शिव पुराण
Shiva Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* कोटिरुद्रसंहिता * ५७१
चलता है, भगवान् विष्णुका भक्त होकर शिवकी निन्दा करता है, माता-पिताकी निधन-तिथिको श्राद्ध आदि न करके उसे सूना बिता देता है तथा मनमें संतापका अनुभव करके अपने दिये हुए वचनको पूरा करता है, ऐसे लोगोंको जो पाप लगता है, वही मुझे भी लगे, यदि मैं लौटकर न आऊँ।'
सूतजी कहते हैं—उसके ऐसा कहनेपर व्याधने उस मृगीसे कहा—'जाओ।' मृगी जल पीकर हर्षपूर्वक अपने आश्रमको गयी। इतनेमें ही रातका दूसरा प्रहर भी व्याधके जागते-जागते बीत गया। इसी समय तीसरा प्रहर आरम्भ हो जानेपर मृगीके लौटनेमें बहुत विलम्ब हुआ जान चकित हो व्याध उसकी खोज करने लगा। इतनेमें ही उसने जलके मार्गमें एक हिरनको देखा। वह बड़ा हृष्ट-पुष्ट था। उसे देखकर वनेचरको बड़ा हर्ष हुआ और वह धनुषपर बाण रखकर उसे मार डालनेको उद्यत हुआ। ऐसा करते समय उसके प्रारब्धवश कुछ जल और बिल्वपत्र शिवलिंगपर गिरे, उससे उसके सौभाग्यसे भगवान् शिवकी तीसरे प्रहरकी पूजा सम्पन्न हो गयी। इस तरह भगवान्ने उसपर अपनी दया दिखायी। पत्तोंके गिरने आदिका शब्द सुनकर उस मृगने व्याधकी ओर देखा और पूछा—'क्या करते हो?' व्याधने उत्तर दिया—'मैं अपने कुटुम्बको भोजन देनेके लिये तुम्हारा वध करूँगा।' व्याधकी यह बात सुनकर हरिणके मनमें बड़ा हर्ष हुआ और तुरंत ही व्याधसे इस प्रकार बोला।
हरिणने कहा—मैं धन्य हूँ। मेरा हृष्ट-पुष्ट होना सफल हो गया; क्योंकि मेरे शरीरसे आपलोगोंकी तृप्ति होगी। जिसका शरीर परोपकारके काममें नहीं आता, उसका सब कुछ व्यर्थ चला गया। जो सामर्थ्य रहते हुए भी किसीका उपकार नहीं करता है, उसकी वह सामर्थ्य व्यर्थ चली जाती है तथा वह परलोकमें नरकगामी होता है*। परंतु एक बार मुझे जाने दो। मैं अपने बालकोंको उनकी माताके हाथमें सौंपकर और उन सबको धीरज बँधाकर यहाँ लौट आऊँगा।
उसके ऐसा कहनेपर व्याध मन-ही-मन बड़ा विस्मित हुआ। उसका हृदय कुछ शुद्ध हो गया था और उसके सारे पापपुंज नष्ट हो चुके थे। उसने इस प्रकार कहा।
व्याध बोला—जो-जो यहाँ आये, वे सब तुम्हारी ही तरह बातें बनाकर चले गये; परंतु वे वंचक अभीतक यहाँ नहीं लौटे हैं। मृग! तुम भी इस समय संकटमें हो, इसलिये झूठ बोलकर चले जाओगे। फिर आज मेरा जीवन-निर्वाह कैसे होगा?
मृग बोला—व्याध! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनो। मुझमें असत्य नहीं है। सारा चराचर ब्रह्माण्ड सत्यसे ही टिका हुआ है। जिसकी वाणी झूठी होती है, उसका पुण्य उसी क्षण नष्ट हो जाता है; तथापि भील! तुम मेरी सच्ची प्रतिज्ञा सुनो। संध्याकालमें मैथुन तथा शिवरात्रिके दिन भोजन करनेसे जो पाप लगता है, झूठी
* यो वै सामर्थ्ययुक्तश्च नोपकारं करोति वै। तत्सामर्थ्यं भवेद् व्यर्थं परत्र नरकं व्रजेत्॥
(शि० पु० को० रु० सं० ४०।५७)
५७२ * संक्षिप्त शिवपुराण *
गवाही देने, धरोहरको हड़प लेने तथा संध्या न करनेसे द्विजको जो पाप होता है, वही पाप मुझे भी लगे, यदि मैं लौटकर न आऊँ। जिसके मुखसे कभी शिवका नाम नहीं निकलता, जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरोंका उपकार नहीं करता, पर्वके दिन श्रीफल तोड़ता, अभक्ष्य-भक्षण करता तथा शिवकी पूजा किये बिना और भस्म लगाये बिना भोजन कर लेता है, इन सबका पातक मुझे लगे, यदि मैं लौटकर न आऊँ।
सूतजी कहते हैं—उसकी बात सुनकर व्याधने कहा—'जाओ, शीघ्र लौटना।' व्याधके ऐसा कहनेपर मृग पानी पीकर चला गया। वे सब अपने आश्रमपर मिले। तीनों ही प्रतिज्ञाबद्ध हो चुके थे। आपसमें एक-दूसरेके वृत्तान्तको भलीभाँति सुनकर सत्यके पाशसे बँधे हुए उन सबने यही निश्चय किया कि वहाँ अवश्य जाना चाहिये। इस निश्चयके बाद वहाँ बालकोंको आश्वासन देकर वे सब-के-सब जानेके लिये उत्सुक हो गये। उस समय जेठी मृगीने वहाँ अपने स्वामीसे कहा—'स्वामिन्! आपके बिना यहाँ बालक कैसे रहेंगे? प्रभो! मैंने ही वहाँ पहले जाकर प्रतिज्ञा की है, इसलिये केवल मुझको जाना चाहिये। आप दोनों यहीं रहें।' उसकी यह बात सुनकर छोटी मृगी बोली—'बहिन! मैं तुम्हारी सेविका हूँ, इसलिये आज मैं ही व्याधके पास जाती हूँ। तुम यहीं रहो।' यह सुनकर मृग बोला—'मैं ही वहाँ जाता हूँ। तुम दोनों यहाँ रहो; क्योंकि शिशुओंकी रक्षा मातासे ही होती है।' स्वामीकी यह बात सुनकर उन दोनों मृगियोंने धर्मकी दृष्टिसे उसे स्वीकार नहीं किया। वे दोनों अपने पतिसे प्रेमपूर्वक बोलीं—'प्रभो! पतिके बिना इस जीवनको धिक्कार है।' तब उन सबने अपने बच्चोंको सान्त्वना देकर उन्हें पड़ोसियोंके हाथमें सौंप दिया और स्वयं शीघ्र ही उस स्थानको प्रस्थान किया, जहाँ वह व्याध-शिरोमणि उनकी प्रतीक्षामें बैठा था। उन्हें जाते देख उनके वे सब बच्चे भी पीछे-पीछे चले आये। उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि इन माता-पिताकी जो गति होगी, वही हमारी भी हो। उन सबको एक साथ आया देख व्याधको बड़ा हर्ष हुआ। उसने धनुषपर बाण रखा। उस समय पुनः जल और बिल्वपत्र शिवके ऊपर गिरे। उससे शिवकी चौथे प्रहरकी शुभ पूजा भी सम्पन्न हो गयी। उस समय व्याधका सारा पाप तत्काल भस्म हो गया। इतनेमें ही दोनों मृगियाँ और मृग बोल उठे—'व्याधशिरोमणे! शीघ्र कृपा करके हमारे शरीरको सार्थक करो।'
उनकी यह बात सुनकर व्याधको बड़ा विस्मय हुआ। शिवपूजाके प्रभावसे उसको दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो गया। उसने सोचा—'ये मृग ज्ञानहीन पशु होनेपर भी धन्य हैं, सर्वथा
* कोटिरुद्रसंहिता * ५७३
आदरणीय हैं; क्योंकि अपने शरीरसे ही परोपकारमें लगे हुए हैं। मैंने इस समय मनुष्य-जन्म पाकर भी किस पुरुषार्थका साधन किया ? दूसरेके शरीरको पीड़ा देकर अपने शरीरको पोसा है। प्रतिदिन अनेक प्रकारके पाप करके अपने कुटुम्बका पालन किया है। हाय ! ऐसे पाप करके मेरी क्या गति होगी ? अथवा मैं किस गतिको प्राप्त होऊँगा ? मैंने जन्मसे लेकर अबतक जो पातक किया है, उसका इस समय मुझे स्मरण हो रहा है। मेरे जीवनको धिक्कार है, धिक्कार है।' इस प्रकार ज्ञानसम्पन्न होकर व्याधने अपने बाणको रोक लिया और कहा—' श्रेष्ठ मृगो ! तुम जाओ। तुम्हारा जीवन धन्य है।'
व्याधके ऐसा कहनेपर भगवान् शंकर तत्काल प्रसन्न हो गये और उन्होंने व्याधको अपने सम्मानित एवं पूजित स्वरूपका दर्शन कराया तथा कृपापूर्वक उसके शरीरका स्पर्श करके उससे प्रेमसे कहा—'भील! मैं तुम्हारे व्रतसे प्रसन्न हूँ। वर माँगो।' व्याध भी भगवान् शिवके उस रूपको देखकर तत्काल जीवन्मुक्त हो गया और 'मैंने सब कुछ पा लिया' यों कहता हुआ उनके चरणोंके आगे गिर पड़ा। उसके इस भावको देखकर भगवान् शिव भी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उसे 'गुह' नाम देकर कृपादृष्टिसे देखते हुए उन्होंने उसे दिव्य वर दिये।
शिव बोले—व्याध ! सुनो, आजसे तुम शृंगवेरपुरमें उत्तम राजधानीका आश्रय ले दिव्य भोगोंका उपभोग करो। तुम्हारे वंशकी वृद्धि निर्विघ्नरूपसे होती रहेगी। देवता भी तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। व्याध ! मेरे भक्तोंपर स्नेह रखनेवाले भगवान् श्रीराम एक दिन निश्चय ही तुम्हारे घर पधारेंगे और तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे। तुम मेरी सेवामें मन लगाकर दुर्लभ मोक्ष पा जाओगे।
इसी समय वे सब मृग भगवान् शंकरका दर्शन और प्रणाम करके मृगयोनिसे मुक्त हो गये तथा दिव्यदेहधारी हो विमानपर बैठकर शिवके दर्शनमात्रसे शापमुक्त हो दिव्यधामको चले गये। तबसे अर्बुद पर्वतपर भगवान् शिव व्याधेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए, जो दर्शन और पूजन करनेपर तत्काल भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। महर्षियो ! वह व्याध भी उस दिनसे दिव्य भोगोंका उपभोग करता हुआ अपनी राजधानीमें रहने लगा। उसने भगवान् श्रीरामकी कृपा पाकर शिवका सायुज्य प्राप्त कर लिया। अनजानमें ही इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे उसको सायुज्य मोक्ष मिल गया; फिर जो भक्तिभावसे सम्पन्न होकर इस व्रतको करते हैं, वे शिवका शुभ सायुज्य प्राप्त कर लें, इसके लिये तो कहना ही क्या है। सम्पूर्ण शास्त्रों तथा अनेक प्रकारके धर्मोंके विषयमें भलीभाँति विचार करके इस शिवरात्रि-व्रतको सबसे उत्तम बताया गया है। इस लोकमें जो नाना प्रकारके व्रत, विविध तीर्थ, भाँति-भाँतिके विचित्र दान, अनेक प्रकारके यज्ञ, तरह-तरहके तप तथा बहुत-से जप हैं, वे सब इस शिवरात्रि-व्रतकी समानता नहीं कर सकते। इसलिये अपना हित चाहनेवाले मनुष्योंको इस शुभतर व्रतका अवश्य पालन करना चाहिये। यह शिवरात्रि-व्रत दिव्य है। इससे सदा भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है। महर्षियो ! यह शुभ शिवरात्रि-व्रत व्रतराजके नामसे विख्यात है। इसके विषयमें सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो ?
(अध्याय ४०)
५७४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
मुक्ति और भक्तिके स्वरूपका विवेचन
ऋषियोंने पूछा—सूतजी ! आपने बारंबार मुक्तिका नाम लिया है। यहाँ मुक्ति मिलनेपर क्या होता है? मुक्तिमें जीवकी कैसी अवस्था होती है? यह हमें बताइये।
सूतजीने कहा—महर्षियो ! सुनो। मैं तुमसे संसारक्लेशका निवारण तथा परमानन्दका दान करनेवाली मुक्तिका स्वरूप बताता हूँ। मुक्ति चार प्रकारकी कही गयी है—सारूप्या, सालोक्या, सांनिध्या तथा चौथी सायुज्या। इस शिवरात्रि-व्रतसे सब प्रकारकी मुक्ति सुलभ हो जाती है। जो ज्ञानस्वरूप अविनाशी, साक्षी, ज्ञानगम्य और द्वैतरहित साक्षात् शिव हैं, वे ही यहाँ कैवल्यमोक्षके तथा धर्म, अर्थ और कामरूप त्रिवर्गके भी दाता हैं। कैवल्या नामक जो पाँचवीं मुक्ति है, वह मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। मुनिवरो! मैं उसका लक्षण बताता हूँ, सुनो। जिनसे यह समस्त जगत् उत्पन्न होता है, जिनके द्वारा इसका पालन होता है तथा अन्ततोगत्वा यह जिनमें लीन होता है, वे ही शिव हैं। जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, वही शिवका रूप है। मुनीश्वरो! वेदोंमें शिवके दो रूप बताये गये हैं—सकल और निष्कल। शिवतत्त्व सत्य, ज्ञान, अनन्त एवं सच्चिदानन्द नामसे प्रसिद्ध है। निर्गुण, उपाधिरहित, अविनाशी, शुद्ध एवं निरंजन (निर्मल) है। वह न लाल है न पीला; न सफेद है न नीला; न छोटा है न बड़ा और न मोटा है न महीन। जहाँसे मनसहित वाणी उसे न पाकर लौट आती है, वह परब्रह्म परमात्मा ही शिव कहलाता है। जैसे आकाश सर्वत्र व्यापक है, उसी प्रकार यह शिवतत्त्व भी सर्वव्यापी है। यह मायासे परे, सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे रहित तथा मत्सरताशून्य परमात्मा है। यहाँ शिवज्ञानका उदय होनेसे निश्चय ही उसकी प्राप्ति होती है अथवा द्विजो! सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा शिवका ही भजन-ध्यान करनेसे सत्पुरुषों-को शिवपदकी प्राप्ति होती है*।
संसारमें ज्ञानकी प्राप्ति अत्यन्त कठिन है, परंतु भगवान्का भजन अत्यन्त सुकर माना गया है। इसलिये संतशिरोमणि पुरुष मुक्तिके लिये भी शिवका भजन ही करते हैं। ज्ञानस्वरूप मोक्षदाता परमात्मा शिव भजनके ही अधीन हैं। भक्तिसे ही बहुत-से पुरुष सिद्धिलाभ करके प्रसन्नतापूर्वक परम मोक्ष पा गये हैं। भगवान् शम्भुकी भक्ति ज्ञानकी जननी मानी गयी है जो सदा भोग और मोक्ष देनेवाली है। वह साधु महापुरुषोंके कृपाप्रसादसे सुलभ होती है। उत्तम प्रेमका अंकुर ही उसका लक्षण है। द्विजो! वह भक्ति भी सगुण और निर्गुणके भेदसे दो प्रकारकी जाननी चाहिये। फिर वैधी और स्वाभाविकी—ये दो भेद और होते हैं। इनमें वैधीकी अपेक्षा स्वाभाविकी श्रेष्ठ मानी
* सत्यं ज्ञानमनन्तं च सच्चिदानन्दसंज्ञितम्। निर्गुणो निरुपाधिश्चाव्ययः शुद्धो निरञ्जनः॥
न रक्तो नैव पीतश्च न श्वेतो नील एव च। न ह्रस्वो न च दीर्घश्च न स्थूलः सूक्ष्म एव च॥
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह। तदेव परमं प्रोक्तं ब्रह्मैव शिवसंज्ञकम्॥
आकाशं व्यापकं यद्वत् तथैव व्यापकं त्विदम्। मायातीतं परात्मानं द्वन्द्वातीतं विमत्सरम्॥
तत्प्राप्तिश्च भवेदत्र शिवज्ञानोदयाद् ध्रुवम्। भजनाद्वा शिवस्यैव सूक्ष्ममत्या सतां द्विजाः॥
(शि० पु० को० रु० सं० ४१। १२—१६)
* कोटिरुद्रसंहिता * ५७५
गयी है। इनके सिवा नैष्ठिकी और अनैष्ठिकीके भेदसे भक्तिके दो प्रकार और बताये गये हैं। नैष्ठिकी भक्ति छः प्रकारकी जाननी चाहिये और अनैष्ठिकी एक ही प्रकारकी। फिर विहिता और अविहिताके भेदसे विद्वानोंने उसके अनेक प्रकार माने हैं। उनके बहुत-से भेद होनेके कारण यहाँ विस्तृत वर्णन नहीं किया जा रहा है। उन दोनों प्रकारकी भक्तियोंके श्रवण आदि भेदसे नौ अंग जानने चाहिये। भगवान्की कृपाके बिना इन भक्तियोंका सम्पादन होना कठिन है और उनकी कृपासे सुगमतापूर्वक इनका साधन होता है। द्विजो! भक्ति और ज्ञानको शम्भुने एक-दूसरेसे भिन्न नहीं बताया है। इसलिये उनमें भेद नहीं करना चाहिये। ज्ञान और भक्ति दोनोंके ही साधकको सदा सुख मिलता है। ब्राह्मणो! जो भक्तिका विरोधी है, उसे ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती। भगवान् शिवकी भक्ति करनेवालेको ही शीघ्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त होता है। अतः मुनीश्वरो! महेश्वरकी भक्तिका साधन करना आवश्यक है। उसीसे सबकी सिद्धि होगी, इसमें संशय नहीं है। महर्षियो! तुमने जो कुछ पूछा था, उसीका मैंने वर्णन किया है। इस प्रसंगको सुनकर मनुष्य सब पापोंसे निस्संदेह मुक्त हो जाता है। (अध्याय ४१)
शिव, विष्णु, रुद्र और ब्रह्माके स्वरूपका विवेचन
ऋषियोंने पूछा—शिव कौन हैं? विष्णु कौन हैं? रुद्र कौन हैं और ब्रह्मा कौन हैं? इन सबमें निर्गुण कौन है? हमारे इस संदेहका आप निवारण कीजिये।
सूतजीने कहा—महर्षियो! वेद और वेदान्तके विद्वान् ऐसा मानते हैं कि निर्गुण परमात्मासे सर्वप्रथम जो सगुणरूप प्रकट हुआ, उसीका नाम शिव है। शिवसे पुरुष-सहित प्रकृति उत्पन्न हुई। उन दोनोंने मूलस्थानमें स्थित जलके भीतर तप किया। वह स्थान पंचक्रोशी काशीके नामसे विख्यात है, जो भगवान् शिवको अत्यन्त प्रिय है। यह जल सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त था। उस जलका आश्रय ले योगमायासे युक्त श्रीहरि वहाँ सोये। नार अर्थात् जलको अयन (निवासस्थान) बनानेके कारण फिर 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध हुए और प्रकृति 'नारायणी' कहलायी। नारायणके नाभिकमलसे जिनकी उत्पत्ति हुई, वे ब्रह्मा कहलाते हैं। ब्रह्माने तपस्या करके जिनका साक्षात्कार किया, उन्हें विष्णु कहा गया है। ब्रह्मा और विष्णुके विवादको शान्त करनेके लिये निर्गुण शिवने जो रूप प्रकट किया, उसका नाम 'महादेव' है। उन्होंने कहा—'मैं शम्भु ब्रह्माजीके ललाटसे प्रकट होऊँगा' इस कथनके अनुसार समस्त लोकोंपर अनुग्रह करनेके लिये जो ब्रह्माजीके ललाटसे प्रकट हुए, उनका नाम रुद्र हुआ। इस प्रकार रूपरहित परमात्मा सबके चिन्तनका विषय बननेके लिये साकाररूपमें प्रकट हुए। वे ही साक्षात् भक्तवत्सल शिव हैं। तीनों गुणोंसे भिन्न शिवमें तथा गुणोंके धाम रुद्रमें उसी तरह वास्तविक भेद नहीं है, जैसे सुवर्ण और उसके आभूषणमें नहीं है। दोनोंके रूप और कर्म समान हैं। दोनों समानरूपसे भक्तोंको उत्तम गति प्रदान करनेवाले हैं। दोनों समानरूपसे सबके सेवनीय हैं तथा नाना प्रकारके लीला-विहार करनेवाले हैं। भयानक
५७६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
पराक्रमी रुद्र सर्वथा शिवरूप ही हैं। वे भक्तोंके कार्यकी सिद्धिके निमित्त विष्णु और ब्रह्माकी सहायता करनेके लिये प्रकट हुए हैं। अन्य जो-जो देवता जिस क्रमसे प्रकट हुए हैं, उसी क्रमसे लयको प्राप्त होते हैं। परंतु रुद्रदेव उस तरह लीन नहीं होते। उनका साक्षात् शिवमें ही लय होता है। ये प्राकृत प्राणी रुद्रमें मिलकर ही लयको प्राप्त होते हैं। परंतु रुद्र इनमें मिलकर लयको नहीं प्राप्त होते। यह भगवती श्रुतिका उपदेश है। सब लोग रुद्रका भजन करते हैं, किंतु रुद्र किसीका भजन नहीं करते। वे भक्तवत्सल होनेके कारण कभी-कभी अपने-आप भक्तजनोंका चिन्तन कर लेते हैं। जो दूसरे देवताका भजन करते हैं, वे उसीमें लीन होते हैं; इसीलिये वे दीर्घकालके बाद रुद्रमें लीन होनेका अवसर पाते हैं। जो कोई रुद्रके भक्त हैं, वे तत्काल शिव हो जाते हैं; अतः उनके लिये दूसरेकी अपेक्षा नहीं रहती। यह सनातन श्रुतिका संदेश है।
द्विजो! अज्ञान अनेक प्रकारका होता है, परंतु विज्ञानका एक ही स्वरूप है। वह अनेक प्रकारका नहीं होता। उसको समझनेका प्रकार मैं बताऊँगा, तुमलोग आदरपूर्वक सुनो। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ भी यहाँ देखा जाता है, वह सब शिवरूप ही है। उसमें नानात्वकी कल्पना मिथ्या है। सृष्टिके पूर्व भी शिवकी सत्ता बतायी गयी है, सृष्टिके मध्यमें भी शिव विराज रहे हैं, सृष्टिके अन्तमें भी शिव रहते हैं और जब सब कुछ शून्यतामें परिणत हो जाता है, उस समय भी शिवकी सत्ता रहती ही है। अतः मुनीश्वरो ! शिवको ही चतुर्गुण कहा गया है। वे ही शिव शक्तिमान् होनेके कारण 'सगुण' जाननेयोग्य हैं। इस प्रकार वे सगुण-निर्गुणके भेदसे दो प्रकारके हैं। जिन शिवने ही भगवान् विष्णुको सम्पूर्ण सनातन वेद, अनेक वर्ण, अनेक मात्रा तथा अपना ध्यान एवं पूजन दिये हैं, वे ही सम्पूर्ण विद्याओंके ईश्वर हैं—ऐसी सनातन श्रुति है। अतएव शम्भुको ‘वेदोंका प्राकट्यकर्ता’ तथा ‘वेदपति’ कहा गया है। वे ही सबपर अनुग्रह करनेवाले साक्षात् शंकर हैं। कर्ता, भर्ता, हर्ता, साक्षी तथा निर्गुण भी वे ही हैं। दूसरोंके लिये कालका मान है, परंतु कालस्वरूप रुद्रके लिये कालकी कोई गणना नहीं है; क्योंकि वे साक्षात् स्वयं महाकाल हैं और महाकाली उनके आश्रित हैं। ब्राह्मण, रुद्र और कालीको एक-से ही बताते हैं। उन दोनोंने सत्य लीला करनेवाली अपनी इच्छासे ही सब कुछ प्राप्त किया है। शिवका कोई उत्पादक नहीं है। उनका कोई पालक और संहारक भी नहीं है। ये स्वयं सबके हेतु हैं। एक होकर भी अनेकताको प्राप्त हो सकते हैं और अनेक होकर भी एकताको। एक ही बीज बाहर होकर वृक्ष और फल आदिके रूपमें परिणत होता हुआ पुनः बीजभावको प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार शिवरूपी महेश्वर स्वयं एकसे अनेक होनेमें हेतु हैं। यह उत्तम शिवज्ञान तत्त्वतः बताया गया है। ज्ञानवान् पुरुष ही इसको जानता है, दूसरा नहीं।
मुनि बोले—सूतजी! आप लक्षणसहित ज्ञानका वर्णन कीजिये, जिसको जानकर मनुष्य शिवभावको प्राप्त हो जाता है। सारा जगत् शिव कैसे है अथवा शिव ही सम्पूर्ण जगत् कैसे हैं?
ऋषियोंका यह प्रश्न सुनकर पौराणिक-शिरोमणि सूतजीने भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके उनसे कहा।
(अध्याय ४२)
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* कोटिरुद्रसंहिता * ५७७
शिवसम्बन्धी तत्त्वज्ञानका वर्णन तथा उसकी महिमा, कोटिरुद्रसंहिताका माहात्म्य एवं उपसंहार
सूतजीने कहा—ऋषियो! मैंने शिवज्ञान जैसा सुना है, उसे बता रहा हूँ। तुम सब लोग सुनो, वह अत्यन्त गुह्य और परम मोक्षस्वरूप है। ब्रह्मा, नारद, सनकादि, मुनि व्यास तथा कपिल—इनके समाजमें इन्हीं लोगोंने निश्चय करके ज्ञानका जो स्वरूप बताया है, उसीको यथार्थ ज्ञान समझना चाहिये। सम्पूर्ण जगत् शिवमय है, यह ज्ञान सदा अनुशीलन करनेयोग्य है। सर्वज्ञ विद्वान्को यह निश्चितरूपसे जानना चाहिये कि शिव सर्वमय हैं। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब शिव ही हैं। वे महादेवजी ही शिव कहलाते हैं। जब उनकी इच्छा होती है, तब वे इस जगत्की रचना करते हैं। वे ही सबको जानते हैं, उनको कोई नहीं जानता। वे इस जगत्की रचना करके स्वयं इसके भीतर प्रविष्ट होकर भी इससे दूर हैं। वास्तवमें उनका इसमें प्रवेश नहीं हुआ है; क्योंकि वे निर्लिप्त, सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। जैसे सूर्य आदि ज्योतियोंका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है, वास्तवमें जलके भीतर उनका प्रवेश नहीं होता, उसी प्रकार साक्षात् शिवके विषयमें समझना चाहिये। वस्तुतः तो वे स्वयं ही सब कुछ हैं। मतभेद ही अज्ञान है; क्योंकि शिवसे भिन्न किसी द्वैत वस्तुकी सत्ता नहीं है। सम्पूर्ण दर्शनोंमें मतभेद ही दिखाया जाता है, परंतु वेदान्ती नित्य अद्वैत तत्त्वका वर्णन करते हैं। जीव परमात्मा शिवका ही अंश है; परंतु अविद्यासे मोहित होकर अवश हो रहा है और अपनेको शिवसे भिन्न समझता है। अविद्यासे मुक्त होनेपर वह शिव ही हो जाता है। शिव सबको व्याप्त करके स्थित हैं और सम्पूर्ण जन्तुओंमें व्यापक हैं। वे जड़ और चेतन—सबके ईश्वर होकर स्वयं ही सबका कल्याण करते हैं। जो विद्वान् पुरुष वेदान्तमार्गका आश्रय ले उनके साक्षात्कारके लिये साधना करता है, उसे वह साक्षात्काररूप फल अवश्य प्राप्त होता है। व्यापक अग्नितत्त्व प्रत्येक काष्ठमें स्थित है; परंतु जो उस काष्ठका मन्थन करता है, वही असंदिग्धरूपसे अग्निको प्रकट करके देखता है। उसी तरह जो बुद्धिमान् यहाँ भक्ति आदि साधनोंका अनुष्ठान करता है, उसे अवश्य शिवका दर्शन प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है। सर्वत्र केवल शिव हैं, शिव हैं, शिव हैं; दूसरी कोई वस्तु नहीं है। वे शिव भ्रमसे ही सदा नाना रूपोंमें भासित होते हैं।
जैसे समुद्र, मिट्टी अथवा सुवर्ण—ये उपाधिभेदसे नानात्वको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार भगवान् शंकर भी उपाधियोंसे ही अनेक रूपोंमें भासते हैं। कार्य और कारणमें वास्तविक भेद नहीं होता। केवल भ्रमसे भरी हुई बुद्धिके द्वारा ही उसमें भेदकी प्रतीति होती है। भ्रम दूर होते ही भेदबुद्धिका नाश हो जाता है। जब बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है, तब वह नानात्वको प्रकट करता है; फिर अन्तमें वह बीजरूपमें ही स्थित होता है और अंकुर नष्ट हो जाता है। ज्ञानी बीजरूपमें ही स्थित है और नाना प्रकारके विकार अंकुररूप हैं। उन विकारस्वरूप अंकुरोंकी निवृत्ति हो जानेपर पुरुष फिर ज्ञानीरूपमें ही स्थित होता है—इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। सब कुछ शिव है और शिव ही सब कुछ हैं। शिव तथा
789 संक्षिप्त शिवपुराण—19 A
५७८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
सम्पूर्ण जगत्में कोई भेद नहीं है; फिर क्यों कोई अनेकता देखता है और क्यों एकता ढूँढ़ता है। जैसे एक ही सूर्य नामक ज्योति जल आदि उपाधियोंमें विशेषरूपसे नाना प्रकारकी दिखायी देती है, उसी प्रकार शिव भी हैं। जैसे आकाश सर्वत्र व्यापक होकर भी स्पर्श आदि बन्धनमें नहीं आता, उसी प्रकार व्यापक शिव भी कहीं नहीं बँधते। अहंकारसे युक्त होनेके कारण शिवका अंश जीव कहलाता है। उस अहंकारसे मुक्त होनेपर वह साक्षात् शिव ही है। कर्मोंके भोगमें लिप्त होनेके कारण जीव तुच्छ है और निर्लिप्त होनेके कारण शिव महान् हैं। जैसे एक ही सुवर्ण आदि चाँदी आदिसे मिल जानेपर कम कीमतका हो जाता है, उसी प्रकार अहंकारयुक्त जीव अपना महत्त्व खो बैठता है। जैसे क्षार आदिसे शुद्ध किया हुआ उत्तम सुवर्ण आदि पूर्ववत् बहुमूल्य हो जाता है, उसी प्रकार संस्कारविशेषसे शुद्ध होकर जीव भी शुद्ध हो जाता है।
पहले सद्गुरुको पाकर भक्तिभावसे युक्त हो शिवबुद्धिसे उनका पूजन और स्मरण आदि करे। गुरुमें शिवबुद्धि करनेसे सारे पाप आदि मल शरीरसे निकल जाते हैं। उस समय अज्ञान नष्ट हो जाता है और मनुष्य ज्ञानवान् हो जाता है। उस अवस्थामें अहंकारमुक्त निर्मल बुद्धिवाला जीव भगवान् शंकरके प्रसादसे पुनः शिवरूप हो जाता है। जैसे दर्पणमें अपना रूप दिखायी देता है, उसी तरह उसे सर्वत्र शम्भुका साक्षात्कार होने लगता है। वही जीवन्मुक्त कहलाता है। शरीर गिर जानेपर वह जीवन्मुक्त ज्ञानी शिवमें मिल जाता है। शरीर प्रारब्धके अधीन है; जो उस देहके अभिमानसे रहित है, उसे ज्ञानी माना गया है। जो शुभ वस्तुको पाकर हर्षसे खिल नहीं उठता, अशुभको पाकर क्रोध या शोक नहीं करता तथा सुख-दुःख आदि सभी द्वन्द्वोंमें समभाव रखता है, वह ज्ञानवान् कहलाता है।*
आत्मचिन्तनसे तथा तत्त्वोंके विवेकसे ऐसा प्रयत्न करे कि शरीरसे अपनी पृथक्ताका बोध हो जाय। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला पुरुष शरीर एवं उसके अभिमानको त्यागकर अहंकारशून्य एवं मुक्त हो सदाशिवमें विलीन हो जाता है।
अध्यात्मचिन्तन एवं भगवान् शिवकी भक्ति—ये ज्ञानके मूल कारण हैं। भक्तिसे साधनविषयक प्रेमकी उपलब्धि बतायी गयी है। प्रेमसे श्रवण होता है, श्रवणसे सत्संग प्राप्त होता है और सत्संगसे ज्ञानी गुरुकी उपलब्धि होती है। गुरुकी कृपासे ज्ञान प्राप्त हो जानेपर मनुष्य निश्चय ही मुक्त हो जाता है। इसलिये जो समझदार है, उसे सदा शम्भुका ही भजन करना चाहिये। जो अनन्यभक्तिसे युक्त होकर शम्भुका भजन करता है, उसे अन्तमें अवश्य ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है। अतः मुक्तिकी प्राप्तिके लिये भगवान् शंकरसे बढ़कर दूसरा कोई देवता
* शुभं लब्ध्वा न हृष्येत कुप्येल्लब्ध्वाशुभं नहि। द्वन्द्वेषु समता यस्य ज्ञानवानुच्यते हि सः॥
(शि० पु० को० रु० सं० ४३।३१)
789 संक्षिप्त शिवपुराण—19 B
* कोटिरुद्रसंहिता * ५७९
नहीं है। उनकी शरण लेकर जीव संसार-बन्धनसे छूट जाता है।
ब्राह्मणो! इस प्रकार वहाँ पधारे हुए ऋषियोंने परस्पर निश्चय करके जो यह ज्ञानकी बात बतायी है, इसे अपनी बुद्धिके द्वारा प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिये। मुनीश्वरो! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। इसे तुम्हें प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिये। बताओ, अब और क्या सुनना चाहते हो?
ऋषि बोले—व्यासशिष्य! आपको नमस्कार है। आप धन्य हैं, शिवभक्तोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने हमें शिवतत्त्वसम्बन्धी परम उत्तम ज्ञानका श्रवण कराया है। आपकी कृपासे हमारे मनकी भ्रान्ति मिट गयी। हम आपसे मोक्षदायक शिवतत्त्वका ज्ञान पाकर बहुत संतुष्ट हुए हैं।
सूतजीने कहा—द्विजो! जो नास्तिक हो, श्रद्धाहीन हो और शठ हो, जो भगवान् शिवका भक्त न हो तथा इस विषयको सुननेकी रुचि न रखता हो, उसे इस तत्त्वज्ञानका उपदेश नहीं देना चाहिये। व्यासजीने इतिहास, पुराणों, वेदों और शास्त्रोंका बारंबार विचार करके उनका सार निकालकर मुझे उपदेश दिया है। इसका एक बार श्रवण करनेमात्रसे सारे पाप भस्म हो जाते हैं, अभक्तको भक्ति प्राप्त होती है और भक्तकी भक्ति बढ़ती है। दुबारा सुननेसे उत्तम भक्ति प्राप्त होती है। तीसरी बार सुननेसे मोक्ष प्राप्त होता है। अतः भोग और मोक्षरूप फलकी इच्छा रखनेवाले लोगोंको इसका बारंबार श्रवण करना चाहिये। उत्तम फलको पानेके उद्देश्यसे इस पुराणकी पाँच आवृत्तियाँ करनी चाहिये। ऐसा करनेपर मनुष्य उसे अवश्य पाता है, इसमें संदेह नहीं है; क्योंकि यह व्यासजीका वचन है। जिसने इस उत्तम पुराणको सुना है, उसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
यह शिव-विज्ञान भगवान् शंकरको अत्यन्त प्रिय है। यह भोग और मोक्ष देनेवाला तथा शिवभक्तिको बढ़ानेवाला है। इस प्रकार मैंने शिवपुराणकी यह चौथी आनन्ददायिनी तथा परम पुण्यमयी संहिता कही है, जो कोटिरुद्रसंहिताके नामसे विख्यात है। जो पुरुष एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे इस संहिताको सुनेगा या सुनायेगा, वह समस्त भोगोंका उपभोग करके अन्तमें परमगतिको प्राप्त कर लेगा।
(अध्याय ४३)
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॥ कोटिरुद्रसंहिता सम्पूर्ण ॥
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789 संक्षिप्त शिवपुराण—19 C
उमासंहिता
उमासंहिता
भगवान् श्रीकृष्णके तपसे संतुष्ट हुए शिव और पार्वतीका उन्हें अभीष्ट वर देना तथा शिवकी महिमा
यो धत्ते भुवनानि सप्त गुणवान् स्रष्टा रजःसंश्रयः
संहर्त्ता तमसान्वितो गुणवतीं मायामतीत्य स्थितः।
सत्यानन्दमनन्तबोधममलं ब्रह्मादिसंज्ञास्पदं
नित्यं सत्त्वसमन्वयादधिगतं पूर्णं शिवं धीमहि॥
'जो रजोगुणका आश्रय ले संसारकी सृष्टि करते हैं, सत्त्वगुणसे सम्पन्न हो सातों भुवनोंका धारण-पोषण करते हैं, तमोगुणसे युक्त हो सबका संहार करते हैं तथा त्रिगुणमयी मायाको लाँघकर अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित रहते हैं, उन सत्यानन्दस्वरूप, अनन्त बोधमय, निर्मल एवं पूर्ण ब्रह्म शिवका हम ध्यान करते हैं। वे ही सृष्टिकालमें ब्रह्मा, पालनके समय विष्णु और संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं तथा सदैव सात्त्विक-भावको अपनानेसे ही प्राप्त होते हैं।
ऋषि बोले—महाज्ञानी व्यासशिष्य सूतजी! आपको नमस्कार है। आपने कोटिरुद्र नामक चौथी संहिता हमें सुना दी। अब उमासंहिताके अन्तर्गत नाना प्रकारके उपाख्यानोंसे युक्त जो परमात्मा साम्ब सदाशिवका चरित्र है, उसका वर्णन कीजिये।
सूतजीने कहा—शौनक आदि महर्षियो! भगवान् शंकरका मंगलमय चरित्र परम दिव्य एवं भोग और मोक्षको देनेवाला है। तुमलोग प्रेमसे इसका श्रवण करो। पूर्वकालमें मुनिवर व्यासने सनत्कुमारके सामने ऐसे ही पवित्र प्रश्नको उपस्थित किया था और इसके उत्तरमें उन्होंने भगवान् शिवके उत्तम चरित्रका गान किया था।
उस समय पुत्रकी प्राप्तिके निमित्त श्रीकृष्णके हिमवान् पर्वतपर जाकर महर्षि उपमन्युसे मिलने, उनकी बतायी हुई पद्धतिके अनुसार भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करने, उनके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती, कार्तिकेय तथा गणेशसहित शिवके प्रकट होने तथा श्रीकृष्णके द्वारा उनकी स्तुतिपूर्वक वरदान माँगनेकी कथा सुनाकर सनत्कुमारजीने कहा—श्रीकृष्णका वचन सुनकर भगवान् भव उनसे बोले—'वासुदेव! तुमने जो कुछ मनोरथ किया है, वह सब पूर्ण होगा।' इतना कहकर त्रिशूलधारी भगवान् शिव फिर बोले—"यादवेन्द्र! तुम्हें साम्ब नामसे प्रसिद्ध एक महापराक्रमी बलवान् पुत्र प्राप्त होगा। एक समय मुनियोंने भयानक संवर्तक (प्रलयंकर) सूर्यको शाप दिया था कि 'तुम मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होओगे' अतः वे संवर्तक सूर्य ही तुम्हारे पुत्र होंगे। इसके सिवा जो-जो वस्तु तुम्हें अभीष्ट है, वह सब तुम प्राप्त करो।"
सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार परमेश्वर शिवसे सम्पूर्ण वरोंको प्राप्त करके श्रीकृष्णने विविध प्रकारकी बहुत-सी स्तुतियोंद्वारा उन्हें पूर्णतया संतुष्ट किया। तदनन्तर भक्तवत्सला गिरिराजकुमारी शिवाने प्रसन्न हो उन तपस्वी शिवभक्त महात्मा वासुदेवसे कहा।
पार्वती बोलीं—परम बुद्धिमान् वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ।
789 संक्षिप्त शिवपुराण—19 D
* उमासंहिता * ५८१
अनघ! तुम मुझसे भी उन मनोवांछित वरोंको ग्रहण करो, जो भूतलपर दुर्लभ हैं।
श्रीकृष्णने कहा—देवि! यदि आप मेरे इस सत्य तपसे संतुष्ट हैं और मुझे वर दे रही हैं तो मैं यह चाहता हूँ कि ब्राह्मणोंके प्रति कभी मेरे मनमें द्वेष न हो, मैं सदा द्विजोँका पूजन करता रहूँ। मेरे माता-पिता सदा मुझसे संतुष्ट रहें। मैं जहाँ कहीं भी जाऊँ, समस्त प्राणियोंके प्रति मेरे हृदयमें अनुकूल भाव रहे। आपके दर्शनके प्रभावसे मेरी संतति उत्तम हो। मैं सैकड़ों यज्ञ करके इन्द्र आदि देवताओंको तृप्त करूँ। सहस्त्रों साधु-संन्यासियों और अतिथियोंको सदा अपने घरपर श्रद्धासे पवित्र अन्नका भोजन कराऊँ। भाई-बन्धुओंके साथ नित्य मेरा प्रेम बना रहे तथा मैं सदा संतुष्ट रहूँ।
सनत्कुमारजी कहते हैं—श्रीकृष्णका वह वचन सुनकर सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाली सनातनी देवी पार्वती विस्मित हो उनसे बोलीं—'वासुदेव! ऐसा ही होगा। तुम्हारा कल्याण हो।' इस प्रकार श्रीकृष्णपर उत्तम कृपा करके उन्हें उन वरोंको देकर पार्वतीदेवी तथा परमेश्वर शिव दोनों वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर केशिहन्ता श्रीकृष्णने मुनिवर उपमन्युको प्रणाम करके उनसे वर-प्राप्तिका सारा समाचार बताया। तब उन मुनिने कहा—'जनार्दन! संसारमें भगवान् शिवके सिवा दूसरा कौन महादानी ईश्वर है तथा क्रोधके समय दूसरा कौन अत्यन्त दुस्सह हो उठता है। महायशस्वी गोविन्द! दान, तप, शौर्य तथा स्थिरतामें शिवसे बढ़कर कौन है। अतः तुम शम्भुके दिव्य ऐश्वर्यका सदा श्रवण करते रहो।'*
तदनन्तर उपमन्युके द्वारा शिवकी महिमा सुननेके बाद उन मुनीश्वरको नमस्कार करके वसुदेवनन्दन केशव मन-ही-मन शम्भुका स्मरण करते हुए द्वारकापुरीको चले गये।
(अध्याय १—३)
~~०~~
* महर्षि उपमन्युके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति शिवतत्त्वके उपदेश तथा उपमन्युकी कथा वायवीयसंहितामें विस्तारसे कही जायगी।
५८२
* संक्षिप्त शिवपुराण *
नरकमें गिरानेवाले पापोंका संक्षिप्त परिचय
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जो पापपरायण जीव महानरकके अधिकारी हैं, उनका संक्षेपसे परिचय दिया जाता है; सावधान होकर सुनो। परस्त्रीको प्राप्त करनेका संकल्प, पराये धनको अपहरण करनेकी इच्छा, चित्तके द्वारा अनिष्ट-चिन्तन तथा न करनेयोग्य कर्ममें प्रवृत्त होनेका दुराग्रह—ये चार प्रकारके मानसिक पापकर्म हैं। असंगत प्रलाप (बेसिर-पैरकी बातें), असत्य-भाषण, अप्रिय बोलना और पीठ-पीछे चुगली खाना—ये चार वाचिक (वाणीद्वारा होनेवाले) पापकर्म हैं। अभक्ष्य-भक्षण, प्राणियोंकी हिंसा, व्यर्थके कार्योंमें लगना और दूसरोंके धनको हड़प लेना—ये चार प्रकारके शारीरिक पापकर्म हैं। इस प्रकार ये बारह कर्म बताये गये, जो मन, वाणी और शरीर इन तीन साधनोंसे सम्पन्न होते हैं। जो संसार-सागरसे पार उतारनेवाले महादेवजीसे द्वेष करते हैं, वे सब-के-सब नरकोंके समुद्रमें गिरनेवाले हैं। उनको बड़ा भारी पातक लगता है। जो शिवज्ञानका उपदेश देनेवाले तपस्वीकी, गुरुजनोंकी और पिता-ताऊ आदिकी निन्दा करते हैं, वे उन्मत्त मनुष्य नरक-समुद्रमें गिरते हैं। ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीनेवाला, सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीगामी तथा इन चारोंसे सम्पर्क रखनेवाला पाँचवीं श्रेणीका पापी—ये सब-के-सब महापातकी कहे गये हैं।
जो क्रोधसे, लोभसे, भयसे तथा द्वेषसे ब्राह्मणके वधके लिये महान् मर्मभेदी दोषका वर्णन करता है, वह ब्रह्महत्यारा होता है। जो ब्राह्मणको बुलाकर उसे कोई वस्तु देनेके पश्चात् फिर ले लेता है तथा जो निर्दोष पुरुषपर दोषारोपण करता है, वह मनुष्य भी ब्रह्महत्यारा होता है। जो भरी सभामें उदासीनभावसे बैठे हुए श्रेष्ठ द्विजको अपनी विद्याके अभिमानसे अपमानित करके उसे निस्तेज (हतप्रतिभ) कर देता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो दूसरोंके यथार्थ गुणोंका भी बलात् खण्डन करके झूठे गुणोंद्वारा अपने-आपको उत्कृष्ट सिद्ध करता है, वह भी निश्चय ही ब्रह्महत्यारा होता है। जो साँड़ोंद्वारा बाही जाती हुई गौओंके तथा गुरुसे उपदेश ग्रहण करते हुए द्विजोंके कार्यमें विघ्न डालता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं। जो देवताओं, ब्राह्मणों तथा गौओंके उपयोगके लिये दी हुई भूमिको हर लेता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहा गया है। देवता और ब्राह्मणके धनको हर लेना तथा अन्यायसे धन कमाना ब्रह्महत्याके समान ही पातक जानना चाहिये। जिस किसी व्रत, नियम तथा यज्ञको ग्रहण करके उसे त्याग देना तथा पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान न करना मदिरापानके समान पातक बताया गया है। पिता और माताको त्याग देना, झूठी गवाही देना, ब्राह्मणसे झूठा वादा करना, शिव-भक्तोंको मांस खिलाना तथा अभक्ष्य वस्तुका भक्षण करना ब्रह्महत्याके तुल्य कहा गया है। वनमें निरपराध प्राणियोंका वध कराना भी ब्रह्महत्याके ही तुल्य है। साधु पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणके धनको त्याग दे। उसे धर्मके कार्यमें भी न लगाये, अन्यथा ब्रह्महत्याका दोष लगता है। गौओंके मार्गमें, वनमें तथा गाँवमें जो लोग
* उमासंहिता * ५८३
आग लगाते हैं, वे भी ब्रह्महत्या ही करते हैं। इस तरहके जो भयानक पाप हैं, वे ब्रह्म-हत्याके समान माने गये हैं।
ब्राह्मणके द्रव्यका अपहरण करना, पैतृक सम्पत्तिके बँटवारेमें उलट-फेर करना, अत्यन्त अभिमान और अधिक क्रोध करना, पाखण्ड फैलाना, कृतघ्नता करना, विषयोंमें अत्यन्त आसक्त होना, कंजूसी करना, सत्पुरुषोंसे द्वेष रखना, परस्त्रीसमागम करना, श्रेष्ठ कुलकी कन्याओंको कलंकित करना, यज्ञ, बाग-बगीचे, सरोवर तथा स्त्री-पुरुषोंका विक्रय करना, तीर्थयात्रा, उपवास तथा व्रत एवं उपनयन आदिका सौदा करना, स्त्रीके धनसे जीविका चलाना, स्त्रियोंके अत्यन्त वशीभूत होना, स्त्रियोंकी रक्षा न करना तथा छलसे परायी स्त्रियोंका सेवन करना, ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंको त्याग देना, दूसरोंके आचारका सेवन करना, असत्-शास्त्रोंका अध्ययन करना, सूखे तर्कका सहारा लेना, देवता, अग्नि, गुरु, साधु तथा ब्राह्मणकी निन्दा करना, पितृयज्ञ और देवयज्ञको त्याग देना, अपने कर्मोंका परित्याग करना, बुरे स्वभावको अपनाना, नास्तिक होना, पापोंमें लगना और सदा झूठ बोलना—इस तरहके पापोंसे युक्त स्त्री-पुरुषोंको उपपातकी कहा गया है।
जो मनुष्य गौओं, ब्राह्मणकन्याओं, स्वामी, मित्र तथा तपस्वी महात्माओंके कार्य नष्ट कर देते हैं, वे नरकगामी माने गये हैं। जो ब्राह्मणोंको दुःख देते हैं, उन्हें मारनेके लिये शस्त्र उठाते हैं, जो द्विज होकर शूद्रोंकी सेवा करते हैं तथा जो कामवश मदिरापान करते हैं, जो पापपरायण, क्रूर तथा हिंसाके प्रेमी हैं, जो गोशालामें, अग्निमें, जलमें, सड़कोंपर, पेड़ोंकी छायामें, पर्वतोंपर, बगीचोंमें तथा देवमन्दिरोंके आस-पास मल-मूत्रका त्याग करते हैं, बाँस, ईंट, पत्थर, काठ, सींग और कीलोंद्वारा जो रास्ता रूँधते या रोकते हैं, दूसरोंके खेत आदिकी सीमा (मेड़) मिटा देते हैं, छलसे शासन करते हैं, छल-कपटके ही कार्योंमें लगे रहते हैं, किसीको ठगकर लाये हुए पाक, अन्न तथा वस्त्रोंका छलसे ही उपयोग करते हैं, जो स्त्री, पुत्र, मित्र, बाल, वृद्ध, दुर्बल, आतुर, भृत्य, अतिथि तथा बन्धुजनोंको भूखे छोड़कर स्वयं खा लेते हैं, जो अजितेन्द्रिय पुरुष स्वयं नियमोंको ग्रहण करके फिर उन्हें त्याग देते हैं, संन्यास धारण करके भी फिरसे घर बसा लेते हैं, जो शिवप्रतिमाका भेदन करनेवाले हैं, गौओंको क्रूरतापूर्वक मारते और बारंबार उनका दमन करते हैं, जो दुर्बल पशुओंका पोषण नहीं करते, सदा उन्हें छोड़े रखते हैं, अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं तथा सहन न होनेपर भी बलपूर्वक उन्हें हल या गाड़ीमें जोतते हैं अथवा उनसे असह्य बोझ खिंचवाते हैं, जो उन पशुओंको खिलाये बिना ही भार ढोने या हल खींचनेके काममें जोत देते हैं, बँधे हुए भूखे पशुओंको चरनेके लिये नहीं छोड़ते तथा जो भारसे घायल, रोगसे पीड़ित और भूखसे आतुर गाय-बैलोंका यत्नपूर्वक पालन नहीं करते, वे सब-के-सब गो-हत्यारे तथा नरकगामी माने गये हैं।
जो पापिष्ठ मनुष्य बैलोंके अण्डकोश कुटवाते हैं और बन्ध्या गायको जोतते हैं, वे महानारकी हैं। जो आशासे घरपर आये हुए भूख, प्यास और परिश्रमसे कष्ट पाते हुए और अन्नकी इच्छा रखनेवाले अतिथियों,
५८४ * संक्षिप्त शिवपुराण *
अनाथों, स्वाधीन पुरुषों, दीनों, बाल, वृद्ध, दुर्बल एवं रोगियोंपर कृपा नहीं करते, वे मूढ़ नरकके समुद्रमें गिरते हैं। मनुष्य जब मरता है तब उसका कमाया हुआ धन घरमें ही रह जाता है। भाई-बन्धु भी श्मशानतक जाकर लौट आते हैं, केवल उसके किये हुए पाप और पुण्य ही परलोकके पथपर जानेवाले उस जीवके साथ जाते हैं।
जो औचित्यकी सीमाको लाँघकर मनमाना कर वसूल करता है तथा दूसरोंको दण्ड देनेमें ही रुचि रखता है, वह राजा नरकमें पकाया जाता है। जिस राजाके राज्यमें प्रजा घूसखोरों, अपनी रुचिके अनुसार कम दाम देकर अधिक कीमतका माल ले लेनेवाले अधिकारियों तथा चोर-डाकुओंसे अधिक सतायी जाती है, वह राजा भी नरकोंमें पकाया जाता है। परायी स्त्रियोंके साथ व्यभिचार और चोरी करनेवाले प्रचण्ड पुरुषोंको जो पाप लगता है, वही परस्त्रीगामी राजाको भी लगता है। जो साधुको चोर और चोरको साधु समझता है तथा बिना विचारे ही निरपराधको प्राणदण्ड दे देता है, वह राजा नरकमें पड़ता है। जिस-किसी पराये द्रव्यको सरसों बराबर भी चुरा लेनेपर मनुष्य नरकमें गिरते हैं, इसमें संशय नहीं है। इस तरहके पापोंसे युक्त मनुष्य मरनेके पश्चात् यातना भोगनेके लिये नूतन शरीर पाता है, जिसमें सम्पूर्ण आकार अभिव्यक्त रहते हैं। इसलिये किये हुए पापका प्रायश्चित्त कर लेना चाहिये। अन्यथा सौ करोड़ कल्पोंमें भी बिना भोगे हुए पापका नाश नहीं हो सकता। जो मन, वाणी और शरीरद्वारा स्वयं पाप करता, दूसरेसे कराता तथा किसीके दुष्कर्मका अनुमोदन करता है, उसके लिये पापगति (नरक) ही फल है। (अध्याय ४—६)
पापियों और पुण्यात्माओंकी यमलोकयात्रा
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! मनुष्य चार प्रकारके पापोंसे यमलोकमें जाते हैं। यमलोक अत्यन्त भयदायक और भयंकर है। वहाँ समस्त देहधारियोंको विवश होकर जाना पड़ता है। कोई ऐसे प्राणी नहीं हैं, जो यमलोकमें न जाते हों। किये हुए कर्मका फल कर्ताको अवश्य भोगना पड़ता है, इसका विचार करो। जीवोंमें जो शुभ कर्म करनेवाले, सौम्यचित्त और दयालु हैं, वे सौम्यमार्गसे यमपुरीके पूर्व द्वारको जाते हैं। जो पापी पापकर्मपरायण तथा दानसे रहित हैं, वे भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोककी यात्रा करते हैं। मर्त्यलोकसे छियासी हजार योजनकी दूरी लाँघकर नानारूपवाले यमलोककी स्थिति है, यह जानना चाहिये। पुण्यकर्म करनेवाले लोगोंको तो वह नगर निकटवर्ती-सा जान पड़ता है; परंतु भयानक मार्गसे यात्रा करनेवाले पापियोंको वह बहुत दूर स्थित दिखायी देता है। वहाँका मार्ग कहीं तो तीखे काँटोंसे युक्त है; कहीं कंकड़ोंसे व्याप्त है; कहीं छुरेकी धारके समान तीखे पत्थर उस मार्गपर जड़े गये हैं, कहीं बड़ी भारी कीचड़ फैली हुई है। बड़े-छोटे पातकोंके अनुसार वहाँकी कठिनाइयोंमें भी भारीपन और हलकापन है। कहीं-कहीं यमपुरीके मार्गपर लोहेकी सूईके समान
* उमासंहिता * ५८५
तीखे डाभ फैले हुए हैं।
तदनन्तर यमपुरीके मार्गकी भीषण यातनाओं और कष्टोंका वर्णन करके सनत्कुमारजीने कहा—व्यासजी! जिन्होंने कभी दान नहीं किया है, वे लोग ही इस प्रकार दुःख उठाते और सुखकी याचना करते हुए उस मार्गपर जाते हैं। जिन्होंने पहलेसे ही दानरूपी पाथेय (राहरखर्च) ले रखा है, वे सुखपूर्वक यमलोककी यात्रा करते हैं। इस रीतिसे कष्ट उठाकर पापी जीव जब प्रेतपुरीमें पहुँच जाते हैं, तब उनके विषयमें यमराजको सूचना दी जाती है। उनकी आज्ञा पाकर दूत उन पापियोंको यमराजके आगे ले जाकर खड़े करते हैं। वहाँ जो शुभ कर्म करनेवाले लोग होते हैं, उनको यमराज स्वागतपूर्वक आसन देकर पाद्य और अर्घ्य निवेदन करके प्रिय बर्तावके द्वारा सम्मानित करते हैं और कहते हैं—'वेदोक्त कर्म करनेवाले महात्माओ! आपलोग धन्य हैं, जिन्होंने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये पुण्यकर्म किया है। अतः आपलोग दिव्यांगनाओंके भोगसे भूषित तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंसे सम्पन्न निर्मल स्वर्गलोकमें जाइये। वहाँ महान् भोगोंका उपभोग करके अन्तमें पुण्यके क्षीण हो जानेपर जो कुछ थोड़ा-सा अशुभ शेष रह जाय; उसे फिर यहाँ आकर भोगियेगा।' जो धर्मात्मा मनुष्य होते हैं, वे मानो यमराजके लिये मित्रके समान हैं। वे यमराजको सुखपूर्वक सौम्य धर्मराजके रूपमें देखते हैं।
किंतु जो क्रूर कर्म करनेवाले हैं, वे यमराजको भयानक रूपमें देखते हैं। उनकी दृष्टिमें यमराजका मुख दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता है। नेत्र टेढ़ी भौंहोंसे युक्त प्रतीत होते हैं। उनके केश ऊपरको उठे होते हैं। दाढ़ी-मूँछ बड़ी-बड़ी होती है। ओठ ऊपरकी ओर फड़कते रहते हैं। उनके अठारह भुजाएँ होती हैं, वे कुपित तथा काले कोयलोंके ढेर-से दिखायी देते हैं। उनके हाथोंमें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उठे होते हैं।
५८६ * संक्षिप्त शिवपुराण *
वे सब प्रकारके दण्डका भय दिखाकर उन पापियोंको डाँटते रहते हैं। बहुत बड़े भैंसेपर आरूढ़, लाल वस्त्र और लाल माला धारण करके बहुत ऊँचे महामेरुके समान दृष्टिगोचर होते हैं। उनके नेत्र प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त दिखायी देते हैं। उनका शब्द प्रलयकालके मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर होता है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो महासागरको पी रहे हैं, गिरिराजको निगल रहे हैं और मुँहसे आग उगल रहे हैं।
उनके समीप प्रलयकालकी अग्निके समान प्रभाववाले मृत्यु देवता खड़े रहते हैं। काजलके समान काले कालदेवता और भयानक कृतान्त देवता भी रहते हैं। इनके सिवा मारी, उग्र महामारी, भयंकर कालरात्रि, अनेक प्रकारके रोग तथा भाँति-भाँतिके भयावह कुष्ठ मूर्तिमान् हो हाथोंमें शक्ति, शूल, अंकुश, पाश, चक्र और खड्ग लिये खड़े रहते हैं।
वज्रतुल्य मुख धारण करनेवाले रुद्रगण क्षुर, तरकश और धनुष धारण किये वहाँ उपस्थित होते हैं। सभी नाना प्रकारके आयुध धारण करनेवाले; महान् वीर एवं भयंकर हैं। इनके अतिरिक्त असंख्य महावीर यमदूत, जिनकी अंगकान्ति काले कोयलेके समान काली होती है, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्र लिये बड़े भयंकर जान पड़ते हैं। ऐसे परिवारसे घिरे हुए घोर यमराज तथा भीषण चित्रगुप्तको पापिष्ठप्राणी देखते हैं। यमराज उन पापकर्मियोंको बहुत डाँटते हैं और भगवान् चित्रगुप्त धर्मयुक्त वचनोंद्वारा उन्हें समझाते हैं। (अध्याय ७)
नरकोंकी अट्ठाईस कोटियों तथा प्रत्येकके पाँच-पाँच नायकके क्रमसे एक सौ चालीस रौरवादि नरकोंकी नामावली
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! तदनन्तर यमदूत पापियोंको अत्यन्त तपे हुए पत्थरपर बड़े वेगसे दे मारते हैं, मानो वज्रसे बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी कर दिया गया हो। उस समय शरीरसे जर्जर हुआ देहधारी जीव कानसे खून बहाने लगता है और सुध-बुध खोकर निश्चेष्ट हो जाता है। तब वायुका स्पर्श कराकर वे यमदूत फिर उसे जीवित कर देते हैं और उसके पापोंकी शुद्धिके लिये उसे नरक-समुद्रमें डाल देते हैं। पृथ्वीके नीचे नरककी सात कोटियाँ हैं, जो सातवें तलके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर स्थित हैं। उन सबकी अट्ठाईस कोटियाँ हैं। पहली कोटि घोरा कही गयी है। दूसरी सुघोरा है, जो उसके नीचे स्थित है। तीसरी अतिघोरा, चौथी महाघोरा, पाँचवीं घोररूपा, छठी तलातला, सातवीं भयानका, आठवीं कालरात्रि, नवीं भयोत्कटा, उसके नीचे दसवीं चण्डा, उसके भी नीचे महाचण्डा, फिर चण्ड-कोलाहला तथा उससे भिन्न प्रचण्डा है, जो चण्डोंकी नायिका कही गयी है; उसके बाद पद्मा, पद्मावती, भीता और भीमा है, जो भीषण नरकोंकी नायिका मानी गयी है। अठारहवीं कराला, उन्नीसवीं विकराला और बीसवीं नरककोटि वज्रा कही गयी है। तदनन्तर त्रिकोणा, पंचकोणा, सुदीर्घा, अखिलार्तिदा, समा, भीमबला, भीमा तथा अट्ठाईसवीं दीप्तप्राया
* उमासंहिता * ५८७
है। इस प्रकार मैंने तुमसे भयानक नरक-कोटियोंके नाम बताये हैं। इनकी संख्या अट्ठाईस ही है। ये पापियोंको यातना देनेवाली हैं। उन कोटियोंके क्रमशः पाँच-पाँच नायक जानने चाहिये।
अब उन सब कोटियोंके नाम बताये जाते हैं, सुनो। उनमें प्रथम रौरव नरक है, जहाँ पहुँचकर देहधारी जीव रोने लगते हैं। महारौरवकी पीड़ासे तो महान् पुरुष भी रो देते हैं। इसके बाद शीत और उष्ण नामक नरक है। फिर सुघोर है। रौरवसे सुघोरतक आदिके पाँच नरक नायक माने गये हैं। इसके बाद सुमहातीक्ष्ण, संजीवन, महातम, विलोम, विलोप, कण्टक, तीव्रवेग, कराल, विकराल, प्रकम्पन, महावक्र, काल, कालसूत्र, प्रगर्जन, सूचीमुख, सुनेति, खादक, सुप्रपीड़न, कुम्भीपाक, सुपाक, क्रकच, अतिदारुण, अंगारराशिभवन, मेरु, असृक्प्रहित, तीक्ष्णतुण्ड, शकुनि, महासंवर्तक, क्रतु, तप्तजन्तु, पंकलेप, प्रतिमांस, त्रपूद्भव, उच्छ्वास, सुनिरुच्छ्वास, सुदीर्घ, कूटशाल्मलि, दुरिष्ट, सुमहावाद, प्रवाद, सुप्रतापन, मेघ, वृष, शाल्म, सिंहमुख, व्याघ्रमुख, गजमुख, कुक्कुरमुख, सूकरमुख, अजमुख, महिषमुख, घूकमुख, कोकमुख, वृकमुख, ग्राह, कुम्भीनस, नक्र, सर्प, कूर्म, काक, गृध्र, उलूक, हलौक, शार्दूल, क्रथ, कर्कट, मण्डूक, पूतिमुख, रक्ताक्ष, पूतिमृत्तिक, कणधूम्र, अग्नि, कृमि, गन्धिवपु, अग्नीध्र, अप्रतिष्ठ, रुधिराभ, श्वभोजन, लालाभक्ष, अन्त्रभक्ष, सर्वभक्ष, सुदारुण, कण्टक, सुविशाल, विकट, कटपूतन, अम्बरीष, कटाह, कष्टदायिनी वैतरणी नदी, सुतप्त लोहशयन, एकपाद, प्रपूरण, घोर असितालवन, अस्थिभंग, सुपूरण, विलातस, असुयन्त्र, कूटपाश, प्रमर्दन, महाचूर्ण, असुचूर्ण, तप्तलोहमय, पर्वत, क्षुरधारा, यमलपर्वत, मूत्रकूप, विष्ठाकूप, अश्रुकूप, शीतल क्षारकूप, मुसलोलूखल, यन्त्र, शिला, शकट, लांगल, तालपत्रवन, असिपत्रवन, महाशकटमण्डप, सम्मोह, अस्थिभंग, तप्त, चंचल, अयोगुड (लोहेकी गोली), बहुदुःख, महाक्लेश, कश्मल, शमल, मलात्, हालाहल, विरूप, स्वरूप, यमानुग, एकपाद, त्रिपाद, तीव्र, अचीवर और तम।
इस प्रकार ये अट्ठाईस नरक और क्रमशः उनके पाँच-पाँच नायक कहे गये हैं। अट्ठाईस कोटियोंके क्रमशः रौरव आदि पाँच-पाँच ही नायक बताये जाते हैं। उपर्युक्त २८ कोटियोंको छोड़कर लगभग सौ नरक माने जाते हैं और महानरकमण्डल एक सौ चालीस नरकोंका बताया गया है।*
(अध्याय ८)
* यहाँ अट्ठाईस कोटियोंका पहले पृथक् वर्णन आया है, फिर प्रत्येकके पाँच-पाँच नायक बताकर ठीक एक सौ चालीस नरकोंका नामोल्लेख किया गया है। कोटियोंकी संख्या मिला देनेसे सब एक सौ अड़सठ होते हैं।
५८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *
विभिन्न पापोंके कारण मिलनेवाली नरकयातनाका वर्णन तथा कुक्कुरबलि, काकबलि एवं देवता आदिके लिये दी हुई बलिकी आवश्यकता एवं महत्ताका प्रतिपादन
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! इन सब भयानक पीड़ादायक नरकोंमें पापी जीवोंको अत्यन्त भीषण नरकयातना भोगनी पड़ती है। जो मिथ्या आगम (पाखण्डियोंके शास्त्र)-में प्रवृत्त होता है, वह द्विजह्व नामक नरकमें जाता है और जिह्वाके आकारमें आधे कोसतक फैले हुए तीक्ष्ण हलोंद्वारा वहाँ उसे विशेष पीड़ा दी जाती है। जो क्रूर मनुष्य माता-पिता और गुरुको डाँटता है, उसके मुँहमें कीड़ोंसे युक्त विष्ठा ठूँसकर उसे खूब पीटा जाता है। जो मनुष्य शिवमन्दिर, बगीचे, बावड़ी, कूप, तड़ाग तथा ब्राह्मणके स्थानको नष्ट-भ्रष्ट कर देते और वहाँ स्वेच्छानुसार रमण करते हैं, वे नाना प्रकारके भयंकर कोल्हू आदिके द्वारा पेरे और पकाये जाते हैं तथा प्रलयकाल-पर्यन्त नरकाग्नियोंमें पकते रहते हैं। परस्त्रीगामी पुरुष उस-उस रूपसे ही व्यभिचार करते हुए मारे-पीटे जाते हैं। पुरुष अपने पहले-जैसे शरीरको धारण करके लोहेकी बनी और खूब तपायी हुई नारीका गाढ़ आलिंगन करके सब ओरसे जलते रहते हैं। वे उस दुराचारिणी स्त्रीका गाढ़ आलिंगन करते और रोते हैं। जो सत्पुरुषोंकी निन्दा सुनते हैं, उनके कानोंमें लोहे या ताँबे आदिकी बनी हुई कीलें आगसे खूब तपाकर भर दी जाती हैं; इनके सिवा जस्ते, शीशे और पीतलको गलाकर पानीके समान करके उनके कानमें भरा जाता है। फिर बारंबार गरम दूध और खूब तपाया हुआ तेल उनके कानोंमें डाला जाता है। फिर उन कानोंपर वज्रका-सा लेप कर दिया जाता है। इस तरह क्रमशः उनके कानोंको उपर्युक्त वस्तुओंसे भरकर उनको नरकोंमें यातनाएँ दी जाती हैं। क्रमशः सभी नरकोंमें सब ओर ये यातनाएँ प्राप्त होती हैं और सभी नरकोंकी यातनाएँ बड़ा कष्ट देनेवाली होती हैं। जो माता-पिताके प्रति भौंहें टेढ़ी करते अथवा उनकी ओर उद्दण्डतापूर्वक दृष्टि डालते या हाथ उठाते हैं, उनके मुखोंको अन्ततक लोहेकी कीलोंसे दृढ़तापूर्वक भर दिया जाता है। जो मनुष्य लुभाकर स्त्रियोंकी ओर अपलक दृष्टिसे देखते हैं, उनकी आँखोंमें तपाकर आगके समान लाल की हुई सुइयाँ भर दी जाती हैं।
जो देवता, अग्नि, गुरु तथा ब्राह्मणोंको अग्रभाग निवेदन किये बिना ही भोजन कर लेते हैं, उनकी जिह्वा और मुखमें लोहेकी सैकड़ों कीलें तपाकर ठूँस दी जाती हैं। जो लोग धर्मका उपदेश करनेवाले महात्मा कथावाचककी निन्दा करते हैं, देवता, अग्नि और गुरुके भक्तोंकी तथा सनातन धर्मशास्त्रकी भी खिल्लियाँ उड़ाते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, दाँतोंकी संधि, तालु, ओठ, नासिका, मस्तक तथा सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें आगके समान तपायी हुई तीन शाखावाली लोहेकी कीलें मुद्गरोंसे ठोकी जाती हैं। उस समय उन्हें बहुत कष्ट होता है। तत्पश्चात् सब ओरसे उनके घावोंपर तपाया हुआ नमक छिड़क दिया
* उमासंहिता * ५८९
जाता है। फिर उस शरीरमें सब ओर बड़ी भारी यातनाएँ होती हैं। जो पापी शिव-मन्दिरके पास अथवा देवताके बगीचोंमें मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनके लिंग और अण्डकोशको लोहेके मुद्गरोंसे चूर-चूर कर दिया जाता है तथा आगसे तपायी हुई सुइयाँ उसमें भर दी जाती हैं, जिससे मन और इन्द्रियोंको महान् दुःख होता है। जो धन रहते हुए भी तृष्णाके कारण उसका दान नहीं करते और भोजनके समय घरपर आये हुए अतिथिका अनादर करते हैं, वे पापका फल पाकर अपवित्र नरकमें गिरते हैं।$^१$ जो कुत्तों और गौओंको उनका भाग अर्थात् बलि न देकर स्वयं भोजन कर लेते हैं, उनके खुले हुए मुँहमें दो कीलें ठोक दी जाती हैं। 'यमराजके मार्गका अनुसरण करनेवाले जो श्याम और शबल (साँवले तथा चितकबरे) दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिये यह अन्नका भाग देता हूँ, वे इस बलिको ग्रहण करें।' 'पश्चिम, वायव्य, दक्षिण और नैर्ऋत्य दिशामें रहनेवाले जो पुण्यकर्मा कौए हैं, वे मेरी इस दी हुई बलिको ग्रहण करें।'$^२$ इस अभिप्रायके दो मन्त्रोंसे क्रमशः कुत्ते और कौएको बलि देनी चाहिये। जो लोग यत्नपूर्वक भगवान् शंकरकी पूजा करके विधिवत् अग्निमें आहुति दे शिवसम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा बलि समर्पित करते हैं, वे यमराजको नहीं देखते और स्वर्गमें जाते हैं। इसलिये प्रतिदिन बलि देनी चाहिये।
एक चौकोर मण्डप बनाकर उसे गन्ध आदिसे अधिवासित करे। फिर ईशानकोणमें धन्वन्तरिके लिये और पूर्व-दिशामें इन्द्रके लिये बलि दे। दक्षिणदिशामें यमके लिये, पश्चिमदिशामें सुदक्षोमके लिये और दक्षिणदिशामें पितरोंके लिये बलि देकर पुनः पूर्वदिशामें अर्यमाको अन्नका भाग अर्पित करे। द्वारदेशमें धाता और विधाताके लिये बलि निवेदन करे। तदनन्तर कुत्तों, कुत्तोंके स्वामी और पक्षियोंके लिये भूतपर अन्न डाल दे। देवता, पितर, मनुष्य, प्रेत, भूत, गुह्यक, पक्षी, कृमि और कीट—ये सभी गृहस्थसे अपनी जीविका चलाते हैं। स्वाहाकार, स्वधाकार, वषट्कार तथा हन्तकार—ये धर्ममयी धेनुके चार स्तन हैं। स्वाहाकार नामक स्तनका पान देवता करते हैं, स्वधाका पितर लोग, वषट्कारका दूसरे-दूसरे देवता और भूतेश्वर तथा हन्तकार नामक स्तनका सदा ही मनुष्यगण पान करते हैं। जो मानव श्रद्धापूर्वक इस धर्ममयी धेनुका सदा ठीक समयपर पालन करता है, वह अग्निहोत्री हो जाता है। जो स्वस्थ रहते हुए भी उसका त्याग कर देता है, वह अन्धकारपूर्ण नरकमें डूबता है। इसलिये उन सबको बलि देनेके पश्चात् द्वारपर खड़ा हो क्षणभर
१-धने सत्यपि ये दानं न प्रयच्छन्ति तृष्णया ॥
अतिथि चावमन्यन्ते काले प्राप्ते गृहाश्रमे । तस्मात् ते दुष्कृतं प्राप्य गच्छन्ति निरयेऽशुचौ ॥
(शि० पु० उ० सं० १०। ३१-३२)
२-द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ यममार्गानुरोधकौ । यौ स्तस्ताभ्यां प्रयच्छामि तौ गृह्णीतामिमं बलिम् ॥
ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या नैर्ऋत्यकास्तथा । वायसाः पुण्यकर्माणस्ते प्रगृह्णन्तु मे बलिम् ॥
(शि० पु० उ० सं० १०। ३५-३६)
५९० * संक्षिप्त शिवपुराण *
अतिथिकी प्रतीक्षा करे। यदि कोई भूखसे पीड़ित अतिथि या उसी गाँवका निवासी पुरुष मिल जाय तो उसे अपने भोजनसे पहले यथाशक्ति शुभ अन्नका भोजन कराये। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौटता है, उसे वह अपना पाप दे बदलेमें उसका पुण्य लेकर चला जाता है।*
(अध्याय ९-१०)
यमलोकके मार्गमें सुविधा प्रदान करनेवाले विविध दानोंका वर्णन
व्यासजी बोले—प्रभो! पापी मनुष्य बड़े दुःखसे यमलोकके मार्गमें जाते हैं। अब आप मुझे उन धर्मोंका परिचय दीजिये, जिनसे जीव सुखपूर्वक यममार्गपर यात्रा करते हैं।
सनत्कुमारजीने कहा—मुने! अपना किया हुआ शुभाशुभ कर्म बिना विचारे विवश होकर भोगना पड़ता है। अब मैं उन धर्मोंका वर्णन करता हूँ, जो सुख देनेवाले हैं। इस लोकमें जो श्रेष्ठ कर्म करनेवाले, कोमलचित्त और दयालु पुरुष हैं, वे भयंकर यममार्गपर सुखसे यात्रा करते हैं। जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जूता और खड़ाऊँ दान करता है, वह मनुष्य विशाल घोड़ेपर सवार हो बड़े सुखसे यमलोकको जाता है। छत्र दान करनेसे मनुष्य उस मार्गपर उसी तरह छाता लगाकर चलते हैं, जैसे यहाँ छातेवाले लोग चलते हैं। शिविकाका दान करनेसे मनुष्य रथके द्वारा सुखसे यात्रा करते हैं। शय्या और आसनका दान करनेसे दाता यमलोकके मार्गमें विश्राम करते हुए सुखपूर्वक जाता है। जो बगीचे लगाते और छायादार वृक्षका आरोपण करते हैं अथवा सड़कके किनारे वृक्षारोपण करते हैं, वे धूपमें भी बिना कष्ट उठाये यमलोकको जाते हैं। जो मनुष्य फुलवाड़ी लगाते हैं, वे पुष्पक विमानसे यात्रा करते हैं। देवमन्दिर बनानेवाले उस मार्गपर घरके भीतर क्रीड़ा करते हैं। जो यतियोंके आश्रमका निर्माण कराते हैं और अनाथोंके लिये घर बनवाते हैं, वे भी घरके भीतर क्रीड़ा करते हैं। जो देवता, अग्नि, गुरु, ब्राह्मण, माता और पिताकी पूजा करते हैं, वे मनुष्य स्वयं ही पूजित हो अपनी इच्छाके अनुकूल मार्गद्वारा सुखसे यात्रा करते हैं। दीपदान करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए जाते हैं। गृहदान करनेसे दाता रोग-शोकसे रहित हो सुखपूर्वक यात्रा करते हैं। गुरुजनोंकी सेवा करनेवाले मानव विश्राम करते हुए जाते हैं। बाजा देनेवाले उसी तरह सुखसे यात्रा करते हैं, मानो अपने घर जा रहे हों। गोदान करनेवाले लोग सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे भरे-पूरे मार्गद्वारा जाते हैं। मनुष्य उस मार्गपर इस लोकमें दिये हुए अन्न-पानको ही पाता है। जो किसीको पैर धोनेके लिये जल देता है, वह ऐसे मार्गसे जाता है, जहाँ जलकी सुविधा हो। जो आदरणीय पुरुषोंके पैरोंमें उबटन लगाता है,
* अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रति निवर्तते। स तस्मै दुष्कृतं दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति॥
(शि० पु० उ० सं० १०। ४८)