संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पसीनेका निवारण करता था। प्रातःकाल स्नान करके दिन-रात राम-नामका जप करता था। इस प्रकार धर्मानुष्ठान करके वह दूसरे जन्ममें वल्मीकका पुत्र हुआ। उस समय वह महायशस्वी वाल्मीकिके नामसे विख्यात हुआ। उन्हीं वाल्मीकिजीने अपने मनोहर प्रबन्ध रचनाद्वारा संसारमें दिव्य राम-कथाको प्रकाशित किया, जो समस्त कर्म-बन्धनोंका उच्छेद करनेवाली है।
मिथिलापते! देखो, वैशाखका माहात्म्य कैसा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला है, जिससे एक व्याध भी परम दुर्लभ ऋषिभावको प्राप्त हो गया। यह रोमांचकारी उपाख्यान सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो इसे सुनता और सुनाता है, वह पुनः माताके स्तनका दूध पीनेवाला नहीं होता।
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धर्मवर्णकी कथा, कलिकी अवस्थाका वर्णन, धर्मवर्ण और पितरोंका संवाद एवं वैशाखकी अमावास्याकी श्रेष्ठता
मिथिलापतिने पूछा—ब्रह्मन्! इस वैशाख मासमें कौन-कौन-सी तिथियाँ पुण्यदायिनी हैं?
श्रुतदेवजी बोले—सूर्यके मेष राशिपर स्थित होनेपर वैशाख मासमें तीसों तिथियाँ पुण्यदायिनी मानी गयी हैं। एकादशीमें किया हुआ पुण्य कोटिगुना होता है। उसमें स्नान, दान, तपस्या, होम, देवपूजा, पुण्यकर्म एवं कथाका श्रवण किया जाय तो वह तत्काल मुक्ति देनेवाला है। जो रोग आदिसे ग्रस्त और दरिद्रतासे पीड़ित हो वह मनुष्य इस पुण्यमयी कथाको सुनकर कृतकृत्य होता है। वैशाख मास मनसे सेवन करने योग्य है; क्योंकि वह समय उत्तम गुणोंसे युक्त है। दरिद्र, धनाढ्य, पंगु, अन्धा, नपुंसक, विधवा, साधारण स्त्री, पुरुष, बालक, युवा, वृद्ध तथा रोगसे पीड़ित मनुष्य ही क्यों न हो, वैशाख मासका धर्म सबके लिये अत्यन्त सुखसाध्य है। परम पुण्यमय वैशाख मासमें जब सूर्य मेष राशिमें स्थित हों, तब पापनाशिनी अमावास्या कोटि गयाके समान फल देनेवाली होती है। राजन्! जब पृथ्वीपर राजर्षि सावर्णिका शासन था, उस समय तीसवें कलियुगके अन्तमें सभी धर्मोंका लोप हो चुका था। उसी समय आनर्त देशमें धर्मवर्ण नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे। मुनिवर धर्मवर्णने उस कलियुगमें ही किसी समय महात्मा मुनियोंके सत्रयागमें सम्मिलित होनेके लिये पुष्कर क्षेत्रकी यात्रा की। वहाँ कुछ व्रतधारी महर्षियोंने कलियुगकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा था—'सत्ययुगमें भगवान् विष्णुको संतुष्ट करनेवाला जो पुण्य एक वर्षमें साध्य है, वही त्रेतामें एक मासमें और द्वापरमें पंद्रह दिनोंमें साध्य होता है; परंतु कलियुगमें भगवान् विष्णुका स्मरण कर लेनेसे ही उससे दसगुना पुण्य होता है*। कलिमें बहुत थोड़ा पुण्य भी कोटिगुना होता है। जो एक बार भी भगवान्का नाम लेकर दयादान करता है और दुर्भिक्षमें अन्न देता है, वह निश्चय ही ऊर्ध्वलोकमें गमन करता है।'
यह सुनकर देवर्षि नारद हँसते हुए उन्मत्तके समान नृत्य करने लगे। सभासदोंने पूछा—'नारदजी! यह क्या बात है?' तब बुद्धिमान् नारदजीने हँसते हुए उन सबको उत्तर दिया—
* कृते यद् वत्सरात्साध्यं पुण्यं माधवतोषणम्। त्रेतायां मासतः साध्यं द्वापरे पक्षतो नृप॥
तस्माद्दशगुणं पुण्यं कलौ विष्णुस्मृतेर्भवेत्।
(स्क० पु०, वै० मा० २२। २०-२१)
* वैष्णवखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य * ५०१
‘आपलोगोंका कथन सत्य है। इसमें सन्देह नहीं कि कलियुगमें स्वल्प कर्मसे भी महान् पुण्यका साधन किया जाता है तथा क्लेशोंका नाश करनेवाले भगवान् केशव स्मरणमात्रसे ही प्रसन्न हो जाते हैं। तथापि मैं आपलोगोंसे यह कहता हूँ कि कलियुगमें ये दो बातें दुर्घट हैं—शिशनेन्द्रियका निग्रह और जिह्वाको वशमें रखना। ये दोनों कार्य जो सिद्ध कर ले, वही नारायणस्वरूप है। अतः कलियुगमें आपको यहाँ नहीं ठहरना चाहिये।’
नारदजीकी यह बात सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि सहसा यज्ञको समाप्त करके सुखपूर्वक चले गये। धर्मवर्णने भी वह बात सुनकर भूलोकको त्याग देनेका विचार किया। उन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करके दण्ड और कमण्डलु हाथमें लिया और जटा-वल्कलधारी होकर वे कलियुगके अनाचारी पुरुषोंको देखनेके लिये घर छोड़कर चल दिये। उनके मनमें बड़ा विस्मय हो रहा था। उन्होंने देखा, प्रायः मनुष्य पापाचारमें प्रवृत्त हो बड़े भयंकर एवं दुष्ट हो गये हैं। ब्राह्मण पाखण्डी हो चले हैं। शूद्र संन्यास धारण करते हैं। पत्नी अपने पतिसे द्वेष रखती है। शिष्य गुरुसे वैर करता है। सेवक स्वामीके और पुत्र पिताके घातमें लगा हुआ है। ब्राह्मण शूद्रवत् और गौएँ बकरियोंके समान हो गयी हैं। वेदोंमें गाथाकी ही प्रधानता रह गयी है। शुभकर्म साधारण लौकिक कृत्योंके ही समान रह गये हैं, इनके प्रति किसीकी महत्त्व बुद्धि नहीं है। भूत, प्रेत और पिशाच आदिकी उपासना चल पड़ी है। सब लोग मैथुनमें आसक्त हैं और उसके लिये अपने प्राण भी खो बैठते हैं। सब लोग झूठी गवाही देते हैं। मनमें सदा छल और कपट भरा रहता है। कलियुगमें सदा लोगोंके मनमें कुछ और, वाणीमें कुछ और तथा क्रियामें कुछ और ही देखा जाता है। सबकी विद्या किसी-न-किसी स्वार्थको लेकर ही होती है और केवल राजभवनमें उसका आदर होता है। संगीत आदि कलात्मक विद्याएँ भी राजाओंको प्रिय हैं। कलिमें अधम मनुष्य पूजे जाते हैं और श्रेष्ठ पुरुषोंकी अवहेलना होती है। कलिमें वेदोंके विद्वान् ब्राह्मण दरिद्र होते हैं। लोगोंमें प्रायः भगवान्की भक्ति नहीं होती। पुण्यक्षेत्रमें पाखण्ड अधिक बढ़ जाता है। शूद्रलोग जटाधारी तपस्वी बनकर धर्मकी व्याख्या करते हैं। सभी मनुष्य अल्पायु, दयाहीन और शठ होते हैं। कलिमें प्रायः सभी धर्मके व्याख्याता बन जाते हैं और दूसरोंसे कुछ लेनेमें ही उत्सव मानते हैं। अपनी पूजा कराना चाहते हैं और व्यर्थ ही दूसरोंकी निन्दा करते हैं। अपने घर आनेपर सभी अपने स्वामीके दोषोंकी चर्चामें तत्पर रहते हैं। कलिमें लोग साधुओंको नहीं जानते। पापियोंको ही बहुत आदर देते हैं। दुराग्रही लोग इतने दुराग्रही होते हैं कि साधुपुरुषोंके एक दोषका भी ढिंढोरा पीटते हैं और पापात्माओंके दोषसमूहोंको भी गुण बतलाते हैं। कलिमें गुणहीन मनुष्य दूसरोंके गुण न देखकर उनके दोष ही ग्रहण करते हैं। जैसे पानीमें रहनेवाली जोंक प्राणियोंके रक्त पीती है, जल नहीं पीती, उसी प्रकार जोंकके धर्मसे संयुक्त हो मनुष्य दूसरेका रक्त चूसते हैं। ओषधियाँ शक्तिहीन होती हैं। ऋतुओंमें उलट-फेर हो जाता है। सब राष्ट्रोंमें अकाल पड़ता है। कन्या योग्य समयमें सन्तानोत्पत्ति नहीं करती। लोग नट और नर्तकोंकी विद्याओंसे विशेष प्रेम करते हैं। जो वेद-वेदान्तकी विद्याओंमें तत्पर और अधिक गुणवान् हैं, उन्हें अज्ञानी मनुष्य सेवककी दृष्टिसे देखते हैं, वे सब-के-सब भ्रष्ट होते हैं। कलिमें प्रायः लोग श्राद्धकर्मका त्याग करते हैं। वैदिक कर्मोंको छोड़ बैठते हैं। प्रायः जिह्वापर भगवान्
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विष्णुके नाम कभी नहीं आते। लोग शृंगार रसमें आनन्दका अनुभव करते हैं और उसीके गीत गाते हैं। कलियुगके मनुष्योंमें न कभी भगवान् विष्णुकी सेवा देखी जाती है, न शास्त्रीय चर्चा होती है, न कहीं यज्ञकी दीक्षा है, न विचारका लेश है, न तीर्थयात्रा है और न दान-धर्म ही होते देखे जाते हैं। यह कितने आश्चर्यकी बात है?
उन सबको देखकर धर्मवर्णको बड़ा भय लगा। पापसे कुलकी हानि होती देख, अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो वे दूसरे द्वीपमें चले गये। सब द्वीपों और लोकोंमें विचरते हुए बुद्धिमान् धर्मवर्ण किसी समय कौतूहलवश पितृलोकमें गये। वहाँ उन्होंने कर्मसे कष्ट पाते हुए पितरोंको बड़ी भयंकर दशामें देखा। वे दौड़ते, रोते और गिरते-पड़ते थे। उन्होंने अपने पितरोंको भी नीचे अन्धकूपमें पड़े हुए देखा। उनको देखकर आश्चर्यचकित हो दयालु धर्मवर्णने पूछा— 'आपलोग कौन हैं, किस दुस्तर कर्मके प्रभावसे इस अन्धकूपमें पड़े हैं?'
पितरोंने कहा—हम श्रीवत्स गोत्रवाले हैं। पृथ्वीपर हमारी कोई सन्तान नहीं रह गयी है, अतः हम श्राद्ध और पिण्डसे वंचित हैं, इसीलिये यहाँ हमें नरकका कष्ट भोगना पड़ता है। सन्तानहीन दुरात्माओंका अन्धकूपमें पतन होता है। हमारे वंशमें एक ही महायशस्वी पुरुष है, जो धर्मवर्णके नामसे विख्यात है। किंतु वह विरक्त होकर अकेला घूमता-फिरता है। उसने गृहस्थ-धर्मको नहीं स्वीकार किया है। वह एक ही तन्तु हमारे कुलमें अवशिष्ट है। उसकी भी आयु क्षीण हो जानेपर हमलोग घोर अन्धकूपमें गिर पड़ेंगे, जहाँसे फिर निकलना कठिन होगा। इसलिये तुम पृथ्वीपर जाकर धर्मवर्णको समझाओ। हमलोग दयाके पात्र हैं, हमारे वचनोंसे उसको यह बताओ कि 'हमारी वंशरूपा दूर्वाको कालरूपी चूहा प्रतिदिन खा रहा है। क्रमशः सारे वंशका नाश हो गया है, एक तुम्हीं बचे हो। जब तुम भी मर जाओगे तब सन्तान-परम्परा न होनेके कारण तुम्हें भी अन्धकूपमें गिरना पड़ेगा। इसलिये गृहस्थ-धर्मको स्वीकार करके सन्तानकी वृद्धि करो। इससे हमारी और तुम्हारी दोनोंकी ऊर्ध्वगति होगी। यदि एक भी पुत्र वैशाख, माघ अथवा कार्तिक मासमें हमारे उद्देश्यसे स्नान, श्राद्ध और दान करेगा तो उससे हमलोगोंकी ऊर्ध्वगति होगी और नरकसे उद्धार हो जायगा। यदि एक पुत्र भी भगवान् विष्णुका भक्त हो जाय, एक भी एकादशीका व्रत रहने लगे अथवा यदि एक भी भगवान् विष्णुकी पापनाशक कथा श्रवण करे तो उसकी सौ बीती हुई पीढ़ियोंका तथा सौ भावी पीढ़ियोंका उद्धार होता है। वे पीढ़ियाँ पापसे आवृत होनेपर भी नरकका दर्शन नहीं करतीं। दया और धर्मसे रहित उन बहुत-से पुत्रोंके जन्मसे क्या लाभ, जो कुलमें उत्पन्न होकर सर्वव्यापी भगवान् नारायणकी पूजा नहीं करते*।' इस प्रकार प्रिय वचनोंद्वारा धर्मवर्णको समझाकर तुम उसे विरक्तिपूर्ण ब्रह्मचर्य-आश्रमसे गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश करनेकी सलाह दो।
पितरोंकी यह बात सुनकर धर्मवर्ण अत्यन्त विस्मित हुआ और हाथ जोड़कर बोला— 'मैं ही धर्मवर्ण नामसे विख्यात आपके वंशका दुराग्रही बालक हूँ। यज्ञमें महात्मा नारदजीका यह वचन सुनकर कि 'कलियुगमें प्रायः कोई भी रसनेन्द्रिय और शिश्नेन्द्रियको दृढ़तापूर्वक संयममें नहीं रखता'— मैं दुर्जनोंकी संगतिसे भयभीत हो अबतक दूसरे-दूसरे द्वीपोंमें घूमता रहा। इस कलियुगके तीन चरण बीत गये, अन्तिम चरणमें भी साढ़े तीन भाग व्यतीत हो चुके हैं। मेरा जन्म व्यर्थ बीता है; क्योंकि जिस कुलमें मैंने जन्म लिया, उसमें
* किमन्यैर्बहुभिः पुत्रैर्दयाधर्मविवर्जितैः। ये जाता नार्चयन्त्यद्धा विष्णुं नारायणं कुले॥ (स्क० पु०, वै० वै० मा० २२। ८१)
* वैशाखखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य * ५०३
माता-पिताके ऋणको भी मैंने नहीं चुकाया। पृथ्वीके भारभूत उस शत्रुतुल्य पुत्रके उत्पन्न होनेसे क्या लाभ जो पैदा होकर भगवान् विष्णु और देवताओं तथा पितरोंकी पूजा न करे। मैं आपलोगोंकी आज्ञाका पालन करूँगा। बताइये, पृथ्वीपर किस प्रकार मुझे कलियुगसे और संसारसे भी बाधा नहीं प्राप्त होगी?'
धर्मवर्णकी बात सुनकर पितरोंके मनको कुछ आश्वासन मिला, वे बोले—बेटा! तुम गृहस्थ-आश्रम स्वीकार करके सन्तानोत्पत्तिके द्वारा हमारा उद्धार करो। जो भगवान् विष्णुकी कथामें अनुरक्त होते, निरन्तर श्रीहरिका स्मरण करते और सदाचारके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन्हें कलियुग बाधा नहीं पहुँचाता। मानद! जिसके घरमें शालग्राम शिला अथवा महाभारतकी पुस्तक हो, उसे भी कलियुग बाधा नहीं दे सकता। जो वैशाख मासके धर्मोंका पालन करता, माघ-स्नानमें तत्पर होता और कार्तिकमें दीप देता है, उसे भी कलिकी बाधा नहीं प्राप्त होती। जो प्रतिदिन महात्मा भगवान् विष्णुकी पापनाशक एवं मोक्षदायिनी दिव्य कथा सुनता है, जिसके घरमें बलिवैश्वदेव होता है, शुभकारिणी तुलसी स्थित होती हैं तथा जिसके आँगनमें उत्तम गौ रहती हैं, उसे भी कलियुग बाधा नहीं देता। अतः इस पापात्मक युगमें भी तुम्हें कोई भय नहीं है। बेटा! शीघ्र पृथ्वीपर जाओ। इस समय वैशाख मास चल रहा है, यह सबका उपकार करनेवाला मास है। सूर्यके मेषराशिमें स्थित होनेपर तीसों तिथियाँ पुण्यदायिनी मानी गयी हैं। एक-एक तिथिमें किया हुआ पुण्य कोटि-कोटि गुना अधिक होता है। उनमें भी जो वैशाखकी अमावास्या तिथि है, वह मनुष्योंको मोक्ष देनेवाली है, देवताओं और पितरोंको वह बहुत प्रिय है, शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है। जो उस दिन पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्ध करते और जलसे भरा हुआ घड़ा एवं पिण्ड देते हैं, उन्हें अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। अतः महामते! तुम शीघ्र जाओ और जब अमावास्या हो, तब कुम्भसहित श्राद्ध एवं पिण्डदान करो। सबका उपकार करनेके लिये गृहस्थ-धर्मका आश्रय लो। धर्म, अर्थ और कामसे सन्तुष्ट हो, उत्तम सन्तान पाकर फिर मुनिवृत्तिसे रहते हुए सुखपूर्वक द्वीप-द्वीपान्तरोंमें विचरण करो।
पितरोंके इस प्रकार आदेश देनेपर धर्मवर्ण मुनि शीघ्रतापूर्वक भूलोकमें गये। वहाँ मेषराशिमें सूर्यके स्थित रहते हुए वैशाख मासमें प्रातःकाल स्नान करके देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया; फिर कुम्भदानसहित पापविनाशक श्राद्ध करके उसके द्वारा पितरोंको पुनरावृत्तिरहित मुक्ति प्रदान की। तत्पश्चात् उन्होंने स्वयं विवाह करके उत्तम सन्तानको जन्म दिया और लोकमें उस पापनाशिनी अमावास्या तिथिको प्रसिद्ध किया। तदनन्तर वे भक्तिपूर्वक भगवान्की आराधना करनेके लिये हर्षके साथ गन्धमादन पर्वतपर चले गये। इसलिये वैशाख मासकी यह अमावास्या तिथि परम पवित्र मानी गयी है।
## वैशाखकी अक्षय तृतीया और द्वादशीकी महत्ता, द्वादशीके पुण्यदानसे एक कुतियाका उद्धार
श्रुतदेवजी कहते हैं—जो मनुष्य अक्षय तृतीयाको सूर्योदयकालमें प्रातःस्नान करते हैं और भगवान् विष्णुकी पूजा करके कथा सुनते हैं, वे मोक्षके भागी होते हैं। जो उस दिन श्रीमधुसूदनकी प्रसन्नताके लिये दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान्की आज्ञासे अक्षय फल देता है। वैशाख
५०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मासकी पवित्र तिथियोंमें शुक्ल पक्षकी द्वादशी समस्त पापराशिका विनाश करनेवाली है। शुक्ला द्वादशीको योग्य पात्रके लिये जो अन्न दिया जाता है, उसके एक-एक दानेमें कोटि-कोटि ब्राह्मण-भोजनका पुण्य होता है। शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिमें जो भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये जागरण करता है, वह जीवन्मुक्त होता है। जो वैशाखकी द्वादशी तिथिको तुलसीके कोमलदलोंसे भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह समूचे कुलका उद्धार करके वैकुण्ठलोकका अधिपति होता है। जो मनुष्य त्रयोदशी तिथिको दूध, दही, शक्कर, घी और शुद्ध मधु—इन पाँच द्रव्योंसे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये उनकी पूजा करता है तथा जो पंचामृतसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिको स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कुलका उद्धार करके भगवान् विष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सायंकालमें भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये शर्बत देता है, वह अपने पुराने पापको शीघ्र ही त्याग देता है। वैशाख शुक्ला द्वादशीमें मनुष्य जो कुछ पुण्य करता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है।
प्राचीन कालमें कश्मीरदेशमें देवव्रत नामक एक ब्राह्मण थे। उनके सुन्दर रूपवाली एक कन्या थी, जो मालिनीके नामसे प्रसिद्ध थी। ब्राह्मणने उस कन्याका विवाह सत्यशील नामक बुद्धिमान् द्विजके साथ कर दिया। मालिनी कुमार्गपर चलनेवाली पुंश्चली होकर स्वच्छन्दतापूर्वक इधर-उधर रहने लगी। वह केवल आभूषण धारण करनेके लिये पतिका जीवन चाहती थी, उसकी हितैषिणी नहीं थी। उसके घरमें काम-काज करनेके बहाने उपपति रहा करता था। सभी जातिके मनुष्य जारके रूपमें उसके यहाँ ठहरते थे। वह कभी पतिकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर नहीं हुई। इसी दोषसे उसके सब अंगोंमें कीड़े पड़ गये, जो काल, अन्तक और यमकी भाँति उसकी हड्डियोंको भी छेदे डालते थे। उन कीड़ोंसे उसकी नाक, जिह्वा और कानोंका उच्छेद हो गया, स्तन तथा अंगुलियाँ गल गयीं, उसमें पंगुता भी आ गयी। इन सब क्लेशोंसे मृत्युको प्राप्त होकर वह नरककी यातनाएँ भोगने लगी। एक लाख पचास हजार वर्षोंतक वह ताँबेके भाण्डमें रखकर जलायी गयी, सौ बार उसे कुत्तेकी योनिमें जन्म लेना पड़ा। तत्पश्चात् सौवीर देशमें पद्मबन्धु नामक ब्राह्मणके घरमें वह अनेक दुःखोंसे घिरी हुई कुतिया हुई। उस समय भी उसके कान, नाक, पूँछ और पैर कटे हुए थे, उसके सिरमें कीड़े पड़ गये थे और योनिमें भी कीड़े भरे रहते थे। राजन्! इस प्रकार तीस वर्ष बीत गये। एक दिन वैशाखके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको पद्मबन्धुका पुत्र नदीमें स्नान करके पवित्र हो भीगे वस्त्रसे घर आया। उसने तुलसीकी वेदीके पास जाकर अपने पैर धोये। दैवयोगसे वह कुतिया वेदीके नीचे सोयी हुई थी। सूर्योदयसे पहलेका समय था, ब्राह्मणकुमारके चरणोदकसे वह नहा गयी और तत्काल उसके सारे पाप नष्ट हो गये। फिर तो उसी क्षण उसे अपने पूर्वजन्मोंका स्मरण हो आया। पहलेके कर्मोंकी याद आनेसे वह कुतिया तपस्वीके पास जाकर दीनतापूर्वक पुकारने लगी—'हे मुने! आप हमारी रक्षा करें।' उसने पद्मबन्धु मुनिके पुत्रसे अपने पूर्वजन्मके दुराचारपूर्ण वृत्तान्त सुनाये और यह
* वैष्णवखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य * ५०५
भी कहा—'ब्रह्मन्! जो कोई भी दूसरी युवती पतिके ऊपर वशीकरणका प्रयोग करती है, वह दुराचारिणी मेरी ही तरह ताँबेके पात्रमें पकायी जाती है। पति स्वामी है, पति गुरु है और पति उत्तम देवता है। साध्वी स्त्री उस पतिका अपराध करके कैसे सुख पा सकती है?* पतिका अपराध करनेवाली स्त्री सैकड़ों बार तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियोंकी योनि)-में और अरबों बार कीड़ेकी योनिमें जन्म लेती है। इसलिये स्त्रियोंको सदैव अपने पतिकी आज्ञा पालन करनी चाहिये। ब्रह्मन्! आज मैं आपकी दृष्टिके सम्मुख आयी हूँ। यदि आप मेरा उद्धार नहीं करेंगे, तो मुझे पुन: इसी यातनापूर्ण घृणित योनिका दर्शन करना पड़ेगा। अतः विप्रवर! मुझ पापाचारिणीको वैशाख शुक्ल पक्षमें अपना पुण्य प्रदान करके उबार लीजिये। आपने जो पुण्यकी वृद्धि करनेवाली द्वादशी की है, उसमें स्नान, दान और अन्नभोजन करानेसे जो पुण्य हुआ है, उससे मुझ दुराचारिणीका भी उद्धार हो जायगा। महाभाग! दीनवत्सल! मुझ दुःखियाके प्रति दया कीजिये। आपके स्वामी जगदीश्वर जनार्दन दीनोंके रक्षक हैं। उनके भक्त भी उन्हींके समान होते हैं। दीनवत्सल! मैं आपके दरवाजेपर रहनेवाली कुतिया हूँ। मुझ दीनाके प्रति दया कीजिये, मेरा उद्धार कीजिये। अन्तमें मैं आप द्विजेन्द्रको नमस्कार करती हूँ।'
उसका वचन सुनकर मुनिके पुत्रने कहा—कुतिया! सब प्राणी अपने किये हुए कर्मोंके ही सुख-दुःखरूप फल भोगते हैं। जैसे साँपको दिया हुआ शर्करामिश्रित दूध केवल विषकी वृद्धि करता है, उसी प्रकार पापीको दिया हुआ पुण्य उसके पापमें सहायक होता है।
मुनिकुमारके ऐसा कहनेपर कुतिया दुःखमें डूब गयी और उसके पिताके पास जाकर आर्तस्वरसे क्रन्दन करती हुई बोली—'पद्मबन्धु बाबा! मैं तुम्हारे दरवाजेकी कुतिया हूँ। मैंने सदा तुम्हारी जूठन खायी है। मेरी रक्षा करो, मुझे बचाओ। गृहस्थ महात्माके घरपर जो पालतू जीव रहते हैं, उनका उद्धार करना चाहिये, यह वेदवेत्ताओंका मत है। चाण्डाल, कौवे, कुत्ते—ये प्रतिदिन गृहस्थोंके दिये हुए टुकड़े खाते हैं; अतः उनकी दयाके पात्र हैं। जो अपने ही पाले हुए रोगादिसे ग्रस्त एवं असमर्थ प्राणीका उद्धार नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है, यह विद्वानोंका मत है। संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान् विष्णु एकको कर्ता बनाकर स्वयं ही पत्नी, पुत्र आदिके व्याजसे समस्त जन्तुओंका पालन करते हैं; अतः अपने पोष्यवर्गकी रक्षा करनी चाहिये, यह भगवान्की आज्ञा है। दयालु होनेके कारण आप मेरा उद्धार कीजिये।'
दुःखसे आतुर हुई कुतियाकी यह बात सुनकर घरमें बैठा हुआ मुनिपुत्र तुरंत घरसे बाहर निकला। इसी समय दयानिधान पद्मबन्धुने कुतियासे पूछा—'यह क्या वृत्तान्त है?' तब पुत्रने सब समाचार कह सुनाया। उसे सुनकर पद्मबन्धु बोले—'बेटा! तुमने कुतियासे ऐसा वचन क्यों कहा? साधुपुरुषोंके मुँहसे ऐसी बात नहीं निकलती। वत्स! देखो तो, सब लोग दूसरोंका उपकार करनेके लिये उद्यत रहते हैं। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, रात्रि, अग्नि, जल, चन्दन, वृक्ष और साधुपुरुष सदा दूसरोंकी भलाईमें लगे रहते हैं। दैत्योंको महाबली जानकर महर्षि दधीचिने देवताओंका उपकार करनेके लिये दयापूर्वक उन्हें अपने शरीरकी हड्डी दे दी थी। महाभाग!
* भर्ता नाथो गुरुर्भर्ता भर्ता दैवत्तमुत्तमम्। विक्रियां कृत्य साध्वी सा कथं सुखमवाप्नुयात् ॥
(स्क० पु०, वै० वै० मा० २४। ६२)
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पूर्वकालमें राजा शिविने कबूतरके प्राण बचानेके लिये भूखे बाजको अपने शरीरका मांस दे दिया था। पहले इस पृथ्वीपर जीमूतवाहन नामक राजा हो गये हैं। उन्होंने एक सर्पका प्राण बचानेके लिये महात्मा गरुड़को अपना जीवन समर्पित कर दिया था। इसलिये विद्वान् ब्राह्मणको दयालु होना चाहिये; क्या इन्द्रदेव शुद्ध स्थानमें ही वर्षा करते हैं, अशुद्ध स्थानमें जल नहीं बरसाते? क्या चन्द्रमा चाण्डालोंके घरमें प्रकाश नहीं करते? अतः बार-बार प्रार्थना करनेवाली इस कुतियाका मैं अपने पुण्योंसे उद्धार करूँगा।'
इस प्रकार पुत्रकी मान्यताका निराकरण करके परम बुद्धिमान् पद्मबन्धुने संकल्प किया— 'कुतिया! ले, मैंने द्वादशीका महापुण्य तुझे दे दिया।' ब्राह्मणके इतना कहते ही कुतियाने सहसा अपने प्राचीन शरीरका त्याग कर दिया और दिव्य देह धारणकर दिव्य वस्त्र-आभूषणोंसे विभूषित हो, दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई ब्राह्मणकी आज्ञा ले स्वर्गलोकको चली गयी। वहाँ महान् सुखोंका उपभोग करके इस पृथ्वीपर भगवान् नर-नारायणके अंशसे 'उर्वशी' नामसे प्रकट हुई।
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वैशाख मासकी अन्तिम तीन तिथियोंकी महत्ता तथा ग्रन्थका उपसंहार
श्रुतदेवजी कहते हैं—राजेन्द्र! वैशाखके शुक्ल पक्षमें जो अन्तिम तीन त्रयोदशीसे लेकर पूर्णिमातककी तिथियाँ हैं, वे बड़ी पवित्र और शुभकारक हैं। उनका नाम 'पुष्करिणी' है, वे सब पापोंका क्षय करनेवाली हैं। जो सम्पूर्ण वैशाख मासमें स्नान करनेमें असमर्थ हो, वह यदि इन तीन तिथियोंमें भी स्नान करे तो वैशाख मासका पूरा फल पा लेता है। पूर्वकालमें वैशाख मासकी एकादशी तिथिको शुभ अमृत प्रकट हुआ। द्वादशीको भगवान् विष्णुने उसकी रक्षा की। त्रयोदशीको उन श्रीहरिने देवताओंको सुधा-पान कराया। चतुर्दशीको देवविरोधी दैत्योंका संहार किया और पूर्णिमाके दिन समस्त देवताओंको उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया। इसलिये देवताओंने सन्तुष्ट होकर इन तीन तिथियोंको वर दिया—'वैशाख मासकी ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्योंके पापोंका नाश करनेवाली तथा उन्हें पुत्र-पौत्रादि फल देनेवाली हों। जो मनुष्य इस सम्पूर्ण मासमें स्नान न कर सका हो, वह इन तिथियोंमें स्नान कर लेनेपर पूर्ण फलको ही पाता है। वैशाख मासमें लौकिक कामनाओंका नियमन करनेपर मनुष्य निश्चय ही भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता
| वैष्णवखण्ड-वैशाखमास-माहात्म्य | ५०७ |
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है। महीनेभर नियम निभानेमें असमर्थ मानव यदि उक्त तीन दिन भी कामनाओंका संयम कर सके तो उतनेसे ही पूर्ण फलको पाकर भगवान् विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है।'
इस प्रकार वर देकर देवता अपने धामको चले गये। अतः पुष्करिणी नामसे प्रसिद्ध अन्तिम तीन तिथियाँ पुण्यदायिनी, समस्त पापराशिका नाश करनेवाली तथा पुत्र-पौत्रको बढ़ानेवाली हैं। जो वैशाख मासमें अन्तिम तीन दिन गीताका पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है। जो उक्त तीनों दिन विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन करनेमें इस भूलोक तथा स्वर्गलोकमें कौन समर्थ है? पूर्णिमाको सहस्रनामोंके द्वारा भगवान् मधुसूदनको दूधसे नहलाकर मनुष्य पापहीन वैकुण्ठधाममें जाता है। वैशाख मासमें प्रतिदिन भागवतके आधे या चौथाई श्लोकका पाठ करनेवाला मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। जो वैशाखके अन्तिम तीन दिनोंमें भागवतशास्त्रका श्रवण करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी भाँति कभी पापोंसे लिप्त नहीं होता। उक्त तीनों दिनोंके सेवनसे कितने ही मनुष्योंने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनोंने ब्रह्मत्व पा लिया। ब्रह्मज्ञानसे मुक्ति होती है। अथवा प्रयागमें मृत्यु होनेसे या वैशाख मासमें नियमपूर्वक प्रातःकाल जलमें स्नान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसलिये वैशाखके अन्तिम तीन दिनोंमें स्नान, दान और भगवत्पूजन आदि अवश्य करना चाहिये। वैशाख मासके उत्तम माहात्म्यका पूरा-पूरा वर्णन रोग-शोकसे रहित जगदीश्वर भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन कर सकता है। तुम भी वैशाख मासमें दान आदि उत्तम कर्मका अनुष्ठान करो। इससे निश्चय ही तुम्हें भोग और मोक्षकी प्राप्ति होगी।
इस प्रकार मिथिलापति जनकको उपदेश देकर श्रुतदेवजीने उनकी अनुमति ले वहाँसे जानेका विचार किया। तब राजर्षि जनकने अपने अभ्युदयके लिये उत्तम उत्सव कराया और श्रुतदेवजीको पालकीपर बिठाकर विदा किया। वस्त्र, आभूषण, गौ, भूमि, तिल और सुवर्ण आदिसे उनकी पूजा और वन्दना करके राजाने उनकी परिक्रमा की। तत्पश्चात् उनसे विदा हो महातेजस्वी एवं परम यशस्वी श्रुतदेवजी सन्तुष्ट हो प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे अपने स्थानको गये। राजाने वैशाखधर्मका पालन करके मोक्ष प्राप्त किया।
नारदजी कहते हैं—अम्बरीष! यह उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुनाया है, जो कि सब पापोंका नाश तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको देनेवाला है। इससे मनुष्य भुक्ति, मुक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष पाता है।
नारदजीका यह वचन सुनकर महायशस्वी राजा अम्बरीष मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बाह्य जगत्के व्यापारोंसे निवृत्त होकर मुनिको साष्टांग प्रणाम किया और अपने सम्पूर्ण वैभवोंसे उनकी पूजा की। तत्पश्चात् उनसे विदा लेकर देवर्षि नारदजी दूसरे लोकमें चले गये; क्योंकि दक्ष प्रजापतिके शापसे वे एक स्थानपर नहीं ठहर सकते। राजर्षि अम्बरीष भी नारदजीके बताये हुए सब धर्मोंका अनुष्ठान करके निर्गुण परब्रह्म परमात्मामें विलीन हो गये। जो इस पापनाशक एवं पुण्यवर्द्धक उपाख्यानको सुनता अथवा पढ़ता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जिनके घरमें यह लिखी हुई पुस्तक रहती है, उनके हाथमें मुक्ति आ जाती है। फिर जो सदा इसके श्रवणमें मन लगाते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है।
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वैशाखमास-माहात्म्य सम्पूर्ण
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१०. वैष्णवखण्ड (अयोध्यामाहात्म्य)
५०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
श्रीअयोध्या-माहात्म्य
## अयोध्यापुरीकी महिमा और सीमाका वर्णन, चक्रतीर्थ एवं श्रीविष्णुहरिका माहात्म्य
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
महाक्षेत्र कुरुक्षेत्रमें जब महात्मा राजा श्रीरामचन्द्रजीका बारह वर्षोंमें पूरा होनेवाला यज्ञ चल रहा था, उस समय उस यज्ञमें निमन्त्रित होकर शुद्ध अन्तःकरणवाले सभी मुनि पधारे थे, जो वेदों और वेदांगोंके पारगामी विद्वान् थे। वे वहाँ स्नान करके न्यायपूर्वक जप आदि कर्म करके वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित भरद्वाज मुनिको आगे करके क्रमशः विचित्र-विचित्र आसनोंपर बैठे। उस समय व्यासशिष्य रोमहर्षण सूतजीसे भरद्वाज आदि मुनिवरोंने पूछा—'महाभाग! इस समय हम महापुरी अयोध्याका गुणोंसे उज्ज्वल एवं रहस्ययुक्त सनातन माहात्म्य सुनना चाहते हैं। विष्णुप्रिया अयोध्या कैसी है? उसमें कैसे स्थान हैं, कौन-कौन-से तीर्थ हैं और उसके सेवनसे कैसा फल प्राप्त होता है?'
**सूतजी बोले—** तपोधनो! मैं भगवान् व्यासको प्रणाम करके आपके आगे महापुरी अयोध्याके रहस्ययुक्त माहात्म्यका यथावत् वर्णन करता हूँ। अलसीके फूलकी भाँति जिनकी श्याम कान्ति है तथा जिन्होंने रावणका विनाश किया है, उन कमलके समान नेत्रोंवाले अविनाशी परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीको मैं नमस्कार करता हूँ।\* अयोध्यापुरी परम पवित्र है, पापी मनुष्योंको इसकी प्राप्ति होनी बहुत कठिन है। जिसमें साक्षात् भगवान् श्रीहरि निवास करते हैं, वह अयोध्यापुरी भला किसके सेवनके योग्य नहीं है? अयोध्या सरयूके तटपर बसी है। वह दिव्य पुरी परम शोभासे युक्त है। प्रायः बहुत-से तपस्वी महात्मा उसके भीतर निवास करते हैं। जिस पुरीमें सूर्यवंशी इक्ष्वाकु आदि सब राजा प्रजापालनमें तत्पर रहे हैं। जिसके किनारे मानसरोवरसे निकली हुई पुण्यसलिला सरयू नामवाली नदी सदा सुशोभित होती है और उसके तटपर भ्रमरोंके गुंजन एवं पक्षियोंके कलरव होते रहते हैं। मुनिवरो! भगवान् विष्णुके दहिने चरणके अँगूठेसे गंगाजी और बायें चरणके अँगूठेसे शुभकारिणी सरयूजी निकली हैं। इसलिये वे दोनों नदियाँ परम पवित्र तथा सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हैं। इनमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्याका नाश कर डालता है। अकार कहते हैं ब्रह्माको, यकार विष्णुका नाम है और धकार रुद्रस्वरूप है, इन सबके योगसे 'अयोध्या' नाम शोभित होता है। समस्त उपपातकोंके साथ ब्रह्महत्या आदि महापातक इस पुरीसे युद्ध नहीं कर सकते, इसलिये इसे 'अयोध्या' कहते हैं। यह भगवान् विष्णुकी आदिपुरी है और विष्णुके सुदर्शनचक्रपर स्थित है। अतएव पृथ्वीपर अतिशय पुण्यदायिनी है। इस पुरीकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं। सहस्रधारातीर्थसे पूर्व दिशामें एक योजनतक और समं नामक स्थानसे पश्चिम दिशामें एक योजनतक, सरयूतटसे दक्षिण दिशामें एक योजनतक और तमसासे उत्तर दिशामें एक योजनतक इस अयोध्याक्षेत्रकी स्थिति है। यही भगवान् विष्णुका अन्तर्गृह है। यह
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\* नमामि परमात्मानं रामं राजीवलोचनम्। अतसीकुसुमश्यामं रावणान्तकमव्ययम्॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० १।२९)
- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५०९
विष्णुपूरी मछलीके आकारवाली बतलायी गयी है। पश्चिम दिशामें गो-प्रतारतीर्थसे लेकर असीतीर्थपर्यन्त इसका मस्तक है, पूर्व दिशामें इसका पुच्छ भाग है और दक्षिण एवं उत्तर दिशामें इसका मध्यम भाग है।
प्राचीन कालमें विष्णुशर्मा नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे। वे वेद-वेदांगके तत्त्वज्ञ और धर्म-कर्ममें तत्पर रहनेवाले थे। विष्णुशर्मा निरन्तर भगवान् विष्णुके भजनमें संलग्न रहते थे। एक दिनकी बात है, वे तीर्थयात्राके प्रसंगसे अयोध्यापुरीमें आये। वहाँ उन्होंने शाक, मूल और फल खाकर तपस्या प्रारम्भ की। सबेरे स्नान करके विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करते और इन्द्रियसमुदायको वशमें करके विशुद्ध चित्तसे भगवान् विष्णुमें मन लगाकर प्राणायाम करते हुए ओंकारका जप करते तथा हृदयमें विकसित कमलका चिन्तन करके उसके ऊपर पीताम्बरधारी शंख-चक्र-गदाधर भगवान् विष्णुका ध्यान एवं पुष्प आदिसे मानसिक पूजन करते थे। ब्रह्मरूप श्रीहरिका ध्यान और द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करते हुए वे वायु पीकर रहने लगे। इस प्रकार उस ब्राह्मणके तीन वर्ष बीत गये। तदनन्तर विप्रवर विष्णुशर्माने ध्यानपूर्वक भगवान् विष्णुका इस प्रकार स्तवन किया।
विष्णुशर्मा बोले—भगवन्! विष्णो! आप प्रसन्न होइये। पुरुषोत्तम! प्रसन्न होइये। देवदेवेश्वर! प्रसन्न होइये। कमलनयन! प्रसन्न होइये। कृष्ण! आपकी जय हो। अचिन्त्य परमेश्वर! आपकी जय हो। विष्णो! आपकी जय हो। अव्यय! आपकी जय हो। नाथ! यज्ञपते! आपकी जय हो। विष्णो! आप सबके पालक और सर्वत्र व्यापक हैं, आपकी जय हो। पापहारी अनन्त! आपकी जय हो। जन्मरूपी ज्वरका निवारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो। जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है तथा जो कमलकी माला धारण करते हैं, ऐसे आप श्रीहरिको नमस्कार है, नमस्कार है। सर्वेश! आपको नमस्कार है। कैटभका संहार करनेवाले भूतेश्वर! आपको नमस्कार है। जगत्के मूल कारण जगदीश्वर! आप तीनों लोकोंके रक्षक हैं, आपको नमस्कार है। आप देवताओंके भी अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। आप जलमें शयन करनेवाले नारायण हैं, आपको नमस्कार है। सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले सच्चिदानन्दमय श्रीकृष्णको नमस्कार है। जहाँ योगीजनोँका मन रमण करता है, उन श्रीरामको नमस्कार है। चक्र-सुदर्शनधारी श्रीहरिको नमस्कार है। आप सब लोगोंकी माता हैं, आप ही जगत्के पिता हैं, भयसे व्याकुल प्राणियोंके लिये आप ही सुहृद् और मित्र हैं, आप ही पिता और पितामह हैं, हविष्य, वषट्कार, प्रभु और अग्नि सब कुछ आप ही हैं, आप ही करण, कारण, कर्ता और परमेश्वर हैं। हाथमें शंख-चक्र-गदा धारण करनेवाले माधव! मेरा उद्धार कीजिये। मन्दराचलधारी कच्छप! आप प्रसन्न होइये। मधुसूदन! प्रसन्न होइये। कमलाकान्त! प्रसन्न होइये। भुवनेश्वर! प्रसन्न होइये।
इस प्रकार स्तुति करते हुए महात्मा विष्णुशर्माकी भक्तिसे प्रसन्न हो विश्वात्मा भगवान् विष्णु गरुड़की पीठपर बैठे हुए वहाँ प्रकट हुए। उनके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा शोभा पा रहे थे। वे पीताम्बरधारी अविनाशी श्रीहरि प्रसन्न चित्त हो विष्णुशर्मासे इस प्रकार बोले—'वत्स! मैं तुम्हारी बड़ी भारी तपस्यासे इस समय सन्तुष्ट हूँ। इस स्तोत्रसे तुम्हारा पाप नष्ट हो गया है। विप्रवर! कोई वर माँगो।' विष्णुशर्मा बोले—'देवेश! इस समय आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया हूँ। जगदीश्वर! मुझे एकमात्र अपनी अविचल भक्ति प्रदान कीजिये।'
श्रीभगवान्ने कहा—तुम्हें मोक्ष देनेवाली मेरी अविचल वैष्णवी भक्ति प्राप्त हो और यहींपर
५१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मुक्तिदायिनी गंगा भी प्रकट होकर अविचल-रूपसे रहें।
यों कहकर देवदेवेश्वर श्रीविष्णुने चक्रसे उस स्थलको खोदकर पातालमण्डलसे गंगाजीका जल प्रकट किया। तबसे वह स्थान चक्रतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह त्रिभुवनप्रसिद्ध तीर्थ समस्त पापराशिका नाश करनेवाला है। वहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। तदनन्तर भगवान् विष्णुने विष्णुशर्मासे पुनः कहा—'विप्रवर! यहाँ भक्तोंको मुक्ति देनेवाली मेरी मूर्ति विष्णुहरिके नामसे प्रसिद्ध होकर रहे।' भगवान्की यह बात सुनकर बुद्धिमान् ब्राह्मणने भगवान् विष्णुकी उस मूर्तिको स्थापित किया। तबसे शंख, चक्र, गदा और पीताम्बर धारण करनेवाले चतुर्भुज भगवान् विष्णु वहाँ विष्णुहरिके नामसे स्थित हुए। कार्तिक शुक्ल पक्षकी दशमीसे लेकर पूर्णिमातक वहाँकी वार्षिक यात्रा होती है। चक्रतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे पिण्डदान करेगा, उसके पितर तृप्त होकर भगवान् विष्णुके लोकमें जायँगे। समस्त सद्गुणोंके सागर ध्येयमूर्ति सच्चिदानन्दमय श्रीहरि इस प्रकार लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके लिये उत्तम स्वरूप धारण करके वहाँ स्थित हुए। जो वहाँ चक्रतीर्थमें स्नान करके अधिक भक्तिभावसे भगवान् विष्णुहरिकी पूजा करता है, वह पुण्यात्मा मनुष्य वैकुण्ठधाममें निवास करता है।
ब्रह्मकुण्ड, ऋणमोचन तथा पापमोचन आदि तीर्थोंकी महिमा
सूतजी कहते हैं— प्राचीन कालमें जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुको अयोध्यापुरीमें निवास करते देख स्वयं भी वहाँ रहनेका निश्चय किया। उन्होंने वहाँकी यात्रा की और अपने नामसे एक विशाल कुण्ड बनाया, जो अनेक देवताओंसे संयुक्त तथा अगाध जलराशिकी लोल लहरोंसे सुशोभित था। कुमुद, उत्पल, कह्लार और पुण्डरीकसे आच्छादित हुआ वह कुण्ड सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस समय ब्रह्माजीने कुण्डके विषयमें इस प्रकार कहा—'इसमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे पापी जीव भी विमानपर बैठकर सुन्दर, दिव्य वस्त्रसे सुशोभित हो प्रलयकालपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करेंगे। यहाँ यथाशक्ति दान और होम करनेसे मनुष्य तुलादान और अश्वमेध यज्ञका पुण्य प्राप्त कर लेंगे। इस तीर्थमें विधिपूर्वक किया हुआ स्नान, दान और जप आदि कर्म सम्पूर्ण यज्ञोंके समान महापातकोंका नाश करनेवाला होगा। यह कुण्ड ब्रह्मकुण्डके नामसे प्रसिद्ध होगा और इसके समीप मैं सदा निवास करूँगा।'
यों कहकर देवदेव, लोकपितामह ब्रह्माजी उस तीर्थको देखकर देवताओंके साथ अन्तर्धान हो गये। तभीसे वह कुण्ड इस पृथ्वीपर विशेष विख्यात है। वह महाकुण्ड चक्रतीर्थसे पूर्व दिशामें स्थित है। ब्रह्मकुण्डसे पूर्व-उत्तर दिशामें सात सौ धनुषकी दूरीपर सरयूजीके जलमें ऋणमोचन नामक तीर्थ विद्यमान है। वहाँ पूर्वकालमें तीर्थयात्राके प्रसंगसे आये हुए मुनिवर लोमशने विधिपूर्वक स्नान किया था। इससे वे ऋणमुक्त एवं पापशून्य हो गये। तब उन्होंने अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर हर्षसे आँसू बहाते हुए कहा—'यह ऋणमोचन नामक तीर्थ बहुत उत्तम है। मनुष्यपर इहलोक और परलोकके जो तीन प्रकारके ऋण हैं, वे सब इस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे क्षणभरमें नष्ट हो जाते हैं। इसलिये यहाँ फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको श्रद्धापूर्वक विधिके साथ यथाशक्ति स्नान और दान करना चाहिये।' इस प्रकार तीर्थका माहात्म्य बतलाकर मुनिश्रेष्ठ लोमश उसके गुणकी प्रशंसा करते हुए अन्तर्धान हो गये। ऋणमोचन
- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५११
तीर्थसे पूर्व दिशामें बीस धनुषकी दूरीपर पापमोचन तीर्थ है। यह भी सरयूके जलमें ही है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य उसी क्षण सब पापोंसे मुक्त हो शुद्धचित्त हो जाता है। पांचालदेशमें नरहरि नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था जो दुष्टोंके संगके प्रभावसे पापात्मा हो गया था। उसने ब्रह्महत्या आदि अनेक प्रकारके पाप किये थे। पापियोंके संसर्गमें आकर वह तीनों वेदोंके मार्गकी निन्दा करता था। वह किसी समय साधुओंके साथ तीर्थयात्राके प्रसंगसे अयोध्याजीमें आया। उस महापातकी ब्राह्मणने साधुसंगसे पापमोचन तीर्थमें स्नान किया। फिर तो उसी क्षण उसकी सारी पापराशि नष्ट हो गयी और वह निष्पाप हो दिव्य विमानपर बैठकर विष्णुधाममें चला गया। मनुष्योंको सब पापकी शुद्धिके लिये वहाँ माघकृष्ण चतुर्दशीको विशेषरूपसे स्नान और दान करना चाहिये। अन्य समयमें भी स्नान करनेपर सब पापोंका क्षय हो जाता है।
पापमोचन तीर्थसे पूर्व दिशामें सौ धनुषकी दूरीपर सहस्त्रधारा नामक उत्तम तीर्थ है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उसीमें शत्रु-वीरोंका नाश करनेवाले वीरवर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रकी आज्ञासे योगशक्तिद्वारा प्राण त्यागकर अपने शेष नामक स्वरूपको प्राप्त हुए थे। एक धनुषका प्रमाण साढ़े तीन हाथ माना गया है और चार हाथका एक दण्ड बताया गया है। पहलेकी बात है, रघुकुलनायक श्रीरामचन्द्रजी देवताओंका कार्य पूरा करके कालके साथ बैठकर एकान्तमें मन्त्रणा कर रहे थे। उस समय उन्होंने यह प्रतिज्ञा की थी कि परस्पर मन्त्रणा करते समय हम दोनोंको जो कोई समीप आकर देखेगा, वह शीघ्र ही मेरे द्वारा त्याग दिया जायगा। ऐसा निश्चय करके जब वे मन्त्रणा करने लगे तब लक्ष्मणजी राजद्वारपर खड़े हो पहरा देने लगे। उसी समय तेजोनिधि, तपोराशि दुर्वासाजी आ पहुँचे और भूखसे व्याकुल हो लक्ष्मणजीसे प्रेमपूर्वक बोले—'सुमित्रानन्दन! तुम शीघ्र जाओ तथा श्रीरामचन्द्रजीके आगे मेरे आगमनकी सूचना दो। मैं कार्यवश उनसे मिलने आया हूँ। तुम्हें मेरी यह बात टालनी नहीं चाहिये।'
तब लक्ष्मणजी शापसे डरकर शीघ्र ही भीतर गये और श्रीरामचन्द्रजी तथा कालदेव दोनोंके सामने खड़े हो यह निवेदन किया कि 'तपोराशि अत्रिनन्दन दुर्वासा श्रीरघुनाथजीका दर्शन करनेके लिये आये हैं।' श्रीरामचन्द्रजीने कालसे सलाह करके उन्हें विदा किया तथा स्वयं बाहर निकले। बाहर आनेपर उन्होंने मुनिको देखा और प्रणाम करके उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराया। उसके बाद उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया तथा सत्य-भंग होनेके भयसे श्रीरघुवीरने लक्ष्मणको त्याग दिया। लक्ष्मणजी भी अपने बड़े भाईकी आज्ञाको सफल बनानेके लिये सरयूके तटपर आये और स्नान करके ध्यानका आश्रय ले सच्चिदानन्दमय परमेश्वरमें अपने शान्त मनको शीघ्र ही लगाकर अविचलभावसे बैठ गये। तदनन्तर सहस्रफणोंसे सुशोभित शेषनाग पृथ्वीको सहस्र छिद्रोंमें भेदन करके वहाँ प्रकट हुए। इसी समय देवराज इन्द्र
५१२
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भी देवताओंको साथ लेकर स्वर्गलोकसे वहाँ आये। शेषनागके फणोंकी सहस्र मणियोंसे वहाँकी पृथ्वी दग्ध हो गयी थी; इसलिये सरयूतटवर्ती यह शुभकारक महातीर्थ सहस्रधाराके नामसे विख्यात हुआ। इस क्षेत्रका प्रमाण पचीस धनुष है; इस तीर्थमें मनुष्य श्रद्धापूर्वक स्नान, दान और श्राद्ध करनेसे सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इसमें स्नान करके अविनाशी भगवान् शेषकी विधिपूर्वक पूजा करनेवाला मनुष्य वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है। अतः इस तीर्थमें विधिवत् स्नान करना चाहिये। श्रावणके शुक्ल पक्षमें जो पंचमी तिथि होती है, उसमें यहाँ नागोंके उद्देश्यसे यत्नपूर्वक उत्सव करना चाहिये। उस उत्सवमें पहले शेषनागका पूजन करना उचित है। नागपूजापूर्वक ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक सन्तुष्ट किया जाय, तो सभी सर्प प्रसन्न होते हैं और प्रसन्न होनेपर वे मनुष्योंको कभी पीड़ा नहीं देते हैं। जो वैशाख मासमें एकाग्रचित्त होकर यहाँ स्नान करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। इसलिये मनुष्योंको इस तीर्थमें यत्नपूर्वक वैशाख मासका स्नान, दान, श्रीहरिका पूजन और ब्राह्मणोंका सत्कार करना चाहिये। जो बुद्धिमान् मनुष्य इस तीर्थमें अपनी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक स्नान-दान आदि करता है, वह शुद्धचित्त होकर इस लोकमें प्रचुर सुखोंका उपभोग करता है और भक्तिभावके प्रभावसे अन्तमें शेषशायी भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेता है।
स्वर्गद्वार तथा चन्द्रहरितीर्थकी महिमा, चन्द्रसहस्रव्रतकी उद्यापनविधि
सूतजी कहते हैं- स्वर्गद्वार नामसे प्रसिद्ध तीर्थ सब पापोंको दूर करनेवाला है। स्वर्गद्वारके माहात्म्यका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है, इसलिये संक्षेपसे सुनो। सरयूके जलमें सहस्रधारा तीर्थसे लेकर पूर्व दिशामें छः सौ छत्तीस धनुषतक पुराणके ज्ञाताओंने स्वर्गद्वारका विस्तार बतलाया है। सब तीर्थोंमें स्नान करनेका फल अपनेको प्राप्त हो, ऐसी इच्छा रखनेवाले पुरुषको यहाँ विशेषरूपसे प्रातःकाल स्नान करना चाहिये। स्वर्गद्वारमें जो जप, तप, हवन, दर्शन और ध्यान, अध्ययन एवं दान आदि किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। सहस्रों जन्मान्तरोंमें पहले जो पाप संचित किया गया है, वह स्वर्गद्वारमें प्रवेश करनेमात्रसे तत्काल नष्ट हो जाता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, म्लेच्छ, संकीर्ण पापयोनि, कीड़े, मकोड़े, मृग, पक्षी जो भी स्वर्गद्वारमें कालसे मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे सब हाथमें कौमोदकी गदा ले गरुड़ध्वज रथपर आरूढ़ हो सुन्दर कल्याणमय वैकुण्ठधाममें जाते हैं। जो लोग आदरपूर्वक वहाँ मध्याह्नमें स्नान करते हैं तथा जो जितेन्द्रिय पुरुष स्वर्गद्वारमें निराहार व्रत करते हैं अथवा जो एक मासतक उपवास करनेवाले हैं, वे सभी उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं। जो स्वर्गद्वारमें ब्राह्मणोंको अन्नदान, रत्नदान, भूमिदान, गोदान तथा वस्त्रदान करते हैं, वे सब श्रीहरिके धामको जाते हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु अपने स्वरूपको चार शरीरोंमें व्यक्त करके रघुवंशशिरोमणि श्रीराम होकर अपने तीनों भाइयोंके साथ यहाँ नित्य विहार करते हैं। इसी स्वर्गद्वारमें कैलासनिवासी शिव भी वास करते हैं। मेरु तथा मन्दराचलके समान पापकी बड़ी भारी राशि भी स्वर्गद्वारमें पहुँचते ही नष्ट हो जाती है। ऋषि, देवता, असुर, जप-होमपरायण मनुष्य, संन्यासी और मुमुक्षु पुरुष स्वर्गद्वारका सेवन करते हैं। काशीमें योगयुक्त होकर शरीर त्याग करनेवाले पुरुषोंको
* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१३
जो गति प्राप्त होती है, वही एकादशीको सरयूमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाती है। वे भगवान् विष्णुकी भक्तिको पाकर निश्चय ही परमानन्दको प्राप्त होते हैं।
एक समय शीतरश्मि चन्द्रमा अयोध्यावासी भगवान् विष्णुको नमस्कार करके उत्कण्ठापूर्वक यहाँके तीर्थकी महिमाका साक्षात्कार करनेके लिये आये। यहाँ आकर उन्होंने क्रमशः प्रत्येक तीर्थमें विधिपूर्वक यात्रा की। इससे उन्हें अनेक प्रकारके आश्चर्यका अनुभव हुआ। तत्पश्चात् दुष्कर तपस्याद्वारा भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनकी प्रसन्नता प्राप्त की और वहाँ अपने नामके साथ भगवान्का नाम रखकर उनके अर्चाविग्रहको स्थापित किया। इससे वे भगवान् वहाँ चन्द्रहरिके नामसे विख्यात हुए। श्रीवासुदेवके प्रसादसे वह स्थान अद्भुत हो गया। वह श्रीविष्णुका अत्यन्त गूढ़ स्थान है। समस्त प्राणियोंके मोक्षके स्वामी श्रीरघुनाथजीके इस दिव्य स्थानमें सिद्धपुरुष सदा श्रीविष्णुका व्रत धारण किये निवास करते हैं। नाना प्रकारके वेषवाले जितेन्द्रिय मुक्तात्मा पुरुष यहाँ विष्णुलोककी आकांक्षा रखकर नित्य उत्तम योगका अभ्यास करते हैं। यहाँ मनुष्य जिस प्रकार धर्मका फल पाता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं पाता। इसमें किया हुआ दान, व्रत और होम सब अक्षय होता है। मनुष्योंको यहाँ भगवान् चन्द्रहरिके आगे ब्राह्मणकी प्रधानतामें चन्द्रसहस्रव्रतकी उद्यापनविधि करनी चाहिये। दो वर्ष, आठ महीने और सत्रह दिन बीतनेपर दिनके आठवें भागमें एक अधिमास आकर प्राप्त होता है*। तिरासी वर्ष चार महीनेमें एक सहस्रसे अधिक चन्द्रमा (पूर्णमासी तिथिमें) होते हैं। उतने समयतक जो मनुष्य जीवित रहता है, उसको यात्राके प्रसंगसे यहाँ आकर उद्यापन करना चाहिये। चतुर्दशीमें दन्तधावनपूर्वक स्नान करके पवित्र हो, ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए मन, वाणी और शरीरको काबूमें रखे और पूर्णिमा तिथिको भी उसी प्रकार रहते हुए चन्द्रमाकी पूजा करे। पहले गौरी आदि षोडश मातृकाओंकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद भक्तिपूर्वक नान्दीमुख श्राद्ध करके ऋत्विजोंका पूजन करे। मनको पवित्र रखते हुए चन्द्रमण्डलके आकारकी प्रतिमा बनवावे। तदनन्तर शास्त्रोक्त विधानसे चन्द्रमाकी पूजा करे। चन्द्रमाके मन्त्रसे होम करे। प्रतिमा स्थापन करते समय भी सोममन्त्रका उच्चारण करे, सोमकी उत्पत्ति और सोमसूक्तका पाठ करे। मण्डलमें चन्द्रन्यास, कलान्यास और विधिपूर्वक एकादश इन्द्रियोंका न्यास करे। उत्तम अक्षतोंसे चन्द्रबिम्बके समान मण्डल बनावे। उसके बीचमें गायके दूधसे भरे हुए कलशकी स्थापना करे। फिर उस मण्डलमें भिन्न-भिन्न नामोंद्वारा क्रमशः चन्द्रमाकी पूजा करे— हिमांशवे नमः, सोमचन्द्राय नमः, चन्द्राय नमः, विधवे नमः, कुमुदबन्धवे नमः, सुधांशवे नमः, सोमाय नमः, ओषधीशाय नमः, अब्जाय नमः, मृगाङ्काय नमः, कलानिधये नमः, नक्षत्रनाथाय नमः, शर्वरीपतये नमः, जैवातृकाय नमः, द्विजराजाय नमः, चन्द्रमसे नमः —इन सोलह नामोंसे क्रमशः चन्द्रमाका स्तवन करे। तदनन्तर पवित्र चित्त हो शंखमें जल, फल, फूल और चन्दन लेकर निम्नांकित मन्त्रसे विधिपूर्वक अर्घ्य दे—
अर्घ्य-मन्त्र
नमस्ते मासमासान्ते जायमान पुनः पुनः।
गृहाणार्घ्यं शशाङ्क त्वं रोहिण्या सहितो मम॥
'प्रत्येक मासके अन्तमें पूर्णरूपेण प्रकट होनेवाले चन्द्रदेव! आपको नमस्कार है, आप रोहिणी देवीके साथ पधारकर मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।'
इस प्रकार विधिपूर्वक अर्घ्य देकर चन्द्रमाको
* गते वर्षद्वये सार्धे पञ्चपक्षे दिनद्वये। दिवसस्याष्टमे भागे पतत्येकोऽधिमासकः॥ (स्क० पु०, वै० अ० मा० ३।५६)
५१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रणाम करे। दूधसे भरे हुए अन्य सोलह कलशोंको वस्त्रसे आच्छादित करके शान्तिके लिये ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। तत्पश्चात् दूधमिश्रित जलसे अभिषेक करे; फिर वैभवके अनुसार दक्षिणा देकर ऋत्विजोंको सन्तुष्ट करे। उसके बाद ब्राह्मणको उसके कुटुम्बसहित भोजन करावे। द्विजदम्पतिकी वस्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक पूजा करे। तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणा दान करना चाहिये; फिर उपवासकी विधिसे बुद्धिमान् पुरुष शेष दिन व्यतीत करे। दूसरे दिन पुनः भगवान् विष्णुकी पूजा करके भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे और नियमका विसर्जन करे। जो इस प्रकार उत्तम चन्द्रसहस्रव्रतका पालन करता है, वह महापातकी हो, तो भी शुद्धचित्त होकर चन्द्रलोकमें जाता है।
धर्महरिकी स्थापना और स्वर्णखनि तीर्थ, रघुका सर्वस्व दान तथा कौत्सकी याचनाको सफल करना
चन्द्रहरिके स्थानसे अग्निकोणमें भगवान् धर्महरिके नामसे विराजमान हैं, जो कलिके समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। प्राचीनकालमें वेद और वेदांगोंके तत्त्वज्ञ तथा अपने वर्णाश्रमोचित कर्ममें तत्पर धर्म नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करनेकी इच्छासे अयोध्यापुरीमें आये और बड़ी श्रद्धाके साथ यहाँके प्रत्येक तीर्थमें घूमते रहे। अयोध्याका अनुपम माहात्म्य देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने बड़े हर्षके साथ यह उद्गार प्रकट किया, 'अहो! अयोध्याके समान दूसरी कोई पुरी नहीं दिखायी देती। जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु निवास करते हैं, उसकी किससे उपमा हो सकती है। अहो! यहाँके सब तीर्थ भगवान् विष्णुका लोक प्रदान करनेवाले हैं।' ऐसा कहकर ब्राह्मणने आनन्दमग्न होकर बहुत नृत्य किया। अयोध्याका विशेष माहात्म्य देखकर जब धर्म नृत्य कर रहे थे, उस समय पीताम्बरधारी भगवान् विष्णु उनपर कृपा करके प्रकट हुए। धर्मने भगवान्को प्रणाम करके आदरपूर्वक उनका स्तवन किया।
धर्म बोले— क्षीरसागरमें निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। भगवान् शंकर जिनके दिव्य चरणारविन्दोंका स्पर्श करते हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है। जिनके उत्तम चरण भक्तिभावसे पूजित हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। ब्रह्मा आदिके प्रियतम आप श्रीनारायणको नमस्कार है। शुभ अंग तथा सुन्दर नेत्रोंवाले भगवान् लक्ष्मीपतिको बार-बार नमस्कार है। जिनके चरण कमलके समान सुन्दर हैं, उन भगवान्को नमस्कार है। जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, उन मधुसूदनको नमस्कार है। क्षीरसागरकी उत्ताल तरंगे जिनके श्रीअंगोंका स्पर्श करती रहती हैं, उन शार्ङ्ग-धनुषधारी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। योगनिद्राका आश्रय लेनेवाले भगवान्को नमस्कार है। गरुड़की पीठपर बैठनेवाले भगवान् गोविन्ददेवको बार-बार नमस्कार है। जिनके केश, नासिका और ललाट सब सुन्दर हैं, उन भगवान् चक्रपाणिको नमस्कार है। सुन्दर वस्त्र तथा मनोहर श्यामवर्णवाले भगवान् श्रीधरको बार-बार नमस्कार है। सुन्दर भुजाओंवाले आप श्रीहरिको नमस्कार है। मनोहर जंघावाले आपको नमस्कार है। सुन्दर वस्त्र, सुन्दर दिव्य वेष और सुन्दर विद्यावाले आप भगवान् गदाधरको नमस्कार है। शान्तस्वरूप, वामनरूपधारी केशवको बार-बार नमस्कार है। जिन्हें धर्म प्रिय है, उन पीताम्बरधारी आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है।
धर्मके द्वारा स्तुति की जानेपर सम्पूर्ण जगत्के
- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१५
स्वामी भगवान् लक्ष्मीपतिने प्रसन्न होकर कहा—'धर्म! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ धर्म! जो तुम्हारे मनको प्रिय हो, ऐसा कोई वर माँगो। जो मनुष्य इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेगा, वह सब कामनाओंको प्राप्त कर लेगा।'
धर्म बोले—भगवन्! देवदेव जगत्पते! जगद्गुरो! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, तो मैं यहाँ आपकी स्थापना करूँगा।
'एवमस्तु' कहकर सर्वव्यापक भगवान् विष्णु धर्महरिके नामसे प्रसिद्ध हुए। भगवान् धर्महरिका स्मरण करनेमात्रसे मनुष्य मुक्त हो जाता है। कितनी ही चिन्तासे व्याकुल क्यों न हो, यदि सरयूजीके जलमें स्नान करके मनुष्य भगवान् धर्महरिका दर्शन करता है तो वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है; जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं; अतः मनुष्य इसकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकता। आषाढ़ मासके शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिमें वहाँकी वार्षिक यात्रा विधिपूर्वक सम्पन्न करनी चाहिये। स्वर्गद्वारमें स्नान करके भगवान् धर्महरिका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके धाममें निवास करता है।
धर्महरिसे दक्षिण दिशामें सोनेकी उत्तम खान है, जहाँ कुबेरने राजा रघुके भयसे सोनेकी वर्षा की थी। पूर्वकालमें इक्ष्वाकुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजा रघु अपनी उदार भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण भूमण्डलका शासन करते थे। उनके प्रतापसे संतप्त हुए शत्रुवर्गके लोग उनके उत्तम यशका वर्णन करते थे। प्रजाओंका न्यायपूर्वक पालन करनेवाले उस नीतिमान् राजाने अपने यशके प्रवाहसे दसों दिशाओंको उज्ज्वल प्रभासे आलोकित कर रखा था। उन्होंने दिग्विजययात्राके क्रमसे बहुत अधिक धनका संग्रह किया था। घर लौटकर उन्होंने यज्ञके लिये उत्सुक हो अपनी वंश-परम्पराके योग्य कर्म किया और निर्मल बुद्धिका परिचय दिया। वशिष्ठ मुनिसे आज्ञा लेकर राजा रघुने वामदेव, कश्यप तथा अन्य मुनिवरोंको, जो अनेक तीर्थोंमें निवास करते थे, एक विनयशील ब्राह्मणके द्वारा बुलवाया। प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी उन सब मुनियोंके वहाँ उपस्थित होनेका समाचार पाकर शत्रुविजयी महायशस्वी रघु स्वयं ही राजभवनसे बाहर निकले और उन सबके सामने नतमस्तक होकर यज्ञकी सिद्धिके लिये यह धर्मयुक्त वचन बोले—'मुनिवरो! मैं यज्ञ करना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान करें।'
मुनि बोले—राजन्! विश्वजित् नामक यज्ञ सब यज्ञोंमें उत्तम है। इस समय उसीका यत्नपूर्वक अनुष्ठान कीजिये।
तब राजाने अनेक प्रकारकी सामग्रियोंसे परम मनोहर प्रतीत होनेवाला वह विश्वदिग्जय (विश्वजित्) नामक यज्ञ किया, जिसमें सर्वस्वकी दक्षिणा दे दी जाती है। नाना प्रकारके दानसे उन्होंने मुनियोंको सन्तोष और हर्ष प्रदान किया और ब्राह्मणोंको अत्यन्त आदरपूर्वक सर्वस्व दान कर दिया। वे सब ब्राह्मण जब राजाद्वारा पूजित होकर अपने-अपने घरोंको चले गये तथा प्रणाम आदिसे सत्कृत हुए मुनि भी अपने आश्रमको पधारे, तब वे सदाचारी राजा रघु विधिपूर्वक किये हुए उस यज्ञसे बड़ी शोभा पाने लगे। इसी समय विश्वामित्र मुनिके शिष्य एवं संयमी पुरुषोंमें श्रेष्ठ कौत्स गुरुकी दक्षिणाके लिये राजाको पवित्र करनेके लिये आये। उनको आया हुआ जान राजा रघु बड़े आदरसे उठे और विधिपूर्वक उनका पूजन किया। राजाने मिट्टीके पात्रोंद्वारा ही कौत्स मुनिका पूजनकार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् कौत्सने कहा—'राजन्! आपका अभ्युदय हो, इस समय मैं अन्यत्र जाता हूँ। आपने अपना सर्वस्व दक्षिणामें दे डाला है। मैं गुरुजीको देनेके लिये धन माँगनेके लिये आया था, किंतु आपके पास धनका अभाव है; इसलिये आपसे याचना नहीं करता।'
मुनिके ऐसा कहनेपर शत्रुविजयी रघुने क्षणभर
सर्वस्वदानी रघु और ब्राह्मण कौत्स
* वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५१७
कुछ विचार किया; फिर विनयसे हाथ जोड़कर कहा—'भगवन् ! मेरे महलमें एक दिन ठहरिये। तबतक मैं आपके धनके लिये विशेष प्रयत्न करता हूँ।' उदारबुद्धिवाले राजा रघुने यह परम उदारतापूर्ण वचन कहकर धनाध्यक्ष कुबेरको जीतनेकी इच्छासे प्रस्थान किया। कुबेरजीने उन्हें आते देख सन्देश भेजकर उनके मनको संतुष्ट किया और अयोध्यामें ही सुवर्णकी अक्षय वर्षा की। जहाँ वह वर्षा हुई थी, वहाँ सोनेकी उत्तम खान बन गयी। कुबेरकी दी हुई वह सोनेकी खान राजाने मुनिको दिखलायी और उन्हें समर्पित कर दी। मुनीश्वर कौत्सने भी गुरुके लिये जितना आवश्यक था, उतना धन आदरपूर्वक ले लिया और शेष सारा धन राजाको ही निवेदन किया और कहा—'राजन्! तुम्हें अपने कुलके गुणोंसे सम्पन्न सत्पुत्रकी प्राप्ति हो और यह जो सुवर्णकी खान है, वह मनोवांछित फल देनेवाली हो। यहाँ सब पापोंका अपहरण करनेवाला उत्तम तीर्थ हो जाय। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको यहाँकी वार्षिक यात्रा हो और उसमें मेरे कथनानुसार लोगोंको अनेक प्रकारके अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो।'
इस प्रकार राजाको वर देकर संतुष्ट चित्तवाले कौत्स मुनि अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये उत्कण्ठापूर्वक गुरुके आश्रमपर चले गये।
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सम्भेदतीर्थ, सीताकुण्ड, गुप्तहरि और चक्रहरि तीर्थकी महिमा
सूतजी कहते हैं—स्वर्णखनिसे दक्षिण दिशामें सिद्धसेवित 'सम्भेद' तीर्थ है, जो तिलोदकी और सरयूके संगमसे विख्यात हुआ है। महाभाग! उसमें स्नान करके मनुष्य पापरहित होते हैं। दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे जो फल होता है, वही धर्मात्मा पुरुष नियमपूर्वक उसमें स्नान करके प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य वहाँ वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणको सुवर्ण आदि देता है, वह उत्तम गतिको पाता है। भादोंके कृष्ण पक्षकी अमावास्याको वहाँकी यात्रा होती है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने दूसरे समुद्रकी भाँति उस नदीका निर्माण किया था। उसमें तिलकी तरह काले रंगका जल सदा शोभा पाता था। इसलिये वह पुण्यसलिला नदी 'तिलोदकी' नामसे विख्यात हुई। पवित्र व्रत धारण करनेवाला मनुष्य संगमसे अन्यत्र भी यदि तिलोदकीमें स्नान करे तो वह सात जन्मके पापोंसे मुक्त हो जाता है। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंको यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिये। वहाँ किये हुए स्नान, दान, व्रत, होम सभी अक्षय होते हैं। उस संगमसे पश्चिम दिशामें तटपर 'सीताकुण्ड' नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। सीताजीने स्वयं ही उस कुण्डका निर्माण किया है तथा श्रीरामचन्द्रजीने वरदान देकर उसे महान् फलोंकी निधि बना दिया है।
(चित्र: सीता-राम एवं मन्दिर-दर्शन)
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श्रीराम बोले—सौभाग्यवती सीते! इस तीर्थमें विधिपूर्वक किया हुआ स्नान, दान, जप, होम अथवा तप सब अक्षय हो। मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशीको यहाँ स्नानका विशेष पर्व होगा। उस समय इसमें स्नान करनेवाले मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश होगा।
प्रजाप्रेमी श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीको इस प्रकार वरदान दिया था। तभीसे यह तीर्थ पृथ्वीपर प्रसिद्ध है। सीताकुण्ड मनुष्योंके लिये बड़ा अद्भुत तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य निश्चय ही भगवान् श्रीरामचन्द्रजीको प्राप्त कर लेता है। उसमें स्नान, दान और तपस्या करके चन्दन, माला, धूप, दीप तथा अनेक भाँतिके वैभवविस्तारसे श्रीराम और सीताजीकी पूजा करके मनुष्य मुक्त हो जाता है। मार्गशीर्ष मासमें यहाँ स्नान करना चाहिये। इससे फिर गर्भमें नहीं आना पड़ता। अन्य समयमें भी यहाँ स्नान करके मनुष्य भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। भगवान् विष्णुहरिके पश्चिम दिशामें चक्रहरि नामसे प्रसिद्ध श्रीविष्णु निवास करते हैं, जो समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले हैं। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विद्वान् पुरुष भी चक्रहरिकी महिमाका वर्णन नहीं कर सकते। वहाँसे पश्चिम हरिस्मृति नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णुका परम पवित्र मन्दिर है, जो पारमार्थिक फल देनेवाला है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। चक्रहरि और हरिस्मृति इन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य इस पृथ्वीपर जितने पाप करते हैं, उन सबका नाश हो जाता है।
पूर्वकालकी बात है, देवताओं और असुरोंमें बड़ा भयंकर संग्राम हुआ। वरदानके मदसे उन्मत्त हुए दैत्योंने उस युद्धमें देवताओंको परास्त कर दिया। देवता भागने लगे। तब भगवान् शंकरने उनका अगुआ बनकर उन्हें रोका और ब्रह्माजीको आगे करके सब लोग क्षीरसागरपर गये। वहाँ भगवान् विष्णु क्षीरसमुद्रमें शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे थे। भगवती लक्ष्मी उनके पास बैठकर अपने हाथसे उनके चरणारविन्दोंकी सेवा करती थीं। नारद आदि श्रेष्ठ मुनि भगवान्के गुण-गौरवका उच्चस्वरसे गान कर रहे थे। गरुड़जी सामने खड़े होकर निरन्तर हाथ जोड़े उनकी स्तुति करते थे। क्षीरसागरके जलसे उठती हुई तरंगोंके कारण भगवान्के पीताम्बरमें जलके कुछ छींटे पड़े हुए थे। नक्षत्रसमुदायके समान प्रकाशमान उज्ज्वल हार भगवान्के वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके कटिप्रदेशमें पीताम्बर शोभायमान था। मुखपर मुसकानकी घटा छा रही थी। भगवान् एक अद्भुत भावसे भावित थे। कानोंमें मोती जड़े हुए दिव्य एवं स्थूल कुण्डल पहने हुए थे। श्वेतद्वीपकी स्वच्छ रत्नमयी लता-सी भगवान्ने धारण कर रखी थी। मस्तकपर किरीट और हाथोंमें पद्मरागमणिके वलय सुशोभित थे। भगवान् शंकरने विनीतभावसे सम्पूर्ण देवताओंके साथ उस समय भगवान्की शरण ली और एकाग्रचित्त होकर स्तवन किया।
भगवान् शिव बोले—जो संसारसमुद्रसे तारने और गरुड़जीको सुख देनेवाले हैं, घनीभूत मोहान्धकारका निवारण करनेके लिये चन्द्रस्वरूप हैं, उन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार है। जहाँ ज्ञानमयी मणिकी प्रज्वलित शिखा प्रकाशित होती है तथा जो चित्तमें भगवत्संगरूपी सुधाकी वर्षा करनेवाली चन्द्रिकाके तुल्य है, मानसके उद्यानमें जो प्रवाहित होती है, उस भगवद्भक्तिरूपी मन्दाकिनीकी मैं शरण लेता हूँ। वह लीलापूर्वक उत्साहशक्तिको जाग्रत् करनेवाली तथा सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त है। सात्त्विक भावोंकी पूर्वकोटि है। उसे ही वैष्णवी शक्ति कहते हैं। हवासे हिलते हुए कमलदलके पर्वके भीतर रहनेवाले पतनशील जन्तुओंकी भाँति पतनके गर्तमें गिरनेवाले प्राणियोंको स्थिरता देनेवाली एकमात्र श्रीहरिकी
- वैष्णवखण्ड-श्रीअयोध्या-माहात्म्य * ५११
स्मृति ही है। हृदयकमलकी कलिकाको विकसित करनेवाली ज्ञानरूपी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्यस्वरूप आप भगवान्को नमस्कार है। योगियोंकी एकमात्र गति आप संयमशील श्रीहरिको नमस्कार है। तेज और अन्धकार दोनोंसे परे विराजमान आप परमेश्वरको नमस्कार है। आप यज्ञस्वरूप, हविष्यके उपभोक्ता तथा ऋक्, यजु एवं सामवेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। भगवती सरस्वतीके द्वारा गाये जानेवाले दिव्य सद्गुणोंसे विभूषित आप भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप शान्तस्वरूप, धर्मके निधि, क्षेत्रज्ञ एवं अमृतात्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप साधकके योगकी प्रतिष्ठा तथा जीवके एकमात्र हेतु हैं, आपको नमस्कार है। आप घोरस्वरूप, मायाकी विधि तथा सहस्रों मस्तकवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप योगनिद्रास्वरूप होकर शयन करते और अपने नाभिकमलसे उत्पन्न संसारकी सृष्टि रचते हैं, आपको नमस्कार है। आप जलस्वरूप एवं संसारकी स्थितिके कारण हैं, आपको नमस्कार है। आपके कार्योंद्वारा आपकी शक्तिका अनुमान होता है। आप महाबली, सबके जीवन और परमात्मा हैं, आपको नमस्कार है। समस्त भूतोंके रक्षक और प्राण आप ही हैं, आप ही विश्व तथा उसके स्रष्टा ब्रह्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप नृसिंहशरीर धारण करके दर्पयुक्त हो दैत्यका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप ही सबके पराक्रम हैं। आपका हृदय अनन्त है। आप सम्पूर्ण संसारके भावको ग्रहण करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप संसारके कारणभूत अज्ञानरूपी घोर अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। आपका धाम अचिन्त्य है, आपको नमस्कार है। आप गूढ़रूपसे स्थित तथा अत्यन्त उद्वेगकारक रुद्र हैं, आपको नमस्कार है। आप शान्त हैं, जहाँ समस्त ऊर्मियाँ शान्त हो जाती हैं ऐसे कैवल्यपदको देनेवाले हैं। सम्पूर्ण भावपदार्थोंसे परे तथा सर्वमय हैं, आपको नमस्कार है। जो नील कमलके समान श्याम हैं और चमकते हुए केसरके समान सुशोभित कौस्तुभमणि धारण करते हैं तथा नेत्रोंके लिये रसायनरूप हैं, ऐसे आप भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।
इस प्रकार स्तुति करनेपर प्रसन्नचित्त, वरदायक भगवान् गरुड़ध्वजने कृपायुक्त हो सम्पूर्ण देवताओंपर अपनी सुधावर्षिणी दृष्टिसे अमृतकी वर्षा की और विनीत देवताओंसे यह मधुर वचन कहा—'देवताओ! मैं ध्यानसे तुम्हारा सारा अभिप्राय जान गया हूँ। मैं इस समय अयोध्या नगरमें जाकर तुम्हारे तेजकी वृद्धि और दैत्योंके उपद्रवकी शान्तिके लिये गुप्त रहकर उत्तम तपका अनुष्ठान करूँगा। तुमलोग भी शुद्धचित्त हो अयोध्यामें जाकर दैत्योंके विनाशके लिये तीव्र तपस्या करो।'
ऐसा कहकर भगवान् गरुड़वाहन अन्तर्धान हो गये। उन्होंने अयोध्यामें आकर गुप्त रहकर देवताओंके तेजकी वृद्धिके लिये शीघ्र उत्तम तपस्या प्रारम्भ की। इसलिये वे गुप्तहरिके नामसे प्रसिद्ध हुए। यहाँ पहले आये हुए भगवान् विष्णुके हाथसे सुदर्शन-चक्र छूटकर गिरा था, अतः चक्रहरिके नामसे भगवान्की प्रसिद्धि हुई। उन दोनोंके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। भगवान् श्रीहरिके प्रभावसे देवता प्रबल तेजस्वी हो गये। उन्होंने युद्धमें दैत्योंको परास्त करके अपना स्थान प्राप्त कर लिया और परम आनन्दयुक्त हो वे अतिशय शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् बृहस्पति आदि सब देवताओंने भगवान्को प्रणाम किया और उनके दर्शनके लिये उत्कण्ठित हो सब-के-सब अयोध्यामें आये। वहाँ पुनः प्रणाम करके हाथ जोड़कर एकाग्रचित्तसे श्रीहरिका ध्यान करते हुए उन्हींमें तन्मय हो गये। तब भगवान् विष्णुने उनसे कहा—'देवताओ! मैं इस समय तुम्हारी कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ।'