श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
३७ ८ फलाधिकरण [सूत्र ३७-४०] १. हर प्रकार के फल प्रदान में ब्रह्म की कत्तृं ता का वर्णन। २. जैमिनि के मत से धर्म से फलप्राप्ति का वर्णन। ३. बादरायण के मतानुसार परमेश्वर की फल प्रदानता का उपपादन। —पृ० ६६२-६६, (तृतीय पाद) १. सर्ववेदांत प्रत्ययाधिकरण [सूत्र १-५] विभिन्न वैदिक शाखाओं में विहित एक जातीय ब्रह्मोपासना की एकता का वर्णन। उपासना की एकता के संबंध में की गई शंका का समाधान। यज्ञांग स्नान के दृष्टान्त से शिरोव्रत की अध्ययनांगता का निरूपण। श्रुति के आधार पर विद्या की एकता का समर्थन। एक उपासना में कथित गुणों का तत्समान जातीय उपासना में उपसंहार के प्रयोजन का निरूपण। —पृ० ६६७-७२, २. अन्यथात्वाधिकरण [सूत्र ६-६] १. पूर्वपक्ष—छांदोग्य और बृहदारण्यक में वर्णित उद्गीथ विद्या की भिन्नता का संशय। २. (सिद्धान्त)—छांदोग्य और बृहदारण्योक्त उद्गीथो- पासना के स्वरूपगत भेद के आधार पर दोनों की पृथकता और विद्याभेद का प्रतिपादन। उद्गीथ की प्रणवार्थता का निरूपण। —पृ० ६७२-७६, ३. सर्वभेदाधिकरण [सूत्र १०] ज्येष्ठ श्रेष्ठ आदि गुणों के योग से प्राणोपासना की एकता प्रतिपादन। —पृ० ६७६-८३, ४. आनन्दाधिकरण [सूत्र ११-१७] आनन्द आदि ब्राह्म गुणों का सभी उपासनाओं में चिन्तन का उपदेश। प्रियशिर आदि गुणों का सभी ankurnagpal108@gmail.com
३६ जगह उपसंहार किये जाने का निराकरण । प्रिय- शिर आदि गुणों की अपेक्षा आनन्द आदि गुणों की विलक्षणता का निरूपण । प्रियशिर आदि गुणों का प्रयोजन वर्णन । प्रियशिर आदि गुणों की अब्रह्मता का वर्णन । परमात्मा के आनन्द गुण का वर्णन । आनन्द आदि गुणों की परमार्थधर्मता का निरूपण । —पृ० ६८३-८६, ५. कार्याख्यानाधिकरण [सूत्र १८] भोजन के पूर्व और उत्तर काल में आचमनीय जल की प्राणवासना का निरूपण । —पृ० ६८६-६१, ६. समानाधिकरण [सूत्र १६] अग्नि रहस्य और बृहदारण्य की शाण्डिल्य विद्या की एकता का निरूपण । —पृ० ६६१-६२, ७. संबंधाधिकरण [सूत्र २०-२२] ब्रह्मोपासना के अंग "अहः और अहम्" इन दो नामों की प्रयोजनीयता निरूपण । स्थान भेद से उक्त दोनों के पृथक प्रयोग का निरूपण । श्रुति द्वारा स्वाभिमत [
४० १२. साम्परायाधिकरण (सूत्र २७-३१) ज्ञानी के पुण्यपाप त्याग काल का निरूपण । पुण्यपाप त्याग सपंर्क। वाक्य समन्वय का निर्देश । कर्मानुसार कार्याधिकार विशेष प्राप्त जीवों की अधिकार पर्यन्त अवस्थिति का विवेचन । —पृ० १००४-६, १३. अनियमाधिकरण (सूत्र ३२) उपासक मात्र की देवयान गति ब्रह्मलोक प्राप्ति का निरूपण । —पृ० १००६-१२, १४. अक्षर धी अधिकरण (सूत्र ३३-३४) अक्षर ब्रह्म संबंधी अस्थूलता आदि गुणों का सभी विद्याओं में उपसंहार निर्देश, उक्त गुणों के उपसंहार की आवश्यकता का निरूपण । —१०१२-१५, १५. अन्तरत्वाधिकरण (सूत्र ३५-३७) सर्वान्तरपद की परमार्थता का निरूपण । उषस्त और कहोल के प्रश्नार्थ के परस्पर विनिमय का प्रदर्शन । छांदोग्य में एक ही परादेवता के पूर्वापर कीर्त्तन का निरूपण । —पृ० १०१५-२६, १६. कामाद्यधिकरण (सूत्र ३८-४०) छांदोग्य और वाजसनेयोक्त सत्यकामता आदि ब्राह्म गुणों का अभेद निरूपण । नेति नेति श्रुति से सत्यकामता आदि गुणों की अप्रतिषिद्धता ज्ञापन । सगुणोपासना की मोक्षसाधकता का निरूपण ।— पृ० १०२६-३४ १७.तन्निर्धारण नियमाधिकरण (सूत्र ४१) कर्मकाल में कर्मांग उपासना की अवश्यकर्त्तव्यता का खंडन । —पृ० १०३४, १८. प्रदानाधिकरण (सूत्र ४२) अपहतपाप्मता आदि गुणों के साथ गुणी परमात्मा के चिन्तन की आवश्यकता ज्ञापन । —पृ० १०३४-३६, ankurnagpal108@gmail.com
. शरीरभावाधिकरण (सूत्र ५१-५२) Wait, in line 15:(सूत्र १-५२)or(सूत्र ५१-५२)? Look at (सूत्र १-५२): there is a digit ५before१? No, there is a space, but wait, look really closely at the space between रand१: Wait, सूत्रends withत्र. Then a space. Then ५? No, wait! There is no ५, it just says १-५२or is it५१-५२with the५missing? Wait, look at the space: betweenत्रand१-५२: the space is the width of one digit! The ५was either broken or dropped out of the composing stick! Wait, or did it print a faint mark? No, it's blank. But wait, in Devanagari Brahma Sutra, Sharirabhava is सूत्र ५१-५२ (or 1-52? No sutras go up to 52 without being in the 50s here, since the previous is 44-50 and the next is 53-54!). Wait, should we transcribe५१-५२or१-५२? Usually, if the ५is missing in print, do we transcribe१-५२
४१ एक या अनेक के अनुष्ठान की कर्त्तव्यता निरूपण । १. पूर्वपक्ष—कर्मांगाश्रित उपासना में कर्मांग के साथ उपासनानुष्ठान की आवश्यकता का शास्त्र सम्मत युक्तिपूर्ण प्रतिपादन । —पृ०१०५७-६१ २६. यथाश्रयभावाधिकरण (सूत्र ५८-६४) २. (सिद्धान्त)—कर्मांगानुष्ठान के साथ तदाश्रित उपासना की अवश्य कर्त्तव्यता का खंडन, उक्त मत की पुष्टि में शास्त्र समर्थन । —पृ०१०६१-६६ (चतुर्थ पाद) १. पुरुषार्थाधिकरण (सूत्र १-२०) १. बादरायण के मतानुसार विद्या से मुक्ति लाभ का निरूपण । २. जैमिनि के मतानुसार विद्या की मुक्ति साधनता की अर्थवादिता का प्रदर्शन, उक्त मत में शिष्ट सम्मति प्रदर्शन । प्रकारान्तर से विद्या की कर्मांगता का समर्थन । ३. बादरायण मत से सिद्धान्त निरूपण । विद्या की कर्मांगता के विरुद्ध प्रमाण प्रदर्शन । विद्या की कर्मांगता का खंडन मृत व्यक्ति के साथ विद्या और कर्म के पृथक गमन का वर्णन विद्या की कर्मांगता विषयक जैमिनि की युक्ति का सतर्क खंडन जैमिनि प्रदर्शित नियम श्रुति का अर्थान्तर कथन, प्रकारान्तर से नियम श्रुति का प्रतिपादन । वैराग्य सम्पन्न व्यक्ति के गृह त्याग विषय में श्रुति प्रमाण प्रस्तुति । विद्या की कर्मोपमर्दकता प्रदर्शन । कर्मत्यागी संन्यासी के विद्यानुशीलन का समर्थन । ४. आचार्य जैमिनि के मतानुसार संन्यासाश्रम की अवैधता । ५. बादरायणाचार्य के मत से संन्यासाश्रम का सद्भाव तथा वैधता प्रतिपादन । —पृ०१०६७-८६ ankurnagpal108@gmail.com
४३ २. स्तुतिमात्राधिकरण (सूत्र २१-२२) १. पूर्वपक्ष—यज्ञांग उद्गीथ आदि के विषय में उपदिष्ट रसतमत्व आदि के प्रशंसामात्र तात्पर्य का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—यज्ञांग उद्गीथादि के विषय में रसतमत्वादि दृष्टि की विधेयता का प्रतिपादन। —पृ० १०८६-८८ ३. पारिप्लवाधिकरण (सूत्र २३-२४) १. पूर्वपक्ष—उपनिषदुक्त सभी आख्यायिकाओं की पारिप्लव प्रयोगांगता का प्रदर्शन। २. (सिद्धान्त)—आख्यायिकाओं के विद्यामाहात्म्य प्रकाशन तात्पर्य का समर्थन, एकवाक्यता द्वारा सिद्धान्त प्रतिपादन। —पृ० १०८८-८९ ४. अग्नीन्धनाद्यधिकरण (सूत्र २५) ऊर्ध्वरेताओं का यज्ञांग विद्या में अधिकार प्रतिपादन पृ० १०८९-९० ५. सर्वापेक्षाधिकरण (सूत्र २६) कर्म निरत गृहस्थों की विद्योपासना में अग्निहोत्र कर्मानुष्ठान की आवश्यकता प्रतिपादन। पृ० १०९०-९२ ६. शमाद्यधिकरण (सूत्र २६) गृहस्थों के लिए शमदमादि आवश्यकता का प्रतिपादन। —पृ० १०९२-९४ ७. सर्वान्नानुमत्यधिकरण (सूत्र २८-३१) आपत् काल में प्राणात्मदर्शी के लिए सर्वान्नभक्षण की शास्त्रानुमति समर्थन। विशुद्ध आचार से चित्त शुद्धि निरूपण। यथेच्छ आहार निषेध। —पृ० १०९४-९७ ८. विहितत्वाधिकरण (सूत्र ३२-३५) मुक्ति की अभिलाषा से रहित गृही के लिए आश्रमो- चित कर्मानुष्ठान की अनिवार्यता का निर्देश। विद्या के सहकारी साधन के रूप में कर्मानुष्ठान की कर्तव्यता का निरूपण। यज्ञांग और आश्रमांग कर्मों ankurnagpal108@gmail.com
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की एकरूपता का विश्लेषण। आश्रमोचित कर्म के साथ विद्या के अविरोध का प्रतिपादन। —पृ०१०६७-६६ ६. विधुराधिकरण (सूत्र ३६-३६) अनाश्रमी व्यक्तियों के लिए भी ब्रह्मविद्या में अधिकार प्रदर्शन प्रकारान्तर से उक्त मत का प्रतिपादन। अनाश्रमी की अपेक्षा आश्रमी की श्रेष्ठता प्रतिपादन। —पृ०१०६६-११०२ १०. तद्भूताधिकरण (सूत्र ४०-४३) ब्रह्मचर्य आदि नैष्ठिकों के लिए निज आश्रम परित्या- ज्यता का निषेध, नैष्ठिकों के स्वधर्माच्युत होने पर प्रायश्चित्ताभाव का निरूपण। स्वधर्माच्युत नैष्ठिकों का विद्या में अनधिकार प्रदर्शन। —पृ०११०२-५ ११. स्वाम्यधिकरण (सूत्र ४४-४५) १. आत्रेय के मतानुसार कर्मांग उपासना में यजमान कर्त्तृता का निरूपण। २. औडुलोमि के मत से ऋत्वित्वक् कर्त्तृत्व निरूपण —पृ०११०
४५ (चतुर्थ अध्याय) (प्रथम पाद) १. आवृत्त्यधिकरण (सूत्र १-२) १. ब्रह्म प्राप्ति की उपाय उपासना के एक बार अनुष्ठान मात्र से फलप्राप्ति संभावना प्रदर्शन। २. जीवन पर्यन्त उपासना की कर्त्तव्यता निरूपण, अनुकूल प्रमाणों के आधार पर उक्तसिद्धान्त का निरूपण। —पृ०१११७-२० २. आत्मत्वोपासनाधिकरण (सूत्र ३) १. पूर्वपक्ष—आत्मरूप से ब्रह्म की उपासना का निषेध। २. (सिद्धान्त)—आत्मभाव से उपासना की कर्त्तव्यता का निरूपण। —पृ०११२०-२३ ३. प्रतीकाधिकरण (सूत्र ४-५) १. पूर्वपक्ष--मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का समर्थन। २. (सिद्धान्त) मन आदि प्रतीक की आत्मारूप से उपासना का खंडन मन आदि प्रतीक में ब्रह्मदृष्टि की कर्त्तव्यता का प्रतिपादन। —पृ०११२३-२४ ४. आदित्यादिमत्याधिकरण (सूत्र ६) १. पूर्वपक्ष—कर्मांग उद्गीथ आदि की उपासना में आदित्य आदि में उद्गीथादि दृष्टि कर्त्तव्यता का निरूपण। २. (सिद्धान्त)—कर्मांग उद्गीथ आदि में आदित्य दृष्टि का समर्थन। —पृ०११२४-२५ ५. आसीनाधिकरण (सूत्र ७-११) आसनविशेष में ही उपासना करने का उपपादन। ध्यानात्मक उपासना में आसन की अनिवार्यता ज्ञापन। उपासना की स्थिरतासापेक्षता का प्रतिपादन। उपासना में एकाग्रता के अनुकूल देश, काल की प्रयोजनीयता का समर्थन। —पृ०११२५-२७ ankurnagpal108@gmail.com
४६ ६. आप्रायणाधिकरण (सूत्र १२) मृत्युकाल पर्यन्त उपासना की प्रयोजनीयता का प्रतिपादन । —पृ० ११२८- ७. तदधिगमाधिकरण (सूत्र १३) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्म विद्या अभ्यास से पूर्वोत्तरपापों के विनाश का अस्वीकरण । २. (सिद्धान्त)—ब्रह्मविद्या अभ्यास से पूर्वोत्तर पापों का विनाश तथा उत्तरीय पापपुण्यों के असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११२८–३२ ८. इतराधिकरण (सूत्र १४) ब्रह्मविद्या के उदय से पूर्वोत्तर पुण्य के विनाश और असंस्पर्श का प्रतिपादन । —पृ० ११३२–३३ ९. अनारब्धकार्याधिकरण (सूत्र १५) १. पूर्वपक्ष—ब्रह्मविद्या प्राप्ति से प्रारब्धकर्म के विनाश का प्रतिपादन । २. (सिद्धान्त)—प्रारब्धकर्म रहित अन्य कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । —पृ० २१३३–३४ १०. अग्निहोत्राद्यधिकरण (सूत्र १६-१८) १. पूर्वपक्ष—अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मों की अनुष्ठेयता का प्रदर्शन । २. सिद्धान्त—अग्निहोत्र आदि की अवश्य कर्त्तव्यता का प्रतिपादन विद्या सहकारी कृत कर्मों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन । —पृ० ११३४–३६ ११. इतरक्षपणाधिकरण (सूत्र १९) भोगद्वारा ही प्रारब्ध कर्मों के क्षय का प्रतिपादन । पृ० ११३६–३७ (द्वितीय पाद) १. वागाद्यधिकरण (सूत्र १-२) १. पूर्वपक्ष—वाक् आदि इन्द्रियों की वृत्तिलय का प्रदर्शन । ankurnagpal108@gmail.com
४७ २. सिद्धान्त- उत्क्रमण काल में इन्द्रियों का मन से मिलने का प्रतिपादन तथा इन्द्रियों की अणुता का उपपादन। —पृ०११३६-४१ २. मनोधिकरण (सूत्र ३) मरण काल में इन्द्रियों सहित मन का प्राण से मिलने का वर्णन। —पृ०११४१-४२ ३. अध्यक्षाधिकरण (सूत्र ४) देहाध्यक्ष जीव की प्राण संबद्धता का निरूपण। —पृ०११४२-४३ ४. भूताधिकरण (सूत्र ५-६) जीव समन्वित प्राण की भूतसंबद्धता का निरूपण। भूतों से प्राण संयोग का समर्थन। —पृ०११४३-४५ ५. आसृत्युपक्रमाधिकरण (सूत्र ७-१३) १. पूर्वपक्ष—विद्वान और अविद्वान के भेद से उपक्रमण के पार्थक्य की संभावना का संशय। २ सिद्धान्त—उपक्रमण में विद्वान अविद्वान की समानता का प्रतिपादन। ब्रह्म प्राप्ति न होने तक संसारगति का समर्थन। देह त्याग के उपरान्त भी जीव का सूक्ष्म शरीर से संबन्ध निरूपण। सूक्ष्म शरीर के सद्भाव से ही दैहिक उष्णता की उपलब्धि ज्ञापन। पृ०११४५-५३ ६. पर संपत्त्यधिकरण (सूत्र १४) जीव समन्वित भूतों की परमात्म लीनता का वर्णन। —पृ०११५३-५४ ७. अविभागाधिकरण (सूत्र १५) जीव समन्वित भूतों की परमात्मा से अविभक्त स्थिति का निरूपण —पृ०११५४-५५ ८. तदोकोधिकरण (सूत्र १६) मृत्युकाल में उपासक के हृदयाग्रभाग में ज्वलन का वर्णन। —पृ०११५५-५७ ankurnagpal108@gmail.com
४६ ९. रश्म्यनुसाराधिकरण (सूत्र १७) सूर्य रश्मियों के सहारे उपासक के ऊर्ध्वगमन का विश्लेषण। —पृ० ११५७-५८ १०. निशाधिकरण (सूत्र १८) दक्षिणायन में भी मृत उपासक की ब्रह्म प्राप्ति का निरूपण। दक्षिणायन और दोनों मार्गों की नित्यस्मरणीयता का प्रतिपादन। —पृ० ११५८-६३ (तृतीय पाद) १. अर्चिराद्यधिकरण (सूत्र १) मृत्यु के बाद उपासक की अर्चिरादि गति का निरूपण। —पृ० ११६४-६५ २. वाय्वधिकरण (सूत्र २) संवत्सरगति के बाद आदित्य पूर्वं वायु प्राप्ति का वर्णन। —पृ० ११६७-७० ३. वरुणाधिकरण (सूत्र ३) विद्युत्प्राप्ति के पूर्व वारुणी गति का समर्थन। —पृ० ११७०-७२ ४. आतिवाहिकाधिकरण (सूत्र ४-५) अर्चिरादि शब्दों का आतिवाहिक अर्थ निरूपण, —पृ० ११७२-७४ ५. कार्याधिकरण (सूत्र ६-१६) विद्युत लोक के वैद्युत पुरुषों द्वारा उपासक की ब्रह्म प्राप्ति का निरूपण। १ बादरि आचार्य के मत से उपासकों की हिरण्यगर्भ लोक प्राप्ति का निरूपण। हिरण्यगर्भ में ब्रह्म शब्द की गौणार्थता का निरूपण। कर्त्तव्य के अवसान में हिरण्यगर्भ सहित ब्रह्मलोक वासियों की मुक्ति का समर्थन। ankurnagpal108@gmail.com
४६ २. जैमिनि के मत से ब्रह्म शब्द की मुख्यार्थता समर्थन ३. का बादरायण के मत से प्रतीकोपासना रहित उपासकों का निरूपण । —पृ० ११७४-८३ (चतुर्थ पाद) १. संपद्याविर्भावाधिकरण (सूत्र १-३) परज्योति परब्रह्म की प्राप्ति के अनन्तर जीव के स्वरूपाविर्भाव का निरूपण प्रकरणानुसार आत्मा की स्वाविक निष्पापता का समर्थन । —पृ० ११८४-८७ २. अविभागेन दृष्टत्वाधिकरण (सूत्र ४) मुक्त पुरुष की अभिन्नरूप से ब्रह्मानुभूति का समर्थन । —पृ० ११८७-९२ ३. ब्राह्माधिकरण (सूत्र ५-७) १. जैमिनि के मत से अपहतपाप्मता आदि गुणविशिष्ट ब्रह्म रूप से मुक्तात्मा के आविर्भाव का निरूपण । २. औडुलोमि के मत से चैतन्यात्मक ब्रह्मरूप में स्वरूपाविर्भाव का निरूपण । ३. बादरायण के मत से दोनों स्वरूपाविर्भाव का प्रतिपादन । —पृ० ११९२-९५ ४. संकल्पाधिकरण (सूत्र ८-९) मुक्त पुरुष के स्वेच्छानुसार ज्ञाति प्रिय समागम का निरूपण । मुक्त पुरुष की पराधीनता का निराकरण । —पृ० ११९६-९७ ५. अभावाधिकरण (सूत्र १०-१६) १. बादरि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि अभाव का प्रतिपादन । २. जैमिनि के मत से मुक्त पुरुष के शरीरादि सद्भाव का समर्थन । ankurnagpal108@gmail.com
५० ३. मुक्ति के समय देहाभाव में भी स्वेच्छा से भगवान के लीलारस आस्वादन का प्रतिपादन। मुक्त पुरुष की देहादि के सद्भाव में जाग्रतानुभूति का निरूपण। मुक्तावस्थ अणु स्वरूप आत्मा की अन्यत्र भोग संभावना का समर्थन। नित्य जीवात्मा की सर्वज्ञता का समर्थन। —पृ०११६७-१२०२ ६. जगद्व्यापारवर्जाधिकरण (सूत्र १७-२२) १. मुक्त पुरुष का जगत् सृष्टि आदि ईश्वरीय कार्यों से भिन्न कार्यों में अधिकार निरूपण। २. मुक्त पुरुष के निर्विकार ब्रह्मभोग का वर्णन। ३. मुक्त पुरुष की संसार पुनरावृत्ति का निराकरण पृ०१२०२-११
॥ श्रीमते रामानुजाय नम ॥ शारीरक मीमांसा श्रीभाष्य अखिलभुवनजन्मस्थेमभङ्गादिलीले, विनतविविधभूतव्रातरक्षैकदीक्षे। श्रुतिशिरसि विदीप्ते ब्रह्मणि श्रीनिवासे, भवतु मम परस्मिन् शेमुषी भक्तिरूपा॥ समस्त विश्व की सृष्टि, स्थिति और लय रूप लीला करने वाले, 'शरणागत भक्त की रक्षा के लिए प्रतिश्रुत, उपनिषद् शास्त्र प्रतिपादित परब्रह्म श्रीनिवास वासुदेव में मेरी सतत भक्तिमयी मति हो। पाराशर्यवचःसुधामुपनिषद्दुग्धाब्धिमध्योद्धृतां संसाराग्निविदीपनव्यपगतप्राणात्मसंजीवनीम्। पूर्वाचार्यसुरक्षितां बहुमतिव्याघातदूरस्थिता-, मानीतान्तु निजाक्षरैःसुमनसो भौमाः पिबन्त्वन्वहम्॥ उपनिषद् शास्त्र रूप समुज्ज्वल क्षीरसागर से प्रकट, संसार रूप अग्निताप से तप्त, परमात्मज्ञान हीन संतप्त जनो की संजीवनी, पूर्वा- चार्य ( श्री द्रविडाचार्य ) से सुरक्षित, मतमतान्तरों के व्याघात से दुर्बोध, वेदान्ताचार्यों के व्याख्यानों से प्राप्त, पराशरपुत्र बादरायण की अमृतमय वाणी का भूलोक वासी विद्वज्जन निरन्तर पान करे। भगवद्बोधायनकृतां विस्तीर्णां ब्रह्मसूत्रवृत्तिं पूर्वाचार्याः संचिक्षिपुः तन्मतानुसारेण सूत्राक्षराणि व्याख्यास्यन्ते। भगवान् बोधायन कृत विस्तृत ब्रह्मसूत्र वृत्ति को पूर्वाचार्य ( श्री द्रविड ) ने संक्षिप्त किया, मैं उन्हीं के मतानुसार सूत्राक्षरों की व्याख्या कर रहा हूँ। ankurnagpal108@gmail.com
( २ ) प्रथम अध्याय, प्रथम पाद १ अधिकरण अथाऽतो ब्रह्मजिज्ञासा । १।१।१।। अत्रायमथशब्द आनन्तर्ये भवति, अतश्शब्दो वृत्तस्य हेतुभावे । अधीतसाङ्गसशिरस्कवेदस्याधिगताल्पास्थिरफल-केवलकर्मज्ञानतया संजातमोक्षाभिलाषस्यानन्तास्थिरफल-ब्रह्मजिज्ञासा ह्यनन्तरभा- विनी । इस सूत्र में "अथ" शब्द आनन्तर्य अर्थ का बोधक तथा "अतः" शब्द पूर्वावगत विषय का सूचक है, अर्थात् पूर्ववर्त्ती कर्मकाण्ड से अवगत कर्म-फल की अस्थिरता, अनित्यता आदि का अवबोध ही ब्रह्मजिज्ञासा की उपस्थिति का मुख्य हेतु है । जिस व्यक्ति ने वेद वेदांग, उपनिषद् शास्त्र के अध्ययन से यह बात समझ ली है कि केवल कर्म का फल अल्प, अस्थिर और नाशवान् है तथा ब्रह्मज्ञान का फल अनन्त और अक्षर है, तो निश्चित ही उसके मन में मोक्षलाभ की अभिलाषा जाग्रत होती है, और फिर उसके अनन्तर उसके मन में ब्रह्म सम्बन्धिनी जिज्ञासा होती है । ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा इति कर्मणि षष्ठी "कर्तृकर्मणोः कृति" इति विशेषविधानात् । यद्यपि संबन्धसामान्यपरिग्रहेऽपि जिज्ञासायाः कर्मापेक्षत्वेन कर्मार्थत्वसिद्धिः, तथाप्याक्षेपतः प्राप्तादाभिधानिकस्यैव ग्राह्यत्वात् कर्मणि षष्ठी गृह्यते । न च “प्रतिपदविधाना षष्ठी न समस्यते" इति कर्मणि षष्ठ्याः समास- निषेधः शङ्कनीयः । “कृद्योगा च षष्ठी समस्यते" इति प्रतिप्रसव- सद्भावात् । ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है ब्रह्म के जानने की इच्छा । "कर्तृ कर्मणोः कृतिः" इस व्याकरणीय नियमानुसार "ब्रह्मणः" पद कर्मवाच्य षष्ठी विभक्ति का है । यद्यपि सामान्य संबंध रूप अर्थ स्वीकारने से भी जिज्ञासा कर्म की अपेक्षित कर्मार्थता सिद्ध है, तथापि आक्षेप लब्ध ( प्रकारान्तर से प्राप्त ) अर्थ की अपेक्षा आभिधानिक ankurnagpal108@gmail.com
( ३ )
( शब्द लब्ध ) अर्थ ग्राह्य होता है इसलिए यहाँ कर्म में षष्ठी विभक्ति मानते हैं। "प्रतिपद ( कर्म विहित ) षष्ठी विभक्ति में समास नहीं होता" इस नियमानुसार यहाँ समास निषेध की शंका भी नहीं की जा सकती, क्योंकि "कृद्योगे षष्ठी समस्यते" इस नियम से कृत् प्रत्यय के योग में विहित षष्ठी के साथ समास का पुनः विधान किया गया है। ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते, सर्वत्र बृहत्त्वगुणयोगेन हि ब्रह्मशब्दः, बृहत्त्वं च स्वरूपेण गुणैश्च यत्रानवधिकातिशयं सोऽस्य मुख्योऽर्थः । स च सर्वेश्वर एव, अतो ब्रह्मशब्दस्तत्रैव मुख्यवृत्तः । तस्मादन्यत्र तद्गुणलेशयोगादौपचारिकः, अनेकार्थकल्पनायोगाद् भगवच्छब्दवत् । तापत्रयातुरैरमृतत्वाय स एव जिज्ञास्यः । अतस्सर्वेश्वर एव जिज्ञासाकर्मभूतं ब्रह्म । ब्रह्म शब्द से स्वभावतः समस्त दोषों से रहित, निरवधि, असंख्येय, कल्याणमय गुणों से युक्त पुरुषोत्तम कहे गये हैं। ब्रह्म शब्द सभी जगह "बृहत्त्व" गुणवाला कहा गया है। स्वरूपतः और गुणानुसार असीमता और अतिशयिता ही बृहत्त्व का सही अर्थ है। उक्त विशेषताओं से युक्त सर्वेश्वर ही हैं, इसलिए ब्रह्म शब्द से वे ही अभिहित हैं । उक्त गुणों से आंशिक संबंध होने से अन्यों के लिए प्रयुक्त ब्रह्म शब्द भगवत् शब्द की तरह औपचारिक मात्र है। त्रितापों से तप्त और आतुर संसारी जीवों को अमरता और शांति प्राप्त करने के लिए वह सर्वेश्वर ही जिज्ञास्य हैं। जिस ब्रह्म की जिज्ञासा की जाती है वह सर्वेश्वर ही हैं। ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । इच्छाया इष्यमाणप्रधानत्वादिष्य- माणं ज्ञानमिह विधीयते । मीमांसापूर्वभागज्ञातस्य कर्मणोऽल्पा- स्थिरफलत्वादुपरितनभागावसेयस्य ब्रह्मज्ञानस्यानन्ताक्षय फलत्वं च पूर्ववृत्तात् कर्मज्ञानादनन्तरं तत एव हेतोर्ब्रह्म ज्ञातव्यमित्युक्तं भवति । तदाह वृत्तिकारः—"वृत्तात्कर्माधिगमादनन्तरं ब्रह्म- विविदिषा" इति ।
( ४ ) जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं, इच्छा क्रिया में इष्यमाण वस्तु प्रधान होती है, जिज्ञासा पद में इष्यमाण वस्तु ज्ञान है; इसलिए ब्रह्म जिज्ञासा का तात्पर्य है, ब्रह्म ज्ञान । मीमांसा के पूर्व भाग से ज्ञात कर्म की अल्प और अस्थिर फलता तथा उत्तर भाग से ज्ञात ब्रह्म ज्ञान की अनन्त और अक्षय फलता से मन में निर्वेद होता है, जिसके फलस्वरूप कर्म तत्त्व को भली भाँति जानकर ब्रह्म तत्त्व को भी जानना चाहिए ऐसा भाव होता है। ऐसा ही वृत्तिकार ने कहा भी है—"कर्मतत्त्व को भली भाँति जानने के बाद ब्रह्म ज्ञान की इच्छा होती है।" वक्ष्यति च कर्मब्रह्ममीमांसयोरेकशास्त्र्यम्—"संहितमेतच्छा- रीरकं जैमिनीयेन षोडशलक्षणेनेति शास्त्रैकत्वसिद्धिः” इति । अतः प्रतिपिपादयिषितार्थभेदेन षट्कभेदवदध्यायभेदवच्च पूर्वोत्तर- मीमांसयोर्भेदः । मीमांसाशास्त्रम्—"अथातो धर्मजिज्ञासा” इत्या- रभ्य "अनावृत्तिश्शब्दादनावृत्तिश्शब्दात्” इत्येवमन्तं संगति- विशेषेणाविशिष्टक्रमम् । वृत्तिकार कर्ममीमांसा और ब्रह्ममीमांसा दोनों को एक ही शास्त्र बतलाते हैं—"यह शारीरक मीमांसा, जैमिनि कृत धर्म मीमांसा के सोलह अध्यायों से मिलकर ही संपूर्ण एक शास्त्र के रूप में पूरी होती है।" प्रतिपाद्य विषय को जैसे पाद और अध्यायों में बाँटकर अलग- अलग वर्णन किया गया है, वैसे ही मीमांसा के पूर्व और उत्तर दो भेद हैं। मीमांसा शास्त्र पूर्व मीमांसा के आदिम सूत्र "अथातो धर्म जिज्ञासा” से लेकर उत्तर मीमांसा के अंतिम सूत्र "अनावृत्तिश्शब्दात्" में जाकर संगति विशेष के विशिष्ट क्रम से पूरा हुआ है । तथाहि प्रथमं तावत् "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः" इति अध्ययनेनैव स्वाध्यायशब्दवाच्यवेदाख्याक्षरराशेर्ग्रहणं विधीयते । सर्व प्रथम विद्यार्थी को आदेश होता है "स्वाध्ययोऽध्येतव्यः", तथा अध्ययन से स्वाध्याय शब्द वाच्य वेद नामक अक्षर राशि को ग्रहण करने का विधान बतलाया जाता है । ankurnagpal108@gmail.com
( ५ ) तच्चाध्ययनं किंरूपम् ? कथं च कर्तव्यम् ? इत्यपेक्षायाम्— श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वा उपाकृत्य यथाविधि “अष्टवर्षं ब्राह्मण- मुपनयीत तमध्यापयेत्” इत्यनेन “युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान्विप्रोऽर्धपञ्चमान् ।” इत्यादिब्रतनियमविशेषोपदेशैश्चापेक्षितानि विधीयन्ते । एवं सत्संतानप्रसूतसदाचारनिष्ठात्मगुणोपेत- वेदविदाचार्योपनीतस्य व्रतनियमविशेषयुक्तस्याचार्योच्चारणानुच्चा- रणरूपमक्षरराशिग्रहणफलमध्ययनमित्यवगम्यते । उस अध्ययन का क्या रूप है ? वह कैसे किया जाता है ? ऐसी आकांक्षा होने पर “आठ वर्ष में ब्राह्मण का उपनयन करके उसे पढ़ाओ”, “श्रावण या भाद्रपद की पूर्णिमा को यथा विधि उपाकर्म करके साढ़े चार महीने तक स्थिर चित्त से वेद पढ़ना चाहिए ।” इत्यादि व्रत और नियम विशेष के उपदेश द्वारा अपेक्षित अध्ययन की विधि का निरूपण किया गया है। इस प्रकार कुलीन, सदाचार निष्ठ, आत्म गुण संपन्न वेदज्ञ आचार्य द्वारा उपनीत, विशेष व्रत नियम संपन्न (बटु) शिक्षा के उद्देश्य से जब अक्षर राशि को गुरुमुख से श्रवण कर स्वयं मुखरित करता है, उसे ही अध्ययन मानते हैं । अध्ययनं च स्वाध्यायसंस्कारः “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इति स्वाध्यायस्य कर्मत्वावगमात् । संस्कारो हि नाम कार्यान्तरयोग्यता- करणम् । संस्कार्यत्वं च स्वाध्यायस्य युक्तम्, धर्मार्थकाममोक्षरूप- पुरुषार्थचतुष्टयतत्साधनावबोधितत्वात्, जपादिना स्वरूपेणापि तत्साधनत्वाच्च । एवमध्ययनविधिर्मन्त्रवन्नियमवदक्षरराशि- ग्रहणमात्रे पर्यवस्यति । “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः” इस वाक्य से अध्ययन स्वाध्याय क्रिया का कर्म निश्चित होता है; अध्ययन से स्वाध्यायरूप संस्कार दृढ होता है । कार्यान्तर योग्यता संपादन करने वाले को संस्कार कहते हैं । अधीत अक्षर- राशि प्रतिपाद्य ज्ञानार्जन से धर्मार्थ काम मोक्ष रूप पुरुषार्थ चतुष्टय
काँ संपादन होता है तथा अक्षर राशि के जाप आदि रूप से भी पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि होती है, इसलिए स्वाध्याय की सस्कार्यता युक्ति युक्त है। वेद की अध्ययन विधि मंत्र की तरह अक्षर राशि के ग्रहण मात्र मे पर्यवसित है। अध्ययनगृहीतस्य स्वाध्यायस्य स्वभावत एव प्रयोजनवदर्था- वबोधित्वदर्शनात् । गृहीतात् स्वाध्यायादवगम्यमानात् प्रयोजनवतोऽर्थानापाततो दृष्ट्वा तत्स्वरूपप्रकारविशेषनिर्णयफल- वेदवाक्यविचाररूपमीमांसाश्रवणे अधीतवेदः पुरुषः स्वयमेव प्रवर्तते । अध्ययन-गृहीत अक्षर राशि रूप स्वाध्याय के प्रयोजनीय (यज्ञ, उपा- सना आदि) अर्थावबोध की प्रवृत्ति स्वतः ही होती है तथा वेद के विधि- वत् कण्ठस्थ हो जाने पर प्रयोजनीय विषयो को वेदो मे आदि से अन्त तक देखकर उनके स्वरूप, प्रकार विशेष आदि के निर्द्धारण के लिए वेद- वाक्य विचारात्मक मीमांसा शास्त्र के श्रवण मे वेद पढ़ा हुआ व्यक्ति स्व- यमेव उन्मुख होता है। तत्र कर्मविधिस্বরূপे निरूपिते कर्मणामल्पास्थिरफलत्वं दृष्ट्वा अध्ययनगृहीतस्वाध्यायोपनिषद्वाक्येषु च अमृतस्वरूपा- नन्तस्थिरफलापातप्रतीतेः तन्निर्णयफलवेदान्तविचाररूपशारीरक- मीमांसायामधिकरोति । कर्म मीमांसा के कर्म विधि के स्वरूप निरूपण प्रकरण में कर्मों की अल्प अस्थिर फलता को देखकर तथा अध्ययन के सिलसिले में अधीत उप- निषद् वाक्यो मे ब्रह्मज्ञान की अनन्त स्थिर फलता की प्रतीति होने पर ब्रह्मतत्त्व निर्णायक वेदांत विचार रूप शारीरक मीमांसा में स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। विचारक स्वतः ही शारीरक मीमांसा का अध्ययन करता है। तथाच वेदान्तवाक्यानि केवलकर्मफलस्य क्षयित्वं ब्रह्मज्ञानस्यै वाक्षयफलत्वं दर्शयन्ति—"तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते, एव- ankurnagpal108@gmail.com
मेवात्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते”, “अन्तवदेवाऽस्य तद् भवति”, “नह्यध्रुवैः प्राप्यते”, “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः”, “परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात् नास्त्यकृतः कृतेन। तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय। येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्।” इति। “ब्रह्मविदाप्नोति परम्”, “न पुनर्मृत्यवे तदेकं पश्यति”, “न पश्योमृत्यं पश्यति”, “स स्वराड्भवति”, “तमेव विद्वानमृत इह भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति” इत्यादीनि। वेदान्त वाक्य ज्ञानरहित कर्मफल की क्षीणता तथा ब्रह्मज्ञान की अक्षय फलता का ऐसा विवेचन करते है—“इस लोक की वस्तुएं जैसे नाशवान् है वैसे ही पारलौकिक वस्तुएं भी नाशवान् हैं”—“सकाम कर्मों का फल नाशवान् ही होता है”—“क्षण भंगुर कर्मों से नित्य फल कभी नहीं मिलता”—“यज्ञादि कर्म संसार से पार करने वाली दृढ नौकाएं नहीं हैं” —“लौकिक कर्मों का भली भांति पर्यवेक्षण करके, कर्मों की अक्षमता समझ कर ब्राह्मण को सांसारिक कर्मों की ओर से निर्वेद होता है, वह ब्रह्म तत्व की जिज्ञासा से हाथ में कुश आदि पूजन सामग्रियों को लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के निकट उपस्थित होता है, गुरु अपने निकट उपस्थित प्रशान्तचित्त संयतेन्द्रिय शिष्य को ब्रह्मविद्या का उपदेश दें जिससे कि वह अक्षर तथा सत्य से अवगत हो जाय”—“ब्रह्मवेत्ता पर- ब्रह्म को प्राप्त करता है”—“पुनः मृत्यु को प्राप्त नहीं करता”—“वह एक ही वस्तु को देखता है, जागतिक कामनाओं को न देखने वाला मृत्यु को नहीं देखता”—“वह स्वतंत्र हो जाता है” “उसको जानने वाला अमृत हो जाता है”—“उसे जानकर मृत्यु का अतिक्रमण करता है,—इसके अतिरिक्त मोक्ष का दूसरा उपाय नहीं है”—“प्रेरक आत्मा को भिन्न मानकर उसका कृपा पात्र होता है और उसी से, अमृतत्वं प्राप्त करता है।” इत्यादि।