन आदिका अभाव हो जानेपर आगकी ज्वालाएँ स्वयं ही बुझ जाती हैं । म्यानों, तरकसों तथा रथ, घोड़े, हाथी और वृक्षसमुदाय आदि स्थानोंमें पड़े हुए अस्त्र-शस्त्र सायंकाल घोंसलोंमें छिपकर नींद लेनेवाले पक्षियोंके समान निश्चेष्ट हो गये । उस समय शून्यातारूपी जलसे भरा हुआ निर्मल आकाश बढ़े हुए विस्तृत एकार्णवके समान जान पड़ता था । उसके अस्त्र-शस्त्ररूपी जल-जन्तु मानो शान्त होकर कीचड़में विलीन हो गये थे । बाणरूपी जलकणोंकी वर्षाके कारण फैला हुआ कुहरा वहाँसे हट गया था, चक्ररूपी सैकड़ों आवर्त अब नहीं उठते थे । वहाँ निर्मल सौम्यता विराज रही थी । बादलोंके वेगपूर्वक वर्षा करनेसे उत्तुङ्ग तरङ्गोंकी भाँति ऊँची-ऊँची जलधाराएँ शान्त हो चुकी थीं । नक्षत्ररूपी रत्नराशि अन्दर छिप गयी थी और सूर्यरूपी बड़वानल उसके एक देशमें विद्यमान था । सूर्य आदिके विस्तृत प्रकाशसे युक्त, गम्भीर एवं प्रभापूर्ण, धूलरहित वह स्वच्छ आकाश महात्माओंके रजोगुणरहित, आत्म-प्रकाशसे पूर्ण, गम्भीर एवं प्रसन्न मनकी भाँति शोभा पा रहा था । उन चारों विपश्चितोंने चारों समुद्रोंको आकाशके छोटे भाइयोंके समान देखा, जो विमल, विस्तृत एवं सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करके स्थित थे। ऊँची-ऊँची तरङ्गैं, जिनमें जल-जन्तु भी ऊपरको उठ जाते थे, इस तरह नीचे गिरती थीं, मानो आकाशके टुकड़े-टुकड़े होकर नीचे गिर रहे हों । अपनी उठती हुई तरङ्गोंद्वारा अगवानी-सी करते हुए क्षारसमुद्रके विशाल तटपर जब विपश्चित्की सेना पहुँची, तब उन्हें अपने सामने गगनचुम्बी पर्वतके शिखरपर भ्रमरोंके समान काली वनपङ्क्ति शोभा पाती दिखायी दी, जो इलायची, लौंग, मौलसिरी, आँवला, तमाल, हिंताल और ताड़के पत्तोंके ताण्डव-नृत्यसे विभक्त-सी जान पड़ती थी ।

( सर्ग ११०-११३ )


विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ, कुत्ते, कौए और कोकिल आदिको दिखाकर अन्योक्तियोंद्वारा विशेष अभिप्राय सूचित करना

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तदनन्तर वहाँ पार्श्ववर्ती मन्त्री आदिने उन चारों विपश्चितोंको उस समय भिन्न-भिन्न वन, वृक्ष, समुद्र, पर्वत, ग्राम, मेघ और वन-चर दिखाये ।

तत्पश्चात् उन अनुचरोंने कहा—देव ! देखिये, यहाँ युद्धमें लगे हुए सीमाप्रान्तके राजाओंके अस्त्र-शस्त्रोंकी राशियों चमचमा रही हैं और इनकी चतुरङ्गिणी सेनाएँ इधर-उधर विचर रही हैं। देखिये, देखिये, युद्धमें वीरोंद्वारा सम्मुख मारे गये सहस्रों वीरोंको विमानोंपर चढ़ा-चढ़ाकर स्वर्गीय अप्सराएँ उन विमानोंद्वारा आकाशमें लिये जा रही हैं । जो युद्धमें सामने आये हुए योद्धाको धर्मके अनुकूल चलते हुए योग्य¹ अवस्थामें वध करता है, वही शूरवीर


१. योग्य अवस्थासे तात्पर्य यह है कि यदि विपक्षी पैदल हो तो स्वयं भी उसके साथ पैदल ही लड़ा जाय अथवा उसे

६२८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तथा स्वर्गका अधिकारी है, दूसरा नहीं। महाराज ! देखिये, आकाश प्रबल मेघरूपी महासागरसे भरा हुआ है। उधर दृष्टिपात कीजिये, उसने चञ्चल तारोंके विशाल हार पहन रखे हैं। यह देखिये, इधर घने अन्धकारके समान वह नीला दिखायी देता है। उधर दृष्टि डालिये, वह चन्द्रमाकी उज्ज्वल किरणोंसे धोया हुआ-सा जान पड़ता है। आकाश यद्यपि जगत्‌के सम्पूर्ण दोषोंसे पूर्ण है, फिर भी वह सदा ही अविकारी रहता है। मैं समझता हूँ इस आकाशको तत्त्वज्ञानी पुरुषकी भाँति सर्वानर्थ-शून्यताका सुख प्राप्त है। धूम, बादल, धूल, अन्धकार, सूर्य, चन्द्रमा, संध्या, तारावृन्द, विमान, गरुड़, पर्वत, देवता और असुर—इन सबके क्षोभ आकाशमें ही होते हैं तो भी उनसे प्रभावित होकर यह अपने स्वभाव (निर्विकारता एवं शान्ति) का कभी त्याग नहीं करता। अहो! जिसका आशय महान् है, उसकी स्थिति अत्यन्त उन्नत एवं विचित्र दिखायी देती है।

यह जो त्रिभुवनरूपी भवन है, इसमें काल और क्रिया—ये दो दम्पति चिरकालसे रहते और इसकी रक्षा करते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे माली और मालिन फूलोंसे भरे हुए उपवनमें रहते और उसकी देख-भाल करते हैं। यद्यपि काल और क्रियाके द्वारा इस त्रिभुवन-भवनकी रक्षा नहीं होती, अपितु प्रतिदिन इनके द्वारा इसके नाशकी ही व्यवस्था होती रहती है तथापि आजतक नष्ट नहीं हो रहा है, यह कैसी आश्चर्यजनक माया है!

मालूम होता है आकाश वृक्ष आदिकी अधिक उन्नतिको रोकता है—उन्हें बहुत ऊँचा नहीं बढ़ने देता। यदि कहें कि आकाशमें कोई निरोधक व्यापार है ही नहीं, फिर वह किसीकी उन्नतिके अवरोधका कर्ता कैसे हो सकता है तो वह ठीक नहीं है। यद्यपि आकाश अकर्ता ही है, तथापि महान् है और महान्‌में उसकी महिमासे ही कर्तृत्वका उदय हो जाता है। जहाँ लाखों जगत् उत्पन्न और विलीन होते हैं, उस आकाशको शून्य कहा जाता है। शून्यतावादीके इस प्रौढ़ पाण्डित्यको धिक्कार है। समस्त प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते, आकाशमें ही स्थिर रहते और आकाशमें ही विलीन होते हैं। इसलिये शास्त्रसिद्ध ईश्वरका लक्षण आकाशमें घटित होनेके कारण वह ईश्वररूप ही है। जिसमें इस जगत्रूपी भ्रमका उदय और अस्त होता है, जो असीम होनेके कारण समस्त वस्तुओंको अपने शरीरमें धारण करता है और त्रिलोकीरूपी मणियोंका सुविस्तृत आधार है, वह महाकाश चित्स्वरूप है और परब्रह्म ही है; ऐसा मेरा विश्वास है।

देखिये, यहाँ सुबेल पर्वतके शिखरपर निर्मल कान्तिवाली एक सुवर्णमयी शिला है, जो सारी-की-सारी सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे अपनी प्रभासे इस तरह उद्भासित हो रही है, मानो तटतक आनेवाली समुद्रकी चञ्चल लहरोंसे फेंका गया वडवानलका कोई कण प्रकाशित हो रहा हो। इस पर्वतीय ग्रामकी गौओंके झुंडमें तुरंत खिली हुई कलिकाओंके दलोंके भीतर छिपे-छिपे गुञ्जारव करनेवाले मदान्ध भ्रमरोंके दर्शनसे उद्गीत कामनावाले गिरि-गह्वरनिवासी पामर लोगोंको भी जो आनन्द प्राप्त होता है, वह नन्दनवनमें विहार करने-वाले देवताओंको भी सुलभ नहीं है। इस पर्वतराज-के जंगलोंमें बसे हुए ये गाँव अपनी शोभा और महत्तासे चन्द्रमाको भी पराजित कर रहे हैं। जिनके एक बगलमें प्रकाशित मनोहर चन्द्रमण्डल मण्डन (आभूषण) का काम दे रहा है और दूसरी बगलमें जलके भारसे भारे हुए मेघरूपी गजराज विश्राम करते हैं; ऐसे पर्वत-तटोंपर बसे हुए इन


कोई योग्य सवारी दे दी जाय। इसी तरह यदि वह शस्त्ररहित हो तो स्वयं भी शस्त्रहीन होकर उसके साथ युद्ध किया जाय अथवा उसे भी शस्त्र दे दिया जाय।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * विपश्चित्के अनुचरोंका उन्हें आकाश, पर्वत, पर्वतीय ग्राम, मेघ आदि दिखाना * ६२९

गाँवोंमें जो विलासलक्ष्मी लक्षित होती है, वह ब्रह्माजीके वैभवशाली राज्योंमें भी कहाँ सुलभ है ?

देखिये, स्फटिक मणिके खम्भोंकी राशियोंके समान सुरम्य एवं मोटी धारसे गिरनेवाले निर्झर-सलिलसे सुशोभित इस ग्रामगुफामें ये मोरनियाँ कैसा नृत्य कर रही हैं। जहाँ निर्झरोंसे झरते हुए जलका कलकल नाद फैल रहा है, ऐसे इस पर्वतीय ग्रामके कुञ्जोंमें विलासिनी मयूरियों और फूलोंके भारसे झुकी हुई लताएँ भी नाच रही हैं।

(अब मेघके व्याजसे किसी ऐसे दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, जो दान करते समय पात्रापात्र और गुण-अवगुणका विचार न करता हो, इसे अन्योक्ति कहते हैं—) मेघ ! तुम्हारा शील-स्वभाव श्रीमानोंके समान है, आशय (हृदय) महान् (उदार) है। तुम आतप (संताप) को हर लेते हो। तुम्हारी आकृतिसे ही उच्चता और गम्भीरता व्यक्त होती है। तुम पर्वतों (अथवा राजाओं) के शिरोभूषण हो और भूतलके लिये रसके एकमात्र आधार हो। इस प्रकार तुममें बहुतसे गुण हैं, परंतु यह एक ही बात हमारे हृदयको छेदे डालती है कि तुम हर्षसे वर्षा (दान) करते समय ऊसर भूमियोंमें, ताल-तलैयोंमें और वहाँके कँटीले वृक्षोंमें भी उसी तरह जलका विभाजन करते हो, जैसा सुन्दर उपजाऊ खेतोंमें किया करते हो (योग्यता-अयोग्यताका कोई विचार नहीं करते हो)।

(अब दान देनेके पूर्व दान लेनेवालोंके प्रति कठोर और कटुवचन सुनानेवाले दाताको लक्ष्य करके निम्नाङ्कित बात कही जाती है, यह भी मेघान्योक्ति ही है—) जलद ! तुम प्रतिदिन समुद्र और गङ्गा आदि उत्तम तीर्थोंकी जलराशिसे स्नान करते हो, ऊँचे स्थानपर बैठे हो, शुद्ध होकर वनभूमिमें निवास करते और मुनियोंके समान मौनव्रतका आश्रय लेते हो। यद्यपि शरत्-कालमें सब कुछ लुटाकर तुम खाली हो जाते हो तो भी तुम्हारे शरीरपर अत्यन्त उत्तम उज्ज्वल कान्ति ही लक्षित होती है। परंतु ऐसे होकर भी जो तुम जलदानके लिये ऊपर उठकर बिजलीके साथ वज्रसी गड़गड़ाहट पैदा करते हो, यह क्या है ? तुम्हारा ऐसा तुच्छ आचरण क्यों होता है !

अयोग्य स्थानमें पड़ जानेपर सारी अच्छी वस्तु भी बुरी हो जाती है। देखो न, मेघरूपी दूषित स्थानको पाकर श्वेत जल भी काला हो गया है। अहो ! मेघने जलकी वर्षा की और उस जलसे सारी पृथ्वी आप्लावित हो गयी। जैसे धनाढ्य पुरुष अपने दीन-दुखी प्रेमियोंको धन-दौलतसे पुष्ट करते हैं, उसी प्रकार जलने भूतपर मुरझायी हुई खेतीको हरी-भरी एवं पुष्ट कर दिया। यह कितने हर्षकी बात है।

• (शूरवीर और कायरमें अन्तर बतानेवाली अन्योक्ति—) सिंह और कुत्ता दोनोंमें समानरूपसे पशुता विद्यमान है—दोनों पशु जातिके ही जीव हैं परंतु मेघगर्जन आदिसे होनेवाले कोलाहलको सिंह और ही प्रकारसे सहता है और कुत्ता और ही प्रकारसे। सिंह उस कोलाहलको सुनकर मनमें क्षोभ या भयका अनुभव नहीं करता। वह उपेक्षासे आँखें बंद करके सहन करता है। परंतु कुत्ता मेघ-गर्जनको सुनकर मन-ही-मन भयसे काँप उठता है और भयसे ही आँखें बंद करके उस कोलाहल-को सहन करता है।

(कुत्ते-जैसे स्वभाववाले मनुष्यको लक्ष्य करके कही गयी अन्योक्ति—) सदा अपवित्र रहनेवाले कुत्ते ! तू अपने प्रियजनों (सजातीय कुत्तों) के ही निकट आने-पर भौं-भौं किया करता है। तेरा सारा समय गली-कूचोंमें मारे-मारे फिरनेमें ही व्यतीत होता है। मालूम होता है तुझे अपनी चित्तवृत्तिके ही अनुरूप मानकर किसी मूर्खने तुझको अपने इन दुर्गुणोंकी शिक्षा दे दी है। जीवके कर्मोंकी विषमतावश विषम जगत्की रचना करनेवाले विधाताने अपनी पुत्री देवशुनी सरमाके पुत्ररूप अपने

६३० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

दौहित्र कुत्तेमें उसके अनुरूप सभी धर्मोंका एकत्र दर्शन करानेके लिये निम्नाङ्कित सब बातें एक साथ ही रच डालीं। वे सब बातें इस प्रकार हैं—अपने ही बनाये हुए कूड़े-करकटके अपवित्र गड्ढेमें रहना, गूह और पीव खाना, जहाँ सबकी दृष्टि पड़ती हो, ऐसी सड़कों या खुली जगहोंमें कुत्सित मैथुनकी इच्छा तथा सबसे निन्दनीय शरीर। इन सबको विधाताने कुत्तोंके ही हवाले कर दिया।

किसीने कुत्तेसे पूछा—'तुझसे बढ़कर नीच कौन है?' ऐसा प्रश्न करनेवालेसे कुत्तेने हँसकर कहा—'जो मूर्खता (अज्ञान), अपवित्र देहादिका अभिमान तथा अन्धता (विचाररूपी दृष्टिसे वञ्चित होना)—इन दुर्गुणोंका एवं अशुभ वस्तुका सेवन करता है, वह मुझसे भी अधिक नीच है।' प्रश्न करनेवालेने फिर पूछा—'तुझमें कौन-से ऐसे गुण हैं, जिसके कारण तुझे मूर्खसे अच्छा समझा जाय?' कुत्तेने उत्तर दिया—'शूरता, स्वाभाविक स्वामिभक्ति और धृति (थोड़ेमें ही संतोष कर लेनेकी क्षमता)—ये सुन्दर गुण जो मुझमें हैं, लाखों प्रयत्न करके ढूँढ़नेपर भी मूर्खके पास नहीं पाये जा सकते।' कुत्ता सदा अपवित्र वस्तु खाता है, अपवित्र विष्ठाके ढेरमें ही सदा रमता है, नेवले, चूहे आदि जीवित प्राणियोंको भी चुपचाप खा जाता है और निर्बल बकरीके बच्चे आदिको भी बिना किसी अपराधके ही काट खाता है तथा कुतियाके साथ मैथुनमें प्रवृत्त होनेपर सब लोग आकर उसे ढेले मारते हैं। विधाताने संसारमें बेचारे असमर्थ कुत्तेको जन्मभर दुःख भोगनेके लिये ही रचा है।

(कोई अनुचर शिवलिङ्गपर बैठे हुए कौएकी ओर राजाका ध्यान आकृष्ट करता हुआ कहता है—) शिव-लिङ्गके ऊपर बैठकर काँव-काँव करता हुआ यह कौआ अपने आपको ही दृष्टान्तरूपसे दिखाकर कहता है—'लोगो! अधोगतिमें डालनेवाले जितने पातक हैं, उन सबमें श्रेष्ठ है शिव-सम्पत्तिका उपभोग। इस महान् पातकमें स्थित हुए मुझ कौएको प्रत्यक्ष देखो।'

नीच कौए! तू सदा कानोंको कटु प्रतीत होनेवाली काँव-काँवकी आवाज किया करता है और इसके द्वारा तूने मीठी बोली बोलनेवाले हंस आदिके गुणोंको कवलित कर लिया है—मिटा दिया है। अब सरोवरके भीतर कीचड़में घूमता हुआ जो तू अपनी कठोर बोलीसे भ्रमरों-के मधुर गुञ्जारको छिपाये देता है, यह मेरे सिरपर बाणोंके प्रहारकी-सी वेदना पैदा करता है।

कौआ सरोवरमें आनेपर भी जो नरकसमूह (गन्दी चीजों) को ही खाता है और कमलकी नालको छोड़ देता है, इस विषयमें आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये। जिसको जिस वस्तुके खानेका अभ्यास है, उसे सदा वही स्वादिष्ट प्रतीत होती है।

नाना प्रकारके वन-पुष्पोंके केसर लग जानेसे कौएका शरीर सफेद-सा दिखायी देने लगा। इतनेसे ही लोगोंने उसे हंस समझ लिया; किंतु जब उसने सड़े-गले कीड़ों-मकोड़ोंको निगलना आरम्भ किया, तब उसका असली रूप पहचानमें आ गया—सबने जान लिया कि यह कौआ है।

कौओंके झुंडमें बैठा हुआ कोकिल मौन, चेष्टा, विहार, रूप-रंग और आकार-प्रकारमें कौओके साथ पूरी समानता रखनेपर भी मीठी बोलीके द्वारा दूरसे ही पहचान लिया जाता है कि यह कौआ नहीं, रुचिर कान्तिवाला कोकिल है—ठीक उसी तरह, जैसे मूर्खोंके बीचमें बैठे हुए पण्डितकी पहचान हो जाती है। अपनी आकृतिसे ही भव्य गुणोंको सूचित करनेवाले सभी पुरुष अनुरूप आन्तरिक चमत्कारसे ही विख्यात हो जाते हैं।

भैया कोकिल! इस समय यह मधुर कलरव करनेसे कोई लाभ नहीं। इससे तुम्हारा बहुमूल्य गुण नहीं प्रकट हो रहा है। किसी विशाल वृक्षकी कन्दराके भीतर जीर्ण-शीर्ण पत्तोंसे ढके हुए खोखलेमें चुपचाप बैठे रहो। यह कर्ण-कटु काँव-काँवकी रट लगानेवाले कौओंसे भरा हुआ शिशिरका