स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
८० स्पन्दकारिका
नहीं हैं तथापि पृथकत्व प्रतीत होता है लेकिन वह तत्त्व अपने प्रत्यभिज्ञा (Cognition) के सत्स्वरूप से कभी अपने को पृथक् नहीं करता अर्थात् अपने सत्स्वरूप से च्युत नहीं होता ॥१ विभेदेऽपि—भिन्न होने पर भी, पृथक् होने पर भी । प्रसर्पति = (प्रकृष्टेन सर्पति) —प्रसरण करती है, चलती है । ‘निवर्तते’ = यद्यपि जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्थायें पृथक्-पृथक् हैं अतः स्पन्द तत्त्व, एक होता हुआ भी व्यवहार में पृथक्-पृथक् अवस्थाओं में व्यवहार करने के कारण, एकाधिक सा प्रतीत होता है किन्तु सत्य तो यह है कि यह स्पन्द तत्त्व स्वस्वभाव से उपलब्धृरूप से—स्वसंवित्स्वरूप से कभी निवर्तित (च्युत या पृथक्) नहीं होता— ‘तत् स्पन्दतत्त्वं निजादात्मीयात् स्वभावादुपलब्धृरूपात् स्वसंवित्स्वरूपात्रैव निवर्तते ॥’२ ऐसा क्यों ? क्योंकि वह सभी अवस्थाओं में (बिना परिवर्तन या पार्थक्य के, बिना किसी विभेद के) स्वस्वरूप में विद्यमान मिलता है । अतः स्पष्ट है कि तीनों अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में स्पन्द तत्त्व का उपलब्धृरूपत्व सामान्य रूप से (अपृथक् रूप से, अपरिवर्तित दशा में) विद्यमान रहता है । जाग्रत एवं स्वप्न दशाओं के अनुभवों में तो स्पन्दतत्त्व की एकता की धारा अविच्छिन्न रहती ही है किन्तु जब व्यक्ति सो जाने के समय अपने को भूल जाता है—उसे अपनी विद्यमानता की भी स्मृति नहीं रह जाती— आत्मप्रत्यभिज्ञा भी सुषुप्त हो जाती है—ऐसी सुषुप्ति की दशा में भी (जब व्यक्ति सोकर उठता है तो जो यह कहता है कि ‘मैं अत्यन्त सुखपूर्वक सोया’—इस अनुभूति के कारण यही सिद्ध होता है कि सारी अवस्थाओं के पृथक्-पृथक् होने पर भी उनमें एक वस्तु अवश्य है जो कि अविच्छिन्न निरन्तरता बनाए रखती है अतः) स्पन्द तत्त्व अपरिवर्तित रूप में अखण्डतः एक ही रहा आता है । संवेदन भले ही पृथक्-पृथक् हो जायें, अवस्थायें भले ही पृथक्-पृथक् हो जायें किन्तु अवस्थातीत स्पन्द तत्त्व या संवेत्ता प्रारंभ से अन्त तक सभी अवस्थाओं में अक्षुण्ण रूप में एक ही रहा आता है ‘संवेत्ता निर्दिष्ट एव भवति ।’३ ‘विभेदे’ (विशेषेण भेदो विभेदः तस्मिन्) = विशिष्ट प्रकार के भेदों के होने पर ।४ ‘अभित्रे’ = वह स्पन्दतत्त्व ताद्रूप्य में अवस्थित होने के कारण आद्योपान्त निरन्तर एकरूप, तद्रूप एवं स्वस्वरूपावस्थित रहा आता है— ‘किंभूते? तदभिन्ने? तस्यैव ताद्रूप्येणावस्थानात् ।’५ ‘तत्तत्वं ... सर्वस्यात्मभूताच्च अनुभवितृरूपात् स्वभावात्रैव निवर्तते ॥ यदि हि स्वयं निवर्तेत तज्जाग्रदाद्यपि तत्प्रकाशं बिना कृतं न किंचित् प्रकाशेत् । उपलब्धृता च एतदीया जाग्रत्स्वप्नयोः सर्वस्य स्वसंवेदनसिद्धा, सौषुप्ते यद्यपि सा तथा न चेत्यते तथापि एव च स्वभावात् न निवर्तते ॥’६
१. अचार्य क्षेमराजः—स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दप्रदीपिका । ३-५. स्पन्दप्रदीपिका । ६. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः ८१ आचार्य क्षेमराज इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यद्यपि चेतना की जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति की धारायें पृथक्-पृथक् हैं एवं योगियों को अवधान, धारणा, एकाग्रता ध्यान एवं समाधि आदि के रूप में भी वे पृथक्-पृथक् दृष्टिगोचर होती हैं तथापि वह स्पन्द तत्त्व जो कि समस्त विश्व के जीवन का प्राणतत्त्व है (वह) अपरिवर्तित रूप में नित्य, एकरस एवं अखण्डप्रवाहित रहा करता है क्योंकि यदि वही निवर्तित हो जाय-तब तो जाग्रत = स्वप्न-सुषुप्ति की अवस्था में प्राणी में जाग्रत अवस्था वाली प्रत्यभिज्ञा- शक्ति (Cognitive Power) तो विद्यमान नहीं रहती तथापि इस अवस्था में भी उसका वहाँ अस्तित्व विद्यमान ही रहता है क्योंकि उसे सुषुप्ति के पूर्व की, स्वप्न की, एवं सुषुप्तिगत सुस्वाप की अनुभूतियाँ सोने के बाद पुनः जागने पर भी अविच्छिन्न रूप में बनी रहती हैं। स्पन्द तत्त्व अपने यथार्थ स्वरूप या बोधस्वरूपता से कभी पृथक् नहीं हुआ करता चाहे उसके माहात्म्य के कारण जागृत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि अवस्थायें भले ही नष्ट क्यों न हो जायें। 'एव'—यहाँ 'एव' शब्द 'अपि' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।¹ भाव यह है कि— उनकी (उन अवस्थाओं की) अनुपस्थिति में भी वह नित्य स्पन्द तत्त्व अपने स्वस्वरूप से च्युत नहीं होता—निरुद्ध नहीं होता। 'तदभिन्ने' का अर्थ क्या है? 'उससे भिन्न नहीं' अर्थात् इसका प्रथम तात्पर्य है— 'नानुभूयते न निरुध्यते । न निरोत्स्यते ।'² 'तदभिन्ने' = 'उससे भिन्न नहीं'। अर्थात् जागृदादि अवस्थाओं में तो परस्पर भिन्नता है किन्तु 'स्पन्दतत्त्व' में भिन्नता नहीं है। 'तदभिन्ने' = जागृदादि अवस्थाओं से अभिन्न। अर्थात् जागृदादि अवस्थायें भले भिन्न-भिन्न हों तथा स्पन्दतत्त्व भी अभिन्न होने के कारण इन अवस्थाओं से भिन्न हो तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि तत्त्वतः ये जागृदादि अवस्थायें भी स्पन्द तत्त्व से अभिन्न हैं क्योंकि वे उसी का आश्रय लेकर जीवित रहने के कारण स्पन्द से एकरूप हैं। शिवस्वभाव से अभेदात्मक रूप में प्रकाशमान होने के कारण अवस्थायें भी प्रकाशरूप हैं—'तस्मात् शिवस्वभावाद् अभेदेन प्रकाशमानत्वात् प्रकाशरूपेत्यर्थः ।'³ जो एकात्मक है वह किस प्रकार उसके निवृत्त हो जाने पर भी स्थित रह सकेगा ? किसी भी एक वस्तु की सत्ता एक दूसरे के बिना असंभव है।⁴ 'अभिन्न' = शिवतत्त्व । स्वस्वभाव = आत्मा । 'स्वस्वभाव' = निर्मलचिन्मात्ररूप । जो पदार्थ इदन्तापन्न प्रमेयों का प्रकाशक होने के कारण उनकी स्थिति (अस्तित्व) का मूलाधार हो, जो कर्ता होने के कारण प्रमेयों का कारण (उत्पत्तिस्थान) हो और जो अपनी अनवच्छिन्न महिमा से महिमान्वित निर्मल- चिन्मात्रैकरूप हो—वही है 'स्वस्वभाव'। 'यः पदार्थः सर्वस्य इदन्तापन्नतया प्रमेयभूतस्य ... प्रकाशकत्वेन स्थितिहेतुत्वात् आधारभूतः .... अनवच्छिन्नमहिमा निर्मलचिन्मात्रैकरूपः १-४. स्पन्दनिर्णय । स्पं० ६
८२ स्पन्दकारिका
स इह स्वस्वभावशब्देनाभिहितः न तु जात्याद्यवच्छिन्नाभिमानसङ्कोचितात्मनो मायाशक्त्य- पह्नुत स्वैश्वर्यसंविदः कार्यवर्गान्तःपातिनः प्राणिप्रबन्धस्य स्वरूपं स्वस्वभावः' इति युक्तम् उक्तम् 'आत्मैव शङ्कर' इति ॥ १ 'न निवर्तते' = अन्यथा । नहीं हो जाता, पृथक् नहीं हो जाता (नान्यथा भवति। न च्यवते ।)² 'स्वस्वभावात्' = स्वरूप द्वारा उसका 'स्वभाव' है कैसा ? उत्तर—'उपलब्धृतः' अर्थात् उसका स्वभाव उपलंभक, ज्ञाता एवं अनुभविता का है अर्थात् वह 'उपलब्धृलक्षण' है । 'विभेद'-व्यतिरेक । अवस्थाओं का अन्योन्य वैलक्षण्य । 'जाग्रदादि' = जाग्रत आदि अवस्थायें । 'आदि' = स्वप्न, सुषुप्ति की अवस्थायें । 'स्वप्न' की अवस्था में स्मृति आदि एवं 'सुषुप्ति' की अवस्था में मद, मूर्च्छा आदि अवस्थायें अन्तर्भूत हैं । 'जाग्रत अवस्था' का क्या अर्थ है?—'यस्यां श्रोत्रादिभिः इन्द्रियैः शब्दादीन् इन्द्रियार्थान् गृहणन् प्रसृतशक्तिः पुरुषः परिस्पन्दते' (अर्थात् जिसमें श्रवणेन्द्रिय आदि इन्द्रियों से शब्दादिक ऐन्द्रिय विषयों को ग्रहण करके बाहर फैली हुई पुरुष रूप शक्ति परिस्पन्दन करती है उसे जागृतावस्था कहते हैं ) । 'स्वप्नावस्था' किसे कहते हैं ? —'स्वप्नः स्वापावस्था, यस्यां स्वव्यापारपरि- श्रान्तः श्रोत्रादिविहार-विरतावपि मनसैव असौ विषयान् परिगृह्णाति ।' (अर्थात् वह अवस्था जिसमें कि इन्द्रियों के द्वारा स्वव्यापार से परिश्रान्त होकर श्रवणेन्द्रियादिक इन्द्रियों के विरत हो जाने पर भी केवल मन के द्वारा विषयों का ग्रहण किया जाता है 'स्वप्नावस्था' कहलाती है) । 'सुषुप्ति अवस्था' किसे कहते हैं? 'सुषुप्तं गाढ़निद्रारूपा सुखस्वापावस्था, मनो व्यापारस्यापि व्युपरमे सति यत्र व्यतिरिक्तं वेद्यसंवेदनं तात्कालिकं नास्ति ॥' (अर्थात् सुखपूर्वक सोने की वह प्रगाढ़ावस्था जिसमें मन भी व्यापार करना बन्द कर देता है और व्यक्ति को व्यतिरिक्त वेद्य-संवेदन का तात्कालिक ज्ञान भी नहीं होता 'सुषुप्ति की अवस्था' कहलाती है ।) । 'विभेदेऽपि' = विभिन्न अवस्थाओं में प्रवर्तमान रहने पर भी । 'न निवर्तते' = अपने उपलंभक, उपलब्धा स्वभाव से निवर्तित नहीं होता । समस्त अवस्थायें (जागृतादिक अवस्थायें) उसके अन्तर्गत ही स्थित हैं। यदि यह उपलब्धा अवस्थात्मक होता तो अवस्थाओं के पृथक्-पृथक् रूप में स्थित होने पर वह भी पृथक्-पृथक् स्वरूपों में रूपान्तरित (विभिन्न रूपों में विभाजित) हो जाता किन्तु ऐसा नहीं होता—'यदि अवस्था-त्मक एव अयम् उपलब्धा स्यात् तत् अवस्थावत् सोऽपि विभिद्येत ॥' 'अपि'—भी । यह स्वभाव से (अवस्था व्यतिरेक से) निवर्तित नही होता । इसका प्रमाण यह है कि अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी उपलब्धृलक्षण अवस्थाओं के भिन्न-भिन्न होने पर भी उपलब्धृलक्षण अवस्थाता भिन्न-भिन्न रूपों में बदलता हुआ
१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः ८३ स्वरूपच्युत नहीं होता प्रत्युत् अभेदस्वरूप ही रहता है—यही सभी को अनुभव होता है—‘अवस्थाभेदेऽपि उपलब्धृलक्षणस्य अवस्थातुः अभेदः, इति सर्वस्य अत्र स्वानुभवः प्रमाणम् ।।'¹ ‘जो मैं सोया था वही मैं अब जाग रहा हूँ'—इस प्रकार की एकानुसंधानात्मक अनुभूति जाग्रदादिक सभी अवस्थाओं में चलती रहती है । जिस प्रकार एक देह में अवस्थाव्यतिरिक्तस्वरूप उपलब्धा एक ही रहता चला आता है । उसी प्रकार समस्त देहों में भी एक ही आत्मा रूप उपलब्धा निरन्तर एक ही रहता चला आता है ।² प्रत्येक प्राणी में जो ‘अहमस्मि' की पृथक्-पृथक् अनुभूति होती है यह पार्थक्य- संवलित अस्मद् प्रत्यय मायीय है न कि तात्त्विक । योगशास्त्रों में प्रख्यात जाग्रदादिक अवस्थाओं में भी उस आत्मसंवित् में अभेदता बनी ही रहती है क्योंकि संवित् तत्त्व वहाँ भी उपलब्धक के रूप में ही स्थित रहता है । क्योंकि—योगशास्त्र की साधनावस्थाओं- एवं जाग्रदादिक अवस्थाओं में भी साम्य है, अभेद है—अभिन्नता है । (‘एताभिः अवस्थाभिः योगशास्त्र प्रसिद्धास्वपि जाग्रदाद्यवस्थासु तस्य अभेदः प्रति- पादितो वेदितव्य । तास्वपि तस्य उपलब्धृत्वेन व्यापकत्या अवस्थानात्') । १. जाग्ररावस्था एवं धारणा में अभेद—³ ‘तत्र ध्येये अर्थे झगिति प्रवृत्तिमात्रं जाग्ररावस्था, धारणा इति क्वचित्प्रसिद्धा ।' २. स्वप्नावस्था एवं ध्यान में अभेद—⁴ ‘तत्रैव विसदृशप्रत्ययपरिहारेण समान प्रत्यय प्रवाहैकतानतानुसंधानं स्वप्नावस्था ध्यानम् इति याम् आहुः । ३. ‘सुषुप्तावस्था एवं समाधि में अभेद—⁵ ‘क्रमेण ऐकायातिशयात् प्रत्ययान्तरासंकीर्णसूक्ष्मध्येयाभासमात्रविशेषता चित्तस्य संवेद्यसुषुप्तावस्थायां वितर्कविचारानन्दास्मितानुरूपानुगमलक्षस्य संप्रज्ञातस्य समाधेः आनन्दास्मितामात्रानुगतम् अवस्थाविशेषम् आचक्षते । यस्तु—‘विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः' (पा० १७)— इति कृतलक्षणः असंप्रज्ञातसमाधिः, तत अप-वेद्य सुषुप्तम् ।। (सर्वासु एतासु च अनुभावितृरूपस्य व्यापकस्य एकस्य स्वभावस्य सत्ता स्थितैव) ।।⁶ सारांश यह कि इन समस्त योगावस्थाओं एवं जीवों की जाग्रदादिक सभी अवस्थाओं में अनुभविता, अद्वैत, सर्वव्यापक संवित्तत्त्व रूप स्वस्वभाव की सत्ता अखण्ड रूप में प्रवाहित है और वह अभेदरूप है । ४. सालम्बन समाधि—‘यतः सालम्बने तावत् समाधौ व्यतिरिक्तवेद्यसद्भावात् लौकिकावस्थावत् वेदकस्य उपलब्धुः सत्वं स्फुटम् एव ।⁷ ५. निरालम्बन समाधि—‘यत्र तु निरालम्बनत्वात् अभावरूपत्वं तत्र तत्कालमेव १-७. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
८४ स्पन्दकारिका वेद्यासंवेदनमात्रं न तु वेदकस्य वेदकत्वाभावः सुषुप्तादिवत्' ततो निःसृतस्य सा अवस्था स्मर्त्तव्यतां वेद्यत्वम् आपन्ना व्यापकस्य सद्भावम् अभिव्यञ्जयत्येव ।'१ कहा भी गया है— 'जाग्रदादिनापि भेदे प्रवर्तमाने न तस्य स्वरूपमाव्रियते ॥'२ परिणामवाद एवं विवर्तवाद— आचार्य क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में प्रश्न उठाते हैं कि— 'जाग्रदादिविभेदेऽपि' शब्दावली में कारिकाकार का ध्वन्य क्या है? १. 'परिणाम' या कि २. 'विवर्त'? १. परिणामवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने परिणामवाद का प्रतिपादन नहीं किया है अतः 'तावन्न परिणामोऽस्ति ।।' किरणागम में भी कहा गया है कि—'परिणामोऽचेतनस्य चेतनस्य न युज्यते' अर्थात् परिणाम तो केवल अचेतन का हो सकता है किसी चेतन का नहीं।३ यदि अवस्थाओं की यह अभिव्यक्ति थोड़ी भी चित् तत्त्व से भिन्न होती तो अपर भी पूर्ववर्ती के विकास पर वही हो जाएगा क्योंकि वह विकास है और ऐसी स्थिति में कोई भी प्रकाशित नहीं हो सकता । अतः परिणाम के लिए कोई स्थान नहीं है । आचार्य क्षेमराज कहते हैं— 'अवस्था प्रपञ्चोऽपि यदि चिन्मात्रात्परिणामतया मनागपि अतिरिच्येत् चिद्रूपं वा तत्परिणतौ मनाग् अतिरिच्येत् तन्नकिञ्चिच्चकास्यादिति तावन्न परिणामोऽस्ति ॥'४ २. विवर्तवाद का खण्डन—भासमान यह विश्व एवं उसकी अवस्थायें असत्य नहीं है क्योंकि तब तो स्वयं ब्रह्म भी असत्य सिद्ध हो जाएगा क्योंकि विश्व भगवान् का रूप ही तो है 'न च भासमानोऽसौ असत्यो ब्रह्मतत्त्वस्य अपि तथात्वापत्तेः— इत्यसत्यविभक्तान्यरूपोपग्राहिता विवर्त इत्यपि न संगतम् ।' फिर कारिकाकार का ध्वनित क्या है? वस्तुतः कारिकाकार 'विभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का प्रयोग करके 'भगवान् के अति दुर्घटकारित्व' को प्रकाशित करना चाहता है—'अनेन चातिदुर्धटकारित्वमेव भगवतो ध्वनितम् ॥'५ आचार्य क्षेमराज यह भी व्याख्या करते हैं कि कारिकाकार ने 'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने' पदावली का जो प्रयोग किया है और उसके द्वारा विभेद होते हुए भी स्वाभेद प्रदर्शित करना और इस प्रकार भेदाभेदोभय की अभिव्यक्ति करना (१) पर (२) अपर एवं (३) परापर—इस शक्तित्रय से युक्त भगवान् का ही जगत् के रूप में स्फुरित होना प्रमाणित करता है । 'विवर्त' मिथ्यावाद का पोषक है । किन्तु सत्य तो यह है कि जाग्रदादि अवस्थाओं में अवस्थित होने पर भी यह संवित् तत्त्व स्वस्वभाव का परिशीलन करता हुआ कोई अन्य नहीं है प्रत्युत मात्र शङ्कर ही है । अतः विवर्त का तो प्रश्न ही नहीं उठता ॥६ 'अभिन्ने' पद, परमात्मा द्वारा असंभव वस्तुओं को भी उत्पन्न करने की क्षमता का १-६. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' ।
प्रथमः निष्यन्दः ८५ द्योतक है । परमात्मा (१) परा (२) अपरा एवं (३) परापरा शक्तियों के रूप में प्रकट होता है क्योंकि वह जाग्रदादि अवस्थाओं की स्वतन्त्र व्यक्तिगत सत्ता (Individuality) एवं उसके साथ अपनी अभेदात्मकता व्यक्त करता है । परमात्मा जाग्रदादि अवस्थाओं में रहता हुआ भी अपने स्वस्वरूप की गवेषणा एवं साक्षात्कार करता रहता है ॥ १ आचार्य रामकण्ठ— 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय एवं तुरीयातीत आदि विभिन्न अवस्थाओं में तो आत्मा एक रूप रहती ही है किन्तु अन्य अवस्थाओं में भी वह अविचल, अप्रभावित, अरूपान्तरित, अपरिवर्तित एवं एक रस तथा एक रूप (समस्वभाव, स्वस्वभाव) रहती है यथा— १. स्मृत्यावस्था में—'स्मृत्यावस्था अनुभूतविषयासंप्रमोषात्मिका स्वप्न सदृशी, मनसैव विषयग्रहणसाम्यात् ॥ २. मदावस्था में—'मदः पानातिशयजः चित्तेन्द्रियवृत्ति प्रमोषरूपो विकारः' । ३. मूर्च्छावस्था में—'मूर्च्छा विषादविषादिभोजनादिजनित मोहात्मा' । इसी प्रकार वेद्योँ के ग्रहणाभाव साम्य से सुषुप्ति तुल्य अन्य चेतनावस्थायें भी हैं वे सभी इन्हीं में अन्तर्भूत हैं । किन्तु इन किसी भी अवस्था में आत्मा क्यों न हो किन्तु वह अपने नित्यात्मक स्वस्वभाव, स्वस्वरूप का त्याग कभी नहीं करती—'एतन्निमित्तके विभेदे प्रवर्तमानेऽपि, निजात् उपलब्धुः स्वभावात् असौ न निवर्तते ॥ यदि आत्मा भी अवस्थाओं के साथ अपना रूप, या अपनी अवस्था परिवर्तित कर देती तो—तब तो अवस्थाओं के साथ वह भी बदल जाती—'तत् अवस्थात् सोऽपि विभिद्येत, किन्तु ऐसा होता नहीं । कारिकाकार ने 'अपि' शब्द का प्रयोग क्यों किया ? रामकण्ठ कहते हैं कि— एकस्वभाव, समधर्मा रहकर प्रसरण करती है और 'अयं स्वभावात् अवस्था व्यतिरिक्तात् न निवर्तते इति + अपि शब्दस्य अर्थः'—इसीलिए यहाँ 'अपि' शब्द प्रयुक्त हुआ है । 'तदभिन्ने' क्यों कहा? अवस्थाता होते हुए भी आत्मा अनेक भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में अपने स्वभाव से निवर्तित नहीं होती इसीलिए 'तदभिन्ने' (उनसे भिन्न रूप में किन्तु अपने सत्स्वभाव में अभिन्न रहकर) कहा गया अवस्थाभेदों में भी अवस्थाता अभेदात्मक ही रहता है । 'स्वभाव' क्या है? 'स्वस्वभाव एव शङ्कर इति सम्यक् उपपादितं स्वानुभावा- नपह्नविनः प्रबुद्धान प्रति ।' अवस्थात्रय में भी एकत्व द्वितीय कारिका में आन्तर एवं बाह्य दोनों अवस्थाओं में एक ही स्वभाव (स्पन्दतत्त्व) की व्याप्ति का प्रतिपादन किया गया था । समस्त भेदों में भी अभेद— प्रश्न--जब जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भिन्नता है फिर सभी में स्वभावगत एकता को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? १. स्पन्दनिर्णय ।
८६ स्पन्दकारिका कारिकाकार इसके उत्तर में कहते हैं कि— (१) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि विभिन्न अवस्थाओं में भी भेद-विमुक्त सत्ता समान रूप से वेदक (प्रमाता) के रूप में अवस्थित रहता है। (२) इन विभिन्न अवस्थाओं के प्रसरण के समय भी वह सत्ता अपने अनुभूत्या- त्मक (अनुभविता) स्वभाव से च्युत नहीं होता। भट्टकल्लट कहते हैं कि— ‘जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्मात् उपलब्धृरूपत्वं त्रिष्वपि पदेषु साधारणाम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च पञ्चसु स्कन्धेषु ॥’ सारांश = १. जाग्रत आदि भेदों के अस्तित्व का भान होने एवं उनका विस्तार (प्रसार) होने पर भी अनुभविता के स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं आती। अवस्थायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं किन्तु उन भिन्नताओं के अनुभव होते रहने पर भी अनु- भविता भिन्न-भिन्न नहीं हो जाता प्रत्युत् एक ही रहता है। उसका स्वरूप आवृत्त नहीं हो जाता। २. अनुभविता के स्वरूप में उसी प्रकार कोई भेद या भिन्नता नहीं आ पाती जैसे कि विष के बीज में उत्पन्न मूल, शाखा, पत्र, फूल एवं फल आदि में व्याप्त विष एवं विष के बीज में व्याप्त विष में कोई भेद नहीं होता। ३. प्रमाता की विभिन्न अवस्थायें निम्नांकित हैं— ‘जाग्रत स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम्। इति पञ्च पदान्याहुः ... ... ... ... ... ॥’ (तं० १०.२२८) ‘तदभिन्ने प्रसर्पति’—। जाग्रत आदि भेदसमन्वित अवस्थायें भेदशून्य ‘तत्त्व’ से अभिन्न है किन्तु वह ‘तत्त्व’ भेद कल्पना द्वारा (लीला रूप में) भेदों को प्रस्तुत करता है। ‘तदभिन्ने’ = जाग्रदादि अवस्थाओं में पारस्परिक भेद तो है किन्तु उनमें भेद- विमुक्त परासत्ता वेदक के रूप में व्याप्त रहती है। जाग्रदादि = जाग्रत् आदि अवस्थायें— अवस्थायें (चेतना की अवस्थायें)— ──────────────────────────┬────────────────────────── जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीय तुरीयातीत गौण अवस्थायें (सां०) (सां०) (सां०) │ ┌─────────┬─────────┬─────────┬─────────┴─────────┐ भ्रान्ति मद मूर्च्छा उन्माद अर्ध सुरादिक मूर्च्छा पानजन्य
प्रथमः निष्यन्दः ८७ 'तुरीय' = अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका। तुरीयातीत = पूर्ण शिवभाव की अवस्था ॥ जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति = (स्पन्द दार्शनिक एवं स्पन्दाचार्यों का अभिष्ट) निर्विकल्पचिद्घनता की भूमिकायें। भेदकल्पना से शून्य अवस्था चिद्घन अवस्था ॥ शाश्वत जागरण की अवस्था। १. 'सर्वसाधारणार्थ विषयं बाह्येन्द्रियजं ज्ञानं लोकस्य जाग्रत 'जागरावस्था' ।— शि०सू०वि०। २. ये तु मनोमात्र जन्या असाधारणार्थविषया विकल्पाः स एव स्वप्नः स्वप्ना- वस्था' ।—शि०सू०वि०। ३. अविवेको विवेचना भावोऽख्यातिः एतदेव सौषुप्तम् ॥—शि०सू०वि०— क्षेमराज ॥ अवस्थाएँ ┌─────────────┬─────────────┐ जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति (योगियों (योगियों (योगियों की धारणा- की ध्याना- की समाधि वस्था) वस्था) की अवस्था) (यौगिक) (यौगिक) (यौगिक) १. जाग्रतस्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगः संभवः ॥ —शि०सू० । २. 'ज्ञानं जाग्रत' (शिवसूत्र) । (१.८) १. 'ज्ञानं जाग्रत' १।८ ॥ २. स्वप्नो विकल्पाः ।१।९। ३. अविवेको माया सौषुप्तम् ।१।१० इन अवस्थाओं की सविस्तार व्याख्या— १. जाग्रत—ज्ञानं बाह्याक्षजं जाग्रत् सर्वसाधारणार्थकम् ॥ १।४६ ॥ २. स्वप्न—स्वप्नः स्वात्मैव संप्रोक्तो विकल्पाः स्वात्मसंभवाः ॥ ३. सुषुप्ति—अविवेको निजाख्यातिर्मायामोहस्तदात्मकः । सौषुप्तं योगिनामेतत्त्रितयं धारणादिकम् । ईश्वरप्रत्यभिज्ञायां जागराद्यपि लक्षितम् ॥ ४८ ॥ शून्ये बुद्ध्याद्यभाव आत्मन्यहन्ताकर्तृतापदे । अस्फुटारूपसंस्कारमायिणि ज्ञेयशून्यता ॥ ४९ ॥ साक्षाणान्तरी वृत्तिः प्राणादिप्रेरिका मता । जीवनाख्याथवा प्राणेऽहन्ता पुर्यष्टकात्मिका ॥ ५० ॥ तावन्मात्रस्थितौ प्रोक्तं सौषुप्तं प्रलयोपमम् । सवेद्यमपवेद्यं च मायामलयुतायुतम् ॥ ५१ ॥
८८ स्पन्दकारिका मनोमात्रपथेऽप्यक्षविषयत्वेन विभ्रमात् । स्पष्टावभासा भावानां सृष्टिः स्वप्नपदं मतम् ॥ ५२ ॥ सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतरा स्थिरा । सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातॄणां स जागरः ॥ ५३ ॥ इति विस्तरतः प्रोक्ते लोकयोग्यनुसारतः । जगरादित्रयेऽमुष्मिन्नवधानेन जाग्रतः ॥ ५४ ॥ ४. तुर्या— शक्तिचक्रानुसंधानाद्विश्वसंहारकारणात् । तुर्याभोगमयां भेदरख्यातिरख्यातिहारिणी ॥ ५५ ॥ ५. तुर्यातीत—स्फुरत्यविरतं यस्य स तद्वाराधिरोहतः । तुर्यातीतमयं योगी प्रोक्त चैतन्यमामृशन् ॥ वरदराज—'शिवसूत्रवार्तिकम्' सुषुप्ति—ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः ॥ सैव मायावृति जालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता । अर्थस्मृतीस्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥—शि०सू०वा० यस्तु अविवेको विवेचनाभावोऽख्यातिः, एतदेव मायारूपं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी) अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ॥ (शि०सू०वा०) ग्राह्यग्राहकभेदासंचेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तम्, इत्यप्यनया वचो युक्त्या दर्शितम् ॥ (शि०सू०वा०) दृष्टि स्वभावस्य विभोरन्तर्नव तयोदयः । विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तदबाह्यार्थनिरासतः ॥ (शि०सू०वा०) जाग्रत अवस्था—जिस अवस्था में पशुप्रमाता की इन्द्रियाँ सामान्य लोगों के विषयों को ग्रहण करने हेतु स्पन्दायमान हो उसे जाग्रत् अवस्था कहते हैं । इस अवस्था के प्रमेय प्रमाता की कल्पना या स्वप्नाश्रित संस्कारों से न उत्पन्न होकर जागतिक स्तर पर एक व्यावहारिक सत्य के रूप में स्थित रहते हैं और एक ही साथ अनेक प्रमाता उनको इन्द्रियगोचर कर सकते हैं । अन्तःकरण एवं ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से उत्पन्न सुख, दुःख, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, ईर्ष्या, प्रेम, राग, विराग के ज्ञान की इसी व्यावहारिक सत्य की अवस्था को जाग्रत् अवस्था कहते हैं । स्वप्नावस्था—जाग्रतावस्था के बाधित होने पर एवं बाह्य जगत् से ऐन्द्रिय सम्बन्धों के टूट जाने पर जो अन्तर्मुखी काल्पनिक अवस्था उत्पन्न होती है और जिसमें प्रमाता, प्रमेय, प्रमा, द्रष्टा-दृश्य-दर्शन केवल मन की वृत्तियाँ होती हैं और जो जागने पर बाधित हो जाती है वही संकपविकल्पात्मिकावस्था स्वप्नावस्था है । यह अन्य प्रमाताओं को अज्ञात एवं अननुभूत रहती है, रजोगुण प्रधान है, स्वल्पस्थायी है और जाग्रतावस्था में अस्पन्दित है ।
प्रथमः निष्पन्दः ८९ सुषुप्ति की अवस्था—यह तमोगुण प्रधान अवस्था है । तमोगुण का आधिक्य इतना प्रवर्द्धित हो जाता है कि प्रमाता शरीर, मन, बुद्धि सभी को विस्मृत करके गंभीर मोह में संलीन हो जाता है । इस अवस्था में एतत्कालिक सुख-दुख का स्मरण तो नहीं रहता किन्तु—'मैं सुखपूर्वक सोया'—इत्याकारक स्मृति-रेखायें अवश्य (स्मृति पटल पर) खिंच जाती है । १. जाग्रत में जाग्रत २. जाग्रत में स्वप्न ३. जाग्रत में सुषुप्ति २. स्वप्न में जाग्रत २. स्वप्न में स्वप्न ३. स्वप्न में सुषुप्ति ३. सुषुप्ति में जाग्रत २. सुषुप्ति में स्वप्न ३. सुषुप्ति में सुषुप्ति ये समस्त अवस्थायें एक ही प्रमाता की अंगभूत अवस्थायें हैं—एक ही अवस्थाता न होता तो इन भिन्न अवस्थाओं का एक ही अवस्थाता प्रमाता अनुभव नहीं कर सकता था 'एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः ॥' (तं०वि०) ये पाँचों अवस्थायें एक ही वेदक में होती है— 'इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति ॥' (तं०) 'एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्य- वस्थानामवस्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् ।' (तं०वि०) । इन समस्त अवस्थाओं में अनुभविता, ज्ञाता, वेदक या उपलब्धक प्रमाता तो एक ही रहता है । अवस्थायें परिवर्तित होती रहती हैं किन्तु अवस्थातीत आत्मा परिवर्तित नहीं होती—समरूप रहती है यदि एक ही अनुभवी या अवस्थाता न रहे तो इन अवस्थाओं का ज्ञान एवं उसकी स्मृति किसे होगी? ये पाँचों अवस्थायें स्वयं प्रमाता की स्वेच्छागृहीत अवस्थायें हैं । अवस्थाओं में बदलाव आता है किन्तु इन अवस्थाओं का अनुभावक कभी नहीं बदलता । चैतन्यसत्ता एक है और विभिन्न अवस्थाओं का अनुभव भी वही एक सत्ता करती है—अवस्थाओं की भिन्नता के साथ चैतन्यों (वेदकों प्रमाताओं) में भिन्नता नहीं आ जाती ॥ 'माण्डूक्योपनिषद्' में आत्मा को चतुष्पाद बताते हुए एवं उनका विभिन्न अव- स्थाओं में अवस्थान इस प्रकार समझाया गया है और विभिन्न अवस्थाओं में भी एक अभिन्न प्रमाता की स्थिति का प्रतिपादन किया गया है— सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥ १) आत्मा का प्रथमपाद—१. 'वैश्वानर', २. स्वरूप—बहिःप्रज्ञ, ३. अंग—७, ४. मुख—१९, ५. भोक्ता—स्थूल, ६. इस आत्मा की अवस्था—जाग्रत् अवस्था । २) आत्मा का द्वितीय पाद—तैजस । अन्तप्रज्ञ । ७ अंग । १९ मुख । भोक्ता—सूक्ष्म विषयों का । अवस्था—'स्वप्नावस्था' । ३) आत्मा का तृतीय पाद—'प्राज्ञ' । भोक्ता = आनन्द का । मुख—चेतना स्वरूप = ज्ञान । अवस्था—सुषुप्ति । सुषुप्ति अवस्था = 'यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् ॥' स्थिति—'एकीभूत' ।
९० स्पन्दकारिका एक ही आत्मा के तीन भेद है किन्तु उनमें चैतन्य एक ही है । बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः । घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ (माण्डूक्योप०) १. 'विभुविश्व' = बहिष्प्रज्ञ २. 'तैजस' = अन्तःप्रज्ञ ३. 'प्राज्ञ' = घनप्रज्ञ । विश्व का स्थान = दक्षिणनेत्र । तैजस = मन के भीतर । प्राज्ञ = हृदयाकाश में । (एक ही आत्मा शरीर में ३ प्रकार से स्थित है) 'विश्व' = स्थूलभुक् । तैजस—सूक्ष्मभुक् । प्राज्ञ = आनन्दभुक् । इनको जानने वाला ज्ञाता भोगों को भोगते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता । आत्मा का तुरीय स्वरूप— 'तुरीय' का स्वरूप क्या है?— 'नान्तः प्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य- मव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' ('माण्डूक्योपनिषद') । विश्व और तैजस— स्वप्न एवं निद्रा से आच्छादित । 'प्राज्ञ' = स्वप्नशून्य किन्तु सनिद्र । तुरीय— न निद्रा न स्वप्न । स्वप्नावस्था—अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो ॥ (अन्यथा ग्रहण) । निद्रावस्था—निद्रातत्त्वमजानतः ॥ (तत्त्व का अज्ञान) स्वप्न + निद्रा दोनों का अन्त = तुरीय पद ॥ जो आत्मा विभिन्न अवस्थाओं में अवस्थित रहने के कारण भिन्नात्मक दृष्टिगोचर होती है उसे तात्विक दृष्टि से अभिन्न एवं अद्वैतभाव से देखने वाले ही परमार्थदर्शी हैं— एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः । एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशंकितः ॥ (मा० का०) तुर्यपद तो अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है । स्थायी अवस्थान प्राप्त करने पर यही तुर्यातीत पूर्णशिवभाव है । स्पन्द दार्शनिक इसी तुर्यपद शाक्तभूमिका प्राप्त करने पर बल देकर शिवभाव तक ले जाने का प्रयास करते हैं । तुर्य + तुरीयातीत = निर्विकल्प चिद्घन अवस्थायें । इसमें भेदकल्पना की संभावना नहीं । चिद्घनावस्था सततोदीयमान रहने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है । साधना-स्तर पर सांसारिकों की जागरण, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्थायें— ध्यान, धारणा एवं समाधि की अवस्थायें हैं । शङ्कराचार्य कहते हैं— 'निद्रा समाधि-स्थितिः' । आराधना— यद् यद् कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम्' । प्रदक्षिणा— संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः । अपनी वार्ता— 'स्तोत्राणि सर्वागिरो' अपनी आत्मा—शिव । अपनी बुद्धि = पार्वती । शिवसूत्रकार ने भी— 'कथा जपः, 'उद्यमो भैरवः, 'ज्ञानं जाग्रत' 'स्वप्नो विकल्पः ।' अविवेको माया सौषुप्तम् । इच्छा शक्तिः उमा कुमारी, 'दृश्यं शरीरं, 'वितर्क आत्मज्ञानम्, 'चितं मन्त्रः', 'प्रयत्नः साधकः । 'विद्या शरीरसत्ता मन्त्र रहस्यम्, 'शरीरं
प्रथमः निष्यन्दः ९१ हविः' 'ज्ञानं अन्नम्' आत्मा चित्तम्' ज्ञानं बन्धः । 'नर्तक आत्मा' 'रङ्गोऽन्तरात्मा' आदि रहस्यात्मक सूत्रों के द्वारा साधना-प्रयुक्त शब्दों में गुह्य प्रतीकार्थों को ग्रहण किया है । 'विज्ञानाकल' 'प्रलयाकल' एवं 'सकल' ये सभी आत्माओं के ही भेद तो हैं किन्तु चिदात्मा सभी में एक ही है भिन्न भिन्न नहीं । १. जाग्रत में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न, जाग्रत् में सुषुप्ति । २. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न, स्वप्न, में सुषुप्ति । ३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न, सुषुप्ति में सुषुप्ति । अवस्थायें भी होती हैं । ज्ञान की सप्त अवस्थाओं में भी इन सूक्ष्म अवस्थाओं का अन्तर्भाव है । समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व की अनुस्यूतता अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥ ४ ॥ यह तथ्य तो सम्यक् रूप से स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' मैं अनुरक्त हूँ'—आदि जो संवेदन (विकल्पात्मक ज्ञान) हैं ये किसी अन्य वेदक सत्ता के साथ संबंधित हैं । वह (वेदक सत्ता) इन सभी से पृथक् होने पर भी इन सभी सुखादिक अवस्थाओं में अनुस्यूत है ॥ ४ ॥
- सरोजिनी * स्पन्दात्मक स्वभाव समस्त अवस्थाओं में अनुस्यूत है । 'जो मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों में 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही संवेत्ता की अनुस्यूतता पाई जाती है । (भट्ट कल्लट) स्पन्दप्रदीपिकाकार इस कारिका का प्रतिपाद्य विषय बताते हुए कहते हैं— 'अवस्था एव विश्रान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥' अवस्थाओं का परिवर्तन मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का होता है चैतन्य का नहीं । एक ही चैतन्यात्मा की भिन्न-भिन्न अवस्थायें हैं । तीनों अवस्थाओं में उस स्पन्दतत्त्व के स्वभाव में कोई अन्तर नहीं पड़ता अन्यथा सोकर उठने पर तीनों अनुभूतियों को कैसे समानरूप से व्यक्त कर पाता ? समस्त अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता अवस्थित है । सुख, दुःख, प्रसाद, विषाद आदि सभी मनोदशाओं में 'अहंप्रतीति' के रूप में एक ही वेदक अनुस्यूत है । 'स्वभाव' सारी अवस्थाओं से भिन्न है । विवृत्तिकार + रामकण्ठाचार्य कहते हैं कि जाग्रदादि अवस्था विशेष में उपलब्धा संवित् तत्त्व 'स्वभाव' से निवर्तित नहीं होता क्योंकि 'स्व' की अर्थात् अपने (उपलब्धा स्वरूप के) ज्ञान की, 'भाव' (अर्थात् स्वानुभवरूप) की एकरूप अवस्थिति की अखण्ड अविच्छिन्नता (या निरन्तरता) इसे प्रमाणित करती है । किन्तु प्रश्न यह उठता है कि
९२ स्पन्दकारिका 'अनुभविता' 'उपलब्धा' अविच्छिन्न संवित् तत्त्व तो अनेक धरातलों पर भिन्न-भिन्न दिखाई पड़ता है फिर उसकी अभिन्नता सिद्ध कैसे की जा सकती है? विवृत्तिकार पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि अनुभविता इन अवस्थाओं में तो इन निम्न प्रकार के प्रत्ययों से घिरा रहता है— १. 'मैं मनुष्य हूँ' मैं ब्राह्मण हूँ, मैं देवदत्त हूँ, मैं युवक हूँ, मैं वृद्ध हूँ, मैं कृश हूँ, मैं स्थूल हूँ—इत्यादि। ये सभी प्रत्यय देहालम्बन हैं। २. 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि। ये प्रत्यय बुद्ध्यालम्बन हैं।१ ३. 'मैं बुभुक्षित हूँ, मैं पिपासु हूँ',—इत्यादि। ये प्रत्यय प्राणालम्बन हैं।२ ४. 'मैं कुछ भी नहीं जानता'—इस प्रकार के शून्यता प्रमाता के प्रत्यय हैं। ये प्रत्यवमर्शप्रत्येय सुषुप्तादि अवस्थाओं से प्रतिबुद्ध प्रमाता के प्रत्यय शून्यालम्बन हैं।३ और देह, बुद्धि, प्राण आदि तो अनित्य हैं और इनसे सम्बद्ध आलम्बन भी अनित्य हैं। फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि उपलब्धता, अनुभविता, एकात्मप्रत्ययसार, अद्वैत एवं अभेद कहा जाने वाला आत्मतत्त्व स्वभाव से निर्वर्तित नहीं होता?— इसी प्रश्न के उत्तर में कारिकाकार ने चौथी कारिका—'अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः' कही है।४ उत्पलदेवाचार्य कहते हैं कि—किसी-किसी का यह कथन है कि अवस्थायें तो विश्वान्तर्गत हैं किन्तु अवस्थाता तो विश्वान्तर्गत नहीं है अतः अवस्थाओं को भी स्वभाव से अभिन्न कैसे कहा जा सकता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि युक्तियों से इसका समाधान करने हेतु कारिकाकार यह चौथी कारिका प्रस्तुत करते हैं— 'अवस्था एव विश्वान्तर्नावस्थातेति ये जगुः । प्रत्यभिज्ञादियुक्त्येयं तन्निरासाय कारिका ॥'५ 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं रागी हूँ'—आदि प्रत्यय एवं अनुभव, संवेदन मात्र अवस्थायें हैं। वे भिन्न-भिन्न संवेदनों से पृथक् संवेत्ता या अवस्थाता (सुख दुःखादि के उपलब्धा) में उपराग रूप से सुस्पष्ट रूप में अवस्थित है। किन्तु ध्यातव्य यह है कि संवेत्ता के बिना भिन्न-भिन्न संवेदनों की सिद्धि कभी हो ही नहीं सकती—'संवेत्तारं विना संवेदनस्याभावात्' ।६ (क) क्षणिकज्ञानवादियों का खण्डन—क्षणिकज्ञान वादियों के मत में अनेक नदियाँ समुद्र में मिलकर तादात्म्य के कारण एक जान पड़ती हैं किन्तु यह संवेत्ता केवल अवस्थाओं का तादात्म्य नहीं है— नद्योऽब्धाविव तादात्म्यं प्रतप्रतिष्ठाः प्रयान्ति वा। क्षणिकज्ञानिनां ह्येव न तु ता एव केवलाः ॥ १-३. स्पन्दकारिकाविवृति । ४. स्पन्दकारिकाविवृति । ५-६. स्पन्दप्रदीपिका ।
प्रथमः निष्यन्दः ९३
क्योंकि—कार्यकारणभाव (या बाध्यबाधकभाव तब तक सिद्ध ही नहीं हो सकता जब तक कि पूर्वदशा एवं उत्तरदशा का एक ही प्रमाता न हो—) कार्यकारणभावो हि बाध्यबाधकताऽपि च । पूर्वापरैकमातारमन्तरेण प्रसिद्धयतः ॥१ जब प्रत्येक क्षण विलक्षण (पृथक्-पृथक्, पूर्वापरा सम्बद्ध) होंगे, प्रत्येक संविद् पृथक्-पृथक् होगी तो पूर्ववर्ती प्रमाण से उत्तरवर्ती प्रमेय को बोध कैसे होगा ? सम्बन्ध का ग्रहण किए बिना प्रमाण की गति क्या होगी? संवेत्ता के बिना मिथ्याज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध कैसे होगा? एक क्षण के अनन्तर यदि शुक्तिका रजत हो जाय तो उसे रोक कौन सकेगा?२ वस्तुतः संवेत्ता के एक हुए बिना प्रमाण-अप्रमाण का भेद ही नहीं रहेगा । ऐसी स्थिति में तो घट की सिद्धि होगी किन्तु पट का अनुभव होगा । ३ 'यह वही व्यक्ति है; यह वही वस्तु है; यह वही दृश्य है'—इत्यादि प्रत्यय भी क्षणिकवादियों के मतानुसार संभव नहीं हैं । अतः पूर्वविज्ञान की स्मृति जिसे 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं—यह 'सर्वथा प्रामाणिक है क्योंकि लोकसिद्ध है और दैनन्दिन अनुभवगत है । इसलिए नित्यस्वभाव आत्मा ही संवेत्ता है । वास्तविक बात तो यह है कि एक प्रमाता आत्मा की सिद्धि के बिना प्रमाण भी अप्रमाण हो जाएगा क्योंकि सब कुछ क्षणिक और अनिश्चित रहेगा । क्षणिक ज्ञान में कार्य कारण की सिद्धि कैसे होगी? स्मृति-बीज कैसे होगा? कारण का नाश कैसे हो गया ? यदि नाश नहीं हुआ तो विनाशी कार्य का कारण कैसे हुआ ? अभाव से भाव-परम्परा कैसे चल सकती है? यदि कार्य का नाश नहीं होता तो वह क्षणिक कैसे हुआ? जो दूसरे क्षण रह सकता है वह सौ क्षण तक भी रह सकता है । अभिप्राय यह कि भाव स्थिर हैं । स्वरूपतः भाव का अभाव नहीं होता- 'नासतो विद्यते भावः नाभावो विद्यते सतः ।' आत्मज्ञान में कुछ भी क्षणिक दृष्टिगत नहीं होता । निश्चय के बिना बाध्य-बाधक भाव भी सिद्ध नहीं होता । स्थिरता के बिना शुक्ति में रजत-भ्रान्ति मिटाने का क्या अर्थ होगा? अतः ज्ञान एक है, नित्य है और वह क्षणिक एवं अनेक नहीं हो सकता । 'प्रामाण्ये क्षणिकत्वेन प्रत्यक्षेणोपपद्यते । प्रागभावादुत्तरज्ञानदार्ढ्यात् प्रामाण्यसिद्धितः ॥ प्रतिक्षणमथान्यत्वात् सामान्यस्याग्रहे सति । विलक्षणाः क्षणाः सर्वे प्रामाण्ये किं निबन्धनम् ॥ सम्बन्धस्याग्रहश्चापि तेन मानस्य का गतिः । मिथ्याज्ञानस्य मिथ्यात्वं ब्रूहि वा किं निबन्धनम् ॥ क्षणान्तरे शुक्तिकायां रजतं केन वार्यते । भिन्नज्ञानस्य कर्तृत्वे सर्वं प्रामाण्यमाप्नुयात् ॥
१-३. स्पन्दप्रदीपिका ।
९४ स्पन्दकारिका अन्यस्वरूपसंसिद्धावन्यसिद्धिर्भवेद्यदि । घटस्वरूपसंसिद्धौ पटस्यावगमो भवेत् ॥ योऽयं स एवाऽयमिति प्रत्ययः स्थिरकालजः । कर्तुं शक्यो न तद्वादि प्रामाण्यात् क्षणिकैस्ततः ॥ प्राग्विज्ञानस्मृति प्रत्यभिज्ञा नित्यं प्रतिष्ठिताः । अतो नित्य स्वभावस्यैवात्मनः कर्तृतोदिता ॥ एक प्रमात्रभावात् स्यात् क्षणिकत्वाद् निश्चयात् । प्रमाणमप्यप्रमाणं स्याद् बौद्धान्यं हि निराश्रयम् ॥ बौद्धायन संहिता में भी कहा गया है कि— कार्यकारणभावस्तु नास्ति ज्ञाने क्षणक्षयः । क्षणं द्वितीयं नास्ते चेद् स्मृति बीजं कथं भवेत् ? जनकं तत् कथं नष्टमनष्टं वाप्यनष्टकम् । नष्टस्य जनकत्वं चेदभावादभावसन्ततिः ॥ जनकत्वेत्वनष्टस्य क्षणभंगः प्रहीयते । द्वितीयं यत्क्षणं तिष्ठेत्तदास्ते शतमप्यथ ॥ जनकत्वेऽर्थनिष्ठस्य अर्थे नाभावमेति तत् । तस्माद्भावाः स्थिरा सर्वे न च्यवन्ते स्वरूपतः ॥ आत्मावबोधविषये स्वस्थिराः क्षणिका न ते । बाध्यबाधकभावोऽपि न स्यान्निश्चायकं बिना ॥ शुक्तौ हि रजतज्ञानभ्रान्तिभंगोऽस्ति नान्यथा । तस्माज्ज्ञानं नित्यमेकं क्षणिकानि बहूनि नो ॥ ‘सत्कार्य सिद्धि’ में कहा गया है—‘यदि प्रत्येक विज्ञान स्वतन्त्र हो तो एक दूसरे का संवेदन नहीं हो सकता । अतः पूर्वावस्था एवं उत्तरावस्था दोनों का ज्ञाता एक प्रमाता होता है और वह विचित्र वृत्तियों के द्वारा व्यवहार का आश्रय बनता है । अनेक वृत्ति— ज्ञानों का अनुसन्धान एक अजन्मा ज्ञान को होता है ।’ गीता का यह वचन सर्वथा सत्य है कि एक ही चेतन स्मृति ज्ञान और अपोहन का कारण है ।’ विरोधियों के कुतर्क पाषाणों को चबाने में कोई लाभ नहीं है । ‘सत्कार्य सिद्धि’ में ठीक ही कहा गया है— ‘न हि स्वनिष्ठे विज्ञाने इतरेतरवेदनम् । तस्मात् पूर्वापरावस्था प्रमाणं परिपिण्डितः । एकः प्रमाता चित्राभिर्वृत्तिभिर्व्यवहारभाक् ॥ प्रत्यभिज्ञा में भी कहा गया है— एवमन्योन्यभिन्नानाम परस्पर वेदिनाम् । ज्ञानानामनुसंधानजन्मा नश्येज्जनस्थितिः । न चेदन्तः कृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः । स्यादेकश्चिद्वपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥
प्रथमः निष्यन्दः ९५ गीता में भी कहा गया है—'मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च' 'इत्यलं कुतर्काश्मनां चर्वणेन' (कुतर्कों के पत्थर चबाना बन्द करो।)।१ संवेत्ता का स्वरूप क्या है? 'किंभूते संवेत्तरि'? किस प्रकार के संवेत्ता में? यह वह संवेत्ता है जिसमें सुख-दुःख, मोह—प्रबोध आदि समस्त अवस्थायें स्थित हैं । ये अवस्थायें उसमें सूत में मणियों की भाँति अनुस्यूत हैं । 'मैं पहले सुखी था, आज मैं दुःखी हूँ',-इस अनुभव में सुख एवं दुःख में भेद तो है किन्तु 'मैं-मैं' में भेद नहीं है । इस स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञा का उसीको अनु- सन्धान हुआ करता है । इन अवस्थाओं में भी वह नहीं है क्योंकि ये अवस्थायें विकल्पमात्र हैं एवं अनित्य हैं । संवेत्ता इनसे अतिरिक्त है । अविद्यावरण तो केवल उपरागमात्र है यथा चन्द्रमा सूर्य पर ग्रहण । अंधकार से आच्छन्न होने पर रस्सी साँप नहीं बन जाती और न तो नष्ट होती है । इसी प्रकार आत्मा का कुछ बिगाड़ नहीं सकती—भर्तृहरि कहते हैं—२ नाच्छादितस्य तमसा रज्जुखण्डस्य विक्रिया । नाशो वा क्रियते यद्वत्तद्वन्नाविद्ययाऽऽत्मनः ॥ 'संवित्प्रकाश' में भी कहा गया है कि स्फटिक का स्वभाव अत्यन्त निर्मल है किन्तु जपाकुसुम आदि का उपराग होने पर स्फटिक लाल दिखाई पड़ने लगता है । भगवान् संवेत्ता का अत्यन्त निर्मल शरीर भावसमासक्त होकर विविध प्रकार का उपलब्ध होता है । यथा स्फटिक रंगीन नहीं होता वैसे ही भाव युक्त होने पर संवित् वैसी ही नहीं हो जाता । यह आत्म संवित् भी उपरक्त होने पर भी अपने निजरूप का परित्याग नहीं किया करता । रूपान्तरित न होने पर भी रूपान्तरित के तुल्य दृष्टिगोचर अवश्य होता है । जो कुछ भी दिखाई पड़ता है सब कुछ उसीका तो विलास है—३ अत्यन्ताच्छस्वभावत्वात् स्फटिकस्य यथा स्वकम् । रूपं परोपरक्तस्य नित्यमेवोपलभ्यते ॥ तथा भावसमासक्तं भगवंस्तावकं वपुः । अत्यन्तनिर्मलतया पृथक् तैनोपलभ्यते । नैतावताऽसौ स्फटिकः पृथङ्नास्त्येव रञ्जकात् । भावरूपपरित्यक्ता तव वा निर्मला तनुः ॥४ उपराग की स्थिति में भी शुद्धत्व नष्ट नहीं होता— उपरागेऽपि शुद्धत्वं न त्यक्तमनया प्रभो । परित्यज्य निजं रूपं संविदाख्या कुतश्च यत् । अथाऽप्राप्त्यैव तद्रूपं भवेद्रूपान्तरानुगा । तद्रूपापि हि दृश्येत कारणेऽस्यापि संभवात् ॥५ शुद्धानुभव विविध आकारों द्वारा अपने आकार का परित्याग नहीं कर देता बल्कि १-३. उत्पलदेवाचार्य । ४-५. स्पन्दप्रदीपिका ।
९६ स्पन्दकारिका अविच्छिन्न रूप में सदा निर्मल रहा करता है। श्वेत वस्त्र पर कोई रंग चढ़ा, उतर गया दूसरा चढ़ा और पुनः उतर गया । श्वेत वस्त्र ज्यों का त्यों रह जाता है। इसी प्रकार शुद्ध चेतन तत्तत् आकारों के राग से तत्तदाकार दिखाई तो पड़ता है किन्तु वस्तुतः रहता शुद्ध ही है । नील, पीत, सुख दुःख—सभी में चित् स्वरूप अखण्डित ही रहता है । चित्र-विचित्र उपाधि सम्पदा से विकल्प उसे विशिष्ट-विशिष्ट दिखाई देता है—१ सदैव शुद्धोऽनुभवो यं प्रत्याकारकर्बुरः । आकारान्तरसंचारकाले तस्यापि निर्मलः ॥ यथा जात्या सितं वस्त्रं रक्तं रागेण केनचित् । तत्पदप्राप्त शुक्लत्वं पुन रागान्तरं श्रयेत् ॥ एवं शुद्धा चितिर्जात्या यदाकारोपरागिणी । तत्त्यागापरसंचारमध्ये शुद्धैव तिष्ठति ॥२ नीले पीते सुखे दुःखे चित्स्वरूपमखण्डितम् । विशिनष्टि विकल्पस्तच्चित्रयोपाधिसम्पदा ॥३ आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं 'अहं सुखी इत्यादयो याः संविदः ता अन्यत्र वर्तन्ते' ततः असौ स्वभावात् एकस्मात् न निवर्तते ॥४ अर्थात् 'मैं सुखी हूँ'—आदि जो ज्ञान है वह अन्यत्र रहा करता है अतः आत्मतत्त्व अपने एकात्मक स्वभाव से कभी निर्वर्तित नहीं हुआ करता । 'मैं सुखी हूँ, मै दुःखी हूँ'—आदि संवेदन अन्तरंग है और वे बुद्धि पर अवलम्बित हैं । अन्य संवेदन देहादिक पर अवलम्बित हैं । उनका अपना सीधा सम्बन्ध उन्हीं से है—आत्मतत्त्व से नहीं । 'अन्यत्र'—अन्य जगह, अर्थात् शरीर, इन्द्रियमान, बुद्धि आदि जगहों में । 'वर्तन्ते' स्थित हैं । 'स्फुटम्'—यह बात सुस्पष्ट हैं या 'स्पष्टतया'। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ'—इत्यादि संविद—आत्मा में नहीं प्रत्युत् अन्यत्र बुद्धि, शरीर एवं प्राण आदि में रहते हैं तथापि सुखादिक से पृथक् उपलब्धि में भी अभेदात्मना रहते हैं—जैसे कि नदियाँ समुद्र में—'सरितः सागरे इव तत्र विगलितान्योन्यभेदा ऐक्येन अवतिष्ठन्ते, तादात्म्यं आपद्यन्ते ।'५ 'स्फुटम्' = स्वानुभवसंवेद्य होने के कारण सुप्रकट ही हैं ।६ 'संविदः' शब्द का (बहुवचनान्त) प्रयोग क्यों किया गया ? कारण यह है कि—एक ही उपलब्धिरूप संवित् 'अहमोऽस्मि' के रूप में पारमार्थिकी स्फुरण से भी संवलित होता है और वही माया शक्तिजनित एवं तथाविध स्वभाव-परामर्श के अभाव के कारण अनित्य सुखदुःखादि का वेदक होने के कारण—'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ— १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४. स्पन्दकारिकाविवृति । ५-६. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः ९७ इत्यादि संवेदन द्वारा बुद्धि आदि अवस्थाओं के साथ सामानाधिकरण्य स्थापित कर लेने के कारण अनेक संवेदनों के मध्य विचरण करता है अतः कारिकाकार ने 'संविदः' (बहुवचनान्त) शब्द का प्रयोग किया है। आचार्य रामकण्ठ ठीक ही कहते हैं कि यदि सुखादिक वेद्य वस्तु के संबन्ध के कारण संवित् भी सुखादिवत् विभिन्नरूपों वाला बन जाता तो स्मृति एवं प्रत्यभिज्ञानुसंधान न हो पाता। ऐसा न होने पर समस्त व्यवहारोच्छेद हो जाता किन्तु यह स्थिति तो अभीष्ट है नहीं। कारिकाकार 'अन्यत्र' शब्द के पूर्व 'एताः संविदः' विशेषण का प्रयोग करते हैं। ये संवेदन (ज्ञान) किस स्वरूप वाले 'अन्यत्र' में रहते हैं? ये 'सुखाद्यवस्था' में अनुस्यूत रूप वाले अन्यत्र' में रहते हैं। अर्थात् समस्त सुख-दुःख-मोहरूप विशिष्ट अवस्थाओं में उत्पादविनाशधर्मक होने के कारण अनित्य दशाओं में, वेद्यत्व के सामान्य होने के कारण शब्दादिविषय समानवृत्तियों में एवं 'अहमोऽस्मि' अनुभूति के ज्ञान से संवलित उपलब्धा के भीतर विद्यमान रहते हैं। 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इन प्रत्ययों में दो अर्थ स्फुरित होते हैं— १. सुखाद्यात्मा वेद्यरूप एवं २. अहमिति अपर वेदक रूप 'वेद्यत्वरूप'—घटादिक अनित्य पदार्थों के नानात्व को द्योतित करने वाला। 'वेदकरूप' = पूर्वापरावस्था में व्यापक होने के कारण समस्त प्रमातृ प्रसिद्ध, समस्त व्यवहारों के कारणों के अनुसंधानक, नित्य स्थित एवं उपलब्ध रूप एकात्मक संवित् तत्त्व। अवस्थायें जाग्रदादि भेदों के कारण अनेक हैं किन्तु संवित् तत्त्व उसमें संचरण करने पर भी अभिन्नलक्षण एवं एक रूप वाला ही रहता है। 'मैं सुखी हूँ' एवं 'मैं दुःखी हूँ' ये दोनों अवस्थायें भिन्न-भिन्न हैं। एक ही संवेत्ता दोनों अवस्थाओं का संवेदन करता है किन्तु उसके स्वरूप में एकानुसंधातृनिबद्धावस्था होने के कारण एक से अधिक न होने की अभिन्नता (एकता) बनी रहती है। वह नित्य निरावरणा रूप होने के कारण सर्वत्र अनिरुद्ध, स्वयंसिद्ध एवं तात्त्विक स्वभाव में मात्र शङ्कर है और वही समस्त अवस्थाओं में अनुस्यूत है—'स च अनुस्यूत एव सर्वासु अवस्थासु।' उनको 'पर स्वभाव' कहा गया है—'स स्वभावः परः स्मृतः ॥' आचार्य क्षेमराज का कथन है कि चौथी कारिका सौगतों के सिद्धान्त का खण्डन करने के उद्देश्य से कही गई है। सौगत तर्क की शक्ति पर, ज्ञान के सातत्य में विश्वास रखते हैं।१ 'ये सभी सुख-दुःख एक ही चेतना के विविध रूप हैं तथापि ये विभिन्न रूपों एवं विभिन्न आकारों में स्थित हैं' मीमांसक कहते हैं—'यह सभी कुछ आत्मा ही है जो कि १. स्पन्दनिर्णय। स्पं० ७
९८ स्पन्दकारिका सुखादि के द्वारा सदैव छायी रहती है तथा जो कि अपनी चेतना के द्वारा ही सत्ता में बनी रहती है।' 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं आसक्त हूँ'—ये एवं इसीप्रकार के अन्य ज्ञान केवल एक सत्ता में रहते हैं जिसमें कि आनन्दादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं।१ वहीं मैं, जो कि 'सुखी हूँ, दुःखी हूँ,' का अनुभव करता है, वही 'सुखानुशय (सुख के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध) के कारण रागी एवं दुःखानुशय के कारण द्वेषवश द्वेषी हो जाता है। उसके ये सभी प्रत्यय (ज्ञान) एक ही नित्य आत्मतत्त्व में पाये जाते हैं। एवं ये प्रत्यय एक नित्य एवं साक्षी रूप में स्थित आत्मतत्त्व में विश्राम ग्रहण करते हैं। अन्यथा अवबोधों के अन्तर्सम्बन्धों एवं उनके प्रभावों पर आधृत अन्य विचार अपने आप नष्ट हो जायेंगे तथा विचार गतिशील नहीं हो सकते।२ 'च'—और इस श्लोक में 'च' शब्द तीन बार प्रयुक्त हुआ है। वह सम्बन्ध को विकसित करता है क्योंकि यह एक वस्तु के साथ दूसरे का संबन्ध द्योतित करता है। 'एक में' शब्द, 'उसमें' शब्द द्वारा, विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुआ है। अर्थ यह है कि—जिसमें सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत हैं। ये ऐसे अन्तर्विद्ध हैं यथा माला में मणियों के दाने।३ 'ताः' = वे। वे क्षणवादी दार्शनिक जो कि ज्ञान की क्षणभंगुरता में विश्वास रखते हैं सब कुछ क्षणिक मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि क्षण-क्षण परिवर्तित होने वाली घटनाओं की परिवर्तन परम्परा या क्षणभंगुरता की दृश्यावलियों को तो केवल वही देख सकता है जो कि इन सभी परिवर्तनों एवं क्षणक्षण की घटनाओं से अप्रभावित रहकर स्थायी सत्ता रखकर इनकी क्षण-क्षण में होने वाली विनाश लीलाओं को देख सके। यदि ऐसी कोई स्थायी एवं अक्षणात्मक सत्ता मान ली जाती है तो 'क्षणिकवाद सिद्धान्त' अपने आप खण्डित हो जाता है।४ 'ज्ञान' स्मृति से उत्पन्न होते हैं। 'स्मृति' भूतकालिक घटना का पुनर्जागरण है। यदि प्रत्येक वस्तु क्षण-क्षण में परिवर्तित हो जाती है तो 'स्मृति' संभव ही नहीं हो सकती क्योंकि तब तक स्मरण करने वाला संवेत्ता परिवर्तित हो जायेगा। अतः क्षण भर के पूर्व का संवेत्ता एक क्षण के बाद तो रह नहीं जायेगा (प्रत्युत एक क्षण के बाद एक नया संवेत्ता उत्पन्न हो जाएगा) अतः उसे भूतकाल की ये स्मृतियाँ कैसे हो सकती हैं? आचार्य क्षेमराज एक प्रश्न यह भी उठाते हैं कि मूलभूत यथार्थतत्त्व वह तो हो नहीं सकता जिसमें कि सुखादिक अवस्थायें अनुस्यूत रहती हैं अतः वह सुखादि से अनुस्यूत चेतना आत्मा भी नहीं हो सकती क्योंकि आत्मा का स्वरूप लक्षण चैतन्य है—'चैतन्यमात्मा' ।५ जब यह आत्मा अपनी निजी अशुद्धियों के द्वारा उपहित हो जाता है उस स्थिति में अपने यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर लेता है और ऐसी स्थिति में ही सुखदुखादि अवस्थाओं का अनुभव करता है। सुखदुखादि का अनुभविता 'पुर्यष्टक' है न १. स्पन्दनिर्णय। २-४. क्षेमराजाचार्य—स्पन्दनिर्णय। ५. शिवसूत्र।
प्रथमः निष्यन्दः ९९ कि स्वस्वरूपावस्थित पूर्णचेतन संवित् तत्त्व । इस स्थिति में भी उसके लिए सुखदुखादि का स्थायी या नित्यात्मक अवरोध नहीं है क्योंकि वह उनसे मुक्त भी हो सकता है । कारिकाकार ने 'मैं कृश हूँ' 'मैं पृथुल हूँ'—इत्यादि न कहकर 'मैं सुखी हूँ—मैं दुःखी हूँ'—इत्यादि का प्रयोग क्यों किया? इसलिए किया क्योंकि ग्रन्थकार यह प्रस्तुत करना चाहता है कि—'शिव के साथ मेरी निजी आत्मा स्वरूप से अभिन्न है'—यह अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है । यह अनुभव पुर्यष्टक की स्थिति में भी होता है । किन्तु ये अनुभव ज्ञानी एवं आनन्दमय शङ्कर के यथार्थ स्वरूप में कहीं भी स्थान नहीं पाते । शङ्कर ही यथार्थ सत्य है । यथार्थ तत्त्व सुखदुःखादि से उपहित नहीं है । साधक पुर्यष्टकत्व से मुक्ति की साधना का लक्ष्य रखकर आगे बढ़ता है । 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—आदि के प्रत्यय शरीर, इन्द्रिय, मन एवं जागतिक वासनाओं से ऊपर उठने पर नष्ट हो जाते हैं अन्तर्पथ की यात्रा के समय भी ऐसा ही होता है । 'सम्यक् पुर्यष्टक शमनाय एवं आस्थेय इति ॥'१ आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि रहस्यगुरुप्रवर, अनुभवागमज्ञ, कारिकाकार ने युक्तियों, तर्कों एवं उपपत्तियों द्वारा समस्त वादों की अनुपपन्नता का अनुवदन करते हुए स्पन्दतत्त्व का ही प्रतिपादन किया है । 'स्पन्दतत्त्वमेवास्तीति प्रतिजानाति ।'२ इसीलिए वे अगले श्लोक में कहते हैं कि जहाँ सुख, दुःख, ज्ञाता एवं ज्ञेय नहीं है एवं जहाँ क्षणभंगुरता (अनित्यता) की भी अवस्था नहीं है वही पारमार्थिक तत्त्व है— 'न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च । न चास्ति मूढ़भावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ (का०५) निष्कर्ष—रामकण्ठ कहते हैं कि 'मैं सुखी या दुःखी हूँ आदि जो संवेदानायें हैं वे अन्यत्र स्थित हैं अतः यह स्पन्द तत्त्व अपने एकात्मक अविचल स्वस्वंभाव से कभी प्रत्यावर्तित या निवर्तित नहीं होता ॥३ 'आदि' = देहादिक आलम्बन ॥ ये संवेदनायें उपलब्धा स्पन्द से पृथक् तो हैं किन्तु इन भिन्न-भिन्न समस्त अवस्थाओं में एक ही संवित् तत्त्व अनुस्यूत है । १. एक ही संवित् तत्त्व उपलब्ध (अनुभवकर्ता) के रूप में अहं प्रतीति के साथ विद्यमान है ।४ २. वही माया शक्ति जनित तथाविध स्वभाव परामर्शाभाव के कारण सुखादिक अनित्य वस्तुओं का वेदक बनकर 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ'—इस प्रकार की अनुभूतियों से संक्रान्त होकर बुद्ध्याद्यवस्था सामानाधिकरण्य प्राप्त किए हुए स्थित है । ये समस्त संवेदनायें सुख, दुःख मोह आदि अवस्थाओं में स्थित हैं । इस संवेत्ता के दो रूप हैं— १. एकः सुखाद्यात्मा वेद्यरूपः । (घरादि की भाँति) २. द्वितीय है—अहमाकार संवेदन द्वारा अपर वेदक के रूप में । १-२. स्पन्दनिर्णय । ३-४. स्पन्दकारिकाविवृति ।