संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * | ६६१ ---|---
है। आप कल्याणमयी हैं, आपको नमस्कार है।' तब पार्वतीजीने प्रसन्न होकर कहा— 'जनार्दन! आप शिलारूपमें रहकर भी योगीश्वरोंको मोक्ष देनेवाले होंगे। विशेषतः चातुर्मास्यमें सब भक्तोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले होंगे। ब्रह्माजीकी प्यारी पुत्री जो गण्डकी नामवाली नदी है, वह महान् जलराशिसे भरी हुई और परम पुण्यदायिनी है। उसीके अत्यन्त निर्मल नीरमें आपका निवास होगा। पुराणोंके ज्ञाता आपको चौबीस स्वरूपोंमें देखेंगे। आपके मुखमें सुवर्ण होगा और शालग्राम आपकी संज्ञा होगी। गोलाकार तेजोमय शरीर अपूर्व शोभासे युक्त होगा। उस शालग्रामस्वरूपमें आप सम्पूर्ण सामर्थ्यसे युक्त होकर योगियोंको भी मोक्ष देनेवाले होंगे। शालग्राम-शिलामें व्याप्त हुए आपका जो मनुष्य पूजन करेंगे, उन भक्तोंको आप मनोवांछित सिद्धि प्रदान करेंगे।'
गालवजी कहते हैं— महाशूद्र! भगवान् विष्णु जिस प्रकार शालग्राम-शिलामय स्वरूपको प्राप्त हुए, वह सब प्रसंग मैंने तुम्हें बता दिया।
## शालग्राम-पूजन, द्वादशाक्षर मन्त्र एवं रामनामकी महिमा
**गालवजी कहते हैं—** गण्डकी नदीमें भगवान् विष्णु शालग्रामरूपसे प्रकट होते हैं और नर्मदा नदीमें भगवान् शिव नर्मदेश्वर रूपसे उत्पन्न होते हैं। ये दोनों स्वयं प्रकट हैं, कृत्रिम नहीं। शालग्रामशिलामें व्याप्त भगवान् विष्णु चौबीस भेदोंसे उपलब्ध होते हैं; किन्तु भगवान् सदाशिव सदा एक हाथसे ही नर्मदासे प्रकट होते हैं। जहाँ गण्डकीके जलमें शालग्रामशिला उपलब्ध होती है, वहाँ स्नान और जलपान करके मनुष्य ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। गण्डकीसे प्रकट होनेवाली शालग्रामशिलाका पूजन करके मनुष्य शुद्धात्मा योगीश्वर होता है। भगवान् विष्णु पूजन, पठन, ध्यान और स्मरण करनेपर समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। फिर शालग्रामशिलामें उनकी पूजा की जाय, तो उसके महत्त्वके विषयमें क्या कहना है; क्योंकि शालग्राममें साक्षात् श्रीहरि विराजमान होते हैं। चातुर्मास्यमें शालग्रामगत भगवान् विष्णुको नैवेद्य, फल और जल अर्पण करना विशेषरूपसे शुभ होता है। चातुर्मास्यमें शालग्रामशिला सबको पवित्र करती है। जहाँ शालग्रामस्वरूप भगवान् विष्णुकी पूजा की जाती है, वहाँ पाँच कोसतकके भूभागको वे भगवान् पवित्र कर देते हैं। वहाँ कोई अशुभ नहीं होता।
जहाँ लक्ष्मीपति भगवान् शालग्रामका पूजन होता है, वहाँ वह पूजन ही सबसे बड़ा सौभाग्य है, वही महान् तप है और वही उत्तम मोक्ष है। जहाँ दक्षिणावर्त शंख, लक्ष्मीनारायणस्वरूप शालग्रामशिला, तुलसीका वृक्ष, कृष्णसार मृग और द्वारकाकी शिला (गोमतीचक्र) हो, वहाँ लक्ष्मी, विजय, विष्णु और मुक्ति—इन चारोंकी उपस्थिति होती है। भगवान् लक्ष्मीनारायण (शालग्राम)-की पूजा करनेवाले मनुष्यको भगवान् अति पुण्य प्रदान करते हैं, जिससे वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुका ध्यान पापोंका नाश करनेवाला है। तुलसीकी मंजरियोंसे पूजित हुए भगवान् शालग्राम पुनर्जन्मका नाश करनेवाले हैं। सब प्रकारसे यत्न करके उन्हीं जगदीश्वर विष्णुका सेवन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त होकर स्थित हैं।
**एक समय पार्वतीजीने शिवजीसे कहा—** महेश्वर! आपके हाथमें यह रुद्राक्षकी माला सदा मौजूद रहती है। देव! आप किस मन्त्रका जप करते हैं, यह सन्देह मेरे मनमें उठा करता है; क्योंकि आप ही सबके स्वामी हैं। आपसे बढ़कर दूसरे किसीको मैं नहीं जानती। फिर भी आप बड़ी भक्तिसे सदा किसी मन्त्रका जप करते
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हुए दिखायी देते हैं। देवेश! आपसे भी श्रेष्ठ और कौन है, जिसका आप मन-ही-मन चिन्तन किया करते हैं।
भगवान् शिव बोले—प्रिये! भगवान् विष्णुके सहस्र नामोंमें जो सारभूत नाम है, मैं उसीका नित्य निरन्तर चिन्तन करता हूँ। मैं रामनाम जपता हूँ और उसीके अंककी इस मालाद्वारा गणना करता हूँ। श्रीरामका अवतार बहुत ही श्रेष्ठ है। द्वादश अक्षरोंसे युक्त जो सनातन ब्रह्मरूप प्रणव है वह अ, ऊ, म—इन तीन अक्षरोंसे सम्बद्ध है, तीन ग्रामोंसे युक्त है। उस विन्दुयुक्त प्रणव-मन्त्रका मैं सदैव मालाद्वारा जप करता हूँ। यह सम्पूर्ण वेदोंका सारभूत है। यह नित्य, अक्षर, निर्मल, अमृत, शान्त, तद्रूप, अमृततुल्य, कलातीत, सम्पूर्ण जगत्का आधार, मध्य और कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंका बीज है। इसको जानकर मनुष्य शीघ्र ही घोर संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। ॐकारसहित जो द्वादशाक्षर बीज है, उसका जप करनेवाले मनुष्यके लिये वह कोटि-कोटि पापोंका दाह करनेवाला दावानल बन जाता है। द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-का चिन्तन ही सबसे उत्तम ज्ञान है, जो शुभ और अशुभ दोनोंका विनाश करनेवाला है। द्वादशाक्षर मन्त्र करोड़ों जन्मोंमें कहीं किसीको उपलब्ध होता है। चातुर्मास्यमें उसका स्मरण विशेषरूपसे ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला तथा मनोवांछित वस्तु देनेवाला है। इस अक्षरसे प्रकट हुए मन्त्रका जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा आश्रय लेता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। जो भगवान् विष्णुकी भक्तिमें तत्पर हो उनके बारह मास सम्बन्धी पापहारी नामोंका शालग्रामशिलामें न्यास करता है, उसे प्रतिदिन द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है। द्वादशाक्षर मन्त्रके माहात्म्यका सहस्रों जिह्वाओंंद्वारा भी वर्णन नहीं किया जा सकता। संसारमें इसका जप, ध्यान और स्तवन करनेपर यह महामन्त्र सभी मासोंमें पाप-नाश करनेवाला होता है; किंतु चातुर्मास्यमें तो इसका यह माहात्म्य विशेषरूपसे बढ़ जाता है। इस मन्त्रके चिन्तनमात्रसे ही मनुष्योंको मनचाही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसके जपसे सनातन मोक्ष प्राप्त होता है। शान्तिपरायण जप एवं ध्यानसे मनुष्य निश्चय ही मोक्षको प्राप्त होता है। शूद्रों और स्त्रियोंके लिये प्रणवरहित जपका विधान है। पूर्वोक्त अठारह शूद्र जातिवाले मनुष्योंको जप-तप करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे ब्राह्मण-भक्ति, दान और विष्णु भगवान्के चिन्तनसे सिद्ध हो जाते हैं। उनके लिये रामनाम मन्त्र ही है। यही उन्हें कोटि मन्त्रोंसे अधिक फल देनेवाला होता है। 'राम' इस दो अक्षरके नामका जप सब पापोंका नाश करनेवाला है। मनुष्य चलते, खड़े होते और सोते समय भी श्रीरामनामका कीर्तन करनेसे इहलोकमें सुख पाता है और अन्तमें भगवान् विष्णुका पार्षद होता है। 'राम' यह दो अक्षरोंका मन्त्र कोटिशत मन्त्रोंसे भी बढ़कर है। यह सभी संकर जातियोंके पापका नाशक बतलाया गया है। चातुर्मास्य प्राप्त होनेपर तो यह राममन्त्र अनन्त फल देनेवाला होता है। इस भूतलपर रामनामसे बढ़कर कोई पाठ नहीं है। जो रामनामकी शरण ले चुके हैं, उन्हें कभी यमलोककी यातना नहीं भोगनी पड़ती। जो-जो विघ्नकारक दोष हैं, सब रामनामका उच्चारण करनेमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। जो परमात्मा समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें अन्तर्यामी आत्मारूपसे रम रहा है, उसे 'राम' कहते हैं। 'राम' यह मन्त्रराज भय तथा व्याधियोंका नाश करनेवाला है। यह युद्धमें विजय देनेवाला तथा समस्त कार्यों एवं मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। रामनामको सम्पूर्ण तीर्थोंका फल कहा गया है। वह ब्राह्मणोंके लिये भी मनोवांछित फल देनेवाला है। रामचन्द्र,
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राम-राम इत्यादि रूपसे उच्चारण किया जानेवाला यह दो अक्षरोंका मन्त्रराज भूतलपर सब कार्य सिद्ध करनेवाला है। देवता भी रामनामके गुण गाते हैं। इसलिये पार्वती! तुम भी सदा रामनामका जप करो। जो रामनामका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। रामनामसे ही सहस्र नामोंका पुण्य होता है। विशेषतः चातुर्मास्यमें उसका पुण्य दसगुना बढ़ जाता है। रामनामके उच्चारणसे हीनजातिमें उत्पन्न हुए लोगोंका महान् पाप भी भस्म हो जाता है। ये भगवान् श्रीराम सम्पूर्ण जगत्को अपने तेजसे व्याप्त करके स्थित हैं और सब मनुष्योंमें अन्तरात्मारूपसे रहकर उनके पूर्वजन्मोपार्जित स्थूल एवं सूक्ष्म पापोंको क्षणभरमें भस्म करके उन्हें पवित्र कर देते हैं।
भगवान् शिवका नर्मदेश्वर शिवलिंगरूप होना तथा गालव-शूद्र-संवादका उपसंहार
श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! द्विजोंके लिये ॐकारसहित द्वादशाक्षर मन्त्रका विधान है तथा स्त्रियों और शूद्रोंके लिये ॐकाररहित नमस्कारपूर्वक (नमो भगवते वासुदेवाय) द्वादशाक्षर मन्त्रका जप बताया गया है^१। संकरजातियोंके लिये रामनामका षडक्षरमन्त्र (ॐ रामाय नमः) है। वह भी प्रणवसे रहित ही होना चाहिये, ऐसा पुराणों और स्मृतियोंका निर्णय है। यही क्रम सब वर्णोंके लिये है और संकरजातियोंके लिये भी सदा ऐसा ही क्रम है। पार्वती! प्रणव-जपमें तुम्हारा अधिकार नहीं है। अतः तुम्हें सदा 'नमो भगवते वासुदेवाय' इसी मन्त्रका जप करना चाहिये।^२ यह प्रणव सब देवताओंका आदि कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव सभी अपनी प्रिय पत्नियोंके साथ प्रणवमें निवास करते हैं। सब प्राणी और समस्त तीर्थ उसमें विभागपूर्वक स्थित हैं। प्रणव सर्वतीर्थमय तथा कैवल्य ब्रह्ममय है। शुभानने! जब तुम चातुर्मास्यमें भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये तप करोगी, तब प्रणवसहित द्वादशाक्षरके जप करनेके योग्य होओगी। जब तपस्याकी वृद्धि होती है, तब भगवान् विष्णुमें भक्ति होती है। प्रतिदिन भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। इससे जिह्वा पवित्र होती है। जैसे दीपक प्रज्वलित होनेपर बड़े भारी अन्धकारका नाश हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् विष्णुकी कथा सुननेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं। अतः पार्वती! तुम भगवान् विष्णुके शयनकालमें द्वादशाक्षर मन्त्रराजका विशुद्धचित्त होकर जप करो। वे ही भगवान् सन्तुष्ट होकर तुम्हें द्वादशाक्षरसहित अखण्ड ब्रह्मस्वरूपका उत्तम ज्ञान प्रदान करेंगे। तुम ब्रह्माजीके कोटि कल्पोंतक द्वादशाक्षरमन्त्रका जप करती रहो। जो प्रणवसहित मन्त्रराजका ध्यान करता है, उसका कभी नाश नहीं होता।
महादेवजीके ऐसा कहनेपर पार्वतीजी चौमासा आनेपर हिमालयके शिखरपर तपस्या करनेके लिये गयीं। वे तीन वस्त्रोंसे युक्त हो ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करती हुई प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय भगवान्के हरिहरस्वरूपका ध्यान करने लगीं। उनके साथ उनकी सखियाँ
१. द्विजातानां सहोङ्कारः सहितो द्वादशाक्षरः। स्त्रीशूद्राणां नमस्कारपूर्वकः समुदाहृतः॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २५। २)
२. ईश्वर उवाच—
प्रणवस्याधिकारो न तवास्ति वरवर्णिनि। नमो भगवते वासुदेवायेति जपः सदा ॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० २५। ६)
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भी थीं। विशाल नेत्रोंवाली पार्वती ने अपने पिता हिमालयके मनोहर शिखरपर क्षमा आदि गुणोंसे सुशोभित हो तपस्या की।
पार्वतीजीके तपस्यामें संलग्न होनेपर भगवान् शंकर सब ओर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। एक दिन उन्होंने जलकी उत्ताल तरंग-मालाओंसे सुशोभित यमुनाजीको देखकर उसमें स्नान करनेका विचार किया। वे ज्यों ही जलमें घुसे कि उनके शरीरकी अग्निके तेजसे वह जल काला हो गया। यमुना भी दिव्यरूप धारण करके अपने श्यामस्वरूपसे प्रकट हुईं और भगवान् शंकरकी स्तुति एवं नमस्कार करके बोलीं—'देवेश्वर! मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपके अधीन हूँ।'
महादेवजीने कहा—जो मनुष्य इस पुण्यतीर्थमें स्नान करेगा, उसके सहस्रों पाप क्षणभरमें नष्ट हो जायँगे। यह पवित्र तीर्थ संसारमें 'हरतीर्थ' के नामसे विख्यात होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव यमुनाको प्रणाम करके अन्तर्धान हो गये। उन्होंने यमुनाके किनारे मनोहर रूप धारण करके हाथमें वाद्य ले लिया और ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करके शिखरपर जटा बढ़ाये मुनियोंके घरोंमें स्वेच्छानुसार घूम-घूमकर अंगोंकी चपल चेष्टाका प्रदर्शन प्रारम्भ किया। वे कहीं गीत गाते और कहीं अपनी मौजसे नाचने लगते थे। स्त्रियोंके बीचमें जाकर कभी क्रोध करते और कभी हँसने लगते थे। इस प्रकार उन्हें सब ओर घूमते देखकर मुनिलोगोंने क्रोध किया और यह शाप दिया कि 'तुम लिंगरूप हो जाओ।' शाप होनेपर भगवान् शिव अन्यत्र बहुत दूर चले गये। उनका वह लिंगरूप अमरकण्टक पर्वतके रूपमें अभिव्यक्त हुआ और वहाँसे नर्मदा नामक नदी प्रकट हुई। नर्मदामें नहाकर, उसका जल पीकर तथा उसके जलसे पितरोंका तर्पण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर दुर्लभ कामनाओंको भी प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य नर्मदामें स्थित शिवलिंगोंका पूजन करेंगे, वे शिवस्वरूप हो जायँगे। विशेषतः चातुर्मास्यमें शिवलिंगकी पूजा महान् फल देनेवाली है। चातुर्मास्यमें रुद्रमन्त्रका जप, शिवकी पूजा और शिवमें अनुराग विशेष फलद है। जो पंचामृतसे भगवान् शिवको स्नान कराते हैं, उन्हें गर्भकी वेदना नहीं सहन करनी पड़ती। जो शिवलिंगके मस्तकपर मधुसे अभिषेक करेंगे, उनके सहस्रों दुःख तत्काल नष्ट हो जायँगे। जो चातुर्मास्यमें शिवजीके आगे दीपदान करते हैं, वे शिवलोकके भागी होते हैं। जो जलधारासे युक्त नर्मदेश्वर महालिंगका चातुर्मास्यमें विधिपूर्वक पूजन करता है, वह शिवस्वरूप हो जाता है।
गालवजी कहते हैं—यह सब श्रीविष्णुके शालग्राम होनेकी और महेश्वर शिवके लिंगरूप होनेकी कथा सुनायी गयी। अतः जो लिंगरूपी शिव और शालग्रामगत श्रीविष्णुका भक्तिपूर्वक पूजन करते हैं, उन्हें दुःखमयी यातना नहीं भोगनी पड़ती। चौमासेमें शिव और विष्णुका विशेषरूपसे पूजन करना चाहिये। दोनोंमें भेदभाव न रखते हुए यदि उनकी पूजा की जाय तो वे स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले होते हैं। जो भक्तिपूर्वक हरि और हरकी पूजा करते हैं, उन्हें भगवान् श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। विवेक आदि गुणोंसे युक्त शूद्र उत्तम गतिको प्राप्त होता है। हे महाशूद्र! तुम्हें बिना मन्त्रके भगवान् विष्णु और गिरिजापति महादेवजीका षोडशोपचारसे पूजन करना चाहिये। उनकी पूजा बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली है।
ऐसा कहकर पैजवनसे पूजित हो महर्षि गालव शीघ्र ही अपने आश्रमको चले गये। जो मनुष्य इस प्रसंगको सुनता और पढ़कर दूसरोंको भी सुनाता है, उसके पुण्यका कभी अन्त नहीं होता।
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महादेवजीके द्वारा पार्वतीके प्रति ध्यानयोग एवं ज्ञानयोगका निरूपण
पार्वतीजी बोलीं—देवेश्वर! आप ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं ध्यानयोगको पाकर ज्ञानयोगकी प्राप्ति कर सकूँ।
महादेवजीने कहा—प्रिये! पहले जिस द्वादशाक्षर नामक मन्त्रराजका वर्णन किया गया है, उसीका तुम्हें जप करना चाहिये। वह वेदका सनातन सार तत्त्व है। प्रणव (ॐकार) सब वेदोंका आदि है। वह समस्त ब्रह्माण्डोंका याजक है तथा समस्त कार्योंमें प्रथम उच्चारण करने योग्य तथा सब सिद्धियोंका दाता है। उसका शुक्ल वर्ण है, मधुच्छन्दा ब्रह्मा ऋषि हैं, परमात्मा देवता हैं, गायत्री छन्द है तथा समस्त कर्मोंमें उसका विनियोग किया जाता है। देवि! जो प्रतिदिन सम्पूर्ण बीजाक्षरमय द्वादशाक्षर मन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। यह द्वादश लिंगमय अक्षरोंसे युक्त द्वादशाक्षर मन्त्र कूर्मचक्रमें स्थित है। विनियोगसहित प्रत्येक वर्णके ध्यान, ऋषि, बीज, छन्द और देवता आदिके चिन्तनपूर्वक ध्यान, जप और पूजन करनेपर भक्तोंका कर्मजनित बन्धनोंसे मोक्ष हो जाता है। ध्यानयोगसे समस्त पापोंका नाश होता है। जप और ध्यान ही योगका स्वरूप है। शब्दब्रह्म (ॐकार एवं वेद)-से प्रकट हुआ द्वादशाक्षर मन्त्र वेदके समान है। ध्यानसे मनुष्य सब कुछ पाता है। ध्यानसे वह शुद्धताको प्राप्त होता है, ध्यानसे परब्रह्मका बोध होता है तथा सगुण स्वरूपमें चित्तवृत्तिकी एकाग्रतारूप योग भी ध्यानसे ही सम्भव होता है*। ध्यानयोग दो प्रकारका होता है। एक सालम्ब (सविशेष) और दूसरा निरालम्ब (निर्विशेष)। सगुण साकार विग्रह नारायणका दर्शन सालम्ब ध्यान है। दूसरा जो निरालम्ब ध्यान है, वह ज्ञानयोगके द्वारा बताया गया है। वह सबका आलम्ब है। रूपरहित, अप्रमेय तथा सर्वस्वरूप जो सनातन तेज है, जिसका प्रकाश कोटि-कोटि विद्युतोंके समान है, जो सदा उदयशील एवं पूर्णतम है, जो निष्कल, सकल एवं निरंजनमय है, आकाशके समान सर्वव्यापक है, सुखस्वरूप एवं तुरीयातीत है, जिसकी कहीं उपमा नहीं है, वही परमेश्वरका निराकारस्वरूप निरालम्ब ध्यानयोगके द्वारा चिन्तन करने योग्य है। वह द्वन्द्वोंसे रहित एवं साक्षीमात्र है। शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल है। अपने तेजसे उपमारहित और अगाध है। उसीको तुम अंगीकार करो।
भगवान् नारायणका सूर्य मस्तक है, पृथ्वीलोक हृदय है तथा रसातल चरण है। वे मूर्तामूर्त स्वरूपसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें स्थित हैं। भगवान् विष्णु ही ब्रह्मरूपसे ज्ञानयोगके आश्रय हैं। वे ही समस्त प्राणियोंकी सृष्टि और पालन करते हैं तथा वे ही सबका संहार करते हैं। वे सर्वदेवमय हैं। सनातन कालसे ही भगवान् विष्णु बारह मासोंके अधिपति हैं। इसलिये सम्पूर्ण मासों, समस्त दिनों और सब प्रहरोंमें श्रीहरिका स्मरण करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
यह कथा जिस किसी (अनधिकारी)-के सामने नहीं कहनी चाहिये। जो नित्य भक्त, जितेन्द्रिय तथा शम (मनोनिग्रह) आदि गुणोंसे युक्त हो, उससे यह कथा कहनी चाहिये। भगवान् विष्णुका भक्त शूद्र हो या ब्राह्मण, उसे भी यह कथा सुनाने योग्य है। पार्वती! मेरी भक्तिसे तुम शीघ्र योगसिद्धि
* ध्यानेन सर्वमाप्नोति ध्यानेनाप्नोति शुद्धताम्। ध्यानेन परं ब्रह्म मूर्तौ योगस्तु ध्यानजः॥
(स्क० पु०, ब्रा० चा० मा० ३०। २८-२९)
६६६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्राप्त करो और ज्ञानसे प्राप्त होने योग्य सर्वोत्कृष्ट भगवान् नारायणके स्वरूपको समझो। योगका अभ्यास सदा करना चाहिये। विशेषतः चातुर्मास्यमें योगकी साधना करनेवाला पुरुष अपने सब पापोंका नाश करता है। जो योगी दो घड़ी भी अपने कानोंको बंद करके अपने मनको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित करता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है। जिसके घरमें एक भी योगी पुरुष एक ग्रास अन्न भी भोजन कर लेता है, वह अपने सहित तीन पीढ़ियोंका अवश्य उद्धार कर देता है। यदि ब्राह्मण योगी हो तो वह दर्शनसे भी अवश्य सब प्राणियोंकी पापराशिका संहार कर देता है। यदि ब्रह्मपरायण उत्तम कर्मोंवाला श्रेष्ठ शूद्र योगका अभ्यास करता है, सद्गुरुमें भक्ति रखता है और नियमित आहार करते हुए जो योगी परब्रह्मकी समाधिमें स्थित होता है, वह भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त करता है। भगवान् श्रीहरिकी प्रीतिसे मनुष्य उनके स्वरूपमें लीन हो जाता है। पार्वती! यह योग ज्ञानकी सिद्धि प्रदान करनेवाला है। सनकादि आचार्यों तथा मुक्तिकी इच्छावाले देवेश्वरोंने भी इसका सेवन किया है। सर्वप्रथम योगियोंके जो सदा ज्ञानकी सम्पत्ति होती है, उस ज्ञानसम्पत्तिसे गृहीत होकर मनुष्य योगी होता है। तदनन्तर योगीके आगे अणिमा आदि सिद्धियाँ उपस्थित होती हैं, परंतु श्रेष्ठ योगी उनमें मन नहीं लगाता। योगसे सम्पूर्ण दानों और यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। योगसे सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति होती है। कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो योगसे प्राप्त न होती हो। योगसे हृदयकी गाँठ नहीं रहने पाती। योगसे ममतारूपी शत्रु नहीं पैदा होता। योगसिद्ध पुरुषका मन कोई भी लुभा नहीं सकता। भगवान् विष्णु स्वयं ही इस चराचर जगत्में व्याप्त हैं। योगेश्वरोंके परम उपास्य उन भगवान्को अपने ब्रह्मरन्ध्रमें स्थित जानकर मनुष्य इस मायामय जगत्का मोह उसी प्रकार छोड़ देता है, जैसे सर्प अपनी केंचुलको त्याग देता है।
ज्ञानयोग और उसके साधन, स्कन्दस्वामीका सेनापतित्व और कौमारव्रत
महादेवजी कहते हैं—जब शरीरमें ममता नहीं रहती, जब चित्त अत्यन्त निर्मल होता है और जब श्रीहरिमें भक्तियोग दृढ़ होता है, तब कर्मसे बन्धन नहीं होता। जब कर्म करते हुए ही मनुष्योंका मन सदा शान्त रहे, तब योगमयी सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान् विष्णुको कर्मोंके स्वामी जानो। उनमें सब कर्मोंका समर्पण करके मनुष्य संसार-बन्धनसे छूट जाता है। यही उत्तम ज्ञान है, यही उत्तम तप है और यही उत्तम श्रेय है कि भगवान् श्रीकृष्णको सर्वकर्म समर्पण कर दिया जाय। यही निर्मल योग है। इसीको निर्गुण कहा गया है। संसारमें वही ज्ञानवान्, वही योगियोंमें अग्रगण्य और वही महायज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाला है, जो श्रीहरिके चरणोंमें भक्ति रखता है। निरंजन भगवान् विष्णुको जान लेनेपर जिसने मनोमय, कर्ममय और वाणीमय दण्डको धारण किया है—यानी इन तीनोंको वशमें कर लिया है, वही त्रिदण्डी जानने योग्य है। अज्ञानी सदा बन्धनात्मक कर्मद्वारा बाँधा जाता है। द्विजोंको श्रुतियों और स्मृतियोंके अनुशीलनसे मोक्षका मार्ग प्राप्त होता है। यह मोक्ष मानो एक नगर है, जिसके चार दरवाजे हैं। उन दरवाजोंपर शम आदि चार द्वारपाल सदा विद्यमान रहते हैं। वे ही मोक्ष-नगरमें प्रवेश करानेवाले हैं। अतः मनुष्योंको पहले उन्हीं चारोंका सेवन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—शम,
- ब्राह्मखण्ड-चातुर्मास्य-माहात्म्य * ६६७
सद्विचार, सन्तोष और साधुसंग। ये चारों जिसके हाथमें हैं, उसकी सिद्धि दूर नहीं है। भगवान् विष्णुकी भक्ति तथा उत्तम धर्मके आचरणसे मनुष्योंको योगसिद्धि प्राप्त होती है। मनुष्य ज्ञानके लिये विद्यालयोंमें भटकता फिरता है। यदि कहीं सद्गुरु प्राप्त हो जायें तो उनसे तत्काल निर्मल दीपशिखाकी भाँति यथार्थ ज्ञानकी उपलब्धि हो जाती है। राग और द्वेष छोड़कर जो क्रोध और लोभसे रहित हो गया है, जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि है, जो विष्णुभक्तका दर्शन करता है, जिसके हृदयमें सब जीवोंके प्रति दयाका भाव स्थिर है तथा जो शौच एवं सदाचारसे युक्त है, वह योगी कभी दुःख नहीं पाता। जो माया आदिके आवरणोंसे रहित तथा मिथ्या वस्तुसे विरक्त है और कुसंगसे दूर रहता है, वह योगसिद्ध पुरुष है। बुद्धि दो प्रकारकी होती है। एक त्याज्य और दूसरी ग्राह्य। संसारविषयक बुद्धि त्याग देने योग्य है और परब्रह्मके चिन्तनमें लगनेवाली कल्याणमयी बुद्धि ग्रहण करने योग्य है। पार्वती! श्रीविष्णुका जो साकार और निराकार स्वरूप है, उसमें प्रतिष्ठित होनेवाले इस अक्षर, अव्यक्त, अमृत एवं सम्पूर्ण तत्त्वको बताया गया। इस प्रकार जानकर योगीपुरुष संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। मनुष्य सद्गुरुके उपदेशसे इस ज्ञानको पाता है। जब उसके ऊपर गुरु प्रसन्नचित्त होते हैं, तब मानो सम्पूर्ण विश्व प्रसन्न हो जाता है, जिसने गुरुको सन्तुष्ट किया, उसने समस्त देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट कर लिया। गुरुका उपदेश, भगवत्प्रतिमाका पूजन, उत्तम विचार, शममें मनका तत्पर होना और ज्ञानपूर्वक कर्मका अनुष्ठान करना—यह सब मोक्षसिद्धिका लक्षण है। द्वादशाक्षरमन्त्र सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह दुष्टोंका दमन करनेवाला और परब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है। देवि! द्वादशाक्षररूपधारी निर्मल परब्रह्मके स्वरूपको मैंने तुमसे प्रकाशित किया है। जो मनुष्य इस द्वादशाक्षर मन्त्ररूप भगवत्स्वरूपको, जो योगियोंके ध्यान करने योग्य तथा भक्तिसे ग्राह्य है, चातुर्मास्यमें श्रद्धापूर्वक चिन्तन करता है, भगवान् विष्णु उसके कोटि जन्मोंके पापोंको जलाकर मोक्ष प्रदान करते हैं।
**ब्रह्माजी कहते हैं—**एक समय महाबली तारकासुरके भयसे भागे हुए देवताओंने महादेवजीकी स्तुति की और उनकी आज्ञासे कुमार कार्तिकेयको अपना सेनापति बनाया। फिर स्कन्दके तेजसे प्रबल होकर सब देवता तारकासुरसे युद्ध करने लगे। उस समय देवताओंने दानवोंकी सेनाको मार गिराया। भगवान् विष्णुके चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर सहस्रों दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। युद्धमें दानवसेनाको नष्ट होती देख तारकासुर देवताओंका सामना करने लगा। देवेश्वर स्कन्दने बाणोंकी बौछारसे उसकी सेनाको शीघ्र ही तितर-बितर कर डाला। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे कार्तिकेयजीने शक्तिका प्रहार करके सारथिसहित तारकासुरको क्षणभरमें भस्म कर दिया। शेष दैत्य तारकासुरको मरा हुआ देख पातालमें भाग गये। तब देवताओंने कुमारके पराक्रमकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। विजय प्राप्त करके शिव आदि सब देवताओंने स्वामी कार्तिकेयको देवताओंके सेनापति पदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार तारकासुरको मारकर सातवें दिन बालक कार्तिकेयने मन्दराचलपर जा अपने माता-पिताको प्रसन्न किया। परमानन्दमें निमग्न हो स्कन्दने सब वृत्तान्त स्वयं ही माता-पितासे कहा। उस समय भगवान् शंकरने पुत्रका विवाह कर देनेका विचार किया और कार्तिकेयसे कहा—'वत्स! तुम्हारे विवाहका समय प्राप्त है, तुम पत्नी प्राप्त करके उसके साथ धर्माचरण करो।' पिताकी यह बात सुनकर स्वामी कार्तिकेयने कहा—'भगवन्! संसारके दृश्य और अदृश्य
| ६६८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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पदार्थोंमेंसे मैं किसका ग्रहण और किसका त्याग करूँ। जगत्में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब मेरे लिये माता पार्वतीके समान हैं और जितने भी पुरुष हैं, उन सबको मैं आपके रूपमें देखता हूँ। आप मेरे गुरु हैं, अतः मुझे नरकमें डूबनेसे बचाइये। मैंने आपके प्रसादसे यह विवेक प्राप्त किया है। भयंकर संसार-सागरमें मैं फिर न गिर जाऊँ, इसकी चेष्टा रखें। जैसे दीपक हाथमें लेकर किसी वस्तुको खोजनेवाला पुरुष उस वस्तुको देख लेनेपर उसके लिये स्वीकार किये जानेवाले अन्य सब साधनोंको त्याग देता है, उसी प्रकार योगी ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर संसारको त्याग देता है। सर्वज्ञ परमेश्वर! सर्वव्यापी ब्रह्मको जानकर जिसके सब कर्म निवृत्त हो जाते हैं, उसको विद्वान् पुरुष योगी कहते हैं। महेश्वर! मानवोंके लिये ज्ञान अत्यन्त दुर्लभ है। ज्ञानीजन प्राप्त किये हुए ज्ञानको किसी प्रकार भी खोना नहीं चाहते। यह ज्ञान आपके प्रभावसे ही प्राप्त होने योग्य है। मैं संसारबन्धनसे छूटनेकी इच्छा रखता हूँ। अतः मुझसे इस प्रकार विवाह आदि करनेकी बात नहीं कहनी चाहिये।'
जब देवी पार्वतीने विवाहके लिये बार-बार आग्रह किया, तब कार्तिकेयजी पिता-माताको प्रणाम करके क्रौंच पर्वतपर चले गये और वहाँ परम पवित्र आश्रममें बैठकर बड़ी भारी तपस्या करने लगे। उन्होंने द्वादशाक्षर बीजरूप परब्रह्मका जप किया और पहले ध्यानसे सब इन्द्रियोंका वशमें करके एक मासतक मनको योगमें लगाकर ज्ञानयोग प्राप्त कर लिया। जब उनके सामने अणिमा आदि सिद्धियाँ आयीं, तब वे उनसे क्रोधपूर्वक बोले—'अरी! यदि अपनी दुष्टताके कारण तुमलोग मेरे पास भी चली आयीं, तो मेरे-जैसे शान्तपुरुषोंका कभी पराभव न कर सकोगी।'
यह चातुर्मास्यका माहात्म्य सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो भगवान् शिव अथवा विष्णुको अपने हृदयमें स्थापित करके अभेद-बुद्धिसे उनके अद्वितीय स्वरूपका चिन्तन करता है, उसके लिये शत्रु भी अत्यन्त प्रिय हो जाता है।
चातुर्मास्य-माहात्म्य सम्पूर्ण।
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१३. ब्राह्मखण्ड (ब्रह्मोत्तरखण्ड)
| * ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ६६९ |
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ब्रह्मोत्तरखण्ड
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शिवके षडक्षर एवं पंचाक्षर मन्त्रका माहात्म्य; राजा दाशार्ह तथा रानी कलावतीकी कथा
ज्योतिर्मात्रस्वरूपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे।
नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये॥
‘ज्योतिमात्र जिनका स्वरूप है, निर्मल ज्ञान ही जिनका नेत्र है, जो लिंगस्वरूप ब्रह्म हैं, उन परम शान्त कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।’
ऋषि बोले—सूतजी! आपने संक्षेपसे भगवान् विष्णुके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया, जो समस्त पापोंका अपहरण करनेवाला और परम पवित्र है। हमने भी उसे ध्यानपूर्वक सुना है। अब हमलोग त्रिपुरविनाशक शिवजीके माहात्म्य और उनके मन्त्रोंकी महिमाको सुनना चाहते हैं।
सूतजीने कहा—मुनियो! मरणधर्मा मनुष्योंके लिये इतना ही सबसे उत्तम एवं सनातन श्रेय है कि भगवान् महेश्वरकी कथामें अकारण भक्तिभावका उदय हो*। समस्त पुण्यों, श्रेयके सम्पूर्ण साधनों और समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञको ही सर्वोत्तम माना गया है†। जैसे सब देवताओंमें त्रिपुरारि भगवान् शंकर श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब मन्त्रोंमें शिवका षडक्षर मन्त्र श्रेष्ठ है। उसीको प्रणवसे रहित होनेपर पंचाक्षर मन्त्र भी कहते हैं। वह जप करनेवाले पुरुषोंको मोक्ष देनेवाला है। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले सब श्रेष्ठ मुनि इस मन्त्रका सम्यग् रूपसे सेवन करते हैं। शिवजीके शुभ पंचाक्षर मन्त्रमें सर्वज्ञ, परिपूर्ण, सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् शिव सदा रमते रहते हैं। यह मन्त्रराज सम्पूर्ण उपनिषदोंका आत्मा है। इसके जपसे सब मुनियोंने निरामय परब्रह्मका साक्षात्कार किया है। ‘नमः शिवाय’ मन्त्रमें ‘नमः’ पदके अर्थभूत नमस्कारके द्वारा जीवभाव परमात्मा शिवमें मिलकर तद्रूप हो जाता है। अतः वह मन्त्र साक्षात् परब्रह्मस्वरूप है। संसार-बन्धनमें बँधे हुए देहधारियोंके हितकी कामनासे स्वयं भगवान् शिवने ‘ॐ नमः शिवाय’ इस आदिमन्त्रका प्रतिपादन किया है। जिसके हृदयमें ‘ॐ नमः शिवाय’ यह मन्त्र निवास करता है, उसके लिये बहुत-से मन्त्र, तीर्थ, तप और यज्ञोंकी क्या आवश्यकता है‡? देहधारी मनुष्य तभीतक दुःखोंसे भरे हुए इस भयंकर संसारमें भटकते हैं, जबतक कि वे एक बार भी इस षडक्षर मन्त्रका उच्चारण नहीं करते। यह षडक्षर मन्त्र सम्पूर्ण ज्ञानोंकी निधि है। यह मोक्षमार्गको प्रकाशित करनेवाला दीपक है। अविद्याके समुद्रको सोखनेवाला वडवानल है और महापातकोंके जंगलको जला डालनेवाला दावानल है। अतः यह पंचाक्षर मन्त्र सब कुछ देनेवाला माना गया
* एतावदेव मर्त्यानां परं श्रेयः सनातनम्। यदीश्वरकथायां वै जाता भक्तिरहैतुकी॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। ५)
† सर्वेषामपि पुण्यानां सर्वेषां श्रेयसामपि। सर्वेषामपि यज्ञानां जपयज्ञः परः स्मृतः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। ७)
‡ किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः किं तीर्थैः किं तपोऽध्वरैः। यस्यो नमः शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचरः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। १६)
| ६७० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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है। इसे मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले स्त्री-समुदाय, शूद्र और वर्णसंकर धारण कर सकते हैं। इस मन्त्रके लिये दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण, समय-शुद्धि तथा गुरुमुखसे उपदेश आदिकी आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र है*। 'शिव' यह दो अक्षरका मन्त्र ही बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेमें समर्थ है और उसमें 'नमः' पद जोड़ दिया गया, तब तो वह मोक्ष देनेवाला हो जाता है। जो गुरु निर्मल, शान्त, साधु, स्वल्पभाषी, काम-क्रोधसे रहित, सदाचारी और जितेन्द्रिय हों, उनके द्वारा दयापूर्वक दिया हुआ मन्त्र शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है। प्रयाग, पुष्कर, केदार, सेतुबन्ध, गोकर्ण और नैमिषारण्य—ये सब क्षेत्र मनुष्योंको शीघ्र ही सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं।
मथुरापुरीमें दाशार्ह नामसे विख्यात एक राजा हो गये हैं, जो यदुकुलमें श्रेष्ठ, बुद्धिमान्, अत्यन्त उत्साही और महान् बलवान् थे। वे शास्त्रोंके ज्ञाता, नीतियुक्त वचन बोलनेवाले, शूरवीर, धैर्यवान् तथा परम कान्तिमान् थे। अनेक शास्त्रोंके तात्पर्यको जाननेमें राजाने कुशलता प्राप्त की थी। वे उदार, रूपवान्, तरुण तथा शुभ लक्षणोंसे सुशोभित थे। उन्होंने काशिराजकी पुत्री कलावतीके साथ विवाह किया था। ब्याह करके घर आनेपर रात्रिमें पलंगपर बैठी हुई उस स्त्रीको राजाने अपने पास बुलाया। पतिके बुलानेपर भी वह उनके समीप नहीं आयी। तब राजा उसे बलपूर्वक अपनी शय्यापर ले आनेके लिये उठे। यह देख रानीने कहा—'महाराज! मैं कारणका ज्ञान रखनेवाली तथा व्रतमें तत्पर हूँ। मेरा स्पर्श न कीजिये। आप तो धर्म-अधर्मको जानते हैं। अतः मेरे ऊपर बलप्रयोग न कीजिये। पति-पत्नीमें प्रेमपूर्वक जो समागम होता है, वही एक-दूसरेकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। बलपूर्वक स्त्रियोंका सम्भोग करनेसे पुरुषोंको क्या प्रसन्नता होती है और कौन-सा सुख मिलता है? जो प्रेम न करती हो, रोगिणी हो, गर्भवती अथवा किसी व्रतका पालन करनेवाली हो, रजस्वला और रतिकी इच्छा न रखनेवाली हो, ऐसी स्त्रीके साथ पुरुषको बलपूर्वक समागमकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये।'
रानीके इस प्रकार कहनेपर भी राजा दाशार्हने उसकी बात नहीं मानी। रानीका शरीर तपाये हुए लोहेके पिण्डके समान तप रहा था। उसका स्पर्श करते ही सहसा राजाका अंग-अंग जलने लगा। उन्होंने भयसे विह्वल होकर अपने शरीरको जलानेवाली रानीको छोड़ दिया।
राजा बोले—प्रिये! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है कि पल्लवके समान कोमल यह तुम्हारा शरीर अग्निके समान तप्त कैसे हो गया।
रानीने उत्तर दिया—राजन्! बचपनमें मुनिवर दुर्वासाने मुझपर दया करके शिवजीके पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश किया था। उस मन्त्रके प्रभावसे मेरा शरीर निष्पाप हो गया है। पापी पुरुष इसका स्पर्श नहीं कर सकते। महाराज! आपने स्वभावसे ही मदिरा पीनेवाली कुलटा और वेश्याओंका सेवन किया है। आप पवित्र मन्त्रका जप और भगवान् शंकरकी आराधना भी नहीं करते। फिर मेरा स्पर्श कैसे कर सकते हैं?
राजा बोले—सुन्दरी! तुम मुझे भी भगवान् शंकरके शुभ पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश करो।
रानीने कहा—आप मेरे गुरु हैं, मैं आपको उपदेश नहीं कर सकती। आप मन्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु गर्गाचार्यके समीप जाइये।
* तस्मात् सर्वप्रदो मन्त्रः सोऽयं पञ्चाक्षरः स्मृतः। स्त्रीभिः शूद्रैश्च संकीर्णैर्धार्यते मुक्तिकाङ्क्षिभिः॥
नास्य दीक्षा न होमश्च न संस्कारो न तर्पणम्। न कालो नोपदेशश्च सदा शुचिरयं मनुः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० १। २०, २१)
* ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७१
इस प्रकार बातचीत करते हुए दोनों पति-पत्नी गर्ग मुनिके समीप गये और उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया। तत्पश्चात् राजाने विनीतभावसे एकान्तमें कहा—'गुरुदेव! आपका हृदय दयासे भरा हुआ है, आप मुझे भगवान् शिवके पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश देकर कृतार्थ कीजिये।' राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर विप्रवर गर्गाचार्य दोनों दम्पतिको यमुनाजीके महापुण्यमय उत्तम तटपर ले गये। वहाँ गुरुजी एक पवित्र वृक्षके मूल भागमें बैठ गये। राजाने उपवासपूर्वक उस पुण्य तीर्थके निर्मल जलमें स्नान किया। तब उन्होंने राजाको पूर्वाभिमुख बिठाकर भगवान् शिवके चरणारविन्दोंमें नमस्कार किया और राजाके मस्तकपर हाथ रखकर उन्हें शिवस्वरूप पंचाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया। उस मन्त्रको धारण करते ही गुरुजीके हस्तकमलका स्पर्श होनेसे राजा दाशार्हके शरीरसे करोड़ों पाप कौओंका रूप धारण करके बाहर निकल गये।
तब गुरु गर्गाचार्यने कहा—राजन्! भगवान् शिवका पंचाक्षर मन्त्र जब तुम्हारे हृदयमें पहुँचा, तभी तुम्हारे कोटि-कोटि पाप कौओंके रूपमें बाहर निकल गये हैं। सहस्रों कोटि जन्मोंमें जो पापराशि संचित की गयी है, वह शिवके पंचाक्षर मन्त्रको धारण करते ही क्षणभरमें भस्म हो जाती है। राजन्! इस समय तुम्हारे करोड़ों पातक जल गये। अब तुम पवित्रचित्त होकर अपनी इस रानीके साथ सुखपूर्वक विहार करो। ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ गर्गजी उन दोनों दम्पतिके साथ घरको लौटे। तदनन्तर गुरुजीसे आज्ञा ले राजा और रानी प्रसन्नतापूर्वक महलमें चले गये। यह पंचाक्षर मन्त्र सम्पूर्ण वेद, उपनिषद्, पुराण और शास्त्रोंका आभूषण है, सब पापोंका नाश करनेवाला है। इस प्रकार मैंने पंचाक्षर मन्त्रका महान् प्रभाव संक्षेपसे बताया है।
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शिवरात्रिको शिवपूजनका महत्त्व, राजा मित्रसहका वसिष्ठके शापसे राक्षस होकर ब्राह्मणकी हत्या करना और गौतमजीका उन्हें गोकर्णक्षेत्रकी महिमा सुनाना
सूतजी कहते हैं—माघ (फाल्गुन) मासमें कृष्ण पक्षकी चतुर्दशीका उपवास अत्यन्त दुर्लभ है। उसमें भी शिवरात्रिमें जागरण करना तो मैं मनुष्योंके लिये और दुर्लभ मानता हूँ। उससे भी अत्यन्त दुर्लभ है शिवलिंगका दर्शन। तथा परमेश्वर शिवके पूजनको तो मैं और भी दुर्लभतर मानता हूँ। सौ करोड़ जन्मोंमें उत्पन्न हुई पुण्यराशिके प्रभावसे कभी भगवान् शंकरकी बिल्वपत्रसे पूजा करनेका अवसर प्राप्त होता है। दस हजार वर्षोंतक जिसने गंगाजीके जलमें स्नान किया है, उसको जो फल मिलता है, वही फल मनुष्य एक बार बिल्वपत्रसे भगवान् शंकरकी पूजा करके प्राप्त कर लेता है। प्रत्येक युगमें जो-जो पुण्य इस संसारमें लुप्त हुए हैं, वे सभी फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी (शिवरात्रि) में पूर्णतः विद्यमान रहते हैं। लोकमें ब्रह्मा आदि देवता और वसिष्ठ आदि मुनि इस फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। इस शिवरात्रिको यदि किसीने उपवास किया तो उसे सौ यज्ञोंसे अधिक पुण्य होता है। जिसने एक बिल्वपत्रसे शिवलिंगका पूजन किया है, उसके पुण्यकी समता तीनों लोकोंमें कौन कर सकता है?
इस विषयमें एक परम सुन्दर पुण्य-कथा कही जाती है। इक्ष्वाकुवंशमें 'मित्रसह' नामसे
६७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्रसिद्ध एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। वे समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, सब अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, शास्त्रज्ञ, वेदोंके पारंगत विद्वान्, शूरवीर, अत्यन्त बली, उत्साही, नित्य उद्योगी और दयाके निधान थे। राजाको शिकार खेलनेका व्यसन था। एक दिन उन्होंने अपनी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर भयंकर वनमें प्रवेश किया और वहाँ बहुतसे व्याघ्र, जंगली सूअर तथा सिंहोंको अपने बाणोंसे बींध डाला। राजा मित्रसह रथपर सवार हो कवचसे सुरक्षित होकर वनमें विचर रहे थे। उसी समय उन्होंने अग्निके समान आकृतिवाले एक निशाचरको मारा। उसका छोटा भाई दूरसे यह देखकर शोकमग्न हो गया और वहीं कहीं छिप गया। भाईको मारा गया देख उसने मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया—'यह राजा बड़ा दुर्धर्ष वीर है, इसे छलसे ही जीतना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके वह पापात्मा राक्षस मनुष्यके समान आकृति बनाकर राजाके समीप आया। राजाने सेवा करनेके लिये विनीतभावसे आये हुए उस पुरुषको देखकर अज्ञानवश उसे रसोईघरका अध्यक्ष बना दिया। तत्पश्चात् राजा लौटकर अपनी पुरीको आये। महाराज मित्रसहकी पत्नी मदयन्ती नामसे प्रसिद्ध थी। वह नलकी स्त्री दमयन्तीके समान बड़ी पतिव्रता थी। एक दिन राजा मित्रसहने श्राद्धके दिन मुनिवर वसिष्ठको निमन्त्रित करके अपने घरपर बुलाया। उस समय रसोईयेके रूपमें राक्षसने सागमें मनुष्यका मांस मिला दिया और वही वसिष्ठजीके आगे परोस दिया। उसे देखकर वसिष्ठजी बोले—'राजन्! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू इतना दुष्ट और छली है कि मेरे आगे मनुष्यका मांस रख दिया। इस पापके कारण तू राक्षस हो जायगा।' जब मुनिको यह मालूम हुआ कि यह सारी करतूत राक्षसकी है, तब उन्होंने उस शापको बारह वर्षोंकी अवधिमें सीमित कर दिया। तब राजा भी कुपित होकर बोले—'यह मेरी करतूत नहीं थी और न मैं इस विषयमें कुछ जानता ही था, तो भी आपने मुझे अकारण शाप दे दिया। इसलिये गुरु होनेपर भी आपको मैं भी शाप देता हूँ।' ऐसा कहकर राजा अंजलिमें जल ले गुरुको शाप देनेके लिये उद्यत हुए। यह देख रानी मदयन्तीने पतिके चरणोंमें गिरकर उन्हें ऐसा करनेसे रोका। रानीके वचनका मान रखनेके लिये राजा शाप देनेसे निवृत्त हो गये और उस अंजलिके जलको उन्होंने अपने दोनों पैरोंपर डाल दिया। इससे राजाके दोनों पैर कल्मषयुक्त (मलिन) हो गये। तबसे राजाका नाम कल्माषपाद हो गया।
गुरुके शापसे राजा वनमें विचरनेवाले राक्षस हुए। एक दिन वनमें कहीं किशोर अवस्थावाले नवविवाहित मुनि-दम्पति रमण कर रहे थे। उस समय उस नर-भक्षी राक्षसने तरुण मुनिकुमारको खानेके लिये पकड़ लिया। ठीक उसी तरह, जैसे छोटे-से मृगशिशुको कोई व्याघ्र पकड़ लेता है। राक्षसके वशमें पड़े हुए अपने पतिको देखकर उसकी प्यारी स्त्री करुणापूर्वक बोली—'सूर्यवंशयशोधर महाराज! आप ऐसा पाप न कीजिये। आप राक्षस नहीं, अयोध्याके सम्राट् हैं, रानी मदयन्तीके पति हैं। प्रभो! ये मेरे स्वामी मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम हैं, इन्हें न खाइये। शरणमें आये हुए दीन, दुःखी मनुष्योंको आप ही सहारा देनेवाले हैं। इन महात्मा पतिके बिना मेरा यह शरीर मेरे लिये महान् भार है। इस मलिन पापमय पांचभौतिक शरीरसे क्या सुख होगा? ये मुनिकुमार देखनेको बालक हैं; किंतु वेदोंके विद्वान्, शान्त, तपस्वी और अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता हैं। इन्हें प्राणदान देकर आपको सम्पूर्ण जगत्के रक्षा करनेका पुण्य होगा। महाराज! मैं ब्राह्मणकी स्त्री हूँ, अभी बालिका हूँ, मुझपर
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७३
कृपा कीजिये। आप-जैसे साधु पुरुष अनाथों, दीनों और पीड़ितोंपर कृपा करनेवाले होते हैं।'
इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भी उस निर्दयी, नर-भक्षी राक्षसने उस ब्राह्मणकुमारकी गर्दन मरोड़ डाली और उन्हें उदरस्थ कर लिया। तब वह पतिव्रता ब्राह्मणी अत्यन्त शोकसे ग्रस्त हो विलाप करने लगी। उसने पतिकी हड्डियोंको एकत्रित करके भयंकर चिता प्रज्वलित की और पतिका अनुसरण करनेके लिये अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षसरूपधारी राजाको इस प्रकार शाप दिया—'अरे ओ पापात्मन्! तूने मेरे पतिको खा लिया है, अतः तू भी जब स्त्रीसे समागम करेगा, उसी समय तेरी मृत्यु हो जायगी।' यों कहकर वह पतिव्रता स्त्री चिताकी आगमें प्रवेश कर गयी।
गुरुके शापका उपभोग करके राजा पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हुए और प्रसन्नतापूर्वक घरको गये। रानी मदयन्ती उस पतिव्रता ब्राह्मणीके शापको जानती थीं। इसलिये वैधव्यसे डरकर उन्होंने रतिकी इच्छावाले पतिको अपने पास आनेसे मना कर दिया। राजा मित्रसह राज्यके सुखभोगसे विरक्त हो गये और सम्पूर्ण लक्ष्मीका परित्याग करके पुनः वनमें चले गये। राज्य छोड़कर सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए राजाने अपने पीछे-पीछे आती हुई एक भयंकर रूपवाली पिशाचीको देखा। वह ब्रह्महत्या थी। श्रेष्ठ मुनियोंके उपदेशसे राजाने उस ब्रह्महत्याको पहचाना। उसके निवारणके लिये विरक्तचित्तवाले राजाने अनेक वर्षोंतक बहुत-से क्षेत्रोंमें विचरण किया। फिर भी जब ब्रह्महत्या निवृत्त नहीं हुई, तब वे मिथिलामें आये। इसी समय उधर आते हुए निर्मल अन्तःकरणवाले गौतम मुनिको उन्होंने देखा और उनके समीप जाकर बार-बार प्रणाम किया। तब मुनिश्रेष्ठ गौतमने राजाको आशीर्वाद दे मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—'राजन्! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? तुम्हारे राज्यमें कोई विघ्न-बाधा तो नहीं है?'
राजाने कहा—ब्रह्मन्! आपकी कृपासे हम सब लोग कुशलसे हैं; परंतु यह भयंकर रूपवाली पिशाची हमें बड़ा दुःख देती है। शापग्रस्त होकर हमने जो दुर्लङ्घ्य पाप कर डाला है, उसकी शान्ति सहस्रों प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं हो रही है। आप प्रेमपूर्वक सम्भाषण करके मेरे चित्तको आनन्दित कर रहे हैं। महाभाग! आज अपने चरणकमलोंकी शरणमें आये हुए मुझ पापीको शान्ति प्रदान कीजिये, जिससे मुझे सुख मिले।
तब करुणानिधि गौतमजीने कहा—राजेन्द्र! तुम्हें साधुवाद है? अब अपने महान् पापोंसे होनेवाले भयको त्याग दो। जब भगवान् शंकर रक्षा करनेवाले हैं, तब उनकी शरणमें आये हुए भक्तोंको कहाँसे भय हो सकता है? गोकर्ण नामक मनोरम क्षेत्र महापातकोंका संहार करनेवाला है। वहाँ बड़े-से-बड़े पाप भी नहीं टिक सकते। गोकर्ण क्षेत्रमें विद्यमान भगवान् शिव स्मरण करनेमात्रसे समस्त पापोंका नाश कर डालते हैं। जैसे कैलास और मन्दराचलके शिखरपर भगवान् शिवका निश्चित निवास है, उसी प्रकार गोकर्णमण्डलमें भी है। वहाँ महादेवजी महाबल नामसे निवास करते हैं। रावण नामक राक्षसने घोर तपस्या करके जिस शिवलिंगको प्राप्त किया था, उसीको गणेशजीने गोकर्ण क्षेत्रमें स्थापित किया है। सनक-सनन्दन आदि महात्मा तथा मृगचर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले साध्य एवं मुनिगण वहाँ बैठकर भगवान् शिवकी उपासना करते हैं। दण्डी, मुण्डी, स्नातक, ब्रह्मचारी तथा तपसे समस्त पातकोंको जला डालनेवाले महात्मा भी देवाधिदेव शिवकी उत्तम भक्तिसे उपासना करते हैं। इस ब्रह्माण्ड-मण्डलमें गोकर्णके समान दूसरा क्षेत्र नहीं है। वहाँ महात्मा अगस्त्य मुनिने घोर तपस्या की है। राजन्! इस तीर्थमें सम्पूर्ण देवताओंके स्थान हैं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु,
| ६७४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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परमेष्ठी ब्रह्मा, वीरवर कार्तिकेय तथा गणेशजीके स्थान हैं। गोकर्ण तीर्थमें कोटि-कोटि शिवलिंग विद्यमान हैं। वहाँ पग-पगपर असंख्य तीर्थ मौजूद हैं। सत्ययुगमें महाबल नामक भगवान् शिव श्वेतवर्णके होते हैं, त्रेतामें उनका रंग अत्यन्त लाल हो जाता है, द्वापरमें वे पीत वर्णके और कलियुगमें श्याम वर्णके हो जायँगे। महाबल शिव भयंकर कलियुग प्राप्त होनेपर कोमल भावको प्राप्त होंगे। परम उत्तम गोकर्ण क्षेत्र पश्चिम समुद्रके तटपर है। वह ब्रह्महत्या आदि पापोंको भस्म कर डालता है। इस संसारमें जो ब्रह्मघाती, भूतद्रोही, शठ और अन्यान्य पापी होते हैं, वे सब गोकर्ण तीर्थमें पहुँचकर वहाँके तीर्थोंमें स्नान करके महाबल नामक शिवजीका दर्शन करनेपर शिवलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँ पुण्य तिथियोंको पुण्य नक्षत्र एवं पुण्य दिनमें जो महेश्वर शिवकी पूजा करते हैं, वे सब शिवरूप हो जाते हैं। यदा-कदा जो कोई भी मनुष्य गोकर्ण तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। रविवार, सोमवार तथा बुधवारको जब अमावास्या तिथिका योग हो, तब वहाँ समुद्रमें किया हुआ | स्नान, दान, पितृतर्पण, शिवपूजा, जप, होम, व्रतचर्या और ब्राह्मणोंका सत्कार अनन्त फल देनेवाला होता है। महाप्रदोषकी बेलामें भगवान् शिवका पूजन मोक्ष देनेवाला है। माघ मास (फाल्गुन) में जो परम पुण्यमयी कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी आती है, उस दिन शिवलिंग और बिल्वपत्र इन सबका सुयोग दुर्लभ है। अहो! माया कैसी प्रबल है कि जिससे मूढ़ हुए मनुष्य भगवान् शिवकी इस महातिथिको उपवासतक नहीं करते। शिवरात्रिका उपवास, जागरण, भगवान् शंकरके समीप निवास तथा गोकर्ण क्षेत्रका वास इन सबका सुयोग होना मनुष्योंके लिये शिवलोकमें जानेकी सीढ़ी है। राजन्! मैं भी इस समय गोकर्ण तीर्थसे लौटकर आया हूँ। शिवरात्रिको उपवास करके भगवान् शिवका महोत्सव देखकर लौटा हूँ। शिवरात्रिपर वहाँका महान् उत्सव देखनेके लिये सब देशोंसे चारों वर्णोंके लोग आये थे। स्त्री, बालक, वृद्ध तथा चारों आश्रमोंके निवासी वहाँ आकर देवेश्वर शिवका दर्शन करके कृतकृत्यताको प्राप्त हुए। लौटते समय मार्गमें एक अद्भुत आश्चर्यकी बात देखकर मैं परमानन्दमें निमग्न हो कृतार्थ हो गया हूँ।
गोकर्ण क्षेत्रमें शिवरात्रिके शिव-पूजनके माहात्म्यसे एक चाण्डालीका परमधाम-गमन
राजाने पूछा— ब्रह्मन्! आपने मार्गमें कहाँ कौन-सी आश्चर्यकी बात देखी है, वह मुझे भी बताइये।
| गौतमजीने कहा— राजन्! गोकर्णसे आते समय एक स्थानपर दोपहरके समय मुझे एक स्वच्छ सरोवर दिखायी दिया। वहाँ जल पीकर मैंने रास्तेकी थकावट दूर की और घनी एवं शीतल छायावाले बरगदके नीचे विश्राम किया। | उसी समय थोड़ी ही दूरपर मैंने एक अन्धी, बूढ़ी एवं दुबली-पतली चाण्डालीको देखा। उसका मुँह सूख गया था। उसने कुछ भी भोजन नहीं किया था और वह अनेक प्रकारके रोगोंसे पीड़ित थी। उसके सब अंगोंमें कोढ़का घाव हो गया था तथा उसमें बहुत-से कीड़े पड़ गये थे। उसकी कमरमें पीब और रक्तसे सना हुआ एक फटा-पुराना वस्त्र लिपटा हुआ था। उसे |
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- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७५
उस दशामें देखकर मुझे बड़ी दया आयी और उसके मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ मैं क्षणभर वहीं बैठा रहा। इतनेहीमें भगवान् शंकरके पार्षदोंद्वारा लाया जाता हुआ एक विमान देखा, जो अपनी किरणोंसे आकाशमार्गको आलोकित कर रहा था। तब मैंने शीघ्र ही समीप जाकर आकाशमें खड़े हुए उन शिवगणोंसे पूछा—'आपलोगोंको नमस्कार है। मैंने आपलोगोंको पहचान लिया है। आप सभी महादेवजीके चरणोंके सेवक हैं। आपने इस समय जो यहाँ आनेका कष्ट उठाया है, यह आपकी यात्रा सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये हुई है या आपलोगोंको कोई विनोद सूझा है? कृपा करके मुझे बतलाइये। आप यहाँ किसलिये पधारे हैं?'
शिवजीके दूत बोले—मुने! यह सामने जो बूढ़ी चाण्डाली मर रही है, इसीको ले जानेके लिये भगवान् शिवने हमें आदेश दिया है।
यह सुनकर मैंने पूछा—अहो! यह महापापात्मा घोर चाण्डाली इस दिव्य विमानपर बैठनेकी अधिकारिणी कैसे हो सकती है? यह तो जन्मसे लेकर जीवनभर प्रायः अपवित्रतामें ही डूबी रही है। पापमग्ना एवं पापका अनुगमन करनेवाली है। इस दुराचारिणीको आपलोग शिवलोकमें क्यों ले जाना चाहते हैं? इसने कभी शिवजीका पंचाक्षर मन्त्र नहीं जपा, शिवजीका पूजन नहीं किया और न कभी भगवान् शंकरका ध्यान ही किया है? सत्संगसे सदा दूर रहनेवाली इस अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाली स्त्रीको आपलोग भगवान् शिवके लोकमें कैसे ले जाना चाहते हैं। अहो! ईश्वरकी इस लीलाका रहस्य देहधारियोंकी समझमें आना कठिन है, जिसमें पापात्मा प्राणी भी दया करके परम पदमें पहुँचाये जाते हैं।
मेरे ऐसा कहनेपर देवाधिदेव भगवान् शिवके दूत इस प्रकार बोले—महामते! यह कर्मोंके परिपाकसे प्राप्त होनेवाली गति देखो, जो कि एक नीच-से-नीच नारी भी आज रोग-शोकसे रहित परम धामपर आरूढ़ हो रही है। इसने पूर्वजन्ममें अन्न-दान आदि नहीं किया था, अतः भूख-प्यास आदि क्लेशोंसे यहाँ पीड़ित हो रही है। इसने जो मदिराके नशेमें अन्धी होकर बड़ा भयंकर पाप कर डाला था, उसीके फलसे यह जन्मान्ध हो गयी। पूर्वजन्ममें इसने जान-बूझकर गायके बछड़ेको खाया था, इसलिये इस जन्ममें यह अतिशय निन्दित चाण्डाली हुई। इसने सदाचारका मार्ग त्यागकर पूर्वजन्ममें व्यभिचारके मार्गको अपनाया था, उसी अकथनीय पापसे इस जन्ममें यह दुराचारिणी और दुर्भाग्यवती हुई। विधवा होकर भी इसने दूसरे पतिका आलिंगन किया, उसी महान् पापके कारण इसके शरीरमें कोढ़के बहुत-से घाव हो गये हैं। इसने कामवेदनासे व्याकुल होकर स्वेच्छानुसार शूद्रसे रमण किया, उस पापके कारण इसे महारक्त पीब और कीड़ोंसे पीड़ित होना पड़ा है। इसने कभी उत्तम व्रतोंका पालन नहीं किया, यज्ञपूजा नहीं की, कुआँ आदि खुदवाने या बगीचे लगानेका काम नहीं किया, उसी पापसे यह सब प्रकारके भोग-साधनोंसे रहित होकर दुःख पा रही है। पूर्वजन्ममें इस मूढ़ स्त्रीने मदिरा-पान किया था, उसी पापसे यह महायक्ष्माकी पीड़ा और हृदय-शूलसे तड़प रही है। मुनिश्रेष्ठ! विवेकी महात्मा यहींपर सब मनुष्योंमें उनके सम्पूर्ण पापचिह्न देखते हैं। यहाँ जो बहुतसे रोगोंद्वारा पीड़ित और पुत्र तथा धनसे हीन हैं, जो दुष्ट लक्षणोंसे क्लेश पानेवाले और लाज छोड़कर भीख माँगनेवाले हैं, वस्त्र, अन्न, पान, शय्या, भूषण और अभ्यंग आदिसे वंचित, कुरूप, विद्याहीन, विकल अंगोंवाले (लूले-लँगड़े आदि), कुत्सित भोजन करनेवाले, दुर्भाग्यवान्, निन्दित तथा दूसरोंके सेवक हैं—ये सभी पूर्वजन्ममें बड़े भारी पापी रहे हैं। इस प्रकार यत्नपूर्वक विचार करके और संसारके मनुष्योंकी
६७६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
दशा देखकर विद्वान् पुरुष कभी पाप नहीं करता। यदि करे तो वह आत्मघाती है। जीवका यह मनुष्य-शरीर अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका एकमात्र साधन है। इसके द्वारा सदा शुभ कर्मोंका ही सेवन करे। पापकर्मोंको सर्वथा एवं सर्वदा त्याग दे। सुखकी इच्छा रखनेवालेको पुण्य करना चाहिये। मनुष्यका यह शरीर अत्यन्त दुर्लभ है। इसे पाकर जो कोई भी अपना हित चाहनेवाला मानव एकमात्र भगवान् शिवकी शरण लेता है, एकचित्त होकर उन्हींका ध्यान करता है, वह समस्त पातकोंसे तर जाता है। पहले इस दुराचारिणी स्त्रीके मुखसे असावधानीमें शिवजीका नाम उच्चारित हुआ है। श्रीगोकर्ण क्षेत्रमें शिवरात्रिको उपवास करके रातमें इसने जागरण किया और शिवजीके मस्तकपर बिल्वपत्र चढ़ाया है। उसीका जो उत्तम फल है, उसे यह आज भोगने जा रही है। यह सब तुम अपनी आँखों देखते हो।
गौतमजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कहकर उन शिवदूतोंने उस चाण्डालकी योनिसे जीवको खींचकर उसे दिव्य तेजसे सम्पन्न कर दिया। तेजकी राशिसे उद्भासित हो उठी। तत्पश्चात् शिवके दूतोंने प्रसन्न होकर उसे विमानपर बैठाया। वह परम उदाररूप और लावण्यसे सुशोभित तथा दिव्य वस्त्र धारण करनेवाली हो गयी। उसकी देहसे सब ओर दिव्य सुगन्ध और दिव्य प्रकाश फैल रहे थे। वह विमानपर बैठी हुई शिवजीके चरणारविन्दोंका स्मरण कर रही थी। उसे वे पार्षद भगवान् महादेवजीके समीप ले गये। उस समय सब लोकपाल आश्चर्यचकित होकर यह सब देख रहे थे। राजन्! गिरिजापति भगवान् शंकरके प्रति लेशमात्र भक्तिका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक माहात्म्य मैंने तुम्हें बताया है, जो समस्त पापराशिका विनाश करनेवाला है।
राजाने पूछा—भगवन्! परमेश्वर शिवका उत्तम लोक कैसा है। यदि आपकी मुझपर दया है तो मुझे शिवलोकका लक्षण बतलाइये।
गौतमजी बोले—ब्रह्मा आदि देवेश्वरोंके लोकोंमें भी जो अत्यन्त दुर्लभ आनन्द है, वह जिस दिव्य धाममें नित्य-निरन्तर विद्यमान रहता है, वही परमेश्वर शिवका लोक है। जहाँ सब लोकोंको लाँघकर जाना होता है, जिसमें दिव्य प्रकाश स्थित है तथा जहाँ अविद्यामय अन्धकारका कहीं लेशमात्र भी संयोग नहीं है, वही परमेश्वर शिवका लोक है। जहाँ काम, क्रोध, लोभ और मद आदि विकार निवास नहीं करते तथा जहाँ जन्म आदि अवस्थाएँ नहीं प्राप्त होतीं, वह परमेश्वर शिवका लोक है। सम्पूर्ण वेदोंका जो एकमात्र प्रधान क्षेत्र कहा जाता है, जिससे अधिक उत्तम वैभव कहीं नहीं है, वह परमेश्वर शिवका धाम है। वहाँ जानेके लिये योगीजन सदा आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान आदि साधनोंसे युक्त योगमार्गका सहारा लेकर प्रयत्न करते रहते हैं। जो लोग भगवान् शिवकी भक्तिसे परिपूर्ण हैं, वे ही
(चित्र-परिचय: उस नारीको दिव्य शरीरकी प्राप्ति हुई और वह)
| * ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * | ६७७ |
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उस दिव्य धाममें जाते हैं। जो भगवान् शंकरकी कथा सुनने और कहनेमें हर्षका अनुभव करते हैं, केवल शान्तिमें जिनकी स्थिति है, जो सब प्राणियोंके अकारण सुहृद् और मोहरहित हैं, वे संसारचक्रको लाँघकर भगवान् शंकरके आनन्दमय धामको पाकर सुखी होते हैं। राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी गोकर्ण क्षेत्रमें भगवान् शंकरके स्थानपर जाकर उनके दर्शनसे समस्त पापराशिका निवारण करो और कृतकृत्य हो जाओ। वहाँ सब समयमें स्नान करके महाबल शिवकी पूजा करो और शिवचतुर्दशीको एकाग्रतापूर्वक उपवास करके रात्रिमें जागरण तथा बिल्वपत्रद्वारा भगवान् शंकरका पूजन करो। इससे तुम सब पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त करोगे। ऐसा कहकर मुनिवर गौतम प्रसन्नतापूर्वक मिथिलापुरीको चले गये तथा राजा मित्रसह गोकर्ण क्षेत्रमें आये। वहाँ महाबल नामसे प्रसिद्ध महादेवजीका दर्शन और पूजन करनेसे उनकी समस्त पापराशि धुल गयी। उन्होंने भगवान् शिवके परमधामको प्राप्त कर लिया। जो मनुष्य भगवान् शिवकी इस मनोहर कथाको प्रतिदिन भक्तिपूर्वक सुनता अथवा सुनाता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है।
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शिव-पूजाकी महिमाके विषयमें परम शिवभक्त राजा चन्द्रसेन और भक्त श्रीकर गोपकी अद्भुत कथा
सूतजी कहते हैं—भगवान् शिव गुरु हैं, शिव देवता हैं, शिव ही प्राणियोंके बन्धु हैं, शिव ही आत्मा और शिव ही जीव हैं। शिवसे भिन्न दूसरा कुछ नहीं है*। भगवान् शिवके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान, जप और होम किया जाता है, उसका फल अनन्त बताया गया है। यह समस्त शास्त्रोंका निर्णय है। जो एकमात्र भगवान् शिवका भजन करता है, वह सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो प्रीति अपने पुत्र, स्त्री और धनमें की जाती है, वही यदि भगवान् शिवकी पूजामें की जाय तो वह उद्धार कर देती है। इसलिये कितने ही महात्मा पुरुष भगवान् शिवकी पूजाके लिये सम्पूर्ण विषयरूपी मदिराको छोड़ देते हैं। वही जिह्वा सफल है, जो भगवान् शिवकी स्तुति करती है। वही मन सार्थक है, जो शिवके ध्यानमें संलग्न होता है। वे ही कान सफल हैं, जो उनकी कथा सुननेके लिये उत्सुक रहते हैं और वे ही दोनों हाथ सार्थक हैं, जो शिवजीकी पूजा करते हैं। वे नेत्र धन्य हैं, जो महादेवजीकी पूजाका दर्शन करते हैं। वह मस्तक धन्य है, जो शिवके सामने झुक जाता है। वे पैर धन्य हैं, जो भक्तिपूर्वक शिवके क्षेत्रोंमें सदा भ्रमण करते हैं। जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ भगवान् शिवके कार्योंमें लगी रहती हैं, वह संसारसागरके पार हो जाता है और भोग तथा मोक्ष प्राप्त कर लेता है। शिवकी भक्तिसे युक्त मनुष्य चाण्डाल, पुल्कस, नारी, पुरुष अथवा नपुंसक कोई भी क्यों न हो तत्काल संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है†। जिसके हृदयमें भगवान् शिवकी
* शिवो गुरुः शिवो देवः शिवो बन्धुः शरीरिणाम्। शिव आत्मा शिवो जीवः शिवादन्यन्न किञ्चन॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ४। १)
† सा जिह्वा या शिवं स्तौति तन्मनो ध्यायते शिवम्। तौ कर्णौ तत्कथालोलौ तौ हस्तौ तस्य पूजकौ॥
ते नेत्रे पश्यतः पूजां तच्छिरः प्रणतं शिवे। तौ पादौ यौ शिवक्षेत्रं भक्त्या पर्यटतः सदा॥
यस्येन्द्रियाणि सर्वाणि वर्तन्ते शिवकर्मसु। स निस्तरति संसारे भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति॥
शिवभक्तियुतो मर्त्यश्चाण्डालः पुल्कसोऽपि च। नारी नरो वा षण्ढो वा सद्यो मुच्येत संसृतेः॥
(स्क० पु०, ब्रा० ब्रह्मो० ४। ७—१०)
६७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लेशमात्र भी भक्ति है, वह समस्त देहधारियोंके लिये वन्दनीय है।
उज्जयिनीमें चन्द्रसेन नामक एक राजा थे। वे उसी नगरमें निवास करनेवाले भगवान् महाकालका पूजन करते थे। शिवके पार्षदोंमें अग्रगण्य तथा अमंगलोंको जीतनेवाले विश्ववन्दित मणिभद्रजी राजा चन्द्रसेनके सखा हो गये थे। उन्होंने राजापर प्रसन्न होकर एक समय उन्हें दिव्य चिन्तामणि प्रदान की, जो कौस्तुभमणि तथा सूर्यके समान देदीप्यमान थी। वह देखने, सुनने अथवा ध्यान करनेपर भी मनुष्योंको मनोवांछित वस्तु प्रदान करती थी। राजा उस चिन्तामणिको कण्ठमें धारण करके जब सिंहासनपर बैठते थे, तब देवताओंमें सूर्यनारायणकी भाँति उनकी शोभा होती थी। राजा चन्द्रसेनके विषयमें यह सब बात सुनकर समस्त राजाओंके मनमें उस मणिके प्रति लोभकी मात्रा बढ़ गयी और वे क्षुब्ध रहने लगे। एक बार उन सबने बहुत-सी सेना साथ लेकर क्रोधपूर्वक पृथ्वीको कम्पित करते हुए आक्रमण किया और उज्जयिनीके चारों द्वारोंको घेर लिया। अपनी पुरीको घिरी हुई देख राजा चन्द्रसेन भगवान् महाकालकी शरणमें गये और मनको सन्देहरहित करके दृढ़ निश्चयके साथ उपवासपूर्वक दिन-रात अनन्यभावसे भगवान् गौरीपतिकी आराधना करने लगे। उन्हीं दिनों उस नगरमें कोई ग्वालिन रहती थी, जिसके एकमात्र पुत्र था। वह विधवा थी और उज्जयिनीमें बहुत दिनोंसे रहती थी। वह अपने पाँच वर्षके बालकको लिये हुए महाकालके मन्दिरमें गयी और राजा चन्द्रसेनद्वारा की हुई गिरिजापतिकी महापूजाका दर्शन किया। शिवपूजनका वह आश्चर्यमय उत्सव देखकर उसने भगवान्को प्रणाम किया और पुनः अपने निवासस्थानपर लौट आयी। ग्वालिनके उस बालकने भी वह सारी पूजा देखी थी। अतः घर आनेपर उसने कौतूहलवश शिवजीकी पूजा प्रारम्भ की, जो संसारसे वैराग्य प्रदान करनेवाली है। एक सुन्दर पत्थर लाकर उसे घरसे थोड़ी ही दूरपर एकान्त स्थानमें रख दिया और उसीको शिवलिंग माना। फिर अपने हाथसे मिलने लायक जो कोई भी फूल दिखायी दिये, उन सबका संग्रह करके उस बालकने जलसे शिवलिंगको स्नान कराया और भक्तिपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् कृत्रिम अलंकार, चन्दन, धूप, दीप और अक्षत आदि उपचारोंसे अर्चना करके मनःकल्पित दिव्य वस्तुओंसे भगवान्को नैवेद्य निवेदन किया। सुन्दर-सुन्दर पत्रों और फूलोंसे बार-बार पूजा करके भाँति-भाँतिसे नृत्य किया और बारंबार भगवान्के चरणोंमें सीस झुकाया। इस प्रकार अनन्यचित्त होकर शिवकी आराधनामें लगे हुए अपने पुत्रको ग्वालिनने बड़े प्यारसे भोजनके लिये बुलाया। उसका मन तो पूजामें लगा हुआ था, माताके बहुत बुलानेपर भी उसे भोजन करनेकी इच्छा न हुई। तब उसकी माँ स्वयं उसके पास गयी और उसे शिवके आगे आँख बंद करके ध्यान लगाये बैठा देख हाथ पकड़कर खींचने लगी। इतनेपर भी जब वह न उठा, तब उसने क्रोधमें आकर उसे खूब पीटा। खींचने और मारने-पीटनेपर भी जब उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने वह शिवलिंग उठाकर दूर फेंक दिया और उसपर चढ़ायी हुई सारी पूजा-सामग्री नष्ट कर दी। यह देख बालक 'हाय-हाय' करके रो उठा। रोषमें भरी हुई ग्वालिन अपने बेटेको डाँट-डपटकर पुनः घरमें चली गयी। भगवान् शिवकी पूजाको माताके द्वारा नष्ट की हुई देखकर वह बालक 'देव! देव! महादेव!' की पुकार करते हुए सहसा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा प्रवाहित हो रही थी। दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ, तब उसने
- ब्राह्मखण्ड-ब्रह्मोत्तरखण्ड * ६७९
आँखें खोलीं और देखा—उसका वही निवासस्थान परम सुन्दर शिवालय हो गया था। मणियोंके खम्भे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके द्वार, किवाड़ तथा सदर फाटक सब सुवर्णमय हो गये थे। वहाँकी भूमि बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरोंकी वेदिकाओंसे सुशोभित थी। यह सब देखकर वह सहसा उठा और हर्षसे परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। उसने समझ लिया कि यह सब शिवजीकी पूजाका माहात्म्य है। उसीके प्रभावसे यह दिव्य विभूति प्रकट हुई है। तत्पश्चात् उस बालकने अपनी माताके अपराधकी शान्तिके लिये पृथ्वीपर मस्तक रखकर साष्टांग प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'देव! उमापते! मेरी माताका अपराध क्षमा कीजिये। वह मूढ़ है, आपके प्रभावको नहीं जानती है। शंकर! आप उसपर प्रसन्न होइये, यदि मुझमें आपकी भक्तिसे उत्पन्न हुआ कुछ भी पुण्य है, तो उससे मेरी माता आपकी दया प्राप्त करे।'
इस प्रकार भगवान् शंकरको बार-बार प्रसन्न करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर सूर्यास्तके समय वह बालक शिवालयसे बाहर निकला और उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रनगरके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र वैभवसे प्रकाशित होने लगा। भवनके भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ बहुमूल्य रत्नमय पलंगपर बिछी हुई श्वेत रंगकी शय्यापर निर्भय होकर सो रही है और उसीको याद करती है। उसने माताको जगाया। ग्वालिन बड़े वेगसे उठी और अपनेको, अपने पुत्रको तथा अपने घरको भी अपूर्व रूपमें देखकर आनन्दसे विह्वल हो गयी। पुत्रके मुखसे गिरिजापति शंकरका वह सब प्रसाद सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीके सन्तोषसे प्रकट हुआ था, देखा। सुवर्णमय शिव-मन्दिर, रत्नमय शिवलिंग तथा सुन्दर मणि-माणिक्योंसे जगमगाता हुआ ग्वालिनका महल देखकर राजा चन्द्रसेन पुरोहित और मन्त्रियोंके साथ दो घड़ीतक आश्चर्य-चकित हो परमानन्दमें डूबे रहे। तत्पश्चात् उन्होंने नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते हुए ग्वालिनके उस बालकको हृदयसे लगा लिया। भगवान् शिवके इस अद्भुत माहात्म्यकी चर्चा समस्त पुरवासियोंमें बड़े वेगसे फैली और यही कहते-सुनते वह रात मानो क्षणभरमें व्यतीत हो गयी।
युद्धके लिये आये हुए और नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल दूतोंके मुखसे यह परम अद्भुत समाचार सुना। सुनते ही उनके मनसे वैरभाव निकल गया। उन्होंने सहसा हथियार डाल दिये और चकित होकर महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञासे नगरमें प्रवेश किया। उस रमणीय नगरीमें प्रवेश करके भगवान् महाकालको प्रणाम करनेके पश्चात् सब राजा उस ग्वालिनके घरपर आये। वहाँ राजा चन्द्रसेनने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। वे बहुमूल्य आसनोंपर बैठे और प्रीतिपूर्वक विस्मित एवं आनन्दित हुए। गोप-बालकपर कृपा करनेके लिये स्वतः प्रकट हुए शिवालय और शिवलिंगका दर्शन करके सब राजाओंने भगवान् शिवको अपनी उत्तम बुद्धि समर्पित की, उनमें भक्तिपूर्वक मन लगाया।
इसी समय सब देवताओंसे पूजित परम तेजस्वी वानरराज हनुमान्जी वहाँ प्रकट हुए। उनके आते ही सब राजाओंने बड़े वेगसे उठकर भक्तिभावसे विनीत हो उन्हें नमस्कार किया। तब हनुमान्जीने कहा—'राजाओ! भगवान् शिवकी पूजाके सिवा देहधारियोंके लिये दूसरी कोई गति नहीं है। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस गोप-बालकने शनिवारको प्रदोषव्रतके दिन बिना
६८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मन्त्रके भी शिवका पूजन करके उन्हें पा लिया। शनिवारको प्रदोषव्रत समस्त देहधारियोंके लिये दुर्लभ है। कृष्ण पक्ष आनेपर तो वह और भी दुर्लभ है। गोपवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाला यह बालक संसारमें सबसे अधिक पुण्यात्मा है। इसकी वंश-परम्परामें आठवीं पीढ़ीमें महायशस्वी नन्द उत्पन्न होंगे, जिनके यहाँ साक्षात् भगवान् नारायण उनके पुत्ररूपसे प्रकट हो श्रीकृष्णके नामसे प्रसिद्ध होंगे। आजसे यह गोपालनन्दन संसारमें 'श्रीकर' नामसे विख्यात होगा।'
अंजनिनन्दन हनुमान्जी ऐसा कहकर उस गोपबालकको शिवोपासनाके आचार-व्यवहारका उपदेश दे वहीं अन्तर्धान हो गये। वे सब राजा हर्षमें भरकर महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञा ले जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। महातेजस्वी श्रीकर भी हनुमान्जीका उपदेश पाकर धर्मज्ञ ब्राह्मणोंके साथ शंकरजीकी आराधना करने लगा। समयानुसार भक्त श्रीकर गोप तथा राजा चन्द्रसेन दोनोंने भक्तिपूर्वक शिवकी आराधना करके परम पद प्राप्त किया। यह परम पवित्र उपाख्यान कहा गया। यह गोपनीय रहस्य है, सुयश एवं पुण्यसमृद्धिको बढ़ानेवाला है तथा गौरीपति भगवान् शिवके चरणारविन्दोंमें भक्तिभावकी वृद्धि और पापराशिका निवारण करनेवाला है।
प्रदोषमें शिवपूजनकी अवहेलनासे दोषकी प्राप्तिके प्रसंगमें विदर्भराज और उसके पुत्रकी कथा
सूतजी कहते हैं— त्रयोदशी तिथिमें सायंकाल प्रदोष कहा गया है। प्रदोषके समय महादेवजी कैलासपर्वतके रजतभवनमें नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणोंका स्तवन करते हैं। अतः धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रदोषमें नियमपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा, होम, कथा और गुणगान करने चाहिये। दरिद्रताके तिमिरसे अन्धे और भवसागरमें डूबे हुए संसारभयसे भीरु मनुष्योंके लिये यह प्रदोषव्रत पार लगानेवाली नौका है। भगवान् शिवकी पूजा करनेसे मनुष्य दरिद्रता, मृत्यु-दुःख और पर्वतके समान भारी ऋण-भारको शीघ्र ही दूर करके सम्पत्तियोंसे पूजित होता है।
विदर्भ देशमें सत्यरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जो सब धर्मोंमें तत्पर, धीर, सुशील और सत्यप्रतिज्ञ थे। धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करते हुए उनका बहुत-सा समय सुखपूर्वक बीत गया। तदनन्तर शाल्व देशके राजाओंने विदर्भनगरपर आक्रमण करके उसे चारों ओरसे घेर लिया। अपनी पुरीको शत्रुओंसे घिरी हुई देख विदर्भराज विशाल सेना साथ लेकर युद्धके लिये आये। बलोन्मत्त शाल्वदेशीय क्षत्रियोंके साथ राजाका अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ। शाल्वोंकी बहुत बड़ी सेना मारी गयी; परंतु अन्तमें विदर्भराज भी उनके हाथसे मारे गये। मन्त्रियोंसहित उस महारथी वीर राजाके मारे जानेपर मरनेसे बचे हुए सैनिक भाग खड़े हुए। उस समय विदर्भराज सत्यरथकी एक पतिव्रता स्त्री अत्यन्त शोकग्रस्त हो रातके समय राजभवनसे निकलकर पश्चिम दिशाकी ओर चली गयी। वह गर्भवती थी। सबेरा होनेपर धीरे-धीरे मार्गसे जाती हुई उस साध्वी रानीने बहुत दूरका रास्ता तय कर लेनेके पश्चात् एक स्वच्छ तालाब देखा और वह उसके किनारे शोभा पानेवाले एक छायादार वृक्षके नीचे बैठ गयी। भाग्यवश उसी निर्जन स्थानमें वृक्षके ही नीचे पतिव्रता रानीने उत्तम गुणोंसे युक्त शुभ