शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
तृतीय विकास : ३७ अर्थ-सब वेद्य-उल्लास को शिव से अभिन्न स्वात्मा के ऐक्य-परामर्श से उस (योगी) को जल, अग्नि आदि तत्त्व, हिंसा करने वाले जीव और शरीर में ठहरे शब्दराशियों के वर्ण सदा वश में रहते हैं ॥१३॥ सम्बन्ध—ऐसे योगी का स्वातन्त्र्य इस प्रकार है। यथा तत्र तथान्यत्र ॥१४॥ यथा—जैसे तत्र—तुर्य अवस्था में (योगी को सहजभाव अर्थात् समाहित भाव प्राप्त होता है) तथा—वैसे ही अन्यत्र—स्वरूप बाह्य जाग्रत् आदि सब अवस्थाओं में भी (वह सदा समा- हित रहता है)। व्याख्या—शिवव्याप्ति-सम्पन्न योगी को जैसे स्वरूप में अभिव्यक्ति होती है वैसे ही उसे जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्थाओं में भी स्वरूप-प्रथन होता है, क्योंकि सदा समाहित रहने में वह युक्ति-कुशल होता है। वह दूसरे के शरीर में भी संक्रमण कर सकता है। तात्पर्य यह है कि जिस किसी अवस्था में योगी हो उसमें स्वरूपस्थित रहने की स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ॥१४॥ सम्बन्ध—परन्तु ऐसे उत्कृष्ट योगी को भी उदासीन भाव से नहीं रहना चाहिए, अपितु— बीजावधानम् ॥१५॥ बीज--विश्वसंवित् में अवधानम्--पुनः पुनः चित्त (कर्त्तव्यम्)—लगाना चाहिए। व्याख्या—उसे विश्वकारण अर्थात् स्फुरण-स्वरूप परशक्ति में पुनः पुनः चित्त को निमज्जित करना चाहिए। जैसे विज्ञानभैरव के १३७ वें श्लोक में कहा है : ज्ञानप्रकाशकं सर्वं सर्वेणात्मा प्रकाशकः । एकमेकस्वभावत्वात् ज्ञानं ज्ञेयं विभाज्यते ॥ अर्थ—सर्व शब्द वाच्य ज्ञेयजात ज्ञान से पृथक् नहीं है और प्रकाशक ज्ञान आत्मा से भिन्न नहीं है। इस प्रकार ऐक्य का भावना करनी चाहिए। यहाँ योगी को स्वरूपस्थिति में सदा सावधान रहने का संकेत है जिससे वह मित- सिद्धियों में कभी उलझ न जाये ॥१५॥ सम्बन्ध—ऐसा होने पर यह योगी शाक्तबल का लाभ करके शाम्भव पद में विश्रान्ति पाने लगता है। अतः कहा है—
३८ : शिवसूत्र विमर्श आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति ॥१६॥ आसनस्थः- (योगो) आत्मा के साथ एकरूप होकर सुखं-स्वभाव से अर्थात् आयासरहित सुख से ह्रदे-चित्स्वरूप के परमामृत समुद्र में निमज्जति - डूब जाता है। व्याख्या-जिस दशा में योगी आत्मा के साथ सदा एकरूप होकर स्थिर रहता है उसे आसन कहते हैं । जैसे नेत्रतन्त्र में : मध्यं प्राणमाश्रित्य प्राणापानपथान्तरम् आलम्ब्य ज्ञानशक्तिं च तत्स्थं चैवासनं लभेत् ॥ अर्थ-प्राण तथा अपान के रास्ते में मध्यम प्राण (अर्थात् कुम्भक भाव) का आश्रय लेकर ज्ञानशक्ति के सहारे उसमें ठहरने का आसन धारण करे । 'न तु ऋजुत्वं शुष्कवृक्षवत् इति' । यही उसका परम शाक्त बल अथवा चिद्बल है। इस दशा में उसे पर अथवा अपर (निराकार अथवा साकार) ध्यान, धारणा आदि क्रियाओं (अभ्यास) में प्रयास (अथवा प्रयत्न) नहीं करना पड़ता है । वह नित्य अन्तर्मुख भाव में आत्मा के साथ एकता के परामर्श में ही आकर्षित रहता है । इसी को निराभास पद कहते हैं । इस निराभास पद का वर्णन श्री नेत्रतन्त्र में अवलोकनीय है । पूर्वावस्था में दृढ़ तथा निरन्तर अभ्यास करने से योगी को आत्मा के साथ यह लगन स्वाभाविक बन चुकी होती है । अतः अब इस सूत्र में उसे ध्यानादि प्रयास नहीं करने पड़ते । इस प्रकार वह सुखस्वरूप होकर, विश्व के प्रवाह तथा प्रसर (निर्म- लता तथा उत्पत्ति) के हेतु परमामृत समुद्र में, देहादि में आत्माभिमान रूप संकोच और उसके सम्बन्ध में सब संस्कारों से निवृत्त होकर, तन्मय हो जाता है । जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है : निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ अर्थ-वासना रहित पुरुष-सिंह को देखकर विषय रूपी हाथी असमर्थ होकर चुप- चाप भाग जाते हैं और उसकी ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा में रहते हैं। इस प्रकार संशय रहित और निश्चलमन वाला ज्ञानी यम-नियमादि योग क्रिया को आग्रह से नहीं करता है किन्तु लोकदृष्टि से देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ भी आत्मसुख में ही निमग्न रहता है ।
तृतीय विकास : ३९ श्रीमद्भगवद्गीता में ऐसे ही योगी के लिए संकेत है— ‘तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च’ अर्थ—अतः विषय-इन्द्रिय संयोग के सब व्यवहारों में मेरा (मुझ परमात्मा का) स्मरण कर और मलों से ऊपर उठने का अभ्यास-रूप युद्ध भी कर ॥१६॥ सम्बन्ध—आणवोपाय क्रम से नाडीसंहारादि (उ० ३, सू० ५) द्वारा मोह पर विजय पाकर शुद्धविद्यारूप (उ० १, सू० २१) शाक्तबल के प्रकर्ष से योगी शाम्भवपद- रूप परामृत समुद्र में तन्मय हो जाता है। इस स्वतन्त्र पद पर अधिरूढ़ होकर योगी वेद्य तथा वेदक के अवभासरूप जगत् का अपनी इच्छा से निर्माण करता है। अब यह बतलाते हैं। स्वमात्रानिर्माणमापादयति ॥१७॥ स्वमात्रा—(तब योगी) अपनी इच्छा के अनुसार निर्माणं—जगत् के जाग्रत् तथा स्वप्न में सब सिद्धियों का आपादयति—सम्पदावान् बन जाता है। व्याख्या—क्रम पूर्वक शाम्भवोपाय द्वारा प्राप्त स्वतन्त्र पद पर ठहरा योगी अपनी विश्व-व्यापिनी इच्छा के द्वारा वेद्यवेदक के अवभासन रूप जगत् की सृष्टि भी करता है और विनाश भी। यह सम्पत्ति उसको जाग्रदादि अवस्थाओं में सिद्ध होती है ॥१७॥ सम्बन्ध—इस स्वातन्त्र्य से योगी को पुनर्जन्म का अभाव होना कहा है। विद्याऽविनाशे जन्मविनाश : ॥१८॥ विद्या—शुद्ध विद्या के अविनाशे—लगातार रहने पर जन्मविनाश :—(ऐसे योगी को) जन्मादि बन्धन नहीं रहता। व्याख्या—शुद्धविद्या के बल से शाम्भव पद पर ठहरा योगी जब आत्मा के साथ एकता का अनुभव लगातार करता है तो उसकी वह अवस्था स्वाभाविक होने के कारण सहजावस्था कहलाती है। स्थूल और सूक्ष्म देह और इन्द्रियों का समूह सदा दुःख से भरे होते हैं क्योंकि वे ही कर्म (बन्ध) के हेतु और अज्ञान (माया-मोह) के साथी हैं। अतः इन के द्वारा जन्म- मरण आदि बन्धन में जीव सदा यातना-ग्रस्त रहता है। परन्तु जब योगी को सहजावस्था प्राप्त होती है तो जन्मादि सब यातनाओं का सर्वथा नाश हो ही गया होता है ॥१८॥ सम्बन्ध—परन्तु संवित्-तत्त्व को पाकर भी योगी कभी प्रमाद के वश से मोह में फिर पड़ जाता है। जब उसका शुद्धविद्यास्वरूप किञ्चित् आवृत होने लगता है, तब :
४० : शिवसूत्र विमर्श कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः ॥१९॥ माहेश्वर्याद्या : —पीठेश्वरियाँ अर्थात् घोरतरी शक्तियाँ कवर्गादिषु—अ से क्ष पर्यन्त मातृका-चक्र में अर्थात् बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् में पशुमातरः—पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृशक्तियाँ बनकर योगी को द्वैत परम्परा में नीचे और नीचे गिराती रहती हैं। व्याख्या—यदि कभी इस योगी को चिद्रूपता के निरन्तर अभ्यास में प्रमादवश कमी आने लगे तो परावाक् प्रसर में आती हुई इच्छा-ज्ञान-क्रिया का आश्रय लेती है। इस प्रकार शिव-शक्ति-माहेश्वरी आदि वाचक रूपता मे प्रकट होते हुए अ से क्ष रूप मातृका का आश्रय लेकर बहिर्मुखता को प्राप्त होती हैं। इन्हीं को घोरतरी शक्तियाँ कहते हैं। यह योगी को द्वैत-प्रथा की ओर खींचती हैं और स्मय, हर्ष, भय, राग, द्वेषादि प्रपञ्च को फैलाती हैं। असंकुचित चिद्घन स्वरूप पर संकुचित परतन्त्र देहादि भाव को प्राप्त कराती हैं। पर-प्रमाता भिन्न-भिन्न प्रमाताओं में बंट जाता है जिससे अविकल्प अर्थात् सुषुप्ति और सविकल्प अर्थात् स्वप्न-जाग्रत् में संवित् संकुचित रूप धारण करती है। इस विषय में पहले भी कहा गया है : ज्ञानाधिष्ठानंमातृका (१-४) जिस में तीन मलों द्वारा बन्धकभाव सामान्य रूप में कहा गया है। द्वैतज्ञान का आधार (मलत्रय के कारण) बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् है जिसे अज्ञाता माता कहते हैं। परन्तु यहाँ प्राप्त-तत्त्व योगी को भी प्रमादवश पीठेश्वरियों १ (घोरतरी शक्तियों) द्वारा पशुप्रमाताओं के अधिष्ठान से शब्दानुवेद्य मोह में डाला जाता है ॥१९॥ सम्बन्ध—अतः ऊपर कही हुई युक्तियों से शुद्ध-तत्त्व को प्राप्त करके योगी को जाग्रदादि सब (चारों) दशाओं में सावधान रहना चाहिये जिससे उसे चित्स्वरूपता सदा बनी रहे। इस के लिए— त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् ॥२०॥ त्रिषु—जाग्रदादि अवस्थाओं में चतुर्थं—शुद्धविद्याप्रकाश रूप तुर्य अवस्था तैलवत्—तेल की तरह अधिक और अधिक आसेच्यम्—फैलानी चाहिए। १ पीठ शरीर को कहते हैं। उसकी अधिष्ठातृ देवियाँ (आधार शक्तियाँ) बहिर्मुख बहिष्करण तथा बहिर्मुख अन्तष्करण हैं। इन्हें पीठेश्वरियाँ कहा है।
प्रकाश वाला तुर्यानन्द रूप तेज है, तेल की तरह अधिक फैलाना चाहिए। तीनों
तृतीय विकास : ४१ व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में चौथी अवस्था, जो शुद्धतत्त्व के प्रकाश वाला तुर्यानन्द रूप तेज है, तेल की तरह अधिक फैलाना चाहिए। तीनों अवस्थाओं की उन्मेष तथा उपशान्ति दशाओं में भी आदि और अन्त कोटि की मध्यदशा को ग्रहण कर चिद्घनता को व्याप्त करना चाहिये, जिससे चिद्घनरूप परमामृत समुद्र में तन्मयीभाव प्राप्त हो । पहले विकास में 'जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु तुर्यभोगसंभवः' (१.७) इस सूत्र से सूचित किया गया है कि विश्व संवित् की व्याप्ति का अनुभव करने में उद्यम ही उपाय है—'उद्यमो भैरवः' (२.५) । तब योगी शक्तिचक्र के अनुसन्धान से जाग्रदादि अवस्थाओं के अन्तर्गत खाते हुए, जाते हुए, सोते हुए आदि व्यवहारों में भी आत्मस्फुरण के अनुभव का चमत्कार प्राप्त करता है। यही तुर्यावस्था है। आगे एक और सूत्र—'त्रितयभोक्ता वीरेशः' (१-११)—में शाम्भवोपाय के उपयुक्त हठपाक युक्ति से जाग्रदादि का संहार दिखाया गया है। इस प्रकार के अनुभव वाला योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। वह अपने संवित्सांम्राज्य के वैभव में भेदजगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह प्रवणशील अन्तःकरण तथा बहिष्करण का अधीश्वर होता है। परन्तु तृतीय विकास के इस सूत्र में आणवोपाय के उपयुक्त धारणा की युक्ति से जाग्रदादि तीनों अवस्थाओं को तुर्यरूप रस से सिंचित करने के अभ्यास की ओर ही संकेत है ॥२०॥ सम्बन्ध—अब इन तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय कहते हैं। मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत् ॥२१॥ स्वचित्तेन—असंकुचित चिति द्वारा तादात्म्यता के ज्ञान से मग्नः—(शरीर प्राण आदि में अहंरूपता का शमन करते हुए) अविकल्प रूप में प्रविशेत्—अन्तर्मुख होना चाहिए। व्याख्या—तुर्य दशा में प्रवेश करने का प्रकार नेत्रतन्त्र में यूं कहा है : प्राणादिस्थूलभावं तु त्यक्त्वा सूक्ष्ममथान्तरम् । सूक्ष्मातीतं तु परमं स्पन्दनं लभ्यते यतः ॥ अर्थ-अभ्यास काल के आरम्भ में प्राणादि स्थूल भाव (प्राणायाम, ध्यान, धारणादि) का परिपाक होने से उनको योगी त्याग देता है। फिर सूक्ष्म भाव में प्रवेश करके मध्यपथ से वह सूक्ष्मातीत दशा का अनुभव करता है जो प्राण के आलम्बन से परे होती है क्योंकि उस दशा में चित्स्फाररूप रस का परस्पन्द ही रहता है।
४२ : शिवसूत्र विमर्श इसे मत्स्योदरी दशा कहते हैं। इस दशा में योगी के सारे शरीर में स्पन्दतत्त्व का उदय होता है अर्थात् किञ्चित् स्फुरण होता है, प्राण का चलन नहीं होता। आगे कहा है— 'प्रविशेत्तत्स्वचेतसा' अर्थात् उस दशा में योगी तादात्म्यभाव से ही शुद्धात्मा में स्थिति पाकर बोधमात्र शिव से संयोग पाता है। यही बात इस सूत्र में भी कही गई है कि योगी को तुर्यदशा का प्रादुर्भाव तभी होता है जब प्रमेयादि सब उपायों को त्याग कर प्रमातृचित्त से स्वरूप में मग्न होता है। रेचक, पूरक आदि स्वभाव वाले प्राणा- याम, धारणा, ध्यान आदि स्थूल उपाय हैं। इस दशा में योगी ने इन स्थूल उपायों का उल्लंघन किया होता है। शुद्ध अन्तःकरण से वह सूक्ष्मतर मध्य-पथ के द्वारा पर प्रमाता के अन्तर्विमर्श चमत्कार का आस्वादन करता है। इस अविकल्प दशा में शरीर, प्राण आदि प्रमातृता (अहंरूपता या अभिमानरूपता) गल जाती है। विज्ञानभैरव तन्त्र में महादेव भगवती पार्वती को इस तुर्यदशा की प्राप्ति के विषय में इस प्रकार कहते हैं : मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् । यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥ अर्थ—हे प्रिय पार्वती ! जिस अवस्था में (योगी के) मन, बुद्धि, प्राणापान शक्ति और जीवात्मभाव (परिमित प्रमाता) नष्ट होते हैं अर्थात् चित्त की चमत्कार दशा को प्राप्त होते हैं उसी दशा में (उस योगी का) भैरवस्वरूप अर्थात् शिव-सायुज्य होता है। श्रुति में भी : यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टते तमाहुः परमां गतिम् ॥ अर्थ—जब (योगी की) ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन आत्मा में विश्रान्ति पाते हैं और बुद्धि किसी प्रकार से विचलित नहीं होती है, उस (तुर्य) अवस्था को परमगति कहते हैं। इस तुर्य अवस्था का वर्णन ज्ञानगर्भ स्तोत्र में बड़ी सुन्दरता से किया गया है : विहाय सकलाः क्रिया जननि ! मानसीः सर्वतो विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्वलम् । स्थितैस्त्वदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥ अर्थ—हे माता (संविद्देवी) ! विकल्प, स्मृति आदि सब प्रकार की क्रिया को सब ओर से त्याग कर और परतन्त्र साधनों (ऊर्ध्वरेचक आदि मुद्राबन्धनों) द्वारा विकास से मुक्त हो, योगी-जन शाम्भवोपाय के समावेश से सदा सावधान (अतन्द्रित) अनुपम सुखरूप अमृत-प्रवाह वाली वह अनुत्तर (परा) दशा आप के ही अनुग्रह-वाञ्छा से, तत्क्षण अनुभव करते हैं ॥२१॥
तृतीय विकास : ४३ सम्बन्ध—इस प्रकार परमपद में प्रवेश किये हुए योगी के, अवस्थाओं में, अभ्यास का वर्णन किया । यह उसकी विश्वोत्तीर्ण अवस्था का अनुभव है । अब योगी की विश्व- मय अवस्था का अनुभव बताने के लिए व्युत्थान दशा में उसकी इन अवस्थाओं का निर्णय करते हैं अर्थात् प्रवेशदशा का वर्णन करके अब प्रसरदशा का वर्णन करते हैं । इन दोनों दशाओं में वह स्वरूपलाभनिष्ठ ही रहता है । प्राणसमाचारे समदर्शनम् ॥२२॥ प्राणसमाचारे—(प्राण + सम + आ + चारे) प्राण—प्राण के सम—बराबर (समरूप से) आ—धीरे-धीरे चारे—बहिः प्रसर करते हुए समदर्शनम्—चिदानन्दघनरूपता से एकता का अनुभव होता है । व्याख्या—तुर्यरस से योगी का प्राण परमेश्वर के शक्तिस्फार की सुगन्धि से युक्त होता है । उसकी सब वासना-ग्रन्थियों का भेदन हुआ होता है । इस कुम्भक-भाव से जब प्राण धीरे-धीरे और समता में बहिःप्रसर करने लगता है तो उस समय भी वह उस सुगन्धि से आनन्द का अनुभव करता है । इस प्रकार वह व्यवहार करते हुए भी सभी अवस्थाओं में चिदानन्दघनरूप होता है । व्यवहार में भी उसे अभेद दृष्टि का आनन्द रहता है । इसी को निर्व्युत्थान समाधि का साक्षात्कार कहते हैं क्योंकि तुर्य दशा से निकलकर उसे निमेष में प्राण-रोध (समाधि) और उन्मेष में प्राण-प्रवाह (व्युत्थान) रहता है । इसे तुर्यातीत-पद कहते हैं ॥२२॥ सम्बन्ध—परन्तु जब योगी मन्दप्राय होने के कारण इस तुर्यातीतपद में प्रवेश नहीं कर सकता तब वह तुर्य चमत्कार से जाग्रत् में और फिर जाग्रत् से तुर्यचमत्कार के अनुभव में ही सन्तुष्ट रहता है । अब आगे के सूत्र में यह कहते हैं । मध्येऽवरप्रसवः ॥२३॥ मध्ये—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की मध्य अवस्थाओं में अवरः—कुत्सित (अश्रेष्ठ-भेदप्रथामय) प्रसवः—प्रसर-रूप प्रवेश (या स्वरूपलाभ) होता है । व्याख्या—मन्द प्राय योगी जो केवल अन्तर्मुख भाव में तुर्य का आस्वाद ले सकता है और तुर्य दशा से निकल कर निमेष के प्राण-रोध और उन्मेष के प्राण-प्रवाह में चिदानन्द की एकरूपता का अनुभव नहीं कर सकता है वह जाग्रत् स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था में भेदप्रथायुक्त प्रवेश का ही अनुभव करता है । अर्थात् ऐसे योगी को
४४ : शिवसूत्र विमर्श जाग्रत् और सुषुप्ति, जाग्रत् और स्वप्न तथा स्वप्न और सुषुप्ति की सन्धियों में ही (आदि और अन्त कोटियों पर) स्वरूपलाभ होता है। केवल जाग्रत्, केवल स्वप्न अथवा केवल सुषुप्ति में उसे स्वरूपलाभ का अनुभव नहीं रहता है। उसे अनित्य दिव्य भोगों का प्रलोभन विघ्नों में डाल सकता है। परन्तु वह सदा मोह में नहीं रहता। उसे तुर्यावस्था के अनुभव में रुकावट नहीं होती अर्थात् वह सदैव मोह में नहीं पड़ता है क्योंकि उसे तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध साथ रहती है। श्री मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में कहा है : वासनामात्रलाभेऽपि योऽप्रमत्तो न जायते । तमनित्येषु भोगेषु योजयन्ति विनायकाः ।। तस्मान्न तेषु संसक्तिं कुर्वीतोत्तमवाञ्छया । अर्थ—तुर्य चमत्कार का सुगन्धि-लाभ होने पर भी योगी प्रमाद में पड़ता है। उसे विघ्न-कृत विनायक (सिद्ध) अनित्य भोगों का प्रलोभन देते हैं। अतः सर्वोत्तम पद (तुर्यातीत-पद) की इच्छा वाले योगी को उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये । अतः ऐसे योगी को इन प्रलोभनों में नहीं फंसना चाहिये ।।२३।। सम्बन्ध—इसी प्रसंग में कहते हैं कि यदि योगी तुर्यरस (के आश्रय) से व्युत्थान- दशा में भी मध्यपद को सिंचन कर सके, तब मात्रास्वप्रत्ययसन्धाने नष्टस्य पुनरुत्थानम् ॥२४॥ मात्रा—दृष्ट घटपटादि पदार्थरूप प्रमेय संसार में (साथ ही) स्वप्रत्ययसन्धाने—स्वचित्तभाव (स्वात्मानुसन्धान) के अभ्यास पर नष्टस्य—(योगी का) अवर प्रसर नष्ट होने से पुनः—फिर से उसे उत्थानम्—स्वरूप का उदय होता है । व्याख्या--विश्व पदार्थ जब पाँच प्रकार के विषयों में परिमित होते हैं तब इन्हें मात्रा कहते हैं। यह रूपादि विषय हैं जिस प्रकार घटपटादि पदार्थ । यह सब प्रमेय संसार है । जिस योगी के विषय में ऊपर २३वें सूत्र में वर्णन है ऐसा योगी जब जाग्रत्, स्वप्न या सुषुप्ति की मध्य अवस्था के अवर प्रसर अर्थात् भेदप्रथायुक्त प्रवेश से निकल कर साथ ही आत्मानुसन्धान में लगा रहता है उसे प्रलोभन नहीं सताते । अभ्यास में लगे रहने के कारण उसका पूर्व अवर प्रसर नष्ट होने लगता है । उसे तुर्यचमत्कार की सुगन्धि साथ रहती है। अतः वह कुत्सित संसार में सुख से नहीं ठहर सकता है । वह विश्व पदार्थों में 'इदमहम्-यह मैं हूँ' का अनुभव करता है। उसकी भावना 'सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव' इस श्रुति उक्ति के अनुसार दृढ़ होने लगती है। इस तरह
तृतीय विकास : ४५ उसे स्वरूप का उदय फिर होता है और वह आत्मा की चिद्घनरूपता का अनुसन्धान करता है । इस विषय में प्रातः स्मरणीय श्री लक्ष्मण जी महाराज से भगवान् उत्पल के विषय में एक आख्यायिका सुनने को मिली है, वह यहाँ प्रस्तुत है : ''उत्पलदेव अपनी आयु के उत्तरार्ध में स्वचित्तभाव के अभ्यास में निरन्तर लगे रहते थे । वे प्रायः चित्स्वरूपता के अनुभव में निमग्न रहते थे । एक बार वे इसी अवस्था में किसी एक स्थान पर बैठे थे जहाँ बादाम के शगूफे खिले थे और शगूफों की पंखुड़ियां पृथ्वी पर इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं । किसी कारण इनकी समाधि खुल गई । इस व्युत्थान दशा में जब आँखें खुलीं तो सामने शगूफों की पंखुड़ियां बिखरी हुई देखीं । इन्हें देखते ही वे सहसा बोल उठे—'आह ! भक्तजनों ने भगवान पर पुष्प चढ़ाये हैं, केवल मैं ही पीछे रह गया हूँ'—इस पर भावविभोर होकर वे फिर समाधि में लीन हो गए ।'' इस प्रकार भगवान् उत्पल इस प्रसंग में चिद्घनरूपता के अनुसन्धान में गए । यही 'इदमहम्' भाव की स्थिति है जो भगवान् उत्पल को प्राप्त थी । ऐसी दशा में अवर प्रसर होना सम्भव नहीं, न ही मितसिद्धियों की ओर झुकने की सम्भा- वना है । इस दशा में प्रमेय संसार में आते ही योगी को साथ ही स्वरूप का उदय फिर होता है । उस का मन तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से सुवासित होकर सदैव स्वरूप में ही समाहित रहता है । सदा योगनिष्ठ रहने के कारण वह कभी प्रमाद के वश नहीं होता । श्री स्वच्छन्द शास्त्र में कहा है : यस्य ज्ञेयमयो भावः स्थिरः पूर्णः समन्ततः । मनो न चलते तस्य सर्वावस्थागतस्य तु ॥ अर्थ—जिस योगी को परतत्त्वभाव में सब प्रकार से और पूर्णरूप से स्थिरता प्राप्त होती है उसका मन सब अवस्थाओं (समाधि और व्युत्थान) में चलायमान नहीं होता । इसके लिए वहीं युक्ति भी कही है : यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् । चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ अर्थ—ऐसे महायोगी का मन ही परतत्त्व की ऐक्य-भावना से वासित रहता है । अतः जिस ओर भी उसका मन जाता है वहाँ वह अपने ज्ञेय अर्थात् तुर्यातीत पद का ही सब ओर से चिन्तन करता है (क्योंकि उसका यह निश्चय दृढ़ हुआ होता है कि सब कुछ शिवमय ही है ।) योगी की इस युक्ति को और भी स्पष्ट करने के अर्थ से कहा है : विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु च स्थितः । यत्र तत्र निरूप्येत नाशिवं विद्यते क्वचित् ॥ अर्थ—साधारण विषयों में भी, जहाँ पदार्थ इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते
४६ : शिवसूत्र विमर्श हैं, ठहरा हुआ (तुर्य चमत्कार को सुगन्धियुक्त) उत्तम योगी जहाँ कहीं इनमें विचार अर्थात् खोज करता है, तो किसी सूरत में भी उसका अकल्याण नहीं होता है। वह पर-प्रकाश की आनन्दघनता में शिव के साथ एकता को प्राप्त हुआ होता है ॥२४॥ सम्बन्ध—तुर्य चमत्कार की सुगन्धि से भली-भाँति युक्त योगी की दशा का वर्णन करते हैं— शिवतुल्यो जायते ॥२५॥ शिवतुल्यः—(ऐसा योगी) शिव के साथ एकता को जायते—प्राप्त होता है। व्याख्या—अभ्यास-घनता के कारण जब तुर्य-चमत्कार की सुगन्ध अधिकाधिक आने लगती है तो योगी तुर्यातीत-पद में स्थिर होने लगता है। वह परिपूर्ण स्वच्छन्द चिदा- नन्दघन भगवान् शिव के तुल्य होता है। जब तक उसकी देह-कला किञ्चित्-मात्र भी रहती है तब तक वह शिव के समान होता है। इसे सारूप्य मुक्ति कहते हैं। देह-कला (अर्थात् देहवासना) के भी गल जाने पर योगी शिव के साथ ऐक्य को प्राप्त करता है अर्थात् वह साक्षात् शिव ही होता है। इसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं। इस बात को श्रीकालिकाक्रम में स्पष्ट किया गया है : तस्मान्नित्यमसंदिग्धं बुद्ध्वा योगं गुरोर्मुखात्। अविकल्पेन भावेन भावयेत्तन्मयत्वतः॥ यावत्तत्समतां याति, भगवान्भैरवोऽब्रवीत्। अर्थ—अतः श्रीगुरुमुख से इस अलौकिक योग का श्रवण कर उस पर मनन और निदिध्यासन करने से शंकारहित होकर योगी को अविकल्प विमर्श का आश्रय लेकर शिव- मय भावना से तुर्यातीत पद का तब तक अभ्यास करना चाहिए जब तक शिव के साथ समता न हो जाए। यह बात स्वयं भगवान् भैरव ने कही है अर्थात् यह अटल निश्चय है ॥२५॥ सम्बन्ध—परन्तु इस योगी की देह में तो स्थिति होती ही है। यह त्यागने योग्य नहीं है क्योंकि जिन कर्मों से यह जाति, आयु और भोगरूप शरीर बना है उन का भोग द्वारा पूरा करने से ही प्रारब्ध की शुद्धि होती है, जैसे श्रुति कहती है : ‘प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः’ अर्थ—शरीर तो प्रारब्ध कर्मों के अनुरूप ही बना होता है। अतः इन कर्मों का क्षय (समाप्ति) शरीर द्वारा इनके भोगने से ही होता है। अतः देहनिर्वाहपर्यन्त—जब तक जाति, आयु और भोगरूप प्रारब्ध कर्मों की परि- समाप्ति न हो इस संसिद्ध योगी की देह में स्थिति कैसे होती है यह बताते हैं :
तृतीय विकास : ४७ शरीरवृत्तिर्व्रतम् ॥२६॥ शरीरवृत्तिः--(शिवोऽहं-मैं शिव हूँ, इस भावना में ठहरे इस योगी की) शरीर में स्थिति व्रतम्--जीवन के साधारण नियम के अनुसार ही होती है। व्याख्या—अब इस संसिद्धयोगी का आत्मसंयम प्रारब्ध के अनुसार साधारण जीवन के प्रवाह के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता है। शिवोऽहं भावना में अभ्यास-घनता के कारण स्थिर होने से इस योगी को देह-वासना का सम्बन्ध छूटा होता है। केवल प्रारब्ध की परिसमाप्ति तक उसे देह में ठहरना पड़ता है। देह, प्राण आदि में ठहरते हुए भी उसे शिव-समावेश बना रहता है। इस का प्रमाण श्री स्वच्छन्द शास्त्र में मिलता है : सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ शिखा दृश्येत चाम्बरे । देहप्राणस्थितोऽप्यात्मा तद्वल्लीयेत तत्पदे ॥ अर्थ—जिस प्रकार (काष्ठादि ढेर में लगी) अग्नि की शिखा आकाश में लीन होती देखी जाती है, उसी प्रकार देह, प्राणादि में ठहरी हुई संसिद्धयोगी की आत्मा तत्पद अर्थात् शिवस्वरूप में लीन होती है। अरणिमन्थन की युक्ति से अग्नि के प्रज्वलित होने पर जैसे उसकी ज्वाला-दाह्य- वस्तु को जलाकर आकाश में दिखाई देती है और वहाँ लीन होकर तदात्मभाव को प्राप्त होती है वैसे ही दिव्यकरण और मन्त्ररूप अरणि के उत्तेजित होने से योगी के देह में प्राण प्रदीप्त होकर मध्यनाडी में ऊर्ध्ववाही होकर उदान-वह्नि में प्रज्वलित होता है। इस योगी की आत्मा जो देह में ठहरी हुई है, केवल शुद्धविज्ञानरूप अग्नि के समान समना के अन्त तक देहरूप लकड़ी को जलाकर तुर्यातीत पद में लीन होती है अर्थात् उपाधिरहित परमशिव के साथ एक होती है। अतः योगी के देह में स्थिति प्रारब्ध कर्मानुसार ही रहती है। उसके लिए साधा- रण कर्म करने के अतिरिक्त और कोई व्रत नहीं होता है। वह केवल अविकारी होकर विकारी सा प्रतीत होता है। विवेक-चूड़ामणि में भगवान् आद्य शङ्कराचार्य कहते हैं : उपाधिसम्बन्धवशात्परात्मा ह्यु पाधिधर्माननुभाति तद्गुणः अयोविकारानविकारि वह्निव- त्सदैकरूपोऽपि परः स्वभावात् ॥१९३॥ अर्थ—वह परात्मा स्वरूप से सदा एक रूप ही है तथापि उपाधि के सम्बन्ध से उसके गुणों से युक्त-सा होकर उसो के धर्मों को प्रकाशित करता है जिस प्रकार कि लोहे के विकारों में व्याप्त हुई अविकारी अग्नि विकारी सी प्रतीत होती है।
४८ : शिवसूत्र विमर्श यही बात श्रीत्रिकसार में इस प्रकार वर्णित है : देहोत्थिताभिर्मुद्राभिर्यः सदा मुद्रितो बुधः । स तु मुद्राधरः प्रोक्तः शेषा वै अस्थिधारकाः ॥ अर्थ—शरीर-कला की साधारण क्रियाओं में वह बुद्धिकौशलयुक्त योगी सदा 'अन्त- र्लक्ष्यबहिर्दृष्टि' इस प्रकार शाम्भवी मुद्रा से मुद्रित होता है। उसी को मुद्राधर अर्थात् शिव कहा है। शेष तो सब प्राणी हड्डियों के पिञ्जर को ही धारणं करते हैं। इस संसिद्धयोगी के आत्मज्ञान का फल आचार्य शङ्कर विवेकचूडामणि में इस प्रकार कहते हैं : संसिद्धस्य फलं त्वेतज्जीवन्मुक्तस्य योगिनः । बहिरन्तः सदानन्दरसास्वादनमात्मनि ॥४१९॥ अर्थ—आत्मज्ञान में सम्यक् सिद्धि प्राप्त किए हुए जीवन्मुक्त योगी को यही फल मिलता है कि अपने आत्मा के नित्यानन्दरस का बाहर-भीतर निरन्तर आस्वादन किया करें। इस प्रकार बाहर-भीतर नित्यानन्दरस का निरन्तर आस्वादन करना ही परा- भक्ति है अर्थात् शिव-भक्ति के अमृत से पूर्ण शरीर में जो भी योगी की स्थिति होती है वही उसका व्रत है। इस स्थिति की पुष्टि के लिए भगवान् उत्पलदेव शिस्तोत्रावली में भगवान् शिव से यह अलौकिक प्रार्थना करते हैं : अन्तरुल्लसदच्छाच्छभक्तिपीयूषपोषितम् । भवत्पूजोपयोगाय शरीरमिदमस्तु मे ॥१७-२६॥ अर्थ—हे शङ्कर ! भीतर संवित् पद में मग्न हुए अत्यन्त निर्मल भक्तिपीयूष अर्थात् समावेश-अमृत से पाला-पोसा गया यह मेरा शरीर आप की पूजा के काम आ जाये अर्थात् आप चिदानन्दघन में ही विलीन हो जाय। स्वरूप-विमर्श रूप ज्ञान और परा-भक्ति पर्यायवाची हैं क्योंकि ये एक दूसरे पर आश्रित हैं। पराभक्ति स्वरूप भगवान् उत्पलदेव अलौकिक भक्तिरसपूर्ण शिवस्तोत्रावली में कहते हैं : यद्यथास्थितपदार्थदर्शनं युष्मदर्चनमहोत्सवश्च यः । युग्ममेतदितरेतराश्रयं भक्तिशालिषु सदा विजृम्भते ॥१३-७॥ अर्थ—(ज्ञान काल में) सभी सांसारिक वस्तुओं को आप चिद्रूप से अभिन्न देखना और (ध्यान, दर्शन और स्पर्शन-भक्तिकाल में) आप की पूजा का उत्सव, यह दोनों बातें एक दूसरे पर आश्रित रहती हैं। आप के अनन्य भक्तों में इन दोनों बातों का (क्रम- मुद्रा से) सदा विकास रहता है।
तृतीय विकास : ४९ इसी भाव से योगी की शरीर में स्थिति साधारण नियम के अनुसार होती है ॥२६॥ सम्बन्ध—अब ऐसे संसिद्ध योगी के आलाप आदि के विषय में कहते हैं। कथा जपः ॥२७॥ कथा--(अहं विमर्श में आरूढ़ इस योगी के) जो कुछ भी लौकिक-व्यवहार के अनुसार आलाप आदि (हों) जपः - (वह स्वात्मदेवता की भावना के तात्पर्य से) उस का जप ही है। व्याख्या—पराहंभावना में आरूढ़ योगी की भावना का उल्लेख श्रीस्वच्छन्दतन्त्र में इस प्रकार है : अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्। अर्थ—(मैं ही वह पर-हंस रूप शिव हूँ जो सर्वत्र व्याप्त हैं।) हान और समाधान धर्मी होने से शिव को हंसः कहा है। अनुत्तर ज्ञानशाली होने से योगी का लौकिक व्यवहार के अनुसार जो कुछ भी आलाप (बातचीत) हो वह उसका जप ही है क्योंकि वह महामन्त्ररूप स्वाभाविक विमर्श पर आरूढ़ होता है जो परप्रमातृ दशा है। जैसे विज्ञानभैरव में कहा है : भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या। जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा, जप्य ईदृशः ॥१४५॥ अर्थ—जिस भावना का परमेश्वर में लगातार अनुसन्धान किया जाता है। वहाँ पूर्णाहंता का परामर्श यहाँ जप कहा गया है। स्वयं नाद (विमर्श) ही यहाँ जप है। इस विषय में योगबीज में महादेव ने पार्वती से कहा है : सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः । हंस-हंसेति मन्त्रोऽयं जीवो जपति नित्यशः ॥ अर्थ—हे पार्वती सकार से प्राण का प्रवाह बाहर जाता है और हकार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। इस प्रकार हंस-हंस मन्त्र का जप जीव सदा ही करता रहता है। परन्तु योगी इस मन्त्र को सुषुम्ना द्वार में उल्टा कर सोऽहं सोऽहं मन्त्र निरन्तर जपता है। इसी को वास्तव में मन्त्रयोग कहते हैं। इस जप की संख्या महादेव ने विज्ञानभैरव में इस प्रकार कही हैं : षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकंविंशतिः। जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो, दुर्लभो जडैः ॥ अर्थ—पराशक्ति को बताने वाला यह जप दिन-रात में २१६०० बार योगी को सुलभ होता है परन्तु अज्ञानी के लिए ऐसा होना दुर्लभ है। इसलिए स्वात्म देवता के विमर्शन में लगे योगी की साधारण बातचीत भी उसका जप ही होता है ॥२७॥ ४
५० : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—योगी के विषय में उसके व्रत और जप का वर्णन करके उसकी चर्या के बारे में कहते हैं । दानमात्मज्ञानम् ॥२८॥ आत्मज्ञानम्—आत्मज्ञान पर रहना (अथवा शिष्यों को आत्मज्ञान प्रदान करना) ही दानम्—योगी का दान करना है। व्याख्या— संसिद्ध योगी का चैतन्यरूप आत्मा का ज्ञान अर्थात् साक्षात्कार ही दान है। दान के यहाँ कई अर्थ बताये हैं यथा— (१) दीयते परिपूर्णं स्वरूपम्—परिपूर्ण स्वरूप अर्थात् पूर्णाहन्ता को प्राप्त कराता है । (२) दीयते खण्ड्यते विश्वभेदः—पृथ्वी तत्त्व से शिव तत्त्व तक ३६ तत्त्व लक्षण वाले भेद को काट देता है । (३) दीयते शोध्यते मायास्वरूपम्—माया के स्वरूप का शोधन करता है । (४) दीयते रक्ष्यते लब्धः शिवात्मा स्वभावश्च अनेन—प्राप्त किये शिवस्वरूप के स्वभाव की (निरन्तर अभ्यास द्वारा) रक्षा करता है । और (५) दीयते इति दानम्—अन्तेवासियों (शिष्यों) को आत्मज्ञान ही देता है। इसके बारे में कहा है : दर्शनात्स्पर्शनाद्वापि वितताद्भवसागरात् । तारयिष्यन्ति योगीन्द्राः कुलाचारप्रतिष्ठिताः ॥ अर्थ—शैव सिद्धान्त में प्रतिष्ठित योगीन्द्र (मुमुक्षुजनों को इस) विस्तृत भवसागर से अपने दर्शन से या चरण-स्पर्श के प्रभाव से पार कर देते हैं यही उनका उत्तम दान है ॥२८॥ सम्बन्ध—शिव के साथ सदा तुल्य योगी इस प्रकार व्रत, जप और चर्या में लगा रहने से अपनी इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ होता है। वही तत्त्व का उपदेश चाहने वाले शिष्यों को स्वस्वरूप की पहचान का ज्ञान दे सकता है । श्रुति के अनुसार 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य द्वारा आत्मज्ञान की उपलब्धि कराता है। इसी विषय में आगे का सूत्र है। योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च ॥२९॥ यः—जो (योगी) अविपं—परमेश्वर के शक्ति-चक्र की घोरतरी शक्तियों (अर्थात् इन्द्रिय- वृत्तियों) पर स्थः—प्रभुत्व जमाता (अर्थात् वश रखता) है
सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी
तृतीय विकास : ५१ सः- (वह) च-निश्चय से ज्ञाहेतुः - ज्ञानशक्ति के हेतु (अर्थात् शिष्यों को परमार्थज्ञान प्रदान करने से अपने शिवस्वरूप की पहचान कराने में (समर्थ) होता है । व्याख्या - बहिर्मुख इन्द्रिय-वृत्तियों को 'अविप' कहते हैं। (अवीन् पशून् पाति इति अविपं) जो पशुओं अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को पालती हैं, बहिर्मुख रहने की ओर सहा- यता देती हैं महेश्वर की उन घोरतरी शक्तियों को 'अविप' कहते हैं। यह शक्तियां योगी के शुद्धविद्या स्वरूप को किञ्चित् ढक लेती हैं। यह बात इसी विकास के १९वें सूत्र में कही गई है-कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः (माहेश्वर्य आदि घोरतरी शक्तियां बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित्-मातृकाचक्र में पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृ शक्तियां (इन्द्रिय-वृत्तियां) बनकर योगी को नीचे और नीचे गिराती हैं ।) यह शक्तियां पशुओं (जीवों) को परमार्थ प्राप्त करने से रोकती हैं। अतः योगी इन पर 'यह सब मेरा ही विभव है' इस स्वात्म ऐश्वर्य को पहचान कर प्रभुत्व जमाता है। जब उसका प्रभुत्व इन्द्रिय-वृत्तियों पर आरूढ़ होता है तब वह निश्चय ही शिष्यों को स्वात्मा का प्रत्यभिज्ञान कराने में समर्थ होता है। दूसरे जो शक्तिचक्र के अधीन रहें पशुभाव को हटा नहीं सकते फिर तो शिष्यों को प्रबोध देने की बात ही क्या ! परन्तु जो योगी अविपस्थ अर्थात् इन्द्रिय-वृत्तियों को वश में रखने वाला हो, वह अवश्य 'स्वयं तीर्त्वा परान् तारयति' का प्रतीक बनता है। वह दूसरों को भी आत्मज्ञान के प्रबोध कराने का हेतु बन जाता है। इसीलिए पूर्व-सूत्र में कहा है- दानमात्मज्ञानम्-योगी का आत्मज्ञान-निष्ठ रहना ही उसका उत्तम दान है ।।२९।। सम्बन्ध-क्योंकि स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् ॥३०॥ विश्वम् - यह सारा विश्व अस्य - इस शिवयोगी के स्वशक्तिप्रचयः - अपने ही शक्तिचक्र (क्रियाशक्ति) का विकास है । व्याख्या -- यह सारा विश्व शिवयोगी के अपने शक्तिचक्र का समूह है क्योंकि शिव का यह विश्व स्वशक्ति-मय है। कहा है : 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः' ।। अर्थ - यह सारा जगत् उसकी शक्तियों का ही समूह है क्योंकि महेश्वर ही सर्वशक्तिमान् है । इस योगी के लिए जगत् वृत्तिरूप नहीं होता है। इस पद पर इंद्रिय-वृत्तियां योगी की शक्तियां बन जाती हैं क्योंकि यह अन्तर्मुख पद पर ही ठहरती हैं। यह सृष्टि
सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये
५२ : शिवसूत्र विमर्शा दशा में उन्मीलन का विकास है और यही योगी की उन्मीलन-समाधि का विकास कहलाता है। अथवा यूँ कहें कि योगी के लिए विश्व क्रियाशक्ति का स्फुरणरूप विकास है। स्वात्म-साक्षात्कार के बल से योगी के सामने ज्ञान और ज्ञेय पदार्थ भिन्न सत्ता नहीं रखते, वह दोनों में एकरूपता का अनुभव करता है। इसे अक्रमवेदन कहते हैं। यही शिखरस्थ ज्ञान अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा है। यह इस कारण कि इस दशा में अन्तर और बाह्य दोनों में एक साथ योगी को स्वशक्ति-विकास ही होता है— शिखरस्थ ज्ञानं युगपद्वेदनमिति । वही जीवन्मुक्त कहलाता है। योगवासिष्ठ में इस दशा का वर्णन यूँ है— यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ (३।९।७)॥ अर्थ—वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है किन्तु वास्तव में जो जाग्रति के धर्मों से रहित है और जिसका बोध सर्वथा वासना रहित है वह पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। 'वृत्ति के लीन रहते हुए भी जो जागता रहता है'— इसका आशय यह है कि यद्यपि उस योगी का चित्त सम्पूर्ण दृश्य पदार्थों का बाध करके निरन्तर ब्रह्म में लीन रहता है तथापि वह सोये हुए पुरुष के समान संज्ञाशून्य नहीं हो जाता है, वह सब व्यवहार यथावत् करता रहता है किन्तु व्यवहार करते हुए भी उसे स्वप्नवत् समझने के कारण उसकी अन्य पुरुषों के समान दृश्य पदार्थों में आस्था नहीं होती। इसलिए 'वास्तव में वह जाग्रति के धर्मों से रहित है। आगे वहीं कहा है : 'शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चितः स जीवन्मुक्त उच्यते ।। (३।१।१२) अर्थ—जिसकी संसार वासना शान्त हो गई है, जो कलावान् होकर भी कलाहीन है अर्थात् व्यवहार दृष्टि में ऊपर से विकारवान् प्रतीत होता हुआ भी जो निरन्तर अपने निर्विकार स्वरूप में ही स्थित रहता है तथा जिसका चित्त निश्चिन्त है वह पुरुष जीवन- मुक्त कहलाता है ॥३०॥ सम्बन्ध—योगी का विश्व न केवल सृष्टि दशा में ही अपने शक्ति-चक्र का विकास है अपितु सृष्टि के तत्क्षणात् अनन्तर भी— स्थितिलयौ ॥३१॥ स्थिति—बहिर्मुखता का आभास (और) लय—बहिर्मुखता का लय (भी) उसे अपने शक्तिचक्र का विकास है। व्याख्या--पूर्व सूत्र का 'स्वशक्तिप्रचयः' (अपने शक्तिचक्र' का विकास है) इस सूत्र के साथ जोड़ने से इसका अर्थ पूरा होता है। क्रिया शक्ति द्वारा आभास में आये
तृतीय विकास : ५३ हुए विश्व के अलग-अलग प्रमाता की अपेक्षा से कुछ समय तक बहिर्मुखता में अवभासन रूप स्थिति और चित्स्वरूप परप्रमाता में विश्रान्ति-रूप लय, यह दोनों भी योगी के अपने शक्ति चक्र का विकास है । प्रत्येक वेद्य पदार्थ की सृष्टि और लय योगी को अपना ही संवित्-शक्ति रूप है । संवित्-शक्ति के साथ एकता का अभाव न रहने पर ही योगी को दोनों (स्थिति और लय) में स्वरूप-सत्ता का अनुभव रहता है । कालिका- क्रम में कहा है : ‘सर्वं शुद्धं निरालम्बं ज्ञानं स्वप्रत्ययात्मकम् । यः पश्यति स मुक्तात्मा जीवन्नेव न संशयः ॥’ अर्थ—जो योगी निर्विकल्प तथा नाम-रूप-वर्जित विश्व और स्वाहन्ता रूप ज्ञान का अनुभव करता है वह शरीर में जीवन यापन करते हुए भी मुक्तात्मा ही है । इस विषय में कोई संदेह नहीं करना चाहिए ॥३१॥ सम्बन्ध—अब प्रश्न है कि क्या आपस में भेद का आभास रखने वाली सृष्टि, स्थिति और लय की अवस्थाओं में इस परमयोगी को स्वरूप में भेद का अनुभव तो नहीं होता ? इस शङ्का का समाधान करने में आगे का सूत्र कहा है । तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥ तत्—उस (सृष्टि आदि परामर्श) के प्रवृत्तौ--प्रकट होने पर अपि—भी संवेत्तृभावात्—परप्रमातृस्वरूप (तुर्य-चमत्कार विमर्शमय) होने के कारण अनिरासः— (योगी) चलायमान नहीं होता व्याख्या—सृष्टि, स्थिति और लय का भेद प्रकट होने पर भी योगी तुर्य चमत्कार के विमर्श वाला होने से इनमें निष्कम्प ही रहता है । कालिकाक्रम में कहा है : नाशेऽविद्याप्रपञ्चस्य स्वभावो न विनश्यति । उत्पत्तिध्वंसविरहात्तस्मान्नाशो न वास्तवः ॥ अर्थ—बाहर से धन-दारा-पुत्र आदि का मोह और अन्दर से शरीर का मोह ही अविद्या का प्रपञ्च है । उनके नष्ट होने से योगी के आत्मस्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । अतः उत्पत्ति और नाश से रहित होने के कारण स्वरूप में कोई हानि नहीं होती है । यही बात स्पन्दशास्त्र में भी इस प्रकार वर्णित है : अवस्थायुगलं चात्र कार्यकतृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ (१-१४)
५४ : शिवसूत्र विमर्शं अर्थ—इस जगत् में कार्यता और कर्तृता नाम के दो भेद भोग्य और भोक्ता हैं । उन में जो भोग्य रूप भेद है वह पैदा भी होता है और नष्ट भी । परन्तु भोक्ता रूप भेद चिद्रूप होने से न कभी पैदा होता है और न कभी नष्ट ही । अतः वह नित्य है । और भी कहा है : भोक्तैव भोग्यरूपेण सदा सर्वत्र संस्थितः अर्थ—भोक्ता ही भोग्य के रूप में सदा और सब जगह ठहरा है । तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्रविशत् अर्थ—जगत् में नाना प्रकार की सृष्टि को रच कर स्वयं उस में प्रविष्ट हुआ । आगे स्पन्द शास्त्र में कार्यता के बारे में लिखा है— कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ न तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलम्भनात् ॥ (१-१५, १६) अर्थ—वेद्य वर्ग में कार्य संपादन करने का सामर्थ्य जो बाह्य इन्द्रियों के व्यापार से ही होता है, समाधि दशा में उसका लोप हो जाता है । परन्तु अबुद्ध को इस प्रकार इन्द्रियों के व्यापार का लोप होने पर यह मान्यता होती है कि 'मैं नहीं हूँ' । वह यह नहीं जानता कि यह अभाव परामर्श ही साक्षी होने से स्वात्मा का स्थिरीभाव बता देता है । परन्तु जो परप्रमातृपद सर्वज्ञत्व गुण का स्थान है उसका कभी लोप नहीं होता है क्योंकि वहाँ भिन्न वेद्यवर्ग का ज्ञान नहीं होता ॥३२॥ सम्बन्ध—विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय में निष्कम्प योगी को— सुखासुखयोर्बहिर्मननम् ॥३३॥ सुखासुखयोः--(अन्य पुस्तकों में पाठान्तर 'सुखदुःखयो') वेद्य पदार्थों के स्पर्श से हुए सुख और दुःख मननम्—का जानना बहिः--(नीले पीले आदि की तरह इदन्ता का आभास रूप होने से) बहि- र्भाव में ही होता है । व्याख्या—देहप्रमातृता, प्राणप्रमातृता और पुर्यष्टक-प्रमातृता से उत्तीर्ण हुए इस योगिराज को वेद्यवर्ग के स्पर्श पर जय प्राप्त होती है । वह वेद्य-स्पर्श से हुए सुख और दुःखों को इदन्ता का आभास रूप ही जानता है जैसे नीला, पीला आदि बहिर्भाव में ही होते हैं । साधारण जन की अहन्ता वेद्य-पदार्थों में ही होती है इस कारण वह इनके स्पर्श से मान बैठता है कि 'मैं सुखी हूँ' या 'दुःखी हूँ' । परन्तु इस धीमान् के लिए
तृतीय विकास : ५५ विश्व ही स्वशक्ति-चक्र का विकास होता है (स्व-शक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम्—सूत्र ३-३०) । उसने देहादि अहंकार के महामोह को अतिक्रमण किया होता है। अतः उसे दूसरे लोगों की तरह सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते । इसके विषय में स्पन्दशास्त्र में कहा है : न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च । न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (१-५) अर्थ—उसका स्वभाव ही होता है कि उसे सुख, दुःख, मूढता आदि भावों का स्पर्श ही नहीं होता है क्योंकि उसका परप्रमातृभाव सदा उदय में होता है । सुख दुःख तो केवल संकल्प से पैदा होते हैं और क्षणभङ्गुर हैं । अतः वे शब्दादि विषयों के समान आत्मस्वरूप से बाहर होते हैं । यहाँ प्रश्न किया जा सकता है : यदि इस योगी को सुख और दुःख स्पर्श नहीं करते तो क्या वह पत्थर के समान संज्ञाहीन होता है ? इसका उत्तर अष्टावक्र जी ने जनक के प्रति इस प्रकार दिया है : निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छो वै मुक्तबन्धनः । क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।। (अष्टावक्रगीता—१२।२९) अर्थ—ज्ञानी वासना रहित होता है। उसको किसी का आधार नहीं लेना पड़ता है । इस लिए परप्रमातृ स्वभाव में स्वाधीन होता है। ज्ञानी में सुख दुःख के मूल राग-द्वेष नहीं होते हैं। परन्तु प्रारब्धानुसार जो प्राप्त होते हैं उनको अङ्गीकार करता है। जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़े हुए सूखे पत्तों में कहीं जाने की अथवा स्थित होने की वासना (सामर्थ्य) नहीं होती है परन्तु जिस दिशा की ओर वायु चलता है उसी दिशा की ओर वे पत्ते उड़ने लगते हैं ठीक उसी प्रकार यह योगिविराट् प्रारब्ध के अनुसार भोग- चेष्टा करता है । इस योगि-देह के इन्द्रिय-वर्ग इसे विषयों की ओर नहीं ले जाते हैं अपितु करणेश्वरियाँ बनकर इसकी सेवा करते हैं। अष्टावक्र जी राजर्षि जनक को दृष्टान्तपूर्वक समझाते हैं— निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ —(अष्टावक्रगीता : १८।४६) अर्थ—वासना रहित पुरुषरूप सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी असमर्थ होकर चुपचाप भाग जाते हैं। फिर इस वासनारहित पुरुष की ओर आकर्षित होकर स्वयं सेवा करते हैं ॥३३॥
५६ : शिवसूत्र विमर्श सम्बन्ध—क्योंकि जीवभाव से उत्तीर्ण इस योगी के अन्तःकरण को सुख दुःख स्पर्श नहीं करते, इसलिए वह— तद्विमुक्तस्तु केवली ॥३४॥ तत्—संस्कार शेष रहने तक तु—विशेष कर विमुक्तः—सुख-दुःख से मुक्त (होकर) केवली--केवल अद्वैतनिष्ठ रहता है। व्याख्या—स्वरूपनिष्ठ होने से योगी को संस्कार मात्र में भी सुख-दुःख स्पर्श नहीं कर पाते। वह विशेष रूप से इनसे मुक्त होता है। वह चिन्मात्र स्वरूप सदा अद्वैत- निष्ठ ही रहता है। यह श्रीकालिकाक्रम में इस प्रकार वर्णित है : सुखदुःखादिविज्ञानविकल्पानल्पकल्पितम् । भित्त्वा द्वैतमहामोहं योगी योगफलं लभेत् ॥ अर्थ—सुख, दुःख और मोहज्ञान के विकल्पों से घनीभूत द्वैत के महामोह को चीर कर योगी योग के फल स्वरूप लाभ में ही सदा रहता है । यहाँ 'तु' शब्द से आगे कहे जाने वाले अज्ञानी की अपेक्षा ज्ञानी में विशेषता कही गई है ॥३४॥ सम्बन्ध—अतः इस के विपरीत जीवदशा में पुरुष शुभ तथा अशुभ के कलंक से कर्मात्मा कहा गया है। इस का वर्णन करते हैं। मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा॥३५॥ तु--इसके विपरीत मोहप्रतिसंहतः--अज्ञान से पूरी तरह घनीभूत होकर कर्मात्मा—(वह) साधारण जीव अर्थात् कर्म-पिण्ड ही होता है। व्याख्या—परन्तु अज्ञान के आवरण से पुरुष जीव ही होता है योगी नहीं। वह सुख दुःख के ही आश्रित रहता है और सदा कर्म में लगा हुआ शुभ फल और अशुभ फल से कलंकित होता है। वह अविद्या के प्रभाव से विकल्पों के ही अनुसार चलता है और स्वरूप में सुख-दुःख का साक्षात्कार नहीं करता है ! कहा भी है— 'अज्ञानैकघनो नित्यं शुभाशुभकलंकितः' अर्थ—केवल अज्ञान में घनीभूत होकर (साधारण जीव) सदा शुभ तथा अशुभ वासनाओं (मायीयमल) से कलंकित रहता है ॥३५॥