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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

नाष्ट्रा रक्षाꣳस्युपोत्तिष्ठानित्यग्निर्हि रक्षासामपहन्ता तमेतया च समिधै॒तया चाहु॒- त्या॒ समिन्द्धे॒ समिद्धे दे॒वेभ्यो जुहुवानीति ॥ १३॥ अथापरं चतुर्गृहीतमाज्यं गृ- हीत्वा । आश्राव्याह समिधो यजेति सोऽपबर्हिषश्चतुरः प्रयाजान्यजति प्रजा वै बर्हि॒र्वरुण्यो वा॒ऽश्ववभृथो नेत्प्रजा वरुणो गृह्णादिति तस्मादपबर्हिषश्चतुरः प्र- याजा॒न्यजति ॥ १४॥ अथ वारुण एककपालः पुरोडाशो भवति । यो वा॒ऽश्वस्य रसो॒ऽभ्युदक्रामत्तियो वा॒ऽश्वस्य तमक्षीन्नदध्येत्तच्छरीरं तस्मिन् रसो॒ऽस्ति रसो वै पुरोडाशस्तदस्मिन्नेतꣳ रसं दधाति तदेनमेतेन रसेन संगमयति तदेनमतो जन- यति स एनं जात एव संजनयति तस्माद्वारुण एककपालः पुरोडाशो भवति ॥ १५॥ स आज्यस्योपस्तीर्य । पुरोडाशस्यावद्यन्नाह वरुणायोनुब्रूहीत्यत्र हैक ऽवभृथस्य द्विरवद्यन्ति तदु तथा न कुर्याच्छरीरं वा॒ऽएतद्वति नालमाहुत्यै द्वि- रवद्यति सकृदभिघारयति प्रत्यनक्त्यवदाने॒ऽआश्राव्याह वरु॑णं यजेति वषट्कृते जुहोति ॥ १६॥ अथाज्यस्योपस्तीर्य । पुरोडाशमवदधात्याग्नीवरुणाभ्यामनुब्रूहीति तत्स्विष्टकृते स यन्नाग्नयऽइत्याह नेदग्निं वरुणो गृह्णादिति स यद्यमुत्रा॒ऽपबर्हिष्य द्विरवद्येद्यात्र सकृद्यद्यु न नाद्रियेताथोपरिष्टाद्विराज्यस्याभिघारयत्याश्राव्याहाग्नी- वरु॑णौ यजेति वषट्कृते जुहोति ॥ १७॥ ता वा॒ऽएताः । षडाहुतयो भवन्ति ष- ड्वा॒ऽऋतवः संवत्सरस्य संवत्सरो वरुणस्तस्मात्षडाहुतयो भवन्ति ॥ १८॥ एतदा- दित्यानामयनम् । आदित्यानीमानि यजूंष्यीत्याहुः स यावदस्य वशः स्यादेवमेव चिकीर्षेद्यद्यु॒ऽएनमितरथा यजमानः कर्तवे ब्रूयादितरथो तर्हि कुर्यादेतानेव चतुरः प्रयाजानपबर्हिषो यजेद्वावाज्यभागौ वरुणमग्नीवरुणौ द्वावनुयाजावपबर्हिषौ तद्दश दशाक्षरा वै विराड्विराडु यज्ञस्तद्विराजमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ॥ १९॥ ए- तदङ्गिरसामयनम् । अतोऽन्यतरत्कृत्वा यस्मिन्कुम्भे॒ऽवभृथं भवति तं प्लावयति समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तरित्यापो वै समुद्रो रसो वा॒ऽआपस्तदस्मिन्नेतꣳ रसं दधाति

कां० ४, अ० ४, ब्रा० ५, कं० १३-२० शतपथब्राह्मण / ६२५ जिससे राक्षस उनमें से उठने न पावें। अग्नि राक्षसों का विनाशक है। समिधा से और आहुति से वह इसी अग्नि को प्रज्वलित करता है इसलिए कि 'मैं देवों के लिए आहुति दूं' ॥१३॥ अब फिर चार भागों में घी लेकर और (आग्नीध्र से) श्रौषट् कहलवाकर कहता है— 'समिधाओं की स्तुति कर।' अब वह बर्हि की आहुति को छोड़कर शेष चारों आहुतियां दे डालता है। बर्हि प्रजा है। अवभृथ वरुण का है। ऐसा न हो कि सन्तान वरुण-गृहीत हो जाय। इसीलिए बर्हि को छोड़कर शेष चार आहुतियां दे डालता है ॥१४॥ वरुण का एक कपाल का पुरोडाश बनता है। क्योंकि (सोम में) जो कुछ रस था वह तो आहुतियों के लिए निकाला जा चुका। अब जो शरीर (भाग) बच रहा उसमें रस है ही नहीं। पुरोडाश रस है। इस प्रकार उसमें रस डालता है। इस प्रकार वह उसको रस से युक्त कर देता है। इस प्रकार वह उसको रस में से उत्पन्न करता है। यह सोम उत्पन्न होकर यजमान को उत्पन्न करता है। इसलिए वरुण के लिए एक कपाल का पुरोडाश होता है ॥१५॥ वह घी चुपड़कर पुरोडाश को काटते समय कहता है—'वरुण के लिए अनुवाक पढ़।' कुछ लोग इस अवसर पर सोम के फोक के दो भाग करते हैं। परन्तु ऐसा न करे, क्योंकि यह तो खाली शरीर है। आहुतियों के लिए काफी नहीं है। वह दो टुकड़े करता है और घी चुपड़ता है, अर्थात् जहाँ-जहाँ काटा था वहाँ घी लगा देता है। श्रौषट् कहलवाकर वह कहता है— 'वरुण के लिए अनुवाक पढ़।' और वषट्कार के साथ आहुति दे देता है ॥१६॥ अब घी की एक तह लगाकर और (चमचे में) पुरोडाश के टुकड़े को रखकर कहता है कि 'अग्नि और वरुण के लिए अनुवाक कह।' यह अग्नि स्विष्टकृत् के लिए है। केवल अग्नि के लिए यों नहीं कहता कि कहीं वरुण पकड़ ले। यदि सोम के फोक के दो भाग किये हों तो एक भाग करे। न किये हों तो न सही। अब वह ऊपर की ओर दो बार घी लगाता है और श्रौषट् कहलाकर कहता है 'अग्नि और वरुण के लिए अनुवाक पढ़' और वषट्कार से आहुति दे देता है ॥१७॥ ये छः आहुतियां होती हैं। संवत्सर में छः ऋतुएँ होती हैं। संवत्सर वरुण है। इसलिए छः आहुतियाँ होती हैं ॥१८॥ यह आदित्यों का अयन है। और 'यजुः आदित्य के हैं' ऐसा कहा जाता है। (अध्वर्यु को चाहिए) कि जितना (यजमान) कहे उतना करे। यजमान अन्यथा कहे तो अन्यथा करे। बर्हि की आहुति को छोड़कर शेष चारों आहुतियाँ दे देवे। दो आज्यभाग अग्नि और अग्नि-वरुण के लिए और दो अनुयाज; बर्हि को छोड़कर। ये दस हो गये। विराट् में दस अक्षर होते हैं। यज्ञ विराट् है। इस प्रकार यज्ञ को विराट् के समान कर देता है ॥१९॥ यह अयन अंगिराओं का है। (ऊपर कही हुई दोनों विधियों में से) किसी प्रकार (आहुति देकर) जिस पात्र में फोक होता है उसको (अध्वर्यु) इस मन्त्र से पानी पर तैराता है—'समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः' (यजु० ८।२५)—'तेरा हृदय समुद्र में जलों के भीतर है।' जल समुद्र हैं। जल रस है। इस (फोक) में इस प्रकार रस रखता है। इसको इस रस से युक्त करता है। इसमें

अध्याय-५, ब्राह्मण-१

६२६ शतपथ ब्राह्मण

त॒देन॒मेते॒न रसे॑न॒ सं गमयति॒ तदेनमतो जनयति॒ स ए॒नं जा॒त ए॒व स॒न्जनयति सं वा विशन्त्वोष॑धीरु॒ताप॒ इति॒ तद॒स्मिन्नुभय॑ꣳ रसं दधाति॒ यश्चौष॑धिषु॒ यश्चाप्सु॒ यज्ञस्य॑ त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके॑ विधेम॒ यत्स्वाहेति॒ तद्य॒देव॒ यज्ञस्य॑ साधु॒ तदे॒वास्मिंस्तद्दधाति ॥ २०॥ अथा॒नुसृ॒ज्योप॑तिष्ठते । देवी॑राप ए॒ष वो॒ गर्भ॒ इत्य- पा॒ꣳ ह्येष गर्भस्तꣳ सु॒प्रीतꣳ सु॒भृतं॑ बिभृते॒ति तदेनमद्भाः परि॑ददाति गु॒प्त्यै दे॒व सोम॑ैष ते लोक इत्यापो॒ ह्येतस्य लोक॒स्तस्मिञ्छुं च॑ व॒र्द्धव॒ परि॑ च वर्द्ध्वेति॒ त- स्मिन्नः॒ शं चैधि॒ सर्वाᳵभ्यश्च न आ॒र्तिभ्यो गोपायि॒त्येवैतदाह ॥ २१॥ अथोपमार्यति । अव॑भृथ निचुम्पुण निचे॒रुर॑सि निच॒म्पुणः । अव॑ दे॒वैर्देव॒कृत॒मेनो॑ यासिष॒मव॑ म॒र्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मित्यव॒ ह्येतद्देवै॑र्देव॒कृत॒मेनो॒ऽयासीत्सोमेन॒ राज्ञाव॑ म॒र्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मि- त्यव॒ ह्येतन्मर्त्यैर्मर्त्य॒कृत॒मेनो॒ऽयासीत्पशूना पुरोडाशेन पुरुरुाणो देव रिषस्या- हीति॒ सर्वा॑भ्यो मार्तिभ्यो गोपाये॒त्येवैतदाह ॥ २२॥ अथाभ्यवेत्य स्नातः । अन्यो ऽन्यस्य पृष्ठे प्रधावतस्तावन्वे वाससी परिधायोदेतः स यथाऽहिनिर्व्वचो निर्मुच्येते- वꣳ सर्व्वस्मात्पाप्मनो निर्मुच्यते तस्मिन्न तावच्चनेनो भवति यावत्कुमारोऽदति स येनैव निष्क्रामन्ति तेन पुनरायन्ति पुनरेत्याहवनीये समिधमभ्यादधाति देवा- नाꣳ समिदसीति यजमानमेवैतया समिन्द्धे देवानाꣳ हि समिद्धिमनु यजमानः स- मिध्यते ॥ २३॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [४. ५.] ॥ ॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥ ५८ ॥ ॥ आदित्येन चरुणोदयनीयेन प्रचरति । तद्यदादित्यश्चरुर्भवति यद्देवैनामदो दे- वा अब्रुवंस्तद्वैव प्रायणीयस्त्वोदयनीय इति तमेवास्याऽ एतदुभयत्र भागं करो- ति ॥ १॥ स यदमुत्र राजानं क्रेष्यन्नुपप्रेष्यन्यज॑ते । तस्मात्तत्प्रायणीयं नामाथ यद्- त्रावभृथादुदेत्य यज॑ते तस्मादेतदुदयनीयं नाम तद्वाऽ एतत्त्समानमेव हविरादित्या ऽएव प्रायणीयमदित्याऽउदयनीयमियꣳ ह्येवादितिः ॥ २॥ स वै पथ्यामिवाग्रे स्व- स्तिं यजति । तद्देवा अप्रज्ञायमाने वाचेव प्रत्यपद्यन्त वाचा हि मुग्धं प्रज्ञायते

कां० ४, अ० ४-५, ब्रा० ५-१, कं० २०-२३ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६२७ इस रस को उत्पन्न करता है। वह (सोम) पैदा होकर इस (यजमान) को पैदा करता है। "सं त्वा विशन्त्वोषधीरुतापः" (यजु० ८।२५) - "ओषधियाँ और जल तुझसे मिलें।" इस प्रकार इसमें दोनों रसों को युक्त करता है-वह रस जो ओषधि में है और वह जो जलों में है। "यज्ञस्य त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा" (यजु० ८।२५) - "हे यज्ञपति, सूक्त पढ़ने और नमस्कार में तुझ यज्ञ की आराधना करें।" यज्ञ में जो कुछ भली बात है उसको वह उस (यजमान) में रखता है ॥२०॥ अब उस (सोम के फोक) को छोड़कर यह मन्त्र पढ़कर खड़ा होता है, "देवीरापऽ एष वो गर्भः” (यजु० ८।२६) - "हे प्रकाशयुक्त जल, यह तेरा गर्भ (बच्चा) है।" यह जलों का ही तो गर्भ है।" "तं॒ सुप्रीतं॒ सुभृतं बिभ्रत" (यजु० ८।२६) - "इसको प्रीति के साथ और अच्छी तरह उठाकर ले जाओ।" इस प्रकार वह रक्षा के लिए उसको जल के सुपुर्द कर देता है। "देव सोमैष ते लोकः" (यजु० ८।२६) - "हे सोम देव, यह तुम्हारा घर है।" जल ही तो इसका घर है। "तस्मिञ्छञ्च वक्ष्व परि च वक्ष्व" (यजु० ८।३६) -अर्थात् "इसमें तू हमको कल्याण दे और सब कष्टों से बचा" ॥२१॥ अब वह रस को इस मन्त्र से डुबो देता है - "अवभृथ निचङ्कुण निचेरुरसि निचङ्कुणः । अव देवैर्देवकृतमेनोऽयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतम्" (यजु० ८।२७) - 'हे अवभृथ, मन्द गति से जा। यद्यपि तू तेज चलनेवाला है, तो भी मन्द गति से जा। मैंने देवों की सहायता से देवों के प्रति किये हुए पाप को और मनुष्यों की सहायता से मनुष्यों के प्रति किये पाप को दूर कर दिया।" इसने वस्तुतः देवों की सहायता से अर्थात् सोम राजा के द्वारा देवकृत पाप को दूर कर दिया और मनुष्यों की सहायता से अर्थात् पशु तथा पुरोडाश के द्वारा मनुष्यकृत पाप को दूर कर दिया। "पुरूराणो देव रिषस्पाहि" (यजु० ८।२७)-'हे देव, विरुद्धफलदायी वध से तू हमको बचा।" अर्थात् सब कष्टों से हमको बचा ॥२२॥ अब यजमान और उसकी पत्नी जलों में उतरकर नहाते हैं और एक-दूसरे की पीठ मलते हैं। दूसरे कपड़े पहनकर वे बाहर आते हैं। जिस प्रकार साँप केंचुल छोड़ देता है उसी प्रकार यह सब पापों से युक्त हो जाता है। उसमें इतना पाप भी नहीं रहता जितना दाँत-शून्य बच्चे में। जिस मार्ग से ये बाहर आये थे उसी से जाते हैं। लौटकर आहवनीय में समिधा रखता है (इस मन्त्र से) "देवानाऽ समिदसि" (यजु० ८।२७) - "तू देवों की समिधा है।" इस प्रकार यजमान को प्रकाश-युक्त करता है, क्योंकि देवों के प्रज्वलित होने से यजमान भी प्रज्वलित होता है ॥२३॥ उदयनीयेष्टिः अध्याय ५-ब्राह्मण १ अब अन्तिम अदिति-सम्बन्धी चरु बनाता है। अदिति का चरु इसलिए बनाता है कि पहले कभी देवों ने उससे कहा था कि तेरी ही प्रायणीय अर्थात् पहली (Opening) आहुति होगी और तेरी ही उदनीय अर्थात् पिछली (Concluding) । इसलिए पहले और पीछे दोनों भाग उसी के होते हैं ॥१॥ उस समय सोम राजा को मोल लेने की इच्छा से जाते हुए (उपप्रैष्यन्) आहुति देता है, इसलिए इसका नाम 'प्रायणीय' पड़ा और इस समय अवभृथ से लौटकर आहुति देता है, इसलिए इसका 'उदनीय' नाम हुआ। यह आहुति तो समान ही है। प्रायणीय भी अदिति की और उदय- नीय भी अदिति की। यह पृथिवी ही अदिति है ॥२॥ पहले वह 'पथ्या-स्वस्ति' (कल्याणकारी मार्ग हो) इसकी इच्छा के लिए आहुति देता है। पहले देवों ने न जानने की दशा में वाणी से ही मार्ग को पाया था। वाणी से ही अज्ञान को

ऽथात्र॑ प्र॒जाते॑ यथापू॒र्वं क॑रोति ॥ ३॥ सोऽग्निमेव॑ प्रथ॒मं य॑जति । अथ॒ सोम॒मथ॑ स॒वि॒तार॒मथ॑ प॒थ्याꣳ स्व॒स्तिमथादि॑तिं॒ वाग्वै प॒थ्या स्व॒स्तिरिय॒मदि॑ति॒रस्या॑मेव॒ तद्दे- वा वाचं॒ प्रत्य॑ष्ठापयं॒त्सेयं॒ वाग॒स्यां प्र॑ति॒ष्ठिता॒ वद॑ति ॥ ४॥ अथ॑ मैत्रावरु॒णीं व- शाम॑नूब॒न्ध्या॒माल॑भते । स ए॒षोऽन्य एव य॒ज्ञस्ता॑यते पशुब॒न्ध ए॒व स॑मिष्टयजूꣳषि ह्येवा॒त्तो य॒ज्ञस्य॑ ॥ ५॥ तद्यन्मै॑त्रावरु॒णी व॒शा भ॑वति । यद्वाऽई॑ज्ञा॒नस्य॑ स्वि॑ष्टं भ- व॑ति मि॒त्रोऽस्य॒ तद्गृह्णा॑ति॒ यद॑स्य दुरि॑ष्टं भ॑वति वरु॑णोऽस्य॒ तद्गृह्णा॑ति ॥ ६॥ त- दाहुः । क्षेत्ता॑नो॒ऽभूदि॑ति तद्युद्देवा॒व्यात्र॑ मि॒त्रः स्वि॑ष्टं गृह्णा॑ति तद्देवास्माऽऋ॒त्या प्री॒तः प्रत्य॑वसृ॒जति॒ यड॒ चास्य॒ वरु॑णो दुरि॑ष्टं गृह्णा॑ति॒ तद्ये॒वास्मा॑ऽऋ॒त्या प्री॒तः स्वि॑ष्टं क॒रोति॒ तडु॒ चास्मै॒ प्रत्य॑वसृ॒जति॒ सोऽस्यै॒ष स्व ए॒व य॒ज्ञो भ॑वति स्वꣳ सु- कृ॒तम् ॥ ७॥ तद्यन्मै॑त्रावरु॒णी व॒शा भ॑वति । यत्र॒ वै दे॒वा रेतः॑ सि॒क्तं प्राज॑नयं- स्तदा॑ग्निमारु॒तमित्यु॑क्त्यं तस्मिंस्तद्व्याख्यायते॒ यथा॒ तद्दे॒वा रेतः॑ प्राज॑नयंस्ततो॒ऽङ्गा- राः सम॑भव॒न्नङ्गा॑रेभ्यो॒ऽङ्गि॑रस॒स्तद॒न्वन्थे प॒शवः॑ ॥ ८॥ अथ॒ यदा॑सां पाꣳस॑वः॒ पर्य॑- शिष्यन्त । ततो॒ गर्द॑भः सम॑भव॒त्तस्मा॒द्यत्र॑ पाꣳसु॒लं भ॑वति ग॑र्दभस्था॒नमिव बते- त्याड॒रथ॒ यदा॒ न कश्च॒न रसः॒ पर्य॑शिष्यत॒ तत॑ ए॒षा मै॑त्रावरु॒णी व॒शा सम॑भव॒त्त- स्मा॒देषा॒ न प्र॒जाय॑ते र॒साद्धि रेतः॒ सम्भ॑वति॒ रेत॑सः प॒शव॒स्तद्यदन्ततः॒ सम॑भव॒त्त- स्मा॒दन्तं॑ य॒ज्ञस्यानु॑वर्तते॒ तस्मा॒द्वाऽए॒षात्र॑ मैत्रावरु॒णी व॒शाव॑कॢप्ततमा भ॑वति॒ यदि॑ व॒शां न वि॒न्देद॒प्युक्षाव॒श ए॒व स्या॑त् ॥ ९॥ अथै॒तरं॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑मरीमृत्सन्त । ततो॑ वैश्वदे॒वी सम॑भव॒दथ॑ बा॒र्हस्प॒त्या सोऽन्तो॒ऽन्तो हि बृ॒हस्पतिः॑ ॥ १०॥ स यः॑ स॒हस्रं॑ वा॒ भूयो॑ वा दद्या॑त् । स ए॒ताः सर्वा॒ आ ल॑भेत॒ सर्वं॒ वै तस्या॑प्तं भव॑ति सर्वं॑ जि॒तं यः॑ स॒हस्रं॑ वा॒ भूयो॑ वा ददा॑ति॒ सर्व॑मेता ए॒वमे॒व यथा॑पू॒र्वं मै॑त्रावरु- णीमे॒वाग्रेऽथ॑ वैश्वदे॒वीमथ॑ बा॒र्हस्प॒त्यम् ॥ ११॥ अथो॒ ये दी॑र्घस॒त्रमासी॑रन् । सं- व॒त्स॒रं वा॒ भूयो॑ वा॒ तऽए॒नाः सर्वा॒ आ ल॑भेरन्त्स॒र्वं वै ते॒षामा॑प्तं भव॑ति॒ सर्वं॑ जि॒तं

कां० ४, अ० ५, ब्रा० १, कं० ३-१२ शतपथब्राह्मण / ६२६ दूर किया जाता है। अब यहाँ ज्ञान होने पर क्रमशः ठीक-ठीक कार्य करता है ॥३॥ वह पहले अग्नि के लिए आहुति देता है, फिर सोम के लिए, फिर सविता के लिए, फिर पथ्या के लिए, फिर अदिति के लिए। वाणी ही पथ्यास्वस्ति है और पृथिवी अदिति है। इसी पृथिवी पर देवों ने वाणी को स्थापित किया और उसी पर स्थापित होकर वाणी बोलती है ॥४॥ अब मित्र और वरुण के लिए अनुबन्ध्या गाय को मारते हैं।१ यह पशुबन्ध एक दूसरा ही यज्ञ है। यज्ञ का अन्त समष्टि-यजुः हैं ॥५॥ मित्र और वरुण के लिए गाय इसलिए होती है कि यज्ञ का जो स्विष्ट भाग (अच्छा, हितकर) है उसे मित्र लेता है और जो दुरिष्ट भाग है उसे वरुण लेता है ॥६॥ इस पर कुछ लोग कहते हैं कि यजमान का क्या हुआ ? उसके जिस स्विष्ट भाग को मित्र लेता है उसको वह इस गाय के द्वारा प्रसन्न होकर उसी को लौटा देता है। और इसके दुरिष्ट भाग को वरुण लेता है। उसको वह इस गाय के द्वारा प्रसन्न होकर स्विष्ट बना देता है और उसी के लिए छोड़ देता है। इस प्रकार यह यज्ञ उसका अपना ही हो जाता है, अपना ही और भलीभाँति किया हुआ (सुकृत) ॥७॥ यह गौ मित्र वरुण की इसलिए होती है कि जब देवों ने सींचे हुए वीर्य को उगाया, उसे अग्नि-मारुत उक्थ कहते हैं। उसकी व्याख्या है कि देवों ने वीर्य को कैसे उगाया। उससे अंगारे हुए, अंगारों से अंगिरस, उसके पीछे दूसरे पशु ॥८॥ अब जो राख की धूलि रह गई उससे गधा उत्पन्न हुआ। इसीलिए जब कोई धूल का स्थान (बुरा स्थान) होता है तो कहते हैं कि यह तो गधे का स्थान (गर्दभ-स्थान) है। जब कुछ भी रस शेष न रहा तो उससे मित्र और वरुण की गौ उत्पन्न हुई। इसलिए यह वशा (बन्ध्या गौ) बच्चा नहीं देती। क्योंकि रस से वीर्य होता है और वीर्य से सन्तान। चूंकि वह सबसे पीछे उत्पन्न हुई, इसलिए यह यज्ञ के अन्त में लाई जाती है। इसीलिए मित्र वरुण के लिए वशा (बन्ध्या गाय) ही ठीक है। यदि बन्ध्या गाय न मिले तो बैल ही सही ॥९॥ अब विश्वेदेवों ने यत्न किया, उससे वैश्वदेवी गाय हुई, फिर बृहस्पति-सम्बन्धी गाय। बृहस्पति अन्त है, बृहस्पति ही अन्त है ॥१०॥ यह जो हजार गायें देता है वह इन सबका आलभन करता है। जो हजार या बहुत-सी गायें दान करता है उसे सब प्रकार की जय प्राप्त हो जाती है। यह सब क्रमानुसार इस प्रकार है—पहले मित्र-वरुण की, फिर वैश्वदेव की, फिर बृहस्पति की ॥११॥ जो दीर्घ सत्र करते हैं, वर्ष-भर का या अधिक काल का, वे इन सबका आलभन करते हैं। उनकी सब इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, सब विजय मिल जाती है, जो दीर्घ सत्र को करते हैं, १. वेदों में तो गाय को बारम्बार 'अघ्न्या' कहा गया है; यह सन्दर्भ मांसाहारियों द्वारा प्रक्षिप्त है। —स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

अध्याय-५, ब्राह्मण-२

६३० शतपथ ब्राह्मण ये दी॒र्घस॒त्रमास॑ते संवत्स॒रं वा भूयो॑ वा॒ सर्व॑मेता एव॒मेव॒ यथा॒पूर्व॒म् ॥ १२॥ अ॒- थोद॑वसानी॒येष्ट्या॒ यज॑ते । स आ॒ग्ने॒यं प॒ञ्चक॑पालं पु॒रोडाशं॒ निर्व॑पति॒ तस्य॑ प॒ञ्च- पदाः प॒ङ्क्तयो॒ याज्यानुवा॒क्या भ॑वन्ति यात॒यामिव॒ वाऽए॒तद्दीक्षा॒नस्य॑ य॒ज्ञो भ॑वति॒ सो॑ऽस्मात्प॒राङि॑व॒ भव॑त्य॒ग्निर्वै सर्वे॒ य॒ज्ञा अ॒ग्नौ हि सर्वा॒न्य॒ज्ञांस्त॑न्व॒ते ये च॑ पाक- य॒ज्ञा ये चेत॑रे॒ तद्य॒ज्ञमे॒वैत॒त्पुन॒रार॑भते॒ तथा॑स्यायातयामा य॒ज्ञो भ॑वति॒ तथो॒ऽअ॑- स्मान्न प॒राङ् भव॑ति ॥ १३॥ तद्यत्प॒ञ्चक॑पालः पु॒रोडाशो॒ भव॑ति । प॒ञ्चप॑दाः प॒ङ्क्तयो॒ याज्यानुवा॒क्याः पा॒ङ्क्तो वै य॒ज्ञस्तद्य॒ज्ञमे॒वैत॒त्पुन॒रार

कां० ४, अ० ५, ब्रा० १-२, कं० १२-१६ व १-३ शतपथब्राह्मण / ६३१ वर्ष-भर के लिए या अधिक काल के लिए ॥१२॥ अब वह उदवसानीय इष्टि करता है। वह अग्नि के लिए पाँच कपालों का पुरोडाश बनाता है। उसके याज्य और अनुवाक पाँच पद की पंक्तिवाले होते हैं। इस समय यज्ञ करनेवाले का यज्ञ थक-सा जाता है, वह उससे विमुख-सा हो जाता है। अग्नि 'सब यज्ञ' है, क्योंकि अग्नि में ही सब यज्ञ किये जाते हैं चाहे पाक यज्ञ हों या अन्य। वह इसी यज्ञ को फिर लेता है। इस प्रकार यह यज्ञ थकने नहीं पाता, वह उससे विमुख नहीं होने पाता ॥१३॥ पाँच कपालों का पुरोडाश इसलिए होता है कि याज्य और अनुवाक में पाँच पद की पंक्तियाँ होती हैं और यज्ञ भी पाँचवाला है। इस प्रकार वह फिर यज्ञ को ही आरम्भ करता है। इस प्रकार यज्ञ थकता नहीं और इससे विमुख नहीं होता ॥१४॥ उसकी दक्षिणा सोना है। यह यज्ञ अग्नि का है। सोना अग्नि का वीर्य है। इसलिए सोना दक्षिणा है या बैल, यह ढोने के कारण अग्नि का है। क्योंकि इसका कन्धा ऐसा हो जाता है मानो अग्नि में जला दिया गया ॥१५॥ अब चार भाग घी लेकर विष्णु की ऋचा द्वारा आहुति देता है, "उरु विष्णो विक्रमस्वोरु क्षयाय नस्कृधि । घृतं घृतयोने पिब प्रप्र यज्ञपतिं तिर स्वाहा" (यजु० ५।३८)—"हे विष्णु, चौड़ी टाँगें बढ़ाओ। हमारे लिए खुले मकान बनाओ। हे घृतयोनि, घृत पियो और यज्ञपति की उन्नति करो।" यज्ञ विष्णु है। इस प्रकार वह यज्ञ को फिर आरम्भ करता है। इस प्रकार यज्ञ थकता नहीं और वह उससे विमुख नहीं होता। इस समय जितनी शक्ति हो उतनी दक्षिणा दे, क्योंकि यज्ञ बिना दक्षिणा के नहीं होना चाहिए ऐसा कहते हैं। जब यह उदवसानीय इष्टि समाप्त हो जाय तो सायंकाल की आहुति देता है। परन्तु प्रातःकाल की आहुति प्रातःकाल ही दी जाती है ॥१६॥ आनुबन्ध्य-यागः अध्याय ५—ब्राह्मण २ वे वशा का आलभन करते हैं और उसका आलभन करके उसे मारते हैं। मारने के बाद कहते हैं 'वपा को निकाल।' जब वपा निकल चुके तो मारनेवाले से कहना चाहिए कि गर्भ को खोजे (अर्थात् यह देखने का यत्न करे कि गाय कहीं गर्भिणी तो नहीं थी) ।१ यदि गर्भ न मिले तो अच्छा ही है। यदि मिल जाय तो इसका प्रायश्चित्त करना चाहिए ॥१॥ यह तो ठीक है नहीं कि उसको एक (अकेली गाय) मानकर ही कार्य कर डालें या उसको दो मानकर (अर्थात् गाय और उसका पेट का बच्चा) ही कार्य करें। तात्पर्य यह है कि देख-भालकर जाँच कर लेनी चाहिए और उसी के अनुसार बरतना चाहिए। अब कहे कि थाली और उष्णीष (अँगौछा या कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा) लाओ ॥२॥ अब वपा से जैसा नियम है उसी के अनुसार कृत्य करते हैं। वपा के कृत्य के पश्चात् अध्वर्यु और यजमान दोनों लौट आते हैं। अध्वर्यु कहता है कि 'गर्भ को निकाल।' क्योंकि बिना कहे तो कोई गर्भ को निकालता नहीं, जब तक कि माता रोगी न हो या मर न गई हो। या जब गर्भ पूरा हो जाता है तो जनने के समय स्वयं ही बाहर निकल आता है। उससे कहना चाहे कि १. गो-हत्या के ये बीभत्स कर्मकाण्ड सर्वथा प्रक्षिप्त हैं। — स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

६३२ शतपथ ब्राह्मण

त॒मपि॑ वि॒रुज्य॑ श्रोणी॒ प्रत्य॑ञ्चं॒ नि॒रुह्यि॒त्वै ब्रूया॑त् ॥ ३॥ तं नि॒रूह्य॑माणम॒भिम॑न्त्र- यते । ए॒जतु दश॑मास्यो॒ गर्भो॒ जरा॑युणा स॒हेति॑ स यदा॒हैज॑त्विति प्राणमे॒वास्मिन्ने॒- तद्द॑धाति दश॑मास्य॒ इति॒ यदा॒ वै गर्भः॒ समृ॑द्धो भव॒त्यथ॑ दश॑मास्य॒स्तमे॒तद्यद्द॑श- मास्यꣳ॒ सन्तं॒ ब्रह्म॑णैव॒ यजु॑षा दश॑मास्यं करोति ॥ ४॥ जरा॑युणा स॒हेति॑ । तद्यथा॑ दश॑मास्यो जरा॑युणा स॒हेया॑दे॒वमे॒तदा॑ह य॒थायं॑ वा॒युरे॑जति॒ यथा॑ समु॒द्र ए॒जतीति॑ प्रा॒णमे॒वास्मि॑न्ने॒तद्द॑धा॒त्येवायं॑ दश॑मास्यो॒ऽस्रव॑ज्जरा॑युणा स॒हेति॑ तद्यथा॑ दश॑मास्यो जरा॑युणा स॒ह स्रꣳ॑से॒तैतदा॑ह ॥ ५॥ तदा॑हुः । कथ॑मे॒तं गर्भं॑ कुर्या॒दित्य॑ङ्गादङ्गा॒द्धै- वास्या॑व॒द्येयु॒र्यथै॒वेतरे॑षामवदा॒नानाम॑वदा॒नं तडु॒ तथा॒ न कु॒र्याद॒ङ्ग क्षेपो॒ऽविकृ॑- ताङ्गो॑ भव॒त्यध॑स्तादि॒व ग्री॒वा अ॑पि॒कृत्यै॒तस्याꣳ॑ स्था॒त्यामे॒तं मेधꣳ॑ श्रोतयेयुः सर्वे॑- भ्यो वा॒ऽअस्यै॒षो॒ऽङ्गेभ्यो॒ मेध॒ श्रोत॑ति॒ तद॑स्य॒ सर्वे॑षामि॒वाङ्गा॑नामव॒त्तं भव॒त्यव॑द्य- न्ति व॒शाया॒ अव॑दानानि॒ यथै॒व तेषा॑मवदा॒नम् ॥ ६॥ तानि॑ पशुश्रप॒णे श्र॑पयन्ति । तद्वैतं॒ मेधꣳ॑ श्र॒पय॒न्त्युल्ली॑षेणा॒वेक्ष्य॒ गर्भं॒ पार्श्व॑तः पशुश्रप॒णस्यो॒पनि॑दधाति य॒दा शृ॒तो भव॒त्यथ॑ समु॒द्याव॑दाना॒न्येवा॒भिजु॑होति॒ नैतं॑ मे॒धमु॑द्वासयन्ति पशुं॒ तद्वैतं॑ मे- धमु॑द्वास॒यन्ति॑ ॥ ७॥ तं न॒घने॑न चावा॒लम॒न्तरे॑ण॒ यूपं॑ चा॒ग्निं च॒ हर॑न्ति । दक्षि॑णतो नि॒धाय॑ प्रतिप्रस्था॒ताव॑द्य॒त्यथ॒ सुचो॒रुप॑स्तृणी॒तेऽथ॑ मनो॒तायै॑ ह॒विषो॒ऽनुवा॑च॒ आ- हाव॑द्यन्ति व॒शाया॒ अव॑दानानां॒ यथै॒व तेषा॑मवदा॒नम् ॥ ८॥ अथ॑ प्र॒चर॑णीति॒ सु- ग्भ॑वति । तस्यां॑ प्रतिप्रस्था॒ता मे॒धायोप॑स्तृणी॒ति द्विर॑व॒द्यति॑ सकृ॒दभि॑घारयति प्र- त्यन॒क्त्यव॑दानि॒नोऽन्या॑नु॒वाच॒ आहा॒श्राव्या॑ह॒ प्रेष्येति॑ वषट्कृ॒तेऽध्व॒र्युर्जु॑होत्यध्व॒र्योरनु॑ होमं॑ जुहोति प्रतिप्रस्था॒ता ॥ १॥ यस्यै॑ ते य॒ज्ञियो॒ गर्भ॒ इति॑ । अय॑ज्ञिया॒ वै गर्भा॒- स्तमे॒तद्ब्रह्म॑णैव॒ यजु॑षा य॒ज्ञियं॑ करोति॒ यस्यै॒ योनि॒र्हिर॑ण्ययी॒त्यदो॒ वाऽए॒तस्यै॒ योनिं॑ वि॒न्दन्ति॒ यद॒दो नि॒ष्कर्ष॒ममृ॑त॒मायु॒र्हिर॑ण्यं॒ तामे॒वास्या॑ ए॒तदमृ॑तां॒ योनिं॑ करोत्य- ङ्गान्यु॑क्थ॒ता यस्य॑ ते॒ मात्रा॒ सम॑जीगमꣳ॒ स्वाहेति॒ यदि॑ पुमाꣳ॒स्याद्यद्यु॑ स्त्री स्या॒दङ्गा

का० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० ३-१० शतपथब्राह्मण / ६३३ चाहें जाँघें चीरना ही क्यों न पड़ें इस गर्भ को निकाल ले ॥३॥ जब वह (गर्भ) निकल आवे तो इस मन्त्र को पढ़े, "एजतु दशमास्यो गर्भः" (यजु० ८।२८)—"जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"दश मास का गर्भ जरायु के साथ स्पन्दन करे।" 'स्पन्दन करे' यह कहकर कि वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है। दश मास का इसलिए कहा कि दश मास में गर्भ पूर्णतया बढ़ पाता है। यहाँ यह दस मास का नहीं भी हो तो भी यजु० के मन्त्र पढ़कर वह उसे दस मास का कर देता है ॥४॥ 'जरायुणा सह' (यजु० ८।२८)—दस मास का बच्चा जरायु के साथ निकलता है। इसी प्रकार यह भी निकले। "यथायं वायुरेर्जति यथा समुद्र ऽ एजति" (यजु० ८।२८)—"जैसे यह वायु चलता है या जैसे यह समुद्र चलता है।" इससे वह उसमें प्राणों की स्थापना करता है(?)। "एवायँ दशमास्यो ऽ अस्रज्जरायुणा सह" (यजु० ८।२८)—"इसी प्रकार यह दश मास का जरायु के साथ बाहर निकल आया।" अर्थात्—जैसे दश मास का गर्भ जरायु के साथ निकलता है उसी प्रकार यह भी निकले ॥५॥ अब कुछ लोग पूछते हैं कि इस गर्भ का करना क्या चाहिए ? क्या इसके अंग-अंग काट डालने चाहिएँ, जैसे अन्योँ के टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं ? नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए। इसके अंग तो अभी बन नहीं पाये। गर्दन के नीचे काटकर उसका मेध थाली में टपका देवे। यह मेध सभी अंगों से टपकता है, इसलिए सभी अंगों का भाग समझा जाता है। अब वह वशा (गाय) के इसी प्रकार भाग करते हैं जैसे किये जाते हैं ॥६॥ पशुश्रपण (पशु को पकाने की अग्नि) पर उन भागों को पकाते हैं। वहीं उस मेध को भी पकाते हैं। गर्भ को अँगोछे में चारों ओर लपेटकर पशुश्रपण के पास रख देते हैं। जब पक जाता है तो उन भागों को इकट्ठा करके आहुति देते हैं (अभिजुहोति), परन्तु मेध की नहीं। अब वे पशु को निकालते हैं और मेध को भी ॥७॥ इसको चात्वाल के पीछे अग्नि और यूप के बीच में होकर ले जाते हैं। दक्षिण की ओर रखकर प्रतिप्रस्थाता (यज्ञ के भागों को) काटता है। अब दोनों स्रुचों में घी लगाता है और (होता से) कहता है कि मनोता के लिए हवि के अवसर पर अनुवाक पढ़। अब वे वशा (गाय) के टुकड़े-टुकड़े करते हैं, उसी प्रकार जैसे करने चाहिएँ ॥८॥ प्रचरणी नाम की एक स्रुक् होती है। उसमें प्रतिप्रस्थाता मेध की एक तह लगा देता है। दो भाग काटता है। एक बार घी डालता है और उन दोनों भागों को पूरा करता है। अब अनु- वाक के लिए कहता है, और श्रौषट् कहलवाकर (मैत्रावरुण से) कहता है कि अनुवाक कहलवा। वषट्कार के बाद अध्वर्यु आहुति देता है। अध्वर्यु के होम के पीछे प्रतिप्रस्थाता आहुति देता है, इस मंत्र से—॥६॥ "यस्यै ते यज्ञियो गर्भः" (यजु० ८।२६)—"तू जिसका गर्भ यज्ञ के योग्य हो गया है।" गर्भ यज्ञ के योग्य नहीं था। इसको वह मंत्र पढ़कर यज्ञ के योग्य बनाता है। "यस्यै योनिर्हिरण्ययी" (यजु० ८।२६)—"जिसकी सोने की योनि है।" पहले योनि को फाड़ा था जब उसमें से गर्भ निकाला था। सोना अमर-आयु है। इस प्रकार वह इसकी योनि को अमर बना देता हैं। "अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजीगम ँ स्वाहा" (यजु० ८/२६)—"जिसके अंग टूटे नहीं हैं उसको मैंने माता के साथ जोड़ा है।" यदि गर्भ नर हो तो ऐसा कहे और यदि गर्भ मादा हो तो

न्य॑क्ता॒ यस्ये॒ तां मात्रा॒ सम॑जीगम॒ स्वाहेति॒ यद्यु॑ऽअविज्ञातो गर्भो भव॑ति पुꣳ- स्कृ॒त्येव॑ जुहुयात्पुमाꣳसो हि गर्भा॒ अङ्गान्‍य॒क्ता यस्य॒ तं मात्रा॒ सम॑जीगम॒ स्वा- हेत्यदो वा॒ऽएतं॒ मात्रा॒ विष्वंचं॑ कुर्व्वन्ति॒ यद॒दो निष्कर्॒षन्ति॒ तमेतद॒क्षण्यैव यजु॑षा समर्द्ध्‍य मध्य॒तो य॒ज्ञस्य पुन॑र्मात्रा॒ सङ्गम॑यति ॥१०॥ अथार्द्धधुर्व्वन॒स्पतिना चरति । वन॒स्पतिनाध॒र्युश्च॑रित्वा यान्यु॑पभृत्यव॒दाना॑नि भव॑न्ति॒ तानि॒ समा॒नयमान आहा- ॒ग्नये᳖ स्वि॑ष्ट॒कृते॒ऽनुब्रूहीत्यत्या॑क्रामति प्रतिप्रस्थाता॒ स ए॒तꣳ सर्व्वमेव मेधं᳖ गृही॒ते ऽथो॒परि॑ष्टाद् द्विडावत्या॑भिघारयत्याश्राव्याह॒ प्रेष्ये॑ति वषट्कृ॒तेऽध॒र्युर्जुहोत्यध॒र्युमनु होमं᳖ जुहोति प्रतिप्रस्थाता॒ ॥११॥ पुरुद॒स्मो वि॒षुरूप॒ इन्दु॑रिति । बहुदान॒ इति ह्येतदा॒ह पुरुद॒स्म इति॒ विषुरूप॒ इति॒ विषुरूपा-इव॒ हि गर्भा॒ इन्दु॑र॒न्तर्महिमा- नमानञ्ज धीर॒ इत्य॒न्त॒र्ह्येष मातर्य॒क्तो भव॑त्येकप॒दीं द्विप॒दीं त्रिप॒दीं चतु॑ष्पदीम॒ष्टा- प॒दीं भुव॑नानु प्रथन्ता॒ꣳ॒ स्वाहेति॑ प्रथयत्ये॒वैनामेतत्स॒भूयो ह्य जयत्य॒ष्टाप॒द्येष्टा षड् चान॒ष्टाप॒द्या ॥१२॥ तदाहुः । क्वैतं गर्भं᳖ कुर्य्यादिति॒ वृक्ष॒ऽएवैन॒मुद्बध्युर॒न्तरि॑क्षाय- तना वै गर्भा॒ अन्तरि॑क्षमिवैतद्यद्वृ॒क्षस्त॒देनꣳ॒ स्वऽए॒वायत॑ने प्रतिष्ठापयति तदु॒ वा ऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे᳖द॒न्तः᳖ऽएनं मृतमुद्वास्यन्तीति तथा हैव स्यात् ॥१३॥ अप॒ एवैनम॒भ्यव॑हरेयुः । आपो॒ वाऽअ॒स्य सर्व्वस्य प्रतिष्ठा॒ तदेनम॒प्स्वेव प्रति॑ष्ठा- पयति तदु॒ वाऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे॒द॒प्स्वेव मरिष्यतीति तथा हैव स्यात् ॥१४॥ आ॒खूत्क॒रऽए॒वैनमुप॑किरेयुः । इयं वाऽअ॒स्य सर्व्वस्य प्रतिष्ठा॒ तदेनम॒स्या- मेव प्रति॑ष्ठापयति तदु॒ वाऽआहु॒र्य्य एनं॒ तत्रानुव्याहरे᳖त्क्षि॒प्रेऽस्मै मृताय श्म- शानं᳖ करिष्यन्तीति तथा हैव स्यात् ॥१५॥ प॒शु॒श्रप॒णऽए॒वैनं॑ म॒रुद्भ्यो॑ जुहुयात् । अहुतादो वै दे॒वानां᳖ म॒रुतो विड्हुतमिवावैतद्यदशान्तो गर्भं᳖ आहवनीयाद्धा॒ऽएष आहु॑तो भवति प॒शुश्र॒पणस्तस्मा॒न्न ब॒हिर्द्धा यज्ञाद्भवति॒ न प्रत्यक्षमिवार्हवनीये᳖ दे॒वानां᳖ वै म॒रुतस्त॒देनं॑ म॒रुत्स्वेव प्रति॑ष्ठापयति ॥१६॥ स ध्रुवैव समिष्टयजूꣳषि ।

का० ४, अ० ५, ब्रा० २, क० १०-१७ शतपथब्राह्मण / ६३५ 'यस्य' के स्थान में 'यस्यै' और 'तं' के स्थान में 'तां' कह दे अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्यै तां मात्रा समजीगम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६) । "यदि गर्भ में (नर-मादा का भेद) ज्ञात न हो सके तो नर मानकर ही कार्य करे क्योंकि 'गर्भ' पुंल्लिग है अर्थात् "अंगान्यह्रुता यस्य तं मात्रा समजी- गम॒ स्वाहा" (यजु० ८।२६)। पहले इसको इसकी माता से अलग किया था जब इसे माँ के गर्भ से निकाला था। अब इसको मंत्र-पाठ के द्वारा पूर्ण करके इसकी माँ से मिला देता है ॥१०॥ अब अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देता है। अध्वर्यु वनस्पति के लिए आहुति देने के पश्चात् उपभृत् में जो भाग हैं उनको मिलाकर कहता है, 'अग्नि स्विष्टकृत् के लिए अनुवाक पढ़।' अब प्रतिप्रस्थाता आता है और सम्पूर्ण मेध को लाता है। उसके ऊपर दो बार घी छोड़ता है। श्रौषट् कहलवाकर अध्वर्यु कहता है 'प्रेष्य' अर्थात् आरम्भ करो। वषट्कार के पीछे अध्वर्यु आहुति देता है। अध्वर्यु के पीछे प्रतिप्रस्थाता होम करता है—॥११॥ इस मंत्र से—"पुरुदस्मो विषरूप ऽ इन्दुः" (यजु० ८।३०)—'पुरुदस्म' का अर्थ है बहु- दान (बहुत दान करनेवाला); विषरूप का अर्थ है बहुरूप वाला, क्योंकि गर्भ कई रूपों के होते हैं। "इन्दुरन्तर्महिमानमानञ्ज धीरः" (यजु० ८।३०)—"मेधावी रस ने अपने भीतर महत्ता को धारण किया।" वस्तुतः यह गर्भ माता में स्थित हुआ। "एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीमष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ताँ स्वाहा" (यजु० ८।३०)—'एक पैर वाली, दो पैर वाली, तीन पैर वाली, चार पैर वाली, आठ पैर वाली में ये भुवन प्रसरित हों।" यह गाय की बड़ाई है। अष्टापदी न होने के स्थान में यदि अष्टापदी से आहुति दी जाय तो अधिक फल होगा॥१२॥ इस पर कुछ लोग पूछते हैं कि गर्भ का क्या किया जाय ? उसको वृक्ष पर फैला दें। गर्भ अन्तरिक्ष में स्थित रहते हैं। वृक्ष भी अन्तरिक्ष है, इस प्रकार इसकी इसी से प्रतिष्ठा हो जायगी, परन्तु इस पर लोग कहते हैं कि यदि कोई गाली दे कि वह 'इसको काटकर वृक्ष पर लटका देंगे' तो उसी के समान यह भी है ॥१३॥ इसको जल में छोड़ दें। क्योंकि जल तो इस सबकी प्रतिष्ठा है। इस प्रकार जल में इसकी स्थापना हो जाएगी। परन्तु इस पर भी लोग कहते हैं कि जैसे कोई गाली दे कि 'वह जल में डूबकर मर जाय' यह भी वैसा ही है ॥१४॥ उसको घूरे में गाड़ दें। यह पृथिवी तो सभी की प्रतिष्ठा है। इस प्रकार वह इसकी पृथिवी में स्थापना करता है। इस पर भी लोगों का कहना है कि यह भी वैसा ही होगा जैसे कोई गाली दे कि यह मर गया, इसके लिए श्मशान तैयार है ॥१५॥ पशुश्रपण में इसकी मरुतों के लिए आहुति दे देवे। देवों में मरुत् या साधारण पुरुष तो आहुति को खाते नहीं। बे-पका गर्भ तो आहुति में गिना नहीं जाता (अहुत है)। पशुश्रपण तो आहवनीय में से लिया जाता है। इस प्रकार इसका यज्ञ से बहिष्कार नहीं होगा, और न यह प्रत्यक्ष रूप में आहवनीय में डाला जाता है। मरुत् देवों के ही हैं। इस प्रकार वह इसकी मरुतों में स्थापना कर देता है ॥१६॥ समिष्ट यजुओं की आहुति के पीछे जब अंगारे कुछ शान्त हो रहे हों तो अंगोछे में गर्भ

अध्याय-५, ब्राह्मण-३

६३६ शतपथ ब्राह्मण प्रथमावाशान्तेऽङ्गारेष्वे॒तꣳ सोष्णी॒षं गर्भ॒माद॑त्ते॒ तं प्राङ् तिष्ठ॑न्जुहोति मारु॒त्यर्च्चा म॒रुतो॒ यस्य॒ हि क्षये॒ पाथा॑ दि॒वो विम॑हसः॒ स सु॑गो॒पात॑मो॒ जन॒ इति॒ न स्वा- हाकरोत्यहुतादो॒ वै दे॒वानां॑ म॒रुतो वि॒ऽहुतमिवे॑तद्य॒दस्वा॑हाकृतं दे॒वानां॒ वै म- रुतस्तदे॑नं म॒रुत्स्वे॑व प्र॑तिष्ठापयति ॥ १७॥ अथा॒ङ्गारैर॒भिस॒मूह॑ति । म॒ही द्यौः पृ॑- थिवी॑ च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिरिति ॥ १८॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [५. २.] ॥ ॥ शतम् २७०० ॥ ॥ इन्द्रो ह॒ वै षोड॒शी । तं नु स॒कृदिन्द्रं॑ भू॒तान्य॑त्यरिच्यन्त प्र॒जा वै भू॒तानि॒ ता ह्येनेन सदृग्भवमिवासुः ॥ १॥ इन्द्रो॑ ह॒ वाऽई॑क्षां चक्रे । कथं॒ न्वह॒मिदꣳ सर्व॑म- तितिष्ठेयम॒र्वागे॑व॒ यदि॒दꣳ सर्वꣳ॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्यत्त॒मगृ॑ह्णीत॒ स इ॒दꣳ सर्व॑मे॒वात्य॑तिष्ठद॒र्वागे॒वास्मादि॒दꣳ सर्व॑मभवत्सर्वं॑ ह॒ वाऽइ॒दम॑तितिष्ठत्य॒र्वागे॒वा- स्मादि॒दꣳ सर्वं॑ भवति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तं ग्र॒हं गृ॒ह्लन्ति॑ ॥ २॥ तस्मादेतदृषिणाभ्या- नूक्तम् । न ते॑ महि॒त्वमनु॑भूद॒ध द्यौर्न्य॑न्या स्फि॒ग्या क्षाम॒वस्था॒ इति॒ न ह॒ वा ऽस्यासौ॒ द्यौर॒न्यतरां॑ च॒न स्फि॒गीम॑नुबभूव॒ तथेदꣳ सर्व॑मे॒वात्य॑तिष्ठद॒र्वागे॒वा- स्मादि॒दꣳ सर्व॑मभवत्सर्वं॑ ह॒ वाऽइ॒दम॑तितिष्ठत्य॒र्वागे॒वास्मादि॒दꣳ सर्वं॑ भवति॒ य- स्यैवं वि॒दुष ए॒तं ग्र॒हं गृ॒ह्लन्ति॑ ॥ ३॥ तं वै ह॒रिव॑त्य॒र्च्चा गृ॑ह्णाति । ह॒रिव॑तीषु स्तुवते ह॒रिव॑ती॒रनु॑शꣳसति वी॒र्यं॑ वै हर॒ इन्द्रो॒ऽसुरा॑णाꣳ स॒पन्नानाꣳ सम॑वृङ्क तथो॒ऽष्वैष ए॒तद्वी॒र्यꣳ॑ हरः स॒पन्नानां॒ संवृ॑ङ्क्ते॒ तस्माद्धरिव॑त्य॒र्च्चा गृ॒ह्लाति॒ हरि॑- वतीषु स्तुवते ह॒रिव॑ती॒रनु॑शꣳसति ॥४॥ तं वाऽअनुष्टुभा गृह्णाति । गाय॒त्रं वै प्रातःसवनं त्रैष्टुभं माध्यन्दिनꣳ सवनं जागतं तृतीयसवनमथातिरिक्तानुष्टुबत्येवै- नमेतद्रेचयति तस्मादनुष्टुभा गृह्णाति ॥ ५॥ तं वै चतुःस्रक्तिना पात्रेण गृह्णाति । त्रयो॒ वाऽइ॒मे लो॒कास्तदि॒माने॒व लो॒कांस्तिसृभिः॒ स्रक्तिभिरा॒प्नोत्य॒त्ये॑वैनं॒ चतुर्थ्या स्रक्त्या॑ रेचयति॒ तस्माच्चतुःस्रक्तिना पा॒त्रेण गृ॒ह्लाति॑ ॥६॥ तं वै प्रातःसवने गृह्णी-

का० ४, अ० ५, ब्रा० २-३, कं० १७-१८ व १-७ शतपथब्राह्मण / ६३७ को लेकर पूर्वाभिमुख होकर मरुतों के लिए इस मंत्र से आहुति दे देता है, “मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः" (यजु० ८।३१) - "हे द्यौलोक के वीर मरुतो ! जिसके घर में तुम पीते हो वह सबसे अधिक सुरक्षित होता है।" इसके साथ 'स्वाहा' का उच्चा- रण नहीं होता; देवों में मरुत् (साधारण जन) आहुति दिये हुए को नहीं खाते। 'स्वाहा' के बिना जो आहुति दी जाती है वह आहुति नहीं समझी जाती। मरुत् देवों में से हैं। इस प्रकार वह इसको मरुतों के साथ प्रतिष्ठित कर देता है ॥१७॥ अब वह इसको कोयले से ढक देता है, इस मंत्र से, “मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतां नो भरीमभिः" (यजु० ८।३२, ऋ० १।२२।१३) - "बड़े द्यौ-पृथिवी इस हमारे यज्ञ को मिलावें और हमको शक्ति देनेवाले पदार्थों से पूर्ण करें" ॥१८॥ षोडशिग्रहः अध्याय ५-ब्राह्मण ३ षोडशी ग्रह इन्द्र है। एक बार भूत अर्थात् प्राणी-वर्ग इन्द्र से बढ़ गये। प्राणी ही प्रजा हैं। वे उसकी बराबरी करने लगे ॥१॥ इन्द्र ने सोचा मैं इन सबसे कैसे बढ़ सकूँ और ये सब मुझसे नीचे किस प्रकार रहें ? उसने इस ग्रह (षोडशी) को देखा और इसको ले लिया। वह इन सबसे बढ़ गया और ये सब उससे नीचे हो गये। जो इस रहस्य को समझकर इस ग्रह को ग्रहण करता है वह सबसे बढ़ जाता है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥२॥ इसीलिए तो ऋषि का वचन है- “न ते महित्वमनु भूदध द्यौर्यदन्यया स्फिग्या क्षाम- वंस्थाः” (ऋ० ३।३२।११)- "जब तू अपनी दूसरी जांघ के सहारे पृथिवी पर ठहरा तो द्यौलोक तेरी बड़ाई का अनुभव नहीं कर सका, या तेरी बड़ाई को न पहुँच सका।" वस्तुतः यह द्यौ उसकी दूसरी जांघ तक न पहुँच सका। इस प्रकार वह यहाँ की सब वस्तुओं से बढ़ गया और सब वस्तुएँ उसके नीचे हो गईं। वस्तुतः इस रहस्य को समझकर यदि जिस किसी के लिए इस ग्रह को निकालते हैं, वह सबसे बढ़ जाता है और सब उसके अधीन हो जाते हैं ॥३॥ इस ग्रह को लेते समय 'हरिवती' ऋचा पढ़ी जाती है (अर्थात् वह मंत्र जिसमें 'इन्द्र हरिवान्' का उल्लेख हो)। (उद्गाता लोग) 'हरिवती' से ही स्तुति करते हैं और होता 'हरि- वती' का ही पाठ करता है। इन्द्र ने अपने शत्रु असुरों का वीर्य अर्थात् 'हर' ले लिया। इसी प्रकार यह (यजमान) भी अपने शत्रुओं के 'हर' को छीन लेता है। इसीलिए वह 'हरिवान्' वाली ऋचा से ग्रह को लेता है। हरिवान् की स्तुति होती है और हरिवती ऋचाओं का ही (उद्गाता लोग) पाठ करते हैं ॥४॥ वह इसको अनुष्टुभ् छन्द से लेता है। प्रातःसवन गायत्री का है, दोपहर का सवन त्रिष्टुभ् का, तीसरा सवन जगती का। अनुष्टुभ् इन सबके ऊपर है। इसी प्रकार इस ग्रह को भी सबके ऊपर रखता है। इसीलिए इसको अनुष्टुभ् छन्द से ग्रहण करता है ॥५॥ उसको चौकोर पात्र में लेता है। ये लोक तीन हैं। तीन कोनों से वह तीन लोकों का ग्रहण करता है। चौथे कोने से वह इस सोने को सबके ऊपर स्थापित करता है। इसलिए वह इसके चौकोर पात्र लेता है ॥६॥ इसको प्रातःसवन के आग्रयण के लेने के पीछे लेना चाहिए। प्रातःसवन में लेने के पश्चात्

अध्याय-५, ब्राह्मण-४

६३८ शतपथ ब्राह्मण या॒त् । आ॒ग्रय॒णं गृ॒हीत्वा॒ स प्रा॒तःस॒वने॒ गृही॒त ऐत॒स्मात्कालादुपशेते॒ तदे॒नाग् सर्वा॑णि सव॒नान्यति॑रिक्थति॑ ॥७॥ माध्य॑न्दिने वैना॑ग् सव॑ने गृह्णीयात् । आग्रयणं गृ॒हीत्वा॒ सोऽए॒षा मीमाग्॒सैव प्रा॒तःस॒वन॒ऽएवैने॑ गृह्णीयादाग्रयणं गृहीत्वा स प्रा- तःस॒वने॒ गृही॒त ऐत॒स्मात्कालादुपशेते॑ ॥८॥ अथातो गृह्णात्येव । आति॑ष्ठ वृत्र- ह॒न्रथं॑ यु॒क्ता ते॒ ब्रह्म॑णा॒ हरी॑ । अ॒र्वाची॒नग् सु॑ ते॒ मनो॒ ग्रावा॑ कृणोतु वग्गुना । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन॒ऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा षोडशिन॒ऽइति॑ ॥९॥ अनू॑पा वा । यु॒ङ्क्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा । अथा॑ न इन्द्र सोमपा गि॒रामु॑पश्रु॒तिं च॑र । उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन॒ऽए॒ष ते॒ यो- नि॒रिन्द्रा॑य वा षोडशिन॒ऽइति॑ ॥१०॥ अथैत्य स्तोत्र॒मुपा॑करोति । सोमो॒ऽत्य॑रे- च्युपावर्त॑ध॒मित्यत्ये॒वैन॑मे॒तद्रे॑चयति॒ तं वै पु॒रास्त॑मया॒दुपा॑करोत्य॒स्तमि॑ते॒ऽनुश॑ग्ंसति तदे॑नेनाहोरा॒त्रे संद॑धाति॒ तस्मा॑त्पु॒रास्त॑मया॒दुपा॑करोत्य॒स्तमि॑ते॒ऽनुश॑ग्ंसति ॥११॥ ब्राह्मणम् ॥४ [५. ३.] ॥ ॥ सर्वे॑ ह॒ वै देवाः॑ । अग्रे॑ सदृशा आसुः सर्वे॑ पुण्या॒स्तेषाग् सर्वे॑षाग् सदृशानाग् सर्वे॑षां पु॒ण्यानां॒ त्रयो॑ऽकामयन्तातिष्ठावानः स्याम॒ित्यग्नि॒रिन्द्रः॒ सूर्यः॑ ॥१॥ ते॒ऽर्चन्तः॑ श्रा॒म्यन्त॑श्चेरुः । त॒ऽएतानतिग्राह्यान्ददृशुस्तानत्यगृह्णत तद्यदेनानत्यगृह्णत तस्मा- द॑तिग्राह्या॒ नाम॒ तेऽति॑ष्ठावानोऽभव॒न्यथैत॒ऽएतदति॑ष्ठेवातिष्ठेव ह॒ वै भ॑वति॒ य- स्यै॒वं वि॒दुष एतान्य॒हान्गृह्णन्ति॑ ॥२॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ऽग्नौ वर्च॑ आस । यदि॒द- म॒स्मिन्वर्चः॒ सो॑ऽकामय॒तेदं मयि॒ वर्चः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ त- तो॒ऽस्मि॑न्ने॒तद्वर्च॑ आस ॥३॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ऽइन्द्र॒ऽओज॑ आस । यदि॒दम॒स्मि- न्नोजः॒ सो॑ऽकामय॒तेदं मय्योजः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ ततो॒ऽस्मि- न्नै॒तदोज॑ आस ॥४॥ नो ह॒ वा॒ऽइदमग्रे॒ सूर्ये॒ भ्राज॑ आस । यदि॒दम॒स्मिन्भ्राजः॒ सो ऽकामय॒तेदं मयि॒ भ्राजः॑ स्या॒दिति॒ स ए॒तं ग्र॒हम॑पश्य॒त्तम॑गृह्णीत॒ ततो॒ऽस्मि॑न्ने॒तद्भ्राज॑

का० ४, अ० ५, ब्रा० ३-४, कं० ७-११ व १-५ शतपथब्राह्मण / ६३६ इस समय से रक्खा ही रहता है। इस प्रकार वह इसको सब सबनों से बढ़ा देता है ॥७॥ या आग्रयण के लेने के पीछे दोपहर के सबन में इसको लेवे। यह तो मीमांसा मात्र है। लेना तो प्रातःसवन में ही चाहिए, आग्रयण के पश्चात् । वह प्रातःसवन में लिये जाने के पश्चात् रक्खा ही रहता है ॥८॥ वह उसमें से इस मंत्र से लेता है-"आतिष्ठ वृत्रहन्त्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी। अर्वाचीनँ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने" (यजु० ८।३३, ऋ० १।८४।३)-"हे वृत्र को मारनेवाले, रथ पर चढ़। तेरे घोड़े मंत्रों द्वारा जोत दिये गए। पत्थर (सोम पीसने का) अपने शब्द द्वारा तेरे मन को इधर खींचे। तू आश्रय के लिए लिया गया है षोडशी इन्द्र के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। इन्द्र षोडशी के लिए तुझको" ॥६॥ या इस मंत्र से-"युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषण। कक्ष्यप्रा। अथा न ऽ इन्द्र सोमपा गिरा- मुपश्रुतिं चर। उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा षोडशिन ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वा षोडशिने" (यजु० ८।३४, ऋ० १।१०।३) -"बड़े केशवाले, प्रबल और लगामवाले घोड़ों को जोतो। हे सोम या इन्द्र ! हमारी वाणी सुनने के लिए यहाँ आ। तू आश्रय के लिए लिया गया है इन्द्र षोडशी के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। तुझको इन्द्र षोडशी के लिए" ॥१०॥ अब लौटकर स्तोत्र पढ़ता है, 'सोम सबके ऊपर हो गया। लौट आओ।' वस्तुतः वह इसे ऊपर बढ़ा देता है (षोडशी ग्रह के द्वारा) । सूर्यास्त से ही पढ़ता है। सूर्यास्त के पीछे शस्त्र पढ़ा जाता है। वह सूर्यास्त से पहले इसको पढ़ता है और सूर्यास्त के पीछे शस्त्र-पाठ करता है। इस प्रकार वह रात और दिन को मिला देता है ॥११॥ अतिग्राह्या ग्रहाः अध्याय ५-ब्राह्मण ४ पहले सब देव एकसमान थे। सब भले थे। उन सब एक-से और पुण्य-देवों में से तीन अर्थात् अग्नि, इन्द्र और सूर्य ने चाहा कि हम बढ़ जावें ॥१॥ वे पूजा और श्रम करते रहे। उन्होंने इन अतिग्राह्य (ग्रहों) को देखा और उनको (अति + ग्रह) अधिक निकाल लिया। इसलिए इनका नाम 'अतिग्राह्य' पड़ा। वे बढ़ गये जैसे कि अब तक बढ़े हैं। जो कोई इस रहस्य को समझकर इन 'अतिग्राह्य' ग्रहों को निकालता है वह बढ़ जाता है ॥२॥ अग्नि में पहले वह तेज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें तेज हो जाय । उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें यह तेज आ गया ॥३॥ इन्द्र में पहले वह ओज नहीं था जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय । उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें ओज है ॥४॥ सूर्य में पहले वह चमक न थी जो अब है। उसने चाहा कि मुझमें यह चमक आ जाय। उसने इस ग्रह को देखा और अपने लिए निकाल लिया। तब से उसमें चमक है। वस्तुतः इस

६४० शतपथ ब्राह्मण आसितानि ह वै तेजाग्ꣳस्येतानि वीर्याण्यात्मन्धत्ते यस्यैवं विदुष एतान्यहान्गृह्य- न्ति ॥५॥ तान्वै॒ प्रातःसवने गृह्णीयात् । आग्रय॒णं गृहीत्वा॒त्मा वा॒ऽआग्रय॒णो ऽङ्ग॒ वा॒ऽइ॒दमात्मन॒ एकैकमतिरिक्तं॒ क्लोमहृदयं॒ यद्य॒वत् ॥६॥ माध्यन्दिने वैनान्त्सव॒- ने गृह्णीयात् । उ॒क्थं गृहीत्वोपाकरिष्यन्वा पूतभृतोऽयग्ꣳ ह॒ वा॒ऽअग्ने॒योषो॒ऽनि- रुक्त आत्मा यदुक्थ्यः सो॒ऽएषा॒ मीमाग्ꣳसै॒व प्रातःसवन॒ऽए॒वैना॒न्गृह्णीयादाग्रय॒णं गृहीत्वा॒ ॥७॥ ते मा॒हेन्द्र॒स्यैवानु॒ होमग्ꣳ हूयन्ते । एष वा॒ऽइन्द्रस्य निष्केवल्यो ग्रहो॒ यन्माहेन्द्रो॒ऽप्यस्यैतन्निष्केवल्यमेव॒ स्तोत्रं॒ निष्केवल्यग्ꣳ शस्त्रमिन्द्रो॒ वै यज॒- मानो यजमानस्य वा॒ऽएते॒ कामाय गृह्यन्ते तस्मान्माहेन्द्रस्यैवानु॒ होमग्ꣳ हूयन्ते ॥८॥ अथातो गृह्णात्येव॒ । अग्ने॒ पव॑स्व स्व॒पा अ॒स्मे वर्चः॑ सु॒वीर्य॑म् । दध॒द्रयिं म॑- यि॒ पोष॑म् । उपयामगृहीतोऽस्यग्नये त्वा वर्चस॒ऽएष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे ॥९॥ उत्ति॑ष्ठन्नो॒ सा । सह॑ पी॒वी शिप्रै॒ऽअवे॑पयः । सोम॑मिन्द्र चमू॒सुतम्॑ । उपया- मगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौजस॒ऽएष ते योनिरिन्द्राय त्वौज॑से ॥१०॥ अदृ॑श्रमस्य केत॒- वो॒। वि र॒श्मयो॒ जना॑ग्ꣳ अनु॑ । भ्राज॑न्तो अ॒ग्नयो यथा । उपयामगृहीतोऽसि सू- र्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजायेति ॥११॥ तेषां भक्षः । अग्ने व- र्चस्विन्वर्चस्वाग्ꣳस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासमिन्द्रौजस्विन्नौजस्त्वाग्ꣳस्त्वं देवे- ष्वस्यौजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासग्ꣳ सूर्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासमित्येतानि ह वै भ्राजाग्ꣳस्येतानि वीर्याण्यात्मन्धत्ते यस्यैवं विदुष एतान्यहान्गृह्णन्ति ॥१२॥ तान्वै पृष्ठ्ये षडहे गृह्णीयात् । पूर्वे त्र्यह॒ऽआग्नेयमेव प्रथमेऽहन्नेन्द्रं द्वितीये सौर्यं तृतीयऽएवमेवान्वहम् ॥१३॥ तानु॒ हैकऽउत्तरे त्र्यहे गृह्णन्ति । तत्तथा॒ न कुर्यात्पूर्व॒ऽएवैनांस्त्र्यहे गृह्णीयाद्यद्युत्तरे त्र्यहे गृह्णी- यात्स्यात्पूर्व॒ऽएवैनांस्त्र्यहे गृहीत्वायोत्तरे त्र्यहे गृह्णीयादेवमेव यथापूर्वं विष्वञ्चिति सर्वपृष्ठऽएकाह॒ऽएव गृह्यन्ते ॥१४॥ ब्राह्मणम् ॥५ [५.४.]॥ ॥

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ६४१ रहस्य को समझकर जिसके लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं वह इन तेज, पराक्रमोंवाला हो जाता है ॥५॥ इनको प्रातःसवन में लेना चाहिए, आग्रयण ग्रह को लेने के पीछे। आग्रयण आत्मा है। अन्य इसके एक-एक करके अतिरिक्त अंग हैं जैसे क्लोम (फेफड़े) और हृदय तथा अन्य ॥६॥ या इन ग्रहों को दोपहर के सवन में पूतभृत् में से लेना चाहिए, उक्थ्य ग्रह को लेने के पीछे अथवा स्तोत्र पढ़ने के समय (उपाकरिष्यन्) । उक्थ्य इसका अनिरुक्त आत्मा है। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। वस्तुतः इसको आग्रयण के पीछे प्रातःसवन में ही लेना चाहिए ॥७॥ माहेन्द्र ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है। यह जो माहेन्द्र ग्रह है, इन्द्र का निष्के- वल्य (अकेला या अपना निज का) ग्रह है। इसी प्रकार स्तोत्र तथा शस्त्र भी इन्द्र के अपने निज के (निष्केवल्य हैं।) यजमान इन्द्र है, उसी के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं। इसलिए माहेन्द्र ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है ॥८॥ इन ग्रहों को इस प्रकार निकालता है (पहला इस मंत्र से)-"अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् । उपयामगृहीतोऽस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे" (यजु० ८।३८, ऋ० ६।६६।२१)- "हे अग्नि, अपने कार्य में दक्ष, तू पवित्र हो, मुझे तेज और पराक्रम दे। धन और पुष्टि दे। तू आश्रय के लिए लिया गया है अग्नि के लिए तुझे, तेज के लिए। यह तेरी योनि है। अग्नि के लिए तुझको, तेज के लिए तुझको" ॥९॥ दूसरा इस मंत्र से-"उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे ऽ अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ।" उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौ जस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे" (यजु० ८।३६, ऋ० ८।७६।१०) "हे इन्द्र ! अपने ओज के साथ ग्रह में निकाले हुए सोम को इस प्रकार पिया है कि ठोढ़ी आदि काँप गए हैं। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र के लिए ओज के साथ। यह तेरी योनि है। तुझे इन्द्र के लिए, ओज के लिए" ॥१०॥ तीसरा इस मंत्र से- "अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँर ऽ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा । उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय" (यजु० ८।४०, ऋ० १।५०।३) - "जैसे तेजयुक्त अग्नियां दिखाई देती हैं उसी प्रकार इसके केतु और रश्मियां चमकें। तुझे आश्रय के लिए लिया गया। सूर्य के लिए तुझको, चमकनेवाले के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको" ॥११॥ अब सोम-पान इस प्रकार है (पहला) - "अग्ने वर्चस्विन् वर्चस्वांस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।३८) - "हे वर्चस्वी अग्नि ! तू देवों में वर्चस्वी है। मैं मनुष्यों में वर्चस्वी हो जाऊं।" (दूसरा) - "इन्द्रौजस्वीञ्जिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।३६) - "हे ओजवाले इन्द्र ! तू देवों में ओजवाला है। मैं मनुष्यों में ओजिष्ठ हो जाऊँ।" (तीसरा) - "सूर्य्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।४०) - "हे तेजयुक्त सूर्य ! तू देवों में तेजयुक्त है। मैं मनुष्यों में तेजयुक्त हो जाऊँ।" इस रहस्य को जाननेवाले जिस मनुष्य के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं उसके लिए ये ऋत्विज् उसमें तेज और पराक्रम की स्थापना करते हैं ॥१२॥ इनको पृष्ठ्य षडह (छः दिन षडह होता है) के पहले तीन दिनों में निकालना चाहिए, अर्थात् अग्नि का पहले दिन, इन्द्र का दूसरे दिन और सूर्य का तीसरे दिन। इस प्रकार एक-एक प्रतिदिन ॥१३॥ कुछ लोग इनको पिछले तीन दिन में निकालते हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए। इनको पहले तीन दिन में ही निकालना चाहिए। यदि पिछले तीन दिनों में ही निकालने की इच्छा हो तो पहले इनको पहले तीन दिन में निकाल ले और फिर पिछले तीन दिन में। 'विश्वजित् सर्व- पृष्ठ' में ये तीनों ग्रह यथाक्रम एक ही दिन में निकाले जाते हैं ॥१४॥

अध्याय-५, ब्राह्मण-५

६४२ शतपथ ब्राह्मण ए॒ष वै प्र॒जाप॑तिः । य ए॒ष य॒ज्ञस्ताय॑ते॒ यस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः प्र॒जाता ऋ॒त्विजा- ये॒तर्ह्य॑नु प्र॒जाय॑न्ते ॥ १॥ उपा॑ꣳशुपा॒त्रमे॒वान्व॒जाः प्र॒जाय॑न्ते । तद्धै तत्पु॒नर्य॒ज्ञे प्र- युज्य॑ते॒ तस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः पुन॑रभ्या॒वर्तं॑ प्र॒जाय॑न्ते ॥ २॥ अ॒न्तर्या॑मपा॒त्रमे॒वान्वव॑यः प्र॒जाय॑न्ते । तद्धै तत्पु॒नर्य॒ज्ञे प्र॒युज्य॑ते॒ तस्मा॑दि॒माः प्र॒जाः पुन॑रभ्या॒वर्तं॑ प्र॒जाय॑न्ते ॥ ३॥ अथ॒ यदे॒तयो॑रु॒भयोः॑ । स॒ह स॒तो रु॒पा॑ꣳशुं पूर्वं जु॒होति॒ तस्मा॑त् स॒ह स॒तोऽजा॑वि- क॒स्योभ॑यस्यैवा॒जाः पूर्वा॒ यन्त्यनूचो॒ऽवयः॑ ॥ ४॥ अथ यदुपा॑ꣳशुं हु

कां० ४, अ० ५, ब्रा० ५, कं० १-१२ शतपथब्राह्मण / ६४३ अध्याय ५-ब्राह्मण ५ यह जो यज्ञ किया जाता है यही प्रजापति है जिससे प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं या अब तक उत्पन्न होती हैं ॥१॥ उपांशु पात्र के पीछे बकरियां लाई जाती हैं। इस उपांशु पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः-पुनः होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥२॥ अन्तर्याम पात्र के पीछे भेड़ें लाई जाती हैं। इस अन्तर्याम पात्र का प्रयोग यज्ञ में पुनः- पुनः होता है। इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं ॥३॥ अब चूंकि इन दोनों पात्रों के होते हुए उपांशु की आहुति पहले दी जाती है, इसी प्रकार बकरियों और भेड़ों के साथ होते हुए बकरियाँ आगे चलती हैं, भेड़ें पीछे ॥४॥ अब चूंकि उपांशु की आहुति देकर उसको ऊपर से पोंछते हैं, इसलिए जिस प्रकार तेज (गाड़ी के) आरे ऊपर को चलते हैं इसी प्रकार ये बकरियाँ भी बड़ी तेजी से चढ़ जाती हैं ॥५॥ और चूंकि अन्तर्याम की आहुति देकर उसको नीचे से पोंछते हैं, इसलिए भेड़ें नीचे को सिर करके चलती हैं मानो खोद रही हैं। ये बकरियाँ और भेड़ें प्रजापति के सबके प्रत्यक्ष नमूने हैं। इसलिए वर्ष में तीन बार बच्चा देती हैं और दो या तीन बच्चे देती हैं ॥६॥ शुक्र पात्र के पीछे मनुष्य लाये जाते हैं। चूंकि इस पात्र का यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग होता है, इसलिए प्रजा भी पुनः-पुनः लाई जाती हैं। शुक्र वही है जो तपता है (अर्थात् सूर्य); यही इन्द्र है। मनुष्य पशुओं में इन्द्र है। इसलिए यह उनके ऊपर राज्य करता है ॥७॥ ऋतु-पात्र के पीछे एक खुरवाले (पशु) लाये जाते हैं। चूंकि यज्ञ में इस पात्र का प्रयोग फिर-फिर होता है, इसलिए ये प्रजा भी फिर-फिर लाई जाती हैं। ऋतु-पात्र ऐसा होता है (हाथ से बताकर) और एक खुरवाले पशुओं का सिर भी ऐसा होता है। आग्रयण पात्र, उक्थ्य पात्र और आदित्य पात्र—इन पात्रों के पीछे गायें लाई जाती हैं। इन सबका यज्ञ में पुनः-पुनः प्रयोग होता है, इसलिए प्रजायें बार-बार लाई जाती हैं ॥८॥ चूंकि बकरियाँ कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए ये साल में तीन बार बच्चा देती हैं और दो या तीन बच्चे होते हैं, और कनिष्ठ होते हैं, क्योंकि ये कनिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती हैं ॥९॥ और गायें चूंकि भूयिष्ठ (पुष्कल) पात्रों के पीछे लाई जाती हैं, इसलिए साल में एक बार एक ही बच्चा देकर भी वे पुष्कल होती हैं, क्योंकि भूयिष्ठ पात्रों के पीछे लाई जाती हैं ॥१०॥ अब द्रोण कलश में अन्त को हारियोजन ग्रह निकालता है। द्रोण कलश प्रजापति है। यह इन्हीं प्रजाओं का रूप हो जाता है। इनकी रक्षा करता है। इनको सूंघता है। यह इनको उत्पन्न करता है अर्थात् इन्हीं का-सा रूप हो जाता है ॥११॥ ये पात्र पाँच हैं जिनके अनुसार प्रजायें लाई जाती हैं—उपांशु और अन्तर्याम (मिलकर)