भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

कथाओ का उपयोग मनुष्यों को उपदेश देने के लिए किया गया है। बौद्ध लोग पिछले जन्मो मे बुद्ध और उनके समकालीन पुरुषों की महत्ता एवं उनके कार्यों का उदाहरण देने के लिए पशुओं की कथाओं का आधार लिया करते थे। इस "महाभारत"¹ से तथा पतञ्जलि द्वारा लोकन्यायों के उल्लेख से यह माना जा सकता है कि इस प्रकार की पशु-कथा प्रचलित थी किन्तु उक्त कथाओ ने उस समय तक किसी प्रकार का साहित्यिक रूप धारण किया था, यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते।

लोक-कथाओं का प्राचीनतम संग्रह गुणाढय की "वृहत्कथा" है। 'वृहत्कथा' को कालान्तर में इतनी अधिक प्रसिद्धि मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि प्राचीन समय की रचनाओं में तद् अपेक्षया भिन्न कहानियाँ बहुत कम सुरक्षित हैं। प्राचीनतम कथा-ग्रन्थ "पञ्चतन्त्र" के साथ-साथ पशु-पक्षियों की कहानियों की परम्परा नष्ट-प्राय हो गयी। बाद में वृहत्कथा के तीन संस्करण बने-वृहत्कथामञ्जरी, कथासरित्सागर और वृहत्कथाश्लोकसंग्रह। इन संस्करणों में प्राचीन कथाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। यद्यपि इस विषय में विद्वानों में मतभेद है कि इन संस्करणो में प्राप्त कथायें "वृहत्कथा" में प्राप्त कथाओं के ही मूलरुप हैं। ये कथायें गद्य-पद्यात्मक हैं। वृहत्कथा की कथायें उपदेशात्मक मनोरञ्जन प्रधान एवं विशिष्ट उद्देश्य के कथन से समन्वित हैं।

ऐसे ही कथाग्रंथों की विकास की परम्परा में "शुकसप्तति" की 70 कहानियों का विकास हुआ। जो अत्यन्त रोचक हैं। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि इन 70 कहानियो का मूलाधार "वृहत्कथा" थी अथवा कोई अन्य लोक-कथासंग्रह। ऐसा प्रतीत होता है कि शुकसप्तति एक स्वतंत्र लोक-कथा ग्रन्थ है जिसका उद्देश्य पत्नी को कुमार्ग पर जाने से बचाना है। यद्यपि इस मूल तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि इसका रचयिता पूर्व में प्राप्त कथा ग्रन्थों से प्रभावित नहीं था।


1 Mahabharata, (iv) 88 FF.

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(6) ग्रन्थ का महत्व : शुकसप्तति के इन 70 कहानियों में स्त्रियों के व्यभिचार सम्बन्धी कामशास्त्र द्वारा प्रथित उन तमाम चातुर्य का विश्लेषण कवि ने जिस चातुरी से प्रस्तुत किया है, संभवत. उतनी सरलता से अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। ये सम्पूर्ण कहानियाँ उपदेशपरक, रोचक, सरल गान में कहीं-कहीं पद्य में हैं। कुछ प्राकृत में भी पद्य समुपलब्ध हैं।

वस्तुतः इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक समावलोकन करने पर जिज्ञासु कोपबुद्धिजीवी अनुसंधान की पराकाष्ठा पर पहुंचने पर इस तथ्य को दावे के साथ प्रस्तुत करने के लिए पूर्णरुपेण परिपक्वास्था में प्राप्त होने पर एक निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचता है, जो सारगर्भित एवं किसी देशकाल एवं परिस्थिति का जीता जागता वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करने मे समर्थ ही नहीं अपितु सिद्ध हो जाता है। प्राचीनकाल से आज तक विभिन्न काल-खण्डों, स्थान विशेष व विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार अनेक लोक-कल्याणकारी एव सचालक प्रकृति के समक्ष सहज ही दर्शित होते हैं। इन्ही काल-क्रमादि के परिप्रेक्ष्य में "शुकसप्तति" कथा का जन्म घटनाचक्र, वृहत कथाङ्ग शुक एवं सारिका के विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान की पारदर्शिता की उपयोगिता, उसकी आवश्यकता, हरिदत्त नामक सेठ की परिवारिक प्रतिकूलता, असहयोग जटिलता की समस्याओ से ग्रसित संकटकालीन परिस्थितियो के रुप में अपने अस्तित्व को लाना तथा उसका प्रचार-प्रसार एवं संज्ञान उपयुक्त ज्ञानियों, विज्ञानियों, कवियों तथा मीमासकों का ध्यान आकर्षित होना और समग्ररुप में लिपिबद्ध करके साहित्य में लाने की प्रबल आकांक्षा जिसका संचरण तत्कालीन इसका मूलाधार है। मुख्यतया अशिष्टता, अश्लीलता, साथ ही साथ नैतिकता का संयोग सदैव विद्यमान होकर इस ग्रन्थ को गुणाढ्य कृत वृहतकथा जो कि लोककथाओं का प्राचीनतम ग्रन्थ है उससे भी अग्रसर होता हुआ अद्यावतु हम सभी अपने लोक जीवन व्यवहार एवं परस्पर सम्बन्धों की श्रृंखला पर प्रदर्शित कर रहे हैं। कुल मिलाकर उपर्युक्त यह रचना संस्कृत साहित्य के कथा-साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय है।

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(7) प्रचार एवं प्रसार : शुक सप्तति यद्यपि मनोरञ्जक है किन्तु इसे उतनी प्रसिद्धि एवं ख्याति नही मिल पायी जितनी अन्य कथाग्रन्थों को मिली। संभवतः इसका एक प्रमुख कारण यह रहा होगा कि समाज मे बहुत समय तक वृहत्कथा, हितोपदेश एव पञ्चतन्त्र की कहानियो का प्रचार था, सम्भवतः लोग उन्हीं ग्रन्थों को प्रधानरूप से पढते थे। धीरे-धीरे कालान्तर मे ऐसा लगता है कि समाज एवं मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में कुछ परिवर्तन आया और हल्के-फुल्के कहानियो के माध्यम से मनोरञ्जन करने की प्रवृत्ति का समाज में जन्म हुआ। यद्यपि शुकसप्तति की कथायें आदर्शात्मक हैं तथापि शुकसप्तति की कथाओं का समाज में प्रसार अपेक्षाकृत कम हुआ।

(8) <u>शुकसप्तति कथा अथवा आख्यायिका :</u>

कथा के उपर्युक्त विभाजनों मे से यदि मात्र दो मुख्य भेदों कथा और आख्यायिका को ही माना जाय तो इसका तात्पर्य है कि समग्र कथा सहित्य के ग्रन्थों का भी, विभाजन हो जायेगा जिसमें कुछ "कथा" के अन्तर्गत आयेंगे और कुछ "आख्यायिका" के। अब प्रश्न यह उठता है कि प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के अध्येय ग्रन्थ 'शुक-सप्तति' को किस वर्ग मे रखा जाय। आख्यायिका का पूर्वपक्षी विद्वान इसमें आख्यायिका के लक्षणो की उपस्थिति बताकर उसे आख्यायिका सिद्ध करने का प्रयास करेगा तो दूसरी ओर कथा के उत्तरपक्षी भी इसमें कथा के लक्षणों का प्रवेश बताकर उसे कथा ही सिद्ध करने का अटूट प्रयास करेंगे।

आख्यायिका के सामान्य लक्षण हैं-उच्छ्वासों से युक्त होना, वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग होना, ऐतिहासिक व्यक्ति का वर्णन होना, संस्कृत में रचना होना, कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त होना तथा कन्याहरण, संग्राम आदि विपत्तियों से युक्त होना।

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आख्यायिका के इन लक्षणों में से कतिपय 'शुकसप्तति' में प्राप्त होते हैं। यथा—सस्कृत मे इसकी रचना है तथा कहानियो में वियोग आदि विपत्तियों का वर्णन है।

इसी प्रकार कथा की सामान्य विशेषतायें हैं ... कथा में सरस इतिवृत्त होता है, कहीं-कहीं आर्या, वक्त्र तथा अपरवक्त्र छन्दो का प्रयोग हो, लम्ब, लुम्बकों में विभाजन हो, संस्कृत, प्राकृत अथवा अपभ्रश में रचना हो, कुलीन व्यक्ति स्वगुण कथन नहीं कर सकता अतएव कथा मे नायक स्वयं अपना चरित्र वर्णन न करे, कथा के प्रारम्भ में पद्यों द्वारा देवस्तुति, सज्जन प्रशंसा, दुर्जन निन्दा इत्यादि का विधान होता है।

आख्यायिका की ही भाँति कथा की भी कतिपय विशेषताये 'शुक सप्तति'' में प्राप्त होती है इस ग्रन्थ का इतिवृत्त अतिसरस और रोचक है जो पाठक के मन में ग्रन्थ के प्रति रुचि बनाए रहता है, यह ग्रन्थ संस्कृत में रचित है, नायक द्वारा स्वयं अपने चरित्र का वर्णन नही किया गया है, तथा कथा के प्रारम्भ में पद्यों द्वारा माता शारदा की स्तुति की गई है तथा चिन्तामणि भट्ट और श्वेताम्बर जैन मुनि के संस्करणों में गद्य के मध्य पद्य भी प्राप्त है।

इस प्रकार कथा और आख्यायिका दोनों विधाओं की कुछ-कुछ विशेषतायें "शुकसप्तति" ग्रन्थ में प्राप्त होती हैं। किन्तु इनका विभाजन आधार रहित और अधिक स्थिर नहीं माना जाता है और अन्ततः एकमात्र कथा को ही महत्व दिया जाता है। आख्यायिका को कथा के समक्ष नहीं माना जाता है तथा 'कथा सरित्सागर' में कहानियों को कथा कहे जाने के कारण, कथा का प्रयोग कहानी के अर्थ में होने के कारण 'शुकसप्तति' के समस्त संस्करणों में इन कथाओं का अभिधान कथा रुप में ही होने के कारण यथा 'यशोदेवी की कथा', 'बालपण्डिता' की कथा 'मंडक की कथा' आदि चिन्तामणि भट्ट ओर श्वेताम्बर जैनके संस्करणों में मङ्गलाचरण के पश्चात् कथा का ही अभिधान होने से तथा स्वयं शुक द्वरा प्रत्येक कथा के सुनाने पर यदि विपत्ति में पडने

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पर ऐसी बुद्धि रखती हो तो जाओ-इस प्रकार "कथा" का ही सर्वत्र प्रचुरता से प्रयोग होने के कारण यदि इन कथाओं को "कथा" ही कह दिया जाय तो अनुचित नहीं होगा।

(ग) शुकसप्तति पर अन्य ग्रन्थों का प्रभाव :

शुकसप्तति का रचयिता अन्य नैतिक आदर्शों का उपदेशक है। शुकसप्तति की प्रत्येक कथा समाज को नैतिक मूल्यों, नैतिक आदर्शों का उपदेश देने के निमित्त उपनिबद्ध की गई है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ग्रन्थकार ने इन कथाओं की रचना तो की है साथ ही अन्य ग्रन्थों से भी सहायता ली है। शुकसप्तति के अध्ययन के पश्चात् यह स्पष्ट होता है कि कवि पर अन्य ग्रन्थों का प्रभूत प्रभाव पड़ा जिसके अन्तर्गत लोक-कथाये, रामायण, महाभारत, किरातार्जुनीयम्, रत्नावली, कालिदास आदि प्रमुख हैं।

पुराणो का भी यथेष्ट प्रभाव शुक सप्तति पर देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाकार अपने आदर्शों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए एवं उसे और प्रभावशाली बनाने के निमित्त इन ग्रंथों के आदर्शस्थापक श्लोकों को उद्धृत किया है।

राज नियम का ज्ञान कराने हेतु ग्रन्थकार प्रभावती को शुक द्वारा उपदेश देने के माध्यम से हर पाठक को यह संदेश देताहै कि राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से वित्त, राम एवं कृष्ण से बल एवं दृढ़ता लेकर रचा जाता है।¹ राजा के देवत्व स्वरूप का वर्णन "भुयोभूयः" वैदिक वाङ्गमय में दिखाई पड़ता है। राजा देवताओ का अंश होता है इसीलिए उसके लिए देव सम्बोधन का प्रयोग परवर्ती साहित्य में किया गया है। स्पष्ट है कि ग्रन्थकार पर वैदिक वाङ्गमय का प्रभाव था।


¹ इन्द्रात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 49, पृ० सं० 39

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महाभारत का प्रभाव :

ग्रन्थकार महाभारत से खूब प्रभावित था। भिन्न-भिन्न प्रङ्गों में महाभारत के कई श्लोक उसी रुप मे शुकसप्तति मे उद्धृत कर दिये गये हैं। प्रजापालक राजा के सम्बन्ध में महाभारत का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया गया है। जो कि भीम के सम्बन्ध में है हूबहू इस ग्रंथ मे उद्धृत किया गया है।

मा वृकोदर पादेन एकादशचमूपतिम्।।
पञ्चानामपि यो भर्ता नासाप्रकृतिमानवी।।¹

हे भीम! दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेना का मालिक है, पैर से इसका मर्दन मत करो-अपमानित मत करो। पाँच आदमियों का भी जो पोषण करता है वह मानवी प्रकृति नहीं है।

मनुष्य का मित्र धन होता है जिसके पास धन है वही संसार में पण्डित समझा जाता है इस कथन के समर्थन रूप में शुकसप्तति में महाभारत के श्लोक को पुनः उद्धृत किया गया है।

जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च श्रूयन्ते किल भारत।
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः।।²

हे भारत! दरिद्र, रोगी, मूर्ख, विदेशस्थ और नित्यसेवक—ये पाँच जीते हुए भी मृत समझे जाते हैं।

महाभारत के उद्धृत श्लोकों से स्पष्ट है कि ग्रन्थकार महाभारत से प्रभावित था।

रामायण का प्रभाव :

भारत को नैतिक शिक्षा का उपदेश देने वाले रामायण से भी ग्रन्थकार प्रभावित था। शुकसप्तति में यत्र-तत्र पात्र रामायण के श्लोकों से यह तथ्य स्वतः स्पष्ट है कि—स्वर्णनिर्मित लङ्का के प्रति विरक्ति एवं अयोध्या के प्रति आसक्ति को व्यक्त करने


1 शुकसप्तति., श्लोक सं० 50, पृष्ठ सं० 40
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 57, पृष्ठ सं० 44.

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वाले राम के द्वारा भरत के प्रति कहा गया यह श्लोक-लोभ नही करना चाहिए। इस आदर्श को व्यक्त करने के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।¹

श्रीरामचन्द्र जी कह रहे हैं। हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन-रहित भी मुझे सुखकर है।

कालिदास का प्रभाव :

शुकसप्तति के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि कालिदास का प्रभूत प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा है। यही कारण है कि नैतिक आदर्शों का कथन करने वाले कालिदास के कतिपय श्लोक शुकसप्तति में यत्र-तत्र उद्धृत किये गये हैं। मित्रता का आदर्श प्रस्तुत करने वाला कुमारसम्भव का निम्नलिखित श्लोक बिना किसी परिवर्तन के इस ग्रन्थ मे उद्धृत हुआ है।

"यतः सता सन्नतगात्रिसङ्गतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते।।"²

कुमारसम्भव महाकाव्य में ब्रह्मचारी वेश धारण किए शिव ने पार्वती से कहा है- हे (स्तनों के भार से)! झुके शरीर वाली, मनीषियों ने कहा है कि सज्जनों के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

हर्षदेव का प्रभाव : '

महाराज हर्षदेव की रचनाओं का यथेष्ट प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा। महाराज श्री हर्षदेव का समय छठीं शताब्दी के आस-पास माना जाता है। हर्षकृत रत्नावली के निष्कम्पक के अन्तर्गत वर्णित निम्नलिखित श्लोक को हू-ब-हू रूप में इस ग्रन्थ में


1 शुकसप्तति श्लोक सं० 314, पृष्ठ स० 263.
2 शुकसप्तति पृष्ठ सं०-265 (कुमारसंभव पञ्चम अंक)

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तृतीय अध्याय : शुकसप्तति - कथा परिचय

उद्धृत किया गया है। जिसमें कर्म की अपेक्षा भाग्यवादित की अवश्य सम्भाविता को सिद्ध किया गया है।

द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥¹

अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लाकर मिला देता है।

भारवि का प्रभाव :

किरातार्जुनीय जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ का भी पर्याप्त प्रभाव कवि पर पड़ा। किरातार्जुनीय का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक जो राजनीतिक आदर्श के संदर्भ में है, शुकसप्तति में प्राप्त होता है। “शठेशाठ्यं समाचरेत्” के आदर्श को उपस्थित करने वाला यह श्लोक शुकसप्तति के 21 वीं (कथा) के अन्तर्गत उद्धृत किया गया है।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः। प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः ॥²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीर वालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

इन उद्धरणों के अतिरिक्त – इस ग्रन्थ में यत्र-तत्र उपमान के रुप में कवि ने अनेक ग्रन्थों के पात्रों का वर्णन किया है। जैसे-महाभारत के पात्र -भीम, दुर्योधन का।³ द्यूत क्रीडा में युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दाँव में लगाने का वर्णन हुआ। शिव पुराण एवं नीतिशास्त्र के प्रसङ्गों का भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलता है।⁴


1 शुकसप्तति-श्लोक सं० 61, पृष्ठ सं० 47
2 शुक सप्तति -श्लोक सं० 123, पृष्ठ सं० 106.
3 शुकसप्ततिः-श्लोक स० 336, पृष्ठ सं० 279.
4 शुक सप्ततिः-श्लोक स० 96, 97, 135 पृष्ठ संख्या- 76, 77, 115

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इसके अतिरिक्त नारद द्वारा मदन नामक गंधर्व की पुत्री मदनमञ्जरी को शाप देने की कथा का वर्णन भी इसमें प्राप्त होता है।¹

इस प्रकार कहा जा सकता है कि शुकसप्ततिः का रचनाकार वैदिक वाङ्मय, अनेक पौराणिक ग्रन्थो एवं लौकिक काव्यों एवं नीतिशास्त्र का ज्ञाता था।



¹ अथान्यदा नारद समायातः। सोऽप्यस्या रूपमवलोक्य मूर्च्छित सकामोऽभूत्। पश्चाल्लब्धसंज्ञेन ऋषिणा सा शप्ता। शुकसप्तति, पृष्ठ स0 279-280 (चौखम्बा प्रकाशित, सम्वत् 2023)।

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तृतीय अध्याय

शुकसप्तति कथा परिचय

"शुकसप्तति "कथा-परिचय"

(1) ग्रन्थ का मूल स्वरूप :

शुकसप्तति के प्राप्त प्रधान दो संस्करणों साधारण और परिष्कृत के विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इस ग्रन्थ का मूल स्वरूप क्या था। यह ग्रन्थ मूलतः गद्यात्मक था या पद्यात्मक या गद्य-पद्य मिश्रित था, यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकते। प्रसिद्ध इतिहासकार मङ्गलदेव शास्त्री का विचार है¹ कि इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्त्यात्मक पद्य और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन परक पद्य रहे होंगे।

शुकसप्तति के साधारण संस्करण के आधार पर कुछ विचारकों ने ऐसा विचार प्रकट किया है कि यह कथाग्रन्थ अपने मूलरूप में चाहे जिस भी रूप में रहा हो किन्तु बाद में अन्ततोतात्वा इसने एक पद्यात्मक रूप ग्रहण कर लिया था। इस कथा ग्रन्थ मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः यह सग्रह अपने मूलरूप में प्राकृतभाषा में रहा होगा किन्तु इस प्रश्न का कोई निश्चित समाधान प्रस्तुत नही किया जा सकता। ग्रन्थ का कलेवर मनोरञ्जक है। लोकभाषा के साहित्य पर अपने प्रभाव को छोड़कर इस ग्रन्थ का कोई विशेष आकर्षण नहीं है।

किसी ठोस सामग्री के अभाव में अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि इसका मूलरूप गद्यात्मक रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तियों के कथन हेतु पद्यों का प्रयोग किया गया रहा होगा। यद्यपि शुकसप्तति से पूर्व प्राप्त कथाग्रन्थ जैसे वृहत्कथा आदि जो प्राप्त नहीं हैं किन्तु उसका संस्करण विशेष रूप से कश्मीरी संस्करण पद्यात्मक है। इस प्रकार पञ्चतन्त्र भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है हितोपदेश भी भी पद्यात्मक है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की जा


¹ संस्कृत साहित्य का इतिहास, मगलदेव शास्त्री

सकती है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारण प्रस्तुत की जा सकती है कि शुकसप्तति भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है। शुकसप्तति का मूलस्वरूप भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक रहा होगा किन्तु निश्चित रूप से निर्णायक रूप में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

(2) आधार कथा :

कथा सहित्य में शुकसप्तति 70 कहानियों का एक ऐसा संग्रह है जिनमें तरह-तरह की समस्याओ के हल प्राप्त होते हैं। इस संग्रह में सम्पूर्ण कथायें उपदेशप्रद ही हैं यह सर्वथा सत्य नहीं है जैसा कि संग्रह की आधार कथा से लगता है।

चन्द्रपुर नाम के नगर में विक्रमसेन नाम का राजा रहता था। उसी नगर में हरिदत्त नाम का सेठ रहता था। उसकी पत्नी का नाम श्रृंगार सुन्दरी था उसके पुत्र का नाम मनदविनोद था और पुत्रवधू प्रभावती थी जो सोमदत्त नामक सेठ की पुत्री थी।

यथा नाम तथा गुणः के आधार पर यह मदनविनोद अपना सारा समय अपनी युवती पत्नी के प्रेमालाप में ही व्यतीत कर देता था और पिता की शिक्षा का अपमान करता था। जुआ, मृगया, वेश्या, आदि में निरन्तर आसक्त रहता था। कुमार्गगामी इस पुत्र से पिता हरिदत्त सपत्नीक दुःखी रहता था। उन्हें दुःख से पीड़ित देखकर हरिदत्त का मित्र त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण ने अपने घर से नीतिकुशल शुक एवं सारिका उपहार में भेट किया और यह कहा कि तुम्हारा प्रस्तुत दुःख इनसे दूर हो जायेगा। इन शुक सारिकाओं को ग्रहण कर हरिदत्त ने अपने पुत्र मदन विनोद को दे दिया। जिन्हें अपने शयन कक्ष में पिंजड़े में स्थापित कर उसने पालन-पोषण किया।

एकबार एकान्त में शुक ने मदन विनोद से कहा-हे मित्र! 'तुम्हारे व्यसन आसक्ति से दुःखी तुम्हारे माता-पिता के आँखों से जो अस्रु समूह निरन्तर भूमि पर

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गिरता है उस पाप से देवशर्मा की तरह तुम्हारा भी पतन सम्भाव्य है। कहीं-कहीं पर यह पक्षी रूपधारी गन्धर्व थे ऐसी चर्चा भी प्राप्त होती है¹ बुद्धिमान शुक के उपदेश से कुमार्ग-गामी वह मदन विनोद सदाचार के मार्ग का अवलम्बन कर लेता है और अत्यन्त विनयशील बन जाता है। इसके बाद वह मदनविनोद माता-पिता की आज्ञा से एवं पत्नी की राय से व्यापार की दृष्टि से देशान्तर को चला गया। इसके अनन्तर पति विरह से दुःखी मदनविनोद की पत्नी कुछ समय निर्वाह करती है और व्यभिचारिणी अपनी सखियों के द्वारा प्रेरित होकर परपुरुष के प्रति अभिलाषवती हो जाती है, एव रमण के लिए श्रृङ्गार कर ज्योंही घर से निकलना चाहती है त्यों ही सारिका पक्षी ने उसे रोका और फटकारा तब उसने (प्रभावती) गला मरोड़ कर सारिका को विनष्ट करना चाहा, तत्काल वह उड़कर दूर चली गयी। इसके अनन्तर कुछ क्षण रूककर अपने इष्ट देवता को स्मरण कर एवं ताम्बूल आदि ग्रहण कर ज्यों ही चलती है उसी समय तथा कथित वह शुक बोल पड़ा कि आपका कार्य सिद्ध हो, कहाँ जा रही है? इत्यादि वाक्य से पूछा। शुक वचन को शकुन मानकर मुस्कराते हुए उसने कहा कि, किसी परपुरूष के पास जा रही हूँ। इस बात को सुनकर शुक उसके कार्य का अनुमोदन करते हुए कहता है कि—‘तुम परपुरूष के संगति के आनन्द का अनुभव करो यह तो ठीक है किन्तु यह कार्य अत्यन्त दुष्कर है, निन्दित है एवं कुल स्त्रियों के लिए बाधित है।’ प्रतिकूल एवं सङ्कट का अवसर पड़ने पर उससे बचने के लिए तुम्हारे पास बुद्धि होनी चाहिए। तभी जाओ क्योंकि-विपत्ति पड़ जाने पर दुष्ट लोग केवल तमाशा ही देखते हैं और अपमानित करते हैं। क्योकि एक मास तक भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लड़के के केश पकड़कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाशा ही देखती रह गयी।² यह सुनकर अपनी व्यभिचारिणी सखियों के साथ उस


1 ए०बी० कीथ–अनुवादित मङ्गलदेवशास्त्री, पृष्ठ–361
2 कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिकपुत्रकचग्रहे।।

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प्रभावती ने शुक का बहुत समादर किया और घबराकर उपर्युक्त आख्यान सुनने के लिए प्रार्थना किया।

इसके अनन्तर वह शुक निरन्तर मनोरञ्जक कहानी सुनाता है और बीच-बीच मे वैसी-वैसी विपत्ति आने पर कैसा आचरण करना चाहिए इस प्रकार का प्रश्न करता है और समाधान में 70 कहानियाँ सुनाते हुए उसके शील की रक्षा करता है और कुछ ही दिनों में उसका पति परदेश से मदन विनोद आ जाता है और दोनों (पति-पत्नी) सुखपूर्वक अपने जीवन का समय व्यतीत करते हैं।

शुकसप्तप्ति की यह आधारभूत कथा अन्य 70 कथाओ को जन्म देती है। जो प्रभावती के चरित्र की रक्षा करने में पर्याप्त सक्षम है।

(3) शुकसप्तति की कथाओं का परिचय :

कथा- 1
"देशशर्मा की कथा"

शुकसप्तति की प्रथम कथा मदनविनोद को सद्ज्ञान देने हेतु शुक द्वारा कही गयी है-

पञ्चपुर नगर मे सत्यशर्मा नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी धर्मशीला और पुत्र देवशर्मा के साथ रहता था। उस (पुत्र) ने विद्याध्ययन के बाद पिता से छिपाकर अन्य देश में गङ्गा के तट पर तप किया।

एक दिन वह तपस्वी गङ्गा के तट पर जप कर रहा था कि उसी समय एक उड़ती बगुली ने उसके शरीर पर मलत्याग कर दिया। क्रोध से रक्तनेत्र उस तपस्वी ने ज्यों ही ऊपर देखा त्यों ही अपनी क्रोधाग्नि से भस्म हुई बगुली को भूमि पर गिरी देखकर (बगुली को भस्म कर) वह नारायण नामक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने गया। उसकी पत्नी अपने पति के सेवा में लगी थी उसके (स्त्री) विलम्ब करने से वह क्रुद्ध


शुकसप्ततिः श्लोक सं० 8 पृ० सं० १

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हुआ। उस स्त्री ने (ऐसा देखकर) निरीह पक्षी के हत्यारे उस तपस्वी को फटकारा और कहा- 'तेरे क्रोध ने उस बगुली को जला दिया, पर मेरा वह कुछ नहीं कर सकता है।'

उस स्त्री से गुप्त पातक जान लिये जाने के कारण वह डर गया और विस्मित हुआ। (गुप्त पातक जाने लेने का रहस्य पूछने पर) उस स्त्री ने उसे धर्मव्याध नामक मांसविक्रेता के पास वाराणसी नगरी में भेजा। वहाँ पहुँचने पर धर्मव्याध ने शुभागमन के विषय में पूछकर अपने घर ले जाकर, अपने माता-पिता को भक्ति के साथ भोजन देकर, तत्पश्चात् उसे भोजन दिया। उसके बाद उसने व्याध से ज्ञान का कारण पूछा- 'वह सती कैसे ज्ञानवती है और तुम कैसे ज्ञानवान हुये?' उस धर्मव्याधस ने कहा-

जो उत्तम, मध्यम, अधम सभी प्रकार के विकारों से अनासक्त रह, अपने कुलक्रममागत धर्म का पालन भलीभाँति करता है, जो सदा माता-पिता की सेवा करता है वह साधारण मनुष्य भी सच्चा गृहस्थ है, वही मुनि, साधु, योगी, और धार्मिक है।¹

मैं और वह सती इस प्रकार से ज्ञानी हुये है। तुम अपने माता-पिता का परित्याग कर घूम रहे हो, मुझे तुम ऐसे व्यक्तियों से सम्भाषण नहीं करना चाहिए किन्तु अतिथि समझकर मैने तुमसे बात की।

इस प्रकार कहने पर उस ब्राह्मण ने धर्मव्याध से अपने कर्तव्य तथा गुरूजन महिमा के सम्बन्ध में पूछा। उसने कहा-

जो अपने पूज्य जन की पूजा नहीं करते, जो अपने मान्यजन का सम्मान नहीं करते वे संसार में निन्दित होते हुए जीते हैं और मरने के बाद स्वर्ग नहीं जाते हैं।²


1 निजान्वयप्रणीत यः सभ्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तममाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।।
स गृही स मुनिः साधुः स च योगी स धार्मिकः
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।।
— शुकसप्ततिः, श्लोक सं०, 3, 4,, पेज सं० 5

2 न पूजयन्ति ये पूज्यान्मान्यान्न मानयन्ति ये।
जीवन्ति निन्द्यमानास्ते मृताः स्वर्गं न यान्ति च।।
— शुकसप्ततिः श्लोक स० 5, पेज पृष्ठ 6

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इस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया और माता-पिता की सेवा कर ससार में कीर्तिमान हुआ और मृत्यूपश्चात भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।¹

इसलिए "तुम अपने कुल क्रमागत वणिग्धर्म का स्मरण करो तदनुसार कर्म करो और माता-पिता के प्रति विनयशील बनो।"²

इस प्रकार उपदिष्ट हुआ वह मदनविनोद माता-पिता को नमस्कार कर उनकी आज्ञा लेकर, पत्नी से पूछकर एवं विदा होकर नौका द्वारा विदेश चला गया।

तत्पश्चात् व्यभिचार मार्ग पर जाने के लिए उद्यत प्रभावती से शुक कहता है—तुम कुमार्ग पर मत जाओ अन्यथा पराभव का पात्र होगी। क्योंकि—

विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता) जैसे भास भर की भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लडके के केश पकड़ कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाश ही देखती रही।

तब उस प्रभावती ने शुक का समादर करते हुए घबडा कर "यह आख्यान कैसे है"—पूछा। तो शुक ने कहा—

चन्द्रावती पुरी में भीम नामक राजा था। उस पुरी में मोहन नामक सेठ का सुधन नामक पुत्र था। वह उस नगर के निवासी हरिदत्त की पत्नी लक्ष्मी के साथ रति-क्रीडा करना चाहता था किन्तु लक्ष्मी सहमत नहीं थी। तब उस सुधन ने मास भर की भूखी पूर्णा नाम की स्त्री के पास जाकर उसे खूब धन देकर, जब हरिदत्त नगर से बाहर गया तब दूती बनाकर भेजा। उसने भी प्रिय बचनों से लक्ष्मी को प्रसन्न


1 व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मनः।
अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्त्तिभाजनम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक स० 6, पेज पृष्ठ 6,
2 तस्माद्वणिग्धर्मं स्वकुलोद्भवं स्मर पित्रोश्च विनयपरो भव।
शुकसप्ततिः पृष्ठ सं० 8,

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कर लिया। उसने (लक्ष्मी) कहा 'जो तुम कहो वह करूँ। पूर्णा ने कहा- जिससे कहूँ उस पुरुष के साथ रमण करो।'

इसके बाद लक्ष्मी को तैयार कर आनन्दप्रद सुरत के लिए सायंकाल के समय अपने घर ले गयी। किन्तु वह सुन्दर सुधन नामक वणिक् पुत्र किसी काम में फँस जाने के कारण निर्दिष्ट समय पर नहीं आ सका। तब कामातुरा लक्ष्मी ने कहा-'किसी भी पुरुष को ले आओ।'

तब मूढ़ पूर्णा इती उसके पति को ही ले आयी अपने पति के आने पर उसका बचाव कैसे हो? यह तुम या तुम्हारी सखियाँ बतायें।

उन सबने कहा- 'हम नहीं जानती हैं। तुम्हीं कहो।'

शुक ने कहा- 'अपना पति ही आ रहा है'- यह जानकर उसने उसके केश पकड़कर कहा- हे शठ! सर्वदा तू मेरे सामने कहा करता है कि तुम्हारे अतिरिक्त मेरी और कोई दूसरी प्रिया नहीं है। आज मैंने तेरी परीक्षा कर ली और जान गयी।' इस प्रकार उसने कोप किया।

वह हरिदत्त उसको बड़ी कठिनाई से अत्यन्त कोमल वचनों द्वारा सान्तवना देकर अपने घर ले आया।

इस प्रकार व्यभिचारिणी सखियों समेत मदन विनोद की पत्नी प्रभावती भय एवं विस्मय उत्पन्न करने वाली शुक द्वारा कथित कथा सुनकर रात में सो गयी और परपुरुष के पास नहीं गयी।

कथा- 2

"यशोदेवी की कथा"

दूसरे दिन व्यभिचार करने के लिए उद्धत प्रभावती को शुक रोकता हुआ उसे दूसरी कहानी सुनाता है-

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नन्दन नामक नगर में नन्दन नाम का एक राजा था। उसके पुत्र का नाम राजशेखर और पुत्रवधू का नाम शशिप्रभा था। उसको वीर नामक धनसेन का पुत्र देखकर कामवासना से युक्त कावमज्वर से पीड़ित हो गया। भोजन आदि नहीं करता था। अपनी माता यशोदेवी से पूछे जाने पर उसने गद्गद् वाणी से कारण बताया। उस राजकन्या का मिलना कठिन है। वह कैसे जिये' यह प्रश्न है। प्रभावती ने कहा- 'तुम्हीं बताओ'। शुक ने कहा- प्रभावती। यदि आज तुम परपुरूष के पास न जाओ तो बताऊँ। प्रभावती ने कहा ठीक है कहो।

तब शुक ने कहा- उस यशोदेवी ने एक कुतिया को भोजन खिला-पिला कर हिला-मिला लिया और आभूषण पहिनकर अपने साथ उसे लेकर शशिप्रभा के पास जाकर उससे एकान्त मे गद्गद् स्वर में कहा- मैं, तुम और यह, तीनों पूर्वजन्म में बहिन थीं। मैंने निःशङ्क और तूने सशङ्क, परपुरूष की संभोगेच्छा को पूरा किया। इसने नहीं किया। इसी कारण से इसे पातिव्रत रूप सदाचार के प्रभाव से केवल पूर्वजन्म की ही स्मृति है, भोग नहीं, और इस जन्म में कुतिया हुई। परपुरूष के सम्भोगविषयक विघ्न के कारण मुझे पूर्वजन्म का स्मरण भी नहीं है और मुझे निर्विघ्न भोग के कारण निर्विघ्न जन्म का स्मरण है। इसलिए इस कुतिया और तुझको देखकर अनुकम्पा-वश तुझसे यही कहने आई हूँ। अतः तुम्हें याचको को काङ्क्षित वस्तु देनी ही चाहिये।¹ क्योकि कहा गया है-

भिक्षुक घर-घर भीख नहीं माँग रहे हैं, अपितु मानो यह कह रहे हैं कि याचकों को सदा दान दिया करो, अन्यथा दान न देने वाले को ऐसा ही फल मिलेगा जैसे हमें मिल रहा है- हमारी ही तरह वह भी घर-घर भीख माँगता फिरेगा।²


1 'अतस्त्वयार्थिना काङ्क्षितं दातव्यमेव।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ सं० 16
2 कथयन्ति न याचन्ते भिक्षाहारा गृहे गृहे।
अर्थिभ्यो दीयतां नित्यमदातुः फलमीदृशम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 17, पृष्ठ सं० 16

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तब शशिप्रभा ने उसके गले से लिपट कर रोकर कहा- 'कल्याणि! मुझे भी पर पुरूष से मिलाओ।'

तब यशोदेवी ने उसे सान्त्वना देकर पति की जानकारी में उसे अपने घर ले जाकर अपने पुत्र से मिलाया पति ने भी उसे सखी समझकर जाने से नहीं रोका।

हे कामिनि! यशोदेवी ने इस प्रकार राजशेखर और उसकी पत्नी को धोखा देकर अपनी महती बुद्धि से अपना कार्य पूरा कर लिया। अतैव यदि तुम्हारे पास ऐसी बुद्धि हो तो परपुरूष के पास जाओ अन्यथा नहीं।

कथा-3

"राजा सुदर्शन की कथा";

विशाला नगरी में सुदर्शन नाम का राजा था। वहीं पर विमल नाम का एक बनिया था उसकी दो पत्नियों को सुन्दर रूप सम्पन्न देखकर कुटिल नामक धूर्त ने उन्हें प्राप्त करने के लिए अम्बिका देवी की आराधना कर विमल का रूप माँगा। उसका आकार प्रकार पाकर 'विमल' के बाहर जाने पर उसके घर जाकर वह धूर्त अपना आधिपत्य जमा लिया। उसने पुरस्कार रूप में धन प्रदान कर समस्त भृत्य वर्ग को अपने अधीन कर लिया। वह विमल की दोनों पत्नियों को अत्यन्त सम्मान दान आदि से संतुष्ट कर उनका सम्भोग करता रहा।

कुछ समय पश्चात् वास्तविक विमल भी द्वार पर आया तो कुटिल की आज्ञा से द्वारपाल ने उसे भीतर प्रविष्ट होने से रोक दिया, तब वह जोर से चिल्लाने लगा कि 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया।' इस प्रकार चिल्लाते हुए उसे देखकर कौतुक वश उसके कुल गोत्र वालों एवं बनियों का समुदाय एकत्र हो, नगरपालों एवं मुख्यमन्त्री के सामने चिल्लाने लगा- राजन्! 'महान धूर्त ने हमें धोखा दिया'।

तब राजा ने उस धूर्त को देखने के लिए अपने आदमी भेजे, उस धूर्त ने उन्हें भी धन देकर अपने अनुकूल कर लिया। धन प्राप्त कर राजा के आदमी कहने लगे, स्वामी! विमल तो घर में है, यह द्वार पर स्थित व्यक्ति ही महान धूर्त है।

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तब राजा को उपाय सूझा। उसने विमल की दोनों पत्नियों को पृथक-पृथक कर पूछा। तुम दोनों को विवाह के समय पति ने कौन आभूषण और धन दिया था। विवाह के पश्चात् क्या बातचीत हुई थी? प्रथम सहवास के समय पति के साथ तुम्हारी क्या बातचीत हुई थी? तुम दोनो की माता-पिता कौन है? क्या कुल और जाति है? इस प्रकार पूछने पर दोनों ने जो पाया था, जो-जो बातें हुई थी, जिस प्रकार प्रथम सहवास के समय शयन किया था सबकुछ बता दिया। इसके बाद राजा ने वही बाते परस्पर विवाद करते उन दोनों पुरुषों से पूछा तो रूक्मणी एवं सुन्दरी नाम्नी दोनों भार्याओ का संवाद जो कहता है वही सच है। दूसरा धूर्त है, राजा ने उसे निकाल दिया। सच्चा विमल पत्नी समेत राजा से सत्कृत हुआ और अपने घर गया। यह कथा सुनकर प्रभावती सो गयी।

कथा-4

"विषकन्या-विवाह की कथा"

सोमप्रभ नामक ब्राह्मणों की एक बस्ती थी, वहाँ सोमशर्मा नामक एक विद्वान, धार्मिक ब्राह्मण था। उसकी पुत्री विषकन्या अत्यन्त रूपवती थी, किन्तु भय के कारण उससे कोई विवाह नहीं करता था। तब सोमशर्मा वर की तलाश में पृथ्वी पर घूमते हुए जनस्थान नामक ब्राह्मणों की बस्ती में पहुँचा। वहाँ गोविन्द नामक मूर्ख एवं निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसे उसने कन्या दे दी। उसने रोकते हुए सुहृज्जनों की भी अवज्ञाकर रूपलावण्यवती मोहिनी विषकन्या से विवाह कर लिया। वह काम-कला प्रवीण थी एवं गोविन्द मूर्ख एवं अल्पवयस्क था। तब वह अपने रूप लावण्य एवं यौवन पर शोक करने लगी। कहा गया है कि-कामकलानिपुण पत्नी का मूर्ख पति, प्रौढ़ स्त्री का मूर्ख नायक, दानशील गुणीजन का अल्पधन- ये तीनों दुःखदायी होते हैं।$^1$


1 अविदग्धः पतिः स्त्रीणां, प्रौढाना नायकोऽगुणी
गुणिनां त्यागिना स्तोको विभवश्चेति दुःखकृत्
शुक्सप्ततिः श्लोक सं० 23, पृष्ठ सं०- 24

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