श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
६६) (श्री भक्तमाल निकसी झमकि द्वार, हंस, निहारि सब, कौन भाग जागे, भेद नहीं मेरे नाम कौ। मुहरनि पात्र भरि, लै महन्त आगे धर्यो, ढर्यो दृग नीर कही भोग करौ स्याम कौ।।२५०।। पूछी तुम कौन? काके भौन में जनम लियो? कियो सुनि मौन महाचिन्ता चित्त धरी है। खोलिकै निशंक कहौ, शंका जनि आनो मन, कहि बारमुखी, ऐपै पाँय आय परी है।। भरो है भण्डार धन, करो अंगीकार अजू ! करिये विचार जोपे, तोपैं यह मरी है। एक है उपाय, हाथ रंगनाथ जू को अहो, कीजिये मुकुट जामें, जाति गति हरी है।।२५१।। विप्रहू न छुवें जाको, रंगनाथ कैसे लेत? देत हम हाथ तोकौं, रहें इहाँ कीजिये। कियोई बनाय सब, घर कौ लगाय धन, बनि ठनि चली, थार मधि धरि लीजिये।। ऐसें आज्ञा पाइकै, निशंक गई मन्दिर में, फिरी यों सशंक, धिक् तियाधर्म भीजिये। बोले आप याको ल्याय, आप पहिराय जाय, दियो पहिराय, नयो सीस मति रीझियै।।२५२।। ब्राह्मण-दम्पत्ति और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।। बीच दिये रघुनाथ, भक्त संग ठगिया लागे। निर्जन वन में जाय, दुष्ट कर्म कियो अभागे।। बीच दियो सो कहाँ? राम ! कहि नारि पुकारी। आये सारंगपाणि, शोकसागर ते तारी।। दुष्ट किये निर्जीव सब, दास प्राण संज्ञा धरी। और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।५५।। विप्र हरिभक्त करि गौनो चल्यो तिया संग, जाके दूनौ रंग, ताकी बात लै जनाइयै। मग ठग मिले, द्विज पूछैं अहो ! कहाँ जात? जहाँ तुम जात, यामें मन न पत्याइयै।। पन्थ को छुटाय चाहैं, वन में लिवाय जायँ, कहैं अति सूधो पैंड़ो, उर में न आइयै। बोले बीच राम, तऊ हिये नेकु धकधकी, कहै वह भाम, श्याम नाम कहाँ पाइयै।।२५३।। चले लागि संग, अब रंग कै कुरंग करौ, तिया पर रीझे, भक्ति साँची इन जानी है। गये वन मध्य, ठग लोभ लगि मार्यो विप्र, छिप्र लै कै चले, बधू अति बिलखानी है।। देखै फिरि-फिरि पाछैं, कहैं कहा देखै? मार्यो तबतौ उचार्यौ देखौं वाही बीच प्रानी है। आये राम प्यारे, सब दुष्ट मारि डारे, साधु प्रान दै उवारे, हित रीति यों बखानी है।।२५४।। मास परायण ग्यारहवाँ विश्राम
अन्तर्निष्ठ राजा) (६७ भेषनिष्ठ एक राजा एक भूप भागौत की, कथा सुनत हरि होय रति।। तिलक दाम धरि कोइ, ताहि गुरु गोविन्द जानै। षट्दर्शनी अभाव, सर्वथा घट करि मानै॥ भाँड़ भक्त कौ भेष, हाँसि हित, भँड़कुट ल्याये। नरपति कै दृढ़ नेम, ताहि ये पाँव धुवाये॥ भाँड़ भेष गाढ़ो गह्यो, दरस परस उपजी भगति। एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति।। ५६।। राजा भक्तराज, डोम, भाँड़ कौ न काज होय भोय गई, याके धन हरी कौ न दीजियै। आये भेष धारि, लै पुजाये, नाचैं दैकेँ तारि, नृपति निहारि कही यों निहाल कीजियै।। भोजन कराये, भरि मुहरनि थार ल्याये, आगे धरि विनय करी, अजू यह लीजियै। भई भक्तिरासि बोले, आवै बास भावै नाहिं, बाहिं गहि रहे, कैसैं चले मति भीजियै।। २५५।। अन्तर्निष्ठ राजा अन्तरनिष्ठ नृपाल इक, परम धरम, नाहिन धुजी।। हरि सुमिरण हरि ध्यान, आन काहू न जनावै। अलग न इहि विधि रहै, अँगना मरम न पावै।। निद्रावश सो भूप, वदन ते नाम उच्चार्यो। रानी पति पर रीझि, बहुत वसु ता पर वार्यो।। ऋषिराज सोचि कह्यो नारि सौं, आज भक्ति मेरी कुजी। अन्तरनिष्ठ नृपाल इक परम धरम नाहिन धुजी।। ५७।। तिया हरिभक्त कहै, पति पै न भक्त पायौँ ! रहै मुरझायो मन, सोच बढ़यो भारी है। मरम न जान्यो, निसि सोवत पिछान्यो भाव,-विरह प्रभाव नाम निकस्यौ, विहारी है।। सुनत ही रानी, प्रेमसागर सभानी, भोर सम्पत्ति लुटाई मानो, नृपति जियारी है। देखि उत्साह भूप पूछ्यो सो निवाह कह्यो रह्यो तन ठौर नाम जीव यों विचारी है।। २५६।।
६८) (श्री भक्तमाल देखि तन त्याग पति, भई और गति याकी, ऐसो रतिवान् मैं न भेद कछू पायो है। भयो दुख भारी, सुधि-बुधि सब तब टारी, नेकु न विचारी, भावरासि हियो छायो है।। निसिदिन ध्यान तजे, विरह प्रबल प्रान, भक्ति रस खान, रूप कापै जात गायो है। जाके यह होय, सोई जानै रस भोय सब, डारै मति खोय, यामें प्रगट दिखायो है।। २५७ ।। श्री गुरुनिष्ठ भक्त गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। अनुचर आज्ञा माँगि, कह्यो कारज कौं जैहों। आचारज इक बात, तोहिं आये तें कहिहौं ।। स्वामी रह्यो समाय, दास दरसन कौं आयो। गुरु की गिरा विश्वास, फेरि शव घर में ल्यायो ।। शिषपन साँचो करन कौं, विभु सबै सुनत सोई कह्यो। गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। ५८ ।। बड़ो गुरुनिष्ठ, कछु घटी साधु, इष्ट जानै, स्वामी, सन्त पूज्य मानैं कैसैं समझाइयै। नित्यहिं विचारे, पुनि टारे, पै उचारे नाहिं, चल्यो जब रामत कौं, कही फिरि आइयै ।। सपथ दिवाई न जराइवे कौं दियो तन, ल्यायो यों फिराइ वही बात जू जनाइयै। साँचो भाव जानि, प्रान आये सो बखान कियो, करो भक्त सेवा, करी वर्ष लौं दिखाइये ।। २५८ ।। श्रीरैदासजी सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। सदाचार श्रुति शास्त्र, वचन अविरुद्ध उचार्यौ। नीर खीर विवरण, परम हंसनि उर धार्यौ ।। भगवत् कृपा प्रसाद, परमगति इहि तन पाई। राजसिंहासन बैठि, ज्ञाति परतीति दिखाई ।। वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज वन्दहिं जासु की। सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। ५६ ।।
श्रीरैदासजी) (६६ रामानन्द जू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक, गहे वृत्ति छूटकी की कहे तासौं बानिये। करो अंगीकार सीधो कहि दस बीस बार, बरषे प्रबल धार तामें वापै आनिये।। भोग कौं लगावैं प्रभु ध्यान नहिं आवैं, अरे कैसें करि ल्यावैं जाइ पूछि नीच मानिये। दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि, कुल में उतारी देह सोई याकों जानिये।।२५९।। माता दूध प्यावे याकों छुयोऊ न भावे सुधि, आवे सब पाछिलि सो सेवा को प्रताप है। भई नभ वानी रामानन्द मन जानी बड़ो, दण्ड दियो मानी वेगि आये चले आप है।। दुखी माता-पिता देखि धाय लपटाय पाँय, कीजिये उपाय कियो शिष्य गयो पाप है। स्तनपान कियो जियो लियो उन्हें ईश जानि, निपट अजानि फेरि भूले भयो ताप है।।२६०।। बड़ेई रैदास हरिदासनि सौं प्रीति बढ़ी, पिता न सुहाई दई ठौर पिछवारहीं। हुतो धन माल कन दियो हू न हाल तिया, पति सुख जाल अहो! किये जब न्यारहीं।। गाँठैं पगदासी क हूँ बात न प्रकासी ल्यावैं, खाल करें जूती साधु-सन्त कौं सँभारही। डारी एक छानि कियो सेवा को अस्थान रहे, चौड़े आप जानि बाँटि पावै यहि धारहीं।।२६१।। सहे अति कष्ट अंग हिये सुखसील रंग, आये हरिप्यारे लियो भक्त भेष धारिकैं। कियो बहु मान खान-पान सो प्रसन्न ह्वै कै दीनों कह्यो पारस हैं राखियो सँभारिकै।। मेरे धन राम कछु पाथर न सरै काम, दाम मैं न चाहौं, चाहौं डारौं तन वारिकैं। राँपी एक सोनों कियो दियो करि कृपा राखो, राखो यहु छानि माँझ लैहौं जु निकारिकैं।।२६२।। आये फिरि श्याम मास तेरह वितीत भये प्रीति करि बोले 'कहो पारस की रीति कौं'। वाही ठौर लीजै मेरो मन न पतीजै अब, चाहौ सोई कीजै मैं तो पावत हौं भीति कौं।। लैंके उठि गये नये कौतुक सो सुनो पावैं सेवत मुहर पाँच नित ही प्रतीति कौं। सेवा हू करत डर लाग्यो निसि कह्यो हरि, छोड़ो अर आपनी ओ राखो मेरी जीतिकौं।।२६३।। मानि लई बात नई ठौर लै बनाय चाय, सन्तनि बसाय हरि मन्दिर चिनायो है। विविध वितान तान गनौँ जो प्रमान होइ, भोय गई भक्तिपुरी जग जस गायो है।। दरसन आवैं लोग नाना विधि रागभोग, रोग भयो विप्रनि कौं तन सब छायो है। बड़ेई खिलारी वे रहे हैं छान डारि करी, घर पै अँटारी फेरि द्विजन सिखायो है।। २६४।। प्रीति रसरासि सौं रैदास हरि सेवत हैं, घर में दुराय लोक रंजनादि टारी है। प्रेरि दिये ह्रदै जाय द्विजानि पुकारि करी, भरी सभा नृप आगे कह्यो मुख गारी है।। जन कौं बुलाय समझाय न्याय प्रभु सौंपि, कीनौ जग जस साधु लीला मनुहारी है। जिते प्रतिकूल मैं तो माने अनुकूल, 'यातें सन्तनि प्रभाव मनि कोठरी की तारी है'।।२६५।।
७०) (श्री भक्तमाल बसत चित्तौर माँझ रानी एक झाली नाम, नाम बिन कान खाली आनि शिष्य भई है। संगहु तैं विप्र सुनि छिप्र तन आँच लागी, भागी मति नृप आगे भीर सब गई है।। वैसेहिं सिंहासन पै आयकै विराजे प्रभु, पढ़े वेद वानी पै न आये यह नई है। पतितपावन नाम कीजिये प्रगट आजु, गायो पद गोद आय बैठे भक्ति लई है।। २६६।। गई घर झाली पुनि बोलिकै पठाये 'अहो! जैसे प्रतिपाली अब तैसें प्रतिपारिये'। आपुहू पधारे उन बहु धन पट वारे विप्र सुनि पाँव धारे सीधौ दै निवारिये।। करिकै रसोई द्विज भोजन करन बैठे द्वै-द्वै मधि एक यों रैदास कौं निहारिये। देखि भई आँखै दीन भाषैं शिष्य भये लाखैं स्वर्ण को जनेऊ काढ़्यो त्वचा कीनी न्यारिये।।२६७।। श्रीकबीरजी कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम करि गायो। जोग जग्य व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखायो।। हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी शबदी साखी। पक्षपात नहिं वचन सबही के हित की भाखी।। आरूढ़ दसा ह्वै जगत् पर मुखदेखी नाहिन भनी। कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। ६०।। अति ही गम्भीर मति सरस कबीर हियो, लियो भक्तिभाव जाति-पाँति सब टारियै। भई नभ वानी देह तिलक रमानी करौ, करौ गुरु रामानन्द गरैं माल धारियै।। देखें नहिं मुख मेरो मानिकैं मलेछ मोकौं जात न्हान गंगा कही मग तन डारियै। रजनी के शेष में आवेस सौं चलत आप परै पग राम कहै मन्त्र सो विचारिये।। २६८।। कीनी वही बात माला-तिलक बनाय गात मानि उतपात मात शोर कियो भारियै। पहुँची पुकार रामानन्द जू कैं पास आनि कही कोऊ पूछे तुम नाम लै उचारिये। ल्यावौ जू पकरि वाको कब हम शिष्य कियो? ल्याये करि परदा में पूछी कहि डारिये। राम-नाम मन्त्र यही लिख्यो सब तन्त्रनि में खोलि पट मिले साँचौ मत उर धारियै।। २६६।। बुनैनं तानों-बानों हिये राम मँडरानौं कहि कैसे कै बखानौं वह रीति कछु न्यारिये। उतरनोई करैं जामें तन निरवाह होय भोय गई औरै बात भक्ति लागी प्यारियै।।
३. कृष्ण-भक्त एवं अष्टछाप संत (सूरदास, मीराबाई, रसखान, हित हरिवंश)
श्रीकबीरजी) (७१ ठाढ़े मण्डी माँझ पट बेचन लै जन कोऊ, आयो मोकों देहु देह मेरी है उघारियै। लग्यौ देन आधौ फारि आधे सौं न काम होत, दियो सब लियौ जोपै यहै उर धारियै॥२७०॥ तिया सुत मात मग देखें भूखे आवैं कब? दबि रहे हाटनि में ल्यावैं कहा धाम कौं। साँचो भक्तिभाव जानि निपट सुजान वे तौ, कृपा के निधान गृह सोच पर्यो श्याम कौं॥ बालद लै धाये दिन तीनि यों बिताये जब, आये घर डारि दई, दई हौ आराम कौं। माता करै शोर कोऊ हाकिम मरोरि बाँधै, डारौ बिन जानें सुत लेत नहीं दाम कौं॥२७१॥ गये जन दोय चार ढूँढ़िकै लिवाय ल्याये, आये घर सुनी बात जानी प्रभु पीर कौं। रहे सुख पाय कृपा करी रघुराय दई, छिन में लुटाय सब बोलि भक्त भीर कौं॥ दियौ छोड़ि तानौं-बानौ सुख सरसानौं हिये, किये रोष धाये सुनि विप्र तजि धीर कौं। क्यों रे तूं जुलाहे ! धन पाये न बुलाये हमें? शूद्रनि कौं दियो जावौ कहैं यों कबीर कौं॥२७२॥ क्यों जू उठि जाऊँ? कछु चोरी धन ल्याऊँ नित, हरिगुन गाऊँ कोऊ राह मैं न मारी है। उनकौं लै मान कियो याही में अमान भयौ, दयो जोपै जाय हमें तौही तो जियारी है॥ ‘घर में तौ नाहीं मण्डी जाहिं तुम रहौ बैठें’, नीठिकै छुटायौ पैडौ छिपे ब्याधि टारी है। आये प्रभु आप द्रव्य ल्याये समाधान कियो, लियो सुख होय भक्त कीरति उजारी है॥२७३॥ ब्राह्मन कौ रूप धरि आये छिपि बैठे जहाँ, ‘काहे कौं मरत भौन जावौ जू कबीर के। कोऊ जाय द्वार ताहि देत है अढ़ाई सेर, बेर जिनि लावो चले जावौ यों बहीर के’॥ आये घर माँझ देखि निपट मगन भये, नये-नये कौतुक ये कैसें रहै धीर के। वारमुखी लई संग मानौ वाही रंग रँगे, जानौ यह बात करी डर अति भीर के॥२७४॥ सन्त देखि डरे सुख भयौई असन्तनि कें, तब तौ विचार मन माँझ और आयो है। बैठी नृप सभा जहाँ गये पै न मान कियौ, कियौ एक चोज उठि जल ढरकायो है॥ राजा जिय सोच पर्यो कर्यो कहा? कह्यो तब, जगन्नाथ पण्डा पाँव जरत बचायो है। सुनि अचरज भरे नृप ने पठाये नर ल्याये सुधि कही ‘अजू साँच ही सुनायो है’॥२७५॥ कही राजा रानी सौं ‘जु बात वह साँची भई, आँच लागी हिये अब कहो कहा कीजियै?’। ‘चले ही बनत चले’ सीस तृण बोझ भारी, गरे सो कुल्हारी बाँधि तिया संग भीजियै॥ निकसे बजार ह्वैकै डारि दई लोकलाज, कियौ मैं अकाज छिन-छिन तन छीजियै। दूर ते कबीर देखि ह्वै गये अधीर महा, आये उठि आगे कह्यौ डारि मति रीझियै॥२७६॥ देखिकै प्रभाव फेरि उपज्यूँ अभाव द्विज, आयौ पादसाह सो सिकन्दर सुनावै है। विमुख समूह संग माता हूँ मिलाय लई, जायकै पुकारे ‘जू दुखायौ सब गाँव है’॥
७२) (श्री भक्तमाल ल्यावौ रे ! पकरि वाको देखौं ये मकर कैसो, अकर मिटाऊँ गाढ़े जकर तनाव है। आनि ठाढ़े किये काजी कहत 'सलाम करौ', जानै न सलाम जानै राम गाढ़े पाँव है।। २७७ ।। बाँधिकै जंजीर गंगा नीर माँझ वोरि दिये, जिये तीर ठाढ़े कहै 'जन्त्र-मन्त्र आवंही'। लकरीन माँझ डारि अगिनि प्रजारि दई, नई मानो भई देह कंचन लजावही।। विफल उपाय भये तऊ नहीं आय नये, तब मतवारो हाथी आनिकै झुकावही। आवत न ढिंग औ चिघारि हारि भाजि जाय, आप आगे सिंह रूप बैठे सो भगावहीँ।। २७८ ।। देख्यो बादसाह भाव कूदि परे गहे पाँव, देखि करामात मात भये सब लोग हैं। 'प्रभु पै बचाय लीजै हमें न गजब कीजै, दीजै जोई चाहो गाँव देश नाना भोग हैं'। 'चाहैं एक राम जाकौं जपैं आठो याम और, दाम सौं न काम जामें भरे कोटि रोग हैं'। आये घर जीति साधु मिले करि प्रीति जिन्हें, हरि की प्रतीति वेई गायवे के जोग है।। २७९ ।। होय के खिसाने द्विज निज चारि विप्रन के, मूँडनि मुड़ायो भेष सुन्दर बनाये है। दूर-दूर गाँवनि में नावनि को पूँछि-पूँछि, नाम लै कबीर जू कौ झूठैं न्योति आये है। आये सब साधु सुनि एतो दुरि गये कहूँ, चहुँ दिसि सन्तनि के फिरैं हरि धाये हैं। उनहीं को रूप धरि न्यारी-न्यारी ठौर बैठे, एकु मिलि गये नीके पोषिकै रिझाये हैं।। २८० ।। आई अपछरा छारिवे के लिये भेष किये, हिये देखि गाढ़ो फिरि गई नहीं लागी है। चतुर्भुजरूप प्रभु आनिकैं प्रगट कियो, लियो फल नैननि कौ बड़ौ बड़भागी है।। सीस धरै हाथ तन साथ मेरे धाम आवौ, गावौ गुन रहौ जौलौं तेरी मति पागी हैं। मगह में जाय भक्तिभाव को दिखाय बहु, फूलनि मँगाय पौढ़ि मिल्यौ हरि रागी है।। २८१।। मास परायण बाहरवाँ विश्राम श्रीपीपाजी की कथा पीपा प्रताप जग वासना, नाहर कौं उपदेश दियौ ।। प्रथम भवानी भक्त, मुक्ति माँगन कौं धायौ। सत्य कह्यो तिहिं शक्ति, सुदृढ़ हरिशरण बतायौ ।। श्रीरामानन्द पद पाइ, भयौ अति भक्ति की सीवाँ । गुण असंख्य निर्मोल, सन्त धरि राखत ग्रीवाँ ।। परसि प्रणाली सरस भई, सकल विश्व मंगल कियौ । पीपा प्रताप जग वासना नाहर कौं उपदेश दियौ ।। ६१ ।।
गागरौनगढ़ बढ़ पीपा नाम राजा भयो, लयो पन देवी सेवा रंग चढ़्यो भारियै। आये पुर साधु सीधौ दियौ जोई सोई लियो, कियो मन माँझ प्रभु ! बुद्धि फेरि डारियै ।। सोयो निसि रोयो देखि सपनो बेहाल अति, प्रेत विकराल देह धरिकै पछारियै। अब न सुहाय कछू वहू पाँय परि गई, नई रीति भई वाहि भक्ति लागी प्यारियै ।। २८२ ।। पूछ्यो हरि पाइवे कौ मग जब देवी कही, 'सही रामानन्द गुरु करि प्रभु पाइयै'। लोग जानै बौरौ भयौ गयौ यह काशीपुरी, फुरी मति अति आये जहाँ हरि गाइयै ।। द्वार में न जान देत आज्ञा ईश लेत कही, राजा सौं न हेत सुनि सबही लुटाइयै। कह्यो 'कुँवा गिरौ' चले गिरन प्रसन्न हिये, जिये सुख पायौ ल्याये दरस दिखाइयै ।। २८३ ।। किये शिष्य कृपा करी धरी हरिभक्ति हृदै, कही 'अब जावौ गृह सेवा साधु कीजियै। बितये बरष जब सरस टहल जानि, सन्त सुख मानि आवैं घर मधि लीजियै' ।। आये आज्ञा पाय धाम कीन्हीं अभिराम रीति, प्रीति कौ न पारावार चीठी लिखि दीजियै। 'हूजिये कृपाल वही बात प्रतिपाल करौं', चले जुग बीस जन संग मति रीझियै ।। २८४ ।। कबीर रैदास आदि दास सब संग लिये आये पुर पास पीपा पालकी लै आयो है। करी साष्टांग न्यारी-न्यारी बिनै साधुन को, धन को लुटाय सो समाज पधरायौ है ।। जैसी कीन्हीं सेवा बहु मेवा नाना राग भोग, वानी के न जोग भाग कापै जात गायौ है। जानी भक्ति रीति 'घर रहौ कै अतीत होहु', करिकै प्रतीति गुरु पग लगि धायौ है ।। २८५ ।। लागी संग रानी दस दोय कही मानी नहीं, कष्ट को बतावैं डरपावैं मन लावहीं। कामरीन फारि मधि मेखला पहिरि लेवो, देवो डारि आभरन जोपै नहीं भावहीं ।। काहू पै न होय दियो रोय भोय भक्ति आई छोटी नाम सीता गरैं डारी न लजावहीं। 'यहू दूर डारौ करौ तन को उघारौ' कियो, द्रव्यौ रामानन्द हियौ पीपा न सुहावहीं ।। २८६ ।। जोपै यापै कृपा करी दीजै काहू संग करि, मेरे नहीं रंग यामें कही बार-बार है। सौंह को दिवाय दई लई तब कर धरि, चले ढरि विप्र एक छोड़ै न विचार है ।। खायौ विष ज्यायौ पुनि फेरिकैं पठायौ सब, आयौ यों समाज द्वारावती सुखसार है। रहे कोऊ दिन आज्ञा माँगी इन रहिवे की, कूदे सिन्धु माँझ चाह उपजी अपार है ।। २८७ ।। आये आगे लैन आप दिये हैं पठाय जन, देखि द्वारावती कृष्ण मिले बहु भायकै। महल-महल माँझ चहल-पहल लखी, रहे दिन सात सुख सकै कौन गायकै ।। आज्ञा दई जाइवे की जाइवौ न चाहें हिये, पिये वह रूप 'देखौ मोहीं कौं जु जायकै'। भक्त बूड़ि गयो यह बड़ोई कलंक भयौ, मेटौ तम अंक शंक गही अकुलायकै ।। २८८ ।।
७४) (श्री भक्तमाल चले पहुँचायवे को प्रीति के अधीन आप, बिन जल मीन जैसे ऐसे फिरि आये है। देखि नई बात गात सूखे पट भीजे हिये, लिये पहिचानि आनि पग लपटाये है।। दई लैके छाप पाप जगत् के दूरि करौ, 'ढरौ कहूँ और' कहि सीता समझाये हैं। छूटेई मिलान वन में पठान भेंट भई, लई छिनि तिया कियौ चैन प्रभु धाये हैं।। २८६।। अभूँ लगि जाओ घर कैसे-कैसे आवै डर, बोली 'हरि ! जानियै न भाव पै न आयो है'। लेत हौं परीक्ष्छा मैं तो जानौं तेरी सिच्छा ऐपै, सुनि दृढ़ बात कान अति सुख पायो है।। चले मग दूसरे सु तामें एक सिंह रहै, आयौ बास लेत शिष्य कियो समझायो है। आये और गाँव शेषसाई प्रभु नांव रहै, करे बाँस हरे ढरे चीधर सुहायो है।। २९०।। दोऊ तिया पति देखें आये भागवत ऐपै, घर की कुगति रति साँची लै दिखाई है। लहँगा उतारि बेचि दियौ ताकौ सीधौ लियौ, 'करौ अजू! पाक' बधू कोठी में दुराई है।। करी लै रसोई सोई भोग लगि बैठे कह्यौ आवौ मिलि दोई कही पाछे सीथ भाई है। वाहू कौ बुलावौ ल्यावौ आनिकै जिमावौ, तब सीता गई ठौर जाइ नगन लखाई है।। २६१।। पूछैं 'कहो बात ये उघारे क्यों है गात', कही 'ऐसे ही बिहात साधुसेवा मन भाई है'। 'आवैं जब सन्त सुख होत है अनन्त तन, ढक्यौं कै उघारौ ? कहा चरचा चलाई है'। जानि गई रीति प्रीति देखी एक इनहीं में 'हमहूँ कहावैं ऐपै छटाहूँ न पाई है'। दियौ पट आधौ फारि गहि कै निकारि लई, भई सुख सैल पाछैं पीपा सौं सुनाई है।। २६२।। 'करैं वेश्याकर्म अब धर्म है हमारौ यही', कही जाय बैठी जहाँ नाजनि की ढेरी है। घिरि आये लोग जिन्हें नैननि कौ रोग, लखि दूर भयो शोक नेकु नीके हूँ न हेरी है।। कहैं तुम कौन ? 'बारमुखी नहीं भौना संग भरुवा सु गहैं मौन सुनि परी बेरी है। करी अन्नरासि आगे मुहर रुपैया पागे, पठै दई चीधर के तबही निबेरी है।। २६३।। आज्ञा माँँगि तोड़े आये कभूूँ भूखे कभूूँ घाये, औचक ही दाम पाये गयो हो स्नान को। मुहरनि भाँड़ो भूमि गाड़ो देखि छाँडि आयौं, कही निसि तिया बोली 'जावौ सर आन को'।। चोर चाहैं चोरी करैं ढरे सुनि वाही ओर, देखें जो उघारि साँप डारैं हतै प्रान को। ऐसे आय परीं गनी सात सत बीस भईं, तौ लै पाँच बाँट करै एक के प्रमान को।। २६४।। जोई आवै द्वार ताहि देत हैं अहार और, बोलिकै अनन्त सन्त भोजन करायो है। बीत दिन तीन धन खवाय प्याय छीन कियौ, लियो सुनि नाम नृप देखिवे को आयो है।। देखिकै प्रसन्न भयौ नयौ 'देवौ दीच्छा मोहि', दीच्छा है अतीत करैं आप सो सुहायो है। 'चाहो सोई करौं ह्वै कृपाल मोकौं ढरौ', 'अजू! आनि सम्पति औ रानी जाइ ल्यायो है'।।२६५।।
करिकै परीच्छा दई दीच्छा संग रानी दई, भई हमारी करौ परदा न सन्त सौं। दीयौ धन घोरा कछू राख्यो दै निहोरा भूप, मान तन छोरा बड़ौ मान्यौ जीव जन्त सौं।। सुनि जरि बरि गये भाई सेनसूरज के, ऊरज प्रताप कहा कहैं सीताकन्त सौं। आयौ बनिजारौ मोल लियौ चाहैं खेलनि कौं, दियौ बहकाय कहौ पीपा जू अनन्त सौं।।२६६।। बोल्यौ बनिजारौ 'दाम खोलि खैला दीजिये जू!' 'लीजिये जू!' आय गाँव चरन पठाये हैं। गये उठि पाछे बोलि सन्तनि महोच्छौ कियौ, आयौ वाही समैं कही लेहु मन भाये है।। दरसन करि हिये भक्तिभाव भर्यौ आनि, आनिकै वसन सब साधु पहिराये हैं। और दिन न्हान गये घोड़ा चढ़ि छोड़ि दियौ, लियौ बाँध्यौ दुष्टन ने आयौ मानौ ल्याये है।।२६७।। गये हे बुलाये आप पाछे घर सन्त आये, अन्न कछू नाहिं कहूँ जाय करि ल्याइयै। विषई बनिक एक देखिकै बुलाइ लई, दई सब सौज कही 'सही निसि आइयै'। भोजन करत माँझ पीपा जू पधारे, पूछी वारे तन प्रान जब कहिकै सुनाइयै। करिकै सिंगार सीता चली झुकि मेह आयौ, काँधे पै चढ़ायौ वपु बनिया रिझाइयै।।२६८।। हाट पै उतार दई द्वार आप बैठे रहे, चहे सूके पग माता! कैसे करि आई हौ?। स्वामी जू लिवाय ल्याये कहाँ हैं? निहारौ जाय, आय पाँय पर्यो डर्यो राखौ सुखदाई हौ।। मानौ जिन शंक काज कीजियै निशंक धन, दियौ बिन अंक जौपै लरैं मरैं भाई हौ। मर्यो लाज भार चाहै धसौं भूमि फार दृग, बहै नीर धार देखि दई दीच्छा पाई हौ।।२६९।। चलत-चलत बात नृपति श्रवन परी, भरी सभा विप्र कहैं बड़ी विपरीत है। भूप मन आई यह निपट घटाई होत, भक्ति सरसाई नहीं जानै घटी प्रीति है।। चले पीपा बोध दैन द्वार ही तैं सुधि दई, लई सुनि कही आवौं करौं सेवा रीति है। 'बड़ौ मूढ़ राजा मोजा गाँठै बैठ्यौ मोची घर', सुनि दौरि आयो रहे ठाढ़े कौन नीति है।।३००।। हुती घर माँझ बाँझ रानी एक रूपवती, माँगी 'वही ल्यावौ वेगि' चल्यौ सोच भारी है। डगमग पाँव धरै पीपा सिंह रूप करै, ठाढ़ौ देखि डरै इत आवै आप ख्वारी है।। जाय तौ विलाय गयौ तिया ढिंग सुत नयौ, नयो भूमि पर 'कला जानी न तिहारी है'। प्रगट्यौ सरूप निज खीजिकै प्रसंग कह्यौ, 'कहाँ वह रंग?' शिष्य भयो लाज टारी है।।३०१।। कियौ उपदेस नृप हृदै में प्रवेस कियौ, लियौ वही पन आप आये निज धाम है। बोल्यौ एक नाम साधु 'एक निसि देहु तिया', 'लेहु' कही भागौ संग भागी सीता बाम है।। प्रात भये चलैं नाहिं 'रैन ही की आज्ञा प्रभु', चल्यौ हारि आगे घर-घर देखो ग्राम है। आयौ वाही ठौर 'चलो माता! पहुँचाय आवौं', आय गहे पाँव भाव भयौ गयौ काम है।।३०२।।
७६) (श्री भक्तमाल विषई कुटिल चारि साधुभेष लियौ धारि, कीनी मनोहारि कही 'तिया निज दीजिये'। करिकै सिंगार सीता कोठे माँझ बैठीं जाय, चाहें मग आतुर ह्वै अजू! जाहु लीजिये॥ गये जब द्वार उठी नाहरी सुपारिवे कौं, फारैं नहीं वानौ जानि आय अति खीजियै। अपनौ विचारो हियो कियो भोग भावना कौ, मानि साँच भये शिष्य प्रभु मति धीजिये॥३०३॥ (१) गूजरी कौं धन दियौ (२) पियौ दही सन्तनि नैं, (३) ब्राह्मन को भक्त कियौ (४) देवी दी निकारिकै। (५) तेली कौं जिवायौ (६) भैंसि चोरनि पै फेरि ल्यायौ (७) गाड़ी भरि गेहूँ (८) तन पाँच ठौर जारिकै।। (६) कागद लै कोरो कर्यौ (१०) बनियाँ को शोक हर्यौ, (११) भर्यो घर त्यागि (१२) डारी हत्या हूँ उतारिकै। (१३) राजा कौं औसेर भई (१४) सन्त कौं जु विभौ दई, (१५) लई चीठी मानि गये श्रीरंग उदारिकै॥३०४॥ सप्ताह परायण तीसरा विश्राम (१) श्रीरंग के चेत धर्यौ (२) तिया हिय भाव भर्यौ, (३) ब्राह्मन को शोक हर्यो राजा पै पुजायकै। (४) चँदवा बुझाय लियौ (५) तेली को लै बैल दियौ, (६) दियौ पुनि घर माँझ भयौ सुख आयकै।। (७) बड़ोई अकाल पर्यौ जीव दुख दूर कर्यौ, पर्यौ भूमि गर्भ धन पायौ दै लुटायकै। (८) अति विस्तार लियौ कियौ है विचार, (६) यह सुनै एक बार फेरि भूलै नहीं गायकै॥३०४॥ मास परायण तेहरंवा विश्राम श्रीधनाजी धन्य धना के भजन को, बिनहीं बीज अंकुर भयौ॥ घर आये हरिदास, तिनहिं गोधूम खवाये। तात मात डर खेत, थोथ लांगूल चलाये॥ आस-पास कृषिकार, खेत की करत बड़ाई। भक्त भजे की रीति, प्रगट परतीति जु पाई॥ अचरज मानत जगत में, कहुँ निपुज्यौ कहुँवौ बयौ। धन्य धना के भजन को, बिनहिं बीज अंकुर भयौ॥ ६२॥ खेत की तौ बात कही प्रगट कवित्त माँझ, और एक सुनौ भई प्रथम जु रीति है। आयौ साधु विप्र धाम सेवा अभिराम करै, ठर्यौ ढिंग आय कही 'मोहूँ दीजैं प्रीति है'॥ पाथर लै दियौ अति सावधान कियौ छाती, माँझ लाय जियौ सेवै जैसी नेह नीति है। रोटी धरि आगे आँखि मूँदि लियौ परदा कै, छियौ नहीं टूक देखि भई बड़ी भीति है॥३०६॥
श्रीसेनजी) (७७ बार-बार पाँव परै अरै भूख-प्यास तजी, धरै हिये साँचौ भाव पाई प्रभु प्यारियै। छाक नित आवै नीके भोग कौ लगावै जोई, छोड़ैं सोई पावैं प्रीति रीति कछु न्यारियै।। जाकौ कोऊ खाय ताकी टहल बनाय, करै ल्यावत चराय गाय हरि उर धारियै। आयौ फिरि विप्र नेह खोजहूँ न पायौ कहूँ, सरसायौ बातै लै दिखायौ श्याम ज्यारियै।।३०७।। द्विज लखि गायनि में चायनि समाज नाहिं, भायनि की चोट दृग लागी नीर झरी है। जायकै भवन सीतारवन प्रसन्न करैं, बड़े भाग मानि प्रीति देखी जैसी करी है।। धना को दयाल ह्वै कै आज्ञा प्रभु दई ठरौ, करौ गुरु रामानन्द भक्ति मति हरी है। भये शिष्य जाय आप छाती सौं लगाय लिये, किये गृह काम सबै सुनी जैसी धरी है।।३०८।। श्रीसेनजी विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।। प्रभू दास के काज रूप नापित कौ कीनौ। छिप्र छुड़हरी गही, पानि दर्पन तँह लीनौ।। तादृश ह्वै तिहिं काल, भूप के तेल लगायौ। उलटि राव भयो शिष्य, प्रगट परचौ जब पायौ।। श्याम रहत सनमुख सदा ज्यौं बच्चा हित धेन के। विदित बात जग जानियै हरि भये सहायक सेन के।।६३।। बाँधौगढ़ वास हरि साधु सेवा आस लगी, पगी मति अति प्रभु परचौ दिखायौ है। करि नित्त नेम चल्यौ भूप कौ लगाऊँ तेल, भयौ मग मेल सन्त फिरि घर आयौ है।। टहल बनाय करी नृप की न शंक धरी, धरि उर श्याम जाय भूपति रिझायौ है। पाछे सेन गयौ पन्थ पूछै हिये रंग छायौ, भयौ अचरज राजा वचन सुनायौ है।।३०६।। फेरि कैसे आये? सुनि अति ही लजाये कही, 'सदन पधारे सन्त भई यों अबार है। आवन न पायौँ वाही सेवा अरुझायौं', राजा दौरि सिर नायौ देखि महिमा अपार है।। भीजि गयौ हियौ दास भाव दृढ़ लियौ पियौ, भक्तिरस शिष्य ह्वै कै जान्यौ सोई सार है। अबलौं हूँ प्रीति सुत नाती वही रीति चलैं, होय जौ प्रतीति प्रभु पावै निरधार है।।३१०।।
७८) (श्री भक्तमाल) श्रीसुखानन्दजी भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।। सुखसागर की छाप, राग गौरी रुचि न्यारी। पद रचना गुरु मन्त्र, मनौं आगम अनुहारी।। निसिदिन प्रेम प्रवाह, द्रवत भूधर ज्यौं निर्झर। हरिगुन कथा अगाध, भाल राजत लीला भर।। संत कंज पोषन विमल, अति पीयूष सरसी सरस। भक्ति दान भय हरन भुज, सुखानन्द पारस परस।। ६४ ।। श्रीसुरसुरानन्दजी महिमा महा प्रसाद की, सुरसुरानन्द साँची करी।। एक समै अध्वा चलत, बरा वाक् छल पाये। देखा-देखी शिष्य, तिनहुँ पाछैं ते खाये।। तिन पर स्वामी खिजे, वमन करि बिन विश्वासी। तिन तैसें परतच्छ, भूमि पर कीनी रासी।। सुरसुरी सुवर पुनि उद्गले, पुहुप रेनु तुलसी हरी। महिमा महा प्रसाद की सुरसुरानन्द साँची करी।। ६५।। श्रीसुरसुरीजी महासती सत ऊपमा, त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।। अति उदार दम्पति, त्यागि गृह वन को गमने। अचरज भयो तँह एक, सन्त सुनि जिन हो बिमने।। बैठे हुते एकान्त, आय असुरनि दुख दीयौ। सुमिरे सारँगपाणि, रूप नरहरि कौ कीयौ।। सुरसुरानन्द की घरनि कौ सत राख्यो नरसिंह जह्यौ। महासती सत ऊपमा त्यौं सत्त सुरसुरी कौ रह्यौ।। ६६।। नवाह परायण चतुर्थ विश्राम
श्रीतत्वाजी, श्रीजीवाजी) (७६ श्रीनरहरियानन्दजी निपट नरहरियानन्द कौ, करदाता दुर्गा भई॥ घर झर लकरी नाहिं, शक्ति कौ सदन उदारैं। शक्ति भक्त सौं बोलि, दिनहिं प्रति बरही डारैं॥ लगी परोसी हौंस, भवानी भैंसो मारैं। बदले की बेगारि, मूँड़ वाके सिर डारैं॥ भरत प्रसंग ज्यौं कालिका, लडू देखि तन में तई। निपट नरहरियानन्द कौ करदाता दुर्गा भई॥ ६७॥ श्रीपद्मनाभजी कबीर कृपा तें परमतत्त्व, पद्मनाभ परचौ लह्यौ॥ नाम महानिधि मन्त्र, नाम ही सेवा पूजा। जप तप तीरथ नाम, नाम बिन और न दूजा॥ नाम प्रीति नाम बैर, नाम कहि नामी बोलै। नाम अजामिल साखि, नाम बन्धन तें खोलै॥ नाम अधिक रघुनाथ तें, राम निकट हनुमत् कह्यौ। कबीर कृपा तें परमतत्त्व पद्मनाभ परचौ लह्यौ॥ ६८॥ काशीवासी साहु भयो कोढ़ी सो निवाह कैसे, परि गये कृमि चल्यौ बूड़िवे को भीर है। निकसे पद्म आय पूछि ढिंग जाय कही, गही देह खोलौ गुन न्हाय गंगा नीर है॥ राम-नाम कहै बेर तीन में नवीन होत, भयौई नवीन कियौ भक्त मति धीर है। गयौ गुरु पास तुम महिमा न जानी अहो ! नामाभास काम करै कही यों कबीर है॥ ३११॥ श्रीतत्वाजी, श्रीजीवाजी तत्वा जीवा दक्षिण देश, वंशोद्धर राजत विदित॥ भक्ति सुधा जल समुद्र, भये बेलावलि गाढ़ी। पूरवजा ज्यौं रीति, प्रीति उत्तरोत्तर बाढ़ी॥
८०) (श्री भक्तमाल रघुकुल सदृश सुभाव, श्रेष्ठ गुण सदा धर्मरत। सूर धीर ऊदार, दया पर दक्ष अनन्य व्रत॥ पद्मखण्ड पद्मा पद्धति, प्रफुलित कर सविता उदित। तत्त्वा जीवा दक्षिण देश, वंशोद्धर राजत विदित॥ ६६॥ तत्त्वा जीवा भाई उभै विप्र साधु सेवा पन, मन धरी बात तातैं शिष्य नहीं भये हैं। गाड्यौ एक ठूंठ द्वार होय अहो! हरी डार, सन्त चरनामृत को लै कै डारि दये हैं॥ जबही हरित देखैं ताकौं गुरु करि लेखैं, आये श्रीकबीर पूजी आस पाँव लये हैं। नीठ-नीठ नाम दियौ, दियौ परिचाय धाम, काम कोऊ होय जोपै आवौ कहि गये हैं॥ ३१२॥ कानाकानी भई द्विज जानी जाति गई पाँति, न्यारी करि दई कोऊ बेटी नहीं लेत है। चल्यो एक काशी जहाँ बसत कबीर धीर, जाय कही पीर जब पूछ्यौ कौन हेत है॥ दोऊ तुम भाई करौ आपु में सगाई होय, भक्ति सरसाई न घटाई चित चेत है। आय वहै करी परी ज्ञाति खरभरी कहैं, कहा उर धरी कछू मतिहूँ अचेत है॥ ३१३॥ 'करैं यही बात हमें और न सुहात' आये, सबै हा-हा खात यह छाँड़ि हठ दीजिये। पूछिवे कौं फेरि गये करौ ब्याह जोपै नये, दण्ड करि नाना भाँति भक्ति दृढ़ कीजिये॥ तब दई सुता लई पाँति में प्रसन्न ह्वै कै, पाँति हरि भक्तनि सौं सदा मति भीजिये। विमुख समूह देखि सबही बड़ाई करैं, धरैं हिय माँझ कहैं पन पर रीझिये॥ ३१४॥ www.malookpeeth.com श्रीमाधवदासजी बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै, जग को हित माधौ कियौ॥ पहिले वेद विभाग, कथित पुरान अष्टादस। भारतादि भागौत, मथित उद्धार्यौ हरि जस॥ अब सोधे सब ग्रन्थ, अर्थ भाषा विस्तार्यौ। लीला जै-जै जैति, गाय भवपार उतार्यौ॥ जगन्नाथ इष्ट वैराग्य सींव, करुणा रस भीज्यो हियौ। बिनै व्यास मनो प्रगट ह्वै जग को हित माधौ कियौ॥ ७०॥
श्रीमाधवदासजी) (८१ माधौदास द्विज निज तिया तन त्याग कियौ, लियौ इन जानि जग ऐसोई व्योहार है। सुत की बढ़नि जोग लियें नित चाहत हो, भई यह औरैं लै दिखाई करतार है।। ताते तजि दियौ गेह वेई अब पालैं देह, करै अभिमान सोई जानिये गँवार है। आये नीलगिरि धाम रहे गिरिसिन्धु तीर, अति मतिधीर भूख-प्यास न विचार है।। ३१५।। भये दिन तीन एतो भूख के अधीन, नाहिं रहें हरि लीन प्रभु सोच पर्यो भारियै। दियौ सैनभोग आप लक्ष्मी जू लै पधारीं, हाटक की थारी झनझन पाँव धारियै।। बैठे हैं कुटी में पीठ दिये हिये रूप रँगे, बीजुरी-सी कौंधि गई नीके न निहारियै। देखि सो प्रसाद बड़ौ मन अह्लाद भयौ, लयौ भाग मानि पात्र धर्योइ विचारियै।। ३१६।। खोलैं जो किवार थार देखियै न सोच पर्यो, कर्यो लै जतन ढूँढ़ि वाही ठौर पायौ है। ल्याये बाँधि मारी बेंत धारी जगन्नाथदेव, भेव जब जान्यौ पीठ चिह्न दरसायौ है।। कही पुनि आप मैं ही दियौ जब लियौ याने, माने अपराध पाँव गहिकै छिमायौ है। भई यों प्रसिद्ध बात कीरति न माँत कहूँ, सुनिकै लजात साधु शील यह गायौ है।। ३१७।। देखत सरूप सुधि तन की बिसरी जात, रहि जात मन्दिर में जानै नहीं कोई है। लग्यौ सीत गात सुनौ बात प्रभु काँपि उठे, दई सकलात आनि प्रीति हिये भोई है।। लागे जब बेगि-बेगि जाय परे सिन्धु तीर, चाहें जब नीर लिये ठाढ़े देहँ धोई है। करिकै विचार और निहारि कही जानी मैं तो, देत हौ अपार दुख ईशता लै खोई है।। ३१८।। 'कहा करौं अहो! मोपै रह्यो नहीं जात नेकु, मेटौ विथा गात' 'मोकौं विथा बहु भारी है'। रहै भाग शेष और तन में प्रवेस करै, ताते नहीं दूर करौं ईशता लै टारी है।। बहू बात साँच याकी गाँस एक और सुनौ, साधु को न हँसै कोऊ यह मैं विचारी है। देखत ही देखत में पीड़ा सो विलाय गई, नई-नई कथा कहि भक्ति बिसतारी है।। ३१९।। कीरति अभंग देखि भिक्षा कौ अरम्भ कियौ, दियौ काहू बाई पोता खीजत चलायकै। देवो गुन लियौ नीके जल सौं प्रछाल करि, करी दिव्य बाती दई दिये में बरायकै।। मन्दिर उँजारौ भयौ हिये को अन्ध्यारौ गयौ, गयो फेरि देखन कौं परी पाँय आयकै। ऐसे हैं दयाल दुख देत में निहाल करैं, करैं लै जे सेवा ताको सकै कौन गायकै।। ३२०।। पण्डित प्रबल दिग्गिवजै करि आयौ आय, वचन सुनायौ 'जू ! विचार मोसों कीजिये'। दई लिखि हारि काशी जायकै निहारि पत्र, भयौ अति खार लिखि जीति वाकी खीजियै।। फेरि मिलि माधौ जू कौं वैसे ही हरायौ एक, खर कौ मँगायौ कही 'चढ़ौ जब धीजियै'। बोल्यौ 'जूती बाँधो कान' गयो सुनि न्हान आन, जगन्नाथ जीते लै चढ़ायौ वाको रीझियै।। ३२१।।
८२) (श्री भक्तमाल ब्रज ही की लीला सब गावैं नीलाचल माँझ, मन भई चाह 'जाय नैननि निहारियै'। चले वृन्दावन मग लग एक गाँव जहाँ, बाई भक्त भोजन कौं ल्याई चाव भारियै।। बैठे ये प्रसाद लेत, लेत दृग भरि 'अहो ! कहो कहा बात दुख हिये को उघारियै'। 'साँवरौ कुँवर यह कौन को भुराय ल्याये? माय कैसें जीवै' सुनि मति लै बिसारियै ।। ३२२ ।। चले और गाँव जहाँ महाजन भक्त रहै, गहे मन माँझ आगे विनती हूँ करी है। गये वाके घर वह गयौ काहू और घर, भाय भरी तिया आनि पाँयन में परी है।। ऊपर महन्त कही 'अजू एक सन्त आये' 'इहाँ तौ समाई नाहिं' आई अरबरी है। कीजिये रसोई 'जोई सिद्ध सोई ल्यावो', दूध नीके कै पिवायो नाम माधौ आस भरी है।।३२३।। गये उठि पाछे भक्त आयो सो सुनायौ नाम सुनि अभिराम दौरे संग ही महन्त है। लिये जाय पाँय लपटाय सुखपाय मिले, झिले घर माँझ 'तिया धन्य तो सो कन्त है'। सन्तपति बोले 'मैं अनन्त अपराध किये ! जिये अब' कही 'सेवौ सीत मानि जन्त है'। आवत मिलाप होय यही राखौ बात गोय, आये वृन्दावन जहाँ सदाई बसन्त है।। ३२४।। देखि-देखि वृन्दावन मन में मगन भये, गये श्रीबिहारी जू के चना तहाँ पाये है। कहि रह्यो द्वारपाल नेकु में प्रसाद लाल, यमुना रसाल तट भोग कौं लगाये है।। नाना विधि पाक धरैं स्वामी आप ध्यान करें, बोले हरि भावैं नाहिं वेई लै खवाये है। पूछ्यो सो जनायौ ढूँढ़ि ल्यायौ आगे गायौ, सब तुम तौ उदार हास रस समझाये है।। ३२५ ।। गये ब्रज देखिवे कौं भाण्डीर में "खेम" रहै, निसि को दुराय खाय कृमि लै दिखाये हैं। लीला सुनिवे कौं हरियाने गाँव रहे, जाय गोबरहूँ पाथि पुनि नीलाचल धाये हैं।। घर हूँ को आये सुत सुखी सुनि माता वानी, मारग में स्वप्न दैकै बनिक मिलाये हैं। याही विधि नाना भाँति चरित अपार जानौ, जिते कछु जाने तिते गायकै सुनाये हैं।। ३२६ ।। मास परायण चौदह विश्राम श्रीरघुनाथदास गोसाँईजी (श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्यौं, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।। सीत लगत सकलात, विदित पुरुषोत्तम दीनी। शौच गये हरि संग, कृत्य सेवक की कीनी।। जगन्नाथ पद प्रीति, निरन्तर करत खवासी। भगवत् धर्म प्रधान, प्रसन्न नीलाचल वासी।।
श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी) (८३ उत्कल देश उड़ीसा नगर बैनतेय सब कोउ कहैं। (श्री) रघुनाथ गुसाँई गरुड़ ज्यों, सिंहपौरि ठाढ़े रहैं।।७१।। अति अनुराग घर सम्पति सौं रह्यो पागि, ताहू करि त्याग कियौ नीलाचल वास है। धन को पठावै पिता ऐपै नहीं भावै कछू, देखिवो महाप्रभुजी कौ पास है।। मन्दिर के द्वार रूप सुन्दर निहार्यो करैं, लग्यौ सीत गात सकलात दई दास है। शौच संग जायवे की रीति कौं प्रमान वहै, वैसे सब जानौ माधौदास सुखरास है।। ३२७ ।। महाप्रभु कृष्ण चैतन्य जू की आज्ञा पाइ, आये वृन्दावन राधाकुण्ड वास कियौ है। रहनि कहनि रूप चहनि न कहि सकैं, थकैं सुनि तन भाव रूप करि लियौ है।। मानसी में पायौ दूध-भात सरसात हिये, लिये रस नारी देखि बैद कहि दियौ है। कहाँ लौं प्रताप कहौं आप ही समझि लेहु, देहु वही रीझि जासौँ आगे पाय जियौ है।। ३२८ ।। श्रीनित्यानन्दजी, श्रीकृष्णचैतन्यजी नित्यानन्द (कृष्ण) चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।। गौड़ देश पाखण्ड, मेटि कियौ भजन परायण। करुणासिन्धु कृतज्ञ, भये अगतिन गति दायन।। दसधा रस आक्रान्ति, महत जन चरण उपासे। नाम लेत निहपाप, दुरित तिहिं नर के नासे।। अवतार विदित पूरव मही, उभै महन्त देही धरी। नित्यानन्द(कृष्ण)चैतन्य की, भक्ति दसों दिशि विस्तरी ।।७२।। श्रीनित्यानन्दजी आप बलदेव सदा वारुणी सौं मत्त रहैं, चहैं मन मान्यो प्रेम मत्तताई चाखियै। सोई नित्यानन्द प्रभु महन्त की देही धरी, भरी सब आनि तऊ पुनि अभिलाखियै।। भयो बोझ भारी किहूँ जात न सँभारी, तब ठौर-ठौर पारषद माँझ धरि राखियै। कहत-कहत और सुनत-सुनत जाके, भये मतवारे बहु ग्रन्थ ताकी साखियै।। ३२६ ।। श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजी गोपिन के अनुराग आगे आप हारे श्याम, जान्यौ यह लाल रंग कैसे आवै तन में। ये तौ सब गौर तनी नख-सिख बनी-ठनी, खुल्यौ यों सुरंग अंग-अंग रँगे वन में।।
८४) (श्री भक्तमाल श्यामताई माँझ सो ललाई हूँ समाइ जाय, ताते मेरे जान फिरि आई यहै मन में। जसुमति सुत सोई शची सुत गौर भये, नये-नये नेह चोज नाचैं निज गन में।। ३३०।। आवै कभूँ प्रेम हेमपिण्डवत तन होत, कभूँ सन्धि-सन्धि छूटि अंग बढ़ि जात है। और एक न्यारी रीति आँसू पिचकारी मानौं उभै लाल प्यारी भावसागर समात है।। ईशता बखान कही करौ सो प्रमान याको, 'जगन्नाथ क्षेत्र नेत्र निरखि साक्षात है'। चतुर्भुज षट्भुज रूप लै दिखाय दियो, दियो जो अनूप हित बात पात-पात है।। ३३१।। श्रीकृष्णचैतन्य नाम जगत प्रगट भयौ, अति अभिराम लै महन्त देही धरी है। जितो गौड़ देश भक्ति लेशहूँ न जानै कोऊ, सोऊ प्रेमसागर में बोर्यो कहि 'हरी' है।। भये सिरमौर एक-एक जग तारिवे कौं, धारिवे कौं कौन साखि पोथिन में धरी है। कोटि कोटि अजामील वारि डारै दुष्टता पै, ऐसेहूँ मनन किये भक्ति भूमि भरी है।। ३३२।। श्रीसूरदासजी सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै।। उक्ति चोज अनुप्रास, वरन अस्थिति अति भारी। वचन प्रीति निर्वाह, अर्थ अद्भुत तुक धारी।। प्रतिबिम्बित दिवि दृष्टि, हृदय हरि लीला भासी। जनम करम गुन रूप, बसै रसना परकासी।। विमल बुद्धि गुन और की, जो यह गुन श्रवननि धरै। सूर कवित सुनि कौन कवि, जो नहिं सिर चालन करै ।।७३।। श्रीपरमानन्ददासजी ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं, परमानन्द भयौ प्रेमकेत।। पौगण्ड बाल कैशोर, गोप लीला सब गाई। अचरज कहा यह बात, हुतौ पहिलौ जु सखाई।। नैननि नीर प्रवाह, रहत रोमांच रैन दिन। गद्गद् गिरा उदार, श्याम शोभा भीज्यौ तन।।
श्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी) (८५ 'सारंग' छाप ताकी भई, श्रवण सुनत आवेश देत। ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं परमानन्द भयौ प्रेमकेत।।७४।। श्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।। काश्मीरि की छाप, पाप तापन जग मण्डन। दृढ़ हरिभक्ति कुठार, आन धर्म बिटप विहण्डन।। मथुरा मध्य मलेच्छ, वाद करि बरबट जीते। काजी अजित अनेक, देखि परचै भय भीते।। विदित बात संसार सब, सन्त साखि नाहिन दुरी। केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।। ७५।। (चार कवित्त अन्य कवि कृत हैं) करि दिग विजै सब पण्डित हराय दिये, लिये बड़े-बड़े जीति भीति उपजाई है। फिरत चौडौल चढ़े गज बाजि लोग संग, प्रतिभा कौ रंग आये नदिया प्रभाई है।। डरे द्विज भारी महाप्रभु जू विचारी तब, लीला विस्तारी गंगा तीर सुखदाई है। बैठे ढिंग आय बोले नम्रता जनाय रह्यो, जग जसु छाय नेकु सुनै मनभाई है।। 'लरिकान संग पढ़ौ बातें बड़ी-बड़ी गढ़ौ, ऐपै रढ़ौ कहौं सोई सीलता पै रीझियै'। 'गंगा कौ सरूप कहौ' 'चाहौ दृग आगे सोई', नये सौ श्लोक किये सुनि मति भीजियै।। तामें एक कण्ठ करि पढ़िकै सुनायौ 'अहो! बड़ो अभिलाष याकी व्याख्या करि दीजियै'। अचरज भारी भयौ कैसे तुम सीखि लयो?, 'दयौ लै प्रभाव तुम्हें ताने दयौ जीजियै'। दूषन औ भूषन हूँ कीजियै बखान याके, सुनि दुख मानि कही दोष कहाँ पाइयै। 'कविता प्रबन्ध मध्य रहै खोटि गन्ध अहो ! आज्ञा मोकौं देउ कह्यो 'कहिकै सुनाइयै'।। व्याख्या करि दई नई औगुन सुगुनमई, आये निज धाम 'भोर मिले' समुझाइयै। सरस्वती ध्यान कियौ आई ततकाल बाल, बाल पै हरायो सब जग जितवाइयै। बोली सरस्वती 'मेरे ईश भगवान वेतौ मान मेरौ कितौ सम्मुख बतराइयै'। भयौ दरसन तुम्हें मन परसन होत, सुनि सुख सोत वानी आये प्रभु पाइयै।।