श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
समान प्रतीत होते थे और ऊँचे-ऊँचे ध्वज ही उनके तटवर्ती वृक्ष थे॥ ११ १/२ ॥
समस्त वानर खूनसे लथपथ हो रहे थे। वे कूद-कूदकर समराङ्गणमें राक्षसोंके ध्वज, कवच, रथ, घोड़े और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका विनाश करने लगे॥
वानर अपने तीखे दाँतों और नखोंसे निशाचरोंके केश, कान, ललाट और नाक कुतर डालते थे॥ १४ ॥
जैसे फलवाले वृक्षकी ओर सैकड़ों पक्षी दौड़े जाते हैं, उसी प्रकार एक-एक राक्षसपर सौ-सौ वानर टूट पड़े॥ १५ ॥
उस समय पर्वताकार राक्षस भी भारी गदाओं, भालों, तलवारों और फरसोंसे भयंकर वानरोंको मारने लगे॥ १६ ॥
राक्षसोंद्वारा मारी जाती हुई वानरोंकी वह विशाल सेना शरणागतवत्सल दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामकी शरणमें गयी॥ १७ ॥
तब बल-विक्रमशाली महातेजस्वी श्रीरामने धनुष ले राक्षसोंकी सेनामें प्रवेश करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी॥ १८ ॥
जैसे आकाशमें बादल तपते हुए सूर्यपर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार सेनामें प्रवेश करके अपने बाणरूपी अग्निसे राक्षससेनाको दग्ध करते हुए श्रीरामपर वे महाक्रूर निशाचर धावा न कर सके॥ १९ ॥
निशाचर रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा किये गये अत्यन्त घोर एवं दुष्कर कर्मोंको ही देख पाते थे, उनके स्वरूपको नहीं॥ २० ॥
जैसे वनमें चलती हुई हवा बड़े-बड़े वृक्षोंको हिलाती और तोड़ डालती है तो भी वह देखनेमें नहीं आती, उसी प्रकार भगवान् श्रीराम निशाचरोंकी विशाल सेनाको विचलित करते और कितने ही महारथियोंकी धज्जियाँ उड़ा देते थे तो भी वे राक्षस उन्हें देख नहीं पाते थे॥
वे अपनी सेनाको श्रीरामके द्वारा बाणोंसे छिन्नभिन्न, दग्ध, भग्न और पीड़ित होती हुई देखते थे; किंतु शीघ्रतापूर्वक युद्ध करनेवाले श्रीराम उनकी दृष्टिमें नहीं आते थे॥ २२ ॥
अपने शरीरोंपर प्रहार करते हुए श्रीरघुनाथजीको वे उसी तरह नहीं देख पाते थे, जैसे शब्दादि विषयोंके भोक्तारूपमें स्थित जीवात्माको प्रजाएँ नहीं देख पाती हैं॥
‘ये राम हैं, जो हाथियोंकी सेनाको मार रहे हैं, ये रहे राम, जो बड़े-बड़े रथियोंका संहार कर रहे हैं, नहीं-नहीं ये हैं राम, जो अपने पैने बाणोंसे घोड़ोंसहित पैदल सैनिकोंका वध कर रहे हैं;’ इस प्रकार वे सब राक्षस श्रीरघुनाथजीकी किंचित् समानताके कारण सभीको राम समझ लेते और रामके ही भ्रमसे क्रोधमें भरकर आपसमें एक-दूसरेको मारने लगते थे॥ २४-२५ ॥
श्रीरामचन्द्रजी राक्षससेनाको दग्ध कर रहे थे तो भी वे राक्षस उन्हें देख नहीं सके। महात्मा श्रीरामने राक्षसोंको गान्धर्व नामक दिव्य अस्त्रसे मोहित कर दिया था॥ २६ ॥
अतः वे राक्षस रणभूमिमें कभी तो हजारों राम देखते थे और कभी उन्हें उस महासमरमें एक ही रामका दर्शन होता था॥ २७ ॥
वे महात्मा श्रीरामके धनुषकी सुनहरी कोटि (नोक या कोणभाग)-को अलातचक्रकी भाँति घूमती देखते थे; किंतु साक्षात् श्रीरघुनाथजीको नहीं देख पाते थे॥ २८ ॥
युद्धस्थलमें राक्षसोंका संहार करते हुए श्रीरामचन्द्रजी साक्षात् चक्रके समान जान पड़ते थे। शरीरका मध्यभाग अर्थात् नाभि ही उस चक्रकी नाभि थी, बल ही उससे प्रकट होनेवाली ज्वाला था, बाण ही उसके अरे थे, धनुष ही नेमिका स्थान ग्रहण किये हुए था, धनुषकी टंकार और तलध्वनि—ये ही दोनों उस चक्रकी घर्घराहट थीं, तेज-बुद्धि और कान्ति आदि गुण ही उस चक्रकी प्रभा थे तथा दिव्यास्त्रोंके गुणप्रभाव ही उसके प्रान्तभाग अर्थात् धार थे। जैसे प्रजा प्रलयकालमें कालचक्रका दर्शन करती है, उसी प्रकार राक्षस उस समय श्रीरामरूपी चक्रको देख रहे थे॥ २९-३० ॥
श्रीरामने अकेले दिनके आठवें भाग (डेढ़ घंटे)-में ही आगकी ज्वालाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसोंके वायुके समान वेगशाली दस हजार रथोंकी, अठारह हजार वेगवान् हाथियोंकी, चौदह हजार सवारोंसहित घोड़ोंकी तथा पूरे दो लाख पैदल निशाचरोंकी सेनाका संहार कर डाला॥ ३१—३३ ॥
जब घोड़े और रथ नष्ट हो गये तथा ध्वज तोड़-फोड़ डाले गये, तब मरनेसे बचे हुए निशाचर शान्त हो लङ्कापुरीमें भाग गये॥ ३४ ॥
मारे गये हाथियों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंकी लाशोंसे भरी हुई वह रणभूमि कुपित हुए महात्मा रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि-सी प्रतीत होती थी॥ ३५ ॥
तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियोंने साधुवाद देकर भगवान् श्रीरामके इस कार्यकी प्रशंसा की॥ ३६ ॥
उस समय धर्मात्मा श्रीरामने अपने पास खड़े हुए सुग्रीव, विभीषण, कपिवर हनुमान्, जाम्बवान्, कपिश्रेष्ठ मैन्द तथा द्विविदसे कहा— ‘यह दिव्य अस्त्र-बल मुझमें है या भगवान् शंकरमें’ ॥ ३७-३८ ॥
उस अवसरपर इन्द्रतुल्य तेजस्वी महात्मा श्रीराम जो अस्त्र-शस्त्रोंका संचालन करते समय कभी थकते नहीं थे, उस राक्षसराजकी सेनाका संहार करके हर्षभरे देवताओंके समुदायद्वारा पूजित एवं प्रशंसित होने लगे॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३ ॥
चौरानबेवाँ सर्ग
चौरानबेवाँ सर्ग
राक्षसियोंका विलाप
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले भगवान् श्रीरामके द्वारा उनके तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित चमकीले बाणोंसे रावणके भेजे हुए हजारों हाथी, सवारोंसहित सहस्रों घोड़े, अग्निके समान देदीप्यमान एवं ध्वजोंसे सुशोभित सहस्रों रथ तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, सुवर्णमय ध्वजसे विचित्र शोभा पानेवाले और गदा-परिघोंसे युद्ध करनेवाले हजारों शूरवीर राक्षस मारे गये—यह देख-सुनकर मरनेसे बचे हुए निशाचर घबरा उठे और लङ्कामें जा राक्षसियोंसे मिलकर बहुत ही दुःखी एवं चिन्तामग्न हो गये॥ १—४ ॥
जिनके पति, पुत्र और भाई-बन्धु मारे गये थे, वे अनाथ राक्षसियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र होकर दुःखसे पीड़ित हो विलाप करने लगीं— ॥ ५ ॥
‘हाय! जिसका पेट धँसा हुआ और आकार विकराल है, वह बुढ़िया शूर्पणखा वनमें कामदेवके समान रूपवाले श्रीरामके पास कामभाव लेकर कैसे गयी—किस तरह जानेका साहस कर सकी?॥ ६ ॥
‘जो भगवान् राम सुकुमार और महान् बलशाली हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं, उन्हें देखकर वह कुरूपा राक्षसी उनके प्रति कामभावसे युक्त हो गयी—यह कैसा दुःसाहस है? यह दुष्टा तो सबके द्वारा मार डालनेके योग्य है॥ ७ ॥
‘कहाँ सर्वगुणसम्पन्न, महान् बलशाली तथा सुन्दर मुखवाले श्रीराम और कहाँ वह सभी गुणोंसे हीन, दुर्मुखी राक्षसी! उसने कैसे उनकी कामना की?॥ ८ ॥
‘जिसके सारे अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो गये हैं तथा जो किसी भी दृष्टिसे श्रीरामके योग्य नहीं है, उस दुष्टाने हम लङ्कावासियोंके दुर्भाग्यसे ही खर, दूषण तथा अन्य राक्षसोंके विनाशके लिये श्रीरामका धर्षण (उन्हें अपने स्पर्शसे दूषित करनेका प्रयास) किया था॥ ९-१० ॥
‘उसके कारण ही दशमुख राक्षस रावणने यह महान् वैर बाँध लिया और अपने तथा राक्षसकुलके वधके लिये वह सीताजीको हर लाया॥ ११ ॥
‘दशमुख रावण जनकनन्दिनी सीताको कभी नहीं पा सकेगा; परंतु उसने बलवान् रघुनाथजीसे अमिट वैर बाँध लिया है॥ १२ ॥
‘राक्षस विराध विदेहकुमारी सीताको प्राप्त करना चाहता है, यह देख श्रीरामने एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर दिया। वह एक ही दृष्टान्त उनकी अजेय शक्तिको समझनेके लिये काफी था॥ १३ ॥
‘जनस्थानमें भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको श्रीरामने अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा कालके गालमें डाल दिया था और सूर्यके सदृश प्रकाशमान सायकोंसे समराङ्गणमें खर, दूषण तथा त्रिशिराका भी संहार कर डाला था; यह उनकी अजेयताको समझ लेनेके लिये पर्याप्त दृष्टान्त था॥ १४-१५ ॥
‘रक्तभोजी राक्षस कबन्धकी बाँहें एक-एक योजन लम्बी थीं और वह क्रोधवश बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करता था तो भी वह श्रीरामके हाथसे मारा गया। वह दृष्टान्त ही श्रीरामचन्द्रजीके दुर्जय पराक्रमका ज्ञान करानेके लिये पर्याप्त था॥ १६ ॥
‘मेरुपर्वतके समान महाकाय बलवान् इन्द्रकुमार वालीको श्रीरामचन्द्रजीने एक ही बाणसे मार गिराया। उनकी शक्तिका अनुमान लगानेके लिये वह एक ही उदाहरण काफी है॥ १७ ॥
‘सुग्रीव बहुत ही दुःखी और निराश होकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करते थे; परंतु श्रीरामने उन्हें किष्किन्धाके राजसिंहासनपर बिठा दिया। उनके प्रभावको समझनेके लिये वह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त है॥ १८ ॥
‘विभीषणने जो धर्म और अर्थसे युक्त बात कही थी, वह सभी राक्षसोंके लिये हितकर तथा युक्तियुक्त थी; परंतु मोहवश रावणको वह अच्छी न लगी। यदि कुबेरका छोटा भाई रावण विभीषणकी बात मान लेता तो यह लङ्कापुरी इस तरह दुःखसे पीड़ित हो श्मशानभूमि नहीं बन जाती॥ १९-२० ॥
‘महाबली कुम्भकर्ण श्रीरामके हाथसे मारा गया। दुःसह वीर अतिकायको लक्ष्मणने मार गिराया तथा रावणका प्यारा पुत्र इन्द्रजित् भी उन्हींके हाथसे मारा गया तथापि रावण भगवान् श्रीरामके प्रभावको नहीं समझ रहा है॥ २१ ॥
‘हाय, मेरा बेटा मारा गया!’ ‘मेरे भाईको प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा।’ ‘रणभूमिमें मेरे पतिदेव मार डाले गये।’ लङ्काके घर-घरमें राक्षसियोंके ये शब्द सुनायी देते हैं॥ २२ ॥
‘समराङ्गणमें शूरवीर श्रीरामने जहाँ-तहाँ सहस्रों रथों, घोड़ों और हाथियोंका संहार कर डाला है। पैदल सैनिकोंको भी मौतके घाट उतार दिया है॥ २३ ॥
‘जान पड़ता है, श्रीरामका रूप धारण करके हमें साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, भगवान् विष्णु, शतक्रतु इन्द्र अथवा स्वयं यमराज ही मार रहे हैं॥ २४ ॥
‘हमारे प्रमुख वीर श्रीरामके हाथसे मारे गये। अब हमलोग अपने जीवनसे निराश हो चली हैं। हमें इस भयका अन्त नहीं दिखायी देता, अतएव हम अनाथकी भाँति विलाप कर रही हैं॥ २५ ॥
‘दशमुख रावण शूरवीर है। इसे ब्रह्माजीने महान् वर दिया है। इसी घमंडके कारण यह श्रीरामके हाथसे प्राप्त हुए इस महाघोर भयको नहीं समझ पाता है॥ २६ ॥
‘युद्धस्थलमें श्रीराम जिसे मारनेको तुल जायँ, उसे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही बचा सकते हैं॥ २७ ॥
‘रावणके प्रत्येक युद्धमें जो उत्पात दिखायी देते हैं, वे रामके द्वारा रावणके विनाशकी ही सूचना देते हैं॥ २८ ॥
‘ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर रावणको देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंकी ओरसे अभयदान दे दिया था। मनुष्योंकी ओरसे अभय प्राप्त होनेके लिये इसने याचना ही नहीं की थी॥ २९ ॥
‘अतः मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यह निःसन्देह मनुष्योंकी ओरसे ही घोर भय प्राप्त हुआ है, जो राक्षसों तथा रावणके जीवनका अन्त कर देनेवाला है॥ ३० ॥
‘बलवान् राक्षस रावणने अपनी उद्दीप्त तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे जब देवताओंको पीड़ा दी, तब उन्होंने पितामह ब्रह्माजीकी आराधना की॥ ३१ ॥
‘इससे महात्मा ब्रह्माजी संतुष्ट हुए और उन्होंने देवताओंके हितके लिये उन सबसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही॥ ३२ ॥
‘आजसे समस्त दानव तथा राक्षस भयसे युक्त होकर ही नित्य-निरन्तर तीनों लोकोंमें विचरण करेंगे’॥ ३३ ॥
‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर त्रिपुरनाशक वृषभध्वज महादेवजीको संतुष्ट किया॥ ३४ ॥
‘संतुष्ट होनेपर महादेवजीने देवताओंसे कहा— ‘तुम लोगोंके हितके लिये एक दिव्य नारीका आविर्भाव होगा, जो समस्त राक्षसोंके विनाशमें कारण होगी॥ ३५॥
‘जैसे पूर्वकल्पमें देवताओंद्वारा प्रयुक्त हुई क्षुधाने दानवोंका भक्षण किया था, उसी प्रकार यह निशाचरनाशिनी सीता रावणसहित हम सब लोगोंको खा जायगी॥ ३६॥
‘उद्दण्ड और दुर्बुद्धि रावणके अन्यायसे यह शोकसंयुक्त घोर विनाश हम सबको प्राप्त हुआ है॥ ३७॥
‘जगतमें हम किसी ऐसे पुरुषको नहीं देखती हैं, जो महाप्रलयके समय कालकी भाँति इस समय श्रीरघुनाथजीसे संकटमें पड़ी हुई हम राक्षसियोंको शरण दे सके॥ ३८॥
‘हम बड़े भारी भयकी अवस्थामें स्थित हैं। जैसे वनमें दावानलसे घिरी हुई हथिनियोंको कहीं प्राण बचानेके लिये जगह नहीं मिलती, उसी तरह हमारे लिये भी कोई शरण नहीं है॥ ३९॥
‘महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणने समयोचित कार्य किया है। उन्हें जिनसे भय दिखायी दिया, उन्हींकी शरणमें वे चले गये’॥ ४०॥
इस प्रकार निशाचरोंकी सारी स्त्रियाँ एक-दूसरीको भुजाओंमें भरकर आर्तभाव एवं विषादग्रस्त हो गयीं और अत्यन्त भयसे पीड़ित हो अति भयंकर क्रन्दन करने लगीं॥ ४१॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४॥
पञ्चानबेवाँ सर्ग
पञ्चानबेवाँ सर्ग
रावणका अपने मन्त्रियोंको बुलाकर शत्रुवधविषयक अपना उत्साह प्रकट करना और सबके साथ रणभूमिमें आकर पराक्रम दिखाना
रावणने लङ्काके घर-घरमें शोकमग्न राक्षसियोंका करुणाजनक विलाप सुना॥ १ ॥
वह लम्बी साँस खींचकर दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो कुछ सोचता रहा; तत्पश्चात् रावण अत्यन्त कुपित हो बड़ा भयानक दिखायी देने लगा॥ २ ॥
उसने दाँतोंसे ओठ दबा लिया। उसकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं। वह मूर्तिमान् प्रलयाग्निके समान दिखायी देने लगा। राक्षसोंके लिये भी उसकी ओर देखना कठिन हो गया॥ ३ ॥
उस राक्षसराजने अपने पास खड़े हुए राक्षसोंसे अस्पष्ट शब्दोंमें वार्तालाप आरम्भ किया। उस समय वहाँ वह इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे दग्ध कर डालेगा॥ ४ ॥
उसने कहा—‘निशाचरो! महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरुपाक्षसे शीघ्र जाकर कहो—‘तुमलोग मेरी आज्ञासे शीघ्र ही सेनाओंको कूच करनेका आदेश दो’॥ ५ ॥
रावणकी यह बात सुनकर भयसे पीड़ित हुए उन राक्षसोंने राजाकी आज्ञाके अनुसार उन निर्भीक निशाचरोंको पूर्वोक्त कार्य करनेके लिये प्रेरित किया॥ ६ ॥
तब ‘तथास्तु’ कहकर भयानक दीखनेवाले उन सभी राक्षसोंने अपने लिये स्वस्तिवाचन करवाया और युद्धके लिये प्रस्थान किया॥ ७ ॥
स्वामीकी विजय चाहनेवाले वे सभी महारथी वीर यथोचित रीतिसे रावणका आदर-सम्मान करके उसके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये॥ ८ ॥
तत्पश्चात् रावण क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बड़े जोरसे हँस पड़ा और महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरुपाक्षसे कहा— ॥ ९ ॥
‘आज अपने धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंद्वारा, जो प्रलयकालके सूर्य-सदृश तेजस्वी हैं, मैं राम और लक्ष्मणको भी यमलोक पहुँचा दूँगा॥ १० ॥
‘आज शत्रुंका वध करके खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त तथा इन्द्रजित्के मारे जानेका भरपूर बदला चुकाऊँगा॥
‘मेरे बाण मेघोंकी घटाके समान सब ओर छा जायँगे; अतः अन्तरिक्ष, दिशाएँ, आकाश तथा समुद्र— कुछ भी दिखायी न देगा॥ १२ ॥
‘आज अपने धनुषसे पङ्खवाले बाणोंका जाल-सा बिछा दूँगा और वानरोंके मुख्य-मुख्य यूथोंका पृथक्-पृथक् वध करूँगा॥ १३ ॥
‘आज वायुके समान वेगशाली रथपर आरूढ़ हो मैं अपने धनुषरूपी समुद्रसे उठी हुई बाणमयी तरङ्गोंसे वानर-सेनाओंको मथ डालूँगा॥ १४ ॥
‘कमल-केसरकी-सी कान्तिवाले वानरोंके यूथ सरोवरोंके समान हैं। उनके मुख ही उन सरोवरोंके भीतर प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित होते हैं। आज मैं हाथीके समान उनमें प्रवेश करके उन वानर-यूथरूपी सरोवरोंको मथ डालूँगा॥ १५ ॥
‘आज युद्धस्थलमें गिरे हुए वानर-यूथपति अपने बाणविद्ध मुखोंद्वारा नालयुक्त कमलोंका भ्रम उत्पन्न करते हुए रणभूमिकी शोभा बढ़ायेंगे॥ १६ ॥
‘आज युद्धभूमिमें धनुषसे छूटे हुए एक-एक बाणसे मैं वृक्ष लेकर जूझनेवाले सौ-सौ प्रचण्ड वानरोंको विदीर्ण करूँगा॥ १७ ॥
‘आज शत्रुका वध करके मैं उन सब निशाचरोंके आँसू पोछूँगा, जिनके भाई और पुत्र इस युद्धमें मारे गये हैं॥ १८ ॥
आज युद्धमें मेरे बाणोंसे विदीर्ण तथा निर्जीव हुए वानर इस तरह बिछ जायँगे कि वहाँकी भूमि बड़े यत्नसे दीख सकेगी॥ १९ ॥
‘आज अपने बाणोंद्वारा मारे गये शत्रुओंके मांसोंसे मैं कौओं, गीधों तथा जो दूसरे मांसभक्षी जन्तु हैं, उन सबको भी तृप्त करूँगा॥ २० ॥
‘जल्दी मेरा रथ तैयार किया जाय, शीघ्र धनुष लाया जाय तथा मरनेसे बचे हुए निशाचर युद्धमें मेरे पीछे-पीछे चलें’॥ २१ ॥
रावणका वह वचन सुनकर महापार्श्वने वहाँ खड़े हुए सेनापतियोंसे कहा— ‘सेनाको शीघ्र ही कूच करनेकी आज्ञा दो’॥ २२ ॥
यह आज्ञा पाकर वे शीघ्रपराक्रमी सेनाध्यक्ष घरघर जाकर उन राक्षसोंको तैयार होनेका आदेश देते हुए सारी लङ्कामें घूमते फिरे॥ २३ ॥
थोड़ी ही देरमें भयंकर मुख एवं आकारवाले राक्षस गर्जना करते हुए वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥ २४ ॥
तलवार, पट्टिश, शूल, गदा, मूसल, हल, तीखी धारवाली शक्ति, बड़े-बड़े कूटमुद्गर, डंडे, भाँतिभाँ तिके चक्र, तीखे फरसे, भिन्दिपाल, शतघ्नी तथा अन्य प्रकारके उत्तमोत्तम अस्त्र-शस्त्रोंसे वे सम्पन्न थे॥
रावणकी आज्ञासे चार सेनापति एक लाखसे कुछ अधिक रथ, तीन लाख हाथी, साठ करोड़ घोड़े, उतने ही गदहे तथा ऊँट और असंख्य पैदल योद्धा लेकर आ पहुँचे। वे सब सैनिक राजाके आदेशसे वहाँ गये॥ २७-२८ ॥
इस प्रकार विशाल सेना लाकर सेनाध्यक्षोंने राक्षसराज रावणके सामने खड़ी कर दी। इसी बीचमें सारथिने एक रथ लाकर उपस्थित कर दिया॥ २९ ॥
उसमें उत्तम दिव्यास्त्र रखे थे, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे उस रथको सजाया गया था। उसमें भाँतिभाँ तिके हथियार थे और वह रथ घुँघुरुदार झालरोंसे सुशोभित था॥ ३० ॥
उसमें नाना प्रकारके रन्त जड़े हुए थे। रन्तमय खम्भे उसकी शोभा बढ़ाते थे और सोनेके बने हुए सहस्रों कलशोंसे वह अलंकृत था॥ ३१ ॥
उस रथको देखकर सब राक्षस अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे। उसपर दृष्टि पड़ते ही राक्षसराज रावण सहसा उठकर खड़ा हो गया। वह रथ करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा प्रज्वलित अग्निके सदृश दीप्तिमान् था। उसमें आठ घोड़े जुते हुए थे। उसपर सारथि बैठा था। वह रथ अपने तेजसे प्रकाशित होता था। रावण तुरंत उस भयंकर रथपर आरूढ़ हो गया॥ ३२-३३ ॥
तदनन्तर बहुत-से राक्षसोंसे घिरा हुआ रावण सहसा युद्धके लिये प्रस्थित हुआ। वह अपने बलकी अधिकतासे पृथ्वीको विदीर्ण-सा करता हुआ जा रहा था॥ ३४ ॥
फिर तो जहाँ-तहाँ सब ओर वाद्योंका महानाद गूँज उठा। मृदङ्ग, पटह, शङ्ख तथा राक्षसोंके कलहकी ध्वनि भी उसमें मिली हुई थी॥ ३५ ॥
‘सीताको चुरानेवाला, दुराचारी, ब्रह्महत्यारा तथा देवताओंके लिये कण्टकरूप राक्षसराज रावण छत्र एवं चँवर लगाये श्रीरघुनाथजीके साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है; इस प्रकारकी कलह-ध्वनि कानोंमें पड़ रही थी॥
उस महानादसे पृथ्वी काँप उठी। उस भयानक शब्दको सुनकर सब वानर सहसा भयसे भाग चले॥ ३७ ॥
मन्त्रियोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबाहु रावण युद्धमें विजयकी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर वहाँ आया॥ ३८ ॥
रावणकी आज्ञा पाकर उस समय महापार्श्व, महोदर तथा दुर्जय वीर विरूपाक्ष—तीनों ही रथोंपर आरूढ़ हुए॥ ३९ ॥
वे हर्षपूर्वक जोर-जोरसे इस तरह दहाड़ रहे थे, मानो पृथिवीको विदीर्ण कर डालेंगे। वे विजयकी इच्छा मनमें लिये घोर सिंहनाद करते हुए पुरीसे बाहर निकले॥
तदनन्तर काल, मृत्यु और यमराजके समान भयंकर तेजस्वी रावण धनुष हाथमें ले राक्षसोंकी सेनासे घिरकर युद्धके लिये आगे बढ़ा॥ ४१ ॥
उसके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे। उसके द्वारा वह महारथी वीर लङ्काके उसी द्वारसे बाहर निकला, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण मौजूद थे॥ ४२ ॥
उस समय सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी। समस्त दिशाओंमें अन्धकार छा गया, भयंकर पक्षी अशुभ बोली बोलने लगे और धरती डोलने लगी॥ ४३ ॥
बादल रक्तकी वर्षा करने लगे। घोड़े लड़खड़ाकर गिर पड़े। ध्वजके अग्रभागपर गीध आकर बैठ गया और गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं॥ ४४ ॥
बाँयी आँख फड़कने लगी। बाँयीं भुजा सहसा काँप उठी। उसके चेहरेका रंग फीका पड़ गया और आवाज कुछ बदल गयी॥ ४५ ॥
राक्षस दशग्रीव ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही रणभूमिमें उसकी मृत्युके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे॥ ४६ ॥
आकाशसे उल्कापात हुआ। उससे वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा हुई। अमङ्गलसूचक पक्षी गीध कौओंसे मिलकर अशुभ बोली बोलने लगे॥ ४७ ॥
इन भयंकर उत्पातोंको सामने उपस्थित देखकर भी रावणने उनकी कोई परवा नहीं की। वह कालसे प्रेरित हो मोहवश अपने ही वधके लिये निकल पड़ा॥
उन महाकाय राक्षसोंके रथका गम्भीर घोष सुनकर वानरोंकी सेना भी युद्धके लिये ही उनके सामने आकर डट गयी॥ ४९ ॥
फिर तो अपनी-अपनी जीत चाहते हुए रोषपूर्वक एक-दूसरेको ललकारनेवाले वानरों और राक्षसोंमें तुमुल युद्ध छिड़ गया॥ ५० ॥
उस समय दशमुख रावण अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा वानरोंकी सेनाओंमें रोषपूर्वक बड़ी भारी मार-काट मचाने लगा॥ ५१ ॥
रावणने कितने ही वानरोंके सिर काट लिये, कितनोंकी छाती छेद डाली और बहुतोंके कान उड़ा दिये॥
कितनोंने घायल होकर प्राण त्याग दिये। रावणने कितने ही वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं, कितनोंके मस्तक कुचल डाले और कितनोंकी आँखें चौपट कर दीं॥ ५३ ॥
दशमुख रावणके नेत्र क्रोधसे घूम रहे थे। वह अपने रथके द्वारा युद्धस्थलमें जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे वानरयूथपति उसके बाणोंका वेग न सह सके॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पञ्चानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९५ ॥
छानबेवाँ सर्ग
छानबेवाँ सर्ग
सुग्रीवद्वारा राक्षससेनाका संहार और विरूपाक्षका वध
इस प्रकार जब रावणने अपने बाणोंसे वानरोंके अङ्ग-भङ्ग कर डाले, तब वहाँ धराशायी हुए वानरोंसे वह सारी रणभूमि पट गयी॥ १ ॥
रावणके उस असह्य बाणप्रहारको वे वानर एक क्षण भी नहीं सह सके; ठीक वैसे ही, जैसे पतंग जलती आगका स्पर्श क्षणभर भी नहीं सह सकते हैं॥ २ ॥
राक्षसराजके तीखे बाणोंकी मारसे पीड़ित हो वे वानर उसी तरह चीखते-चिल्लाते हुए भागे, जैसे दावानलकी ज्वालाओंसे घिरकर जलते हुए हाथी चीत्कार करते हुए भागते हैं॥ ३ ॥
जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार रावण अपने बाणोंसे वानरसेनाओंका संहार करता हुआ समराङ्गणमें विचरने लगा॥ ४ ॥
बड़े वेगसे वानरोंका संहार करके वह राक्षसराज समराङ्गणमें जूझनेके लिये तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीके पास जा पहुँचा॥ ५ ॥
उधर सुग्रीवने देखा, वानरसैनिक रावणसे खदेड़े जाकर समरभूमिसे भाग रहे हैं, तब उन्होंने सेनाको स्थिर रखनेका भार सुषेणको सौंपकर स्वयं शीघ्र ही युद्ध करनेका विचार किया॥ ६ ॥
सुषेणको अपने ही समान पराक्रमी वीर समझकर उन्होंने सेनाकी रक्षाका कार्य सौंपा और स्वयं वृक्ष लेकर शत्रुके सामने प्रस्थान किया॥ ७ ॥
उनके अगल-बगलमें और पीछे समस्त वानरयूथपति बड़े-बड़े पत्थर और नाना प्रकारके वृक्ष लेकर चले॥ ८ ॥
उस समय सुग्रीवने युद्धमें उच्चस्वरसे गर्जना की और प्रलयकालमें बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाले वायुदेवकी भाँति उन विशालकाय वानरराजने विभिन्न प्रकारकी आकृतिवाले बड़े-बड़े राक्षसोंको गिरा-गिराकर मथ एवं कुचल डाला॥ ९-१० ॥
जैसे बादल वनमें पक्षियोंके समुदायपर ओले बरसाता है, उसी प्रकार सुग्रीव राक्षसोंकी सेनाओंपर बड़े-बड़े पत्थरोंकी वर्षा करने लगे॥ ११ ॥
वानरराजके चलाये हुए शैलखण्डोंकी वर्षासे राक्षसोंके मस्तक कुचल जाते और वे ढहे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो जाते थे॥ १२ ॥
इस प्रकार सुग्रीवकी मारसे जब सब ओर राक्षसोंका विनाश होने लगा तथा वे भागने और आर्तनाद करते हुए पृथ्वीपर गिरने लगे, तब विरूपाक्ष नामक दुर्जय राक्षस हाथमें धनुष ले अपना नाम घोषित करता हुआ रथसे कूद पड़ा और हाथीकी पीठपर जा चढ़ा॥ १३-१४ ॥
उस हाथीपर चढ़कर महाबली विरूपाक्षने बड़ी भयानक आवाजमें गर्जना की और वानरोंपर वेगपूर्वक धावा किया॥ १५ ॥
उसने सेनाके मुहानेपर सुग्रीवको लक्ष्य करके बड़े भयंकर बाण छोड़े और डटे हुए राक्षसोंका हर्ष बढ़ाकर उन्हें स्थिरतापूर्वक स्थापित किया॥ १६ ॥
उस राक्षसके पैने बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए वानरराज सुग्रीवने महान् क्रोधसे भरकर भीषण गर्जना की और विरूपाक्षको मार डालनेका विचार किया॥ १७ ॥
शूरवीर तो वे थे ही, सुन्दर ढंगसे युद्ध करना भी जानते थे; अतः एक वृक्ष उखाड़कर आगे बढ़े और अपने सामने खड़े हुए उसके विशाल हाथीपर उन्होंने उस वृक्षको दे मारा॥ १८ ॥
सुग्रीवके प्रहारसे घायल हो वह महान् गजराज एक धनुष पीछे हटकर बैठ गया और पीड़ासे आर्तनाद करने लगा॥ १९ ॥
पराक्रमी राक्षस विरूपाक्ष उस घायल हाथीकी पीठसे तुरंत कूद पड़ा और ढाल-तलवार ले शीघ्रतापूर्वक अपने शत्रु सुग्रीवकी ओर बढ़ा। सुग्रीव एक स्थानपर स्थिरतापूर्वक खड़े थे। वह उन्हें फटकारता हुआ-सा उनके पास जा पहुँचा॥ २०-२१ ॥
यह देख सुग्रीवने एक बहुत बड़ी शिला हाथमें ली, जो मेघके समान काली थी। उसे उन्होंने विरूपाक्षके शरीरपर क्रोधपूर्वक दे मारा॥ २२ ॥
उस शिलाको अपने ऊपर आती देख उस परम पराक्रमी राक्षसशिरोमणि विरूपाक्षने पीछे हटकर आत्मरक्षा की और सुग्रीवपर तलवार चलायी॥ २३ ॥
उस बलवान् निशाचरकी तलवारसे घायल होकर वानरराज सुग्रीव मूर्च्छित होकर थोड़ी देर धरतीपर पड़े रहे॥ २४ ॥
फिर सहसा उछलकर उन्होंने उस महासमरमें मुट्ठी बाँधकर विरूपाक्षकी छातीपर वेगपूर्वक एक मुक्का मारा॥ २५ ॥
उनके मुक्केकी चोट खाकर निशाचर विरूपाक्षका क्रोध और बढ़ गया और उसने सेनाके मुहानेपर उसी तलवारसे सुग्रीवके कवचको काट गिराया; साथ ही उसके पैरोंका आघात पाकर
वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६ १/२ ॥
गिरे हुए सुग्रीव पुनः उठकर खड़े हो गये और उन्होंने उस राक्षसको वज्रके समान भीषण शब्द करनेवाले थप्पड़से मारा॥ २७ १/२ ॥
सुग्रीवके चलाये हुए उस थप्पड़का वार वह राक्षस अपने युद्धकौशलसे बचा गया और उसने सुग्रीवकी छातीपर एक घूसा मारा॥ २८ १/२ ॥
अब तो वानरराज सुग्रीवके क्रोधकी सीमा न रही। उन्होंने देखा कि राक्षसने मेरे प्रहारको व्यर्थ कर दिया और अपने ऊपर उसका स्पर्श नहीं होने दिया। तब वे विरुपाक्षपर प्रहार करनेका अवसर देखने लगे॥ २९-३० ॥
तदनन्तर सुग्रीवने विरुपाक्षके ललाटपर क्रोधपूर्वक दूसरा महान् थप्पड़ मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान दुःसह था। उससे आहत होकर विरुपाक्ष पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसका सारा शरीर खूनसे भीग गया और वह समस्त इन्द्रिय-गोलकोंसे उसी प्रकार रक्त वमन करने लगा, जैसे झरनेसे जल गिर रहा हो॥
उस राक्षसकी आँखें क्रोधसे घूम रही थीं। वह फेनयुक्त रुधिरमें डूबा हुआ था। वानरोंने देखा, विरुपाक्ष अत्यन्त विरुपाक्ष (कुरूप नेत्रवाला और भयंकर) हो गया है। खूनसे लथपथ हो छटपटाता करवटें बदलता तथा करुणाजनक आर्तनाद करता है॥ ३३-३४ ॥
इस प्रकार वे दोनों वेगशाली वानरों और राक्षसोंके सैन्य-समुद्र मर्यादा तोड़कर बहनेवाले दो भयानक महासागरोंके समान परस्पर संयुक्त हो युद्धभूमिमें महान् कोलाहल करने लगे॥ ३५ ॥
वानरराज सुग्रीवके द्वारा महाबली विरुपाक्षका वध हुआ देख वानरों और राक्षसोंकी सेनाएँ एकत्र हो बढ़ी हुई गङ्गाके समान उद्वेलित हो गयीं (एक ओर आनन्दजनित कोलाहल था तो दूसरी ओर शोकके कारण आर्तनाद हो रहा था)॥ ३६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९६ ॥
सत्तानबेवाँ सर्ग
सत्तानबेवाँ सर्ग
सुग्रीवके साथ महोदरका घोर युद्ध तथा वध
उस महासमरमें वे दोनों ओरकी सेनाएँ परस्परकी मारकाटसे प्रचण्ड ग्रीष्मऋतुमें सूखते हुए दो तालाबोंकी तरह शीघ्र ही क्षीण हो चलीं॥ १ ॥
अपनी सेनाके विनाश और विरूपाक्षके वधसे राक्षसराज रावणका क्रोध दूना बढ़ गया॥ २ ॥
वानरोंकी मारसे अपनी सेनाको क्षीण हुँऽइ देख दैवके उलट-फेरपर दृष्टिपात करके युद्धस्थलमें उसे बड़ी व्यथा हुँऽइ॥ ३ ॥
उसने पास ही खड़े हुए महोदरसे कहा— ‘महाबाहो! इस समय मेरी विजयकी आशा तुम्हारे ऊपर ही अवलम्बित है॥ ४ ॥
‘वीर! आज अपना पराक्रम दिखाओ और शत्रुसेनाका वध करो। यही स्वामीके अन्नका बदला चुकानेका समय है। अतः अच्छी तरह युद्ध करो’॥ ५ ॥
रावणके ऐसा कहनेपर राक्षसराज महोदरने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और जैसे पतङ्ग आगमें कूदता है, उसी प्रकार उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया॥ ६ ॥
सेनामें प्रवेश करके तेजस्वी और महाबली महोदरने स्वामीकी आज्ञासे प्रेरित हो अपने पराक्रमद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया॥ ७ ॥
वानर भी बड़े शक्तिशाली थे। वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर शत्रु की भयंकर सेनामें घुस गये और समस्त राक्षसोंका संहार करने लगे॥ ८ ॥
महोदरने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उस महायुद्धमें वानरोंके हाथ-पैर और जाँघें काट डालीं॥ ९ ॥
राक्षसोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सब वानर दसों दिशाओंमें भागने लगे। कितने ही सुग्रीवकी शरणमें गये॥ १० ॥
वानरोंकी विशाल सेनाको समरभूमिसे भागती देख सुग्रीवने पास ही खड़े हुए महोदरपर आक्रमण किया॥ ११ ॥
वानरराज बड़े तेजस्वी थे। उन्होंने पर्वतके समान विशाल एवं भयंकर शिला उठाकर महोदरके वधके लिये उसपर चलायी॥ १२ ॥
उस दुर्जय शिलाको सहसा अपने ऊपर आती देखकर भी महोदरके मनमें घबराहट नहीं हुई। उसने बाणोंद्वारा उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले॥ १३ ॥
उस राक्षसके बाणसमूहोंसे कटकर सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त हुई वह शिला उस समय आकुल हुए गृध्रसमुदायकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ १४ ॥
उस शिलाको विदीर्ण हुई देख सुग्रीवका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने एक शालका वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसके ऊपर फेंका, किंतु राक्षसने उसके भी कई टुकड़े कर डाले॥ १५ ॥
साथ ही शत्रुसेनाका दमन करनेवाले उस शूरवीरने इन्हें अपने बाणोंसे घायल कर दिया। इसी समय क्रोधसे भरे हुए सुग्रीवको वहाँ पृथ्वीपर पड़ा हुआ एक परिघ दिखायी दिया॥ १६ ॥
उस तेजस्वी परिघको घुमाकर सुग्रीवने महोदरको अपनी फुर्ती दिखाते हुए उस भयानक वेगशाली परिघके द्वारा उस राक्षसके उत्तम घोड़ोंको मार डाला॥ १७ ॥
घोड़ोंके मारे जानेपर वीर राक्षस महोदर अपने विशाल रथसे कूद पड़ा और अत्यन्त रोषसे भरकर उसने गदा उठा ली॥ १८ ॥
एकके हाथमें गदा थी और दूसरेके हाथमें परिघ। वे दोनों वीर युद्धस्थलमें दो साँड़ों और बिजलीसहित दो मेघोंके समान गर्जना करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये॥
तदनन्तर कुपित हुए राक्षस महोदरने सुग्रीवपर सूर्यतुल्य तेजसे चमकती हुई एक गदा चलायी॥ २० ॥
उस महाभयंकर गदाको अपनी ओर आती देख महासमरमें महाबली वानरराज सुग्रीवके नेत्र रोषसे लाल हो गये और उन्होंने परिघ उठाकर उसके द्वारा राक्षसकी गदापर आघात किया। वह गदा गिर पड़ी; किंतु उसके वेगसे टकराकर सुग्रीवका परिघ भी टूटकर पृथ्वीपर जा गिरा॥ २१-२२ ॥
तब तेजस्वी सुग्रीवने भूमिपरसे एक लोहेका भयंकर मूसल उठाया; जिसमें सब ओरसे सोना जड़ा हुआ था॥ २३ ॥
उसे उठाकर उन्होंने राक्षसपर दे मारा। साथ ही उस राक्षसने भी इनके ऊपर गदा फेंकी। गदा और मूसल दोनों आपसमें टकराकर टूट गये और जमीनपर जा गिरे॥ २४ ॥
वे दोनों वीर तेज और बलसे सम्पन्न थे और जलती हुई अग्नियोंके समान उद्दीप्त हो रहे थे। अपने-अपने आयुधोंके टूट जानेपर वे घूंसोंसे एक-दूसरेको मारने लगे॥ २५ ॥
उस समय बारम्बार गर्जते हुए वे दोनों योद्धा परस्पर मुक्कोंसे प्रहार करने लगे। फिर थप्पड़ोंसे एक-दूसरेको मारकर दोनों ही पृथ्वीपर गिर पड़े॥ २६ ॥
फिर तत्काल ही दोनों उछले और शीघ्र ही एक-दूसरेपर चोट करने लगे। वे दोनों वीर हार नहीं मानते थे। दोनों ही दोनोंपर भुजाओंद्धारा प्रहार करते रहे॥ २७ ॥
शत्रुओंको तपानेवाले वे दोनों वीर बाहुयुद्ध करते-करते थक गये। तब महान् वेगशाली राक्षस महोदरने थोड़ी ही दूरपर पड़ी हुई ढालसहित तलवार उठा ली। उसी तरह अत्यन्त वेगशाली कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने भी वहाँ गिरे हुए विशाल खड्गको ढालसहित उठा लिया॥ २८ ॥
महोदर और सुग्रीव दोनों युद्धके मैदानमें शस्त्र चलानेकी कलामें चतुर थे तथा दोनोंके शरीर रोषसे प्रभावित थे; अतः रणभूमिमें हर्ष और उत्साहसे युक्त हो वे तलवार उठाये गर्जते हुए एक-दूसरेपर टूट पड़े॥
वे दोनों बड़ी तेजीसे दायें-बायें पैंतरे बदल रहे थे, दोनोंका दोनोंपर क्रोध बढ़ा हुआ था तथा दोनों ही अपनी-अपनी विजयकी आशा लगाये हुए थे॥ ३१ ॥
अपने बलपर घमंड करनेवाले महान् वेगशाली तथा शौर्य-सम्पन्न दुर्बुद्धि महोदरने अपनी वह तलवार सुग्रीवके विशाल कवचपर दे मारी॥ ३२ ॥
सुग्रीवके कवचमें लगी हुई तलवारको जब वह राक्षस खींचने लगा, उसी समय कपिकुञ्जर सुग्रीवने महोदरके शिरस्त्राणसहित कुण्डलमण्डित मस्तकको अपने खड्गसे काट लिया॥ ३३ ॥
मस्तक कट जानेपर राक्षसराज महोदर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर उसकी सेना फिर वहाँ नहीं दिखायी दी॥ ३४ ॥
महोदरको मारकर प्रसन्न हुए वानरराज सुग्रीव अन्य वानरोंके साथ गर्जना करने लगे। उस समय दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ और श्रीरघुनाथजी हर्षसे खिल उठे॥ ३५ ॥
उस समय समस्त राक्षसोंका मन दुःखी हो गया। उन सबके मुखपर विषाद छा गया और वे सभी भयभीतचित्त होकर वहाँसे भाग चले॥ ३६ ॥
महोदरका शरीर किसी महान् पर्वतके एक टूटे हुए शिखर-सा जान पड़ता था। उसे पृथ्वीपर गिराकर सूर्यपुत्र सुग्रीव वहाँ विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित होने लगे, मानो प्रचण्ड सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हों॥
इस प्रकार वानरराज सुग्रीव युद्धके मुहानेपर विजय पाकर बड़ी शोभा पाने लगे। उस समय देवता, सिद्ध और यक्षोंके समुदाय तथा भूतलनिवासी प्राणियोंके समूह भी बड़े हर्षसे उनकी ओर देखने लगे॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९७ ॥
अठानबेवाँ सर्ग
अठानबेवाँ सर्ग
अंगदके द्वारा महापार्श्वका वध
सुग्रीवके द्वारा महोदरके मारे जानेपर उनकी ओर देखकर महाबली महापार्श्वके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये॥
उसने अपने बाणोंद्वारा अंगदकी भयंकर सेनामें हलचल मचा दी। वह राक्षस मुख्य-मुख्य वानरोंके मस्तक धड़से काट-काटकर गिराने लगा, मानो वायु वृन्त या डंठलसे फल गिरा रही हो॥ २ १/२ ॥
क्रोधसे भरे हुए महापार्श्वने अपने बाणोंसे कितनोंकी बाँहें काट दीं और कितने ही वानरोंकी पसलियाँ उड़ा दीं॥ ३ १/२ ॥
महापार्श्वकी बाणवर्षासे पीड़ित हो बहुत-से वानर युद्धसे विमुख हो गये। सबकी चेतना जाती रही॥ ४ १/२ ॥
उस राक्षससे पीड़ित वानर-सेनाको उद्विग्न हुई देख महान् वेगशाली अङ्गदने पूर्णिमाके दिन समुद्रकी भाँति अपना भारी वेग प्रकट किया॥ ५ १/२ ॥
उन वानरशिरोमणिने सूर्यकी किरणोंके समान दमकनेवाला एक लोहेका परिघ उठाकर महापार्श्वपर दे मारा॥ ६ १/२ ॥
उस प्रहारसे महापार्श्वकी सुध-बुध जाती रही और वह मूर्च्छित हो सारथिसहित रथसे नीचे जा पड़ा॥
इसी समय काले कोयलेके ढेरके समान कृष्ण वर्णवाले, महान् पराक्रमी और तेजस्वी ऋक्षराज जाम्बवान्ने मेघोंकी घटाके सदृश अपने यूथसे बाहर निकलकर कुपित हो एक पर्वत-शिखरके समान विशाल शिला हाथमें ले ली और उसके द्वारा उस राक्षसके घोड़ोंको मार डाला तथा उसके रथको भी चूर्ण कर दिया॥
दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर महाबली महापार्श्वने बहुत-से बाणोंद्वारा पुनः अङ्गदको घायल कर दिया और जाम्बवान्की छातीमें भी तीन बाण मारे॥ १०-११ ॥