संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
६४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लिये सदैव त्याज्य है। नारद! जो सम्पूर्ण कार्योंमें निष्कामभावसे प्रवृत्त होता है, जिसमें अहंबुद्धिका अभाव है, जो बुद्धिके नेत्रोंसे ही देखता है, ऐसा पुरुष ही महाज्ञानी और योगी है। मनुष्योंके शरीरमें यह अहंकार विष है। अतः वह सदैव त्याग देने योग्य है। मनुष्य कामनाके त्यागद्वारा क्रोध और लोभको जीते। ऐसे मनुष्यके सहस्रों पाप उसके शरीरसे निकलकर सहस्रों टुकड़ोंमें नष्ट हो जाते हैं। शान्तिके द्वारा मोह और मनको जीतकर विचारके द्वारा शान्तिभावको अपनाना चाहिये। सन्तोषसे भी शान्तिका उदय होता है। जो अपनी कोमलता एवं सरलताके द्वारा ईर्ष्याभावको दबा देता है, यह मुनीश्वर है। चातुर्मास्यमें जीवदया विशेष धर्म है। प्राणियोंसे द्रोह करना कभी भी धर्म नहीं माना गया है। अतः सदा सब मासोंमें भूतद्रोहका परित्याग करना चाहिये। मनीषी पुरुष इस भूतद्रोहको सहस्रों पापोंका मूल बताते हैं। इसलिये मनुष्योंको सर्वथा प्रयत्न करके प्राणियोंके प्रति दया करनी चाहिये। सब प्राणियोंके हृदयमें सदा भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। जो उन प्राणियोंसे द्रोह करनेवाला है, उसके द्वारा भगवान्का ही तिरस्कार होता है। जिस धर्ममें दया नहीं है, वह दूषित माना गया है। दयाके बिना न विज्ञान होता है, न धर्म होता है और न ज्ञान ही होता है। अतः सब प्राणियोंके प्रति आत्मभाव रखकर सबके ऊपर दया करना सनातन धर्म है, जो सब पुरुषोंके द्वारा सदा सेवन करने योग्य है।
सब धर्मोंमें दानधर्मकी विद्वान् लोग सदा प्रशंसा करते हैं। वेदमें अन्नको ब्रह्म कहा गया है, अन्नमें ही प्राणोंकी प्रतिष्ठा है। अतः मनुष्य सदा अन्न एवं जलका दान करे। जल देनेवाला तृप्तिको और अन्न-दान करनेवाला मनुष्य अक्षय सुखको पाता है। अन्न और जलके समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा। मणि, रत्न, मूँगा, चाँदी, सोना और वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानोंमें भी अन्नदान ही सबसे बढ़कर है^१। चातुर्मास्यमें अन्न और जलका दान, गोदान, प्रतिदिन वेदपाठ और अग्निमें हवन—ये सब महान् फल देनेवाले हैं। यदि भगवान् विष्णुके साथ समागमके लिये वैकुण्ठधाममें जानेकी इच्छा हो, तो सब पापोंके नाशके लिये चौमासेमें अन्नदान करना चाहिये। अन्नदान करनेसे सब प्राणी प्रसन्न होते हैं। देवता भी अन्नदाताकी स्पृहा रखते हैं। गुरु और ब्राह्मणोंको भोजन कराना, घृतदान करना तथा सत्कर्मोंमें संलग्न रहना—ये सब बातें चातुर्मास्यकालमें जिसमें मौजूद हैं, वह साधारण मनुष्य नहीं है। सद्धर्म, सत्कथा, सत्पुरुषोंकी सेवा, संतोंका दर्शन, भगवान् विष्णुका पूजन और दानमें अनुराग—ये सब बातें चौमासेमें दुर्लभ बतायी गयी हैं^२। जो मनुष्य चौमासेमें पितरोंके उद्देश्यसे अन्नदान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर पितरोंके लोकमें जाता है। उसके अन्नदानसे तृप्त हुए देवतालोग उसे मनोवांछित वस्तु प्रदान करते हैं। चींटी भी उसके घरसे भोजन लेकर जाती है। अन्नदान सबसे उत्तम है, उसका न रातमें निषेध है, न दिनमें। चौमासेमें वह विशेषरूपसे पापोंका नाश करनेवाला है। शत्रुओंको भी अन्न देना मना नहीं है। चौमासेमें दूध, दही एवं मट्ठाका दान
१- अन्नं ब्रह्म इति प्रोक्तमन्ने प्राणाः प्रतिष्ठिताः। तस्मादन्नप्रदो नित्यं वारिदश्च भवेन्नरः॥
वारिदस्तृप्तिमायाति सुखमक्षय्यमन्नदः। वार्यन्नयोः समं दानं न भूतं न भविष्यति॥
मणिरत्नप्रवालानां रूप्यहाटकवाससाम्। अन्येषामपि दानानामन्नदानं विशिष्यते॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३। २-४)
२- सद्धर्मः सत्कथा चैव सत्सेवा दर्शनं सताम्। विष्णुपूजा रतिर्दाने चातुर्मास्येसुदुर्लभा॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३। ११)
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६४९
महान् फल देनेवाला होता है। जन्मकालमें जिससे यह शरीर पुष्ट हुआ है, उस अन्न एवं दुग्धका दान उत्तम है। साग देनेवाला मनुष्य न कभी नरकमें जाता है और न यमलोकका दर्शन करता है। वस्त्र देनेवाला प्रलयकालतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो चातुर्मास्यमें चन्दन, अगुरु और धूपका दान करता है, वह मनुष्य पुत्र-पौत्रोंसहित विष्णुरूप होता है। भगवान् विष्णुके शयनकालमें जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मणको फल दान करता है, वह यमलोकको नहीं देखता। जो चौमासेमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये विद्यादान, गोदान और भूमिदान करता है, वह अपने पूर्वजोंका उद्धार कर देता है। जो जिस देवताके उद्देश्यसे चौमासेमें गुड़, नमक, तेल, शहद, तिक्त पदार्थ, तिल और अन्न देता है, वह उसीके लोकमें जाता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें मनुष्यको अग्निमें आहुति देनी चाहिये, ब्राह्मणको दान देना चाहिये और गौओंकी भलीभाँति सेवा-पूजा करनी चाहिये। भविष्यमें दान देनेकी प्रतिज्ञा न करके शीघ्र ही दे डालना चाहिये। मनुष्य जो कुछ देनेकी इच्छा करे, वह अवश्य दे डाले। जिसको देनेका निश्चय किया हो उसे ही दे, दूसरेको न दे। दी हुई वस्तु उससे वापस न ले। जो श्रीहरिके शयनकालमें ब्राह्मणोंके लिये सब प्रकारका दान देता है, वह पूर्वजोंसहित अपनेको पापोंसे मुक्त कर लेता है।
चातुर्मास्यमें इष्ट वस्तुके परित्याग तथा नियम-पालनका महत्त्व
ब्रह्माजी कहते हैं—मनुष्य सदा प्रिय वस्तुकी इच्छा करता है। अतः जो चातुर्मास्यमें भगवान् नारायणकी प्रीतिके लिये अपने प्रिय भोगोंका पूर्ण प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षयरूपमें प्राप्त होती हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रिय वस्तुका त्याग करता है, वह अनन्त फलका भागी होता है। धातुपात्रोंका त्याग करके पलाशके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। गृहस्थ मनुष्य ताँबेके पात्रमें कदापि भोजन न करे। चौमासेमें तो ताँबेके पात्रमें भोजन विशेषरूपसे त्याज्य है। मदारके पत्तेमें भोजन करनेवाला मनुष्य अनुपम फलको पाता है। चातुर्मास्यमें विशेषतः वटके पत्रमें भोजन करना चाहिये। चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये गृहस्थ-आश्रमका परित्याग करके बाह्य आश्रमका सेवन करनेवाले मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता। मिर्च छोड़नेसे राजा होता है, रेशमी वस्त्रोंके त्यागसे अक्षय सुख मिलता है, उड़द और चना छोड़ देनेसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति नहीं होती। चातुर्मास्यमें विशेषतः काले रंगका वस्त्र त्याग देना चाहिये। नीले वस्त्रको देख लेनेसे जो दोष लगता है, उसकी शुद्धि भगवान् सूर्यनारायणके दर्शनसे होती है। कुसुम्भ रंगके परित्याग करनेसे मनुष्य यमराजको नहीं देखता। केशरके त्यागसे वह राजाका प्रिय होता है। फूलोंको छोड़नेसे मनुष्य ज्ञानी होता है, शय्याका परित्याग करनेसे महान् सुखकी प्राप्ति होती है। असत्यभाषणके त्यागसे मोक्षका दरवाजा खुल जाता है। चातुर्मास्यमें परनिन्दाका विशेषरूपसे परित्याग करे। पर-निन्दा महान् पाप है, पर-निन्दा महान् भय है, पर-निन्दा महान् दुःख है और पर-निन्दासे बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है*। पर-निन्दाको सुननेवाला भी पापी होता है। चौमासेमें केशोंका संँवारना (हजामत)
* परनिन्दा महापापं परनिन्दा महाभयम्। परनिन्दा महद्दुःखं न तस्याः पातकं परम् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ४। २५)
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण * त्याग दे तो वह तीनों तापोंसे रहित होता है। जो भगवान्के शयन करनेपर विशेषतः नख और रोम धारण किये रहता है, उसे प्रतिदिन गंगास्नानका फल मिलता है। मनुष्यको सब उपायोंद्वारा योगियोंके ध्येय भगवान् विष्णुको ही प्रसन्न करना चाहिये। समस्त वर्णों एवं श्रेष्ठ पुरुषोंके द्वारा भी भगवान् श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् विष्णुके नामसे मनुष्य घोर बन्धनसे मुक्त हो जाता है। चातुर्मास्यमें उनका विशेषरूपसे स्मरण करना उचित है। कर्ककी संक्रान्तिके दिन भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करके प्रशस्त एवं शुभ जामुनके फलोंसे अर्घ्य देना चाहिये। अर्घ्य देते समय इस भावका चिन्तन करे - 'छः महीनेके भीतर जहाँ कहीं भी मेरी मृत्यु हो जाय तो मानो मैंने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् वासुदेवके चरणोंमें ही समर्पित कर दिया।' सर्वथा प्रयत्न करके भगवान् जनार्दनका सेवन करना चाहिये। जो मनुष्य भगवान् विष्णुकी कथा, पूजा, ध्यान और नमस्कार सब कुछ उन्हीं श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये करता है, वह मोक्षका भागी होता है* । सत्यस्वरूप सनातन विष्णु वर्णाश्रम धर्मके स्वरूप हैं। जन्म- मृत्यु आदिके कष्टका उन्हींके द्वारा नाश होता है। अतः चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे व्रतद्वारा श्रीहरिको ही ग्रहण करना चाहिये। तपोनिधि भगवान् नारायणके शयन करनेपर अपने इस शरीरको तपस्याद्वारा शुद्ध करना चाहिये। भगवान् विष्णुकी भक्तिसे युक्त जो व्रत है, उसे विष्णुव्रत जानो। धर्ममें संलग्न होना तप है। व्रतोंमें सबसे उत्तम व्रत है - ब्रह्मचर्यका पालन । ब्रह्मचर्य तपस्याका सार है और ब्रह्मचर्य महान् फल देनेवाला है। इसलिये समस्त कर्मोंमें ब्रह्मचर्यको बढ़ावे। ब्रह्मचर्यके प्रभावसे उग्र तपस्या होती है। ब्रह्मचर्यसे बढ़कर धर्मका उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके शयन करनेपर यह महान् व्रत संसारमें अधिक गुणकारक है - ऐसा जानो। जो इस वैष्णवधर्मका पालन करता है, वह कभी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता। भगवान्के शयन करनेपर जो यह प्रतिज्ञा करके कि - 'हे भगवन् ! मैं आपकी प्रसन्नताके लिये अमुक सत्कर्म करूँगा।' उसका पालन करता है, तो उसीको व्रत कहते हैं। वह व्रत अधिक गुणोंवाला होता है। अग्निहोत्र, ब्राह्मणभक्ति, धर्मविषयक श्रद्धा, उत्तम बुद्धि, सत्संग, विष्णुपूजा, सत्यभाषण, हृदयमें दया, सरलता एवं कोमलता, मधुर वाणी, उत्तम चरित्रमें अनुराग, वेदपाठ, चोरीका त्याग, अहिंसा, लज्जा, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम, लोभ, क्रोध और मोहका अभाव, इन्द्रियसंयममें प्रेम, वैदिक कर्मोंका उत्तम ज्ञान तथा श्रीकृष्णको अपने चित्तका समर्पण - ये नियम जिस पुरुषमें स्थिर हैं, वह जीवन्मुक्त कहा गया है। वह पातकोंसे कभी लिप्त नहीं होता। एक बारका किया हुआ व्रत भी सदैव महान् फल देनेवाला होता है। चातुर्मास्यमें ब्रह्मचर्य आदिका सेवन अधिक फलद होता है। चातुर्मास्यव्रतका अनुष्ठान सभी वर्णके लोगोंके लिये महान् फलदायक है। व्रतके सेवनमें लगे हुए मनुष्योंद्वारा सर्वत्र भगवान् विष्णुका दर्शन होता है। चातुर्मास्य आनेपर व्रतका यत्नपूर्वक पालन करे। विष्णु, ब्राह्मण और अग्निस্বরূপ तीर्थका सेवन करे। चारों वेदमय स्वरूपवाले अजन्मा विराट् पुरुषको भजे, जिनके प्रसादसे मनुष्य मोक्षरूपी महान् वृक्षके ऊपर चढ़ जाता है और कभी सन्तापको नहीं प्राप्त होता।
* विष्णोः कथा विष्णुपूजा ध्यानं विष्णोर्नतिस्तथा। सर्वमेव हरिप्रीत्या यः करोति स मुक्तिभाक् ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ५।७-८)
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* ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६५१
चातुर्मास्यमें विशेष-विशेष तप और भगवान्की षोडशोपचार पूजाका क्रम
ब्रह्माजी कहते हैं—षोडशोपचारसे सदैव भगवान् विष्णुकी पूजा करना तप है और भगवान्के शयन करनेपर वही महातप कहा गया है। इसी प्रकार सदा पंचयज्ञोंका अनुष्ठान भी तप है; परंतु चातुर्मास्यमें श्रीहरिको निवेदन करनेपर वही महातप हो जाता है। ऋतुकालमें स्त्रीके साथ सम्बन्ध करना गृहस्थके लिये सदा ही तप माना गया है, किंतु वही चातुर्मास्यमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये किया जाय तो महातप है। सदा सत्य बोलना तप है। यह भूतलपर निवास करनेवाले प्राणियोंके लिये दुर्लभ तप कहा गया है। देवेश्वर श्रीहरिके शयन करनेपर यह सत्यभाषणरूपी तपस्या करनेवाला मनुष्य अनन्त फलका भागी होता है। अहिंसा आदि गुणोंका पालन करना सदा ही तप है; किंतु चातुर्मास्यमें वैरभावका परित्याग करके उसका पालन किया जाय तो वह महातप कहा गया है। पंचायतन पूजा महातप है। मनुष्य चातुर्मास्यमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये इस महातपका विशेषरूपसे अनुष्ठान करे। सभी पर्वोंके अवसरपर सदा दान देना चाहिये, यह तप है; परंतु चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका पालन करनेपर वह दान अनन्त होता है।
चौमासेमें दो प्रकारका शौच ग्रहण करना चाहिये। एक बाह्य शौच और दूसरा आन्तरिक शौच। जलसे नहाना-धोना बाह्य शौच कहलाता है और श्रद्धासे अन्तःकरणको शुद्ध करना आन्तरिक शौच है। इन्द्रियोंका निग्रह करना चाहिये। यह तपस्याका उत्तम लक्षण है। किंतु चातुर्मास्यमें इन्द्रियोंकी चंचलता दूर हो तो वह महातप कहा गया है। इन्द्रियरूपी घोड़ोंको काबूमें रखकर मनुष्य सदा सुख पाता है। वे इन्द्रियरूपी अश्व जब कुमार्गसे चलने लगते हैं, तब जीवको नरकमें गिराते हैं। यह काम महान् शत्रु है। इस एकको ही दृढ़तापूर्वक जीते। जिन महात्माओंने कामको जीत लिया है, उन्होंने सम्पूर्ण जगत्पर विजय पा ली है। काम और संकल्पपर विजय पा लेना ही तपस्याका मूल है। वही सबसे उत्तम ज्ञान है जिसके द्वारा कामको जीत लिया जाय। लोभ सदा त्याग देनेयोग्य है; क्योंकि लोभमें पापकी स्थिति है। लोभको जीत लेना ही तप है। चातुर्मास्यमें इसका विशेष महत्त्व है। मोहका अर्थ है अविवेक। वह सदा त्याग देनेयोग्य है। जो मोहसे रहित है, वही ज्ञानी है। मनुष्योंके शरीरमें रहनेवाला मद ही महान् शत्रु है। यों तो सदा ही, किंतु चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका निग्रह करना चाहिये। मान बड़ा भयंकर शत्रु है। वह सब प्राणियोंके भीतर निवास करता है। उसे क्षमाद्वारा जीतना चाहिये। चातुर्मास्यमें उसे जीतना अधिक गुणकारी होता है। मात्सर्य (ईर्ष्या) भी महान् पातकका कारण है। अतः विद्वान् पुरुष चातुर्मास्यमें उसको जीते। जिसने उसे जीत लिया, उसने तीनों लोक जीत लिये। अहंकारके वशीभूत हुए अजितेन्द्रिय मुनि धर्ममार्गको छोड़कर कुमार्गके कर्म करने लगते हैं। अतः अहंकारका परित्याग करके मनुष्य सदैव सुख पाता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें अहंकारके त्यागका महान् फल है। यह तपस्याका मूल है। जो मनुष्य विष्णुके शयनकालमें प्रतिदिन एक समय भोजन करता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल मिलता है। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें प्रतिमास नित्य चान्द्रायणव्रत करता है, उसके पुण्यका वर्णन नहीं किया जा सकता। जो भगवान् विष्णुके शयनकालमें कृच्छ्र व्रतका सेवन करता
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है, वह पापराशिका नाश करके वैकुण्ठमें भगवान्का पार्षद होता है। जो चातुर्मास्यमें केवल दूध पीकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं। यदि धीर पुरुष चौमासेमें नित्य परिमित अन्नका भोजन करता है, तो वह सब पातकोंका नाश करके वैकुण्ठधाम पाता है। चौमासेमें एक अन्न भोजन करनेवाला मनुष्य रोगी नहीं होता। जो क्षार लवणका सेवन करनेवाला नहीं है, उसमें पापका अभाव हो जाता है। चौमासेमें भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये फलाहार करनेवाला मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो कन्द-मूलका आहार करता है, वह अपने साथ पूर्वजोंका भी घोर नरकसे उद्धार करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो प्रतिदिन चौमासेमें केवल जल पीकर रहता है, उसे रोज-रोज अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य चौमासेमें श्रीहरिकी प्रीतिके लिये शीत और वर्षा सहन करता है, उसपर प्रसन्न होकर भगवान् जगन्नाथ उसे अपने-आपको दे डालते हैं। जो मन-ही-मन भगवान् नारायणका चिन्तन करके इस परम पवित्र और पापकी शुद्धिके हेतुभूत पुराणको सुनता अथवा पढ़ता है, वह मरकर मोक्षको प्राप्त होता है।
**नारदजीने पूछा—**प्रजापते! सोलह उपचारोंसे किस प्रकार भगवान्की पूजा की जाती है?
**ब्रह्माजीने कहा—**वेदों और शास्त्रोंके विधानके अनुसार भगवान् विष्णुकी भक्ति दृढ़ करनी चाहिये। यह सब जो कुछ दिखायी देता है, सबका मूल वेद है और वेद सनातन भगवान् विष्णुका स्वरूप है। वेदोंके आधार हैं ब्राह्मण तथा ब्राह्मणोंके देवता अग्नि हैं। अग्निमें आहुति डालनेवाला ब्राह्मण यज्ञमें सदा भगवान् श्रीहरिका यजन करता हुआ तथा श्रीविष्णुकी पूजामें निरन्तर संलग्न रहता हुआ सम्पूर्ण जगत्को धारण करता है। भगवान् नारायणका स्मरण और ध्यान क्लेश, दुःख आदिका नाश करनेवाला है। चातुर्मास्यमें भगवान् श्रीहरि जलमें विशेषरूपसे व्याप्त रहते हैं। जलसे अन्न पैदा होता है, जिससे जगत्की तृप्ति होती है। वह अन्न भगवान् विष्णुके शरीरके अंशसे उत्पन्न होता है। अन्नको 'ब्रह्म' कहते हैं। वह अन्न आवाहनपूर्वक भगवान् विष्णुको समर्पण करके मनुष्य पुनर्जन्म, वृद्धता और क्लेशके संस्कारोंद्वारा तिरस्कृत नहीं होता। 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' इत्यादि जो सोलह ऋचाओंवाला यजुर्वेदका महासूक्त है, वह सर्वोत्कृष्ट नारायणमय है। उसके पाठमात्रसे भी ब्रह्महत्या दूर हो जाती है। ब्राह्मणको उचित है कि वह पहले स्मृतियोंमें बतायी हुई विधिके अनुसार अपने शरीरमें उक्त सोलह सूक्तोंका न्यास करे। तत्पश्चात् भगवान्की प्रतिमा अथवा शालग्रामशिलामें विशेषरूपसे न्यास करे। फिर क्रमशः आवाहन आदि करे। वैकुण्ठधाममें विराजमान, कौस्तुभमणिसे सुशोभित, कोटि-कोटि सूर्योंके समान तेजस्वी, दण्डधारी, शिखासूत्रसे सुशोभित पीताम्बरधारी-रूपसे भगवान् विष्णुका आवाहन करके ध्यान करे। सब पापोंके समूहका नाश करनेवाले श्रीविष्णुको इस रूपमें अपने ध्यानमें स्थिर करके उन्हें पूजाके लिये अपने आगे आवाहन करे। पुरुषसूक्तकी प्रथम ऋचा 'सहस्रशीर्षा पुरुषः' इत्यादि मन्त्रके आदिमें ॐकार जोड़कर उसका उच्चारण करे और उसीके द्वारा भगवान्का आवाहन करे। इसी प्रकार दूसरी ऋचा 'पुरुष एवेदम्' इत्यादिसे पार्षदोंसहित श्रीहरिको आसन समर्पित करे। वे सभी आसन सुवर्णमय हैं, ऐसा मन-ही-मन चिन्तन करे। भक्तियोगसे चिन्तन करनेपर वह परिपूर्ण होता है। फिर तीसरी ऋचासे पाद्य समर्पण करे और उसमें गंगाजीका स्मरण करे। उसके बाद सरिताओं तथा सातों समुद्रोंके जलसे जगदीश भगवान् विष्णुको अर्घ्य दे। सरिताओं और सागरोंका चिन्तनमात्र करना
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६५३ ---|---
चाहिये। चौथी ऋचासे अर्घ्यदान करना उचित है। इसके बाद श्रीहरिको अमृतसे आचमन करावे। तीन आचमनसे ब्राह्मणकी शुद्धि बतायी गयी है। आचमनका जल स्वच्छ एवं फेन और बुद्बुदसे रहित होना चाहिये। ब्राह्मण इतने जलसे आचमन करे कि वह उसके हृदयतक पहुँच जाय, क्षत्रिय कण्ठतक जाने लायक जलसे आचमन करे और वैश्य तालुतक पहुँचने लायक जलसे आचमन करे। स्त्री और शूद्र एक बार जलका स्पर्शमात्र करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। पाँचवीं ऋचाके द्वारा भक्तियुक्त चित्तसे आचमन करना चाहिये। भगवान् हृषीकेश भक्तिसे ग्रहण करने योग्य हैं। भक्तिसे वे अपने-आपको भी समर्पित कर देते हैं। तत्पश्चात् सुगन्धित पदार्थोंद्वारा सुवासित और सभी ओषधियोंसे युक्त सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए जलसे भगवान्को स्नान करावे। श्रद्धापूर्वक मनसे भावनाद्वारा लाये हुए तीर्थजलसे स्नान कराना चाहिये। श्रद्धाके बिना दी हुई रत्नोंकी राशि भी निष्फल होती है और श्रद्धासे दिया हुआ जल भी अक्षय फल देनेवाला होता है। छठी ऋचासे स्नान कराकर पुनः आचमन कराना चाहिये।
सातवीं ऋचासे भगवान् विष्णुके लिये वस्त्र देना चाहिये। आठवींसे यज्ञोपवीत समर्पित करे, नवीं ऋचासे यज्ञमूर्ति श्रीहरिके श्रीअंगोंपर उत्तम चन्दनका लेप करना चाहिये। जिसने सुन्दर यक्षकर्दमके द्वारा जगद्गुरु भगवान् विष्णुके अंगोंमें लेप किया है, उसने अपने सुयशसे इस संसारको आच्छादित एवं तृप्त किया है। चन्दन देनेवाला मनुष्य संसारमें अपने तेजसे भगवान् सूर्यके समान होकर देवभावको प्राप्त होता और ब्रह्मादि देवताओंके लोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो मनुष्य चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुको चन्दनके आलेपसे सुन्दर रूपमें देखते हैं, वे कभी यमपुरीमें नहीं जाते। दसवीं ऋचासे भक्तिपूर्वक पुष्प चढ़ाकर भगवान्की पूजा करे। पुष्पोंसे पूजित हुए भगवान् विष्णुको यदि दूसरे लोग भी प्रणाम करते हैं, तो उन्हें भी अक्षय लोक प्राप्त होते हैं। ग्यारहवीं ऋचासे श्रीहरिको धूप-दान करना चाहिये—'उत्तम गन्धसे युक्त दिव्य वनस्पतिका रस तथा अतिशय सुगन्धित यह धूप सम्पूर्ण देवताओंके सूँघने योग्य है, भगवन्! आप इसे ग्रहण करें।' इस मन्त्रका उच्चारण करके भगवान्को अगुरुका धूप निवेदन करे। चातुर्मास्यमें इसका महान् फल है। कपूर, चन्दनदल, मिश्री, मधु और जटामासीसे युक्त धूप श्रीहरिके शयनकालमें निवेदन करना चाहिये। देवता सूँघनेसे ही प्रसन्न होते हैं। अतः धूप उनकी घ्राणेन्द्रियको तृप्त करनेका शुभ साधन है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको बारहवीं ऋचासे दीपदान करना चाहिये। जो चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुके आगे दीपदान करता है, उसकी पापराशि पलभरमें जलकर भस्म हो जाती है।
दीपदानके अनन्तर मोक्षपदमें स्थित भक्तियुक्त पुरुषोंको तेरहवीं ऋचाके द्वारा भगवान्को अन्नमय नैवेद्य निवेदन करना चाहिये। अन्नदानके अनन्तर भगवान्को पुनः आचमन कराना चाहिये। तत्पश्चात् चौदहवीं ऋचासे सब पापोंका नाश करनेवाली आरती उतारे और भगवान्को नमस्कार करे। पंद्रहवीं ऋचाके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ भगवान्के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करनी चाहिये। चार बार परिक्रमा करनेसे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्की परिक्रमा तथा भगवत्सम्बन्धी तीर्थोंकी यात्रा सम्पन्न हो जाती है। तदनन्तर सोलहवीं ऋचाद्वारा भगवान् विष्णुके साथ अपनी एकताका चिन्तन करे—'मैं ही सदा विष्णु हूँ' इस प्रकार अपने मनमें भावना करनेवाला ब्राह्मण जीवन्मुक्त हो जाता है। चौमासेमें ब्राह्मणको विशेषरूपसे योगयुक्त होना चाहिये। इस प्रकार यहाँ मोक्षमार्ग प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुकी भक्ति बतायी गयी।
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६५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ब्रह्माजीके द्वारा मानसी और शारीरिक सृष्टिका प्रादुर्भाव, चारों वर्णोंके धर्म तथा शूद्र जातियोंके भेदोंका वर्णन
नारदजीने पूछा— पितामह! अट्ठारह प्रकारकी प्रजाएँ कौन-कौन-सी हैं? उनकी जीवनवृत्ति और धर्म क्या है? यह सब बताइये।
ब्रह्माजीने कहा— अपने कालके परिमाणसे जब जगदीश्वर भगवान् श्रीहरि योगनिद्रासे जाग्रत् हुए, तब उस समय उनकी नाभिसे प्रकट हुए कमलकोषसे मेरा जन्म हुआ। तदनन्तर उस कमलकी नालसे भगवान्के उदरमें प्रवेश करके जब मैंने देखा, तब वहाँ मुझे कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंके दर्शन हुए; परंतु फिर जब बाहर आया तब सृष्टिके पदार्थ और उसके हेतुओंको भूल गया। तब आकाशवाणी हुई—'महामते! तपस्या करो।' यह भगवदीय आदेश पाकर मैंने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की। फिर मनके द्वारा पहले मानसी सृष्टिका चिन्तन किया। उससे मरीचि आदि मुनीश्वर ब्राह्मण प्रकट हुए। नारद! उन्हींमें सबसे छोटे होकर तुम उत्पन्न हुए। तुम ज्ञानी एवं वेदान्तके पारंगत पण्डित हुए। वे सब मुनि कर्मनिष्ठ हो सदा सृष्टिविस्तारके लिये उद्योग करने लगे। परंतु तुम अनन्यभावसे भगवान् विष्णुके भक्त हुए। एकान्ततः ब्रह्मचिन्तनपरायण, ममता और अहंकारसे शून्य हुए। तुम भी मेरे मानस पुत्र ही हो। मानसी सृष्टिके पश्चात् मैंने देहजा सृष्टिकी रचना की। मेरे मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, दोनों ऊरुओंसे वैश्य और चरणोंसे शूद्र उत्पन्न हुए। अनुलोम और विलोम क्रमसे शूद्रसे नीचे-नीचे सब मेरे चरणतलोंसे ही प्रकट हुए हैं। वे सब प्रकृतियाँ (प्रजाजन) मेरे शरीरके अवयव-विशेषसे उत्पन्न हैं। नारद! मैं तुमसे उनके नाम बताता हूँ, सुनो—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीन ही द्विज हैं। वेद, तपस्या, पठन, यज्ञ करना और दान देना—ये सब इनके कर्म हैं। द्विजोंको पढ़ाने और थोड़ा-सा प्रतिग्रह लेनेसे ब्राह्मणोंकी जीविका चलती है। यद्यपि ब्राह्मण तपस्याके प्रभावसे दान ग्रहण करनेमें समर्थ है, तथापि वह प्रतिग्रह न स्वीकार करे; क्योंकि उसे अपने तपोबलकी रक्षा सदा करनी चाहिये। वेदपाठ, विष्णु-पूजन, ब्रह्मध्यान, लोभका अभाव, क्रोध न होना, ममताशून्यता, क्षमासारता, आर्यता (श्रेष्ठ आचारका पालन), सत्कर्मपरायणता, दानरूपी कर्म तथा सत्यभाषण आदि सद्गुणोंसे जो सदा विभूषित होता है, वह ब्राह्मण कहलाता है। क्षत्रियको तपस्या, यज्ञ, दान, वेदपाठ और ब्राह्मणभक्ति—ये सब कर्म करने चाहिये। शस्त्रोंसे इनकी जीविका चलती है। स्त्री, बालक, गौ, ब्राह्मण और भूमिकी रक्षाके लिये, स्वामीपर आये हुए संकटको टालनेके लिये, शरणमें आये हुएकी रक्षाके लिये तथा पीड़ितोंकी आर्त पुकार सुनकर उन सबका संकट दूर करनेके लिये जो सदा तत्पर रहते हैं, वे ही क्षत्रिय हैं। वैश्य धन बढ़ानेवाला, पशुओंका पालक, कृषिकर्म करनेवाला, रस आदिका विक्रेता तथा देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजक है। वह सूद लेकर धनकी उत्पत्ति करे, यज्ञ आदि कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे, दान और स्वाध्याय भी करे। ये सब वैश्यके कर्म बताये गये हैं। शूद्र भी प्रातःकाल उठकर भगवान्का चरण-वन्दन करके विष्णुभक्तिमय श्लोकोंका पाठ करते हुए भगवान् विष्णुके स्वरूपको प्राप्त होता है। जो वर्षमें आनेवाले सभी व्रतोंका तिथि तथा वारके अधिदेवताकी प्रसन्नताके लिये पालन करता है और सब जीवोंको अन्नदान करता है, वह शूद्र गृहस्थ श्रेष्ठ माना गया है। वह वेदमन्त्रोंके उच्चारणके
ब्रह्माजीका प्राकट्य
६५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बिना ही इस लोकमें सब कर्म करते हुए मुक्त होता है। चातुर्मास्यका व्रत करनेवाला शूद्र भी श्रीहरिके स्वरूपको प्राप्त होता है। महामुने ! सभी वर्णों, आश्रमों और जातियोंके लिये भगवान् विष्णुकी भक्ति सबसे उत्तम मानी गयी है। जो पवित्र चित्तवाला मनुष्य इस परम पवित्र पुराणको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पूर्वजन्मोपार्जित समस्त पापोंका नाश करके श्रीविष्णुकी आराधनामें तत्पर हो विष्णुलोकको प्राप्त होता है।
पैजवन शूद्र और महर्षि गालवका संवाद तथा शालग्रामशिलाके पूजनका महत्त्व
**ब्रह्माजी कहते हैं—**महामते ! प्राचीन त्रेतायुगमें पैजवन नामसे प्रसिद्ध एक शूद्र था, जो धर्ममें तत्पर और विष्णु तथा ब्राह्मणोंका पूजक था। वह न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करता और सदा शान्तभावसे रहता था। सभी लोग उससे प्रेम करते थे। वह सत्यवादी और विवेकशील था। उसकी स्त्री समान कुलमें उत्पन्न, धर्मपूर्वक विवाहित तथा शुभ आचरणवाली पतिव्रता थी। वह भी सदा देवताओं और ब्राह्मणोंके हितमें तत्पर रहती थी। महात्मा पैजवनको पूर्वपुण्यके प्रभावसे धनकी प्राप्ति हुई थी। वह सदा स्वजनोंके द्वारा स्वदेश और परदेशमें व्यापार किया करता था। अपने और दूसरेके धनसे भी वह व्यापार करता-कराता था। इस प्रकार धर्मपर दृष्टि रखनेवाले उस पैजवनको नाना प्रकारका प्रचुर धन प्राप्त हुआ। उसके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही पिताकी सेवा-शुश्रूषामें लगे रहनेवाले थे। धन आदिका अहंकार तो उन्हें छू तक नहीं गया था। वे अपने धर्मयुक्त आचरणसे शोभा पाते थे और पिता-माताकी सेवाके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुका आदर नहीं करते थे। उनकी स्त्रियाँ भी अपने सास-श्वशुरकी सेवामें अनिवार्य-रूपसे लगी रहती थीं। पैजवनका घर धन-धान्यसे भरा रहता था। वह स्वयं भी सदा धर्मपरायण हो देवताओं और अतिथियोंके पूजनमें तत्पर रहता था। उसके घरपर आया हुआ कोई भी अतिथि विमुख नहीं लौटता था। वह शीतकालमें धन और उष्णकालमें अन्न एवं जलका दान करता था। वर्षाकालमें वस्त्र तथा अन्न बाँटा करता था। भगवान् शिव और विष्णुके व्रतमें स्थित होकर उचित समयमें वह बावली, कूप, तड़ाग, प्याऊ तथा देवमन्दिर बनवाता था। चातुर्मास्यमें वह विशेषरूपसे भगवान् विष्णुके भजनमें लगा रहता था।
एक दिन ब्रह्मज्ञानपरायण शान्त तपस्वी परम जितेन्द्रिय गालव मुनि पैजवन शूद्रके घरमें आये। वह अभ्युत्थान और आसन आदि उपचारोंसे मुनिकी पूजा करके मधुर वाणीमें बोला—‘आज मेरा जन्म सफल हो गया, जीवन अति उत्तम हो गया, आज मेरा धर्माचरण भी सार्थक हुआ। मुने! आपने यहाँ पधारकर कुलसहित मुझे उन्नत कर दिया। आपकी दृष्टिसे मेरे सहस्रों पाप जलकर भस्म हो गये, मुझ गृहस्थके सम्पूर्ण गृहको आज आपने पवित्र कर दिया।’
उस शूद्रकी भक्तिसे गालव मुनि बहुत प्रसन्न हुए। उनकी सारी थकावट दूर हो गयी। वे हाथ जोड़कर खड़े हुए शूद्रसे बोले—‘सौम्य ! तुम कुशलसे तो हो न ? तुम्हारा मन धर्ममें लगता है न ? क्योंकि भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र आदि सब लोग सदा स्वार्थसे ही सम्बन्ध रखते हैं। तुम गोविन्दमें सदा भक्ति रखते हो न? दानमें तो तुम्हारी रुचि है न? क्या धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी कार्योंमें
* ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६५७
तुम्हारा मन उत्साहके साथ संलग्न होता है? भगवान् विष्णुका चरणोदक प्रतिदिन सिरपर धारण करते हो न? भगवान् विष्णुका भजन, श्रीविष्णुकी कथा, श्रीविष्णुका स्तोत्र, श्रीविष्णुका नमस्कार, श्रीविष्णुका ध्यान और भगवान् विष्णुका पूजन—यह सब भगवान्के शयनकाल (चातुर्मास्य) में किया जाय तो मोक्ष देनेवाला होता है।'
ऐसा कहते हुए मुनिको प्रणाम करके शूद्रने फिर कहा—मुने! आपकी कृपादृष्टिसे ही मुझे इस आश्रमका पूरा-पूरा फल मिल गया। तथापि मैं आपकी उपदेशयुक्त वाणी सुनना चाहता हूँ। आपके आगमनका क्या प्रयोजन है, यह कृपा करके बतावें?
तब गालवजीने उस धर्मात्मा एवं सत्यवादी शूद्रसे कहा—इधर तीर्थयात्रामें लगे हुए मुझे कई मास व्यतीत हो गये, अब चातुर्मास्य आ गया है। अतः अपने आश्रमको जाऊँगा। भगवान् नारायणकी प्रसन्नताके लिये आषाढ़ शुक्ला एकादशीको अपने घरपर चातुर्मास्यका नियम ग्रहण करूँगा।
पैजवन बोला—द्विजश्रेष्ठ! मेरे ऊपर अनुग्रह करके कोई ज्ञानकी बात मुझे भी बताइये। वेदमें मेरा अधिकार नहीं है। वेदसारके जपका भी मुझे अधिकार नहीं है। अतः विशेषतः चातुर्मास्यमें पालन करने योग्य यदि कोई मोक्षसाधक उपाय हो तो उसे बताइये।
गालवजीने कहा—जो मनुष्य शालग्राममें स्थित भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं, भक्ति उनसे दूर नहीं है। जिसका मन भगवान् शालग्रामके चिन्तनमें लगा हुआ है, उसके द्वारा जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह अक्षय होता है। चातुर्मास्यमें इसका विशेष माहात्म्य है। जहाँ शालग्राम-शिला और द्वारकाकी शिला दोनोंका संगम हो, वहाँ मनुष्यके लिये मुक्ति दुर्लभ नहीं है। जिस भूमिमें सैकड़ों पापोंसे युक्त मनुष्योंद्वारा भी शालग्रामकी शिला पूजी जाती है, वहाँ यह शिला पाँच कोसतकके प्रदेशको पवित्र करती है। यह शालग्रामशिला तेजोमय पिण्ड है, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। इसके दर्शनमात्रसे भी तत्काल सब पापोंका नाश हो जाता है। महाशूद्र! शालग्रामशिलाकी उपस्थितिसे सब तीर्थ और देवमन्दिर पवित्र हो जाते हैं तथा समस्त नदियाँ तीर्थत्वको प्राप्त होती हैं। शालग्रामशिलाकी सन्निधिमात्रसे सर्वत्र सम्पूर्ण क्रियाएँ शोभन होती हैं। जिसके घरमें शुभ शालग्रामशिलाका कोमल तुलसीदलोंद्वारा पूजन होता है, वहाँ यमराज अपना मुँह नहीं दिखाते। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सच्छूद्रोंको भी शालग्रामशिलाके पूजनका अधिकार है।
सच्छूद्रने पूछा—ब्रह्मन्! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। सुना जाता है कि स्त्री और शूद्र आदिके लिये शालग्रामशिलाके पूजनका निषेध है। अतः मेरे-जैसा मनुष्य किस प्रकार शालग्रामका पूजन करे?
गालवजीने कहा—मानद! शूद्रोंमें केवल असत् शूद्रके लिये शालग्रामशिलाका निषेध है। स्त्रियोंमें भी पतिव्रता स्त्रियोंके लिये उसका निषेध नहीं किया गया है। जो शालग्रामशिलाके ऊपर चढ़ायी
६५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
हुई माला अपने मस्तकपर धारण करते हैं, उनके सहस्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो शालग्राम-शिलाके आगे दीपदान करते हैं, उनका कभी यमपुरमें निवास नहीं होता। जो शालग्राममें व्याप्त भगवान् विष्णुकी मनोहर पुष्पोंद्वारा पूजा करते हैं तथा जो भगवान् विष्णुके शयनकाल (चातुर्मास्य)-में शालग्रामशिलाको पंचामृतसे स्नान कराते हैं, वे मनुष्य संसारबन्धनमें कभी नहीं पड़ते। मुक्तिके आदिकारण निर्मल शालग्रामगत श्रीहरिको अपने हृदयमें स्थापित करके जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक उनका चिन्तन करता है, वह मोक्षका भागी होता है। जो सब समयमें, विशेषतः चातुर्मास्यकालमें, भगवान् शालग्रामके ऊपर तुलसीदलकी माला चढ़ाता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। तुलसीदेवी भगवान् विष्णुको सदा प्रिय हैं। शालग्राम महाविष्णुके स्वरूप हैं और तुलसीदेवी साक्षात् लक्ष्मी हैं। इसलिये चन्दनचर्चित सुगन्धित जलसे तुलसीमंजरीसहित शालग्रामशिलारूप श्रीहरिको नहलाकर जो तुलसीकी मंजरियोंसे उनका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है। उत्तम पुष्पोंसे पूजित भगवान् शालग्रामका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर श्रीहरिमें तन्मयताको प्राप्त होता है। शालग्राम-शिलाके चौबीस भेद हैं, उनका वर्णन सुनो। पहले केशव हैं, उनकी पूजा करनी चाहिये। दूसरे मधुसूदन, तीसरे संकर्षण, चौथे दामोदर, पाँचवें वासुदेव, छठे प्रद्युम्न, सातवें विष्णु, आठवें माधव, नवें अनन्तमूर्ति, दसवें पुरुषोत्तम, ग्यारहवें अधोक्षज, बारहवें जनार्दन, तेरहवें गोविन्द, चौदहवें त्रिविक्रम, पंद्रहवें श्रीधर, सोलहवें हृषीकेश, सत्रहवें नृसिंह, अठारहवें विश्वयोनि, उन्नीसवें वामन, बीसवें नारायण, इक्कीसवें पुण्डरीकाक्ष, बाईसवें उपेन्द्र, तेईसवें हरि और चौबीसवें श्रीकृष्ण कहे गये हैं। ये चौबीस मूर्तियाँ चौबीस एकादशियोंसे सम्बन्ध रखती हैं। सालभरमें चौबीस एकादशियाँ और ये चौबीस मूर्तियाँ पूजी जाती हैं। इनकी नित्य पूजा करनेवाला मनुष्य भक्तिमान् होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता और पढ़ता है, उसके ऊपर भूतसृष्टिकी रक्षा करनेवाले भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।
सतीका देहत्याग, पार्वतीविवाह, भगवान् शिवका हरिहररूपमें प्राकट्य और शालग्रामशिलाका महत्त्व
गालवजी कहते हैं—भगवान् विष्णु जिस प्रकार शालग्रामशिलाके स्वरूपको प्राप्त हुए हैं और भगवान् शिव भी जिस प्रकार लिंगाकारमें स्थित हुए हैं, वह सब प्रसंग मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके अंगूठेसे प्रजापति दक्ष उत्पन्न हुए थे। दक्षके सती नामकी एक पुत्री हुई, जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न और बड़ी साध्वी थी। विधिके ज्ञाता भगवान् शंकरने सतीके साथ वेदोक्त विधिसे विवाह किया। दक्ष प्रजापतिका चित्त मोहवश मूढताको प्राप्त हो गया था। उन्होंने एक महान् यज्ञका आयोजन किया और उसमें भगवान् शंकरके प्रति द्वेष-भावका परिचय दिया। पिताके उस महान् द्वेषसे सतीदेवी कुपित हो उठीं और यज्ञवेदीमें आकर प्राणायाममें तत्पर हो उन्होंने अग्निमयी धारणाके द्वारा अपना शरीर त्याग दिया। उनके शरीरमें जो पैतृक अंश था, उसका परित्याग करके अपने भागके साथ सतीदेवीने मन-ही-मन शीतल हिमालयका चिन्तन किया। मृत्युकालमें अपने कर्मके अधीन हुआ मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहीं-वहीं उसका अवतार होता है। अतः
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अग्निमें जली हुई सतीदेवी शीतल हिमालयका चिन्तन करनेके कारण हिमालयकी पुत्री हुईं। वहाँ पर्वतकन्या होकर उन्होंने शिवभक्तिमें तत्पर हो बड़ी उग्र तपस्या की। तदनन्तर सहस्रों वर्षोंके पश्चात् भूतभावन भगवान् महेश्वर ब्राह्मणका वेष धारण कर उस स्थानपर आये और पार्वतीके कर्म एवं स्वभावकी परीक्षा लेकर उन्हें तपस्यासे विशुद्ध जाना। तत्पश्चात् दिव्यशरीर धारण करके भगवान् शिवने पार्वतीका हाथ पकड़ लिया और कहा—'देवि ! तुमने तपस्यासे मुझे जीत लिया है, बोलो तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?' तब पार्वतीने महेश्वरसे कहा—'आप मुझे अंगीकार करनेमें मेरे पिताको निमित्त बनाइये।' उनके इस प्रकार कहनेपर भगवान् शंकरने सप्तर्षियोंको हिमालयके पास भेजा। सप्तर्षियोंने हिमालयके पास जाकर लग्नका समय बतलाया और महादेवजीसे सब समाचार कहकर वे अपने स्थानको चले गये। तदनन्तर लग्नके दिन इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मा, विष्णु और अग्निको आगे करके आये और 'वर' वेषमें भगवान् शंकरका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए। हिमवान्ने दूल्ह-वेषमें भगवान् शंकरका दर्शन करके अपनेको कृतार्थ माना और प्रसन्नतापूर्वक मधुपर्क आदि शुभ उपचारोंसे उनका पूजन किया। तत्पश्चात् वेदोक्त विधिसे उस गुणवती कन्याको हिमवान्ने भगवान् शिवको सौंप दिया। उसके बाद भगवान् शिवने अग्निकी परिक्रमा की और जब उनसे गोत्र आदि पूछा गया, तब वे लज्जित-से हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके कथनानुसार विवाहकी शेष विधि पूरी की गयी। जो यज्ञमें चरु ग्रहण करते समय अपने पाँच मुख प्रकाशित करनेवाले हैं, वे ही भगवान् महेश्वर गिरिराजनन्दिनीके लिये सुन्दर रूप और वेष-भूषासे सम्पन्न 'वर' बने हुए विराजमान थे। पार्वतीने भगवान् शंकरको ही अपना प्राणवल्लभ स्वीकार किया। विवाहके पश्चात् दहेज देकर हिमालयने शिवजीको विदा किया। वहाँसे भगवान् शिव मन्दराचल पर्वतपर आये। वहाँ विश्वकर्माने उनके लिये क्षणभरमें मणिमय भवनका निर्माण किया। वह मन्दिर देवाधिदेव भगवान् शिवकी इच्छाके अनुसार बढ़नेवाला था। उस सुन्दर भवनमें पार्वतीके साथ निवास करते हुए भगवान् शंकरकी दृष्टिमें वायुरूपधारी कामदेव आया। कामदेवने शिवजीको देखकर इस प्रकार स्तवन किया—'वृषभध्वज ! आपको नमस्कार है। आप सर्वस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप गणोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। हे नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। प्रभो! आपके इस चराचर जगत्में कोई ऐसी वस्तु नहीं दिखायी देती, जो आपसे रहित हो। आप ही रक्षक, आप ही सृष्टि करनेवाले तथा आप ही समस्त संसारका संहार करनेवाले हैं। महादेव! मुझपर कृपा कीजिये और मुझे देहदान दीजिये।'
भगवान् शिव बोले—कामदेव ! मैंने पूर्व कालमें तुम्हें पार्वतीके आगे भस्म किया है। अब पुनः उन्हींके समीप शरीरधारी हो जाओ।
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर कामदेवने अपना शरीर धारण किया और विनयसे नम्र हो उसने पार्वतीके दोनों चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय उसके मनमें बड़ी प्रसन्नता थी। पार्वती और परमेश्वरका प्रसाद पाकर महामोह एवं बलसे सम्पन्न महातेजस्वी कामदेव तीनों लोकोंमें विचरण करने लगा।
प्राचीन कालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर भयंकर रूप धारण करनेवाले बलोन्मत्त दानवोंने देवताओंको मारा। देवता भयभीत होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये। बृहस्पति आदि सभी देवताओंने जगत्पिता ब्रह्माको नमस्कार करके उनका स्तवन किया। फिर सब-के-सब हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब ब्रह्माजीने उनसे पूछा—'देवताओ ! किसलिये मेरे पास आये हो ?'
देवता बोले—तात ! अद्भुत पराक्रम करनेवाले
६६० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
दैत्योंने युद्धमें हमें परास्त कर दिया। अतः हम सब लोग आपकी शरणमें आये हैं। देवेश्वर! अपनी शरणमें आये हुए हमलोगोंकी आप रक्षा कीजिये।
देवताओंकी यह बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा— एक समय शिवभक्तोंने भगवान् विष्णुके भक्तोंके साथ एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बड़ा विवाद हुआ। तब भगवान् शंकरने अपने भक्तोंके देखते-देखते एक परम अद्भुत रूप धारण किया। वह उनका हरिहरस्वरूप था। वे आधे शरीरसे शिव और आधे शरीरसे विष्णु हो गये। एक ओर भगवान् विष्णुके चिह्न और दूसरी ओर भगवान् शिवके चिह्न प्रकट हुए। एक ओर गरुड़ और दूसरी ओर नन्दी वृषभ उपस्थित थे। एक ओर मेघके समान श्याम वर्ण था तो दूसरी ओर कर्पूरके समान गौर वर्ण। दोनोंमें एकताका स्पष्टीकरण हुआ। इसी प्रकार सम्पूर्ण विश्वमें एक ही भगवान् व्यापक हैं। अतः विश्व भगवान्से भिन्न नहीं है। इस तरह भगवान्की एकताका बोध हुआ। श्रुतियों और स्मृतियोंके अर्थको बाधित करनेवाली भेदबुद्धि नष्ट हो गयी। पाखण्डी और युक्तिवादी सब आश्चर्यचकित हो गये। सबने अपने-अपने मतका आग्रह छोड़कर मोक्षमार्गकी शरण ली। मन्दराचल पर्वतपर वह हरिहर-मूर्ति आज भी विद्यमान है, जिसकी प्रमथ आदि गण सदा स्तुति करते रहते हैं। सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली वह मूर्ति सम्पूर्ण विश्वका बीज एवं अनन्त है। शिव और विष्णुकी उस संयुक्त मूर्तिका स्मरण करनेपर वह सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली है। वह परम सत्य एवं योगी पुरुषोंके द्वारा चिन्तन करने योग्य है। मुक्तिकी इच्छा करनेवाले मनुष्य उस मूर्तिका ध्यान करके परम पदको प्राप्त होते हैं। चातुर्मास्यमें विशेषरूपसे उसका ध्यान करके मनुष्य फिर मानवलोकमें जन्म नहीं लेता। उस हरिहर-मूर्तिके समीप जो लोग जाते हैं, उनका वे भगवान् कल्याण करते हैं।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् वे अग्नि आदि देवता मन्दराचल पर्वतपर गये और भगवान् महेश्वरको खोजते हुए वहीं भ्रमण करने लगे। तदनन्तर चातुर्मास्य पूर्ण होनेपर हरिहरस्वरूपधारी भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न हो प्रत्यक्ष दर्शन देकर बोले—‘देवेश्वरो! अब तुमलोग जाओ और अपने-अपने अधिकारोंका उपभोग करो। मैंने उन दानवोंको जिनसे तुम्हें भय था, मार डाला है।' तब प्रसन्नचित्त एवं बाधारहित देवता कोटि-कोटि विमानोंके द्वारा अपने-अपने अधिकारोंको प्राप्त हुए।
एक समय सब देवताओं तथा भगवान् विष्णु और शिवके द्वारा भी पार्वतीजीकी इच्छाके प्रतिकूल कोई कार्य हो गया। इससे उन्होंने देवताओंको मर्त्यलोकमें प्रस्तर-प्रतिमा होनेका शाप दिया। उसी समय उन्होंने भगवान् विष्णुसे कहा—'आप भी मर्त्यलोकमें शिलारूप होंगे और शिवजीको भी ब्राह्मणोंके शापसे लिंगाकार प्रस्तररूप प्राप्त होगा।' तब भगवान् विष्णुने पार्वतीजीको प्रणाम करके कहा—'महाव्रते! महादेवि! आप सदैव महादेवजीकी प्रिया हैं। सम्पूर्ण भूतोंकी जननि! आपको नमस्कार
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६६१ ---|---
है। आप कल्याणमयी हैं, आपको नमस्कार है।' तब पार्वतीजीने प्रसन्न होकर कहा— 'जनार्दन! आप शिलारूपमें रहकर भी योगीश्वरोंको मोक्ष देनेवाले होंगे। विशेषतः चातुर्मास्यमें सब भक्तोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले होंगे। ब्रह्माजीकी प्यारी पुत्री जो गण्डकी नामवाली नदी है, वह महान् जलराशिसे भरी हुई और परम पुण्यदायिनी है। उसीके अत्यन्त निर्मल नीरमें आपका निवास होगा। पुराणोंके ज्ञाता आपको चौबीस स्वरूपोंमें देखेंगे। आपके मुखमें सुवर्ण होगा और शालग्राम आपकी संज्ञा होगी। गोलाकार तेजोमय शरीर अपूर्व शोभासे युक्त होगा। उस शालग्रामस्वरूपमें आप सम्पूर्ण सामर्थ्यसे युक्त होकर योगियोंको भी मोक्ष देनेवाले होंगे। शालग्राम-शिलामें व्याप्त हुए आपका जो मनुष्य पूजन करेंगे, उन भक्तोंको आप मनोवांछित सिद्धि प्रदान करेंगे।'
गालवजी कहते हैं— महाशूद्र! भगवान् विष्णु जिस प्रकार शालग्राम-शिलामय स्वरूपको प्राप्त हुए, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें बता दिया।
## शालग्राम-पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र एवं रामनामकी महिमा
**गालवजी कहते हैं—** गण्डकी नदीमें भगवान् विष्णु शालग्रामरूपसे प्रकट होते हैं और नर्मदा नदीमें भगवान् शिव नर्मदेश्वर रूपसे उत्पन्न होते हैं। ये दोनों स्वयं प्रकट हैं, कृत्रिम नहीं। शालग्रामशिलामें व्याप्त भगवान् विष्णु चौबीस भेदोंसे उपलब्ध होते हैं; किन्तु भगवान् सदाशिव सदा एक हाथसे ही नर्मदासे प्रकट होते हैं। जहाँ गण्डकीके जलमें शालग्रामशिला उपलब्ध होती है, वहाँ स्नान और जलपान करके मनुष्य ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। गण्डकीसे प्रकट होनेवाली शालग्रामशिलाका पूजन करके मनुष्य शुद्धात्मा योगीश्वर होता है। भगवान् विष्णु पूजन, पठन, ध्यान और स्मरण करनेपर समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। फिर शालग्रामशिलामें उनकी पूजा की जाय, तो उसके महत्त्वके विषयमें क्या कहना है; क्योंकि शालग्राममें साक्षात् श्रीहरि विराजमान होते हैं। चातुर्मास्यमें शालग्रामगत भगवान् विष्णुको नैवेद्य, फल और जल अर्पण करना विशेषरूपसे शुभ होता है। चातुर्मास्यमें शालग्रामशिला सबको पवित्र करती है। जहाँ शालग्रामस्वरूप भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, वहाँ पाँच कोसतकके भूभागको वे भगवान् पवित्र कर देते हैं। वहाँ कोई अशुभ नहीं होता।
जहाँ लक्ष्मीपति भगवान् शालग्रामका पूजन होता है, वहाँ वह पूजन ही सबसे बड़ा सौभाग्य है, वही महान् तप है और वही उत्तम मोक्ष है। जहाँ दक्षिणावर्त शंख, लक्ष्मीनारायणस्वरूप शालग्रामशिला, तुलसीका वृक्ष, कृष्णसार मृग और द्वारकाकी शिला (गोमतीचक्र) हो, वहाँ लक्ष्मी, विजय, विष्णु और मुक्ति—इन चारोंकी उपस्थिति होती है। भगवान् लक्ष्मीनारायण (शालग्राम)-की पूजा करनेवाले मनुष्यको भगवान् अति पुण्य प्रदान करते हैं, जिससे वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुका ध्यान पापोंका नाश करनेवाला है। तुलसीकी मंजरियोंसे पूजित हुए भगवान् शालग्राम पुनर्जन्मका नाश करनेवाले हैं। सब प्रकारसे यत्न करके उन्हीं जगदीश्वर विष्णुका सेवन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त होकर स्थित हैं।
**एक समय पार्वतीजीने शिवजीसे कहा—** महेश्वर! आपके हाथमें यह रुद्राक्षकी माला सदा मौजूद रहती है। देव! आप किस मन्त्रका जप करते हैं, यह सन्देह मेरे मनमें उठा करता है; क्योंकि आप ही सबके स्वामी हैं। आपसे बढ़कर दूसरे किसीको मैं नहीं जानती। फिर भी आप बड़ी भक्तिसे सदा किसी मन्त्रका जप करते
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हुए दिखायी देते हैं। देवेश! आपसे भी श्रेष्ठ और कौन है, जिसका आप मन-ही-मन चिन्तन किया करते हैं।
भगवान् शिव बोले—प्रिये! भगवान् विष्णुके सहस्र नामोंमें जो सारभूत नाम है, मैं उसीका नित्य निरन्तर चिन्तन करता हूँ। मैं रामनाम जपता हूँ और उसीके अंककी इस मालाद्वारा गणना करता हूँ। श्रीरामका अवतार बहुत ही श्रेष्ठ है। द्वादश अक्षरोंसे युक्त जो सनातन ब्रह्मरूप प्रणव है वह अ, ऊ, म—इन तीन अक्षरोंसे सम्बद्ध है, तीन ग्रामोंसे युक्त है। उस विन्दुयुक्त प्रणव-मन्त्रका मैं सदैव मालाद्वारा जप करता हूँ। यह सम्पूर्ण वेदोंका सारभूत है। यह नित्य, अक्षर, निर्मल, अमृत, शान्त, तद्रूप, अमृततुल्य, कलातीत, सम्पूर्ण जगत्का आधार, मध्य और कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंका बीज है। इसको जानकर मनुष्य शीघ्र ही घोर संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। ॐकारसहित जो द्वादशाक्षर बीज है, उसका जप करनेवाले मनुष्यके लिये वह कोटि-कोटि पापोंका दाह करनेवाला दावानल बन जाता है। द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-का चिन्तन ही सबसे उत्तम ज्ञान है, जो शुभ और अशुभ दोनोंका विनाश करनेवाला है। द्वादशाक्षर मन्त्र करोड़ों जन्मोंमें कहीं किसीको उपलब्ध होता है। चातुर्मास्यमें उसका स्मरण विशेषरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला तथा मनोवांछित वस्तु देनेवाला है। इस अक्षरसे प्रकट हुए मन्त्रका जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा आश्रय लेता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जो भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर हो उनके बारह मास सम्बन्धी पापहारी नामोंका शालग्रामशिलामें न्यास करता है, उसे प्रतिदिन द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है। द्वादशाक्षर मन्त्रके माहात्म्यका सहस्रों जिह्वाओंंद्वारा भी वर्णन नहीं किया जा सकता। संसारमें इसका जप, ध्यान और स्तवन करनेपर यह महामन्त्र सभी मासोंमें पाप-नाश करनेवाला होता है; किंतु चातुर्मास्यमें तो इसका यह माहात्म्य विशेषरूपसे बढ़ जाता है। इस मन्त्रके चिन्तनमात्रसे ही मनुष्योंको मनचाही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसके जपसे सनातन मोक्ष प्राप्त होता है। शान्तिपरायण जप एवं ध्यानसे मनुष्य निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है। शूद्रों और स्त्रियोंके लिये प्रणवरहित जपका विधान है। पूर्वोक्त अठारह शूद्र जातिवाले मनुष्योंको जप-तप करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे ब्राह्मण-भक्ति, दान और विष्णु भगवान्के चिन्तनसे सिद्ध हो जाते हैं। उनके लिये रामनाम मन्त्र ही है। यही उन्हें कोटि मन्त्रोंसे अधिक फल देनेवाला होता है। 'राम' इस दो अक्षरके नामका जप सब पापोंका नाश करनेवाला है। मनुष्य चलते, खड़े होते और सोते समय भी श्रीरामनामका कीर्तन करनेसे इहलोकमें सुख पाता है और अन्तमें भगवान् विष्णुका पार्षद होता है। 'राम' यह दो अक्षरोंका मन्त्र कोटिशत मन्त्रोंसे भी बढ़कर है। यह सभी संकर जातियोंके पापका नाशक बतलाया गया है। चातुर्मास्य प्राप्त होनेपर तो यह राममन्त्र अनन्त फल देनेवाला होता है। इस भूतलपर रामनामसे बढ़कर कोई पाठ नहीं है। जो रामनामकी शरण ले चुके हैं, उन्हें कभी यमलोककी यातना नहीं भोगनी पड़ती। जो-जो विघ्नकारक दोष हैं, सब रामनामका उच्चारण करनेमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। जो परमात्मा समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें अन्तर्यामी आत्मारूपसे रम रहा है, उसे 'राम' कहते हैं। 'राम' यह मन्त्रराज भय तथा व्याधियोंका नाश करनेवाला है। यह युद्धमें विजय देनेवाला तथा समस्त कार्यों एवं मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। रामनामको सम्पूर्ण तीर्थोंका फल कहा गया है। वह ब्राह्मणोंके लिये भी मनोवांछित फल देनेवाला है। रामचन्द्र,
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६६३
राम-राम इत्यादि रूपसे उच्चारण किया जानेवाला यह दो अक्षरोंका मन्त्रराज भूतलपर सब कार्य सिद्ध करनेवाला है। देवता भी रामनामके गुण गाते हैं। इसलिये पार्वती! तुम भी सदा रामनामका जप करो। जो रामनामका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। रामनामसे ही सहस्र नामोंका पुण्य होता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें उसका पुण्य दसगुना बढ़ जाता है। रामनामके उच्चारणसे हीनजातिमें उत्पन्न हुए लोगोंका महान् पाप भी भस्म हो जाता है। ये भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण जगत्को अपने तेजसे व्याप्त करके स्थित हैं और सब मनुष्योंमें अन्तरात्मारूपसे रहकर उनके पूर्वजन्मोपार्जित स्थूल एवं सूक्ष्म पापोंको क्षणभरमें भस्म करके उन्हें पवित्र कर देते हैं।
भगवान् शिवका नर्मदेश्वर शिवलिंगरूप होना तथा गालव-शूद्र-संवादका उपसंहार
श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! द्विजोंके लिये ॐकारसहित द्वादशाक्षर मन्त्रका विधान है तथा स्त्रियों और शूद्रोंके लिये ॐकाररहित नमस्कारपूर्वक (नमो भगवते वासुदेवाय) द्वादशाक्षर मन्त्रका जप बताया गया है^१। संकरजातियोंके लिये रामनामका षडक्षरमन्त्र (ॐ रामाय नमः) है। वह भी प्रणवसे रहित ही होना चाहिये, ऐसा पुराणों और स्मृतियोंका निर्णय है। यही क्रम सब वर्णोंके लिये है और संकरजातियोंके लिये भी सदा ऐसा ही क्रम है। पार्वती! प्रणव-जपमें तुम्हारा अधिकार नहीं है। अतः तुम्हें सदा 'नमो भगवते वासुदेवाय' इसी मन्त्रका जप करना चाहिये।^२ यह प्रणव सब देवताओंका आदि कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव सभी अपनी प्रिय पत्नियोंके साथ प्रणवमें निवास करते हैं। सब प्राणी और समस्त तीर्थ उसमें विभागपूर्वक स्थित हैं। प्रणव सर्वतीर्थमय तथा कैवल्य ब्रह्ममय है। शुभानने! जब तुम चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये तप करोगी, तब प्रणवसहित द्वादशाक्षरके जप करनेके योग्य होओगी। जब तपस्याकी वृद्धि होती है, तब भगवान् विष्णुमें भक्ति होती है। प्रतिदिन भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। इससे जिह्वा पवित्र होती है। जैसे दीपक प्रज्वलित होनेपर बड़े भारी अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् विष्णुकी कथा सुननेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः पार्वती! तुम भगवान् विष्णुके शयनकालमें द्वादशाक्षर मन्त्रराजका विशुद्धचित्त होकर जप करो। वे ही भगवान् सन्तुष्ट होकर तुम्हें द्वादशाक्षरसहित अखण्ड ब्रह्मस्वरूपका उत्तम ज्ञान प्रदान करेंगे। तुम ब्रह्माजीके कोटि कल्पोंतक द्वादशाक्षरमन्त्रका जप करती रहो। जो प्रणवसहित मन्त्रराजका ध्यान करता है, उसका कभी नाश नहीं होता।
महादेवजीके ऐसा कहनेपर पार्वतीजी चौमासा आनेपर हिमालयके शिखरपर तपस्या करनेके लिये गयीं। वे तीन वस्त्रोंसे युक्त हो ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करती हुई प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय भगवान्के हरिहरस्वरूपका ध्यान करने लगीं। उनके साथ उनकी सखियाँ
१. द्विजातानां सहोङ्कारः सहितो द्वादशाक्षरः। स्त्रीशूद्राणां नमस्कारपूर्वकः समुदाहृतः॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २५। २)
२. ईश्वर उवाच—
प्रणवस्याधिकारो न तवास्ति वरवर्णिनि। नमो भगवते वासुदेवायेति जपः सदा ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २५। ६)
६६४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
भी थीं। विशाल नेत्रोंवाली पार्वती ने अपने पिता हिमालयके मनोहर शिखरपर क्षमा आदि गुणोंसे सुशोभित हो तपस्या की।
पार्वतीजीके तपस्यामें संलग्न होनेपर भगवान् शंकर सब ओर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। एक दिन उन्होंने जलकी उत्ताल तरंग-मालाओंसे सुशोभित यमुनाजीको देखकर उसमें स्नान करनेका विचार किया। वे ज्यों ही जलमें घुसे कि उनके शरीरकी अग्निके तेजसे वह जल काला हो गया। यमुना भी दिव्यरूप धारण करके अपने श्यामस्वरूपसे प्रकट हुईं और भगवान् शंकरकी स्तुति एवं नमस्कार करके बोलीं—'देवेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपके अधीन हूँ।'
महादेवजीने कहा—जो मनुष्य इस पुण्यतीर्थमें स्नान करेगा, उसके सहस्रों पाप क्षणभरमें नष्ट हो जायँगे। यह पवित्र तीर्थ संसारमें 'हरतीर्थ' के नामसे विख्यात होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव यमुनाको प्रणाम करके अन्तर्धान हो गये। उन्होंने यमुनाके किनारे मनोहर रूप धारण करके हाथमें वाद्य ले लिया और ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करके शिखरपर जटा बढ़ाये मुनियोंके घरोंमें स्वेच्छानुसार घूम-घूमकर अंगोंकी चपल चेष्टाका प्रदर्शन प्रारम्भ किया। वे कहीं गीत गाते और कहीं अपनी मौजसे नाचने लगते थे। स्त्रियोंके बीचमें जाकर कभी क्रोध करते और कभी हँसने लगते थे। इस प्रकार उन्हें सब ओर घूमते देखकर मुनिलोगोंने क्रोध किया और यह शाप दिया कि 'तुम लिंगरूप हो जाओ।' शाप होनेपर भगवान् शिव अन्यत्र बहुत दूर चले गये। उनका वह लिंगरूप अमरकण्टक पर्वतके रूपमें अभिव्यक्त हुआ और वहाँसे नर्मदा नामक नदी प्रकट हुई। नर्मदामें नहाकर, उसका जल पीकर तथा उसके जलसे पितरोंका तर्पण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर दुर्लभ कामनाओंको भी प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य नर्मदामें स्थित शिवलिंगोंका पूजन करेंगे, वे शिवस्वरूप हो जायँगे। विशेषतः चातुर्मास्यमें शिवलिंगकी पूजा महान् फल देनेवाली है। चातुर्मास्यमें रुद्रमन्त्रका जप, शिवकी पूजा और शिवमें अनुराग विशेष फलद है। जो पंचामृतसे भगवान् शिवको स्नान कराते हैं, उन्हें गर्भकी वेदना नहीं सहन करनी पड़ती। जो शिवलिंगके मस्तकपर मधुसे अभिषेक करेंगे, उनके सहस्रों दुःख तत्काल नष्ट हो जायँगे। जो चातुर्मास्यमें शिवजीके आगे दीपदान करते हैं, वे शिवलोकके भागी होते हैं। जो जलधारासे युक्त नर्मदेश्वर महालिंगका चातुर्मास्यमें विधिपूर्वक पूजन करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है।
गालवजी कहते हैं—यह सब श्रीविष्णुके शालग्राम होनेकी और महेश्वर शिवके लिंगरूप होनेकी कथा सुनायी गयी। अतः जो लिंगरूपी शिव और शालग्रामगत श्रीविष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करते हैं, उन्हें दुःखमयी यातना नहीं भोगनी पड़ती। चौमासेमें शिव और विष्णुका विशेषरूपसे पूजन करना चाहिये। दोनोंमें भेदभाव न रखते हुए यदि उनकी पूजा की जाय तो वे स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले होते हैं। जो भक्तिपूर्वक हरि और हरकी पूजा करते हैं, उन्हें भगवान् श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। विवेक आदि गुणोंसे युक्त शूद्र उत्तम गतिको प्राप्त होता है। हे महाशूद्र! तुम्हें बिना मन्त्रके भगवान् विष्णु और गिरिजापति महादेवजीका षोडशोपचारसे पूजन करना चाहिये। उनकी पूजा बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली है।
ऐसा कहकर पैजवनसे पूजित हो महर्षि गालव शीघ्र ही अपने आश्रमको चले गये। जो मनुष्य इस प्रसंगको सुनता और पढ़कर दूसरोंको भी सुनाता है, उसके पुण्यका कभी अन्त नहीं होता।
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६६५ ---|---:
महादेवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति ध्यानयोग एवं ज्ञानयोगका निरूपण
पार्वतीजी बोलीं—देवेश्वर! आप ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं ध्यानयोगको पाकर ज्ञानयोगकी प्राप्ति कर सकूँ।
महादेवजीने कहा—प्रिये! पहले जिस द्वादशाक्षर नामक मन्त्रराजका वर्णन किया गया है, उसीका तुम्हें जप करना चाहिये। वह वेदका सनातन सार तत्त्व है। प्रणव (ॐकार) सब वेदोंका आदि है। वह समस्त ब्रह्माण्डोंका याजक है तथा समस्त कार्योंमें प्रथम उच्चारण करने योग्य तथा सब सिद्धियोंका दाता है। उसका शुक्ल वर्ण है, मधुच्छन्दा ब्रह्मा ऋषि हैं, परमात्मा देवता हैं, गायत्री छन्द है तथा समस्त कर्मोंमें उसका विनियोग किया जाता है। देवि! जो प्रतिदिन सम्पूर्ण बीजाक्षरमय द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। यह द्वादश लिंगमय अक्षरोंसे युक्त द्वादशाक्षर मन्त्र कूर्मचक्रमें स्थित है। विनियोगसहित प्रत्येक वर्णके ध्यान, ऋषि, बीज, छन्द और देवता आदिके चिन्तनपूर्वक ध्यान, जप और पूजन करनेपर भक्तोंका कर्मजनित बन्धनोंसे मोक्ष हो जाता है। ध्यानयोगसे समस्त पापोंका नाश होता है। जप और ध्यान ही योगका स्वरूप है। शब्दब्रह्म (ॐकार एवं वेद)-से प्रकट हुआ द्वादशाक्षर मन्त्र वेदके समान है। ध्यानसे मनुष्य सब कुछ पाता है। ध्यानसे वह शुद्धताको प्राप्त होता है, ध्यानसे परब्रह्मका बोध होता है तथा सगुण स्वरूपमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रतारूप योग भी ध्यानसे ही सम्भव होता है*। ध्यानयोग दो प्रकारका होता है। एक सालम्ब (सविशेष) और दूसरा निरालम्ब (निर्विशेष)। सगुण साकार विग्रह नारायणका दर्शन सालम्ब ध्यान है। दूसरा जो निरालम्ब ध्यान है, वह ज्ञानयोगके द्वारा बताया गया है। वह सबका आलम्ब है। रूपरहित, अप्रमेय तथा सर्वस्वरूप जो सनातन तेज है, जिसका प्रकाश कोटि-कोटि विद्युतोंके समान है, जो सदा उदयशील एवं पूर्णतम है, जो निष्कल, सकल एवं निरंजनमय है, आकाशके समान सर्वव्यापक है, सुखस्वरूप एवं तुरीयातीत है, जिसकी कहीं उपमा नहीं है, वही परमेश्वरका निराकारस्वरूप निरालम्ब ध्यानयोगके द्वारा चिन्तन करने योग्य है। वह द्वन्द्वोंसे रहित एवं साक्षीमात्र है। शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है। अपने तेजसे उपमारहित और अगाध है। उसीको तुम अंगीकार करो।
भगवान् नारायणका सूर्य मस्तक है, पृथ्वीलोक हृदय है तथा रसातल चरण है। वे मूर्तामूर्त स्वरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें स्थित हैं। भगवान् विष्णु ही ब्रह्मरूपसे ज्ञानयोगके आश्रय हैं। वे ही समस्त प्राणियोंकी सृष्टि और पालन करते हैं तथा वे ही सबका संहार करते हैं। वे सर्वदेवमय हैं। सनातन कालसे ही भगवान् विष्णु बारह मासोंके अधिपति हैं। इसलिये सम्पूर्ण मासों, समस्त दिनों और सब प्रहरोंमें श्रीहरिका स्मरण करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
यह कथा जिस किसी (अनधिकारी)-के सामने नहीं कहनी चाहिये। जो नित्य भक्त, जितेन्द्रिय तथा शम (मनोनिग्रह) आदि गुणोंसे युक्त हो, उससे यह कथा कहनी चाहिये। भगवान् विष्णुका भक्त शूद्र हो या ब्राह्मण, उसे भी यह कथा सुनाने योग्य है। पार्वती! मेरी भक्तिसे तुम शीघ्र योगसिद्धि
* ध्यानेन सर्वमाप्नोति ध्यानेनाप्नोति शुद्धताम्। ध्यानेन परं ब्रह्म मूर्तौ योगस्तु ध्यानजः॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३०। २८-२९)
६६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्राप्त करो और ज्ञानसे प्राप्त होने योग्य सर्वोत्कृष्ट भगवान् नारायणके स्वरूपको समझो। योगका अभ्यास सदा करना चाहिये। विशेषतः चातुर्मास्यमें योगकी साधना करनेवाला पुरुष अपने सब पापोंका नाश करता है। जो योगी दो घड़ी भी अपने कानोंको बंद करके अपने मनको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिसके घरमें एक भी योगी पुरुष एक ग्रास अन्न भी भोजन कर लेता है, वह अपने सहित तीन पीढ़ियोंका अवश्य उद्धार कर देता है। यदि ब्राह्मण योगी हो तो वह दर्शनसे भी अवश्य सब प्राणियोंकी पापराशिका संहार कर देता है। यदि ब्रह्मपरायण उत्तम कर्मोंवाला श्रेष्ठ शूद्र योगका अभ्यास करता है, सद्गुरुमें भक्ति रखता है और नियमित आहार करते हुए जो योगी परब्रह्मकी समाधिमें स्थित होता है, वह भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त करता है। भगवान् श्रीहरिकी प्रीतिसे मनुष्य उनके स्वरूपमें लीन हो जाता है। पार्वती! यह योग ज्ञानकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। सनकादि आचार्यों तथा मुक्तिकी इच्छावाले देवेश्वरोंने भी इसका सेवन किया है। सर्वप्रथम योगियोंके जो सदा ज्ञानकी सम्पत्ति होती है, उस ज्ञानसम्पत्तिसे गृहीत होकर मनुष्य योगी होता है। तदनन्तर योगीके आगे अणिमा आदि सिद्धियाँ उपस्थित होती हैं, परंतु श्रेष्ठ योगी उनमें मन नहीं लगाता। योगसे सम्पूर्ण दानों और यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। योगसे सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति होती है। कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो योगसे प्राप्त न होती हो। योगसे हृदयकी गाँठ नहीं रहने पाती। योगसे ममतारूपी शत्रु नहीं पैदा होता। योगसिद्ध पुरुषका मन कोई भी लुभा नहीं सकता। भगवान् विष्णु स्वयं ही इस चराचर जगत्में व्याप्त हैं। योगेश्वरोंके परम उपास्य उन भगवान्को अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित जानकर मनुष्य इस मायामय जगत्का मोह उसी प्रकार छोड़ देता है, जैसे सर्प अपनी केंचुलको त्याग देता है।
ज्ञानयोग और उसके साधन, स्कन्दस्वामीका सेनापतित्व और कौमारव्रत
महादेवजी कहते हैं—जब शरीरमें ममता नहीं रहती, जब चित्त अत्यन्त निर्मल होता है और जब श्रीहरिमें भक्तियोग दृढ़ होता है, तब कर्मसे बन्धन नहीं होता। जब कर्म करते हुए ही मनुष्योंका मन सदा शान्त रहे, तब योगमयी सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान् विष्णुको कर्मोंके स्वामी जानो। उनमें सब कर्मोंका समर्पण करके मनुष्य संसार-बन्धनसे छूट जाता है। यही उत्तम ज्ञान है, यही उत्तम तप है और यही उत्तम श्रेय है कि भगवान् श्रीकृष्णको सर्वकर्म समर्पण कर दिया जाय। यही निर्मल योग है। इसीको निर्गुण कहा गया है। संसारमें वही ज्ञानवान्, वही योगियोंमें अग्रगण्य और वही महायज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला है, जो श्रीहरिके चरणोंमें भक्ति रखता है। निरंजन भगवान् विष्णुको जान लेनेपर जिसने मनोमय, कर्ममय और वाणीमय दण्डको धारण किया है—यानी इन तीनोंको वशमें कर लिया है, वही त्रिदण्डी जानने योग्य है। अज्ञानी सदा बन्धनात्मक कर्मद्वारा बाँधा जाता है। द्विजोंको श्रुतियों और स्मृतियोंके अनुशीलनसे मोक्षका मार्ग प्राप्त होता है। यह मोक्ष मानो एक नगर है, जिसके चार दरवाजे हैं। उन दरवाजोंपर शम आदि चार द्वारपाल सदा विद्यमान रहते हैं। वे ही मोक्ष-नगरमें प्रवेश करानेवाले हैं। अतः मनुष्योंको पहले उन्हीं चारोंका सेवन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—शम,
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६६७
सद्विचार, सन्तोष और साधुसंग। ये चारों जिसके हाथमें हैं, उसकी सिद्धि दूर नहीं है। भगवान् विष्णुकी भक्ति तथा उत्तम धर्मके आचरणसे मनुष्योंको योगसिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य ज्ञानके लिये विद्यालयोंमें भटकता फिरता है। यदि कहीं सद्गुरु प्राप्त हो जायें तो उनसे तत्काल निर्मल दीपशिखाकी भाँति यथार्थ ज्ञानकी उपलब्धि हो जाती है। राग और द्वेष छोड़कर जो क्रोध और लोभसे रहित हो गया है, जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि है, जो विष्णुभक्तका दर्शन करता है, जिसके हृदयमें सब जीवोंके प्रति दयाका भाव स्थिर है तथा जो शौच एवं सदाचारसे युक्त है, वह योगी कभी दुःख नहीं पाता। जो माया आदिके आवरणोंसे रहित तथा मिथ्या वस्तुसे विरक्त है और कुसंगसे दूर रहता है, वह योगसिद्ध पुरुष है। बुद्धि दो प्रकारकी होती है। एक त्याज्य और दूसरी ग्राह्य। संसारविषयक बुद्धि त्याग देने योग्य है और परब्रह्मके चिन्तनमें लगनेवाली कल्याणमयी बुद्धि ग्रहण करने योग्य है। पार्वती! श्रीविष्णुका जो साकार और निराकार स्वरूप है, उसमें प्रतिष्ठित होनेवाले इस अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सम्पूर्ण तत्त्वको बताया गया। इस प्रकार जानकर योगीपुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य सद्गुरुके उपदेशसे इस ज्ञानको पाता है। जब उसके ऊपर गुरु प्रसन्नचित्त होते हैं, तब मानो सम्पूर्ण विश्व प्रसन्न हो जाता है, जिसने गुरुको सन्तुष्ट किया, उसने समस्त देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट कर लिया। गुरुका उपदेश, भगवत्प्रतिमाका पूजन, उत्तम विचार, शममें मनका तत्पर होना और ज्ञानपूर्वक कर्मका अनुष्ठान करना—यह सब मोक्षसिद्धिका लक्षण है। द्वादशाक्षरमन्त्र सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह दुष्टोंका दमन करनेवाला और परब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। देवि! द्वादशाक्षररूपधारी निर्मल परब्रह्मके स्वरूपको मैंने तुमसे प्रकाशित किया है। जो मनुष्य इस द्वादशाक्षर मन्त्ररूप भगवत्स्वरूपको, जो योगियोंके ध्यान करने योग्य तथा भक्तिसे ग्राह्य है, चातुर्मास्यमें श्रद्धापूर्वक चिन्तन करता है, भगवान् विष्णु उसके कोटि जन्मोंके पापोंको जलाकर मोक्ष प्रदान करते हैं।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**एक समय महाबली तारकासुरके भयसे भागे हुए देवताओंने महादेवजीकी स्तुति की और उनकी आज्ञासे कुमार कार्तिकेयको अपना सेनापति बनाया। फिर स्कन्दके तेजसे प्रबल होकर सब देवता तारकासुरसे युद्ध करने लगे। उस समय देवताओंने दानवोंकी सेनाको मार गिराया। भगवान् विष्णुके चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर सहस्रों दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। युद्धमें दानवसेनाको नष्ट होती देख तारकासुर देवताओंका सामना करने लगा। देवेश्वर स्कन्दने बाणोंकी बौछारसे उसकी सेनाको शीघ्र ही तितर-बितर कर डाला। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे कार्तिकेयजीने शक्तिका प्रहार करके सारथिसहित तारकासुरको क्षणभरमें भस्म कर दिया। शेष दैत्य तारकासुरको मरा हुआ देख पातालमें भाग गये। तब देवताओंने कुमारके पराक्रमकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। विजय प्राप्त करके शिव आदि सब देवताओंने स्वामी कार्तिकेयको देवताओंके सेनापति पदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार तारकासुरको मारकर सातवें दिन बालक कार्तिकेयने मन्दराचलपर जा अपने माता-पिताको प्रसन्न किया। परमानन्दमें निमग्न हो स्कन्दने सब वृत्तान्त स्वयं ही माता-पितासे कहा। उस समय भगवान् शंकरने पुत्रका विवाह कर देनेका विचार किया और कार्तिकेयसे कहा—'वत्स! तुम्हारे विवाहका समय प्राप्त है, तुम पत्नी प्राप्त करके उसके साथ धर्माचरण करो।' पिताकी यह बात सुनकर स्वामी कार्तिकेयने कहा—'भगवन्! संसारके दृश्य और अदृश्य