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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

श्रीगिरिधरग्वालजी) (१७१ रुचिर शील घन नील, लील रुचि सुमति सरित पति। विविध भक्त, अनुरक्त व्यक्त, बहु चरित चतुर अति। लघु दीरघ सुर, शुद्ध वचन अविरुद्ध उचारन। विश्व वास विश्वास, दास परिचय विस्तारन।। जानि जगत् हित सब गुननि, सु सम नारायनदास दिय। भक्तरत्न माला सुधन, गोविन्द कण्ठ विकास किय।। १६२ ।। श्रीजगत्सिंहजी भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।। श्रीयुत् नृप मनि जगत्सिंह, दृढ़भक्ति परायन। परम प्रीति किये सुवश, शील लक्ष्मी नारायन।। जासु सुजस सहज ही कुटिल, कलि कल्प जु घायक। आज्ञा अटल सुप्रगट, सुभट कटकनि सुखदायक।। अति प्रचण्ड मारतण्ड सम, तम खण्डन दोरदण्ड वर। भक्तेश भक्त भवतोष कर, सन्त नृपति वासो कुँवर।। १६३।। जगता कौ तन, मन, सेवा श्रीनारायन जू भयौ ऐसौ परायन रहै डोला संग ही। लरिवे कौं चलै आगे, आगै सदा पाछै रहै, ल्यावै जल सीस, ईश भर्यौ हियौ रंग ही।। सुनि जसवन्त, जयसिंह कै हुलास भयौ, देख्यौ दिल्ली माँझ, नीर ल्यावत अभंग ही। भूमि परि विनै, करी, धरी देह तुम्हहिं नै, जातै पायौ नेह, भींजि गये यों प्रसंग ही।। ६२१।। नृपति जयसिंह जू सौं, बोल्यौ कहा नेह मेरे? तेरे जो बहिन, ताकी गन्ध को न पाऊँ मैं। नाम दीपकुँवरि, सो बड़ी भक्तिमान् जानि, वह रसखानि ऐपै, कछुक लड़ाऊँ मैं।। सुनि सुख भयौ भारी, हुती रिस वासौं टारी, लिये गाँव काढ़ि, फेरि दिये हरि ध्याऊँ मैं। लिखिकै पठाई बाई, करैं सो करन दीजै, लीजै साधुसेवा करि, निसिदिन गाऊँ मैं।। ६२२।। श्रीगिरिधरग्वालजी गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं सखा साँचलौ संग कौ।।

१७२) (श्री भक्तमाल प्रेमी भक्त प्रसिद्ध, गान अति गद्गद वानी। अन्तर प्रभु सौं प्रीति, प्रगट रहै नाहिन छानी॥ नृत्य करत आमोद, विपिन तन वसन बिसारै। हाटक पट हित दान, रीझि तत्काल उतारै॥ मालपुरै मंगल करन, रास रच्यौ रसरंग कौ। गिरिधरन ग्वाल गोपाल कौं, सखा साँचलो संग कौ।। १६४।। गिरिधर ग्वाल साधुसेवा ही कौ ख्याल जाके, देखि यों निहाल होत, प्रीति साँची पाई है। सन्त तन छूटेहूँ ते, लेत चरनामृत जो, और अब रीति कहौ, कापै जात गाई है।। भये द्विज पंच, इकठौरे सो प्रपंच मान्यो, आन्यो सभा माँझ, कहें छोड़ौ न सुहाई है। जाके हो अभाव, मत लेवौ मैं प्रभाव जानौ, मृतक यों बुद्धि ताकौ, वारो सुनि भाई है।। ६२३।। श्रीगोपालीजी गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।। प्रगट अंग में प्रेम, नेम सौं मोहन सेवा। कलियुग कलुष न लग्यौ, दास तें कबहुँ न छेवा।। वानी सीतल सुखद, सहज गोविन्द धुनि लागी। लक्षन कला गँभीर, धीर सन्तनि अनुरागी।। अन्तर शुद्ध सदाँ रहै, रसिक भक्ति निज उर धरी। गोपाली जनपोषकौं, जगत् जसोदा अवतरी।। १६५।। श्रीरामदासजी श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत।। सीतल परम सुशील, वचन कोमल मुख निकसै भक्त उदित रवि देखि, हृदै बारिज जिमि विकसै।।

श्रीभगवन्तमुदितजी) (१७३ अति आनन्द मन उमँगि, सन्त परिचर्या करई। चरण धोय दण्डौत, विविध भोजन विस्तरई॥ बछवन निवास विस्वास हरि, जुगल चरण उर जगमगत। श्रीरामदास रसरीति सौं, भलीभाँति सेवत भगत॥ १६६॥ सुनि एक साधु आयौ, भक्तिभाव देखिवे कौं, बैठें रामदास पूछै, रामदास कौन है। उठै आप, धोये पाँव, आवै रामदास अब, रामदास कहाँ? मेरे चाह और गौन है॥ चलौ जू प्रसाद लीजै, दीजै रामदास आनि, यही रामदास, पग धारौ निज भौन है। लपटानौ पाँयनि सौं, चायनि समात नाहिं, भायनि सौं भयौ हिये, छाई जस जौन्ह है॥६२४॥ बेटी कौ विवाह घर, बड़ौ उतसाह भयौ, किये पकवान नाना, कोठे माँझ धरे हैं। करैं रखवारी सुत, नाती दिये तारौ रहें, और ही लगाई तारी, खोल्यौ नहीं डरे हैं॥ आये गृह सन्त, तिन्हें पोट बँधवाय दई, पायौ यों अनन्त सुख, ऐसे भाव भरे हैं। सेवा श्रीविहारीलाल, गाई पाक शुद्धताई, मेरे मनभाई सब साधु उर हरे हैं॥६२५॥ मास परायण उन्तीसवाँ विश्राम श्रीरामरायजी विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥ भक्ति ज्ञान वैराग, जोग अन्तरगति पाग्यौ। काम क्रोध मद लोभ, मोह मत्सर सब त्याग्यौ॥ कथा कीरतन मगन, सदा आनन्द रस झूल्यौ। सन्त निरखि मन मुदित, उदित रवि पंकज फूल्यौ॥ बैर भाव जिन द्रोह किय, तासु पाग खसि भ्वैं परी। विप्र सारसुत घर जनम, रामराय हरि रति करी॥१६७॥ श्रीभगवन्तमुदितजी भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय॥

१७४) (श्री भक्तमाल कुँजविहारी केलि, सदा अभ्यन्तर भासैं। दम्पति सहज सनेह, प्रीति परमिति परकासै ॥ अननि भजन रसरीति, पुष्ट मारग करि देखी। विधि निषेध बल त्यागि, पागि रति हृदय विशेखी ॥ माधव सुत सम्मत रसिक, तिलक दाम धरि सेव लिय। भगवन्तमुदित उदार जस, रस रसना आस्वाद किय ॥ १६८ ॥ सूजा के दिवान, भगवन्त रसवन्त भये, वृन्दावन-वासिन की, सेवा ऐसी करी है। विप्र कै गुसाँई, साधु कोई ब्रजवासी जाहु, देत बहु धन, एक प्रीति मति हरी है।। सुनी गुरूदेव, अधिकारी श्रीगोविन्ददेव, नाम हरिदास जाय, देखें चित धरी है। योग्यताई सीवाँ, प्रभु दूध-भात माँणि लियौ, कियौ उतसाह तऊ, पेखैं अरबरी है ।। ६२६ ।। सुनी गुरु आवत, अमावत न किहूँ अंग, रंग भरि तिया सौ यों, कही कहा कीजिये। बोली घरबार पट, सम्पति भण्डार सब, भेट करि दीजै, एक धोती धारी लीजिये।। रीझे सुनि वानी, साँची भक्ति तैं ही जानी मेरे, अति मनमानी कहि, आँखैं जल भीजिये। यही बात, परी कान, श्रीगुसाँई लई जान, आये फिरे वृन्दावन, पन मति धीजिये ।। ६२७ ।। रह्यौ उतसाह, उर दाह कौ न पारावार, कियौ लै विचार आज्ञा माँगि वन आये हैं। रहे सुख लहे, नाना पद रचि कहे, एकरस निर्वहे, ब्रजवासी जा छुटाये हैं।। कीनी घर चोरी, तऊ नेकु नासा मोरी नाहिं, बोरी मति रंग, लाल प्यारी दृग छाये हैं। बड़े बड़भागी, अनुरागी रति जागी जग, माधव रसिक बात, सुनौ पिता पाये हैं।। ६२८ ।। आयौ अन्तकाल जानि, बेसुधि पिछानि सब आगरे तें लै कै चले, वृन्दावन जाइयै। आये आधी दूर, सुधि आई बोले चूर ह्वैकै, कहाँ लिये जात कूर? कही जोई ध्याइयै ।। कह्यौ फेरो तन, वन जाइवे कौ पात्र नाहीं, जरै बास आवै, प्रिया पिय को न भाइयै। जानहारौ होई सोई, जायगौ जुगल पास, ऐसे भावरासि, ताही ठौर चलि आइयै ।। ६२६ ।। श्रीलालमतीजी दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ ॥

श्रीलालमतीजी) (१७५ गौर स्याम सौं प्रीति, प्रीति जमुना कुँजनि सौं। वंशीवट सौं प्रीति, प्रीति ब्रजरज पुंजनि सौं॥ गोकुल गुरुजन प्रीति, प्रीति घन बारह वन सौं। पुर मथुरा सौं प्रीति, प्रीति गिरि गोवर्द्धन सौं॥ वास अटल वृन्दाविपिन, दृढ़करि सो नागरि कियौ। दुर्लभ मानुष देह कौ, लालमती लाहौ लियौ॥ १६६॥ भक्त-परत्व कविजन करत विचार, बड़ौ कोउ ताहि भनिज्‍जै। कोउ कह अवनी बड़ी, जगत आधार फनिज्‍जै॥ सो धारी सिर शेष, शेष शिव भूषन कीनौ। शिव आसन कैलास, भुजा भरी रावन लीनौ॥ रावन जीत्यौ बालि, बालि राघो इक सायक दँड़े। ''अगर'' कहैं त्रैलोक में, हरि उर धरें तेई बड़ै॥ २००॥ हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥ नेह परसपर अघट, निबहि चारों जुग आयौ। अनुचर कौ उत्कर्ष, स्याम अपने मुख गायौ॥ ओत-प्रोत अनुराग, प्रीति सबही जग जानें। पुर प्रवेश रघुवीर, भृत्य कीरति जु बखानैं॥ ''अगर'' अनुग गुन बरनते, सीतापति नित होयँ बस। हरि सुजस प्रीति हरिदास कैं, त्यौ भावै हरिदास जस॥२०१॥ सन्त-उत्कर्ष उत्कर्ष सुनत सन्तनि कौं, अचरज कोऊ जिनि करौ॥

१७६) (श्री भक्तमाल दुर्वासा प्रति स्याम, दास बसता हरि भाषौ। ध्रुव गज पुनि, प्रह्लाद राम शबरी फल साखी॥ राजसूय जदुनाथ, चरण धोय जूठ उठाई। पाण्डव विपति निवारि, दियौ विष विषया पाई॥ कलि विशेष परचौ प्रगट, आस्तिक ह्वैकै चित धरौ। उत्कर्ष सुनत सन्तनि कौं अचरज कोऊ जिनि करौ॥२०२॥ • अन्तिम मंगलाचरण = प्रार्थना = — दोहा — पादप पीड़हिं सींचते, पावै अँग-अँग पोष। पूरबजा जयौं बरनते, सब मानियो सन्तोष॥२०३॥ भक्त जिते भू-लोक में, कथै कौन पै जायँ। समुद्र पान श्रद्धा करै, कहँ चिरि पेट समायँ॥२०४॥ श्रीमूरति सब वैष्णव, (लघु) दीरघ गुणनि अगाध। आगे पीछे बरनते, जिनि मानौ अपराध॥२०५॥ फल की शोभा लाभ तरू, तरू शोभा फल होय। गुरु शिष्य की कीर्ति में, अचरज नाहीं कोय॥२०६॥ चारि जुगन में भगत जे, तिनके पद की धूरि। सर्वसु सिर धरि राखिहौं, मेरी जीवन मूरि॥२०७॥

कथन श्रवण की महिमा) (१७७ कथन-श्रवण की महिमा जग कीरति मंगल उदै, तीनों ताप नसायँ। हरिजन को गुण बरनते, हरि हृदि अटल बसायँ ॥२०८॥ हरिजन को गुण बरनते, जो करै असूया आय। इहाँ उदर बाढ़ै विथा, औ परलोक नसाय ॥२०९॥ जौं हरि प्राप्ति की आस है, तौ हरिजन गुन गाय। नतरू सुकृत भुजे बीज ज्यौं, जनम-जनम पछिताय ॥२१०॥ भक्तदाम संग्रह करै, कथन स्रवन अनुमोद। सो प्रभु प्यारौ पुत्र ज्यौं, बैठै हरि की गोद ॥२११॥ अच्युतकुल जस बेर यक, जाकी मति अनुरागि। उनकी भक्ति भजन को, निहचैं होय विभागि ॥२१२॥ भक्तदाम जिन-जिन कथौ, तिनकी जूठनि पाय। मों मतिसार अक्षर द्वै, कीनों सिलौ बनाय ॥२१३॥ काहू के बल जोग जज्ञ, कुल करनी की आस। भक्तनाम माला "अगर", उर (बसौ) नारायणदास ॥२१४॥ ।। इति श्रीनाभाजी कृत मूल-भक्तमाल सम्पूर्ण ।। •

१७८) (श्री भक्तमाल (टीकाकर्त्ता-श्रीप्रियादासजी अपने श्रीगुरुदेवजी का वर्णन करते हैं) रसिकाई कविताई, जाहि दीनी तिनि पाई, भई सरसाई हिये, नव-नव चाय हैं। उर रंगभवन में, राधिकारवन बसैं, लसैं ज्यौं मुकुर मध्य, प्रतिबिम्ब भाय हैं॥ रसिक समाज में, विराज रसराज कहैं, चहैं मुख सब फूलैं, सुख समुदाय हैं। जन मन हरि लाल, मनोहर नांव पायो, उनहूँ को मन हरि लीनौ, यातो राय हैं॥६३०॥ इनहीं के दास-दास-दास प्रियादास जानौं, तिन लै बखानौं, मानौं टीका सुखदाई है। गोवर्द्धननाथ जू कें, हाथ मन पऱ्यौ जाको, कर्यौ वास वृन्दावन, लीला मिलि गाई है॥ मति उनमान कह्यौ, लह्यौ मुख सन्तनि के, अन्त कौन पावै, जोई गावै हिय आई है। घट बढ़ जानि, अपराध मेरौ क्षमा कीजै, साधु गुणग्राही, यह मानि मैं सुनाई है॥६३१॥ कीनी भक्तमाल, सुरसाल नाभा स्वामी जू ने तरे, जीव जाल, जग जन मन मोहनी। भक्तिरसाबोधिनी सो, टीका मति सोधिनी है, बाँचत कहत अर्थ, लागै अति सोहनी॥ जोपै प्रेम लक्षना की, चाह अवगाहि याहि, मिटै उर दाह, नेकु नैननि हूँ जोहनी। टीका अरु मूल नाम, भूल जात सुनै जब, रसिक अनन्य मुख, होत विश्वमोहनी॥६३२॥ टीका का उपसंहार नाभा जू कौ अभिलाष, पूरन लै कियौ मैं तौ, ताकी साखी प्रथम सुनाई, नीके गाइकै। भक्ति विसवास जाके, ताही कौं प्रकास कीजै, भीजै रंग हियो लीजै, सन्तनि लड़ाइकै॥ सम्वत् प्रसिद्ध दस, सात सत उन्हत्तरं, फालगुन मास वदी, सप्तमी बिताइकै। “नारायणदास” सुखरासि भक्तमाल लैकै, “प्रियादास” दास उर, बसौ रहौ छाइकै॥६३३॥ टीकाकार की विज्ञप्ति अगिनि जरावौ लैकै जल में बुड़ावौ, भावे सूली पै चढ़ावौ, घोरि गरल पियायबी। बीछू कटवावौ, कोटि साँप लपटावौ, हाथी आगे डरवावौ, ईति भीति उपजायबी॥ सिंह पै खवावौ, चाहौ भूमि गड़वावौ, तीखी अनी विंधवावौ, मोहिं दुख नही पायबी। ब्रजजन प्रान, कान्ह बात यह कान करौ, भक्त सौं विमुख ताको, मुख न दिखायबी॥६३४॥ मास परायण तीस विश्राम नवाह परायण नवमां विश्राम सप्ताह परायण सप्त विश्राम ।। श्रीप्रियादासजी कृत भक्तिरसबोधिनी टीका समाप्त ।।

छन्द-प्रमाणिका •═════नमामि भक्तमाल को═════• पढ़ै जो आदि अन्त लौ बढ़ै जो पर्म तन्त लौं। दहैं अनन्त साल को नमामि भक्तमाल को।। १।। कथा करै जो याहि की व्यथा रहै न ताहि की। मिलै सो रामलाल को नमामि भक्तमाल को।। २।। प्रकार नौ कि भक्ति जो सो अंग होत शक्ति सौं। कहै गिरा रसाल को नमामि भक्तमाल को।। ३।। गहै अनन्य भाव है लहै सुभक्ति भाव है। यही प्रमाण भाल को नमामि भक्तमाल को।। ४।। अभक्त भक्ति को लहै न भूलि मुक्ति को चहै। गनै सो तुच्छ काल को नमामि भक्तमाल को।। ५।। करैं जो पाठ प्रात में सरै सुकाज गात में। हरैहि कर्मजाल को नमामि भक्तमाल को।। ६।। मिलाय दुग्ध तक्र ते जु होत सर्पि चक्र ते। तथा सुबुद्धि बाल को नमामि भक्तमाल को।। ७।। बहूपमा कहौं कहा कहे न पार को लहा। बखान सूर्य ख्याल को नमामि भक्तमाल को।। ८।। •═════ श्रीनाभाजी की प्रार्थना ═════• बातन ही हौ पतितपावन। मोते काम परे जानहुगे बिन रन सूर कहावन।। सतयुग त्रेता द्वापर हू के पतितन को गति आपी। उन्हे हमें बहुतै अन्तर है हम कलियुग के पापी।। कोउ टाँक द्वै टाँक पौसेरा बड़ी बड़ाई सेर। हौं पूरन पतिताई ऐसो ज्यौं पाषाननि मेर।। है दिन मनि खद्योत आन खल अविद्या को जु उजागर। गोपद पावन के न सरवरै हौं दुरमति जल सागर।। पतितपावन है विरद् तिहारो सोइ करौ परमान। पाहन नाव पार करौ "नाभा" के हरि पकरौ कान।। •═══•

॥श्रीभक्तमालजी की आरती॥ इस धन्य नाभा भारती की, आरती आरती हरै। यह भक्त भगवत् की कथा, सब विश्व का मंगल करै॥ नर जाति जब माया विवश, अज्ञान तम में पग गई। जन भारती आभा तभी, जग जग गई जग मग गई॥ अज्ञान माया मोह तम की, कालिमा कलई धुली। सप्रेम समता सत्य सुख शुचि, कंज कलिकायें खिलीं॥ उल्लूक खल कलिमल सकल, उड़गन प्रभाहत हो गये। तब सब पथिक सुन्दर सुखद, हरिभक्ति पथ को पा गये॥ इस भक्त माला के सकल, हरि भक्तजन दाया करो। सच्ची अहिंसा भक्तिमय, विज्ञान दै माया हरो॥