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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ

११६

  • रामचरितमानस *

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । निमिष निमिष उपजत सुख नए ॥

प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्दमें मग्न हो गये। इस प्रकार पल-पलमें उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं ॥ ५ ॥

दो०—कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ।

आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥ ८ ( क ) ॥

फिर उन लोगोंने कौसल्याजीके चरणोंमें मस्तक नवाये। कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [और कहा—] तुम मुझे रघुनाथके समान प्यारे हो ॥ ८ (क) ॥

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।

चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥ ८ ( ख ) ॥

आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महलको चले, आकाश फूलोंकी वृष्टिसे छा गया। नगरके स्त्री-पुरुषोंके समूह अटारियोंपर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं ॥ ८ (ख) ॥

कंचन कलस बिचित्र सँवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ॥

बंदनवार पताका केतू । सबन्हि बनाए मंगल हेतू ॥

सोनेके कलशोंको विचित्र रीतिसे [मणि-रत्नादिसे] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजोंपर रख लिया। सब लोगोंने मङ्गलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं ॥ १ ॥

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई । गजमनि रचि बहु चौक पुराई ॥

नाना भाँति सुमंगल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥

सारी गलियाँ सुगन्धित द्वोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं। अनेकों प्रकारके सुन्दर मङ्गल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से ढंके बजने लगे ॥ २ ॥

जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं । देहिं असीस हरष उर भरहीं ॥

कंचन थार आरतीं नाना । जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना ॥

स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदयमें हर्षित होकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोनेके थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मङ्गलगान कर रही हैं ॥ ३ ॥

करहिं आरती आरतिहर कें । रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें ॥

पुर सोभा संपत्ति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥

वे आर्तिहर (दुःखोंको हरनेवाले) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं— ॥ ४ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

११७

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥

परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं) । [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं ॥५॥

दो०— नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।

अस्त भएँ बिगसत भई निरखि राम राकेस ॥ १ ( क ) ॥

स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह-सूर्यके तापसे वे मुरझा गयी थीं] । अब उस विरहरूपी सूर्यके अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं ॥१ (क)॥

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।

पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान् ॥ १ ( ख ) ॥

अनेक प्रकारके शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । नगरके पुरुषों और स्त्रियोंको सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महलको चले ॥१ (ख)॥

प्रभु जानी कैकई लजानी । प्रथम तासु गूह गए भवानी ॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं । [इसलिये] वे पहले उन्हींके महलको गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया । फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया ॥१॥

कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥

गुर बसिष्ठ द्विज लिए बुलाई । आजु सुधरी सुदिन समुदाई ॥

कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महलको गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए । गुरु बसिष्ठजीने ब्राह्मणोंको बुला लिया [और कहा—] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं ॥२॥

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥

मुनि बसिष्ठ के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों । बसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे ॥३॥

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥

अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै । महाराज कहैं तिलक करीजै ॥

वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत्को आनन्द देनेवाला है । हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये ॥४॥

११८

  • रामचरितमानस *

दो०—तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।

रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥ १० (क)॥

तब मुनिने सुमन्त्रजीसे कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;॥ १० (क)॥

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।

हरष समेत बसिष्ठ पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥

और जहाँ-तहाँ [सूचना देनेवाले] दूतोंको भेजकर माङ्गलिक वस्तुएँ मँगाकर फिर हर्षके साथ आकर बसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया॥ १० (ख)॥

नवाह्वपारायण, आठवाँ विश्राम

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥

राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥

अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओंने पुष्पोंकी वर्षाकी झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको स्नान कराओ॥ १॥

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥

पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुअरे॥

भगवान्के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादिको स्नान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजीको बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया॥ २॥

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥

भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥

तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयोंको स्नान कराया। भरतजीका भाग्य और प्रभुकी कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते॥ ३॥

पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥

करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥

फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अङ्गोंको देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये॥ ४॥

दो०—सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ।

दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥ ११ (क)॥

  • उत्तरकाण्ड *

१११

[इधर] सासुओंने जानकीजीको आदरके साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अङ्ग-अङ्गमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये (पहना दिये) ॥ ११ (क) ॥

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।

देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥ ११ (ख) ॥

श्रीरामके बार्थी ओर रूप और गुणोंकी खान रमा (श्रीजानकीजी) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥ ११ (ख) ॥

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।

चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥ ११ (ग) ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियोंके समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान्के दर्शन करनेके लिये आये ॥ ११ (ग) ॥

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिव्य सिंधासन मागा ॥ रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥

प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ठजीके मनमें प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन माँगाया, जिसका तेज सूर्यके समान था। उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणोंको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उसपर विराज गये ॥ १ ॥

जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥ वेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥

श्रीजानकीजीके सहित श्रीरघुनाथजीको देखकर मुनियोंका समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणोंने वेदमन्त्रोंका उच्चारण किया। आकाशमें देवता और मुनि 'जय हो, जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥ २ ॥

प्रथम तिलक बसिष्ठ मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥ सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी ॥

[सबसे] पहले मुनि वसिष्ठजीने तिलक किया। फिर उन्होंने सब ब्राह्मणोंको [तिलक करनेकी] आज्ञा दी। पुत्रको राजसिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥ ३ ॥

बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥ सिंधासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥

१२०

  • रामचरितमानस *

उन्होंने ब्राह्मणोंको अनेकों प्रकारके दान दिये और सम्पूर्ण याचकोंको अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। त्रिभुवनके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको [अयोध्याके] सिंहासनपर [विराजित] देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये ॥ ४ ॥

छं०—नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बूंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥ भरतादि अनुज बिभीषणांगद हनुमदादि समेत ते। गहैं छत्र चामर व्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥

आकाशमें बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराओंके झुंड-के-झुंड नाच रहे हैं। देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी, विभीषण, अज्ञद, हनुमान् और सुग्रीव आदिसहित क्रमशः छत्र, चैंवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये हुए सुशोभित हैं ॥ १ ॥

श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥ मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥

श्रीसीताजीसहित सूर्यवंशके विभूषण श्रीरामजीके शरीरमें अनेकों कामदेवोंकी छबि शोभा दे रही है। नवीन जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर श्याम शरीरपर पीताम्बर देवताओंके मनको भी मोहित कर रहा है। मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अङ्ग-अङ्गमें सजे हुए हैं। कमलके समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं; जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥ २ ॥

दो०—वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।

बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस ॥ १२ (क) ॥

हे पक्षिराज गरुड़जी! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुखसे कहते नहीं बनता। सरस्वतीजी, शेषजी और वेद निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनन्द) महादेवजी ही जानते हैं ॥ १२ (क) ॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।

बंदी बेष बेद तब आए जहाँ श्रीराम ॥ १२ (ख) ॥

सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोकको चले गये। तब भाटोंका रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आये जहाँ श्रीरामजी थे ॥ १२ (ख) ॥

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।

लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥ १२ (ग) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१२१

कृपानिधान सर्वज्ञ प्रभुने [उन्हें पहचानकर] उनका बहुत ही आदर किया। इसका भेद किसीने कुछ भी नहीं जाना। वेद गुणगान करने लगे ॥ १२ (ग) ॥

छं०—जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल हने ॥ अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख देहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥

हे सगुण और निर्गुनरूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त! हे राजाओंके शिरोमणि! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरोंको अपनी भुजाओंके बलसे मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसारके भारतको नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखोंको भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी)-सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निमि काल कर्म गुननि भरे ॥ जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहँ रच्छ राम नमामहे ॥

हे हरे! आपकी दुस्तर मायाके वशीभूत होनेके कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल, कर्म और गुणोंसे भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव (आवागमन)के मार्गमें भटक रहे हैं। हे नाथ! इनमेंसे जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टिसे) देख लिया, वे [मायाजनित] तीनों प्रकारके दुःखोंसे छूट गये। हे जन्म-मरणके श्रमको काटनेमें कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं ॥ २ ॥

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाड़ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञानके अभिमानमें विशेषरूपसे मतवाले होकर जन्म-मृत्यु [के भय] को हरनेवाली आपकी भक्तिका आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ (देवताओंको भी बड़ी कठिनातासे प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदिके) पदको पाकर भी हम उस पदसे नीचे गिरते देखते हैं। [परन्तु] जो सब आशाओंको छोड़कर आपपर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागरसे तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं ॥ ३ ॥

१२२

  • रामचरितमानस *

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी । नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी ॥ ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे । पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणोंकी कल्याणमयी रजका स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषिकी पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणोंके नखसे मुनियोंद्वारा वन्दित, त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाली देवनदी गङ्गाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नोंसे युक्त जिन चरणोंमें वनमें फिरते समय काँटे चुभ जानेसे घट्टे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलोंको नित्य भजते रहते हैं ॥ ४ ॥

अव्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने । षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥ फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे । पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥

वेद-शास्त्रोंने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है; जो [प्रवाहरूपसे] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत-से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकारके फल लगे हैं; जिसपर एक ही बेल है, जो उसीके आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसारवृक्षस्वरूप (विश्वरूपमें प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ ५ ॥

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन पर ध्यावहीं । ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥ करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं । मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभवसे ही जाना जाता है और मनसे परे है—जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणाके धाम प्रभो! हे सदगुणोंकी खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्मसे विकारोंको त्यागकर आपके चरणोंमें ही प्रेम करें ॥ ६ ॥

दो०— सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।

अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥ १३ (क) ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१२३

वेदोंने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मलोकको चले गये ॥ १३ (क) ॥

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहाँ रघुबीर।

बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥ १३ (ख) ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! सुनिये, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ श्रीरघुवीर थे और गदद वाणीसे स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावलीसे पूर्ण हो गया— ॥ १३ (ख) ॥

छं०— जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं ॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥

हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकान्त)! हे जन्म-मरणके संतापका नाश करनेवाले! आपकी जय हो; आवागमनके भयसे व्याकुल इस सेवककी रक्षा कीजिये। हे अवधपति! हे देवताओंके स्वामी! हे रमापति! हे बिभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥

दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥

रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड देहे ॥

हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणका विनाश करके पृथ्वीके सब महान् रोगों (कष्टों)को दूर करनेवाले श्रीरामजी! राक्षससमूहरूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्निके प्रचण्ड तेजसे भस्म हो गये ॥ २ ॥

महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं ॥

मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥

आप पृथ्वीमण्डलके अत्यन्त सुन्दर आभूषण हैं; आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किये हुए हैं। महान् मद, मोह और ममतारूपी रात्रिके अन्धकारसमूहके नाश करनेके लिये आप सूर्यके तेजोमय किरणसमूह हैं ॥ ३ ॥

मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥

हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावैर भूलि परे ॥

कामदेवरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनोंके हृदयमें कुभोगरूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। हे नाथ! हे [पाप-तापका हरण करनेवाले] हरे! उसे मारकर विषयरूपी वनमें भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवोंकी रक्षा कीजिये ॥ ४ ॥

बहु रोग बियोगन्हि लोग हुए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥

भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते ॥

१२४

  • रामचरितमानस *

लोग बहुत-से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं। ये सब आपके चरणोंके निरादरके फल हैं। जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागरमें पड़े हैं ॥५॥

अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं॥ अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥

जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं। और जिन्हें आपकी लीला-कथाका आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं ॥६॥

नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥ एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद। उनको सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है। इसीसे मुनिलोग योग (साधन) का भरोसा सदाके लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं ॥७॥

करि प्रेम निरंतर नेम लिऐँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिऐँ॥ सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदयसे आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं ॥८॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥ तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥

हे मुनियोंके मनरूपी कमलके भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)। हे हरि! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरणरूपी रोगकी महान् औषध और अभिमानके शत्रु हैं ॥९॥

गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥ रघुनंद निकंदय द्वन्द्वघनं। महिपाल बिलोक्य दीनजनं॥

आप गुण, शील और कृपाके परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! [आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि] द्वन्द्व-समूहोंका नाश कीजिये। हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन्! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये ॥१०॥

दो०—बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।

पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग॥ १४ ( क )॥

  • उत्तरकाण्ड *

१२५

मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगाता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्सङ्ग सदा प्राप्त हो। हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये ॥ १४ (क) ॥

बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।

तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥ १४ (ख) ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये। तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकारसे सुख देनेवाले डेरे दिलवाये ॥ १४ (ख) ॥

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥ महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥

हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म-मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजीके कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥

और जो मनुष्य सकामभावसे सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकारके सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत्में देवदुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकालमें श्रीरघुनाथजीके परमधामको जाते हैं ॥ २ ॥

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥ खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

इसे जो जीवनमुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमशः] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखको हरनेवाली है ॥ ३ ॥

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहैं सुंदर तरनी ॥ नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्तिको दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदीके [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरीमें नित-नये मङ्गलोलोत्सव होते हैं। सभी वर्गोंके लोग हर्षित रहते हैं ॥ ४ ॥

नित नङ् प्रीति राम पद पंकज । सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥ मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥

श्रीरामजीके चरणकमलोंमें—जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं—सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुओंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणोंने नाना प्रकारके दान पाये ॥ ५ ॥

१२६

  • रामचरितमानस *

दो०—ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥ १५ ॥

वानर सब ब्रह्मानन्दमें मग्न हैं। प्रभुके चरणोंमें सबका प्रेम है! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [बात-की-बातमें] छः महीने बीत गये ॥ १५ ॥

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं॥ तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए॥

उन लोगोंको अपने घर भूल ही गये। [जाग्रतकी तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्नमें भी घरकी सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरोंसे द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदरसहित सिर नवाया ॥ १ ॥

परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे॥ तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई॥

बड़े ही प्रेमसे श्रीरामजीने उनको अपने पास बैठाया और भक्तोंको सुख देनेवाले कोमल वचन कहे—तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ? ॥ २ ॥

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥

मेरे हितके लिये तुमलोगोंने घरोंको तथा सब प्रकारके सुखोंको त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र— ॥ ३ ॥

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मूषा न कहउँ मोर यह बाना॥ सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती॥

ये सभी मुझे प्रिय हैं, परंतु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभीको प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) है। [पर] मेरा तो दासपर [स्वाभाविक ही] विशेष प्रेम है ॥ ४ ॥

दो०—अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम। सदा सर्वगत सर्वहित जानि करेहु अति प्रेम ॥ १६ ॥

हे सखागण! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियमसे मुझे भजते रहना। मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना ॥ १६ ॥

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए॥ एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे॥

  • उत्तरकाण्ड *

१२७

प्रभुके वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्न हो गये। हम कौन हैं और कहाँ हैं? यह देहकी सुध भी भूल गयी। वे प्रभुके सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते ॥ १ ॥

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा ॥ प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥

प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञानका उपदेश दिया। प्रभुके सम्मुख वे कुछ कह नहीं सकते। बार-बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं ॥ २ ॥

तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥ सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥

तब प्रभुने अनेक रंगोंके अनुपम और सुन्दर गहने-कपड़े मँगावाये। सबसे पहले भरतजीने अपने हाथसे सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये ॥ ३ ॥

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥

फिर प्रभुकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीने विभीषणजीको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगहसे हिलेतक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया ॥ ४ ॥

दो०—जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।

हिर्घ धरि राम रूप सब चले नाड़ पद माथ ॥ १७ (क) ॥

जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयोंमें श्रीरामचन्द्रजीके रूपको धारण करके उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर चले ॥ १७ (क) ॥

तब अंगद उठि नाड़ सिरु सजल नयन कर जोरि ।

अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥ १७ (ख) ॥

तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंमें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले ॥ १७ (ख) ॥

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥ मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोछें घाली ॥

हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुखके समुद्र! हे दीनोंपर दया करनेवाले! हे आर्तोंके बन्धु! सुनिये। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था ॥ १ ॥

१२८

  • रामचरितमानस *

असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥ मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाऊँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥

अतः हे भक्तोंके हितकारी! अपना अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता, सब कुछ आप ही हैं। आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ? ॥ २ ॥

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥ बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥

हे महाराज! आप ही विचारकर कहिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घरमें मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बलसे हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये ॥ ३ ॥

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥ अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥

मैं घरकी सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े [और बोले—] हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नाथ! अब यह न कहिये कि तू घर जा ॥ ४ ॥

दो०—अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।

प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥ १८ (क) ॥

अङ्गदके विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदयसे लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया ॥ १८ (क) ॥

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ॥

बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥ १८ (ख) ॥

तब भगवान्ने अपने हृदयकी माला, वस्त्र और मणि (रत्नोंके आभूषण) बालि-पुत्र अङ्गदको पहनाकर और बहुत प्रकारसे समझाकर उनकी विदाई की ॥ १८ (ख) ॥

भरत अनुज सौमित्रि समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥ अंगद हृदयँ प्रेम नहीं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीँ ओरा ॥

भक्तकी करनीको याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुघ्मजी और लक्ष्मणजीसहित उनको पहुँचाने चले। अङ्गदके हृदयमें थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिरकर श्रीरामजीकी ओर देखते हैं, ॥ १ ॥

बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥ राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१२१

और बार-बार दण्डवत्-प्रणाम करते हैं। मनमें ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहनेको कह दें। वे श्रीरामजीके देखनेकी, बोलनेकी, चलनेकी तथा हँसकर मिलनेकी रीतिको याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं) ॥ २ ॥

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥ अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥

किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनयवचन कहकर तथा हृदयमें चरण-कमलोंको रखकर वे चले। अत्यन्त आदरके साथ सब वानरोंको पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये ॥ ३ ॥

तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥ दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥

तब हनुमान्जीने सुग्रीवके चरण पकड़कर अनेक प्रकारसे विनती की और कहा—हे देव! दस (कुछ) दिन श्रीरघुनाथजीकी चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणोंके दर्शन करूँगा ॥ ४ ॥

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥ अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनुहु हनुमंता ॥

[सुग्रीवने कहा—] हे पवनकुमार! तुम पुण्यकी राशि हो [जो भगवान्ने तुमको अपनी सेवामें रख लिया]। जाकर कृपाथाम श्रीरामजीकी सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अङ्गदने कहा—हे हनुमान्! सुनो— ॥ ५ ॥

दो०—कहेहु दंडवत प्रभु सँ तुम्हहि कहउँ कर जोरि।

बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥ १९ ( क ) ॥

मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभुसे मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजीको बार-बार मेरी याद कराते रहना ॥ १९ (क) ॥

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।

तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत ॥ १९ ( ख ) ॥

ऐसा कहकर बालिपुत्र अङ्गद चले, तब हनुमान्जी लौट आये और आकर प्रभुसे उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममग्न हो गये ॥ १९ (ख) ॥

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।

चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥ १९ ( ग ) ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़जी! श्रीरामजीका चित्त वज्रसे भी अत्यन्त कठोर और फूलसे भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझमें आ सकता है? ॥ १९ (ग) ॥

१३०

  • रामचरितमानस *

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा । दीन्हे भूषण बसन प्रसादा ॥ जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥

फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये। [फिर कहा—] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा कर्मसे धर्मके अनुसार चलना ॥ १ ॥

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥ बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥

तुम मेरे मित्र हो और भरतके समान भाई हो। अयोध्यामें सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रोंमें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भरकर वह चरणोंमें गिर पड़ा ॥ २ ॥

चरन नलिन उर धरि गूह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥ रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥

फिर भगवान्के चरणकमलोंको हृदयमें रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियोंको उसने प्रभुका स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजीका यह चरित्र देखकर अवधपुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुखकी राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं ॥ ३ ॥

राम राज बैठें त्रैलोक। हरषित भए गए सब सोका ॥ बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी ॥ ४ ॥

दो०—बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।

चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भय सोक न रोग ॥ २० ॥

सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है ॥ २० ॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि व्यापा ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥

‘राम-राज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं ॥ १ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१३१

चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥ राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी॥

धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान) से जगत्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी हैं ॥ २ ॥

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥

छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है ॥ ३ ॥

सब निर्दभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ सब गुनगय पंडित सब ग्यानी। सब कृतगय नहिं कपट सयानी॥

सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है ॥ ४ ॥

दो०— राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।

काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥ २१ ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये। श्रीरामके राज्यमें जड़, चेतन सारे जगत्में काल, कर्म, स्वभाव और गुणोंसे उत्पन्न हुए दुःख किसीको भी नहीं होते (अर्थात् इनके बन्धनमें कोई नहीं है) ॥ २१ ॥

भूमि सस सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला॥ भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू॥

अयोध्यामें श्रीरघुनाथजी सात समुद्रोंकी मेखला (करधनी)-वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपोंकी यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है ॥ १ ॥

सो महिमा समुद्गत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी॥ सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी॥

बल्कि प्रभुकी उस महिमाको समझ लेनेपर तो यह कहनेमें [कि वे सात समुद्रोंसे घिरी हुई ससद्वीपमयी पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट् हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परन्तु हे गरुड़जी! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीलामें बड़ा प्रेम मानते हैं ॥ २ ॥

१३२

  • रामचरितमानस *

सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥ राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥

क्योंकि उस महिमाको भी जाननेका फल यह लीला (इस लीलाका अनुभव) ही है, इन्द्रियोंका दमन करनेवाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्यकी सुख-सम्पत्तिका वर्णन शेषजी और सरस्वतीजी भी नहीं कर सकते ॥ ३ ॥

सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥ एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥

सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं ॥ ४ ॥

दो०—दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।

जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥ २२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें है और भेद नाचनेवालोंके नृत्यसमाजमें है और 'जीतो' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही सुनायी पड़ता है (अर्थात् राजनीतिमें शत्रुओंको जीतने तथा चोर-डाकुओं आदिको दमन करनेके लिये साम, दान, दण्ड और भेद—ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्यमें कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिये 'जीतो' शब्द केवल मनके जीतनेके लिये ही कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसीको नहीं होता; 'दण्ड' शब्द केवल संन्यासियोंके हाथमें रहनेवाले दण्डके लिये ही रह गया है। तथा सभी अनुकूल होनेके कारण भेदनीतिकी आवश्यकता ही नहीं रह गयी; 'भेद' शब्द केवल सुर-तालके भेदके लिये ही कामोंमें आता है।) ॥ २२ ॥

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥

वनमें वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपसमें प्रेम बढ़ा लिया है ॥ १ ॥

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ॥ सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गुंजत अलि लै चलि मकरंदा ॥

पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँतिके पशुओंके समूह वनमें निभंय विचरते और आनन्द करते हैं। सीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौर पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं ॥ २ ॥

लता बिटप मागें मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥ ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेतां भइ कृतजुग कै करनी ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१३३

बेलें और वृक्ष माँगनेसे ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेतीसे भरी रहती है। त्रेतामें सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी॥ ३ ॥

प्रगटों गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी॥ सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी॥

समस्त जगत्के आत्मा भगवान्को जगत्का राजा जानकर पर्वतोंने अनेक प्रकारकी मणियोंकी खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं॥ ४ ॥

सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं॥ सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा॥

समुद्र अपनी मर्यादामें रहते हैं। वे लहरोंके द्वारा किनारोंपर रत्न डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलोंसे परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओंके विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं॥ ५ ॥

दो०—बिधु महि पूर मयूरखन्हि रबि तप जेतनेहि काज । मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज॥ २३ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणोंसे पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितनेकी आवश्यकता होती है और मेघ माँगनेसे [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं॥ २३ ॥

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥ श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥

प्रभु श्रीरामजीने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणोंको अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्गके पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [प्रकृतितज्ज् सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणोंसे अतीत और भोगों (ऐश्वर्य) में इन्द्रके समान हैं॥ १ ॥

पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता॥ जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई॥

शोभाकी खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पतिके अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं॥ २ ॥

जद्यपि गृहं सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥ निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई॥

१३४

  • रामचरितमानस *

यद्यपि घरमें बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवाकी विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवाका महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथोंसे करती हैं और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं ॥ ३ ॥

जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥ कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥

कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवाकी विधिको जाननेवाली हैं। घरमें कौसल्या आदि सभी सासुओंकी सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बातका अभिमान और मद नहीं है ॥ ४ ॥

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता । जगदंबा संततमनिंदिता ॥

(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओंसे वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं ॥ ५ ॥

दो०—जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ । राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥ २४ ॥

देवता जिनका कृपाकटाक्ष चाहते हैं, परन्तु वे उनकी ओर देखतीं भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी (जानकीजी) अपने [महामहिम] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीके चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं ॥ २४ ॥

सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई ॥ प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥

सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामजीके चरणोंमें उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभुका मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपालु श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करनेको कहें ॥ १ ॥

राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥ हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥

श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयोंपर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकारकी नीतियाँ सिखलाते हैं। नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ (देवताओंको भी कठिनासे प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं ॥ २ ॥

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥ दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥

वे दिन-रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुबीरके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं। सीताजीके लव और कुश—ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद-पुराणोंने वर्णन किया है ॥ ३ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१३५

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर । हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥ दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनरे ॥

वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणोंके धाम हैं और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्रीहरिके प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयोंके हुए, जो बड़े ही सुन्दर, गुणवान् और सुशील थे ॥ ४ ॥

दो०—ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।

सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥ २५ ॥

जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्द्रियोंसे परे और अजन्मा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदानन्दधन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥ २५ ॥

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभों संग द्विज सज्जन ॥

बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥

प्रातःकाल सरयूजीमें स्नान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभामें बैठते हैं। बसिष्ठजी वेद और पुराणोंकी कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं ॥ १ ॥

अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥

भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥

वे भाइयोंको साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्दसे भर जाती हैं। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों भाई हनुमान्जीसहित उपवनमें जाकर, ॥ २ ॥

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥

सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं । बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥

वहाँ बैठकर श्रीरामजीके गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमान्जी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके निर्मल गुणोंको सुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं ॥ ३ ॥

सब कें गूह गूह होहिं पुराना । राम चरित पावन बिधि नाना ॥

नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥

सबके यहाँ घर-घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते ॥ ४ ॥

दो०—अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।

सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥ २६ ॥