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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी २१७

भ्रूमध्य निलयो बिन्दुः शुद्ध स्फटिक संनिभः ।
महा विष्णोश्च देवस्य तत्सूक्ष्मं रूपमुच्यते ॥ (५. ३४)
एतत्पंचाग्निरूपं यो भावयेद्बुद्धिमान् धियः ।
तेन भुक्तंच पीतंच हुतमेव न संशयः ॥ (५. ३५)

अर्थ:- पातालों के अधोभाग में जो कालाग्नि रहता है, वह शरीर में मूलाधार का अग्नि है, जिससे नाद उत्पन्न होता है । स्वाधिष्ठान में वडवाग्नि रहता है । काष्ठ पाषाण का जो अग्नि है वह अस्थियों में रहता है, उसे पार्थिव अग्नि कहते हैं । अन्तरिक्ष में जाकर अर्थात् मणिपूर में वह ही स्वान्तरात्मा स्वरूप विद्युत् अग्नि है । आकाशस्थ अग्नि सूर्य है वह नाभि (सूर्य) मण्डल में आश्रित है । यह सूर्य विष की वर्षा करता रहता है परन्तु उन्मुख होकर अमृत का स्राव करता है । बिन्दु भ्रूमध्य में लीन होकर शुद्ध स्फटिक सदृश हो जाता है, जो महा विष्णु देव का सूक्ष्म रूप कहलाता है । इस प्रकार पंचाग्नि का जो बुद्धिमान ध्यान करता है, उसका खाया-पीया हुआ आहुति के तुल्य है, इसमें सन्देह नहीं ।

छान्दोग्य उपनिषद् के पांचवे अध्याय के खण्ड ३ से नवम खण्ड तक जिस पंचाग्नि विद्या का वर्णन मिलता है, उसीका यहां लय क्रम बताया गया है । छान्दोग्य कथित पंचाग्नि विद्या की गाथा इस प्रकार है । अरुणि के पुत्र श्वेतकेतु से पांचाल देश के राजा प्रवाहण जैबलि ने ५ प्रश्न किये, परन्तु वह एक का भी उत्तर न दे सका, तब उसने अपने पिता से पूछा, परन्तु वह भी नहीं जानता था । इसलिये अरुणि अपने पुत्र को साथ लेकर राजा के

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पास गया और उससे उन प्रश्नों का उत्तर जानने की जिज्ञासा की । राजा ने कहा यह पंचाग्नि विद्या कहलाती है । वे प्रश्न इस प्रकार हैं:-क्या तुम जानते हो कि सब जीव मरकर यहां से जाते हैं, क्या तुम जानते हो कि फिर यहां लौटकर आते हैं, क्या पितृयान और देवयान दोनों मार्गों को जानते हो, क्या जानते हो कि क्यों यह लोक कभी नहीं भरता, अर्थात् इस आवागमन का चक्र कभी बन्द क्यों नहीं होता, और क्या यह भी जानते हो कि पांचवीं आहुति में जल से यह देह कैसे बनता है ? इन प्रश्नों को पूछने का राजा का अभिप्राय स्पष्ट है कि जो मनुष्य प्रभव क्रम को जानता है, वह ही आवागमन से छूटने के लिये देवयान मार्ग का द्वार खोलते समय, इसका प्रतिकार स्वरूप प्रति प्रसव क्रम भी जानने का यत्न करेगा, नहीं तो आवागमन का चक्र कभी बन्द नहीं होता ।

राजा न जो प्रभव क्रम बताया वह इस प्रकार है:—

(१) द्युलोक प्रथम अग्नि है, जिसमें सूर्य रूपी ईंधन जल रहा है, उसमें देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं, और उससे सोम उत्पन्न होता है ।

(२) पर्जन्य दूसरी अग्नि है, उसमें सोम की आहुति दी जाती है और वर्षा उत्पन्न होती है ।

(३) पृथिवी तीसरी अग्नि है, उसमें वर्षा की आहुति दी जाती है और अन्न उत्पन्न होता है ।

(४) मनुष्य का देह चौथी अग्नि है, उसमें अन्न की आहुति दी जाती है और शुक्र उत्पन्न होता है ।

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(५) स्त्री का गर्भ पांचवीं अग्नि है, उसमें शुक्र की आहुति दी जाती है और बालक का देह उत्पन्न होता है ।

जो मनुष्य इस क्रम को उलटना चाहते हैं, उनको ब्रह्मचर्यव्रत अर्थात् ऊर्ध्व रेता रहने का व्रत धारण करके तप करना चाहिये । तब देवयान का मार्ग खुलता है ।

बहिर्मुख शुक्र संतानोत्पादक होने से सृष्टिकमाभिमुख रहता है, परन्तु ऊर्ध्व होकर अभ्यन्तर पंचाग्नियों द्वारा उत्तरोत्तर सूक्ष्म होकर भ्रूमध्य में सोमात्मक परबिन्दु के रूप में लौट जाता है । मूलाधार से शक्ति का उत्थान होना प्रथम अभ्यन्तर अग्नि है, जिसके योग से शुक्र की ऊर्ध्वगति होती है, फिर वह स्वाधिष्ठान की अग्नि से सूक्ष्म होकर सब अस्थियों में पृथिवीतत्व का वेध करता है और मांस एवं रुधिर में भी जल का वेध करके मणिपूर चक्र में विद्युत्-रूप अधिक सूक्ष्म होकर सूर्य को उन्मुख करता हुआ चन्द्र मण्डल में पहुंच कर सोम में परिणत हो जाता है । प्रसव क्रम में सोम ही शुक्र के रूप में परिणत हुआ था, प्रतिप्रसव क्रम में वह फिर अपने पूर्व रूप में आ जाता है । श्रद्धा के सकाम होने से सोम प्रसवा-भिमुख होता है और उस ही श्रद्धा के निष्काम होने पर वह अपने कारण हैरण्यगर्भ रूपी समष्टि प्राण में लीन हो जाता है । समष्टि प्राण स्वयं ब्रह्म की किरण ही हैं । कहा है

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खंवायुर्ज्योतिरापः पृथिवी

इत्यादि ! (प्र० ६, ४)

२२०सौंदर्य लहरी

अर्थः—उसने प्राण की सृष्टि की, प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी इत्यादि। उक्त प्रतिप्रसव क्रम षड्चक्र वेध का विषय है।

इस संबंध में यह बात भी जानने योग्य है कि विशुद्धचक्र की डाकिनी शक्ति का संबंध त्वचा से, अनाहत् की राकिनी शक्ति का रुधिर से, मणिपूर की लाकिनी शक्ति का मांस से, स्वाधिष्ठान की काकिनी शक्ति का मेदा से, मूलाधार की साकिनी शक्ति का अस्थि से, आज्ञा की हाकिनी शक्ति का मज्जा से और सहस्रार की याकिनी शक्ति का संबंध शुक्र से है। देखें ललिता सहस्रनाम श्लोक (१४९—१६१)

पृथिवी के गर्भ रूपी पातालों में जो अग्नि है, वह अग्नि का एक रूप है, दूसरा रूप भूतल पर काष्ठपाषाणादि में है, जल में रहने वाला तीसरा रूप है, विद्युत् अग्नि का चौथा रूप है और सूर्य में अग्नि का पांचवा रूप है। उष्णता, प्रकाश और प्राणशक्ति तीनों का सूर्य के ताप में युगपद समावेश रहता है। चन्द्रमा सूर्य के ताप को स्वयं पी लेता है और शीतल प्रकाश एवं सोम के रूप में प्राणशक्ति को अपनी चंद्रिका के साथ पृथिवी पर भेजा करता है। प्राण ही जीवन शक्ति है, जिसको चेतन शक्ति भी कहते हैं। प्राणमय कोष की प्राण अपानादि ५ वृत्तियां चेतन शक्ति की स्थूल क्रियायें हैं। चिति स्वरूप प्राण ही उपरोक्त श्रुति में ब्रह्म से उत्पन्न होने वाला सोम कहा गया है। अग्नि के उपरोक्त पांचों रूप अधिभौतिक स्तर पर बताये गये हैं, वे परस्पर में संबंधित हैं और एक अग्नि के ही रूपान्तर हैं और उन

सौंदर्य लहरी

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का चन्द्रमा से भी संबंध है। अब आध्यात्म रूप समझाते हैं। जैसे पृथिवी के गर्भ में सात पाताल माने जाते हैं, वैसे ही देह के अधो-भाग में चरणों का तलभाग, ऊपर का भाग, गुल्फ, जंघा, जानु, ऊरु और नितंब सात पाताल समझे जाते हैं इनमें फैली हुई नाड़ियां मणिपूर चक्र से निकलती हैं, इनके द्वारा जो अग्नि इन अंगों को तप्त रखता है वह पातालाग्नि है। उसका स्थान मूलाधार तक है। वह ही अग्नि ऊपर के भाग में हड्डियों में व्याप्त है उसे पार्थिव अग्नि कहा गया है। आस्थि, मज्जा और शुक्र में भी यह ही पार्थिव अग्नि कार्य करता है। शुक्र में भी दो शक्तियां कार्य करती हैं, मज्जा से बनने के कारण उसमें एक प्रजनन शक्ति वाला भाग है, दूसरा प्राण शक्ति वाला भाग। प्रजनन के लिये प्राण शक्ति आवश्यक नहीं होती, इसलिये प्रश्नो पनिषद् में कहा है कि रात्रि में रतिक्रिया के रमण करने वालों की प्राण शक्ति का ह्रास नही होता, और वह ब्रह्मचारी के ही तुल्य हैं, परन्तु दिन में रमण करने वालों के प्राण भी नष्ट होते हैं, इसलिये दिन को रतिक्रिया का निषेध है।

प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्यासंयुज्यन्ते,
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्यासंयुज्यन्ते ।

(प्र० १, १३)

प्रजनन द्रव्य में सातों धातुओं का बीज है, वह भाग ऊर्ध्व होकर अन्नमय कोष को पुष्ट करेगा, और दूसरा प्राण वाला भाग प्राणमय को पुष्ट करेगा । और इस स्तर पर दोनों का पृथकरण होने से अन्नमय कोष से प्राणमय कोष का पृथकरण

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होगा। शुक्र में दोनों कोषों की बीजरूप से ग्रंथि रहती है, उसके टूटने से दोनों कोषों की गांठ खुल जायगी। इसलिये कामवासना की वृद्धि से यह ग्रंथि दृढ होती है और ब्रह्मचर्य अर्थात् उर्द्धवरेता होने से यह ग्रंथि शिथिल होती है। प्रजनन शक्ति वाले द्रव्य से प्राण शक्ति का पृथक्करण होने पर वह विद्युत्ताग्नि, सूर्याग्नि-क्रम से सोम में परिणत हो जायगी। प्राण का सोम से पृथक्कर दूसरी ग्रंथि का और सोम का आत्मत्व में लयकरण तीसरी ग्रंथि का बेध है।

दूसरा प्रजनन शक्तियुक्त द्रव्य जो रुधिर के और अण्डकोषों के रस के योग से बनता है वह भी प्राण शक्तियुक्त होता है, परन्तु वहां दोनों का वीर्य में एकीकरण रहता है। स्वाधिष्ठान में जल और अग्नि का संधि स्थान है, इसलिये जलस्थ अग्नि को बडवाग्नि नाम दिया गया है। समुद्र में रहने वाले अग्नि को वडवानल कहते हैं। मणिपूर में सौदामिनी स्वरूपा विद्युत् अग्नि है, जिसको अन्न को पचाने वाला वैश्वानर अग्नि भी कहते हैं, उसको समान वायु भी कहते हैं और उसे ही स्वान्तरात्मा कहा गया है।

जब कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है, तब उसे मूलाग्नि का प्रज्वलन समझना चाहिये। जिसकी क्रिया नीचे पैरों में और ऊपर हड्डियों में होती है, और साथ ही जल में भी। अर्थात् मांस, रुधिर मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा, शुक्र सातों धातुएं संतप्त हो जाती हैं। इनके क्षुब्ध अथवा मथन होने से शुक्र (वीर्य) की आहुति मूलाधार में पडती है। वह बहिर्मुख होकर जब स्त्री के गर्भाशय में पोषण पाता है तो एक नये शरीर की रचना करता है, परन्तु जब अन्तर्मुखी होकर उसकी मूलाग्नि में आहुति दी जाती है

सौंदर्य लहरी २२३

तो वह ऊर्ध्व मुख होकर सूक्ष्म स्तरों पर चढ़ने लगता है। जिसको ब्रह्मचर्य कहते हैं। उन सूक्ष्म स्तरों पर चढ़ने की क्रिया को अन्तः पंचाग्नि याग कहते हैं। छान्दोग्य उपनिषद में प्राकृतिक बाह्य पंचाग्नियाग का वर्णन है, योग शिखोपनिषद में लयाभिमुख अन्तर्याग का संकेत है।

जैसे सूर्य का ताप वायु मण्डल के भूमि के निकटस्थ निम्न स्तरों को ही संतप्त कर सकता है, ऊपर के पर्वत शिखरों के स्तर को नहीं तपा सकता, जिसका कारण यह है कि निम्न स्तरों की वायु भूमि की उष्णता से अथवा समुद्र के जल की उष्णता से तप्त होकर उष्ण हो जाती है, परन्तु ऊपर के स्तरों की तरल वायु उतनी तप्त नहीं हो सकती। इसी प्रकार जब सूर्य अधोमुख होता है तो देह की सब धातुओं को संतप्त कर देता है, और उसको विष बरसाने वाला कहा जाता है। परन्तु जब वह ऊर्ध्व मुख होता है तब सुषुम्ना पथ के सूक्ष्म स्तरों पर चमकने लगता है, और उसकी देह को संतप्त करने वाली शक्ति ऊर्ध्व गामिनी हो जाती है, जिससे ऊपर के अमध्यस्थ चन्द्र मण्डल पर प्रकाश पड़ने लगता है। उस प्रकाश को सोम कहते हैं। चन्द्रमा का नाम सोम भी है। और मध्य के विशुद्ध चक्र पर विशुद्ध सोम का ही प्रकाश चमकने लगता है।

वास्तव में अग्नि, विद्युत् और सूर्य तीनों एक ब्रह्म तेज से ही प्रकाशमान है। इसीप्रकार पांचों अग्नियां एक चिति शक्ति से प्रकाशमान समझनी चाहियें, और चिति शक्ति का स्थान आज्ञा

२२५ | सौंदर्य लहरी


चक्र के ऊपर है, और सोम ही उसका शुद्ध स्वरूप है, इसलिये उसे पर विन्दु अथवा ब्रह्म का पर रूप कहते हैं ।

जिन साधकों की कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं हुआ है,

| श्रद्धा का<br>ब्रह्मचर्य से<br>सम्बन्ध | परन्तु ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, उनको अपनी श्रद्धा पर संयम करना अत्यावश्यक है । क्योंकि जब तक काम वासना का वेग कार्य करता रहता है, शुक्र अन्तर्मुखी नहीं हो सकता । |

काम वासना भी स्त्रीसंग की ओर प्रेरणा करने वाली एक प्रकार की राजसी श्रद्धा का ही रूप है । जब सात्विक श्रद्धा का उदय होता है और देव बुद्धि अथवा पूज्य बुद्धि उत्पन्न होती है, तब तुरन्त काम वासना शान्त हो जाया करती है । श्रद्धा ही बहिर्मुखी होकर सृष्टि का कारण बन जाती है जैसा ऊपर पंचाग्नि विद्या में कहा गया है और अन्तर्मुखी रहने पर श्रद्धा ही मोक्ष का साधन होती है । इसलिये श्रद्धा को सात्विक रखने पर स्थूल विन्दु की ऊर्ध्व गति संभव है, अन्यथा नहीं । देवता उसकी आहुति सृष्टि के हेतु बहिर्यागार्थ निम्न स्तरों पर देते हैं और मुमुक्षु आत्मचिन्तन रूपी अन्तर्याग द्वारा उसको उलट क्रम का अनुष्ठान करता है ।

गुरु शिष्य का संबंध भी श्रद्धा के सूत्र से बंधा होता है । इसलिये गुरु शिष्य के संबंध पर भी कुछ विचार प्रकट कर के हम यहां विषयान्तर के दोष को पाठकों के लाभार्थ ग्रहण करते हैं ।

<u>गुरु और शिष्य का सम्बन्ध और श्रद्धा ।</u>

गुरु और शिष्य में जो संबंध होता है, उसका सूत्र एक मात्र शिष्य की गुरु के प्रति श्रद्धा ही है । यदि शिष्य की श्रद्धा शिथिल

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हो जाय, तो वह संबंध भी शिथिल हो जाता है । यह संबंध वास्तव में एक-पक्षी ही है, उभय-पक्षी नहीं। क्योंकि गुरु की शिष्य के प्रति श्रद्धा की भावना का होना संभव नहीं, श्रद्धा सदा अपने से बड़ों के प्रति ही हुआ करती है। परन्तु श्रद्धा की प्रतिक्रिया भी प्रेम के रूप में प्रकट हुआ करती है, जिससे शिष्य को गुरु की विद्या फलीभूत होती है। शिष्य गुरु की शरण में श्रद्धा की प्रेरणा से प्रेरित होकर जाता है, कि उसको वहां से उसकी जिज्ञास्य विद्या की उपलब्धि होगी। और आध्यात्म पथ का पथिक गुरु से भौतिक स्तर पर उस प्रकाश की जिज्ञासा रखता है जो उसे तीनों तापों से मुक्त करदे । इसलिये वह ज्ञानी गुरु की खोज करता है परोक्षज्ञानी की नहीं, वरन् अनुभवी तत्व ज्ञानी की। श्री भगवान ने भी ऐसे ही ज्ञानी गुरु की शरण में जाने का आदेश किया है:— यथा,

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥ गीता ॥

ज्ञानी गुरु योगी तो होना ही चाहिये, क्योंकि बिना योग संसिद्धि के ज्ञान नहीं होता, श्री भगवान् स्वयं कहते हैं कि:—

'तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । गीता ।

परन्तु योग से भोग और भोगों से रोग भी होते हैं, यह देखने में आता है । इसलिये यदि गुरु में योग के साथ-साथ भोग भी हों तो हर्ष की बात है, क्योंकि योगी के पास भोगों की समृद्धि उसकी सिद्धियों का परिचय देती है। परन्तु भोगों के साथ रोग भी गुरु की

२२६ | सौंदर्य लहरी

सेवा में आ उपस्थित हों और रोगों के निवारणार्थ गुरु घबरा कर साधारण डाक्टरों वैद्यों का आश्रय ढूंढता फिरे, तो उसके योग को बट्टा लग जाने की आशंका है । और उससे शिष्य की श्रद्धा में भी ठेस लगने की संभावना है ।

भोग और रोग दोनों पूर्वार्जित् प्रारब्ध कर्मों का भी फल हो सकते हैं, जिनका योग की सिद्धि से कोई संबंध नहीं होता, परन्तु एक योगी और ज्ञानी महापुरुष से यह भी आशा की जाती है कि वह वीतराग होने के कारण भोगों में फंसेगा नहीं, और योगज और प्रारब्धज दोनों प्रकार के भोगों को पास नहीं फटकने देगा, यदि उनसे रोग उत्पन्न होते दिखते हैं, और यदि प्रारब्धवश रोगों का आक्रमण भी हो, तो अपने योग बल से उनको परास्त करता हुआ उन्हें वह सहन करेगा, न कि साधारण मनुष्य के सदृश भोगासक्ति का कुपथ्य करके उनका पोषण करेगा ।

यदि किसी गुरु को भोगासक्त और रोगाक्रांत देखा जाय, तो स्वभावतः शिष्य की श्रद्धा भंग हो जाने में आश्चर्य नहीं । परन्तु उसका दुष्परिणाम शिष्य के लिये उसके सर्व-नाश का कारण बन जाता है ।

तैत्तिरीयोपनिषत् की ब्रह्मानन्दवल्ली के चतुर्थ अनुवाक् में श्रद्धा को विज्ञानात्मा का शिर बताया गया है, और योग को उसकी आत्मा । विज्ञानात्मा के ऋत् और सत्य दोनों पक्ष हैं और महत् उसकी प्रतिष्ठा पुच्छ है । शिर के कट जाने पर आत्मा शरीर को छोड देती है, और शिर के विकार से दोनों हाथ निकम्मे अर्थात्

सौंदर्य लहरी २२७

पक्षाघात के रोगी हो जाते हैं, और प्रतिष्ठा भी नहीं रहती। अर्थात् श्रद्धा की कमी होते ही उससे योग, सत्य और ऋत तीनों विदा होने लगते हैं और महत् का सहारा छूट जाता है। महत् से आनंदमय सगुण ब्रह्म का ही यहां अभिप्राय है, क्योंकि साधक की प्रतिष्ठा उसी के आधार पर होती है, न कि लोक प्रतिष्ठा पर। विज्ञानमय कोष का आधार आनन्दमय आत्मा ही है, उसे स्वयं परमात्मा का प्रतीक समझना चाहिये।

जब विज्ञानात्मा ही न रहा, तो मनोमय, प्राणमय और अन्नमय आत्मा की क्या दशा होगी यह पाठकगण स्वयं समझ सकते हैं।

मणिपूर चक्र

(४०)

तडित्वन्तं शक्त्या तिमिरपरिपन्थिस्फुरणया
स्फुरन्नानारत्नाभरणपरिणद्धेन्द्रधनुषम् ।
तव श्यामं मेघं कमपि मणिपूरैकशरणं
निषेवे वर्षन्तं हरमिहिरतप्तं त्रिभुवनम् ॥

शब्दः कमपि=जलको भी, हर=अग्नि ।

**अर्थः—**तेरे मणिपूर की शरण में गये हुए श्याम मेघों के रूप धारण करने वाले कं जल की भी सेवा करता हूं, जिन में अंधकार की परिपंथिनी अर्थात् प्रतिद्वंद्विनी बिजली की चमक आभरणों में जटित नाना रत्नों की चमक सदृश इन्द्रधनुष का

२३८ | सौँदर्य लहरी

रूप धारण किये हुए हैं, और जो अग्नि और सूर्य के ताप से संतप्त त्रिभुवन पर वर्षा कर रहे हैं।

मणिपूर चक्र में मेघेश्वर और सौदामिनी के रूप में शिव शक्ति का ध्यान बताया गया है। सूर्य का स्थान ऊपर सूर्य मण्डल में और अग्नि का स्थान नीचे स्वाधिष्ठान चक्रस्थ अग्नि मण्डल मे होने के कारण, दोनों के ताप से सारा देहरूपी तीन खण्डों का त्रिभुवन तप्त होने पर जल बाष्प रूप से मणिपूर चक्र मे मेघों का रूप धारण कर लेता है और मेघों मे अग्नि विद्युताकार चमकने लगती है। जिन को मेघेश्वर और सौदामिनी कहते हैं, और दोनों के योग से वर्षावत् सारे शरीर मे रस का सिंचाव होने लगता हैं।

मूलाधार

(४१)

तवाधारे मूले सह समयया लास्यपरया
शिवा ( नवा ) त्मान मन्ये नवरस महाताण्डवनटम् ।
उभाभ्यामेताभ्यामुद(भ)य विधिमुद्दिश्य दयया
सनाथाभ्यां जज्ञे जनक जननीमज्जगदिदम् ॥

अर्थः— तेरे मूलाधार में लास्यपरा अर्थात् नृत्य करती हुई समया देवी के साथ, नवधा रसपूर्ण ताण्डव नृत्य करने वाले नटेश्वर नवात्मा-शिवजी का मैं चिन्तन करता हूं। यह जगत् इन दोनों की जनक जननीवत् दया से प्रभवाभिमुख होने के कारण अपने को सनाथ मानता है।

सौन्दर्य लहरी

८२९


समया देवी मे समयाचार की उपास्य देवी निर्दिष्ट है, लास्य भगवती के नृत्य का नाम है और ताण्डव शंकर के नृत्य का नाम है । नवरस युक्त ताण्डव नृत्य को महा ताण्डव कहते हैं । नौ रस ये हैं— १. श्रृंगार, २. विभत्स, ३. रौद्र, ४. अद्भुत, ५. भयानक ६. वीर, ७. हास्य, ८. करुणा, ९. शान्त । ये नौरस साहित्य, कविता, नृत्य और गान विद्या के अंग हैं । नवात्मा शिवजी को कहते हैं, जिसकी व्याख्या ऊपर श्लोक ३४ के नीचे दी जा चुकी है ।

आधार चक्र में प्राण के निरोध होने पर योगी नृत्य करने लगता है, कहा है

आधार वात रोधेन शरीरं कम्पते यदा,
आधारवात रोधेन योगी नृत्यति सर्वदा ॥ यो. शि. ६ २८)
आधारवात रोधेन विश्वं तत्रैव दृश्यते ।
सृष्टिराधारमाधारमाधारे सर्व देवताः
आधारे सर्ववेदाश्चतस्मादाधारमाश्रयेत् ॥ (६, २९.)

अर्थ:— आधार चक्र में जब प्राण शक्ति का निरोध होता है, तब शरीर कांपने लगता है योगी नृत्य करने लगता है, और वहाँ ही विश्व दिखने लगता है । आधार चक्र में जो सृष्टि का आधार है, सब देवता, सब वेद रहते हैं । इसलिये आधार चक्र का आश्रय लेना चाहिये ।

समया देवी का नाम मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों के ध्यान में मिलता है, अन्य चक्रों के ध्यान में नहीं, इससे यह प्रतीत

२३० सौंदर्य लहरी


होता है कि शंकर भगवत्पाद ने इन दोनों चक्रों में विशेष रूप से समयाचार की ओर लक्ष्य कराया है, क्योंकि उनका ध्यान कौल मत वालों को ही अभिष्ट है। समयाचार वालों को ऊपर के चक्रों पर विशेष ध्यान देना चाहिये, मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों पर नहीं। इसका कारण हम अन्यत्र भी कह आये हैं। देखें श्लोक ९। स्वाधिष्ठान चक्र के वेध से वीर्यपात इत्यादि की क्रियायें होने की सम्भावना है, और ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के साधकों का उन क्रियाओं से पतन होने की आशंका है, इसलिये वेध क्रम को भी इसी प्रकार बताया गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र को नहीं छोड़ा जाता। यह स्मरण रहे कि ऊपर के अनाहत् अथवा आज्ञा चक्र का पूर्ण वेध होने पर नीचे के चक्रों का भी वेध स्वयं हो जाता है। इसलिये काम वासना की दीप्ति से रक्षा करने के लिये अनाहत् चक्र और आज्ञा चक्रों का अथवा नादानु-सन्धान का आश्रय लेना श्रेयस्कर है। हृदय चक्र में दहर विद्या, आज्ञा चक्र में शांभवी विद्या और नाद श्रवण तीनों के साधन शुद्ध और ऊंचे हैं। एक शांभवी मुद्रा के साधन से ऊर्ध्वरेतत् की सिद्धि के साथ २ खेचरत्व की सिद्धि हो जाती है। फिर बज्रौली क्रिया की झंझट वृथा मोल लेकर पथभ्रष्ट होने की संभावना का क्यों आवा-हन किया जाय।

पृथिवी तत्व की ६४ किरणें आधी २ ताण्डवनटेश्वर और लास्य परा समया देवी से उद्भूत समझनी चाहियें।

सौंदर्य लहरी २३१


शिव ताण्डव

हिरण्मयेनपात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ।
तत्त्वंपूषन्नपा वृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ (यजुर्वेद)

वेद कहते हैं कि सत्य का मुख सुवर्ण के पात्र से ढका हुआ है, मानो सत्य की देवी ने सुनहरी घूंघट से अपना सुंदर वदन छुपा लिया है, अथवा उसकी सुनहरी अलकें ही मुख पर आ पडी हैं जो घूंघट का काम कर रही हैं। यदि कहें कि सूर्य अपनी ही किरणों में स्वयं छुप गया है तो अधिक ठीक है। यह उपमा आत्मदेव के लिए दी गई है। अध्यात्म-सूर्य जो सत्य है, अपनी माया के सुनहरी पडदे में स्वयं अंतर्हित हो रहा है। कोई-कोई दार्शनिक विद्वान माया की अन्धकार से तुलना करते हैं, परन्तु माया का अर्थ सुवर्णमय विस्तार भी तो किया जाता है। क्या यह दूसरा अर्थ सुंदर नहीं है ? सुवर्ण किसको प्रिय नहीं लगता ? सुवर्ण में तो एक कांति चमकती है, अंधकार में कांति कहां ? इसलिये हम तो यह ही समझते हैं कि माया का पडदा अथवा घूंघट हिरण्यमय ही ठीक बखाना गया है, जिसके आकर्षण में पडकर जीव अनादिकाल से मर-मर कर भी उसका पीछा नहीं छोड़ रहा। आधुनिक युग का भौतिक विज्ञान तो इस सुनहरी घूंघट के सौंदर्य से संतुष्ट नहीं होता, उसने उस पर हजारों रहस्यमय तारे लगा दिये हैं, मानों प्रकृति के विद्युत्कण(electrons) अनंत संख्या में चमक रहे हैं। यद्यपि भौतिक विज्ञानियों की दृष्टि पडदे के पीछे छुपे हुये सत्य के मौलिक सौंदर्य तक नहीं जाती, तो भी वह अपने मनोरंजन में व्यस्त हैं। इसमें

२३२ सौंदर्य लहरी


किसी का क्या दोष है ? हिरण्मय घूंघट की ही शोभा इतना आकर्षण रखती है, कि उसे स्वयं आत्मदेव ने ही ओढ लिया है । अपना मुख छुपाने की दृष्टि से नहीं, परन्तु इसमें उसका अपने सौंदर्य का विकास करने का ही मुख्य उद्देश्य जान पडता है । शायद शून्यवादी इस रहस्य से परिचित नहीं है, उसका तो विश्वास यह जान पडता है कि घूंघट के पीछे कोई तत्त्व नहीं, केवल शून्य पर ही पददा पडा हुआ है, वास्तव में जांच तो उसकी किसी हद तक ठीक ही सी जान पडती है, परन्तु क्या शून्य का ही नाम सत्य है ? वेद मिथ्या क्यों बहकाने लगे । इसी धारणा से शायद बुड्ढे भारत के कतिपय पागल जिज्ञासु उस शून्य में ही मौलिक सत्य की खोज के लिये कटिबद्ध रहते हैं । जिसका घूंघट, जो उसी की किरणों की प्रभा की जाली से बना हुआ है, इतना सुंदर है, तो उस सत्य के मुख की शोभा कितनी ऊंची होना चाहिये । पाठकगण ! वह अनुमान का विषय नहीं है, परन्तु कोई-कोई सत्य के अन्वेषक साक्षि देते हैं कि वह अवश्य दर्शनीय है । इसलिये इन भौतिकवादियों की बातों में नहीं आना, उसे शून्य मत समझो, वह शून्य नहीं है, वरन् पूर्ण है, सुंदर है, स्वयं ज्योति स्वरूप है, सत्य है, अनंत ज्ञान निधि है, और आनंद का खजाना है । वह पददे में है दिखता नहीं तो यह नहीं समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व ही नहीं । ठीक बात तो यह ही है कि सूर्य अपनी किरणों में छुपा होने के कारण नहीं दिखाई दे रहा, बस यह बात बीसों बिसवे सत्य समझो ! उक्त हिरण्यमय पददे को ही गायत्री मंत्र 'भर्गो देवस्य' कहकर ध्यान करने का उपदेश करता है । तेज के ध्यान द्वारा तेजस्वी का ध्यान होता है, और शक्ति का ध्यान करने से शक्ति मान का ध्यान होता

सौंदर्य लहरी २३३

है। यहां पर तो सत्य ब्रह्म का भर्गस् (तेज) और उसकी शक्ति एक ही जान पडती है। सारा जगत्-पिण्ड और ब्रह्मांड उसी की परिणति मात्र है। शक्तिमान अपनी शक्ति के रूप में व्यक्त होता है, और शक्ति की द्युति उस ही की ज्योति का प्रकाश है। अर्थात् शक्ति में वह स्वयं चमकता है अथवा यों कहें कि शक्ति स्वयं शक्तिमान का तेजोमय प्रसार है, जिसकी अभिव्यक्ति किसी स्तर पर चेतनवत् दिखती है, और किसी स्तर पर जडवत्। जडचेतन की विभाग रेखा शक्ति और तेज दोनों की भिन्नता का मिथ्या ज्ञान है। और यदि दोनों को भिन्न मानें तो दोनों का इतरेत्तर अध्यास रूपी एक का दूसरे के धर्मों का अपने ऊपर अध्यारोपण कर लेना भी मिथ्या ज्ञान है। क्योंकि शक्ति में परिणामी धर्म स्पष्ट है परन्तु तेज का चेतन स्वरूप धर्म अपरिणामी है। परन्तु जड शरीर में चेतन के धर्मों का अध्यारोपण होने से चेतना भी परिणामिनीसी दीख पडती है, यद्यपि वह मौलिक रूप से अपरिणामी है, केवल उसकी जड शरीर पर पडने वाली छाया परिणामीवत् प्रतीत होती है। अर्थात् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' के मुख को ढकने वाला हिरण्यमय पात्र तेजोमय आजमान है, उस तेज में शक्ति है और शक्ति में तेज है। तेज से शक्ति में कांति है और उसकी तेजोमई प्रभा आदिमूल शक्ति की प्रत्येक स्तर की परिणति में चमक रही है। विद्युत-अणु में वह विद्युत् है और प्रत्येक विद्युत्-कण उसके तेज से परिपूर्ण है। अग्नि सूर्य सब में शक्ति है और शक्ति कहीं भी तेज से रहित नहीं। शक्ति रजोगुण और तमोगुण की विरोधी सापेक्षिक सक्रिय और क्रिया रहित परिणामों युक्त अनेक रूपों का स्वांग भरकर सर्वत्र

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नृत्य कर रही है और तेज भी युग पद् अपरिणामी होते हुए भो, उसके नृत्य के साथ ताण्डव करता रहता है । यह ही शिवशक्ति का अनादि जोडा है ।

यह समस्त जड-चेतनमय विश्व शंकर भगवान के अविराम ताण्डव नृत्य का अभिनय है और उनके ताण्डव के अंगहार अथवा अंग विक्षेप ही मानों सत् शक्ति के परिणामक्रम के विभिन्न स्तरों पर उसकी स्वांग भरी नृत्य कलाएं हैं, जिस शृंगार के नवधा-रस-परिपूर्ण हाव-भावों में शंकर के चिदानंद स्वरूप का प्रत्याभास हो रहा है । इस नृत्य को आनंद ब्रह्म के उन्मेश से प्रेरणा मिलती है और प्रलयकालीन विराम भी नृत्य के परिश्रम के अनंतर विश्रामरूपी आनंद का आभोगरूपी निमेश है । शिवजी के इस आनंदोन्मेशरूपी ताण्डव को वेदों ने संवर्तन कहा है और शंकर भगवत्पाद उसको विवर्तन कहते हैं । हमको तो दोनों शब्द एक ही अर्थ में प्रयुक्त हुये से दीखते हैं ।

शिवजी के ताण्डव नृत्य को तालबद्ध करने के लिये उन दिगम्बर एवं चिदम्बर के पास डमरू के वाद्य के सिवाय दूसरा यंत्र नहीं ! डमरू में दो विपरीत दिशाओं से शिव-शक्त्यात्मक दोनों ही प्रकार के शब्द ताल दिया करते हैं । जिनसे सरस्वती देवी अ-क--च-ट-त-प-यशों के वर्ण-वर्गों की वर्ण-माला की शिक्षा ग्रहण करके समस्त वैखरी वाणी की सृष्टि करती है । मानों शिवजी के डमरू की सहायता से ही वह वाक्शक्ति बोलना सीखती है और उसका अभ्यास अपनी वीणातंत्री पर किया करती हैं । अर्थात ताण्डव की तालों से निकलने वाली शिव-शक्त्यात्मक ध्वनि ही शंकर का

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डमरू वाद्य है, जिसको उनके चिदाकाशरूपी देह की स्पन्द-ध्वनि का वाचिक-व्यंजक अभिनय कह सकते हैं।

शिव तांडव का साक्षात् प्रत्यक्षी-करण तारों की टिमटिमाहट-रूपी डिमडिम में, ग्रहों के नृत्य में, सूर्य के नेत्रोल्हास में, पृथ्वी के षड्ऋतुओं के श्रृंगारयुक्त नाट्य में, चन्द्रमा की कलाओं में, विद्युत् की क्रीडा में, वसंत की मंद सुगंधित वायु के झकोरों में, पुष्पों के हास्य में, समुद्र की तरंगों में, हिमपात के हिमकणों के नर्तन में, आंधी तूफानों की द्रुत गति में, नदियों के कल-कल निनाद में, पर्वतों के श्रृंगार में, शस्य-श्यामा भूतल के आंचल के हिलोरों में, पशुपक्षियों की अटरखेलियों में और मनुष्य की मस्तीभरी चालों में, कहां नहीं ? सर्वत्र किया जा सकता है !

यह सब विराट्‌विश्व सृष्टि-प्रसार का निम्नतम स्तर रूपी मूलाधार है, जिसमें भगवती के इस लास्य नृत्य और शंकर के तांडव को युगपद् देखने वाले उपासक जीवन मुक्ति का आनंद लेते हैं। जो मूढ अपने तुच्छ स्वार्थों के अंधकार वश इसका साक्षात्कार नहीं कर पाते और मिथ्या अज्ञान वश शोक-मोह के कूपों में पड़े रोते हैं वे वास्तव में दया के पात्र हैं।

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