श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
७६६
- रामचरितमानस *
जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना मेरा कीजिये। जब उस (दूत) ने जानकीजीको देनेके लिये कहा, तब दुष्ट रावणने उसको लात मारी ॥ ४ ॥
नाड़ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥ करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई॥
वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणोंमें सिर नवाकर वहीं चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपासे अपनी गति (मुनिका स्वरूप) पायी ॥ ५ ॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥ बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहँ पगु धारा॥
(शिवजी कहते हैं—) हे भवानी! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषिके शापसे राक्षस हो गया था। बार-बार श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वह मुनि अपने आश्रमको चला गया ॥ ६ ॥
दो०—बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होड़ न प्रीति ॥ ५७ ॥
इधर तीन दिन बीत गये, किन्तु जड़ समुद्र बिनय नहीं मानता। तब श्रीरामजी क्रोधसहित बोले—बिना भयके प्रीति नहीं होती! ॥ ५७ ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौँ बारिधि बिसिख कृसानू॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥
हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाणसे समुद्रको सोख डालूँ। मूर्खसे बिनय, कुटिलके साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूससे सुन्दर नीति (उदारताका उपदेश), ॥ १ ॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बाँ फल जथा॥
ममतामें फँसे हुए मनुष्यसे ज्ञानकी कथा, अत्यन्त लोभीसे वैराग्यका वर्णन, क्रोधीसे शम (शान्ति) की बात और कामीसे भगवान्की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसरमें बीज बोनेसे होता है (अर्थात् ऊसरमें बीज बोनेकी भाँति यह सब व्यर्थ जाता है) ॥ २ ॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥ संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजीके मनको बहुत अच्छा लगा। प्रभुने भयानक [अग्नि] बाण सन्धान किया, जिससे समुद्रके हृदयके अंदर अग्निकी ज्वाला उठी ॥ ३ ॥
- सुन्दरकाण्ड *
७६७
मकर उरग द्रुष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥ कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥
मगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें आया ॥ ४ ॥
दो०— काटेहिं पड़ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पड़ नव नीच॥ ५८ ॥
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! सुनिये, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटनेपर ही फलता है। नीच विनयसे नहीं मानता, वह डाँटनेपर ही झुकता है (रास्तेपर आता है) ॥ ५८ ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥ गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कड़ नाथ सहज जड़ करनी॥
समुद्रने भयभीत होकर प्रभुके चरण पकड़कर कहा—हे नाथ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिये। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन सबकी करनी स्वभावसे ही जड़ है ॥ १ ॥
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥ प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥
आपकी प्रेरणासे मायाने इन्हें सृष्टिके लिये उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थोंने यही गाया है। जिसके लिये स्वामीकी जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकारसे रहनेमें सुख पाता है ॥ २ ॥
प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही॥ ढोल गवॉर सूद पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥
प्रभुने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा (दण्ड) दी; किन्तु मर्यादा (जीवोंका स्वभाव) भी आपकी ही बनायी हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री—ये सब शिक्षाके अधिकारी हैं ॥ ३ ॥
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटक न मोरि बड़ाई॥ प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाई॥
प्रभुके प्रतापसे मैं सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जायगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है (मेरी मर्यादा नहीं रहेगी)। तथापि प्रभुकी आज्ञा अपेल है (अर्थात् आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं हो सकता) ऐसा वेद गाते हैं। अब आपको जो अच्छा लगे, मैं तुरंत वही करूँ ॥ ४ ॥
७६८
- रामचरितमानस *
दो०— सुनत विनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ । जेहि बिधि उत्तै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ॥ ५९ ॥
समुद्रके अत्यन्त विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामजीने मुसकराकर कहा—हे तात! जिस प्रकार वानरोंकी सेना पार उत्तर जाय, वह उपाय बताओ ॥ ५९ ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई । लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥ तिन्ह कें परस किऐं गिरि भारे । तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ॥
[समुद्रने कहा—] हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपनमें ऋषिसे आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेनेसे ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रतापसे समुद्रपर तैर जायेंगे ॥ १ ॥
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई । करिहउँ बल अनुमान सहाई ॥ एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ । जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ॥
मैं भी प्रभुकी प्रभुताको हृदयमें धारण कर अपने बलके अनुसार (जहाँतक मुझसे बन पड़ेगा) सहायता करूँगा। हे नाथ! इस प्रकार समुद्रको बँधाइये, जिससे तीनों लोकोंमें आपका सुन्दर यश गाया जाय ॥ २ ॥
एहिं सर मम उत्तर तट बासी । हतहु नाथ खल नर अघ रासी ॥ सुनि कृपाल सागर मन पीरा । तुरतिहिं हरी राम रनधीरा ॥
इस बाणसे मेरे उत्तर तटपर रहनेवाले पापके राशि दुष्ट मनुष्योंका वध कीजिये। कृपालु और रणधीर श्रीरामजीने समुद्रके मनकी पीड़ा सुनकर उसे तुरंत ही हर लिया (अर्थात् बाणसे उन दुष्टोंका वध कर दिया) ॥ ३ ॥
देखि राम बल पौरुष भारी । हरषि पयोनिधि भयउ सुरखारी ॥ सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बंदि पाथोधि सिधावा ॥
श्रीरामजीका भारी बल और पौरुष देखकर समुद्र हर्षित होकर सुरखी हो गया। उसने उन दुष्टोंका सारा चरित्र प्रभुको कह सुनाया। फिर चरणोंकी वन्दना करके समुद्र चला गया ॥ ४ ॥
छं०— निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ । यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना । तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ॥
- सुन्दरकाण्ड * ७६९
समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत (उसकी सलाह) अच्छा लगा। यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है। श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं। अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा-भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन।
दो०-सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥
श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है। जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागरको तर जायँगे॥ ६०॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ।
( सुन्दरकाण्ड समाप्त )
शरणागतवत्सलता
तुरत विभीषण पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोड़ सेला ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
षष्ठ सोपान
लङ्काकाण्ड
श्लोक
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमतेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् । मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्विशरूपम् ॥ १ ॥
कामदेवके शत्रु शिवजीके सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भयको हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान, योगियोंके स्वामी (योगीश्वर), ज्ञानके द्वारा जानने योग्य, गुणोंकी निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, मायासे परे, देवताओंके स्वामी, दुष्टोंके वधमें तत्पर, ब्राह्मणवृन्दके एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघके समान सुन्दर श्याम, कमलके-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूपमें परमदेव श्रीरामजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
शङ्खेन्द्राभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् । काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २ ॥
७७२
- रामचरितमानस *
शङ्खु और चन्द्रमाकी-सी कान्तिके अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, व्याघ्रचर्मके वस्त्रवाले, कालके समान [अथवा काले रंगके] भयानक सर्पिका भूषण धारण करनेवाले, गङ्गा और चन्द्रमाके प्रेमी, काशीपति, कलियुगके पाप-समूहका नाश करनेवाले, कल्याणके कल्पवृक्ष, गुणोंके निधान और कामदेवको भस्म करनेवाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥
जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्यमुक्तिक दे डालते हैं और जो दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याणका विस्तार करें ॥ ३ ॥
दो०—लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥
लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता?
सो०—सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उत्तै कटकु ॥
समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मन्त्रियोंको बुलाकर ऐसा कहा—अब विलम्ब किसलिये हो रहा है? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे।
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं ॥
जाम्बवान्ने हाथ जोड़कर कहा—हे सूर्यकुलके ध्वजा-स्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) श्रीरामजी! सुनिये। हे नाथ! [सबसे बड़ा] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसाररूपी समुद्रसे पार हो जाते हैं।
यह लघु जलधि तरत कति बारा। अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ॥
फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करनेमें कितनी देर लगेगी? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमान्जीने कहा—प्रभुका प्रताप भारी बड़वानल (समुद्रकी आग) के समान है। इसने पहले समुद्रके जलको सोख लिया था ॥ १ ॥
तव रिपु नारि रुदन जल धारा। भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ॥
सुनि अति उकृति पवनसुत केरी। हरषे कपि रघुपति तन हेरी ॥
- लङ्काकाण्ड *
७७३
परन्तु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके औंसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे खारा भी हो गया। हनुमानजीकी यह अत्युक्ति (अलङ्कारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये ॥ २ ॥
जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब कथा सुनाई॥ राम प्रताप सुमिरि मन माहीं। करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं॥
जाम्बवान्ने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [और कहा—] मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [रामप्रतापसे] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा ॥ ३ ॥
बोलि लिए कपि निकर बहोरी। सकल सुनहु बिनती कछु मोरी॥ राम चरन पंकज उर धरहू। कौतुक एक भालु कपि करहू॥
फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [और कहा—] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये। अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण-कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये ॥ ४ ॥
धावहु मर्कट बिकट बरुथा। आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा॥ सुनि कपि भालु चले करि हूहा। जय रघुबीर प्रताप समूहा॥
विकट वानरोंके समूह (आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये। यह सुनकर वानर और भालू हूह (हुंकार) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रतापसमूहकी [अथवा प्रतापके पुंज श्रीरामजीकी] जय पुकारते हुए चले ॥ ५ ॥
दो०—अति उत्तंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ॥ १ ॥
बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नीलको देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [सुन्दर] सेतु बनाते हैं ॥ १ ॥
सैल बिसाल आनि कपि देहीं। कंदुक इव नल नील ते लेहीं॥ देखि सेतु अति सुंदर रचना। बिहसि कृपानिधि बोले बचना॥
वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह ले लेते हैं। सेतुकी अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले— ॥ १ ॥
परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी॥ करिहउँ इहाँ संभु थापना। मोरे हृदयँ परम कलपना॥
७७४
- रामचरितमानस *
यह (यहाँकी) भूमि परम रमणीय और उत्तम है। इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजीकी स्थापना करूँगा। मेरे हृदयमें यह महान् संकल्प है ॥ २ ॥
सुनि कपीस बहु दूत पठाए। मुनिबर सकल बोलि लै आए॥ लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
श्रीरामजीके वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने बहुत-से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियोंको बुलाकर ले आये। शिवलिङ्गकी स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया। [फिर भगवान् बोले—] शिवजीके समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है ॥ ३ ॥
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहूँ मोहि न पावा॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥
जो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्नमें भी मुझे नहीं पाता। शङ्करजीसे विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है ॥ ४ ॥
दो०—संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महूँ बास॥ २ ॥
जिनको शङ्करजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं; एवं जो शिवजीके द्रोही हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरकमें निवास करते हैं ॥ २ ॥
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं॥ जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि। सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि॥
जो मनुष्य [मेरे स्थापित किये हुए इन] रामेश्वरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायेंगे। और जो गङ्गाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा (अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा) ॥ १ ॥
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही॥
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा ॥ २ ॥
राम बचन सब के जिय भाए। मुनिबर निज निज आश्रम आए॥ गिरिजा रघुपति कै यह रीती। संतत करहिं प्रनत पर प्रीती॥
- लङ्काकाण्ड *
७७५
श्रीरामजीके वचन सबके मनको अच्छे लगे। तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमोंको लौट आये। [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! श्रीरघुनाथजीकी यह रीति है कि वे शरणागतपर सदा प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर॥ बूड़हिँ आनहि बोरहिँ जेई। भए उपल बोहित सम तेई॥
चतुर नल और नीलने सेतु बाँधा। श्रीरामजीकी कृपासे उनका यह [उज्ज्वल] यश सर्वत्र फैल गया। जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरोंको डुबा देते हैं, वे ही जहाजके समान [स्वयं तैरनेवाले और दूसरोंको पार ले जानेवाले] हो गये ॥ ४ ॥
महिमा यह न जलधि कड़ बरनी। पाहन गुन न कपिन्ह कड़ करनी॥
यह न तो समुद्रकी महिमा वर्णन की गयी है, न पत्थरोंका गुण है और न वानरोंकी ही कोई करामात है ॥ ५ ॥
दो०— श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान। ते मतिमंद जे राम तजि भजहिँ जाड़ प्रभु आन॥ ३ ॥
श्रीरघुवीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये। ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं ॥ ३ ॥
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा। देखि कृपानिधि के मन भावा॥ चली सेन कछु बरनि न जाई। गर्जीहिँ मर्कट भट समुदाई॥
नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया। देखनेपर वह कृपानिधान श्रीरामजीके मनको [बहुत ही] अच्छा लगा। सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता। योद्धा वानरोंके समुदाय गरज रहे हैं ॥ १ ॥
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई। चितव कृपाल सिंधु बहुताई॥ देखन कहँ प्रभु करुना कंदा। प्रगट भए सब जलचर बृंदा॥
कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्धके तटपर चढ़कर समुद्रका विस्तार देखने लगे। करुणाकन्द (करुणाके मूल) प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचरोंके समूह प्रकट हो गये (जलके ऊपर निकल आये) ॥ २ ॥
मकर नक्र नाना झष ब्याला। सत जोजन तन परम बिसाला॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं॥
बहुत तरहके मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजनाके बहुत बड़े विशाल शरीर थे। कुछ ऐसे भी जन्तु थे जो उनको भी खा जायँ। किसी-किसीके डरसे तो वे भी डर रहे थे ॥ ३ ॥
७७६
- रामचरितमानस *
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे। मन हरषित सब भए सुखारे॥ तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी। मगन भए हरि रूप निहारी॥
वे सब [वैर-विरोध भूलकर] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते। सबके मन हरषित हैं; सब सुखी हो गये। उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता। वे सब भगवान्का रूप देखकर [आनन्द और प्रेममें] मग्न हो गये॥४॥
चला कटकु प्रभु आयसु पाई। को कहि सक कपि दल बिपुलाई॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर सेना चली। वानर-सेनाकी विपुलता (अत्यधिक संख्या) को कौन कह सकता है?॥५॥
दो०— सेतुबंध भड़ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं॥४॥
सेतुबन्धपर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे और दूसरे [कितने ही] जलचर जीवोंपर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं॥४॥
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई॥
सेन सहित उतरे रघुबीरा। कहि न जाइ कपि जूथप भीरा॥
कृपालु रघुनाथजी [तथा लक्ष्मणजी] दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए चले। श्रीरघुवीर सेनासहित समुद्रके पार हो गये। वानरों और उनके सेनापतियोंकी भीड़ कहीं नहीं जा सकती॥१॥
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा। सकल कपिन्ह कहँ आयसु दीन्हा॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए। सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए॥
प्रभुने समुद्रके पार डेरा डाला और सब वानरोंको आज्ञा दी कि तुम जाकर सुन्दर फल-मूल खाओ। यह सुनते ही रीछ-वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े॥२॥
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥
खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं। लंका सन्मुख सिखर चलावहिं॥
श्रीरामजीके हित (सेवा) के लिये सब वृक्ष ऋतु-कुञ्ज-समयकी गतिको छोड़कर फल उठे। वानर-भालू मीठे-मीठे फल खा रहे हैं, वृक्षोंको हिला रहे हैं और पर्वतोंके शिखरोंको लङ्काकी ओर फेंक रहे हैं॥३॥
जहँ कहँ फिरत निसाचर पावहिं। घेरि सकल बहु नाच नचावहिं॥
दसनन्हि काटि नासिका काना। कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना॥
- लङ्काकाण्ड *
७७७
घूमते-फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षसको पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दाँतोंसे उसके नाक-कान काटकर, प्रभुका सुयश कहकर [अथवा कहलाकर] तब उसे जाने देते हैं ॥ ४ ॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥ सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥
जिन राक्षसोंके नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावणसे सब समाचार कहा। समुद्र [पर सेतु] का बाँधा जाना कानोंसे सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखोंसे बोल उठा— ॥ ५ ॥
दो०—बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु वारीस । सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५ ॥
वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया? ॥ ५ ॥
निज विकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी ॥ मन्दोदरीं सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥
फिर अपनी व्याकुलताको समझकर [ऊपरसे] हँसता हुआ, भयको भुलाकर रावण महलको गया। [जब] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बँधवा लिया है, ॥ १ ॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर बानी ॥ चरन नाड़ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥
[तब] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली। चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा—हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये ॥ २ ॥
नाथ बयरु कीजे ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥ तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥
हे नाथ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके। आपमें और श्रीरघुनाथजीमें निश्चय ही कैसा अन्तर है, जैसा जुगन् और सूर्यमें! ॥ ३ ॥
अति बल मधु कैटभ जेहिं मारे । महाबीर दितिसुत संघारे ॥ जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा । सोड़ अवतरेउ हरन महि भारा ॥
७७८
- रामचरितमानस *
जिन्होंने [विष्णुरूपसे] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [दैत्य] मारे और [वाराह और नृसिंहरूपसे] महान् शूरवीर दितिके पुत्रों (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) का संहार किया; जिन्होंने [वामनरूपसे] बलिको बाँधा और [परशुरामरूपसे] सहस्रबाहुको मारा, वे ही [भगवान्] पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये [रामरूपमें] अवतीर्ण (प्रकट) हुए हैं ॥४॥
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा । काल करम जिव जाकें हाथा ॥
हे नाथ! उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और जीव सभी हैं ॥५॥
दो०—रामहि सौँपि जानकी नाइ कमल पद माथ।
सुत कहँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥ ६ ॥
[श्रीरामजीके] चरणकमलोंमें सिर नवाकर (उनकी शरणमें जाकर) उनको जानकीजी सौंप दीजिये और आप पुत्रको राज्य देकर वनमें जाकर श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये ॥६॥
नाथ दीनदयाल रघुराई । बाघउ सनमुख गऐ न खाई ॥
चाहिअ करन सो सब करि बीते । तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥
हे नाथ! श्रीरघुनाथजी तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं। सम्मुख (शरण) जानेपर तो बाघ भी नहीं खाता। आपको जो कुछ करना चाहिये था, वह सब आप कर चुके। आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभीको जीत लिया ॥१॥
संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथैपन जाइहि नृप कानन ॥
तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ॥
हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथैपन (बुढ़ापे) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये। हे स्वामी! वहाँ (वनमें) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं ॥२॥
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥
हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्का भजन कीजिये। जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं— ॥३॥
सोइ कोसलाधीस रघुराया । आयउ करन तोहि पर दया ॥
जौँ पिय मानहु मोर सिखावन । सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥
वही कोसलाधीश श्रीरघुनाथजी आपपर दया करने आये हैं। हे प्रियतम! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यन्त पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकोंमें फैल जायगा ॥४॥
- लङ्काकाण्ड *
७७९
दो०—अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंषित गात।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥ ७ ॥
ऐसा कहकर, नेत्रोंमें [करुणाका] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा—हे नाथ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय ॥ ७ ॥
तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥ सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥
तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा—हे प्रिये! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत्में मेरे समान योद्धा है कौन? ॥ १ ॥
बरुन कुबेर पवन जम काला । भुजबल जितेउँ सकल दिगपाला ॥ देव दनुज नर सब बस मोरें । कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥
वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोंको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रखा है। देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं। फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया? ॥ २ ॥
नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई । सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥ मंदोदरीं हृदयँ अस जाना । काल बस्य उपजा अभिमाना ॥
मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [किन्तु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया। मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है ॥ ३ ॥
सभाँ आड़ मंत्रिन्ह तेहिँ बूझा । करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥ कहहिँ सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥
सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना होगा? मन्त्री कहने लगे—हे राक्षसोंके नाथ! हे प्रभु! सुनिये, आप बार-बार क्या पूछते हैं? ॥ ४ ॥
कहहु कवन भय करिअ बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा ॥
कहिये तो [ऐसा] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय? (भयकी बात ही क्या है?) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [की सामग्री] हैं ॥ ५ ॥
दो०—सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि।
नीति विरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि ॥ ८ ॥
७८०
- रामचरितमानस *
कानोंसे सबके वचन सुनकर [रावणका पुत्र] प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा—हे प्रभु! नीतिके विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिये, मन्त्रियोंमें बहुत ही थोड़ी बुद्धि है ॥ ८ ॥
कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥ बारिधि नाधि एक कपि आवा । तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥
ये सभी मूर्ख (खुशामदी) मन्त्री ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं। हे नाथ! इस प्रकारकी बातोंसे पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था। उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं (स्मरण किया करते हैं) ॥ १ ॥
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू । जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥ सुनत नीक आगें दुख पावा । सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥
उस समय तुमलोगोंमेंसे किसीको भूख न थी? [बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियोंने स्वामी (आप) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुननेमें अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा ॥ २ ॥
जेहिं बारीस बँधायउ हेला । उतरेउ सेन समेत सुबेला ॥ सो भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥
जिसने खेल-ही-खेलमें समुद्र बँधा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर आ उतरा। हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे? सब गाल फुला-फुलाकर (पागलोंकी तरह) वचन कह रहे हैं ॥ ३ ॥
तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥ प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥
हे तात! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे (बड़े गौरसे) सुनिये। मुझे मनमें कायर न समझ लीजियेगा। जगत्में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड (बहुत अधिक) हैं, जो प्यारी (मुँहपर मीठी लगनेवाली) बात ही सुनते और कहते हैं ॥ ४ ॥
बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥ प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥
हे प्रभो! सुननेमें कठोर परन्तु [परिणाममें] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं। नीति सुनिये, [उसके अनुसार] पहले दूत भेजिये, और [फिर] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [मेल] कर लीजिये ॥ ५ ॥
दो०—नारि पाड़ फिरि जाहिं जौँ तौ न बढाइअ रारि ।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ॥ ९ ॥
- लङ्काकाण्ड *
७८१
यदि वे स्त्री पाकर लौट जायें, तब तो [व्यर्थ] झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो (यदि न फिरें तो) हे तात! सम्मुख युद्धभूमिमें उनसे हठपूर्वक (डटकर) मार-काट कीजिये ॥ ९ ॥
यह मत जौँ मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥ सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥
हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्में दोनों ही प्रकारसे आपका सुयश होगा। रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा—अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी ? ॥ १ ॥
अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥ सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥
अभीसे हृदयमें सन्देह (भय) हो रहा है ? हे पुत्र! तू तो बाँसकी जड़में घमोई हुआ (तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ)। पिताकी अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया ॥ २ ॥
हित मत तोहि न लागत कैसैं । काल बिबस कहुँ भेषज जैसैं ॥ संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥
हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आपपर कैसे असर नहीं करती), जैसे मृत्युके वश हुए [रोगी] को दवा नहीं लगती। सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला ॥ ३ ॥
लंका सिखर उपर आगारा । अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥ बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ॥
लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था। वहाँ नाच-गानका अखाड़ा जमता था। रावण उस महलमें जाकर बैठ गया। किन्नर उसके गुणसमूहोंको गाने लगे ॥ ४ ॥
बाजहिं ताल पखाउज बीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥
ताल (करताल), पखावज (मृदंग) और बीणा बज रहे हैं। नृत्यमें प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं ॥ ५ ॥
दो०—सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥ १० ॥
वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है। यद्यपि [श्रीरामजी-सरीखा] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है ॥ १० ॥
७८२
- रामचरितमानस *
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥
यहाँ श्रीरघुवीर सुबेल पर्वतपर सेनाकी बड़ी भीड़ (बड़े समूह) के साथ उतरे। पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर— ॥ १ ॥
तहाँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥ ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला। तेहि आसन आसीन कृपाला॥
वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये। उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे ॥ २ ॥
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥ दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना॥
प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं ॥ ३ ॥
बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना॥ प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन॥
परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं ॥ ४ ॥
दो०—एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥ ११ ( क ) ॥
इस प्रकार कृपा, रूप (सौन्दर्य) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं ॥ ११ (क) ॥
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥ ११ ( ख ) ॥
पूर्व दिशाकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामजीने चन्द्रमाको उदय हुआ देखा। तब वे सबसे कहने लगे—चन्द्रमाको तो देखो। कैसा सिंहके समान निडर है! ॥ ११ (ख) ॥
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी॥ मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी॥
- लङ्काकाण्ड *
७८३
पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है ॥ १ ॥
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥ कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ॥
आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियोंके समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके शृङ्गार हैं। प्रभुने कहा—भाइयो! चन्द्रमामें जो कालापन है वह क्या है? अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार कहो ॥ २ ॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई ॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महुँ परी स्यामता सोई ॥
सुग्रीवने कहा—हे रघुनाथजी! सुनिये। चन्द्रमामें पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है। किसीने कहा—चन्द्रमाको राहुने मारा था। वही [चोटका] काला दाग हृदयपर पड़ा हुआ है ॥ ३ ॥
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥
कोई कहता है—जब ब्रह्मणे [कामदेवकी स्त्री] रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया]। वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है ॥ ४ ॥
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥ बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी ॥
प्रभु श्रीरामजीने कहा—विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है। इसीसे उसने विषको अपने हृदयमें स्थान दे रखा है। विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर वह वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है ॥ ५ ॥
दो०— कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास ।
तव मूरति बिधु उर बसति सोड़ स्यामता अभ्रास ॥ १२ ( क ) ॥
हनुमान्जीने कहा—हे प्रभो! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक चन्द्रमामें है ॥ १२ ( क ) ॥
नवाह्यपारायण, सातवाँ विश्राम
पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान ।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२ ( ख ) ॥
७८४
- रामचरितमानस *
पवनपुत्र हनुमान्जीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे। फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले— ॥ १२ (ख) ॥
देखु बिभीषण दच्छिन्न आसा। घन घमंड दामिनी बिलासा॥ मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा॥
हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे (हलके-हलके) स्वरसे गरज रहा है। कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा न हो! ॥ १ ॥
कहत बिभीषण सुनहु कृपाला। होइ न तडित न बारिद माला॥ लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंधर देख अखारा॥
विभीषण बोले—हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा। लंकाकी चोटीपर एक महल है। दशग्रीव रावण वहाँ [नाच-गानका] अखाड़ा देख रहा है ॥ २ ॥
छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोड़ जनु जलद घटा अति कारी॥ मन्दोदरी श्रवन ताटंका। सोड़ प्रभु जनु दामिनी दमंका॥
रावणने सिरपर मेघडंबर (बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला) छत्र धारण कर रखा है। वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है ॥ ३ ॥
बाजहिं ताल मृदंग अनुपा। सोड़ रव मधुर सुनहु सुरभूपा॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना॥
हे देवताओंके सम्राट्! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं। वही मधुर [गर्जन] ध्वनि है। रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया; ॥ ४ ॥
दो०—छत्र मुकुट ताटंक तब होते एकहीं बान।
सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३ (क) ॥
और एक ही बाणसे [रावणके] छत्र-मुकुट और [मन्दोदरीके] कर्णफूल काट गिराये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसाने नहीं जाना ॥ १३ (क) ॥
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग।
रावन सभा संसंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३ (ख) ॥
ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका बाण [वापस] आकर [फिर] तरकसमें जा घुसा। यह महान् रस-भंग (रंगमें भंग) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी ॥ १३ (ख) ॥
- लङ्काकाण्ड *
७८५
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा । अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ॥
न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा (आँधी) चली। न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे। [फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े?] सभी अपने-अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयङ्कर अपशकुन हुआ!! १ ॥
दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही । मुकुट परे कस असगुन ताही ॥
सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे—सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा? ॥ २ ॥
सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई ॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥
अपने-अपने घर जाकर सो रहो [डरनेकी कोई बात नहीं है] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये। जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोदरीके हृदयमें सोच बस गया ॥ ३ ॥
सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनुहु प्रानपति बिनती मोरी ॥ कंत राम विरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥
नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [रावणसे] कहने लगी—हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये ॥ ४ ॥
दो०—बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥ १४ ॥
मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं—(यह सारा विश्व उन्हींका रूप है) वेद जिनके अङ्ग-अङ्गमें लोकोंकी कल्पना करते हैं ॥ १४ ॥
पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥ भूकृति बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच घन माला ॥
पाताल [जिन विश्वरूप भगवान्का] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य (बीचके सब) लोकोंका विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गोंपर है। भयङ्कर काल जिनका भूकृटिसंचालन (भौहोंका चलना) है। सूर्य नेत्र है, बादलोंका समूह बाल है ॥ १ ॥