स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
प्रात: स्मरणीय ईश्वर-स्वरूप जी महाराज का आशीर्वाद श्री वसुगुप्ताचार्य के प्रधान शिष्य श्री भट्ट-कल्लट की स्पन्द-वृत्ति का हिन्दी अनुवाद, जिसे श्री गुरुटू जी ने अति प्रयास से किया है, देखकर हमारा मन अति प्रसन्न हुआ। स्पन्द-शास्त्र का विषय स्वभावतः अति गहन है। स्पन्द उस निर्विकल्प स्थिति को कहते हैं, जिसमें सारा विश्व त्वरितगति से चलायमान होने पर भी सामान्य अस्पन्दरूपता में ही अवस्थित है। विशेष-स्पन्द तो भेददृष्टि से देखने में आता है किन्तु सामान्य-स्पन्द की भित्ति पर ही वह विशेष-स्पन्द की स्थिति आधारित है। यह सामान्य-स्पन्द अन्तरातमा की वह दशा है जिसमें सभी गति, स्वरूप में ही होती रहती है, अतः इसे अस्पन्द-रूप स्पन्द यदि कहें तो अत्युक्ति न होगी। श्री गुरुटू जी ने हमें अपना अनूदित ग्रन्थ दिखाया। इन्होंने अपने गहन शैव-संप्रदाय के ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त यह अनुवाद किया है। इसमें सभी शैवी गुत्थियों को सुलझाया गया है। शैव सिद्धान्त के प्रेमियों के सम्मुख यह नवीन ग्रन्थ उनकी बरसों की पिपासा को शान्त करेगा—ऐसी धारणा है। ऐसा सुन्दर ग्रन्थ हिन्दी भाषा प्रेमियों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होगा। हमारा हार्दिक आशीर्वाद है कि श्री गुरुटू जी आगे भी शैवी ग्रन्थों का इसी प्रकार का अनुवाद करके संस्कृत से अनभिज्ञ हिन्दी-प्रेमियों को लाभान्वित करेंगे। ऐसा यदि होगा तो उनका प्रयास सफल सिद्ध होगा। लक्ष्मण जी ब्रह्मचारी, गुप्त गंगा, काश्मीर २१ अक्तूबर १९७६
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri स्वामी मुक्तानन्द Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
प्रकाशित हो रहा है, जानकर बड़ी खुशी हुई ।
आदरणीय स्वामी मुक्तानन्द जी का आशीर्वाद स्पन्दकारिका काश्मीर शैव-सिद्धान्त का एक उत्तम ग्रन्थ है । स्पन्द-शास्त्र वैज्ञानिक है । आधुनिक वैज्ञानिकों ने ऐसा पता लगाया है कि जगत् की उत्पत्ति एक बड़े प्रथम स्फोट के स्पन्दन से हुई है, जो अभी भी स्पन्दित हो रहा है और विश्व का विकास चालू है । लेकिन वे लोग अभी तक स्पन्द के मूल का पता नहीं लगा सके हैं । किन्तु हजारों वर्ष पूर्व के काश्मीर के शैव-सिद्धान्त के स्पन्द-शास्त्र ने बताया है कि परम तत्त्व की चैतन्य-शक्ति का स्फुरण ही वह स्पन्द है । इस चेतनामय प्रकाश-विमर्श-रूप परमेश्वर शिवजी के संकल्परूप उन्मेष- मात्र से जगत् की उत्पत्ति हुई है । ज्ञानेश्वर महाराज ने परमेश्वर की यह सतत-स्थिति का वर्णन 'विश्वविकसित मुद्रा' के शब्दों से किया है । इस रहस्य को प्रकट करनेवाला यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है, जानकर बड़ी खुशी हुई । आधुनिक वैज्ञानिक अपने ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए इस ग्रन्थ का उपयोग अवश्य करेंगे । अमेरिका में वैज्ञानिकों की सभा में मैं स्पन्द-शास्त्र का ज़िक्र हमेशा करता हूँ और वे इस विषय में उत्साहित रहते हैं और इसके बारे में ग्रन्थ पढ़ना चाहते हैं । इस उत्तम काश्मीरीय दर्शन का प्रसार करने में श्री नीलकण्ठ गुरुटू जो योगदान दे रहे हैं, इसका मैं स्वागत करता हूँ । वे महापुरुषों की संगति में तत्त्वान्वेषण करके सत्य का ज्ञान पाये हुए पुरुष हैं । इस ग्रन्थ में प्रतिपादित सत्य-दर्शन के ज्ञान द्वारा विश्व की जनता का कल्याण हो— इति आशीर्वाद । स्वामी मुक्तानन्द
भगवती शारिका का आशीर्वाद श्रद्धासम्पन्न श्री गुरुटू जी को स्पन्द-शक्ति-मय शिव आजीवन सफलता प्रदान करें। शुभाशीर्वाद सहित शारिका
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥
आमुख स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा । प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥ परिपूर्ण अनुत्तर-भाव प्रकाश एवं विमर्श की नीरक्षीरात्मक समरसता की अवस्था है । वह न तो एकान्तिक चित् है और न एकान्तिक आनन्द, अपितु दोनों के मिश्रित रूप चिदानन्द का एक ऐसा पारावार है जो कि इच्छात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक स्फुरणा के रूप में प्रतिसमय हिलकोरें लेता रहता है । अहं-विमर्श ही उस पर-तत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप में नित्य अवस्थित रहने वाली स्पन्द-शक्ति है । यही उस आलोकपुञ्ज का सारसर्वस्व, हृदय और उसमें प्रवेश पाने का लोकोत्तर सिंहद्वार है । इस विश्वात्मक स्फुरणा में ही विश्वमयता की हलचल अर्थात् इसके बहिर्मुखीन प्रसार, विश्वरूप में अवस्थित और अन्तर्मुखीन अनुत्तरधाम में ही पर्यन्तिक विश्रान्ति का रहस्य भरा हुआ है । यदि यह न होती तो कुछ न होता और शायद इस 'कुछ न होने' की जैसी कल्पना का भी नितान्त अभाव ही होता । प्रस्तुत कारिकाओं में इसी स्पन्द नामवाली पारमेश्वरी शक्ति का विश्लेषण एवं विवेचन प्रस्तुत किया गया है । जहां एक ओर भगवान सोमानन्द जैसे अनुभवी सिद्धों एवं प्रत्यभिज्ञा-शास्त्रियों ने पर- तत्त्व के प्रकाश पक्ष का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन किया, वहां दूसरी ओर स्पन्द-शास्त्रियों ने उसके विमर्शपक्ष का विश्लेषण करके, विश्वमयता में ही उसके परिपूर्ण रूप का दर्शन करवाया, हां केवल उस दिव्य आभा का दर्शन करने के लिए आंखें चाहिये । कश्मीर शैव-दर्शन का अमर सन्देश हिन्दी संसार तक पहुँचाने की कामना से स्पन्द- कारिका और उस पर श्री भट्टकल्लटाचार्य के द्वारा लिखी गई वृत्ति का हिन्दी अनुवाद पहली बार प्रस्तुत किया जा रहा है । अनुवाद के अलावा कारिकाओं के साथ अपनी ओर से अलग- अलग विवरण भी जोड़ दिये गये हैं । आशा है कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ परन्तु शैव- सिद्धान्त की मोटी-मोटी बातों को समझने के इच्छुक पाठक इस प्रयास से अवश्य लाभान्वित हो सकेंगे । स्पन्द-कारिकाओं पर श्रीभट्टकल्लटाचार्य के अतिरिक्त अन्य कतिपय आचार्यों ने भी टीकायें लिखी हैं, परन्तु आचार्यजी की लेखनी में गम्भीर आध्यात्मिक विषयों को अत्यन्त सरल शब्दों में और व्यावहारिक उदाहरणों के द्वारा बोधगम्य बनाने का जैसा अनोखा जादू भरा हुआ है, वैसा दूसरे टीकाकारों में अप्राप्य है । इसी कारण से प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद के लिए आचार्य जी की वृत्ति को ही चुना गया है । पाठकों की सुगमता के लिए इस पुस्तक की भूमिका में भी कुछेक विषयों का स्पष्टी- करण किया गया है । सत्यु शीतलनाथ श्रीनगर—कश्मीर नीलकंठ गुर्टू ८-११-१९७९
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CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri विषयानुक्रमणिका पहला-निःष्यन्द विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १ शक्तिमान् की वन्दना और स्पन्द-शक्ति का स्वरूप । १ १५ २ कर्तृता और कार्यता २ २५ ३ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वभाव की व्यापकता । ३ ३० ४ सुखिता, दुःखिता इत्यादि अनुभूतियों में एक ही अनुभावी की वर्तमानता । ४ ३४ ५ स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका का स्वरूप और स्पन्द-शक्ति की पारमार्थिक सत्ता । ५ ४२ ६ स्पन्द-शक्ति की अनुस्यूतता से ही जड़ इन्द्रियों में चेतना का संचार । ६,७ ४५ ७ मित-प्रमाता और आत्मबल । ८ ५० ८ क्षोभ के लयीभवन से परमपद में प्रतिष्ठा का लाभ । ९ ५४ ९ क्षोभ के लय होने पर स्वाभाविक ज्ञातृता और कर्तृता की अभिव्यक्ति । १० ६३ १० अभ्यास की दृढ़ता से अपने अन्तस् में ही स्पन्द-शक्ति की अनुभूति । ११ ६६ ११ अभाव-ब्रह्मवाद और सर्वशून्यवाद की अमान्यता । १२ ७१ १२ अभाव-समाधि की कृत्रिमता । १३ ७७ १३ कार्यता की भङ्गुरता और कर्तृता की अभङ्गुरता । १४ ८० १४ अभाव की भावना करने वाले साधक की अबुद्धता । १५ ८१ १५ अन्तर्मुखीन चित्-रूपता की अनश्वरता । १६ ८२ विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क १६ प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध योगियों में स्वरूप-अनुभूति का तारतम्य । १७ ८४ १७ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वरूप-उपलब्धि के विभिन्न रूप । १८ ८९ १८ स्वरूप-उपलब्ध हो जाने पर विशेष-स्पन्दों की बाधकता का अभाव । १९ ९२ १९ अप्रबुद्ध व्यक्तियों की आत्म-चेतना पर विशेष-स्पन्दों का आवरण । २० ९५ २० स्पन्द-शक्ति की अनुभूति के लिये निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता । २१ १०१ २१ जाग्रत् अवस्था में किन्हीं निश्चित अवसरों पर स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि । २२ १०४ २२ शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुख योगी की संकल्प-बद्धता, योगिक प्रक्रिया और अन्तिम लयीभवन । २३, २४, २५ १०७ दूसरा-निःष्यन्द १ मन्त्रों में आत्म-बल का संचार और उनकी वास्तविक शिवरूपता । १, २ ११२
२ वेद्योँ और वेदकों का संक्षोभ भी स्वरूप का ही विकास । २८, २९, ३० ११८ ३ मन्त्र-देवता और चित्त की एकाकारता का रूप । ३१, ३२ १२१-१२२ तीसरा-निःष्यन्द १ जाग्रत्-स्वातन्त्र्य और स्वातन्त्र्य । ३३, ३४, ३५ १२६ २ शाक्त-बल से अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट विषयों का ज्ञान । ३६, ३७ १३२ ३ शाक्त-बल पर अधिष्ठित योगी में सर्वकर्तृता का उदय । ३८, ३९ १३३ ४ ग्लानि का रूप, उससे शारीरिक विकारों का जन्म, उन्मेष के द्वारा उसका निवारण । ४०, ४१ १३६ ५ अवर सिद्धियाँ और मानसिक क्षोभ । ४२ १३८ ६ तीव्र-संकल्प के द्वारा महान् रहस्य की आकस्मिक अनुभूति । ४३ १४० ७ स्वरूप-व्यापकता की अनुभूति का उपाय । ४४ १४२ ८ ब्राह्मी आदि शक्तियों की भोग्यता ही पशुता है । ४५ १४५ ९ प्रत्ययोद्भव का रूप और इसके शिव-भाव की अख्याति । ४६, ४७, ४८ १५० १० पुर्यष्टक का रूप और उसकी विद्यमानता से संसृति का बखेड़ा । ४९, ५० १५७ ११ संसृति के टंटे को समाप्त करनेवाले हेतु का वर्णन । ५१ १६० १२ गुरु-भारती की वन्दना । ५२ १६३
भूमिका देवि प्रपन्नवरदे गुणगौरि गौरि यद्गौरियं परिमितं स्रवतीह किञ्चित् । तत्स्वामिने समुचिते समये सुपाक- माकूतवेदिनि निवेदयितुं प्रसीद ।। (कश्मीरिक श्रीजगद्धर भट्ट) प्रस्तुत प्रयास में जो कुछ भी अंकित हुआ है उसके विषय में केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि यह प्रातःस्मरणीय भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप जी महाराज की अन्तःप्रेरणा का साकार रूपमात्र है । अपना तो कुछ नहीं है । अकिञ्चन के पास होता भी क्या है ? कई वर्ष पहले एक दिन अकस्मात् भगवत्पाद के द्वारा, ईश्वराश्रम ('ईशबर' श्रीनगर-कश्मीर) में नियमित रूप से चलनेवाली रविवारसीय बैठकों में श्री भट्टकल्लट की वृत्ति के सहित स्पन्द-सूत्र को पढ़ाने का आदेश मिला । आदेश सुनते ही अन्तर्हृदय में किसी अननुभूतपूर्व धड़कन का आभास होने लगा । ऐसी बात नहीं थी कि इन बैठकों में कोई शैव ग्रन्थ पढ़ाने का यह पहला अवसर था, परन्तु भगवत्पाद के सामने स्पन्दसूत्र जैसे गम्भीर एवं अनुभूतिपरक विषय पर कुछ कहना मुझ जैसे अनाड़ी के लिए हृत्कम्प का कारण बन जाना स्वाभाविक ही था । अस्तु, आदेश तो आदेश ही था । इसमें अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था । बिल्कुल आदेशानुसार कार्य आरम्भ करना पड़ा । कुछेक शैवग्रन्थों का- स्पन्द के परिप्रेक्ष्य में, फिर से अध्ययन करना पड़ा परन्तु यथार्थ तो यह है कि इन सारे प्रयत्नों को आगे बढ़ाने में, भगवत्पाद की दयादृष्टि का सबल संबल ही मूल प्रेरणा- दायक तत्त्व था । यह संबल भी किसी अलक्षित रूप में स्वयं ही प्राप्त होता रहा । मन में, इसी बीच, अकस्मात् एक दिन यह संकल्प उठा कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ परन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिये, मूलसूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया जाये । अपने कई हितैषी मित्रों के समक्ष इस संकल्प को अभिव्यक्त किया । प्रत्युत्तर में उन्होंने इस दिशा में तुरन्त आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया और साथ ही यह सुझाव भी दिया कि मूलग्रन्थ के भाषानुवाद के साथ-साथ हर एक सूत्र पर अलग-अलग विवरण भी लिखा जाये ताकि रुचिसम्पन्न पाठकों को सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली शैव मान्यताओं को समझने में सहायता मिले । मित्रवर्ग के इस सहानुभूतिपूर्ण आग्रह को भी टालते न बना । सम्भवतः इतनी सी पूर्वपीठिका से यह बात स्वयं स्पष्ट हो जाती है कि प्रस्तुत प्रयास शैवशास्त्र के धुरन्धर एवं उद्भट विद्वानों के लिये कोई अर्थ नहीं रखता है । एक लघुदीपक
सूत्रों का पता बता दिया और उनमें अन्तर्निहित रहस्य को भी समझा दिया। साथ ही यह
२ स्पन्दकारिका मध्याह्न के प्रखर सहस्रकिरण को क्या प्रकाश दे सकता है ? तथापि मन में इस बात का पूर्ण विश्वास है कि इसको देखकर कम से कम उनके मन में निराशा के भाव का उदय नहीं होगा क्योंकि वर्तमान युग के चतुर्दिक् क्षुब्ध वातावरण में, मानवमात्र को हार्दिक शान्ति प्रदान करनेवाली, इस भारतीय पूर्वजों की थाती को आगे बढ़ाने की दिशा में, जितना भी और जो कुछ भी किया जाये बहुत कम है। फलतः यदि उल्लिखित बन्धुवर्ग को प्रस्तुत प्रयास के द्वारा अल्पमात्रा में भी हार्दिक संतोष प्राप्त होगा तो वह पारमेश्वर शक्तिपात का हो अलौकिक चमत्कार समझा जायेगा। स्पन्द-सूत्रों का वर्ण्य विषय सततस्पन्दमयी पारमेश्वरी विमर्शशक्ति होने के कारण, प्रस्तुत अनुवाद-कार्य ईश्वराश्रम में रहनेवाली तपस्विनी भगवती शारिकादेवी के ही एक जन्म- दिवस पर आरम्भ करके, दो वर्षों के पश्चात् आनेवाले दूसरे जन्मदिवस के अवसर पर, समाप्त भी किया गया। इस पुनीत दिवस पर जहां आश्रम में आनेवाले भक्तजन, भगवती के सामने स्वादिष्ट मिष्ठान्नों के ढेरों के ढेर एकत्रित कर लेते हैं, वहाँ किसी रिक्त कोने में अकिञ्चन की यह तुच्छ भेंट भी शायद अपना स्थान बनाने से सफल होगी। यहाँ पर पाठकों की उत्सुकता को शान्त करने के लिये भगवती शारिकादेवी का परिचय देना आवश्यक है। त्याग और तपस्या की साक्षात् मूर्ति भगवती शारिकादेवी श्रीसद्- गुरुमहाराज की मुख्य शिष्या हैं। जन्म १९१४ की मार्ग शुक्ल द्वितीया को एक समृद्धिशाली कश्मीरी पण्डित घराने में हुआ। पिता का नाम श्री जियालाल सोपोरी और माता का नाम सुश्री राधिकरानी था। आप में जन्मकाल से ही आध्यात्मिक भावनायें प्रस्फुटित थीं अतः आपने सांसारिक प्रलोभनों के बन्धनों में फँसना स्वीकार नहीं किया। केवल पंद्रह वर्ष की अवस्था ही में आपको सद्गुरुमहाराज से दीक्षा मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तब से ही आपने अपने अत्यन्त कठिन त्यागमय और साधनामय जीवन का लक्ष्य स्वरूपलाभ ही बनाया है। बाह्य-जगत् के क्षुब्ध एवं कोलाहलपूर्ण वातावरण में भी, आप प्रतिसमय मौन एवं शान्त रहकर, तन-मन से गुरुभक्ति एवं परमार्थ-विचार में ही लीन रहती हैं। स्पन्द-सम्प्रदाय कश्मीर के सभी शैवक्षेत्रों में, प्राचीनकाल से ही चली आ रही एक जनश्रुति के अनु- सार, नवीं शताब्दी ईसा से पहले की कई शताब्दियाँ, यहाँ के दार्शनिक संसार का अंधकार- युग माना जाता है। इस समय में नागबोधि जैसे प्रचण्ड बौद्ध आचार्यों और अन्य मताव- लम्बियों ने, यहाँ के दार्शनिक क्षेत्रमें द्वैत-मूलक सिद्धान्तों की स्थापना करके, सर्वसाधारण जनता को वास्तविकता से बहुत दूर ले जाकर, भ्रान्ति के गड्ढे में ढकेल दिया था। ऐसी अवस्था में पड़े हुए लोगों का उद्धार करने की इच्छा से, अनुग्रहैकमूर्ति भगवान् भूतनाथ ने, वसुगुप्त नामक सिद्ध को स्वप्नदशा में स्वयं दीक्षित करके, महादेव पर्वत की तलहटी (वर्तमान दाछीगाम) में विद्यमान एक उपल (वर्तमान शङ्कर-पल) पर उत्कीर्ण, अद्वैत शैव-सिद्धान्त के सूत्रों का पता बता दिया और उनमें अन्तर्निहित रहस्य को भी समझा दिया। साथ ही यह आदेश भी दिया कि वह वहाँ से उन सूत्रों का संग्रह करके, उनमें निहित रहस्य को अन्धकारा-
भूमिका ३ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri वृत लोगों को समझा कर, उनका उद्धार करे । सिद्ध वसुगुप्त ने भगवान् के आदेशानुसार वहाँ से उन सूत्रों का संग्रह किया और श्री भट्टकल्लट आदि सत्-शिष्यों को उनका यथावत् अध्ययन भी कराया । साथ ही स्वयं उन सूत्रों में वर्तमान, शक्तिमान् और शवित के पूर्ण अभेदसिद्धान्त का सार, इकावन कारिकाओं में संग्रहीत भी किया । आगे चलकर उन्हीं इकावन कारिकाओं को स्पन्दकारिका, स्पन्दसूत्र या शक्तिसूत्र की संज्ञा दी गई । श्री भट्ट कल्लट ने परतत्त्व की विमर्शप्रधानता के सिद्धान्त को अपनाकर इन स्पन्द- सूत्रों पर अपनी वृत्ति लिखी और स्पन्द-सम्प्रदाय का शिलान्यास किया । ऊपर उल्लेख किया गया है कि सिद्ध वसुगुप्त के द्वारा अद्वैत शैवदर्शन का पुनरुद्धार हुआ । वास्तव में उस समय इस दर्शन का दूसरी बार पुनरुद्धार हुआ । सिद्ध वसुगुप्त से पहले बहुत प्राचीनकाल में भी, प्रतिकूल विचारधाराओं के प्रचण्ड प्रहारों से, इसका उच्छेद हो चुका था । उस काल में भी भगवान् आशुतोष ने, अंधकार में पड़े हुए लोगों का उद्धार करने की इच्छा से, श्रीकण्ठ की मूर्ति धारण करके, भगवान् दुर्वासा के द्वारा इसका पुनरुद्धार करवाया था । इस घटना का उल्लेख भगवान् अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक के प्रथम आह्निक में विस्तारपूर्वक किया है । स्पन्द-सम्प्रदाय का उपलब्ध साहित्य जिस प्रकार सिद्ध वसुगुप्त के अनन्तर श्रीसोमानन्द और उसकी शिष्य-परम्परा ने एक से एक बढ़कर स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना करके विशाल प्रत्यभिज्ञा-साहित्य की सर्जना की उस प्रकार स्पन्द-सम्प्रदाय में ऐसे किसी मौलिक लेखक का नाम नहीं मिलता है जो इस विषय पर स्पन्दकारिका के अतिरिक्त अन्य किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना करता । इसका कारण क्या है, यह कुछ समझ में नहीं आता है । यह सोचना भी गलत है कि ऐसे ग्रन्थ लिखे तो गये होंगे परन्तु बाद में राजनैतिक विषमताओं के कारण काल-कवलित हो गये । यदि ऐसा ही हुआ होता तो प्रत्यभिज्ञा-साहित्य या शैवदर्शन के दूसरे प्राचीन आगम-ग्रन्थ या स्वयं स्पन्द- सूत्र ही उन विषमताओं के कठोर प्रहारों से कैसे बच सकते ? अतः स्पष्ट है कि स्पन्द विषय पर सिद्ध वसुगुप्त के अनन्तर, स्पन्द-कारिकाओं के अतिरिक्त, कोई मौलिक ग्रन्थ नहीं लिखा गया । इस विचार में भी कोई सार नहीं दिखता कि कश्मीर में अधिकतर संख्या शैवों की ही रही है शाक्तों की नहीं । आजकल भी यहाँ शाक्त-क्रम पर चलनेवाले लोगों की कमी नहीं है । फिर इसमें क्या कारण हो सकता है, यह स्वयं शिवभट्टारक ही जानते हैं । स्पन्द-सूत्रों पर बहुत सी वृत्तियां या टीकायें अवश्य लिखी गईं । इनमें से कई आज भी उपलब्ध हैं और कइयों का केवल उल्लेख मिलता है । अभिनवगुप्तपाद के प्रधान शिष्य श्रीक्षेमराजाचार्य ने अपने स्पन्द-निर्णय में अनेकों विवृत्तियों का उल्लेख किया है :— 'यद्यप्यस्मिन् विवृत्तिगणना विद्यते नैव शास्त्रे' ॥ उन्होंने विशेषतः सूत्राङ्क १७ और १८ की व्याख्या में भट्टलोल्लट की वृत्ति और अन्य टीकाकारों की टीकाओं का उल्लेख किया है । ये वृत्तियां या टीकायें उनके समय में उपलब्ध रही होंगी परन्तु दुर्भाग्य से आजकल उपलब्ध नहीं हैं । आजकल जो वृत्तियां या टीकायें उपलब्ध हैं उनका ब्योरा निम्नलिखित प्रकार से है :— Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
४ स्पन्दकारिका I. श्री भट्ट कल्लट की स्पन्दकारिकावृत्ति । पाठकों के हाथों में इसी वृत्ति का भाषानुवाद है । II. श्री क्षेमराज का स्पन्द-सन्दोह । यह केवल पहले ही स्पन्द-सूत्र पर लिखी गई एक विस्तृत टीका है और इसी में अन्य सारे सूत्रों का सार संगृहीत किया गया है । III. श्री क्षेमराज का ही स्पन्द-निर्णय । इसमें सारे स्पन्द-सूत्रों पर अलग-अलग टीका लिखी गई है । IV. श्री रामकंठ की स्पन्दकारिका-विवृति । यह विवृति श्री भट्ट कल्लट की वृत्ति का आशय पूर्णतया प्रकाश में लाने के अभिप्राय से लिखी गई है । V. श्री उत्पल (वैष्णव) की स्पन्द-प्रदीपिका । यह भी सारे स्पन्द-सूत्रों पर लिखी गई विस्तृत टीका है । श्री उत्पल (वैष्णव) के विषय में यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि यह व्यक्ति ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के लेखक भगवान् उत्पलदेव से भिन्न कोई दूसरा व्यक्ति था । इस उपलब्ध साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह तथ्य भली-भाँति समझ में आता है कि इन टीकाकारों में बहुधा पारस्परिक मतभेद और दृष्टिकोणों की भिन्नता रही है । प्रत्येक लेखक ने किसी विशेष आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अपनाकर ही सूत्रों की व्याख्या की है । सिद्ध वसुगुप्त और श्री भट्ट कल्लट का समय इसमें न तो किसी प्रकार का खेद है और न कोई आश्चर्य कि इन दोनों सिद्ध पुरुषों ने अपने जीवनवृत्त या वंशावली के विषय में कहीं कुछ भी नहीं लिखा है क्योंकि ऐसा करने में इन्होंने विशुद्ध भारतीय मर्यादा का ही पालन किया है । परवर्ती लेखकों ने भी इनके विषय में जितना उल्लेख किया है उससे केवल इतना ज्ञात होता है कि अर्वाचीन शैवक्षेत्र इनको सिद्ध गुरुओं के रूप में स्मरण करते आये हैं । क्षेमराजाचार्य ने स्पन्द-निर्णय के उपोद्घात में उल्लिखित जनश्रुति का उल्लेख करने के अवसर पर, जहाँ सिद्ध वसुगुप्त का मात्र नामनिर्देश किया है वहाँ श्री भट्ट कल्लट की प्रासङ्गिक चर्चा भी नहीं की है । आचार्यजी ने केवल शिवसूत्र विमर्शिनी के उपोद्घातमें सिद्ध वसुगुप्त को महामाहेश्वर सिद्धगुरु और श्री भट्ट कल्लट को उनके अन्यतम शिष्य के रूप में स्वीकार किया है । इसके प्रतिकूल कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहास कार कल्हण ने अपनी राजतरङ्गिणी में, मुख्यरूप में, श्री भट्ट कल्लट का ही नाम लेकर, उसके समकालीन अन्य सिद्धों का 'आदि' शब्द से गौणरूप में ही निर्देश किया है । अनुग्रहाय लोकानां भट्टश्रीकल्लटादयः । अवन्तिवर्मणः काले सिद्धा भूममवातरन् ॥ (राजतरङ्गिणीः ५, ६६) इन दोनों के अतिरिक्त दूसरे शैव लेखकों ने भी अपनी कृतियों में इन दोनों का, गुरु और शिष्य के रूप में, केवल नामोल्लेख किया है । अतः इस विषय में तबतक मौन का आश्रय लेना ही श्रेयस्कर है जबतक इसपर अलग शोध न किया जाये । जहाँतक इन दोनों के समय का सम्बन्ध है, हमें श्री कल्हण का परम आभार स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि उन्होंने इस समस्या का समाधान करके रखा है । अभी ऊपर जो राज-
भूमिका ५ तरङ्गिणी का पद्य उद्धृत किया गया है उसके अनुसार श्री भट्ट कल्लट और अन्य कई सिद्धों ने, लोगों पर अनुग्रह करने के लिए, कश्मीर के प्रसिद्ध राजा अवन्तिवर्म्मन् के शासनकाल में पृथिवी पर अवतार लिया था। श्री कल्हण ने राजतरङ्गिणी के ही एक अन्य पद्य में अवन्ति- वर्म्मन् के राज्याधिरोहण का काल लौकिक संवत् २९०० बताया है। श्लोक इस प्रकार है :- एकोनत्रिंशे वर्षेऽथ प्रजाविप्लवशान्तये । विनिर्वायोत्पलापीडं तमेव नृपति व्यधात् ॥ (राजतरङ्गिणी : ४, ७१६) यह संवत् श्री स्टैन महोदय की गणना के अनुसार ईस्वी ८५५/५६ बैठता है। अवन्तिवर्म्मन् का राज्यकाल ३१ वर्ष का रहा है अतः ईस्वी सन् ८८६/८७ अवन्तिवर्म्मन् के समय की अपर सीमा है। सिद्ध वसुगुप्त और श्री भट्ट कल्लट आपस में गुरु और शिष्य रहे हैं अतः उनके समकालीन होने में तनिक भी संशय नहीं। दूसरी ओर कल्हण ने श्रीभट्ट कल्लट को सिद्ध के रूप में स्मरण किया है। उसको सिद्धावस्था प्राप्त करने में कम से कम पचास वर्ष तो लगे ही होंगे। अतः यदि उसके प्रादुर्भाव का समय नवीं शताब्दी का आरम्भ माना जाये तो सिद्ध वसुगुप्त के प्रादुर्भाव का समय बीस वर्ष प्रति पीढ़ी के हिसाब से पीछे लेकर आठवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मानना युक्तियुक्त होगा। स्पन्द-सूत्रों का वास्तविक लेखक इस सम्बन्ध में भी प्राचीनकाल से ही यहां के शैव आचार्यों में पारस्परिक मत-भेद चलता आ रहा है। आजतक भी यह प्रश्न विवादग्रस्त ही है और इसका कोई निश्चित एवं संतोषजनक समाधान प्राप्त नहीं हो सका है। कई आचार्यों के विचार में मूल सूत्रों की रचना स्वयं सिद्ध वसुगुप्त ने ही की है और भट्ट कल्लट ने गुरु की सूत्रात्मक भाषा का आशय सम- झाने के लिए इनपर वृत्ति लिखी है। आजकल भी यहाँ के शैव क्षेत्रों में बहुमत इसी मान्यता का समर्थन कर रहा है। इसके प्रतिकूल कई आचार्यों का मत यह है कि मूलसूत्रों की रचना श्री भट्ट कल्लट ने की है और अपनी ही भाषा का अभिप्राय स्पष्ट करने के लिये इन पर स्वयं ही वृत्ति भी लिखी है। इस दूसरी मान्यता के समर्थकों में स्पन्दप्रदीपिका के लेखक श्री उत्पल (वैष्णव) और शिवसूत्रवार्त्तिक के लेखक श्री भास्कराचार्य प्रमुख हैं। श्री उत्पल का कथन है कि श्री भट्ट कल्लट को तत्त्वदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य मिला और उसने इसको श्लोकबद्ध किया— वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः । रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्रीभट्टकल्लटः॥ (स्प० प्र० ५३ वां पद्य) श्री भास्कराचार्य ने, अपने शिवसूत्रवार्त्तिक के उपोद्घात में पूर्वोक्त जनश्रुति का उल्लेख करते हुए, अपनी यह मान्यता प्रस्तुत की है कि प्राचीन समय में गुरु वसुगुप्त को, किसी सिद्ध के आदेश से महादेव पर्वत पर शिवसूत्र मिले थे। उसने वे सूत्र और उनका रहस्य श्री भट्ट कल्लट को दे दिया। सूत्र चार खण्डों में विभक्त थे। श्री भट्ट कल्लट ने इनमें से
६ स्पन्दकारिका पहले तीन खण्डों की व्याख्या अपने स्पन्द-सूत्रों में और अन्तिम खण्ड की व्याख्या अपनी 'तत्त्वार्थचिन्तामणि' नामक टीका में की। श्री भास्कराचार्य के शब्द इस प्रकार हैं- श्रीमन्महादेवगिरौ वसुगुप्तगुरोः पुरा । सिद्धादेशात्प्रादुरासन् शिवसूत्राणि तस्य हि ॥ सरहस्यान्यतः सोऽपि प्रदाद्भट्टाय सूरये । श्रीकल्लटाय सोऽप्येवं चतुःखण्डानि तान्यथ ॥ व्याकरोत्रिकमेतेभ्यः स्पन्दसूत्रैः स्वकैस्ततः । तत्त्वार्थचिन्तामण्याख्यटीकया खण्डमन्तिमम् ॥ (शिवसूत्रवार्त्तिक उपोद्घात) श्री उत्पल (वैष्णव) और श्रीभास्कर की इस मान्यता का आधार क्या है, इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता है और न इन्होंने स्वयं ही इस विषय में कुछ कहा है । श्री क्षेमराजाचार्य का मत है कि सूत्रों की रचना स्वयं सिद्ध वसुगुप्त ने ही की है । उन्होंने अपनी इस मान्यता को स्पन्दनिर्णय के अन्त में अपनी ओर से जोड़े हुए एक पद्य में अभिव्यक्त किया है। वह पद्य इस प्रकार है- लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं हृद्गुहान्तकृतनिहितेः । वसुगुप्तवच्छिवाय हि भवति सदा सर्वलोकस्य ॥ (स्पन्दनिर्णय ४, २) जहाँतक श्री रामकण्ठाचार्य की विवृति का सम्बन्ध है उससे भी, पाठक को, किसी अन्तिम एवं निश्चित निर्णय पर पहुँचने में कोई सहायता नहीं मिलती है। यहाँ के रिसर्च कार्यालय द्वारा प्रकाशित विवृति (संवत् १९६९ संस्करण) के पृष्ठांक ३ पर उल्लिखित 'केनापि ग्रथितां प्रसारणधिया........' इत्यादि उपोद्घातात्मक पद्य में श्रीरामकण्ठाचार्य ने सूत्रावली को ग्रथन करनेवाले किसी निश्चित व्यक्ति का नाम नहीं लिया है। इसी पद्य पर लिखी हुई टिप्पणी में स्पष्ट शब्दों में लिखा हुआ है कि श्री वसुगुप्तपाद ने ही सर्वप्रथम सूत्रा- वली की रचना की है- 'प्रथमं वसुगुप्तपादैः सूत्रावलिः दृब्धा' । यह टिप्पणी चाहे किसी ने भी लिखी हो, परन्तु किस आधार पर लिखी है इसका सूत्र कहीं भी प्राप्य नहीं है। दूसरी ओर आचार्य जी ने 'अगाधसंशया.............' इत्यादि अन्तिम पद्य की विवृति में गुरु वसुगुप्त का नाम तो लिया है परन्तु स्पष्ट शब्दों में उसको सूत्रकार उद्घोषित नहीं किया है। यदि यह माना भी जाये कि आचार्य जी श्री भट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में थे, तो भी इस शंका का समाधान नहीं होने पाता कि उन्होंने फिर यह बात किसी स्थान पर स्पष्ट शब्दों में क्यों नहीं लिखी ? साथ ही आचार्य जी के इन शब्दों से यह स्थिति भी पूर्णतया स्पष्ट नहीं हो जाती है कि क्या गुरु वसुगुप्त ने अपने शिष्य को अद्वैत-सिद्धान्त का रहस्य सूत्ररूप में दिया था या मौखिक उपदेश के रूप में ? आज से कुछ दिन पहले प्रस्तुत लेखक के परम आदरणीय गुरुवर्य डा० बलजिन्नाथ पण्डित शिमला से यहाँ पधारे थे। ईश्वर आश्रम में श्री सद्गुरु ईश्वर स्वरूप जी महाराज के
भूमिका ७ समक्ष ही सौभाग्यवश उनसे भेंट हुई और प्रस्तुत विषय की चर्चा भी छिड़ गई। डा० महोदय श्रीभट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में हैं। इस विषय में वे उल्लिखित श्री भास्कराचार्य की मान्यता को ही श्री क्षेमराजाचार्य की मान्यता की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक मानते हैं। साथ ही उनका कथन है कि उनके गुरुमहाराज प्रातःस्मरणीय श्री अमृतवाग्भ- वाचार्य महाराज का मत भी यही है। इसके प्रतिकूल श्री सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज अपने गुरुक्रम से चली आ रही परम्परा के आधार पर, सिद्ध वसुगुप्त को मूलसूत्रकार मानते हैं। अस्तु, परमेश्वरस्वरूप गुरुओं की बातें गुरु ही जानें। प्रस्तुत लेखक को, उनकी मान्य- ताओं को उचित या अनुचित ठहराने का न तो कोई अधिकार है और न उसमें ऐसा साहस है। केवल अपनी ओर से इतना नम्र निवेदन है कि यदि श्रीभट्ट कल्लट के अपने ही पद्य— अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् । वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥ (स्पन्दकारिकावृत्ति ५२ वाँ पद्य) के अर्थ पर निष्पक्षता से विचार किया जाये, तो सहज ही में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वास्तव में सूत्रकार होने का श्रेय सिद्ध वसुगुप्त को प्राप्त है। मूल स्पन्दसूत्रों की संख्या ५१ है। श्रीक्षेमराजाचार्य ने भी स्पन्दनिर्णय के उपोद्घात में मूलसूत्रों की यही संख्या बताई है। इससे यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि उल्लिखित कारिका श्रीभट्ट कल्लट ने मूल- सूत्रों पर वृत्ति लिखने के अनन्तर, गुरुभारती की वन्दना करने के लिये, अपनी ओर से जोड़ दी है। यदि मूलसूत्र भी उनके अपने ही शब्द होते तो सम्भवतः उनको यह कारिका लिखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई भी विवेकशाली व्यक्ति, अपने ही शब्दों को 'गुरुभारती' का नाम देकर और कारिका में वर्णित विशेषणों से सजाकर, स्वयं ही उनकी वन्दना करता हुआ देखा नहीं जाता है। अतः सिद्ध वसुगुप्त के ही मूलसूत्रकार होने की मान्यता स्वयं वृत्ति- कार के ही शब्दों से प्रमाणित होती है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत अनुवाद के ही मूल पुस्तक, यहाँ के रिसर्च कार्यालय द्वारा प्रकाशित स्पन्दकारिका (श्री कल्लटाचार्य वृत्ति-संवत् १८७० संस्करण) के अन्त में, तीन श्लोकों का एक अलग परिशिष्ट जैसा छपाया गया है। ये तीन श्लोक श्रीभट्ट कल्लट ने लिखे हैं अथवा किसी और ने, कुछ पता नहीं है। इनमें से दूसरा श्लोक इस प्रकार है— दृब्धं महादेवगिरौ महेशस्वप्नोपदिष्टाच्छिवसूत्रसिन्धोः । स्पन्दामृतं यद्वसुगुप्तपादैः श्रीकल्लटस्तत्प्रकटीचकार ॥ उल्लिखित श्लोकों की रचना चाहे जिस किसी व्यक्ति ने की हो परन्तु यहाँ पर उद्धृत श्लोक, स्पष्ट शब्दों में, वसुगुप्तपाद को ही सूत्रकार और श्री भट्टकल्लट को वृत्तिकार उद्घोषित करता है।
८ स्पन्दकारिका अस्तु, यद्यपि बहुमत इसी मान्यता के पक्ष में है तथापि इस सम्बन्ध में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये निष्पक्ष शोधकार्य की आवश्यकता है । स्पन्द क्या है ? शिवशक्तिसामरस्य ही, सदाशिव तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक, सारे जड़-चेतनात्मक विश्व का आधार-भूत एवं शाश्वत यथार्थ है । स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी कहते हैं । इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है । शिव और शक्ति अथवा प्रकाश और विमर्श यह केवल कहने-सुनने के लिये मात्र औपचारिक द्वित्व है । वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक सामरस्य है । अस्तु, विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है । यदि प्रकाश में प्राणभूत स्पन्दना न हो तो प्रकाश की सत्ता ही क्या ? शक्तिहीन शिव की कल्पना शव की कल्पन अधिक नहीं । फलतः प्रकाशरूप शिव की, निजो अभिन्न, अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है और स्पन्दना ही शिव का स्वातन्त्र्य है । स्पन्दशक्ति में ज्ञातृता और कर्तृतारूप स्वातन्त्र्य शक्ति के पाँच मुख हैं—'चित्, निर्वृत्ति (आनन्द), इच्छा, ज्ञान और क्रिया' से चित्ता और आनन्दता शिव के साथ इस रूप में घुले-मिले हैं कि इनका मात्र कल्पनात्मक पार्थक्य भी सम्भव नहीं । मौलिक शिवभाव खण्डित रूप में 'चित्' और 'आनन्द' नहीं, अपितु अखण्डबोध से ग्राह्य 'चिदानन्द' है । इच्छा यद्यपि इनका ही स्थूलरूप है तथापि शिवभूमिका पर उसका वैसा रूप नहीं जैसा कि पशुभूमिका पर है । शिव पशु के समान, स्थूल रूप में, न कभी आम खाना चाहता है और न कभी पेड़ ही गिनना चाहता है । शैव मान्यता के अनुसार, उस भूमिका पर इच्छा का रूप चित्ता और आनन्दता का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अभ्युपगम- मात्र (शिवत्व में इन दोनों की वर्तमानता का स्वीकार) है । इस अभ्युपगम में भी, बहिर्मुखीन उन्मुखता न होने के कारण, इच्छा भी शिवत्व में ही विश्रान्त अवस्था में वर्तमान है । शेष रह जाते हैं ज्ञान और क्रिया । इन्हीं दो रूपों में शाश्वत शक्ति-स्पन्दना, पतिभूमिका और पशुभूमिका पर युगपत् ही, स्पन्दायमान है । फलतः ज्ञातृता और तदनुकूल कर्तृता (सब कुछ जानने और करने का स्वातन्त्र्य = पूर्णकर्तृत्व) यही स्पन्दशक्ति का स्वरूप है और यही उसमें स्वातन्त्र्य है । इसी स्वातन्त्र्य के द्वारा वह ग्रहीता-भूमिका, ग्रहण-भूमिका और ग्राह्य-भूमिका पर युगपत् ही स्पन्दायमान है । शक्ति के पाँच मुखों का यह अभिप्राय नहीं कि ये पाँच प्रकार की भिन्न-भिन्न शक्तियाँ हैं । वास्तव में शक्ति एक ही है । इसका मूलरूप स्वतन्त्र चित्ता (चिन्मात्ररूपता) है । यह शक्तिमान् से अभिन्न है । चित्ता का ही स्थूल रूप आनन्द, आनन्द का ही स्थूलरूप इच्छा, इच्छा का ही स्थूलरूप ज्ञान और ज्ञान का ही स्थूलरूप क्रिया है । शिव, सृष्टि संहार आदि पाँच कृत्य करता है क्योंकि उसमें ज्ञान है; वह जानता है क्योंकि उसमें इच्छा है, वह चाहता है क्योंकि उसमें आनन्द है, वह आनन्दमय है क्योंकि वह पूर्णचैतन्य है । फलतः चित्ता ही शिव और शिव ही चित्ता है । केवल 'शिवशक्तिसामरस्य' है ।
भूमिका ९ 'स्वस्वभाव' या स्वभाव संसार-भूमिका पर किसी भी प्राणिविशेष या वस्तुविशेष में, उत्पत्ति से लेकर अन्त तक प्रायः एक ही रूप में रहनेवाले, किसी विशिष्ट गुण या प्रकृति को स्वभाव कहा जाता है। इस भूमिका पर, प्रत्येक पदार्थ के विशिष्ट एवं अन्य पदार्थों से भिन्न होने के कारण, यह स्वभाव भी विशिष्ट एवं विभिन्न प्रकार का होता है अतः इसको समष्टिरूप नहीं अपितु व्यष्टिरूप ही कहा जा सकता है। इसके प्रतिकूल अध्यात्म-भूमिका पर स्वभाव या स्वस्वभाव शब्द से उस सामान्यरूप मौलिक स्पन्द तत्त्व का अभिप्राय है जो विश्व के प्रत्येक जड़ अथवा चेतन पदार्थ में, एक ही मौलिक सत्ता के रूप में अनुस्यूत होकर अवस्थित है। वह तत्त्व उन विभिन्न वेद्य पदार्थों के प्रकाशन, स्थिति और संहार का मूलकारण होने से कर्तृभूत सत्ता है और स्वयं कार्यभूत प्रमेयता के स्पर्शमात्र से भी बहुत दूर है। वह निरवच्छिन्न, अकालकलित और स्वतन्त्र होने के कारण विशुद्ध चिन्मात्ररूप है। वही तत्त्व प्रस्तुत स्पन्दसूत्रों में वर्णित आत्मसत्ता है और स्वरूप अथवा स्वस्वरूप जैसे अन्य पारिभाषिक शब्द भी उसी को अभि- व्यक्त करते हैं। स्पन्दशास्त्र में अवस्थायुगल यदि शैवदर्शन के मूलमन्त्र पूर्ण-अभेद के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाये तो यही तथ्य समझ में आता है कि विश्व के कण-कण में अथवा विश्वोत्तीर्ण रूप में मात्र स्पन्दमयी आत्मसत्ता की विद्यमानता है। उसको अवस्था विशेषों की सीमाओं में बन्द करना महती भ्रान्ति है। अस्तु, इसके बिना कोई चारा भी नहीं क्योंकि संसारभूमिका का निर्वाह भेददृष्टि को अपनाये बिना नहीं हो सकता है। भेद तो अभेद का ही बहिर्मुखीन विकास है अतः इसको झुठलाया भी कैसे जा सकता है ? परतत्त्व शक्तिमान् होने के कारण, अपनी निर्बाध एवं स्वतन्त्र शाक्तविजृम्भणा के द्वारा, स्वयं ही कर्तृता-अवस्था और कार्यता-अवस्था में अवभासमान होकर, विश्व के उत्थान एवं पतन की क्रीडा करता रहता है। इन दो अवस्थाओं में से कार्यता-अवस्था स्वरूप-विकास और कर्तृता-अवस्था स्वरूप-विश्रान्ति है। कार्यता केवल उपाधि है क्योंकि वह कर्तृता के प्रकाश पर उपजीवित है और बोध-प्राप्ति के बाद तत्काल ही विलीन हो जाती है। इससे प्रतिकूल कर्तृता-अवस्था, नित्योदित-बोधरूपा होने के कारण, शाश्वत वास्तविकता है। आत्मकल्याण चाहनेवाले व्यक्तियों के लिये कर्तृता उपादेय और कार्यता हेय है। भारत के लगभग समूचे दार्शनिक संसार में स्वतन्त्र कर्तृता को 'अहंता' और परतन्त्र कार्यता को 'इदन्ता' शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है। १. स्पन्दशास्त्र में स्वस्वभाव या स्वस्वरूप जैसे शब्दों में 'स्व' शब्द की पुनरुक्ति का दोष नगण्य है क्योंकि इस दर्शन में इस पुनरुक्ति के द्वारा आत्मतत्त्व की मौलिकता, मल- हीनता और शाश्वतिक वर्तमानता अभिव्यक्त की गई है। भाषा के नियमों को दृष्टिपथ में रखकर प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद में इस पुनरुक्ति के परिहार का प्रयत्न तो किया गया है परन्तु कुछेक स्थानों पर इसका प्रयोग अनिवार्य बन गया।
१० स्पन्दकारिका स्पन्दशास्त्र में प्रमाता के भेद स्पन्दशास्त्र की मान्यता के अनुसार मूलतः पूर्णचेतन स्वस्वभाव, ऊपर से नीचे तक, एक ही प्रमाता है। स्वतन्त्र एवं आनन्दमय होने के कारण वह दो रूपों में अवस्थित है। पहला पतिप्रमाता और दूसरा पशुप्रमाता। पतिप्रमाता के रूप में वह, विश्वमय विकास का विश्वोत्तीर्ण रूप है अतः इस रूप में उसके अवान्तर भेदों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पशुप्रमाता के रूप में वह विश्वोत्तीर्ण का विश्वमय विकास है। इस रूप में वह व्यष्टिरूप और विशिष्ट है। अतः उसके भेद, उपभेद और आकार-प्रकारात्मक वैचित्र्य इतने हैं कि उनकी गणना मानव की संकुचित कल्पना में नहीं आ सकती है। पाञ्चभौतिक काया को धारण करनेवाला प्रत्येक जङ्गमस्वरूप या स्थावररूप प्राणी 'पशुप्रमाता' है। प्रत्यभिज्ञा के आचार्यों ने अहंता और इदन्ता के उतार-चढ़ाव के आधार पर, विश्व को शुद्ध-मार्ग में और अशुद्ध-मार्ग में बांटकर, इन पर अवस्थित प्रमाताओं के विभिन्न एवं विविध स्तरों का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत किया है, परन्तु स्पन्द-शास्त्रियों के मतानुसार शिवप्रमाता के अतिरिक्त अन्य सारे पशुप्रमाता हैं चाहे वे सदाशिव-कोटि या पृथिवीकोटि पर अवस्थित हों। हाँ, उन्होंने केवल इनमें पाये जानेवाले बोधात्मक संकोच या विस्तार के आधार पर अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध इन चार श्रेणियों में बाँटकर रखा है। आगे सूत्राङ्क १७ के विवरण में इन चारों श्रेणियों पर यथासम्भव प्रकाश डाला गया है। प्रमाताओं के ग्राह्यविषय पतिप्रमाता के लिये समूचा जड़-चेतनात्मक विश्व अभिन्न अहम्-रूप में ही ग्राह्य है। पशुप्रमाताओं के ग्राह्यविषय दो प्रकार के हैं—१. आभ्यन्तर और २. बाह्य। आभ्यन्तर ग्राह्यविषयों में सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीनों अन्तःकरण-धर्मों के साथ सम्बन्धित भावनात्मक और बाह्य ग्राह्यविषयों में शब्दात्मक, स्पर्शात्मक, रूपात्मक, रसात्मक और गन्धात्मक स्थूल पदार्थ अन्तर्भूत हो जाते हैं। आभ्यन्तर विषय मानसिक अनुभूति के द्वारा और बाह्य- विषय पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्राह्य हैं। इन बाह्य ग्राह्यविषयों और आभ्यन्तर ग्राह्यविषयों का बोध क्रमशः नील और सुख इन दो पारिभाषिक शब्दों से हो जाता है। इस सम्बन्ध में यह तथ्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि पतिप्रमाता की अपेक्षा से पशुप्रमाता स्वयं भी ग्राह्यकोटि में ही पड़ जाता है। पाश कौन सा है ? प्रत्येक पशु के हृन्मंडल में, निगूढ़ रूप में अवस्थित ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दशक्ति के वास्तविक स्वतन्त्र एवं सामान्य रूप का अपरिचय ही, उसके लिये पाश है। संसार की भूमिका पर अवस्थित सारे जड़ या चेतन पदार्थ सामान्य शक्ति के ही विशिष्ट रूप हैं। विशिष्ट होने के कारण आपस में भिन्न और पारस्परिक भिन्नता के कारण परस्पर-सापेक्ष हैं। यह पारस्परिक सापेक्षता ही भौतिक द्वन्द्वात्मकता है। द्वन्द्वों की चक्की के दो पाटों में फँसा हुआ जीव लगातार पिसा जा रहा है और युग-युगों तक (जबतक उसको पारमेश्वर शक्तिपात का स्पर्श न हो जाय) आवागमन के चक्कर में पड़ा ही रहता है। साधारण शब्दों में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि विश्वात्मक एकत्व को भूलकर वैविध्यमय भेदज्ञान की गहराइयों
भूमिका ११ में खो जाना ही एक ऐसा बन्धन है जो जीवात्मा के साथ जोंक की तरह चिपका रहता है । इस जोंक से पिंड छुड़ाना केवल वीर और धीर पुरुषों का काम है । मुक्ति क्या है ? साधारण रूप में यदि मुक्ति जैसे किसी पृथक् पदार्थ की कल्पना की जाये तो यह सापेक्ष बन जाती है । आखिर मुक्ति किससे ? ऐसी परिस्थिति में इसके लिये किसी पूर्ववर्ती बन्धन जैसे पृथक् पदार्थ के सद्भाव की अपेक्षा है । जहां तक स्वस्वभाव का सम्बन्ध है वह तो निरपेक्ष है । फलतः उस भूमिका पर न कोई बन्धन है और न किसी से मुक्त होना है । स्वभाव स्वभाव ही है; न कम और न ज्यादा । पशुभूमिका पर सब कुछ सापेक्ष है । अतः बन्धन और मुक्ति जैसी कल्पनायें भी विद्यमान हैं। अभी ऊपर कहा गया कि आत्मशक्ति से वास्तविक स्वरूप की विस्मृति ही बन्धन है, अतः यह स्पष्ट बात है कि उसकी पूर्ण और सच्ची स्मृति (ढोंग—धतूरा छोड़कर) ही मुक्ति है । इस स्मृति को ही शास्त्रीय शब्दों में तुरीयारूप शाक्तभूमिका का साक्षात्कार होना कहते हैं । स्पन्द के उपदेश का अधिकारी कौन ? स्पन्द-सम्प्रदाय के गुरुओं की मान्यता के अनुसार, पशुभूमिका पर अवस्थित पूर्वोक्त चार प्रकार के प्रमाताओं में से केवल प्रबुद्ध प्रमाता ही स्पन्दशास्त्र के उपदेश के लिये उप- युक्त पात्र है। जहांतक अबुद्ध और बुद्ध प्रमाताओं का सम्बन्ध है, उनको उपदेश देना मरुभूमि में बीज बोने के समान निष्फल है । जहाँतक सुप्रबुद्ध प्रमाता का सम्बन्ध है, उसको उपदेश दिये जाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि उसने प्राप्य वस्तु प्राप्त की होती है । शेष रह जाता है प्रबुद्ध प्रमाता । वह आध्यात्मिक दृष्टि से शाक्तभूमिका के प्रवेश द्वार के बिल्कुल निकट पहुँचा हुआ तो होता है परन्तु सद्-गुरु की दया के बिना इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने के लिये सक्षम नहीं होता है । अतः उसको स्पन्द वाक्यों की सुधा पिलाकर अगाध संशयसागर से पार उतारना सिद्ध गुरुओं का आवश्यक एवं मनोनीत कर्तव्य है और यही सारे स्पन्दशास्त्र का मुख्य उद्देश्य भी है ! श्री भट्टकल्लट की वृत्ति का ही अनुवाद क्यों ? श्री भट्टकल्लट की वृत्ति को ही हिन्दी अनुवाद के लिये चुनने में पहला और विशेष कारण यह है कि सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज ने, स्पष्ट शब्दों में, इसी पुस्तक को पढ़ाने का आदेश दिया था । दूसरा कारण अपनी यह दृढ़ धारणा है कि श्री भट्टकल्लट ने जिस दृष्टिकोण को अपनाकर स्पन्द-सूत्रों की व्याख्या की है वह, स्वाभाविक रूप में, सिद्ध वसुगुप्त के वास्तविक अभिप्राय का प्रतिनिधित्व करती होगी । इसका स्पष्ट कारण यह है कि श्री भट्टकल्लट सूत्र- कार के साक्षात् शिष्य हैं अतः उनको गुरु ने अपना अभिप्राय स्वयं मौखिक रूप में बहुत बार अवश्य समझाया होगा । दूसरी ओर इसमें भी कोई संशय नहीं कि यदि श्री भट्टकल्लट ने के जीवन काल में ही यह वृत्ति लिखी होगी तो अवश्य उनकी स्वीकृति प्राप्त करने
१२ स्पन्दकारिका के लिये, उनको दिखाई होगी। निःसंदेह श्री भट्टकल्लट को जो उपदेश मिला वह साक्षात् सूत्रकार से ही मिला। इसके प्रतिकूल अन्य टीकाकारों के पास जो कुछ पहुँचा वह उन्हीं के माध्यम से पहुँचा। कई परिस्थितियों में उसके पहुँचने में कई पीढ़ियों का समय लग गया और इतने समय में वह कितनी मात्रा तक बासी हो गया इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। तीसरा कारण यह है कि यदि श्री क्षेमराजाचार्य की निर्णय नामक टीका और श्री भट्टकल्लट की प्रस्तुत वृत्ति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि जहाँ पहली दुरूह, अस्पष्ट एवं अपेक्षा से अधिक अन्तर्मुखीन प्रवृत्तियों को लिये हुए है, वहाँ दूसरी सरल, स्पष्ट, व्यावहारिक एवं साधारण से साधारण और आध्यात्मिक दांव-पेचों से बिल्कुल अनभिज्ञ व्यक्तियों को भी किसी न किसी रूप में लाभ पहुँचानेवाली है। हिन्दी अनुवाद मूल सूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद करते समय, अपनी ओर से, इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि सूत्रकार या वृत्तिकार के आशय को कोई क्षति न पहुँचे। पारिभाषिक शब्दों के साथ छेड़खानी करना या उनको तोड़-मरोड़ कर नये रूप में प्रस्तुत करना अथवा शब्दकोषों के पन्ने उलट-पलट कर उनके स्थान पर दूसरे उपयुक्त या अनुपयुक्त शब्दों को ठूंसने की हिमाकत करना भी उपयुक्त प्रतीत न हुआ, अतः उनको अपने ही रूप में रहने दिया है। जहाँ जहाँ आवश्यक जान पड़ा, वहाँ वहाँ पाठकों की सुगमता के लिये, कोष्ठकों का प्रयोग करके ऐसे शब्दों के अभिप्राय को समझाने का प्रयत्न किया गया है। पारिभाषिक शब्दों को अपने यथावत् रूप में रहने देना इस दृष्टि से भी उचित जान पड़ा कि ऐसा करने से हिन्दी भाषा के शब्द-कोष में अपेक्षित वृद्धि ही होगी। संस्कृत भाषा हिन्दी की जननी है, यह मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं अतः यदि दैवयोग से जननी की वस्तु पुत्री को उत्तराधिकार में मिल गई तो यह किसी अलक्षित रूप में मणिकाञ्चन-संयोग ही हुआ। विवरणों के विषय में प्रत्येक विवरण स्पन्द-सूत्रों के अन्तर्निहित अभिप्राय तक ही सीमित न रखकर, समूचे शैवदर्शन के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है। इस बात का पहले ही उल्लेख किया गया है कि शैवदर्शन की मौलिक मान्यताओं की, जितनी विशद एवं विस्तृत व्याख्या प्रत्यभिज्ञाग्रन्थों में उतनी स्पन्दग्रन्थों में नहीं की गई है। फलतः किसी भी स्पन्द-ग्रन्थ या प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थ का अध्ययन करने के इच्छुक पाठक को जबतक इस दर्शन के मौलिक सिद्धान्तों की, विस्तृत रूप में, जानकारी न हो तबतक उसके लिये, प्रतिपाद्य विषय को पूर्णतया हृदयंगम बनाना या उसके रस का आस्वादन करना, कठिन ही है। यही कारण है कि विवरणों का क्षेत्र स्पन्द सूत्रों तक ही सीमित न रखकर प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थों और आगम-ग्रन्थों तक भी विस्तृत किया गया है। क्षेत्र को विस्तृत करने के साथ साथ, इनको, यथासम्भव संक्षिप्त बनाने का प्रयत्न तो किया गया परन्तु इतना संक्षिप्त भी नहीं कि मुख्य सैद्धान्तिक बातें ही अपूर्ण रह गई हों। इस सम्बन्ध में सज्जन पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना आवश्यक है कि किसी भी विवरण को शैव आचार्यों के पारस्परिक मतभेदों और तार्किक घात-प्रतिघातों