संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गन्ध बहुत प्रिय है इसलिये कस्तूरीके चन्दन और कचनारके फूलोंसे तुम इनकी पूजा करो। प्रभो! तुम्हारे पास जितनी सम्पत्ति है वह सब भगवान् अरुणाचलके मन्दिर, गोपुर, चहारदीवारी तथा आँगनका चौक आदि बनवानेके लिये दे डालो। ऐसा करनेसे शीघ्र ही तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त होगी। मनु, मान्धाता, नाभाग तथा भगीरथसे भी उत्कृष्ट पद तुम्हें प्राप्त हो जायगा।
तत्काल अपने धामको प्राप्त करनेवाले उन दोनों विद्याधरोंका यह वचन सुनकर राजा वज्रांगदने सन्देहरहित चित्तसे भगवान् अरुणाचलनाथके प्रति भक्ति बढ़ायी और उसी समयसे विशेष संयम-नियमका पालन आरम्भ किया।
मार्कण्डेयजीने पूछा—भगवन्! पाण्ड्य-नरेश वज्रांगदने किस प्रकार महादेवजीका पूजन किया और देव अरुणाचलनाथने कैसे उनपर अनुग्रह किया?
नन्दिकेश्वर बोले—मुने! राजा वज्रांगदने अपने नगरको लौटनेकी इच्छा त्यागकर उन्हीं भगवान् अरुणाचलनाथके चरणोंके समीप रहना पसंद किया। तदनन्तर रथ, हाथी, घोड़े और पैदलसे भरी हुई उनकी विशाल चतुरंगिणी सेना घोड़ेके मार्गका अनुसरण करती हुई वहाँ आ पहुँची। पुरोहित, मन्त्री, सामन्त, सेनापति तथा सुहृदोंनें धैर्यसिन्धु महाराज वज्रांगदका उस अवस्थामें दर्शन किया। तब वहाँ आयी हुई सेनाको राजाने आदरपूर्वक अरुणाचल क्षेत्रके बाहर ही ठहराया और भक्तियुक्त होकर अपने सम्पूर्ण कोश तथा समृद्धिशाली देशोंको भगवान् अरुणाचलनाथकी पूजाके लिये संकल्प कर दिया। उन्होंने गौतमजीके आश्रमके निकट अपने लिये एक तपोवन बनाया और पुरोहितके कथनानुसार मन्त्रीसहित वे भगवान् शिवकी पूजामें तत्पर हो गये। अपने पदपर उन्होंने राजकुमार रत्नांगदको बैठा दिया और उसके भेजे हुए धनसे भी भगवान् अरुणाचलनाथको ही तृप्त किया। राजाने अरुणाचलके चारों ओर जलसे भरे हुए जलाशय खुदवाये और ब्राह्मणोंको बहुत-से दान दिये। अग्निस्तम्भरूपी अरुणाचलनाथके तेजसे यद्यपि वह देश मरुभूमिकी भाँति निर्जल-सा हो गया था तथापि वहाँ राजा वज्रांगदने सैकड़ों बावलियोंका निर्माण कराया। उस समय लोपामुद्राके साथ आये हुए महर्षि अगस्त्यने अरुणाचलेश्वरकी पूजामें लगे हुए राजाका अभिनन्दन किया। प्रतिदिन नयतीर्थ नामक सरोवरमें स्नान करके वे पापनाशक श्रीप्रवालेश्वरका पूजन करते थे। समस्त दुर्गम पीड़ाओंका निवारण करनेवाली महिषासुरमर्दिनी भगवती दुर्गाकी आराधना भी उनके द्वारा प्रतिदिन होती रहती थी। ब्रह्मा और भगवान् विष्णुकी प्रार्थनासे लिंगरूपमें प्रकट हुए आदिदेव भगवान् शिवकी वे प्रतिक्षण नाना प्रकारकी सेवा-पूजा किया करते थे। प्रतिदिन सबेरे उठते और स्नान करके पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए अरुणाचलनाथकी तीन बार परिक्रमा करते थे। कार्तिककी पूर्णिमा आनेपर राजाने पार्वतीवल्लभ शिवके महादीपोत्सवका आयोजन किया, जो तीनों लोकोंमें पूजित एवं प्रशंसित है। कस्तूरी, कह्लार-पुष्प, कर्पूर और जलसे भरे हुए एक हजार स्वर्णकलशोंसे उन्होंने भगवान् त्रिलोचनका अभिषेक किया। प्रत्येक मासमें राजा ध्वजारोहणपूर्वक तीर्थोत्सव आदिका प्रबन्ध करते तथा रथपर भगवान्की सवारी निकालते थे। उस समय रथारोहणका बड़ा भारी उत्सव मनाया जाता था। यह उत्सव तीनों लोकोंमें विशेष सम्मानित है। महामना राजा वज्रांगदने तीन योजनतक फैले हुए अरुणाचलकी प्रदक्षिणा भी की। उस समय वे 'हे अरुणाचलनाथ! हे करुणामृतसागर! हे अरुणाम्बाके प्राणनाथ!' इस प्रकार पुकारते हुए बार-बार भगवान्की स्तुति करते थे। भाँति-भाँतिके द्रव्योंसे भगवान्के अंगोंमें आलेपन करके पंचामृत आदिके द्वारा उनका अभिषेक करते तथा कपूरका चूर्ण मिलानेसे उज्ज्वल प्रतीत होनेवाले कस्तूरीके चन्दनसे भगवान्की पूजा करते थे। एक लिंगस्वरूप अरुणाचलनाथकी पीठसे लेकर सम्पूर्ण अंगोंतक वे कस्तूरी और कह्लार-पुष्पोंसे भलीभाँति अर्चना करते थे। इस प्रकार तीन वर्षोंतक निरन्तर
- माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २५९
सेवा करनेसे सन्तुष्ट होकर अरुणाचलनाथने राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे हिमालयके समान श्वेत वृषभराजकी पीठपर चढ़कर अपने पीछे बैठी हुई पार्वतीदेवीसे सटे हुए थे। वसिष्ठ आदि ब्रह्मर्षि, नारद आदि महर्षि तथा निकुम्भ, कुम्भ आदि गण उनकी जय-जयकार एवं स्तुति कर रहे थे। कमलके समान विकसित एवं विशाल नेत्रोंके कटाक्षपात मानो करुणासिन्धुकी उठती हुई तरंग थे और उनके द्वारा भगवान् शिव सम्पूर्ण जगत्की मलिनताका निवारण-सा कर रहे थे। इस प्रकार देवाधिदेव महादेवको उपस्थित देखकर महाराज वज्रांगदको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्को साष्टांग प्रणाम किया और मस्तकपर अंजलि बाँधकर कहा—'देवेश ! मैंने जो मोहवश आपके समीप सवारीपर बैठकर विचरण किया है, उस मेरे एकमात्र अपराधको आप क्षमा करें।'
इस प्रकार अत्यन्त दीन भावसे बोलनेवाले राजासे करुणानिधान जगदीश्वर भगवान् अरुणाचलेश्वरने कहा—वत्स! भय न करो, तुम्हारा कल्याण हो। मेरी आठ मूर्तियाँ हैं। वे सब सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये कल्पित हुई हैं। पूर्वकालमें तुम इन्द्र थे और अहंकारवश तुमने कैलाशशिखरपर बैठे हुए मेरा अपमान किया। तब मैंने उसी समय तुम्हें स्तम्भित करके जडवत् बना दिया। तुम्हारा सारा अभिमान और पापभार क्षणभरमें गल गया और तुम लज्जित होकर मेरे समीप बैठ गये। उस समय मैंने तुम्हें समस्त ऐश्वर्योंके कारणभूत शिव-ज्ञानका उपदेश किया और यह आज्ञा दी कि तुम पृथ्वीपर जन्म ले राजा वज्रांगद होकर मेरी कृपा प्राप्त करोगे। इस समय तुम्हारी की हुई दिन-रातकी सेवाओंसे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। अतः तुम्हें यह ज्ञान देता हूँ, सुनो। आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और पुरुष—इन मेरी आठ मूर्तियोंसे व्याप्त होकर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रकाशित होता है। मैं इन सब तत्त्वोंसे परे शिव हूँ, मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं है। मेरे स्वरूपभूत चिदानन्द-समुद्रसे उठी हुई कुछ लहरें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंको आनन्दसे परिपूर्ण करती हैं। मैं समस्त संसारका स्वामी हूँ। यह गौरीदेवी मेरी महाशक्ति माया हैं। इन्हींके द्वारा सम्पूर्ण विश्व सदा आच्छादित होता और विस्तारको प्राप्त होता है। इन महाशक्तिके द्वारा सदा सृष्टि-रक्षा और संहाररूप लीलाविलासोंसे अत्यन्त विचित्ररूपमें प्रस्तुत किये हुए इस जगत्को मैं स्वेच्छासे देखता रहता हूँ। तुम अपने-आपको मेरी महिमासे उसी प्रकार अभिन्न देखो जैसे समुद्रकी तरंग उससे भिन्न नहीं होती। ऐसी दृष्टि हो जानेपर यह सारी पृथ्वी तुम्हें मेरे ही रूपसे सुशोभित दिखायी देगी और उसपर मेरी कृपासे प्रभुत्व प्राप्त करके तुम उत्तम भोगोंका सुखसे उपभोग करोगे। इसके बाद तुम्हें पुनः इन्द्ररूपसे दिव्य सुखदायी भोग दीर्घकालके लिये प्राप्त होंगे। तदनन्तर तुम मुझसे एकरूपता एवं विशुद्ध चिन्मयता प्राप्त कर लोगे।
यों कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये और पुण्यात्मा राजा वज्रांगदने भगवान् अरुणाचलनाथकी आराधना करते हुए ही समस्त भोगोंको प्राप्त किया। 'मुने! इस प्रकार तुमसे शिवभक्तकी उन्नतिका वृत्तान्त, अरुणाचलकी प्रदक्षिणाका फल तथा सदाचारका अक्षय परिणाम बताया गया। अरुणाचलसे बढ़कर दूसरा क्षेत्र नहीं है। अरुणाचलेश्वरसे बढ़कर और कोई देवता नहीं है तथा उनकी परिक्रमासे अधिक तीनों लोकोंमें दूसरा कोई तप नहीं है।' नन्दिकेश्वरके ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे बार-बार नेत्रोंसे आनन्दाश्रुकी वर्षा करते हुए अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये।
अरुणाचल-माहात्म्यखण्ड सम्पूर्ण
माहेश्वरखण्ड समाप्त
राजा वज्रांगदपर भगवान् अरुणाचलेश्वरकी कृपा
४. वैष्णवखण्ड (वेंकटाचलमाहात्म्य)
ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः
संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण
वैष्णव-खण्ड
भूमिवाराहखण्ड या वेंकटाचल-माहात्म्य
मेरुगिरिपर भगवान् वाराहकी सेवामें पृथ्वीदेवीका उपस्थित होना और श्रेष्ठ पर्वतों तथा वेंकटाचलवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य सुनना
एक समय कथा कहनेके लिये रोमहर्षण-पुत्र उग्रश्रवा मुनि आये, जो व्यासजीके परम बुद्धिमान् शिष्य थे। वहाँ आनेपर मुनियोंने उनका भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीने उनसे स्कन्द नामक दिव्य पुराणकी कथा कही। सृष्टि-संहार, वंश-परिचय, विभिन्न वंशोंमें उत्पन्न महापुरुषोंके चरित्र तथा मन्वन्तरोंकी कथाका उन्होंने विस्तारपूर्वक वर्णन किया। तीर्थोंके माहात्म्यकी बहुत-सी कथाएँ सुनकर उन मुनिवरोंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले सूतजीसे कथाश्रवणकी अभिलाषा मनमें रखकर इस प्रकार कहा।
ऋषि बोले—रोमहर्षणकुमार सूतजी! आप सर्वज्ञ हैं, पौराणिक विषयोंका वर्णन करनेमें कुशल हैं, अतः हमलोग आपके मुखसे भूतलके मुख्य-मुख्य पर्वतोंका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।
सूतजीने कहा—महर्षियो! पूर्वकालमें मैंने यही प्रश्न गंगाजीके तटपर बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ व्यासजीसे पूछा था। उसके उत्तरमें मेरे सर्वोत्तम गुरु व्यासजीने इस प्रकार कहा।
व्यासजी बोले—सूत! प्राचीन युगकी बात है। एक दिन मुनिश्रेष्ठ नारद नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित सुमेरु-पर्वतके शिखरपर गये और उसके मध्यभागमें ब्रह्माजीका अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य एवं विस्तृत भवन देखा। उसके उत्तरप्रदेशमें पीपलका एक उत्तम वृक्ष था, जिसकी ऊँचाई एक हजार योजनकी और विस्तार दुगुना था। उस पीपलके मूलभागके समीप अनेक प्रकारके रत्नोंसे युक्त दिव्य मण्डप बना हुआ था, जिसमें वैदूर्य, मोती और मणियोंके द्वारा स्वस्तिक गृह बनाये गये थे। वह दिव्यमण्डप नूतन रत्नोंसे चिह्नित तथा दिव्य तोरणों (बाहरी फाटकों)-से सुशोभित था। उसका मुख्यद्वार पुष्पराग मणिका बना हुआ था, जिसका गोपुर सात मंजिलका था। चमकते हुए हीरोंसे बनाये गये दो किवाड़ उस द्वारकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस मण्डपके भीतर प्रवेश करके नारदजीने देखा, दिव्य मोतियोंका एक मण्डप है, उसमें वैदूर्यमणिकी वेदी बनी हुई है। महामुनि नारद उस ऊँचे मण्डपके ऊपर चढ़ गये। वहाँ उक्त मण्डपके मध्यभागमें एक बहुत ऊँचा सिंहासन था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। उस मध्यभागमें सहस्र दलोंसे सुशोभित दिव्य कमल था, जिसका रंग श्वेत था। उसकी प्रभा सहस्रों चन्द्रमाओंके समान
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थी। उस कमलके मध्यमें दस हजार पूर्ण चन्द्रमाओंसे भी अधिक कान्तिमान् कैलाशपर्वतके समान आकारवाले एक सुन्दर पुरुष बैठे हुए थे। उनके चार भुजाएँ थीं, अंग-अंगसे उदारता टपक रही थी, वाराहके समान मुख था। वे परम सुन्दर भगवान् पुरुषोत्तम अपने चारों हाथोंमें शंख, चक्र, अभय एवं वर धारण किये हुए थे। उनके कटिभागमें पीताम्बर शोभा पाता था। दोनों नेत्र कमलदलके समान विशाल थे। सौम्यमुख पूर्ण चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा था। मुखारविन्दसे धूपकी-सी सुगन्ध निकलती थी। सामवेद उनकी ध्वनि, यज्ञ उनका स्वरूप, स्रुक् उनका मुख था और स्रुवा उनकी नासिका थी। मस्तकपर धारण किये हुए मुकुटके प्रकाशसे उनका मुख अत्यन्त उद्भासित हो रहा था। उनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। श्वेत यज्ञोपवीत धारण करनेसे उनके श्रीअंगोंकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। उनकी छाती चौड़ी और विशाल थी। वे कौस्तुभमणिकी दिव्य प्रभासे देदीप्यमान हो रहे थे। ब्रह्मा, वसिष्ठ, अत्रि, मार्कण्डेय तथा भृगु आदि अनेक मुनीश्वर दिन-रात उनकी सेवामें संलग्न रहते थे। इन्द्र आदि लोकपालों और गन्धर्वोंसे सेवित देवदेवेश्वर भगवान्के पास जाकर नारदजीने प्रणाम किया और पृथ्वीको धारण करनेवाले उन वाराहभगवान्का दिव्य उपनिषद्-मन्त्रोंसे स्तवन करके अत्यन्त प्रसन्न हो वे उनके पास ही खड़े हो गये।
इतनेहीमें दिव्य दुन्दुभी बज उठी। तत्पश्चात् वहाँ पृथ्वीदेवीका शुभागमन हुआ। रत्नोंसहित समुद्रके सदृश दिव्य वस्त्र धारण करके वे बड़ी शोभा पा रही थीं। इला और पिंगला नामवाली दो सखियाँ उनके साथ थीं। उन दोनोंके लाये हुए फूलोंको लेकर पृथ्वीदेवीने भगवान् वाराहके चरणोंमें बिखेर दिया और उन देवदेवेश्वरको प्रणाम करके वे दोनों हाथ जोड़कर उनके आगे खड़ी हो गयीं।
तब भगवान् वाराहने कहा—'पृथ्वीदेवि! मैं तुम्हें शेषनागके सुखदायक मस्तकपर बिठाकर और सम्पूर्ण विश्वको तुम्हारे ऊपर स्थापित करके पर्वतोंको तुम्हारा सहायक बनाकर यहाँ आया हूँ। फिर किसलिये तुम यहाँ आयी हो?'
पृथ्वी बोली—भगवन्! आपने पातालसे मेरा उद्धार करके ऊँचे रत्नसिंहासनकी भाँति शेषनागके रत्नयुक्त मस्तकपर, जो सहस्रों फणोंसे सुशोभित है, मुझे बिठाया है। इस प्रकार मुझे भलीभाँति स्थिर करके मुझ धारण करनेमें समर्थ पुण्यमय पर्वतोंको भी मेरे ऊपर स्थापित किया है, जो आपके ही स्वरूप हैं। महाबाहु पुरुषोत्तम! उन पर्वतोंमेंसे जो मेरे आधारभूत मुख्य-मुख्य पर्वत हैं, उनका मुझे परिचय दीजिये।
श्रीभगवान् वाराहने कहा—सुमेरु, हिमवान्, विन्ध्याचल, मन्दराचल, गन्धमादन, शालग्राम, चित्रकूट, माल्यवान्, पारियात्रक, महेन्द्र, मलय, सह्य, सिंहाचल, रैवत तथा मेरुपुत्र अंजन, जो बड़ा भारी स्वर्णमय पर्वत है; वसुन्धरे! ये सभी
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २६३
श्रेष्ठ पर्वत तुम्हारे आधार हैं। मैंने देवसमूह और ऋषिसमूहके साथ इन पर्वतोंका सेवन किया है। माधवि ! इनमें जो श्रेष्ठ पर्वत हैं, उनका यथार्थ वर्णन करता हूँ, सुनो। देवि! शालग्राम, सिंहाचल तथा गिरिराज गन्धमादन—ये उत्तम शैल हिमालयकी ओर उत्तर दिशामें स्थित हैं। वसुधे ! अब मैं दक्षिणके प्रधान पर्वतोंका नाम बतलाता हूँ—अरुणाचल, हस्तिपर्वत, गृध्राचल तथा घटिकाचल—ये सभी श्रेष्ठ पर्वत क्षीर नदीके समीपवर्ती हैं। हस्तिपर्वतसे पाँच योजन उत्तर सुवर्णमुखरी नामक उत्तम नदी बहती है। उसीके उत्तर तटपर कमला सरोवर है, जिसके किनारे शुकदेवजीको वर देनेवाले तथा भक्तोंकी पीड़ाओंका नाश करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण बलभद्रजीके साथ निवास करते हैं। शुद्धचित्तवाले वानप्रस्थ मुनि सदा उनकी आराधना करते हैं। कमला सरोवरसे उत्तर दो कोसकी दूरीपर कल्पवृक्षोंसे सुशोभित श्रेष्ठ वनमें श्रीवेंकटाचल नामक प्रसिद्ध पर्वत है, जो भगवान् विष्णुका महान् आश्रय है। वह शैलराज एक योजन ऊँचा और सात योजन चौड़ा है। वह समूचा पर्वत सुवर्णमय है। उसके शिखर रत्न धारण करनेवाले हैं। इन्द्र आदि देवता, वसिष्ठ आदि मुनीश्वर, सिद्ध, साध्य, मरुद्गण, दानव, दैत्य, राक्षस तथा रम्भा आदि अप्सराएँ वहाँ नियमपूर्वक निवास करती हैं। नाग, गरुड़ और किन्नर वहाँ तपस्या करते हैं। इन सबसे सेवित अनेक नदियाँ हैं, जिनका दर्शन भी पुण्यप्रद है। पृथ्वी ! उस पर्वतपर अनेक प्रकारके दिव्य सरोवर शोभा पा रहे हैं।
अब सब तीर्थोंमें प्रधान चक्र आदि तीर्थोंका वर्णन सुनो। चक्रतीर्थ, दैवतीर्थ, आकाशगंगा, कुमारधारिकातीर्थ, पापनाशनतीर्थ, पाण्डवतीर्थ तथा स्वामिपुष्करिणीतीर्थ—ये सात तीर्थ उस उत्तम नारायणगिरि (वेंकटाचल)—पर सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं। इन सातोंमें भी सबसे श्रेष्ठ कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणी है। भूदेवि ! उस स्वामिपुष्करिणीके पश्चिम तटपर तुम्हारे साथ मैं निवास करता हूँ और दक्षिण तटपर सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् लक्ष्मीन निवास (विष्णु) विराजमान हैं। समुद्रवसना पृथ्वी ! वह स्वामिपुष्करिणी गंगा आदि सम्पूर्ण तीर्थोंके समान है। तीनों लोकोंमें जो तीर्थ, सरोवर और नदियाँ हैं, उन सबका आधिपत्य स्वामिपुष्करिणी तीर्थको प्राप्त है। उस परम पवित्र स्वामिपुष्करिणी तीर्थका सेवन करनेके लिये दिव्य गिरि वेंकटाचलपर सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। उनमें भी छः सबसे प्रधान हैं।
माधवि ! अब मैं तुम्हें नारायणगिरिका माहात्म्य बतलाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। देवता, ऋषि तथा सनकादि योगी सत्ययुगमें अंजनगिरिको, त्रेतामें नारायणगिरिको, द्वापरमें सिंहाचलको और कलियुगमें श्रीवेंकटाचलको परमात्मा भगवान् विष्णुका निवासस्थान कहते हैं। अन्य विद्वानोंका भी यही मत है। जो सहस्रों योजन दूरसे अथवा द्वीपान्तरमें पहुँचकर भी गिरिराज वेंकटाचलको प्रणाम करता है, उसे प्रणाम करनेके उद्देश्यसे उसकी दिशाकी ओर भक्तिभावसे मस्तक झुकाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकमें जाता है। उस पर्वतपर जो छः प्रधान तीर्थ हैं, उनका समयानुसार माहात्म्य बतलाता हूँ। माघमासमें जब भगवान् सूर्य कुम्भ राशिपर स्थित हों, तब मघा-नक्षत्रयुक्त महातिथि पूर्णिमाको गिरिराज वेंकटाचलपर जो कुमारधारिका नामवाली पुष्करिणी है, वह समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली हो जाती है। जिसके तटपर कृत्तिका और अग्निसे उत्पन्न पार्वतीनन्दन स्कन्द देव-सेनाके साथ भगवान् विष्णुका पूजन करते हुए निवास करते हैं, उस तीर्थमें जो मध्याह्नकालमें स्नान करता है, उसके पुण्यफलको श्रवण करो। वसुधे ! गंगा आदि सब तीर्थोंमें जो बारह वर्षोंतक नियमपूर्वक स्नान करता है, उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल कुमारधारा तीर्थमें स्नान करनेवालेको भी मिल जाता है। जो उस
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तीर्थमें यथाशक्ति दक्षिणाके साथ अन्नदान करता है, उसे भी उतना ही फल मिलता है, जितना स्नानके लिये बताया गया है।
वसुन्धरे ! जब मीन राशिके सूर्य हों, तब उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा तिथिको चौथे पहरमें पर्वतकी गुफाके भीतर तुम्बतीर्थमें जो मनुष्य स्नान करता है, वह पुनः गर्भमें नहीं आता। जब सूर्यदेव मेष राशिपर स्थित हों, तब चित्रा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा तिथिको पुण्यमय प्रभातके समय आकाशगंगाके जलमें स्नान करनेवाला पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेता है। सूर्यदेव जब वृष राशिपर विराजमान हों, तब वैशाखमासमें शुक्ल या कृष्ण पक्षकी द्वादशी तिथिको रविवार या मंगलवारका योग होनेपर अथवा शुक्ल या कृष्ण पक्षमें रविवारके दिन पुष्य या हस्त नक्षत्रके योग होनेपर जो मनुष्य संगवकालमें पाण्डव तीर्थके भीतर स्नान करता है, वह इस लोकमें कभी दुःख नहीं पाता तथा परलोकमें सुख भोगता है। महाभागे ! शुक्ल अथवा कृष्ण पक्षमें रविवारके साथ जो सप्तमी तिथि आवे, उसमें यदि पुष्य नक्षत्र अथवा हस्त नक्षत्रका योग हो, तब गिरिराज वेंकटाचलके शिखरपर वर्तमान पापनाशन नामक तीर्थमें जो स्नान करता है, वह श्रेष्ठ मनुष्य कोटिजन्मोपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है। भूदेवि ! अब तुम एक रहस्यकी बात सुनो। 'अनन्त' नामक महापर्वतपर मेरे दिव्य मन्दिरके वायव्य कोणमें शिखरपर स्थित गुफामें देवतीर्थ नामसे प्रसिद्ध एक परम सुन्दर सरोवर है। उसमें पुष्य नक्षत्रयुक्त बृहस्पतिवारको अथवा व्यतीपात योगमें अथवा श्रवण नक्षत्रयुक्त सोमवारको जो स्नान करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। इस लोकमें जान-बूझकर या अनजानमें किये हुए जो कोई भी पाप हैं, वे सब अत्यन्त पावन देवतीर्थमें गोता लगाते ही नष्ट हो जाते हैं, पुण्यकी वृद्धि होती है तथा अन्तमें वह चन्द्रलोकमें सम्मानित होता है।
यह सब सुनकर पृथ्वीदेवीने भगवान् वाराहकी इस प्रकार स्तुति की—देवदेवेश्वर ! वाराहमुख ! अच्युत ! आपको नमस्कार है। महाबाहो ! आपकी श्वेतकान्ति क्षीरसागरके समान है। वज्रशृंग ! आपको नमस्कार है। देव ! आपकी सहस्रों भुजाएँ हैं। आपने कल्पके आदिमें एकार्णवके जलसे मेरा उद्धार किया है; तभी मैं सम्पूर्ण जगत्को धारण करती हूँ। प्रभो! आप अनेक दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा यज्ञसूत्रसे सुशोभित हैं, लाल-लाल वस्त्र धारण करते हैं और दिव्य रत्नोंसे अलंकृत होते हैं। आपके चरणारविन्द प्रातःकाल उदय होनेवाले सूर्यनारायणके समान अरुण कान्तिवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आपके दाढ़ोंका अग्रभाग बाल-चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। आपका बल और पराक्रम महान् है। आपके श्रीअंगोंमें दिव्य चन्दनका आलेप लगा हुआ है और कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झिलमिला रहे हैं। आप इन्द्रनीलमणिसे प्रकाशमान, सुवर्णमय अंगद (बाजूबन्द)-से विभूषित हैं। महाबल ! आपने अपनी दाढ़ोंके अग्रभागसे हिरण्याक्ष नामक दैत्यका वक्षःस्थल चीर डाला है। आपके नेत्र खिले हुए कमलपुष्पके समान परम सुन्दर हैं। आप अपने मुखसे सामवेदके मन्त्रोंका गान करते समय मेरे मनको मोहे लेते हैं। विशाललोचन ! ब्रह्माजी और भगवान् शिव आपके चरणोंकी वन्दना करते हैं। आपका श्रीविग्रह सर्वविद्यामय है। आप शब्दोंकी पहुँचसे परे हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। आनन्दविग्रह ! अनन्त ! कालकाल ! आपको नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करके पृथ्वीदेवीने भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया। यह देखकर भगवान् वाराहदेवके नेत्र हर्षसे खिल उठे। उन्होंने
| * वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * | २६५ |
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पृथ्वीदेवीको साथ लेकर, गरुड़पर आरूढ़ हो, वहाँसे वृषाभाचल (वेंकटगिरि)-को प्रस्थान किया। नारद आदि मुनीश्वरोंसे प्रशंसित होकर पृथ्वीपति भगवान् वाराह स्वामिपुष्करिणीके लोकपूजित पश्चिम तटपर निवास करते हैं। वहाँ अनेकानेक मुनीश्वर, महाभाग वैखानस तथा ब्रह्माजीके तुल्य महात्मा पुरुष वाराहमुख भगवान् विष्णुकी आराधनामें संलग्न रहते हैं। | सूत! जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय पावन संवादको सुनता अथवा देवता और ब्राह्मणोंके आगे पढ़ता है, वह प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है। तथा जितने लोग सुनते हैं, उन सभीको अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है।<br>सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! भगवान् व्यासने यह माहात्म्य मुझसे कहा है और मैंने जैसा सुना है, वैसा ही आपलोगोंके सामने वर्णन किया है।
$\approx\circ\approx$
भगवान् वाराहका मन्त्र, उसके जपकी विधि, ध्यान तथा उसके अनुष्ठानका फल
ऋषियोंने कहा—सूतजी! पृथ्वीके साथ भगवान् वाराह जब वृषभाचलपर चले गये, तब वहाँ उन्होंने पृथ्वीसे क्या कहा? महामते! वह सब प्रसंग हमें सुनाइये।
सूतजी बोले—मुनियो! आप सब लोग पूर्व-कालकी पुण्यमयी कथा श्रवण करें। पहले वैवस्वत मन्वन्तरके परम पवित्र सत्ययुगमें वाराहरूपधारी पृथ्वीपति देवेश्वर भगवान् विष्णु नारायणगिरिपर निवास करते थे। उस समय पृथ्वीदेवी अपनी सखियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने भगवान्के सामने यह प्रश्न उपस्थित किया—'देवेश! आप किस मन्त्रसे आराधना करनेपर प्रसन्न होंगे? जो मन्त्र आपको सदा ही प्रिय है और नियमपूर्वक रहनेवाले मनुष्योंको आपके परमधामकी प्राप्ति करा देता है, उसका मुझे उपदेश कीजिये।'
भूदेवीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर भगवान् वाराहने प्रेमसे मुसकराते हुए कहा—देवि! सुनो। यह परम गोपनीय मन्त्र है, इसे कभी अनधिकारीके सामने प्रकाशमें नहीं लाना चाहिये। जो सेवा करनेवाला भक्त तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला है, उसीको इस मन्त्रका उपदेश करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा'। मुमुक्षु पुरुषोंको इस मन्त्रका सदैव जप करना चाहिये। भूदेवि! यह मन्त्र सब सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके संकर्षण ऋषि हैं और मैं ही देवता कहा गया हूँ। इसका छन्द पंक्ति है, श्री बीज है। सद्गुरुसे इस मन्त्रकी दीक्षा लेकर इसका चार लाख जप करना चाहिये और घी तथा मधु मिलाये हुए खीरका हवन करना चाहिये।
अब मैं अपने स्वरूपका ध्यान बतला रहा हूँ, जो अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला है। समुद्रवसने! मेरे अंगोंकी कान्ति शुद्ध स्फटिक गिरिके समान श्वेत है। खिले हुए लाल कमलदलोंके समान सुन्दर नेत्र हैं, वाराहके समान मुख है, स्वरूप सौम्य है, चार भुजाएँ हैं, मस्तकपर किरीट शोभा पाता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। हाथोंमें चक्र, शंख, अभयदायिनी मुद्रा और कमल सुशोभित हैं। मेरी बायीं जाँघपर तुम बैठी हो। मैंने लाल, पीले वस्त्र पहनकर लाल रंगके ही आभूषणोंसे अपनेको विभूषित किया है। श्रीकच्छपके पृष्ठके मध्यभागमें शेषनागकी मूर्ति है। उसके ऊपर सहस्रदल कमलका आसन है
२६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
और उसपर मैं विराजमान हूँ। इस प्रकार ध्यान करके जो सदा अष्टोत्तरशत मन्त्रका जप करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता और अन्तमें निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
यह सुनकर पृथ्वीदेवीने पुनः प्रश्न किया— देव! पूर्वकालमें किसने इस मन्त्रका अनुष्ठान किया है और उसे किस फलकी प्राप्ति हुई है?
भगवान् वराहने कहा—देवि! पहले कृतयुगमें धर्म नामक महात्मा मनुने ब्रह्माजीसे इस मन्त्रको प्राप्त किया और इसी पर्वतपर उसका जप करके मेरा प्रत्यक्ष दर्शन पाया। फिर मुझसे अभीष्ट वरदान प्राप्त करके वे मेरे पदको प्राप्त हो गये। पूर्वकालमें इन्द्र दुर्वासाके शापसे स्वर्गभ्रष्ट हो गये थे; उस समय इसी मन्त्रसे यहीं मेरी आराधना करके उन्होंने पुनः स्वर्गका राज्य प्राप्त कर लिया। भूदेवि! अन्यान्य मुनियोंने भी इस मन्त्रका जप करके परम गति प्राप्त की है। सर्पोंके स्वामी अनन्तने कश्यपजीसे इस मन्त्रको पाकर श्वेत-द्वीपमें इसका जप किया और उसीसे अद्भुत शक्ति पाकर वे पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हुए हैं। अतः पृथ्वीकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंको इहलोकमें सदा ही इस मन्त्रका जप करना चाहिये।
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महर्षि अगस्त्यकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णुका वेंकटाचलपर श्री-भू देवियोंके साथ निवास तथा आकाशराजके यहाँ पद्मावती और वसुदानका जन्म
भगवान् वराह कहते हैं— महादेवी पृथ्वी! मैं तुम्हें एक पवित्र इतिहास सुनाता हूँ, सुनो। वैवस्वत मन्वन्तरके आदि सत्ययुगमें वायु देवताका बड़ा भारी तप देखकर लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णु श्रीदेवी और भूदेवीके साथ स्वामिपुष्करिणीके तटपर आये। इसके दक्षिण तटपर परम पवित्र आनन्द नामक विमानमें वे श्रीलक्ष्मीकान्त विष्णु सदा वायु देवताका प्रिय करते हुए निवास करते हैं। तभीसे कुमार कार्तिकेयद्वारा निरन्तर पूजित हो, भगवान् हृषीकेश इस विमानपर अदृश्य भावसे रहते हैं और आगे भी रहेंगे।
पृथ्वीने पूछा— मनुष्योंकी दृष्टिमें न आनेवाले भगवान् विष्णु किस प्रकार यहाँ उन्हें प्रत्यक्ष दिखायी देंगे?
भगवान् वराहने कहा— देवि! महर्षि अगस्त्यने इस पर्वतपर आकर सनातनदेव भगवान् विष्णुका दर्शन किया और बारह वर्षोंतक आराधना करके उन्हें बारंबार प्रसन्न किया। तत्पश्चात् भगवान्से यह याचना की कि 'प्रभो! आप सदा यहाँ निवास करें और सब लोगोंको आपका प्रत्यक्ष दर्शन होता रहे।'
उनके ऐसा कहनेपर श्री-भू देवियोंके साथ
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २६७
भगवान् विष्णु इस प्रकार बोले—देवर्षे! मैं तुम्हारे सन्तोषके लिये यहाँ समस्त देहधारियोंको प्रत्यक्ष दर्शन देता हुआ निवास करूँगा, परंतु यह विमान कभी किसीकी दृष्टिमें नहीं आवेगा। भगवान्का यह वचन सुनकर अगस्त्य मुनि प्रसन्न हो अपने आश्रमको चले गये। तबसे भगवान् विष्णु मुनियोंके ही ध्यानमें आनेवाले इस विमानपर मनुष्य आदि प्राणियोंकी दृष्टिके विषय होकर चतुर्भुज रूपसे निवास करते हैं और आगे भी निवास करते रहेंगे। स्कन्द-स्वामी सदा उनकी आराधना करते हैं और वायु देवता सेवामें संलग्न रहते हैं। एक समयकी बात है कि मित्रवर्माकी मनोरमा धर्मपत्नीके गर्भसे 'आकाश' नामक पुत्र हुआ, जो अपने कुलका आभूषण था। शकवंशमें उत्पन्न धरणी नामवाली कन्या राजकुमार आकाशकी धर्मपत्नी हुई। नृपश्रेष्ठ मित्रवर्माने अपने उस पुत्रको राज्यका सारा भार सौंपकर स्वयं वेंकटाचलके समीप पवित्र तपोवनको प्रस्थान किया। राजकुमार आकाश महान् चक्रवर्ती राजा हुए। वे एकपत्नीव्रती थे। केवल अपनी धर्मपत्नी धरणीके प्रति ही उनका मन अनुरक्त था। एक दिन उन्होंने यज्ञके लिये आरणी नदीके किनारे भूमिका शोधन कराया। जब सोनेके हलसे पृथ्वी जोती जाने लगी तब बीजकी मुट्ठी बिखेरते समय राजाने देखा, पृथ्वीसे एक कन्या प्रकट हुई है, जो कमलकी शय्यापर सोयी हुई है। वह बड़ी सुन्दरी और समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी, सोनेकी पुतली-सी शोभा पा रही थी। उसे देखकर राजाके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने उसे गोदमें उठा लिया और 'यह मेरी ही पुत्री है' ऐसा बार-बार कहते हुए मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए। इसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! वास्तवमें यह तुम्हारी ही पुत्री है। इस सुन्दर नेत्रवाली कन्याका तुम पालन-पोषण करो।'
यह सुनकर राजाके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया और महारानी धरणीदेवीको बुलाकर कहा—'प्रिये! यह भगवान्की दी हुई अपनी कन्या है, इसे देखो। यह पृथ्वीसे प्रकट हुई है। हम दोनों सन्तानहीन हैं। हमारे लिये यही पुत्री होगी।' यों कहकर आकाशराजने रानीके हाथमें प्रेमपूर्वक वह कन्या दे दी। उस कन्याके घरमें प्रवेश करनेपर धरणीदेवीने भी गर्भ धारण किया और समय आनेपर उन्होंने उत्तम मुहूर्तमें पुत्रको जन्म दिया। उस समय पाँच ग्रह उच्च स्थानोंमें स्थित थे और सूर्यदेव मेष राशिपर विराजमान थे। उस पुत्रके जन्म-कालमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं तथा राजाके घरमें फूलोंकी वर्षा हुई। उस समय सुखदायिनी हवा चल रही थी। जिन लोगोंने महाराजको पुत्र-जन्मका समाचार सुनाया, उन्हें अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने जो कुछ उनके पास था, सब दे डाला। केवल छत्र और चामर रख लिया। एक करोड़ कपिला गौएँ और एक करोड़ एक सौ बैल दान किये। बारहवें दिनका पुण्य-मुहूर्त आनेपर उन्होंने जातकर्म आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं और स्वयं ही पुत्रका नाम वसुदान रखा।
पृथ्वीदेवी! आकाशराजका पुत्र वसुदान बड़ा ही सुन्दर था। वह बालक प्रतिदिन शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ने लगा। वेदोंके पारंगत विद्वान् गुरुजनोंने उस विनयशील कुमारका उपनयन-संस्कार किया। पितासे ही उसने मन्त्रपूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी। अंग और उपांगोंसहित धनुर्वेदके चारों पादोंका अध्ययन किया।
**पृथ्वीदेवीने पूछा—**भगवन्! आपने आकाशराजके पुत्रका नाम बताया। अब यह बतानेकी कृपा करें कि उनकी अयोनिजा कन्याका नाम उस समय क्या रखा गया था?
**भगवान् वाराहने कहा—**देवि! बुद्धिमान्
२६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आकाशराजने उस कन्याका नाम पद्मिनी (पद्मावती, पद्मालया आदि) रखा था। धीरे-धीरे वह युवा अवस्थाको प्राप्त हुई। एक दिन पद्मिनी शुक और कोकिलोंके कलरवसे व्याप्त उपवनमें अपनी सखियोंके साथ विहार कर रही थी। उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारद अकस्मात् घूमते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने वनकी मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति उस कन्याको देखकर विस्मयसे पूछा—‘भीरु! तुम कौन हो, किसकी कन्या हो? मुझे अपना हाथ तो दिखाओ।’ यह सुनकर पद्मिनीने नारदजीसे कहा—‘ब्रह्मन्! मैं आकाशराजकी कन्या हूँ। मेरे लक्षण बताइये।’
नारदजी बोले—सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा मस्तक गोलाकार और सम है। इसके ऊपर चिकने और लंबे बाल शोभा पा रहे हैं। तुम्हारा मुख मन्द मुसकानसे सुशोभित है और तुम्हारे अधर बिम्बाफलके समान अरुण हैं। इस प्रकार तुम्हारा यह मुख भगवान् विष्णुके ही योग्य है। ऐसा मेरी बुद्धिका निश्चय है। तुम क्षीरसागरसे प्रकट हुई साक्षात् लक्ष्मीके समान दिखायी देती हो।
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वेंकटाचलनिवासी श्रीहरि और पद्मावतीका विवाह
भगवान् वाराह कहते हैं—यों कहकर नारदजी पद्मिनी और उसकी सखियोंद्वारा सम्मानित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सखियोंने पद्मिनीसे कहा—‘सखि! चलो वनमें फूल लानेके लिये चलें।’ यों कहकर आकाशराजकी कन्याके साथ वे सखियाँ वनमें गयीं और फूलोंको तोड़ती हुई इधर-उधर विचरने लगीं। फिर वे सब सखियाँ एक वनस्पतिके नीचे जा बैठीं। इसी समय उन्होंने चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णवाले एक ऊँचे घोड़ेको देखा। उसके ऊपर श्यामवर्णका पुरुष सवार था, जिसकी आकृति और कान्ति कामदेवको भी लज्जित कर रही थी। उसके विशाल नेत्र पद्मपत्राकार कानोंके समीप पहुँचे हुए थे। उसने एक हाथमें दिव्य शार्ङ्ग धनुष और दूसरेमें सुवर्णमय बाण धारण कर रखा था। उसका कटिप्रदेश पीले रंगके रेशमी वस्त्रसे आच्छादित था। शरीरका मध्यभाग बहुत ही सुन्दर था। वह रत्ननिर्मित कंकण, बाजूबंद और करधनीसे सुशोभित था। उसकी छाती चौड़ी थी, जिससे उस पुरुषकी दक्षिणावर्तनाभि अधिक शोभा पा रही थी। उसका बायाँ कंधा स्वर्णमय यज्ञोपवीतसे चमक रहा था। इस प्रकार उस तरुणका सुन्दर रूप मनको मोह लेनेवाला था। उसे देखकर वे सब स्त्रियाँ चकित हो उठीं। वह घुड़सवार एक भेड़ियेको ढूँढ़ता हुआ वहाँ फूल तोड़नेवाली स्त्रियोंके समीप आया और उनसे पूछने लगा—‘इधर कोई भेड़िया आया है क्या?’ स्त्रियोंने उत्तर दिया—‘तुम धनुष धारण किये हमारे वनमें क्यों आये हो? यहाँके सभी मृग अवध्य हैं। आकाशराजके द्वारा सुरक्षित इस वनसे शीघ्र बाहर निकल जाओ।’ उनकी यह बात सुनकर सवार घोड़ेसे उतर पड़ा। उसने पूछा—‘तुम सब लोग कौन हो? यह कमलके समान रंगवाली परम सुन्दरी कन्या कौन है?’ उसका यह प्रश्न सुनकर एक सखीने उत्तर दिया—‘शूरवीर! ये हमारी स्वामिनी हैं। इनका नाम पद्मिनी है। ये आकाशराजकी पुत्री हैं, इनका प्रादुर्भाव पृथ्वीसे हुआ है। सुन्दर शरीरवाले पुरुष! तुम अपना परिचय दो। तुम्हारा नाम क्या है और निवासस्थान कहाँ है? तुम किसलिये यहाँ आये हो?’
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *
२६९
सखियोंके इस प्रकार पूछनेपर उस पुरुषने मन्द मुसकानयुक्त मुखारविन्दसे इस प्रकार कहा— 'मेरे नाम अनन्त हैं। तपस्वी लोग रंग, रूप और नाम दोनों ही दृष्टियोंसे मुझे कृष्ण कहते हैं। मैं वह हूँ, जिसके धनुषकी समता करनेवाला कोई धनुष देवताओंके पास भी नहीं है। लोग मुझे वेंकटाचलनिवासी वीरपति कहते हैं। शिकारके लिये वनमें आया हूँ। इस वनकी शोभा देखते हुए मेरी दृष्टि सुन्दरीपर भी पड़ गयी। क्या यह मुझे प्राप्त हो सकती है?'
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सब सखियाँ कुपित हो गयीं। तब कृष्ण घोड़ेपर चढ़कर शीघ्र ही वेंकटाचलपर चले गये। वहाँ अपने दिव्य निवासस्थानपर पहुँचकर वे घोड़ेसे उतर गये। कृष्णके रूपमें साक्षात् श्रीहरि ही थे। घोड़ेसे उतरकर उन्होंने रत्नमय मण्डपमें प्रवेश किया और मुक्तामय मन्दिरमें जाकर नूतन रत्नमय सिंहासनपर वे विराजमान हुए और उसी विशाल नेत्रोंवाली तथा मन्द मुसकानसे सुशोभित मुखारविन्दवाली पद्मावतीका स्मरण करने लगे।
तदनन्तर मध्याह्न कालमें भगवान्के भोग लगानेयोग्य दिव्य उत्तम एवं सुगन्धित अन्न तैयार करके बकुलमालिका नामकी सखी भगवान्को देखनेके लिये शीघ्रतापूर्वक गयी और उनके चरणोंमें भक्ति-भावसे प्रणाम करके पास ही बैठ गयी। उसने देखा, श्रीहरि नेत्र बंद किये किसीकी याद कर रहे हैं। तब उस सखीने कहा—'देवदेवेश्वर! उठिये, पुरुषोत्तम! आपके लिये बहुत उत्तम रसोई तैयार की गयी है। माधव! अब भोजनके लिये पधारिये।'
श्रीभगवान् बोले—सखी! प्राचीन कालकी बात है। पवित्र त्रेतायुगमें जब मैंने रावणका वध किया था, उस समय वेदवती नामवाली एक कन्याने लक्ष्मीजीकी सहायता की थी। लक्ष्मी राजा जनकके यहाँ पृथ्वीसे उत्पन्न हो सीताके रूपमें निवास करती थीं। फिर मुझसे विवाह होनेपर जब वे मेरे साथ वनमें गयीं, तब एक दिन पंचवटीमें मारीच नामक राक्षसका वध करनेके लिये मैं आश्रमसे बाहर गया। मेरा छोटा भाई लक्ष्मण भी सीताके कहनेसे मेरे ही पीछे चला आया। तत्पश्चात् राक्षसराज रावण सीताको हर ले जानेके लिये मेरे आश्रमके समीप आया। उस समय मेरे अग्निहोत्र-गृहमें विद्यमान अग्निदेव रावणकी वैसी चेष्टा जानकर सीताको साथ ले पातालमें चले गये और अपनी पत्नी स्वाहाकी देख-रेखमें सीताको सौंपकर लौट आये। पूर्वकालमें कल्याणमयी वेदवतीको एक बार उसी राक्षसने स्पर्श कर लिया था, जिससे दुःखी होकर उसने प्रज्वलित अग्निमें अपने शरीरको त्याग दिया। उस समय उसी वेदवतीको रावणका संहार करनेके उद्देश्यसे अग्निदेवने सीताके समान रूपवाली बना दिया और मेरी पर्णशालामें सीताके स्थानपर उसे लाकर छोड़ दिया। रावणने उसीका अपहरण करके लंकामें ला बिठाया। तदनन्तर रावणके मारे जानेपर अग्नि-परीक्षाके समय उसी वेदवतीने अग्निमें प्रवेश किया। उस समय अग्निदेवने
२७० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्वाहाके समीप सुरक्षित जनकनन्दिनी सीतारूपा लक्ष्मीको लाकर पुनः मेरे हाथमें दिया और इस प्रकार कहा—'देव! यह वेदवती सीताका परम प्रिय करनेवाली है; अतः आप इसे वरदान देकर प्रसन्न करें।' अग्निकी यह बात सुनकर कल्याणमयी सीताने भी मुझसे कहा—'प्रभो! यह वेदवती सदा मेरा प्रिय कार्य करनेवाली है। यह उच्चकोटिकी भगवद्भक्त है। अतः आप स्वयं ही इसे अंगीकार करें।'
तब मैंने कहा—देवि! मैं कलियुगमें तुम्हारे कथनानुसार कार्य करूँगा। तबतक यह देवताओंसे पूजित होकर ब्रह्मलोकमें निवास करे। पश्चात् पृथ्वीसे उत्पन्न होकर आकाशराजकी पुत्री होगी। सखी! इस प्रकार मैंने और लक्ष्मीने पूर्वकालमें जिसे वरदान दिया था, वह सुन्दरी इस समय नारायणपुरमें पृथ्वीसे प्रकट हुई है। वह लक्ष्मीके समान ही सद्गुणवती है। उसके नेत्र कमलके समान परम सुन्दर हैं। आज जब मैं शिकार खेलने गया था, तब वह मेरे देखनेमें आयी थी। वह अपने ही समान सुन्दरी सखियोंके साथ वनमें फूल तोड़ रही थी। वकुलमालिके! तुम वहाँ जाकर उस कन्याको देखो और यह जान लो कि वह अपने अनुपम रूप और लावण्यसे इस प्रशंसाके योग्य है या नहीं।
तब वकुलमालिका सखी देवाधिदेव भगवान्को प्रणाम करके गुंजाके दानेके समान लाल रंगवाले घोड़ेपर सवार हुई और उनके बताये हुए मार्गसे चल दी। रास्तेमें अनेक प्रकारके मृगों, पक्षियों तथा वृक्ष-लताओंका अवलोकन करती और बार-बार प्रसन्न होती हुई वह आरणी नदीके पश्चिम तटपर जा पहुँची। वह स्थान बहुतेरे वृक्षोंसे हरा-भरा था। वहाँ अगस्त्येश्वरके समीप अपने लाल घोड़ेसे उतरकर वकुलमाला स्नान तथा जलपान करके नदीके तटपर विश्राम करने लगी। इतनेमें ही राजभवनसे बहुत-सी स्त्रियाँ देवताके समीप वहाँ आयीं। वे सब-की-सब पद्मावतीकी सखियाँ थीं। उन्हें देखकर वकुलमालिका उनके समीप गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दरियो! तुम कौन हो? तुम्हारे आभूषण और हार तो बड़े विचित्र हैं। तुम कहाँसे आयी हो और इस स्थानपर तुम्हारा क्या कार्य है?'
उसकी बात सुनकर सखियोंने मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—हम आकाशराजकी रनिवासमें रहनेवाली स्त्रियाँ और महाराजकी पुत्री पद्मावतीकी सहेलियाँ हैं। एक दिन राजकुमारीको आगे करके हम वनमें गयी थीं। वहाँ उनके लिये फूल तोड़ती हुई सब सखियाँ एक वृक्षके नीचे जा बैठीं। वहीं हमें एक सुन्दर पुरुषका दर्शन प्राप्त हुआ। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम थी। उनका वक्षःस्थल लक्ष्मीका निवास जान पड़ता था। मुखपर मन्द-मन्द मुसकानकी छटा छा रही थी। दोनों भुजाएँ बहुत ही सुन्दर, विशाल और हृष्ट-पुष्ट थीं। कटिप्रदेशमें शुद्ध पीताम्बर शोभायमान था। उन्होंने एक हाथमें सुवर्णमय धनुष और दूसरेमें बाण धारण कर रखा था। मस्तकपर सोनेका मुकुट चमक रहा था। वे हार और भुजबंद आदि आभूषणोंसे विभूषित थे। उन्हें देखकर सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली हमारी कमलनयनी सखी पद्मावती सहसा बोल उठी—'देखो, देखो!' तब हम सब सखियाँ उन्हींकी ओर देखने लगीं। इतनेहीमें वे शीघ्र चले गये। उनके चले जानेपर सखी पद्मावती मूर्च्छित हो गयीं। उसे उसी अवस्थामें हमलोग राजभवनमें ले गयी। पुत्रीकी ऐसी अवस्था देखकर महाराजने ज्योतिषीसे पूछा—'विप्रवर! मेरी पुत्रीकी ग्रहदशाका फल बताइये।' तब बृहस्पतिके समान विद्वान् ब्राह्मणने मन-ही-मन ग्रहोंको विचारकर कहा—'नृपश्रेष्ठ! कोई उत्तम पुरुष आपकी कन्याके समीप आया था, उसे ही देखकर राजकुमारी मूर्च्छित हो गयी हैं। उसीके साथ पद्मावतीका विवाहसम्बन्ध होगा।'
- वैष्णवखण्ड-भूमिवराहखण्ड * २७१
राजासे ऐसा कहकर ज्यौतिषीजी अपने घर चले गये। तब आकाशराजने वैदिक ब्राह्मणोंको बुलाकर आदरपूर्वक कहा—'ब्राह्मणो! आपलोग देवमन्दिरमें जाकर वेदमन्त्रोंके साथ शंकरजीका महा-अभिषेक कीजिये।' उनको ऐसा आदेश देकर महाराजने हमें बुलाया और इस प्रकार कहा—'कन्याओ! तुम भगवान्के महा-अभिषेककी सामग्री जुटाओ।' राजाकी यह आज्ञा पाकर हम सब सखियाँ देवमन्दिरमें आयी हैं। शुभगे! अब तुम हमें अपना परिचय दो। कहाँसे या किसके कामसे यहाँ आगमन हुआ है अथवा यहाँसे कहाँ जानेका तुम्हारा विचार है? जान पड़ता है, इस दिव्य अश्वपर आरूढ़ होकर तुम देवलोकसे आयी हो।
सखियोंके इस प्रकार पूछनेपर वकुलमालिकाको बड़ा हर्ष हुआ। उसने मधुर वाणीमें कहा—'मैं वेंकटाचलसे इस घोड़ेपर सवार होकर आयी हूँ और महारानी धरणीदेवीसे मिलना चाहती हूँ। क्या राजभवनमें महारानीके दर्शन हो सकते हैं?' उसकी यह बात सुनकर उन कन्याओंने कहा—'शुभे! तुम हमारे साथ धरणीदेवीका दर्शन कर सकती हो।' तब वकुलमालिका उन कन्याओंके साथ राजभवनमें आयी। उधर धरणीदेवीने अन्तःपुरमें जाकर अपनी पुत्रीसे कहा—'बेटी! तुम्हारा कौन कार्य करूँ? तुम्हें कौन वस्तु प्रिय लगती है?' माताके इस प्रकार पूछनेपर मनस्वी कन्या पद्मावतीने मन्द स्वरमें कहा—'अम्बे! संसारमें जो सबसे अधिक नयनाभिराम है, साधु-संतोंके मनको भी जो परम प्रिय लगता है, ब्रह्मा आदि देवता भी जिसके दर्शनकी इच्छा रखते हैं, जो सबसे महान् और सर्वत्र व्यापक है, तेजस्वी पदार्थोंमें भी सर्वाधिक तेजस्वी है, देवताओंका भी देवता है, श्रेष्ठ भक्तोंको ही जो इस लोकमें सुलभ है तथा अभक्तोंको जिसकी प्राप्ति कभी नहीं होती, उसी वस्तुमें मेरा मन लग रहा है। माताजी! वह भक्तोंको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाला है, तुम मेरे लिये उसी वस्तुकी खोज कराओ।'
धरणी बोली—सुलोचने! उसके भक्तोंका लक्षण बतलाओ, जिनके लिये वह संसारमें सुलभ है।
पद्मावतीने कहा—उनके मनोरम लक्षणोंका वर्णन करती हूँ, सुनो। वे वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर होकर सदा वैदिक कर्मका अनुष्ठान करते हैं, सत्य बोलते हैं, दूसरोंके दोषोंको कभी नहीं देखते हैं, परायी निन्दासे दूर रहते हैं, दूसरोंके धनका अपहरण नहीं करते। परायी स्त्रियाँ कितनी ही सुन्दरी क्यों न हों, वे न तो उनकी याद करते हैं, न उनकी ओर देखते हैं और न कभी उनका स्पर्श ही करते हैं। ऐसे सदाचारी महात्माओंको ही तुम वैष्णव जानो। जो सब प्राणियोंके प्रति दयाभावसे युक्त होकर सबके हितमें संलग्न रहते हैं तथा देवेश्वर विष्णुके गुणोंका गान करते हैं, उनको निश्चय ही भगवान्का भक्त समझो। जिस किसी वस्तुसे भी जो सन्तुष्ट रहते, अपनी ही स्त्रीके प्रति अनुराग रखते तथा राग, भय और क्रोधसे दूर रहते हैं, उन पुरुषोंको तुम भगवान् विष्णुका भक्त जानो। जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त हैं, वे ही वैष्णव माने गये हैं। ऐसे सदाचारी भक्तोंको ही उन परमात्माकी प्राप्ति होती है। उन्हीं परमेश्वरमें मेरा प्रेम हो गया है, मेरा मन उन्हींसे मिलना चाहता है। मा! भगवान् विष्णुके सिवा और किसी वस्तुकी मुझे कोई इच्छा नहीं है। मैं श्यामसुन्दर भगवान् विष्णुका स्मरण करती हूँ। उन्हींके हरि, अच्युत आदि नाम लेती हूँ और उन्हींके सहारे जीवन धारण करती हूँ। अतः जिस प्रकार उनसे सम्बन्ध हो सके वैसा उपाय सोचो।
मातासे ऐसा कहकर दयनीय दशाको पहुँची हुई कमलसदृश मुखवाली पद्मावती चुप हो गयी। पुत्रीकी बातें सुनकर धरणीदेवी यह सोचने लगी
२७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कि—'भगवान् विष्णु कैसे प्रसन्न होंगे?' इसी समय अगस्त्येश्वरकी पूजा करके पूर्वोक्त कन्याएँ वकुलमालिकाके साथ धरणीदेवीका दर्शन करनेके लिये आयीं। महारानी धरणीने घरपर पधारे हुए ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन दे उनका स्वागत-सत्कार करके वस्त्र और आभूषणोंसहित पर्याप्त दक्षिणा दी तथा अपने मनोरथकी सिद्धिके लिये आशीर्वाद लेकर उन सबको विदा किया। तत्पश्चात् वहाँ आयी हुई मनस्विनी कन्याओंसे पूछा—'बताओ, यह श्रेष्ठ कन्या कौन है? तुमलोगोंसे इसका साथ कहाँ हुआ है? इस राजभवनमें यह किसलिये आयी है? मुझे तो यह कोई पूजनीया देवी प्रतीत होती है।'
कन्याएँ बोलीं—महारानी! यह देवी वास्तवमें दिव्यांगना है और किसी कार्यसे आपके ही पास आयी है। देवालयमें भगवान् शंकरके समीप हमलोगोंसे यह मिली है। हमारे पूछनेपर इसने बताया कि 'मैं पूजनीया महारानीसे मिलने आयी हूँ।' तब हमने कहा—'तुम हमारे ही साथ चलो। हम महारानीकी दासियाँ हैं और अभी राजमहलमें चलेंगी।' इस प्रकार यह आपके समीप आयी है। अब आप ही पूछें, इसके आगमनका क्या उद्देश्य है।
तब धरणीदेवीने पूछा—तुम कहाँसे आयी हो? मुझसे तुम्हें क्या काम है? सच-सच बताओ।
वकुलमालिका बोली—महारानी! मैं वेंकटाचलसे आयी हूँ। मेरा नाम वकुलमालिका है। हमारे स्वामी भगवान् नारायण सदा श्रीवेंकटाचलमें निवास करते हैं। एक दिन वे हंसके समान श्वेत और मनके समान वेगशाली अश्वपर सवार हो वेंकटगिरिके पास ही वनमें शिकार खेलनेके लिये गये और एक वनसे दूसरे वनमें विचरते हुए आरणी नदीके तटपर जा पहुँचे। वहाँ घोड़ेसे उतरकर वे नदीके सुन्दर तटपर भ्रमण करने लगे। उसी समय उन्होंने फूल तोड़ती हुई कुछ सुन्दरी कन्याओंको देखा। उनके बीचमें एक तन्वंगी कन्या थी, जो लक्ष्मीजीके समान सुवर्ण गौरी एवं अत्यन्त मनोहर थी। उस कन्याके प्रति भगवान्का मन अनुरक्त हो गया। उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे श्रीहरिने उन कन्याओंसे पूछा—'यह सुन्दरी कुमारी कौन है?' कन्याओंने उत्तर दिया—'महाबल! यह आकाशराजकी कन्या है।' इतना सुनकर वे घोड़ेपर सवार हो गये और बड़े वेगसे अपने निवासस्थान वेंकटाचलपर जा पहुँचे। वहाँ स्वामिपुष्करिणीके किनारे अपने धाममें प्रवेश करके भगवान्ने मुझे बुलाया और इस प्रकार कहा—'सखी वकुलकालिके! तुम आकाशराजके नगरमें जाकर महाराजके अन्तःपुरमें प्रवेश करो और महारानी धरणीसे मिलकर कुशल-प्रश्न पूछनेके पश्चात् उनकी सुन्दरी पुत्री पद्मालयाको मेरे लिये माँगो तथा राजाका मनोभाव जानकर शीघ्र लौट आओ।' महारानी! भगवान्की ऐसी आज्ञा होनेपर मैं तुम्हारे महलमें आयी हूँ। अब तुम मन्त्रीसहित महाराजसे सलाह करके जो उचित जान पड़े वैसा करो।
वकुलमालिकाकी बात सुनकर महारानी धरणी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने आकाशराजको बुलाया और पद्मालयाके पास जाकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। सुनकर राजा भी अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन्त्रियों तथा पुरोहितोंसे बोले—'मेरी पुत्री पद्मालया दिव्यरूपवाली अयोनिजा कन्या है। उसके लिये वेंकटाचल-निवासी देवाधिदेव भगवान् नारायणने याचना की है। आज मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। बताइये, आपलोगोंकी क्या राय है?' महाराजका उत्तम वचन सुनकर सब मन्त्री प्रसन्नचित्त होकर बोले—'राजेन्द्र! यदि ऐसी बात है, तो हम सब लोग कृतार्थ हो गये। इस सम्बन्धसे आपका यह कुल सबसे उन्नत होगा। आपकी अनुपम कन्या साक्षात् भगवती लक्ष्मीके साथ आनन्दपूर्वक रहेगी। आप
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २७३
इसे देवाधिदेव शार्ङ्गधनुषधारी परमात्मा विष्णुको समर्पित करें। यह शोभामय वसन्त-ऋतु है। इसमें इस शुभ कार्यका अनुष्ठान शीघ्र कर डालना चाहिये। बृहस्पतिजीको बुलाकर आप विवाहके लिये लग्न निश्चित करें।'
तदनन्तर 'बहुत अच्छा' कहकर आकाशराजने देवलोकसे बृहस्पतिजीको बुलाया और वर-कन्याके विवाहके लिये लग्न पूछा—'ब्रह्मन्! कन्याका जन्मनक्षत्र मृगशिरा है और वरका श्रवण। अतः इन दोनोंके विवाह-सम्बन्धका विचार कीजिये।' तब बृहस्पतिजीने कहा—'वर और कन्या दोनोंके सुखकी वृद्धिके लिये ज्योतिषियोंने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रको सर्वश्रेष्ठ माना है। अतः वैशाखमासके उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें दोनोंका विधिपूर्वक विवाहकार्य सम्पन्न किया जाय।' यह सुनकर राजाने बृहस्पतिजीकी पूजा करके उन्हें विदा किया और भगवान्की दूतीसे कहा—'शुभे! तुम भगवान्के निवासस्थानको जाओ और देवाधिदेव नारायणसे कहो—वैशाखमासमें यह मंगलकार्य सम्पन्न होगा। आप वैवाहिक मंगलाचार सम्पन्न करके यहाँ पधारें।'
इसके बाद देवीका प्रिय करनेवाले शुकरूपी दूतको वकुलमालिकाके साथ भेजकर आकाशराजने अपने पुत्रको वायु, इन्द्र आदि देवताओंके बुलानेके कार्यमें नियुक्त किया। साथ ही विश्वकर्माको बुलाकर अपने नगरकी सजावटके काममें लगाया। विश्वकर्माने पलभरमें अपना कार्य पूर्ण कर दिया। उधर वकुलमालिका अश्वपर सवार हो शुकके साथ प्रस्थित हुई और वेंकटाचलपर पहुँचकर देवालयके समीप घोड़ेसे नीचे उतरी। फिर शुकको अपने साथ ले मन्दिरके भीतर गयी। वहाँ सुन्दर नेत्रोंवाले भगवान् नारायणको लक्ष्मीजीके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान देख प्रणाम करके प्रसन्नतापूर्वक बोली—'प्रभो! वहाँका कार्य तो मैंने पूरा कर लिया, उधरसे मांगलिक वार्ता करनेके लिये यह शुक आया हुआ है।'
तब भगवान्की आज्ञा पाकर शुकने उन्हें प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'माधव! भूमिकन्या पद्मावतीने आपके पास यह सन्देश भेजा है कि मुझे अंगीकार कीजिये। रमापते! मैं आपके ही नाम लेती हूँ, आपके ही स्वरूपका सदा स्मरण करती हूँ। मधुसूदन! आपकी प्रसन्नताके लिये ही मैं सब कार्य करती हूँ। मेरे इस काममें पिता और माताकी भी सम्मति है। देवेश! मुझपर कृपा करके मुझे अंगीकार कीजिये।'
शुकका यह प्रिय वचन सुनकर श्रीहरिने कहा—'शुक! जाओ और पद्मालयासे इस प्रकार कहो—'देवि! श्रीनारायणदेवने कहा है कि मैं देवताओंको साथ लेकर मंगलमय विवाहकार्य सम्पन्न करनेके लिये अवश्य आऊँगा।' भगवान्का यह वचन सुनकर और प्रसादरूपसे उनकी दी हुई वनमाला लेकर शुक शीघ्र ही आकाशराजकी कन्याके पास लौट गया। उसने कस्तूरीकी सुगन्धसे युक्त वह तुलसीमाला राजकुमारीको देकर प्रणाम किया और भगवान्का शुभ सन्देश कह सुनाया। सुनकर उस प्रसादमालाको हाथमें ले पद्मालयाने उसे मस्तकपर चढ़ा लिया और भगवान्के आगमनकी प्रतीक्षा करती हुई योग्य आभूषण धारण किये। आकाशराजने भी आनन्दमग्न हो चन्द्रदेवको बुलाकर आदरपूर्वक कहा—'राजन्! आप नाना प्रकारका सरस भोजन तैयार कीजिये जो भगवान् विष्णुके भोगमें आने योग्य हो। उत्तम-से-उत्तम अन्नकी व्यवस्था होनी चाहिये।' इस प्रकार प्रबन्ध करके भगवान्के आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए आकाशराज प्रसन्न मनसे राजसभामें बैठे थे।
तदनन्तर देवाधिदेव भगवान् नारायणने भी लक्ष्मीजीको बुलाकर कहा—'कल्याणि! अपनी सखियोंको आज्ञा दो और वैवाहिक कार्य सम्पन्न करो।' भगवान्का यह आदेश सुनकर लक्ष्मीदेवीने सखियोंको बुलाया और सबको आवश्यक कार्य करनेकी आज्ञा दी। लक्ष्मीकी आज्ञासे प्रीतिदेवीने
| २७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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सुगन्धित तेल लिया, श्रुतिदेवी रेशमी वस्त्र लेकर भगवान्के समीप खड़ी हुईं, स्मृति भी भाँति-भाँतिके आभूषण लेकर प्रसन्नतापूर्वक उपस्थित हुईं। धृतिने दर्पण हाथमें लिया, शान्तिने कस्तूरीको प्रस्तुत किया, लज्जादेवी यक्षकर्दम१ लेकर भगवान्के सामने खड़ी हुईं, कीर्तिने सोनेका पट्ट तथा रत्नयुक्त मुकुट हाथमें लिया, शचीने छत्र लगाया, सरस्वतीदेवी चँवर डुलाने लगीं, गौरीदेवीने दूसरा चँवर हाथमें लिया, विजया और जया पंखा झलने लगीं। उपर्युक्त सब देवियोंको वहाँ उपस्थित देख लक्ष्मीदेवीने शीघ्रतापूर्वक उठकर सुगन्धित तेल हाथमें लिया और भगवान्के मस्तकसे लेकर सब अंगोंमें उसे लगाकर सुगन्धित चूर्णसे उबटन किया। इस प्रकार श्रीनारायणदेवके सब अंगोंको भलीभाँति मलकर आकाशगंगा आदि तीर्थोंसे भरकर लाये हुए सौ सुवर्णमय कलश मँगवाये और उनमेंसे एक-एकको लेकर उसके जलसे भगवान्का अभिषेक किया। तत्पश्चात् सुनहरे रंगके सुगन्धयुक्त चन्दनसे भगवान्के अंगमें लेप लगाया। फिर उनकी कमरमें रेशमी पीताम्बर बाँधकर उसमें करधनी पहना दी। मस्तकपर मुकुट रखा और अन्यान्य आभूषणोंसे भी विभिन्न अंगोंको विभूषित किया। उनकी सभी अंगुलियोंमें लक्ष्मीजीने दिव्य सोनेकी अंगूठियाँ पहना दीं। इसके बाद धृतिदेवीने भगवान्के समीप जाकर दर्पण दिखाया। दर्पण देखकर देवाधिदेव विष्णुने स्वयं ही ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण किया। तदनन्तर वे लक्ष्मीजीके साथ गरुड़पर आरूढ़ हुए। इसी समय ब्रह्मा, महादेवजी, इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर उनकी सेवामें उपस्थित हुए। इन सब देवताओं, वसिष्ठ आदि मुनीश्वरों, सनकादि योगियों तथा अन्य भगवद्भक्तोंके साथ भगवान् विष्णु नारायणपुरको गये। उस समय भगवान् विष्णुके समीप देवताओंके नगाड़े बज रहे थे। मुनिलोग स्वस्त्ययनसम्बन्धी सूक्तोंका जप करते हुए भगवान्के पीछे-पीछे चल रहे थे। भगवान्के साथ सम्पूर्ण देवता और विष्वक्सेन आदि पार्षद चल रहे थे। वकुलमाला आदि सखियाँ रथोंमें बैठकर गयीं। इस प्रकार भगवान्ने बारात लेकर आकाशराजके सजे-सजाये नगरमें प्रवेश किया।
आकाशराजने देखा, भगवान् आ गये और पुत्री पद्मावती भी ऐरावतपर बैठकर समस्त पुरीकी परिक्रमा करके गोपुरद्वारपर आ पहुँची है। तब वे वर-वधूको साथ ले आकर भाई-बन्धुओंके साथ भगवान्का दर्शन करते हुए खड़े हो गये। भगवान्ने अपने कण्ठमें पड़ी हुई माला हाथमें लेकर पद्मालयाके गलेमें डाल दी और पद्मालयाने बेलाके फूलोंका गजरा लेकर भगवान्के कण्ठमें पहना दिया। ऐसा करके वे दोनों सवारीसे उतर गये और थोड़ी देर पीढ़ीपर खड़े होनेके पश्चात् सुन्दर गृहमें प्रवेश किया। उनके साथ ब्रह्मा आदि देवताओंका समुदाय भी था। ब्रह्माजीने अंकुरारोपणपूर्वक मांगल्य-सूत्र-बन्धन (कंकण-बन्धन)-से लेकर लाजाहोमतककी सम्पूर्ण वैवाहिक विधि सम्पन्न करायी। फिर व्रत-पालनकी आज्ञा लेकर पद्मालया और श्रीहरिने पृथक्-पृथक् शयन किया। पुनः चौथे दिन चतुर्थी कर्म आदि सब कार्य पूर्ण करके चतुर्मुख ब्रह्माने आकाशराजकी अनुमति ले दोनों देवियोंके साथ भगवान्को गरुड़पर बिठाया और देवताओंके साथ वहाँसे चलनेकी तैयारी की। तब आकाशराजने इन्द्र आदि देवताओंके साथ अपनी पुत्री और दामादका प्रिय करनेके लिये सोनेके कड़ाहोंमें अगहनीके चावल, मूँगसे भरे हुए अनेक पात्र और सैकड़ों घीके घड़े दहेजमें दिये। हजारों
१- कपूर, अगर, कस्तूरी और कंकोलसे बनी हुई अंगराग-सामग्रीका नाम 'यक्षकर्दम' है।
पद्मालया और भगवान्का परस्पर माला पहनाना
२७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
घड़े दूध और दहीसे भरे हुए अनेकों भाण्ड, आम, केला और नारियलके दिव्य फल, आँवले, कूष्माण्ड, राजकदलीके फल, कटहल, बिजौरा नींबू, शक्करसे भरे हुए घड़े, सोना, मणि, मोती, करोड़ों रेशमी वस्त्र, हजारों दास-दासी, करोड़ों गाय, हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगके दस हजार घोड़े और सदा उन्मत्त रहनेवाले सौसे अधिक ऊँचे-ऊँचे हाथी—ये सारी वस्तुएँ भगवान् विष्णुको भेंट करके आकाशराज उनके आगे खड़े हुए।
पद्मावती और लक्ष्मीदेवीके साथ वेंकटनाथ भगवान् विष्णु दहेजकी वह सब सामग्री देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने श्वसुरसे बोले—'राजन्! इस समय आप मेरे गुरु हैं। आपकी जो इच्छा हो मुझसे वर माँगिये।' भगवान्की यह बात सुनकर आकाशराजने कहा—'देव! इस संसारमें आपकी अनन्य सेवा ही मेरे द्वारा होती रहे, मेरा मन आपके चरणारविन्दोंमें रमता रहे और आपमें मेरी निरन्तर भक्ति बनी रहे।'
श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! आपने जो कहा है, वह सब पूर्ण होगा। तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओने और शुक आदि मुनिगणोंने भगवान् पुरुषोत्तमका स्तवन किया। फिर ब्रह्मा आदि सब देवताओंका यथायोग्य सत्कार करके श्रीहरिने उन्हें स्वर्गलोकमें जानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दे दी। उन सबके चले जानेपर भगवान् नारायण स्वामिपुष्करिणीके तटपर लक्ष्मीदेवी और पद्मावतीके साथ अपने दिव्य धाममें रहने लगे।
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तोण्डमानको निषादके साथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन होना
पृथ्वीने पूछा— मुझे धारण करनेवाले प्रियतम! कलियुगमें आपका दर्शन किसको होगा तथा परम सुन्दर विग्रहवाले भगवान् श्रीनिवासका दर्शन भी किसे प्राप्त हो सकेगा? यह मुझे बतलाइये।
भगवान् वराह बोले— देवि! सुनो। जो भविष्यमें होनेवाली बात है उसे भूतकालकी भाँति बतला रहा हूँ। इस पवित्र पर्वतपर एक वसु नामक निषाद था, जो श्यामाक वन (सावाँके जंगल)-की रक्षा किया करता था। भगवान् पुरुषोत्तमके प्रति उसके मनमें बड़ी भक्ति थी। वह सावाँके चावलोंका भात बनाकर उसमें मधु मिला देता और श्रीदेवी तथा भूदेवीसहित देवाधिदेव भगवान् विष्णुको निवेदन करके स्वयं प्रसाद पाता था। इस प्रकार भक्ति करनेवाले उस निषादकी कल्याणमयी भार्या चित्रवतीने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया, जिसका नाम वीर था। वसु अपने पुत्र तथा पतिव्रता पत्नीके साथ आनन्दपूर्वक रहता था।
एक दिन वह अपने पुत्रको सावाँकी रक्षा करनेका आदेश दे स्वयं पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चला। मधुका छाता देखनेकी इच्छासे वह एक वनसे दूसरे वनमें शीघ्रतापूर्वक चला जा रहा था। इधर उसके पुत्रने सावाँके तैयार किये हुए भातको लेकर कुछ अग्निमें डाल दिया और कुछ पीसकर वृक्षकी जड़में भगवान् श्रीपतिको भोग लगाया। फिर भगवान्का प्रसाद खाकर वीर वहाँ सुखसे बैठा रहा। तदनन्तर वसु मधु लेकर आया और सावाँके चावलोंको खाया हुआ देख अपने पुत्रको फटकारने लगा। उसने बड़ी उतावलीके साथ वीरको मार डालनेके लिये तलवार लेकर हाथको ऊपर उठाया। उस समय भगवान् विष्णु उस वृक्षपर ही विराजमान थे। उन्होंने वसुकी तलवार हाथसे पकड़ ली। तब उसने वृक्षकी ओर देखा। भगवान् विष्णु हाथमें शंख, चक्र
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २७७
और गदा लिये तथा आधा शरीर वृक्षपर टिकाये खड़े थे। उन्हें देखते ही वसुने तलवार छोड़ दी और भगवान्के चरणोंमें प्रणाम करके कहा— 'देवदेवेश्वर! आप यह क्या कर रहे हैं?'
श्रीभगवान् बोले—वसो! तुम मेरी बात सुनो। तुम्हारा पुत्र मुझमें भक्ति रखता है। यह तुमसे भी बढ़कर मुझे प्यारा है। इसलिये मैंने इसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया। इसकी दृष्टिमें मैं सर्वत्र हूँ, किंतु तुम्हारी दृष्टिमें केवल स्वामिपुष्करिणीके तटपर रहता हूँ।
भगवान्का यह वचन सुनकर वसु बड़ा प्रसन्न हुआ। एक समय चन्द्रवंशमें तोण्डमान नामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए। वे बड़े वीर थे। उनके पिताका नाम सुवीर और माताका नाम नन्दिनी था। पाँच ही वर्षकी अवस्थामें उनके हृदयमें भगवान् विष्णुकी भक्ति प्रकट हो गयी थी। वे बड़े बुद्धिमान् और शीलता, शूरता तथा पराक्रम आदि गुणोंकी निधि थे। युवा होनेपर उन्होंने पाण्ड्यनरेशकी सुन्दरी पुत्री पद्माके साथ विवाह किया। तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न देशोंकी सैकड़ों स्वयंवरा कन्याओंको भी वे ब्याह लाये और नारायणपुरमें रहकर इस पृथ्वीपर देवराज इन्द्रकी भाँति सुख भोगने लगे। एक दिन सिंहके समान पराक्रमी तोण्डमान अपने पिताकी आज्ञा लेकर वेंकटाचलके समीप शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ अपने सेवकोंके साथ पैदल घूमते हुए उन्होंने एक यूथपति गजराजको देखा और उसे पकड़नेके लिये उसका पीछा किया। सुवर्णमुखरी नदीको पार करके वे परम उत्तम ब्रह्मर्षि शुकके पास गये और उन्हें प्रणाम करके, उनकी आज्ञा ले एक वनसे दूसरे वनमें चलते गये। एक जगह उन्होंने रेणुकादेवीको देखा, जो वल्मीक—बाँबी (बिमौट)—के आकारमें खड़ी थीं। उनको प्रणाम करके वीर तोण्डमान पश्चिमकी ओर चले गये। आगे जाकर उन्हें एक पँचरंगा तोता दिखायी दिया। फिर उसे पकड़नेके लिये वे भी उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगे। तोता श्रीनिवासका नाम रटता हुआ शीघ्र ही पर्वतके शिखरपर जा पहुँचा। पीछा करते हुए राजा भी गिरिराजपर चढ़ गये और उस तोतेको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते श्यामाक वनमें जा पहुँचे। वहाँ तोतेको न देखकर उन्होंने उस वनकी रक्षा करनेवाले निषादको देखा। उसने भी राजाको आते देख शीघ्रतापूर्वक आगे आकर उनकी अगवानी की और उन्हें प्रणाम करके विनीतभावसे वह दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। तोण्डमानने भी उसका आदर करके उससे पूछा—'वनेचर! इधर कोई पँचरंगा तोता आया है? क्या तुमने उसे देखा है? वह 'श्रीनिवास-श्रीनिवास' की रट लगा रहा था। बताओ वह किधर गया है?'
वनेचर बोला—महाराज! वह पाँच रंगोंवाला शुक भगवान् श्रीनिवासको बहुत प्रिय है। उसे श्रीदेवी और भूदेवीने पाल-पोसकर बड़ा किया है। वह सदा भगवान् श्रीहरिके ही पास रहता