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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

२१६ शतपथ ब्राह्मण द्यामृता॑ भू॒त्वास्त॑र्य्या भूत्वा॒ स्त॒र्य्या॑त्सप॒त्नान्मर्त्या॑न॒भिभ॑विष्याम॒ इति॑ ॥ १०॥ ते॒ हो- चुः । उ॒भये॑षु॒ वै नो॒ऽयम॒ग्निः प्र॒ लेवा॒सुरे॑भ्यो ब्रवा॒मेति॑ ॥ ११॥ ते॒ होचुः । आ॒ वै व॒यम॒ग्नी धा॑स्यामहे॒ऽथ यूयं॒ किं क॑रिष्य॒थेति॑ ॥ १२॥ ते॒ होचुः । अथैनं॒ वयं॒ न्ये॑व धास्यामहे॒ऽत्र तृणा॑नि दहा॒त्र दारू॑णि दहा॒त्रौद॑नं पचा॒त्र मां॒सं प॑चेति॒ स यं त- म॒सुरा॒ न्यद॑धत तेना॒न्ने॑न मनु॒ष्या॑ भुञ्जते ॥ १३॥ अथैनं देवाः। अन्त॑रा॒त्मन्नाद॑धत त॒ऽऽए॒तदमृ॑तमन्त॒रात्म॒न्नाधा॒यामृता॑ भू॒त्वास्त॑र्य्या भूत्वा स्त॒र्य्या॑त्सप॒त्नान्मर्त्या॑न॒भ्यभ॑वँस्त- थो॒ऽए॒वैष॑ ए॒तदमृ॑तमन्त॒रात्म॒न्नाध॑त्ते॒ नामृ॑तत्व॒स्याशा॑स्ति॒ सर्व॒मायु॑रेत्यस्त॑र्य्यो ह्येव॑ भ- वति॒ न ह्ये॑नं॒ सप॑त्नस्तू॒र्ण्ण॑मा॒णाश्चन॑ स्तृणु॒ते तस्माद्यदासिक्तामिश्रान्नासिक्तामिश्र स्पर्धेता॑ऽऽसिक्तामिश्रे॒वाभिभ॑वत्यस्तर्य्यो हि खलु॒ स॒ तर्हि॑ भवत्य॒मृतः॑ ॥ १४॥ त- म॒त्रिन॒महो म॑न्यन्ति । तज्जा॒तम॑भि॒प्राणि॑ति प्रा॒णो वा॒ऽअग्नि॑रा॒त्मन्ने॒वैन॑मे॒तत्सं॑ ज- नयति॒ स पुन॑रपानिति॒ तदे॑नमन्त॒रात्म॒न्नाध॑त्ते॒ सो॒ऽस्यैषो॒ऽन्त॒रात्म॒न्नग्नि॒राहि॑तो भ- वति ॥ १५॥ तमु॒हैष्य समि॑न्द्धे । इ॒ह य॒क्ष्य॒ऽइ॒ह सु॑कृ॒तं क॑रिष्यामी॒त्येवैन॑मे॒तत्सं॑- मिन्द्धे॒ यो॒ऽस्यैषो॒ऽन्त॒रात्म॒न्नग्नि॒राहि॑तो भव॑ति ॥ १६॥ अन्त॑रेणागाद्यद्य॒द्विति॑ । न॒ ह वा॒ऽअ॒स्यैत॑ क॒श्चनान्तरे॑णेति॒ याव॒ज्जीव॑ति॒ यो॒ऽस्यैषो॒ऽन्त॒रात्म॒न्नग्नि॒राहि॑तो भव॑- ति॒ तस्मा॑दु॒ तन्नाद्रि॑येत॒ यद॑नुग॒हेन्न॒ ह वा॒ऽअ॒स्यैषो॒ऽनु॑गच्छति॒ याव॒ज्जीव॑ति॒ यो॒ऽस्यै- षो॒ऽन्त॒रात्म॒न्नग्नि॒राहि॑तो भव॑ति ॥ १७॥ ते वा॒ऽए॒ते प्रा॒णा ए॒व यद॒ग्नयः॑ । प्रा॒णो- दा॒नावे॒वाह॑वनीयश्च गा॒र्हप॑त्यश्च व्या॒नो॒ऽन्वा॑हार्य्यपचनः ॥ १८॥ तस्य॒ वा॒ऽए॒त- स्या॒ग्न्याधे॑यस्य । स॒त्यमै॒वोप॑चारः स॒ यः स॒त्यं वद॑ति यथा॒ग्निं स॒मिद्धं॒ तं घृते॑ना- भिषिञ्चेदे॒वं हैनं॒ स उ॒द्दीप॑यति॒ तस्य॒ भूयो॑-भूय ए॒व तेजो॑ भवति श्वः॑-श्वः॑ श्रे- यान्भव॒त्यथ यो॒ऽनृतं॒ वद॑ति यथा॒ग्निं स॒मिद्धं॒ तमु॒दके॑नाभिषिञ्चेदे॒वं हैनं॒ स श॑- मयति॒ तस्य॒ कनी॑यः-कनीय ए॒व तेजो॑ भवति श्वः॑-श्वः॑ पापी॑यान्भवति॒ तस्मा॑दु स॒त्यमे॒व व॑देत् ॥ १९॥ तदु॒ ह्या॒यस्थूणा॒मौप॑वेशिं ज्ञा॒तय॑ ऊचुः । स्थवि॑रो वा॒ऽअ-

का० २, अ० २, ब्रा० २, कं० १०-२० शतपथब्राह्मण / २१७ आत्म के भीतर रख लेंगे और अमर और अजेय हो जायेंगे तो हम अपने जीतने के योग्य शत्रुओं पर विजय पा लेंगे' ॥१०॥ उन्होंने कहा, 'यह अग्नि हम दोनों के पास है। इसलिए असुरों से खुल्लमखुल्ला कहें ॥११॥ उन्होंने कहा, 'हम दोनों अग्नियों का आधान करेंगे। तब तुम क्या करोगे' ? ॥१२॥ उन्होंने कहा, 'हम इसका आधान करेंगे और कहेंगे, यहाँ तिनकों को जला, यहाँ लकड़ियों को जला, यहाँ भात पका, यहाँ माँस पका।' असुरों ने जिस अग्नि का आधान किया, यह वही है जिससे मनुष्य खाना पकाते हैं ॥१३॥ तब देवों ने इस अग्नि को अपने अन्तरात्मा में धारण किया और इसको अपने अन्तरात्मा में धारण करके अमर और विजयी हो गये तथा अपने जीतने योग्य असुर मर्त्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली। इसी प्रकार यह (यजमान) भी अपनी अन्तरात्मा में इस अमर अग्नि को धारण करता है, और यद्यपि उसे अमर होने की आशा नहीं होती, वह पूर्ण आयु को प्राप्त होता है क्योंकि वह अजेय हो जाता है और उसका शत्रु उस पर विजय पाना चाहता है, परन्तु विजय पा नहीं सकता। और इसलिए जब एक आहिताग्नि और अनाहिताग्नि परस्पर झगड़ते हैं तो आहिताग्नि अनाहिताग्नि को जीत लेता है, क्योंकि ऐसा करने से वह अवश्य ही दुर्जय और अमर हो जाता है ॥१४॥ अब जब (अग्नि को) मथते हैं, तो उस उत्पन्न हुए (अग्नि) को (यजमान) फूंकता है। प्राण ही अग्नि है। मानो उस पैदा हुए को वह पैदा करता है। अब वह (यजमान) साँस को भीतर खींचता है। इस प्रकार वह (अग्नि को) अपने अन्तरात्मा में धारण करता है और वह अग्नि उसके अन्तरात्मा में स्थापित हो जाती है ॥१५॥ उसको जलाकर उद्दीप्त करता है—'इससे यज्ञ करूँगा। इससे शुभ कर्म करूँगा।' इस प्रकार वह उस अग्नि को उद्दीप्त करता है जो उसके अन्तरात्मा में स्थापित होती है ॥१६॥ (कुछ लोगों को भय है कि) कोई विघ्न बीच में आ जाय या अग्नि बुझ जाय ! परन्तु जीवन-पर्यन्त कोई उसके और अग्नि के बीच में नहीं आ सकता जिसके अन्तरात्मा में अग्नि स्थापित रहती है। इसलिए उसे भय न करना चाहिए। और बुझने के विषय में—जब तक वह जीता है वह अग्नि नहीं बुझ सकती जो उसके अन्तरात्मा में स्थापित रहती है ॥१७॥ ये जो अग्नियां है वे प्राण ही हैं। आहवनीय प्राण है। गार्हपत्य उदान है। अन्वाहार्यपचन अग्नि व्यान है ॥१८॥ इस अग्न्याधेय का उपचार (सेवा) सत्य है। जो कोई सच बोलता है मानो वह अग्नि पर घी छिड़कता है। क्योंकि उससे वह उसको प्रज्वलित करता है। उसका दिन-प्रतिदिन तेज बढ़ता है। दिन-प्रतिदिन उसका कल्याण होता है। और जो कोई झूठ बोलता है मानो वह जलती आग पर पानी डालता है क्योंकि वह इस प्रकार उसको कमज़ोर करता है। दिन-प्रतिदिन उसका तेज कम होता जाता है और दिन-प्रतिदिन वह पापी होता जाता है। इसलिए सच ही बोलना चाहिए ॥१९॥ औपवेशि अरुण से उसके बिरादरीवालों ने कहा, 'आप स्थविर (बूढ़े) हैं। दोनों अग्नियों

अध्याय-२, ब्राह्मण-३

२१८ शतपथ ब्राह्मण स्यग्नी॒ञ्श्चाध॑त्स्वेति॑ स॒ होवा॑च ते॒ मेतदू॑च॒ वाचं॑यम् ए॒वैधि॒ न वाऽआ॒हिता॑ग्निना- नृ॒तं व॑दि॒तव्यं॒ न वद॒न्त्नाडु नानृ॒तं व॑दे॒ताव॑त्स॒त्यमे॒वोप॑चा॒र् इति॑ ॥२०॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥६[२.२.]॥ प्रथमः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या ११४ ॥ ॥ व॒रु॒णो ह्ये॑न्द्रा॒ज्यका॑म॒ आद॑धे । स॒ राज्य॑मगच्छ॒त्समा॒ह्य॑स्य॒ वेद॒ यन्न॒ वरु॑णो राजेत्ये॒वाहुः॒ सोमो॒ यश॑स्कामः स॒ यशो॑ऽभव॒त्समा॒ह्य॑स्य॒ सोमे॒ लभ॑ते॒ यन्न॒ नोभा- वेवागच्छ॑तो॒ यश॑ ए॒वैतद्रू॒पमा॑गच्छति॒ यशो॑ ह॒ भव॑ति॒ राज्यं॑ गच्छति॒ य ए॒वं वि॒द्वा- नाध॑त्ते ॥१॥ अ॒ग्नौ ह॒ वै दे॒वाः । सर्वा॑णि रू॒पाणि॑ निद॒धिरे॒ यानि॑ च ग्रा॒म्या॑णि यानि॑ चा॒रण्या॑नि वि॒जयं॑ वो॒पप्रे॑प्सन्तः कामचा॒रस्य॑ वा कामा॒यायं॑ नो गोपि॒ष्ठो गोपा॒यद्विति॒ वा ॥२॥ ता॒न्यु हा॒ग्निर्निर॑चकमे । तैः सं॒गृभ्या॒ऽन्त॑र्प्रविवेश पुन॒रेम इति दे॒वा उ॒दमुं॑ तिरो॒भूतं॑ तेषां॒ ह्ये॑तदेवास॒ किमि॒ह कत्र्त॑व्यं॒ केहु॒ प्रज्ञेति॒ वा ॥३॥ तत॑ ए॒तत्त॑ष्टा पुन॒राधे॑यं दद॒र्श । तदाद॑धे तेना॒ग्नेः प्रि॒यं धामोपा॑ऽगच्छ॒त् सो ऽस्मा॒ऽउ॒भया॑नि रू॒पाणि॒ प्रतिनि॑ःससर्ज॒ यानि॑ च ग्रा॒म्या॑णि॒ यानि॑ चा॒रण्या॑नि॒ त- स्मादाहुस्त्वष्ट्राणि॒ वै रू॒पाणी॑ति॒ त्वष्टुर्ह्ये॑व सर्वं॒ रूप॒मुप॑ ह॒ त्वेवान्याः॑ प्र॒जा याव॑- त्तो-यावत्त॒ इव॒ तिष्ठ॑न्ते ॥४॥ तस्मै॒ कं पुन॒राधे॑यमा॒दधी॑त । ए॒षह॑ ह्यै॒वाग्नेः॑ प्रि॒यं धामोपा॑गच्छति॒ सो॒ऽस्मा॒ऽउ॒भया॑नि रू॒पाणि॒ प्रतिनि॑ःसृजति॒ यानि॑ चं ग्रा॒म्या॑णि या- नि चा॒रण्या॑नि॒ तस्मि॑न्ने॒तान्यु॒भया॑नि रू॒पाणि॑ दृश्यन्ते॒ पर॑मता॒ वै सा स्पृ॒रूप॒त्यु॑ का- स्मै तथा॑ पुष्यति॒ लो॒क्य॑मे॒वापि॑ ॥५॥ अ॒ग्नियो॒ऽयं य॒ज्ञः । ज्योति॒र॒ग्निः पा॒प्मनो द॑- ग्धा सो॒ऽस्य पा॒प्मानं॑ दहति॒ स इ॒ह ज्योति॑रेव॒ श्रिया॒ यश॑सा भवति॒ ज्योति॑र॒मुत्र॑ पु॒ण्यलो॒कमे॑तन्नु॒ तद्य॒स्मादाद॑धीत ॥६॥ स वै व॒र्षास्वा॑दधीत । व॒र्षा वै सर्व॑ऽऋ- तवो॒ वर्षा॒ हि वै सर्व॑ऽऋतवो॒ऽथादो॑ व॒र्षमकु॑र्मा॒दो व॒र्षमकु॑र्मेति संवत्सरा॒त्संप॑- श्यन्ति॒ वर्षा॒ ह्वेव॒ सर्वे॑षामृतू॒नाꣳ रू॒पमुत॑ हि॒ तद्व॑र्षासु॒ भव॑ति यदाहुर्ग्री॒ष्मो॒ऽव वा॒ऽअद्येत्युतो॒ तद्व॑र्षासु॒ भव॑ति यदाहुः॒ शिशिरो॒ऽव वा॒ऽअद्येति॑ व॒र्षाद्धिहृ॒र्षाः॑ ॥७॥

का० २, अ० २, ब्रा० ३, क० १-७ शतपथब्राह्मण / २१६ का आधान कीजिये।' उसने उत्तर दिया, 'ऐसा मत कहो। वाणी का संयम करो। जो आहिताग्नि है उसे झूठ नहीं बोलना चाहिए। अच्छा हो कि वह कुछ न बोले। परन्तु झूठ बोले ही नहीं। इस- लिये सत्य ही उपचार है' ॥२०॥ पुनराधेयम् अध्याय २—ब्राह्मण ३ वरुण ने इस (अग्नि) का राज्य की कामना से आधान किया। उसने राज्य को पा लिया। इसलिए चाहे कोई (अग्न्याधान करनेवाला) जाने या न जाने, लोग उस (अग्न्याधान करने- वाले) को 'वरुण राजा' कहते हैं। सोम ने यश की कामना से (अग्न्याधान किया), वह यशस्वी हो गया। इसलिए चाहे कोई सोम का लाभ करे या न करे, दोनों ही यश पाते हैं, क्योंकि लोग यश को ही देखने आते हैं। जो पुरुष इस रहस्य को समझकर अग्न्याधान करता है वह यशस्वी होता है और राज्य को प्राप्त होता है ॥१॥ देवों ने सब रूपों को अग्नि के सुपुर्द कर दिया, चाहे वह ग्राम-सम्बन्धी हो या अरण्य- सम्बन्धी; चाहे विजय करने की इच्छा से, चाहे स्वतन्त्र विचरने के लिए; चाहे यह सोचकर कि (अग्नि) अच्छा रक्षक है इनकी रक्षा करेगा' ॥२॥ अग्नि को उनका लोभ हो गया। वह उनको इकट्ठा करके ऋतुओं में छिप गया। देवों ने सोचा कि वहीं चलें। जहाँ अग्नि छिपा हुआ था, वहीं गये। वे निराश हो गये कि 'क्या करना चाहिए?' 'क्या राय है ?' ॥३॥ तब त्वष्टा ने पुनराधेय अग्नि (फिर रक्खी हुई अग्नि) को देखा। उसने उसका आधान किया और इस प्रकार अग्नि के प्रिय धाम को पहुँच गया। उस (अग्नि) ने उस (त्वष्टा) के लिए दोनों रूप अर्थात् ग्राम-सम्बन्धी और अरण्य-सम्बन्धी छोड़ दिये। इसीलिए इन रूपों को त्वाष्ट्र (त्वष्टा) कहते हैं, क्योंकि त्वष्टा से ही ये सब रूप आते हैं। परन्तु दूसरी प्रजा इस-इस प्रकार रहती है ॥४॥ इसलिए (मनुष्य को चाहिए) कि त्वष्टा के लिए ही पुनराधेय करे। इसी प्रकार वह अग्नि के प्रिय धाम का लाभ कर सकता है। और वह (अग्नि) उसके लिए दोनों रूप छोड़ देता है अर्थात् ग्राम के भी और अरण्य के भी। उसी में ये दोनों रूप दिखाई पड़ते हैं। वह बड़ा हो जाता है, लोग उससे डाह करते हैं। वह फूलता-फलता है और लोक में उसका यश होता है ॥५॥ यह यज्ञ अग्नि का है। अग्नि ज्योति है। यह पापों को जलाती है। यह उस (यजमान) के पापों को भी जलाती है। यही ज्योति श्री और यश को देनेवाली होती है। ज्योति दूसरे लोक में पुण्य का मार्ग बनाती है। इसलिए (फिर) आधान करना चाहिए ॥६॥ वर्षा में पुनराधान करे। वर्षा ही सब ऋतुओं का (प्रतिनिधि) है। वर्षा ही सब ऋतुएँ हैं। इसीलिए कहते हैं कि अमुक वर्ष में यह काम किया, अमुक वर्ष में यह काम किया। वर्षा सब ऋतुओं का एक रूप है। जब कहते हैं 'यह ग्रीष्म-सा है' तो यह वर्षा में ही है और जब कहता है कि 'आज शिशिर-सा है' तो यह भी वर्षा ही है। 'वर्ष से ही 'वर्षा' है ॥७॥

अथै॒तदे॒व प॒रोऽक्षं॑ रू॒पं । यदे॒व पु॒रस्ताद्वा॑ति॒ तद्व॑स॒न्तस्य॑ रू॒पं यत्स्तन॑यति॒ तद्ग्री॒- ष्मस्य॒ यद्वर्ष॑ति॒ तद्व॑र्षाणां॒ यद्विद्योत॑ते॒ तच्छ॒रदो॒ यदु॑द्गृह्णाति॒ तद्धे॑मन्त॒स्य वर्षाः सर्व॑ ऽऋ॒तव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतु॒भ्य ए॒वैन॑मेतन्निर्मि॑मीते ॥८॥ आ॒दि॒त्यस्त्वे॑व सर्व॑ऽऋ॒तवः॑ । यदि॒वोदेत्य॑थ वस॒न्तो यदा॑ संग॒वोऽथ॑ ग्री॒ष्मो यदा॑ मध्य॒न्दिनोऽथ॑ वर्षा य॒दापरा॒ह्णो ऽथ श॒रद्य॒देवास्त॑मे॒त्यथ॑ हेमन्त॒स्तस्मा॑न्मध्यन्दिन॒ऽएवा॑दधीत॒ तर्हि॑ ह्ये॒षोऽस्य॑ लो॒कस्य॒ नेदि॑ष्ठं भ॑वति॒ तन्नेदि॑ष्ठादे॒वैन॑मेतन्मध्यान्निर्मि॑मीते ॥९॥ छा॒येये॑व वाऽअ॒- यं पुरु॑षः । पा॒प्मनानु॑षक्तः सो॒ऽस्यात्र॒ कनि॑ष्ठो भवत्यथ॒ य॒दूर्ध्वं॒ नि॒वेप्य॑ते॒ तत्कनि॑ष्ठ- मे॒वैतत्पा॒प्मान॑मव॒बाध॑ते॒ तस्मा॑न्मध्यन्दिन॒ऽएवा॑दधीत ॥१०॥ तं वै दर्भैरु॒द्धर॑ति । दारु॑भि॒र्वे पूर्व॑मु॒द्धर॑ति दारु॑भिः पूर्वं दारु॑भिर॒परं॒ जामि॑ कुर्यात्स॒मदं॑ कुर्यादापो॒ दर्भा आपो॒ वर्षा॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शद॒द्भ्य ए॒वैन॑मे॒तद॒द्भ्यो निर्मि॑मीते॒ तस्मा॑द्दर्भैरु॒द्धर॑ति ॥११॥ अ॒र्कप॒लाशाभ्यां॑ । व्रीहि॒मयम॒पूपं॑ कृ॒त्वा यत्र॒ गार्ह॑पत्यमा॒धास्य॒न्भव॑ति॒ तन्निद॑धाति तद्गार्ह॑पत्यमा॒दधा॑ति ॥१२॥ अ॒र्कप॒लाशाभ्यां॑ । यव॒मयम॒पूपं॑ कृ॒त्वा यत्रा॒हव॑नीयमा॒- धास्य॒न्भव॑ति॒ तन्निद॑धाति॒ तदा॒हव॑नीयमा॒दधा॑ति पूर्वार्ध्यामे॒वैना॑वेतद॒ग्निभ्या॒मन्त॑र्द्धम् इति॒ वद॑न्तस्त॒दु तथा॑ न कुर्याद्रा॒त्रिभि॑र्ह्येवान्त॒र्हितौ॑ भवतः ॥१३॥ आ॒ग्ने॒यमे॒व प॒- ञ्चक॒पालं॑ पुरो॒डाशं॒ निर्व॑पति । तस्य॒ पञ्च॑पदाः प॒ङ्क्त्यो याज्यानुवाक्या॑ भवन्ति प॒ञ्च वाऽऋ॒तव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतु॒भ्य ए॒वैन॑मेतन्निर्मि॑मीते ॥१४॥ सर्व॑ आग्ने॒यो भ॑वति । ए॒तद्वै विष्णोः प्रि॒यं धामो॒पाग॑च्छ॒त्तस्मा॑त्सर्व आग्ने॒यो भ॑वति ॥१५॥ तेनो॑पा॒ꣳशु चर॑न्ति । यद्वै ज्ञा॒तये॑ वा स॒ख्ये वा निष्केव॒ल्यं चि॑िकी॒र्षति तिर॒ इवैते॑न बीभत्स॑ते- यद्दे॒वेभ्यो॒ऽन्यो य॒ज्ञोऽथै॑ष निष्केव॒ल्य आ॑ग्ने॒यो यद्वै तिर॒ इव॒ तदु॑पा॒ꣳशु॒ तस्मा॑दुपा॒ꣳशु चर॑न्ति ॥१६॥ उच्चैरु॑त्त॒ममनू॑या॒जं य॑जति । कृ॒तक॑र्मेव॒ हि स तर्हि॑ भ॑वति॒ सर्वै॑- र्हि कृ॒तमनु॑बुध्यते ॥१७॥ स आ॒श्राव्या॑ह । स॒मिधो॑ य॒जेति॒ तदा॑ग्ने॒यꣳ रू॒पं प॒रोऽक्षं॑ त्वम॒ग्नियजेति॑ ह्ये॒व ब्रूया॒त्तद्देव प्रत्य॒क्षमा॑ग्ने॒यꣳ रू॒पम् ॥१८॥ स य॑जति । अ॒न्नाद्या॒य-

कां० २, अ० २, ब्रा० ३, क० ७-१६ शतपथब्राह्मण / २२१ (वर्षा का) एक परोक्ष रूप है। जब यह पूर्व से बहता है तो वसन्त का रूप है, जो गरजता है वह ग्रीष्म का, जो बरसता है वह वर्षा का, जो बिजली चमकती है वह शरद् का, जब बरसकर बन्द हो जाता हैं वह हेमन्त का। वर्षा सब ऋतुएँ हैं। वह (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हो गया। इसलिए ऋतुओं में से ही इसका निर्माण करते हैं ॥८॥ लेकिन आदित्य भी सब ऋतुएँ हैं। जब उदय होता है तो वसन्त, जब संगव होता है (अर्थात् जब गौएँ दुहने के लिए इकट्ठी की जाती हैं) तब ग्रीष्म, जब दोपहर होता है तो वर्षा, तीसरा पहर शरद्, जब अस्त होता है तब हेमन्त । इसलिए दोपहर के समय ही (पुनराधान) करे, क्योंकि उस समय सूर्य इस लोक के निकटतम होता है और इसलिए वह मध्य से ही (अग्नि का) निर्माण करता है ॥६॥ यह पुरुष छाया के समान पाप से लिप्त है। (दोपहर के समय) यह छाया सबसे छोटी होती है, पैर के नीचे ही सिकुड़ जाती है। इस प्रकार वह पाप को सबसे छोटा कर देता है। इसलिए दोपहर के समय ही पुनराधान करे ॥१०॥ वह (गार्हपत्य में से) दर्भों के द्वारा निकालता है। पहले वह दारु (लकड़ी) से निकालता है। पहले भी दारु से निकाले और फिर भी दारु से, तो दुहराने का दोषी हो और विघ्न पड़े। जल ही दर्भ है और जल ही वर्षा है। (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हो गया। इसलिए वह उसे जलों में से जलों के द्वारा ही निकालता है। इसलिए दर्भों के द्वारा निकालता है ॥११॥ भात पकाकर वह दो आक के पत्तों पर रखता है; और उसको उस जगह रखता है जहाँ गार्हपत्य अग्नि रखनी है। फिर गार्हपत्य अग्नि की स्थापना कर देता है ॥१२॥ जौ के अपूप (पूये) पकाकर दो आक के पत्तों पर रखकर उस जगह रखता है जहाँ आहवनीय स्थापित करनी होती है और आहवनीय को स्थापित कर देता है। कुछ लोग कहते हैं कि हम इस प्रकार पहली दो अग्नियों से इनको ढक देते हैं। परन्तु ऐसा न करे क्योंकि ये रातों के द्वारा ढकी जाती हैं ॥१३॥ अब पांच कपालों पर पुरोडाश को अग्नि के लिए तैयार करता है। इसके याज्य और अनुवाक्य पंक्ति छन्द के पाँच-पाँच पदवाले होते हैं। पाँच ही ऋतुएँ हैं। अग्नि ऋतुओं में घुसा था, इसलिए ऋतुओं से ही इसको निकालता है ॥१४॥ यह सब (यज्ञ) अग्नि का होता है। क्योंकि इसी से त्वष्टा अग्नि के प्रियधाम में घुसा, इसलिए यह सब अग्नि का ही होता है ॥१५॥ इसे चुपके-चुपके करते हैं। किसी सम्बन्धी या सखा के लिए जब कोई कुछ बनाना चाहता है तो छिपाकर रखता है। अन्य यज्ञ विश्वेदेवों का होता है और यह यज्ञ केवल अग्नि का ही है। जो छिपाकर किया जाता है वह चुपके से किया जाता है। इसलिए वे इसका चुपके- चुपके करते हैं ॥१६॥ अन्तिम अनुयाज को जोर से बोलते हैं, क्योंकि तब कार्य समाप्त हो जाता है। जब कार्य हो चुकता है तो उसे सभी जान जाते हैं ॥१७॥ वह पुकार (और आग्नीध्र द्वारा उत्तर दिये जाने के पश्चात् होतृ से) कहता है,* 'समिधाओं का यज्ञ करो।' वह अग्नि का परोक्ष-रूप है। परन्तु उसको यह भी कहना चाहिए कि 'अग्नियों का यज्ञ करो', क्योंकि वह अग्नि का प्रत्यक्ष रूप है ॥१८॥ अब वह पढ़ता है—(अ) “अग्नऽआज्यस्य व्यन्तु वौषट्”—'हे अग्नि ! (ये समिधायें)

  • अध्वर्यु कहता है, 'ओं श्रावय'; इस पर आग्नीध्र कहता है, 'अस्तु, श्रोषट्' ।

स्य॒ व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य व्यन्तु॒ वौ३षडग्निरा॑ज्यस्य वेतु वौ३षडिति ॥१९॥ अथ॒ स्वाहा॒ग्निमित्या॑ह । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ स्वाहा॒ग्निं पव॑मा- न॒मिति॒ यदि॑ पवमानाय॒ ध्रिये॑र॒न्स्वाहा॒ग्निमिन्दु॑मन्त॒मिति॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑र- न्स्वाहा॒ग्निग्ँ स्वाहा॒ग्नीनाज्य॑पाञ्जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२०॥ अ- थाहा॒ग्नयेऽनु॑ब्रूहीति॑ । आ॒ग्नेयमा॑ज्यभा॒गꣳ सोऽन्वा॑हा॒ग्निꣳ स्तोमे॑न बोधय॒ समि॑धा- नो॒ऽअमर्त्यम् । कृ॒ण्वद्दे॒वेषु॑ नो॒ दध॒दिति॒ स्वपि॑तीव॒ खलु॒ वाऽए॒तद्यदु॑द्वासि॒तो भ॑वति सम्प्र॒बोध॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सम॒दी॑धयति जुषाणो॒ऽअग्निरा॑ज्यस्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२१॥ अथ॒ यद्य॑ग्नये॒ पव॑मानाय॒ ध्रिये॑रन् । अग्न॑ये॒ पव॑मानायानु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो ऽन्वा॑हाग्ने॒ऽआयु॑ꣳषि पवस॒ऽआसु॒वोर्ज॒मिषं॑ च नः । आ॒रे बा॑धस्व दु॒च्छुना॒मिति॑ त- थाहाग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वै पव॑मानस्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्यन्त्यि जुषाणो॒ऽअग्निः॑ पव॑मान॒ आज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑ति ॥२२॥ अथ॒ यद्य॑ग्नय॒ऽइन्दु॑मते॒ ध्रिये॑रन् । अग्नय॑ ऽइन्दु॑मते॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ब्रूयात्सो॒ऽन्वाहे॒ह्वो॒ न्नु प्र॒वाणि॑ ते॒ऽग्ना॒ऽइत्थे॒तरा॒ गिरः॑ । अ॒भि- वर्ध॑स्व॒ऽइन्दु॑भिरिति॒ तथा॑ ह्याग्ने॒यो भ॑वति॒ सोमो॒ वाऽइन्दु॑स्त॒दु सौम्या॑दाज्यभागाद्य- न्ति जुषाणो॒ऽअग्नि॒रिन्दु॑मानाज्य॑स्य वेत्विति॒ यज॑त्येवमु॒ सर्व॑माग्ने॒यं करो॑ति ॥२३॥ अथा॑हा॒ग्नये॒ऽनु॑ब्रूहीति॑ ह॒विषः॑ । अ॒ग्निं य॑जा॒ग्नये॑ स्विष्ट॒कृते॒ऽनु॑ब्रूह्य॒ग्निग्ँ स्विष्ट॒कृतं॑ यजे॒त्यथ॒ यद्दे॒वान्यजे॒त्यग्नी॒न्यजे॒त्येवैतदा॑ह ॥२४॥ स॒ यज॑ति । अ॒ग्नेर्वसु॑वने वसु॒धे- यस्य॑ वेतु॒ वौ३षड॒ग्नाऽउ॑ वसु॒वने॑ वसु॒धेयस्य॑ वेतु॒ वौ३षद्देवो॒ऽअग्निः॑ स्विष्ट॒कृदिति॑ स्वय॒माग्ने॒यस्तृतीय॑ ए॒वम्वा॑ग्ने॒याननुया॒जान्क॑रोति ॥२५॥ ता वा॒ऽए॒ताः । षड्भि- र्निर्य॑तति च॒तस्रः॑ प्रया॒जेषु॒ द्वेऽनु॑नया॒जेषु॒ षडा॒ऽऋतव॑ ऋ॒तून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मे- तन्निर्मि॑मीते ॥२६॥ द्वाद॑श वा॒ त्रयो॑दश वा॒न्तरा॑णि भवन्ति । द्वाद॑श वा॒ वै त्र- यो॑दश वा संवत्सर॒स्य मासाः॑ संवत्सर॒मृतून्प्रावि॑शदृतुभ्य॑ ए॒वैन॑मेतत्त्संवत्सरा॒न्नि- र्मि॑मीते न द्वे च॒न स॒ङ्काशा॑मितायै ज्ञानि॒ क कुर्याद्यद्वे॒ भित्सन्त्स्याता॑ व्यन्तु॒ वे-

कां० २, अ० २, ब्रा० ३, कं० १६-२७ शतपथब्राह्मण / २२३ घी को ग्रहण करे। वौषट् ।" (आ) "अग्निमाज्यस्य वेतु वौषट् ।" "(तनूनपात्) आज्य की अग्नि को स्वीकार करे। वौषक्।" (इ) "अग्निनाज्यस्य व्यन्तु वौषक् ।"— "वे (इडा) अग्नि के द्वारा आज्य को स्वीकार करें, वौषक् ।" (ई) "अग्निराज्यस्य वेतु वौषक्"-'अग्नि आज्य को स्वीकार करे, वौषक्" ।।१६।। अब कहता है— 'स्वाहाग्निम्'—आग्नेय आज्य भाग के लिए। यदि पवमान के लिए आधान करे तो कहे 'स्वाहाग्निं पवमानम्', यदि इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करें तो कहे, 'स्वाहाग्निमिन्दुमन्तम्' । 'स्वाहाग्निम्', 'स्वाहाग्नीनाज्यपान् जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु ।' यह (होता) पढ़ता है ॥२०॥ आग्नेय आज्य भाग के सम्बन्ध में (अध्वर्यु) कहता है, "अग्नयेऽनुब्रूहि"— "अग्नि के लिए पढ़ो।" तब (होता) पढ़ता है- "अग्निं स्तोमेन बोधय, समिधानोऽमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ।"- "स्तुति द्वारा अग्नि को जगाओ जो अमरत्व को प्रज्वलित करता है, जिससे यह अग्नि हमारे हवियों को देवताओं तक ले जावे।" जब अग्नि अपने स्थान से निकाला जाता है तो सोता-सा है। अब (ऋत्विज्) उसको जगाता है। अब वह पढ़ता है- "जुषाणोऽग्निराज्यस्य वेतु" अर्थात् "अग्नि कृपा करके आज्य को ग्रहण करे" ।।२१।। यदि अग्नि-पवमान के लिए आधान करना हो तो कहे "अग्नये पवमानाय अनुब्रूहि" अर्थात् "पवमान अग्नि की स्तुति करो।" तब होता पढ़े— "अग्नऽआयु॑ षि पवसऽआसुवोर्ज॒मिषं च नः । आरे बाधस्व दुच्छुनाम्" (ऋग्वेद ६।६६।१६)—"हे अग्नि ! तू आयु को (उम्रों को) फूँकती है। हमारे लिए अन्न और रस उत्पन्न करो। विपत्तियों को हमसे दूर करो।" इस प्रकार यह अग्नि-युक्त हो जाता है। सोम पवमान है। परन्तु इसको वह सोम के आज्य भाग से निकालते हैं। अब वह पढ़ता है— "जुषाणोऽग्निः पवमान आज्यस्य वेतु ।"— "अग्नि पवमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे" ।।२२।। यदि वह इन्दुमान् अग्नि के लिए आधान करे तो कहता है— "अग्नयेऽइन्दुमतेऽनुब्रूहि ।" "इन्दुमान् अग्नि के लिए प्रार्थना करो।" तब होता पढ़े- "एह्यषु ब्रवाणि तेऽग्ने इत्येतरा गिरः। एभिर्वर्धास इन्दुभिः" (ऋग्वेद ६।१६।१६)-'हे अग्नि, आ। मैं और प्रार्थनायें तेरे लिए कहूँगा। इन इन्दुओँ (बूँदों) से बढ़।" इस प्रकार वह अग्नि का सम्बन्धी हो जाता है। सोम ही इन्दु है। सोम आज्य भाग से लाते हैं। इसलिए पढ़ता है-"जुषाणोऽग्निरिन्दुमानाज्यस्य वेतु।"-"अग्नि इन्दुमान प्रसन्न होकर आज्य को स्वीकार करे।" इस प्रकार वह इन सब को अग्नि-युक्त कर देता है ।।२३।। अब वह हवियों के विषय में कहता है— 'अग्नयेऽनुब्रूहि।' अर्थात् अग्नि की प्रार्थना करो। 'अग्निं यज' अर्थात् अग्नि को पूजो। 'अग्नये स्विष्टकृतेऽनुब्रूहि।' अर्थात् स्विष्टकृत् की प्रार्थना करो। 'अग्निं स्विष्टकृतं यज।' अर्थात् अग्नि स्विष्टकृत् को पूजो। फिर कहे 'देवान् यज ।'—देवों को पूजो। 'अग्नीन् यज ।'—अग्नियों को पूजो ॥२४॥ अब वह प्रार्थना करता है-"अग्नेर्वसुवने वसुधेयस्य वेतु, वौषक् ।"— "(बर्हि) अग्नि की वृद्धि के लिए वसुधा को ग्रहण करे, वौषक् ।"—"अग्नाऽऽड वसुवने वसुधेयस्य वेतु वौषक् ।" " (नराशंस) अग्नि में वृद्धि के लिए वसुधा को स्वीकार करे, वौषक् ।" "देवोऽअग्निः स्विष्टकृत् ।" अर्थात् देव स्विष्टकृत् अग्नि।" यह तीसरी प्रार्थना स्वयं अग्नि की ही है। इस प्रकार सब अनु- याजों को अग्नि का कर देता है ॥२५॥ ये छः विभक्तियाँ हैं— चार प्रयाज में और दो अनुयाजों में। छः ऋतुएँ हैं। (अग्नि) ऋतुओं में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं से ही उनका निर्माण करता है ॥२६॥ (इन छः विभक्तियों में) बारह या तेरह अक्षर होते हैं। वर्ष में बारह या तेरह महीने होते हैं। अग्नि ऋतुओं अर्थात् वर्ष में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार ऋतुओं में अर्थात् संवत्सर से उसका निर्माण करता है। दुहराने के दोष से बचने के लिए दो एक-से नहीं होते। यदि दो एक-से हों तो दुहराने का दोष लगे। इसलिए प्रयाजों में कहते हैं 'व्यन्तु' या 'वेतु', और अनुयाजों में

अध्याय-२, ब्राह्मण-४

न्त्वित्येव॑ प्रयाजानाꣳ रू॒पं व॒सुव॑ने वसुधेयस्येत्य॑नुयाजा॒नाम् ॥ २७ ॥ तस्य॒ हिर॑ण्यं दक्षि॑णा । आ॒ग्ने॒यो वाऽए॒ष य॒ज्ञो भव॑त्य॒ग्ने रेतो॒ हिर॑ण्यं॒ तस्मा॑द्धिर॒ण्यं दक्षि॑णान्व- ॒डन्वा स हि वृ॒द्धेनाग्ने॒योऽग्नि॒र्ह्यमिव॑ ह्यस्य व॒ह् भ॑वति दे॒वानाꣳ हव्यवा॒हनो ऽग्नि॒रिति॒ वह्वति वाऽए॒ष म॑नु॒ष्येभ्य॒स्तस्मा॑दन्व॒ङ्गान्दक्षि॑णा ॥ २८ ॥ ब्राह्म॒णम् ॥ १ [२.३.] ॥ ॥ प्रजाप॑तिर्ह॒ वाऽइ॒दमग्र॑ऽएक॑ ए॒वास॑ । स ऐक्षत क॒थं नु प्र॒जाये॒येति॒ सोऽश्रा- म्यत्स तपो॑ऽतप्यत॒ सो॒ऽग्निमे॒व मु॒खाज्जन॑यां चक्रे तद्यदे॒नं मु॒खादज॑नयत॒ तस्मा॑द- न्ना॒दोऽग्निः स यो हॆव॑मेत॒मग्निम॒न्नादं॑ वे॒दान्ना॑दो हैव भ॑वति ॥ १ ॥ तद्वाऽए॒भ्येत॒ द्ये दे॒वाना॒मज॑नयत । तस्मा॑दग्नि॒रग्रि॒र्ह वै नामैतद्यद॒ग्निरिति॒ स जा॒तः पूर्व्व॑: प्रे- याय॒ यो वै पूर्व्व ए॒त्यग्र॒ऽएतीति॒ वै तमा॑हुः सो॒ऽस्याग्निता ॥ २ ॥ स ऐक्षत प्र॒जाप॑तिः । अ॒न्नादं॒ वाऽइ॒ममा॒त्मनो॒ऽजीज॑ने॒ यदि॒मं न वाऽइ॒ह म॒दन्य॒दन्न॑मस्ति॒ यं वाऽअ॒यं नाद्यादिति॑ काल्वालीकृ॒ता हैव त॒र्हि पृ॑थि॒व्या॑स॒ नौष॑धय आ॒सुर्न वन॒- स्प॒तय॒स्तदे॑वास्य॒ मन॒स्या॑स ॥ ३ ॥ अथैनम॒ग्निव्या॑त्तेनोप॒पर्य्या॑ववर्त्त । तस्य॒ भीत॒स्य स्वो म॑हि॒माप॑चक्राम वाग्वाऽअ॒स्य स्वो म॑हि॒मा वाग॑स्यापचक्राम॒ स आ॒त्मन्ने॒वा- ऽहुतीमीषे॒ स उ॑द॒मृष्ट॒ तद्यदु॑द॒मृष्ट॒ तस्मा॑दि॒दं चा॑लोम॒कमि॒दं च॒ तत्र॑ विवेद घृ॒ता- हुतिं वैव॒ पय॑आहुतिं॒ वोभयꣳ॑ ह॒ वेव॒ तत्पय॑ ए॒व ॥ ४ ॥ सा हैनं॑ नाभि॒राध्यां॑ चकार । केशमिश्रेव ह्वास॒ तां व्यौक्ष॒द्दोष॒ धयेति॒ तत॒ ओष॑धयः॒ सम्भ॑वं॒स्तस्मा॑दो- षधयो॒ नाम॒ स द्वि॒तीय॒मुद॑मृष्ट॒ तत्राप॑रामा॒हुतिं॑ विवेद घृ॒ताहु॑तिं चै॒व पय॑आहुतिं॒ वोभयꣳ॑ ह॒ वेव तत्पय॑ ए॒व ॥ ५ ॥ सा हैनम॒भिराध्वां॑ चकार । स व्य॑चिकित्स- ज्जुहुवानी३ मा हौ॒षामी॒३ति तꣳ स्वो म॑हि॒माभ्यु॑वाद जु॒हुधीति॒ स प्र॒जाप॑तिर्विदां॑ चकार॒ स्वो वै मा म॑हि॒माहेति॒ स स्वाहेत्ये॒वाजु॑हो॒त्तस्मा॑दु॒ स्वाहे॒त्येव हू॒यते॒ तत॒ एष उद॑ियाय॒ य ए॒ष तप॑ति॒ ततोऽयं प्रब॑भूव॒ योऽयं प॑वते॒ तत॒ ए॒वाग्निः परा॑ङ्

कां० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० १-६ शतपथब्राह्मण / २२५ कहते हैं 'वसुवने वसुधेयस्य' ॥२७॥ इसकी दक्षिणा है स्वर्ण। यह यज्ञ अग्नि का है और स्वर्ण अग्नि का रेत अर्थात् वीर्य है। इसलिए स्वर्ण दक्षिणा है, या बैल, क्योंकि बैल का कन्धा अग्नि का होता है। इसका कन्धा अग्नि से दग्ध-सा होता है। दूसरे, अग्नि देवों का ढोनेवाला है, और बैल मनुष्यों का बोझ ढोने- वाला है। इसलिए बैल दक्षिणा (में दिया जाता है) ॥२८॥ अग्निहोत्रम् अध्याय २—ब्राह्मण ४ यहाँ पहले एक प्रजापति ही था। उसने सोचा, मैं कैसे उत्पन्न (प्रकट) होऊँ? उसने श्रम और तप किया। उसने मुख से अग्नि को उत्पन्न किया। चूंकि उसको मुख से उत्पन्न किया इसलिए अग्नि अन्न का खानेवाला है। जो इस प्रकार अग्नि का अन्न को खानेवाला जानता है वह अन्न का खानेवाला होता है ॥१॥ इस अग्नि को देवों से पहले उत्पन्न किया, इसलिए अग्नि का अग्रि नाम है। अग्नि और अग्रि एक बात है। वह उत्पन्न होकर पूर्व की ओर अर्थात् आगे गया। जो पहले (पूर्व) जाता है उसको कहते हैं आगे (अग्रे) गया। यही अग्नि की अग्रिता है ॥२॥ प्रजापति ने सोचा कि मैंने इस अग्नि को अपना अन्न खानेवाला बनाया है, और मुझे छोड़कर और कोई अन्न तो है ही नहीं; और मुझे वह खायेगा नहीं। उस समय पृथिवी गंजी थी। न ओषधियाँ थीं, न वनस्पतियाँ। उसको इसी बात का सोच था ॥३॥ अब (अग्नि) उसकी ओर मुंह फाड़कर दौड़ा। वह डर गया और उसकी महिमा चली गई। वाणी ही उसकी महिमा है। यह वाणी ही चली गई। उसने अपने में ही आहुति की इच्छा की, और (हाथ) मले। चूंकि हाथ मले, इसीलिए ये (हथेलियाँ) लोभरहित होती हैं। अब उसने घी की आहुति या दूध की आहुति ली। ये दोनों दूध ही तो हैं ॥४॥ वह उसे पसन्द न आई क्योंकि वह केशमिश्रित (बालों से मिली हुई) थी। उसने उसे (आग में) डाल दिया यह कहकर—'ओषं धय' (जलते हुए खा)। इससे 'ओषधि' उत्पन्न हुई। इसीलिए उनका नाम 'ओषधि' है। अब फिर उसने हथेलियाँ मलीं। तब दूसरी आहुति मिली। घी की आहुति या दूध की आहुति, ये दोनों दूध ही तो हैं ॥५॥ वह उसको पसन्द आ गई। उसे संकोच हुआ, 'इसे (आग में) छोड़ूँ या न छोड़ूँ।' उसकी महिमा ने कहा, 'आहुति दे।' प्रजापति ने जाना कि यह तो मेरी ही (स्व) महिमा है जो कह रही है (आह)। इसलिए उसने 'स्वाहा' कहकर आहुति दे दी। इसलिए 'स्वाहा' कहकर आहुति दी जाती है। अब वह निकला जो तपता है अर्थात् सूर्य, और वह आया जो बहता है अर्थात् वायु।

२२६ शतपथ ब्राह्मण

पर्या॑ववर्त ॥ ६॥ स हु॒त्वा प्र॒जाप॑तिः । प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मान॑मत्रायत स यो है॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होत्ये॒ताꣳ हे॑व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यां प्र॒जाप॑तिः प्रा- जा॑य॒तैवं ह्ये॒वाऽत्मन॑स्तो॒ऽग्नेर्मृ॒त्योरा॒त्मानं॑ त्रायते ॥७॥ स यत्र॒ म्रिय॑ते । यत्रै॑नम॒ग्ना- व॒भ्याद॑धति॒ तदे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ऽथास्य शरी॑रमे॒वा॒ग्निर्दह॑ति॒ तद्यथा॑ पि॒तुर्वा मा॒तुर्वा जा॒य॑तैवमे॒षो॑ऽग्ने॒रधि॒जाय॑ते॒ शश्व॑द्ध वा॒ऽए॒ष न सम्भ॑वति॒ यो॑ऽग्निहो॒त्रं न जु॒होति॑ । तस्मा॒द्वाऽग्निहो॒त्रꣳ हो॑त॒व्यम् ॥८॥ तद्वाऽए॒तत् । ए॒व वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॒ य- त्प्र॒जाप॑तिर्व्यचि॑कित्स॒त्स वि॑चिकित्सञ्छ्रेय॒स्य॑ध्रियत॒ यः प्र चा॒जायत॒ाऽऽत्म॒नश्चा॒ग्नेर्मृ- त्योरा॒त्मान॑मत्रायत स यो॒ है॒वमे॒तद्वि॑चिकित्सि॒त्ये॒ जन्म॑ वे॒द ग्रह॒ किं च विचि॑कि- त्सति॒ श्रेय॑सि॒ हैव॑ ध्रियते ॥ ९॥ स हु॒त्वा न्य॑मृष्ट । ततो विकङ्क॒तः सम॑भव॒त्तस्मा- दे॒ष य॒ज्ञियो॑ य॒ज्ञपा॑त्रीयो वृ॒क्षस्तत॒ ए॒ते दे॒वानां॑ वी॒रा अ॑जायन्ता॒ग्निर्वा॒ऽयं पव॑ते सूर्य्यः॑ स यो॒ है॒वैतान्वे॒वानां॑ वी॒रान्वे॒दाहा॑स्य वी॒रो जा॑यते ॥ १०॥ तऽउ॒ हैत॒ ऽऊचुः । व॒यं वै प्र॒जाप॑तिं पि॒तर॒मनु॑ स्मो ह॒न्त व॒यं तत्सृ॑जामहै॒ यद॒स्मानन्वस॒दि- ति ते परि॑श्रित्य गाय॒त्रेणा॒पहिं॑कारिण तुष्टुविरे तद्य॒त्पर्य॑श्रयꣳस्तत्समु॒द्रोऽभ॑वदियमे॒व पृ॑थि॒व्यास्ता॒वः ॥११॥ ते स्तु॒त्वा प्राञ्च॒ उच्च॑क्रमुः । पुन॑रे॒म इति॑ दे॒वा ए॒डाꣳ सम्भू- ताꣳ सा हैना॒नुदी॑क्ष्य हिं॑चकार ते दे॒वा वि॒दां च॑क्रुरेष साम्नो हिंकार इत्युपहिं- कारꣳ हैव पुरा ततः॒ सामा॑स॒ स ए॒ष गवि साम्नो हिंकार॒स्तस्मा॑दे॒षोप॑जी॒वनीयो- पजी॒वनी॑यो ह॒ वै भ॑वति॒ य ए॒वमे॒तं गवि साम्नो हिंकारं वेद॑ ॥ १२॥ ते हो॑चुः । भ॒द्रं वा॒ऽइ॒दमजी॑जनामहि॒ ये गा॒मजी॑जनामहि य॒ज्ञो ह्ये॒वेयं नो॑ कॢप्तिर्गोर्य्यज्ञास्ता- यते॒ऽन्नꣳ ह्ये॒वेयं यदि॒ किं चात्नं॑ गौरे॒व तदिति॑ ॥ १३॥ तद्वाऽए॒तद्दे॒वता॑सां॒ नाम॑ । ए॒तद्य॒ज्ञस्य॒ तस्मा॑देतत्परिह॒रेत्साधु पु॒ण्यमिति॑ ब्रू॒याद्यो ह वाऽअ॒स्यैता॑ भव॒त्युपना- मुक॑ एनं य॒ज्ञो भ॑वति॒ य ए॒वं वि॒द्वानेतत्परि॑हरति साधु पु॒ण्यमिति॑ ॥ १४॥ ता॒मु हा॒ग्निर॑भिद॒ध्यौ । मिथु॒न्यन॑या स्या॒मिति॑ ताꣳ सम्ब॑भूव॒ तस्याꣳ रेतः॒ प्रासि॑ञ्चत्तत्प-

का० २, अ० २, ब्रा० ४, कं० ६-१५ शतपथब्राह्मण / २२७ अब अग्नि चला गया ॥६॥ प्रजापति ने आहुतियां देकर अपने को फिर उत्पन्न कर लिया, और अग्नि-रूपी मृत्यु से अपने को बचा लिया जो उसको खाना चाहती थी। इसलिए जो आदमी समझकर अग्निहोत्र करता है वह प्रजा-रूप में अपने को उत्पन्न करता है जैसे प्रजापति ने किया, और खानेवाली अग्नि से अपने को बचा लेता है ॥७॥ और जब वह मरता है और जब उसको अग्नि में रखते हैं तो वह अग्नि से फिर उठता है। अग्नि उसके शरीर को ही जलाता है। जैसे वह मा या बाप से उत्पन्न होता है उसी प्रकार अग्नि से उत्पन्न होता है। और जो अग्निहोत्र नहीं करता वह उत्पन्न होता ही नहीं। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥८॥ संकोच के द्वारा जन्म के विषय में यह बात है कि जब प्रजापति ने संकोच किया तो न संकोच करते हुए भी श्रेय पर आरूढ़ रहा, यहाँ तक कि उसने अपने को उत्पन्न किया और अपने को मृत्युरूपी अग्नि से बचाया जबकि वह उसे खाना चाहता था; इसी प्रकार वह भी जो संकोच से जन्म को जानता है, यदि कभी संकोच करता है तो भी श्रेय पर आरूढ़ रहता है ॥९॥ आहुति देकर उसने (हथेलियां) मलीं। तब विकङ्कत वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिए यह यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष है और यज्ञ-सम्बन्धी पात्र इससे बनाये जाते हैं। अब देवों में जो वीर हैं वे उत्पन्न हुए, अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य। सचमुच जो इन वीर देवों को जानता है उसके वीर उत्पन्न होता है ॥१०॥ उन्होंने कहा, 'हम पिता प्रजापति के पीछे हुए हैं। अब हम प्रजा उत्पन्न करें जो हमारे पीछे हो।' उन्होंने एक घेरा घेरकर गायत्री से हिङ्कार छोड़कर प्रार्थना की । जिससे उन्होंने घेरा था वह समुद्र था; और पृथिवी आस्ताव (अर्थात् प्रार्थना की) जगह हो गई ॥११॥ वे स्तुति करके पूर्व को गये, यह कहकर कि 'हम लौटे जाते हैं।' देव एक गाय के पास आये जो उत्पन्न हो गई थी। उसने उनकी ओर देखकर 'हिंकार' किया। देवों ने जाना कि यह सामवेदीय हिंकार है। पहले वह हिंकार-शून्य था। अब ठीक शाम हो गया। यह सामवेदीय हिंकार गाय के मध्य में थी। इसलिए यह (गाय) जीविका का साधन हो गई। जो कोई गाय में इस सामवेदीय हिंकार के भेद को जानता है, वह जीविका का साधन हो जाता है ॥१२॥ उन्होंने कहा, 'यह जो हमने उत्पन्न किया वह भद्र है, यह जो हमने गाय उत्पन्न की; इसलिए कि यह तो यज्ञ ही है, क्योंकि गाय के बिना यज्ञ हो ही नहीं सकता। यह अन्न भी है, क्योंकि जो भी कुछ अन्न है वह गाय ही है ॥१३॥ यह ('गो' नाम) उन (गौओं) का भी है और यज्ञ का भी। इसलिए उसको दुहराना चाहिए यह कहकर 'साधु है, पुण्य है।' जो कोई इस रहस्य को समझकर 'साधु, पुण्य' दुहराता है, (गायँ) उसके लिए बहुतायत देती हैं और यज्ञ उसकी ओर झुकता है ॥१४॥ अब अग्नि ने उससे प्रेम किया कि मैं इसके साथ मैथुन करूँ। उसने उसके साथ मैथुन

अध्याय-३, ब्राह्मण-१

यो॒ऽभव॒त्तस्मादे॒तदामायां॑ ग॒वि स॒त्याꣳ शृतम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्माद्यदि॑ कृ॒ष्णायां॒ यदि॑ रोहि॒ण्याꣳ शु॒क्लमे॒व भव॑त्य॒ग्निसंकाशम॒ग्नेर्हि रेत॒स्तस्मात्प्रथमदुग्धमुष्णं॑ भवत्य॒ग्नेर्हि रेत॑: ॥ १५॥ ते॒ होचु॑: । ह॒न्तेदं जु॒हुवाम॒हाऽऽइति॒ कस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य- न्तीति॒ मह्य॒मिति॒ हैवा॒ग्निरु॑वाच॒ मह्य॒मिति॒ यो॒ऽयं पव॑ते॒ मह्य॒मिति॒ सूर्य॑स्ते न स- म्पाद॒यां चक्रुस्ते हासम्पा॒द्योचु॑: प्र॒जाप॑तिमे॒व पि॒तरं॑ प्रत्य॒याम॒ स यस्मै॑ न इ॒दं प्र- थ॒माय॑ होत॒व्यं॑ व॒क्ष्यति॒ तस्मै॑ न इ॒दं प्रथ॒माय॑ होष्य॒न्तीति॒ ते प्र॒जाप॑तिं पि॒तरं॑ प्रतीत्योचुः कस्मै न इदं प्रथमाय होष्यन्तीति ॥ १६॥ स॒ होवाच॑ । अ॒ग्नये॒ऽग्निर- नुध्या॒ स्वꣳ रेत॑: प्र॒जन॑यिष्यते॒ तया॑ प्र॒जनि॑ष्यध॒ऽइत्यथ॒ तुभ्य॒मिति॒ सूर्य॒मथ॒ यदे॒व हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं पव॑त॒ऽइति॒ तदे॒भ्य इ॒दमप्ये॑त॒र्हि तथै॒व जु- ह्वत्य॒ग्नय॒ऽएव सा॒यं सूर्य्याय॑ प्रा॒तरथ॒ यदे॒व हूय॒मानस्य॒ व्यश्नु॑ते॒ तद्दे॒वैतस्य॒ यो॒ऽयं पव॑ते ॥ १७॥ ते हु॒त्वा दे॒वाः । इ॒मां प्र॒जातिं॑ प्रा॒जाय॑न्त॒ येषा॒मियं प्र॒जाति॑रि॒मां वि- जितिं॒ व्य॑जयन्त॒ येय॑मेषां॒ विजि॑तिरि॒ममे॒व लो॒कम॒ग्निर॒जय॑द॒न्तरि॑क्षं वा॒युर्द्दिव॑मेव॒ सूर्य॑: स यो॒ हैवं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्ये॒ताꣳ है॒व प्र॒जातिं॑ प्र॒जाय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तत्प्राजा॑- यन्तै॒तां विजि॑तिं वि॒जय॑ते॒ यामे॒तऽए॒तद्व्यज॑यन्तै॒तैरु॒ है॒व स॒लोको भ॑वति॒ य एवं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ तस्माद्वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ होत॒व्यम् ॥ १८॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ [२.४.]॥ अध्यायः ॥२ [११.]॥ ॥ सूर्यो॑ ह वा॒ऽअ॒ग्निहोत्रं॑ । तद्यदे॒तस्या॒ अग्र्य॒ऽआहु॑तेरु॒दैत्तस्मात्सूर्यो॑ऽग्निहोत्रं॑ ॥ १॥ स य॒त्सायमस्तमि॑ते जु॒होति॑ । य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीत्यथ॒ य- त्प्रा॒तरनु॑दिते जु॒होति॑ य इ॒दं तस्मि॑न्नि॒ह्नु सति॑ जु॒हुवानीति॒ तस्मा॑द्धि॒ सूर्यो॑ऽग्निहो- त्रमित्याहु॑: ॥ २॥ ॥ शतम् १००० ॥ ॥ अथ॒ यद॒स्तमे॑ति । तद्द्यावेव योनौ गर्भो भू॒त्वा प्र॒विश॑ति॒ तं गर्भं भव॑न्तमि॒माः सर्वा॑: प्र॒जा अनु॑ ग॒र्भा भव॑न्तीलिता हि॒ शेरे॒ संजानाना॒ अथ॒ यद्रात्रिस्ति॒र् ए॒वैतत्क॑रोति ति॒र् इव हि गर्भ॑: ॥ ३॥ स यत्सा-

कां० २, अ० २-३, ब्रा० ४-१, कं० १५-१८ व १-३ शतपथब्राह्मण / २२६ किया। उसमें वीर्य सींचा। वह दूध हो गया। इसलिए गाय जब तक कच्ची रहती है (वह दूध) पकता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है। इसलिए चाहे काली गाय में हो चाहे लाल में, दूध सफेद ही होता है, अग्नि के समान चमकता हुआ, क्योंकि अग्नि का वीर्य है। इसलिए जब वह पहले दुहा जाता है तो गर्म होता है, क्योंकि वह अग्नि का वीर्य है ॥१५॥ उन्होंने (मनुष्य ने ?) कहा, 'इसकी आहुति दें।' (देवों ने कहा) 'ये पहले किसके लिए आहुति देंगे ?' अग्नि ने कहा, 'मेरे लिए।' वायु ने कहा, 'मेरे लिए।' सूर्य ने कहा, 'मेरे लिए।' वे निश्चय न कर सके और निश्चय न करके कहा, 'पिता प्रजापति के पास चलें। वे जिसको पहली आहुति के योग्य बतायेंगे, लोग भी उसीको पहली आहुति देंगे।' वे पिता प्रजापति के पास जाकर बोले, 'हममें से किसको लोग पहले आहुति देंगे ?' ॥१६॥ उसने कहा, 'अग्नि के लिए। अग्नि तुरन्त ही अपने वीर्य को उत्पन्न करेगा। इससे तुम्हारी भी प्रजा होगी।' फिर सूर्य से कहा, 'इसके पश्चात् तुम्हारे लिए (आहुति दी जायगी)। और जो (दूध) आहुति देने से बच रहा वह उसके लिए जो बहता है (वायु के लिए)। इसलिए अब तक लोग इसी प्रकार आहुति देते हैं-सायंकाल में अग्नि के लिए और प्रातःकाल में सूर्य के लिए; और जो आहुति देने से बच रहता है वह वायु के लिए ॥१७॥ आहुति देकर देवों ने उस प्रकार अपने को प्रजा के रूप में उत्पन्न किया जिस प्रकार उत्पन्न हुए। इस प्रकार उन्होंने वह विजय पाई जो सचमुच पाई। अग्नि ने यह लोक जीता, वायु ने अन्तरिक्ष और सूर्य ने द्यौ । जो कोई इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसके उसी प्रकार प्रजा होती है जैसे देवों के हुई, और वह उसी प्रकार विजय पाता है जैसे देवों ने। जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह (उन देवों के साथ) इस लोक का हिस्सेदार होता है। इसलिए अग्निहोत्र अवश्य करना चाहिए ॥१८॥ अध्याय ३-ब्राह्मण १ सूर्य ही अग्निहोत्र है। क्योंकि वह इस आहुति के पहले उदय हुआ, इसलिए सूर्य अग्निहोत्र है ॥१॥ सायंकाल को अग्निहोत्र = (अग्ने होत्रस्य) अस्त होते हुए सूर्य के बाद आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है इसके यहाँ रहते हुए मैं आहुति दे दूँ। और जो सूर्योदय से पहले प्रातः- काल के समय आहुति देता है तो सोचता है कि जो यह है उसके यहाँ रहते हुए आहुति दूँ। इसलिए 'सूर्य ही अग्निहोत्र है' ऐसा कहते हैं ॥२॥ अब जब वह अस्त हो जाता है तब अग्निरूपी योनि में गर्भ होकर प्रवेश करता है, और उसके गर्भ होने पर यह सब प्रजा गर्भ हो जाती है। थपथपाये जाकर मानो वे सन्तुष्ट होकर सो जाते हैं। रात्रि उस (सूर्य) को इसलिए छिपा लेता है कि गर्भ भी तो छिपा रहता है ॥३॥

२३० शतपथ ब्राह्मण यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । गर्भ॑मे॒वैतत्संन्त॒मभि॑जु॒होति॒ गर्भ॑ꣳ सन्त॒मभि॑करोति स प्र॒गर्भ॑ꣳ सन्त॒मभि॑जुहोति॒ तस्मा॑दिमे॒ गर्भा॑ अ॒न्नम॑त्तो जी॒वन्ति॑ ॥ ४॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒- होति॑ । प्र॒जन॑यत्ये॒वैन॑मे॒तत्सो॑ऽयं तेजो॑ भू॒त्वा वि॒भ्राज॑मान उदेति शश्व॒द्ध वै नो॑- दियाद्य॒दस्मि॑न्ने॒तामाहु॑तिं॒ न जु॑हु॒यात्तस्मा॑दाऽए॒तामाहु॑तिं जु॒होति॑ ॥ ५॥ स यथा॑- ऽहिस्त्वचो॑ निर्मुच्ये॒त । ए॒वꣳ रात्रेः पाप्म॑ना निर्मुच्यते यथा ह वाऽअ॒हिस्त्वचो॑ निर्मुच्ये॒तैवꣳ सर्व॑स्मात्पा॒प्मनो॑ निर्मुच्यते॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहो॒त्रं जु॒होति॒ तदे॒त- स्यैवा॒नु प्र॒जाति॒मिमाः सर्वाः प्र॒जा अनु॑ प्र॒जाय॑न्ते वि हि सृ॒ज्यन्ते॒ यथा॒र्थ॑म् ॥ ६॥ स यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑र॒त्येते वै विश्वे॑ दे॒वा र॒श्मयो॒ऽथ यत्प॑रं भाः प्र॒जाप॑तिर्वा स इन्द्रो॑ वै॒तदु॑ ह वै विश्वे॑ दे॒वा अ॒ग्निहो॒त्रं जुह्व॑तो गृ॒हानाग॑- च्छन्ति॒ स यस्या॑नुद्धत॒माग॑च्छन्ति॒ तस्मा॑दि॒वा अप॑प्रयन्ति॒ तद्धा॑ऽअस्मै॒ तद्व्यृ॑ध्यते॒ यस्मा॑द्दे- वा अप॑प्रयन्ति॒ तस्यानु॑ व्यृ॒द्धिं यश्च॒ वेद॒ यश्च॒ नानु॑द्धतम॒भ्यस्त॑मगादि॒त्याहुः॑ ॥ ७॥ अथ॒ यः पु॒रादि॒त्यस्या॑स्तम॒यात् । आ॒हव॒नीय॒मुद्ध॑रति यथा॒ श्रेय॒स्याग॑मिष्यत्यावस॒थे- नो॑प॒क्लृप्ति॑नोपासी॒तैवं तत्स यस्यो॑द्धत॒माग॑च्छन्ति तस्या॑हव॒नीयं प्र॒विश॑न्ति तस्याह- व॒नीये॑ नि॒विश॑न्ते ॥ ८॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । अ॒ग्नावे॒वैभ्य ए॒तत्प्र॒वि॑ष्टे- भ्यो॑ जुहोत्यथ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होत्ये॒तेभ्य ए॒वैभ्य ए॒तज्जु॑होति॒ तस्मा॑दुदितहो- मिनां॑ वि॒च्छिन्न॑मग्निहो॒त्रं म॑न्याम॒हेऽरु॑ति ह स्माहा॒सुरि॒र्यथा शून्ये॑मावस॒थमाकु॑रुरे॒वं तदि॑ति ॥ ९॥ द्वयं वाऽइ॒दं जी॑वनं । मू॒लि चै॒वामू॑लं च॒ तदु॑भयं दे॒वानाꣳ स॒न्म- नु॒ष्या उप॑जीवन्ति प॒शवो मूला ओष॑धयो मू॒लिन्य॑स्ते प॒शवो मूला ओष॑धीर्मू- लिनी॑र्ग॒ध्वापः॑ पी॒त्वा तत ए॒ष रसः॒ सम्भ॑वति ॥ १०॥ स यत्सा॒यम॒स्तमि॑ते जु॒होति॑ । अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑ जुह्वानि॒ यदे॑षामि॒दꣳ स॒दुप॑जीवाम॒ इति॑ स यत्त- तो रात्र्या॒मश्ना॑ति हु॒तोच्छि॑ष्टमेव॒ तन्नि॒र्वृत्त॑ब॒ल्यश्नाति हु॒तोच्छि॑ष्टस्य॒ ह्येवा॑ग्निहो॒त्रं जु- ह्वद॑शिता ॥ ११॥ अथ॒ यत्प्रा॒तर॑नुदिते जु॒होति॑ । अस्य॒ रस॑स्य जी॒वन॑स्य दे॒वेभ्यो॑

कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ४-१२ शतपथब्राह्मण / २३१ वह सायंकाल को अस्त होने पर इसलिए आहुति देता है कि (सूर्य) जो गर्भरूप है उसको आहुति दी जाय, और चूंकि उसको गर्भ के रूप में आहुति देता है इसलिए यह गर्भस्थ जीव बिना खाये जीते रहते हैं ॥४॥ प्रातःकाल उदय होने से पूर्व इसलिए आहुति देता है कि इस (सूर्यरूपी बालक) को जन्म दे । वह तेज होकर चमकता हुआ निकलता है। अगर वह आहुति न देता तो कदापि न निकलता। इसलिए वह आहुति देता है ॥५॥ जैसे सांप केंचुली छोड़ता है इसी प्रकार वह पाप-युक्त रात्रि को छोड़ता है। जो रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है वह उसी प्रकार पाप-युक्त रात्रि से छूट जाता है जैसे सांप केंचुली से। उस (सूर्य) के छूटने पर सब प्रजा फिर से उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि वे अपने प्रयोजन के अनुकूल बिचरते हैं ॥६॥ वह जो सूर्यास्त से पहले आहवनीय को (गार्हपत्य से) निकालता है—ये किरणें ही विश्वेदेव (सब देव) हैं। इससे अधिक जो प्रकाशित होता है प्रजापति या इन्द्र है। अग्निहोत्र करनेवाले के घर सब देवता पहुँच जाते हैं। और जो कोई आग न निकाल पावे और देवतागण आ जायें तो वे चले जाते हैं। और जिसके यहाँ से देवतागण लौट जायें वह सफल नहीं होता। और जिसके यहाँ से देवतागण चले गये और वह विफल हुआ, उसके विषय में लोग कहते हैं कि चाहे यह जाने या न जाने, इसका सूर्यं अस्त हो गया क्योंकि इसने (गार्हपत्य से आहवनीय अग्नि को) नहीं निकाला ॥७॥ सूर्यास्त से पहले आहवनीय निकालने का यह कारण है कि जब कोई बड़ा आने वाला होता है तो घर को साफ करके सत्कार करते हैं, उसी प्रकार यह भी। क्योंकि जिस किसी के अग्नि निकालने के पीछे (देवतागण) आते हैं, वे उसके आहवनीय गृह में घुस जाते हैं और उसी आहवनीय गृह में ठहर जाते हैं ॥८॥ वह शाम को सूर्यास्त होने पर अग्नि में इसलिए आहुति देता है कि वह घर में प्रवेश किये हुए (देवताओं) के लिए आहुति देता है। और सूर्योदय होने से पहले आहुति देने का प्रयोजन यह है कि जब तक देव जाने न पावें, तब तक आहुति दी जाय। इसीलिए आसुरी का कहना था कि सूर्योदय होने के पश्चात् आहुति देनेवालों का अग्निहोत्र व्यर्थ हो जाता है जैसे खाली घर में कोई खाना ले जाय ॥६॥ जीविकाएँ दो प्रकार की हैं—जड़ वाली और बिना जड़ की। ये दोनों देवताओं की हैं। इन्हीं के सहारे मनुष्य जीते हैं। पशु बिना जड़ के हैं और ओषधियाँ जड़वाली; बिना जड़- वाले पशु जब जड़वाली ओषधियों को खाते और जल पीते हैं तब रस उत्पन्न होता है ॥१०॥ वह सूर्यास्त के पश्चात् शाम को आहुति इसलिए देता है कि इस जीवन-रस की आहुति देवताओं के लिए दे दूँ, क्योंकि यह रस उन्हीं का है जिसको खाकर हम जीते हैं। और जो वह रात्रि में भोजन करता है वह आहुति का शेष भाग है जिसमें से बलि निकाला जा चुका है (अर्थात् अन्य जीवों के लिए भाग बाँट दिया गया हो)। क्योंकि जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥११॥ और जो प्रातःकाल सूर्योदय से पहले आहुति देता है, वह सोचता है कि इस जीवन-रस

२३२ शतपथ ब्राह्मण

जुहुवानि य॑देषामिदꣳ सडुपजीवाम॒ इति॑ स यत्ततो॒ऽश्नाति॑ हु॒तोच्छि॒ष्टमेव॒ तन्नि- र्व्वर्त्तयत्यश्नाति हुतोच्छिष्टस्य॒ ह्येवाग्निहोत्रं जुह्वदशिता ॥ १२॥ तदाहुः । स॒मे- वान्ये यज्ञास्तिष्ठन्ते॒ऽग्निहोत्रमेव न सं॑तिष्ठते॒ऽपि द्वादशसंवत्सरमन्तवदेवाथैतद्दे- वानस्तꣳ सायꣳ हि हुत्वा वेद॒ प्रात॑र्हो॒ष्यामीति प्रातर्हु॒त्वा वेद॒ पुनः सायꣳ हो- ष्यामी॑ति त॒देतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं तस्यानुपस्थितिमनु॑पस्थिता इमाः प्रजाः प्र- जायन्ते॒ऽनुपस्थितो ह॒ वै श्रिया॑ प्र॒जया॑ प्र॒जायते॒ य ए॒वमेतद॒नुपस्थितमग्निहोत्रं वे- द ॥ १३॥ तद्दुग्धाधिश्रयति । शृतमस॒दिति तदाहुर्य्यद्युदक्तं तर्हि जुहुयादिति तद्वै नो॒दक्तं कुर्य्यादुप ह दहेद्यदुदक्तं कुर्य्यात्प्रप्र॒ज्ञि वै रेत॑ उपदग्धं तस्मान्नोदक्तं कुर्य्यात् ॥ १४॥ अधिश्रित्यैव जुहुयात् । पयो॒वैतदग्रे रेतस्तेन॒ नैव शृतं यद्देनदग्नावधिश्रय- न्ति तेनो॒ऽएव शृतं तस्मादधिश्रित्यैव जुहुयात् ॥ १५॥ तदुद्द्योतयति । शृतं वे- दानीत्यथापः प्रत्यानयति शा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वायैतद्वि यदा वर्षत्य- थौषधयो जायन्त॒ऽओषधीर्जग्ध्वापः पीत्वा तत एष रसः सम्भवति तस्माद् रसस्यो चैव॒ सर्व्वत्वाय तस्माद्यद्येनं क्षीरं केवलं पानेऽभ्याभवेदुदस्तोकमाश्चोतयेदिति ब्रू- याच्छा॒न्त्यै न्वेव रस॑स्यो चैव॒ सर्व्वत्वाय ॥ १६॥ अथ चतुरुन्नयति । चतुर्द्धाविहितꣳ हीदं पयोऽथ स॒मिधमादायोदाद्रवति समिद्धहोमायेव सो॒ऽनुपसाद्य॒ पूर्वामाहु॑तिं जुहोति स यदुपसादयेद्यथा यस्मा॒ऽअशनमाहरिष्यन्त्स्यात्तदुत्तरा निदध्यादेवं तद्यथ यद॒नुपसाद्य यथा यस्मा॒ऽअशनमाह॒रेत्तस्मा॒ऽआहृत्यै॒वोपनिदध्यादे॒वं तदुपसाद्यो- त्तरां नानाविय्यै॒ऽएवैने॒ऽएतत्करोति मनश्च ह॒ वै वाक्चैते॒ऽआहुती तन्मनसैवैत- द्वाचं च व्याव॑र्त्तयति तस्मादिदं मनश्च वाक्च समानमेव सन्तानेव ॥ १७॥ स वै द्विरग्नौ॑ जुहोति । द्विरुपमार्ष्टि द्विः प्राश्नाति चतुरुन्नयति तद्दश दशाक्षरा वै वि- राड्विराडु यज्ञस्तद्विराजमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ॥ १८॥ स यद॒ग्नौ जुहो॑ति । तद्दे- वेषु॑ जुहोति तस्माद्देवाः सन्त्यथ यदुपमार्ष्टि तत्पितृषु चौषधीषु च जुहोति त-

कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १२-१६ शतपथब्राह्मण / २३३ की देवताओं के लिए आहुति दे दूं, क्योंकि यह इनका है जिसको खाकर हम जीते हैं। वह जो दिन में भोजन करता है वह यज्ञ-शेष है, जिसमें से बलि निकाला जा चुका हो। जो अग्निहोत्र करता है वह यज्ञ के शेष भाग को खाता है ॥१२॥ इस विषय में कहा जाता है कि अन्य सब यज्ञ समाप्त हो जाते हैं परन्तु अग्निहोत्र समाप्त नहीं होता। बारह वर्ष चलनेवाला यज्ञ भी अन्तवाला है, परन्तु अग्निहोत्र अन्तवाला नहीं है। क्योंकि सायं को आहुति देकर जानता है कि प्रातःकाल आहुति दूंगा, और प्रातःकाल आहुति देकर जानता है कि सायं को आहुति दूंगा। इसलिए अग्निहोत्र अनन्त है और इससे अनन्त सन्तान उत्पन्न होती है। और जो मनुष्य अग्निहोत्र की अनन्तता को समझता है, उसके अनन्त सन्तान और वैभव होता है ॥१३॥ दूध दुहकर (गार्हपत्य अग्नि पर) पकाने रखता है जिससे पक जावे। इस विषय में कहते हैं कि जब उबाल आवे तब आहुति दे। परन्तु उबाल आ जायगा तो जल जायगा और जला हुआ बीज उपजता नहीं। इसलिए उबाल न आने देना चाहिए ॥१४॥ आग पर चढ़ाकर ही आहुति दे, क्योंकि यह (दूध) अग्नि का वीर्य है। इसको आग पर इसलिए रखते हैं कि गर्म हो जाय। इसलिए आग पर रखकर ही आहुति देनी चाहिए ॥१५॥ अब प्रकाशित करता है (अर्थात् तिनके जलाकर उसके प्रकाश से दूध को देखता है) कि यह पक गया क्या ? अब उस पर जल छिड़कता है शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए। जब बरसता है तब ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाने और जल को पीने से यह रस उत्पन्न होता है। इसलिए रस की वृद्धि के लिए वह जल छोड़ता है। इसलिए यदि 'केवल' (खालिस) दूध पीना हो तो उसमें एक बूंद जल अवश्य मिला ले, शान्ति के लिए तथा रस की वृद्धि के लिए ॥१६॥ अब वह दूध को चार (चमचों) में निकालता है, क्योंकि वह दूध चार प्रकार से (चार थनों से) मिला था। अब वह समिद्ध होम के लिए समिधा को उठाता है और (चमसे को) बिना नीचे रक्खे हुए पूर्व-आहुति देता है। यदि (चमसे को) नीचे रख देगा तो मानो वह किसी के लिए खाना ले जाते हुए बीच मार्ग में रख दे। परन्तु बिना नीचे रक्खे हुए (आहुति देना) मानो किसी को खाना ले जाते हुए पहले उसके पास पहुँचाकर (बर्तन) नीचे रक्खे। नीचे रखने के बाद एक और (आहुति देता है)। इस प्रकार इन दो आहुतियों को नानावीर्य (भिन्न-भिन्न पराक्रमवाली) बनाता है। ये दो आहुतियाँ मन और वाणी हैं। इस प्रकार मन और वाणी को एक-दूसरे से अलग करता है। इस प्रकार मन और वाणी समान होते हुए भी नाना हैं ॥१७॥ दो बार अग्नि में आहुति देता है। दो बार (चमसे को) पोंछता है। दो बार (दूध) खाता है। चार बार (चमसे में) निकालता है। ये दस (क्रियाएँ) हुईं। विराज् छन्द में दस अक्षर होते हैं। विराज् ही यज्ञ है। इस प्रकार वह यज्ञ को विराज् बना देता है ॥१८॥ वह अग्नि में जो आहुति देता है, वह देवताओं के लिए देता है। इसी से देव (यज्ञों में) सम्मिलित हैं। और जो पोंछ डालता है उसको पितरों और ओषधियों के लिए आहुति देता है।

२३४ शतपथ ब्राह्मण स्मात्पितर॒श्चौष॑धयश्च सन्त्य॑ यदुवा॒ प्राश्ना॑ति तन्मनु॒ष्येषु॑ जुहोति॒ तस्मान्मनु॒ष्याः सन्ति॑ ॥१९॥ या वै प्र॒जा य॒ज्ञेऽन॑न्वाभक्ताः । परा॒भूता वै ता ए॒वमे॒वैता इमाः प्र॒जा अप॑राभूतास्ता य॒ज्ञमुख॒ऽआभ॑जति॒ तेनो॑ ह॒ पश॑वोऽन्वा॑भक्ता य॒न्मनुष्या॒ननु॑ पश॒वः ॥२०॥ तदु॑ होवाच याज्ञवल्क्यः । न वै य॒ज्ञ इ॑व न्तत्वै पाकय॒ज्ञ इ॑व वा ऽहुतीदं हि यद॒न्यस्मि॒न्य॒ज्ञे स्रुच्यव॑द्यति॒ सर्वं॒ तद॒ग्नौ जुहोत्यथैतद॒ग्नौ जु॒होत्य्- प्याचा॑मति॒ निर्ले॑ढि॒ तद्य॑त् पाकय॒ज्ञस्ये॑वेति॒ तद्य॑त् तत्पशव्यं रू॒पं प॑शव्यो॒ हि पाकय॒ज्ञः ॥२१॥ सैषेकाऽऽहु॑तिरित्ये॒वाग्रे । यन्न्विवामूं प्रजाप॑ति॒रजु॑हो॒दथ य॑देत॒ऽए॒तत्प- श्चा॒वाधिय॒न्ताम॒ग्नि॒र्ज्योति॒ᳲ प॑वते॒ सूर्य॑स्तस्मादे॒षा द्वि॒तीयाऽऽहु॑तिर्हूयते ॥२२॥ सा या पू- र्वाऽऽहु॑तिः । सा॒ग्नि॒होत्र॑स्य दे॒वता॒ तस्मा॒त्तस्यै जुहोत्यथ योत्त॑रा स्विष्टकृद्भाजनमेव सा तस्मा॒त्तामु॑त्तरार्धे॑ जु॒होत्ये॑षा हि दिक् स्विष्टकृतस्तन्मिथुनायै॒वैषा द्वि॒तीयाऽऽहु- तिर्हूय॑ते द्वन्द्वं हि मिथु॒नं प्र॒जनन॑म् ॥२३॥ तद्द्वयमे॒वैतेऽआहुती । भू॒तं चैव॑ भ- वि॒ष्यच्च॑ जा॒तं च॑ ज॒निष्य॑माणं॒ चाग॑तं चाशा॑ चा॒द्य च॒ श्वश्च॒ तद्द्वयमे॒वानु॑ ॥२४॥ आ॒त्मैव भू॒तं । अ॒द्धा हि तद्यद्भू॒तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव भ॑वि॒ष्यद॒द्धा हि तद्य- द्भवि॒ष्यद॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२५॥ आ॒त्मैव जा॒तम् । अ॒द्धा हि तद्यज्जा॒तम॒द्धो तद्य- दा॒त्मा प्र॒जैव ज॑नि॒ष्यमा॑णम॒द्धा हि तद्यज्ज॑निष्यमा॑णम॒द्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२६॥ आ॒त्मैवाग॑तम् । अ॒द्धा हि तद्यदाग॑तम॒द्धो तद्यदा॒त्मा प्र॒जैवाशा॒नद्धा हि तद्यदा- शा॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२७॥ आ॒त्मैवा॒द्य । अ॒द्धा हि तद्यद॒द्याद्धो॑ तद्यदा॒त्मा प्र॒जैव श्वो॒ऽनद्धा हि तद्यच्छ्वो॒ऽनद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२८॥ सा या पूर्वा॒ऽऽहुतिः । सात्मान॑म॒भि- हूय॑ते तां॒ मन्त्रे॑ण जुहोत्यद्धा हि तद्यन्मन्त्रो॒ऽद्धो तद्यदा॒त्माऽथ योत्त॑रा सा प्र॒जा- म॒भि हूय॑ते तां तू॒ष्णीं जुहोत्यनद्धा हि तद्यत्तूष्णीम॒नद्धो तद्यत्प्र॒जा ॥२९॥ स जु- होति । अ॒ग्निर्ज्योति॒र्ज्योति॑र॒ग्निः स्वाहेत्यथ प्रातः सूर्यो ज्योति॒र्ज्योतिः सूर्यः॒ स्वाहे- ति॒ तत्स॒त्येनै॑व हूयते यदा॒ ह्ये॑व सूर्या॒ऽस्तमेत्यथा॒ग्निर्ज्योति॒र्यदा सूर्य॑ उ॒देत्यथ॒ सूर्यो॑

कां० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० १६-३० शतपथब्राह्मण / २३५ इससे पितर और ओषधियाँ (यज्ञ में) सम्मिलित हैं। यह जो आहुति देकर खाता है वह मनुष्यों के लिए आहुति देता है। इससे (मनुष्य यज्ञ में) सम्मिलित होते हैं ॥१९॥ जो यज्ञ में सम्मिलित नहीं किये जाते वे तिरस्कृत हैं। इस प्रकार जो प्रजा तिरस्कृत नहीं है उसके लिए यज्ञ के आरम्भ में ही भाग निकल जाता है। इस प्रकार पशु (मनुष्यों के) साथ-साथ भाग लेते हैं क्योंकि पशु मनुष्यों के पीछे चलनेवाले हैं ॥२०॥ इस पर याज्ञवल्क्य का कहना है कि इस (अग्निहोत्र) को हविर्यज्ञ नहीं मानना चाहिए। इसको तो पाकयज्ञ (Domestic Sacrifice) कहना चाहिए, क्योंकि हविर्यज्ञ में जो कुछ स्रुक् में लिया जाता है वह सब अग्नि में छोड़ दिया जाता है। और यहाँ अग्नि में आहुति देने के पश्चात् आचमन करता और खाता है। यह सब पाकयज्ञ की ही क्रिया है। यह यज्ञ का पाशविक रूप है क्योंकि पाकयज्ञ पाशविक है ॥२१॥ पहली एक आहुति वही है जिसको प्रजापति ने दिया था और जिसके पीछे देवों ने (यज्ञ) जारी रक्खा अर्थात् अग्नि, वायु और सूर्य ने। इसलिए यह दूसरी आहुति देता है ॥२२॥ वह जो पूर्वाहुति दी गई वह तो अग्निहोत्र का देवता है, इसलिए उसी के लिए दी जाती है। और जो दूसरी आहुति है वह स्विष्टकृत् के समान है, इसलिए वह उत्तर की ओर दी जाती है। (उत्तरा आहुति उत्तर की ओर दी जाने से शब्दों का सादृश्य है), क्योंकि स्विष्टकृत् की यही दिशा है। यह दूसरी आहुति जोड़ा बनाने के लिए दी जाती है, क्योंकि जोड़े से ही सन्तान उत्पन्न होती है ॥२३॥ ये दोनों आहुतियाँ दो का जोड़ हैं—भूत और भविष्य का और उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होनेवाले का, जो है और जिसकी आशा है उन दोनों का, आज का और कल का ॥२४॥ आत्मा ही भूत है। भूत निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। भविष्यत् प्रजा है। भविष्यत् अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२५॥ जो उत्पन्न हो गया वह आत्मा है, क्योंकि जो उत्पन्न हो गया वह निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। जो उत्पन्न होनेवाला है वह प्रजा है, क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला है वह अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२६॥ जो प्राप्त हो गया (आगत, actual) वही आत्मा है, क्योंकि जो प्राप्त हो गया वह निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। आशा प्रजा है क्योंकि प्रजा भी अनिश्चित है और आशा भी अनिश्चित है ॥२७॥ आत्मा आज है, क्योंकि आज भी निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। कल प्रजा है क्योंकि कल भी अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२८॥ यह जो पूर्वाहुति है वह आत्मा के लिए दी जाती हैं। यह मन्त्र से दी जाती है, क्योंकि मन्त्र निश्चित है और आत्मा भी निश्चित है। दूसरी प्रजा के लिए दी जाती है। वह मौन होकर दी जाती है, क्योंकि मौन अनिश्चित है और प्रजा भी अनिश्चित है ॥२९॥ (सायंकाल की) आहुति इस मन्त्र से दी जाती है—"अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" (यजु० ३।६), और प्रातःकाल इस मन्त्र से—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६)। सत्यता के साथ आहुति दी जाती है, क्योंकि जब सूर्य डूब जाता है तो अग्नि ही ज्योति रहती है।