श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
५८ एक विज्ञान से सर्व विज्ञान रूप विशिष्ट फल निधान तथा जीव की अपेक्षा श्रेष्ठत्वाभिधान के आधार पर अन्तर्यामी शब्द की जीव और प्रधानार्थकता का निराकरण । ३. परापरा भेद से द्विविध विद्या का निरूपण । ब्रह्म प्राप्ति के उपाय भूत अपरोक्ष ज्ञान की भक्तिरूपता का प्रतिपादन तथा अंगहीन और अयथानुष्ठित कर्म की निष्फलता ज्ञापन । —पृ०४३१-४० ६. वैश्वानराधिकरण (सूत्र २५-३३) १. पूर्वपक्षः—वैश्वानर शब्द से जाठराग्नि, भूताग्नि और देवता अर्थ की संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त) परमात्मा के विशेषधर्मों के आधार पर वैश्वानर की परमात्मकता का प्रतिपादन । अग्निमूर्धा इत्यादि के निर्देश से वैश्वानर की परमात्मकता का निरूपण । पूर्व सूत्रीय युक्ति से देवता और भूताग्नि की वैश्वानरता का खण्डन । वैश्वानर की ब्रह्मता का जैमिनि के मतानुसार अविरोध और उपपत्ति । आश्मरथ्य और बादरि आचार्यों के मत से अविरोध का उपपादन जैमिनि मतानुसार वैश्वानर उपासना तथा उपासक के देह में उपास्य का विवेचन । —पृ०४४०-५५ (तृतीय पाद) १. द्युभ्वाद्यधिकरण (सूत्र १-६) १. पूर्वपक्ष--द्यु भूलोक आदि के आश्रय के रूप में अभि- हित पदार्थ की जीवता की संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त)-लोकाभिहित पदार्थ की परमात्मकता की, उपस्थापना, भेद निर्देश हेतुक जीवता का खण्डन, प्रकरणानुसार ब्रह्मार्थकता का समर्थन । —पृ०४५६-६२ २. भूमाधिकरण (सूत्र ७-८) १. भूमा शब्द की व्याख्या ankurnagpal108@gmail.com
१. जिज्ञासाधिकरण एवं महासिद्धान्त (मायावाद-खण्डन व सविशेष ब्रह्म-सिद्धि)
१६ २. पूर्वपक्ष--भूमा की जीवता का संशय ३- (सिद्धान्त)-भूमा की परमात्मकता का निरूपण तथा उसकी सुखरूपता आदि विशिष्ट गुणों का उप- पादन । —पृ०४६२-७७ ३. अक्षराधिकरण (सूत्र ९-११) १. पूर्वपक्ष--वेदोक्त अक्षर शब्द की प्रधान, जीव और पर ब्रह्म अर्थों में अभिशंका उत्थापन पूर्वक प्रधान और जीव के अर्थ में संभावना का संशय । २. (सिद्धान्त) सर्व जगत् विधारकत्ता, सर्वशास्ता और अच्युतत्व के आधार पर अक्षर तत्त्व की परब्रह्मार्थकता का प्रतिपादन । —पृ०४७७-८३ ४. ईक्षति कर्माधिकरण (सूत्र १२) १. त्रैमात्रिक प्रणवोपासना की प्रतिपादक श्रुति के अर्थ का विवेचन । उपास्य “पर पुरुष” की जीवार्थकता का निरास, ईक्षणीय “पर पुरुष” की ब्रह्मात्मकता का प्रतिपादन । —पृ०४८३-८७ ५. दहराधिकरण (सूत्र १३-२२) १. पूर्वपक्ष—“दहराकाश” की जीवात्मकता और भूता- काशता का संशय । २. (सिद्धान्त) सत्यकामता, आदि विशिष्ट गुणों के आधार पर दहर की परब्रह्मता का निरूपण । ३. सुषुप्ति में जीवों की दहराकाश गति की प्रकाशिका श्रुति, दहर के लिए प्रयुक्त ब्रह्मलोक शब्द के उल्लेख तथा दहर के ब्रह्म संबंधीय गुणों के आधार पर उसकी परमात्मकता का समाधान । ४. गति श्रुति के अन्यार्थ का निरूपण । विश्वधारण महिमा, अपहतपाप्मता आदि विशिष्ट गुण, के अनुसार दहर की ब्रह्मात्मकता का उपपादन । ५. दहर की जीवताविषयक संभावना का समाधान जीव की अविद्या रहित अवस्था के प्रदर्शन के निमित्त
२० दहर की जीवोल्लेखना का निरूपण। अल्पत्व श्रुति के आधार पर अब्रह्मभाव संबन्धी शंका का समा- धान। दहर के अनुरूप अवस्था वाले जीव को ही दहर स्वीकारने का निराकरण तथा स्मृत्यानुसार भी दहर की ब्रह्मरूपकता का निरूपण। —पृ०४८७-५०६ ६. प्रमिताधिकरण [सूत्र २३-४१] १. पूर्वपक्ष--अंगुष्ठ परिमित पुरुष की जीवात्मकता और परमात्मकता के विचार में जीवात्मकता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)---श्रंगुष्ठ परिमित पुरुष की परमात्मकता का उपस्थापन तथा मानव हृदय के परिमाणानुसार पुरुष की अंगुष्ठ परिमिति की सिद्धि। —पृ०५०६-६ १. प्रासंगिक देवताधिकरण [सूत्र २५-२६] १. पूर्वपक्ष--मनुष्य भिन्न जीवों का उपासना में अन- धिकार प्रदर्शन। २, (सिद्धान्त)—मनुष्येतर देवतादिकों के उपासनाधि- कार का प्रतिपादन तथा उनकी शरीरता का सम- र्थन। देवताओं की शरीरता स्वीकारने में, अनेकों यज्ञों में उनकी युगपद् उपस्थिति की असंभावना का निराकरण तथा वैदिक शब्द के विरोध का परिहार। देवादिसृष्टि की शब्द पूर्वकता का प्रतिपादन तथा मंत्रमय वेद की नित्यता का समर्थन। प्रत्येक प्रलय के अन्त में समानाकार सृष्टि का समर्थन। —पृ०५०६-२१ (ii) प्रासंगिक मध्वधिकरण (सूत्र ३०-३२) १. पूर्वपक्ष-मधु आदि विद्याओं में, वसु आदि देवताओं के उपासना अधिकार के असंभव होने से जैमिनी के मतानुसार उपासना में देवताओं के अनधिकार का विवेचन। ज्योतिर्मय ब्रह्मोपासना मात्र में अधिकार का ज्ञापन। ankurnagpal108@gmail.com
२१ २. (सिद्धान्त)--बादरायण के मतानुसार देवताओं के उपासनाधिकार का प्रतिपादन । --पृ०५२१-२५ (iii) प्रासंगिक अपशूद्राधिकरण (३३-३६) १. पूर्वपक्ष--ब्रह्मविद्या में शूद्रों के अधिकार का समर्थन २. (सिद्धान्त) - ब्रह्म विद्या में शूद्रों के अनधिकार का उपस्थापन, ब्रह्म विद्यार्थी जानश्रुति की क्षत्रियता का प्रतिपादन चित्ररथ वंशीय राजा अभिप्रतारी के साहचर्य निर्देश से जानश्रुति की क्षत्रियता की पुष्टि । ब्रह्मविद्या में उपनयन अपेक्षित होने से शूद्रों के वेद श्रवण, अध्ययन और अधिकार रहित होने की पुष्टि । स्मृति प्रमाणों से भी अनधिकार का समर्थन । निर्विशेष ब्रह्मवादी मत से शूद्र के अन- धिकार की अनुपपत्ति । अधिकरण की परि- समाप्ति-ज्योति शब्द से उल्लेख परिमित पुरुष की परब्रह्मता का प्रतिपादन तथा अन्य संभावना का निरास । --पृ०५२५-४३ ७ अर्थान्तरत्वाधिकरण (सूत्र ४२-४४) १. पूर्वपक्ष--नामरूप निर्वाहक आकाश शब्दोक्त आत्मा में मुक्तात्मा और परमात्मा की संभावना की तुलना में मुक्तात्मा का समर्थन । २ (सिद्धान्त) - सुषुप्ति और उत्क्रमण काल में आकाश और जीव के स्पष्ट भेद उल्लेख होने से तथा आकाश के लिए प्रयुक्त पति शब्द के प्रयोग से आकाश की परमात्मकता की पुष्टि । --पृ०५४३-४६ (चतुर्थपाद) १. आनुमानिकाधिकरण (सूत्र १-७) १. पूर्वपक्ष--कठोपनिद् के “महतः परमव्यक्तम्” मंत्र के आधार पर सांख्य परिकल्पित प्रधान की जगत्का- रणता की कल्पना । ankurnagpal108@gmail.com
२१ २. (सिद्धान्त)—अव्यक्त शब्द से रथरूप से परिकल्पित शरीर के निर्देश से, अव्यक्त शब्द की सूक्ष्म शरीरता का समर्थन तथा रथरूपक की सार्थकता का विवेचन ज्ञेयता के अभाव में प्रधान का निराक- रण। प्रधान में ज्ञेयता की सम्भावना का खंडन करते हुए प्राज्ञ आत्मा की ज्ञेयता की पुष्टि। परम पुरुष, उसके उपासक तथा उपासना प्रणाली संबंधी प्रश्नोत्तरों का उल्लेख। महत् शब्द के दृष्टान्त से सांख्योक्त प्रधान की सम्भावना का निराकरण। —पृ० ५५०-६५ २ चमसाधिकरण सूत्र (८ १०) १. पूर्वपक्ष—वेदोक्त अजा शब्द की सांख्योक्त प्रधाना- र्थता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—चमस दृष्टान्त से प्रधान के अपरिग्रह का निरूपण। ब्रह्मोत्पन्न अजा ग्रहण के हेतु तथा आदित्य की मधुत्व कल्पना के समान, ब्रह्मकारणिका प्रकृति की अजत्व कल्पना की संगति का प्रदर्शन। अजा शब्द की शांकर मतोक्त तेज, जल और अन्नार्थ प्रतिपादकता का निराकरण। —पृ० ५६५-७६ ३. संख्योपसंग्रहाधिकरण सूत्र (११-१३) १. पूर्वपक्ष—"पंच पंचजना." श्रुति से सांख्योक्त प्रधान के पचीस तत्त्वों की परिकल्पना। २. (सिद्धान्त) श्रौत और सांख्य के पच्चीस तत्त्वों की नितान्त भिन्नता से उक्त मत का निराकरण। पंचजन शब्द से प्राण आदि पांच का तथा काण्व शाखा के अनुसार ज्योति शब्द से विषय प्रकाशिका इन्द्रियों की पंच संख्या का निरूपण ! —पृ० ५७६-८२ ४. कारणत्वाधिकरण सूत्र (१४-१५) १. पूर्वपक्ष—"तदैक्षत" श्रुति की प्रधान कारणपरता का समर्थन। २. (सिद्धान्त)—आकाश आदि की कारणता के रूप से अवधारित, परब्रह्म की जगत्कारणता का समर्थन ankurnagpal108@gmail.com
२३ तथा पूर्ववर्त्ती वाक्य की अनुवृत्ति के आधार पर परब्रह्म की कारणता का अवधारण । —पृ०५८२-८७ ५ जगद्वाचित्वाधिकरण सूत्र (१६-१८) १. पूर्वपक्ष-“यः एतेषां” श्रुत्युक्त पुरुष शब्द से साङ्गोक्त पुरुष का समर्थन । २. (सिद्धान्त)-कर्त्ता पद से परमात्मता का निरूपण तथा जीवात्म दर्शन पक्ष का खण्डन । जीव और मुख्य प्राण परता का प्रत्याख्यान जैमिनि मत के अनुसार परमात्मसत्ता के ज्ञापन के लिए जीव के उल्लेख का निरूपण । —पृ०५८७-६६ ६ वाक्यान्वयाधिकरण [सूत्र १६-२२] १. पूर्वपक्ष-“आत्मा वा अरे” श्रुति कथित आत्मा की जीवता की परिकल्पना । २. (सिद्धान्त)- समस्त वेदांत वाक्यों की तात्पर्य पर्यालो- चना से आत्मा शब्द की ब्रह्मार्थकता का प्रतिपादन । ३. आश्मरथ्य 'औडुलोमि, काशकृत्स्न आदि आचार्यों के मत से भी परमात्मकता का प्रतिपादन । पृ०५६६-६१६ ७ प्रकृत्यधिकरण [सूत्र २३-२८] १. पूर्वपक्ष-उपादान और निमित्त कारणकी लोकसिद्ध पृथकता से परब्रह्म की निमित्तकारणता मात्र की परिकल्पना । २. (सिद्धान्त -सृष्टि विषयक चिन्ता प्रणाली के आधार पर तथा साक्षात् संबंध से ब्रह्म की निमित्त और उपादान कारणता का विवेचन । स्थूल, सूक्ष्म अवस्था भेद से निरंजनता आदि बोधक वाक्यों का उपपादन तथा ब्रह्म के जगदुपादानता बोधक वाक्य का वर्णन । —पृ०६१६-३५ ८ सर्वव्याख्यानाधिकरण [सूत्र २६] जगत् कारणता बोधक समस्त वेदांत वाक्यों की ब्रह्म कारणपरता का निरूपण । —पृ०६३५-३६ ankurnagpal108@gmail.com
२४ द्वितीय अध्याय (प्रथम पाद) १. स्मृत्यधिकरण (सूत्र १-२) सांख्य आदिदर्शनों से ब्रह्म के कारणतावादी वेदांत का विरोध प्रदर्शन मनु आदि स्मृतियों की सहायता से ब्रह्मकारणतावाद की निर्दोषता का समर्थन । सर्वज्ञ मनु आदि से अनुमोदित न होने से सांख्योक्त तत्त्वों की अप्रामाणिकता का निरूपण । —पृ० ६३६-४८ २. योग प्रत्युक्ति अधिकरण [सूत्र ३] योग साधना से अतिरिक्त सिद्धान्त विषय में पातञ्जल दर्शन की अप्रामाणिकता का निरूपण । —पृ० ६४८-५४ ३. विलक्षणत्वाधिकरण [सूत्र ४-१२] १. पूर्वपक्ष-विलक्षणताहेतुक अचेतन जगत की चेतन ब्रह्मोपादानकता का प्रतिषेध तथा पृथिव्यादि के चेतनाधिष्ठान का प्रतिपादन । २. (सिद्धान्त)—दृष्टान्त और युक्ति द्वारा विलक्षण दो पदार्थों के कार्य कारणभाव का समर्थन । उत्पत्ति के पूर्व भी ब्रह्म में जगत् की विद्यमानता का प्रति- पादन । प्रलयकाल में विलीन जगत के दोषों से ब्रह्म कलुषता की संभावना की शंका का दृष्टांत द्वारा समाधान । पृ० ६५४-६४ ४. शिष्ट परिग्रहाधिकरण [सूत्र १३] सांख्य स्मृति की तरह, वेदवाह्य सभी स्मृतियों की अप्रामाणिकता का निरूपण । पृ० ६६४-६५ ५. भोक्त्रापत्याधिकरण [सूत्र १४] चेतन अचेतन शरीरधारी ब्रह्म में भी जीव के समान भोग प्राप्ति की कल्पना का निराकरण । पृ० ६६५-६६ ankurnagpal108@gmail.com
१५ ६ आरम्भणाधिकरण [सूत्र १५-२०] १. असत्कार्यवादी कणाद आदि के मतों का दिग्दर्शन स्वमतानुसार कार्य कारण के अभेद का समर्थन । शंकरादि सम्मत जीव ब्रह्मादि विषयक सिद्धान्त का दिग्दर्शन शंकरादिमतों का निराकरण । अपने मत और सिद्धान्त का उपसंहार । २. कार्याधीन करणोपलब्धि के आधार पर कार्य कारण की अभिन्नता का समर्थन । वेदोक्त “असत्” शब्द के अर्थान्तर का विवेचन । कार्य कारण के अभेद में पटादि के दृष्टान्त का प्रदर्शन । एक ही वायु के प्राण अपान आदि भेद के दृष्टान्त से एक ही ब्रह्म की विचित्र जगत्कारणता का उपपादन । —पृ० ६६६-७२४, ७. इतरव्यपदेशाधिकरण (सूत्र २१-२३) १. पूर्वपक्ष—जीव और ब्रह्म की एकता के मत में, सर्वज्ञ ब्रह्म ने अपने लिए अहितकर दुःखमय जगत रचना की, इस असंगति की आशंका । २. (सिद्धान्त)—श्रुति स्मृति पुराणों के आधार पर जीव ब्रह्म के भेद का उपपादन । जड़ और जीव की ब्रह्मभावानुपपत्ति का प्रदर्शन । स्थूल-सूक्ष्म, चेतना- चेतन शरीरक ब्रह्म की कारण और कार्यावस्था का निरूपण । पाषाण आदि के दृष्टान्त से उसकी पुष्टि । अविद्या के हेतु से जीव, ब्रह्म के विभागवादी मत का खण्डन । —पृ० ७२४-३०, ८. उपसंहार दर्शनाधिकरण (सूत्र २४-२५) १. पूर्वपक्ष—साधन निरपेक्ष ब्रह्म की जगत्कर्त्तृत्वानुपपत्ति का दिग्दर्शन । २. (सिद्धान्त)--क्षीर जल आदि के दृष्टान्त से साधन निरपेक्ष ब्रह्म की कर्त्तृता का प्रतिपादन । —पृ० ७३०-३३,
२६ ९. कृत्स्न प्रसक्ति अधिकरण (सूत्र २६-३१) १. पूर्वपक्ष—निरवयव ब्रह्म के सर्वांश की जगदाकार परिणति की संभावना में संशय तथा उसकी निरा- कारता स्वीकारने में आपत्ति । २. (सिद्धान्त)—ब्रह्म की निराकारता के होते हुए भी शास्त्रानुसार असंपूर्ण परिणाम का समर्थन । ब्रह्म- निष्ठ शक्ति वैचित्र्य के आधार पर परिणाम वैचित्र्य का उपपादन । त्रिगुणात्मिका प्रकृति कारणतावादी सांख्यमत में दोष प्रसक्ति परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता बोधक श्रुति का दिग्दर्शन उपयुक्त साधनों के अभाव में भी ब्रह्म की सर्वकारणता का पुष्टि पुष्ट समाधान । —पृ० ७३३-३८ १०. प्रयोजनवत्त्वाधिकरण (सूत्र ३२-३६) १. निष्प्रयोजन सृष्टि कार्य में पूर्ण काम ब्रह्म की अप्रवृत्ति का समर्थन । ब्रह्म कृत जागतिक सृष्टि की लीलारूपता का वर्णन । २. सृष्टि कार्य में ब्रह्म की विषम दर्शिता और निर्दयता की शंका । जीव के कर्मानुसार जगत् सृष्टि वैचित्र्य के सिद्धान्त से ब्रह्म प्रसक्त वैषम्य और नैर्घृण्य दोषों का परिहार । सृष्टि के आदि में कर्माभाव की शंका । सृष्टि की अनादिता के हेतु से कर्म के सद्भाव का प्रतिपादन । ब्रह्म सृष्टि की अनादिता के हेतु से कर्म के कारणत्वोपपादक धर्म सद्भाव का निरूपण । —पृ० ७३८-४३, [द्वितीय पाद] १ रचनानुपपत्त्यधिकरण (सूत्र १-६) १. सांख्यमत तत्त्व वर्णन और प्रकृति की जगत् कारणता का समर्थन स्वमतानुसार प्रकृति की जगत्कारणता की अनुपपत्ति दिखलाते हुए सांख्य मत खंडन । ankurnagpal108@gmail.com
जल और दूध के दृष्टान्त से प्रकृति जगत्कारणता के किए गए समर्थन का निराकरण । २. ब्रह्म की सृष्टिकर्तृ'ता में जीव के पुण्यपापानुसार प्रकृति की कारणता का समर्थन । पुण्य पाप की शास्त्रगम्यता, परमेश्वर की दयालुता, और निग्रहानुग्रह के आधार पर प्रकृति की जगत्कारणता का खंडन । ३. धेनु भुक्त तृण आदि की दुग्धाकार परिणिति की तरह, ईश्वर प्रेरणा निरपेक्ष प्रकृति की जगदाकार परिणिति के सिद्धान्त का खंडन । ४. पंगु सहायक अंध तथा लोह सन्निहित चुम्बक मणि की तरह, पुरुष निकटस्थ प्रकृति स्फुरण सिद्धान्त का खंडन । सत्त्व, रज और तमोगुण में गुण प्रधान भाव की अनुपपत्ति । ५. प्रधान में ज्ञान शक्ति के अभाव के आधार पर तत्संबंधी अन्यान्य अनुमानों की अनुपपत्ति का प्रदर्शन । अनुमान के साहाय्य से प्रधान की स्थिति की सिद्धि होते हुए भी उसकी व्यर्थता ज्ञापन । परस्पर विरोधी सिद्धान्तों के आधार पर सांख्यमत की असमंजसता का दिग्दर्शन । ६. शांकर सम्मत निर्विशेष चिन्मात्र की असत् बंध मोक्ष भागित सिद्धान्त का खंडन । —७४३-६६ २. महद्दीर्घाधिकरण [सूत्र १०-१६] १. वैशेषिक परमाणु कारणवाद का वर्णन एवं उसकी अनुपपत्ति का प्रदर्शन । १०वें सूत्र की शांकर व्याख्या में दोष दिग्दर्शन । २. परमाणुगत प्राथमिक क्रियोत्पत्ति की असंभवता का वर्णन । समवाय संबंध का खंडन । युत सिद्धि और अयुतसिद्धि का विचार तथा समवाय स्वीकृति में अनवस्था दोष की शंका । समवाय संबंध की नित्यता
३४ के हेतु से तत्संबंधी जगत् नित्यता की संभावना का ज्ञापन। रूप रस आदि गुण संबद्ध होने से परमाणु में अनित्यता, स्थूलता आदि दोषों की संभावना की विज्ञप्ति। परमाणुगत, रूप रस आदि की स्वीकृति और अस्वीकृति दोनों में दोष प्रदर्शन। शिष्टों से अपरिगृहीत परमाणु कारणवाद की उपेक्षणीयता।—पृ०७६६-७३. ३. समुदायाधिकरण [सूत्र १७-२६] १. चार प्रकार के बौद्धों के अभिमत सिद्धान्तों का वर्णन २. परमाणुजात और पृथिव्यादि जात संघातों की उत्पत्ति की अनुपपत्ति अविद्या आदि परस्पर कारण कार्य भाव से समुदायों की उत्पत्ति सिद्धांत का स्वमतानुसार निराकरण । ३. क्षणिकवाद में पूर्ववर्त्ती और परवर्त्ती क्षण के कारण कार्यवाद की असंभावना का प्रदर्शन, तथा कारण के बिना कार्योत्पत्ति की स्वीकृति में प्रतिज्ञा हानि का वर्णन । प्रतिसंख्या निरोध और अप्रतिसंख्या निरोध की अनुपपत्ति का प्रदर्शन । तुच्छ कारण से कार्योत्पत्ति तथा उत्पन्न पदार्थ की तुच्छता के सिद्धान्त का खण्डन । आकाश की तुच्छता का खण्डन । प्रतिभिज्ञा प्रमाण का खण्डन । ४. सौतांत्रिकाभिमत विज्ञानवाद का खण्डन तथा प्रयत्न के अभाव में कार्योत्पत्ति की संभावना का समर्थन । —पृ० ७७३-८८, ४. उपलब्ध्यधिकरण [सूत्र २७-२६] १. योगाचार मत से विज्ञानातिरिक्त बाह्यवस्तु मात्र के असद् भाव का समर्थन । विज्ञानमात्रास्तित्ववाद का खंडन । २. स्वप्न दृष्ट पदार्थ के साथ बाह्य पदार्थ की विलक्षणता का प्रदर्शन । बाह्य पदार्थ के असद्भाव का खंडन ।
२६ ५. सर्वथानुपपत्त्यधिकरण [सूत्र ३०] सर्वशून्यवादी माध्यमिक सिद्धान्त का वर्णन । स्वमतानुसार सर्वशून्यत्ववाद का निराकरण । —पृ० ७८६-९३, ६. एकस्मिन्नसम्भवाधिकरण [सूत्र ३१-३३] १ जैनाभिमत सिद्धान्त का निरूपण । सप्तभंगी न्याय की असंगति । २ आत्मा की देह परिमितता, तथा संकोच विकास स्वभाव का खंडन । आत्मा की मोक्ष कालीन परिणाम की स्थिरता के आधार पर उक्त स्वभाव का निराकरण । —पृ० ७९३-८०२, ७. पशुपत्यधिकरण [सूत्र ३४-३८] पाशुपत मत का वर्णन । पाशुपत की असमंजसता का विवेचन अशरीर ईश्वर के प्राकृतिक अधिष्ठान की असंभवता प्रदर्शन । अशरीर जीव के इन्द्रियाधिष्ठान की तरह परमेश्वराधिष्ठान की स्वीकृति से ईश्वर में सुखदुःखादि भोग प्रसक्ति की संभावना प्रदर्शन । पशु- पति में पुण्य पाप की स्वीकृति से अनित्यतादि दोषों की संभावना का दिग्दर्शन । —पृ० ८०२-८, उत्पत्त्यसंभवाधिकरण [सूत्र ३९-४२] १. पांचरात्र सात्वतदर्शन के सिद्धान्त का विवेचन । २. पूर्वपक्ष-कर्त्तास्वरूप संकर्षण से कारणरूप प्रद्युम्न की उत्पत्ति का विरोध प्रदर्शन । ३. उत्तरपक्ष-संकर्षण आदि की विज्ञानमय ब्रह्मस्वरूपता हेतुक जीवोत्पत्ति के विवेचक पांचरात्र मत की प्रामाणिकता ज्ञापन । पांचरात्र शास्त्रानुसार ही जीव की स्वरूपतः उत्पत्ति का निषेध तथा पांचरात्र शास्त्र की वेद सम्मतता का प्रतिपादन । ४. (सिद्धान्त)— “न च कर्त्तुः करणम्” इत्यादि सूत्रों की शंकराचार्य कृत व्याख्या का निराकरण । सांख्य
३० आदि शास्त्रों के साथ पांचरात्र शास्त्र का अविरोध ज्ञापन। उक्त शास्त्र की स्वाभिमत स्वीकृति । —पृ० ८०८-१६, (तृतीय पाद) १. वियदधिकरण [सूत्र १-६] १. पूर्वपक्ष-आकाश की अनुत्पत्ति का संशय । २. (सिद्धान्त)-आकाश की उत्पत्ति का समर्थन तथा आकाशोत्पत्ति बोधक श्रुति की गौणार्थता के संशय का निराकरण । ३. पूर्वपक्ष-ब्रह्म शब्द की तरह “संभूत” शब्द के गौण मुख्य दोनों ही अर्थों का समर्थन । ४. (सिद्धान्त)-एक विज्ञान से समस्त विज्ञान की प्रतिज्ञा के आधार पर आकाशोत्पत्ति के सिद्धान्त का श्रौत शब्दों से ही समर्थन । जन्य पदार्थ मात्र की ब्रह्म कार्यता का समर्थन । आकाशोत्पत्ति से वायु की उत्पत्ति का वर्णन तथा सद्ब्रह्म की अनुपपत्ति का निरूपण । —पृ० ८११-२६, २. तेजोधिकरण (सूत्र १०-१७) १. पूर्वपक्ष-शुद्ध वायु से तेजोत्पत्ति की शंका, तेज से जलोत्पत्ति की शंका, जल से पृथिवी उत्पत्ति की शंका श्रौत “अन्न” शब्द के पृथिवी परक अर्थ का हेतु प्रदर्शन । १. (सिद्धान्त)-आकाशादि शरीरधारी ब्रह्म से वायु आदि की उत्पत्ति का समर्थन, ब्रह्म से साक्षात् आकाश आदि की उत्पत्ति का प्रतिपादन । इन्द्रिय और मन की उत्पत्ति के आधार पर ब्रह्म की साक्षात् कारणता का समर्थन । स्थावर जंगम सभी पदार्थों की ब्रह्म शब्द की मुख्यार्थता प्रदर्शन । —पृ० ८२६-३२, ३. आत्माधिकरण (सूत्र १८) १. पूर्वपक्ष-आकाश आदि की तरह जीवोत्पत्ति की शंका
३३ २. (सिद्धान्त)-श्रुति और युक्ति के आधार पर जीव की नित्यता का समर्थन तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान का उपपादन। —पृ० ८३३-३६, ४. ज्ञाधिकरण सूत्र (१६-३२) १. जीवात्मा का स्वरूप निरूपण । २, पूर्वपक्ष—जीवात्मा की चैतन्य रूपता का समर्थन । ३. (सिद्धान्त]—आत्मा की ज्ञानरूपता का निराकरण तथा ज्ञान विशिष्टता का प्रतिपादन । जीव की लोकान्तर गमनागमना बोधक श्रुति के आधार परसर्वव्यापकता का खंडन । जीव की अणु परिमाणता का प्रतिपादन लोकान्तर गमनागमन में जीव के कर्त्तृत्व का समर्थन । ४ विज्ञानमय शब्द से जीव एवं उसकी सर्वव्यापकता मानने वाले सिद्धान्त का निराकरण, उसकी ब्रह्मा- र्थता का निरूपण । अणु परिमाण बोधक शब्द तथा दृष्टान्त के आधार पर जीव की अणुता का समर्थन । अणु जीव की सर्वांगीण उपलब्धि का समर्थन । जीव की हृदयस्थिति का समर्थन । एक स्थित प्रदीपादि की तरह जीव की भी सर्वांगीण ज्ञानरूप अनुभूति का प्रतिपादन । आत्म गुण ज्ञान की आत्मातिरिक्तता का प्रदर्शन । ज्ञान और आत्मा के पृथक निर्देश का समर्थन । ज्ञान प्राधान्यता के आधार पर ही, आत्मा में ज्ञान शब्द की व्यवहार्यता का सम्मोदन । ज्ञान और आत्मा के नित्य साहचर्य के कारण आत्मा के लिए प्रयुक्त विज्ञान शब्द के प्रयोग का उपपादन । सुषुप्ति आदि अवस्थाओं में ज्ञान की अप्रतीति होते हुए भी ज्ञान की आत्मगुणता का समर्थन । आत्मा की सर्वव्यापकता और ज्ञानमयता में दोष प्रदर्शन ।—पृ० ८३६-५०, ५. कर्त्ताधिकरण (सूत्र ३३-३६) जीवात्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण । इन्द्रियग्रहण और परिभ्रमण में आत्मा के कर्त्तृत्व का निरूपण ankurnagpal108@gmail.com
३३ बुद्धि की कर्तृता स्वीकारने में दोष प्रदर्शन। बुद्धि की कर्तृता में भोगशांकर्य का उपपादन बुद्धिकर्तृता में समाधिसाधन की असंभवता तथा उसकी भोगकर्तृता का समर्थन। जीव की कर्तृता होते हुए भी सामयिक कर्मानुष्ठान का उपपादन। —पृ० ८५०-५६, ६. परायत्ताधिकरण (सूत्र ४०-४१) जीव की ब्रह्माधीन कर्तृता का तथा जीव की चेष्टानुसार ईश्वर प्रेरणा का निरूपण। —पृ० ८५६-६०, ७ अंशाधिकरण (सूत्र ४२-५३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म से जीव की अत्यन्त भिन्नता की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव की ब्रह्मांशता का प्रतिपादन। श्रुति और स्मृति प्रमाणों से अंशता का उपपादन। ब्रह्म में जीवगत दोष संसर्गता संभावना के प्रसंग में आदित्य आदि दृष्टान्तों की प्रस्तुति देहभेद से जीवों के अधिकार भेदों का प्रतिपादन। देहभेद और जीव भेद के कारण एक के भोग का दूसरे में अभाव प्रदर्शन। जीव और ब्रह्म की अभेद समर्थक आभासता का उपपादन। अदृष्ट की भोग नियामकता का वर्णन। भोगाभिसंधि से जीव की अनियामकता का वर्णन। अंशभेद के अनुसार भोगादि व्यवस्था का खंडन। —पृ० ८६०-७१, [चतुर्थ पाद] १. प्राणोत्पत्ति अधिकरण [सूत्र १-३] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रियों की उत्पत्ति की शंका। २. (सिद्धान्त)—इन्द्रियों की उत्पत्ति का समर्थन, तथा अनुत्पत्ति बोधक श्रुतियों की गौणार्थता निरूपण। आकाशादि से भिन्न वायु आदि की सृष्टि का उपपादन। —पृ० ८७१-७५, ankurnagpal108@gmail.com
३३ २. सप्तगत्यधिकरण [सूत्र ४-५] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रियों की सप्त संख्या का प्रतिपादन। १. (सिद्धान्त)—इन्द्रियों की एकादश संख्या का निरूपण।—पृ० ५७५-७८ ३. प्राणाणुत्वाधिकरण [सूत्र ६-७] एकादश इन्द्रियों की अणुता का प्रतिपादन तथा मुख्य प्राण की अणुता का उपपादन। —पृ० ५७८-७९, ४ वायुक्रियाधिकरण [सूत्र ८ ११] मुख्य प्राण की वायुरूपता तथा वायु की क्रियारूपता का खंडन। मुख्य प्राण की जीवोपकरणता का निरूपण। प्राण की पंचवृत्त्यात्मकता का निरूपण।—पृ० ५७९-८३ ५ श्रेष्ठाणुत्वाधिकरण [सूत्र १२] मुख्य प्राण की अणुता का निरूपण। —पृ० ५८३, ६ ज्योत्याद्यधिष्ठानाधिकरण सूत्र [१३-१४] १. पूर्वपक्ष—इन्द्रिय, जीवात्मा तथा अग्नि आदि देवताओं की स्वतंत्र अधिक्रामता की शंका। २. (सिद्धान्त)—परमेश्वरेच्छाधीन अनुष्ठान का निरूपण तथा परमेश्वर के सार्वभौम अधिष्ठान का वर्णन।—पृ० ५८४-८६ ७ इन्द्रियाधिकरण [सूत्र १५-१६] प्राणपद वाच्य चक्षु आदि की इन्द्रियता का भेद श्रुति और स्वभाव वैलक्षण्य के आधार पर मुख्य प्राण की अनिन्द्रियता का निरूपण। —पृ० ५८६-८७, ८ संज्ञामूर्त्तिक्लृप्ति अधिकरण [सूत्र १७-१९] १. पूर्वपक्ष—व्यष्टि जागतिक सृष्टि की हिरण्यगर्भ कर्त्तृता पर शंका। २. (सिद्धान्त)—व्यष्टि जगत सृष्टि की परमात्मकत्तृता का निरूपण। १. पूर्वपक्ष—व्यष्टि सृष्टि की जीव कर्त्तृता की शंका। २. (सिद्धान्त)—ब्रह्माण्ड सृष्टि प्रकरणीय "त्रिवृत्करण" का अर्थान्तर निरूपण।
१४ १. पूर्वपक्ष--त्रिवृत्कृत आकाश आदि भूत समुदाय के पृथक् पृथक् व्यवहार की संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—अधिकता के अनुसार आकाश आदि नाम की व्यवहारिकता का उपपादन। —पृ० ८८७-६६, [तृतीय अध्याय] [प्रथम पाद] १ तदन्तर प्रतिपत्त्यधिकरण [सूत्र १-७] शरीर त्याग करते समय जीव भावी देह के उपादान भूतसूक्ष्म को ले जाता है या नहीं, इस पर विचार १. पूर्वपक्ष—भूतसूक्ष्म को न ले जाने की शंका। २. (सिद्धान्त)—जीव के साथ भूतसूक्ष्म के गमन का प्रतिपादन प्रयाण काल में वागादि इन्द्रियो की अग्नि आदि में लीनता बतलाने वाली श्रुति के आधार पर उक्त शंका का समाधान। पंचाग्निविद्या के प्रकरण में जल होम का उल्लेख न होने से सूक्ष्मभूतों के सहगमन पर उद्भूत संशय का समाधान। जीवो- ल्लेख संबंधी संशय का समाधान। —पृ०८६६-१०६, २. कृतात्ययाधिकरण (सूत्र ८-११) कर्मयोगी जीवों के चन्द्रमण्डल से लौटते समय प्राक्तन कर्म अवशिष्ट रहते हैं या नहीं, इस पर विचार। १: पूर्वपक्ष—जो कर्म फलभोग के लिए जीव के साथ जाते हैं, उनका चन्द्रमण्डल में ही भोग समाप्त हो जाता है। २. (सिद्धान्त)—कर्म के अवशिष्ट फलभोग के लिए ही पृथिवी में पुनरागमन होता है, इस मत का प्रतिपादन। १. पूर्वपक्ष— संचित शुभाशुभ कर्मानुसार जीव के जन्म का समर्थन
३५ ४. (सिद्धान्त)—वैदिक “चरण” शब्द के आधार पर अवशिष्ट कर्मानुसार ही जन्म का समर्थन । ५. पूर्वपक्ष—स्मृतिशास्त्र विहित आचार की व्यर्थता ज्ञापन । ६. (सिद्धान्त)—स्मृति शास्त्रोक्त आचार की कारणता का प्रतिपादन बादरि आचार्य के मतानुसार “चरण” शब्द की पुण्य पापार्थता का निरूपण । —पृ० ६०६-११, ३. अनिष्टादिकार्याधिकरण (सूत्र १२-२१) १. यागादिकर्म विहीन पापी जीवों की भी चान्द्रमसी गति की संभावना का निरूपण । प्रथम यमालय में पापफल का भोग बाद में चान्द्रमसी गति की संभावना प्रदर्शन । २. सात प्रकार के प्रधान नरकों का ज्ञापन । नरक में यम की प्रधानता वर्णन । कर्मी और कर्मांग विद्या संपन्न व्यक्तियों की चान्द्रमसी गति का निरूपण । पापपुण्य रहित अज्ञ जीवों की दंशमशकादि गति का वर्णन । स्वेदज में उद्भिज का अन्तर्भाव । —पृ० ६११-१६, ४. तत्स्वाभाव्यापत्ति अधिकरण (सूत्र २२) चन्द्रमंडल से लौटते समय कर्मयोगियों की आका- शादि स्वभाव प्राप्ति का निरूपण । —पृ० ६१६-१७, ५. नातिचिराधिकरण (सूत्र २३) आकाश आदि स्वभाव के परित्याग की त्वरा का विवेचन । —पृ० ६१७-१८, ६. अन्याधिष्ठिताधिकरण (सूत्र २४-२७) अन्य जीवों से अधिष्ठत जीव का शस्य प्रवेश वर्णन । यज्ञीय हिंसा में निष्पापता का प्रतिपादन । जीव का शस्य से, रेत सेचनक्षम शरीर में प्रवेश वर्णन । स्त्री देह में रेत सिंचन द्वारा जीव का गर्भ प्रवेश तथा योनि द्वारा जन्म वर्णन । —पृ० ६१८-२१, ankurnagpal108@gmail.com
३६ (द्वितीय पाद) १. संध्यधिकरण (सूत्र १-६) १. पूर्वपक्ष—स्वप्नदृष्ट पदार्थों की जीवकर्त्तृता का श्रौत प्रमाणों से समर्थन। २. (सिद्धान्त) स्वप्नदृश्य की मायिकता का वर्णन। परमेश्वर की इच्छानुसार ही जीव की ज्ञानैश्वर्यादि शक्ति के तिरोधान और बंधन मुक्ति का प्रतिपादन। देह संबंध को जीव की शक्ति तिरोधान का कारण ज्ञापन। स्वप्नदर्शन की शुभाशुभ सूचकता का वर्णन। —पृ० ६२४-२६, २. तमसाधिकरण (सूत्र ७ ८) १. पूर्वपक्ष—हित नामक नाड़ी और आत्मा इन दोनों स्थानों में यथा संभव सुषुप्ति की संभावना का संशय। २. (सिद्धान्त)—नाड़ी, पुरीतत और आत्मा तीनों स्थानों में सुषुप्ति का निरूपण। सुषुप्ति भंग के समय ब्रह्म से जीव के उत्थान का वर्णन। —पृ० ६२६-३१, ३. कर्मानुस्मृतिशब्दविध्यधिकरण (सूत्र ६) जागरण के समय जीव के पुनरुत्थान का निरूपण। ४. मुग्धाधिकरण (सूत्र १०) मुग्धावस्था का स्वरूप निरूपण। —पृ० ६३१-३४, ५. उभयलिंगाधिकरण (सूत्र ११-२५) १. पूर्वपक्ष—जाग्रत आदि अवस्थाओं से संबद्ध ब्रह्म में दोष प्रसक्ति संभावना की शंका। २. (सिद्धान्त)—तीनों अवस्थाओं से संबद्ध होते हुए भी ब्रह्म की निर्दोषता तथा उसकी उभयलिंगता का निरूपण। कठशाखीय मत से एकस्थानस्थित ब्रह्म की निर्दोषता तथा शरीर स्थित होते हुए भी उसकी निराकारता का उपपादन। ankurnagpal108@gmail.com
३७ ३. ब्रह्म की स्व-प्रकाशता एवं ज्ञान स्वभावता का उपपादन उक्त विषय में जलसूर्यादि प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त प्रस्तुत । ४. पूर्वपक्ष—जल सूर्यादि के साथ देहस्थ परमात्मा की विषम दृष्टान्तता का दिग्दर्शन । ५. (सिद्धान्त)—वृद्धि ह्रास आदि दृष्टान्त द्वारा उक्त आपत्ति का परिहार । ६. 'नेति नेति' श्रुति का तात्पर्य निरूपण ब्रह्म के अव्यक्त भाव का वर्णन। भक्ति स्वरूप निदिध्यासन की अवस्था में ब्रह्म की अभिव्यक्ति का विवेचन। प्रकाश आदि की तरह ब्रह्म के मूर्त्तामूर्त्तरूप का वर्णन। ब्रह्म के कल्याणमय अनन्त गुणों के सद्भाव का निरूपण । —पृ० ६३४-५१, ६. अहिकुण्डलाधिकरण (सूत्र २६-२६) अहिकुण्डल के दृष्टान्त से ब्रह्म के भेदाभेद रूप का प्रतिपादन । तेज के दृष्टान्त एवं प्रकारान्तर से भी भेदाभेद का उपपादन । जड़धर्म विधेयक श्रुति के आधार पर ब्रह्म के अंशांशी भाव का निरूपण ।—पृ० ६५१-५५, ७. पराधिकरण (सूत्र ३० ३६) १. पूर्वपक्ष-श्रुति में ब्रह्म को सेतु और परिमित कहे जाने से, उससे अतिरिक्त तत्त्व के अस्तित्व की आशंका । २. (सिद्धान्त)—सादृश्यता बोधकरूप से सेतु शब्द का प्रतिपादन । उपासना के द्वैविध्य से सेतु शब्द के प्रयोग का उपपादन । स्थान विशेष से संबद्ध होने से ब्रह्म के परिमाण निर्देश का सयुक्ति प्रतिपादन । ब्रह्म के अतिरिक्त किसी अन्य वृहत् पदार्थ की सत्ता का निराकरण । ब्रह्म की सर्वव्यापकता का समर्थन । —६५५-६२, ankurnagpal108@gmail.com