सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
६८ सौंदर्य लहरी
के कारण वैराग्य नहीं होता, उससे आतुर वे लोग क्षीणपुण्य होने पर स्वर्ग से गिरा दिये जाते हैं। इष्टापूर्त कर्मों को श्रेष्ठ मानने वाले वे मूढ यह समझते हैं कि उससे अन्य कोई श्रेय का मार्ग नहीं है। वे स्वर्ग में अपने पुण्यों को भोग कर इस लोक में अथवा इससे भी हीनतर लोकों में प्रवेश करते है। परन्तु जो तप और श्रद्धा से युक्त होकर वनों में रहते हैं, शांत हैं, विद्वान हैं और भिक्षा से जीवन निर्वाह करते हैं, वे निष्पाप होकर सूर्यद्वार (सुषुम्ना मार्ग) अथवा देवयान मार्ग से वहां जाते हैं, जहां वह अमर अविनाशी परम पुरुष मिलता है ।
यज्ञयागादि कर्मों के अनुष्ठान और कूपतडाग धर्मशाला इत्यादि का बनवाना, ऐसे इष्टापूर्त कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, मोक्ष नहीं मिलती। स्वर्ग में अपने-अपने पुण्यार्जित भोगों के समाप्त होने पर वहां से उनको इस मर्त्यलोक में गिरा दिया जाता है । इसलिये सब सकाम अनुष्ठान और यज्ञों के कर्मकांड का विस्तार अविद्या कहलाता है। कर्मेष्ठी मनुष्य कर्म को ही मोक्ष का साधन जानते हैं और उनके अनुष्ठानों में आसक्ति के साथ लगे रहते हैं उनके हृदयों में अनेक कामनायें उठा करती हैं और भगवान के भजन और अनेक प्रकार के अनुष्ठानों के द्वारा अपनी कामनाओं की पूर्ति मांगा करते हैं। इस प्रकार मोहांधकार से उनका अन्तः करण अन्धकार मय रहता है, यद्यपि वे शास्त्रीय ज्ञान के धुरन्धर पंडित क्यों न हों। जब तक मन की वृत्तियां बहिर्मुखी रहती हैं, आत्मज्ञान का प्रकाश नहीं दिखता।
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कुण्डलिनी शक्ति जाग कर जब सुषुम्ना पथ में छओं चक्रों का बेध करती हुई सहस्रार में शिवसायुज्य पद पर आरूढ होने जाती है, तब प्रतिप्रसव क्रम द्वारा सब इन्द्रियों को अन्तर्मुखी कर देती है, मन के परों को काट डालती है, और बुद्धि को जगत के बहिर्चिन्तन से विश्रांति देने लगती है, और अन्तरात्मा रूपी सूर्य पर छाये हुए बादल एक-एक कर के विलीन होने लगते हैं । हृदयाकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है और ज्ञान का प्रकाश अन्तराकाश में पूर्ण तेज से युक्त होकर चमकने लगता है । अविद्या का गाढ अन्धकार फट जाता है और अन्धेरे में बसेरा करने वाली बासना रूपी चिमगीदडों अथवा काम क्रोधादि उल्लूकों के ठहरने का कहीं स्थान नहीं रहता, और वे वहीं बैठे बैठे ज्ञान रूपी सूर्य के तेज से समाप्त हो जाते हैं । इसी अभिप्राय से शंकर भगवत्पद् कहते हैं कि भगवती अविद्यांधकार को नष्ट करने के लिये ज्ञानरूपी सूर्य का उद्दीपन करती है । दूसरा भाव यह भी है कि सूर्य मण्डल में अधोमुखी सूर्य शक्ति जागरण के पश्चात उन्मुख होकर अमृत का स्राव करने लगता है और परिणाम स्वरूप बहिर्विषयों की वासनायें स्वयं शांत हो जाती हैं । उसका फल यह होता है कि कर्मानुष्ठानों में रत, अविद्या के अन्धकार में पडे हुए कर्मकांडी बहिरनुष्ठानों का तिरस्कार कर के अन्तर्याग में लग जाते हैं । क्योंकि भगवती की चिन्मयी वाटिका के पुष्पों से प्रवाहित मधुर मकरन्द के स्रोतों के झरने जड लोगों की जडता को भी द्रवीभूत करने का सामर्थ्य रखते हैं । भगवती की चिन्मयी सत्ता ही तो नाना भेद रूपा सृष्टि के प्रभव काल में स्थूल सूक्ष्म जगत् का स्वांग भर लेती है, और प्रतिप्रसव क्रम के आरम्भ होने पर सब नाम
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रूपों को अपने में विलीन करती हुई शिव के निष्कल रूप से सायुज्यता का आलिंगन कर के स्वयं शिव स्वरूप हो जाती है । जीव की जडता पानी होकर बह जाती है और वह चैतन्य गंगा में स्नान करने लगता है ।
आत्मा असंग है, उसका जड प्रकृति अथवा उसके विकारों से तादात्म्य नहीं होता । स्थूल सूक्ष्म शरीर पर आत्मा की चेतना का प्रकाश अवश्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु आत्मा कभी शरीर नहीं बनता, वह सदा असंग है । देहाभिमान द्वारा केवल भ्रांति मात्र का स्फुरण हो उठा है कि मैं देह हूं । क्या चेतन स्वरूप आत्मदेव कभी जड देह बन सकता है ? यदि वह देह बन गया होता तो जागरण में अनुभव में आने वाला शारीरिक कष्ट स्वप्न में भी बना रहना चाहिये था, परन्तु वह ही एक आत्मा जागृत और स्वप्नावस्था के सुखदुःख अलग-अलग भोगता है, और गाढ निद्रा में सब छूट जाते हैं । तीनों अवस्थाओं का पृथक्-पृथक योग होने से उनके भोगों की अनुभूति भी पृथक २ होती है । स्वभाव से असंग आत्मा में कष्ट पीडा वेदनादि का सर्वथा अभाव है, परन्तु जब वह देह से संगी होता है उसको देह के धर्मों का भी भोग अनुभव गम्य होने लगता है । देहाध्यास ने मानो उसे अपने स्वरूप से गिराकर उसमें शरीर की जडता के अध्यारोपण की भ्रांति उत्पन्न कर दी है । देहाध्यास जितना दृढ होता जाता है, उतनी जडता की भी वृद्धि होती जाती है । मनुष्यों से पशुओं और पशुओं से उद्भिज्जों में अधिक जडता देखने में आती है । मनुष्यों में भी अन्तर होता है, कोई कोई थोडे से कष्ट से विह्वल हो उठते हैं, उनमें जडता अधिक
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है, और कोई कोई इतने तितिक्षु होते हैं कि महान कष्टों की भी परवाह नहीं करते, उनमें जडता कम समझनी चाहिये । शरीर के योग से ही आत्मा का स्वाभाविक आनन्द स्वरूप तिरोहित हो गया है । जितना मनुष्य देहवृत्ति का त्याग कर के आत्मस्थिति में ऊंचा उठ जाता है, उसे शारीरिक कष्ट उतना ही कम मन्ताप पहुंचाते हैं, और उसके आनन्दानुभव की वृद्धि होती है । कुण्डलिनी शक्ति जागकर पांचों तत्वों और मन का बेध कर के जड चेतन की ग्रंथियों को खोल देती है, तब साधक का देहाध्यास शिथिल हो जाने पर वह आत्मस्थिति की उच्च भूमिकाओं का अनुभव करने लगता है और आनन्द की लहरें उसकी प्रत्येक नाडी में प्रवाहित होने लगती हैं ।
चैतन्यस्तबक मकरन्दस्रुतिझरी का संकेत मधुप्रतीका भूमिका के लिये भी हो सकता है, जो ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर आती है । चैतन्य का अर्थ मंत्र-चैतन्य भी ग्रहण किया जा सकता है, उस पक्ष में श्री विद्या के मंत्र को स्तबक और मंत्र के अनुष्ठान द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के जागरण से प्राप्त होने वाले दिव्यानन्दाबेश का प्रवाह मकरन्द के स्रोत की झरी से उपमित किया जा सकता है । मंत्र चैतन्य का लक्षण योगशिखोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है ।
यदानुध्यायते मंत्रं गात्रकंपोऽथ जायते । ७० ।
अर्थात् जब मंत्र का ध्यान किया जाता है, तब गात्रों में कंप का अनुभव होना चाहिये । कंप शक्ति के सक्रिय होने पर हुआ करते हैं, और उस कंप में दिव्यानन्द की लहरें प्रवाहित होती हुई
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अनुभव में आती हैं, जिससे सिर में आत्मानन्द की मस्ती प्रदान करने वाला नशा सा चढ जाता है । मंत्र चैतन्य का अर्थ मंत्रयोग द्वारा शक्ति का जागरण ही समझना चाहिये । कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर शरीर की जडता, आलस्य, भारीपन इत्यादि दोष तत्क्षण दूर हो जाते हैं। श्री विद्या के अक्षरों की चिन्तामणियों से और मंत्र की चिन्तामणियों की माला से भी उपमा दी जा सकती है । भगवती का अनुग्रह मुमुक्षुओं को मोक्ष देता है और सकाम उपासना करने वालों की अभीप्सित् कामनाओं को पूर्ण करता है, इसलिये कहा है कि भगवती दरिद्रियों के लिये चिन्तामणियों की माला के सदृश है । एक चिन्तामणि इन्द्र लोक में है जो कल्प वृक्ष के सदृश सब ही कामनाओं को पूर्ण करती है, परन्तु पंचदशी मंत्र में १५ और षोडशी में १६ अक्षर उतनी ही चिन्तामणियों के तुल्य हैं, जो उपासकों की सब ही कामनाए पूर्ण करते हैं ।
इस श्लोक से हादिविद्या का प्रथम कूट इस प्रकार उद्धृत किया जा सकता है । मिहिर से हकार, मकरंद की सोमसदृश उपमा से सकार, चिन्तामणि से सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला ककार और वराहावतार के महीउद्धार सदृश पृथिवी बीज का लकार और 'भगवती' पद से भगवती का साक्षात् हृल्लेखा अक्षर समझना चाहिये, एक कूट सिद्ध होने से पूरा मंत्र ग्रहण किया जा सकता है क्योंकि इस विद्या के तीनों कूट इन ही अक्षरों से बनते हैं । आगे चल कर श्लोक ३२ के नीचे यह दिखायेंगे कि शंकर भगवत्पाद् की इष्ट विद्या हादि विद्या ही थी । इसलिये इस श्लोक में भगवती के गुणानुवाद के साथ-साथ उस विद्या का रूप भी बता दिया गया
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है। हादि विद्या से ही चतुष्कूटी शांकरी विद्या का भी निर्माण होता है, और त्रैलोक्य मोहन कवच में उससे पाताल लोक से रक्षा होने का उल्लेख मिलता है, इसलिये यहां 'मुररिपुवराहस्यदंष्ट्रा' कहने से स्पष्ट हादि विद्या की ओर संकेत दिख पडता है।
भगवान ने मुर राक्षस का वध किया था, इसलिये उनका एक नाम मुरारि अथवा मुररिपु भी प्रसिद्ध है, इसलिये मुररिपुवराह का अर्थ वाराह अवतार है। भगवान ने वराह का रूप धारण कर के पाताल से दांतों पर भूमि को उठाकर ऊपर निकाला था और उसे उसके स्थान पर अपनी आधार शक्ति प्रदान कर के स्थापित किया था। उसी प्रकार कुण्डलिनी रूपी आधार शक्ति के जागने पर भगवती जन्म मरण रूपी संसार सागर में डूबे हुओं का उद्धार करती है। वाराह भगवान का बीज मंत्र 'हूं' है अर्थात् हूं बीज का प्रयोग करने से जो शक्ति उत्पन्न होती है, वह वाराह भगवान के दांत के सदृश जीवों को संसार सागर से बाहर निकाल लेती है।
मुरारि विष्णु भगवान ने वराह अवतार धारण कर के पाताल में
| मुररिपुवराहस्य दंष्ट्रा | धसती हुई पृथिवी को उभारा था। मूला-धार पृथिवी तत्व का स्थान है और चरण पाताल के स्थान माने जाते हैं। जीव ने पार्थिव शरीर |
में अध्यस्त होकर अपने को अन्धकार में डाल रखा है, जितना-जितना वह मूलाधार से ऊपर उठता जाता है, उसका अध्यास सूक्ष्म होता जाता है और सहस्रार में पहुंचकर सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसलिये जन्ममरण रूपी संसार की पाताल रूपी दल-दल से निकलने के लिये, उसे भगवती की वैष्णवी बाराही शक्ति का
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आश्रय लेना चाहियें। वाराही शक्ति अथवा वाराही विद्या का वर्णन वाराहोपनिषत् में मिलता है, वहां ब्रह्म विद्या को ही वाराही विद्या कहा है। देखें वाराहोपनिषत् (अतस्त्वद्रूपप्रतिपादितां ब्रह्मविद्यां ब्रूहीति हो वाच) (१,१) अर्थात् ऋभु ऋषि वाराह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आप अपने रूप से प्रतिपादित ब्रह्म विद्या कहिये। भावनोपनिषत् में वाराही शक्ति को पिता समान दिखाया है, देखें परिशिष्ठ (१)। मूलाधार से भी नीचे अधिक अन्धकार के स्थान हैं। मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अन्धकारमय आग्नेय मंडल माना जाता है। यदि शरीराध्यास की वृद्धि होती जाय तो जीव अधिकाधिक जडता में उतरता जाता है। पातालादि निम्न लोको को घनांधकारमय माना जाता है। ईशावास्योपनिषत् में यह बात यजुर्वेदीय निम्नोध्दृत मंत्र द्वारा इन शब्दों में कही गई है।
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥
अर्थ:— अन्धकार से आवृत्त जो आसुरी लोक हैं, उनको आत्म हनन करने वाला मनुष्य मरकर जाता है।
जड पार्थिव शरीर में आत्म भावना के दृढ अध्यास को ही यहां आत्म हनन कहा गया है। आत्म स्वरूप को जानने के लिये इस अध्यास से उभरना अनिवार्य है और वाराही शक्ति का आश्रय लेकर उससे ऊपर उठा जा सकता है, यह भाव इस श्लोक की अन्तिम पङ्क्ति में दिखाया गया है।
सौंदर्य लहरी ७५
[ ४ ]
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगण—
स्त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया ।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वांछासमधिकं
शरण्ये लोकानां तवहि चरणावेव निपुणौ ॥
अर्थः— तेरे सिवाय अन्य सब देवतागण दोनों हाथों के अभिनय से अभयदान और वरदान देते हैं । तू ही एक ऐसी है जो अभयदान अथवा वरदान देते समय हाथों का अभिनय नहीं करती । भय से त्राण करने में और वांछा के अनुकूल वर प्रदान करने में, हे लोकों की शरण्ये ! तेरे दोनों चरण ही निपुण हैं ।
सं० टि०— इस श्लोक में भगवती की उपासना के लिये ‘ऐं क्लीं सौः’ इस बाला मंत्र का संकेत है, जो भुक्ति मुक्ति दोनों देता है ।
वर अभिनय — देवता दो प्रकार से अनुग्रह करते हैं, १. अभयदान देकर और २. वरप्रदान करके । वरदान से मनोवाञ्छित् कामना की सिद्धि होती है । दोनों प्रकार के अनुग्रहों को हाथों के अभिनय से प्रकट किया जाता है । दक्षिण हाथ उठा कर अभयद अभिनय किया जाता है और बायें हाथ को जैसे सिर पर रखते हैं, नीचे झुकार कामना सिद्ध्यर्थ वरद अभिनय किया जाता है । सब देवता और सब गुरुजन इस प्रकार ही
७६ | सौंदर्य लहरी
अनुग्रह करने की इच्छा से दोनों हाथों के अभिनयों द्वारा अपनी इच्छा प्रकट किया करते हैं। परन्तु भगवती की शरण में सब लोक हैं, भक्त में शरणागति का भाव उदय होते ही, उसकी कामना पूर्ण होती है। और भगवती चारों हाथों में इक्षुधनुः, ५ बाण, और अंकुश एवं पाश धारण किये हुए है इसलिये वह हाथों का अभिनय नहीं करती, परन्तु दोनों चरण ही भय से रक्षा करने में और सब कामनाओं के लिये सिद्ध वरदान देने में निपुण हैं। कराभिनय द्वारा वर देने की इच्छा को किसी प्रकार प्रकट करने की क्या आवश्यकता है ? जो मनुष्य अनन्य भाव से शरण में आता है उसकी सब कामनाएं स्वयं पूर्ण हो जाती हैं और सब प्रकार के भयों से उसकी रक्षा हो जाती है।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणी का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता।
शास्त्रों में भगवती को अग्नि के रूप से हवन द्वारा प्रसन्न करने का विधान देखने में आता है। जंगलों में हिंसक पशुओं के भय से रक्षा के लिये प्रज्वलित अग्नि रखी जाती है। अग्नि की समक्षता से मनुष्य में अभय की भावना स्वतः जाग उठती है, यह सबका अनुभव है। अंधकार में भय लगता है, दीपक रहने पर भय नहीं लगता। रक्षार्थ दिग्बंधन के मन्त्र द्वारा भी प्रज्वलित अग्नि के परिकोट की भावना की जाती है। यथा:—
नमो भगवति ज्वाला मालिनी देवदेवि सर्व भूत संहार-कारिके जातवेदसि ज्वलंति उज्वल २ प्रज्वल २ व्ह्रां व्ह्रीं व्ह्रूं र र र र र र र हं फट स्वाहा, इति परितो वह्निः परकारं ध्यायेत।
सौंदर्य लहरी [७७]
सब भयों का एक मात्र कारण यह दुःखालय संसार ही है।
भय का मूल कारण
यद्यपि विश्व में प्रकृति की रचना सौन्दर्य का घर है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति देवी ने अपने स्वाभाविक सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिये ही इस विश्व की रचना की है। तारागण रूपी हीरे माणिक्यों से जटिल आकाश जिसका मुकुट है, तेजःपुंज सूर्य चन्द्र और अग्नि जिसके तीन नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका वक्षःस्थल और विश्व की चित्रविचित्र विविध रचनायें जिसके श्रृंगार हैं, और जिसके रूप-लावण्य की छाया सर्वत्र बसी हुई है, जिसकी अंगप्रभा सर्वत्र चमक रही है, ऐसा यह विश्व उस भगवती के समस्त सौंदर्य राशि का विकास ही तो है। विश्व की एक-एक गौणकृति की चमकदमक पर पतंगवत मनुष्य मोहित हो जाता है। क्यों न हो ? सौंदर्य का भूखा, आनन्द का प्यासा यह जीव एक-एक अणु की प्रभा में इतना आसक्त हो जाता है कि उसकी दृष्टि प्रकृति देवी के समष्टि सौंदर्य तक पहुंच पाती ही नहीं, उसकी एक देशीय मोहासक्ति ही उसके दुःख का कारण बन जाती है। दीपक ही पतंग की मृत्यु का कारण हो जाता है।
बाला मंत्र
अग्नि भगवती का साक्षात् स्थूल स्वरूप है। भगवती के एक प्रणव का रूप ऐं भी है। 'ऐं' अग्नि तत्व का अक्षर है, और सुषुम्ना नाडी से संबंधित है, सुषुम्ना को भी आग्नेय माना जाता है। ऐं बीज को वाक् बीज भी कहते हैं, वाक् शक्ति को भी अग्निमयी कहते हैं। 'तेजोमयी वाक्' ऐसी श्रुति है। ऐं का त्रिकोणाकृति भाग शक्ति का द्योतक
७८ | सौन्दर्य लहरी
है । भगवती का तीसरा नेत्र जो भ्रुकुटि के ऊपर स्थित है, वह भी अग्नेय है, जिसके एक कटाक्ष से संसार रूपी भवसागर के भय से मुक्ति मिलती है । इसलिये ब्रम्हाजी ने मधु कैटभ से भयभीत होकर इस ही बीज द्वारा भगवती की आराधना की थी । कामनाओं की सिद्धि के लिए काम बीज का प्रयोग किया जाता है । जिसके गर्भ में आद्योपान्त सारा विश्व है । (देखें श्लोक १९.)
भगवती के दोनों चरण सर्वशक्तिसामर्थ्य युक्त हैं, उनका प्रतीक सौः बीज समझा जाना चाहिये । 'स' अक्षर शक्ति वाचक माना जाता है, दो सकारों के लिये द्विवचनान्त 'सौ' पद दोनों चरणों का संकेत करता है, विसर्ग भी शक्ति का ही द्योतक है । इस प्रकार सौः बीज से भगवती के दोनों चरणों की सर्व शक्तिमत्ता प्रकट होती है । और तीनों बीजों से बाला का सब भयों से मुक्ति और मन वांछित कामनाओं की सिद्धिदे ने वाला मंत्र सिद्ध होता है । ऐसे ही नवार्ण मंत्र को भी जानना चाहिये ।
काम देव सब प्रकार के मोहों का राजा है, जो तपस्वी ज्ञानियों के चित्त पर भी प्रहार किये बिना नहीं रहता । मुमुक्षुओं को उससे अपनी रक्षा करने के लिये, सब भयों से त्राण करने वाले भगवती के चरणों की ही शरण में जाना चाहिये, दूसरा कोई मार्ग बचने का नहीं है । यह बात आगे के तीन श्लोकों द्वारा कही गई है ।
[ ५ ]
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
सौंदर्य लहरी ७९
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥
अर्थ:— हरि (विष्णु भगवान) ने पूर्व काल में, प्रणत जनों को सौभाग्य प्रदान करने वाली तेरी आराधना कर के नारी का मोहिनी रूप धारण कर, त्रिपुरारि महादेव के भी चित्त में काम का क्षोभ उत्पन्न कर दिया था। और काम देव स्मर भी तुझ को नमन करने के कारण ही अपनी पत्नी रति के नयनों द्वारा चुंबन किये जाने वाले शरीर से बडे बडे मुनियों के भी अन्तःकरण में मोह उत्पन्न कर देता है।
सं० टि० श्री अच्युतानन्दजी प्रणतजनसौभाग्यजननीं को प्रणत-जनसौभाग्यजननि ईं पढकर श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं:— हे प्रणत जन सौभाग्य जननि हरि तेरी ईं रूप से आराधना कर के मोहनी का रूप ग्रहण करते हैं। ईं काम कला है और कादि विद्या का तीसरा अक्षर है और अनुस्वार (शिव) सहित माया, लक्ष्मी और काम बीजों में रहता है। इस श्लोक से साध्य सिद्धासन विद्या (ह्रीं क्लीं ब्लैं) का उद्धरण किया जाता है।
पुराणों की गाथा के अनुसार देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र का मथन किया था, मथन करने पर समुद्र से अनेक पदार्थ निकले, जिनके साथ अमृत और हलाहल विष भी निकले थें; अमृत के बटवारे के लिये दोनों में विवाद उपस्थित हुआ इस पर विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत का कलश
८० | सौंदर्य लहरी
लेकर उसके बांटने का काम करने लगे। देव और असुरों को अलग-अलग दो पंक्तियों में बिठा दिया गया। मोहिनी के नेत्रों के कटाक्षों और अंगों के हावभावों से सब असुर मोहित हो गये और सारा अमृत देवताओं को बांट दिया गया। वे अमृत पीकर अमर हो गये और असुर मर्त्य रह गये। अमृत के पूर्व जो हला-हल निकला था, उसके प्रभाव से जब सारा विश्व जलने लगा, तब देव और असुर दोनों ही घबरा गये, उस समय करुणा सागर शंकर भगवान ने उसे पान कर के सब की रक्षा की थी, इसके पश्चात् शंकर एकांत में जाकर समाधिस्थ होकर बैठ गये। उठने पर उन्होंने जब मोहिनी रूप द्वारा असुरों के ठगे जाने की बात सुनी, तब विष्णु भगवान से उस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा प्रगट की। भगवान ने वह रूप फिर शंकर को भी दिखाया। उसे देखकर शंकर इतने मोहातुर हुए कि काम के क्षोभ से अपने को भूलकर मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे।
पुरा काल में कश्यप नाम के एक प्रजापति थे, वे कश्यप सागर के तट पर रहा करते थे। शायद वह कश्यप सागर योरोप और एशिया के मध्यवर्ती मधुर जलयुक्त महान सरोवर आधुनिक कैस्पियन सी ही हो। इसलिये इस पौराणिक गाथा को उस युग का स्मारक कहा जा सकता है, जब आर्य जाति मध्य एशिया में निवास करती थी। कश्यप देव की दो स्त्रियां थीं—दिति और अदिति। दिति की सन्तान दैत्य अर्था असुर हुए और अदिति की देव। पश्चिम में रहने वाली अनार्य जातियां दैत्य कहलाती थीं, और आर्य जाति के लोग देव कहलाते थे। दैत्यों को संस्कृत में दानव भी कहते हैं।
सौंदर्य लहरी
फारसी का दाना ( बुद्धिमान ) शब्द दानव का ही अपभ्रंश दिख पडता है और फारसी में देव शब्द बुरे अर्थों में ग्रहण किया जाता हैं। फारसी में देव शब्द विशाल भयंकर व्यक्ति के लिये प्रयुक्त होता है, जिसे अंग्रेजी में जायंट giant कहते हैं। परन्तु योरोप की भाषाओं में देव शब्द ने अपना स्वरूप तद्रूप ही रखा है, जैसे डिवाइन, डियू ( divine, dieu )। और संस्कृत में दोनों शब्दों का विपरीत और विरोधी अर्थ दोनों की विपरीत और विरोधी मनोवृत्तियों और संस्कृतियों पर प्रकाश डालता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस गाथा का महत्व समझने योग्य है, इसलिये उसे समझाना हम उचित समझते हैं। यह संसार एक महासागर है, जो अनेक रत्नों की खानि है। प्राकृतिक विज्ञान के विषय ही वे रत्न हैं, जिनको प्राप्त करने के लिये ध्यान रूपी मथनी से उसका मथन किया जाता है। मथनी को घुमाने के लिये उसपर एक रस्सी लपेटी जाती है, वहां वासुकी नाग से यह काम लिया गया था। मन ही वह वासुकी नाग है, जिसने सारे जगत को डस रखा है। उसका मुख बहिर्मुखी और पूंछ अन्तर्मुखी हैं। मुख की ओर असुर बाह्य विषयों की ओर खेंचते हैं, और पूंछ की ओर से देवगण अन्तरात्मा की ओर खेंचते हैं। वृत्तियां भी आसुरी और दैवी विख्यात हैं। तब उस मनरूपी रस्सी को तानकर खेंचने से ध्यानरूपी मथन आरम्भ होता है। आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य बहिर्विषयों पर ध्यान जमाकर भौतिक विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं और देवता अन्तरात्मा की आध्यात्मिक खोज के लिये चिंतन करते हैं। आत्म ज्ञान अमृत है, ओर भौतिक विज्ञान में
८२ सौन्दर्य लहरी
विष रहता है। आधुनिक वैज्ञानिक रहस्योद्घाटन का फल नश्वर है और उनका प्रयोग जगत के विनाश के लिये ही अधिक किया जाता है। जहां तक उनका संबंध संसारिक वैभव से है, वह भी मानव जाति के यद्यपि सुख की मात्रा बढ़ाने की इच्छा से किया जाता है, परन्तु सुख की वृद्धि के साथ दुःखों की भी वृद्धि करता है। सुख दुःख दोनों बराबरी के साथी हैं, दोनो एक ही सिक्के (मुद्रा) के दो पार्श्व हैं, और दोनों का मूल्य उस सिक्के के बराबर है। अन्तरात्मा में प्रविष्ठ होकर दोनों से मुक्ति पाना ही अध्यात्म मार्ग का ध्येय है। भगवान की मोहिनी माया बहिर्मुखी वृत्ति वालों को सदा अमृत पान से वंचित करती रहती है; यहां तक कि शंकर भगवान की भी समाधि कभी-कभी भंग हो जाती है। शंकर भगवान ने अमृत पान की इच्छा नहीं की, वे तो पूर्व से ही अमर थे, और विष को पीकर भी नहीं मरे, तो भी मोहिनी शक्ति की भ्रांति में कुछ समय के लिये वे भी आ ही तो गये, यह मोहिनी माया इतनी प्रबल है।
इसलिये मुमुक्षुओं को संसार सागर के रत्नों की प्रेयासक्ति छोडकर, तितिक्षा सहित दुःखों को सहन करते रहना चाहिये। आत्मा अमर है, उसे कोई हलाहल मार नहीं सकता।
दुःखों से उद्विग्न न होना और सुखों की स्पृहा का त्याग करना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।
भगवान का भगवती की आराधना कर के मोहिनी रूप से भगवती के नारी सौन्दर्य का आश्रय लेना ही उसकी आराधना है।
सौन्दर्य लहरी ८३
हादि विद्या मोक्ष देती है, उसका प्रथम अक्षर ह कार शिव वाचक है। वैष्णवी विद्या में छः कूट होते हैं, प्रथम तीन कूटों में हादि विद्या ज्यों की त्यों है, और अन्य तीन कूटों के प्रथम दो कूटों में ह स के स्थान पर स ह और अन्तिम कूट में स ह पूर्व में जोड़कर षडाक्षरी कूट मंत्र बनाया गया है। इस प्रकार आधा मंत्र शिव प्रधान है और आधा शक्ति प्रधान कर दिया गया है।
भगवान का एक नाम हरि है। ह्+अ+र्+इ इनमें हकार शिव वाचक है, अकार भी ब्रह्मपद वाचक है— अक्षराणामकारोऽस्मि (गीता)। अकार को हटाकर, र में जो ह्रस्व इकार है उसे दीर्घ कर देने से ह्रीं पद बनता है। र कार अग्नि का अक्षर होने से शक्ति वाचक है और दीर्घ ईकार भी, इस प्रकार ह्रीं (लज्जा) पद बनता है। उस पर अनुस्वार रूपी प्राण प्रतिष्ठा करने से मोहिनी माया का रूप बन जाता है। इस प्रक्रिया में पुरुष वाचक अकार को हटाकर और इकार को दीर्घ कर के स्त्रीलिंग बनाया गया है। ह्रीं का अर्थ लज्जा होने के कारण ह्रीं को मोहिनी रूप कहना यथार्थ ही है।
या देवी सर्व भूतेषुविष्णुमायेति शब्दिता नमस्तस्यैः ३ नमो नमः॥
काम देव ने कादि विद्या मूल मंत्र की ही उपासना की थी।
| साध्य सिद्ध विद्या | काम देव प्रजनन शक्ति का देवता है, और ईश्वर की सृष्टि करने की इच्छा से ही उसका उदय होता है। भगवान ने भी कहा है कि |
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धर्म के अविरुद्ध काम मेरा ही रूप है। परन्तु रजोगुण से उत्पन्न होने
८४ सौंदर्य लहरी
के कारण सत्वगुण का वह बाधक भी है । रति उसकी पत्नि है । दोनों का रूप अति सुन्दर है, परन्तु काम देव का शरीर तो इतना सुन्दर है कि रति भी उसके रूप का अपने नेत्रों से सदा चुम्बन किया करती है, अथवा दृष्टि रूपी जिव्हा से उसके रूप का रसास्वाद लिया करती है । कामदेव का सामर्थ्य भी इतना अधिक है कि बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी क्षुब्ध कर देता है । यह सब भगवती की उपासना का ही फल है, क्योंकि कादि विद्या की उपासना से रूप लावण्य सहित सब ही सिद्धियों की प्राप्ति होती है । ब्लैं रति का मंत्र है व् और ल् उसके नेत्र हैं और ए शक्ति रूप है । उपरोक्त श्लोकोक्त वपुषा पद से व्. 'लेह्येत' पद से ले और 'महतां मुनिनाम्' पद से अनुस्वार लेकर उक्त बीज का उद्धरण किया जाता है, माया बीज और काम बीज के योग से अच्युतानन्द स्वामी ने इस श्लोक से 'ह्रीं क्लीं ब्लैं' इस साध्य-सिद्ध मंत्र का उद्धार किया है । इस मंत्र से हृदय चक्र और महानाद् के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है । इसका फल सर्व सौभाग्य की प्राप्ति है जैसा कि 'प्रणत जन सौभाग्य जननीं पद से स्पष्ट है ।
अगले श्लोक में कामदेव के सामर्थ्य का वर्णन है ।
( ६ )
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकर मयी पंचविशिखा वसंतः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
## सौंदर्य लहरी
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते ! कामपि कृपा—
मपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिदमसंगो विजयते ॥
**क्लिष्ट शब्दार्थः—** विशिख = बाण, मौर्वी = रस्सी, अपांग = कटाक्ष ।
**अर्थः—** धनुष्य पुष्पों का बना है, उसकी रस्सी (ज्या) भौरों की बनी है, शब्द स्पर्श रूप रस गंध पांच विषय उसके बाण हैं, वसन्त ऋतु उसका योद्धा सामन्त है, मलयागिरि का शीतल मंद सुगंधित पवन उसका युद्ध में बैठने का रथ है और वह स्वयं अनंग (शरीर रहित) है, ऐसा कामदेव ऐसे शस्त्रों को लेकर सारे जगत को अकेला जीत लेता है । हे हिमगिरि सुते ! यह सामर्थ्य केवल तेरे कटाक्ष से कुछ थोडी सी ही कृपा प्राप्त करने का फल है ।
**सं. टिः—** इस श्लोक से काम बीज क्लीं का उद्धरण किया जाता है, काम से क कार, मलय से ल कार, मौर्वी से ई और पौष्पं से अनुस्वार लेना चाहिये ।
काम देव अनंग है, शंकर ने उसका देह भस्म कर दिया था ।
| काम दहन आख्यान | दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति का अपमान न सहन करने के कारण सती ने अपना देह योगाग्नि से भस्म कर दिया था । ठीक ही तो |
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है, शिव द्रोही,
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अपने ईश्वर का निरादर कैसे सहन कर सकती है। प्रजापति से यहां हमारा अभिप्राय राजे महाराजाओं से नहीं है, हमारे विचार से तो प्रत्येक गृहस्थ जो बच्चे पैदा करने में ही कुशल है अपनी प्रजा का छोटा-मोटा प्रजापति ही है। अस्तु। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के देह त्याग के पश्चात शंकर दीर्घकालीन समाधि लगाकर बैठ गये, और सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म ग्रहण किया। पार्वती ने शिवजी के साथ विवाह करने का हठ किया और उग्रतप करने लगी। तब देवाताओं ने काम देव को शिवजी की समाधि खोलने के लिये भेजा। कामदेव उपरोक्त सेना लेकर सशस्त्र शिवजी के स्थान पर पहुंचा, वहां वसंत ऋतु का प्रादुर्भाव हुआ, मलयागिरि की शीतल मंद सुगंधित वायु चलने लगी, पुष्प खिल गये जिन पर भौंरे गूंजने लगे और काम देव ने अपने पांचों बाणो का शिवजी पर प्रहार किया, बस शिवजी की समाधि खुल गई। उन्होंने सामने कामदेव को एक झाड के पीछे खड़ा देखा। उसको अपनी समाधि में विघ्नरूप देखकर शिवजी ने तीसरा ज्ञान नेत्र खोला और ज्ञानाग्नि से उसे भस्म कर दिया, तब से काम अनंग हो गया है। उसकी पत्नि रति ने पार्वती से अपना शोक सुनाया, भवानी ने कृपा कर के उसे फिर जीवित कर दिया। अब वह अनंग होने पर भी कामियों को अपने प्रभाव से पराजित कर के सारे जगत का विजेता कहलाता है। प्रभव के लिये मैथुनिक सृष्टि की आवश्यकता है, और काम के बिना सृष्टि प्रभव संभव नहीं। भगवान ने भी कहा है।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।
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परन्तु वह समाधि के लिये बहुत बड़ा विघ्न है, बड़े-बड़े योगियों को भी पथ भ्रष्ट कर देता है। जो शंकर की भी समाधि खोल सकता है, उसकी दुर्जेयता प्रत्यक्ष ही है। काम वासना का क्षय ज्ञान के उदय होने पर ही होता है, इससे पूर्व नहीं। यह ही इस आख्यायिका का अभिप्राय है। श्लोक में काम को सारे जगत का विजेता कहने से, साधकों का लक्ष्य काम वासना के प्रभाव की ओर आकर्षित करना है, जो भगीरथ प्रयत्नों से भी शमन किया जान कठिन है। परन्तु कामदेव का सारा सामर्थ्य भगवती के अति स्वल्प कृपा कटाक्ष का ही तो फल है, इसलिये मुमुक्षु साधकों को इस दुर्जय शत्रु से बचने के लिये भगवती की ही शरण में जाना चाहिये। भगवती के ध्यान मात्र से रक्षा हो सकती है।
इसलिये अगले श्लोक में भगवती का ध्यान बताया जाता है:—
[ ७ ]
क्वणत्कांचीदामा करिकलभ कुंभस्तन नता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्र वदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधानाकरतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहो पुरुषिका ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— कांची=मेखला जो स्त्रियां कटि पर पहनती हैं। दाम=बंधनी, तगड़ी, कलभ=बच्चा, सृणि=अंकुश