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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

द्वितीय विकास : १७ इसे पंचार-चक्र कहते हैं। अ इ उ दीर्घ स्वरों के साथ मिल कर (अर्थात् क्षोभ को पाकर) जन्मस्थान अथवा बीजस्थान कहलाते हैं। ऋ तथा ऌ अपने दीर्घ स्वरों के साथ भी न बीज हैं न योनि, क्योंकि यह शिवतत्त्व में ही अनादिरूप से आनन्दभोग में मग्न हैं। इस प्रकार इस पंचार-चक्र से पराशक्ति देवी का विस्तार बारह स्वरों में हुआ। फिर व्यञ्जनों की सृष्टि करके वर्णमाला के पचास अक्षरों में विस्तार पाया। परारूप पराशक्ति में यह शब्द-राशि-भैरव सनातन रूप से ब्रह्मरन्ध्र में ठहरा है। यही प्राणी के हृदय में एक अणु से पश्यन्ती के द्वारा, कण्ठ में दो अणुओं से मध्यमा द्वारा और फिर जिह्वामूल में तीन अणुओं से वैखरी के द्वारा प्रकट होता है। इस प्रकार शब्द से ही चर तथा अचर व्याप्त है। अतः परभैरवीय परावाक् शक्तिरूप जो मातृका है वह ज्येष्ठा, रौद्री तथा अम्बा शक्तियों द्वारा विचित्ररूप धारण कर सब वर्णों में उदित हुई है। इन वर्णों के संघट्ट (मेल) का स्वरूप मन्त्रों में प्रकट होता है। वही मन्त्रों की भगवती यहाँ विद्याशरीर- सत्ता का रहस्य कही गई है। इसका साक्षात्कार करके योगी कृतकृत्य बन जाता है क्योंकि उसे शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है। विषय गहन होने के कारण यदि उपर्युक्त विवरण समझने में कुछ कठिन लगे तो सद्गुरु महाराज की शरण का ही आश्रय लेना उचित है ॥३॥ सम्बन्ध—जिन साधकों को ऊपर कहे हुए के अनुसार पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास परमेश्वर की इच्छा से हृदयङ्गम न हो उन्हें बिन्दुनाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियों में ही मन ऐसे रमता है जैसे मार्ग में जाता हुआ पथिक अपने ध्येय को भूलकर तृण तथा पर्णों को ही इकट्ठा करने में लगता है (रथ्यां गमने तृणपर्णानि इति नीत्या)। इस विषय का अगले सूत्र में वर्णन किया है। गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ॥४॥ गर्भे—योगमाया भूमि (अख्याति-रूप महामाया अर्थात् मित मन्त्र- सिद्धियों) के प्रपञ्च में (ही) चित्तविकासः—(जिस के) मन का विकास (अर्थात् जिस का मन प्रसन्न) हो (उसको) अविशिष्टविद्या—(वह) सर्वजन साधारण विद्या अर्थात् किञ्चित् ज्ञान वाली अशुद्धविद्या स्वप्नः—स्वप्न के बराबर ही भ्रमात्मक है अर्थात् उसकी समाधि स्वप्न तुल्य ही है। २

१८ : शिवसूत्र विमर्श व्याख्या—जो साधक ईश्वर-इच्छा से ही उस परप्रमातृभाव पर स्थिति प्राप्त करने में असमर्थ होकर मार्ग के प्रलोभनों में ही रमता है उसका मन योगमाया भूमि (छः मित-सिद्धियों) में प्रसन्न रहता है। यद्यपि उसे किञ्चित् ज्ञानलाभ होता भी है तथापि वह अशुद्धविद्या (अर्थात् सर्व-जन-साधारण विद्या) के ही विशेष चमत्कारों में व्यस्त रहता है और परलाभ से वञ्चित रहता है। उसकी समाधि-दशा वैसी ही भ्रमात्मक है जैसे स्वप्न में पड़ा साधारण जीव । व्युत्थान दशा में वह यद्यपि इन मितसिद्धियों का प्रदर्शन करता है परन्तु समाधि में उसे ये ही विघ्न बन जाती हैं। फलतः ऐसा साधक स्वच्छन्द परमार्थ लाभ से वंचित रह जाता है। पातञ्जल योगदर्शन में कहा है— 'ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः' —(३-२७) अर्थ—वे छः प्रकार की मितसिद्धियाँ समाधि की सिद्धि अर्थात् ज्ञानप्राप्ति में विघ्न हैं और व्युत्थान में सिद्धियाँ हैं। ऐसे साधक की देहवासना छूटी नहीं होती है। इस कारण उसकी बिन्दु-नाद की शक्तियों से उत्पन्न हुई मितसिद्धियाँ अस्थायी होती हैं और उसे क्षोभ में डालती रहती हैं। अतः साधक को सचेत रहने की आवश्यकता है। यह सद्गुरु का कृपापात्र बनकर रहने से ही हो सकता है ॥४॥ सम्बन्ध—परन्तु इन मितसिद्धियों के समीप आने पर भी जब योगी ईश्वरकृपा से इनका आश्रय नहीं लेता है और परम स्थिति का ही आलम्बन धारण कर सकता है तो वह परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति को पाता है। इसके लिए अगला सूत्र कहा गया है। विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था ॥५॥ विद्यासमुत्थाने—पराद्वयप्रथारूप शुद्धविद्या का उदय स्वाभाविके—स्वाभाविक (सहज) होने पर खेचरी—चिदाकाशगामी खेचरी मुद्रा (में) शिवावस्था—परसंविद्रूप शिव अवस्था (योगी को प्राप्त होती है)। व्याख्या—अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल होने पर योगी शुद्धविद्या को पाता है। यहाँ उसे परम अद्वैत-स्वरूप ज्ञान का उदय होता है। परमेश्वर की इच्छा मात्र से वह अनेक जन्माजित पुण्य-पुञ्जों के फलस्वरूप पराद्वयस्वरूप में मज्जन करता है। यहाँ मित सिद्धियों का अनादर होता है और समस्त मायीय भेद शान्त हो जाते हैं। योगी बोधगगन में विचरण रूप खेचरी मुद्रा के आस्वादन में स्वाभाविकी स्थिति को प्राप्त होता है। यह उसकी पराहंतारूप स्वानन्दपूरित शिवावस्था है। फिर यह स्वाभाविक विद्यासमुत्थान उसे केवल अनुसंधान मात्र से होता है। श्रुति कहती है:—

द्वितीय विकास : १९ 'शरवत् संहितो भवेत्' अर्थ—जिस प्रकार तीर अपने लक्ष्य पर अति वेग से जा लगता है उसी प्रकार ऐसे योगी का चिदात्मस्वरूप में मज्जन होता है, यही योगी की परम सिद्धि है। इसी अवस्था के लिये आचार्य उत्पलदेव ने भगवान् शिव से प्रार्थना की है— त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो योगसिद्धिरियती सदास्तु मे। यद्विशेयमभिसन्धिमात्रत्- स्त्वत्सुधासदनमर्चनाय ते ॥ —(शिवस्तोत्रावली २२-६) अर्थ—हे परमेश्वर ! तुम्हारे दर्शन के लिये उत्कण्ठित हृदयवाले मुझे इतनी सी ही योग-सिद्धि सदा प्राप्त होती रहे कि मैं केवल इच्छा होते हुए ही (अर्थात् जब मैं चाहूँ तब) तुम्हारी पूजा करने के लिए तुम्हारे चिदानन्द-सदन (अर्थात् परमानन्द धाम) में प्रवेश करूँ ॥ ऐसे परम सिद्ध योगी की सिद्धियां उसका अनुसरण करती हैं परन्तु वह उनकी ओर देखता तक भी नहीं। परम भक्त सन्त परमानन्द महाराज ने क्या सुन्दर कविता इस संदर्भ में कश्मीरी भाषा में कही है : 'पत् ल़ारन्स् ऋद् त् सिद्ध स्योद् वुछ्यक् न् जांह्' अर्थ—ऋद्धि और सिद्धि योगी का पीछा करेंगी परन्तु वह उनकी ओर एक आंख भी नहीं देखेगा। श्रुति के अनुसार ऐसे योगी का अनुभव—'सवं इदं अहं च ब्रह्मैव' (अर्थात् यह सर्व चराचर विश्व ओर मैं ब्रह्म ही हैं) इस प्रकार स्वरूप चमत्कार पूर्ण होता है। काश्मीर शैव-दर्शन में इसे कुलमार्ग कहते हैं। कुलरूप परमशिव हैं। 'कुल' का अर्थ है 'विश्वाभेद अवस्था' । इसी से इसको 'कौल' अर्थात् 'त्रिक' नाम दिया गया है। यहाँ सब प्रकार के क्षोभ का लय होता है। इस प्रकार मन्त्रवीर्य स्वरूप के कथन द्वारा मुद्रा- वीर्य का भी संग्रह हो गया। तन्त्रालोक में श्रीअभिनवगुप्तपाद इसे जगदानन्द की संज्ञा देते हैं। यह स्थिति इस प्रकार है :— यत्र कोऽपि व्यवच्छेदो नास्ति यद्विश्वत: स्फुरत् । यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्ति भावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शम्भूरुचिवान् ॥ —(तन्त्रालोकः)

२० : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जिस चिदानन्द दशा में कोई रुकावट न हो, जो [स्वात्मलाभरूप चमत्कार] विकास वाला हो, जहाँ किसी दूसरी अपेक्षा से रहित, प्रमाता-प्रमेयादि रूप से संवित् परिपूर्ण विकसित हो, जिस अवस्था में समाधि, धारणा आदि की कोई विशेष उप- योगिता न हो वही (योगी की) जगदानन्द दशा है ऐसा श्री शम्भुनाथ ने हम (अभिनव गुप्त) से कहा है ॥५॥ सम्बन्ध—अब इस स्थिति की प्राप्ति का उपाय कहते हैं । गुरुरुपायः ॥६॥ उपायः—(इस अवस्था अर्थात् परमसिद्धि की प्राप्ति का) उपाय गुरुः—गुरु (ही हैं) । व्याख्या—मन्त्रवीर्य और खेचरी मुद्रा से सृष्टि बीज हंसः अथवा अहम् और संहार बीज सोऽहं अथवा म ह अ क्रमशः तात्पर्य है । यहाँ सृष्टिबीज की ही प्रधानता कही गई है । इस तात्त्विक अर्थ का जो उपदेश करे उसे गुरु कहते हैं । 'मनुष्य देह- मास्थाय छन्नास्ते परमेश्वरः' (परमेश्वर ही गुरुजनों के रूप में मनुष्य देह में छिपे हुए हैं) । या यों समझना चाहिये कि—'गुर्वी पारमेश्वरी अनुग्राहिका शक्तिः' (गुरु तो परमेश्वर की अनुग्रह करने वाली ही शक्ति है) अतः गुरु, ऊपर कही हुई परमसिद्धि के उपाय का अवकाश देता है, ऐसा स्पष्ट है, (सैवावकाशं ददतीत्युपायः भवति) ॥६॥ सम्बन्ध—अतः गुरु के प्रसाद से ही शिष्य को स्वात्मरूपता का परिज्ञान होता है । वह अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम है । इसका कथन अगले सूत्र में है । मातृकाचक्रसंबोधः ॥७॥ मातृकाचक्र—अहं-परामर्श के तात्त्विक क्रम का । संबोधः—सम्यक् बोध (गुरु की प्रसन्नता से शिष्य को होता है) । व्याख्या—जिन साधारण जनों को स्वरूपज्ञान की चेतना नहीं होती है उनको प्रति- लोमरूप परमेश्वर की जो शक्ति बहिर्मुखता में विषयों की ओर दौड़ाती है उसे मातृका कहते हैं । यही जीव-संसार है । परन्तु जो विरले योगी-जन मन्त्रवीर्य रहस्य को जानकर खेचरी मुद्रा में अ-ह वाचक-वाच्य रूप जगत् (शब्दादि) के शब्दराशि भैरव में सद्गुरु महाराज की प्रसन्नता के फलस्वरूप स्थिति प्राप्त करते हैं उन्हीं को चिदानन्दघन स्व- स्वरूप का सम्यक् ज्ञान अर्थात् समावेश होता है । उनको विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के विमर्श का विकास होता है । अहं-विमर्श दो प्रकार का है । पहला परमशिवरूप स्वरूपान्तर्गत अहं की प्रथम कला है जिसे कुल कहते हैं । इसी को कौल अर्थात् त्रिक.मत से जाना जाता है । दूसरा

द्वितीय विकास : २१ शिवरूप प्रसरोन्मुख द्वितीय कला है जिसे अकुल अर्थात् विमर्शोन्मुख अहं कहते हैं। यहाँ शाक्तोपाय में दूसरे प्रकार के विमर्श से तात्पर्य है, मातृकाचक्र की यत्किञ्चित् व्याख्या इसी विकास के तीसरे सूत्र में की गई है ॥७॥ सम्बन्ध — इस प्रकार अहं परामर्श के तात्त्विक क्रम का सम्यक् बोध प्राप्त करने के लिए योगी चिदग्नि में स्थूल-सूक्ष्मादिरूप शरीर की आहुति देता है। इस पर कहते हैं। शरीरं हविः ॥८॥ शरीरं — (योगी) स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पररूप शरीर के अहम्भाव की हविः — (चिद्-अग्नि में) आहुति देता है। व्याख्या — देह स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पर चार प्रकार का है। इस तरह जीव शरीर में चार प्रमाताओं से अभिषिक्त है। वे हैं देह, पुर्यष्टक, प्राण और शून्य । अतः जीव की मितप्रमातृता जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और शून्य अवस्थाओं में रहती है। महा- योगी पूर्णाहन्ता को प्राप्त करने के लिए इन चारों प्रमाताओं को पर प्रमातृरूप चिदग्नि में जब आहुति देता है तब वह कृतकृत्य हो जाता है। अतः देह-प्रमातृता का शमन ही यहाँ तात्पर्य है । गीता जी में कहा है :— बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन् विषयांस्र्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः । ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् । विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ —(गीताः अध्याय १८; श्लोक ५१-५३) अर्थ—संशय, विपर्यय आदि से विमुक्त बुद्धि से युक्त ब्रह्मवित् यति सात्त्विक धृति से बाह्यविषयों में प्रवृत्त चित्त का निरोध कर, शब्दादि विषयों का त्याग कर (अर्थात् अनुसन्धान न कर) तथा राग और द्वेष का परित्याग कर, जो निर्जन अरण्य आदि देशों में रहता है, परिमित अशन करता है, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता है, सदा ध्यान और योग में तत्पर रहता है एवं सदा वैराग्य से पूर्ण रहता है, अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग कर देह आदि में ममतारहित और शान्त रहता है, वह यति ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। स्पन्दशास्त्र में भी कहा हैः— 'यदा क्षोभः प्रलीयेत, तदा स्यात् परमं पदम् ।' —(९)

२२ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जब देह में आत्मा के अभिमान करने का 'अहं' पूर्णाहन्ता में लय हो जाये तब योगी की प्रतिष्ठा परम पद में होती है ॥८॥ 'सम्बन्ध—क्योंकि पूर्णता प्राप्त करने तक षट्-कञ्चुक इसके साथ हो रहते हैं अतः; वही योगी: ज्ञानमन्नम् ॥९॥ ज्ञानं—घटपटादि तथा रागद्वेषादि रूप भेदप्रथा के ज्ञान का अन्नम्—ग्रास करने में (तत्पर रहता है) । व्याख्या—पहले विकास के दूसरे सूत्र-'ज्ञानं बन्धः' (द्वैतज्ञान ही बन्धन है)—के अनुसार योगी द्वैतज्ञान को ग्रास करने में तत्पर रहता है। भेदज्ञान बाह्येन्द्रियों द्वारा घटपटादि में होता है और अन्तःकरण द्वारा रागद्वेषादि में प्रकट होता है ! इस अवस्था में यह भेदज्ञान ही योगी के ग्रास करने योग्य अन्न है। सब प्रकार की भेदप्रथा का वह ग्रास करके अद्वयानन्द में मग्न रहता है। श्री भर्गशिखा शास्त्र में कहा है:— 'मृत्युं च कालं च कलाकलापं विकारजातं प्रतिपत्तिसात्म्यम्। ऐकात्म्यनानात्मविकल्पजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥' अर्थ—तब स्वरूप साक्षात्कार के समय वह महायोगी स्थूलदेह के विनाश, महाकाल, क्रियासमूह, हासक्रोधादि द्वन्द्वविकार, भेदप्रथा के ज्ञान से तत्तत् भाव में तन्मय होना, जीवों के साथ एकता और स्थाणु आदि के साथ नानात्व का विकल्प, इन सब को ग्रास करता है। ऐसे उदारचित्त योगिराजों का कुटुम्ब सारी सृष्टि है। कहा भी है : 'उदारचरि- तानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्' । इस सूत्र का दूसरा अर्थ इस प्रकार है— ज्ञानं—स्वरूप विमर्शरूप ज्ञान अन्नम्—(योगी का) पोषक है। व्याख्या—स्वरूपविमर्शरूप ज्ञान ऐसे महायोगी का अन्न है अर्थात् पूर्णरूप से परितृप्त होने से यह स्वरूपज्ञान ही उसकी विश्रान्ति का कारण बन जाता है। इसमें युक्ति प्राप्त करने के लिए श्रीविज्ञानभैरव में कथित एक सौ बारह (११२) धारणाएँ सहायक बन सकती हैं। ऐसा योगी संकोचरहित स्वातन्त्र्यशक्तिसम्पन्न रहता है। 'स्पन्दशास्त्र में कहा है :— “प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत्…………” अर्थ—स्वातन्त्र्यशक्ति सम्पन्न होने से वह महायोगी सदा स्वरूप ज्ञान में प्रबुद्ध रहता है ॥९॥

द्वितीय विकास : २३ सम्बन्ध—परन्तु जब वह योगी सतत रूप से समाहित नहीं रहता है तब ज्ञानवान् होकर भी उसे रुकावट (स्वरूप में स्वेच्छानुसन्धान की कमी) रहती है; इस पर कहते हैं । विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम् ॥१०॥ विद्यासंहारे—शुद्ध विद्या के संहार (लोप) होने पर तदुत्थ—उससे निकल कर स्वप्न--भेदमय विकल्प प्रपञ्च-रूपता में दर्शनम्—मज्जन होता है । व्याख्या—शुद्धविद्या के एक बार उदय होने पर उसका अभ्यास सदा उत्थित रहता है । परन्तु एक बार असावधानी हो तो विक्षेप आता है । योगी तब स्वप्नरूप भेद में जाता है । अर्थात् वह भेदमय विकल्प प्रपञ्च में डूब कर त्रिशङ्कु की तरह, जो शापवश आकाश और पृथ्वी के बीच में लटका रहा, अर्धनिमग्न ही रहता है । वह जाग्रत् के विकल्पमय-भ्रम से स्वप्न में जाता है और पूर्णता से वञ्चित ही रह जाता है । अतः योगी को यहाँ सावधानी से अभ्यास में रहना चाहिये ॥१०॥ इस प्रकार शिवसूत्र का शाक्तोपाय प्रकाश नामक द्वितीय विकास समाप्त हुआ

तृतीय विकास अब आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन किया जाता है। आणवोपाय का लक्षण मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में इस प्रकार वर्णित है :- उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ —(मा० वि० : अधिकार २ श्लोक २१) अर्थ—प्राणादि पंच प्रवाहों द्वारा उच्चार से, मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से और कदली सम्पुटाकार की तरह हृदयादि देश में धारणा से जो समावेश साधक को होता है उसे आणवोपाय कहते हैं। सम्बन्ध—यह साधारण जीवोपाय है। अणु का अर्थ है जीवात्मा। उसी से आणव अर्थात् जीवात्मा सम्बन्धी अर्थ बनता है। अब आणवोपाय का वर्णन करने की इच्छा से पहले अणु अर्थात् जीव का स्वरूप कहते हैं। आत्मा चित्तम् ॥१॥ आत्मा—लगातार जन्म-जरादि में गमन करने वाला जीवात्मा चित्तम्—विषय वासनाओं से रंगे हुए मन वाला है। व्याख्या—'अत्' धातु सातत्य अर्थात् सतत गमन के अर्थ में लगता है। जो लगातार गमनशील हो उसे आत्मा कहते हैं। जिस प्रकार परमात्मा तीनों कालों (भूत, वर्तमान और भविष्य—स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति) में गमन करता है, अर्थात् एक आत्मा संवित् रूप से स्वयं प्रभा है, उसी प्रकार जीवात्मा भी जन्म-जरादि (स्वप्न- जाग्रदादि) में सत्त्व, रज, तम वृत्तियों से गमन करता रहता है। वही आत्मा मन अर्थात् अन्तःकरण है जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण वृत्तियों (निश्चय, विकल्प और अभिमान प्रधान) विषय-वासनाओं, प्रकाश (अविद्या सत्त्व विशेष), चंचलता और आवरण से रंगा हुआ है। वही जीव अथवा अणु कहलाता है जो मन, बुद्धि, अहंकार के व्यापार वाला चित्त है। शाम्भवपरामर्श में यह आत्मा भाव और अभाव रूप जगत् के स्वभाव वाला ज्ञान- रूप क्रिया में स्वतन्त्र है। बोधसुधाब्धि के साथ तादात्म्य होने के कारण आत्मा यहाँ पूर्णाहन्ता में प्रवेश वाला है। चिदेकरूप आत्मा का यहाँ उत्क्रमण (अर्थात् जन्मान्तर

तृतीय विकास : २५ देशान्तरादि में गमन) नहीं होता । 'न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति अत्रैव समवलीयन्ते-२' इस प्रकार श्रुति कहती है । अतः 'चैतन्यमात्मा'-(१/१) इस प्रकार स्वभावभूत तात्त्विक स्वरूप के प्रतिपादन से यहाँ पूर्णात्मा ही लक्षित होता है । शाक्तपरामर्श में रंगा हुआ यह आत्मा 'चित्तं मन्त्रः' -(२-१), अहं-परामर्श में मग्न आराधन करने वाले का मन है । आणव विमर्श में यह आत्मा मन, बुद्धि, अहंकार के व्यापार वाला चित्त है (आत्मा चित्तम्-३-१) ॥१॥ सम्बन्ध-चित्त के बन्धन का कारण कहते हैं । ज्ञानं बन्धः ॥२॥ ज्ञानं-(सत्त्व, रज, तम रूप विषयवासना का) ज्ञान बन्धः- (भेद प्रथामय होने के कारण) बन्धन है । व्याख्या-सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की विषय वृत्तियों वाला जीव विषय वासनाओं में रंगा रहता है । इससे उसे भेदमयज्ञान के कारण सुख-दुःख, राग- द्वेष तथा मोह आदि में निश्चय और विकल्प में अभिमान होता है । अतः भेदप्रथा का ज्ञान ही जीव को बन्धन में डाल कर उसे जन्म-मरण के चक्र में यातनादेह धारण करवाता है ॥२॥ सम्बन्ध-यहाँ यह शङ्का होती है कि सर्वशब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं हो सकता, अतः यह ज्ञान कैसे बन्धन का कारण हो सकता है ? इसके समाधान में कहते हैं कि यह बात सत्य है । परन्तु ऐसा तब ही हो सकता है जब योगी को पर- मेश्वर के प्रसाद से इस प्रकार के प्रत्यभिज्ञान का विमर्श हो । किन्तु जब परमेश्वर की मायाशक्ति से ऐसा विमर्श न हो तब माया के प्रभाव से अज्ञान का ज्ञान स्वरूपोपलब्धि में बाधक है । अतः तत्त्वों का अविवेक माया है, यह कहते हैं । कलादीनां तत्त्वानामविवेको माया ॥३॥ कलादीनां - कला तत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक तत्त्वानां - (इन) तत्त्वों का अविवेकः--अज्ञान (ही) माया --माया (कहलाती है) । व्याख्या--मालिनीविजयोत्तर तन्त्र के अनुसार अवरोह-क्रम में परमशिव की स्वा- तन्त्र्य शक्ति से पाँच शक्तियाँ प्रकाशित हैं (१) चित् (२) आनन्द (३) इच्छा (४) ज्ञान

२६ : शिवसूत्र विमर्श और (५) क्रिया। इन शक्तियों के पाँच ऐश्वर्य क्रमशः (१) सर्वज्ञता (२) सर्वकर्तृता (३) पूर्णता (४) नित्यता और (५) सर्वव्यापकता हैं। यही शक्तियाँ मायाशक्ति द्वारा क्रमशः (१) विद्या (२) कला (३) राग (४) काल और (५) नियति में परिवर्तित होती हैं। उपरोक्त ऐश्वर्य फलतः पाँच गुणों में परिवर्तित होते हैं। यह गुण क्रमशः इस प्रकार हैं-- (१) अल्पज्ञता (२) अल्पकर्तृता (३) अपूर्णता (४) अनित्यता तथा (५) नियति (अर्थात् नियतरूपता) यह गुण मायाशक्ति के प्रभाव से अज्ञान का ही बोध कराने वाले हैं। इनके साथ साथ तीन मलों अर्थात् कोशत्रय का उद्भव होता है। वे तीन मल इस प्रकार हैं-- (१) आणव मल-इस मल से स्वातन्त्र्य का अभाव अर्थात् अपूर्णता का अनुभव होने लगता है-स्वरूप के अन्दर नहीं रहा जा सकता है। (२) मायीय मल-इस मल से भिन्न वेद्य प्रथा अर्थात् द्वैत प्रथा का भान होने लगता है। (३) कार्म मल-इस मल से कर्माशय के कारण शुभ और अशुभ वासनाएँ प्रकट होती हैं और स्थूल शरीरों का आश्रय लिया जाता है। ऐसे ही छत्तीस तत्त्वों का विकास होने में आता है। परमशिव ने अवरोह क्रम में सात प्रमाता प्रकाशमान किये, जिनके अन्तर्गत छत्तीस (३६) तत्त्व, सात (७) अवस्थायें, परामर्श और वाणी के चार रूप हैं। इनकी तालिका यहाँ पाठकों के सुबोधार्थ दी जाती है :-- छत्तीस तत्त्व इस प्रकार हैं-- १. शिव } | १४. अहंकार २७. शब्द ] पंच २. शक्ति } | १५. बुद्धि २८. स्पर्श ] तन्मा- ३. सदाशिव } शुद्धाध्वा १६. मन २९. रूप } त्राणि- ४. ईश्वर } १७. श्रोत्र } ३०. रस ] ५. शुद्ध विद्या ] १८. त्वक् } पंच ३१. गन्ध ] ६. माया (माया तथा महामाया) १९. चक्षु } ज्ञाने- ३२. आकाश ] ७. कला ] २०. जिह्वा } न्द्रिय ३३. वायु ] पंच ८. विद्या ] पंच २१. घ्राण } ३४. अग्नि ] भूतानि ९. राग } कञ्चुक २२. वाक् } ३५. जल ] १०. काल ] २३. पाणि } पंच ३६. पृथिवी ] ११. नियति ] २४. पाद } कर्में- १२. पुरुष २५. पायु } न्द्रिय १३. प्रकृति २६. उपस्थ }

तृतीय विकास : २७ तत्त्वान्तर्गत प्रमाता अवस्था परामर्श वाणी १ २ ३ ४ १. शिव प्रमाता अनाख्य — परा (शक्ति के साथ अभिन्न तत्त्व) २. मन्त्रमहेश्वर प्रमाता तुर्यातीत अहमिदम् (सदाशिव तत्त्व) ३. मन्त्रेश्वर प्रमाता तुर्य इदमहम् पश्यन्ती (ईश्वर तत्त्व) ४. मन्त्र प्रमाता तुर्यारम्भ इदमिदमहमहम् (शुद्धविद्या तत्त्व) यह यहाँ तक शुद्धाध्वा कहलाते हैं । अब आगे अशुद्धाध्वा बतलाते हैं । ५. विज्ञानाकल प्रमाता★. सविद्यशून्य आणवमल (माया और महामाया, दोनों माया तत्त्व के अन्तर्गत) ६. प्रलयाकल प्रमाता सुषुप्ति आणव तथा मध्यमा (कला से पुरुष-तत्त्व तक) मायीय मल (सुखमहम् अस्वाप्सम्) ७. सकल प्रमाता जाग्रत्-स्वप्न आणव, मायीय (प्रकृति से पृथ्वी तक) तथा वैखरी २४ तत्त्व कार्ममल इस प्रकार कला से पृथ्वी तत्त्व तक यह तीस तत्त्व मायाकार्य होने के कारण स्व- रूपोपलब्धि में बाधक होते हैं । अज्ञान का आवरण यथार्थ स्वरूप को ढंक लेता है। इसी अज्ञान अथवा तत्त्वों के अविवेक को माया कहते हैं ॥३॥ सम्बन्ध—अतः इस माया के प्रशमन के लिए यहाँ उपाय कहते हैं । यह आत्म- व्याप्ति का प्रकरण है। इसमें समाधि में ही आत्मलाभ का सुख मिलता है। शरीरे संहारः कलानाम् ॥४॥ शरीरे—स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीरों में कलानाम्—पृथ्वी में शिव तत्त्व तक सब तत्त्व भागों का संहारः—अपने कारण में लय-भावना द्वारा (व्यक्तियों से ध्यान करना चाहिए) । व्याख्या—महाभूत, पुर्यष्टक और समना तक जो स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर हैं उनमें पृथ्वी से शिव तत्त्व तक सब कला-भागों का प्रतिलोम-वृत्ति से एक का दूसरे में, दूसरे का तीसरे में, इस प्रकार लय-भावना द्वारा ध्यान करना चाहिये जब तक अन्त ★ यहाँ अनुसन्धान करने पर अनुसन्धान तथा न करने पर बहिर्मुखता ही रहती है।

२८ : शिवसूत्र विमर्श में मन का स्वकारण में लय हो । इसे लय-चिन्तनाभ्यास कहते हैं। जैसे विज्ञान- भैरव में कहा है :- भुवनाध्वादिरूपेण चिन्तयेत्क्रमशोऽखिलम् । स्थूलसूक्ष्मपरस्थित्या यावदन्ते मनोलयः ॥श्लोक५६॥ अर्थ—भुवन, तत्त्व, कला, पद, मन्त्र और वर्ण षडध्वाओं का वाच्य-वाचक व्यक्ति के रूप में प्रतिलोम के क्रम से चिन्तन करना चाहिए । इस प्रकार इस चराचर जगत् का स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर में तब तक लय-चिन्तन का अभ्यास करते रहना चाहिए जब तक अन्त में मन चित्स्वरूप में विलीन न हो । इस प्रकार के अभ्यास का वर्णन वेदान्त में भी कहा गया है। योग-वासिष्ठ में यह वाल्मीकि-भरद्वाज संवाद के अन्तर्गत स्पष्टरूप से मिलता है:— व्यस्तेन च समस्तेन व्यापिना ग्रथितं जगत् । क्षितिं चाप्सु समावेश्य सलिलं चाऽनले क्षिपेत् ॥ अग्निं वायौ समावेश्य वायुं च नभसि क्षिपेत् । नभश्च महादाकाशे समस्तोत्पत्तिकारणे ॥ स्थित्वा तस्मिन् क्षणं योगो लिङ्गमात्रशरीरदृक् । .................................................... ............................................ ततोऽर्धोऽण्डाद्बहिर्यातिस्तत्राऽऽत्मास्मीति चिन्तयेत् ॥ —(निर्वाण प्र०, पूर्वार्ध सर्गः २२८ श्लोक २६-२९) अर्थ—पञ्चीकृत या अपञ्चीकृत आकाश से यह सारा जगत् ग्रथित है । योगी को चाहिए कि वह पृथिवी का जल में लय करके उस जल को फिर तेज में लीन कर दे । तेज को वायु में विलीन करके उस वायु को फिर आकाश में विलीन कर दे और आकाश को समस्त स्थूल प्रपञ्चों की उत्पत्ति के कारणभूत हिरण्यगर्भाकाश में विलीन कर दे । उस हिरण्यगर्भाकाश में एक मात्र लिङ्गशरीर धारण कर योगी क्षण भर स्थित रहे ।........ तदनन्तर स्थूल उपाधि का लय हो जाने से अर्धशरीर से सम्पन्न हुआ सा वह योगी ब्रह्माण्डरूपता के अभिमान का त्याग करके उस से बाहर निकल कर सूक्ष्मभूतात्मक लिङ्गसमष्टि देह में 'मैं ही आत्मरूप अधिष्ठाता हिरण्यगर्भ हूँ' यों चिन्तन करे । आदि ।। दाह-चिन्तन प्रकार से ध्यान आगमों में इस प्रकार कहा है— कालाग्निना कालपदादुत्थितेन स्वकं पुरम् । प्लुष्टं विचिन्तयेदन्ते शान्ताभासः प्रजायते ॥ --(वि० भै० श्लोक ५२) अर्थ--रंबीजयुक्त कालाग्निरुद्र की ज्वाला वामपादाङ्गुष्ठ [बायें पैर के अंगूठे] से उठती हुई अपने सारे शरीर को जलाती है ऐसा चिन्तन करे । अन्त में शान्त आभास प्रकट होता है ।

तृतीय विकास : २९ आणवोपाय से ध्यानादि श्रीमालिनीविजय तन्त्र में कहा है ।-- उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः । यो भवेत्स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥ अर्थ--प्राणादि पंच द्वारा उच्चार से, खेचरी आदि मुद्रा से, ध्वन्याभ्यास से कदली सम्पुटाकार की तरह हृदयादि में धारणा से जो पूर्ण समावेश हो उसे आणवोपाय द्वारा ध्यान कहते हैं । इसका पर्यवसान शाक्तोपाय में होता है । ऐसी किसी भी युक्ति से जो गुरूपदिष्ट हो लय-भावना द्वारा ध्यान करने से माया का प्रशमन होता है ॥४॥ सम्बन्ध--आणवोपाय से ध्यान की विधि कहकर अब उसके योग (अप्राप्त को पाना) और क्षेम (प्राप्त किये की रक्षा) देने वाले प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि कहते हैं । नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि ॥ ५ ॥ नाडीसंहार—प्राणापानादि का मध्यनाडी (सुषुम्ना) में संहार अर्थात् लय करना (प्राणायाम), भूतजय—पृथ्वी आदि भूतों का धारणाओं से वश करना (धारणा), भूतकैवल्य—पंचभूतों का आत्मा से अलग करना अर्थात् चित्त का भूतों से हटाना (प्रत्याहार) और भूतपृथक्त्वानि—पंचभूतों से पृथक् होकर निर्मल तथा स्वच्छन्द चिदात्मा में वास करना (समाधि) —योगी को यह भावनाएँ करनी चाहिए । व्याख्या—आत्मव्याप्ति दृढ़ करने के लिए अन्य साधन हैं । (१) नाडीसंहार के प्रकार में प्राण, अपान, समान आदि मध्यनाडी (सुषुम्ना) में लय करना है । इसके लिए सामान्य (बाह्य) दो प्राणायाम और विशेष (आभ्यन्तर) एक प्राणायाम कहे गये हैं । क—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम दायें नासापुट को दायें हाथ के अंगूठे से बन्द करके बायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे अन्दर लेना चाहिये । इसे पूरक कहते हैं । फिर बायें नासापुट को मध्यमा अंगुली से बन्द करके दायें नासापुट से वायु धीरे-धीरे बाहर छोड़ देना चाहिये । इसे रेचक कहते हैं। इस प्रकार तीन से पांच बार तक सामान्य रूप से करना चाहिये । इसके निरन्तर अभ्यास करने से नाडी-शोधन होता है अर्थात् मोक्षमार्ग के मध्य-धाम का विकास होता है । ख—सामान्य (बाह्य) प्राणायाम ऊपर कहे हुए के अनुसार पूरक करके ही वायु को यथाशक्ति कुछ देर अन्दर ही रोके रखना चाहिये । इसे प्राण-निरोध कहते हैं और यह कुम्भक है । इसके उपरान्त रेचक करना चाहिये ।

३० : शिवसूत्र विमर्श विशेष (आभ्यन्तर) प्राणायाम मध्य पथ के द्वारा बहिर्द्वादशान्त की ओर प्राण-वायु का रेचक करके सन्धि-स्थान पर कुम्भक करना चाहिये । फिर वायु को हृदय अर्थात् अन्तर्द्वादशान्त की तरफ लेकर सन्धि पर फिर कुम्भक करना चाहिये । यह अभ्यास जब आयास के बिना ही होने लगे तब इसे आभ्यन्तर प्राणायाम अर्थात् प्रशान्त-कुम्भक कहते हैं । यहाँ कुम्भक ही सन्धि बन जाता है अतः निःस्पन्द कुम्भक कहलाता है । दैशिक कटाक्ष से यही ब्रह्मद्वार के विकसित होने का अनुग्रहावसर है । तब 'सर्वमिदं अह च ब्रह्मैवेति' भावना दृढ़ होती है । इन प्राणायामों से प्राणवायु का संचार हल्का होने लगता है और इस प्रकार वायु- प्रशमन (निरोध) होकर ऊर्ध्व-द्वादशान्त के लिए उदान-वायु द्वारा सुषुम्नाद्वार खुल जाता है । यह सुप्रशान्त अर्थात् चतुर्थ प्राणायाम ही सर्वसिद्धिप्रद है । स्मरण रहे कि यह प्राणायाम योगी साधक ही कर सकता है । (२) भूतजय के लिए पृथिवी आदि पाँच भूतों की धारणाएँ इस प्रकार करनी होती हैं : विराट् भावना में पञ्चभूतों को विभक्त करके पृथिवी को इससे दुगुने जल में, जल को इससे दुगुने तेज में, तेज को इससे दुगुने वायु में और वायु को इससे दुगुने आकाश में लय करना चाहिए । इस धारणा से योगी को भूतों पर विजय प्राप्त होती है और वह शरीर की पीड़ाओं सिरदर्द आदि पर वश पा सकता है । शरीर में यह धारणा हृदय देश के आधार से अंगुष्ठ, नाभि, कण्ठ आदि देशों में सद्गुरुप्रोक्त रीति से की जाती है और ब्रह्मरन्ध्र में आकाश ग्रन्थि का भेदन कर साधक को द्वादशान्त में सब सिद्धियां प्राप्त होती हैं । (३) भूतकैवल्य में चित्त को भूतों से प्रत्याहरण किया जाता है। भूतों को स्वरूप- ज्ञान से भिन्न किया जाता है । चित्त मन से और विषयों से हटकर हृदय देश में ही संचार करता है । यह दशा चतुर्थ अर्थात् सुप्रशान्त प्राणायाम (जिसका वर्णन ऊपर नाड़ी संहार में किया गया है) से साधक को सिद्ध होती है । (४) भूतपृथक्त्व योगी की समाधि दशा है । इसके अभ्यास से भूतों के आवरण से निर्मल हुआ चित्त स्वच्छन्द चिदानन्द भाव को प्राप्त होता है । यह योगी की निरुद्ध अवस्था है । यह अवस्था आणवोपाय में प्रयत्न से ही साध्य है । जिस योगी को शाम्भ- वोपाय का समावेश हुआ हो उसे यह अवस्था यत्न के बिना ही स्वाभाविक होती है । जैसे प्रथम उन्मेष के बीसवें सूत्र में कहा गया है : "भूतसंधानभूतपृथक्त्वविश्वसंघट्टाः" यहाँ आणवोपाय में योगी को इन अवस्थाओं की भावना करनी आवश्यक है ॥५॥ सम्बन्ध—स्वकारण में पञ्चभूतों की एक दूसरे में लय भावना करने से तत्त्ववशी- करणरूपा सिद्धि प्राप्त होती है

तृतीय विकास : ३१ से ही होती है तत्त्वज्ञान से नहीं । इस बात को आगे शिव-व्याप्ति के प्रकरण में स्पष्ट करते हैं। शिवव्याप्तिलाभ होने पर योगी को समाधि और व्युत्थान दोनों दशाओं में स्वस्वरूप की उपलब्धि रहती है। जिसे जगदानन्द कहते हैं ।] मोहावरणात् सिद्धिः ॥६॥ मोहावरणात्—(आत्मव्याप्ति में) मोह का आवरण बना रहने से सिद्धिः—(उस तत्त्व के भोग की) सिद्धि होती है (किन्तु परतत्त्व के प्रकाश से वञ्चित ही रहता है) व्याख्या—सूत्र पाँच में कहे हुए प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार और समाधि के साधन में लगे हुए साधक को परतत्त्व के प्रकाश होने से पूर्व मितसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। उसे साधन काल में ही आत्मतत्त्व में व्याप्ति होती है। मितसिद्धियों में लगे रहने से उसे परतत्त्व के प्रकाश में विघ्न आ जाते हैं। साधक को आत्मव्याप्ति में भी, सिद्धियों से मोहित होने के कारण, माया का आवरण रहता है । अतः वह विद्वान् नहीं अपितु मूर्ख ही है । पातञ्जलयोगदर्शन में कहा है : "ते समाधावुपसर्गाः व्युत्थाने सिद्धयः" ॥३-३७॥ अर्थ—वे (सिद्धियाँ) परतत्त्व के ज्ञान (समाधि) प्राप्त करने में विघ्न हैं और व्यु- त्थान में सिद्धियाँ है । जब आत्मव्याप्ति तक मोह पर विजय प्राप्त होती है तो योगी को समाधि में चिदानन्द लाभ होता है ॥६॥ सम्बन्ध—परन्तु सात्त्विक विद्या प्राप्ति के लिए जगदानन्द लाभ करना आवश्यक है । इस अवस्था में योगी को समाधि और व्युत्थान में परमानन्दानुभूति रहती है । इसे शिवव्याप्ति कहते हैं । मोहावरण के नष्ट होने पर धारणादि षडङ्गयोग से भी परतत्त्व का समावेश होता है । इसका निरूपण मृत्युजिद्भू‌ट्टारक कथित नेत्रतन्त्र में इस प्रकार मिलता है-- मध्यमं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् । आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥ प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् । सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥ प्राणायामः स निर्दिष्टो यस्मान्न च्यवते पुनः । शब्दादिगुणवृत्तिर्या चेतसा ह्यनुभूयते ॥ त्वक्त्वा तां परमं धाम प्रविशेत्तत्स्वचेतसा । प्रत्याहार इति प्रोक्तो भवपाशनिकृन्तनः ॥ धीगुणान्समतिक्रम्य निर्ध्येयं परमं विभुम् । ध्यात्वा ध्येयं स्वसंवेद्यं ध्यानं तच्च विदुर्बुधाः ॥

धारणा परमात्मत्वं धार्यते येन सर्वदा ।

३२ : शिवसूत्र विमर्श धारणा परमात्मत्वं धार्यते येन सर्वदा । धारणा सा विनिर्दिष्टा भवपाशनिवारिणी ॥ स्वपरस्थेषु भूतेषु जगत्यस्मिन्समानधीः । शिवोऽहमद्वितीयोऽहं समाधिः स परः स्मृतः ॥ —(अ० ८, श्लो० ११-१८) अर्थ—प्राण और अपान की गति के बीच में मध्यम प्राण अर्थात् उदान के संविद्रूप प्राणीय मध्यमभाग में निमज्जन करके ज्ञानशक्ति अर्थात् चिद्व्याप्ति में निमज्जित होकर ठहरने को आसन कहते हैं। चिद्रूपता के सदोदित होने के कारण यहाँ बुद्धि का अभाव रहता है क्योंकि अभेद चिन्मय अवस्था में ही शुद्धबोध होता है। स्थूल प्राणायाम रेचकपूरकादि स्वभाव वाला होता है। इसको छोड़कर आन्तर मध्यपथ से रेचनपूरणादि रूप प्राणायाम सूक्ष्म होता है। इस सूक्ष्म प्राणायाम से अतीत स्पन्दन का प्रादुर्भाव होता है। इसे परम-स्पन्द कहते हैं। यहाँ प्राणादि चित्स्फुरण का अभाव रहता है। यही उत्कृष्ट प्राणायाम कहा गया है। इसका आसाधन स्थिर होने पर योगी चित्प्रमातृमयता को कभी नहीं छोड़ता, परप्रमातृभाव में सदा आनन्दमय रहता है जिससे फिर संसार-सरणि में नहीं आने पाता है। शब्द, स्पर्श आदि में सात्त्विक या तामसिक जो कोई वृत्ति अस्पष्ट रूप से अनुभव की जाती है उसका अनादर करके योगी प्रमाताचित्त से अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा पर-चित् धाम में प्रवेश करता है। इसी को संसार पाश को काट डालने वाला प्रत्याहार कहते हैं। अविकल्प संवित्परामर्श के द्वारा बुद्धि के सत्त्वादि गुणों का शमन करने से नियत आकारादि ध्येय वस्तु का तथा धारणा देशों का उल्लङ्घन किया जाता है। ऐसा होने पर योगी का ध्येय स्वसंवेद्य स्वप्रकाशता ही होती है जो व्यापक, अव्यय और नित्य है। इसी दशा को बुद्धिमान् जन ध्यान कहते हैं। जो योगी सर्वदा आत्मसमावेश द्वारा चैतन्यरूप परमात्मभाव का आलम्बन लेता है उसकी उस चैतन्य विमर्शनात्मा वृत्ति को धारणा कहते हैं। यह धारणा भव-पाश को हटाती है। जगत् में ग्राह्य-ग्राहक रूप से ठहरे हुए भावों में जब 'यह सब कुछ मैं ही हूँ' यह निश्चय हो और 'अहंता' व 'इदंता' की समानाधिकरणरूप शुद्धविद्या टिक जाय तो पर- समाधि सिद्ध होती है। अतः शिवव्याप्ति से परतत्त्व में ही समावेश होता है। आत्मव्याप्ति में सम्भव मित-सिद्धियां नहीं। यह अगले सूत्र में कहते हैं।

तृतीय विकास : ३३ मोहजयादनन्ताभोगात्सहजविद्याजयः ॥७॥ मोहजयात्—(समाधि में आत्मव्याप्ति तक) मोह के विजय होने पर अनन्त—अनन्तता अर्थात् शिवव्याप्ति आभोगात्—के विस्तार से सहजविद्या—सात्त्विक विद्या (समाधि और व्युत्थान दोनों में चिद्रूप आनन्द) जयः—की प्राप्ति होती है । व्याख्या—अख्याति (अज्ञान) रूप पाश को मोह-माया कहते हैं । इसका प्रभाव समना अवस्था तक होता है । योगी को तुर्य अर्थात् शक्ति-व्यापिनी समना तक माया- जाल का रंग रहता है । स्वच्छन्द तन्त्र में शिव पार्वती से कहते हैं : “समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् ।” अर्थ—हे पार्वती ! (योगी को) समना अवस्था तक भी माया-पाश का अन्त नहीं होता है । इस माया के मोह पर विजय पाने से योगी के सब संस्कारों का शमन होता है और यही अनन्तता का विस्तार है । इसे उन्मना अवस्था अथवा शिव-व्याप्ति कहते हैं जो चैतन्य स्वरूप में स्थिरता पाने का हेतु बनती है, क्योंकि आणवोपाय में ध्यानादि- साधन का शुद्ध चिन्तनादि में ही पर्यवसान होता है । श्री स्वच्छन्द-तन्त्र में आगे कहा है : पाशावलोकनं त्यक्त्वा स्वरूपालोकनं हि यत् । आत्मव्याप्तिर्भवेत्येषा चैतन्ये हेतुरूपिणी ॥ सार्वज्ञादिगुणा येऽथा व्यापकान्भावयेद्यदा । शिवव्याप्तिर्भवेदेषा चैतन्ये सेतुरूपिणी ॥ अर्थ—माया पाश को छोड़कर जो स्वरूप का अवलोकन (अनुभव) समाधि में होता है उसे आत्मव्याप्ति कहते हैं । शिवव्याप्ति इससे कुछ और ही है । जब योगी सर्वज्ञता आदि गुणों के भावों को अहं-व्यापकता की भावना में लाता है तो यह शिवव्याप्ति है जो योगी को चैतन्यस्वरूपता में प्रेरित करती है । इस प्रकार आत्मव्याप्ति के अन्त तक मोह पर विजय पाने से उन्मना अर्थात् शिव- व्याप्ति रूप सात्त्विक विद्या योगी को प्राप्त होती है । यही वह सहजावस्था है जहाँ योगी को अनायास ही स्वाभाविक रूप से समाधि अथवा व्युत्थान दशा में संकोच रहित परमशिवरूपता ही रहती है । यह शिव-व्याप्ति की पहली किरण है जिस में सहज-विद्या प्राप्ति होती है । यह स्वानुभूति प्रकाशरूप है जिस में अहंता पूर्णविमर्शरूप होती है ॥७॥ सम्बन्ध—अब शक्तिरूपता का वर्णन करते हैं । ३

३४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रद् द्वितीयकरः ॥८॥ द्वितीयकरः—(शिवव्याप्ति की) दूसरी किरण जाग्रत्—(वेद्यवर्ग को आभासन कराने वाली) जागरूकता है। व्याख्या—सात्त्विक अर्थात् शुद्ध विद्या को प्राप्त करके उसके साथ एकाग्र वा साम- रस्य होने को जागरूकता कहते हैं। पूर्ण विमर्शरूप अहंता का लाभ होने के बाद इदन्ता का भी उसी भाव से विमर्श करना आवश्यक है। वही स्वरूप-परिपूर्णता है। अतः वेद्य- वर्ग के आभासन में आने वाला जगत् इसकी दूसरी किरण है। विज्ञानभैरव में कहा है : यत्र यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते विभोः । तस्य तन्मात्रधर्मित्वाच्चिल्लयाद्भूरितात्मता ॥ श्लोक ११७॥ अर्थ—जहाँ जहाँ परभैरवरूप चित्प्रकाश चक्षु आदि मार्ग से नील सुख आदि में स्फुरित होता है वहाँ वहाँ चैतन्य के बिना कुछ और न होने के कारण वह नीलादि चित्त में ही लीन होते हैं। यही साधक की परभैरवरूपता है। सर्वमङ्गला-तन्त्र में कहा है : शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥ अर्थ—चित्स्वरूप की परिपूर्णता में शक्ति और शक्तिमान् (शिव) केवल दो पदार्थ हैं। सारा जगत् तो उसकी शक्तियाँ हैं और शक्तिमान् स्वयं महेश्वर है ॥८॥ सम्बन्ध—इस प्रकार दोनों किरणों द्वारा स्वरूपविमर्शन से आविष्ट योगी के आत्मा के बारे में कहते हैं। नर्तक आत्मा ॥९॥ नर्तकः—विश्वनाटक का नट आत्मा—(उसका) अपना आप है। व्याख्या—अपने अन्तर में छिपाये हुए अपने शुद्ध स्वरूप की पकड़ के अनुसार नाना अवस्थाओं का प्रपंच, अपने ही परिस्पन्द अर्थात् स्वातन्त्र्य शक्ति की क्रीड़ा से अपनी ही भित्ति पर जो प्रकट करता है वह नट अपना आप है। भगवान् उत्पल की प्रत्यभिज्ञा की टीका (जो अनुपलब्ध है) में यह बात स्पष्ट है : “संसारनाट्यप्रवर्तयिता सुप्ते जगति जागरूक एक एव परमेश्वरः” अर्थ—संसार नाटक को प्रवर्तन में लाने वाला एक परमेश्वर ही इस सोये हुए जगत् में सजग है ॥९॥ सम्बन्ध—अब इस जगत्-नाटक में नर्तक (योगी) का नाट्य-स्थान बतलाते हैं।

तृतीय विकास : ३५ रङ्गोऽन्तरात्मा ॥१०॥ रङ्गः—(योगी के प्रपंच की नाना अवस्थाओं में) खेल का स्थान अन्तरात्मा—(प्राण-प्रधान) पुर्यष्टक से नियन्त्रित जीव है । व्याख्या—स्वरूप के संकोच का अवभासन कराने वाला तत्त्व शून्य-प्रधान अथवा प्राण-प्रधान पुर्यष्टक है । यही अन्तर जीव है । इसी के द्वारा योगी जगत् का भास देने वाली क्रीड़ा करता है। सूक्ष्म शरीर में ठहरा हुआ ही वह अपनी इन्द्रियों के स्पन्दन-क्रम से जगत् के नाटक का अवभासन करता है। शिवव्याप्ति को प्राप्त योगी अहंता और इदंता, अन्तर और बाह्य में चिद्विमर्श की समरसता का अनुभव करता है। साधारणरूप में पुर्यष्टक-प्रमातृता स्वप्न अवस्था में ही प्रकट होती है ॥१०॥ सम्बन्ध—इस प्रकार पुर्यष्टक रूप आत्मा द्वारा रङ्गमञ्च पर नर्तन करने वाले योगी के दर्शक कौन हैं, इस प्रकार कहते हैं । प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि ॥११॥ इन्द्रियाणि—योगी की चक्षुरादि इन्द्रियाँ (संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में) प्रेक्षकाणि—दर्शक (स्वस्वरूप को अन्तर्मुख भाव से साक्षात् कराने वाली) हैं। व्याख्या—जैसे रंगमंच पर खेलने वाले नट के नाटक का आस्वादन करने वाले रंगशाला में बैठे दर्शक होते हैं वैसे स्वस्वरूप में ठहरा हुआ योगी नट है जो अन्तरात्मा अर्थात् पुर्यष्टक रूप रंगमंच पर अहंता और इदन्ता में चिद्विमर्श की समरसता से संसार- नाटक इन्द्रिय-स्पन्दन के क्रम से अवभासित (प्रदर्शन) करता है । अतः चक्षुरादि इन्द्रियाँ इस नाटक के दर्शक हैं। तात्पर्य यह है कि उसकी चक्षुरादि इन्द्रियाँ संसार नाटक को प्रकट करने के आनन्द में मग्न होकर ही स्वस्वरूप का अन्तर्मुखभाव से साक्षात्कार करतीं हैं । इस प्रकार इन्द्रियाँ चमत्कार-रस के सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त करती हैं। श्रुति कहती है : ‘कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन्’ ॥—कठ० उप० । २-१-१॥ अर्थ—कोई धैर्यवान् (योगी) ही चक्षुरादि इन्द्रियों को अन्तर्मुख करके स्वस्वरूप का साक्षात्कार कर अमृत-पद को प्राप्त करता है । और भी : ‘यत्र यत्र मिलिता मरीचयः तत्र तत्र प्रभुरेव जृम्भति’

३६ : शिवसूत्र विमर्श अर्थ—जहाँ जहाँ चिन्मरीचियों का साक्षात्कार होता है वहाँ वहाँ प्रभु ही प्रकट होते हैं ॥११॥ सम्बन्ध—नाटक में सात्त्विक अभिनय की सिद्धि बुद्धि की कुशलता से ही मिलती है। इसी प्रकार योगी को जगदानन्द की प्राप्ति विशेष सात्त्विक बुद्धि से होती है। धीवशात् सत्त्वसिद्धिः ॥१२॥ धीवशात्—(ऋतम्भरा प्रज्ञा) शुद्ध-सत्त्व-बुद्धि से सत्त्वसिद्धिः—आन्तर संवित्-स्पन्दन की अभिव्यक्ति होती है। व्याख्या—तात्त्विक स्वरूप का विमर्श करने में चतुर बुद्धि को धी अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। जैसे नाटक में अभिनय की सफलता कुशल बुद्धि पर ही निर्भर होती है वैसे ही शुद्ध-सत्त्व में ठहरी हुई युक्ति-कुशल बुद्धि के द्वारा ही योगी को आन्तर संवित्-स्पन्द की अभिव्यक्ति सफलता-पूर्वक होती है ॥१२॥ सम्बन्ध—इस सात्त्विक अभिनय में कुशलता के प्राप्त होने पर इस योगी को स्वतन्त्रता की सिद्धि होती है। सिद्धः स्वतन्त्रभावः ॥१३॥ स्वतन्त्रभाव : -- (जाग्रत् और स्वप्न में इस योगी को) सारे विश्व को वश करने की स्वतन्त्रता सिद्ध : -- सम्पन्न ही है। व्याख्या—युक्ति-कुशल बुद्धि अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होने पर शिव-व्याप्ति प्राप्त योगी को स्वाभाविक ज्ञानरूपता अथवा सहजभावरूप स्वातन्त्र्य सम्पन्न होता है। सर्व-कर्तृत्वादि-रूप स्वातन्त्र्य उपलब्ध होता है। सारा विश्व उसके वश में होता है। इसका तात्पर्य इस प्रकार है— (क) परदशा में जाग्रत् से स्वप्न अवस्था तक जब चाहे समाधि में बैठ सकता है। स्वप्न में भी स्वरूप-स्थित होकर स्वेच्छा से जागता है। (ख) परापर स्वातन्त्र्य दशा में जिस किसी अवस्था में जो कोई इच्छा करता है वह उसे पूर्ण होती है। जाग्रत् अवस्था में यदि किसी को शाप दे या वरदान दे तो वह तत्क्षण सफल होता है। स्वप्न अवस्था में यदि चाहे कि 'मैं इस प्रकार स्वप्न देखूं" तो उसकी इच्छापूर्ति तुरन्त होती है। यही उसका जाग्रत-स्वप्न अवस्थाओं में स्वातन्त्र्य है। ऐसे योगी को सुषुप्ति अवस्था नहीं होती है वह तो तुर्यावस्था में बदल जाती है। श्री स्वच्छन्द तन्त्र में कहा है : सर्वतत्त्वानि भूतानि मन्त्रवर्णाश्च ये स्मृताः । नित्यं तस्य वशास्ते वै शिवभावनया सदा ॥ —(प० ७ श्लोक २४२)