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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३६१


ज्योतिष्टोमादिश्रुतिबोधितानुष्ठानात् फलसिद्धिः स्वाप्नश्रुतिबोधिता- नुष्ठानप्रयुक्तफलसंवादतुल्या । ज्योतिष्टोमादिश्रुतीनां च सत्त्वशुद्धिद्वारा ब्रह्मणि तात्पर्यान्नाऽप्रामाण्यमित्यादिदृष्टिसृष्टिव्युत्पादनप्रक्रियाप्रपञ्चस्त्वाकर- ग्रन्थेषु द्रष्टव्यः । अयमेको दृष्टिसमसमया विश्वसृष्टिरिति दृष्टिसृष्टिवादः ।

दृष्टिरेव हि विश्वस्य सृष्टिरित्यपरा विधा ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुरित्येतत्स्मृतियायिनः ॥४५॥

स्मृत्यनुसारी कुछ लोग दृष्टि ही संसारसृष्टि है, ऐसा दृष्टिसृष्टिका अन्य प्रकार है और यह संसार ज्ञानस्वरूप है, ऐसा कहते हैं ॥४५॥


श्रुतियोंका स्वार्थमें तात्पर्य मानकर ही वियत्पाद और प्राणपादमें विरोधका समाधान किया गया है, क्योंकि सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियोंका तात्पर्य वस्तुतः ब्रह्मात्मैक्यमें ही होनेसे सृष्टिके प्रतिपादनमें उनका अभिप्राय है ही नहीं ) ।

'ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः' ( स्वर्गको † चाहनेवाला ज्योतिष्टोम याग करे ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित अनुष्ठानसे स्वर्गरूप फलकी सिद्धि वैसी ही है, जैसी कि स्वप्नावस्थामें उक्त श्रुतिकी कल्पना करके उससे ज्योतिष्टोम आदिका परिज्ञान प्राप्त कर उसके अनुष्ठानसे फलकी प्राप्ति हो अर्थात् जैसे पुरुष स्वप्नकालमें परिकल्पित श्रुतियोंसे स्वर्ग आदिके साधनविशेषोंको जानकर उनके अनुष्ठानसे मिथ्या ही फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी उन श्रुतियोंसे साधनविशेषोंकी अवगति द्वारा उनका अनुष्ठान करके मिथ्या स्वर्गादि फल प्राप्त करता है, यह भाव है । और अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा ज्योतिष्टोमादि यागकी प्रतिपादक श्रुतियाँ‡ ब्रह्मका ही परिज्ञान कराती हैं, अतः वे निष्प्रमाण नहीं हैं, इत्यादि दृष्टिसृष्टिवादका विवेचन-प्रकार आकर ग्रन्थोंमें देखना चाहिए । एक यह—दृष्टि समकालीन ही संसारकी उत्पत्ति है, इस प्रकारका—दृष्टिसृष्टिवाद है ।


† 'यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतञ्च तत्सुखं स्वःपदास्पदम्' अर्थात् जिस सुखमें दुःखकी मात्रा न हो, जिसका नाश न हो—जो चिरस्थायी हो और जो इच्छानुसार प्राप्त होता हो, वह सुख स्वर्गशब्दसे कहा जाता है ।

‡ कर्मप्रतिपादक वाक्योंसे और उपासनाप्रतिपादक वाक्योंसे विहित कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका ही चित्त शुद्ध होता है, शुद्धचित्त अधिकारी पुरुषको वेदान्त-शास्त्र ब्रह्मज्ञान कराता है, अतः कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड अधिकारित्वकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मज्ञानके ही अङ्ग हैं, इसलिए उन दोनों काण्डोंका भी ब्रह्ममें ही तात्पर्य है, स्वर्गसाधनत्वरूप स्वार्थमें नहीं है, अतः उनमें अप्रामाण्य शङ्का नहीं है, यह भाव है ।

४६

३६२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्यस्तु दृष्टिरैव विश्वसृष्टिः । दृश्यस्य दृष्टिभेदे प्रमाणाभावात् ।
‘ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुर्जगदेतद्विचक्षणाः ।
अर्थस्वरूपं भ्राम्यन्तः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः ॥’
इति स्मृतेश्चेति सिद्धान्तमुक्तावल्यादिदर्शितो दृष्टिसृष्टिवादः।

सृष्टिदृष्टिं परे प्राहुः संस्काराद्यनपेक्षणात् ॥
तथाऽपि विश्वं मिथ्यैव बाध्यत्वाच्छ्रुतिमानतः ॥४६॥

यद्यपि संस्कार आदिकी अपेक्षा न होनेके कारण कुछ लोग सृष्टिदृष्टिवादका ही आश्रयण करते हैं, तथापि श्रुति बाधित होनेसे संसार मिथ्या है ॥४६॥

द्विविधेऽपि दृष्टिसृष्टिवादे मनःप्रत्ययमलभमानाः केचिदाचार्याः सृष्टिदृष्टिवादं रोचयन्ते । श्रुतिदर्शितेन क्रमेण परमेश्वरसृष्टमज्ञातसत्तायुक्तमेव विश्वं तत्तद्विषयप्रमाणावतरणे तस्य तस्य दृष्टिसिद्धिरिति ।


* सिद्धान्तमुक्तावली आदिमें दूसरे ही दृष्टिसृष्टिवादका निरूपण किया गया है—दृष्टि ही विश्वसृष्टि है, [अर्थात् स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपा दृष्टि ही प्रपञ्चकी सृष्टि है, दृष्टिसमकालीन अन्य प्रपञ्चकी सृष्टि नहीं है, क्योंकि] दृश्य पदार्थको स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपसे पृथक् माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, और इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृति भी है कि विवेकी पुरुष इस प्रत्यक्षसिद्ध जगत्‌को ज्ञानात्मक ही कहते हैं, परन्तु कुछ कुदृष्टि-भ्रान्त पुरुष—इसी ज्ञानरूप जगत्‌को ज्ञानसत्तासे भिन्न देखते हैं ।

उक्त दो प्रकारके दृष्टिसृष्टिवादमें विश्वास न रखते हुए† कुछ आचार्य सृष्टिदृष्टिवादमें अपनी अभिरुचि रखते हैं । श्रुतिमें बतलाये गये क्रमके अनुसार परमेश्वरसे बना हुआ जगत् अज्ञात सत्तासे ही युक्त है, और उन-उन विषयोंमें प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेपर उन-उन विषयोंका ज्ञान सिद्ध होता है ।


* द्रष्टव्य—जीवानन्द विद्यासागर द्वारा कलकत्तामें मुद्रित सिद्धान्तमुक्तावलीके ३१५ वें पेजमें इस दृष्टिसृष्टिवादका विस्तारसे वर्णन किया गया है—कोऽयं विकारः द्वैतं तद्‌दृष्टिर्वा? इत्यादिसे ।

मनःप्रत्ययशब्दका अर्थ है—विश्वास अर्थात् दृष्टिसृष्टिवादमें प्रामाणिकत्वका निश्चय नहीं है, इसमें हेतु यह है कि जाग्रत्प्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका अङ्गीकार, आकाश आदि सृष्टिका अपलाप, कर्मोपासनाकाण्डमें वर्णित अर्थोंके अनुष्ठानसे होनेवाले स्वर्ग आदिका अपलाप आदि। अतः सृष्टिदृष्टिवाद ही युक्त है अर्थात् श्रुतिमें जिस आकाशादिक्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है, उसी

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सृष्टिके कल्पकका विचार] भाषानुवादसहित ३६३

न चैवं प्रपञ्चस्य कल्पितत्वाभावे श्रुत्यादिप्रतिपन्नस्य सृष्टिप्रलयादिमतः प्रत्यक्षादिप्रतिपन्नार्थक्रियाकारिणश्च तस्य सत्यत्वमेवाऽभ्युपगतं स्यादिति वाच्यम्, शुक्तिरजतादिवत् सम्प्रयोगसंस्कारदोषरूपेण, अधिष्ठानज्ञानसंस्कारदोषरूपेण वा कारणत्रयेणाऽजन्यतया कल्पनासमसमयत्वाभावेऽपि ज्ञानैकनिव-


यदि शङ्का हो कि * उक्त रीतिसे प्रपञ्चको यदि कल्पित न माना जाय, तो श्रुति, स्मृति आदिसे ज्ञात सृष्टि, प्रलय आदिसे युक्त तथा प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात अर्थक्रियाकारित्वसे युक्त संसारमें सत्यता ही स्वीकृत होगी ? तो यह शङ्का † युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि शुक्ति-रजत आदिके समान सम्प्रयोग, संस्कार और दोषरूप अथवा अधिष्ठानज्ञान, संस्कार और दोषरूप तीन कारणोंसे जन्य न होनेके कारण वियदादि प्रपञ्च कल्पनासमानकालीन नहीं है, तथापि ‡


क्रमसे परमेश्वरसे सृष्टि उत्पन्न होती है, और वह अज्ञात सत्तावाली है, तत्-तत् विषयोंमें तत्-तत् प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेके अनन्तर आवरणभङ्ग द्वारा तत्-तत् विषयोंका अपरोक्षावभास (दृष्टि) होता है, अतः दृष्टि ही सृष्टि नहीं है, यह सृष्टिदृष्टिवादियोंका भाव है।

* शङ्काका तात्पर्य यह है कि सृष्टिदृष्टिवादके अनुसार प्रपञ्च कल्पित न माना जाय, तो प्रपञ्च सत्य ही सिद्ध होगा, क्योंकि प्रपञ्च सत्य है, श्रुतिसिद्ध होनेसे, ब्रह्मके समान, यह अनुमान प्रमाण है। यद्यपि प्रपञ्च स्वरूपतः प्रत्यक्षसे सिद्ध है, तथापि सृष्टि, प्रलय आदियुक्तत्वरूपसे श्रुति, स्मृति आदिसे ही सिद्ध है, इसी प्रकार प्रपञ्च सत्य है, अर्थक्रियाकारी होनेसे, सृष्टि आदि अर्थक्रिया-कारी ब्रह्मके समान, यह हेतु स्वरूपासिद्ध भी नहीं है, क्योंकि पृथ्वी, जल आदिमें उक्त हेतु प्रत्यक्षसे सिद्ध ही है।

† समाधानका तात्पर्य यह है—यद्यपि आकाशा आदि प्रपञ्चमें कल्पना-समान-कालिकत्व नहीं है, जिसे कि दृष्टिदृष्टिवादियोंने माना है, क्योंकि वहींपर कल्पनासमानकालिकत्व होता है, जहाँपर सम्प्रयोग आदि कारणत्रयजन्यत्व रहता है, तथापि पारमार्थिक सत्यत्वसे विरुद्ध मिथ्यात्व, जिसका (तीन प्रकारोंसे मूलमें निर्वचन किया है) वियदादि प्रपञ्चमें वर्तमान है, अतः इस वादमें भी प्रपञ्च पारमार्थिक सत्य नहीं हो सकता है।

‡ केवल ज्ञाननिवर्त्यत्व—जिसका बाध केवल अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कार हीसे हो, वह मिथ्यात्व है। जैसे शुक्तिमें उत्पन्न रजतकी निवृत्ति शुक्तिरूप अधिष्ठानके तत्त्वसाक्षात्कारसे होती है, अतः वह मिथ्या है।

सदसद्विलक्षणत्व—जो सत् (त्रिकालावाधित) से और असत् (किसी समयमें भी प्रतीत न होनेवाले) से विलक्षण हो, वह मिथ्या है, जैसे शुक्तिरजत न सत् है और न शशशृङ्गके समान असत् है, अतः शुक्तिरजत मिथ्या है। केवल सद्विलक्षणको मिथ्या कहनेसे असत् शशशृङ्गमें दोष होगा और असद्विलक्षणमात्र कहनेसे ब्रह्ममें अतिव्याप्ति होगी, इसलिए सदस-द्विलक्षण मिथ्याका लक्षण कहा गया है।

३६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद


र्त्यत्वरूपस्य, सदसद्विलक्षणत्वरूपस्य, प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वरूपस्य वा मिथ्यात्वस्याऽभ्युपगमात् । सत्यत्वपक्षे प्रपञ्चे उक्त-रूपमिथ्यात्वाभावेन ततो भेदात् ।

अहङ्कारादिमिथ्यात्वं नन्वेवं सम्प्रसिध्यति । तदध्यासाय टीकादौ व्यर्था कारणकल्पना ॥४७॥

**शङ्का—**जब आकाश आदिके समान अहङ्कार और उसके धर्म मिथ्या सिद्ध होते हैं, तब उसके मिथ्यात्वके लिए भाष्य, टीका और विवरणमें कारणत्रयकी की गई कल्पना व्यर्थ ही है ॥४७॥

नन्वेवमहङ्कारतद्धर्माणामपि उक्त रूपमिथ्यात्वं वियदादिवत् कल्पितत्वा-


केवल ज्ञानसे निवर्त्यत्वरूप, सदसद्विलक्षणत्वरूप अथवा प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिक निषेधप्रतियोगित्वरूप मिथ्यात्व आकाश आदि प्रपञ्चमें सिद्ध ही है। [ अतः सत्यत्वविरोधी उक्त त्रिविध लक्षणोंसे लक्षित मिथ्यात्वके विद्यमान होनेसे उनमें सत्यत्वकी प्रसक्ति नहीं है, यह भाव है ] । घटादिके सत्यत्वपक्षमें प्रपञ्चमें उक्त मिथ्यात्वके न होनेसे सत्यत्वपक्षसे दृष्टिसृष्टिपक्षमें भेद है ही ।

यदि शङ्का हो कि * ज्ञाननिवर्त्यत्व आदि यदि मिथ्यात्वके स्वरूप माने जांय, तो आकाशादि प्रपञ्चके समान अहङ्कार और उसके धर्मोंमें कथित मिथ्यात्व


तृतीय प्रतिपन्नोपाधिगतत्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्व मिथ्यात्वका लक्षण है—अर्थात् अधिष्ठानमें ज्ञात जो अत्यन्ताभाव उसका जो प्रतियोगी हो, वह मिथ्या है, जैसे शुक्तिरजतका अधिष्ठान है शुक्ति, उसमें रहनेवाला त्रैकालिक निषेध अत्यन्ताभाव है—शुक्तिमें रजत नहीं है, नहीं था और होगा भी नहीं, इसका प्रतियोगी हुआ रजत, इसलिए रजत मिथ्या है ।

ये मिथ्याके तीनों लक्षण प्रपञ्चमें घटते हैं, क्योंकि आकाश आदि प्रपञ्चका ब्रह्मरूप अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कारसे बाध होता है, प्रपञ्च सत् एवं असत्‌से विलक्षण है और ब्रह्मरूप जो उपाधि—अधिष्ठान है, उसमें प्रपञ्चका जो त्रैकालिक निषेध है यह उसका प्रतियोगी भी प्रपञ्च है ।

* 'तथान्तःकरणधर्मान्—कामसङ्कल्पविचिकित्सा······एवमहं प्रत्ययिनम्०' इत्यादि भाष्य, युष्मदर्थलक्षणापन्नोऽहङ्कारोऽध्यस्त इति······'ननु बहिरर्थकरणदोषोर्थगतः······न त्विह कारणान्तरायत्ता इत्यादि टीका ( पृ० २५६ भामत्यादि टीकानवकोपेत भाष्य कलकत्ता मुद्रित ) और इसी पत्रस्थ अद्वितीयचैतन्यात्मनि······इत्यादि विवरण, जिनसे अहङ्कारादि अध्यास सिद्ध किया गया है, इस प्रकृत शङ्काके बीज हैं, यह भाव है ।

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सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३६५


भावेऽपि सिध्यतीति भाष्यटीकाविवरणेषु तदध्यासे कारणत्रितयसम्पादनादियत्नो व्यर्थ इति चेद्,

अत्राहुः साक्षिवेद्यत्वादहङ्कारस्पृहादिकम् ।
प्रातिभासिकमेवेति चित्सुखाचार्ययोगिनः ॥४८॥

उक्त शङ्काके समाधानमें योगी चित्सुखाचार्य कहते हैं कि अहङ्कार और उसके धर्म साक्षिवेद्य होनेसे [ शुक्तिरजतके समान ] प्रातिभासिक ही हैं ॥४८॥

अहङ्कारादीनामपि केवलसाक्षिवेद्यतया शुक्तिरजतवत् प्रातिभासिकत्वमभिमतमिति चित्सुखाचार्याः ॥

चैतन्यस्याऽप्रमाणस्य प्रमाणत्वेन कीर्तनात् ।
तं तु रामाद्वयाचार्याः प्रौढिवादं प्रचक्षते ॥४९॥

अप्रमाणभूत चैतन्यमें प्रमाणत्वके कथनसे उस कारणत्रितय प्रतिपादक भाष्यटीकादि ग्रन्थको रामाद्वयाचार्य प्रौढिवादमात्र मानते हैं ॥४९॥

अभ्युपेत्यवादमात्रं तत्, 'अद्वितीयाधिष्ठानब्रह्मात्मप्रमाणस्य चैतन्यस्य' इत्यादितत्तत्यकारणत्रितयसम्पादनग्रन्थस्य चैतन्यस्य प्रमाकरणत्वे वेदान्त-

उन अहङ्कारादिके प्रातिभासिक न माननेपर भी हो सकता है, फिर भाष्य, टीका और विवरणमें अहङ्कार आदिके अध्यासमें कारणत्रयके सम्पादन आदिमें जो प्रयत्न किया गया है, वह व्यर्थ ही है ?

नहीं, व्यर्थ नहीं है, क्योंकि केवल साक्षीसे वेद्य होनेके कारण शुक्ति-रजतके समान अहङ्कार आदि प्रातिभासिक ही हैं, ऐसा चित्सुखाचार्य मानते हैं ।

† उक्त विषयमें रामाद्वयाचार्यका कहना है कि भाष्य; टीका आदि सब ग्रन्थ केवल अभ्युपेत्यवाद ही हैं अर्थात् अहङ्कार आदिमें प्रातिभासिकत्वका केवल आपाततः स्वीकार करके भाष्य, टीकादिमें कारणत्रयका सम्पादन किया गया है, वस्तुस्थितिका अङ्गीकार करके नहीं किया गया है, क्योंकि वहाँके 'अद्वितीया०' ( अद्वितीय अधिष्ठानरूप ब्रह्मात्मामें चैतन्य ही प्रमाण है ) इत्यादि


† इनका तात्पर्य यह है कि अहङ्कार आदि भले ही केवल साक्षीसे वेद्य हों, परन्तु उन्हें शुक्तिरजतादिके समान प्रातिभासिक मानना अयुक्त है, क्योंकि अहङ्कार आदिका व्यवहारकालमें बाध नहीं देखा जाता है, इसलिए ये वस्तुतः प्रातिभासिक नहीं हैं, परन्तु उनके प्रातिभासिकत्व-का आपाततः अङ्गीकार करके कारणत्रयजन्यत्वका समर्थन भाष्य आदिमें किया गया है ।

३६६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

करणत्वादिकल्पनाभङ्गप्रसङ्गेन प्रौढिवादत्वस्य स्फुटत्वादिति रामाद्व- याचार्याः ॥ ७ ॥

ननु प्रपञ्चो मिथ्यात्वात् कथमर्थक्रियाक्षमः । यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च मिथ्या होनेसे अर्थक्रियामें समर्थ कैसे होगा ?

(८) ननु दृष्टिसृष्टिवादे, सृष्टिदृष्टिवादे च मिथ्यात्वसम्प्रतिपत्तेः कथं मिथ्याभूतस्याऽर्थक्रियाकारित्वम् ?

केचित् स्वप्नवदत्राऽऽहुः समसत्ताकतत्क्रियाम् ॥ ५० ॥

उक्त शङ्काके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नके समान जागरणमें भी समानसत्ताक अर्थक्रिया होगी ॥५०॥

स्वप्नवदिति ब्रूमः । ननु स्वाप्नजलादिसाध्यावगाहनादिरूपाऽर्थक्रिया


कारणत्रयसम्पादक ग्रन्थकी प्रौढिवादिता स्पष्ट है, [ यदि उसे प्रौढिवाद न माना जाय, तो चैतन्यके प्रमाकरण होनेसे वेदान्त ही ब्रह्मप्रमाके करण हैं, इत्यादि कल्पनाका भङ्ग होगा ] ॥७॥

अब * शङ्का होती है कि दृष्टि-सृष्टिवादमें और सृष्टि-दृष्टिवादमें प्रपञ्चके मिथ्यात्वका अङ्गीकार होनेसे मिथ्याभूत प्रपञ्च अर्थक्रियाकारी कैसे होगा ?

इस † आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नके समान जाग्रत्में अर्थक्रियाकारित्व हो सकता है, अर्थात् जैसे मिथ्याभूत स्वाप्न जलमें स्नान आदि अर्थक्रिया देखी जाती है, परन्तु उन पदार्थोंमें सत्यत्व नहीं है, वैसे ही उक्त दो वादोंमें प्रपञ्चके सत्य न होनेपर भी अर्थक्रिया हो सकती है, यह भाव है । यदि शङ्का हो कि स्वप्नके जल आदिसे होनेवाली अवगाहन आदि अर्थक्रिया असत्य ही है, सत्य नहीं है, जाग्रत्में अवगाहनादि अर्थ सत्य


* अर्थक्रियाकारित्व प्रपञ्चके पारमार्थिकत्वमें प्रयोजक नहीं है, ऐसा पूर्वमें कहा जा चुका है, परन्तु शङ्का करनेवाला कहता है—वह अयुक्त है, क्योंकि जो मिथ्याभूत पदार्थ है, उसमें अर्थक्रियाकारित्व रह नहीं सकता है, कारण कि मिथ्याभूत शुक्तिरजतसे कटक आदि अर्थ-क्रिया नहीं देखी जाती है, अतः प्रपञ्च मिथ्या नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका अभिप्राय है ।

† अर्थक्रियाकारित्व हेतुसे भी प्रपञ्चमें सत्यत्वका साधन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि स्वाप्न पदार्थोंमें व्यभिचार है, यह इस ग्रन्थसे कहा जाता है ।

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मिथ्या पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिताका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३६७


असत्यैव, किन्तु जाग्रज्जलादिसाध्या सा सत्या ? अविशिष्टमुभयत्रापि स्वसमानसत्कार्थक्रियाकारित्वमिति केचित् ।

स्वप्नोत्थभयकम्पादेर्जागरेऽप्यनुवर्तनात् ।
अद्वैतविद्याचार्याणां समसत्ता न सम्मता ॥ ५१ ॥

स्वप्नसे जागनेवाले मनुष्यके भय, कम्प आदि जागरणमें देखे जाते हैं, अतः अद्वैतविद्याचार्य समसत्ताक अर्थक्रिया नहीं मानते हैं ॥५१॥

अद्वैतविद्याचार्यास्त्वाहुः—स्वाप्नपदार्थानां न केवलं प्रबोधबाध्यार्थक्रियामात्रकारित्वम् । स्वाप्नाङ्गनाभुजङ्गमादीनां तदबाध्यसुखभयादिजन-


है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे प्रश्न करनेवालोंसे यह पूछा जा सकता है कि क्या जाग्रत्कालीन जलादिसे साध्य अवगाहनादि अर्थक्रिया सत्य है ? अर्थात् उसे भी सत्य नहीं मान सकते हैं, इसलिए सत्यार्थक्रियाकारित्वसे भी प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते हैं। स्वसमानसत्ताक ‡ अर्थक्रियाकारित्व तो स्वप्न और जाग्रत् दोनोंमें समान है, [ परन्तु इससे प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है ] ।

* पूर्वोक्त आक्षेपके समाधानमें अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं—स्वप्नकालीन पदार्थोंकी केवल वही अर्थक्रियाकारिता नहीं है, जो कि प्रबोधसे बाधित होती


‡ तात्पर्य यह है कि केवल अर्थक्रियाकारिता सत्यत्वप्रयोजक नहीं है, परन्तु सत्यार्थक्रियाकारिता ही सत्यत्वकी प्रयोजक है। आकाश, घट आदिकी अर्थक्रिया सत्य है, इसलिए वे आकाशादि मिथ्या नहीं हो सकते हैं, स्वाप्न जलादिकी अर्थ क्रिया असत्य है, अतः उनमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः घटादि प्रपञ्च सत्य है, सत्यार्थक्रियाकारी होनेसे इस अनुमानसे प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध हो सकता है, तथापि यह असङ्गत है, क्योंकि जाग्रत्कालीन अर्थोकी अर्थक्रिया भी सत्य—त्रिकालाबाधित—नहीं है, अतः उसे नहीं मान सकते हैं। अर्थक्रियाकारिता, तो दोनोंमें समान है।

* अद्वैतविद्याचार्यके मतमें स्वप्नकालीन पदार्थोंकी भी अर्थक्रिया सत्य मानी गई है, अतः पूर्व मतोंसे इसमें वैलक्षण्य है। तात्पर्य यह है कि प्रबोधसे बाध्य अर्थक्रिया प्रातिभासिक अर्थक्रिया होती है, और जो प्रबोधसे बाधित अर्थक्रिया नहीं होती है, वह भले ही स्वप्नकालीन क्यों न हो परन्तु अप्रातिभासिक—सत्य—ही अर्थक्रिया होती है। इसलिए स्वप्नकालके सभी पदार्थोंमें असत्य अर्थक्रियाकारिता नहीं रहती है, किन्तु व्यावहारिक अर्थक्रियाकारित्व भी रहता ही है। क्योंकि स्वप्नाङ्गना आदिसे ऐसे सुख आदि होते हैं, जिनका जागरणमें बाघ नहीं होता है, इसी प्रकार व्यावहारिक पदार्थोंमें व्यावहारिकार्थक्रियाकारिता

३६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

कत्वस्यापि दर्शनात् । स्वाप्नविषयजन्यस्यापि हि सुखभयादेः प्रबोधानन्तरं न बाधोऽनुभूयते, प्रत्युत प्रबोधानन्तरमपि मनःप्रसादशरीरकम्पनादिना सह तदनुवृत्तिदर्शनात् प्रागपि सत्त्वमेवाऽवसीयते । अत एव प्राणिनां पुनरपि सुखजनकविषयगोचरस्वप्ने वाञ्छा, अतादृशे च स्वप्ने प्रद्वेषः । सम्भवति च स्वप्नेऽपि ज्ञानवद् अन्तःकरणवृत्तिरूपस्य सुखभयादेरुदयः । न च स्वाप्नाङ्गनादिज्ञानमेव सुखादिजनकम्, तच्च सदेवेति वाच्यम्, तस्यापि


है, क्योंकि स्वप्नकालीन अङ्गना, भयङ्कर सर्प आदिसे जागरणमें बाधित न होनेवाले सुख, भय आदि भी देखे जाते हैं । यद्यपि स्वाप्निक अङ्गना आदि विषयोंसे आनन्द और भय आदि उत्पन्न हुये हैं, तथापि उनका 'स्वप्नमें सुख, भय आदि मुझे नहीं हुए' इस प्रकार प्रबोधमें बाध नहीं देखा जाता है, प्रत्युत उठनेके बाद भी मनकी † प्रसन्नता और शरीरके कम्प आदिके साथ सुखादिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, अतः उठनेके पूर्वमें भी उनकी सत्ता निश्चित होती है । इसीसे आनन्दप्रद विषयोंसे युक्त स्वप्नकी प्राणियोंको फिर भी इच्छा होती है और जो स्वप्न सुखप्रद विषयोंसे युक्त नहीं है, उसकी इच्छा नहीं होती है—उसमें द्वेष होता है । ‡ स्वप्नमें ज्ञानके समान अन्तःकरणके वृत्तिरूप सुख, भय आदि उत्पन्न होते हैं । यदि शङ्का हो कि स्वप्नकालिक अङ्गना आदिका ज्ञान ही सुख आदिका कारण है, और वह ज्ञान तो सत्य ही है, इसलिए कोई अनुपपत्ति


सिद्ध हो सकती है, इसलिए अर्थक्रियाकारिताकी मिथ्यात्वपक्षमें अनुपपत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

† सुखानुभवसे मनःप्रसाद हुआ करता है और भय या दुःखके अनुभवसे शरीरकम्प आदि हुआ करता है, इन्हींसे ज्ञात होता है कि जागनेके बाद भी सुख, भय आदिकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए उनकी जाग्रत्कालमें अनुवृत्ति होनेसे प्रबोधके पूर्वमें भी उनकी सत्यता साबित होती है, यह भाव है । इस विषयमें अनुमान भी करते हैं—स्वप्नकालीन भय और सुख आदि, जाग्रत् सुख आदिके समान व्यावहारिक सत्य हैं, प्रातिभासिक नहीं हैं, क्योंकि प्रबोधके बाद भी उनका बाध नहीं होता है और जाग्रत्कालमें उनकी अनुवृत्ति भी होती है ।

‡ 'तदेतत्सत्त्वम् येन स्वप्नं पश्यति' इस श्रुतिके आधारपर कल्पतरूकारने मानसवृत्तिरूप ज्ञान. स्वप्नमें माना है, इसी प्रकार मानसवृत्तिरूप अन्तःकरण वृत्तिरूप—भय आदि भी व्यावहारिक हो सकते हैं, यह भाव है ।

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३६९


दर्शनस्पर्शनादिवृत्तिरूपस्य स्वप्नप्रपञ्चसाक्षिण्यध्यस्तस्य कल्पनामात्रसिद्धत्वात्, नह्युपरतेन्द्रियस्य चक्षुरादिवृत्तयः सत्याः सम्भवन्ति । न च तद्विषयापरोक्ष्यमात्रं सुखजनकम्, तच्च साक्षिरूपं सदेवेति वाच्यम्, दर्शनात् स्पर्शने कामिन्याः, पदा स्पर्शनात् पाणिना स्पर्शने; भुजङ्गस्याऽ-

नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वह * ज्ञान भी, जो कि दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिरूप और स्वप्नप्रपञ्चके साक्षीमें अध्यस्त है, केवल कल्पनासे ही सिद्ध है, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ उपरत हुई हैं, ऐसे पुरुषके चक्षु आदिकी वृत्तियाँ सत्य नहीं हो सकती हैं । यदि शङ्का हो कि स्वाप्न विषयका अपरोक्ष्य ही सुखजनक है और वह साक्षिरूप होनेसे सत्य है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जागरणमें सुन्दरीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्श करनेमें †


* शङ्का समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वाप्न सुख आदिकी उत्पत्ति स्वाप्न अङ्गना आदिसे नहीं होती है, किन्तु उनके ज्ञानसे होती है, अतः असत्यसे सत्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु सत्यसे सत्यकी उत्पत्ति होती है । प्रकृतमें स्वाप्न अङ्गना आदिका ज्ञान साक्षिरूप है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, यह पूर्वपक्षका आशय है, इसका उत्तर है कि मनोमात्रजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है या चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है अथवा केवल साक्षिरूप ज्ञान सत्य है । इस विकल्पमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें भी यह विकल्प हो सकता है कि केवल उक्त वृत्ति ही भयादिकी हेतु है या स्वाप्न भुजङ्ग आदिरूप विषयसे विशेषित वृत्ति हेतु है ? इसमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि यत्किञ्चित् वृत्तिसे भी मुख आदिकी स्वप्नमें उत्पत्ति होने लगेगी, द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिमात्रके सत्य होनेपर भी विषयोंके असत्य होनेसे उन विषयोंसे विशिष्ट वृत्ति असत्य होगी, इसलिए प्रातिभासिक ज्ञानसे व्यावहारिक अर्थक्रिया उत्पन्न हो सकती है, अतः उक्त उदाहरण युक्त ही है, ऐसा समझ कर प्रथम कहे गये विकल्पमेंसे द्वितीय पक्ष का अर्थात् चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञानस्वरूपका 'ज्ञानस्यापि' इत्यादि मूलसे परिहार किया गया है । तृतीय विकल्पका 'न च तद्विषया' इत्यादिसे परिहार किया गया है । अतः 'स्वाप्न अङ्गनादिज्ञान सत्य है, यह कहना असङ्गत है ।

† जागरण अवस्थामें यह अक्सर देखा गया है और अनुभवसिद्ध भी है कि किसी रमणीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्शसे अधिक सुख होता है, एवमेव सर्पके पुच्छस्पर्शकी अपेक्षा सिरके स्पर्शसे भय अधिक होता है । अतः यह मानना आवश्यक है कि केवल विषयापरोक्ष्यसे सुख, भय आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु दर्शन, स्पर्शन आदि रूपवृत्तिविशेषसे युक्त विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही सुख आदिकी उत्पत्ति होती है, इसी प्रकार स्वप्नमें भी तत्-तत् विषयोंके केवल अपरोक्ष्यसे सुखादिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु तादृशवृत्तिविशेषोंसे विशेषित विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही उनकी उत्पत्ति होती है। इसलिए केवल

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३७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

मर्मस्थले स्पर्शनाद् मर्मस्थले स्पर्शने सुखविशेषस्य भयविशेषस्य चाऽनुभवसिद्धत्वेन स्वप्नेऽपि तत्तत्सुखभयादिविशेषस्य कल्पितदर्शनस्पर्शनादिवृत्तिविशेषजन्यत्वस्य वक्तव्यत्वादिति।

अन्तर्वाह्यपुमध्यस्ततमसोऽर्थक्रियेक्षणात्।
दीपादिनाश्यतादृष्टेर्युक्तमेतदितीतरे ॥ ५२ ॥

स्वप्नमें बाह्यपुरुषसे अध्यस्त घरके भीतरके अंधकारमें अर्थक्रिया—घटाद्यावरण और दीपादिनाश्यता—देखी जाती है, अतः पूर्वोक्त अद्वैताचार्यसम्मत पक्ष युक्त ही है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ ५२॥

तथा जागरे घटादिप्रकाशनक्षमतत्रत्यपुरुषान्तरनिरीक्ष्यमाणालोकवत्यपवरके सद्यः प्रविष्टेन पुंसा कल्पितस्य सन्तमसस्य प्रसिद्धसन्तमसोचितार्थक्रियाकारित्वं दृष्टम्। तेन तं प्रति घटाद्यावरणम्, दीपाद्यानयने तदपसरणम्, तन्नयने पुनरावरणमित्यादेर्दर्शनादित्यपि केचित्।

और वहां भी पैरसे स्पर्शकी अपेक्षा हस्तसे स्पर्श करनेमें, और सर्पके अमर्मस्थलके स्पर्शकी अपेक्षा मर्मस्थलके स्पर्श करनेमें क्रमशः अधिक सुखविशेष और भयविशेष अनुभवसिद्ध है, इसलिए स्वप्नमें भी तत्-तत् सुख, भय आदि विशेष—कल्पित दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिविशेषोंसे—जन्य हैं, यह कह सकते हैं।

इसी * प्रकार जाग्रदवस्था में घट आदि पदार्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ तथा छोटे घरमें स्थित अन्य पुरुषों द्वारा दृश्यमान तेजसे युक्त छोटे घर में भी तत्क्षण प्रविष्ट पुरुष द्वारा कल्पित अन्धकार, प्रसिद्ध अन्धकारके सदृश, अर्थक्रियाकारी देखा जाता है, क्योंकि उस अन्धकारसे उस पुरुषके प्रति घटादिका आवरण, दीप आदिके लानेपर उसका अपसरण और दीप आदिके हटानेपर पुनः संवरण आदि अनुभूत होते हैं—ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।


विषयापरोक्ष्यके सत्य होनेपर भी उक्त विशिष्ट आपरोक्ष्यके प्रातिभासिक होनेके कारण प्रातिभासिकसे व्यावहारिक सत्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भाव है।

* पूर्वोक्त प्रकारसे स्वप्नावस्था में असत्यसे सत्य अर्थक्रियाका उपपादन किया गया, जागरणमें भी असत्यसे सत्य अर्थक्रिया होती है, यह भी कुछ लोगों का सम्मत पक्ष है, अब उसे कहते हैं।

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७१


अन्ये तु हेतुसत्यत्वापेक्षा नाऽर्थक्रियां प्रति ।
मरीचितोये तोयत्वजात्यभावान्न तत्क्रिया ॥ ५३ ॥

कुछ लोग कहते हैं—अर्थक्रियाके प्रति हेतुकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, मरु-मरीचिका जलमें अर्थक्रिया इसलिए नहीं होती है कि उसमें अवगाहनादि कार्यका कारण-तावच्छेदक जलत्व जाति नहीं है ॥५३॥

अन्ये तु पानावगाहनाद्यर्थक्रियायां जलादिस्वरूपमात्रमुपयोगि, न तद्गतं सत्यत्वम् । तस्य कारणत्वतदवच्छेदकत्वयोरभावादिति किं तेन । न चैवं सति मरुमरीचिकोदकशुक्तिरजतादेरपि प्रसिद्धोदकाद्युचितार्थक्रियाकारित्वप्रसङ्गः । 'मरीचिकोदकादावुदकत्वादिविजातिर्नास्तीति तद्विषयकभ्रमस्य उदकशब्दोल्लेखित्‍वं तदुल्लेखिपूर्वानुभवसंस्कारजन्य-

कुछ लोग कहते हैं कि जलपान और स्नान आदि अर्थक्रियामें केवल जल आदिका स्वरूप ही अपेक्षित है, जलादिकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, क्योंकि जलादिगत सत्यतामें न तो उक्त अर्थक्रियाकी कारणता है और न तो कारणतावच्छेदकता है, इससे उसकी सत्यताका प्रकृतमें कुछ प्रयोजन नहीं है । यदि शङ्का हो कि सत्यताको यदि कारणावच्छेदक न माना जाय, तो मरुमरीचिकोदक † और शुक्ति-रजतमें भी व्यावहारिक जलके योग्य अर्थक्रियाकारिता प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'मरीचिकाजल आदिमें उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, और मरु-मरीचिका-जलविषयक भ्रममें 'यह जल है' इत्याकारक जो जलावगाही प्रत्यय होता है। वह तो उदकशब्दोल्लेखि पूर्वानुभवसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे उक्त भ्रम उत्पन्न होता है—इसलिए होता है । इस प्रकारके तत्त्वशुद्धिकार आदिके मतसे मरु-मरीचिकाजल आदिमें तत्-तत् अर्थक्रियाओंके प्रति हेतुभूत ‡


† मरुभूमिमें सम्पृक्त किरणोंमें आरोपित जलको 'मरुमरीचिकोदक' कहते हैं ।
‡ व्यावहारिक जलकी पान आदि जो अर्थक्रियाएँ हैं, उनमें उदकत्व जाति प्रयोजक है, क्योंकि जलके बिना पान हो ही नहीं सकता है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रजत आदिकी कटक, कुण्डल आदि अर्थक्रियामें भी रजतत्व आदि प्रयोजक है, क्योंकि रजतत्वादिस रहित मृत्तिका आदिसे कटक आदि नहीं हो सकते हैं, इस परिस्थितिमें प्रातिभासिक मरुमरीचिका जलमें वस्तुतः जलत्वादि अर्थक्रिया प्रयोजक धर्मोंके न रहनेसे उनसे अर्थक्रिया नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

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३७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

त्वप्रयुक्तम्' इति तत्त्वशुद्धिकारादिमते तत्तदर्थक्रियाप्रयोजकोदकत्वादिजात्य- भावादेव तदप्रसङ्गात् ।

अन्ये तु जातिरस्त्येव काचिदर्थक्रियाऽपि च ।
हेतूच्छेदेन बाधेनाऽनध्यासेन च नाऽखिला ॥५४॥

कुछ लोग कहते हैं कि मरुमरीचिका जल आदिमें उदकत्व आदि जाति है और उक्तस्थलमें कोई अर्थक्रिया भी वहाँ होती है, परन्तु हेतुके उच्छेदसे, बाधसे और अनध्याससे सम्पूर्ण अर्थक्रियाएँ नहीं होती हैं॥ ५४ ॥

तत्राप्युदकत्वादिजातिरस्ति । अन्यथा तद्वैशिष्ट्योल्लेखिभ्रमविरोधाद्, उदकार्थिनस्तत्र प्रवृत्त्यभावप्रसङ्गाच्चेति प्रातिभासिके पूर्वदृष्टसजातीयत्वव्यवहारानुरोधिनां मते क्वचिदधिष्ठानविशेषज्ञानेन समूलाध्यासनाशात्,

उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, अतः तथाकथित प्रसिद्ध उदक आदिसे होनेवाली अर्थक्रियाओंका प्रातिभासिक जलादिसे प्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है।

* मरीचिकाजल आदिमें भी उदकत्व आदि जातियाँ हैं। यदि उनमें उदकत्वादि जातियाँ न मानी जाँय, तो उदकत्व आदि जातियोंका अवगाहन करनेवाले भ्रमोंके साथ विरोध होगा, और दूसरी बात यह है कि जलादि के अभिलाषुओंकी प्रवृत्ति ही उन स्थलोंमें नहीं होगी †, इस प्रकारसे प्रातिभासिक पदार्थोंमें जो पूर्वदृष्ट पदार्थोंकी सजातीयता ‡ मानते हैं, उनके मतमें तत्-तत् भ्रमविषयीभूत पदार्थोंमें तत्-तत् अर्थक्रियाकारिता इसलिए नहीं होती है कि कहींपर ✕ अधिष्ठानगत विशेषांशके परिज्ञानसे समूल-अध्यासका विनाश


❀ प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें जलत्व आदि जातिका अङ्गीकार करके भी उक्त अतिप्रसङ्गका निवारण कुछ लोग करते हैं—'तत्रापि' इस ग्रन्थसे ।
† क्योंकि प्रवृत्तिके प्रति इष्टतावच्छेदकविशिष्टका ज्ञान प्रयोजक है, प्रकृत प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें यदि जलत्वादि धर्मोका अङ्गीकार न किया जाय, तो इष्टतावच्छेदक जलत्वादि-वैशिष्ट्यावगाही ज्ञानके न होनेसे जलार्थीकी प्रवृत्ति ही नहीं होगी। परन्तु होती है, अतः जलत्वादि जातियाँ माननी चाहिएँ, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि प्रातिभासिक और व्यावहारिक जलमें एक जातिके न माननेपर भाष्यादिमें प्रतिभासिकाध्यासोंमें पूर्वदृष्टकी सजातीयताका जो व्यवहार किया गया है, वह भी विरुद्ध होगा, यदि प्रातिभासिक जलमें जलत्वादि न माने जाँय तो ।
✕ मनुष्य दूरसे मरीचिकामें जलकी भ्रान्तिके बाद स्नान आदिके लिए उनके पास गया, जानेके

मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७३

क्वचिदधिष्ठानसामान्यज्ञानोपरमेण केवलाध्यासनाशात्, क्वचित् गुञ्जापुञ्जादौ चक्षुषा वह्न्याद्यध्यासस्थले दाहपाकादिप्रयोजकस्योष्णस्पर्शादेरनध्यासाच्च तत्र तत्राऽर्थक्रियाभावोपपत्तेः। क्वचित् कासांचिदर्थक्रियाणामिष्यमाणत्वाच्च। मरीचिकोदकादिव्यावर्तकस्याऽर्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तव्यत्वे च श्रुतिविरुद्धं प्रत्यक्षादिना दुर्ग्रहं त्रिकालाबाध्यत्वं विहाय दोषविशेषाजन्य रजतत्वादेरेव रजताद्युचितार्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तुं शक्यत्वाच्च। तस्मान्मिथ्यात्वेऽप्य-


हुआ है, कहींपर अधिष्ठानके सामान्यांशज्ञानके उपरत होनेसे केवल अध्यास-का नाश हुआ है * और किसी स्थलमें गुञ्जा-पुञ्ज आदिमें चक्षुसे वह्नि आदिके अध्यासस्थलमें दाह, पाक अर्थक्रियाके हेतुभूत उष्णस्पर्श आदि अध्यस्त नहीं होते हैं। और किसी स्थलविशेषमें कुछ अर्थक्रियाओंका अङ्गीकार भी करते हैं †। मरीचिकाजल आदिमें न रहनेवाले अर्थात् केवल व्यावहारिक पदार्थोंमें रहनेवाले अर्थक्रियामें उपयुक्त धर्मका यदि निर्वचन करता है, तो मिथ्यात्वश्रुतिसे विरुद्ध तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे ग्रहण न होनेवाले त्रिकालाबाध्यत्वरूप सत्यत्वको छोड़कर ‡ दोषविशेषसे अजन्य रजतादिवृत्ति रजतत्व आदि रजतादिकी उपयुक्त अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेद धर्म है, ऐसा कह सकते हैं। इससे अर्थोंके मिथ्या


अनन्तर उसे ज्ञात होता है कि यह जल नहीं है, किन्तु केवल मरीचिका है, इस प्रकार विशेषदर्शनसे अपने उपादान अज्ञानके साथ जलाध्यास निवृत्त होता है, अतः इससे अर्थ-क्रियाकी प्रसक्ति नहीं होती है, यह भाव है।

* जिस शुक्तिरजतादि स्थलमें विशेषदर्शन नहीं हुआ हो, उस स्थलमें अधिष्ठान-सामान्यज्ञानरूप कारणका नाश होनेसे ही उक्त स्थलमें अर्थक्रियाकारिता नहीं है, यह भाव है।

† 'स्वप्नवदिति ब्रूमः' इस ग्रन्थसे स्वप्नमें जिन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता मानी गई है, उन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता इष्ट है, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेदक सत्यत्व है, ऐसा पूर्वमें कहा गया है, परन्तु उसे नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सद्भूतरजतसे कटक आदि कार्य होते हैं, और तद्भिन्न शुक्तिरजतसे नहीं होते हैं, इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकसे सहकृत प्रत्यक्षसे ही अर्थक्रियाकारितावच्छेदकरूपसे सत्त्वका परिज्ञान तुम्हें करना होगा, परन्तु यह सत्त्व मिथ्यात्वका विरोधी कालत्रयाबाध्यत्वरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि उसका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः उससे पृथक् ही कहना होगा।

३७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

र्थक्रियाकारित्वसम्भवान्मिथ्यैव प्रपञ्चः, न सत्य इति ॥८।

ननु मिथ्यात्वसत्यत्वे ब्रह्मैक्यश्रुतिपीडनम् ।
तन्मिथ्यात्वे तु विश्वस्य सत्यत्वं केन वार्यते ॥५५॥

शङ्का होती है कि मिथ्यात्वको सत्य माननेसे ब्रह्मैक्यश्रुति बाधित होगी, उसके मिथ्या होनेपर भी विश्वकी सत्यता का निराकरण होगा ॥ ५५ ॥

ननु मिथ्यात्वस्य प्रपञ्चधर्मस्य सत्यत्वे ब्रह्माद्वैतक्षतेस्तदपि मिथ्यैव वक्तव्यमिति कुतः प्रपञ्चस्य सत्यत्वक्षतिः ? मिथ्याभूतं ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न निष्प्रपञ्चत्वविरोधीति त्वदुक्तरीत्या मिथ्याभूतमिथ्यात्वस्य सत्यत्वाविरोधात् ॥

सत्यमत्रोक्तमद्वैतदीपिकायां विरोधिनीम् ।
स्वधर्म्यन्यूनसत्ताकं मिथ्यात्वं सत्यतां हरेत् ॥५६॥

इस प्रश्नके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि अपने धर्मीकी अन्यून सत्ता-वाला मिथ्यात्व अपने से विरुद्ध सत्यत्वका अपहरण करता है ॥ ५६ ॥

अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्—वियदादिप्रपञ्चसमानस्वभावं मिथ्यात्वम् ।


होनेपर भी अर्थक्रियाकारिताका सम्भव होनेसे प्रपञ्च मिथ्या ही है, सत्य नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ८ ॥

अब शङ्का होती है कि प्रपञ्चमें रहनेवाला मिथ्यात्व यदि सत्य है, तो अद्वैत ब्रह्मकी क्षति होगी अर्थात् अद्वितीय ब्रह्म सिद्ध नहीं होगा, इसलिए सिद्धान्तीको उसे भी मिथ्या ही कहना होगा। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चकी सत्यताका निरास कैसे होगा ? क्योंकि ब्रह्मका मिथ्याभूत प्रपञ्चतादात्म्य ꕤ प्रपञ्चशून्यताका विरोधी नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे ही कथनके अनुसार मिथ्याभूत मिथ्यात्व सत्यत्वका विरोधी नहीं हो सकता है।

इस † आक्षेपके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि मिथ्यात्वका


ꕤ प्रपञ्चतादात्म्य ही सप्रपञ्चत्व है और निष्प्रपञ्चत्व प्रपञ्चात्यन्ताभावरूप है, इस प्रकारका निष्प्रपञ्चत्व वास्तविक है, क्योंकि, व्यावहारिक प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव ब्रह्ममें पारमार्थिक माना गया है, इससे एक ब्रह्ममें सप्रपञ्चत्व और निष्प्रपञ्चत्वका विरोध नहीं है, वैसे ही मिथ्यात्व और सत्यत्वका विरोध नहीं है।

† मिथ्यात्वधर्म मिथ्याभूत ही है, इस पक्षका ग्रहण करके समाधान करते हैं—आकाश

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मिथ्याके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चमिथ्यात्व-विचार] भाषानुवादसहित ३७५


तच्च धर्मिणः सत्यत्वप्रतिक्षेपकम्। धर्मस्य स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वे हि उभयवादिसिद्धं धर्मिसमसत्त्वं तन्त्रम्, न पारमार्थिकत्वम्। अघटत्वादिप्रतिक्षेपके पटत्वादावस्माकं पारमार्थिकत्वासम्प्रतिपत्तेः। ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न धर्मिसमसत्ताकमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेपकम्।

अत एव मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे तद्विरोधिनोऽप्रातिभासिकस्य


आकाश आदि प्रपञ्चके साथ समानस्वभाव है अर्थात् आकाश आदि पदार्थोंकी जैसी सत्ता है, वैसी ही सत्ता मिथ्यात्वकी भी है। और वह मिथ्यात्व धर्मीके सत्यत्वका विरोधी—विघातक—है, अपने विरुद्ध धर्मका विरोध करनेमें धर्मका धर्मीसे समानसत्ताकत्व वादी और प्रतिवादी दोनोंके मतमें प्रयोजक है, धर्मकी पारमार्थिकता प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अघटत्वके प्रतिक्षेपक पटत्व आदिमें हमारे (वेदान्तीके) मतसे पारमार्थिकत्व सम्प्रतिपन्न—निश्चित—नहीं है। ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य धर्मिसमानसत्तक नहीं है, अतः निष्प्रपञ्चत्वका प्रतिक्षेपक नहीं है।

इसीसे ‡ यह भी प्रश्न निरस्त हुआ समझना चाहिए कि यदि मिथ्यात्व व्यावहारिक हो, तो उसका विरोधी अप्रातिभासिक प्रपञ्चसत्यत्व पारमार्थिक


आदि पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता है, इसलिए मिथ्यात्वकी भी व्यावहारिक सत्ता होगी। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि आरोपित घटत्व आदि आरोपाधिकरणीभूत अपने आश्रय पटादिमें विरुद्ध अघटत्व आदिके विघातक नहीं देखे जाते हैं, अतः सत्य घटत्व आदि स्वविरुद्ध धर्मोंके स्वाश्रयमें प्रतिक्षेपक होंगे? इस दशामें मिथ्याभूत मिथ्यात्व प्रपञ्चके सत्यत्वका कैसे विरोधी होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक वही धर्म होता है, जो धर्मिसमानसत्तावाला हो, इस प्रकारका उभयवादिसिद्ध एक प्रयोजक मानना चाहिए, संदिग्ध नहीं मानना चाहिए, क्योंकि परमतमें घटत्वादिकी सत्ता पारमार्थिक है, और हमारे मतमें नहीं है, अतः सत्यत्व धर्म स्वाश्रयमें स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक नहीं हो सकता है, किन्तु मूलोक्त धर्मिसमानसत्ताक धर्म ही प्रतिक्षेपक हो सकता है, यह भाव है।

‡ प्रकृतमें यह शङ्का हो सकती है कि प्रपञ्चगतमिथ्यात्वके मिथ्यात्वपक्षमें उस मिथ्यात्वको व्यावहारिक ही मानना चाहिए, क्योंकि उसकी निवृत्ति केवल ब्रह्मज्ञानसे होती है, इसलिए उसे प्रातिभासिक, या पारमार्थिक नहीं मान सकते, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी निवृत्ति ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य ज्ञानसे भी होती है और पारमार्थिककी कभी भी निवृत्ति नहीं होती है। और उसके व्यावहारिक होनेपर प्रपञ्चगतसत्यत्व पारमार्थिक सिद्ध होता है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षसे सिद्ध प्रपञ्चका सत्यत्व ब्रह्मज्ञान तक अनुवृत्त होता है अतः प्रातिभासिक नहीं मान सकते हैं और व्यावहारिक मिथ्यात्वधर्मसे युक्त प्रपञ्चमें सत्यत्वको व्यावहारिक नहीं मान सकते

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३७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

प्रपञ्चसत्यत्वस्य पारमार्थिकत्वं स्यादिति निरस्तम् । धर्मिसमसत्ताकस्य मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे धर्मिणोऽपि व्यावहारिकत्वनियमात् ।

स्वधर्मीक्षाऽक्षतो धर्मः स्वविरुद्धहरोऽथवा ॥

अथवा अपने धर्मीके साक्षात्कारसे निवृत्त न होनेवाला धर्म अपने विरुद्ध धर्मका अपहरण करता है ।

अथवा यो यस्य स्वविषयसाक्षात्कारानिवर्त्यो धर्मः, स तत्र स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकः । शुक्तौ शुक्तितादात्म्यं तद्विषयसाक्षात्कारानिवर्त्यम्


होगा, क्योंकि धर्मीके समान सत्तावाले मिथ्यात्वके व्यावहारिक होनेपर धर्मी भी व्यावहारिक ही होता है, ऐसा नियम है ।

अथवा * जिसका जो धर्म अपने विषयके साक्षात्कारसे निवृत्त न होता हो, वह धर्म उस धर्मीमें अपने विरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक होता है अर्थात् अपने विरुद्ध धर्मकी स्थिति नहीं होने देता है, यह भाव है । शुक्तिमें रहनेवाला शुक्तितादात्म्य शुक्तिविषयक साक्षात्कारसे निवृत्त नहीं होता है, इसलिए वह


हैं। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चगत सत्यत्व जब पारमार्थिक है, तो उसका धर्मी प्रपञ्च भी पारमार्थिक अवश्य हो सकता है, अतः ब्रह्माद्वैतकी क्षति होगी, इस प्रश्नका समाधान 'अतएव' इस ग्रन्थसे किया जाता है। तात्पर्य यह है कि मिथ्यात्वरूप धर्ममें धर्मिसमानसक्ताकत्वके आधारपर व्यावहारिकत्वका अङ्गीकार करके मिथ्यात्वाश्रय प्रपञ्चमें सत्यत्वपर्यवसायी पारमार्थिकत्वका आपादन, विरोध होनेके कारण, हो ही नहीं सकता है। यदि प्रपञ्चमें अनुभूयमानसत्यत्वका व्यावहारिकरूपसे अङ्गीकार किया जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समानसत्तावाले मिथ्यात्व और सत्यत्व एक जगहपर रहेंगे कैसे ? क्योंकि उनका विरोध है; वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब तक तत्त्वज्ञान न हो, तब तक बाधित न होनेवाले प्रत्यक्षका विषय, तथा मिथ्यात्वका अविरुद्ध सत्यत्व प्रपञ्चमें रहता है, ऐसा बार बार पूर्वमें कहा गया है, यह भाव है।

※ इस पक्षका अवलम्बन करनेवालोंका मत है कि सर्वत्र ब्रह्मसत्ता ही प्रतीत होती है, उससे भिन्न व्यावहारिक अथवा प्रातिभासिक सत्ता है ही नहीं, इसलिए 'धर्मिसमानसक्ताकत्व' आदिसे कहा गया समाधान युक्त नहीं है, अतः स्वाभिमत समाधान 'अथवा' इस ग्रन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है कि वही धर्म अपने विरोधी धर्मकी स्थितिका निवर्तक होता है, जो अपने आश्रयके प्रत्यक्षसे निवृत्त न होता हो, इसलिए स्वाश्रयसाक्षात्कारानिवर्त्यत्व ही धर्मके स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वमें प्रयोजक है, यह फलित है। पारमार्थिकत्व या धर्मिसमानसक्ताकत्व प्रयोजक नहीं है, शुक्ति रजतमस्थलमें शुक्तित्व धर्मकी शुक्तिका साक्षात्कार होनेपर भी निवृत्ति नहीं होती है, इसलिये शुक्तित्व धर्म अशुक्तित्वविरोधी है, यह सर्वानुभवसिद्ध है, अतः इस प्रयोजकके स्वीकार करनेमें विरोध नहीं है, यह भाव है।

[मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७७


अशुक्तित्वस्य विरोधी, तत्रैव रजततादात्म्यं तन्निवर्त्यमरजतत्वाविरोधीति व्यवस्थादर्शनात् । एवं च प्रपञ्चमिथ्यात्वं कल्पितमपि प्रपञ्चसाक्षात्कार-निवर्त्यमिति सत्यत्वप्रतिक्षेपकमेव । ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं तु ब्रह्मसाक्षात्कारा-निवर्त्यमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेकमिति ।

शाब्दप्रामाण्ययोग्यत्वसत्त्वं लौकिकमप्यलम् ॥ ५७ ॥

शाब्दज्ञान प्रामाण्य और शब्दकी योग्यता में व्यावहारिक सत्त्वसे भी पारमार्थिक ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है ॥५७॥

एतेन शब्दगम्यस्य ब्रह्मणः सत्यत्वे शब्दयोग्यतायाः, शाब्दधी-प्रामाण्यस्य च सत्यत्वं वक्तव्यम् । प्रातिभासिकयोग्यतावताऽनाप्तवाक्येन व्यावहारिकार्थस्य व्यावहारिकयोग्यतावताऽग्निहोत्रादिवाक्येन तात्त्विकार्थस्य


अशुक्तित्वका—रजतत्वका—विरोधी है, और इसी स्थलमें जो रजततादात्म्य है, वह शुक्तिके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, अतः शुक्तित्वका विरोधी नहीं हो सकता है। ऐसा होनेपर यद्यपि प्रपञ्चका मिथ्यात्व कल्पित है, तथापि प्रपञ्चसाक्षात्कार-से निवृत्त नहीं होता है, इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंसे स्वाश्रय साक्षात्कारसे अनिवर्त्य धर्म स्वाश्रयमें अपनेसे विरुद्ध धर्मकी स्थितिमें विरोधी है ऐसा निश्चित होनेपर सत्यत्वका विरोधी ही है, ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य ब्रह्मके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, इससे प्रपञ्चतादात्म्य निष्प्रपञ्चत्वका विरोधी नहीं है।

इसीसे अर्थात् वक्ष्यमाण हेतुसे यह भी शङ्का निरस्त हुई कि यदि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे ज्ञेय ब्रह्म सत्य है, तो शब्दकी योग्यताको † और शब्दज्ञानके प्रामाण्यको भी सत्य कहना चाहिए, क्योंकि प्रातिभासिक योग्यतासे युक्त अनाप्त पुरुषके वाक्यसे व्यावहारिक अर्थ और व्यावहारिक योग्यतावाले 'अग्निहोत्रं जुहोति' (अग्निहोत्र होम करे) इत्यादि वाक्योंसे तात्त्विक अर्थकी


† बाध निश्चयका अभाव योग्यता है, वह शाब्दबोधमें कारण है। जैसे 'जलेन सिञ्चति' जलसे सिञ्चन करता है, इत्यादि स्थलमें सिञ्चनकरणताके बाधका निश्चय नहीं है, अतः इससे शाब्दबोध होता है और 'वह्निना सिञ्चति' (अग्निसे सिञ्चन करता है) इस स्थलमें वह्निमें सिञ्चन-करणताका बाध निश्चित है, इसलिए इस वाक्यसे शाब्द बोध नहीं होता है। प्रकृतमें जिस उपनिषद् वाक्यसे ब्रह्मका बोध होगा उस उपनिषद्-वाक्यकी योग्यता अवश्य अपेक्षित है, अन्यथा उससे ब्रह्मज्ञान हो ही नहीं सकेगा, इस परिस्थितिमें द्वैतापत्ति दोष देते हैं ।

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३७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद

वा सिद्धयभावेन योग्यतासमानसत्ताकस्यैव शब्दार्थसिद्धिनियमात् । अर्थाबाधरूपप्रामाण्यस्याऽसत्यत्वे अर्थस्य सत्यत्वायोगाच्च । तथा च ब्रह्मातिरिक्तसत्यवस्तुसत्त्वेन द्वैतावश्यम्भाव इति वियदादिप्रपञ्चोऽपि सत्योऽस्त्विति निरस्तम् ।

व्यावहारिकस्याऽर्थक्रियाकारित्वस्य व्यवस्थापितत्वेन व्यावहारिकयोग्यताया अपि सत्यब्रह्मसिद्धिसम्भवात् । ब्रह्मपरे वेदान्ते सत्यादिपदसत्त्वाद् ब्रह्मसत्यत्वसिद्धेः । अग्निहोत्रादिवाक्ये तादृशपदाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि प्रबलब्रह्माद्वैतश्रुतिविरोधात् तदसिद्धिरित्येव वैषम्योपपत्तेः । शब्दार्थयोग्यतयोः समानसत्ताकत्वनियमस्य निष्प्रमाणकत्वात् । घटज्ञान-


सिद्धि न होनेके कारण योग्यतासमानसत्ताक शब्दार्थकी ‡ सिद्धि होती है, यह नियम प्राप्त होता है और अर्थाबाधरूप * प्रामाण्यके असत्य होनेपर अर्थ भी सत्य नहीं हो सकता है, इस अवस्थामें ब्रह्मसे पृथक् योग्यता आदि अबाधित अर्थोका अस्तित्व होनेपर द्वैत ही सिद्ध होगा, इससे आकाशादि प्रपञ्चमें भी सत्यत्व प्रसक्त होगा ।

व्यावहारिक प्रपञ्चकी अर्थक्रियाकारिताका अद्वैतवादमें अङ्गीकार होनेसे उसी व्यावहारिक योग्यतासे सत्य—त्रिकालाबाधित—ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है । ब्रह्मपरक वेदान्तोंमें सत्यादि पदोंके होनेसे ब्रह्मकी सत्यता सिद्ध होती है । और 'अग्निहोत्रं जुहोति' इत्यादि वाक्योंमें सत्यादि पदोंके न रहनेसे अग्निहोत्रादि त्रिकालाबाधित सिद्ध नहीं होते हैं । यदि अग्नि होत्रादि प्रकरणमें सत्यादि पद हैं, तो भी प्रबल ब्रह्माद्वैत श्रुतिका विरोध होनेसे अग्निहोत्रादिकी सत्यता सिद्ध नहीं होती है, इस प्रकार वैषम्यकी उपपत्ति होती है । शब्दार्थ और योग्यताके समानसत्ताकत्वके नियममें कोई प्रमाण भी नहीं है । जैसे घट-


‡ जैसी योग्यताकी सत्ता होगी, वैसी ही सत्तासे युक्त शब्दार्थकी सिद्धि होगी, यह नियम अवश्य मानना चाहिए, अन्यथा प्रातिभासिक योग्यतावाले शब्दसे भी व्यावहारिक अर्थकी सिद्धि हो जायगी, यह भाव है ।

  • जिस ज्ञानके विषयका बाध होता है, वह ज्ञान प्रमाण नहीं माना जाता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञान, अतः वही ज्ञान प्रमाण है, जिसका अर्थ बाधित न होता हो, इसलिए अर्थाबाध अर्थात् अबाधितार्थत्वरूप ही प्रामाण्य है, यह भाव है ।

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मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७९

प्रामाण्यस्याऽघटत्ववत् सत्यभूतब्रह्मज्ञानप्रामाण्यस्याऽपि तदतिरिक्तघटितत्वेन मिथ्यात्वोपपत्तेश्च। तस्माद् (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६) आरम्भणाधिकरणोक्तन्यायेन कृत्स्नस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं वज्रलेपायते ॥ ९ ॥

न जीवैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणस्तदभेदतः ।
तेषां च भोगसाङ्कर्यं वारणीयमुपाधिभिः ॥ ५८ ॥

जीवों को लेकर ब्रह्ममें द्वैतत्व प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, और उनके भोगके साङ्कर्य का परिहार उपाधिके आधारपर करना चाहिए ॥ ५८ ॥

ननु आरम्भणशब्दादिभिरचेतनस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्व-सिद्धावपि चेतनानामपवर्गभाजां मिथ्यात्वायोगाद् अद्वितीये ब्रह्मणि

ज्ञानके प्रामाण्यमें अघटत्वका, वैसे ही सत्यात्मक ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यमें * ब्रह्म-भिन्न ब्रह्मत्वका सम्बन्ध होनेसे मिथ्यात्वकी उपपत्ति है। इससे आरम्भणाधिकरणमें † कहे गये सिद्धान्तके अनुसार सम्पूर्ण आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या ही है ॥९॥

यदि यह शङ्का हो कि आरम्भणाधिकरणके सिद्धान्तके अनुसार अचेतन आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या हो सकता है, परन्तु मुक्त चेतन जीवोंमें मिथ्यात्व-का सम्बन्ध न होनेसे अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वय नहीं हो सकता है, और पूर्वमें


* ब्रह्मत्वाधिकरण ब्रह्ममें ब्रह्मत्वप्रकारक अनुभवत्वरूप जो ब्रह्मज्ञानका प्रामाण्य है, वह ब्रह्मसे भिन्न ब्रह्मत्वके सम्बन्धसे युक्त है, अतः वह भी मिथ्या ही है, यह भाव है। यदि कहा जाय कि ब्रह्मज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य अबाधितार्थानुभवत्वरूप है, और केवल योग्य विषयस्वरूपमें उसका पर्य्यवसान है। वह प्रामाण्य अखण्डार्थक वेदान्तोंमें ब्रह्मरूप ही है, तदतिरिक्त घटित नहीं है, इसलिए वह सत्य ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसके सत्य होनेपर भी कोई दोष नहीं है, कारण कि वह केवल ब्रह्मस्वरूप ही है, अतः इससे भी ब्रह्मातिरिक्त सत्य वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है।

† तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः 'ब्रह्मरूप अभिन्ननिमित्तोपादान कारणसे यह कार्य अलग नहीं है' क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेव सत्यम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'ब्रह्मैवेदम्' (विकार केवल वाचारम्भण ही है मृत्तिका सत्य है—अर्थात् कारण सत्य है, यह सब सत्य-रूप है, यह सब ब्रह्म ही है) इत्यादि श्रुति प्रमाण है, यह सूत्रका अर्थ है। इसका अधिक विस्तार अच्युतग्रन्थमालामुद्रित ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यरत्नप्रभा भाषानुवादमें देखना चाहिए [पृ० १००० द्वितीय खण्ड]।

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३८०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

समन्वयो न युक्तः। न च तेषां ब्रह्माभेदः प्रागुक्तो युक्तः, परस्परं- भिन्नानां तेषाम् एकेन ब्रह्मणाऽभेदासम्भवात् । न च तद्भेदासिद्धिः । सुखदुःखादिव्यवस्थया तत्सिद्धेरिति चेद्, न ; तेषामभेदेऽपि उपाधिभेदा- देव तद्व्यवस्थोपपत्तेः ॥ १० ॥

नन्वन्यभेदादन्यस्य कथं साङ्कर्यवारणम् ।

यदि शङ्का हो कि दूसरे के भेदसे दूसरे का भोगसाङ्कर्य कैसे परिहृत होगा ?

ननु उपाधिभेदेऽपि तदभेदानपायात् कथं व्यवस्था । नह्याश्रय- भेदेनोपपादनीयो विरुद्धधर्मसाङ्करस्तदतिरिक्तस्य कस्यचिद्भेदोपगमेन सिध्यति ।

अत्राहुरन्यताऽसङ्गे भोक्तृतादात्म्यकल्पनात् ॥ ६९ ॥

इसके परिहारमें कहते हैं कि अन्यत्व है ही नहीं, क्योंकि असङ्ग आत्मामें भोक्तृ- तादात्म्य कल्पित है ॥ ६९ ॥

अत्र केचिदाहुः—सिध्यत्येवाऽन्तःकरणोपाधिभेदेन सुखदुःखादिव्य-

उनके साथ ब्रह्मका जो अभेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो परस्पर भिन्न हैं, उनका एक ब्रह्मके साथ अभेद नहीं हो सकता है । और भेदकी असिद्धि है, यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि सुख और दुःख आदिकी व्यवस्थासे उसकी सिद्धि है । तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन अपवर्गभागी जीवोंका वस्तुतः ब्रह्मके साथ अभेद ही है, तथापि उपाधिके बलसे उनका भेद हो सकता है ॥१०॥

यदि शङ्का हो कि उपाधिके भिन्न होनेपर भी आत्माके अभेदका विनाश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था कैसे होगी ? क्योंकि जिन विरुद्ध धर्मोंके असाङ्कर्यका—आश्रयके भेदसे—उपपादन करना है, उनकी किसी भिन्न वस्तुके भेदसे उपपत्ति कैसे हो सकती है ?

इस * आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—अन्तःकरणरूप उपाधि-


* अन्तःकरण ही कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है और 'अहम्' अनुभवका गोचर है, आत्मा नहीं, क्योंकि वह कूटस्थ है, इसलिए आश्रयके भेदसे व्यवस्था हो सकती है, यह 'केचित्' पक्षका भाव है ।

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