भारतकोश
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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ
६६सौंदर्य लहरी

अर्थः— कटि पर क्कण क्कण शब्द करने वाले घूंघुरुओं युक्त मेखला बांधे हुए, हाथी के बच्चे के मस्तक पर निकले हुए कुंभ सदृश स्तनों के भार से झुकी हुई, मध्य भाग में पतली, शरद ऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे मुख वाली, चारों हाथों में धनुष, ५ बाण, पाश, और अंकुश धारण किये पुरारि की आहो पुरुषिका हमारे सामने (ध्यान में) रहें ।

सं० टि० आहो पुरुषिका= पुरमथितुः शिवस्य अहंकार रूपा । त्रिपुरारि अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों से अतीत ब्रह्म स्वरूप में अहम् विमर्ष का व्युत्थान होना यहां अभिप्रेत है । इस श्लोक से ब्लूँ बीज ग्रहण किया जाता है, बाण से ब्, करतल से लू, मथितुः से उ और आस्तां से अनुस्वार ।

देवताओं का ध्यान खडी हुई स्थिति में किया जाता है, इसलिये सनातन धर्मावलंबियों के मंदिरों में खडी मूर्तियां प्रतिष्ठित की जाती हैं । इसका अर्थ यह है कि खडी स्थिति में उपासक की दृष्टि चरणों पर पडती है और बैठी हुई मूर्ति के मुख पर । ध्यान चरणों का ही अभीष्ट है, पूजन भी चरणों का ही करना चाहिये ।

पुरारि या त्रिपुरारि शंकर को कहते हैं । जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीन पुर हैं, शंकर तीनों अवस्थाओं के बैरी है, क्योंकि वे सदा समाधिस्थ रहते हैं। मोक्ष ब्रह्म लीनता का नाम है, ब्राह्मी अवस्था में समस्त तीनों लोकों का एवं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का लय हो जाता है । कहा है:—

सौन्दर्य लहरी ८९


न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो नो महदादयोऽमी
न प्राणबुद्धीन्द्रिय देवतावा न सन्निवेशः खलुलोक कल्पः ।
न स्वप्न जागर्र्न हितत्सुषुप्तं नखंजलंभूरनिलोऽग्निरर्कः
संमुप्त वच्छून्य वदप्रतर्क्यं तन्मूलभूतं पदमामनन्ति ॥
श्रीमद्भागवत ।

अर्थः— जहां न वाक शक्ति है, न मन, न सत्व, तमोगु रजोगु न ये महदादि हैं। न कर्मेन्द्रियों अथवा ज्ञानेन्द्रियों के देवता हैं और निश्चय ही न लोकों की कल्पना रूपी प्रतीति । न वह स्वप्न है न जाग्रत और सुषुप्ति, न वहां आकाश, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि या सूर्य है । सुषुप्तिवत् शून्यवत् अप्रतर्क्य ही व मूल-भूतपद है ।

आहोपुरुषिका पद भगवती के लिये प्रयुक्त किया गया है।

माया का<br>बन्धनआहो आश्चर्य सूचक पद है, और पुरुषिका पुरुष का स्त्रीलिंग भाव वाचक पद है । अर्थात भगवती का रूप आश्चर्यमय है। आत्मा प्रकृति से असंग

है, असंगोऽयमात्मा यह सांख्य वेदान्त का मूल सिद्धान्त है। परन्तु उपाधि से उस ही में संसारी जीवात्मशक्ति का भी भाव है। भगवान् ने उसे परा प्रकृति इसी नाते कहा है।

अपरेयमितस्त्वन्यां विद्धि मे प्रकृतिं परां ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ गीता (७,५)

जैसे स्फटिक के ऊपर सन्निधि में आये हुए पदार्थों के रंग की छाया पडकर उसे अपने रंग से रंजित कर देती है, वैसे ही

३० सौंदर्य लहरी


आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से संसारी पुरुष दिखने लगता है । पुरुषिका पद में यह ही भाव निहित है । माया कला के स्तर पर काल, कला, नियति, विद्या और राग इन पांच कंचुकों के आवरणों से स्फटिक सदृश आत्मतत्त्व सोपाधिक होने पर प्रकृति के रंग में रंगा हुआ दिखने लगता है, और भगवती महामाया मनरूपी इक्षु धनुष पर, जिस पर संकल्प रूपी भौरों की प्रत्यंचा चढी है, शब्द-स्पर्श रूपरस गंधात्मक पांच विषय रूपी बाणों को चढाकर पुरुष का आखेट करती है, राग रूपी पाश से बांधती है और क्रोध रूपी अंकुश से ताडन करती है । परन्तु उसका अंकुश भी मां का क्रोध होने के कारण खांड का बना हुआ है । इस प्रकार वह पुरुष को अपरा प्रकृति के स्तर पर बांध देती है । इक्षु मधुर रस से भरा रहता है, इसलिये आनन्द रस के भोगी मन को इक्षु धनुष से उपमित किया गया है, मन में सदा संकल्प विकल्प रूपी भौंरे उडते रहते हैं, उनको धनुष की प्रत्यंचा से उपमा दी गई है । जैसे वे पुष्पों के मकरन्द की कामना से आकाश में गुंजारते रहते हैं, वैसे ही मन की संकल्पात्मिका वृत्तियां विषयों की वासना से चित्ताकाश को प्रतिध्वनित करती हुई उडती रहती हैं । पांचों ज्ञानेन्द्रियों से संबंधित ५ प्रकार के विषय शब्द स्पर्श रूप रस गंधात्मक पांच पुष्प बाण हैं । राग अर्थात् आसक्ति रूपी ही वह पाश है जिससे सारा जगत् बंधा पडा है, क्रोध अथवा द्वेष प्रकृति का अंकुश है, जिससे विद्ध कर मनुष्य कौनसा पाप-कर्म करने को बाध्य नहीं हो जाता । इस प्रकार पुरुष को पशु के सदृश वश में रखकर उससे प्रकृति अपने सृष्टि क्रम का कार्य कराती है । भौरों

सौंदर्य लहरी ९१

की प्रत्यंचा पर चढ़े हुए उपरोक्त पांच पुष्प बाण वाला इक्षु धनुष कामदेव का भी अस्त्र है, और कामिनी स्त्री स्वयं शक्ति का ही रूप है। इसलिये कामी मनुष्यों को भोगासक्ति में फंसाने के लिये मानो महामाया ने अपना ही धनुष कामदेव को दे दिया है, क्योंकि बिना ऐसे अस्त्र के भगवान् का सनातन अंश बंधन में नहीं आ सकता था।

भगवान् की लीला विचित्र है, अपनी ही शक्ति से वह स्वयं ही बंध जाता है। पारमार्थिक दृष्टि से वह स्वयं स्त्री है और स्वयं पुमान्, आत्म तत्त्व में लिंग भेद का भाव नहीं। वह स्वयं माया है और स्वयं मायावी, स्वयं नट है और स्वयं दर्शक, स्वयं ईश्वर है और स्वयं दास। कृष्ण राधा है और राधा कृष्ण, राम सीता है और सीता राम, शिव शक्ति है और शक्ति स्वयं शिव। इसी प्रकार आप ही रति है और आप ही काम।

सब प्राणि मात्र का अन्तरात्मा एक ईश्वर स्वयं ही है, जो एक रूप से अनेक हो रहा है, जैसा कि उसका आदि संकल्प था, एकोऽहम् बहुस्यां प्रजायेयेति ।

इस लिये साधक जनों को महामाया के आखेट से बचने के लिये कामिनी के काम बाणों से बचना चाहिये और भगवती के चरणों का हृदय में ध्यान करना चाहिये। और

पर तिय ककार तजहु गुसाईं। ज्यों चौथ चन्दा की नाईं ॥ तुलसीदास

क्योंकि, विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।

९२ सौंदर्य लहरी

भगवती के नीचे के वाम हस्त में पाश, और ऊपर के वाम हाथ में धनुष, दक्षिण हाथों में नीचे अंकुश और ऊपर ५ बाण हैं।

अगले श्लोक में भगवती के ध्यान के लिये पीठ का वर्णन किया गया है।

[ ८ ]

सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे।
शिवाऽऽकारे मंचे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥

**कठिन शब्दोंका अर्थ:—**शिवाकारे=त्रिकोणाकृति, निलय=आलय

अर्थ:— सुधा के समुद्र के मध्य, कल्प वृक्षों की वाटिका से घिरे हुए मणि द्वीप में, नीप वृक्षों के उपवन के बीच चिन्ता-मणियाँ के बने घर में, त्रिकोणाकृति मंच पर, परम शिव के पलंग पर विराजमान चिदानन्द लहरी स्वरूप तेरा, कोई बिरले मनुष्य भजन करते हैं, वे धन्य हैं।

सं० टि० शिवाकारे=शिव+आकारे अथवा शिवा+आकारे । यहां हृदय में आनन्दावेष की अनुभूति की ओर लक्ष्य कराया गया है। ॐ कार में अ+उ+म्+नाद+बिन्दु+शान्ति ( कला )+शान्त्यातीता सात मात्रा मानी जाती हैं। अ ब्रह्मा, उ विष्णु, म् रुद्र, नाद ईश्वर,

सौन्दर्य लहरी ९३


बिन्दु सदाशिव, शान्ति शक्ति और शान्त्यातीत शिव हैं । प्रथम चार मंच के चार पाये, बिन्दु चद्दर, और शिवाकार मंच पर विराजने वाली चिदानन्द लहरी, अथवा परम शिव पर्यंकनिलया चिदानन्द लहरी है ।

भगवती के भजन से प्राप्त चिदानन्द के आवेशों का अनुभव करने वाले साधक थोडे ही होते हैं। वे वास्तव में धन्य हैं जिन पर भगवती की ऐसी कृपा होती है भगवती का ध्यान परम शिव के साथ करना चाहिये, यह बात पूर्व श्लोकोक्त पुरमथितुराहो-पुरुषिका पद से भी प्रगट होती है । सत्य बात तो यह ही है कि सच्चिदानन्द के आनन्दावेशों की अनुभूति में स्वयं भगवती की ही कृपा की अनुभूति है, अर्थात् परम ब्रह्म के शून्य अव्यक्त सत्स्वरूप आकाश में शून्य रूपी पलंग पर चिदानन्द की लहरी विराजती है । पलंग एक त्रिकोण मंच पर बिछा हुआ है, मंच चिन्तामणियों के बने हुए घर में स्थित है, घर के चारों ओर नीप वृक्षों का उपवन है, वह उपवन एक मणियों के द्वीप पर लगाया गया है । द्वीप के चारों किनारों पर कल्पवृक्षों का घेरा है, और वह द्वीप अमृत के समुद्र में स्थित है । ऐसा भगवती के रहने का स्थान है ।

निःस्पन्द परम शिव आनन्द ब्रह्म परं पद सुधासिंधु है, और चिदानन्द लहरी स्वयं चिति शक्ति है । जिसका स्थान सहस्रार पद्म में हैं। सहस्रार ही वह मणि जटित द्वीप है, जिसके चारों ओर कल्प वृक्षों का घेरा है और मध्य में नीप वृक्षों का उपवन है, जिसमें चिन्तामणियों से घर बनाया गया है, उसमें ▽ त्रिकोणाकृति

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  • सौन्दर्य लहरी

अकथ अथवा गुरु चक्र रूपी मंच पर बिन्दु रूपी पलंग बिछा हुआ है। वहां सच्चिदानन्द की प्रथम स्पन्द स्वरूपा चिदानन्द लहरी शिव के साथ विहार करती है। जिसका उल्लेख अगले श्लोक में आयगा। अकथ त्रिकोण चक्र की तीनों भुजाओं के बाहर क्रमशः १६ स्वर, क से त तक १६ व्यंजन, और थ से स तक १६ अक्षर विराजते हैं, और तीनों कोगों में ह क्ष ळ तीन अक्षर हैं। अ, क, थ से युक्त अन्य १५ अक्षरों के कारण, तीनों भुजाएं इन अक्षरों से नामांकित की जाती हैं और चक्र का नाम अकथ कहा जाता है। अकथ का अर्थ अकथनीय अथवा अनिर्वचनीय होता है। सब वर्ण चिन्तामणियों के सदृश हैं जिनसे यह घर बना है। इसके चारों ओर सहस्र अरे (radii) नीप वृक्ष हैं और उनसे उदय होने वाले संकल्प कल्प वृक्ष हैं। भगवती के पलंग का वर्णन ९२ वें श्लोक में देखें। वहां हरि, रुद्र, ब्रह्मा और महेश्वर को पलंग के चार पाये बताया गया है और सदाशिव को पलंग पर बिछाने की चद्दर से उपमा दी गई है। अथवा ॐ पलंग है और अ, उ, म् और अनुस्वार उसके चार पाये हैं। अथवा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर और अनाहत् चक्र चार पाये हैं और विशुद्ध चक्र उस पर बिछी चादर है। और देह श्री चक्र है। श्री चक्र भगवती का निवास स्थान माना जाता है, देखें श्लोक ११। श्री चक्र में बिन्दु को पलंग का स्थान, त्रिकोण को अकथ चक्र, ४३ त्रिकोणों को नीप वृक्ष और ४ श्री कंठ और ५ शिवयुवतियों को कल्प वृक्ष समझना चाहिये।

इस श्लोकोक्त 'चिदानन्द लहरी' पद के कारण प्रथम ४१ श्लोकों के पूर्व ग्रंथ को आनंद लहरी कहते हैं। आनन्द से 'क,'

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सहस्रार
गुह्चक्र
उन्मनी १६
१५ समनी
व्यापिका १४
१३ शक्ति
महानाद १२
११ नाद
निरोधिका १०
९ अर्धेन्दु
बिन्दु ८
७ आज्ञाचक्र
५ विशुद्ध
अनाहत् ४
हृदयचक्र
मणिपूर ३
२ स्वाधिष्ठान
योनिस्थान
१ मूलाधार
कन्द
स्वयंभूलिङ्ग
कुण्डलिनी


श्री हिरालाल
देवास

The different yogic plexuses

सौंदर्य लहरी ९५


और लहरी से ल हीं लेकर हादि विद्या के तीनों कूटों को ग्रहण किया जा सकता है । कं * सुख वाचक शब्द है, कं ब्रह्म और प्राण वाचक भी है देखे छान्दोग्य (४, १०, ५) । इस श्लोक की अगले श्लोक से संगति करने से हादि विद्या को षट् चक्र वेध विद्या समझना चाहिये ।

षट् चक्र वेध अर्थात उन्नेय भूमिका ।

[ ९ ]

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वाकुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥

अर्थः— पृथिवी तत्व को मूलाधार में और जल को भी ( मूलाधार में ही ) मणिपूर में अग्नितत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान में है, हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध चक्र ) में आकाश तत्व को, और मन को भी भ्रूमध्य में, इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) का वेध करके तू सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है ।

सं० टि० यहां अन्तर्याग का वर्णन है, कुण्डलिनी शक्ति का षट चक्र वेध पूर्वक आरोहण बताया गया है ।


* नोट:—कं शिरः सुख वारिषु-विश्वः, सुखशीर्ष जलेषु कं इति मेदिनी ।

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व्याख्या:— षट् चक्र निरूपण, शिव संहिता और अन्य ग्रन्थों में विना मतभेद षट् चक्रों का क्रम इस प्रकार देखने में आता है कि गुदा के पास पृथिवी तत्व का मूलाधार चक्र है, उपस्थ के निकट जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि के पास अग्नि तत्व का मणिपूर चक्र, हृदय के पास वायु तत्व का अनाहत चक्र, कंठ में आकाश तत्व का विशुद्ध चक्र और भ्रूमध्य के पास मनस्चक्र है, जिसको आज्ञा चक्र कहते हैं । परन्तु सौन्दर्य लहरी में इस क्रम में अन्तर दिखता है जिसके अनुसार उपस्थ के पास जल तत्व का मणिपूर और नाभि में आग्नेय स्वाधिष्ठान चक्र होना चाहिये । तत्वों का क्रम तो वह ही है परन्तु चक्रों के नामों के क्रम से उपस्थ के चक्र का नाम मणिपूर और नाभि चक्र का नाम स्वाधिष्ठान प्रतीत होता है । शंकर भगवत्पाद ने यद्यपि इन दो चक्रों के स्थानों का संकेत नहीं किया है, परन्तु नाम क्रम से यह ही प्रतीत होता है कि उनको, उपस्थ वाले चक्र का नाम मणिपूर और नाभि के चक्र का नाम स्वाधिष्ठान अभिमत था । परन्तु हमारी राय में ऐसा नहीं है, केवल तत्वों के वेध क्रम में अन्तर है । समयाचार के मतानुसार उपस्थ वाले चक्र का वेध करना उचित नहीं समझा गया, क्योंकि इस चक्र के वेध से काम वासना की वृद्धि होकर बज्रौली इत्यादि क्रियाओं द्वारा ऊर्द्धरेता होने की सिद्धि प्राप्त की जाती है, जो कौलाचार को अभीष्ट है, समयाचार को नहीं । इसलिये यहां समयाचार के अनुसार वेध क्रम दिया गया है । वह इस प्रकार है कि मूलाधार के वेध द्वारा पृथिवी तत्व का और साथ ही जल तत्व का भी वहां ही वेध किया जाना चाहिये । 'अपि' शब्द का 'कं'

सौंदर्य लहरी ९७


के साथ प्रयोग इस बात की ओर संकेत करता है, नहीं तो अपि शब्द वृथा सा दिखता है। फिर स्वाधिष्ठान को छोडकर नाभि वाले मणिपूर में अग्नि का बेध किया जाता है परन्तु अग्नि तत्व की स्थिति योनि स्थान में होने के कारण स्वाधिष्ठान में दिखाई गई है अर्थात् स्वाधिष्ठान चक्र में नीचे अग्नि ऊपर जल दोनों का संधि स्थान है क्योंकि योनि स्थान मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्य भाग में स्थित है इसलिये अग्नि के प्रदीप्त होने पर मूलाधारस्थ पृथिवी और स्वाधिष्ठानस्थ जल दोनों का बेध मूलाधर के बेध के साथ हो जायगा।

हमारे इस मत को हंसोपनिषत् से पुष्टि मिलती है। वहां गुदा चक्र से वायु का उत्थान करके मणिपूर चक्र में ले जाने का विधान किया गया है, बीच में स्वाधिष्ठान चक्र का बेध न करके उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करने की आज्ञा है।

गुदमवष्टभ्याध राद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिःप्रदक्षिणी-
कृत्य मणिपूरकं च गत्वाऽनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौप्राणान् निरुध्या-
ज्ञामनुध्यायन् ब्रह्मरंध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येवं सर्वदा ध्यायेत् ।

**अर्थः—**गुदाद्वार को रोक कर आधार चक्र से वायु को उठा कर स्वाधिष्ठान की ३ बार परिक्रमा करके मणिपूर जाकर, अनाहतचक्र का अतिक्रमण करके विशुद्धचक्र में प्राणों का निरोध करे और आज्ञाचक्र में ध्यान करता हुआ, फिर ब्रह्मरंध्र का ध्यान करता हुआ मैं तीन मात्रा से युक्त ॐ हूं ऐसा सदा ध्यान करे। अर्थात् मैं जाग्रतावस्था में वैश्वानर अकार, स्वप्नावस्था में तैजस् उकार और

९८ सौंदर्य लहरी

सुषुप्ति में प्राज्ञ मकार हूं, इस प्रकार सदा ध्यान करता हुआ शुद्ध- स्फटिक सदृश नाद का आधार चक्र से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त ध्यान करना चाहिये ।

बिन्दु और बीज के योग से नाद की उत्पत्ति होती है । कहा है

बिन्दुःशिवात्मको बीज शक्तिर्नादस्तयोर्मितः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ॥

स्थूल रूप में बिंदु शुक्र है और बीज रज है और उर्द्धरेता होने पर दोनों का समवाय अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण नाद कहलाता है । समयाचार की विधि भावना प्रधान होती है और भावना युक्त साधन द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जाती है, कौलाचार में जो उर्ध्वरेतस् की सिद्धि स्वाधिष्ठान चक्र के वेध द्वारा की जाती है, वह समयाचार वाला आज्ञाचक्र में मन का वेध करके करता है । हंसोपनिषत् के उपरोक्त क्रमानुसार स्वाधिष्ठान चक्र की ३ बार प्रदक्षिणा करके ऊपर उठ जाने के साधन में स्वाधिष्ठान चक्र के वेध का निषेध किया गया है । उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिये, क्योंकि यहां शक्ति की पीठ है, जैसा कि नाम से प्रकट है ( स्व+अधि+स्थान=स्वाधिष्ठान ) । मूल बंध द्वारा आधार चक्र का वेध होकर पृथिवी और जल दोनों का एक साथ बंध होगा, क्योंकि मूलबन्ध के अभ्यास से योनिस्थान जो दोनों चक्रों के मध्य में है और अग्नि का स्थान है, दबता है । योनिस्थान पर दबाव पडने से अग्नि प्रदीप्त होकर पृथिवी और जल दोनों का वेध एक साथ कर देती है । अग्नि तत्व का वेध मणिपूर अर्थात् नाभि चक्र में होता है और वह

सौन्दर्य लहरी ९९


वहां विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल का वेध होकर वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् प्रकट हुआ करती है। योनिस्थान में प्रदीप्त अग्नि नीचे मूलाधार में पृथिवी तत्व को तपाता है और ऊपर स्वाधिष्ठानस्थ जल को। जल बाष्प बन कर मणिपूर (नाभिचक्र) में मेघवत् आच्छादित हो जाता है और वहां अग्नि का वेध होकर वह विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। देखें श्लोक ३९, ४०। ग्रीष्म ऋतु में गरमी से पृथिवी तप्त होकर जल सूखने लगता है, यह जल का वेध है। वर्षा में वह ही जल मेघों के रूप में परिणत हो जाता है, और उनके ताप से विद्युत् प्रकट होती है, यह अग्नि का वेध है।

*चक्रों का स्थान मेरुदंड (spinal bone) के भीतर नीचे से मस्तिष्क तक उठने वाली सुषुम्ना नाड़ी (spinal cord) में है। इसके द्वारा शरीर की नाड़ियों का मस्तक से संबंध है। गुदा के पीछे एक मांसपेशी है, जिसे कंद कहते हैं, उसकी नाभि अर्थात् केन्द्र में कुण्डलिनी स्वयंभूलिंग पर साढ़े तीन कुंडल डाले सोती रहती है। जागकर वह स्वाधिष्ठान चक्र में रहने लगती है। उस अवस्था में जीव को बिन्दु रूपी शिव कहते हैं और कुंडलिनी को जीव रूपा शक्ति।

आज्ञा चक्र में चढ़कर वह ही परमात्मा रूपा शक्ति त्रिपुरा कहलाती है जो सहस्रार में शिव के साथ सायुज्यता प्राप्त कर लेती


* चक्रों और नाडियों की सविस्तार जानकारी के लिये लेखक का अंग्रेजी ग्रंथ Divine Power पढ़ें।

१०० सौन्दर्य लहरी

है। षट् चक्र बेध के पूर्व शक्ति का रूप जीवात्मिका और षट् चक्र बेध के पश्चात् शिवात्मिका समझना चाहिये। जीवात्मिका का स्थान स्वाधिष्ठान और शिवात्मिका का स्थान विशुद्ध चक्र हैं।

मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अग्नि खंड, मणिपूर और अनाहत को सूर्य खंड और विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र को चन्द्र खंड कहते हैं। योनिस्थान अग्नि की, अनाहत सूर्य की और आज्ञा चंद्र की पीठ कहलाती हैं। अग्नि खंड में रुद्र ग्रंथि, सूर्य खंड में विष्णु ग्रंथि, और सोम खंड में ब्रह्म ग्रंथि कहलाती हैं।

अन्तरिक्षगतो वह्निर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः ।
नभःस्थः सूर्यरूपोऽग्नि नीभेमंडलमाश्रिताः ॥
(यो शि ५, ३२)

विषं वर्षती सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः ।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधो मुखः ॥
(५, ३३)

अर्थः— अन्तरिक्ष में उठकर अग्नि विद्युत् रूप हो जाती है, जो अपना अन्तरात्मा है। आकाश में स्थित अग्नि सूर्य रूप है, यह नाभि मण्डल (मणिपूर और अनाहत्) में आश्रित है, नीचे की ओर मुख रहने पर वह विष की वर्षा करता है और ऊपर की ओर मुख होने पर अमृत का स्रवण करने लगता है। तालू के मूल स्थान (आज्ञा) पर चन्द्रमा का स्थान हैं, उसका मुख नीचे की ओर है और वह अमृत की वर्षा किया करता है। अनाहत् चक्र के १२ दल १२ आदित्य कहलाते हैं। उर्द्धमुख सूर्य और अधो-

सौंदर्य लहरी१०१

मुख चन्द्र के बीच में विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६ कलाओं के सदृश चमकने लगते हैं। कुण्डलिनी शक्ति जागकर जब सूर्य मण्डल से ऊपर चढती है, तब सूर्य को ऊर्ध्वमुख कर देती है। फिर कुण्डलिनी शक्ति उससे भी ऊपर जाकर चन्द्र मण्डलका बेध करती हुई सहस्रार में उठती है, तब चन्द्रमा भी अमृत की वर्षा करने लगता है और सारे देह की नाड़ियां उस अमृत से भर जाती हैं और योगी का शरीर दिव्य बन जाता है।

अवसरण अर्थात अन्वय भूमिकावेध के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्रार की ओर होती है जिसका वर्णन ऊपर के श्लोक में दिया गया है। सहस्रार से नीचे उतरते समय वह नाड़ियों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की ओर लौटती है। आरोह को उन्नेय भूमिका और अवरोह को अन्वय भूमिका कहते हैं। प्रत्यावृत्ति भूमिका से कुण्डलिनी का नीचे उतर कर अपने स्थान पर गुहा में लौट आने का अभिप्राय है। गत श्लोक में उन्नेय भूमिका का वर्णन किया गया है और अगले श्लोक में अन्वय और प्रत्यावृत्ति भूमिकाओं का वर्णन है इनको अप्यय और प्रभव क्रम भी कहते हैं। दोनों के सिद्ध होने पर योग की सिद्धि होती है। कहा है 'योगोहि प्रभवाप्ययौ' कठोपनिषत् । यह उभय क्रम कुण्डलिनी सोपान रहस्य के नाम से प्रसिद्ध है।

[ १० ]

सुधाधाराऽऽसारैश्चरण युगलान्तर्विगलितैः
प्रपंचं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नाय महसा।

१०२ | सौंदर्य लहरी

अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वामात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥

अर्थः— अमृत धाराओं की वर्षा से, जो तेरे दोनों चरणों के बीच से टपकती हैं, प्रपंच को सींचती हुई फिर छओं आम्नायों से होती हुई अथवा छओं चक्रों द्वारा सींचती हुई, अपनी भूमि पर उतरकर अपने आप को सर्पिणी के सदृश साडेतीन कुंडल डालकर, हे कुहरिणि ! तू कुल कुंड में सोती है ।

स० टि० यहां पर कुण्डलिनी का सहस्रार में कुछ समय ठहर कर फिर अपने स्थान में उतर आना दिखाया गया है । रस=छः चक्र, आम्नाय=विधान, महस्=प्रकाश । प्रपंच=देह, पिण्ड । कुल कुण्ड=कुण्डलिनी के रहने का कुंड, कुहरिणी= गुहा में रहने वाली । (कुहर=गुहा ।)

पूर्व श्लोक की संगति से इस श्लोक का भाव स्पष्ट है कि मूलाधार से जागकर सुषुम्ना मार्ग द्वारा जब कुँडलिनी हृदयस्थ सूर्य को उन्मुख करती हुई आज्ञा चक्र के ऊपर चन्द्रमंडल में प्रवेश करती है, तब उसके चरणद्वय के बीच से अमृत की धारायें नीचे बरसने लगती हैं। यहां भगवती के चरणों का ध्यान आज्ञा चक्र में किया जाना बताया गया है ।

शक्ति के अवतरण के साथ सब नाडियों का भिन्न-भिन्न चक्रों के द्वारा अमृत के प्रवाह से सारे शरीर में आनखशिख सिंचाव होता है । जिस मार्ग से शक्ति का आरोहण होता है उसी मार्ग से

सौंदर्य लहरी १०३

अवतरण होकर वह फिर अपने स्थान पर सर्पाकार साढ़ेतीन कुण्डल डालकर सो जाती है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं । या तो सारी शक्ति ऊपर उठ जाती है और मूलाधार में शक्ति का कुंडलिनी रूप में उसके उठने से अभाव हो जाता है, और फिर लौटने पर वह फिर सो जाती है । दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि मूलाधार में अनन्त शक्ति है, इसलिये वहां पर रहने वाले भंडार में कभी कमी नहीं होती, जागकर शक्ति ऊपर भी जाती आती रहती है और नीचे भी बनी रहती है। हमारी समझ में दूसरा विकल्प सत्य जान पड़ता है क्योंकि यदि सारी शक्ति सहस्रार में उठ जाय तो उत्थान के साथ शरीर का आधार न रहने के कारण वह तुरन्त प्रति प्रसव क्रम से लीन हो जाना चाहिये । प्रपंच का अर्थ शरीर अथवा नाडी जाल किया जाता है, दोनों पक्ष में एक ही परिणाम समझना चाहिये । क्योंकि नाडियों द्वारा सारा शरीर पुष्ट होता है, केवल नाडियां ही नहीं। नाडियों की संख्या प्रश्नोपनिषत् में इस प्रकार दी गई है।

अत्रैत दे कशतं नाडिनां तासां शतशतमेकैकस्यां द्वासप्ततिः २ प्रतिशाखा नाडी सहस्राणि भवन्ति । प्रश्न० ( ३,६ )

रसाम्नाय महसा के स्थान पर रसाग्नाय महसः पाठान्तर भी मिलता है । उसका अर्थ नीचे दिया जाता है । तांत्रिक परिभाषा के अनुसार इस पाठान्तर पद का अर्थ 'अमृत के प्रकाश से चमकने वाला चन्द्रमा' होने के कारण श्लोक का भावार्थ इस प्रकार होगा कि शक्ति चन्द्र मण्डल से नीचे उतर आती है, और अपनी भूमि

१०४ | सौंदर्य लहरी

पर आकर ३।। कुण्डलाकृति सर्पिणीवत् सो जाती है। कुल का अर्थ शक्ति समझना चाहिये और कुण्ड से उसके रहने का कुंड सदृश स्थान समझना चाहिये। कुहरिणी का अर्थ कुहर अर्थात् बिल में रहने वाली है। कुहर बिल, छिद्र अथवा रंध्र को कहते हैं। नाडियों द्वारा प्रपंच का सींचे जाने का संबन्ध छःओं चक्रों के द्वारा होने के कारण रसाम्नायमहसा का अर्थ जैसा हमने किया है उचित प्रतीत होता है। रस पद से छः और आम्नाय पद से 'मार्ग' अर्थ लेने से यह अर्थ किया गया है। आम्नाय का अर्थ मार्ग दिखाने वाले वेद, और गुरु परम्परा गत संप्रदायोपदेश हैं। और महस् का अर्थ उत्सव और तेज दोनों है (महस्तूत्सवतेजसोः, इति अमरः) इसलिये पूरे पद का तृतीयांत अर्थ छः तेजोमय आम्नायों के द्वारा, अथवा रस (अमृत) से पूर्ण तेजोमय आम्नाय द्वारा होगा, पंचमी विभक्ति में 'द्वारा' की जगह 'से' लगाना पड़ेगा। आम्नाय से चाहे चन्द्र अथवा चक्र समझा जा सकता है। महस् का अर्थ उत्सव भी किया जा सकता, उस पर्याय में शक्ति का शिव के योग से अमृत सिंचन रूपी उत्सव समझना चाहिये। तांत्रिक पद्धति के अनुसार उपासना के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्द्ध और वाम छः आम्नाय हैं, उन सबका फल शक्ति का जागरण होकर समाधि प्राप्त करना ही है। उक्त आम्नाय गुरु परम्परागत उपदेश से जानने चाहिये।

सौंदर्य लहरी १०२


श्रीचक्र

अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का संकेत है।

(११)

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्र त्रिवलय–
त्रिरेखाभिः सार्ध तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः

**नोटः—**कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।

**अर्थः—**चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो शंभु के विन्दुस्थान से भिन्न हैं । वे तीन वृत्तों (circles) और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।

**सं० टि०—**यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६ नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता