शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
(६)
विषय | पृष्ठ-संख्या
- श्रीहरिद्वारा शिवतत्त्वका वर्णन, शिवका ब्रह्माजीको दिये हुए वरके अनुसार वेदीपर सदाके लिये अवस्थान तथा शिव और सतीका विदा हो कैलासपर जाना ...... १९०
- १३- सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें भगवान् शिवद्वारा ज्ञान एवं नवधा भक्तिके स्वरूपका विवेचन ...... १९२
- १४- दण्डकारण्यमें शिवको श्रीरामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा श्रीरामकी परीक्षा ...... १९६
- १५- श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक तथा उनके प्रति प्रणामका प्रसंग सुनाकर श्रीरामका सतीके मनका संदेह दूर करना, सतीका शिवके द्वारा मानसिक त्याग ...... १९९
- १६- प्रयागमें समस्त महात्मा मुनियोंद्वारा किये गये यज्ञमें दक्षका भगवान् शिवको तिरस्कारपूर्वक शाप देना तथा नन्दीद्वारा ब्राह्मणकुलको शाप-प्रदान, भगवान् शिवका नन्दीको शान्त करना... २०३
- १७- दक्षके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन, उसमें ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं और ऋषियोंका आगमन, दक्षद्वारा सबका सत्कार, यज्ञका आरम्भ, दधीचि-द्वारा भगवान् शिवको बुलानेका अनुरोध और दक्षके विरोध करनेपर शिव-भक्तोंका वहाँसे निकल जाना ...... २०६
- १८- दक्षयज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ चलनेके लिये अनुरोध, दक्षके शिवद्रोहको जानकर भगवान् शिवकी आज्ञासे देवी सतीका पिताके यज्ञमण्डपकी ओर शिवगणोंके साथ प्रस्थान ...... २०९
- १९- यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर सतीके रोषपूर्ण वचन, दक्षद्वारा शिवकी निन्दा सुन दक्ष तथा देवताओंको धिक्कार-फटकारकर सतीद्वारा अपने प्राण-त्यागका निश्चय ...... २११
- २०- सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, दर्शकोंका हाहाकार, शिवपार्षदोंका प्राण-त्याग तथा दक्षपर आक्रमण, ऋभुओंद्वारा उनका भगाया जाना तथा देवताओंकी चिन्ता ...... २१४
- २१- आकाशवाणीद्वारा दक्षकी भर्त्सना, उनके विनाशकी सूचना तथा समस्त देवताओंको यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्रेरणा ...... २१६
- २२- गणोंके मुखसे और नारदसे भी सतीके दग्ध होनेकी बात सुनकर दक्षपर कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ-विध्वंस करने और विरोधियोंको जला डालनेकी आज्ञा देना ...... २१८
- २३- प्रमथगणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओंको अपशकुन एवं उत्पातसूचक लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना ...... २२१
- २४- दक्षके यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन ...... २२२
- २५- देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिका रुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत तथा विष्णु आदिका अपने लोकमें जाना एवं दक्ष और यज्ञका विनाश करके वीरभद्रका कैलासको लौटना ...... २२५
- २६- श्रीविष्णुकी पराजयमें दधीचि मुनिके शापको कारण बताते हुए दधीचि और क्षुवके विवादका इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचिकी अवध्यता तथा श्रीहरिका क्षुवको दधीचिकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन ...... २२८
- २७- श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिका उनके लिये शाप और क्षुवपर अनुग्रह... २३२
- २८- देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, श्रीविष्णुका उन्हें शिवसे क्षमा माँगनेकी अनुमति दे उनको साथ ले कैलासपर जाना तथा भगवान् शिवसे मिलना... २३४
- २९- देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान् शिवका देवता आदिके अंगोंके ठीक होने और दक्षके जीवित होनेका वरदान देना, श्रीहरि आदिके साथ यज्ञमण्डपमें पधारकर शिवका दक्षको जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिके द्वारा उनकी स्तुति... २३६
- ३०- भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवताओंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, सब देवता आदिका अपने-अपने स्थानको जाना, सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य... २४०
रुद्रसंहिता, तृतीय (पार्वती) खण्ड
- १- हिमालयके स्थावर-जंगम द्विविध स्वरूप एवं दिव्यत्वका वर्णन, मेनाके साथ उनका विवाह तथा मेना आदिको पूर्वजन्ममें प्राप्त हुए सनकादिके शाप एवं वरदानका कथन... २४३
- २- देवताओंका हिमालयके पास जाना और उनसे सत्कृत हो उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी एक सुन्दर स्थानमें जाकर उनकी स्तुति करना... २४५
( ७ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३-उमादेवीका दिव्यरूपसे देवताओंको दर्शन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करना और देवीका अवतार लेनेकी बात स्वीकार करके देवताओंको आश्वासन देना... | २४७ | वर देना और रतिका शम्बर-नगरमें जाना..... | २७० |
| ४-मेनाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवादेवीका उन्हें अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना तथा मेनासे मैनाकका जन्म... | २४९ | १४-ब्रह्माजीका शिवकी क्रोधाग्निको वडवानलकी संज्ञा दे समुद्रमें स्थापित करके संसारके भयको दूर करना, शिवके विरहसे पार्वतीका शोक तथा नारदजीके द्वारा उन्हें तपस्याके लिये उपदेशपूर्वक पंचाक्षर-मन्त्रकी प्राप्ति... | २७३ |
| ५-देवी उमाका हिमवान्के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा स्तवन, उनका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना... | २५२ | १५-श्रीशिवकी आराधनाके लिये पार्वतीजीकी दुष्कर तपस्या | २७७ |
| ६-पार्वतीका नामकरण और विद्याध्ययन, नारदका हिमवान्के यहाँ जाना, पार्वतीका हाथ देखकर भावी फल बताना, चिन्तित हुए हिमवान्को आश्वासन दे पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करनेको कहना और उनके संदेहका निवारण करना... | २५३ | १६-पार्वतीकी तपस्याविषयक दृढ़ता, उनका पहलेसे भी उग्र तप, उससे त्रिलोकीका संतप्त होना तथा समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णुका भगवान् शिवके स्थानपर जाना... | २७९ |
| ७-मेना और हिमालयकी बातचीत, पार्वती तथा हिमवान्के स्वप्न तथा भगवान् शिवसे 'मंगल' ग्रहकी उत्पत्तिका प्रसंग... | २५७ | १७-देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्का विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना... | २८१ |
| ८-भगवान् शिवका गंगावतरण तीर्थमें तपस्याके लिये आना, हिमवान्द्वारा उनका स्वागत, पूजन और स्तवन तथा भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उनका उस स्थानपर दूसरोंको न जाने देनेकी व्यवस्था करना... | २६० | १८-भगवान् शिवकी आज्ञासे सप्तर्षियोंका पार्वतीके आश्रमपर जा उनके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना और भगवान्को सब वृत्तान्त बताकर स्वर्गको जाना... | २८५ |
| ९-हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना और शिवका कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना... | २६२ | १९-भगवान् शंकरका जटिल तपस्वी ब्राह्मणके रूपमें पार्वतीके आश्रमपर जाना, उनसे सत्कृत हो उनकी तपस्याका कारण पूछना तथा पार्वतीजीका अपनी सखी विजयासे सब कुछ कहलाना... | २८८ |
| १०-पार्वती और शिवका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा पार्वतीद्वारा भगवान्की प्रतिदिन सेवा... | २६४ | २०-पार्वतीकी बात सुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निन्दा करते हुए पार्वतीको उनकी ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना... | २९१ |
| ११-तारकासुरके सताये हुए देवताओंका ब्रह्माजीको अपनी कष्टकथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन्हें पार्वतीके साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग करनेका आदेश देना, ब्रह्माजीके समझानेसे तारकासुरका स्वर्गको छोड़ना और देवताओंका वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्नशील होना... | २६६ | २१-पार्वतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन करना, रोषपूर्वक जटिल ब्राह्मणको फटकारना, सखीद्वारा उन्हें फिर बोलनेसे रोकना तथा भगवान् शिवका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दे अपने साथ चलनेके लिये कहना... | २९३ |
| १२-इन्द्रद्वारा कामका स्मरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहनेसे कामका शिवको मोहनेके लिये प्रस्थान... | २६८ | २२-शिव और पार्वतीकी बातचीत, शिवका पार्वतीके अनुरोधको स्वीकार करना... | २९६ |
| १३-रुद्रकी नेत्राग्निसे कामका भस्म होना, रतिका विलाप, देवताओंकी प्रार्थनासे शिवका कामको द्वापरमें प्रद्युम्नरूपसे नूतन शरीरकी प्राप्तिके लिये | २३-पार्वतीका पिताके घरमें सत्कार, महादेवजीकी नटलीलाका चमत्कार, उनका मेना आदिसे पार्वतीको माँगना और माता-पिताके इनकार करनेपर अन्तर्धान हो जाना... | २९८ | |
| २४-देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना... | ३०१ | ||
| २५-मेनाका कोपभवनमें प्रवेश, भगवान् शिवका |
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| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| श्रीहरिद्वारा शिवतत्त्वका वर्णन, शिवका ब्रह्माजीको दिये हुए वरके अनुसार वेदीपर सदाके लिये अवस्थान तथा शिव और सतीका विदा हो कैलासपर जाना | १९० |
| १३- सतीका प्रश्न तथा उसके उत्तरमें भगवान् शिवद्वारा ज्ञान एवं नवधा भक्तिके स्वरूपका विवेचन .. | १९२ |
| १४- दण्डकारण्यमें शिवको श्रीरामके प्रति मस्तक झुकाते देख सतीका मोह तथा शिवकी आज्ञासे उनके द्वारा श्रीरामकी परीक्षा | १९६ |
| १५- श्रीशिवके द्वारा गोलोकधाममें श्रीविष्णुका गोपेशके पदपर अभिषेक तथा उनके प्रति प्रणामका प्रसंग सुनाकर श्रीरामका सतीके मनका संदेह दूर करना, सतीका शिवके द्वारा मानसिक त्याग | १९९ |
| १६- प्रयागमें समस्त महात्मा मुनियोंद्वारा किये गये यज्ञमें दक्षका भगवान् शिवको तिरस्कारपूर्वक शाप देना तथा नन्दीद्वारा ब्राह्मणकुलको शाप-प्रदान, भगवान् शिवका नन्दीको शान्त करना... | २०३ |
| १७- दक्षके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन, उसमें ब्रह्मा, विष्णु, देवताओं और ऋषियोंका आगमन, दक्षद्वारा सबका सत्कार, यज्ञका आरम्भ, दधीचि-द्वारा भगवान् शिवको बुलानेका अनुरोध और दक्षके विरोध करनेपर शिव-भक्तोंका वहाँसे निकल जाना | २०६ |
| १८- दक्षयज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ चलनेके लिये अनुरोध, दक्षके शिवद्रोहको जानकर भगवान् शिवकी आज्ञासे देवी सतीका पिताके यज्ञमण्डपकी ओर शिवगणोंके साथ प्रस्थान | २०९ |
| १९- यज्ञशालामें शिवका भाग न देखकर सतीके रोषपूर्ण वचन, दक्षद्वारा शिवकी निन्दा सुन दक्ष तथा देवताओंको धिक्कार-फटकारकर सतीद्वारा अपने प्राण-त्यागका निश्चय | २११ |
| २०- सतीका योगाग्निसे अपने शरीरको भस्म कर देना, दर्शकोंका हाहाकार, शिवपार्षदोंका प्राण-त्याग तथा दक्षपर आक्रमण, ऋभुओंद्वारा उनका भगाया जाना तथा देवताओंकी चिन्ता | २१४ |
| २१- आकाशवाणीद्वारा दक्षकी भर्त्सना, उनके विनाशकी सूचना तथा समस्त देवताओंको यज्ञमण्डपसे निकल जानेकी प्रेरणा | २१६ |
| २२- गणोंके मुखसे और नारदसे भी सतीके दग्ध होनेकी बात सुनकर दक्षपर कुपित हुए शिवका अपनी जटासे वीरभद्र और महाकालीको प्रकट करके उन्हें यज्ञ-विध्वंस करने और विरोधियोंको जला डालनेकी आज्ञा देना | २१८ |
| २३- प्रमथगणोंसहित वीरभद्र और महाकालीका |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| दक्षयज्ञ-विध्वंसके लिये प्रस्थान, दक्ष तथा देवताओंको अपशकुन एवं उत्पातसूचक लक्षणोंका दर्शन एवं भय होना | २२१ |
| २४- दक्षके यज्ञकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुसे प्रार्थना, भगवान्का शिवद्रोहजनित संकटको टालनेमें अपनी असमर्थता बताते हुए दक्षको समझाना तथा सेनासहित वीरभद्रका आगमन | २२२ |
| २५- देवताओंका पलायन, इन्द्र आदिके पूछनेपर बृहस्पतिकारुद्रदेवकी अजेयता बताना, वीरभद्रका देवताओंको युद्धके लिये ललकारना, श्रीविष्णु और वीरभद्रकी बातचीत तथा विष्णु आदिका अपने लोकमें जाना एवं दक्ष और यज्ञका विनाश करके वीरभद्रका कैलासको लौटना | २२५ |
| २६- श्रीविष्णुकी पराजयमें दधीचि मुनिके शापको कारण बताते हुए दधीचि और क्षुवके विवादका इतिहास, मृत्युंजय-मन्त्रके अनुष्ठानसे दधीचीकी अवध्यता तथा श्रीहरिका क्षुवको दधीचिकी पराजयके लिये यत्न करनेका आश्वासन ...... | २२८ |
| २७- श्रीविष्णु और देवताओंसे अपराजित दधीचिका उनके लिये शाप और क्षुवपर अनुग्रह... | २३२ |
| २८- देवताओंसहित ब्रह्माका विष्णुलोकमें जाकर अपना दुःख निवेदन करना, श्रीविष्णुका उन्हें शिवसे क्षमा माँगनेकी अनुमति दे उनको साथ ले कैलासपर जाना तथा भगवान् शिवसे मिलना... | २३४ |
| २९- देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति, भगवान् शिवका देवता आदिके अंगोंके ठीक होने और दक्षके जीवित होनेका वरदान देना, श्रीहरि आदिके साथ यज्ञमण्डपमें पधारकर शिवका दक्षको जीवित करना तथा दक्ष और विष्णु आदिके द्वारा उनकी स्तुति... | २३६ |
| ३०- भगवान् शिवका दक्षको अपनी भक्तवत्सलता, ज्ञानी भक्तकी श्रेष्ठता तथा तीनों देवताओंकी एकता बताना, दक्षका अपने यज्ञको पूर्ण करना, सब देवता आदिका अपने-अपने स्थानको जाना, सतीखण्डका उपसंहार और माहात्म्य... | २४० |
| रुद्रसंहिता, तृतीय (पार्वती) खण्ड | |
| १- हिमालयके स्थावर-जंगम द्विविध स्वरूप एवं दिव्यत्वका वर्णन, मेनाके साथ उनका विवाह तथा मेना आदिको पूर्वजन्ममें प्राप्त हुए सनकादिके शाप एवं वरदानका कथन | २४३ |
| २- देवताओंका हिमालयके पास जाना और उनसे सत्कृत हो उन्हें उमाराधनकी विधि बता स्वयं भी एक सुन्दर स्थानमें जाकर उनकी स्तुति करना... | २४५ |
( ७ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३-उमादेवीका दिव्यरूपसे देवताओंको दर्शन देना, देवताओंका उनसे अपना अभिप्राय निवेदन करना और देवीका अवतार लेनेकी बात स्वीकार करके देवताओंको आश्वासन देना........... | २४७ | वर देना और रतिका शम्बर-नगरमें जाना..... | २७० |
| ४-मेनाको प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिवादेवीका उन्हें अभीष्ट वरदानसे संतुष्ट करना तथा मेनासे मैनाकका जन्म................................... | २४९ | १४-ब्रह्माजीका शिवकी क्रोधाग्निको वडवानलकी संज्ञा दे समुद्रमें स्थापित करके संसारके भयको दूर करना, शिवके विरहसे पार्वतीका शोक तथा नारदजीके द्वारा उन्हें तपस्याके लिये उपदेशपूर्वक पंचाक्षर-मन्त्रकी प्राप्ति... | २७३ |
| ५-देवी उमाका हिमवान्के हृदय तथा मेनाके गर्भमें आना, गर्भस्था देवीका देवताओंद्वारा स्तवन, उनका दिव्यरूपमें प्रादुर्भाव, माता मेनासे बातचीत तथा नवजात कन्याके रूपमें परिवर्तित होना................................... | २५२ | १५-श्रीशिवकी आराधनाके लिये पार्वतीजीकी दुष्कर तपस्या ................................. | २७७ |
| ६-पार्वतीका नामकरण और विद्याध्ययन, नारदका हिमवान्के यहाँ जाना, पार्वतीका हाथ देखकर भावी फल बताना, चिन्तित हुए हिमवान्को आश्वासन दे पार्वतीका विवाह शिवजीके साथ करनेको कहना और उनके संदेहका निवारण करना.................................... | २५३ | १६-पार्वतीकी तपस्याविषयक दृढ़ता, उनका पहलेसे भी उग्र तप, उससे त्रिलोकीका संतप्त होना तथा समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णुका भगवान् शिवके स्थानपर जाना................... | २७९ |
| ७-मेना और हिमालयकी बातचीत, पार्वती तथा हिमवान्के स्वप्न तथा भगवान् शिवसे 'मंगल' ग्रहकी उत्पत्तिका प्रसंग........................... | २५७ | १७-देवताओंका भगवान् शिवसे पार्वतीके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भगवान्का विवाहके दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करनेपर स्वीकार कर लेना ............. | २८१ |
| ८-भगवान् शिवका गंगावतरण तीर्थमें तपस्याके लिये आना, हिमवान्द्वारा उनका स्वागत, पूजन और स्तवन तथा भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार उनका उस स्थानपर दूसरोंको न जाने देनेकी व्यवस्था करना............................ | २६० | १८-भगवान् शिवकी आज्ञासे सप्तर्षियोंका पार्वतीके आश्रमपर जा उनके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना और भगवान्को सब वृत्तान्त बताकर स्वर्गको जाना .......................... | २८५ |
| ९-हिमवान्का पार्वतीको शिवकी सेवामें रखनेके लिये उनसे आज्ञा माँगना और शिवका कारण बताते हुए इस प्रस्तावको अस्वीकार कर देना... | २६२ | १९-भगवान् शंकरका जटिल तपस्वी ब्राह्मणके रूपमें पार्वतीके आश्रमपर जाना, उनसे सत्कृत हो उनकी तपस्याका कारण पूछना तथा पार्वतीजीका अपनी सखी विजयासे सब कुछ कहलाना ........................................ | २८८ |
| १०-पार्वती और शिवका दार्शनिक संवाद, शिवका पार्वतीको अपनी सेवाके लिये आज्ञा देना तथा पार्वतीद्वारा भगवान्की प्रतिदिन सेवा........... | २६४ | २०-पार्वतीकी बात सुनकर जटाधारी ब्राह्मणका शिवकी निन्दा करते हुए पार्वतीको उनकी ओरसे मनको हटा लेनेका आदेश देना ........ | २९१ |
| ११-तारकासुरके सताये हुए देवताओंका ब्रह्माजीको अपनी कष्टकथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन्हें पार्वतीके साथ शिवके विवाहके लिये उद्योग करनेका आदेश देना, ब्रह्माजीके समझानेसे तारकासुरका स्वर्गको छोड़ना और देवताओंका वहाँ रहकर लक्ष्यसिद्धिके लिये यत्नशील होना............. | २६६ | २१-पार्वतीजीका परमेश्वर शिवकी महत्ताका प्रतिपादन करना, रोषपूर्वक जटिल ब्राह्मणको फटकारना, सखीद्वारा उन्हें फिर बोलनेसे रोकना तथा भगवान् शिवका उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दे अपने साथ चलनेके लिये कहना ....................... | २९३ |
| १२-इन्द्रद्वारा कामका स्मरण, उसके साथ उनकी बातचीत तथा उनके कहनेसे कामका शिवको मोहनेके लिये प्रस्थान............................ | २६८ | २२-शिव और पार्वतीकी बातचीत, शिवका पार्वतीके अनुरोधको स्वीकार करना ...................... | २९६ |
| १३-रुद्रकी नेत्राग्निसे कामका भस्म होना, रतिका विलाप, देवताओंकी प्रार्थनासे शिवका कामको द्वापरमें प्रद्युम्नरूपसे नूतन शरीरकी प्राप्तिके लिये | २३-पार्वतीका पिताके घरमें सत्कार, महादेवजीकी नटलीलाका चमत्कार, उनका मेना आदिसे पार्वतीको माँगना और माता-पिताके इनकार करनेपर अन्तर्धान हो जाना ................... | २९८ | |
| २४-देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना .................................. | ३०१ | ||
| २५-मेनाका कोपभवनमें प्रवेश, भगवान् शिवका |
( ८ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| हिमवान्के पास सप्तर्षियोंको भेजना तथा हिमवान्द्वारा उनका सत्कार, सप्तर्षियों तथा अरुन्धतीका और महर्षि वसिष्ठका मेना और हिमवान्को समझाकर पार्वतीका विवाह भगवान् शिवके साथ करनेके लिये कहना | ३०३ | हिमाचलके घरके आँगनमें विराजना तथा वर-वधूके द्वारा एक-दूसरेका पूजन | ३३० |
| ३५-शिव-पार्वतीके विवाहका आरम्भ, हिमालयके द्वारा शिवके गोत्रके विषयमें प्रश्न होनेपर नारदजीके द्वारा उत्तर, हिमालयका कन्यादान करके शिवको दहेज देना तथा शिवाका अभिषेक | ३३२ | ||
| २६-सप्तर्षियोंके समझाने तथा मेरु आदिके कहनेसे पत्नीसहित हिमवान्का शिवके साथ अपनी पुत्रीके विवाहका निश्चय करना तथा सप्तर्षियोंका शिवके पास जा उन्हें सब बात बताकर अपने धामको जाना | ३०७ | ३६-शिवके विवाहका उपसंहार, उनके द्वारा दक्षिणा-वितरण, वर-वधूका कोहबर और वासभवनमें जाना, वहाँ स्त्रियोंका उनसे लोकाचारका पालन कराना, रतिकी प्रार्थनासे शिवद्वारा कामको जीवनदान एवं वर-प्रदान, वर-वधूका एक-दूसरेको मिष्टान्न भोजन कराना और शिवका जनवासेमें लौटना | ३३५ |
| २७-हिमवान्का भगवान् शिवके पास लग्नपत्रिका भेजना, विवाहके लिये आवश्यक सामान जुटाना, मंगलाचारका आरम्भ करना, उनका निमन्त्रण पाकर पर्वतों और नदियोंका दिव्यरूपमें आना, पुरीकी सजावट तथा विश्वकर्माद्वारा दिव्यमण्डप एवं देवताओंके निवासके लिये दिव्यलोकोंका निर्माण करवाना | ३१० | ३७-रातको परम सुन्दर सजे हुए वासगृहमें शयन करके प्रातःकाल भगवान् शिवका जनवासेमें आगमन | ३३८ |
| ३८-चतुर्थीकर्म, बारातका कई दिनोंतक ठहरना, सप्तर्षियोंके समझानेसे हिमालयका बारातको विदा करनेके लिये राजी होना, मेनाका शिवको अपनी कन्या सौंपना तथा बारातका पुरीके बाहर जाकर ठहरना | ३४० | ||
| २८-भगवान् शिवका नारदजीके द्वारा सब देवताओंको निमन्त्रण दिलाना, सबका आगमन तथा शिवका मंगलाचार एवं ग्रहपूजन आदि करके कैलाससे बाहर निकलना | ३१४ | ३९-मेनाकी इच्छाके अनुसार एक ब्राह्मण-पत्नीका पार्वतीको पतिव्रतधर्मका उपदेश देना | ३४१ |
| २९-भगवान् शिवका बारात लेकर हिमालयपुरीकी ओर प्रस्थान | ३१६ | ४०-शिव-पार्वती तथा उनकी बारातकी विदाई, भगवान् शिवका समस्त देवताओंको विदा करके कैलासपर रहना और पार्वतीखण्डके श्रवणकी महिमा | ३४६ |
| ३०-हिमवान्द्वारा शिवकी बारातकी अगवानी तथा सबका अभिनन्दन एवं वन्दन, मेनाका नारदजीको बुलाकर उनसे बारातियोंका परिचय पाना तथा शिव और उनके गणोंको देखकर भयसे मूर्च्छित होना | ३१८ | रुद्रसंहिता, चतुर्थ (कुमार) खण्ड<br>१-देवताओंद्वारा स्कन्दका शिव-पार्वतीके पास लाया जाना, उनका लाड़-प्यार, देवोंके माँगनेपर शिवजीका उन्हें तारक-वधके लिये स्वामी कार्तिकको देना, कुमारकी अध्यक्षतामें देव-सेनाका प्रस्थान, महीसागर-संगमपर तारकासुरका आना और दोनों सेनाओंमें मुठभेड़, वीरभद्रका तारकके साथ घोर संग्राम, पुनः श्रीहरि और तारकमें भयानक युद्ध | ३४९ |
| ३१-मेनाका विलाप, शिवके साथ कन्याका विवाह न करनेका हठ, देवताओं तथा श्रीविष्णुका उन्हें समझाना तथा उनका सुन्दर रूप धारण करनेपर ही शिवको कन्या देनेका विचार प्रकट करना | ३२२ | २-ब्रह्माजीकी आज्ञासे कुमारका युद्धके लिये जाना, तारकके साथ उनका भीषण संग्राम और उनके द्वारा तारकका वध, तत्पश्चात् देवोंद्वारा कुमारका अभिनन्दन और स्तवन, कुमारका उन्हें वरदान देकर कैलासपर जा शिव-पार्वतीके पास निवास करना | ३५२ |
| ३२-भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, मेनाकी प्रसन्नता और क्षमा-प्रार्थना तथा पुरवासिनी स्त्रियोंका शिवके रूपका दर्शन करके जन्म और जीवनको सफल मानना | ३२६ | ३-शिवाका अपनी मैलसे गणेशको उत्पन्न करके द्वारपाल-पदपर नियुक्त करना, गणेशद्वारा शिवजीके रोके जानेपर उनका शिवगणोंके साथ भयंकर संग्राम, शिवजीद्वारा गणेशका शिरश्छेदन, कुपित | |
| ३३-मेनाद्वारा द्वारपर भगवान् शिवका परिछन, उनके रूपको देखकर संतोषका अनुभव, अन्यान्य युवतियोंद्वारा वरकी प्रशंसा, पार्वतीका अम्बिकापूजनके लिये बाहर निकलना तथा देवताओं और भगवान् शिवका उनके सुन्दर रूपको देखकर प्रसन्न होना | ३२८ | ||
| ३४-वरपक्षके आभूषणोंसे विभूषित शिवाकी नीराजना, कन्यादानके समय वरके साथ सब देवताओंका |
( ९ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| हुई शिवाका शक्तियोंको उत्पन्न करना और उनके द्वारा प्रलय मचाया जाना, देवताओं और ऋषियोंका स्तवनद्वारा पार्वतीको प्रसन्न करना, उनके द्वारा पुत्रको जिलाये जानेकी बात कही जानेपर शिवजीके आज्ञानुसार हाथीका सिर लाया जाना और उसे गणेशके धड़से जोड़कर उन्हें जीवित करना ......... | ३५५ | जीवित बच निकलना ......... | ३७८ |
| ४- पार्वतीद्वारा गणेशजीको वरदान, देवोंद्वारा उन्हें अग्रपूज्य माना जाना, शिवजीद्वारा गणेशको सर्वाध्यक्ष-पद प्रदान और गणेशचतुर्थीव्रतका वर्णन, तत्पश्चात् सभी देवताओंका उनकी स्तुति करके हर्षपूर्वक अपने-अपने स्थानको लौट जाना ......... | ३६० | ५- देवोंके स्तवनसे शिवजीका कोप शान्त होना और शिवजीका उन्हें वर देना, मय दानवका शिवजीके समीप आना और उनसे वर-याचना करना, शिवजीसे वर पाकर मयका वितललोकमें जाना ......... | ३८३ |
| ५- स्वामिकार्तिक और गणेशकी बाल-लीला, दोनोंका परस्पर विवाहके विषयमें विवाद, शिवजीद्वारा पृथ्वी-परिक्रमाका आदेश, कार्तिकेयका प्रस्थान, गणेशका माता-पिताकी परिक्रमा करके उनसे पृथ्वी-परिक्रमा स्वीकृत कराना, विश्वरूपकी सिद्धि और बुद्धि नामक दोनों कन्याओंके साथ गणेशका विवाह और उनसे क्षेम तथा लाभ नामक दो पुत्रोंकी उत्पत्ति, कुमारका पृथ्वी-परिक्रमा करके लौटना और क्षुब्ध होकर क्रौंचपर्वतपर चला जाना, कुमार-खण्डके श्रवणकी महिमा ......... | ३६४ | ६- दम्भकी तपस्या और विष्णुद्वारा उसे पुत्रप्राप्तिका वरदान, शंखचूड़का जन्म, तप और उसे वरप्राप्ति, ब्रह्माजीकी आज्ञासे उसका पुष्करमें तुलसीके पास आना और उसके साथ वार्तालाप, ब्रह्माजीका पुनः वहाँ प्रकट होकर दोनोंको आशीर्वाद देना और शंखचूड़का गान्धर्व विवाहकी विधिसे तुलसीका पाणिग्रहण करना ......... | ३८६ |
| रुद्रसंहिता, पंचम (युद्ध) खण्ड | ७- शंखचूड़का असुरराज्यपर अभिषेक और उसके द्वारा देवोंका अधिकार छीना जाना, देवोंका ब्रह्माकी शरणमें जाना, ब्रह्माका उन्हें साथ लेकर विष्णुके पास जाना, विष्णुद्वारा शंखचूड़के जन्मका रहस्योद्घाटन और फिर सबका शिवके पास जाना और शिवसभामें उनकी झाँकी करना तथा अपना अभिप्राय प्रकट करना...... | ३९० | |
| १- तारकपुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष-की तपस्या, ब्रह्माद्वारा उन्हें वर-प्रदान, मयद्वारा उनके लिये तीन पुरोंका निर्माण और उनकी सजावट-शोभाका वर्णन ......... | ३६९ | ८- देवताओंका रुद्रके पास जाकर अपना दुःख निवेदन करना, रुद्रद्वारा उन्हें आश्वासन और चित्ररथको शंखचूड़के पास भेजना, चित्ररथके लौटनेपर रुद्रका गणों, पुत्रों और भद्रकालीसहित युद्धके लिये प्रस्थान, उधर शंखचूड़का सेनासहित पुष्पभद्राके तटपर पड़ाव डालना तथा दानवराजके दूत और शिवकी बातचीत ......... | ३९३ |
| २- तारकपुत्रोंके प्रभावसे संतप्त हुए देवोंकी ब्रह्माके पास करुण पुकार, ब्रह्माका उन्हें शिवके पास भेजना, शिवकी आज्ञासे देवोंका विष्णुकी शरणमें जाना और विष्णुका उन दैत्योंको मोहित करके उन्हें आचारभ्रष्ट करना ......... | ३७२ | ९- देवताओं और दानवोंका युद्ध, शंखचूड़के साथ वीरभद्रका संग्राम, पुनः उसके साथ भद्रकालीका भयंकर युद्ध करना और आकाशवाणी सुनकर निवृत्त होना, शिवजीका शंखचूड़के साथ युद्ध और आकाशवाणी सुनकर युद्धसे निवृत्त हो विष्णुको प्रेरित करना, विष्णुद्वारा शंखचूड़के कवच और तुलसीके शीलका अपहरण, फिर रुद्रके हाथों त्रिशूलद्वारा शंखचूड़का वध, शंखकी उत्पत्तिका कथन ......... | ३९७ |
| ३- देवोंका शिवजीके पास जाकर उनका स्तवन करना, शिवजीके त्रिपुरवधके लिये उद्यत न होनेपर ब्रह्मा और विष्णुका उन्हें समझाना, विष्णुके बतलाये हुए शिव-मन्त्रका देवोंद्वारा तथा विष्णुद्वारा जप, शिवजीकी प्रसन्नता और उनके लिये विश्वकर्माद्वारा सर्वदेवमय रथका निर्माण ......... | ३७४ | १०- विष्णुद्वारा तुलसीके शील-हरणका वर्णन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विष्णुको शाप, शम्भुद्वारा तुलसी और शालग्राम-शिलाके माहात्म्यका वर्णन ..... | ४०२ |
| ४- सर्वदेवमय रथका वर्णन, शिवजीका उस रथपर चढ़कर युद्धके लिये प्रस्थान, उनका पशुपति नाम पड़नेका कारण, शिवजीद्वारा गणेशका पूजन और त्रिपुर-दाह, मयदानवका त्रिपुरसे | ११- उमाद्वारा शम्भुके नेत्र मूँद लिये जानेपर अन्धकारमें शम्भुके पसीनेसे अन्धकासुरकी उत्पत्ति, हिरण्याक्षकी पुत्रार्थ तपस्या और शिवका उसे पुत्ररूपमें अन्धकको देना, हिरण्याक्षका त्रिलोकीको जीतकर पृथ्वीको रसातलमें ले जाना और वराहरूपधारी विष्णुद्वारा उसका वध ............ | ४०४ |
( १० )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| १२- हिरण्यकशिपुकी तपस्या और ब्रह्मासे वरदान पाकर उसका अत्याचार, नृसिंहद्वारा उसका वध और प्रह्लादको राज्यप्राप्ति | ४०७ |
| १३- भाइयोंके उपालम्भसे अन्धकका तप करना और वर पाकर त्रिलोकीको जीतकर स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त होना, उसके मन्त्रियोंद्वारा शिव-परिवारका वर्णन, पार्वतीके सौन्दर्यपर मोहित होकर अन्धकका वहाँ जाना और नन्दीश्वरके साथ युद्ध, अन्धकके प्रहारसे नन्दीश्वरकी मूर्च्छा, पार्वतीके आवाहनसे देवियोंका प्रकट होकर युद्ध करना, शिवका आगमन और युद्ध, शिवद्वारा शुक्राचार्यका निगला जाना, शिवकी प्रेरणासे विष्णुका कालीरूप धारण करके दानवोंके रक्तका पान करना, शिवका अन्धकको अपने त्रिशूलमें पिरोना और युद्धकी समाप्ति | ४०९ |
| १४- नन्दीश्वरद्वारा शुक्राचार्यका अपहरण और शिवद्वारा उनका निगला जाना, सौ वर्षके बाद शुक्रका शिवलिंगके रास्ते बाहर निकलना, शिवद्वारा उनका 'शुक्र' नाम रखा जाना, शुक्रद्वारा जपे गये मृत्युंजय-मन्त्र और शिवाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रका वर्णन, शिवद्वारा अन्धकको वर-प्रदान | ४१५ |
| १५- शुक्राचार्यकी घोर तपस्या और इनका शिवजीको चित्तरत्न अर्पण करना तथा अष्टमूर्त्यष्टक-स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजीका प्रसन्न होकर उन्हें मृतसंजीवनी विद्या तथा अन्यान्य वर प्रदान करना | ४२२ |
| १६- बाणासुरकी तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिवका गणों और पुत्रोंसहित उसके नगरमें निवास करना, बाणपुत्री उषाका रातके समय स्वप्नमें अनिरुद्धके साथ मिलन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका द्वारकासे अपहरण, बाणका अनिरुद्धको नागपाशमें बाँधना, दुर्गाके स्तवनसे अनिरुद्धका बन्धनमुक्त होना, नारदद्वारा समाचार पाकर श्रीकृष्णकी शोणितपुरपर चढ़ाई, शिवके साथ उनका घोर युद्ध, शिवकी आज्ञासे श्रीकृष्णका उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाणकी सेनाका संहार करना | ४२६ |
| १७- श्रीकृष्णद्वारा बाणकी भुजाओंका काटा जाना, सिर काटनेके लिये उद्यत हुए श्रीकृष्णको शिवका रोकना और उन्हें समझाना, श्रीकृष्णका परिवारसमेत द्वारकाको लौट जाना, बाणका ताण्डव नृत्यद्वारा शिवको प्रसन्न करना, शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानोंके साथ महाकालत्वकी प्राप्ति | ४३२ |
| १८- गजासुरकी तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिवद्वारा उसका वध, उसकी प्रार्थनासे शिवका उसका चर्म धारण करना और 'कृत्तिवासा' नामसे विख्यात होना तथा कृत्तिवासेश्वर-लिंगकी स्थापना करना | ४३५ |
| १९- दुन्दुभिनिर्ह्राद नामक दैत्यका व्याघ्ररूपसे शिवभक्तपर आक्रमण करनेका विचार और शिवद्वारा उसका वध | ४३६ |
| २०- विदल और उत्पल नामक दैत्योंका पार्वतीपर मोहित होना और पार्वतीका कन्दुक-प्रहारद्वारा उनका काम तमाम करना, कन्दुकेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा | ४३७ |
| शतरुद्रसंहिता | |
| १- शिवजीके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान नामक पाँच अवतारोंका वर्णन | ४३९ |
| २- शिवजीकी अष्टमूर्तियोंका तथा अर्धनारीनररूपका सविस्तर वर्णन | ४४१ |
| ३- वाराहकल्पमें होनेवाले शिवजीके प्रथम अवतारसे लेकर नवम ऋषभ अवतारतकका वर्णन | ४४४ |
| ४- शिवजीद्वारा दसवेंसे लेकर अट्ठाईसवें योगेश्वरावतारोंका वर्णन | ४४६ |
| ५- नन्दीश्वरावतारका वर्णन | ४४८ |
| ६- नन्दीश्वरके जन्म, वरप्राप्ति, अभिषेक और विवाहका वर्णन | ४५० |
| ७- कालभैरवका माहात्म्य, विश्वानरकी तपस्या और शिवजीका प्रसन्न होकर उनकी पत्नी शुचिष्मतीके गर्भसे उनके पुत्ररूपमें प्रकट होनेका उन्हें वरदान देना | ४५३ |
| ८- शिवजीका शुचिष्मतीके गर्भसे प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा बालकका संस्कार करके 'गृहपति' नाम रखा जाना, नारदजीद्वारा उसका भविष्य-कथन, पिताकी आज्ञासे गृहपतिका काशीमें जाकर तप करना, इन्द्रका वर देनेके लिये प्रकट होना, गृहपतिका उन्हें ठुकराना, शिवजीका प्रकट होकर उन्हें वरदान देकर दिक्पालपद प्रदान करना तथा अग्नीश्वरलिंग और अग्निका माहात्म्य | ४५६ |
| ९- शिवजीके महाकाल आदि दस अवतारोंका तथा ग्यारह रुद्र-अवतारोंका वर्णन | ४६१ |
| १०- शिवजीके 'दुर्वासावतार' तथा 'हनुमदवतार'का वर्णन | ४६३ |
| ११- शिवजीके पिप्पलाद-अवतारके प्रसंगमें देवताओंकी दधीचि मुनिसे अस्थि-याचना, दधीचिका शरीरत्याग, वज्र-निर्माण तथा उसके द्वारा वृत्रासुरका वध, सुवर्चाका देवताओंको शाप, पिप्पलादका जन्म और उनका विस्तृत वृत्तान्त | ४६५ |
(११)
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| १२- भगवान् शिवके द्विजेश्वरावतारकी कथा- राजा भद्रायु तथा रानी कीर्तिमालिनीकी धार्मिक दृढ़ताकी परीक्षा | ४६८ |
| १३- भगवान् शिवका यतिनाथ एवं हंस नामक अवतार | ४७१ |
| १४- भगवान् शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतारकी कथा | ४७२ |
| १५- भगवान् शिवके अवधूतेश्वरावतारकी कथा और उसकी महिमाका वर्णन | ४७५ |
| १६- भगवान् शिवके भिक्षुवर्यावतारकी कथा, राजकुमार और द्विजकुमारपर कृपा | ४७७ |
| १७- शिवके सुरेश्वरावतारकी कथा, उपमन्युकी तपस्या और उन्हें उत्तम वरकी प्राप्ति | ४८० |
| १८- शिवजीके किरातावतारके प्रसंगमें श्रीकृष्णद्वारा द्वैतवनमें दुर्वासाके शापसे पाण्डवोंकी रक्षा, व्यासजीका अर्जुनको शस्त्रविद्या और पार्थिव-पूजनकी विधि बताकर तपके लिये सम्मति देना, अर्जुनका इन्द्रकील पर्वतपर तप, इन्द्रका आगमन और अर्जुनको वरदान, अर्जुनका शिवजीके उद्देश्यसे पुनः तपमें प्रवृत्त होना | ४८२ |
| १९- किरातावतारके प्रसंगमें मूक नामक दैत्यका शूकररूप धारण करके अर्जुनके पास आना, शिवजीका किरातवेषमें प्रकट होना और अर्जुन तथा किरातवेषधारी शिवद्वारा उस दैत्यका वध | ४८५ |
| २०- अर्जुन और शिवदूतका वार्तालाप, किरातवेषधारी शिवजीके साथ अर्जुनका युद्ध, पहचाननेपर अर्जुनद्वारा शिव-स्तुति, शिवजीका अर्जुनको वरदान देकर अन्तर्धान होना, अर्जुनका आश्रमपर लौटकर भाइयोंसे मिलना, श्रीकृष्णका अर्जुनसे मिलनेके लिये वहाँ पधारना | ४८७ |
| २१- शिवजीके द्वादश ज्योतिर्लिंगावतारोंका सविस्तर वर्णन | ४९३ |
| कोटिरुद्रसंहिता | |
| १- द्वादश ज्योतिर्लिंगों तथा उनके उपलिंगोंका वर्णन एवं उनके दर्शन-पूजनकी महिमा | ४९७ |
| २- काशी आदिके विभिन्न लिंगोंका वर्णन तथा अत्रीश्वरकी उत्पत्तिके प्रसंगमें गंगा और शिवके अत्रिके तपोवनमें नित्य निवास करनेकी कथा | ५०० |
| ३- ऋषिकापर भगवान् शिवकी कृपा, एक असुरसे उसके धर्मकी रक्षा करके उसके आश्रममें 'नन्दिकेश' नामसे निवास करना और वर्षमें एक दिन गंगाका भी वहाँ आना | ५०१ |
| ४- प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथके प्रादुर्भावकी कथा और उसकी महिमा | ५०३ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ५- मल्लिकार्जुन और महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनकी महिमा | ५०५ |
| ६- महाकालके माहात्म्यके प्रसंगमें शिवभक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकरकी कथा | ५०७ |
| ७- विन्ध्यकी तपस्या, ओंकारमें परमेश्वरलिंगके प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन | ५११ |
| ८- केदारेश्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनके माहात्म्यका वर्णन | ५१३ |
| ९- विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग और उनकी महिमाके प्रसंगमें पंचक्रोशीकी महत्ताका प्रतिपादन | ५१७ |
| १०- वाराणसी तथा विश्वेश्वरका माहात्म्य | ५२० |
| ११- त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंगके प्रसंगमें महर्षि गौतमके द्वारा किये गये परोपकारकी कथा, उनका तपके प्रभावसे अक्षय जल प्राप्त करके ऋषियोंकी अनावृष्टिके कष्टसे रक्षा करना; ऋषियोंका छलपूर्वक उन्हें गोहत्यामें फँसाकर आश्रमसे निकालना और शुद्धिका उपाय बताना | ५२२ |
| १२- पत्नीसहित गौतमकी आराधनासे संतुष्ट हो भगवान् शिवका उन्हें दर्शन देना, गंगाको वहाँ स्थापित करके स्वयं भी स्थिर होना, देवताओंका वहाँ बृहस्पतिके सिंहराशिपर आनेपर गंगाजीके विशेष माहात्म्यको स्वीकार करना, गंगाका गौतमी (या गोदावरी) नामसे और शिवका त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंगके नामसे विख्यात होना तथा इन दोनोंकी महिमा | ५२५ |
| १३- वैद्यनाथेश्वर ज्योतिर्लिंगके प्राकट्यकी कथा तथा महिमा | ५२८ |
| १४- नागेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगका प्रादुर्भाव और उसकी महिमा | ५३० |
| १५- रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन | ५३२ |
| १६- घुश्माकी शिवभक्तिसे उसके मरे हुए पुत्रका जीवित होना, घुश्मेश्वर शिवका प्रादुर्भाव तथा उनकी महिमाका वर्णन | ५३४ |
| १७- शंकरजीकी आराधनासे भगवान् विष्णुको सुदर्शन चक्रकी प्राप्ति तथा उसके द्वारा दैत्योंका संहार | ५३८ |
| १८- भगवान् विष्णुद्वारा पठित शिवसहस्रनाम-स्तोत्र | ५३९ |
| १९- भगवान् शिवको संतुष्ट करनेवाले व्रतोंका वर्णन, शिवरात्रि-व्रतकी विधि एवं महिमाका कथन | ५६२ |
| २०- शिवरात्रि-व्रतके उद्यापनकी विधि | ५६७ |
| २१- अनजानमें शिवरात्रि-व्रत करनेसे एक भीलपर भगवान् शंकरकी अद्भुत कृपा | ५६८ |
( १२ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| २२- मुक्ति और भक्तिके स्वरूपका विवेचन ......... | ५७४ |
| २३- शिव, विष्णु, रुद्र और ब्रह्माके स्वरूपका विवेचन ..................................................... | ५७५ |
| २४- शिवसम्बन्धी तत्त्वज्ञानका वर्णन तथा उसकी महिमा, कोटिरुद्रसंहिताका माहात्म्य एवं उपसंहार...................................................... | ५७७ |
| उमासंहिता | |
| १- भगवान् श्रीकृष्णके तपसे संतुष्ट हुए शिव और पार्वतीका उन्हें अभीष्ट वर देना तथा शिवकी महिमा........................................................... | ५८० |
| २- नरकमें गिरानेवाले पापोंका संक्षिप्त परिचय... | ५८२ |
| ३- पापियों और पुण्यात्माओंकी यमलोकयात्रा... | ५८४ |
| ४- नरकोंकी अट्ठाईस कोटियों तथा प्रत्येकके पाँच-पाँच नायकके क्रमसे एक सौ चालीस रौरवादि नरकोंकी नामावली .................................... | ५८६ |
| ५- विभिन्न पापोंके कारण मिलनेवाली नरकयातनाका वर्णन तथा कुक्कुरबलि, काकबलि एवं देवता आदिके लिये दी हुई बलिकी आवश्यकता एवं महत्ताका प्रतिपादन........................................ | ५८८ |
| ६- यमलोकके मार्गमें सुविधा प्रदान करनेवाले विविध दानोंका वर्णन................................... | ५९० |
| ७- जलदान, जलाशय-निर्माण, वृक्षारोपण, सत्य-भाषण और तपकी महिमा........................... | ५९२ |
| ८- वेद और पुराणोंके स्वाध्याय तथा विविध प्रकारके दानकी महिमा, नरकोंका वर्णन तथा उनमें गिरानेवाले पापोंका दिग्दर्शन, पापोंके लिये सर्वोत्तम प्रायश्चित्त शिवस्मरण तथा ज्ञानके महत्त्वका प्रतिपादन....................................... | ५९४ |
| ९- मृत्युकाल निकट आनेके कौन-कौनसे लक्षण हैं, इसका वर्णन... .................................... | ५९७ |
| १०- कालको जीतनेका उपाय, नवधा शब्दब्रह्म एवं तुंकारके अनुसंधान और उससे प्राप्त होनेवाली सिद्धियोंका वर्णन... .................................... | ५९९ |
| ११- काल या मृत्युको जीतकर अमरत्व प्राप्त करनेकी चार यौगिक साधनाएँ—प्राणायाम, भ्रूमध्यमें अग्निका ध्यान, मुखसे वायुपान तथा मुड़ी हुई जिह्वाद्वारा गलेकी घाटीका स्पर्श...................... | ६०१ |
| १२- भगवती उमाके कालिका-अवतारकी कथा—समाधि और सुरथके समक्ष मेधाका देवीकी कृपासे मधुकैटभके वधका प्रसंग सुनाना... ... | ६०३ |
| १३- सम्पूर्ण देवताओंके तेजसे देवीका महालक्ष्मीरूपमें अवतार और उनके द्वारा महिषासुरका वध ... | ६०७ |
| १४- देवी उमाके शरीरसे सरस्वतीका आविर्भाव, उनके रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत भेजना, दूतके निराश लौटनेपर शुम्भका क्रमशः धूम्रलोचन, चण्ड, मुण्ड तथा |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| रक्तबीजको भेजना और देवीके द्वारा उन सबका मारा जाना... .................................... | ६१० |
| १५- देवीके द्वारा सेना और सेनापतियोंसहित निशुम्भ एवं शुम्भका संहार.......................... | ६१३ |
| १६- देवताओंका गर्व दूर करनेके लिये तेजः-पुंजरूपिणी उमाका प्रादुर्भाव... ...................... | ६१६ |
| १७- देवीके द्वारा दुर्गमासुरका वध तथा उनके दुर्गा, शताक्षी, शाकम्भरी और भ्रामरी आदि नाम पड़नेका कारण... ........................................ | ६१९ |
| १८- देवीके क्रियायोगका वर्णन—देवीकी मूर्ति एवं मन्दिरके निर्माण, स्थापन और पूजनका महत्त्व, परा अम्बाकी श्रेष्ठता, विभिन्न मासों और तिथियोंमें देवीके व्रत, उत्सव और पूजन आदिके फल तथा इस संहिताके श्रवण एवं पाठकी महिमा... ................................... | ६२२ |
| कैलाससंहिता | |
| १- ऋषियोंका सूतजीसे तथा वामदेवजीका स्कन्दसे प्रश्न—प्रणवार्थ-निरूपणके लिये अनुरोध... ... | ६२६ |
| २- प्रणवके वाच्यार्थरूप सदाशिवके स्वरूपका ध्यान, वर्णाश्रम-धर्मके पालनका महत्त्व, ज्ञानमयी पूजा, संन्यासके पूर्वाङ्गभूत नान्दीश्राद्ध एवं ब्रह्मयज्ञ आदिका वर्णन... ............................. | ६३० |
| ३- संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि—गणपति-पूजन, होम, तत्त्व-शुद्धि, सावित्री-प्रवेश, सर्वसंन्यास और दण्ड-धारण आदिका प्रकार... | ६३६ |
| ४- प्रणवके अर्थोंका विवेचन... ........................... | ६४३ |
| ५- शैवदर्शनके अनुसार शिवतत्त्व, जगत्-प्रपंच और जीवतत्त्वके विषयमें विशद विवेचन तथा शिवसे जीव और जगत्की अभिन्नताका प्रतिपादन... | ६४५ |
| ६- महावाक्योंके अर्थपर विचार तथा संन्यासियोंके योगपट्टका प्रकार... .................................... | ६५० |
| ७- यतिके अन्त्येष्टिकर्मकी दशाहपर्यन्त विधिका वर्णन.......................................................... | ६५४ |
| ८- यतिके लिये एकादशाह-कृत्यका वर्णन........ | ६५८ |
| ९- यतिके द्वादशाह-कृत्यका वर्णन, स्कन्द और वामदेवका कैलास पर्वतपर जाना तथा सूतजीके द्वारा इस संहिताका उपसंहार........................ | ६६० |
| वायवीयसंहिता ( पूर्वखण्ड ) | |
| १- प्रयागमें ऋषियोंद्वारा सम्मानित सूतजीके द्वारा कथाका आरम्भ, विद्यास्थानों एवं पुराणोंका परिचय तथा वायुसंहिताका प्रारम्भ... ........... | ६६३ |
| २- ऋषियोंका ब्रह्माजीके पास जा उनकी स्तुति करके उनसे परमपुरुषके विषयमें प्रश्न करना और ब्रह्माजीका आनन्दमग्न हो ‘रुद्र’ कहकर उत्तर देना... .................................... | ६६५ |
| ३- ब्रह्माजीके द्वारा परमतत्त्वके रूपमें भगवान् शिवकी |
( १३ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ही महत्ताका प्रतिपादन, उनकी कृपाको ही सब साधनोंका फल बताना तथा उनकी आज्ञासे सब मुनियोंका नैमिषारण्यमें आना... | ६६७ | प्रतिपादन... | ६९८ |
| ४- नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन, उनका सत्कार तथा ऋषियोंके पूछनेपर वायुके द्वारा पशु, पाश एवं पशुपतिका तात्त्विक विवेचन... | ६७१ | १६- ऋषियोंके प्रश्नका उत्तर देते हुए वायुदेवके द्वारा शिवके स्वतन्त्र एवं सर्वानुग्राहक स्वरूपका प्रतिपादन... | ७०० |
| ५- महेश्वरकी महत्ताका प्रतिपादन... | ६७५ | १७- परम धर्मका प्रतिपादन, शैवागमके अनुसार पाशुपत ज्ञान तथा उसके साधनोंका वर्णन... | ७०४ |
| ६- ब्रह्माजीकी मूर्च्छा, उनके मुखसे रुद्रदेवका प्राकट्य, सप्राण हुए ब्रह्माजीके द्वारा आठ नामोंसे महेश्वरकी स्तुति तथा रुद्रकी आज्ञासे ब्रह्माद्वारा सृष्टि-रचना... | ६७९ | १८- पाशुपत-व्रतकी विधि और महिमा तथा भस्म-धारणकी महत्ता... | ७०८ |
| ७- भगवान् रुद्रके ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट होनेका रहस्य, रुद्रके महामहिम स्वरूपका वर्णन, उनके द्वारा रुद्रगणोंकी सृष्टि तथा ब्रह्माजीके रोकनेसे उनका सृष्टिसे विरत होना... | ६८२ | १९- बालक उपमन्युको दूधके लिये दुःखी देख माताका उसे शिवकी आराधनाके लिये प्रेरित करना तथा उपमन्युकी तीव्र तपस्या... | ७१३ |
| ८- ब्रह्माजीके द्वारा अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति तथा उस स्तोत्रकी महिमा... | ६८४ | २०- भगवान् शंकरका इन्द्ररूप धारण करके उपमन्युके भक्तिभावकी परीक्षा लेना, उन्हें क्षीरसागर आदि देकर बहुत-से वर देना और अपना पुत्र मानकर पार्वतीके हाथमें सौंपना, कृतार्थ हुए उपमन्युका अपनी माताके स्थानपर लौटना... | ७१५ |
| ९- महादेवजीके शरीरसे देवीका प्राकट्य और देवीके भ्रूमध्यभागसे शक्तिका प्रादुर्भाव... | ६८७ | वायवीयसंहिता ( उत्तरखण्ड ) | |
| १०- भगवान् शिवका पार्वती तथा पार्षदोंके साथ मन्दराचलपर जाकर रहना, शुम्भ-निशुम्भके वधके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे शिवका पार्वतीको 'काली' कहकर कुपित करना और कालीका 'गौरी' होनेके लिये तपस्याके निमित्त जानेकी आज्ञा माँगना... | ६८८ | १- ऋषियोंके पूछनेपर वायुदेवका श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलनका प्रसंग सुनाना, श्रीकृष्णको उपमन्युसे ज्ञानका और भगवान् शंकरसे पुत्रका लाभ... | ७१९ |
| ११- पार्वतीकी तपस्या, एक व्याघ्रपर उनकी कृपा, ब्रह्माजीका उनके पास आना, देवीके साथ उनका वार्तालाप, देवीके द्वारा काली त्वचाका त्याग और उससे कृष्णवर्णा कुमारी कन्याके रूपमें उत्पन्न हुई कौशिकीके द्वारा शुम्भ-निशुम्भका वध... | ६९१ | २- उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको पाशुपत ज्ञानका उपदेश... | ७२० |
| १२- गौरीदेवीका व्याघ्रको अपने साथ ले जानेके लिये ब्रह्माजीसे आज्ञा माँगना, ब्रह्माजीका उसे दुष्कर्मी बताकर रोकना, देवीका शरणागतको त्यागनेसे इनकार करना, ब्रह्माजीका देवीकी महत्ता बताकर अनुमति देना और देवीका माता-पितासे मिलकर मन्दराचलको जाना... | ६९३ | ३- भगवान् शिवकी ब्रह्मा आदि पंचमूर्तियों, ईशानादि ब्रह्ममूर्तियों तथा पृथ्वी एवं शर्व आदि अष्टमूर्तियोंका परिचय और उनकी सर्वव्यापकताका वर्णन... | ७२३ |
| १३- मन्दराचलपर गौरीदेवीका स्वागत, महादेवजीके द्वारा उनके और अपने उत्कृष्ट स्वरूप एवं अविच्छेद्य सम्बन्धपर प्रकाश तथा देवीके साथ आये हुए व्याघ्रको उनका गणाध्यक्ष बनाकर अन्तःपुरके द्वारपर सोमनन्दी नामसे प्रतिष्ठित करना... | ६९५ | ४- शिव और शिवाकी विभूतियोंका वर्णन... | ७२४ |
| १४- अग्नि और सोमके स्वरूपका विवेचन तथा जगत्की अग्नीषोमात्मकताका प्रतिपादन... | ६९७ | ५- परमेश्वर शिवके यथार्थ स्वरूपका विवेचन तथा उनकी शरणमें जानेसे जीवके कल्याणका कथन... | ७२९ |
| १५- जगत् 'वाणी और अर्थरूप' है—इसका | ६- शिवके शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सर्वमय, सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूपका तथा उनकी प्रणवरूपताका प्रतिपादन... | ७३१ | |
| ७- परमेश्वरकी शक्तिका ऋषियोंद्वारा साक्षात्कार, शिवके प्रसादसे प्राणियोंकी मुक्ति, शिवकी सेवाभक्ति तथा पाँच प्रकारके शिव-धर्मका वर्णन... | ७३३ | ||
| ८- शिव-ज्ञान, शिवकी उपासनासे देवताओंको उनका दर्शन, सूर्यदेवमें शिवकी पूजा करके अर्घ्यदानकी विधि तथा व्यासावतारोंका वर्णन... | ७३५ | ||
| ९- शिवके अवतार, योगाचार्यों तथा उनके शिष्योंकी नामावली... | ७३८ | ||
| १०- भगवान् शिवके प्रति श्रद्धा-भक्तिकी आवश्यकताका प्रतिपादन, शिवधर्मके चार पादोंका वर्णन एवं ज्ञानयोगके साधनों तथा शिवधर्मके अधिकारियोंका निरूपण, शिवपूजनके अनेक प्रकार एवं अनन्यचित्तसे भजनकी महिमा... | ७३९ |
(१४)
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ११- वर्णाश्रम-धर्म तथा नारी-धर्मका वर्णन; शिवके भजन, चिन्तन एवं ज्ञानकी महत्ताका प्रतिपादन... | ७४२ | २५- काम्य कर्मके प्रसंगमें शक्तिसहित पंचमुख महादेवकी पूजाके विधानका वर्णन... | ७८५ |
| १२- पंचाक्षर-मन्त्रके माहात्म्यका वर्णन... | ७४६ | २६- आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन... | ७८७ |
| १३- पंचाक्षर-मन्त्रकी महिमा, उसमें समस्त वाङ्मयकी स्थिति, उसकी उपदेशपरम्परा, देवीरूपा पंचाक्षरीविद्याका ध्यान, उसके समस्त और व्यस्त अक्षरोंके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति तथा अंगन्यास आदिका विचार... | ७४८ | २७- शिवके पाँच आवरणोंमें स्थित सभी देवताओंकी स्तुति तथा उनसे अभीष्टपूर्ति एवं मंगलकी कामना... | ७९३ |
| १४- गुरुसे मन्त्र लेने तथा उसके जप करनेकी विधि, पाँच प्रकारके जप तथा उनकी महिमा, मन्त्रगणनाके लिये विभिन्न प्रकारकी मालाओंका महत्त्व तथा अंगुलियोंके उपयोगका वर्णन, जपके लिये उपयोगी स्थान तथा दिशा, जपमें वर्जनीय बातें, सदाचारका महत्त्व, आस्तिकताकी प्रशंसा तथा पंचाक्षर-मन्त्रकी विशेषताका वर्णन... | ७५२ | २८- ऐहिक फल देनेवाले कर्मों और उनकी विधिका वर्णन, शिवपूजनकी विधि, शान्ति-पुष्टि आदि विविध काम्य कर्मोंमें विभिन्न हवनीय पदार्थोंके उपयोगका विधान... | ८०९ |
| १५- त्रिविध दीक्षाका निरूपण, शक्तिपातकी आवश्यकता तथा उसके लक्षणोंका वर्णन, गुरुका महत्त्व, ज्ञानी गुरुसे ही मोक्षकी प्राप्ति तथा गुरुके द्वारा शिष्यकी परीक्षा... | ७५६ | २९- पारलौकिक फल देनेवाले कर्म—शिवलिंग-महाव्रतकी विधि और महिमाका वर्णन... | ८१३ |
| १६- समय-संस्कार या समयाचारकी दीक्षाकी विधि... | ७५९ | ३०- योगके अनेक भेद, उसके आठ और छः अंगोंका विवेचन—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, दशविध प्राणोंको जीतनेकी महिमा, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधिका निरूपण... | ८१४ |
| १७- षडध्वशोधनकी विधि... | ७६३ | ३१- योगमार्गके विघ्न, सिद्धि-सूचक उपसर्ग तथा पृथ्वीसे लेकर बुद्धि-तत्त्वपर्यन्त ऐश्वर्यगुणोंका वर्णन, शिव-शिवाके ध्यानकी महिमा... | ८१८ |
| १८- षडध्वशोधनकी विधि... | ७६५ | ३२- ध्यान और उसकी महिमा, योगधर्म तथा शिवयोगीका महत्त्व, शिवभक्त या शिवके लिये प्राण देने अथवा शिवक्षेत्रमें मरणसे तत्काल मोक्ष-लाभका कथन... | ८२३ |
| १९- साधक-संस्कार और मन्त्र-माहात्म्यका वर्णन... | ७६९ | ३३- वायुदेवका अन्तर्धान, ऋषियोंका सरस्वतीमें अवभृथ-स्नान और काशीमें दिव्य तेजका दर्शन करके ब्रह्माजीके पास जाना, ब्रह्माजीका उन्हें सिद्धि-प्राप्तिकी सूचना देकर मेरुके कुमार-शिखरपर भेजना... | ८२७ |
| २०- योग्य शिष्यके आचार्यपदपर अभिषेकका वर्णन तथा संस्कारके विविध प्रकारोंका निर्देश... | ७७० | ३४- मेरुगिरिके स्कन्द-सरोवरके तटपर मुनियोंका सनत्कुमारजीसे मिलना, भगवान् नन्दीका वहाँ आना और दृष्टिपातमात्रसे पाशछेदन एवं ज्ञानयोगका उपदेश करके चला जाना, शिवपुराणकी महिमा तथा ग्रन्थका उपसंहार... | ८३० |
| २१- अन्तर्याग अथवा मानसिक पूजाविधिका वर्णन... | ७७२ | ||
| २२- शिवपूजनकी विधि... | ७७३ | ||
| २३- शिवपूजाकी विशेष विधि तथा शिव-भक्तिकी महिमा... | ७७७ | ||
| २४- पंचाक्षर-मन्त्रके जप तथा भगवान् शिवके भजन-पूजनकी महिमा, अग्निकार्यके लिये कुण्ड और वेदी आदिके संस्कार, शिवाग्निकी स्थापना और उसके संस्कार, होम, पूर्णाहुति, भस्मके संग्रह एवं रक्षणकी विधि तथा हवनान्तमें किये जानेवाले कृत्यका वर्णन... | ७८० |
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चित्र-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| रेखा-चित्र | गणोंको शाप देना ...................................... | ११३ | |
| १- लिंगस्थित भगवान् शिव.... | मुखपृष्ठ | १५- नारदजीका मायाके दूर हो जानेपर पश्चात्ताप-पूर्वक भगवान् विष्णुके चरणोंमें गिरकर अपनी शुद्धिका उपाय पूछना... | ११४ |
| २- शौनकजीको सूतजीका शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना... | २१ | १६- नारदजीका ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्माजीको भक्तिपूर्वक नमस्कार करना और अनेक प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करके उनसे शिवतत्त्वके विषयमें पूछना .......................... | ११७ |
| ३- यमपुरीमें गये देवराज ब्राह्मणको विमानपर बिठाकर शिवदूतोंका कैलास जानेके लिये उद्यत होना तथा धर्मराजका अपने भवनसे बाहर निकलकर उन सबकी पूजा एवं प्रार्थना करना... | २३ | १७- सदाशिवद्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका)-का प्रकटीकरण... | ११९ |
| ४- वाष्कलनगर-निवासिनी चंचुलाका गोकर्णक्षेत्रमें शिवकथा बाँचनेवाले एक पौराणिक ब्राह्मणसे अपना उद्धार करनेकी बात करना... | २५ | १८- अविमुक्तक्षेत्र (काशी)—आनन्दवनमें पार्वतीके साथ विचरण करते हुए भगवान् शिवके द्वारा अपने वामभागके दसवें अंगसे विष्णुको प्रकट करना... | १२१ |
| ५- चंचुलाका शिवपुराण सुननेके परिणामस्वरूप शिवद्वारा भेजे गये विमानपर आरूढ़ होकर शिवलोकमें आगमन तथा पार्वतीका उसे अपनी सखी स्वीकार करना... | २८ | १९- शिवका ब्रह्माका हाथ पकड़कर विष्णुको उन्हें सौंपकर संकटके समय सदा उनकी सहायता करते रहनेके लिये कहना... | १३० |
| ६- पार्वतीदेवीका चंचुलाके साथ जाकर उसके पति पिशाचयोनिवाले बिन्दुगको शिवपुराणकी कथा सुनानेका गन्धर्वराज तुम्बुरुको आदेश ... | ३० | २०- ब्रह्माजीका ऋषियों और देवताओंके साथ क्षीरसागरके तटपर विष्णुके पास आगमन... .. | १३६ |
| ७- चंचुलाके साथ विंध्यपर्वतपर जाकर गन्धर्वराज तुम्बुरुका बिन्दुग पिशाचको पाशोंद्वारा बाँधना तथा हाथमें वीणा लेकर गौरी-पतिकी कथाका गान आरम्भ करना... | ३१ | २१- कैलासके शिखरपर निवास करनेवाले साम्ब शिवका ध्यान करनेयोग्य पंचमुख-रूप... ... | १४२ |
| ८- सरस्वती नदीके तटपर तपस्यारत व्यासदेवको सनत्कुमारका सत्यवस्तु—भगवान् शिवके चिन्तनका आदेश देना... | ४१ | २२- ब्रह्माद्वारा घोर एवं उत्कृष्ट तप करनेपर उनकी दोनों भौंहों और नासिकाके मध्यभागसे शिवका अर्धनारीश्वररूपमें प्राकट्य... | १४८ |
| ९- महेश्वरका ब्रह्मा और विष्णुको अपने निष्कल और सकल स्वरूपका परिचय देना तथा दोनोंके मध्यमें भीषण अग्निस्तम्भके रूपमें उनका आविर्भाव... | ४४ | २३- ब्रह्माद्वारा प्रार्थना करनेपर शिवका अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणोंकी सृष्टि करना... ... | १४९ |
| १०- हिमालयपर्वतकी एक गुफामें नारदजीकी तपस्या......................................................... | १०६ | २४- ब्रह्माका अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त कर दो रूपवाला हो जाना तथा एकसे मनु और दूसरेसे शतरूपाको उत्पन्न करना... ...... | १५० |
| ११- नारदजीका अपनी काम-विजयका वृत्तान्त विष्णुसे कहनेके लिये विष्णुलोकमें आगमन... | १०८ | २५- काम्पिल्य-नगरमें निवास करनेवाले यज्ञदत्त ब्राह्मणके दुराचारी पुत्र गुणनिधिका शिवमन्दिरमें नैवेद्य चुरानेकी इच्छासे प्रवेश... | १५२ |
| १२- विष्णुद्वारा मायानिर्मित नगरमें राजा शीलनिधिका नारदको रत्नसिंहासनपर बिठाकर उनका पूजन करना तथा अपनी कन्या श्रीमतीको उन्हें प्रणाम करनेका आदेश देना..... | ११० | २६- कलिंगराज दमका ग्रामाध्यक्षोंको बुलाकर अपने-अपने गाँवोंके शिवालयोंमें सदा दीप जलानेका आदेश देना... | १५२ |
| १३- राजपुत्रोंसे समलंकृत राजा शीलनिधिकी स्वयंवरसभामें बैठे हुए कुरूप मुखवाले नारदजीकी ओर देखकर ब्राह्मण-वेषमें आकर बैठे हुए दो रुद्र-पार्षदोंका हँसी उड़ाना... | ११२ | २७- ब्रह्माजीसे समस्त शुभ-शिव-चरित्र सुनानेके लिये नारदकी प्रार्थना... ............................. | १५७ |
| १४- नारदका दर्पणमें अपना वानरके समान मुख देखना और उपहास करनेवाले दोनों रुद्र- | २८- ब्रह्माके हृदयसे मनोहर रूपवाली सुन्दरी नारी संध्याका उत्पन्न होना... .................... | १५७ | |
| २९- मरीचि आदि ऋषियोंद्वारा मनोभव कामदेवके मदन, मन्मथ, दर्पक, कंदर्प आदि अनेक नाम रखना... ............................................. | १५९ | ||
| ३०- दक्षका अपने ही शरीरसे प्रकट हुई ‘रति’ नामकी कन्याको कंदर्पको संकल्पपूर्वक सौंपना... | १६० |
( १६ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ३१- ब्रह्माकी प्रेरणासे वसिष्ठका एक तेजस्वी ब्रह्मचारीके रूपमें चन्द्रभाग पर्वतपर तपस्या करनेवाली संध्याके पास जाकर उसके निर्जन पर्वतपर आनेका प्रयोजन पूछना तथा तपस्या करनेकी विधि बताना... | १६१ |
| ३२- तपस्यामें लीन संध्याको शिवका उसीके आराध्यरूपमें प्रत्यक्ष दर्शन देना... | १६३ |
| ३३- संध्याद्वारा मेधातिथि मुनिके यज्ञकी अग्निमें आत्माहुति तथा उसके पुरोडाशमय शरीरके तत्काल दग्ध होनेपर यज्ञकी समाप्तिके समय अग्निकी ज्वालामें महर्षि मेधातिथिका तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली पुत्रीके रूपमें उसे प्राप्त करना... | १६८ |
| ३४- महाप्रजापति दक्षकी तपस्यासे प्रसन्न होकर सिंहवाहिनी जगदम्बाका चतुर्भुजरूपमें उन्हें दर्शन देना... | १७२ |
| ३५- नारदकी ही शिक्षासे अपने हर्यश्व तथा शबलाश्व आदि पुत्रोंके ऊर्ध्वगामी होनेपर दक्ष प्रजापतिका कष्टका अनुभव करना तथा दैववश अनुग्रह करनेके लिये आये हुए नारदको उनका क्रोधपूर्वक धिक्कारना... | १७६ |
| ३६- अपनी पत्नी वीरिणीसहित प्रजापति दक्षद्वारा जगदम्बाका ध्यान और प्रेमपूर्वक स्तवन करना... | १७७ |
| ३७- सब देवताओंके साथ ब्रह्मा और विष्णु आदिका गिरिश्रेष्ठ कैलासपर महादेवके पास आगमन... | १८० |
| ३८- सतीका तपस्या करके मनोवांछित वर पानेपर घर लौटकर माता (वीरिणी) और पिता (प्रजापति दक्ष)-को प्रणाम करना तथा अपनी सखीद्वारा उनको अपनी तपस्यासम्बन्धी सब समाचार कहलवाना... | १८७ |
| ३९- ब्रह्मा, विष्णु, नारद, देवताओं और मुनियों आदिके साथ शिवकी दक्षके घरके लिये विवाहयात्रा... | १८८ |
| ४०- विवाहकृत्य सकुशल समाप्त हो जानेपर दक्षकी आज्ञासे शिवका प्रसन्नतापूर्वक सतीको वृषभकी पीठपर बिठाकर विष्णु आदि देवताओं और मुनियों आदिके साथ हिमालयपर्वतकी ओर प्रस्थान करना... | १९१ |
| ४१- शिवका अपने स्वरूपका ध्यान तोड़ना जानकर जगदम्बा सतीका कैलासपर आना तथा उदारचेता शम्भुद्वारा उन्हें अपने सामने बैठनेके लिये आसन देना... | २०२ |
| ४२- दक्षद्वारा यज्ञमें रुद्रगणोंको शाप दिया जाना तथा शिवके प्रियभक्त नन्दीका दक्षको प्रत्युत्तर... | २०४ |
| ४३- ब्राह्मणकुल और वेदोंको शाप देनेवाले नन्दीको शिवका समझाना... | २०५ |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ४४- वृषभपर सवार होकर बहुसंख्यक प्रमथगणोंके साथ सतीका अपने पिता दक्षके यज्ञकी ओर प्रस्थान... | २११ |
| ४५- दक्षके यज्ञमें उपस्थित सतीके शरीरका योगाग्निसे जलकर उसी क्षण भस्म हो जाना, शिवके पार्षदोंका दक्षका प्राण लेनेके लिये आक्रमण तथा भृगुद्वारा यज्ञमें विघ्न डालनेवालोंके नाशके लिये यज्ञकुण्डसे ऋभु नामक सहस्रों देवताओंको प्रकट करना और शिवके प्रमथ-गणोंका भाग खड़ा होना... | २१५ |
| ४६- नारदके मुखसे दक्षयज्ञमें सतीके योगाग्निमें भस्म होने और असंख्य प्रमथगणोंके विनष्ट हो जानेका समाचार सुनकर शिवद्वारा क्रोधपूर्वक सिरसे एक जटा उखाड़कर पर्वतपर पटकना तथा जटाके दो भाग होनेपर पूर्वभागसे वीरभद्र और दूसरे भागसे महाकालीका उत्पन्न होना... | २१९ |
| ४७- दक्षका भगवान् विष्णुकी शरणमें जाकर उनके चरणोंमें गिरना तथा यज्ञका विनाश न होनेकी प्रार्थना करना... | २२३ |
| ४८- शुक्राचार्यके आदेशसे दधीचिद्वारा महा-मृत्युंजयका कठोर तपस्यापूर्वक जप तथा शिवका उनके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन देना, दधीचिद्वारा शिवकी स्तुति और वरकी याचना... | २३१ |
| ४९- ब्रह्मा, विष्णु और देवताओंके साथ शिवका कनखलमें स्थित दक्षकी यज्ञशालामें पधारना तथा वीरभद्रद्वारा विध्वंस किये गये यज्ञ-स्थलको देखना... | २३८ |
| ५०- देवताओंद्वारा स्तुति की जानेपर परम अद्भुत दिव्य रत्नमय रथपर विराजमान जगज्जननी देवी उमाका उनके सामने प्रकट होना... | २४७ |
| ५१- मनमें संतानकी कामना लेकर तप करनेवाली हिमवान्की पत्नी मेनाके सामने प्रसन्नतापूर्वक जगदम्बाका प्रकट होकर उनपर अनुग्रह करना... | २५० |
| ५२- गिरिराज हिमालयकी प्रार्थनापर नारदजीद्वारा उमाकी जन्मकुण्डलीपर विचार करनेके लिये उनका हाथ देखा जाना... | २५४ |
| ५३- अपनी कन्या उमाका विवाह किसी सुन्दर वरके साथ कर देनेके लिये मेनाका अपने पति हिमवान्के पास जाकर विनय करना तथा हिमवान्का उन्हें समझाना... | २५७ |
| ५४- शिवका गंगावतरणतीर्थमें जाकर आत्मभूत परमात्माका चिन्तन करना तथा सेवकोंसहित गिरिराज हिमवान्का आकर उन्हें स्तवनपूर्वक प्रणाम करना... | २६० |
| ५५- शिवका दर्शन करनेके लिये अपनी पुत्री उमाके साथ नित्य आनेकी हिमवान्का उनसे |
( १७ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| आज्ञा माँगना और शिवद्वारा उन्हें अकेले ही आनेकी आज्ञा देना ................................. | २६३ | ६७-भगवान् शिवका अपने परम सुन्दर दिव्य रूपको प्रकट करना, गंगा-यमुनाका उन्हें सुन्दर चँवर डुलाना, आठों सिद्धियोंका उनके आगे नाचना तथा सिद्ध, उपदेवता, समस्त मुनियोंका वररूपमें शोभित शिवके साथ प्रसन्नतापूर्वक यात्रा करना... ...................................... | ३२७ |
| ५६-इन्द्रद्वारा अपना स्मरण किये जानेपर कामदेवका तत्काल ही उनके सामने आ पहुँचना... ..... | २६९ | ६८-केलिगृहमें नूतन दम्पति शिव-पार्वतीको देखनेके लिये सोलह दिव्य नारियों—सरस्वती आदिका प्रवेश तथा रत्नमय सिंहासनपर नवदम्पतिके विराजमान होनेपर भगवान् शिवके सामने रतिका हाथ जोड़कर अपने पति (कामदेव)-को जीवित करनेकी प्रार्थना करना... .................. | ३३६ |
| ५७-रुद्रकी नेत्राग्निसे कामदेवका भस्म होना... .... | २७१ | ६९-मेनाके मनोभावको जानकर एक सती-साध्वी ब्राह्मणपत्नीद्वारा गिरिजाको उत्तम पातिव्रत्यकी शिक्षाका उपदेश... .................................. | ३४५ |
| ५८-शिवकी क्रोधाग्निको बड़वानलकी संज्ञा देकर—घोड़ेके रूपमें परिवर्तित कर ब्रह्माका उसको स्थापित करनेके लिये समुद्रतटपर जाना तथा समुद्रका साक्षात् प्रकट होकर उनकी स्तुति कर आनेका कारण पूछना... ......................... | २७४ | ७०-ब्रह्माजीकी सत्प्रेरणासे स्वामी कार्तिकका विमानसे उतरकर हाथमें अपनी चमकीली शक्तिको लेकर तारक-असुरकी ओर पैदल दौड़ पड़ना... ......................................... | ३५२ |
| ५९-शिवकी आराधनाके लिये पार्वतीकी दुष्कर तपस्या तथा उनके तपके प्रभावसे उस स्थलपर विचरण करनेवाले एक-दूसरेके विरोधी सिंह, गौ, चूहे, बिल्ली आदिका पारस्परिक विरोधका त्याग कर देना तथा वृक्षोंका सदा फलसे लदा रहना... ................................ | २७८ | ७१-तारक-असुरका हनन करनेवाले कुमार स्कन्द (कार्तिक)-का देवताओंके साथ विमानमें बैठकर शिवजीके समीप कैलास पहुँचना... .......... | ३५४ |
| ६०-भगवान् शिवकी आज्ञासे सप्तर्षियोंका तपस्यामें तत्पर पार्वतीके आश्रमपर जाकर उनके शिवविषयक अनुरागकी परीक्षा करना... ....... | २८७ | ७२-सखियोंके समझानेपर पार्वतीद्वारा अपनी ही आज्ञामें तत्पर रहनेवाले चेतन पुरुष (गणेश)-का अपने शरीरकी मैलसे निर्माण करना तथा उन्हें अपना पुत्र कहकर द्वारपालके पदपर नियुक्त करना................................. | ३५७ |
| ६१-परीक्षाके बहाने जटिल तपस्वी ब्राह्मणके वेषमें पधारे हुए शंकरके सामने ही पार्वतीका अग्निमें प्रवेश करना तथा उनकी तपस्याके प्रभावसे आगका उसी क्षण चन्दन-पंकके समान शीतल हो जाना और पार्वतीका आकाशमें ऊपरकी ओर उठने लगना... ................................. | २९० | ७३-द्वारपालके पदपर नियुक्त गणेशसे शिवजीका लीलापूर्वक अपने गणों और देवताओंका युद्ध करना तथा उनके पराजित न होनेपर शूलपाणिका स्वयं आकर घोर युद्धके पश्चात् त्रिशूलसे उनका (गणेशका) मस्तक काट देना तथा समाचार पाकर स्नानमें सखियोंसहित तत्पर पार्वतीका घटनास्थलपर आकर बहुत-सी शक्तियोंको उत्पन्न कर उन्हें प्रलय करनेकी आज्ञा देना तथा शिवगणोंका भयभीत होकर दूर भाग खड़ा होना... ................... | ३५८ |
| ६२-बायें हाथमें सींग और दाहिने हाथमें डमरू लेकर पीठपर कथरी रखकर तथा लाल वस्त्र पहनकर शिवजीका नटके वेषमें मेनकाके पास जाना तथा मेनकाके पास बैठी हुई स्त्रियोंकी टोलीके समीप उनका सुन्दर नृत्य करना... .. | २९९ | ७४-देवताओंद्वारा शिवके स्मरणपूर्वक वेदमन्त्रद्वारा जलको अभिमन्त्रित कर बालक (गणेश)-के शरीरपर छिड़का जाना तथा जलके स्पर्शसे बालकका शिवेच्छासे चेतनायुक्त होकर जीवित हो जाना तथा सोये हुएकी तरह उठ बैठना... | ३६० |
| ६३-देवताओंके अनुरोधसे वैष्णव ब्राह्मणके वेषमें शिवजीका हिमवान्के घर जाना और शिवकी निन्दा करके पार्वतीका विवाह उनके साथ न करनेको कहना....................................... | ३०२ | ७५-ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आदि देवताओंका | |
| ६४-वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों तथा मेरु आदि पर्वतोंके समझानेपर मेना और हिमवान्का प्रसन्नतापूर्वक शिवके साथ पार्वतीके विवाहका निश्चय करना... | ३०७ | ||
| ६५-मेनाका विलाप करना तथा अपनी पुत्री पार्वती और नारदको दुर्वचन सुनाना और धिक्कारना... | ३२३ | ||
| ६६-सप्तर्षियोंके समझानेपर भी मेनाका शिवके साथ पार्वतीका विवाह न करनेका ही हठ करना तथा हिमवान्का उन्हें समझाना और शिवके पूजनीय स्वरूपका वर्णन करना... ...... | ३२४ |
( १८ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| पार्वतीजीको प्रसन्न करनेके लिये गणेशको सर्वाध्यक्ष घोषित करना तथा शंकरका उन्हें सम्पूर्ण गणोंका अध्यक्ष बनाना... | ३६१ | वर देना तथा कमलोंकी बनी हुई अपनी शिरोमालाको उतारकर उसके गलेमें कृपापूर्वक डाल देना... | ४५१ |
| ७६- पृथ्वी-परिक्रमा करनेमें अपने-आपको असमर्थ पाकर गणेशजीद्वारा अपने माता-पिताको दो आसनोंपर बिठाकर उनकी सात बार प्रदक्षिणाकर अपने विवाहकी प्रार्थना करना... | ३६५ | ८७- शिवजीका प्रकट होकर बालक गृहपतिको अभय-दान देना तथा अग्निपदका भागी बनाना... | ४६० |
| ७७- प्रजापति विश्वरूपकी सुन्दर कन्याओं-सिद्धि और बुद्धिके साथ विश्वकर्माद्वारा गणेशजीका विवाह-संस्कार सम्पन्न कराना... | ३६७ | ८८- रुद्रके अंशभूत कपिश्रेष्ठ हनुमान्का सूर्यके निकट जाकर उनसे सारी विद्याएँ सीखना... | ४६४ |
| ७८- तारकके तीनों पुत्र-तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्षकी तपस्यासे अत्यन्त संतुष्ट हुए महायशस्वी ब्रह्माजीका वर देनेके लिये उनके सामने प्रकट होना और उन तीनोंका अंजलि बाँधकर पितामहके चरणोंमें प्रणिपात करना... | ३६९ | ८९- भगवान् शिवका यतिरूप धारण कर भील आहुक और उसकी पत्नी आहुकाकी परीक्षा लेना तथा पतिके हिंसक पशुओंद्वारा रातमें खा लिये जानेपर प्रातःकाल यतिसे चिता जलवाकर भीलनीके उसमें प्रवेश करते ही शिवका अपने साक्षात् रूपमें प्रकट होकर वर देना... | ४७२ |
| ७९- देवराज इन्द्र, विष्णु आदिसहित देवगणोंकी त्रिपुरवासी दैत्योंके नाशके लिये भगवान् शिवकी स्तुति तथा शिवका वृषभपर सवार होकर प्रकट हो जाना और नन्दीश्वरकी पीठसे उतरकर विष्णुका आलिंगनकर नन्दीपर हाथ टेककर खड़े हो जाना... | ३७५ | ९०- देवताओं तथा बृहस्पतिजीको साथ लेकर शिवका दर्शन करनेके लिये इन्द्रका कैलास-पर्वतपर जाना तथा बीचमें ही अवधूत वेष धारण कर शिवद्वारा परीक्षा लिये जानेपर इन्द्रका उनपर वज्रसे प्रहार करना, शिवके नेत्रसे रोषवश अग्निका निकलना और बृहस्पतिकी प्रार्थनापर शिवका उस तेजको क्षारसमुद्रमें फेंकना और उसका बालक सिन्धुपुत्र जलन्धरके रूपमें परिणत हो जाना... | ४७६ |
| ८०- शिवजीद्वारा धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसपर पाशुपतास्त्र नामक बाणका संधान कर उसे त्रिपुरपर छोड़नेका विचार करना... | ३८२ | ९१- ब्राह्मणपत्नीके सामने भिक्षुरूपमें शिवका प्रकट होकर उसे विदर्भदेशके सत्यरथ राजा, उनकी पत्नी तथा उनके नवजात शिशुके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाकर बालकके पालन-पोषणका आदेश देना तथा ब्राह्मणीको अपने उत्तम स्वरूपका दर्शन कराना... | ४७९ |
| ८१- ब्रह्माजीके आदेशसे शंखचूड़का बदरिकाश्रममें जाकर तपस्यामें लीन तुलसीसे मधुर तथा सकाम संलाप करना... | ३८८ | ९२- व्यासजीका अर्जुनको शुक्रविद्याका उपदेश देना तथा पार्थिवलिंगके पूजनका विधान बताकर उसे इन्द्रकीलपर्वतपर जाकर जाह्नवीके तटपर बैठकर तप करनेकी प्रेरणा देना... | ४८३ |
| ८२- शिवजीकी इच्छासे विष्णुका वृद्ध ब्राह्मणका वेष धारणकर शंखचूड़से उग्र कवचकी याचना करना तथा शंखचूड़द्वारा कवचका प्रदान किया जाना... | ४०० | ९३- इन्द्रकीलपर्वतपर गंगाजीके समीप एक मनोरम स्थानपर अर्जुनद्वारा तेजोरराशि शंकरजीका ध्यान करना तथा परीक्षा करनेके लिये ब्रह्मचारी ब्राह्मणके वेषमें आये हुए इन्द्रका अपने स्वरूपमें प्रकट होना और उसे शंकरका मन्त्र बताकर जप करनेकी आज्ञा देना... | ४८४ |
| ८३- हिरण्याक्षद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये घोर तपका अनुष्ठान तथा गौरीके साथ विराजमान शंकरका प्रसन्नतापूर्वक उसे पुत्ररूपमें अन्धकासुरको प्रदान करना... | ४०६ | ९४- मूक नामक दैत्यका शूकररूप धारण करके अर्जुनके पास आना तथा किरातवेषमें शिवजीका अर्जुनकी रक्षाके लिये आगे जाना और शिव तथा अर्जुनके बाणोंसे मरकर शूकरका भूतलपर गिर पड़ना तथा देवताओंद्वारा जय-जयकारपूर्वक पुष्पवृष्टि और स्तुति किया जाना... | ४८७ |
| ८४- युद्धमें श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज बाणासुरकी बहुत-सी भुजाओंका सुदर्शनचक्रसे काटा जाना तथा उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत होनेपर उन्हें शंकरजीका समझाना... | ४३३ | ||
| ८५- शिवका प्रसन्नतापूर्वक पूर्णसच्चिदानन्दकी कामदामूर्तिमें प्रविष्ट होकर अर्धनारी-नरके रूपसे ब्रह्माके निकट प्रकट होना तथा ब्रह्माजीका उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करना... | ४४३ | ||
| ८६- उग्र तपस्यामें रत नन्दीको वृषभध्वज शिवका |
( १९ )
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| ९५- अर्जुनद्वारा बाण न लौटाये जानेपर किरात-वेषधारी शिवका उससे भीषण संग्राम छेड़ना. | ४८९ |
| ९६- शिवजीका अर्जुनपर प्रसन्न होकर उसे पाशुपत नामक अस्त्र प्रदान करना... | ४९२ |
| ९७- अत्रिपत्नी अनसूयापर गंगाजीकी कृपा तथा उसके द्वारा गंगाजीको अपना वर्षभरका किया हुआ पुण्य अर्पण किया जाना तथा गंगाजीका उसके परिणामस्वरूप काशीमें स्थिररूपसे निवास करनेका आश्वासन देना...... | ५०० |
| ९८- बालविधवा ब्राह्मणपत्नीपर मूढ़ नामक मायावी दुष्ट असुरकी कुदृष्टि और संयोग-याचना तथा शिवद्वारा प्रकट होकर दैत्यराजको तत्काल भस्म कर दिया जाना और ब्राह्मणीद्वारा शिवकी स्तुति......................................... | ५०२ |
| ९९- रोहिणीमें ही अधिक आसक्त होनेके कारण चन्द्रमाको क्षयरोगसे ग्रस्त होनेका दक्षद्वारा शाप तथा रोगके शमनार्थ चन्द्रमाका शिवलिंगकी स्थापना कर प्रभासक्षेत्रमें लगातार खड़े होकर मृत्युंजयमन्त्रसे भगवान् वृषभध्वजका पूजन तथा शिवका प्रसन्न होकर चन्द्रमाको प्रत्यक्ष दर्शन देना और चन्द्रमाद्वारा क्षयरोग-निवारणकी प्रार्थना... | ५०४ |
| १००- अवन्तिपर दूषण असुरकी चढ़ाईसे क्षुब्ध ब्राह्मणोंको शिवपर भरोसा रखनेके लिये कहनेपर शिवलिंगके पूजनमें ध्यानस्थ वेद-प्रियके चारों पुत्रों—देवप्रिय आदिको मार डालनेका असुरका अपनी सेनाको आदेश और शिवलिंगके स्थानके ही गड्ढेसे महाकाल शिवका प्रकट होकर दैत्यको भस्म कर देना................................................ | ५०७ |
| १०१- वानरराज हनुमान्जीका प्रकट होकर गोपकुमार श्रीकर, राजा चन्द्रसेन तथा अन्य राजाओंको कृपादृष्टिसे देखना................ | ५१० |
| १०२- विन्ध्याचलकी तपस्यासे प्रसन्न होकर शिवजीका योगियोंके लिये भी दुर्लभरूपमें प्रकट होना तथा देवता और निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषियोंका वहाँ आकर उनकी पूजा करके स्थिररूपसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना....................................... | ५१२ |
| १०३- नर-नारायणकी पार्थिवलिंग-पूजासे प्रसन्न होकर शिवका प्रकट हो जाना तथा दोनोंका उनसे हिमालयके केदारतीर्थमें स्वयंज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित होनेका अनुरोध... | ५१३ |
| १०४- कामरूप देशके राजा सुदक्षिणके पार्थिवलिंग-पूजनमें राक्षस भीमका विघ्न डालना तथा |
| विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|
| शिवका उस लिंगसे भीमेश्वररूपमें प्रकट होकर राक्षससे युद्ध करना और नारदजीकी प्रार्थनापर समस्त राक्षसों और भीमको हुंकारमात्रसे भस्म कर डालना................ | ५१३ |
| १०५- रुद्रद्वारा भगवान् शिवसे काशीपुरीको अपनी राजधानी बनाकर उमासहित वहीं विराजमान होनेके लिये प्रार्थना.................................. | ५१८ |
| १०६- पत्नीसहित महर्षि गौतमकी आराधनासे संतुष्ट होकर भगवान् शिवका शिवा और प्रमथगणोंके साथ प्रकट होना तथा गौतमद्वारा उनका स्तवन.............................................. | ५२६ |
| १०७- भगवान् शिवसे महर्षि गौतमकी गंगा-याचना तथा शिवदत्त गंगा-जलका स्त्रीरूप धारण करके खड़ा होना, देवता आदिका आकर गंगाजीसे तथा शिवसे वहीं निवास करनेकी प्रार्थना करना और गंगा तथा शिवका क्रमशः गौतमी और त्र्यम्बकेश्वरके रूपमें वहाँ निवास... | ५२७ |
| १०८- देवताओं, ऋषियोंके सान्निध्यमें रावणकी अपनी पत्नी मन्दोदरीसहित वैद्यनाथ शिव-लिंगकी पूजा......................................... | ५२९ |
| १०९- राक्षसी दारुकाकी स्तुतिसे देवी पार्वतीका प्रसन्न हो जाना तथा उसके द्वारा वंशकी रक्षाका वरदान माँगनेपर उनका शिवसे अनुरोध करना कि यही राक्षसोंके राज्यका शासन करे.. | ५३२ |
| ११०- श्रीरामकी पूजासे प्रसन्न होकर शिवका वामांगभूता पार्वतीसहित प्रकट होकर विजय-सूचक वर देना तथा उनके ज्योतिर्लिंग (रामेश्वर)-के रूपमें स्थित होनेके लिये श्रीरामकी प्रार्थना... | ५३३ |
| १११- घुश्माके सामने ज्योतिःस्वरूप महेश्वर शिवका प्रकट होना और घुश्माकी अपनी सौत सुदेहाकी प्राणरक्षाकी उनसे प्रार्थना... | ५३६ |
| ११२- बिल्वके पेड़पर बैठे हुए गुरुद्रुह भीलका मृगीपर बाण-संधान करना तथा अनजानमें उसके हाथके धक्केसे पेड़के नीचे शिवलिंगपर थोड़े-से जल और बिल्वपत्रका गिर पड़ना... | ५६९ |
| ११३- अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मृग और दोनों मृगियोंका गुरुद्रुह भीलके पास आ पहुँचना तथा शिवपूजाके प्रभावसे दुर्लभ ज्ञानसे सम्पन्न भीलका परोपकारमें लगे उन पशुओंकी दशा देखकर अपने-आपको धिक्कारना और उन्हें जानेकी आज्ञा देना... | ५७२ |
| ११४- पुत्रकी प्राप्तिके लिये श्रीकृष्णका तप करना और उनके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती, कार्तिकेय तथा गणेशके सहित शिवका प्रकट |
( २० )
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| होना और श्रीकृष्णका उनसे स्तुतिपूर्वक वरदान माँगना... | ५८१ | ऋषियोंद्वारा दर्शन तथा मस्तकपर अंजलि बाँधकर स्तवन किया जाना... | ६६६ |
| ११५- शुभ कर्म करनेवाले प्राणीके यमपुरीमें जानेपर यमराजद्वारा उसे स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और अर्घ्य दिया जाना... | ५८५ | १२६- ब्रह्माद्वारा छोड़े गये सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रका पीछा करते हुए उसके शीर्ण होनेके स्थान (नैमिषारण्य)-में मुनियोंका जाना ..... | ६७० |
| ११६- क्रूर कर्म करनेवालेका यमराजको भयंकर रूपमें देखना... | ५८५ | १२७- नैमिषारण्यमें दीर्घसत्रके अन्तमें मुनियोंके पास वायुदेवताका आगमन तथा महायज्ञके समाप्त होनेपर वे क्या करना चाहते हैं—इस सम्बन्धमें मुनियोंसे उनका प्रश्न... | ६७१ |
| ११७- शिवसे कालचक्रके सम्बन्धमें पार्वतीका प्रश्न पूछना ......... | ५९७ | १२८- ब्रह्माजीके द्वारा शिवके अर्द्धनारीश्वररूपकी स्तुति... | ६८४ |
| ११८- राजा सुरथके अपने आश्रमपर आनेपर मुनीश्वर मेधाका मीठे वचन, भोजन और आसनद्वारा उनका आदर-सत्कार करना....... | ६०५ | १२९- ब्रह्माजीकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महादेवजीका अपने शरीरके वामभागसे देवी रुद्राणीको प्रकट करना और ब्रह्माद्वारा सर्वलोकमहेश्वरकी स्तुति... | ६८७ |
| ११९- राजा सुरथका वैश्य समाधिको साथ लेकर मेधा मुनिके पास आना तथा उनसे अपने और वैश्यके मोहपाशको काटनेकी प्रार्थना .. | ६०६ | १३०- महादेवजी और पार्वतीजीका परस्पर बातचीतके बीचमें ही देवीद्वारा आज्ञा दिये जानेपर एक सखीका देवीद्वारा ही शंकरके लिये भेंटस्वरूप लाये गये व्याघ्रको लाकर उनके सामने खड़ा कर देना... | ६९६ |
| १२०- जगज्जननी महाविद्याका त्रैलोक्य-मोहिनी शक्तिके रूपमें प्राकट्य... | ६०६ | १३१- भगवान् विष्णुके अनुरोधपर शिवका उमासहित इन्द्रके रूपमें ऐरावतपर आसीन होकर उपमन्यु मुनिके तपोवनमें जाना तथा मुनिका मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम करना... ......... | ७१५ |
| १२१- दैत्य शुम्भासुरके दूत दानवशिरोमणि सुग्रीवका हिमालयपर देवीके पास आकर शुम्भका संदेश-निवेदन... | ६१२ | १३२- देवी पार्वतीके साथ वृषभपर आरूढ़ हुए महादेवजीका दर्शनकर उपमन्युका भक्तिविनम्र चित्तसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़ जाना ... | ७१७ |
| १२२- सच्चिदानन्दस्वरूपिणी शिवप्रिया उमाका वर, पाश, अंकुश और अभय धारणकर प्रकट होना तथा देवताओंद्वारा भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना... | ६१७ | १३३- नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंका वायुदेवसे श्रीकृष्ण और उपमन्युके मिलन तथा श्रीकृष्णके पाशुपत ज्ञानकी प्राप्तिका प्रसंग पूछना और वायुदेवका उसे सुनाना........... | ७१९ |
| १२३- देवताओंकी व्याकुल प्रार्थना सुनकर कृपामयी देवीका चारों हाथोंमें क्रमशः धनुष-बाण, कमल तथा अनेक प्रकारके फल-मूल लिये हुए प्रकट होना और प्रजाजनोंको कष्ट उठाते देखकर नौ दिन और नौ रात रोते रहना ... | ६१९ | १३४- उपमन्युद्वारा श्रीकृष्णको पाशुपत ज्ञानका उपदेश.......................................................... | ७२१ |
| १२४- मेरुके दक्षिण शिखर—कुमारशृंगमें कुमार स्कन्दका दर्शन और पूजनकर महामुनि वामदेवद्वारा उनका स्तवन... | ६२६ | ||
| १२५- सुन्दर रमणीय मेरुशिखरपर जाकर ब्रह्माजीका |
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श्रीशिवपुराण-माहात्म्य
श्रीगणेशाय नमः
श्रीशिवपुराण-माहात्म्य
भवाब्धिमग्नं दीनं मां समुद्धर भवार्णवात्। कर्मग्राहगृहीताङ्गं दासोऽहं तव शङ्कर॥
शौनकजीके साधनविषयक प्रश्न करनेपर सूतजीका उन्हें शिवपुराणकी उत्कृष्ट महिमा सुनाना
श्रीशौनकजीने पूछा—महाज्ञानी सूतजी! आप सम्पूर्ण सिद्धान्तोंके ज्ञाता हैं। प्रभो! मुझसे पुराणोंकी कथाओंके सारतत्त्वका विशेषरूपसे वर्णन कीजिये। ज्ञान और वैराग्य-सहित भक्तिसे प्राप्त होनेवाले विवेककी वृद्धि कैसे होती है? तथा साधुपुरुष किस प्रकार अपने काम-क्रोध आदि मानसिक विकारोंका निवारण करते हैं? इस घोर कलिकालमें जीव प्रायः आसुर स्वभावके हो गये हैं, उस जीवसमुदायको शुद्ध (दैवी सम्पत्तिसे युक्त) बनानेके लिये सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है? आप इस समय मुझे ऐसा कोई शाश्वत साधन बताइये, जो कल्याणकारी वस्तुओंमें भी सबसे उत्कृष्ट एवं परम मंगलकारी हो तथा पवित्र करनेवाले उपायोंमें भी सर्वोत्तम पवित्रकारक उपाय हो। तात! वह साधन ऐसा हो, जिसके अनुष्ठानसे शीघ्र ही अन्तःकरणकी विशेष शुद्धि हो जाय तथा उससे निर्मल चित्तवाले पुरुषको सदाके लिये शिवकी प्राप्ति हो जाय।
श्रीसूतजीने कहा—मुनिश्रेष्ठ शौनक! तुम धन्य हो; क्योंकि तुम्हारे हृदयमें पुराण-कथा सुननेका विशेष प्रेम एवं लालसा है। इसलिये मैं शुद्ध बुद्धिसे विचारकर तुमसे परम उत्तम शास्त्रका वर्णन करता हूँ। वत्स! वह सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तसे सम्पन्न, भक्ति आदिको बढ़ाने-वाला तथा भगवान् शिवको संतुष्ट करने-वाला है। कानोंके लिये रसायन—अमृतस्वरूप तथा दिव्य है, तुम उसे श्रवण करो। मुने! वह परम उत्तम शास्त्र है—शिवपुराण, जिसका पूर्वकालमें भगवान् शिवने ही प्रवचन किया था। यह कालरूपी सर्पसे प्राप्त होनेवाले महान् त्रासका विनाश करनेवाला उत्तम साधन है। गुरुदेव व्यासने सनत्कुमार मुनिका उपदेश पाकर बड़े आदरसे संक्षेपमें ही इस पुराणका प्रतिपादन किया है। इस पुराणके प्रणयनका उद्देश्य है—कलियुगमें उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंके परम हितका साधन।
* श्रीशिवपुराण-माहात्म्य * २३
सूतजी बोले—मुने! जो मनुष्य पापी, दुराचारी, खल तथा काम-क्रोध आदिमें निरन्तर डूबे रहनेवाले हैं, वे भी इस पुराणके श्रवण-पठनसे अवश्य ही शुद्ध हो जाते हैं। इसी विषयमें जानकार मुनि इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जिसके श्रवणमात्रसे पापोंका पूर्णतया नाश हो जाता है।
पहलेकी बात है, कहीं किरातोंके नगरमें एक ब्राह्मण रहता था, जो ज्ञानमें अत्यन्त दुर्बल, दरिद्र, रस बेचनेवाला तथा वैदिक धर्मसे विमुख था। वह स्नान-संध्या आदि कर्मोंसे भ्रष्ट हो गया था और वैश्यवृत्तिमें तत्पर रहता था। उसका नाम था देवराज। वह अपने ऊपर विश्वास करनेवाले लोगोंको ठगा करता था। उसने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों तथा दूसरोंको भी अनेक बहानोंसे मारकर उन-उनका धन हड़प लिया था। परंतु उस पापीका थोड़ा-सा भी धन कभी धर्मके काममें नहीं लगा था। वह वेश्यागामी तथा सब प्रकारसे आचारभ्रष्ट था।
एक दिन घूमता-घामता वह दैवयोगसे प्रतिष्ठानपुर (झूसी-प्रयाग)-में जा पहुँचा। वहाँ उसने एक शिवालय देखा, जहाँ बहुत-से साधु-महात्मा एकत्र हुए थे। देवराज उस शिवालयमें ठहर गया, किंतु वहाँ उस ब्राह्मणको ज्वर आ गया। उस ज्वरसे उसको बड़ी पीड़ा होने लगी। वहाँ एक ब्राह्मणदेवता शिवपुराणकी कथा सुना रहे थे। ज्वरमें पड़ा हुआ देवराज ब्राह्मणके मुखारविन्दसे निकली हुई उस शिव-कथाको निरन्तर सुनता रहा। एक मासके बाद वह ज्वरसे अत्यन्त पीड़ित होकर चल बसा। यमराजके दूत आये और उसे पाशोंसे बाँधकर बलपूर्वक यमपुरीमें ले गये। इतनेमें ही शिवलोकसे भगवान् शिवके पार्षदगण आ गये। उनके गौर अंग कर्पूरके समान उज्ज्वल थे, हाथ त्रिशूलसे सुशोभित हो रहे थे, उनके सम्पूर्ण अंग भस्मसे उद्भासित थे और रुद्राक्षकी मालाएँ उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रही थीं। वे सब-के-सब क्रोधपूर्वक यमपुरीमें गये और यमराजके दूतोंको मार-पीटकर, बारंबार धमकाकर उन्होंने देवराजको उनके चंगुलसे छुड़ा लिया और अत्यन्त अद्भुत विमानपर बिठाकर जब वे शिवदूत कैलास जानेको उद्यत हुए, उस समय यमपुरीमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उस कोलाहल-को सुनकर धर्मराज अपने भवनसे बाहर