श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६४०
- रामचरितमानस *
एक (अविद्या) दुष्ट (दोषयुक्त) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है। और एक (विद्या) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है ॥ ३ ॥
ग्यान मान जहाँ एकठु नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं॥ कहिअ तात सो परम बिरागी। तून सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥
ज्ञान वह है जहाँ (जिसमें) मान आदि एक भी [दोष] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है। हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो ॥ ४ ॥
[जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवाका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मनका निगृहीत न होना, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, अहंकार, जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधिमय जगत्में सुखबुद्धि, स्त्री-पुत्र-घर आदिमें आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक, भक्तिका अभाव, एकान्तमें मन न लगना, विषयी मनुष्योंके संगमें प्रेम—ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म (आत्मा) में स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके अर्थ (तत्त्वज्ञानके द्वारा जाननेयोग्य) परमात्माका नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है। देखिये गीता अध्याय १३। ७ से ११]
दो०—माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्वपर माया प्रेरक सीव॥ १५ ॥
जो मायाको, ईश्वरको और अपने स्वरूपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। जो [कर्मनुसार] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह ईश्वर है ॥ १५ ॥
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥ जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥
धर्म (के आचरण) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है—ऐसा वेदोंने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है ॥ १६ ॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥ भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होई अनुकूला॥
वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको (ज्ञान-विज्ञान आदि किसी) दूसरे साधनका सहारा (अपेक्षा) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल (प्रसन्न) होते हैं ॥ १७ ॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥ प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥
- अरण्यकाण्ड *
६४१
अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे कहता हूँ—यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणोंके चरणोंमें अत्यन्त प्रीति हो और वेदकी रीतिके अनुसार अपने-अपने [वर्णाश्रमके] कर्मोंमें लगा रहे ॥ ३ ॥
एहि कर फल पुनि विषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥ श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । मम लीला रति अति मन माहीं ॥
इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा। तब (वैराग्य होनेपर) मेरे धर्म (भागवतधर्म) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा ॥ ४ ॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥ गुरु पितु मातु बंधु पति देवा । सब मोहि कहैं जानै दृढ़ सेवा ॥
जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो; ॥ ५ ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥ काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गदगद हो जाय और नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ ॥ ६ ॥
दो०— बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम । तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥ १६ ॥
जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ ॥ १६ ॥
भगति जोग सुनि अति सुख पावा । लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥ एहि बिधि गए कछुक दिन बीती । कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥
इस भक्तियोगको सुनकर लक्ष्मणजीने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये ॥ १ ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी । दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥ पंचबटी सो गड़ एक बारा । देखि बिकल भड़ जुगल कुमारा ॥
६४२
- रामचरितमानस *
शूर्पणखा नामक रावणकी एक बहिन थी, जो नागिनके समान भयानक और दुष्ट हृदयकी थी। वह एक बार पञ्चवटीमें गयी और दोनों राजकुमारोंको देखकर विकल (कामसे पीड़ित) हो गयी ॥ २ ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥ होइ विकल सक मनहि न रोकी । जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
(काकभुशुण्डिजी कहते हैं—) हे गरुड़जी! (शूर्पणखा—जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध) स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मनको नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यको देखकर द्रवित हो जाती है (ज्वालासे पिघल जाती है) ॥ ३ ॥
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥ तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
वह सुन्दर रूप धरकर प्रभुके पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली—न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री! विधाताने यह संयोग (जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है ॥ ४ ॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं । देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं ॥ ताते अब लगि रहिउँ कुमारी । मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥
मेरे योग्य पुरुष (वर) जगत्भरमें नहीं है, मैंने तीनों लोकोंको खोज देखा। इसीसे मैं अबतक कुमारी (अविवाहित) रही। अब तुमको देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा) है ॥ ५ ॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता । अहइ कुआर मोर लघु भ्राता ॥ गड़ लछिमन रिपु भगिनी जानी । प्रभु बिलोकिक बोले मृदु बानी ॥
सीताजीकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मणजीके पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रुकी बहिन समझकर और प्रभुकी ओर देखकर कोमल वाणीसे बोले— ॥ ६ ॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा । परार्थीन नहिं तोर सुपासा ॥ प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा । जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥
हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ। मैं परार्थीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता (सुख) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुरके राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फवता है ॥ ७ ॥
सेवक सुख चह मान भिखारी । व्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥ लोभी जसु चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥
- अरण्यकाण्ड *
६४३
सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल—अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं (अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं) ॥ ८ ॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥ लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तून तोरि लाज परिहरई ॥
वह लौटकर फिर श्रीरामजीके पास आयी। प्रभुने फिर उसे लक्ष्मणजीके पास भेज दिया। लक्ष्मणजीने कहा—तुम्हें वही बरेगा जो लज्जाको तूण तोड़कर (अर्थात् प्रतिज्ञा करके) त्याग देगा (अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा) ॥ ९ ॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई । रूप भयंकर प्रगटत भई ॥ सीतहि सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥
तब वह खिसियायी हुई (क्रुद्ध होकर) श्रीरामजीके पास गयी और उसने अपना भयङ्कर रूप प्रकट किया। सीताजीको भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीको इशारा देकर कहा ॥ १० ॥
दो०— लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि । ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥ १७ ॥
लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे उसको बिना नाक-कानकी कर दिया। मानो उसके हाथ रावणको चुनौती दी हो! ॥ १७ ॥
नाक कान बिनु भइ बिकरारा । जनु स्तव सैल गेरु कै धारा ॥ खर दूषण पहिं गड़ बिलपाता । धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥
बिना नाक-कानके वह विकराल हो गयी। [उसके शरीरसे रक्त इस प्रकार बहने लगा] मानो [काले] पर्वतसे गेरुकी धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषणके पास गयी। [और बोली—] हे भाई! तुम्हारे पौरुष (वीरता) को धिक्कार है, तुम्हारे बलको धिक्कार है ॥ १ ॥
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई । जातुधान सुनि सेन बनाई ॥ धाए निसिचर निकर बस्त्रथा । जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा ॥
उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखाने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसोंने सेना तैयार की। राक्षससमूह झुंड-के-झुंड दौड़े। मानो पंखधारी काजलके पर्वतोंका झुंड हो ॥ २ ॥
नाना बाहन नानाकारा । नानायुध धर घोर अपारा ॥ सूपनखा आगें करि लीनी । असुभ रूप श्रुति नासा हीनी ॥
६४४
- रामचरितमानस *
वे अनेकों प्रकारकी सवारियोंपर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार (सूरतों) के हैं। वे अपार हैं और अनेकों प्रकारके असंख्य भयानक हथियार धारण किये हुए हैं। उन्होंने नाक-कान कटी हुई अमङ्गलरूपिणी शूर्पणखाको आगे कर लिया ॥ ३ ॥
असगुन अमित होहिं भयकारी । गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी ॥ गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं । देखि कटकु भट अति हरषाहीं ॥
अनगिनत भयङ्कर अशकुन हो रहे हैं। परन्तु मृत्युके वश होनेके कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाशमें उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धालोग बहुत ही हर्षित होते हैं ॥ ४ ॥
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई । धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई ॥ धूरि पूरि नभ मंडल रहा । राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥
कोई कहता है दोनों भाइयोंको जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्रीको छीन लो। आकाशमण्डल धूलसे भर गया। तब श्रीरामजीने लक्ष्मणजीको बुलाकर उनसे कहा— ॥ ५ ॥
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर । आवा निसिचर कटकु भयंकर ॥ रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी । चले सहित श्री सर धनु पानी ॥
राक्षसोंकी भयानक सेना आ गयी है। जानकीजीको लेकर तुम पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। सावधान रहना। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीसीताजीसहित चले ॥ ६ ॥
देखि राम रिपुदल चलि आवा । बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा ॥
शत्रुओंकी सेना [समीप] चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजीने हँसकर कठिन धनुषको चढ़ाया ॥ ७ ॥
छं०— कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों ।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों ॥
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै ।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै ॥
कठिन धनुष चढ़ाकर सिरपर जटाका जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि (पत्ते) के पर्वतपर करोड़ों बिजलियोंसे दो सौप लड़ रहे हों। कमरमें तरकस कसकर, विशाल भुजाओंमें धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंकी ओर देख रहे हैं। मानो मतवाले हाथियोंके समूहको [आता] देखकर सिंह [उनकी ओर] ताक रहा हो।
सो०— आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट ।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज ॥ १८ ॥
- अरण्यकाण्ड *
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‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर (बड़ी तेजीसे) दौड़े हुए आये [और उन्होंने श्रीरामजीको चारों ओरसे घेर लिया], जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं ॥ १८ ॥
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी । थकित भई रजनीचर धारी ॥ सचिव बोलि बोले खर दूषण । यह कोउ नृपबालक नर भूषण ॥
[सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] प्रभु श्रीरामजीको देखकर राक्षसोंकी सेना थकित रह गयी। वे उनपर बाण नहीं छोड़ सके। मन्त्रीको बुलाकर खर-दूषणने कहा—यह राजकुमार कोई मनुष्योंका भूषण है ॥ १ ॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते । देखे जिते हते हम केते ॥ हम भरि जन्म सुनहु सब भाई । देखी नहिं असि सुंदरताई ॥
जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमेंसे हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयो! सुनो, हमने जन्मभरमें ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी ॥ २ ॥
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ देहु तुरत निज नारि दुराई । जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥
जद्यपि इन्होंने हमारी बहिनको कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। ‘छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते—जी घर लौट जाओ’ ॥ ३ ॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु । तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥ दूतन्ह कहा राम सन जाई । सुनत राम बोले मुसुकाई ॥
मेरा यह कथन तुमलोग उसे सुनाओ और उसका वचन (उत्तर) सुनकर शीघ्र आओ। दूतोंने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजीसे कहा। उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुसकराकर बोले— ॥ ४ ॥
हम छत्री मृगया बन करहीं । तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥ रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं । एक बार कालहु सन लरहीं ॥
हम क्षत्रिय हैं, वनमें शिकार करते हैं और तुम्हारे-सरीखे दुष्ट पशुओंको तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं। हम बलवान् शत्रुको देखकर नहीं डरते। [लड़नेको आवे तो] एक बार तो हम कालसे भी लड़ सकते हैं ॥ ५ ॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक । मुनि पालक खल सालक बालक ॥ जौं न होइ बल घर फिरि जाहू । समर बिमुख मैं हतउँ न काहू ॥
६४६
- रामचरितमानस *
यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुलका नाश करनेवाले और मुनियोंकी रक्षा करनेवाले हैं, हम बालक हैं, परन्तु हैं दुष्टोंको दण्ड देनेवाले। यदि बल न हो तो घर लौट जाओ। संग्राममें पीठ दिखानेवाले किसीको मैं नहीं मारता ॥ ६ ॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई॥ दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति देहेऊ॥
रणमें चढ़ आकर कपट-चतुराई करना और शत्रुपर कृपा करना (दया दिखाना) तो बड़ी भारी कायरता है। दूतोंने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर-दूषणका हृदय अत्यन्त जल उठा ॥ ७ ॥
छं०—उर देहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥ प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा। भाए बधिर व्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा ॥
[खर-दूषणका] हृदय जल उठा। तब उन्होंने कहा—पकड़ लो (कैद कर लो)। [यह सुनकर] भयानक राक्षस योद्धा बाण, धनुष, तोमर, शक्ति (साँग), शूल (बरछी), कृपाण (कटार), परिघ और फरसा धारण किये हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्रीरामजीने पहले धनुषका बड़ा कठोर, घोर और भयानक टक्कार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गये। उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा।
दो०—सावधान होइ धाए जानि सबल आराति।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति ॥ १९ (क) ॥
फिर वे शत्रुको बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर बहुत प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बरसाने लगे ॥ १९ (क) ॥
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर।
तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर ॥ १९ (ख) ॥
श्रीरघुवीरजीने उनके हथियारोंको तिलके समान (टुकड़े-टुकड़े) करके काट डाला। फिर धनुषको कानतक तानकर अपने तीर छोड़े ॥ १९ (ख) ॥
छं०—तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल ॥ कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम ॥
तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत-से सर्प जा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी संग्राममें क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले ॥ १ ॥
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर ॥
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ ॥
- अरण्यकाण्ड *
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अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंको देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले। तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले—जो रणसे भागकर जायगा, ॥ २ ॥
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥ आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥
उसका हम अपने हाथों वध करेंगे। तब मनमें मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेकों प्रकारके हथियारोंसे श्रीरामजीपर प्रहार करने लगे ॥ ३ ॥
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥ छोड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥
शत्रुको अत्यन्त कुपित जानकर प्रभुने धनुषपर बाण चढ़ाकर बहुत-से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे ॥ ४ ॥
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥ चिवकरत लागत बान। धर परत कुधर समान॥
उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथीकी तरह चिघाड़ते हैं। उनके पहाड़के समान धड़ कट-कटकर गिर रहे हैं ॥ ५ ॥
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड॥ नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥
योद्धाओंके शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। आकाशमें बहुत-सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिरके धड़ दौड़ रहे हैं ॥ ६ ॥
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥
चील [या क्रौंच], कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयङ्कर कट-कट शब्द कर रहे हैं ॥ ७ ॥
छं०—कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥ रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥
सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं [अथवा खप्पर भर रहे हैं]। वीर-वैताल खोपड़ियोंपर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाण योद्धाओंके वक्षःस्थल, भुजा और सिरोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। उनके धड़ जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं। फिर उठते और लड़ते हैं और 'पकड़ो-पकड़ो' का भयङ्कर शब्द करते हैं ॥ १ ॥
६४८
- रामचरितमानस *
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं । संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं ॥ मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे । अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ॥ २ ॥
अँतड़ियोंके एक छोरको पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हींका दूसरा छोर हाथसे पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगरके निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये। बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेनाको व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजीकी ओर मुड़े ॥ २ ॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं । करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं ॥ प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका । दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका ॥ ३ ॥
अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बारमें श्रीरघुवीरपर छोड़ने लगे। प्रभुने पलभरमें शत्रुओंके बाणोंको काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े। सब राक्षस-सेनापतियोंके हृदयमें दस-दस बाण मारे ॥ ३ ॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी । सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥ सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो । देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मर्यो ॥ ४ ॥
योद्धा पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकारकी अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [राक्षस] चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियोंको भयभीत देखकर मायाके स्वामी प्रभुने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओंकी सेना एक-दूसरेको रामरूप देखने लगी और आपसमें ही युद्ध करके लड़ मरी ॥ ४ ॥
दो०— राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ २० ( क ) ॥
- अरण्यकाण्ड *
६४९
सब [‘यही राम हैं, इसे मारो’ इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्रीरामजीने यह उपाय करके क्षणभरमें शत्रुओंको मार डाला ॥ २० (क) ॥
हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान ।
अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २० (ख) ॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेकों विमानोंपर सुशोभित हुए चले गये ॥ २० (ख) ॥
जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥ तब लछिमन सीतहि लै आए । प्रभु पद परत हरषि उर लाए ॥
जब श्रीरघुनाथजीने युद्धमें शत्रुओंको जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सबके भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मणजी सीताजीको ले आये। चरणोंमें पड़ते हुए उनको प्रभुने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥
सीता चित्तव स्याम मृदु गाता । परम प्रेम लोचन न अघाता ॥ पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर मुनि सुरखदायक ॥
सीताजी श्रीरामजीके श्याम और कोमल शरीरको परम प्रेमके साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पञ्चवटीमें बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियोंको सुख देनेवाले चरित्र करने लगे ॥ २ ॥
धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाड़ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥ बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस कै सुरति बिसारी ॥
खर-दूषणका विध्वंस देखकर शूर्पणखाने जाकर रावणको भड़काया। वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली—तूने देश और खजानेकी सुधि ही भुला दी ॥ ३ ॥
करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥ राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥ बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किऐँ अरु पाएँ ॥ संग तें जती कुमंत्र ते राजा । मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥
शराब पी लेता है और दिन-रात पढ़ा सोता रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है। विषयोंके सङ्गसे संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा, ॥ ४-५ ॥
६५०
- रामचरितमानस *
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥
नम्रताके बिना (नम्रता न होनेसे) प्रीति और मद (अहङ्कार) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है ॥ ६ ॥
सो०—रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन ॥ २१ ( क ) ॥
शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्पको छोट करके नहीं समझना चाहिये। ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकारसे विलाप करके रोने लगी ॥ २१ ( क ) ॥
दो०—सभा माझ परि व्याकुल बहु प्रकार कह रोड़।
तोहि जितत दसकंधर मोरि कि असि गति होड़ ॥ २१ ( ख ) ॥
[रावणकी] सभाके बीच वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकारसे रो-रोकर कह रही है कि अरे दशग्रीव! तेरे जीते-जी मेरी क्या ऐसी दशा होनी चाहिये? ॥ २१ ( ख ) ॥
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाँह उठाई ॥
कह लंकेस कहसि निज बाता। केई तव नासा कान निपाता ॥
शूर्पणखाके वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। उन्होंने शूर्पणखाकी बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया। लङ्कापति रावणने कहा—अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिये? ॥ १ ॥
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंध बन खेलन आए ॥
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी ॥
[वह बोली—] अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र, जो पुरुषोंमें सिंहके समान हैं, वनमें शिकार खेलने आये हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर देंगे ॥ २ ॥
जिन्ह कर भुजबल पाड़ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन ॥
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना ॥
जिनकी भुजाओंका बल पाकर हे दशमुख! मुनिलोग वनमें निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखनेमें तो बालक हैं, पर हैं कालके समान। वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणोंसे युक्त हैं ॥ ३ ॥
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता ॥
सोभा धाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा ॥
- अरण्यकाण्ड *
६५१
दोनों भाइयोंका बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टोंके वध करनेमें लगे हैं और देवता तथा मुनियोंको सुख देनेवाले हैं। वे शोभाके धाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है ॥४॥
रूप रासि बिधि नारि सँवारी । रति सत कोटि तासु बलिहारी ॥ तासु अनुज काटे श्रुति नासा । सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा ॥
विधाताने उस स्त्रीको ऐसी रूपकी राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति (कामदेवकी स्त्री) उसपर निछावर हैं। उन्हींके छोटे भाईने मेरे नाक-कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे ॥५॥
खर दूषन सुनि लगे पुकारा । छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा ॥ खर दूषन तिसिरा कर घाता । सुनि दससीस जरे सब गाता ॥
मेरी पुकार सुनकर खर-दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभरमें सारी सेनाको मार डाला। खर-दूषण और त्रिशिराका वध सुनकर रावणके सारे अङ्ग जल उठे ॥६॥
दो०—सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति ।
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति ॥ २२ ॥
उसने शूर्पणखाको समझाकर बहुत प्रकारसे अपने बलका बखान किया, किन्तु [मनमें] वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने महलमें गया, उसे रातभर नींद नहीं पड़ी ॥२२॥
सुर नर असुर नाग खग माहीं । मोरे अनुचर कहँ कोउ नाही ॥ खर दूषन मोहि सम बलवंता । तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता ॥
[वह मन-ही-मन विचार करने लगा—] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियोंमें कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवकको भी पा सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान् थे। उन्हें भगवान्के सिवा और कौन मार सकता है ? ॥१॥
सुर रंजन भंजन महि भारा । जौँ भगवंत लीन्ह अवतारा ॥ तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ । प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ॥
देवताओंको आनन्द देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभुके बाण [के आघात] से प्राण छोड़कर भवसागरसे तर जाऊँगा ॥२॥
होइहि भजनु न तामस देहा । मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ॥ जौँ नररूप भूपसुत कोऊ । हरिहुँ नारि जीति रन दोऊ ॥
६५२
- रामचरितमानस *
इस तामस शरीरसे भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्मसे यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनोंको रणमें जीतकर उनकी स्त्रीको हर लूँगा ॥ ३ ॥
चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ । बस मारीच सिंधु तट जहवाँ ॥ इहाँ राम जसि जुगति बनाई । सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥
[यों विचारकर] रावण रथपर चढ़कर अकेला ही वहाँ चला, जहाँ समुद्रके तटपर मारीच रहता था। [शिवजी कहते हैं कि—] हे पार्वती! यहाँ श्रीरामचन्द्रजीने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो ॥ ४ ॥
दो०—लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद । जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद ॥ २३ ॥
लक्ष्मणजी जब कन्द-मूल-फल लेनेके लिये वनमें गये, तब [अकेलेमें] कृपा और सुखके समूह श्रीरामचन्द्रजी हँसकर जानकीजीसे बोले— ॥ २३ ॥
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला । मैं कछु करबि ललित नरलीला ॥ तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा । जौ लगि करौं निसाचर नासा ॥
हे प्रिये! हे सुन्दर पातिव्रत-धर्मका पालन करनेवाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा। इसलिये जबतक मैं राक्षसोंका नाश करूँ, तबतक तुम अग्निमें निवास करो ॥ १ ॥
जबहिं राम सब कहा बखानी । प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥ निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता । तैसइ सील रूप सुबिनीता ॥
श्रीरामजीने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभुके चरणोंको हृदयमें धरकर अग्निमें समा गयीं। सीताजीने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके-जैसे ही शील-स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी ॥ २ ॥
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना । जो कछु चरित रचा भगवाना ॥ दसमुख गयउ जहाँ मारीचा । नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥
भगवान्ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्यको लक्ष्मणजीने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया ॥ ३ ॥
नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ॥ भयदायक खल कै प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥
- अरण्यकाण्ड *
६५३
नीचका झुकना (नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है। जैसे अङ्गुष्ठ, धनुष, सौंप और बिल्लीका झुकना। हे भवानी! दुष्टकी मीठी वाणी भी [उसी प्रकार] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल!! ४॥
दो०— करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
कवन हेतु मन व्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ २४ ॥
तब मारीचने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी—हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं? ॥ २४ ॥
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें ॥
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी ॥
भाग्यहीन रावणने सारी कथा अभिमानसहित उसके सामने कही [और फिर कहा—] तुम छल करनेवाले कपट-मृग बनो, जिस उपायसे मैं उस राजवधूको हर लाऊँ ॥ १ ॥
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा ॥
तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥
तब उसने (मारीचने) कहा—हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूपमें चराचरके ईश्वर हैं। हे तात! उनसे वैर न कीजिये। उन्हींके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना होता है (सबका जीवन-मरण उन्हींके अधीन है) ॥ २ ॥
मुनि मख राखन गयउ कुमार। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ॥
यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजीने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभरमें सौ योजनापर आ गिरा। उनसे वैर करनेमें भलाई नहीं है ॥ ३ ॥
भड़ मम कीट भृंग की नाई। जहाँ तहाँ मैं देखउँ दोउ भाई ॥
जौं नर तात तदपि अति सूर। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा ॥
मेरी दशा तो भृङ्गीके कीड़ेकी-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको ही देखता हूँ। और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करनेमें पूरा न पड़ेगा (सफलता नहीं मिलेगी) ॥ ४ ॥
दो०— जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ॥ २५ ॥
जिसने ताड़का और सुबाहुको मारकर शिवजीका धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिराका वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है? ॥ २५ ॥
६५४
- रामचरितमानस *
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी । सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥ गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा । कहु जग मोहि समान को जोधा ॥
अतः अपने कुलकी कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं (दुर्बचन कहे)। [कहा—] ओर मूर्ख! तू गुरुकी तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा कौन है? ॥ १ ॥
तब मारीच हृदयँ अनुमाना । नवहि बिरोधँ नहिं कल्याना ॥ सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी । बैद बंदि कवि भानस गुनी ॥
तब मारीचने हृदयमें अनुमान किया कि शस्त्री (शस्त्रधारी), मर्मी (भेद जाननेवाला), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया—इन नौ व्यक्तियोंसे विरोध (वैर) करनेमें कल्याण (कुशल) नहीं होता ॥ २ ॥
उभय भाँति देखा निज मरना । तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥ उतरु देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौँ रघुपति सर लागें ॥
जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी (अर्थात् उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा)। [सोचा कि] उतर देते ही (नाहीं करते ही) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ? ॥ ३ ॥
अस जियँ जानि दसानन संगा । चला राम पद प्रेम अभंगा ॥ मन अति हरष जनाव न तेही । आजु देखिहउँ परम सनेही ॥
हृदयमें ऐसा समझकर वह रावणके साथ चला। श्रीरामजीके चरणोंमें उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मनमें इस बातका अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजीको देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावणको नहीं जनाया ॥ ४ ॥
छं०— निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं । श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ॥ निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी । निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥
[वह मन-ही-मन सोचने लगा] अपने परम प्रियतमको देखकर नेत्रोंको सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजीसहित और छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत कृपानिधान श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश (किसीके वशमें न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्) को भी वशमें करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्दके समुद्र श्रीहरि अपने हाथोंसे बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!
- अरण्यकाण्ड *
६५५
दो०— मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान। फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन ॥ २६ ॥
धनुष-बाण धारण किये मेरे पीछे-पीछे पृथ्वीपर (पकड़नेके लिये) दौड़ते हुए प्रभुको मैं फिर-फिरकर देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥ २६ ॥
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥ अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई ॥
जब रावण उस वनके (जिस वनमें श्रीरघुनाथजी रहते थे) निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता। सोनेका शरीर मणियोंसे जड़कर बनाया था ॥ १ ॥
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा ॥ सुनहु देव रघुवीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला ॥
सीताजीने उस परम सुन्दर हिरनको देखा, जिसके अङ्ग-अङ्गकी छटा अत्यन्त मनोहर थी। [वे कहने लगीं—] हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये। इस मृगकी छाल बहुत ही सुन्दर है ॥ २ ॥
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही ॥ तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन ॥
जानकीजीने कहा—हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी [मारीचके कपटमृग बननेका] सब कारण जानते हुए भी, देवताओंका कार्य बनानेके लिये हर्षित होकर उठे ॥ ३ ॥
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा ॥ प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥
हिरनको देखकर श्रीरामजीने कमरमें फेंट बाँधा और हाथमें धनुष लेकर उसपर सुन्दर (दिव्य) बाण चढ़ाया। फिर प्रभुने लक्ष्मणजीको समझाकर कहा—हे भाई! वनमें बहुत-से राक्षस फिरते हैं ॥ ४ ॥
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥ प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी ॥
तुम बुद्धि और विवेकके द्वारा बल और समयका विचार करके सीताकी रखवाली करना। प्रभुको देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े ॥ ५ ॥
६५६
- रामचरितमानस *
निगम नेति सिव ध्यान न पावा । मायामृग पाछें सो धावा ॥ कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई । कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥
वेद जिनके विषयमें 'नेति-नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है ॥ ६ ॥
प्रगटत दुरत करत छल भूरी । एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी ॥ तब तकि राम कठिन सर मारा । धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥
इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभुको दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने तककर (निशाना साधक) कठोर बाण मारा, [जिसके लगते ही] वह घोर शब्द करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७ ॥
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा । पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा ॥ प्रांन तजत प्रगटेसि निज देहा । सुमिरेसि रामु समेत सनेहा ॥
पहले लक्ष्मणजीका नाम लेकर उसने पीछे मनमें श्रीरामजीका स्मरण किया। प्राण त्याग करते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजीका स्मरण किया ॥ ८ ॥
अंतर प्रेम तासु पहिचाना । मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥ ९ ॥
सुजान (सर्वज्ञ) श्रीरामजीने उसके हृदयके प्रेमको पहचानकर उसे वह गति (अपना परमपद) दी जो मुनियोंको भी दुर्लभ है ॥ ९ ॥
दो०— बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ ।
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ ॥ २७ ॥
देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभुके गुणोंकी गाथाएँ (स्तुतियाँ) गा रहे हैं [कि] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुरको भी अपना परम पद दे दिया ॥ २७ ॥
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा । सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥ आरत गिरा सुनी जब सीता । कह लछिमन सन परम सभीता ॥
दुष्ट मारीचको मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथमें धनुष और कमरमें तरकस शोभा दे रहा है। इधर जब सीताजीने दुःखभरी वाणी (मरते समय मारीचकी 'हा लक्ष्मण' की आवाज) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजीसे कहने लगीं— ॥ १ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६५७
जाहु बेगि संकट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥ भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहुँ संकट परड़ कि सोई ॥
तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकटमें हैं। लक्ष्मणजीने हँसकर कहा—हे माता! सुनो, जिनके भृकुटिविलास (भौंके इशारे) मात्रसे सारी सृष्टिका लय (प्रलय) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्नमें भी संकटमें पड़ सकते हैं? ॥ २ ॥
मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥ बन दिसि देव सौँपि सब काहू । चले जहाँ रावन ससि राहू ॥
इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन (हृदयमें चुभनेवाले वचन) कहने लगीं, तब भगवान्की प्रेरणासे लक्ष्मणजीका मन भी चञ्चल हो उठा। वे श्रीसीताजीको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमाके लिये राहुरूप श्रीरामजी थे ॥ ३ ॥
सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ॥ जाकें डर सुर असुर डेराहीं । निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ॥
रावण सूना मौका देखकर यति (संन्यासी) के वेषमें श्रीसीताजीके समीप आया। जिसके डरसे देवता और दैत्यतक इतना डरते हैं कि रातको नींद नहीं आती और दिनमें [भरपेट] अन्न नहीं खाते— ॥ ४ ॥
सो दससीस स्वान की नाई । इत उत चितइ चला भड़िहाई ॥ इमि कुपंथ पग देत खगेसा । रह न तेज तन बुधि बल लेसा ॥
वही दस सिरवाला रावण कुत्तेकी तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई* (चोरी) के लिये चला। [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! इस प्रकार कुमार्गपर पैर रखते ही शरीरमें तेज तथा बुद्धि एवं बलका लेश भी नहीं रह जाता ॥ ५ ॥
- सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाड़ोंमें मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है उसे, 'भड़िहाई' कहते हैं।
नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति देखाई ॥ कह सीता सुनु जती गोसाई । बोलेहु बचन दुष्ट की नाई ॥
रावणने अनेकों प्रकारकी सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजीको राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजीने कहा—हे यति गोसाई! सुनो, तुमने तो दुष्टकी तरह बचन कहे ॥ ६ ॥
तब रावन निज रूप देखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ॥ कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥
६५८
- रामचरितमानस *
तब रावणने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा—‘अरे दुष्ट! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये’ ॥७॥
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर नाहा ॥ सुनत बचन दससीस रिसाना । मन महँ चरन बंदि सुख माना ॥
जैसे सिंहकी स्त्रीको तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज! तू [मेरी चाह करके] कालके वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावणको क्रोध आ गया, परन्तु मनमें उसने सीताजीके चरणोंकी वन्दना करके सुख माना ॥८॥
दो०—क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ॥ २८ ॥
फिर क्रोधमें भरकर रावणने सीताजीको रथपर बैठा लिया और वह बड़ी उतावलीके साथ आकाशमार्गसे चला; किन्तु डरके मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था ॥ २८ ॥
हा जग एक बीर रघुराया । केहिँ अपराध बिसारेहु दया ॥ आरति हरन सरन सुखदायक । हा रघुकुल सरोज दिननायक ॥
[सीताजी विलाप कर रही थीं—] हा जगत्के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी! आपने किस अपराधसे मुझपर दया भुला दी। हे दुःखोंके हरनेवाले, हे शरणागतको सुख देनेवाले, हा रघुकुलरूपी कमलके सूर्य! ॥ १ ॥
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा । सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा ॥ बिबिध बिलाप करति बैदेही । भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ॥
हा लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं—[हाय!] प्रभुकी कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्नेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं ॥ २ ॥
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा । पुरोडास चह रासभ खावा ॥ सीता कै बिलाप सुनि भारी । भए चराचर जीव दुखारी ॥
प्रभुको मेरी यह विपत्ति कौन सुनावे? यज्ञके अन्नको गदहा खाना चाहता है। सीताजीका भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सभी जीव दुखी हो गये ॥ ३ ॥
गीधराज सुनि आरत बानी । रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ॥ अधम निसाचर लीन्हें जाई । जिमि मलेछ बस कपिला गाई ॥
- अरण्यकाण्ड *
६५९
गृध्राज जटायुने सीताजीकी दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नी हैं। [उसने देखा कि] नीच राक्षस इनको [बुरी तरह] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छके पाले पड़ गयी हो ॥४॥
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा । करिहउँ जातुधान कर नासा ॥ धावा क्रोधवंत खग कैसैं। छूटइ पबि परबत कहूँ जैसैं ॥
[वह बोला—] हे सीते पुत्री! भय मत कर। मैं इस राक्षसका नाश करूँगा। [यह कहकर] वह पक्षी क्रोधमें भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वतकी ओर वज्र छूटता हो ॥५॥
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ॥ आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना ॥
[उसने ललकारकर कहा—] रे रे दुष्ट! खड़ा क्यों नहीं होता? निडर होकर चल दिया! मुझे तूने नहीं जाना? उसको यमराजके समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मनमें अनुमान करने लगा— ॥६॥
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई ॥ जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छौड़िहि देहा ॥
यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियोंका स्वामी गरुड़। पर वह (गरुड़) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बलको जानता है! [कुछ पास आनेपर] रावणने उसे पहचान लिया [और बोला—] यह तो बूढ़ा जटायू है! यह मेरे हाथरूपी तीर्थमें शरीर छोड़ेगा ॥७॥
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा ॥ तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ॥
यह सुनते ही गीध क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला—रावण! मेरी सिखावन सुन। जानकीजीको छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले! ऐसा होगा कि — ॥८॥
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा ॥ उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ॥
श्रीरामजीके क्रोधरूपी अत्यन्त भयानक अग्निमें तेरा सारा वंश पतिंगा [होकर भस्म] हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा ॥९॥
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ॥ चोचन्ह मारि बिदोरसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही ॥