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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • किष्किन्धाकाण्ड *

६१३

हे नाथ! अब मुझपर दयादृष्टि कीजिये और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिये। मैं कर्मवश जिस योनिमें जन्म लूँ, वहीं श्रीरामजी (आप) के चरणोंमें प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बलमें मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिये। और हे देवता और मनुष्योंके नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइये ॥ २ ॥

दो०—राम चरन दूढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।

सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग ॥ १० ॥

श्रीरामजीके चरणोंमें दूढ़ प्रीति करके बालिने शरीरको वैसे ही (आसानीसे) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गलेसे फूलोंकी मालाका गिरना न जाने ॥ १० ॥

राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब व्याकुल धावा ॥

नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा ॥

श्रीरामचन्द्रजीने बालिको अपने परम धाम भेज दिया। नगरके सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालिकी स्त्री तारा अनेकों प्रकारसे विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देहकी सँभाल नहीं है ॥ १ ॥

तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया ॥

छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा ॥

ताराको व्याकुल देखकर श्रीरघुनाथजीने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। [उन्होंने कहा—] पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु—इन पाँच तत्त्वोंसे यह अत्यन्त अधम शरीर रचा गया है ॥ २ ॥

प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ॥

उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी ॥

वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिये रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्के चरणों लगी और उसने परम भक्तिका वर माँग लिया ॥ ३ ॥

उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई ॥

तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिवत सब कीन्हा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! स्वामी श्रीरामजी सबको कठपुतलीकी तरह नचाते हैं। तदनन्तर श्रीरामजीने सुग्रीवको आज्ञा दी और सुग्रीवने विधिपूर्वक बालिका सब मृतक-कर्म किया ॥ ४ ॥

राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई ॥

रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा ॥

तब श्रीरामचन्द्रजीने छोटे भाई लक्ष्मणको समझाकर कहा कि तुम जाकर सुग्रीवको राज्य दे दो। श्रीरघुनाथजीकी प्रेरणा (आज्ञा) से सब लोग श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ ५ ॥

६१४

  • रामचरितमानस *

दो०—लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज। राजु दीन्ह सुग्रीव कहैं अंगद कहैं जुबराज ॥ ११ ॥

लक्ष्मणजीने तुरंत ही सब नगरनिवासियोंको और ब्राह्मणोंके समाजको बुला लिया और [उनके सामने] सुग्रीवको राज्य और अंगदको युवराज-पद दिया ॥ ११ ॥

उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं ॥ सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥

हे पार्वती! जगत्में श्रीरामजीके समान हित करनेवाला गुरु, पिता, माता, बन्धु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थके लिये ही सब प्रीति करते हैं ॥ १ ॥

बालि त्रास व्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती ॥ सोड़ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ ॥

जो सुग्रीव दिन-रात बालिके भयसे व्याकुल रहता था, जिसके शरीरमें बहुत-से घाव हो गये थे और जिसकी छाती चिन्ताके मारे जला करती थी, उसी सुग्रीवको उन्होंने वानरोंका राजा बना दिया। श्रीरामचन्द्रजीका स्वभाव अत्यन्त ही कृपालु है ॥ २ ॥

जानतहूँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं ॥ पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई ॥

जो लोग जानते हुए भी ऐसे प्रभुको त्याग देते हैं, वे क्यों न विपत्तिके जालमें फँसें? फिर श्रीरामजीने सुग्रीवको बुला लिया और बहुत प्रकारसे उन्हें राजनीतिकी शिक्षा दी ॥ ३ ॥

कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा ॥ गत ग्रीष्म बरषा रिनु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई ॥

फिर प्रभुने कहा—हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्षतक गाँव (बस्ती) में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्म-ऋतु बीतकर वर्षा-ऋतु आ गयी। अतः मैं यहाँ पास ही पर्वतपर टिक रहूँगा ॥ ४ ॥

अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदयँ धरेहु मम काजू ॥ जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए ॥

तुम अंगदसहित राज्य करो। मेरे कामका हृदयमें सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीवजी घर लौट आये, तब श्रीरामजी प्रवर्षण पर्वतपर जा टिके ॥ ५ ॥

दो०—प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ। राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ ॥ १२ ॥

देवताओंने पहलेसे ही उस पर्वतकी एक गुफाको सुन्दर बना (सजा) रखा था। उन्होंने सोच रखा था कि कृपाकी खान श्रीरामजी कुछ दिन यहाँ आकर निवास करेंगे ॥ १२ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

६१५

सुंदर बन कुसुमित अति सोभा । गुंजत मधुप निकर मधु लोभा ॥ कंद मूल फल पत्र सुहाए । भए बहुत जब ते प्रभु आए ॥

सुन्दर बन फूला हुआ अत्यन्त सुशोभित है। मधुके लोभसे भौरोंके समूह गुंजार कर रहे हैं। जबसे प्रभु आये, तबसे वनमें सुन्दर कन्द, मूल, फल और पत्तोंकी बहुतायत हो गयी ॥ १ ॥

देखि मनोहर सैल अनूपा । रहे तहाँ अनुज सहित सुरभूपा ॥ मधुकर खग मृग तनु धरि देवा । करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा ॥

मनोहर और अनुपम पर्वतको देखकर देवताओंके सम्राट् श्रीरामजी छोटे भाईसहित वहाँ रह गये। देवता, सिद्ध और मुनि भौरों, पक्षियों और पशुओंके शरीर धारण करके प्रभुकी सेवा करने लगे ॥ २ ॥

मंगलरूप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते ॥ फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई । सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई ॥

जबसे रमापति श्रीरामजीने वहाँ निवास किया तबसे वन मङ्गलस्वरूप हो गया। सुन्दर स्फटिकमणिकी एक अत्यन्त उज्ज्वल शिला है, उसपर दोनों भाई सुखपूर्वक विराजमान हैं ॥ ३ ॥

कहत अनुज सन कथा अनेका । भगति बिरति नृपनीति बिबेका ॥ बरषा काल मेघ नभ छाए । गरजत लागत परम सुहाए ॥

श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसे भक्ति, वैराग्य, राजनीति और ज्ञानकी अनेकों कथाएँ कहते हैं। वर्षाकालमें आकाशमें छाये हुए बादल गरजते हुए बहुत ही सुहावने लगते हैं ॥ ४ ॥

दो०—लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पेखि ।

गूही बिरतिरत हरष जस बिष्णुभगत कहँ देखि ॥ १३ ॥

[श्रीरामजी कहने लगे—] हे लक्ष्मण! देखो, मोरोंके झुंड बादलोंको देखकर नाच रहे हैं। जैसे वैराग्यमें अनुरक्त गृहस्थ किसी विष्णुभक्तको देखकर हर्षित होते हैं ॥ १३ ॥

घन घमंड नभ गरजत घोरा । प्रिया हीन डरपत मन मोरा ॥ दामिनि दमक रह न घन माहीं । खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ॥

आकाशमें बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीताजी) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजलीकी चमक बादलोंमें ठहरती नहीं, जैसे दुष्टकी प्रीति स्थिर नहीं रहती ॥ १ ॥

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ । जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ ॥ बूँद अधात सहहिं गिरि कैसँ । खल के बचन संत सह जैसँ ॥

बादल पृथ्वीके समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदोंकी चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टोंके वचन संत सहते हैं ॥ २ ॥

६१६

  • रामचरितमानस *

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥ भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी॥

छोटी नदियाँ भरकर [किनारोंको] तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धनसे भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादाका त्याग कर देते हैं)। पृथ्वीपर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीवके माया लिपट गयी हो ॥ ३ ॥

समिति समिति जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुण सज्जन पहिं आवा॥ सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई॥

जल एकत्र हो-होकर तालाबोंमें भर रहा है, जैसे सदगुण [एक-एककर] सज्जनके पास चले आते हैं। नदीका जल समुद्रमें जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव श्रीहरिको पाकर अचल (आवागमनसे मुक्त) हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—हरित भूमि तून संकुल समुद्धि परहिं नहिं पंथ। जिमि पार्खंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ १४॥

पृथ्वी घाससे परिपूर्ण होकर हरी हो गयी है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पार्खण्ड-मतके प्रचारसे सदग्रन्थ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं ॥ १४ ॥

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई॥ नव पल्लव भाए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका॥

चारों दिशाओंमें मेढकोंकी ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियोंके समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षोंमें नये पत्ते आ गये हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गये हैं जैसे साधकका मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होनेपर हो जाता है ॥ १ ॥

अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ॥ खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी॥

मदार और जवासा बिना पत्तेके हो गये (उनके पत्ते झड़ गये)। जैसे श्रेष्ठ राज्यमें दुष्टोंका उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजनेपर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्मको दूर कर देता है (अर्थात् क्रोधका आवेश होनेपर धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता) ॥ २ ॥

ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी॥ निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा॥

अन्नसे युक्त (लहलहाती हुई खेतीसे हरी-भरी) पृथ्वी कैसी शोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुषकी सम्पत्ति। रातके घने अन्धकारमें जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दम्भियोंका समाज आ जुटा हो ॥ ३ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

६१७

महाबृष्टि चलि फूटि किआरौं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं ॥ कृषी निरावहिं चतुर किसाना । जिमि बुध तजहिं मोह मद माना ॥

भारी वर्षासे खेतोंकी क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतन्त्र होनेसे स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतोंको निरा रहे हैं (उनमेंसे घास आदिको निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान् लोग मोह, मद और मानका त्याग कर देते हैं ॥ ४ ॥

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं ॥ ऊषर बरषइ तून नहिं जामा । जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा ॥

चक्रवाक पक्षी दिखायी नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुगको पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसरमें वर्षा होती है, पर वहाँ घासतक नहीं उगती। जैसे हरिभक्तके हृदयमें काम नहीं उत्पन्न होता ॥ ५ ॥

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा । प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा ॥ जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना । जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना ॥

पृथ्वी अनेक तरहके जीवोंसे भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजाकी वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होनेपर इन्द्रियाँ [शिथिल होकर विषयोंकी ओर जाना छोड़ देती हैं] ॥ ६ ॥

दो०— कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं ।

जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं ॥ १५ ( क ) ॥

कभी-कभी वायु बड़े जोरसे चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्रके उत्पन्न होनेसे कुलके उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ( क ) ॥

कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग ।

बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग ॥ १५ ( ख ) ॥

कभी [बादलोंके कारण] दिनमें घोर अन्धकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है ॥ १५ ( ख ) ॥

बरषा बिगत सरद रिनु आई । लछिमन देखहु परम सुहाई ॥ फूलें कास सकल महि छाई । जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई ॥

हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गयी और परम सुन्दर शरद-ऋतु आ गयी। फूलें हुए काससे सारी पृथ्वी छा गयी। मानो वर्षा-ऋतुने [कासरूपी सफेद बालोंके रूपमें] अपना बुढ़ापा प्रकट किया है ॥ १ ॥

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा । जिमि लोभहि सोषइ संतोषा ॥ सरिता सर निर्मल जल सोहा । संत हृदय जस गत मद मोहा ॥

६१८

  • रामचरितमानस *

अगस्त्यके तारने उदय होकर मार्गके जलको सोख लिया, जैसे सन्तोष लोभको सोख लेता है। नदियों और तालाबोंका निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोहसे रहित संतोंका हृदय! ॥ २ ॥

रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी ॥ जानि सरद रिनु खंजन आए। पाड़ समय जिमि सुकृत सुहाए ॥

नदी और तालाबोंका जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी (विवेकी) पुरुष ममताका त्याग करते हैं। शरद-ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गये। जैसे समय पाकर सुन्दर सुकृत आ जाते हैं (पुण्य प्रकट हो जाते हैं) ॥ ३ ॥

पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी ॥ जल संकोच बिकल भई मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना ॥

न कीचड़ है न धूल; इससे धरती [निर्मल होकर] ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीतिनिपुण राजाकी करनी! जलके कम हो जानेसे मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख (विवेकशून्य) कुटुम्बी (गृहस्थ) धनके बिना व्याकुल होता है ॥ ४ ॥

बिनु घन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा ॥ कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ॥

बिना बादलोंका निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओंको छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं (विरले ही स्थानोंमें) शरद-ऋतुकी थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं ॥ ५ ॥

दो०— चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिरखारि।

जिमि हरिभगति पाड़ श्रम तजहिं आश्रमी चारि ॥ १६ ॥

[शरद-ऋतु पाकर] राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिरखारी [क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षाके लिये] हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्रीहरिकी भक्ति पाकर चारों आश्रमवाले [नाना प्रकारके साधनरूपी] श्रमोंको त्याग देते हैं ॥ १६ ॥

सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा ॥ फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा ॥

जो मछलियाँ अथाह जलमें हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्रीहरिके शरणमें चले जानेपर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलोंके फूलनेसे तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुन ब्रह्म सगुन होनेपर शोभित होता है ॥ १ ॥

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा ॥ चक्रबाक मन दुख निसि पेखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

६१९

भौर अनुपम शब्द करते हुए गँऊ रहे हैं, तथा पक्षियोंके नाना प्रकारके सुन्दर शब्द हो रहे हैं । रात्रि देखकर चकवेके मनमें वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरेकी सम्पत्ति देखकर दुष्टको होता है ॥ २ ॥

चातक रटत तृषा अति ओही । जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही ॥ सरदातप निसि ससि अपहरई । संत दरस जिमि पातक टरई ॥

पपीहा रट लगाये हैं, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्रीशङ्करजीका द्रोही सुख नहीं पाता (सुखके लिये झीखता रहता है) । शरद-ऋतुके तापको रातके समय चन्द्रमा हर लेता है, जैसे संतोके दर्शनसे पाप दूर हो जाते हैं ॥ ३ ॥

देखि इंदु चकोर समुदाई । चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई ॥ मसक दंस बीते हिम त्रासा । जिमि द्विज द्रोह किऐ कुल नासा ॥

चकोरोंके समुदाय चन्द्रमाको देखकर इस प्रकार टकटकी लगाये हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्को पाकर उनके [निर्निमेष नेत्रोंसे] दर्शन करते हैं । मच्छर और डॉस जाड़ेके डरसे इस प्रकार नष्ट हो गये जैसे ब्राह्मणके साथ वैर करनेसे कुलका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।

सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ ॥ १७ ॥

[वर्षा-ऋतुके कारण] पृथ्वीपर जो जीव भर गये थे, वे शरद-ऋतुको पाकर वैसे ही नष्ट हो गये जैसे सदगुरुके मिल जानेपर सन्देह और भ्रमके समूह नष्ट हो जाते हैं ॥ १७ ॥

बरषा गत निर्मल रितु आई । सुधि न तात सीता कै पाई ॥ एक बार कैसेहुँ सुधि जानौँ । कालहु जीति निमिष महुँ आनौँ ॥

वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद-ऋतु आ गयी । परन्तु हे तात ! सीताकी कोई खबर नहीं मिली । एक बार कैसे भी पता पाऊँ तो कालको भी जीतकर पलभरमें जानकीको ले आऊँ ॥ १ ॥

कतहुँ रहउ जौँ जीवति होई । तात जतन करि आनउँ सोई ॥ सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी । पावा राज कोस पुर नारी ॥

कहीं भी रहे, यदि जीती होगी तो हे तात ! यत्न करके मैं उसे अवश्य लाऊँगा । राज्य, खजाना, नगर और स्त्री पा गया, इसलिये सुग्रीवने भी मेरी सुधि भुला दी ॥ २ ॥

जेहिं सायक मारा मैं बाली । तेहिं सर हतौँ मूढ़ कहैं काली ॥ जासु कृपा छूटहिं मद मोहा । ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा ॥

जिस बाणसे मैंने बालिको मारा था, उसी बाणसे कल उस मूढ़को मारूँ ! [शिवजी कहते हैं—] हे उमा ! जिनकी कृपासे मद और मोह छूट जाते हैं, उनको कहीं स्वप्नमें भी क्रोध हो सकता है ? [यह तो लीलामात्र है] ॥ ३ ॥

७००

  • रामचरितमानस *

जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी । जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी ॥ लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना । धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना ॥

ज्ञानी मुनि जिन्होंने श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें प्रीति मान ली है (जोड़ ली है), वे ही इस चरित्र (लीलारहस्य) को जानते हैं। लक्ष्मणजीने जब प्रभुको क्रोधयुक्त जाना, तब उन्होंने धनुष चढ़ाकर बाण हाथमें ले लिये ॥ ४ ॥

दो०—तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सीव ।

भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव ॥ १८ ॥

तब दयाकी सीमा श्रीरघुनाथजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीवको केवल भय दिखलाकर ले आओ [उसे मारनेकी बात नहीं है] ॥ १८ ॥

इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा । राम काजु सुग्रीवँ बिसारा ॥ निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा । चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा ॥

यहाँ (किष्किन्धानगरीमें) पवनकुमार श्रीहनुमानजीने विचार किया कि सुग्रीवने श्रीरामजीके कार्यको भुला दिया। उन्होंने सुग्रीवके पास जाकर चरणोंमें सिर नवाया। [साम, दान, दण्ड, भेद] चारों प्रकारकी नीति कहकर उन्हें समझाया ॥ १ ॥

सुनि सुग्रीवँ परम भय माना । बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना ॥ अब मारुतसुत दूत समूहा । पठवहु जहाँ तहाँ बानर जूहा ॥

हनुमानजीके वचन सुनकर सुग्रीवने बहुत ही भय माना। [और कहा—] विषयोंने मेरे ज्ञानको हर लिया। अब हे पवनसुत! जहाँ-तहाँ बानरोंके यूथ रहते हैं; वहाँ दूतोंके समूहोंको भेजो ॥ २ ॥

कहहु पाख महुँ आव न जोई । मोरें कर ता कर बध होई ॥ तब हनुमंत बोलाए दूता । सब कर करि सनमान बहूता ॥

और कहला दो कि एक पखवाड़ेमें (पंद्रह दिनोंमें) जो न आ जायगा, उसका मेरे हाथों बध होगा। तब हनुमानजीने दूतोंको बुलाया और सबका बहुत सम्मान करके— ॥ ३ ॥

भय अरु प्रीति नीति देखराई । चले सकल चरनन्हि सिर नाई ॥ एहि अवसर लछिमन पुर आए । क्रोध देखि जहाँ तहाँ कपि धाए ॥

सबको भय, प्रीति और नीति दिखलायी। सब बंदर चरणोंमें सिर नवाकर चले। इसी समय लक्ष्मणजी नगरमें आये। उनका क्रोध देखकर बंदर जहाँ-तहाँ भागे ॥ ४ ॥

दो०—धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार ।

व्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार ॥ १९ ॥

तदनन्तर लक्ष्मणजीने धनुष चढ़ाकर कहा कि नगरको जलाकर अभी राख कर दूँगा। तब नगरभरको व्याकुल देखकर बालिपुत्र अंगदजी उनके पास आये ॥ १९ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०१

चरन नाड़ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही ॥ क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना ॥

अंगदने उनके चरणोंमें सिर नवाकर विनती की (क्षमायाचना की)। तब लक्ष्मणजीने उनको अभय बाँह दी (भुजा उठाकर कहा कि डरो मत)। सुग्रीवने अपने कानोंसे लक्ष्मणजीको क्रोधयुक्त सुनकर भयसे अत्यन्त व्याकुल होकर कहा— ॥ १ ॥

सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा ॥ तारा सहित जाड़ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना ॥

हे हनुमान्! सुनो, तुम ताराको साथ ले जाकर विनती करके राजकुमारको समझाओ (समझा-बुझाकर शान्त करो)। हनुमान्जीने तारासहित जाकर लक्ष्मणजीके चरणोंकी वन्दना की और प्रभुके सुन्दर यशका बखान किया ॥ २ ॥

करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखाारि पलँग बैठाए ॥ तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा ॥

वे विनती करके उन्हें महलमें ले आये तथा चरणोंको धोकर उन्हें पलँगपर बैठाया। तब वानरराज सुग्रीवने उनके चरणोंमें सिर नवाया और लक्ष्मणजीने हाथ पकड़कर उनको गलेसे लगा लिया ॥ ३ ॥

नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करड़ छन माहीं ॥ सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा ॥

[सुग्रीवने कहा—] हे नाथ! विषयके समान और कोई मद नहीं है। यह मुनियोंके मनमें भी क्षणमात्रमें मोह उत्पन्न कर देता है [फिर मैं तो विषयी जीव ही ठहरा]। सुग्रीवके विनययुक्त बचन सुनकर लक्ष्मणजीने सुख पाया और उनको बहुत प्रकारसे समझाया ॥ ४ ॥

पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई ॥

तब पवनसुत हनुमान्जीने जिस प्रकार सब दिशाओंमें दूतोंके समूह गये थे वह सब हाल सुनाया ॥ ५ ॥

दो०—हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।

रामानुज आगें करि आए जहाँ रघुनाथ ॥ २० ॥

तब अंगद आदि वानरोंको साथ लेकर और श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणजीको आगे करके (अर्थात् उनके पीछे-पीछे) सुग्रीव हर्षित होकर चले और जहाँ रघुनाथजी थे वहाँ आये ॥ २० ॥

नाड़ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी ॥ अतिसय प्रबल देव तव माया। छूटड़ राम करहु जौं दाय। ॥

७०२

  • रामचरितमानस *

श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें सिर नवाकर हाथ जोड़कर सुग्रीवने कहा—हे नाथ! मुझे कुछ भी दोष नहीं है। हे देव! आपकी माया अत्यन्त ही प्रबल है। आप जब दया करते हैं, हे राम! तभी यह छूटती है ॥ १ ॥

बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी । मैं पावैर पसु कपि अति कामी ॥ नारि नयन सर जाहि न लागा । घोर क्रोध तम निसि जो जागा ॥

हे स्वामी! देवता, मनुष्य और मुनि सभी विषयोंके वशमें हैं। फिर मैं तो पामर पशु और पशुओंमें भी अत्यन्त कामी बंदर हूँ। स्त्रीका नयन-बाण जिसको नहीं लगा, जो भयङ्कर क्रोधरूपी अंधेरी रातमें भी जागता रहता है (क्रोधान्ध नहीं होता) ॥ २ ॥

लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया । सो नर तुम्ह समान रघुराया ॥ यह गुन साधन तें नहिं होई । तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई ॥

और लोभकी फाँसीसे जिसने अपना गला नहीं बँधाया, हे रघुनाथजी! वह मनुष्य आपहीके समान है। ये गुण साधनसे नहीं प्राप्त होते। आपकी कृपासे ही कोई-कोई इन्हें पाते हैं ॥ ३ ॥

तब रघुपति बोले मुसुकाई । तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई ॥ अब सोइ जतनु करहु मन लाई । जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई ॥

तब श्रीरघुनाथजी मुसकराकर बोले—हे भाई! तुम मुझे भरतके समान प्यारे हो। अब मन लगाकर वही उपाय करो जिस उपायसे सीताकी खबर मिले ॥ ४ ॥

दो०—एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ । नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ ॥ २१ ॥

इस प्रकार बातचीत हो रही थी कि वानरोंके यूथ (झुंड) आ गये। अनेक रंगोंके वानरोंके दल सब दिशाओंमें दिखायी देने लगे ॥ २१ ॥

बानर कटक उमा मैं देखा । सो मूरुख जो करन चह लेखा ॥ आइ राम पद नावहिं माथा । निरखि बदनु सब होहिं सनाथा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! वानरोंकी वह सेना मैंने देखी थी। उसकी जो गिनती करना चाहे वह महान् मूर्ख है। सब वानर आ-आकर श्रीरामजीके चरणोंमें मस्तक नवाते हैं और [सौन्दर्य-माधुर्यनिधि] श्रीमुखके दर्शन करके कृतार्थ होते हैं ॥ १ ॥

अस कपि एक न सेना माहीं । राम कुसल जेहि पूछी नाहीं ॥ यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई । बिस्वरूप व्यापक रघुराई ॥

सेनामें एक भी वानर ऐसा नहीं था जिससे श्रीरामजीने कुशल न पूछी हो। प्रभुके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है; क्योंकि श्रीरघुनाथजी विश्वरूप तथा सर्वव्यापक हैं (सारे रूपों और सब स्थानोंमें हैं) ॥ २ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०३

ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई॥ राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा॥

आज्ञा पाकर सब जहाँ-तहाँ खड़े हो गये। तब सुग्रीवने सबको समझाकर कहा कि हे वानरोंके समूहो! यह श्रीरामचन्द्रजीका कार्य है और मेरा निहोरा (अनुरोध) है; तुम चारों ओर जाओ॥ ३॥

जनकसुता कहँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई॥ अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवड़ बनिहि सो मोहि मराएँ॥

और जाकर जानकीजीको खोजो। हे भाई! महीनेभरमें वापस आ जाना। जो [महीनेभरकी] अवधि बिताकर बिना पता लगाये ही लौट आवेगा उसे मेरे द्वारा मरवाते ही बनेगा (अर्थात् मुझे उसका वध करवाना ही पड़ेगा)॥ ४॥

दो०—बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत। तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत॥ २२॥

सुग्रीवके वचन सुनते ही सब वानर तुरंत जहाँ-तहाँ (भिन्न-भिन्न दिशाओंमें) चल दिये। तब सुग्रीवने अंगद, नल, हनुमान् आदि प्रधान-प्रधान योद्धाओंको बुलाया [और कहा—]॥ २२॥

सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना॥ सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूछेहु सब काहू॥

हे धीरबुद्धि और चतुर नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान्! तुम सब श्रेष्ठ योद्धा मिलकर दक्षिण दिशाको जाओ और सब किसीसे सीताजीका पता पूछना॥ १॥

मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु॥ भानु पीठि सेड़अ उर आगी। स्वामिहि सर्व भाव छल त्यागी॥

मन, वचन तथा कर्मसे उसीका (सीताजीका पता लगानेका) उपाय सोचना। श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सम्पन्न (सफल) करना। सूर्यको पीठसे और अग्निको हृदयसे (सामनेसे) सेवन करना चाहिये। परन्तु स्वामीकी सेवा तो छल छोड़कर सर्वभावसे (मन, वचन, कर्मसे) करनी चाहिये॥ २॥

तजि माया सेड़अ परलोक। मिटहिँ सकल भवसंभव सोका॥ देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई॥

माया (विषयोंकी ममता-आसक्ति) को छोड़कर परलोकका सेवन (भगवान्के दिव्य धामकी प्राप्तिके लिये भगवत्सेवारूप साधन) करना चाहिये, जिससे भव (जन्म-मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जायँ। हे भाई! देह धारण करनेका यही फल है कि सब कामों (कामनाओं) को छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही किया जाय॥ ३॥

७०४

  • रामचरितमानस *

सोइ गुनगय सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी ॥ आयसु मागि चरन सिरु नाई । चले हरषि सुमिरत रघुराई ॥

सदगुणोंको पहचाननेवाला (गुणवान्) तथा बड़भागी वही है जो श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेमी है । आज्ञा माँगकर और चरणोंमें फिर सिर नवाकर श्रीरघुनाथजीका स्मरण करते हुए सब हर्षित होकर चले ॥ ४ ॥

पाछें पवन तनय सिरु नावा । जानि काज प्रभु निकट बोलावा ॥ परसा सीस सरोरुह पानी । करमुद्रिका दीन्हि जन जानी ॥

सबके पीछे पवनसुत श्रीहनुमान्जीने सिर नवाया । कार्यका विचार करके प्रभुने उन्हें अपने पास बुलाया । उन्होंने अपने कर-कमलसे उनके सिरका स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथकी अँगूठी उतारकर दी ॥ ५ ॥

बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु । कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु ॥ हनुमत जन्म सुफल करि माना । चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना ॥

[और कहा—] बहुत प्रकारसे सीताको समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) कहकर तुम शीघ्र लौट आना । हनुमान्जीने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभुको हृदयमें धारण करके वे चले ॥ ६ ॥

जद्यपि प्रभु जानत सब बाता । राजनीति राखत सुरत्राता ॥

जद्यपि देवताओंकी रक्षा करनेवाले प्रभु सब बात जानते हैं, तो भी वे राजनीतिकी रक्षा कर रहे हैं । (नीतिकी मर्यादा रखनेके लिये सीताजीका पता लगानेको जहाँ-तहाँ वानरोंको भेज रहे हैं) ॥ ७ ॥

दो०—चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह ।

राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह ॥ २३ ॥

सब वानर वन, नदी, तालाब, पर्वत और पर्वतोंकी कन्दराओंमें खोजते हुए चले जा रहे हैं । मन श्रीरामजीके कार्यमें लवलीन है । शरीरतकका प्रेम (ममत्व) भूल गया है ॥ २३ ॥

कतहुँ होइ निसिचर सँ भँटा । प्रान लेहिँ एक एक चपेटा ॥

बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिँ । कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिँ ॥

कहीं किसी राक्षससे भँट हो जाती है, तो एक-एक चपतमें ही उसके प्राण ले लेते हैं । पर्वतों और वनोंको बहुत प्रकारसे खोज रहे हैं । कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछनेके लिये उसे सब घेर लेते हैं ॥ १ ॥

लागि तृष्णा अतिसय अकुलाने । मिलइ न जल घन गहन भुलाने ॥

मन हनुमान कीन्ह अनुमाना । मरन चहत सब बिनु जल पाना ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०५

इतनेमें ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये। किन्तु जल कहीं नहीं मिला। घने जंगलमें सब भुला गये। हनुमान्जीने मनमें अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं ॥ २ ॥

चढ़ि गिरि सिखर चहुँ दिसि देखा । भूमि बिबर एक कौतुक पेखा ॥ चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं । बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ॥

उन्होंने पहाड़की चोटीपर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वीके अंदर एक गुफामें उन्हें एक कौतुक (आश्चर्य) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं ॥ ३ ॥

गिरि ते उतरि पवनसुत आवा । सब कहुँ लै सोड़ बिबर देखावा ॥ आगें कै हनुमंतहि लीन्हा । पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ॥

पवनकुमार हनुमान्जी पर्वतसे उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमान्जीको आगे कर लिया और वे गुफामें घुस गये, देर नहीं की ॥ ४ ॥

दो०— दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज ।

मंदिर एक रुचिर तहाँ बैठि नारि तप पुंज ॥ २४ ॥

अंदर जाकर उन्होंने एक उत्तम उपबन (बगीचा) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहाँ एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है ॥ २४ ॥

दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा । पूछें निज बृत्तांत सुनावा ॥ तेहिं तब कहा करहु जल पाना । खाहु सुरस सुंदर फल नाना ॥

दूरसे ही सबने उसे सिर नवाया और पूछनेपर अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब उसने कहा—जलपान करो और भाँति-भाँतिके रसीले सुन्दर फल खाओ ॥ १ ॥

मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए । तासु निकट पुनि सब चलि आए ॥ तेहिं सब आपनि कथा सुनाई । मैं अब जाब जहाँ रघुराई ॥

[आज्ञा पाकर] सबने स्नान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [और कहा—] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं ॥ २ ॥

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू । पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ॥ नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा । ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा ॥

तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफाको छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजीको पा जाओगे, पछताओ नहीं (निराश न होओ)। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्रके तीरपर खड़े हैं ॥ ३ ॥

७०६

  • रामचरितमानस *

सो पुनि गईं जहाँ रघुनाथा । जाइ कमल पद नाएसि माथा ॥ नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही । अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ॥

और वह स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभुके चरणकमलोंमें मस्तक नवाया और बहुत प्रकारसे विनती की। प्रभुने उसे अपनी अनपायिनी (अचल) भक्ति दी ॥ ४ ॥

दो०—बदरीबन कहूँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस।

उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस ॥ २५ ॥

प्रभुकी आज्ञा सिरपर धारणकर और श्रीरामजीके युगल चरणोंको, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदयमें धारणकर वह (स्वयंप्रभा) बदरिकाश्रमको चली गयी ॥ २५ ॥

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं । बीती अवधि काज कछु नाहीं ॥

सब मिलि कहहिं परस्पर बाता । बिनु सुधि लएँ करब का भाता ॥

यहाँ वानरगण मनमें विचार कर रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपसमें बात करने लगे कि हे भाई! अब तो सीताजीकी खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे ? ॥ १ ॥

कह अंगद लोचन भरि बारी । दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ॥

इहाँ न सुधि सीता कै पाई । उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ॥

अंगदने नेत्रोंमें जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकारसे हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजीकी सुध नहीं मिली और वहाँ जानेपर वानरराज सुप्रीव मार डालेंगे ॥ २ ॥

पिता बधे पर मारत मोही । राखा राम निहोर न ओही ॥

पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं । मरन भयउ कछु संसय नाहीं ॥

वे तो पिताके वध होनेपर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजीने ही मेरी रक्षा की, इसमें सुप्रीवका कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥

अंगद बचन सुनत कपि बीरा । बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ॥

छन एक सोच मगन होइ रहे । पुनि अस बचन कहत सब भए ॥

वानर वीर अंगदके वचन सुनते हैं; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रोंसे जल बह रहा है। एक क्षणके लिये सब सोचमें मग्न हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे— ॥ ४ ॥

हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना । नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना ॥

अस कहि लवन सिंधु तट जाई । बैठे कपि सब दर्भ डसाई ॥

हे सुयोग्य युवराज! हमलोग सीताजीकी खोज लिये बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागरके तटपर जाकर सब वानर कुश बिछाकर बैठ गये ॥ ५ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०७

जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी॥ तात राम कहूं नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु॥

जाम्बवान्ने अंगदका दुःख देखकर विशेष उपदेशकी कथाएँ कहीं। [वे बोले—] हे तात! श्रीरामजीको मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो॥६॥

हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी॥

हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म (श्रीरामजी) में प्रीति रखते हैं॥७॥

दो०—निज इच्छां प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।

सगुन उपासक संग तहँ रहहिँ मोच्छ सब त्यागि॥२६॥

देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणोंके लिये प्रभु अपनी इच्छासे [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंको त्यागकर उनकी सेवामें साथ रहते हैं॥२६॥

एहि बिधि कथा कहहिँ बहु भाँती। गिरि कंदराँ सुनी संपाती॥ बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा॥

इस प्रकार जाम्बवान् बहुत प्रकारसे कथाएँ कह रहे हैं। इनकी बातें पर्वतकी कन्दरामें सम्पातीने सुनीं। बाहर निकलकर उसने बहुत-से वानर देखे। [तब वह बोला—] जगदीश्वरने मुझको घर बैठे बहुत-सा आहार भेज दिया!॥१॥

आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ॥ कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिँ बारा॥

आज इन सबको खा जाऊँगा। बहुत दिन बीत गये, भोजनके बिना मर रहा था। पेटभर भोजन कभी नहीं मिलता। आज विधाताने एक ही बारमें बहुत-सा भोजन दे दिया॥२॥

डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना॥ कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी॥

गीधके वचन कानोंसे सुनते ही सब डर गये कि अब सचमुच ही मरना हो गया, यह हमने जान लिया। फिर उस गीध (सम्पाती) को देखकर सब वानर उठ खड़े हुए। जाम्बवान्के मनमें विशेष सोच हुआ॥३॥

कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं॥ राम काज कारन तनु त्यागी। हरि पुर गयउ परम बड़भागी॥

अंगदने मनमें विचारकर कहा—अहा! जटायुके समान धन्य कोई नहीं है। श्रीरामजीके कार्यके लिये शरीर छोड़कर वह परम बड़भागी भगवान्के परमधामको चला गया॥४॥

७०८

  • रामचरितमानस *

सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी ॥ तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई । कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई ॥

हर्ष और शोकसे युक्त वाणी (समाचार) सुनकर वह पक्षी (सम्पाती) वानरोंके पास आया। वानर डर गये। उनको अभय करके (अभय-वचन देकर) उसने पास जाकर जटायुका वृत्तान्त पूछा, तब उन्होंने सारी कथा उसे कह सुनायी ॥५॥

सुनि संपाति बंधु कै करनी । रघुपति महिमा बहुबिधि बरनी ॥

भाई जटायुकी करनी सुनकर सम्पातीने बहुत प्रकारसे श्रीरघुनाथजीकी महिमा वर्णन की ॥६॥

दो०—मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।

बचन सहाइ करबि मैं पैहहु खोजहु जाहि ॥ २७ ॥

[उसने कहा—] मुझे समुद्रके किनारे ले चलो, मैं जटायुको तिलाञ्जलि दे दूँ। इस सेवाके बदले मैं तुम्हारी वचनसे सहायता करूँगा (अर्थात् सीताजी कहाँ हैं सो बतला दूँगा) जिसे तुम खोज रहे हो उसे पा जाओगे ॥ २७ ॥

अनुज क्रिया करि सागर तीरा । कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा ॥

हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उड़ाई ॥

समुद्रके तीरपर छोटे भाई जटायुकी क्रिया (श्राद्ध आदि) करके सम्पाती अपनी कथा कहने लगा—हे वीर वानरो! सुनो, हम दोनों भाई उठती जवानीमें एक बार आकाशमें उड़कर सूर्यके निकट चले गये ॥ १ ॥

तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मैं अभिमानी रबि निअरावा ॥

जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ॥

वह (जटायु) तेज नहीं सह सका, इससे लौट आया। (किन्तु) मैं अभिमानी था इसलिये सूर्यके पास चला गया। अत्यन्त अपार तेजसे मेरे पंख जल गये। मैं बड़े जोरसे चीख मारकर जमीनपर गिर पड़ा ॥ २ ॥

मुनि एक नाम चंद्रमा ओही । लागी दया देखि करि मोही ॥

बहु प्रकार तेहिं ग्यान सुनावा । देहजनित अभिमान छड़ावा ॥

वहाँ चन्द्रमा नामके एक मुनि थे। मुझे देखकर उन्हें बड़ी दया लगी। उन्होंने बहुत प्रकारसे मुझे ज्ञान सुनाया और मेरे देहजनित (देहसम्बन्धी) अभिमानको छुड़ा दिया ॥ ३ ॥

त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही । तासु नारि निसिचर पति हरिही ॥

तासु खोज पठइहि प्रभु दूता । तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७०९

[उन्होंने कहा—] त्रेतायुगमें साक्षात् परब्रह्म मनुष्यशरीर धारण करेंगे। उनकी स्त्रीको राक्षसोंका राजा हर ले जायगा। उसकी खोजमें प्रभु दूत भेजेंगे। उनसे मिलनेपर तू पवित्र हो जायगा ॥ ४ ॥

जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता। तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता ॥ मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू। सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू ॥

और तेरे पंख उग आयेंगे; चिन्ता न कर। उन्हें तू सीताजीको दिखा देना। मुनिकी वह वाणी आज सत्य हुई। अब मेरे वचन सुनकर तुम प्रभुका कार्य करो ॥ ५ ॥

गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका। तहैं रह रावन सहज असंका ॥ तहैं असोक उपवन जहैं रहई। सीता बैठि सोच रत अहई ॥

त्रिकूट पर्वतपर लङ्का बसी हुई है। वहाँ स्वभावहीसे निडर रावन रहता है। वहाँ अशोक नामका उपवन (बगीचा) है, जहाँ सीताजी रहती हैं। [इस समय भी] वे सोचमें मग्न बैठी हैं ॥ ६ ॥

दो०—मैं देखउँ तुम्ह नहीं गीधहि दृष्टि अपार। बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार ॥ २८ ॥

मैं उन्हें देख रहा हूँ, तुम नहीं देख सकते; क्योंकि गीधकी दृष्टि अपार होती है (बहुत दूरतक जाती है)। क्या करूँ? मैं बूढ़ हो गया, नहीं तो तुम्हारी कुछ तो सहायता अवश्य करता ॥ २८ ॥

जो नाघइ सत जोजन सागर। करइ सो राम काज मति आगर ॥ मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा। राम कृपाँ कस भयउ सरीरा ॥

जो सौ योजन (चार सौ कोस) समुद्र लॉघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा वही श्रीरामजीका कार्य कर सकेगा। [निराश होकर घबराओ मत] मुझे देखकर मनमें धीरज धरो। देखो, श्रीरामजीकी कृपासे [देखते-ही-देखते] मेरा शरीर कैसा हो गया (बिना पाँखका बेहाल था, पाँख उगनेसे सुन्दर हो गया) !! १ ॥

पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं ॥ तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई ॥

पापी भी जिनका नाम स्मरण करके अत्यन्त अपार भवसागरसे तर जाते हैं, तुम उनके दूत हो, अतः कायरता छोड़कर श्रीरामजीको हृदयमें धारण करके उपाय करो ॥ २ ॥

अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ ॥ निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! इस प्रकार कहकर जब गीध चला गया, तब उन (वानरों) के मनमें अत्यन्त विस्मय हुआ। सब किसीने अपना-अपना बल कहा! पर समुद्रके पार जानेमें सभीने सन्देह प्रकट किया ॥ ३ ॥

७१०

  • रामचरितमानस *

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा । नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा ॥ जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी । तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी ॥

ऋक्षराज जाम्बवान् कहने लगे—मैं अब बूढ़ा हो गया। शरीरमें पहलेवाले बलका लेश भी नहीं रहा। जब खरारि (खरके शत्रु श्रीराम) वामन बने थे, तब मैं जवान था और मुझमें बड़ा बल था ॥ ४ ॥

दो०—बलि बाँधत प्रभु बाढ़ेउ सो तनु बरनि न जाइ।

उभय घरी महाँ दीन्हीं सात प्रदच्छिन धाइ ॥ २९ ॥

बलिके बाँधते समय प्रभु इतने बढ़े कि उस शरीरका वर्णन नहीं हो सकता, किन्तु मैंने दो ही घड़ीमें दौड़कर [उस शरीरकी] सात प्रदक्षिणाएँ कर लीं ॥ २९ ॥

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा । जियँ संसय कछु फिरती बारा ॥

जामवंत कह तुम्ह सब लायक । पठइअ किमि सबही कर नायक ॥

अंगदने कहा—मैं पार तो चला जाऊँगा। परन्तु लौटते समयके लिये हृदयमें कुछ सन्देह है। जाम्बवान्ने कहा—तुम सब प्रकारसे योग्य हो। परन्तु तुम सबके नेता हो, तुम्हें कैसे भेजा जाय ? ॥ १ ॥

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥

पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥

ऋक्षराज जाम्बवान्ने श्रीहनुमान्जीसे कहा—हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवनके पुत्र हो और बलमें पवनके समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञानकी खान हो ॥ २ ॥

कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥

राम काज लगि तव अवतारा । सुनतहिं भयउ पर्वताकारा ॥

जगत्में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्रीरामजीके कार्यके लिये ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वतके आकारके (अत्यन्त विशालकाय) हो गये ॥ ३ ॥

कनक बरन तन तेज बिराजा । मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ॥

सिंहनाद करि बारहिं बारा । लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ॥

उनका सोनेका-सा रंग है, शरीरपर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो। हनुमान्जीने बार-बार सिंहनाद करके कहा—मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ ॥ ४ ॥

सहित सहाय रावनहि मारी । आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी ॥

जामवंत मैं पूछउँ तोही । उचित सिखावनु दीजहु मोही ॥

और सहायकोंसहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान्! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना [कि मुझे क्या करना चाहिये] ॥ ५ ॥

  • किष्किन्धाकाण्ड *

७११

एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥ तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥

[जाम्बवान्ने कहा—] हे तात! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजीको देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्रीरामजी अपने बाहुबलसे [ही राक्षसोंका संहार कर सीताजीको ले आयेंगे, केवल] खेलके लिये ही वे वानरोंकी सेना साथ लेंगे॥ ६ ॥

छं०—कपि सेन संग सँधारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं। त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं॥ जो सुनत गावत कहत समुद्गत परम पद नर पावई। रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥

वानरोंकी सेना साथ लेकर राक्षसोंका संहार करके श्रीरामजी सीताजीको ले आयेंगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान्के तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाले सुन्दर यशका बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझनेसे मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्रीरघुवीरके चरणकमलका मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।

दो०— भव भेषज रघुनाथजसु सुनहिंजे नर अरु नारि। तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥ ३० ( क )॥

श्रीरघुवीरका यश भव (जन्म-मरण)-रूपी रोगकी [अचूक] दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिराके शत्रु श्रीरामजी उनके सब मनोरथोंको सिद्ध करेंगे॥ ३० ( क )॥

सो०—नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक। सुनिअतासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥ ३० ( ख )॥

जिनका नीले कमलके समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियोंको मारनेके लिये बधिक (व्याध) के समान है, उन श्रीरामके गुणोंके समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिये॥ ३० ( ख )॥

मासपारायण, तेईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने चतुर्थः सोपानः समाप्तः।

कलियुगके समस्त पापोंके नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका

यह चौथा सोपान समाप्त हुआ।

( किष्किन्धाकाण्ड समाप्त )

लङ्कादहन

अदृहास करि गर्जा कपि बद्धि लाग अकास ॥