शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
स्य॒ व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु वौ३षडिति ॥१९॥ अथ॒ स्वाहा॒ग्निमित्या॑ह । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ स्वाहा॒ग्निं पव॑मा- न॒मिति॒ यदि॑ पवमानाय॒ ध्रिये॑र॒न्स्वाहा॒ग्निमिन्दु॑मन्त॒मिति॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑र- न्स्वाहा॒ग्निग्ँ स्वाहा॒ग्नीनाज्य॑पाञ्जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२०॥ अ- थाहा॒ग्नयेऽनु॑ब्रूहीति॑ । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ सोऽन्वा॑हा॒ग्निꣳ स्तोमे॑न बोधय॒ समि॑धा- नो॒ऽअमर्त्यम् । कृ॒ण्वद्दे॒वेषु॑ नो॒ दध॒दिति॒ स्वपि॑तीव॒ खलु॒ वाऽए॒तद्यदु॑द्वासि॒तो भ॑वति सम्प्र॒बोध॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सम॒दी॑धयति जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२१॥ अथ॒ यद्य॑ग्नये॒ पव॑मानाय॒ ध्रिये॑रन् । अग्न॑ये॒ पव॑मानायानु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो ऽन्वा॑हाग्ने॒ऽआयु॑ꣳषि पवस॒ऽआसु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः । आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुना॒मिति॑ त- थाहाग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वै पव॑मानस्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्यन्त्यि जुषाणो॒ऽअग्निः॑ पव॑मान॒ आज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२२॥ अथ॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑रन् । अग्नय॑ ऽइन्दु॑मते॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो॒ऽन्वाहे॒ह्वो॒ न्नु प्र॒वाणि॑ ते॒ऽग्ना॒ऽइत्थे॒तरा॒ गिरः॑ । अ॒भि- वर्ध॑स्व॒ऽइन्दु॑भिरिति॒ तथा॑ ह्याग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वाऽइन्दु॑स्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्य- न्ति जुषाणो॒ऽअग्नि॒रिन्दु॑मानाज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑त्येवमु॒ सर्व॑माग्ने॒यं करो॑ति ॥२३॥ अथा॑हा॒ग्नये॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ह॒विषः॑ । अ॒ग्निं य॑जा॒ग्नये॑ स्विष्ट॒कृते॒ऽनु॑ब्रूह्य॒ग्निग्ँ स्विष्ट॒कृतं॑ यजे॒त्यथ॒ यद्दे॒वान्यजे॒त्यग्नी॒न्यजे॒त्येवैतदा॑ह ॥२४॥ स॒ यज॑ति । अ॒ग्नेर्वसु॑वने वसु॒धे- यस्य॑ वेतु॒ वौ३षड॒ग्नाऽउ॑ वसु॒वने॑ वसु॒धेयस्य॑ वेतु॒ वौ३षद्देवो॒ऽअग्निः॑ स्विष्ट॒कृदिति॑ स्वय॒माग्ने॒यस्तृतीय॑ ए॒वम्वा॑ग्ने॒याननुया॒जान्क॑रोति ॥२५॥ ता वा॒ऽए॒ताः । षड्भि- र्निर्य॑तति च॒तस्रः॑ प्रया॒जेषु॒ द्वेऽनु॑नया॒जेषु॒ षडा॒ऽऋतव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मे- तन्निर्मि॑मीते ॥२६॥ द्वाद॑श वा॒ त्रयो॑दश वा॒न्तरा॑णि भवन्ति । द्वाद॑श वा॒ वै त्र- यो॑दश वा संवत्सर॒स्य मासाः॑ संवत्सर॒मृतून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मेतत्त्संवत्सरा॒न्नि- र्मि॑मीते न द्वे च॒न स॒ङ्काशा॑मितायै ज्ञानि॒ क कुर्याद्यद्वे॒ भित्सन्त्स्याता॑ व्यन्तु॒ वे-
कां० २, अ० २, ब्रा० ३, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / २२३ घी को ग्रहण करे। वौषट् ।" (आ) "अग्निमाज्यस्य वेतु वौषट् ।" "(तनूनपात्) आज्य की अग्नि को स्वीकार करे। वौषक्।" (इ) "अग्निनाज्यस्य व्यन्तु वौषक् ।"— "वे (इडा) अग्नि के द्वारा आज्य को स्वीकार करें, वौषक् ।" (ई) "अग्निराज्यस्य वेतु वौषक्"-'अग्नि आज्य को स्वीकार करे, वौषक्" ।।१६।। अब कहता है— 'स्वाहाग्निम्'—आग्नेय आज्य भाग के लिए। यदि पवमान के लिए आधान करे तो कहे 'स्वाहाग्निं पवमानम्', यदि इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करें तो कहे, 'स्वाहाग्निमिन्दुमन्तम्' । 'स्वाहाग्निम्', 'स्वाहाग्नीनाज्यपान् जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु ।' यह (होता) पढ़ता है ॥२०॥ आग्नेय आज्य भाग के सम्बन्ध में (अध्वर्यु) कहता है, "अग्नयेऽनुब्रूहि"— "अग्नि के लिए पढ़ो।" तब (होता) पढ़ता है- "अग्निं स्तोमेन बोधय, समिधानोऽमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ।"- "स्तुति द्वारा अग्नि को जगाओ जो अमरत्व को प्रज्वलित करता है, जिससे यह अग्नि हमारे हवियों को देवताओं तक ले जावे।" जब अग्नि अपने स्थान से निकाला जाता है तो सोता-सा है। अब (ऋत्विज्) उसको जगाता है। अब वह पढ़ता है- "जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु" अर्थात् "अग्नि कृपा करके आज्य को ग्रहण करे" ।।२१।। यदि अग्नि-पवमान के लिए आधान करना हो तो कहे "अग्नये पवमानाय अनुब्रूहि" अर्थात् "पवमान अग्नि की स्तुति करो।" तब होता पढ़े— "अग्नऽआयु॑ षि पवसऽआसुवोर्ज॒मिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम्" (ऋग्वेद ६।६६।१६)—"हे अग्नि ! तू आयु को (उम्रों को) फूँकती है। हमारे लिए अन्न और रस उत्पन्न करो। विपत्तियों को हमसे दूर करो।" इस प्रकार यह अग्नि-युक्त हो जाता है। सोम पवमान है। परन्तु इसको वह सोम के आज्य भाग से निकालते हैं। अब वह पढ़ता है— "जुषाणोऽग्निः पवमान आज्यस्य वेतु ।"— "अग्नि पवमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे" ।।२२।। यदि वह इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करे तो कहता है— "अग्नयेऽइन्दुमतेऽनुब्रूहि ।" "इन्दुमान् अग्नि के लिए प्रार्थना करो।" तब होता पढ़े- "एह्यषु ब्रवाणि तेऽग्ने इत्येतरा गिरः। एभिर्वर्धास इन्दुभिः" (ऋग्वेद ६।१६।१६)-'हे अग्नि, आ। मैं और प्रार्थनायें तेरे लिए कहूँगा। इन इन्दुओँ (बूँदों) से बढ़।" इस प्रकार वह अग्नि का सम्बन्धी हो जाता है। सोम ही इन्दु है। सोम आज्य भाग से लाते हैं। इसलिए पढ़ता है-"जुषाणोऽग्निरिन्दुमानाज्यस्य वेतु।"-"अग्नि इन्दुमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह इन सब को अग्नि-युक्त कर देता है ।।२३।। अब वह हवियों के विषय में कहता है— 'अग्नयेऽनुब्रूहि।' अर्थात् अग्नि की प्रार्थना करो। 'अग्निं यज' अर्थात् अग्नि को पूजो। 'अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि।' अर्थात् स्विष्टकृत् की प्रार्थना करो। 'अग्निं स्विष्टकृतं यज।' अर्थात् अग्नि स्विष्टकृत् को पूजो। फिर कहे 'देवान् यज ।'—देवों को पूजो। 'अग्नीन् यज ।'—अग्नियों को पूजो ॥२४॥ अब वह प्रार्थना करता है-"अग्नेर्वसुवने वसुधेयस्य वेतु, वौषक् ।"— "(बर्हि) अग्नि की वृद्धि के लिए वसुधा को ग्रहण करे, वौषक् ।"—"अग्नाऽऽड वसुवने वसुधेयस्य वेतु वौषक् ।" " (नराशंस) अग्नि में वृद्धि के लिए वसुधा को स्वीकार करे, वौषक् ।" "देवोऽअग्निः स्विष्टकृत् ।" अर्थात् देव स्विष्टकृत् अग्नि।" यह तीसरी प्रार्थना स्वयं अग्नि की ही है। इस प्रकार सब अनु- याजों को अग्नि का कर देता है ॥२५॥ ये छः विभक्तियाँ हैं— चार प्रयाज में और दो अनुयाजों में। छः ऋतुएँ हैं। (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं से ही उनका निर्माण करता है ॥२६॥ (इन छः विभक्तियों में) बारह या तेरह अक्षर होते हैं। वर्ष में बारह या तेरह महीने होते हैं। अग्नि ऋतुओं अर्थात् वर्ष में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं में अर्थात् संवत्सर से उसका निर्माण करता है। दुहराने के दोष से बचने के लिए दो एक-से नहीं होते। यदि दो एक-से हों तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए प्रयाजों में कहते हैं 'व्यन्तु' या 'वेतु', और अनुयाजों में
अध्याय-२, ब्राह्मण-४
न्त्वित्येव॑ प्रयाजानाꣳ रू॒पं व॒सुव॑ने वसुधेयस्येत्य॑नुयाजा॒नाम् ॥ २७ ॥ तस्य॒ हिर॑ण्यं दक्षि॑णा । आ॒ग्ने॒यो वाऽए॒ष य॒ज्ञो भव॑त्य॒ग्ने रेतो॒ हिर॑ण्यं॒ तस्मा॑द्धिर॒ण्यं दक्षि॑णान्व- ॒डन्वा स हि वृ॒द्धेनाग्ने॒योऽग्नि॒र्ह्यमिव॑ ह्यस्य व॒ह् भ॑वति दे॒वानाꣳ हव्यवा॒हनो ऽग्नि॒रिति॒ वह्वति वाऽए॒ष म॑नु॒ष्येभ्य॒स्तस्मा॑दन्व॒ङ्गान्दक्षि॑णा ॥ २८ ॥ ब्राह्म॒णम् ॥ १ [२.३.] ॥ ॥ प्रजाप॑तिर्ह॒ वाऽइ॒दमग्र॑ऽएक॑ ए॒वास॑ । स ऐक्षत क॒थं नु प्र॒जाये॒येति॒ सोऽश्रा- म्यत्स तपो॑ऽतप्यत॒ सो॒ऽग्निमे॒व मु॒खाज्जन॑यां चक्रे तद्यदे॒नं मु॒खादज॑नयत॒ तस्मा॑द- न्ना॒दोऽग्निः स यो हॆव॑मेत॒मग्निम॒न्नादं॑ वे॒दान्ना॑दो हैव भ॑वति ॥ १ ॥ तद्वाऽए॒भ्येत॒ द्ये दे॒वाना॒मज॑नयत । तस्मा॑दग्नि॒रग्रि॒र्ह वै नामैतद्यद॒ग्निरिति॒ स जा॒तः पूर्व्व॑: प्रे- याय॒ यो वै पूर्व्व ए॒त्यग्र॒ऽएतीति॒ वै तमा॑हुः सो॒ऽस्याग्निता ॥ २ ॥ स ऐक्षत प्र॒जाप॑तिः । अ॒न्नादं॒ वाऽइ॒ममा॒त्मनो॒ऽजीज॑ने॒ यदि॒मं न वाऽइ॒ह म॒दन्य॒दन्न॑मस्ति॒ यं वाऽअ॒यं नाद्यादिति॑ काल्वालीकृ॒ता हैव त॒र्हि पृ॑थि॒व्या॑स॒ नौष॑धय आ॒सुर्न वन॒- स्प॒तय॒स्तदे॑वास्य॒ मन॒स्या॑स ॥ ३ ॥ अथैनम॒ग्निव्या॑त्तेनोप॒पर्य्या॑ववर्त्त । तस्य॒ भीत॒स्य स्वो म॑हि॒माप॑चक्राम वाग्वाऽअ॒स्य स्वो म॑हि॒मा वाग॑स्यापचक्राम॒ स आ॒त्मन्ने॒वा- ऽहुतीमीषे॒ स उ॑द॒मृष्ट॒ तद्यदु॑द॒मृष्ट॒ तस्मा॑दि॒दं चा॑लोम॒कमि॒दं च॒ तत्र॑ विवेद घृ॒ता- हुतिं वैव॒ पय॑आहुतिं॒ वोभयꣳ॑ ह॒ वेव॒ तत्पय॑ ए॒व ॥ ४ ॥ सा हैनं॑ नाभि॒राध्यां॑ चकार । केशमिश्रेव ह्वास॒ तां व्यौक्ष॒द्दोष॒ धयेति॒ तत॒ ओष॑धयः॒ सम्भ॑वं॒स्तस्मा॑दो- षधयो॒ नाम॒ स द्वि॒तीय॒मुद॑मृष्ट॒ तत्राप॑रामा॒हुतिं॑ विवेद घृ॒ताहु॑तिं चै॒व पय॑आहुतिं॒ वोभयꣳ॑ ह॒ वेव तत्पय॑ ए॒व ॥ ५ ॥ सा हैनम॒भिराध्वां॑ चकार । स व्य॑चिकित्स- ज्जुहुवानी३ मा हौ॒षामी॒३ति तꣳ स्वो म॑हि॒माभ्यु॑वाद जु॒हुधीति॒ स प्र॒जाप॑तिर्विदां॑ चकार॒ स्वो वै मा म॑हि॒माहेति॒ स स्वाहेत्ये॒वाजु॑हो॒त्तस्मा॑दु॒ स्वाहे॒त्येव हू॒यते॒ तत॒ एष उद॑ियाय॒ य ए॒ष तप॑ति॒ ततोऽयं प्रब॑भूव॒ योऽयं प॑वते॒ तत॒ ए॒वाग्निः परा॑ङ्
कां० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २२५ कहते हैं 'वसुवने वसुधेयस्य' ॥२७॥ इसकी दक्षिणा है स्वर्ण। यह यज्ञ अग्नि का है और स्वर्ण अग्नि का रेत अर्थात् वीर्य है। इसलिए स्वर्ण दक्षिणा है, या बैल, क्योंकि बैल का कन्धा अग्नि का होता है। इसका कन्धा अग्नि से दग्ध-सा होता है। दूसरे, अग्नि देवों का ढोनेवाला है, और बैल मनुष्यों का बोझ ढोने- वाला है। इसलिए बैल दक्षिणा (में दिया जाता है) ॥२८॥ अग्निहोत्रम् अध्याय २—ब्राह्मण ४ यहाँ पहले एक प्रजापति ही था। उसने सोचा, मैं कैसे उत्पन्न (प्रकट) होऊँ? उसने श्रम और तप किया। उसने मुख से अग्नि को उत्पन्न किया। चूंकि उसको मुख से उत्पन्न किया इसलिए अग्नि अन्न का खानेवाला है। जो इस प्रकार अग्नि का अन्न को खानेवाला जानता है वह अन्न का खानेवाला होता है ॥१॥ इस अग्नि को देवों से पहले उत्पन्न किया, इसलिए अग्नि का अग्रि नाम है। अग्नि और अग्रि एक बात है। वह उत्पन्न होकर पूर्व की ओर अर्थात् आगे गया। जो पहले (पूर्व) जाता है उसको कहते हैं आगे (अग्रे) गया। यही अग्नि की अग्रिता है ॥२॥ प्रजापति ने सोचा कि मैंने इस अग्नि को अपना अन्न खानेवाला बनाया है, और मुझे छोड़कर और कोई अन्न तो है ही नहीं; और मुझे वह खायेगा नहीं। उस समय पृथिवी गंजी थी। न ओषधियाँ थीं, न वनस्पतियाँ। उसको इसी बात का सोच था ॥३॥ अब (अग्नि) उसकी ओर मुंह फाड़कर दौड़ा। वह डर गया और उसकी महिमा चली गई। वाणी ही उसकी महिमा है। यह वाणी ही चली गई। उसने अपने में ही आहुति की इच्छा की, और (हाथ) मले। चूंकि हाथ मले, इसीलिए ये (हथेलियाँ) लोभरहित होती हैं। अब उसने घी की आहुति या दूध की आहुति ली। ये दोनों दूध ही तो हैं ॥४॥ वह उसे पसन्द न आई क्योंकि वह केशमिश्रित (बालों से मिली हुई) थी। उसने उसे (आग में) डाल दिया यह कहकर—'ओषं धय' (जलते हुए खा)। इससे 'ओषधि' उत्पन्न हुई। इसीलिए उनका नाम 'ओषधि' है। अब फिर उसने हथेलियाँ मलीं। तब दूसरी आहुति मिली। घी की आहुति या दूध की आहुति, ये दोनों दूध ही तो हैं ॥५॥ वह उसको पसन्द आ गई। उसे संकोच हुआ, 'इसे (आग में) छोड़ूँ या न छोड़ूँ।' उसकी महिमा ने कहा, 'आहुति दे।' प्रजापति ने जाना कि यह तो मेरी ही (स्व) महिमा है जो कह रही है (आह)। इसलिए उसने 'स्वाहा' कहकर आहुति दे दी। इसलिए 'स्वाहा' कहकर आहुति दी जाती है। अब वह निकला जो तपता है अर्थात् सूर्य, और वह आया जो बहता है अर्थात् वायु।
२२६ शतपथ ब्राह्मण
पर्या॑ववर्त ॥ ६॥ स हु॒त्वा प्र॒जाप॑तिः । प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मान॑मत्रायत स यो है॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होत्ये॒ताꣳ हे॑व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यां प्र॒जाप॑तिः प्रा- जा॑य॒तैवं ह्ये॒वाऽत्मन॑स्तो॒ऽग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मानं॑ त्रायते ॥७॥ स यत्र॒ म्रिय॑ते । यत्रै॑नम॒ग्ना- व॒भ्याद॑धति॒ तदे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ऽथास्य शरी॑रमे॒वा॒ग्निर्दह॑ति॒ तद्यथा॑ पि॒तुर्वा मा॒तुर्वा जा॒य॑तैवमे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ शश्व॑द्ध वा॒ऽए॒ष न सम्भ॑वति॒ यो॑ऽग्निहो॒त्रं न जु॒होति॑ । तस्मा॒द्वाऽग्निहो॒त्रꣳ हो॑त॒व्यम् ॥८॥ तद्वाऽए॒तत् । ए॒व वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॒ य- त्प्र॒जाप॑तिर्व्यचि॑कित्स॒त्स वि॑चिकित्सञ्छ्रेय॒स्य॑ध्रियत॒ यः प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ- त्योरा॒त्मान॑मत्रायत स यो॒ है॒वमे॒तद्वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॑ वे॒द ग्रह॒ किं च विचि॑कि- त्सति॒ श्रेय॑सि॒ हैव॑ ध्रियते ॥ ९॥ स हु॒त्वा न्य॑मृष्ट । ततो विकङ्क॒तः सम॑भव॒त्तस्मा- दे॒ष य॒ज्ञियो॑ य॒ज्ञपा॑त्रीयो वृ॒क्षस्तत॒ ए॒ते दे॒वानां॑ वी॒रा अ॑जायन्ता॒ग्निर्वा॒ऽयं पव॑ते सूर्य्यः॑ स यो॒ है॒वैतान्वे॒वानां॑ वी॒रान्वे॒दाहा॑स्य वी॒रो जा॑यते ॥ १०॥ तऽउ॒ हैत॒ ऽऊचुः । व॒यं वै प्र॒जाप॑तिं पि॒तर॒मनु॑ स्मो ह॒न्त व॒यं तत्सृ॑जामहै॒ यद॒स्मानन्वस॒दि- ति ते परि॑श्रित्य गाय॒त्रेणा॒पहिं॑कारिण तुष्टुविरे तद्य॒त्पर्य॑श्रयꣳस्तत्समु॒द्रोऽभ॑वदियमे॒व पृ॑थि॒व्यास्ता॒वः ॥११॥ ते स्तु॒त्वा प्राञ्च॒ उच्च॑क्रमुः । पुन॑रे॒म इति॑ दे॒वा ए॒डाꣳ सम्भू- ताꣳ सा हैना॒नुदी॑क्ष्य हिं॑चकार ते दे॒वा वि॒दां च॑क्रुरेष साम्नो हिंकार इत्युपहिं- कारꣳ हैव पुरा ततः॒ सामा॑स॒ स ए॒ष गवि साम्नो हिंकार॒स्तस्मा॑दे॒षोप॑जी॒वनीयो- पजी॒वनी॑यो ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वमे॒तं गवि साम्नो हिंकारं वेद॑ ॥ १२॥ ते हो॑चुः । भ॒द्रं वा॒ऽइ॒दमजी॑जनामहि॒ ये गा॒मजी॑जनामहि य॒ज्ञो ह्ये॒वेयं नो॑ कॢप्तिर्गोर्य्यज्ञास्ता- यते॒ऽन्नꣳ ह्ये॒वेयं यदि॒ किं चात्नं॑ गौरे॒व तदिति॑ ॥ १३॥ तद्वाऽए॒तद्दे॒वता॑सां॒ नाम॑ । ए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑देतत्परिह॒रेत्साधु पु॒ण्यमिति॑ ब्रू॒याद्यो ह वाऽअ॒स्यैता॑ भव॒त्युपना- मुक॑ एनं य॒ज्ञो भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वानेतत्परि॑हरति साधु पु॒ण्यमिति॑ ॥ १४॥ ता॒मु हा॒ग्निर॑भिद॒ध्यौ । मिथु॒न्यन॑या स्या॒मिति॑ ताꣳ सम्ब॑भूव॒ तस्याꣳ रेतः॒ प्रासि॑ञ्चत्तत्प-
का० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / २२७ अब अग्नि चला गया ॥६॥ प्रजापति ने आहुतियां देकर अपने को फिर उत्पन्न कर लिया, और अग्नि-रूपी मृत्यु से अपने को बचा लिया जो उसको खाना चाहती थी। इसलिए जो आदमी समझकर अग्निहोत्र करता है वह प्रजा-रूप में अपने को उत्पन्न करता है जैसे प्रजापति ने किया, और खानेवाली अग्नि से अपने को बचा लेता है ॥७॥ और जब वह मरता है और जब उसको अग्नि में रखते हैं तो वह अग्नि से फिर उठता है। अग्नि उसके शरीर को ही जलाता है। जैसे वह मा या बाप से उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि से उत्पन्न होता है। और जो अग्निहोत्र नहीं करता वह उत्पन्न होता ही नहीं। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥८॥ संकोच के द्वारा जन्म के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने संकोच किया तो न संकोच करते हुए भी श्रेय पर आरूढ़ रहा, यहाँ तक कि उसने अपने को उत्पन्न किया और अपने को मृत्युरूपी अग्नि से बचाया जबकि वह उसे खाना चाहता था; इसी प्रकार वह भी जो संकोच से जन्म को जानता है, यदि कभी संकोच करता है तो भी श्रेय पर आरूढ़ रहता है ॥९॥ आहुति देकर उसने (हथेलियां) मलीं। तब विकङ्कत वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिए यह यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष है और यज्ञ-सम्बन्धी पात्र इससे बनाये जाते हैं। अब देवों में जो वीर हैं वे उत्पन्न हुए, अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य। सचमुच जो इन वीर देवों को जानता है उसके वीर उत्पन्न होता है ॥१०॥ उन्होंने कहा, 'हम पिता प्रजापति के पीछे हुए हैं। अब हम प्रजा उत्पन्न करें जो हमारे पीछे हो।' उन्होंने एक घेरा घेरकर गायत्री से हिङ्कार छोड़कर प्रार्थना की । जिससे उन्होंने घेरा था वह समुद्र था; और पृथिवी आस्ताव (अर्थात् प्रार्थना की) जगह हो गई ॥११॥ वे स्तुति करके पूर्व को गये, यह कहकर कि 'हम लौटे जाते हैं।' देव एक गाय के पास आये जो उत्पन्न हो गई थी। उसने उनकी ओर देखकर 'हिंकार' किया। देवों ने जाना कि यह सामवेदीय हिंकार है। पहले वह हिंकार-शून्य था। अब ठीक शाम हो गया। यह सामवेदीय हिंकार गाय के मध्य में थी। इसलिए यह (गाय) जीविका का साधन हो गई। जो कोई गाय में इस सामवेदीय हिंकार के भेद को जानता है, वह जीविका का साधन हो जाता है ॥१२॥ उन्होंने कहा, 'यह जो हमने उत्पन्न किया वह भद्र है, यह जो हमने गाय उत्पन्न की; इसलिए कि यह तो यज्ञ ही है, क्योंकि गाय के बिना यज्ञ हो ही नहीं सकता। यह अन्न भी है, क्योंकि जो भी कुछ अन्न है वह गाय ही है ॥१३॥ यह ('गो' नाम) उन (गौओं) का भी है और यज्ञ का भी। इसलिए उसको दुहराना चाहिए यह कहकर 'साधु है, पुण्य है।' जो कोई इस रहस्य को समझकर 'साधु, पुण्य' दुहराता है, (गायँ) उसके लिए बहुतायत देती हैं और यज्ञ उसकी ओर झुकता है ॥१४॥ अब अग्नि ने उससे प्रेम किया कि मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने उसके साथ मैथुन
अध्याय-३, ब्राह्मण-१
यो॒ऽभव॒त्तस्मादे॒तदामायां॑ ग॒वि स॒त्याꣳ शृतम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्माद्यदि॑ कृ॒ष्णायां॒ यदि॑ रोहि॒ण्याꣳ शु॒क्लमे॒व भव॑त्य॒ग्निसंकाशम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्मात्प्रथमदुग्धमुष्णं॑ भवत्य॒ग्नेर्हि रेत॑: ॥ १५॥ ते॒ होचु॑: । ह॒न्तेदं जु॒हुवाम॒हाऽऽइति॒ कस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य- न्तीति॒ मह्य॒मिति॒ हैवा॒ग्निरु॑वाच॒ मह्य॒मिति॒ यो॒ऽयं पव॑ते॒ मह्य॒मिति॒ सूर्य॑स्ते न स- म्पाद॒यां चक्रुस्ते हासम्पा॒द्योचु॑: प्र॒जाप॑तिमे॒व पि॒तरं॑ प्रत्य॒याम॒ स यस्मै॑ न इ॒दं प्र- थ॒माय॑ होत॒व्यं॑ व॒क्ष्यति॒ तस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य॒न्तीति॒ ते प्र॒जाप॑तिं पि॒तरं॑ प्रतीत्योचुः कस्मै न इदं प्रथमाय होष्यन्तीति ॥ १६॥ स॒ होवाच॑ । अ॒ग्नये॒ऽग्निर- नुध्या॒ स्वꣳ रेत॑: प्र॒जन॑यिष्यते॒ तया॑ प्र॒जनि॑ष्यध॒ऽइत्यथ॒ तुभ्य॒मिति॒ सूर्य॒मथ॒ यदे॒व हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं पव॑त॒ऽइति॒ तदे॒भ्य इ॒दमप्ये॑त॒र्हि तथै॒व जु- ह्वत्य॒ग्नय॒ऽएव सा॒यं सूर्य्याय॑ प्रा॒तरथ॒ यदे॒व हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं पव॑ते ॥ १७॥ ते हु॒त्वा दे॒वाः । इ॒मां प्र॒जातिं॑ प्रा॒जाय॑न्त॒ येषा॒मियं प्र॒जाति॑रि॒मां वि- जितिं॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां॒ विजि॑तिरि॒ममे॒व लो॒कम॒ग्निर॒जय॑द॒न्तरि॑क्षं वा॒युर्द्दिव॑मेव॒ सूर्य॑: स यो॒ हैवं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्ये॒ताꣳ है॒व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तत्प्राजा॑- यन्तै॒तां विजि॑तिं वि॒जय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तद्व्यज॑यन्तै॒तैरु॒ है॒व स॒लोको भ॑वति॒ य एवं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ तस्माद्वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ होत॒व्यम् ॥ १८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ [२.४.]॥ अध्यायः ॥२ [११.]॥ ॥ सूर्यो॑ ह वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ । तद्यदे॒तस्या॒ अग्र्य॒ऽआहु॑तेरु॒दैत्तस्मात्सूर्यो॑ऽग्निहोत्रं॑ ॥ १॥ स य॒त्सायमस्तमि॑ते जु॒होति॑ । य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीत्यथ॒ य- त्प्रा॒तरनु॑दिते जु॒होति॑ य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीति॒ तस्मा॑द्धि॒ सूर्यो॑ऽग्निहो- त्रमित्याहु॑: ॥ २॥ ॥ शतम् १००० ॥ ॥ अथ॒ यद॒स्तमे॑ति । तद्द्यावेव योनौ गर्भो भू॒त्वा प्र॒विश॑ति॒ तं गर्भं भव॑न्तमि॒माः सर्वा॑: प्र॒जा अनु॑ ग॒र्भा भव॑न्तीलिता हि॒ शेरे॒ संजानाना॒ अथ॒ यद्रात्रिस्ति॒र् ए॒वैतत्क॑रोति ति॒र् इव हि गर्भ॑: ॥ ३॥ स यत्सा-
कां० २, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १५-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / २२६ किया। उसमें वीर्य सींचा। वह दूध हो गया। इसलिए गाय जब तक कच्ची रहती है (वह दूध) पकता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है। इसलिए चाहे काली गाय में हो चाहे लाल में, दूध सफेद ही होता है, अग्नि के समान चमकता हुआ, क्योंकि अग्नि का वीर्य है। इसलिए जब वह पहले दुहा जाता है तो गर्म होता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है ॥१५॥ उन्होंने (मनुष्य ने ?) कहा, 'इसकी आहुति दें।' (देवों ने कहा) 'ये पहले किसके लिए आहुति देंगे ?' अग्नि ने कहा, 'मेरे लिए।' वायु ने कहा, 'मेरे लिए।' सूर्य ने कहा, 'मेरे लिए।' वे निश्चय न कर सके और निश्चय न करके कहा, 'पिता प्रजापति के पास चलें। वे जिसको पहली आहुति के योग्य बतायेंगे, लोग भी उसीको पहली आहुति देंगे।' वे पिता प्रजापति के पास जाकर बोले, 'हममें से किसको लोग पहले आहुति देंगे ?' ॥१६॥ उसने कहा, 'अग्नि के लिए। अग्नि तुरन्त ही अपने वीर्य को उत्पन्न करेगा। इससे तुम्हारी भी प्रजा होगी।' फिर सूर्य से कहा, 'इसके पश्चात् तुम्हारे लिए (आहुति दी जायगी)। और जो (दूध) आहुति देने से बच रहा वह उसके लिए जो बहता है (वायु के लिए)। इसलिए अब तक लोग इसी प्रकार आहुति देते हैं-सायंकाल में अग्नि के लिए और प्रातःकाल में सूर्य के लिए; और जो आहुति देने से बच रहता है वह वायु के लिए ॥१७॥ आहुति देकर देवों ने उस प्रकार अपने को प्रजा के रूप में उत्पन्न किया जिस प्रकार उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन्होंने वह विजय पाई जो सचमुच पाई। अग्नि ने यह लोक जीता, वायु ने अन्तरिक्ष और सूर्य ने द्यौ । जो कोई इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसके उसी प्रकार प्रजा होती है जैसे देवों के हुई, और वह उसी प्रकार विजय पाता है जैसे देवों ने। जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह (उन देवों के साथ) इस लोक का हिस्सेदार होता है। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥१८॥ अध्याय ३-ब्राह्मण १ सूर्य ही अग्निहोत्र है। क्योंकि वह इस आहुति के पहले उदय हुआ, इसलिए सूर्य अग्निहोत्र है ॥१॥ सायंकाल को अग्निहोत्र = (अग्ने होत्रस्य) अस्त होते हुए सूर्य के बाद आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है इसके यहाँ रहते हुए मैं आहुति दे दूँ। और जो सूर्योदय से पहले प्रातः- काल के समय आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है उसके यहाँ रहते हुए आहुति दूँ। इसलिए 'सूर्य ही अग्निहोत्र है' ऐसा कहते हैं ॥२॥ अब जब वह अस्त हो जाता है तब अग्निरूपी योनि में गर्भ होकर प्रवेश करता है, और उसके गर्भ होने पर यह सब प्रजा गर्भ हो जाती है। थपथपाये जाकर मानो वे सन्तुष्ट होकर सो जाते हैं। रात्रि उस (सूर्य) को इसलिए छिपा लेता है कि गर्भ भी तो छिपा रहता है ॥३॥
२३० शतपथ ब्राह्मण यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । गर्भ॑मे॒वैतत्संन्त॒मभि॑जु॒होति॒ गर्भ॑ꣳ सन्त॒मभि॑करोति स प्र॒गर्भ॑ꣳ सन्त॒मभि॑जुहोति॒ तस्मा॑दिमे॒ गर्भा॑ अ॒न्नम॑त्तो जी॒वन्ति॑ ॥ ४॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒- होति॑ । प्र॒जन॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सो॑ऽयं तेजो॑ भू॒त्वा वि॒भ्राज॑मान उदेति शश्व॒द्ध वै नो॑- दियाद्य॒दस्मि॑न्ने॒तामाहु॑तिं॒ न जु॑हु॒यात्तस्मा॑दाऽए॒तामाहु॑तिं जु॒होति॑ ॥ ५॥ स यथा॑- ऽहिस्त्वचो॑ निर्मुच्ये॒त । ए॒वꣳ रात्रेः पाप्म॑ना निर्मुच्यते यथा ह वाऽअ॒हिस्त्वचो॑ निर्मुच्ये॒तैवꣳ सर्व॑स्मात्पा॒प्मनो॑ निर्मुच्यते॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होति॒ तदे॒त- स्यैवा॒नु प्र॒जाति॒मिमाः सर्वाः प्र॒जा अनु॑ प्र॒जाय॑न्ते वि हि सृ॒ज्यन्ते॒ यथा॒र्थ॑म् ॥ ६॥ स यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑र॒त्येते वै विश्वे॑ दे॒वा र॒श्मयो॒ऽथ यत्प॑रं भाः प्र॒जाप॑तिर्वा स इन्द्रो॑ वै॒तदु॑ ह वै विश्वे॑ दे॒वा अ॒ग्निहो॒त्रं जुह्व॑तो गृ॒हानाग॑- च्छन्ति॒ स यस्या॑नुद्धत॒माग॑च्छन्ति॒ तस्मा॑दि॒वा अप॑प्रयन्ति॒ तद्धा॑ऽअस्मै॒ तद्व्यृ॑ध्यते॒ यस्मा॑द्दे- वा अप॑प्रयन्ति॒ तस्यानु॑ व्यृ॒द्धिं यश्च॒ वेद॒ यश्च॒ नानु॑द्धतम॒भ्यस्त॑मगादि॒त्याहुः॑ ॥ ७॥ अथ॒ यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑रति यथा॒ श्रेय॒स्याग॑मिष्यत्यावस॒थे- नो॑प॒क्लृप्ति॑नोपासी॒तैवं तत्स यस्यो॑द्धत॒माग॑च्छन्ति तस्या॑हव॒नीयं प्र॒विश॑न्ति तस्याह- व॒नीये॑ नि॒विश॑न्ते ॥ ८॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । अ॒ग्नावे॒वैभ्य ए॒तत्प्र॒वि॑ष्टे- भ्यो॑ जुहोत्यथ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होत्ये॒तेभ्य ए॒वैभ्य ए॒तज्जु॑होति॒ तस्मा॑दुदितहो- मिनां॑ वि॒च्छिन्न॑मग्निहो॒त्रं म॑न्याम॒हेऽरु॑ति ह स्माहा॒सुरि॒र्यथा शून्ये॑मावस॒थमाकु॑रुरे॒वं तदि॑ति ॥ ९॥ द्वयं वाऽइ॒दं जी॑वनं । मू॒लि चै॒वामू॑लं च॒ तदु॑भयं दे॒वानाꣳ स॒न्म- नु॒ष्या उप॑जीवन्ति प॒शवो मूला ओष॑धयो मू॒लिन्य॑स्ते प॒शवो मूला ओष॑धीर्मू- लिनी॑र्ग॒ध्वापः॑ पी॒त्वा तत ए॒ष रसः॒ सम्भ॑वति ॥ १०॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑ जुह्वानि॒ यदे॑षामि॒दꣳ स॒दुप॑जीवाम॒ इति॑ स यत्त- तो रात्र्या॒मश्ना॑ति हु॒तोच्छि॑ष्टमेव॒ तन्नि॒र्वृत्त॑ब॒ल्यश्नाति हु॒तोच्छि॑ष्टस्य॒ ह्येवा॑ग्निहो॒त्रं जु- ह्वद॑शिता ॥ ११॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होति॑ । अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / २३१ वह सायंकाल को अस्त होने पर इसलिए आहुति देता है कि (सूर्य) जो गर्भरूप है उसको आहुति दी जाय, और चूंकि उसको गर्भ के रूप में आहुति देता है इसलिए यह गर्भस्थ जीव बिना खाये जीते रहते हैं ॥४॥ प्रातःकाल उदय होने से पूर्व इसलिए आहुति देता है कि इस (सूर्यरूपी बालक) को जन्म दे । वह तेज होकर चमकता हुआ निकलता है। अगर वह आहुति न देता तो कदापि न निकलता। इसलिए वह आहुति देता है ॥५॥ जैसे सांप केंचुली छोड़ता है इसी प्रकार वह पाप-युक्त रात्रि को छोड़ता है। जो रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह उसी प्रकार पाप-युक्त रात्रि से छूट जाता है जैसे सांप केंचुली से। उस (सूर्य) के छूटने पर सब प्रजा फिर से उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वे अपने प्रयोजन के अनुकूल बिचरते हैं ॥६॥ वह जो सूर्यास्त से पहले आहवनीय को (गार्हपत्य से) निकालता है—ये किरणें ही विश्वेदेव (सब देव) हैं। इससे अधिक जो प्रकाशित होता है प्रजापति या इन्द्र है। अग्निहोत्र करनेवाले के घर सब देवता पहुँच जाते हैं। और जो कोई आग न निकाल पावे और देवतागण आ जायें तो वे चले जाते हैं। और जिसके यहाँ से देवतागण लौट जायें वह सफल नहीं होता। और जिसके यहाँ से देवतागण चले गये और वह विफल हुआ, उसके विषय में लोग कहते हैं कि चाहे यह जाने या न जाने, इसका सूर्यं अस्त हो गया क्योंकि इसने (गार्हपत्य से आहवनीय अग्नि को) नहीं निकाला ॥७॥ सूर्यास्त से पहले आहवनीय निकालने का यह कारण है कि जब कोई बड़ा आने वाला होता है तो घर को साफ करके सत्कार करते हैं, उसी प्रकार यह भी। क्योंकि जिस किसी के अग्नि निकालने के पीछे (देवतागण) आते हैं, वे उसके आहवनीय गृह में घुस जाते हैं और उसी आहवनीय गृह में ठहर जाते हैं ॥८॥ वह शाम को सूर्यास्त होने पर अग्नि में इसलिए आहुति देता है कि वह घर में प्रवेश किये हुए (देवताओं) के लिए आहुति देता है। और सूर्योदय होने से पहले आहुति देने का प्रयोजन यह है कि जब तक देव जाने न पावें, तब तक आहुति दी जाय। इसीलिए आसुरी का कहना था कि सूर्योदय होने के पश्चात् आहुति देनेवालों का अग्निहोत्र व्यर्थ हो जाता है जैसे खाली घर में कोई खाना ले जाय ॥६॥ जीविकाएँ दो प्रकार की हैं—जड़ वाली और बिना जड़ की। ये दोनों देवताओं की हैं। इन्हीं के सहारे मनुष्य जीते हैं। पशु बिना जड़ के हैं और ओषधियाँ जड़वाली; बिना जड़- वाले पशु जब जड़वाली ओषधियों को खाते और जल पीते हैं तब रस उत्पन्न होता है ॥१०॥ वह सूर्यास्त के पश्चात् शाम को आहुति इसलिए देता है कि इस जीवन-रस की आहुति देवताओं के लिए दे दूँ, क्योंकि यह रस उन्हीं का है जिसको खाकर हम जीते हैं। और जो वह रात्रि में भोजन करता है वह आहुति का शेष भाग है जिसमें से बलि निकाला जा चुका है (अर्थात् अन्य जीवों के लिए भाग बाँट दिया गया हो)। क्योंकि जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥११॥ और जो प्रातःकाल सूर्योदय से पहले आहुति देता है, वह सोचता है कि इस जीवन-रस
२३२ शतपथ ब्राह्मण
जुहुवानि य॑देषामिदꣳ सडुपजीवाम॒ इति॑ स यत्ततो॒ऽश्नाति॑ हु॒तोच्छि॒ष्टमेव॒ तन्नि- र्व्वर्त्तयत्यश्नाति हुतोच्छिष्टस्य॒ ह्येवाग्निहोत्रं जुह्वदशिता ॥ १२॥ तदाहुः । स॒मे- वान्ये यज्ञास्तिष्ठन्ते॒ऽग्निहोत्रमेव न सं॑तिष्ठते॒ऽपि द्वादशसंवत्सरमन्तवदेवाथैतद्दे- वानस्तꣳ सायꣳ हि हुत्वा वेद॒ प्रात॑र्हो॒ष्यामीति प्रातर्हु॒त्वा वेद॒ पुनः सायꣳ हो- ष्यामी॑ति त॒देतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं तस्यानुपस्थितिमनु॑पस्थिता इमाः प्रजाः प्र- जायन्ते॒ऽनुपस्थितो ह॒ वै श्रिया॑ प्र॒जया॑ प्र॒जायते॒ य ए॒वमेतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं वे- द ॥ १३॥ तद्दुग्धाधिश्रयति । शृतमस॒दिति तदाहुर्य्यद्युदक्तं तर्हि जुहुयादिति तद्वै नो॒दक्तं कुर्य्यादुप ह दहेद्यदुदक्तं कुर्य्यात्प्रप्र॒ज्ञि वै रेत॑ उपदग्धं तस्मान्नोदक्तं कुर्य्यात् ॥ १४॥ अधिश्रित्यैव जुहुयात् । पयो॒वैतदग्रे रेतस्तेन॒ नैव शृतं यद्देनदग्नावधिश्रय- न्ति तेनो॒ऽएव शृतं तस्मादधिश्रित्यैव जुहुयात् ॥ १५॥ तदुद्द्योतयति । शृतं वे- दानीत्यथापः प्रत्यानयति शा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वायैतद्वि यदा वर्षत्य- थौषधयो जायन्त॒ऽओषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति तस्माद् रसस्यो चैव॒ सर्व्वत्वाय तस्माद्यद्येनं क्षीरं केवलं पानेऽभ्याभवेदुदस्तोकमाश्चोतयेदिति ब्रू- याच्छा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वाय ॥ १६॥ अथ चतुरुन्नयति । चतुर्द्धाविहितꣳ हीदं पयोऽथ स॒मिधमादायोदाद्रवति समिद्धहोमायेव सो॒ऽनुपसाद्य॒ पूर्वामाहु॑तिं जुहोति स यदुपसादयेद्यथा यस्मा॒ऽअशनमाहरिष्यन्त्स्यात्तदुत्तरा निदध्यादेवं तद्यथ यद॒नुपसाद्य यथा यस्मा॒ऽअशनमाह॒रेत्तस्मा॒ऽआहृत्यै॒वोपनिदध्यादे॒वं तदुपसाद्यो- त्तरां नानाविय्यै॒ऽएवैने॒ऽएतत्करोति मनश्च ह॒ वै वाक्चैते॒ऽआहुती तन्मनसैवैत- द्वाचं च व्याव॑र्त्तयति तस्मादिदं मनश्च वाक्च समानमेव सन्तानेव ॥ १७॥ स वै द्विरग्नौ॑ जुहोति । द्विरुपमार्ष्टि द्विः प्राश्नाति चतुरुन्नयति तद्दश दशाक्षरा वै वि- राड्विराडु यज्ञस्तद्विराजमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ॥ १८॥ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्दे- वेषु॑ जुहोति तस्माद्देवाः सन्त्यथ यदुपमार्ष्टि तत्पितृषु चौषधीषु च जुहोति त-
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / २३३ की देवताओं के लिए आहुति दे दूं, क्योंकि यह इनका है जिसको खाकर हम जीते हैं। वह जो दिन में भोजन करता है वह यज्ञ-शेष है, जिसमें से बलि निकाला जा चुका हो। जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥१२॥ इस विषय में कहा जाता है कि अन्य सब यज्ञ समाप्त हो जाते हैं परन्तु अग्निहोत्र समाप्त नहीं होता। बारह वर्ष चलनेवाला यज्ञ भी अन्तवाला है, परन्तु अग्निहोत्र अन्तवाला नहीं है। क्योंकि सायं को आहुति देकर जानता है कि प्रातःकाल आहुति दूंगा, और प्रातःकाल आहुति देकर जानता है कि सायं को आहुति दूंगा। इसलिए अग्निहोत्र अनन्त है और इससे अनन्त सन्तान उत्पन्न होती है। और जो मनुष्य अग्निहोत्र की अनन्तता को समझता है, उसके अनन्त सन्तान और वैभव होता है ॥१३॥ दूध दुहकर (गार्हपत्य अग्नि पर) पकाने रखता है जिससे पक जावे। इस विषय में कहते हैं कि जब उबाल आवे तब आहुति दे। परन्तु उबाल आ जायगा तो जल जायगा और जला हुआ बीज उपजता नहीं। इसलिए उबाल न आने देना चाहिए ॥१४॥ आग पर चढ़ाकर ही आहुति दे, क्योंकि यह (दूध) अग्नि का वीर्य है। इसको आग पर इसलिए रखते हैं कि गर्म हो जाय। इसलिए आग पर रखकर ही आहुति देनी चाहिए ॥१५॥ अब प्रकाशित करता है (अर्थात् तिनके जलाकर उसके प्रकाश से दूध को देखता है) कि यह पक गया क्या ? अब उस पर जल छिड़कता है शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए। जब बरसता है तब ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाने और जल को पीने से यह रस उत्पन्न होता है। इसलिए रस की वृद्धि के लिए वह जल छोड़ता है। इसलिए यदि 'केवल' (खालिस) दूध पीना हो तो उसमें एक बूंद जल अवश्य मिला ले, शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए ॥१६॥ अब वह दूध को चार (चमचों) में निकालता है, क्योंकि वह दूध चार प्रकार से (चार थनों से) मिला था। अब वह समिद्ध होम के लिए समिधा को उठाता है और (चमसे को) बिना नीचे रक्खे हुए पूर्व-आहुति देता है। यदि (चमसे को) नीचे रख देगा तो मानो वह किसी के लिए खाना ले जाते हुए बीच मार्ग में रख दे। परन्तु बिना नीचे रक्खे हुए (आहुति देना) मानो किसी को खाना ले जाते हुए पहले उसके पास पहुँचाकर (बर्तन) नीचे रक्खे। नीचे रखने के बाद एक और (आहुति देता है)। इस प्रकार इन दो आहुतियों को नानावीर्य (भिन्न-भिन्न पराक्रमवाली) बनाता है। ये दो आहुतियाँ मन और वाणी हैं। इस प्रकार मन और वाणी को एक-दूसरे से अलग करता है। इस प्रकार मन और वाणी समान होते हुए भी नाना हैं ॥१७॥ दो बार अग्नि में आहुति देता है। दो बार (चमसे को) पोंछता है। दो बार (दूध) खाता है। चार बार (चमसे में) निकालता है। ये दस (क्रियाएँ) हुईं। विराज् छन्द में दस अक्षर होते हैं। विराज् ही यज्ञ है। इस प्रकार वह यज्ञ को विराज् बना देता है ॥१८॥ वह अग्नि में जो आहुति देता है, वह देवताओं के लिए देता है। इसी से देव (यज्ञों में) सम्मिलित हैं। और जो पोंछ डालता है उसको पितरों और ओषधियों के लिए आहुति देता है।
२३४ शतपथ ब्राह्मण स्मात्पितर॒श्चौष॑धयश्च सन्त्य॑ यदुवा॒ प्राश्ना॑ति तन्मनु॒ष्येषु॑ जुहोति॒ तस्मान्मनु॒ष्याः सन्ति॑ ॥१९॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽन॑न्वाभक्ताः । परा॒भूता वै ता ए॒वमे॒वैता इमाः प्र॒जा अप॑राभूतास्ता य॒ज्ञमुख॒ऽआभ॑जति॒ तेनो॑ ह॒ पश॑वोऽन्वा॑भक्ता य॒न्मनुष्या॒ननु॑ पश॒वः ॥२०॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः । न वै य॒ज्ञ इ॑व न्तत्वै पाकय॒ज्ञ इ॑व वा ऽहुतीदं हि यद॒न्यस्मि॒न्य॒ज्ञे स्रुच्यव॑द्यति॒ सर्वं॒ तद॒ग्नौ जुहोत्यथैतद॒ग्नौ जु॒होत्य्- प्याचा॑मति॒ निर्ले॑ढि॒ तद्य॑त् पाकय॒ज्ञस्ये॑वेति॒ तद्य॑त् तत्पशव्यं रू॒पं प॑शव्यो॒ हि पाकय॒ज्ञः ॥२१॥ सैषेकाऽऽहु॑तिरित्ये॒वाग्रे । यन्न्विवामूं प्रजाप॑ति॒रजु॑हो॒दथ य॑देत॒ऽए॒तत्प- श्चा॒वाधिय॒न्ताम॒ग्नि॒र्ज्योति॒ᳲ प॑वते॒ सूर्य॑स्तस्मादे॒षा द्वि॒तीयाऽऽहु॑तिर्हूयते ॥२२॥ सा या पू- र्वाऽऽहु॑तिः । सा॒ग्नि॒होत्र॑स्य दे॒वता॒ तस्मा॒त्तस्यै जुहोत्यथ योत्त॑रा स्विष्टकृद्भाजनमेव सा तस्मा॒त्तामु॑त्तरार्धे॑ जु॒होत्ये॑षा हि दिक् स्विष्टकृतस्तन्मिथुनायै॒वैषा द्वि॒तीयाऽऽहु- तिर्हूय॑ते द्वन्द्वं हि मिथु॒नं प्र॒जनन॑म् ॥२३॥ तद्द्वयमे॒वैतेऽआहुती । भू॒तं चैव॑ भ- वि॒ष्यच्च॑ जा॒तं च॑ ज॒निष्य॑माणं॒ चाग॑तं चाशा॑ चा॒द्य च॒ श्वश्च॒ तद्द्वयमे॒वानु॑ ॥२४॥ आ॒त्मैव भू॒तं । अ॒द्धा हि तद्यद्भू॒तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव भ॑वि॒ष्यद॒द्धा हि तद्य- द्भवि॒ष्यद॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२५॥ आ॒त्मैव जा॒तम् । अ॒द्धा हि तद्यज्जा॒तम॒द्धो तद्य- दा॒त्मा प्र॒जैव ज॑नि॒ष्यमा॑णम॒द्धा हि तद्यज्ज॑निष्यमा॑णम॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२६॥ आ॒त्मैवाग॑तम् । अ॒द्धा हि तद्यदाग॑तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैवाशा॒नद्धा हि तद्यदा- शा॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२७॥ आ॒त्मैवा॒द्य । अ॒द्धा हि तद्यद॒द्याद्धो॑ तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव श्वो॒ऽनद्धा हि तद्यच्छ्वो॒ऽनद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२८॥ सा या पूर्वा॒ऽऽहुतिः । सात्मान॑म॒भि- हूय॑ते तां॒ मन्त्रे॑ण जुहोत्यद्धा हि तद्यन्मन्त्रो॒ऽद्धो तद्यदा॒त्माऽथ योत्त॑रा सा प्र॒जा- म॒भि हूय॑ते तां तू॒ष्णीं जुहोत्यनद्धा हि तद्यत्तूष्णीम॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२९॥ स जु- होति । अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेत्यथ प्रातः सूर्यो ज्योति॒र्ज्योतिः सूर्यः॒ स्वाहे- ति॒ तत्स॒त्येनै॑व हूयते यदा॒ ह्ये॑व सूर्या॒ऽस्तमेत्यथा॒ग्निर्ज्योति॒र्यदा सूर्य॑ उ॒देत्यथ॒ सूर्यो॑
कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १६-३० शतपथब्राह्मण / २३५ इससे पितर और ओषधियाँ (यज्ञ में) सम्मिलित हैं। यह जो आहुति देकर खाता है वह मनुष्यों के लिए आहुति देता है। इससे (मनुष्य यज्ञ में) सम्मिलित होते हैं ॥१९॥ जो यज्ञ में सम्मिलित नहीं किये जाते वे तिरस्कृत हैं। इस प्रकार जो प्रजा तिरस्कृत नहीं है उसके लिए यज्ञ के आरम्भ में ही भाग निकल जाता है। इस प्रकार पशु (मनुष्यों के) साथ-साथ भाग लेते हैं क्योंकि पशु मनुष्यों के पीछे चलनेवाले हैं ॥२०॥ इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि इस (अग्निहोत्र) को हविर्यज्ञ नहीं मानना चाहिए। इसको तो पाकयज्ञ (Domestic Sacrifice) कहना चाहिए, क्योंकि हविर्यज्ञ में जो कुछ स्रुक् में लिया जाता है वह सब अग्नि में छोड़ दिया जाता है। और यहाँ अग्नि में आहुति देने के पश्चात् आचमन करता और खाता है। यह सब पाकयज्ञ की ही क्रिया है। यह यज्ञ का पाशविक रूप है क्योंकि पाकयज्ञ पाशविक है ॥२१॥ पहली एक आहुति वही है जिसको प्रजापति ने दिया था और जिसके पीछे देवों ने (यज्ञ) जारी रक्खा अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य ने। इसलिए यह दूसरी आहुति देता है ॥२२॥ वह जो पूर्वाहुति दी गई वह तो अग्निहोत्र का देवता है, इसलिए उसी के लिए दी जाती है। और जो दूसरी आहुति है वह स्विष्टकृत् के समान है, इसलिए वह उत्तर की ओर दी जाती है। (उत्तरा आहुति उत्तर की ओर दी जाने से शब्दों का सादृश्य है), क्योंकि स्विष्टकृत् की यही दिशा है। यह दूसरी आहुति जोड़ा बनाने के लिए दी जाती है, क्योंकि जोड़े से ही सन्तान उत्पन्न होती है ॥२३॥ ये दोनों आहुतियाँ दो का जोड़ हैं—भूत और भविष्य का और उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होनेवाले का, जो है और जिसकी आशा है उन दोनों का, आज का और कल का ॥२४॥ आत्मा ही भूत है। भूत निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। भविष्यत् प्रजा है। भविष्यत् अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२५॥ जो उत्पन्न हो गया वह आत्मा है, क्योंकि जो उत्पन्न हो गया वह निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। जो उत्पन्न होनेवाला है वह प्रजा है, क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला है वह अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२६॥ जो प्राप्त हो गया (आगत, actual) वही आत्मा है, क्योंकि जो प्राप्त हो गया वह निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। आशा प्रजा है क्योंकि प्रजा भी अनिश्चित है और आशा भी अनिश्चित है ॥२७॥ आत्मा आज है, क्योंकि आज भी निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। कल प्रजा है क्योंकि कल भी अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२८॥ यह जो पूर्वाहुति है वह आत्मा के लिए दी जाती हैं। यह मन्त्र से दी जाती है, क्योंकि मन्त्र निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। दूसरी प्रजा के लिए दी जाती है। वह मौन होकर दी जाती है, क्योंकि मौन अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२९॥ (सायंकाल की) आहुति इस मन्त्र से दी जाती है—"अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" (यजु० ३।६), और प्रातःकाल इस मन्त्र से—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६)। सत्यता के साथ आहुति दी जाती है, क्योंकि जब सूर्य डूब जाता है तो अग्नि ही ज्योति रहती है।
ज्यो॒ति॒र्यदे॒ सत्येन॑ हू॒यते॒ तद्दे॒वाना॒हुति॑ ॥ ३०॥ तद् धैतदे॒वारु॑णये ब्रह्मवर्चसका- माय॒ तन्नानू॑वाचाग्नि॒र्वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्चः॒ सूर्यो वर्चो॒ ज्योति॒र्वर्च॒ इति॑ ब्रह्मवर्च॒सी है॒व भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॑ ॥ ३१॥ तद्वस्त्वे॒व प्र॒जनन॑स्येव रू॒पम् । अ- ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेति॒ तदु॒भयतो॒ ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या परि॒गृह्णा॒त्युभ॑यतः- परिगृहीतं वै रेत॑: प्र॒जाय॑ते॒ तदु॑भयत एवैतत्परि॒गृह्य॑ प्र॒जनय॑ति ॥ ३२॥ अथ प्रा- तः । सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑: सूर्य॑: स्वाहेति॒ तदु॒भयतो॒ ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या परि॒गृ- ह्णा॒त्युभ॑यतःपरिगृहीतं वै रेत॑: प्र॒जाय॑ते॒ तदु॑भयत एवैतत्परि॒गृह्य॑ प्र॒जनय॑ति॒ त त्प्र॒जनन॑स्य रू॒पम् ॥ ३३॥ तदु॑ होवाच जीव॒लश्चैलाकि॑: । गर्भ॑मे॒वारु॑णिः करो॒ति न प्र॒जनय॑तीति॒ स ए॒तेनैव सायं॑ जुहुयात् ॥ ३४॥ अथ प्रातः । ज्योति॑: सूर्य॑: सूर्यो॒ ज्योति॒: स्वाहेति॒ तद्वहि॑र्द्धा ज्योती रेतो॑ दे॒वत॑या करोति ब॒हिर्द्धा वै रेत॑: प्र॒जातं भव॑ति॒ तदे॒तत्प्र॒जनय॑ति ॥ ३५॥ तदाहुः । अ॒ग्नावे॒वैतत्साय॒ ँ सूर्य॑ जुहोति॒ सूर्ये॑ प्रा- तर॒ग्निमिति॒ तद्वै तदु॑दितहो॒मिनामेव॒ यदा॒ ह्ये॑व सूर्यो॑ऽस्तमे॒त्यथा॒ग्निर्ज्योति॒र्यदा॒ सूर्य॑ उ॒देत्यथ॒ सूर्यो॒ ज्योति॒र्नास्य॒ सा परि॑च॒न्नेयमे॑व॒ परि॑चक्षा॒ यत्तस्यै॒ नाष्ट्रा दे॒वता॑यै हू- यते॒ या॒ग्निहोत्रस्य दे॒वता॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेति॒ तन्न नाग्नये॒ स्वाहेत्यथ॒ प्रा- तः सूर्यो॒ ज्योति॒र्ज्योति॑: सूर्य॑: स्वाहेति॒ तन्न सूर्या॑य॒ स्वाहेति॑ ॥ ३६॥ अनेनैव॑ जु॑हुयात् । स॒मूर्द्वेवेन॑ सवि॒त्रेति॒ तत्स॑वि॒तृप्र॑सवाय॒ सन्नू रात्र्येन्द्व॑त्ये॒ति तद्रात्र्या मिथु॒नं करो॑ति॒ सेन्द्रं॑ करोतीन्द्रो॒ हि य॒ज्ञस्य दे॒वता जुषाणो॒ऽअ॒ग्निर्वेतु॒ स्वाहेति॒ तद॒ग्नये॒ प्रत्यनं॑ जुहोति ॥ ३७॥ अथ प्रातः । स॒मूर्द्वेवेन॑ सवि॒त्रेति॒ तत्स॑वि॒तृप्र॑- सवाय॒ सन्नूष॒सेन्द्व॑त्येत्यह्नेति वा॒ तदह्नां वोष॑सां वा मिथु॒नं करो॑ति॒ सेन्द्रं॑ क- रोतीन्द्रो॒ हि य॒ज्ञस्य दे॒वता जुषाणः॒ सूर्यो॑ वेतु॒ स्वाहेति॒ तत्सूर्या॑य॒ प्रत्यनं॑ जुहुया- दिति॒ तस्मा॑दे॒वमेव जु॑हुयात् ॥ ३८॥ ते होचुः । को न इ॒द ँ होष्यतीति ब्राह्म॒णा ꣳ॒ह्वेति॒ ब्राह्म॒णो॑ नो जुहुधीति॒ किं मे ततो॑ भविष्यतीत्य॒ग्निहोत्रोच्छि॑ष्टमे॒वेति॒ स
का० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / २३७ और जब सूर्य निकलता है तो सूर्य ज्योति होता है। जो सत्यता के साथ आहुति देता है वह देवों को प्राप्त होता है ॥३०॥ ब्रह्मवर्चस् की कामना के लिए तक्षा ने अरुण के प्रति यही कहा था—'अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चः' (यजु० ३।६) । जो पुरुष समझकर अग्निहोत्र करता है वह ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥३१॥ यह मन्त्र सन्तानोत्पत्ति का रूप है। "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" कहकर वह ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है। दोनों ओर से घिरकर ही तो वीर्य से उत्पत्ति होता है। इस प्रकार दोनों ओर से घेरकर ही वह इससे सन्तानोत्पत्ति कराता है ॥३२॥ प्रातःकाल की आहुति का मन्त्र—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६) । कहकर वह ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है, क्योंकि दोनों ओर से घिरकर ही वीर्य से उत्पत्ति होती है। इस प्रकार दोनों ओर से इसे घेरकर ही वह इससे सन्तानोत्पत्ति कराता है ॥३३॥ जीवल चैलकि का कथन है कि आरुणि गर्भ ही धारण करता है, सन्तानोत्पत्ति नहीं कराता। इसलिए उसी आहुति से सायंकाल को होत्र करे ॥३४॥ प्रातःकाल "ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा" (यजु० ३।६), कहकर वह देवता के द्वारा ज्योति रूपी वीर्य को बाहर कर देता है। बाहर आकर ही वीर्य उत्पत्ति करता है, इसलिए इसके द्वारा उत्पत्ति करता है ॥३५॥ इसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह सायंकाल को अग्नि में सूर्य के लिए आहुति देता है और प्रातःकाल सूर्य में अग्नि के लिए। यह उनके लिए सच है जो 'उदितहोमि' अर्थात् सूर्योदय के पश्चात् होम करनेवाले हैं। क्योंकि जब सूर्य अस्त होता है तब अग्नि ज्योति होती है और जब सूर्य उदय होता है तो सूर्य ज्योति होता है। इसमें कोई दोष नहीं है। दोष इसमें है कि जो अग्निहोत्र के देवता हैं उनको निश्चय करके न कहा जाय (अर्थात् सूर्य और अग्नि को अलग- अलग) । वह कहता है 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' न कि 'अग्नये स्वाहा।' इसी प्रकार प्रातःकाल के समय 'सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा' न कि 'सूर्याय स्वाहा' ॥३६॥ (सायंकाल को) इससे भी आहुति दे—'सजूर्देवेन सवित्रा' (यजु० ३।१०)। इस प्रकार सवितृ-युक्त हो जाता है, प्रेरणा के लिए। फिर कहता है 'सजूरात्र्येन्द्रवत्या', इससे वह इसका रात्रि से जोड़ मिलाता है और इन्द्र से युक्त करता है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। 'जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कहकर वह प्रत्यक्ष रूप से अग्नि के लिए आहुति देता है ॥३७॥ अब प्रातःकाल को 'सजूर्देवेन सवित्रा' कहकर प्रेरणा के लिए सवितृ-युक्त करता है। अब कहता है—'सजूरुषसेन्द्रवत्या', इस प्रकार वह इसका दिन या उषा से जोड़ मिलाता है और इसे इन्द्र-युक्त करता है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। 'जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कह- कर वह प्रत्यक्ष रूप से सूर्य के लिए आहुति देता है। इसलिए इसी प्रकार आहुति दे ॥३८॥ उन्होंने कहा—'हमारे लिए कौन आहुति देगा?' 'ब्राह्मण ही।' 'हे ब्राह्मण, हमारे लिए आहुति दे।' 'तब मेरा भाग क्या होगा?' 'अग्निहोत्र का उच्छिष्ट (बचा हुआ)।' यह जो
अध्याय-३, ब्राह्मण-२
२३८ शतपथ ब्राह्मण य॒त्स्रुचि॒ परिशि॒नष्टि॒ तद॒ग्निहो॒त्रोच्छि॑ष्ट॒मथ॒ यत्स्थाल्यां॒ यथा॒ परीण॒हो नि॒र्व॑पेदे॒वं तत्त्स्मा॒त्तद्य॒ एव॒ कश्च॒ पिबे॒त्तद्वै नाब्रा॑ह्मणः पिवेद्ग्रौ व्य॑धिय्य॒न्ति तस्मा॒न्नाब्रा- ह्मणः॑ पिबेत् ॥ ३१॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [३. १.] ॥ ॥ ए॒ता ह॒ वै दे॒वता॒ योऽग्निः । तस्मिन्न्वसतीन्द्रो॑ य॒मो राजा॒ नडो॑ नैषि॒धोऽन- श्चत्स॒ांगमनो॒ऽस॒न्या॑ऽसवः ॥ १॥ तद्वाऽए॒ष ए॒वेन्द्रः॑ । यदा॑हव॒नीयोऽथै॒ष ए॒व गा- र्हपत्यो य॒मो राजा॑थै॒ष ए॒व नडो॑ नैषि॒धो य॒दन्वा॑हार्यपच॒नस्तद्य॒देत॒मह॒रह॒र्द्दक्षि- णात् आ॒हर॑न्ति॒ तस्मा॑दाहुरह॒रह॒र्वै नडो॑ नैषि॒धो यमं॑ रा॒जानं॑ दक्षि॒णात उप॑नय- तीति॑ ॥ २॥ अथ॒ य ए॒ष स॒भायाम॒ग्निः । ए॒ष ए॒वानश्चत्सांगम॒नस्तद्य॒देत॒मन॑शिश्वे- वोप॒संगृह्ण॑ते॒ तस्मा॑देषो॒ऽननश्नन्नथ॒ यदेतद्भस्मोद्धृ॒त्य परावपन्त्ये॒ष ए॒वास॒न्या॑ऽस॒वः स यो॒ है॒वमे॒तद्दे॒वं म॒न्येता॒ देवता॑ वसन्तीति॒ सर्वा॒न्द्धैवैतांल्लो॒कान्जयति॒ सर्वांल्लो- का॒ननु॒संच॑रति ॥ ३॥ तेषामुपस्थान॑म् । यदि॑व॒ सायं॒ प्रातरा॑हव॒नीय॒मुप॑ च तिष्ठ॑त ऽउप॑ चास्ते॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यदे॑व॒ प्रति॒परे॑त्य॒ गार्ह॑पत्यमा॒स्ते वा॒ शेते॑ वा॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ संप्र॒ज्ञन्नन्वा॑हार्यपच॒नमुप॒स्मरे॒त्तदे॑व॒ तं मन॑सोप॑ति- ष्ठेत॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थानम् ॥४॥ अथ प्रा॒तः । अन॑शित्वा मु॒हूर्त्तं॑ स॒भाया॒मासि॑त्वा- पि कामं॑ प॒ल्प्ये॒त तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ भस्मो॒द्धृत॒मुप॑नि॒गृह्णी॑या॒त्तदे॑व त॒स्यो- पस्थान॑मेवमु॒ ह्वास्यै॒ता दे॒वता॑ उप॑स्थिता भ॑वन्ति ॥ ५॥ य॒जमान॑दे॒वत्यो॒ वै गार्ह॑- पत्यः । अथै॒ष भ्रातृ॑व्यदे॒वत्यो॒ यद॒न्वाहा॑र्यपच॒नस्तस्मा॑दे॒तं नाह॒रह॒राहरे॒युर्न ह॒ वा ऽअ॒स्य स॒पना॑ भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तं नाह॒रह॒राहर॑न्त्यन्वाहार्यपच॒नो वाऽए- षः ॥ ६॥ उपवसथऽए॒वैन॒माह॑रेयुः । यत्रै॒वास्मिन्द्यद्य॒त्तो भव॑न्ति॒ तन्नो॒ ह्वास्यै॒षो ऽमो॒धायाहृ॑तो भव॑ति ॥ ७॥ नवा॑वसिते वैन॒माह॑रेयुः । तस्मिन्पचेयुस्तद्ब्राह्म॒णा अ॒श्नीयु॑र्यद्यु॒ तन्न वि॒न्देद्य॒द्युचेदपि॒ गोरि॑व दु॒ग्धम॒धिश्रय॑ति॒वै ब्रूया॒त्तस्मि॑न्ब्राह्म॒णा- न्याय॑यित॒वै ब्रूया॒त्पापी॑यांसो ह वाऽअ॒स्य स॒पन्ना भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒वं
का० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २३६ स्रुवे में रह जाता है वह अग्निहोत्र का उच्छिष्ट है। जो थाली में रह जाता है वह वैसा ही है जैसा कि (गाड़ी के) घेरे में से (चावल निकालना)। यदि कोई इसे पिये तो ब्राह्मण के सिवाय अन्य न पीवे। यह अग्नि में रखा हुआ (पवित्र) है, इसलिए अब्राह्मण न पीवे ॥३६॥ अध्याय ३—ब्राह्मण २ जो कोई (यजमान) होता है उसमें ये देवते होते हैं—इन्द्र, राजा, यम, नड-नैषिध (या नैषध), अनश्नत् सांगमन, असन्पांसव ॥१॥ यह जो आहवनीय है वह इन्द्र है, जो गार्हपत्य है वह राजा यम है। यह जो अन्वाहार्य- पचन (दक्षिणाग्नि) है वह नड-नैषिध है। चूँकि प्रतिदिन दक्षिण से (अग्नि) लाते हैं, इसलिए कहते हैं कि नड-नैषिध प्रतिदिन राजा यम को दक्षिण से लाता है ॥२॥ और यह जो सभा में अग्नि है वह अनश्नत् सांगमन है। इसको अनश्नत् इसलिए कहते हैं कि लोग बिना खाये उसके पास जाते हैं। और उसमें से राख निकालकर जहाँ फेंकते हैं वह असन्पांसव है। जो इस बात को जानता है वह सब लोकों को जीतता है, सब लोकों में विचरता है और समझता है कि ये देवतागण मुझमें विद्यमान हैं ॥३॥ अब उन (अग्नियों) के उपस्थान (उपासना) के विषय में। जो सायं और प्रातः को आहवनीय के पास खड़ा होना और बैठना है यही उसकी उपासना है, और जब लौटकर गार्हपत्य के पास बैठना या लेटना है वह उसकी उपासना है, और जब (आहवनीय से) निकलकर अन्वाहार्य-पचन का स्मरण करना तथा मन में उसके पास ठहरना है वह उसकी उपासना है ॥४। और प्रातःकाल बिना खाये मुहूर्त्त-भर सभा में बैठना और यथेच्छा परिक्रमा देना है वही उसकी उपासना है। और जहाँ उसमें से लेकर भस्म डाली जाती है वहाँ ठहरना है, वही उसकी उपासना है। इस प्रकार उन देवताओं की उपासना हो गई ॥५॥ गार्हपत्य का देवता यजमान है, और अन्वाहार्य-पचन का देवता उसका शत्रु है, इसलिए (दक्षिणाग्नि को) रोज-रोज (गार्हपत्य से) नहीं ले जाना चाहिए। उसके कोई शत्रु नहीं होते । जो इस बात को जानता है उसके यहाँ इस अग्नि को रोज-रोज नहीं निकालते। यह अन्वाहार्य- पचन है ॥६॥ उपवास के दिन ही उसको लाना चाहिए जब इसमें यज्ञ करनेवाले हों, और यह (यजमान के) अमोघ (निश्चित सफलता) के लिए लाई जाती है ॥७॥ या इसको नये घर में ले जायें। उसमें पकावें और ब्राह्मणों को खिलाएँ। यदि पकाने के लिए और कुछ न मिले तो गाय के दूध को ही अग्नि पर रख दें और ब्राह्मणों को पिला दें। जिस किसी यह जाननेवाले के लिए वे ऐसा करते हैं उसके शत्रु पापी (अवनति-शील) हो जाते हैं।
२४० शतपथ ब्राह्मण
कुर्व्व॒न्ति॒ तस्मा॑दि॒वमे॒व चिकी॒र्षेत् ॥ ८ ॥ तद्य॑त्रैतत्प्रथ॒मꣳ स॒मिद्धो भव॑ति । धू॒म्यत ऽइ॑व॒ तर्हि॒ ह्येष भव॑ति रु॒द्रः स यः का॒मये॑त य॒थेमा रु॒द्रः प्र॒जा अ॒श्रद॒द्येवं॑ वत्स॒रु- से॑व स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है- वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ ९॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्त॑तरो भ॒वति॑ । त॒- र्हि॒ ह्येष भव॑ति वरु॑णः स यः का॒मये॑त य॒थेमा वरु॑णः प्र॒जा गृ॒ह्णन्नि॑व वत्स॒रुसे॑व स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒- न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १०॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्तो भव॑ति । उ॒र्ध्वर्चिः पर॒मया॒ भ्रूत्या॒ ब्बल्ब॑लीति॒ तर्हि॒ ह्येष भ॑वती॒न्द्रः स यः का॒मये॒तेन्द्र॑ इव श्रि॒या य॒- शसा॑ स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु- ॒होति॑ ॥ ११॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्रति॒तरा॒मिव । ति॒रश्ची॑वार्चिः संशा॒म्यतो॒ भव॑ति॒ तर्हि॒ ह्येष भव॑ति मि॒त्रः स यः का॒मये॑त मैत्रे॒णेद॒मन्न॑म॒द्यामि॑ति य॒माहुः सर्व॑स्य वा॒ऽअयं ब्रा॒ह्म॒णो मि॒त्रं न वा॒ऽअयं कं च॒न हि॒नस्तीति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है- वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १२॥ अथ॒ यत्रै॒तद॒ङ्गारा॒श्चाक॑श्यन्त॒ऽइव॑ । तर्हि॒ ह्येष भव॑ति ब्र॒ह्म स यः का॒मये॑त ब्रह्मवर्च॒सी स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हु- या॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १३॥ ए॒तेषामेकꣳ संवत्स- रमु॒पेत्से॑त् । स्व॒यं जु॑हुया॒दि वा॒स्यान्यो॑ जुहुया॒द्य यो॑ऽन्य॒थान्यथा जु॒होति॑ यथापो॑ वाभि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यꣳ॒ स सा॒मि नि॒वर्त्ते॑तै॒वं तद्यः सा॒र्द्धं जु॒होति॑ यथापो॑ वा- भि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यं॑ तत्त्छि॒न्द्रेऽभि॒तृन्द्यादे॒वं तत् ॥ १४॥ अ॒भ्रयो ह॒ वा॒ऽएता अ॒न्ना- द्यस्य यदा॒हुत॑यः । अ॒भि हैवैतद॒न्नाद्यं॑ तृणत्ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानग्निहोत्रं जु॒होति॑ ॥ १५॥ सा या पू॒र्वाहु॑तिः । ते दे॒वा अथ॒ योत्त॑रा॒ ते म॑नु॒ष्या अथ॒ यत्स्रुचि॒ परि॑- शिन॒ष्टि ते प॒शवः॑ ॥ १६॥ स वै कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ । भूय॑ इवो- त्त॒रां भूय॑ इव॒ स्रुचि परि॑शिनष्टि॒ ॥ १७॥ स यत्कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ ।
कां० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० ८-१८ शतपथब्राह्मण / २४१ इसलिए ऐसा ही करना चाहिए ॥८॥ जब अग्नि पहले ही जलाई जाती है और उसमें धुआँ ही निकलता है, तब यह अग्नि रुद्र होती है। जैसे रुद्र इन प्रजाओं को कभी अश्रद्धा से, कभी कड़ेपन में, कभी मारकर बरतता है, उसी प्रकार यदि कोई चाहे कि अन्न खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है। जब अग्नि अधिक प्रदीप्त हो जाती है तो वरुण हो जाती है। जैसे वरुण प्रजा को कभी पकड़कर, कभी कड़ेपन से और कभी मारकर बरसता है, इसी प्रकार यदि कोई चाहे कि मैं अन्न खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है ॥१०॥ जब अग्नि बहुत प्रज्वलित होती है और पुष्कल धुआँ चक्कर काटता हुआ ऊपर को उठता है तो यह इन्द्र हो जाती है। जो कोई चाहे कि इन्द्र के समान श्री और यश वाला हो जाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है ॥११॥ जब यह अग्नि घटती हुई शान्त-सी तिरछी जलती है तो मित्र हो जाती है। यदि कोई चाहे कि मित्रता से अन्न खाऊँ, जैसे कहा करते हैं कि अमुक ब्राह्मण मित्र है, वह किसी की हानि नहीं करता, तो वह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है वह अन्न को प्राप्त कर लेता है ॥१२॥ जब इस (अग्नि) के अङ्गारे जलते हैं तब यह ब्रह्म हो जाती है। जो चाहे कि मैं ब्रह्म- वर्चसी हो जाऊँ वह यह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है उसे अन्न की प्राप्ति हो जाती है ॥१३॥ उसको साल-भर तक इनमें से एक का सेवन करना चाहिए, चाहे स्वयं आहुति दे या किसी से दिलावे। और जो कभी किसी के और कभी किसी के लिए आहुति देता है तो वैसा ही व्यर्थ है जैसे पानी के लिए कभी यहाँ खोदे, कभी वहाँ, या अन्न के लिए और बीच में छोड़ दे। और यदि लगातार आहुति देता जाय तो ऐसा है जैसे जल या अन्न के लिए खोदता-खोदता शीघ्र प्राप्त कर ले ॥१४॥ ये जो आहुतियां हैं वे अन्न के (खोदने के) लिए अभ्रि या खुरपा हैं। जो समझकर अग्निहोत्र करता है वह अन्न की प्राप्ति करता है। जो पूर्वाहुति है वह देव है, जो पिछली है वह मनुष्य और जो स्रुक् में बच रहे वह पशु ॥१६॥ पूर्वाहुति में थोड़ा ही डालता है, पिछली में अधिक और उससे भी अधिक स्रुक् में बचा रखता है ॥१७॥ पूर्वाहुति में थोड़ा-सा इसलिए डालता है कि देव आदमियों से कम हैं। दूसरी आहुति में