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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

३६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

कत्वस्यापि दर्शनात् । स्वाप्नविषयजन्यस्यापि हि सुखभयादेः प्रबोधानन्तरं न बाधोऽनुभूयते, प्रत्युत प्रबोधानन्तरमपि मनःप्रसादशरीरकम्पनादिना सह तदनुवृत्तिदर्शनात् प्रागपि सत्त्वमेवाऽवसीयते । अत एव प्राणिनां पुनरपि सुखजनकविषयगोचरस्वप्ने वाञ्छा, अतादृशे च स्वप्ने प्रद्वेषः । सम्भवति च स्वप्नेऽपि ज्ञानवद् अन्तःकरणवृत्तिरूपस्य सुखभयादेरुदयः । न च स्वाप्नाङ्गनादिज्ञानमेव सुखादिजनकम्, तच्च सदेवेति वाच्यम्, तस्यापि


है, क्योंकि स्वप्नकालीन अङ्गना, भयङ्कर सर्प आदिसे जागरणमें बाधित न होनेवाले सुख, भय आदि भी देखे जाते हैं । यद्यपि स्वाप्निक अङ्गना आदि विषयोंसे आनन्द और भय आदि उत्पन्न हुये हैं, तथापि उनका 'स्वप्नमें सुख, भय आदि मुझे नहीं हुए' इस प्रकार प्रबोधमें बाध नहीं देखा जाता है, प्रत्युत उठनेके बाद भी मनकी † प्रसन्नता और शरीरके कम्प आदिके साथ सुखादिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, अतः उठनेके पूर्वमें भी उनकी सत्ता निश्चित होती है । इसीसे आनन्दप्रद विषयोंसे युक्त स्वप्नकी प्राणियोंको फिर भी इच्छा होती है और जो स्वप्न सुखप्रद विषयोंसे युक्त नहीं है, उसकी इच्छा नहीं होती है—उसमें द्वेष होता है । ‡ स्वप्नमें ज्ञानके समान अन्तःकरणके वृत्तिरूप सुख, भय आदि उत्पन्न होते हैं । यदि शङ्का हो कि स्वप्नकालिक अङ्गना आदिका ज्ञान ही सुख आदिका कारण है, और वह ज्ञान तो सत्य ही है, इसलिए कोई अनुपपत्ति


सिद्ध हो सकती है, इसलिए अर्थक्रियाकारिताकी मिथ्यात्वपक्षमें अनुपपत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

† सुखानुभवसे मनःप्रसाद हुआ करता है और भय या दुःखके अनुभवसे शरीरकम्प आदि हुआ करता है, इन्हींसे ज्ञात होता है कि जागनेके बाद भी सुख, भय आदिकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए उनकी जाग्रत्कालमें अनुवृत्ति होनेसे प्रबोधके पूर्वमें भी उनकी सत्यता साबित होती है, यह भाव है । इस विषयमें अनुमान भी करते हैं—स्वप्नकालीन भय और सुख आदि, जाग्रत् सुख आदिके समान व्यावहारिक सत्य हैं, प्रातिभासिक नहीं हैं, क्योंकि प्रबोधके बाद भी उनका बाध नहीं होता है और जाग्रत्कालमें उनकी अनुवृत्ति भी होती है ।

‡ 'तदेतत्सत्त्वम् येन स्वप्नं पश्यति' इस श्रुतिके आधारपर कल्पतरूकारने मानसवृत्तिरूप ज्ञान. स्वप्नमें माना है, इसी प्रकार मानसवृत्तिरूप अन्तःकरण वृत्तिरूप—भय आदि भी व्यावहारिक हो सकते हैं, यह भाव है ।

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३६९


दर्शनस्पर्शनादिवृत्तिरूपस्य स्वप्नप्रपञ्चसाक्षिण्यध्यस्तस्य कल्पनामात्रसिद्धत्वात्, नह्युपरतेन्द्रियस्य चक्षुरादिवृत्तयः सत्याः सम्भवन्ति । न च तद्विषयापरोक्ष्यमात्रं सुखजनकम्, तच्च साक्षिरूपं सदेवेति वाच्यम्, दर्शनात् स्पर्शने कामिन्याः, पदा स्पर्शनात् पाणिना स्पर्शने; भुजङ्गस्याऽ-

नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि वह * ज्ञान भी, जो कि दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिरूप और स्वप्नप्रपञ्चके साक्षीमें अध्यस्त है, केवल कल्पनासे ही सिद्ध है, क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ उपरत हुई हैं, ऐसे पुरुषके चक्षु आदिकी वृत्तियाँ सत्य नहीं हो सकती हैं । यदि शङ्का हो कि स्वाप्न विषयका अपरोक्ष्य ही सुखजनक है और वह साक्षिरूप होनेसे सत्य है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जागरणमें सुन्दरीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्श करनेमें †


* शङ्का समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वाप्न सुख आदिकी उत्पत्ति स्वाप्न अङ्गना आदिसे नहीं होती है, किन्तु उनके ज्ञानसे होती है, अतः असत्यसे सत्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु सत्यसे सत्यकी उत्पत्ति होती है । प्रकृतमें स्वाप्न अङ्गना आदिका ज्ञान साक्षिरूप है, अतः अनुपपत्ति नहीं है, यह पूर्वपक्षका आशय है, इसका उत्तर है कि मनोमात्रजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है या चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञान सत्य है अथवा केवल साक्षिरूप ज्ञान सत्य है । इस विकल्पमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि इसमें भी यह विकल्प हो सकता है कि केवल उक्त वृत्ति ही भयादिकी हेतु है या स्वाप्न भुजङ्ग आदिरूप विषयसे विशेषित वृत्ति हेतु है ? इसमें पहला पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि यत्किञ्चित् वृत्तिसे भी मुख आदिकी स्वप्नमें उत्पत्ति होने लगेगी, द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिमात्रके सत्य होनेपर भी विषयोंके असत्य होनेसे उन विषयोंसे विशिष्ट वृत्ति असत्य होगी, इसलिए प्रातिभासिक ज्ञानसे व्यावहारिक अर्थक्रिया उत्पन्न हो सकती है, अतः उक्त उदाहरण युक्त ही है, ऐसा समझ कर प्रथम कहे गये विकल्पमेंसे द्वितीय पक्ष का अर्थात् चक्षुरादिजन्य वृत्तिरूप ज्ञानस्वरूपका 'ज्ञानस्यापि' इत्यादि मूलसे परिहार किया गया है । तृतीय विकल्पका 'न च तद्विषया' इत्यादिसे परिहार किया गया है । अतः 'स्वाप्न अङ्गनादिज्ञान सत्य है, यह कहना असङ्गत है ।

† जागरण अवस्थामें यह अक्सर देखा गया है और अनुभवसिद्ध भी है कि किसी रमणीके दर्शनकी अपेक्षा स्पर्शसे अधिक सुख होता है, एवमेव सर्पके पुच्छस्पर्शकी अपेक्षा सिरके स्पर्शसे भय अधिक होता है । अतः यह मानना आवश्यक है कि केवल विषयापरोक्ष्यसे सुख, भय आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु दर्शन, स्पर्शन आदि रूपवृत्तिविशेषसे युक्त विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही सुख आदिकी उत्पत्ति होती है, इसी प्रकार स्वप्नमें भी तत्-तत् विषयोंके केवल अपरोक्ष्यसे सुखादिकी उत्पत्ति नहीं होती है, किन्तु तादृशवृत्तिविशेषोंसे विशेषित विषयोंके अपरोक्ष्यसे ही उनकी उत्पत्ति होती है। इसलिए केवल

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३७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

मर्मस्थले स्पर्शनाद् मर्मस्थले स्पर्शने सुखविशेषस्य भयविशेषस्य चाऽनुभवसिद्धत्वेन स्वप्नेऽपि तत्तत्सुखभयादिविशेषस्य कल्पितदर्शनस्पर्शनादिवृत्तिविशेषजन्यत्वस्य वक्तव्यत्वादिति।

अन्तर्वाह्यपुमध्यस्ततमसोऽर्थक्रियेक्षणात्।
दीपादिनाश्यतादृष्टेर्युक्तमेतदितीतरे ॥ ५२ ॥

स्वप्नमें बाह्यपुरुषसे अध्यस्त घरके भीतरके अंधकारमें अर्थक्रिया—घटाद्यावरण और दीपादिनाश्यता—देखी जाती है, अतः पूर्वोक्त अद्वैताचार्यसम्मत पक्ष युक्त ही है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं॥ ५२॥

तथा जागरे घटादिप्रकाशनक्षमतत्रत्यपुरुषान्तरनिरीक्ष्यमाणालोकवत्यपवरके सद्यः प्रविष्टेन पुंसा कल्पितस्य सन्तमसस्य प्रसिद्धसन्तमसोचितार्थक्रियाकारित्वं दृष्टम्। तेन तं प्रति घटाद्यावरणम्, दीपाद्यानयने तदपसरणम्, तन्नयने पुनरावरणमित्यादेर्दर्शनादित्यपि केचित्।

और वहां भी पैरसे स्पर्शकी अपेक्षा हस्तसे स्पर्श करनेमें, और सर्पके अमर्मस्थलके स्पर्शकी अपेक्षा मर्मस्थलके स्पर्श करनेमें क्रमशः अधिक सुखविशेष और भयविशेष अनुभवसिद्ध है, इसलिए स्वप्नमें भी तत्-तत् सुख, भय आदि विशेष—कल्पित दर्शन, स्पर्शन आदि वृत्तिविशेषोंसे—जन्य हैं, यह कह सकते हैं।

इसी * प्रकार जाग्रदवस्था में घट आदि पदार्थोंका प्रकाशन करनेमें समर्थ तथा छोटे घरमें स्थित अन्य पुरुषों द्वारा दृश्यमान तेजसे युक्त छोटे घर में भी तत्क्षण प्रविष्ट पुरुष द्वारा कल्पित अन्धकार, प्रसिद्ध अन्धकारके सदृश, अर्थक्रियाकारी देखा जाता है, क्योंकि उस अन्धकारसे उस पुरुषके प्रति घटादिका आवरण, दीप आदिके लानेपर उसका अपसरण और दीप आदिके हटानेपर पुनः संवरण आदि अनुभूत होते हैं—ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं।


विषयापरोक्ष्यके सत्य होनेपर भी उक्त विशिष्ट आपरोक्ष्यके प्रातिभासिक होनेके कारण प्रातिभासिकसे व्यावहारिक सत्यकी उत्पत्ति हो सकती है, यह भाव है।

* पूर्वोक्त प्रकारसे स्वप्नावस्था में असत्यसे सत्य अर्थक्रियाका उपपादन किया गया, जागरणमें भी असत्यसे सत्य अर्थक्रिया होती है, यह भी कुछ लोगों का सम्मत पक्ष है, अब उसे कहते हैं।

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मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७१


अन्ये तु हेतुसत्यत्वापेक्षा नाऽर्थक्रियां प्रति ।
मरीचितोये तोयत्वजात्यभावान्न तत्क्रिया ॥ ५३ ॥

कुछ लोग कहते हैं—अर्थक्रियाके प्रति हेतुकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, मरु-मरीचिका जलमें अर्थक्रिया इसलिए नहीं होती है कि उसमें अवगाहनादि कार्यका कारण-तावच्छेदक जलत्व जाति नहीं है ॥५३॥

अन्ये तु पानावगाहनाद्यर्थक्रियायां जलादिस्वरूपमात्रमुपयोगि, न तद्गतं सत्यत्वम् । तस्य कारणत्वतदवच्छेदकत्वयोरभावादिति किं तेन । न चैवं सति मरुमरीचिकोदकशुक्तिरजतादेरपि प्रसिद्धोदकाद्युचितार्थक्रियाकारित्वप्रसङ्गः । 'मरीचिकोदकादावुदकत्वादिविजातिर्नास्तीति तद्विषयकभ्रमस्य उदकशब्दोल्लेखित्‍वं तदुल्लेखिपूर्वानुभवसंस्कारजन्य-

कुछ लोग कहते हैं कि जलपान और स्नान आदि अर्थक्रियामें केवल जल आदिका स्वरूप ही अपेक्षित है, जलादिकी सत्यता अपेक्षित नहीं है, क्योंकि जलादिगत सत्यतामें न तो उक्त अर्थक्रियाकी कारणता है और न तो कारणतावच्छेदकता है, इससे उसकी सत्यताका प्रकृतमें कुछ प्रयोजन नहीं है । यदि शङ्का हो कि सत्यताको यदि कारणावच्छेदक न माना जाय, तो मरुमरीचिकोदक † और शुक्ति-रजतमें भी व्यावहारिक जलके योग्य अर्थक्रियाकारिता प्रसक्त होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'मरीचिकाजल आदिमें उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, और मरु-मरीचिका-जलविषयक भ्रममें 'यह जल है' इत्याकारक जो जलावगाही प्रत्यय होता है। वह तो उदकशब्दोल्लेखि पूर्वानुभवसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे उक्त भ्रम उत्पन्न होता है—इसलिए होता है । इस प्रकारके तत्त्वशुद्धिकार आदिके मतसे मरु-मरीचिकाजल आदिमें तत्-तत् अर्थक्रियाओंके प्रति हेतुभूत ‡


† मरुभूमिमें सम्पृक्त किरणोंमें आरोपित जलको 'मरुमरीचिकोदक' कहते हैं ।
‡ व्यावहारिक जलकी पान आदि जो अर्थक्रियाएँ हैं, उनमें उदकत्व जाति प्रयोजक है, क्योंकि जलके बिना पान हो ही नहीं सकता है। इसी प्रकार प्रसिद्ध रजत आदिकी कटक, कुण्डल आदि अर्थक्रियामें भी रजतत्व आदि प्रयोजक है, क्योंकि रजतत्वादिस रहित मृत्तिका आदिसे कटक आदि नहीं हो सकते हैं, इस परिस्थितिमें प्रातिभासिक मरुमरीचिका जलमें वस्तुतः जलत्वादि अर्थक्रिया प्रयोजक धर्मोंके न रहनेसे उनसे अर्थक्रिया नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

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३७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

त्वप्रयुक्तम्' इति तत्त्वशुद्धिकारादिमते तत्तदर्थक्रियाप्रयोजकोदकत्वादिजात्य- भावादेव तदप्रसङ्गात् ।

अन्ये तु जातिरस्त्येव काचिदर्थक्रियाऽपि च ।
हेतूच्छेदेन बाधेनाऽनध्यासेन च नाऽखिला ॥५४॥

कुछ लोग कहते हैं कि मरुमरीचिका जल आदिमें उदकत्व आदि जाति है और उक्तस्थलमें कोई अर्थक्रिया भी वहाँ होती है, परन्तु हेतुके उच्छेदसे, बाधसे और अनध्याससे सम्पूर्ण अर्थक्रियाएँ नहीं होती हैं॥ ५४ ॥

तत्राप्युदकत्वादिजातिरस्ति । अन्यथा तद्वैशिष्ट्योल्लेखिभ्रमविरोधाद्, उदकार्थिनस्तत्र प्रवृत्त्यभावप्रसङ्गाच्चेति प्रातिभासिके पूर्वदृष्टसजातीयत्वव्यवहारानुरोधिनां मते क्वचिदधिष्ठानविशेषज्ञानेन समूलाध्यासनाशात्,

उदकत्व आदि जाति ही नहीं है, अतः तथाकथित प्रसिद्ध उदक आदिसे होनेवाली अर्थक्रियाओंका प्रातिभासिक जलादिसे प्रसङ्ग नहीं है, यह भाव है।

* मरीचिकाजल आदिमें भी उदकत्व आदि जातियाँ हैं। यदि उनमें उदकत्वादि जातियाँ न मानी जाँय, तो उदकत्व आदि जातियोंका अवगाहन करनेवाले भ्रमोंके साथ विरोध होगा, और दूसरी बात यह है कि जलादि के अभिलाषुओंकी प्रवृत्ति ही उन स्थलोंमें नहीं होगी †, इस प्रकारसे प्रातिभासिक पदार्थोंमें जो पूर्वदृष्ट पदार्थोंकी सजातीयता ‡ मानते हैं, उनके मतमें तत्-तत् भ्रमविषयीभूत पदार्थोंमें तत्-तत् अर्थक्रियाकारिता इसलिए नहीं होती है कि कहींपर ✕ अधिष्ठानगत विशेषांशके परिज्ञानसे समूल-अध्यासका विनाश


❀ प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें जलत्व आदि जातिका अङ्गीकार करके भी उक्त अतिप्रसङ्गका निवारण कुछ लोग करते हैं—'तत्रापि' इस ग्रन्थसे ।
† क्योंकि प्रवृत्तिके प्रति इष्टतावच्छेदकविशिष्टका ज्ञान प्रयोजक है, प्रकृत प्रातिभासिक जलादि पदार्थोंमें यदि जलत्वादि धर्मोका अङ्गीकार न किया जाय, तो इष्टतावच्छेदक जलत्वादि-वैशिष्ट्यावगाही ज्ञानके न होनेसे जलार्थीकी प्रवृत्ति ही नहीं होगी। परन्तु होती है, अतः जलत्वादि जातियाँ माननी चाहिएँ, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि प्रातिभासिक और व्यावहारिक जलमें एक जातिके न माननेपर भाष्यादिमें प्रतिभासिकाध्यासोंमें पूर्वदृष्टकी सजातीयताका जो व्यवहार किया गया है, वह भी विरुद्ध होगा, यदि प्रातिभासिक जलमें जलत्वादि न माने जाँय तो ।
✕ मनुष्य दूरसे मरीचिकामें जलकी भ्रान्तिके बाद स्नान आदिके लिए उनके पास गया, जानेके

मिथ्या पदार्थोंके अर्थक्रियाकारित्वका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३७३

क्वचिदधिष्ठानसामान्यज्ञानोपरमेण केवलाध्यासनाशात्, क्वचित् गुञ्जापुञ्जादौ चक्षुषा वह्न्याद्यध्यासस्थले दाहपाकादिप्रयोजकस्योष्णस्पर्शादेरनध्यासाच्च तत्र तत्राऽर्थक्रियाभावोपपत्तेः। क्वचित् कासांचिदर्थक्रियाणामिष्यमाणत्वाच्च। मरीचिकोदकादिव्यावर्तकस्याऽर्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तव्यत्वे च श्रुतिविरुद्धं प्रत्यक्षादिना दुर्ग्रहं त्रिकालाबाध्यत्वं विहाय दोषविशेषाजन्य रजतत्वादेरेव रजताद्युचितार्थक्रियोपयोगिरूपस्य वक्तुं शक्यत्वाच्च। तस्मान्मिथ्यात्वेऽप्य-


हुआ है, कहींपर अधिष्ठानके सामान्यांशज्ञानके उपरत होनेसे केवल अध्यास-का नाश हुआ है * और किसी स्थलमें गुञ्जा-पुञ्ज आदिमें चक्षुसे वह्नि आदिके अध्यासस्थलमें दाह, पाक अर्थक्रियाके हेतुभूत उष्णस्पर्श आदि अध्यस्त नहीं होते हैं। और किसी स्थलविशेषमें कुछ अर्थक्रियाओंका अङ्गीकार भी करते हैं †। मरीचिकाजल आदिमें न रहनेवाले अर्थात् केवल व्यावहारिक पदार्थोंमें रहनेवाले अर्थक्रियामें उपयुक्त धर्मका यदि निर्वचन करता है, तो मिथ्यात्वश्रुतिसे विरुद्ध तथा प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे ग्रहण न होनेवाले त्रिकालाबाध्यत्वरूप सत्यत्वको छोड़कर ‡ दोषविशेषसे अजन्य रजतादिवृत्ति रजतत्व आदि रजतादिकी उपयुक्त अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेद धर्म है, ऐसा कह सकते हैं। इससे अर्थोंके मिथ्या


अनन्तर उसे ज्ञात होता है कि यह जल नहीं है, किन्तु केवल मरीचिका है, इस प्रकार विशेषदर्शनसे अपने उपादान अज्ञानके साथ जलाध्यास निवृत्त होता है, अतः इससे अर्थ-क्रियाकी प्रसक्ति नहीं होती है, यह भाव है।

* जिस शुक्तिरजतादि स्थलमें विशेषदर्शन नहीं हुआ हो, उस स्थलमें अधिष्ठान-सामान्यज्ञानरूप कारणका नाश होनेसे ही उक्त स्थलमें अर्थक्रियाकारिता नहीं है, यह भाव है।

† 'स्वप्नवदिति ब्रूमः' इस ग्रन्थसे स्वप्नमें जिन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता मानी गई है, उन पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिता इष्ट है, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि अर्थक्रियाके प्रति कारणतावच्छेदक सत्यत्व है, ऐसा पूर्वमें कहा गया है, परन्तु उसे नहीं मान सकते हैं, क्योंकि सद्भूतरजतसे कटक आदि कार्य होते हैं, और तद्भिन्न शुक्तिरजतसे नहीं होते हैं, इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकसे सहकृत प्रत्यक्षसे ही अर्थक्रियाकारितावच्छेदकरूपसे सत्त्वका परिज्ञान तुम्हें करना होगा, परन्तु यह सत्त्व मिथ्यात्वका विरोधी कालत्रयाबाध्यत्वरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि उसका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः उससे पृथक् ही कहना होगा।

३७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

र्थक्रियाकारित्वसम्भवान्मिथ्यैव प्रपञ्चः, न सत्य इति ॥८।

ननु मिथ्यात्वसत्यत्वे ब्रह्मैक्यश्रुतिपीडनम् ।
तन्मिथ्यात्वे तु विश्वस्य सत्यत्वं केन वार्यते ॥५५॥

शङ्का होती है कि मिथ्यात्वको सत्य माननेसे ब्रह्मैक्यश्रुति बाधित होगी, उसके मिथ्या होनेपर भी विश्वकी सत्यता का निराकरण होगा ॥ ५५ ॥

ननु मिथ्यात्वस्य प्रपञ्चधर्मस्य सत्यत्वे ब्रह्माद्वैतक्षतेस्तदपि मिथ्यैव वक्तव्यमिति कुतः प्रपञ्चस्य सत्यत्वक्षतिः ? मिथ्याभूतं ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न निष्प्रपञ्चत्वविरोधीति त्वदुक्तरीत्या मिथ्याभूतमिथ्यात्वस्य सत्यत्वाविरोधात् ॥

सत्यमत्रोक्तमद्वैतदीपिकायां विरोधिनीम् ।
स्वधर्म्यन्यूनसत्ताकं मिथ्यात्वं सत्यतां हरेत् ॥५६॥

इस प्रश्नके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि अपने धर्मीकी अन्यून सत्ता-वाला मिथ्यात्व अपने से विरुद्ध सत्यत्वका अपहरण करता है ॥ ५६ ॥

अत्रोक्तमद्वैतदीपिकायाम्—वियदादिप्रपञ्चसमानस्वभावं मिथ्यात्वम् ।


होनेपर भी अर्थक्रियाकारिताका सम्भव होनेसे प्रपञ्च मिथ्या ही है, सत्य नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ८ ॥

अब शङ्का होती है कि प्रपञ्चमें रहनेवाला मिथ्यात्व यदि सत्य है, तो अद्वैत ब्रह्मकी क्षति होगी अर्थात् अद्वितीय ब्रह्म सिद्ध नहीं होगा, इसलिए सिद्धान्तीको उसे भी मिथ्या ही कहना होगा। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चकी सत्यताका निरास कैसे होगा ? क्योंकि ब्रह्मका मिथ्याभूत प्रपञ्चतादात्म्य ꕤ प्रपञ्चशून्यताका विरोधी नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे ही कथनके अनुसार मिथ्याभूत मिथ्यात्व सत्यत्वका विरोधी नहीं हो सकता है।

इस † आक्षेपके समाधानमें अद्वैतदीपिकामें कहा है कि मिथ्यात्वका


ꕤ प्रपञ्चतादात्म्य ही सप्रपञ्चत्व है और निष्प्रपञ्चत्व प्रपञ्चात्यन्ताभावरूप है, इस प्रकारका निष्प्रपञ्चत्व वास्तविक है, क्योंकि, व्यावहारिक प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव ब्रह्ममें पारमार्थिक माना गया है, इससे एक ब्रह्ममें सप्रपञ्चत्व और निष्प्रपञ्चत्वका विरोध नहीं है, वैसे ही मिथ्यात्व और सत्यत्वका विरोध नहीं है।

† मिथ्यात्वधर्म मिथ्याभूत ही है, इस पक्षका ग्रहण करके समाधान करते हैं—आकाश

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मिथ्याके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चमिथ्यात्व-विचार] भाषानुवादसहित ३७५


तच्च धर्मिणः सत्यत्वप्रतिक्षेपकम्। धर्मस्य स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वे हि उभयवादिसिद्धं धर्मिसमसत्त्वं तन्त्रम्, न पारमार्थिकत्वम्। अघटत्वादिप्रतिक्षेपके पटत्वादावस्माकं पारमार्थिकत्वासम्प्रतिपत्तेः। ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं न धर्मिसमसत्ताकमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेपकम्।

अत एव मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे तद्विरोधिनोऽप्रातिभासिकस्य


आकाश आदि प्रपञ्चके साथ समानस्वभाव है अर्थात् आकाश आदि पदार्थोंकी जैसी सत्ता है, वैसी ही सत्ता मिथ्यात्वकी भी है। और वह मिथ्यात्व धर्मीके सत्यत्वका विरोधी—विघातक—है, अपने विरुद्ध धर्मका विरोध करनेमें धर्मका धर्मीसे समानसत्ताकत्व वादी और प्रतिवादी दोनोंके मतमें प्रयोजक है, धर्मकी पारमार्थिकता प्रयोजक नहीं है, क्योंकि अघटत्वके प्रतिक्षेपक पटत्व आदिमें हमारे (वेदान्तीके) मतसे पारमार्थिकत्व सम्प्रतिपन्न—निश्चित—नहीं है। ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य धर्मिसमानसत्तक नहीं है, अतः निष्प्रपञ्चत्वका प्रतिक्षेपक नहीं है।

इसीसे ‡ यह भी प्रश्न निरस्त हुआ समझना चाहिए कि यदि मिथ्यात्व व्यावहारिक हो, तो उसका विरोधी अप्रातिभासिक प्रपञ्चसत्यत्व पारमार्थिक


आदि पदार्थोंकी व्यावहारिक सत्ता है, इसलिए मिथ्यात्वकी भी व्यावहारिक सत्ता होगी। इस विषयमें यदि शङ्का हो कि आरोपित घटत्व आदि आरोपाधिकरणीभूत अपने आश्रय पटादिमें विरुद्ध अघटत्व आदिके विघातक नहीं देखे जाते हैं, अतः सत्य घटत्व आदि स्वविरुद्ध धर्मोंके स्वाश्रयमें प्रतिक्षेपक होंगे? इस दशामें मिथ्याभूत मिथ्यात्व प्रपञ्चके सत्यत्वका कैसे विरोधी होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक वही धर्म होता है, जो धर्मिसमानसत्तावाला हो, इस प्रकारका उभयवादिसिद्ध एक प्रयोजक मानना चाहिए, संदिग्ध नहीं मानना चाहिए, क्योंकि परमतमें घटत्वादिकी सत्ता पारमार्थिक है, और हमारे मतमें नहीं है, अतः सत्यत्व धर्म स्वाश्रयमें स्वविरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक नहीं हो सकता है, किन्तु मूलोक्त धर्मिसमानसत्ताक धर्म ही प्रतिक्षेपक हो सकता है, यह भाव है।

‡ प्रकृतमें यह शङ्का हो सकती है कि प्रपञ्चगतमिथ्यात्वके मिथ्यात्वपक्षमें उस मिथ्यात्वको व्यावहारिक ही मानना चाहिए, क्योंकि उसकी निवृत्ति केवल ब्रह्मज्ञानसे होती है, इसलिए उसे प्रातिभासिक, या पारमार्थिक नहीं मान सकते, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी निवृत्ति ब्रह्मज्ञानके सिवा अन्य ज्ञानसे भी होती है और पारमार्थिककी कभी भी निवृत्ति नहीं होती है। और उसके व्यावहारिक होनेपर प्रपञ्चगतसत्यत्व पारमार्थिक सिद्ध होता है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षसे सिद्ध प्रपञ्चका सत्यत्व ब्रह्मज्ञान तक अनुवृत्त होता है अतः प्रातिभासिक नहीं मान सकते हैं और व्यावहारिक मिथ्यात्वधर्मसे युक्त प्रपञ्चमें सत्यत्वको व्यावहारिक नहीं मान सकते

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३७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

प्रपञ्चसत्यत्वस्य पारमार्थिकत्वं स्यादिति निरस्तम् । धर्मिसमसत्ताकस्य मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे धर्मिणोऽपि व्यावहारिकत्वनियमात् ।

स्वधर्मीक्षाऽक्षतो धर्मः स्वविरुद्धहरोऽथवा ॥

अथवा अपने धर्मीके साक्षात्कारसे निवृत्त न होनेवाला धर्म अपने विरुद्ध धर्मका अपहरण करता है ।

अथवा यो यस्य स्वविषयसाक्षात्कारानिवर्त्यो धर्मः, स तत्र स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकः । शुक्तौ शुक्तितादात्म्यं तद्विषयसाक्षात्कारानिवर्त्यम्


होगा, क्योंकि धर्मीके समान सत्तावाले मिथ्यात्वके व्यावहारिक होनेपर धर्मी भी व्यावहारिक ही होता है, ऐसा नियम है ।

अथवा * जिसका जो धर्म अपने विषयके साक्षात्कारसे निवृत्त न होता हो, वह धर्म उस धर्मीमें अपने विरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक होता है अर्थात् अपने विरुद्ध धर्मकी स्थिति नहीं होने देता है, यह भाव है । शुक्तिमें रहनेवाला शुक्तितादात्म्य शुक्तिविषयक साक्षात्कारसे निवृत्त नहीं होता है, इसलिए वह


हैं। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चगत सत्यत्व जब पारमार्थिक है, तो उसका धर्मी प्रपञ्च भी पारमार्थिक अवश्य हो सकता है, अतः ब्रह्माद्वैतकी क्षति होगी, इस प्रश्नका समाधान 'अतएव' इस ग्रन्थसे किया जाता है। तात्पर्य यह है कि मिथ्यात्वरूप धर्ममें धर्मिसमानसक्ताकत्वके आधारपर व्यावहारिकत्वका अङ्गीकार करके मिथ्यात्वाश्रय प्रपञ्चमें सत्यत्वपर्यवसायी पारमार्थिकत्वका आपादन, विरोध होनेके कारण, हो ही नहीं सकता है। यदि प्रपञ्चमें अनुभूयमानसत्यत्वका व्यावहारिकरूपसे अङ्गीकार किया जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समानसत्तावाले मिथ्यात्व और सत्यत्व एक जगहपर रहेंगे कैसे ? क्योंकि उनका विरोध है; वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब तक तत्त्वज्ञान न हो, तब तक बाधित न होनेवाले प्रत्यक्षका विषय, तथा मिथ्यात्वका अविरुद्ध सत्यत्व प्रपञ्चमें रहता है, ऐसा बार बार पूर्वमें कहा गया है, यह भाव है।

※ इस पक्षका अवलम्बन करनेवालोंका मत है कि सर्वत्र ब्रह्मसत्ता ही प्रतीत होती है, उससे भिन्न व्यावहारिक अथवा प्रातिभासिक सत्ता है ही नहीं, इसलिए 'धर्मिसमानसक्ताकत्व' आदिसे कहा गया समाधान युक्त नहीं है, अतः स्वाभिमत समाधान 'अथवा' इस ग्रन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है कि वही धर्म अपने विरोधी धर्मकी स्थितिका निवर्तक होता है, जो अपने आश्रयके प्रत्यक्षसे निवृत्त न होता हो, इसलिए स्वाश्रयसाक्षात्कारानिवर्त्यत्व ही धर्मके स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वमें प्रयोजक है, यह फलित है। पारमार्थिकत्व या धर्मिसमानसक्ताकत्व प्रयोजक नहीं है, शुक्ति रजतमस्थलमें शुक्तित्व धर्मकी शुक्तिका साक्षात्कार होनेपर भी निवृत्ति नहीं होती है, इसलिये शुक्तित्व धर्म अशुक्तित्वविरोधी है, यह सर्वानुभवसिद्ध है, अतः इस प्रयोजकके स्वीकार करनेमें विरोध नहीं है, यह भाव है।

[मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७७


अशुक्तित्वस्य विरोधी, तत्रैव रजततादात्म्यं तन्निवर्त्यमरजतत्वाविरोधीति व्यवस्थादर्शनात् । एवं च प्रपञ्चमिथ्यात्वं कल्पितमपि प्रपञ्चसाक्षात्कार-निवर्त्यमिति सत्यत्वप्रतिक्षेपकमेव । ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं तु ब्रह्मसाक्षात्कारा-निवर्त्यमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेकमिति ।

शाब्दप्रामाण्ययोग्यत्वसत्त्वं लौकिकमप्यलम् ॥ ५७ ॥

शाब्दज्ञान प्रामाण्य और शब्दकी योग्यता में व्यावहारिक सत्त्वसे भी पारमार्थिक ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है ॥५७॥

एतेन शब्दगम्यस्य ब्रह्मणः सत्यत्वे शब्दयोग्यतायाः, शाब्दधी-प्रामाण्यस्य च सत्यत्वं वक्तव्यम् । प्रातिभासिकयोग्यतावताऽनाप्तवाक्येन व्यावहारिकार्थस्य व्यावहारिकयोग्यतावताऽग्निहोत्रादिवाक्येन तात्त्विकार्थस्य


अशुक्तित्वका—रजतत्वका—विरोधी है, और इसी स्थलमें जो रजततादात्म्य है, वह शुक्तिके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, अतः शुक्तित्वका विरोधी नहीं हो सकता है। ऐसा होनेपर यद्यपि प्रपञ्चका मिथ्यात्व कल्पित है, तथापि प्रपञ्चसाक्षात्कार-से निवृत्त नहीं होता है, इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंसे स्वाश्रय साक्षात्कारसे अनिवर्त्य धर्म स्वाश्रयमें अपनेसे विरुद्ध धर्मकी स्थितिमें विरोधी है ऐसा निश्चित होनेपर सत्यत्वका विरोधी ही है, ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य ब्रह्मके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, इससे प्रपञ्चतादात्म्य निष्प्रपञ्चत्वका विरोधी नहीं है।

इसीसे अर्थात् वक्ष्यमाण हेतुसे यह भी शङ्का निरस्त हुई कि यदि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे ज्ञेय ब्रह्म सत्य है, तो शब्दकी योग्यताको † और शब्दज्ञानके प्रामाण्यको भी सत्य कहना चाहिए, क्योंकि प्रातिभासिक योग्यतासे युक्त अनाप्त पुरुषके वाक्यसे व्यावहारिक अर्थ और व्यावहारिक योग्यतावाले 'अग्निहोत्रं जुहोति' (अग्निहोत्र होम करे) इत्यादि वाक्योंसे तात्त्विक अर्थकी


† बाध निश्चयका अभाव योग्यता है, वह शाब्दबोधमें कारण है। जैसे 'जलेन सिञ्चति' जलसे सिञ्चन करता है, इत्यादि स्थलमें सिञ्चनकरणताके बाधका निश्चय नहीं है, अतः इससे शाब्दबोध होता है और 'वह्निना सिञ्चति' (अग्निसे सिञ्चन करता है) इस स्थलमें वह्निमें सिञ्चन-करणताका बाध निश्चित है, इसलिए इस वाक्यसे शाब्द बोध नहीं होता है। प्रकृतमें जिस उपनिषद् वाक्यसे ब्रह्मका बोध होगा उस उपनिषद्-वाक्यकी योग्यता अवश्य अपेक्षित है, अन्यथा उससे ब्रह्मज्ञान हो ही नहीं सकेगा, इस परिस्थितिमें द्वैतापत्ति दोष देते हैं ।

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३७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद

वा सिद्धयभावेन योग्यतासमानसत्ताकस्यैव शब्दार्थसिद्धिनियमात् । अर्थाबाधरूपप्रामाण्यस्याऽसत्यत्वे अर्थस्य सत्यत्वायोगाच्च । तथा च ब्रह्मातिरिक्तसत्यवस्तुसत्त्वेन द्वैतावश्यम्भाव इति वियदादिप्रपञ्चोऽपि सत्योऽस्त्विति निरस्तम् ।

व्यावहारिकस्याऽर्थक्रियाकारित्वस्य व्यवस्थापितत्वेन व्यावहारिकयोग्यताया अपि सत्यब्रह्मसिद्धिसम्भवात् । ब्रह्मपरे वेदान्ते सत्यादिपदसत्त्वाद् ब्रह्मसत्यत्वसिद्धेः । अग्निहोत्रादिवाक्ये तादृशपदाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि प्रबलब्रह्माद्वैतश्रुतिविरोधात् तदसिद्धिरित्येव वैषम्योपपत्तेः । शब्दार्थयोग्यतयोः समानसत्ताकत्वनियमस्य निष्प्रमाणकत्वात् । घटज्ञान-


सिद्धि न होनेके कारण योग्यतासमानसत्ताक शब्दार्थकी ‡ सिद्धि होती है, यह नियम प्राप्त होता है और अर्थाबाधरूप * प्रामाण्यके असत्य होनेपर अर्थ भी सत्य नहीं हो सकता है, इस अवस्थामें ब्रह्मसे पृथक् योग्यता आदि अबाधित अर्थोका अस्तित्व होनेपर द्वैत ही सिद्ध होगा, इससे आकाशादि प्रपञ्चमें भी सत्यत्व प्रसक्त होगा ।

व्यावहारिक प्रपञ्चकी अर्थक्रियाकारिताका अद्वैतवादमें अङ्गीकार होनेसे उसी व्यावहारिक योग्यतासे सत्य—त्रिकालाबाधित—ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है । ब्रह्मपरक वेदान्तोंमें सत्यादि पदोंके होनेसे ब्रह्मकी सत्यता सिद्ध होती है । और 'अग्निहोत्रं जुहोति' इत्यादि वाक्योंमें सत्यादि पदोंके न रहनेसे अग्निहोत्रादि त्रिकालाबाधित सिद्ध नहीं होते हैं । यदि अग्नि होत्रादि प्रकरणमें सत्यादि पद हैं, तो भी प्रबल ब्रह्माद्वैत श्रुतिका विरोध होनेसे अग्निहोत्रादिकी सत्यता सिद्ध नहीं होती है, इस प्रकार वैषम्यकी उपपत्ति होती है । शब्दार्थ और योग्यताके समानसत्ताकत्वके नियममें कोई प्रमाण भी नहीं है । जैसे घट-


‡ जैसी योग्यताकी सत्ता होगी, वैसी ही सत्तासे युक्त शब्दार्थकी सिद्धि होगी, यह नियम अवश्य मानना चाहिए, अन्यथा प्रातिभासिक योग्यतावाले शब्दसे भी व्यावहारिक अर्थकी सिद्धि हो जायगी, यह भाव है ।

  • जिस ज्ञानके विषयका बाध होता है, वह ज्ञान प्रमाण नहीं माना जाता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञान, अतः वही ज्ञान प्रमाण है, जिसका अर्थ बाधित न होता हो, इसलिए अर्थाबाध अर्थात् अबाधितार्थत्वरूप ही प्रामाण्य है, यह भाव है ।

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मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७९

प्रामाण्यस्याऽघटत्ववत् सत्यभूतब्रह्मज्ञानप्रामाण्यस्याऽपि तदतिरिक्तघटितत्वेन मिथ्यात्वोपपत्तेश्च। तस्माद् (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६) आरम्भणाधिकरणोक्तन्यायेन कृत्स्नस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं वज्रलेपायते ॥ ९ ॥

न जीवैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणस्तदभेदतः ।
तेषां च भोगसाङ्कर्यं वारणीयमुपाधिभिः ॥ ५८ ॥

जीवों को लेकर ब्रह्ममें द्वैतत्व प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, और उनके भोगके साङ्कर्य का परिहार उपाधिके आधारपर करना चाहिए ॥ ५८ ॥

ननु आरम्भणशब्दादिभिरचेतनस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्व-सिद्धावपि चेतनानामपवर्गभाजां मिथ्यात्वायोगाद् अद्वितीये ब्रह्मणि

ज्ञानके प्रामाण्यमें अघटत्वका, वैसे ही सत्यात्मक ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यमें * ब्रह्म-भिन्न ब्रह्मत्वका सम्बन्ध होनेसे मिथ्यात्वकी उपपत्ति है। इससे आरम्भणाधिकरणमें † कहे गये सिद्धान्तके अनुसार सम्पूर्ण आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या ही है ॥९॥

यदि यह शङ्का हो कि आरम्भणाधिकरणके सिद्धान्तके अनुसार अचेतन आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या हो सकता है, परन्तु मुक्त चेतन जीवोंमें मिथ्यात्व-का सम्बन्ध न होनेसे अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वय नहीं हो सकता है, और पूर्वमें


* ब्रह्मत्वाधिकरण ब्रह्ममें ब्रह्मत्वप्रकारक अनुभवत्वरूप जो ब्रह्मज्ञानका प्रामाण्य है, वह ब्रह्मसे भिन्न ब्रह्मत्वके सम्बन्धसे युक्त है, अतः वह भी मिथ्या ही है, यह भाव है। यदि कहा जाय कि ब्रह्मज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य अबाधितार्थानुभवत्वरूप है, और केवल योग्य विषयस्वरूपमें उसका पर्य्यवसान है। वह प्रामाण्य अखण्डार्थक वेदान्तोंमें ब्रह्मरूप ही है, तदतिरिक्त घटित नहीं है, इसलिए वह सत्य ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसके सत्य होनेपर भी कोई दोष नहीं है, कारण कि वह केवल ब्रह्मस्वरूप ही है, अतः इससे भी ब्रह्मातिरिक्त सत्य वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है।

† तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः 'ब्रह्मरूप अभिन्ननिमित्तोपादान कारणसे यह कार्य अलग नहीं है' क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेव सत्यम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'ब्रह्मैवेदम्' (विकार केवल वाचारम्भण ही है मृत्तिका सत्य है—अर्थात् कारण सत्य है, यह सब सत्य-रूप है, यह सब ब्रह्म ही है) इत्यादि श्रुति प्रमाण है, यह सूत्रका अर्थ है। इसका अधिक विस्तार अच्युतग्रन्थमालामुद्रित ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यरत्नप्रभा भाषानुवादमें देखना चाहिए [पृ० १००० द्वितीय खण्ड]।

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३८०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ द्वितीय परिच्छेद

समन्वयो न युक्तः। न च तेषां ब्रह्माभेदः प्रागुक्तो युक्तः, परस्परं- भिन्नानां तेषाम् एकेन ब्रह्मणाऽभेदासम्भवात् । न च तद्भेदासिद्धिः । सुखदुःखादिव्यवस्थया तत्सिद्धेरिति चेद्, न ; तेषामभेदेऽपि उपाधिभेदा- देव तद्व्यवस्थोपपत्तेः ॥ १० ॥

नन्वन्यभेदादन्यस्य कथं साङ्कर्यवारणम् ।

यदि शङ्का हो कि दूसरे के भेदसे दूसरे का भोगसाङ्कर्य कैसे परिहृत होगा ?

ननु उपाधिभेदेऽपि तदभेदानपायात् कथं व्यवस्था । नह्याश्रय- भेदेनोपपादनीयो विरुद्धधर्मसाङ्करस्तदतिरिक्तस्य कस्यचिद्भेदोपगमेन सिध्यति ।

अत्राहुरन्यताऽसङ्गे भोक्तृतादात्म्यकल्पनात् ॥ ६९ ॥

इसके परिहारमें कहते हैं कि अन्यत्व है ही नहीं, क्योंकि असङ्ग आत्मामें भोक्तृ- तादात्म्य कल्पित है ॥ ६९ ॥

अत्र केचिदाहुः—सिध्यत्येवाऽन्तःकरणोपाधिभेदेन सुखदुःखादिव्य-

उनके साथ ब्रह्मका जो अभेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो परस्पर भिन्न हैं, उनका एक ब्रह्मके साथ अभेद नहीं हो सकता है । और भेदकी असिद्धि है, यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि सुख और दुःख आदिकी व्यवस्थासे उसकी सिद्धि है । तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उन अपवर्गभागी जीवोंका वस्तुतः ब्रह्मके साथ अभेद ही है, तथापि उपाधिके बलसे उनका भेद हो सकता है ॥१०॥

यदि शङ्का हो कि उपाधिके भिन्न होनेपर भी आत्माके अभेदका विनाश न होनेके कारण सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था कैसे होगी ? क्योंकि जिन विरुद्ध धर्मोंके असाङ्कर्यका—आश्रयके भेदसे—उपपादन करना है, उनकी किसी भिन्न वस्तुके भेदसे उपपत्ति कैसे हो सकती है ?

इस * आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—अन्तःकरणरूप उपाधि-


* अन्तःकरण ही कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है और 'अहम्' अनुभवका गोचर है, आत्मा नहीं, क्योंकि वह कूटस्थ है, इसलिए आश्रयके भेदसे व्यवस्था हो सकती है, यह 'केचित्' पक्षका भाव है ।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भाषानुवादसहितं ३८१


वस्था । ‘कामस्संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्ये- तत्सर्वं मंन एव’ ‘विज्ञानं यज्ञं तनुते’ इत्यादिश्रुतिभिस्तस्यैव निखिला- नर्थाश्रयत्वप्रतिपादनात् । ‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ ‘असङ्गो नहि सज्जते’ इत्यादिश्रुतिभिः चेतनस्य सर्वात्मनौदासीन्यप्रतिपादनाच्च ।

न चैवं सति कर्तृत्वादिबन्धस्य चैतन्यसामानाधिकरण्यानुभवविरोधः । अन्तःकरणस्य चेतनतादात्म्येनाध्यस्ततया तद्धर्माणां चैतन्यसामानाधि- करणाऽनुभवोपपत्तेः । न चाऽन्तःकरणस्य कर्तृत्वादिबन्धाश्रयत्वे चेतनः


भेदसे सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था सिद्ध ही है, क्योंकि ‘कामस्संकल्पो०’ (इच्छा, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय ये सब अन्तःकरणके परिणाम होनेसे मन ही हैं) ‘विज्ञानं यज्ञं तनुते’ (अन्तःकरण शास्त्रीय कर्म करता है) इत्यादि श्रुतियाँ उसी अन्तःकरणका सम्पूर्ण अनर्थोंके आश्रयरूपसे प्रतिपादन करती हैं। और ‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (सर्वदा चैतन्यात्मा ब्रह्म असङ्ग—किसी धर्म विशेषका आश्रय नहीं है) ‘असङ्गो नहि सज्जते’ (असङ्ग होनेके कारण आत्मा किसी पदार्थसे सम्बद्ध नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियाँ चेतन ब्रह्ममें सर्वथा औदासीन्यका ही प्रतिपादन करती हैं।

यदि यह शङ्का हो कि अन्तःकरण ही सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका यदि आश्रय माना जाय, तो ‘मैं कर्ता हूँ’ ‘मैं भोक्ता हूँ’ इत्यादिरूपसे जो कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका चैतन्यके साथ सामानाधिकरण्य अनुभूत होता है, वह बाधित होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणका जो अध्यास हुआ है, वह चेतनके साथ तादात्म्यरूपसे हुआ है, अतः अन्तःकरणके धर्मोंका चैतन्यके सामानाधिकरण्य-रूपसे भान होता है †। यदि यह शङ्का हो कि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका आश्रय यदि अन्तःकरण ही है, तो चेतन आत्मा संसारका भागी नहीं होगा


† तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा चैतन्यरूप है, तथापि भेदकल्पनासे चैतन्य आत्माके धर्मरूपसे भासता है, वैसे ही आत्मा और अन्तःकरणका ऐकयाध्यास होनेसे उनके धर्मोंका अर्थात् चैतन्य, कर्तृत्व आदिका सामानाधिकरण्य भासता है इस प्रक्रियासे उक्त अनुभवके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।

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३८२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

संसारी न स्यादिति वाच्यम्, कर्तृत्वादिबन्धाश्रयाहङ्कारग्रन्थिातादात्म्याध्यासाधिष्ठानभाव एव तस्य संसारः' इत्युपगमात् । तावतैव भीषणत्वाश्रयसर्पतादात्म्याध्यासाधिष्ठाने रज्ज्वादौ 'अयं भीषणः' इत्यभिमानवद् आत्मनोऽनर्थाश्रयत्वाभिमानोपपत्तेः । एतदभिप्रायेणैव 'ध्यायतीव लेलायतीव' 'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते' इत्यादि-श्रुतिस्मृतिदर्शनाच्च ।

न चैकस्मिन्नेवाऽऽत्मनि विचित्रसुखदुःखाश्रयतत्तदन्तःकरणानामध्या-

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चके आश्रयीभूत * अहङ्कार (अन्तःकरण) के साथ ग्रन्थिरूप तादात्म्यके अध्यासका जब आत्मा अधिष्ठान भाव है, तभी वही आत्माका संसार है, ऐसा स्वीकार किया गया है। उपाधि ही संसारकी आश्रय है, इसीसे † जैसे भयकारणत्वके आश्रयीभूत सर्पके तादात्म्याध्यासके अधिष्ठानभूत रस्सीमें 'यही भय हेतु है' इस प्रकार अभिमान होता है, वैसे ही आत्मा (अन्तःकरणतादात्म्याध्यासाधिष्ठान होनेसे) अनर्थका आश्रय है, यह अभिमानमात्र (भ्रान्तिमात्र) है। बुद्धिका ही संसार आत्मामें आरोपित है, इसी भावसे—'ध्यायतीव०' (बुद्धिके ध्यान करनेसे मानो आत्मा ध्यान करता है, बुद्धिके चलनेपर आत्मा मानो चलता है, ऐसा प्रतीत होता है) 'अहङ्कार०' (कर्तृत्वाश्रय अहङ्कारके साथ तादात्म्यापन्न होनेसे ही आत्मा अपनेको कर्ता मानता है) इस प्रकारकी श्रुति-स्मृतियाँ देखी जाती हैं।

यदि ‡ शङ्का हो कि बुद्धिके धर्मोंकी व्यवस्था होनेपर भी विचित्र सुख, दुःखके आश्रयीभूत तत्-तत् अन्तःकरणोंका एक ही आत्मामें अध्यास होनेसे


* चेतन स्वतः संसारका आश्रय नहीं है, तथापि बुद्धिमें रहनेवाले संसारका, (जो कि साक्षीसे अनुभूत है,) उसमें आरोप हो सकता है, इसलिए आरोपित संसाराश्रयत्व आत्मामें है, यह भाव है।

† तावतैव—केवल उपाधिके संसाराश्रयत्व होनेसे प्रकृतमें यदि शङ्का हो कि अन्यनिष्ठ संसारका आत्मामें आरोप यदि माना जाय, तो अन्यथाख्याति प्रसक्त होगी ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अनुभूयमान आरोपस्थलमें आरोप और अधिष्ठानके अनिर्वचनीय संसर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, अन्यथाख्यातिवादमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जाती है, यह वैषम्य है।

‡ बुद्धि स्वतः संसारकी आश्रय है और आत्मामें संसारकी केवल भ्रान्ति है, इस व्यवस्थाको

जीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८३

स्याद् आत्मन्याभिमानिकसुखदुःखादिव्यवस्थैवमपि न सिध्यतीति वाच्यम्, आध्यासिकतादात्म्यापन्नान्तःकरणगतानर्थजातस्येव तद्गतपरस्परभेदस्यापि अभिमानत आत्मीयतया आत्मनो यादृशमनर्थभाक्त्वम्, तादृशेन भेदेन तद्व्यवस्थोपपत्तेः ।

एतेन सुखदुःखादीनामन्तःकरणधर्मत्वेऽपि तदनुभवः साक्षिरूप इति तस्यैकत्वात् सुखदुःखानुभवरूपभोगव्यवस्था न सिध्यतीति निरस्तम् ।

तत्तदन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या तत्तदन्तःकरणभेदेन भेदवत एव साक्षिणस्तत्तदन्तःकरणसुखदुःखानुभवरूपत्वेन तद्व्यवस्थाया अप्युपपत्तेरिति ।

आत्मामें आभिमानिक सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासप्राप्त तादात्म्यसे युक्त अन्तःकरणमें रहनेवाले अनर्थ समुदायके समान उस अन्तःकरणमें रहनेवाले पारस्परिक भेद भी अभिमानसे आत्माके सम्बन्धी होते हैं अर्थात् आत्मामें आ जाते हैं, इसलिए आत्मामें जैसे अनर्थकी व्यवस्था होती है, वैसे ही अन्तःकरणके भेदसे जीवमें भेदकी व्यवस्था हो सकती है ।

यदि किसीको यह शङ्का हो कि भले ही सुख, दुःख आदि अन्तःकरणके धर्म हों, परन्तु अनुभव तो साक्षीरूप है, इसलिए साक्षीके एक होनेसे सुख-दुःखका अनुभव जो व्यवस्थितरूपसे देखा जाता है, वह नहीं * होगा ? तो यह शङ्का भी वक्ष्यमाण हेतुसे निरस्त हुई समझनी चाहिए, क्योंकि तत्-तत् अन्तःकरणके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हुआ साक्षी तत्-तत् अन्तःकरणोंके भेदसे भेदवान् होकर ही उन-उन अन्तःकरणोंमें रहनेवाले सुखदुःख आदिका अनुभवरूप होता है, इसलिए उक्त व्यवस्था भी उपपन्न हो † सकती है ।


मानने पर प्रतिशरीर बुद्धिके भेदसे बुद्धिगत धर्मोंकी व्यवस्था हो सकती है, परन्तु प्रतिशरीर आत्माका भेद न होनेसे आत्माके प्रपञ्चकी व्यवस्था नहीं हो सकती है ? यह शङ्काका भाव है, समाधानका यह भाव है कि बुद्धिगत संसारका जैसे आत्मामें आरोप होता है, वैसे बुद्धिमें रहनेवाले भेदका भी आत्मामें आरोप होता है, इसलिए उक्त अव्यवस्था नहीं है ।

* अर्थात् सुख और दुःखका अनुभव साक्षीरूप है, इसलिए उसके एक होनेसे देवदत्तका सुखानुभव यज्ञदत्तका भी सुखानुभव होगा, इस परिस्थितिमें जिस समय देवदत्तको सुखका अनुभव हुआ, उसी समयमें उसी देवदत्तके सुखानुभवको लेकर यज्ञदत्तको भी 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार अनुभव होना चाहिए, यह शङ्काका भाव है ।

† अर्थात् जैसे अन्तःकरणका भेद आत्मामें अध्यस्त होता है, वैसे ही उसका भेद साक्षीमें

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३८४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्ये भोक्ता चिदाभासः कूटस्थैक्येन कल्पितः ।
अतो न भिन्नगामित्वामित्याहुर्बन्धमोक्षयोः ॥ ६० ॥

कुछ लोग कहते हैं कि कूटस्थके तादात्म्यरूपसे कल्पित चिदाभास ही भोक्ता है, अतः बन्ध और मोक्षका वैयधिकरण्य नहीं है ॥ ६० ॥

अन्ये तु जडस्य कर्तृत्वादिवन्धाश्रयत्वानुपपत्तेः 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वाद्' इति चेतनस्यैव तदाश्रयत्वप्रतिपादकसूत्रेणान्तःकरणे चिदाभासो बन्धाश्रयः । तस्य चाऽसत्यस्य बिम्बाद्भिन्नस्य प्रत्यन्तःकरणभेदाद्विद्वदविद्वत्सुखिदुःखिकर्त्रकर्त्रादिव्यवस्था । न चैवमध्यस्तस्य वन्धाश्रयत्वे बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः । अस्य चिदाभास्यान्तःकरणावच्छिन्ने स्वरूपतस्सत्यतया मुक्त्यन्वयिनि परमार्थजीवेऽध्यस्ततया कर्तृत्वाश्रयचिदाभासतादात्म्याध्यासाधिष्ठानभावस्तस्य बन्ध इत्यभ्युपगमादित्याहुः ।

कुछ लोग ‡ कहते हैं कि जड़ अन्तःकरण कर्तृत्व आदि धर्मोंका आश्रय नहीं हो सकता है, इसलिए 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' इस—चेतनमें कर्तृत्वादि धर्मोंका प्रतिपादन करनेवाले—सूत्रके आधारपर अन्तःकरणमें पड़ा हुआ चैतन्याभास (चैतन्यप्रतिविम्ब) कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है । बिम्बसे भिन्न मिथ्यारूप उस प्रतिबिम्बका प्रत्येक अन्तःकरणमें भेद होनेके कारण विद्वान् और अविद्वान्, सुखी और दुःखी, कर्ता और अकर्ता आदिकी व्यवस्था हो सकती है । यदि शङ्का हो कि बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद माननेपर जो अध्यस्त चैतन्य है, वह बन्धका (कर्तृत्वादि प्रपञ्चका) आश्रय होगा और अनध्यस्त बिम्बचैतन्य मोक्षका आश्रय होगा, इस अवस्थामें बन्ध और मोक्षका सामानाधिकरण्य नहीं होगा ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह चिदाभास अन्तःकरणावच्छिन्न पारमार्थिक जीवमें, जो ख—


भी अध्यस्त होता है, इसलिए तथाकथित अव्यवस्थाका आपादन नहीं हो सकता है, यह समाधानका भाव है ।

‡ आत्माके ऐक्यपक्षमें यह अन्य समाधान कहते हैं, जड़ अन्तःकरण कर्ता नहीं है, किन्तु आत्मा है, इसमें 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ अधि० १४ सूत्र ३३) यह सूत्र प्रमाण है, क्योंकि इस सूत्रमें कर्ता आत्मा ही है बुद्धि (अन्तःकरण) नहीं है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है ।

जीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८५


अन्ये विशिष्टो भोक्ताऽत्र संशुद्धो मुक्तिसङ्गतः ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तमित्यादिश्रुतिदर्शनात् ॥ ६१ ॥

अन्य लोग कहते हैं कि विशिष्ट आत्मा भोक्ता है और शुद्ध आत्मा मुक्तिका भागी है, क्योंकि 'आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्' इत्यादि श्रुति देखी जाती है ॥ ६१ ॥

अपरे तु—
'आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ।'
इति सहकारित्वेन देहेन्द्रियैः तादात्म्येन मनसा च युक्तस्य चेतनस्य भोक्तृत्वश्रवणादन्तःकरणभेदेन तद्विशिष्टभेदाद् व्यवस्था । न चैवं विशिष्टस्य बन्धः, शुद्धस्य मोक्ष इति वैयधिकरण्यम्, विशिष्टगतस्य बन्धस्य विशेष्येऽनन्वयाभावाद् विशिष्टस्यानतिरेकादित्याहुः ।

कोई लोग कहते हैं कि * 'आत्मेन्द्रिय०' (देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य भोक्ता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं) इस प्रकारकी श्रुतिसे यही ज्ञात होता है कि सहकारित्वरूपसे देह और इन्द्रियोंसे युक्त तथा तादात्म्यरूपसे अन्तःकरणसे युक्त चैतन्य ही भोक्ता है, इससे अन्तःकरणके भेदसे ही अन्तःकरणविशिष्ट चेतनका भेद होनेसे सुखित्व, दुःखित्व आदिकी व्यवस्था होती है । इसमें यदि शङ्का हो कि विशिष्टमें † बन्ध है और शुद्धमें मोक्ष है, इसलिए संसार और मोक्षका वैयधिकरण्य ही है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विशिष्टमें रहनेवाला बन्ध विशेष्यमें अन्वित होता है, क्योंकि विशिष्ट विशेष्यसे भिन्न ‡ नहीं है ।


* सब शरीरोंमें यद्यपि चिदात्मा एक है, तथापि केवल वही संसारका आश्रय नहीं है, किन्तु बुद्धिविशिष्ट चिदात्मा उसका आश्रय है । और बुद्धिविशिष्ट चिदात्माके प्रतिशरीर भिन्न होनेके कारण सुख-दुःखादिका साङ्कर्य नहीं है, इस प्रकार अन्यमतवाले कहते हैं, यह भाव है ।

† शङ्काका भाव यह है कि बुद्धिविशिष्ट आत्मा केवल आत्मासे भिन्न है, क्योंकि विशिष्ट शुद्ध नहीं है, ऐसी प्रतीति होती है, कारण कि विशिष्टमें रहनेवाला शुद्धप्रतियोगिक भेद विशेष्यमें रहता है, यह नियम है, इस अवस्थामें विशिष्टात्मगत संसारका विशेष्यमें सम्बन्ध होनेपर भी मुक्तिमें अन्वित केवल चैतन्यमें संसारके न होनेसे वैयधिकरण्य तदवस्थ है ।

‡ तात्पर्य यह है कि विशिष्ट और शुद्धमें कोई भेद नहीं है, लोकमें दण्डसे युक्त पुरुषमें शुद्ध पुरुषका अभेद प्रत्यभिज्ञात होता है अर्थात् वही पुरुष है, इस प्रकार शुद्ध पुरुषका अवगाहन करनेवाली प्रत्यभिज्ञा होती है और इस प्रत्यभिज्ञामें कोई बाधक भी नहीं है, इसलिए

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३८६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

परे कर्तृमनःसङ्गाद्भोक्तृताऽन्या प्रकल्प्यते ।
स्फटिकेण्विव लौहित्यं श्रोत्रवत्तद्व्यवस्थितिः ॥ ६२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि कर्तृरूप मनके सान्निध्यसे आत्मामें अन्य भोक्तृता कल्पित है, जैसे कि जपाकुसुमके सान्निध्यसे स्फटिकमें अन्य ही लौहित्य कल्पित होता है, श्रोत्रके समान व्यवस्था हो सकती है ॥ ६२ ॥

इतरे तु अस्तु केवलश्चेतनः कर्तृत्वादिबन्धाश्रयः । स्फाटिकरौहित्यन्यायेनाऽन्तःकरणस्य, तद्विशिष्टस्य वा कर्तृत्वाद्याश्रयस्य सन्निधानाच्चेतनेऽपि कर्तृत्वाद्यन्तरस्याऽध्यासोपगमात् । न च तस्यैकत्वाद् व्यवस्थाऽनुपपत्तिः, उपाधिभेदादेव तदुपपत्तेः । न चाऽन्यभेदादन्यत्र विरुद्धधर्म-

अन्य लोग कहते हैं कि केवल चैतन्य ही कर्तृत्वादि प्रपञ्चका आश्रय है । स्फटिकलौहित्यन्यायसे x अन्तःकरणके अथवा अन्तःकरणविशिष्ट कर्तृत्वादि-के आश्रयीभूत चैतन्यके सन्निधानसे चेतनमें भी अन्य कर्तृत्वादि धर्म अध्यस्त हो सकते हैं । यदि शङ्का हो कि चैतन्यके एक होनेसे कोई सुखी, कोई दुःखी है, आदि व्यवस्था नहीं होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपाधिके भेदसे ही उक्त व्यवस्था हो सकती है । पुनः यदि शङ्का हो कि अन्यके भेदसे अन्यत्र विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह


विशिष्टके अन्तर्गत विशेष्यका और शुद्धका परस्पर अभेद स्वाभाविक है और भेद काल्पनिक है, प्रकृतमें विशिष्ट आत्मामें रहनेवाले बन्धका शुद्धमें भी अन्वय होता है, अतः संसार और मोक्षके वैयधिकरण्यका संभव नहीं है, यह भाव है।

x जैसे लौहित्य (रक्तरूप) के आश्रयीभूत जपाकुसुमके सन्निधानसे स्फटिकमें उपाधिगत लौहित्यसे अन्य प्रतिबिम्बभूत लौहित्य उत्पन्न होता है, वैसे ही चिदात्मामें अन्तःकरण आदिमें रहनेवाले संसारसे अन्य ही विलक्षण अध्यासत्मक कर्तृत्वादि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है, यह तात्पर्य है। यदि शङ्का हो कि साक्षीद्वारा अन्तःकरण आदिमें अनुभूयमान प्रपञ्चका ही चिदात्मामें संसर्गाध्यास माननेसे वैयधिकरण्यशङ्काका समाधान हो सकता है, फिर बुद्धि आदिमें रहनेवाले प्रपञ्चके सदृश अन्य प्रपञ्चकी उत्पत्ति माननेमें कोई प्रमाण ही नहीं है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'बुद्धेर्गुणेन...आऽऽराग्रमात्रो ह्यवरः' (अन्तःकरणके गुणसे जीव आराके अग्र भागके समान अर्थात् अत्यल्पपरिमाण है) इस श्रुतिसे बुद्धिके गुणसे ही जीवमें अल्पपरिमाणका प्रतिपादन किया गया है, इस न्यायसे बुद्धिधर्मके सदृश कर्तृत्वादिकी भी आत्मामें उपपत्ति हो सकती है, अतः उक्त कल्पना प्रमाणशून्य नहीं है, यह भाव है ।

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जीवोपाधिभेद-विचार] भाषांनुवादसहित ३८७


व्यवस्था न युज्यते इति वाच्यम्, मूलाग्ररूपोपाधिभेदमात्रेण वृक्षे संयोगतदभावव्यवस्थादर्शनात् । तत्तत्पुरुषकर्णपुटोपाधिभेदेन श्रोत्रभावमुपगतस्याऽऽकाशस्य तत्र-तत्र शब्दोपलम्भकत्वानुपलम्भकत्वतारमन्द्रेष्टानिष्ट-शब्दोपलम्भकत्वादिवैचित्र्यदर्शनाच्चेत्याहुः ।

एके त्वनाश्रितोपाधिभेदभेदप्रकल्पनम् ।
प्रतिबिम्बेष्विवोपाधिधर्माध्यासव्यवस्थितिः ॥ ६३ ॥

अनाश्रित उपाधिभेद भेदका कल्पक है, और प्रतिबिम्बोंमें उपाधिधर्मोंकी व्यवस्थाके समान प्रकृतमें भी व्यवस्था हो जाती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥६३॥

एके तु यद्याश्रयभेदादेव विरुद्धधर्मव्यवस्थोपपादननियमः, तदा

भी युक्त नहीं है, क्योंकि मूल और अग्ररूप उपाधिके भेदसे ही एक वृक्षमें संयोग और संयोगाभावकी व्यवस्था देखी जाती है*। और इसी प्रकार तत्-तत् पुरुषोंके कर्णपुटरूप उपाधिके भेदसे श्रोत्रेेन्द्रियत्वको† प्राप्त हुए आकाशमें तत्-तत् स्थलमें शब्दके उपलम्भकत्व और अनुपलम्भकत्व तथा तार, मन्द्र, इष्ट और अनिष्ट शब्दके उपलम्भकत्व आदि वैचित्र्य देखे जाते हैं ।

कुछ लोग तो कहते हैं कि यदि आश्रयके भेदसे ही विरुद्ध धर्मोंकी व्यवस्था उपपादित होती है, यह नियम है, तो अन्तःकरणसे उपहित निष्कृष्ट


* तात्पर्य यह है कि संयोग और संयोगाभाव अव्याप्यवृत्ति है अर्थात् अपने अभावाधिकरणमें भी उनकी स्थिति रहती है, वृक्षमें संयोग भी है और उसका अभाव भी है, परन्तु उनमें अवच्छेदक अलग अलग हैं, संयोगके अवस्थानमें शाखा अवच्छेदक है और संयोगाभावके अवस्थानमें मूल अवच्छेदक है, इसी रीतिसे उपाधिके (अवच्छेदकके) भेदसे एक आत्मामें सुखित्व और दुःखित्वकी व्यवस्था हो सकती है ।

† कर्णपुटसे—कर्णविवरसे अवच्छिन्न आकाश ही श्रोत्र-इन्द्रिय है, अन्य आकाश श्रोत्रेेन्द्रिय नहीं है, इसीलिए श्रोत्र पदार्थके निर्वचनमें 'कर्णविवरावच्छिन्नाकाशः श्रोत्रम्' ऐसा कहा गया है ।

तार शब्द—नाद विशेषका वाची है, इस विषयमें सङ्गीतरत्नाकरमें इस प्रकारका विवरण मिलता है—

नादोऽतिसूक्ष्मः सूक्ष्मश्च... ... ...
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विदुः ।
जातः प्राणाग्निसंयोगत्तेन नादोऽभिधीयते ॥६॥
व्यवहारे त्वसौ त्रेधा हृदि मन्द्रोऽभिधीयते ।
कण्ठे मध्यो मूर्ध्नि तारो द्विगुणश्चोत्तरोत्तरः ॥७॥
[ संगीतरत्नाकर स्वराध्याय प्रकरण तृतीय ]