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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

यतिगण-व्योम ]

यतिगण-संन्यासी लोग याग-यज्ञ यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार योगमाया-भगवान्‌की परा शक्ति योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता

रक्तिम-लालिमायुक्त रञ्जित-रंगा हुआ रूक्ष-रूखा, नीरस

लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये

वञ्चक-वञ्चना करनेवाला वयस-उम्र वर्चस्व-अधिकार वर्णविशिष्ट-वर्णवाला वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय वाचाल-अधिक बोलनेवाला वागिन्द्रिय-जिह्वा विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न विगुण-गुणहीन


विच्युति-भूल, पतन, वियोग विजितात्मा-जिसने मनको जीत लिया है विज्ञ-पण्डित, जाननेवाला विदित-मालूम विधर्म-धर्मविरुद्ध विधिवादिगण-नैतिक लोग विधेय-करने योग्य विधेयात्मा-जिसकी आत्मा संयत हो विन्यास-व्यवस्थित करना विपर्यय-प्रतिकूलता, विपरीतता विभूति-ऐश्वर्य विरहकातर-विरहसे कातर विरोधाभास-विचारमें विरोध प्रतीत होना विलास-क्रीड़ा विवक्षित-इच्छित, कथित विवृत-स्पष्ट, व्यक्त विशारद-निपुण विशिष्ट-विशेषतायुक्त विशिष्टता-विशेषता विशुद्धचित्त-जिसका चित्त शुद्ध है विशेषत्व-विशेषता विषयणी-विषयसे सम्बन्धित विहित-आदेश किया हुआ वृष्टि-वर्षा वेदज्ञ-वेदोंके जाननेवाला वैषम्य-विषमता व्यङ्गोक्ति-गूढ़भाषा, वह भाषा जिसमें व्यङ्ग हो व्यतिक्रम-उल्लङ्घन व्यतिरेक-असङ्गति, निषेध व्यवहृत-व्यवहार किया हुआ व्योम-आकाश

शब्दकोश | ४८१

[ शोच्य-स्वानन्द श शोच्य—शोचनीय शैव—शिवके उपासक श्रुत—सुना हुआ श्रोतव्य—सुनने योग्य श्लेषोक्ति—छिपे अर्थवाली बात ष षडैश्वर्यपूर्ण—छः ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण स सङ्कीर्णता—उदार ना होनेका भाव संवरण—छिपाना संवेदन—अनुभूति संस्पर्श—अच्छी तरहसे होनेवाला स्पर्श संहर्त्ता—संहार करनेवाला सङ्गति—मेल सञ्चित—जमा किया हुआ सदातन—विष्णु सद्विवेकी—सद् विवेकवाला समत्वभाव—समताका भाव सन्निविष्ट—उत्तम रूपसे एकाग्र समाहर—समुच्चय, समूह समाहित—संयमित, व्यवस्थित सम्बन्धविशिष्ट—सम्बन्धवाला सम्मत—सहमत, एक मत समन्वित—संयुक्त, स्वाभाविक रूपसे क्रमबद्ध सम्यक्—भलीभाँति, अच्छी तरह सर्वतन्त्र—समस्त सिद्धान्त सर्वतोभावेन—सम्पूर्ण रूपसे सर्वभूतात्मा—सभी जीवोंके आत्मा अर्थात् परमात्मा सर्वभुक्—सब कुछ खा जानेवाला सर्वात्मकत्व—सर्वात्मकता सहस्र—हजार साम—सामवेद सामर्थ्यविशिष्ट—सामर्थ्यवान् साम्यलक्षण—समानताका लक्षण सारगर्भित—तत्त्वपूर्ण सालोक्य मुक्ति—जीवका भगवान्‌के साथ एक ही लोकमें वास करना साष्टाङ्ग प्रणाम—आठ अङ्गोंसे प्रणाम (सिर, हाथ, पैर, आँख, जंघा, हृदय, वचन और मन) सुखान्वेषी—सुखकी खोज करनेवाला सुदुराचारी—अति दुराचारी सुधा—अमृत सुरस—रसयुक्त सुष्ठु—भली भाँति, अच्छी तरह सुस्पष्ट—विशेषरूपसे स्पष्ट सौम्य—सुन्दर, कोमल स्खलित—गिरा हुआ स्निग्ध—स्नेहयुक्त, प्रियता स्नेहाधिक्य—स्नेहकी अधिकता स्फूर्ति—स्फुरण, व्यक्त होना स्पृहा—इच्छा, आकाङ्क्षा स्फुरण—व्यक्त होना स्फुलिङ्ग—चिङ्गारी स्मार्त्त—स्मृति शास्त्रका अनुयायी स्थायित्व—स्थिरता स्रुवा—घीमें आहुति डालनेकी करछी स्वच्छन्द—स्वतन्त्र स्वधर्मस्थ—अपने धर्ममें स्थित स्वयंभू—स्वयं उत्पन्न स्वानन्दपूर्ण—अपने आनन्दमें पूर्ण ४८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

हत-हृदगत ] ह हत—मरा हुआ हतभागा—भाग्यहीन हन्त—मारना हिरण्यगर्भ—ब्रह्मा हेयता—तुच्छता हृदगत—हृदय-सम्बन्धी शब्दकोश | ४८३

४८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन चौथी पीढ़ीके महापुरुष श्रीरूपानुग अप्राकृत-कविकुलश्रेष्ठ- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् कृष्णदास-कविराज-गोस्वामी-रचित श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला [द्वितीय भाग (अध्याय 8-17)] गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन आठवीं पीढ़ीके पुरुषप्रधान श्रीरूपानुगवर- ॐ विष्णुपाद श्रीश्रीमद् सच्चिदानन्द-भक्तिविनोद-ठाकुर-रचित अमृतप्रवाह-भाष्य, गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन नौवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन परमहंस-परिव्राजकाचार्य-श्रीरूपानुगश्रेष्ठ- श्रीब्रह्मामाध्वगौड़ीय-सम्प्रदायके सर्वोत्तम संरक्षक- ॐ विष्णुपाद परमहंसस्वामी श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद-रचित श्रीस्वरूप-रूप-विरोधी समस्त-कुसिद्धान्तोंको निरस्त करनेवाला अनुभाष्य एवं विविध गौड़ीय वैष्णवाचार्योंके लेखों एवं नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके प्रवचनोंसे सङ्कलित 'अमृतानुकणिका' भाष्य, भूमिका, विविध सूची और विवरण आदि-सहित गुरुपरम्परामें श्रीकृष्णचैतन्यके अधीन दसवीं पीढ़ीके श्रेष्ठ परिजन श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिके प्रतिष्ठाता-आचार्य-भास्कर नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अनुकम्पा-पात्र नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजके- आदेश-निर्देशानुसार उनके चरणाश्रितजनोंके द्वारा अनुवादित और सम्पादित प्रकाशक : इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

मूल बङ्गला पयार, संस्कृत श्लोक, अमृतप्रवाह भाष्य, अनुभाष्य और अमृतानुकणिका सहित प्रकाशित प्रथम संस्करण — श्रीगौरपूर्णिमा, 23 मार्च, 2016 1000 प्रतियाँ 卐 卐 卐 卐 卐 ग्रन्थ प्राप्ति स्थान श्रीरमणविहारी गौड़ीय मठ बी-3, म्यूज़िकल फॉउन्टेन पार्कके निकट, जनकपुरी, नई दिल्ली 011-25533568 श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ जवाहर हाट, मथुरा (उ.प्र.) 0565-2502334 श्रीरूप-सनातन गौड़ीय मठ दान गली, वृन्दावन (उ.प्र.) +91 9219478001 श्रीगिरिधारी गौड़ीय मठ दसविसा, राधाकुण्ड रोड, गोवर्धन (उ.प्र.) 0565-2815668 श्रीश्रीकेशवजी गौड़ीय मठ कोलेरडाङ्गा लेन, नवद्वीप (प.ब.) +91 9153125442 श्रीराधामाधव गौड़ीय मठ 293, सैक्टर-14, फरीदाबाद (हरियाणा) +91 9911283869 जयश्री दामोदर गौड़ीय मठ चक्रतीर्थ रोड़, जगन्नाथपुरी (ओडीशा) +91 9776238328 श्रीराधागोविन्द गौड़ीय मठ डी-5, सैक्टर-55, नौएडा, (उ.प्र.) +91 9910400878 खण्डेलवाल एण्ड सन्स अठखम्बा बाज़ार, वृन्दावन (उ.प्र.) 0565-2443101

विषय-सूची सम्पादक-मण्डली निवेदन 。。。。。 i उद्धृत ग्रन्थ 。。。。。。。。。。 ii - iii अध्याय विवरण 。。。。。。。。。 iv - vi अध्याय 8 ग्रन्थ-रचनार्थ वैष्णव-आज्ञा-कथन 。。。。 3-24 अध्याय 9 भक्तिकल्पवृक्ष वर्णन 。。。。。。。 27-38 अध्याय 10 मूलस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。。。 41-94 अध्याय 11 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。 97-120 अध्याय 12 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा वर्णन 。。。。。 123-144 अध्याय 13 जन्म-महोत्सव वर्णन 。。。。。。。 147-171 अध्याय 14 बाल्यलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 173-188 अध्याय 15 पौगण्डलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 191-198 अध्याय 16 कैशोरलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 201-216 अध्याय 17 यौवनलीला-सूत्र वर्णन 。。。。。。。 219-269 श्लोक सूची 。。。。。。。。。 271-272 पद्य सूची 。。。。。。。。。 273-297 शब्दकोश 。。。。。。。。。 299-306

प्रकाशन-मण्डली टङ्कण (Typing) श्रीमती ऐश्वर्य दासी श्रीमती प्रज्ञा दासी ध्वन्यात्मक अभिलेखन (Transcription) श्रीमती कुन्दलता दासी चित्र श्रीमान् गुलशन श्रीमान् राधेश्याम अनुवाद, विन्यास, शोधकार्य (Translation, Layout & Research) श्रीमान् गोकुलचन्द्र दास प्रूफ-संशोधन (Proof Reading) श्रीमती जानकी दासी संस्कृत-हिन्दी अनुवाद श्रीमान् डॉ अच्युतलाल भट्ट (पी०एच०डी०) श्रीमान् गणेशीलाल शर्मा एम०ए० (संस्कृत) प्रकाशक : श्रीपाद रामचन्द्र दास इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स

निवेदन हमारे परमाराध्य गुरुदेव नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराजजीकी गौड़ीय वैष्णवाचार्योंकी विविध टीकाओं सहित श्रीचैतन्यचरितामृत हिन्दी भाषामें प्रकाशित करनेकी चिर-अभिलाषा थी। इस कार्यको सम्पादित करनेके लिये उन्होंने प्रकाशन मण्डलीको आज्ञा एवं निज शक्ति प्रदान की थी। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा अनुमोदित गूढ़ तत्त्व-सिद्धान्तों और सर्वोच्च रस-तत्त्वका अनूठा, अद्भुत और चमत्कारी समन्वय इस ग्रन्थमें अति सरल बङ्गला भाषामें करके अपने अप्राकृत कवित्वका परिचय प्रदान किया है। “मितञ्च सारञ्च वचो हि वाग्मिता”, श्रील कविराज गोस्वामीकी लेखनी इस उक्तिका उज्ज्वल उदाहरण है, उन्होंने अति अल्प शब्दोंमें समस्त शास्त्रोंके सारको प्रमाण सहित इस ग्रन्थमें प्रस्तुत किया है। इस ग्रन्थकी भाषा सरल होने पर भी इसमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य समन्वित हैं। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर और श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी टीकाओं एवं अनेकानेक लेखोंके द्वारा उन गूढ़ रहस्योंको उद्घाटित किया है। इन टीकाओं और लेखों तथा श्रील गुरुदेवके प्रवचनोंको इस प्रकाशनमें समन्वय करके ग्रन्थके गूढ़ भावोंको सर्वसाधारणके लिये बोधगम्य बनानेका हमारा प्रयास है। श्रील गुरुदेवके अहैतुकी कृपाशीर्वादसे श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीलाका प्रथम भाग गत वर्ष श्रीगौर-पूर्णिमाके दिन उनके करकमलोंमें समर्पित किया गया था। उनके मनोवाञ्छित कार्यको सम्पूर्ण करनेके लिये प्रकाशन मण्डलीके सेवक निरन्तर प्रयासशील हैं और श्रील गुरुदेवकी प्रेरणा एवं निरुपाधिक निरवधि कृपाशक्ति हमें इस महत् कार्यमें सदा उत्साहशील बनाये रखती है। यह अति हर्षका विषय है कि श्रीचैतन्यचरितामृतका द्वितीय भाग भी अब प्रकाशित हो गया है और श्रीगुरुदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी निज वस्तुको उनके ही करकमलोंमें अर्पित करते हुए परमानन्दका अनुभव कर रहे हैं। इस ग्रन्थके प्रकाशनके लिये आत्मीय सहायता एवं प्रेरणाके लिये हम श्रीयुता उमादेवी दासीके आभारी हैं। इस ग्रन्थमें कुछ त्रुटियोंका रह जाना स्वाभाविक है। सुधी पाठकोंके द्वारा उनका संशोधनपूर्वक पाठ करनेसे हम आनन्दित होंगे। प्रकाशन मण्डली इन्टरनेशनल गौड़ीय वेदान्त पब्लिकेशन्स (IGVP) i

श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला उत्तरार्द्धमें उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका एकादशी-तत्त्व—16/58; उद्वाह-तत्त्व—15/27; उज्ज्वलनीलमणि—17/293; केशव-काश्मीरी-श्लोक—16/41; बृहन्नारदीयपुराण—17/21; ब्रह्मवैवर्त्तपुराण—17/164; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/17; भरतमुनि-वाक्य—16/71; भागवत—8/19, 25, 58; 9/42, 43, 46; 13/77; 14/69; 17/76, 78; मलमासतत्त्व—17/164; महाभारत—17/308; ललितमाधव—17/281; श्रीचैतन्यचन्द्रोक्त-श्लोक—16/82; 17/31; सामुद्र—14/15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका पुरुषसूक्त—17/18; बृहद्व्याकरण—13/29; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/58; योगवाशिष्ठ—17/65; रामाष्टक—17/69; लघु-व्याकरण—13/29; सामुद्रिक ग्रन्थ—13/120 ॥ अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अथर्ववेद-संहिता—14/19; अद्वैतचरित—12/13-18, 27; अभिज्ञान-शकुन्तल—16/101; उत्तरचरित—16/101; एकादशी-तत्त्व—17/265, 266; कुमारसम्भव—16/101; कूर्मपुराण—17/78; कृष्णगणोद्देशदीपिका—12/83; कौस्तुभप्रभा—16/25; गीतगोविन्द या अष्टपदी—13/42; गौतमीय-तन्त्र—17/293; गौरगणोद्देशदीपिका—8/41, 59-60, 66; 9/14, 10/8, 14-17, 21-25, 29, 31-38, 40, 53, 56, 61-63, 67-68, 70-71, 73, 75-78, 80, 84-85, 91, 106-115, 119-120, 130-131, 134-136, 139, 143, 153; 11/13, 21, 23-26, 29, 31-33, 37-39, 41-42, 44-45, 51, 53-54; 12/13-18, 57-59, 65, 79-81, 83-87; 13/56, 60-61, 74; 14/68; 15/29; 17/296, 300-301; चण्डीदास-गीतिग्रन्थ—13/42; चैतन्यचन्द्रामृत—13/123; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक—13/89; 17/55; चैतन्य-चरित महाकाव्य—10/49, 62, 136; 14/62-68; 17/55; चैतन्यभागवत—9/11, 14; 10/30-32, 34-37, 41, 43-47, 49, 53, 58, 64, 67-73, 75-77, 113, 115, 126, 131, 135; 11/20, 23, 26, 28, 29, 31, 33-39, 41-47; 12/13-17, 40-42; 13/28, 29, 67-71; 14/19, 21-23, 25, 37-40, 73; 15/7, 23, 31; 17/7-12, 17-20, 23, 31, 37, 55, 64-65, 69-71, 79-86, 99-100, 103-114, 116, 124, 138-142, 228-230, 241-243, 262, 274, 278; चैतन्यमङ्गल (श्रीलोचनदास)—14/46; 17/69, 89, 95, 119; छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्कर-टीका)—17/78; तत्त्व-सन्दर्भ—10/105; नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना—13/123; दशम-टिप्पणी (वैष्णवतोषणी)—17/78; नरोत्तमविलास—12/13-17; नित्यानन्दायिनी पत्रिका—12/13-17; पद्मपुराण—8/16; प्रेमतरङ्गिणी—12/58; भक्तिरत्नाकर—10/78, 84, 85, 91, 105; 11/13, 25; 12/58; 16/25; 17/55; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/16; 14/90; ii

16/11; भक्तिसन्दर्भ—15/9-10; भागवत—12/70; 13/86, 100, 123, 124; 14/73, 88; 16/11; 17/77-78, 117, 201, 257, 312, 331; भावार्थ-दीपिका—13/80-86, 104; 17/57; भोगनिर्णय-पद्धति—12/83; महाभारत—15/27; मालती-माधव—16/101; मेघदूत—16/101; योगवाशिष्ट रामायण—12/40; रघुवंश—16/101; लघुभागवतामृत—13/86; विद्यापतिके गीतिग्रन्थ—13/42; वीरचरित—16/101; वृहज्जातकादि ग्रन्थ—13/90; वेदान्तकौस्तुभ (श्रीनिवासाचार्य)—16/25; वेदान्तदर्शनका परिजात-भाष्य—16/25; वैष्णव-तोषणी—17/77-78; वैष्णव-मञ्जुषा—10/17, 53; 12/18, 27; 13/42; 16/25; वैष्णव-वन्दना—11/29, 40; शाखानिर्णयामृत—12/13-17, 58, 62, 79-87; श्वेताश्वतरोपनिषद्—17/257; साधन-दीपिका—12/58; सीताद्वैतचरित—12/13-17; स्कन्दपुराण—15/9 हरिभक्तिविलास—10/105; 12/27; होराशास्त्र—13/90 ॥

अमृतानुक्रमणिकामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका

अग्निपुराण—15/9-10; उज्ज्वलनीलमणि (आनन्दलोचनीटीका)—10/85; कर्णानन्द—10/85; गौरगणोद्देश-दीपिका—15/28; 16/25; गीता—9/39; चैतन्यभागवत—9/10; 10/14, 19, 32, 40; 12/40-42; 14/61; 16/20-21; 17/7; नारदपुराण—15/9-10, 24; पद्मपुराण—15/9-10, 24; बृहन्नारदीयपुराण—15/9-10; ब्रह्मवैवर्तपुराण—15/24; ब्रह्मसंहिता—10/85; भक्तिरत्नाकर—9/10; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/18, 57; भविष्यपुराण—15/9-10; भागवत—8/12; 17/155-158; मत्स्यपुराण—15/9-10; मनुसंहिता—12/49-53; विष्णोधर्मोत्तर—15/9-10, 24; स्कन्दपुराण—8/24; 15/24; स्मृतिवाक्य—15/9-10; हरिभक्तिविलास—12/49-53; 15/9-10, 24 ॥

साङ्केतिक चिह्नोंकी सूची

अन्त्य — अन्त्यलीला आदि — आदिलीला उःनीः — उज्ज्वलनीलमणि कठः — कठोपनिषद छाः — छान्दोग्योपनिषद तैः — तैत्तिरयोपनिषद नाःपःराः — नारदपञ्चरात्र ब्रःसः — ब्रह्मसंहिता बृःआः — बृहदारण्यकोपनिषद मध्य — मध्यलीला मःभाः — महाभारत भःरःसिः — भक्तिरसामृतसिन्धु भाः — भागवत विःपुः — विष्णुपुराण श्वेः — श्वेताश्वतरोपनिषद हःभःविः —हरिभक्तिविलास

iii

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (उत्तरार्द्ध) अध्याय-विवरण आठवाँ अध्याय— 3-24 पञ्चतत्त्वका माहात्म्य न मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर अथवा श्रीकृष्णकी पूजा घोर अपराध, श्रीकृष्णभक्तिके बिना श्रीगौरभक्ति और श्रीगौरभक्तिके बिना श्रीकृष्णभक्ति 'अभक्ति' अथवा 'आसुरवृत्ति'; श्रीचैतन्य दयाकी चमत्कारिता; अपराधयुक्त होनेपर असंख्य बार श्रीकृष्णका श्रवण-कीर्तन वृथा, श्रीकृष्ण भुक्ति-मुक्ति देकर जीवकी वञ्चना करके 'भक्ति' नहीं देते, श्रीकृष्णके साथ रस सम्बन्ध न होनेसे केवल मुक्ति ही लाभ; महाप्रभुकी महापापीके भी प्रति प्रेम-भक्ति प्रदान लीला, श्रीगौर-निताइ सेवासे ही श्रीकृष्ण-प्रेमोदय, श्रीकृष्ण नामापराधोंका विचार करते हैं, श्रीगौर-निताईके नामोंमें अपराधका विचार नहीं है, श्रीचैतन्यभागवतके श्रवणसे श्रीगौर-निताईकी महिमा और श्रीकृष्णभक्ति-सिद्धान्तके विषयमें ज्ञान; श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी महिमाका कीर्तन, श्रीपण्डित हरिदास, वैष्णवोंके पचास सद्गुण, श्रीकृष्णराज गोस्वामीके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके वर्णनका रहस्य। नौवाँ अध्याय— 27-38 महाप्रभु द्वारा माली बननेका धर्म ग्रहण और नवद्वीपमें भक्तिके फलोंके उद्यानकी रचना, भक्तिकल्पवृक्ष, श्रीमाधवेन्द्रपुरी कल्पवृक्षके प्रथम अङ्कुर, अचिन्त्य शक्तिके बलसे माली होकर भी महाप्रभु स्वयं स्कन्ध एवं सभी शाखाओंके आश्रय, परमानन्दपुरी और केशव भारती-प्रमुख नौ संन्यासी वृक्षके नौ मूल, परमानन्दपुरी मध्यमूल, श्रीअद्वैत और श्रीनित्यानन्द-दो स्कन्ध, स्कन्धकी बहुतसी शाखाएँ और उपशाखाएँ, प्रेमफल, प्रेमफलास्वादन, प्रेमफल वितरण, जीवोंका नित्य-मङ्गल विधान ही परोपकार, श्रीकृष्णप्रेम अर्पण द्वारा जीवोंको अपने अनुरूप महाभागवत बनाना तथा निन्दकोंका भी श्रीकृष्णप्रेम प्राप्तिसे उद्धार। दसवाँ अध्याय— 41-94 मूल स्कन्ध शाखा अर्थात् महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन, श्रीगौरभक्तोंमें गुरु-लघु-भेद शून्यता; 'प्रभुपादोपाधान' शङ्कर पण्डित, वासुदेव ठाकुरकी परदुःख-कातरता, नामाचार्य हरिदास ठाकुर और उनके शिष्य सत्यराज खाँ आदि कुलीन-ग्रामवासी, कुछ भी शुल्क न लेनेवाले देहरोग-भवरोग चिकित्सक मुरारिगुप्तका आत्मवृत्तिके द्वारा कुटुम्ब भरण-पोषण, महाप्रभुका 'साक्षात्', 'आवेश' और 'आविर्भाव'-इन तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा, नकुल ब्रह्मचारीकी देहमें महाप्रभुका आवेश, 'नकुल ब्रह्मचारी' अथवा 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' तथा महाप्रभु प्रदत्त 'नृसिंहानन्द' एक ही व्यक्तिके नाम, कुलीन-ग्रामवासियोंका माहात्म्य; श्रीरूप-सनातन-शाखाके विस्तारसे समस्त भारतका उद्धार-१) भक्त-आचार-प्रवर्तन, २) लुप्ततीर्थ उद्धार और ३) श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार; श्रीस्वरूप दामोदरके अन्तर्धान होनेपर 'स्वरूपके रघुका' श्रीरूप-सनातनके चरणोंके दर्शन और महाप्रभु-स्वरूप दामोदरके विरहसे कातर होकर गोवर्धनसे कूदकर देह त्यागका सङ्कल्प लेकर वृन्दावन आगमन, श्रीरूप-सनातनके द्वारा तृतीय भाईके रूपमें रघुनाथ दास गोस्वामीको अपने समीप रखना, दास गोस्वामीके दैनिक कृत्य, रघुनाथभट्ट गोस्वामीका विवरण। iv

ग्यारहवाँ अध्याय— 97-120 श्रीनित्यानन्दस्कन्ध-शाखा अर्थात् नित्यानन्दगणोंका वर्णन। बारहवाँ अध्याय— 123-144 श्रीअद्वैतस्कन्ध-शाखा अर्थात् श्रीअद्वैतगणोंका वर्णन, श्रीअद्वैतगण पहले एकमत, बादमें दो मत-आचार्यके अनुगत और उनसे स्वतन्त्र, श्रीअच्युतानन्दानुग 'सारग्राही' एवं अन्य सब 'असार', सारग्राही-सहित सभीकी गणना करनेके बाद असारग्राहियोंका त्याग, श्रीचैतन्य महाप्रभु चौदह भुवनोंके गुरु, बाउलिया विश्वास, बाउल अथवा मायावादमतका खण्डन, महाप्रभुके द्वारा वैष्णव आचार्यके कर्त्तव्यका निर्णय, असार गणोंका श्रीगौरकृपाके अभावके कारण पतन, श्रीगौरकृष्ण-भक्त यमके गुरु और श्रीगौरकृष्ण-विमुख यमके दण्डके योग्य, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीकी उपशाखाएँ, शाखा-स्मरणसे भवबन्धनका विमोचन। तेरहवाँ अध्याय— 147-171 महाप्रभुकी आदिलालाका सूत्र, गृहस्थ-लीला ही आदि-लीला एवं संन्यास-लीला ही मध्य और अन्त्य लीला, मुरारिगुप्तके द्वारा आदिलाला और स्वरूप गोस्वामीके द्वारा मध्य और अन्त्य लीलाका सूत्र-ग्रन्थन, आदिलालाके चार भाग; आदि, मध्य और अन्त्य लीलाका संक्षेपमें विवरण, पहले गुरुवर्गोंको अवतरित कराना, बादमें स्वयं अवतरण, श्रीअद्वैतकी भक्तिपूर्ण व्याख्या, श्रीकृष्णोवतार हेतु प्रतिज्ञा, विश्वरूप-जन्म, विश्वरूप-तत्त्व, श्रीगौराविर्भाव, नीलाम्बर-चक्रवर्त्तीकी गणना, आर्याओं (कुलीन स्त्रियों) का विविध उपहारों सहित श्रीगौर-दर्शन हेतु आगमन, सर्वत्र आनन्द-कोलाहल। चौदहवाँ अध्याय— 173-188 महाप्रभुकी बाल्यलीलाओंका वर्णन और माता-पिताको चरणचिह्न-प्रदर्शन, महापुरुषोंके बत्तीस लक्षण, नीलाम्बर चक्रवर्त्तीकी भविष्यवाणी, नामकरण—'विश्वम्भर' नाम, घुटनोंके बल चलना, रोनेके छलसे नाम-प्रचार, पैरोंके बल चलना, मिट्टी खानेके छलसे माताको ज्ञान प्रदान, अतिथि-ब्राह्मणके प्रति कृपा, चोरोंको दिशा-भ्रम कराना, रोगके बहानेसे एकादशीके दिन हिरण्य-जगदीशके नैवेद्यको खाना, बाल-चपलता, माताकी मूर्च्छा और नारियल लाना, गंगाके तटपर कन्याओंके साथ परिहास, लक्ष्मीदेवीकी पूजा ग्रहण और वर प्रदान, उच्छिष्ट हाँडीके ऊपर बैठना तथा माताको ब्रह्मज्ञान-उपदेश, खाली पैरोंमें ही नूपुर ध्वनि, मिश्रका शुद्ध वात्सल्य, कलम पकड़ना। पन्द्रहवाँ अध्याय— 191-198 महाप्रभुकी पौगण्ड लीलाका वर्णन-गङ्गादास पण्डितके स्थानपर व्याकरण-अध्ययन, माताको एकादशीके दिन अन्न न खाने हेतु अनुरोध, विश्वरूपका संन्यास, महाप्रभुकी मूर्च्छा और विश्वरूपके साथ वार्त्तालापरूपी कहानी, जगन्नाथ मिश्रका अप्रकट होना, लक्ष्मीदेवीके पाणिग्रहणकी लीला। सोलहवाँ अध्याय— 201-216 महाप्रभुकी कैशोर लीलाका वर्णन-अध्यापन, पण्डित विजय, जाह्नवी (गङ्गा) में जलकेलि, पूर्वबङ्गाल-गमन, वहाँ विद्याका विचार और नामसङ्कीर्त्तन, तपनमिश्रके साथ मिलन, उनको साध्य-साधन उपदेश और वाराणसी जाने हेतु आदेश प्रदान, महाप्रभुकी विरहमें लक्ष्मीदेवीकी वैकुण्ठ-प्राप्ति, महाप्रभुका घर लौटना, माताको सान्त्वना देना, विष्णुप्रियाके साथ विवाह, दिग्विजयी-जय, दिग्विजयीके द्वारा कहे गये श्लोकके दोष और गुणोंका विचार, दिग्विजयीका सरस्वतीके निकट श्रीगौरतत्त्व-विषयक ज्ञान प्राप्त करना एवं महाप्रभुका चरणाश्रय। v

सत्रहवाँ अध्याय— 219-269 महाप्रभुकी यौवन लीलाका वर्णन—महाप्रभुका गया गमन, श्रीईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय, प्रेमप्रकाश, घरमें लौटना, शचीमाताको प्रेमदान, श्रीअद्वैत-मिलन, श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन, श्रीवासके द्वारा महाप्रभुका अभिषेक, श्रीनित्यानन्द-मिलन, निताइको महाप्रभुके द्वारा षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूपका प्रदर्शन, श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा व्यास-पूजन, महाप्रभुका श्रीनित्यानन्द (श्रीबलदेव) के आवेशमें मूसल धारण, शचीदेवीका श्रीबलराम-कृष्ण-दर्शन, जगाइ-मधाइका उद्धार, महाप्रभुका सात-प्रहरिया भाव, मुरारिके भवनमें वराह आवेश, शुक्लाम्बरके भिक्षाके चावल खाना, 'हरेर्नाम' श्लोककी व्याख्या, नामग्रहण करनेकी प्रणाली, श्रीवास भवनमें एक वर्ष तक सङ्कीर्तन, गोपाल-चापालका उपाख्यान, दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप देना, मुकुन्दके प्रति महाप्रभुका दण्डरूपी अनुग्रह, श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुकी दण्डरूपी कृपा, मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिक रामनिष्ठा, श्रीधरके लोहेके पात्रमें जलपान और उनको वरदान, हरिदास ठाकुरके प्रति कृपा, श्रीअद्वैताचार्यके प्रति शचीदेवीके अपराधका खण्डन, पाषण्डी छात्रका 'नाममें अर्थवाद', नामापराधीके मुख दर्शन होनेपर मनुष्यका कर्त्तव्य, महाप्रभुके द्वारा अभिधेय भक्तिकी महिमाका व्याख्यान, मुरारिकी प्रशंसा, आम्रवृक्ष-रोपण और फल दानकी कहानी, कीर्तनके समय मेघोंका निवारण, श्रीवासका विष्णुसहस्र-नाम पाठ, महाप्रभुकी नृसिंहावेश-लीला, श्रीगौरनामसे अपराध क्षय, श्रीगौरदर्शनसे संसार ध्वंस, महाप्रभुका महेशावेश, भिक्षुको श्रीकृष्णप्रेम प्रदान, ज्योतिषीके द्वारा महाप्रभुको 'साक्षात् भगवान्' बतलाना, ज्योतिषीके द्वारा श्रीगौर-निताइ-तत्त्व कहना, महाप्रभुकी बलदेवके आवेशमें यमुना आकर्षण-लीला और बारह घण्टे तक नृत्य, महाप्रभुकी आज्ञासे प्रति गृहमें श्रीकृष्णसङ्कीर्तन, काजीके द्वारा मृदङ्ग तोड़ना, कीर्तन-विरोध और निषेध, महाप्रभुके द्वारा सभीको नगर सङ्कीर्तन करनेका आदेश और काजी दलन, काजीके साथ शास्त्र-विचार, काजीके द्वारा स्वप्नमें देखी गयी नृसिंह-मूर्तिके दर्शनका उपाख्यान, काजीके पयादोंके मुख और दाढ़ी जलनेका विवरण, काजीके निकट स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग, काजीका वंशधरोंके प्रति 'तालाक', श्रीवासके पुत्रका परलोकगमन, महाप्रभुके द्वारा नारायणीको उच्छिष्ट दान, यवन दर्जीके द्वारा महाप्रभुकी कृपा प्राप्ति, श्रीवासके द्वारा वृन्दावन लीलाका वर्णन, आचार्य रत्नके घरमें महाप्रभुका लक्ष्मीके आवेशमें नृत्य, किसी ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरण स्पर्श करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें छलांग लगाना, महाप्रभुका उच्च स्वरमें 'गोपी' 'गोपी' कहना और पाषण्डी छात्रके द्वारा मना किये जानेपर महाप्रभुका क्रोध, पाखण्डियोंकी दुर्गति देखकर महाप्रभुकी करुणा और संन्यास ग्रहण, केशव भारतीका नदिया आगमन और महाप्रभुके साथ मिलन, महाप्रभुका काटोया जाकर संन्यास ग्रहण करना, चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन, महाप्रभुका राधाभाव, श्रीगौरनागरवादका खण्डन, श्रीकृष्णके अन्य रूपोंमें गोपियोंकी अप्रीति, गोपियोंकी श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीराधाके निकट श्रीकृष्णके चातुर्यकी पराजय, श्रीगौरलीलाके पार्षद एवं भक्तगणोंका तत्त्व, श्रीकृष्ण एवं श्रीगौरलीलाके रहस्य दुर्लभ, अचिन्त्य एवं तर्कातीत, तार्किकोंकी दुर्गति, श्रद्धावानकी ही सेवा प्रवृत्ति तथा आदिलीलाकी पुनरावृत्ति। vi

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला भाग-2 अध्याय 8-17

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आठवाँ अध्याय आठवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका वर्णन हुआ है। नामापराध रहनेपर जन्मों-जन्मोंतक श्रीकृष्णनाम करनेपर भी व्यक्तिको प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होती। इससे यह समझना चाहिये कि यदि नामापराधी व्यक्ति सात्त्विक विकारादिका प्रदर्शन करता है, तो वह केवल छलमात्र है। जो व्यक्ति निष्कपट भावसे श्रीचैतन्य- श्रीनित्यानन्दका नाम लेते हुए आनन्दका अनुभव करता है, दोनों प्रभु उसके हृदयको अपराधशून्य कर देते हैं। तब श्रीकृष्णनाम जप करनेसे उसके हृदयमें प्रेमका उदय होता है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर-कृत श्रीचैतन्यभागवतमें सूत्ररूपमें दी गयी महाप्रभुकी शेषलीलाका विस्तारसे वर्णन होना बाकी था, अतः श्रीवृन्दावनवासी वैष्णवोंकी आज्ञासे और श्रीमदनमोहनजीकी आज्ञामाला प्राप्तकर श्रील कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी रचना की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकी इच्छासे नितान्त अयोग्य व्यक्तिको भी योग्यता-लाभ :- वन्दे चैतन्यदेवं तं भगवन्तं यदिच्छया। प्रसभं नर्त्तते चित्रं लेखरङ्गे जड़ोऽप्ययम् ॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी वन्दना करता हूँ, जिनकी इच्छासे चित्रपुत्तलिका (चित्रपटपर बने चित्र) की भाँति होनेपर भी मुझ मूर्ख व्यक्तिने हठात् (सहसा) यह ग्रन्थ-लेखनरूपी नृत्य-कार्य आरम्भ किया है॥1॥ अनुभाष्य—यदिच्छया (यत् यस्य चैतन्यदेवस्य इच्छया) अयम् (अहं कृष्णदासः) जड़ोऽपि (जड़सदृशोऽपि) लेखरङ्गे (ग्रन्थरचन-क्रीड़ाकार्य) प्रसभं (हठात्) चित्रम् (आश्चर्यं यथा स्यात् तथा) नर्त्तते, तं [कृपामयं] भगवन्तं चैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे (प्रणमामि)। श्लोक भावानुवाद—जिन श्रीचैतन्यदेवकी इच्छासे मुझ कृष्णदासने जड़-सदृश होनेपर भी हठात् ग्रन्थ-लेखन- क्रीड़ारूपी नृत्य आरम्भ किया है, उन कृपामय भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥1॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जय परमानन्द नित्यानन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। परमानन्द स्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥2॥ जय जयाद्वैताचार्य जय कृपामय॥ जय जय गदाधर पण्डित महाशय॥3॥ अनुवाद—कृपामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। श्रीगदाधर पण्डित महाशयकी जय हो, जय हो॥3॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। प्रणत हइया वन्दों सबार चरण॥4॥ अनुवाद—श्रीवासादि सभी भक्तोंकी जय हो, जय हो। मैं शरणागत होकर इन सबके चरणोंकी वन्दना करता हूँ॥4॥ मूक कवित्व करे याँ-सबार स्मरणे। पङ्गु गिरि लङ्घे, अन्ध देखे तारागणे॥5॥ अनुवाद—इनके (पञ्चतत्त्वके) स्मरणमात्रसे गूँगा व्यक्ति कविता करने लगता है, पङ्गु (चलनेमें असमर्थ) व्यक्ति भी पर्वतको लांघ सकता है और अन्धा व्यक्ति आकाशके तारोंको देखनेमें समर्थ हो जाता है॥5॥

[ 8/6-12 पञ्चतत्त्वके माहात्म्यको ना मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर या श्रीकृष्णपूजा घोर अपराध :- ए-सब ना माने येइ पण्डितसकल। ता-सबार विद्यापाठ भेक-कोलाहल ॥ 6 ॥ अनुवाद-जो सब (स्वयंको) पण्डित (माननेवाले) पञ्चतत्त्वको नहीं मानते, उनका विद्यापाठादि मेंढकोंके कोलाहलकी भाँति निरर्थक है॥ 6 ॥ अमृतानुकणिका-मेंढकका कोलाहल उसका कुछ भी कल्याण नहीं करता, अपितु उसके लिये विपत्तिका ही आह्वान करता है। उसके कोलाहलको सुनकर सर्प उसकी स्थिति जानकर वहाँ आकर उसको ग्रास कर लेता है। इसी प्रकार जो पञ्च-तत्त्वको ईश्वर रूपमें स्वीकार नहीं करते अथवा उनकी अलौकिक शक्तिपर विश्वास नहीं करते, उनका लौकिक दृष्टिसे पण्डित होनेपर भी कोई कल्याण नहीं होता। उनका विद्याभ्यास और ग्रन्थोंका अध्ययन निरर्थक हो जाता है, क्योंकि इस पाण्डित्य अभिमानके कारण वे भगवद्-चरणोंमें अपराध कर बैठते हैं और क्रमशः वे श्रीभगवान्से बहुत दूर हो जाते हैं॥ 6 ॥ एइ सब ना माने येबा, करे कृष्णभक्ति। कृष्ण-कृपा नाहि तारे, नाहि तार गति ॥ 7 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इन पञ्चतत्त्वको न मानकर जो श्रीकृष्णभक्ति करते हैं, उनपर श्रीकृष्णकी कृपा नहीं होती ॥ 7 ॥ अनुभाष्य-'तारे' अर्थात् उनके प्रति॥ 7 ॥ पूर्वे येन जरासन्ध-आदि राजागण। वेदधर्म करि' करे विष्णुर पूजन ॥ 8 ॥ कृष्णभक्ति बिना गौरभक्ति, गौरभक्ति बिना कृष्णभक्ति-अभक्ति :- कृष्ण नाहि माने, ताते दैत्य करि' मानि। चैतन्य ना मानिले तैछे दैत्य तारे जानि ॥ 9 ॥ अनुवाद-जैसे द्वापरमें जरासन्धादि राजा वेदविहित धर्मके अनुसार विष्णुकी पूजा करते थे, परन्तु वे श्रीकृष्णको नहीं मानते थे, इसलिये इन्हें दैत्य माना गया है। इस प्रकार जो श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भगवत्ताको स्वीकार नहीं करते, उन्हें भी दैत्यके रूपमें जानो॥ 8-9 ॥ अनुभाष्य-विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको स्वीकार न करके उनके प्रति विद्वेष अथवा उदासीनवशतः जरासन्धादिकी वेदमन्त्रोंके द्वारा की गयी विष्णुपूजा भी आसुरिक धर्ममें ही समाप्त होती है, उसी प्रकार अपने स्वरूपगत धर्म श्रीचैतन्यदास्यको भुलाकर जीवकी विष्णुपूजाकी जो चेष्टा है, वह भी उत्पातमय आसुरिक-धर्म या अवैष्णवता मात्र है॥ 9 ॥ महाप्रभुकी संन्यासलीलाका हेतु :- 'मोरे ना मानिले सब लोक हबे नाश।' इथि लागि' कृपार्द्र प्रभु करिल संन्यास ॥ 10 ॥ संन्यासी-बुद्धये मोरे करिबे नमस्कार। तथापि खण्डिबे दुःख, पाइबे निस्तार ॥ 11 ॥ अनुवाद-'जो मुझे (स्वयं भगवान्को) नहीं मानते, उन सभी लोगोंका नाश होगा'-यह विचारकर कृपासे द्रवीभूत होकर श्रीचैतन्य महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यासी जानकर वे मुझे नमस्कार करेंगे, इससे उनके दुःखोंका नाश होगा और उनका उद्धार हो जायेगा॥ 10-11 ॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचन्द्र श्रीराधाकृष्णतत्त्वसे अभिन्न वस्तु हैं। किन्तु कुछ अज्ञानी लोग अपनी जड़ और भोगमय चित्त-वृत्तिके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको साधारण समझकर अपराध कर बैठते हैं। ऐसे निर्बोध लोगोंके अपराधोंकी चिन्ता करके श्रीगौरहरिने कृपावश संन्यास ग्रहणकर उनके प्रति दयाका प्रकाश किया॥ 11 ॥ महावदान्य श्रीगौरमें अभक्ति-आसुरिक-वृत्ति :- हेन कृपामय चैतन्य ना भजे येइ जन। सर्वोत्तम हइलेओ तारे असुरे गणन ॥ 12 ॥ 4 | श्रीचैतन्यचरितामृत

8/12 ] अनुवाद-ऐसे कृपालु श्रीचैतन्य महाप्रभुका जो लोग भजन नहीं करते, वे (जगत्में) सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी असुरतुल्य हैं॥12॥ अनुभाष्य-“हे जीवों! केवल श्रीकृष्णका भजन करो”-श्रीचैतन्यचन्द्रकी इस प्रकारकी दयाकी जो लोग उपलब्धि नहीं कर सकते, वे निश्चय ही असुर अर्थात् विष्णुभक्तिरहित अवैष्णव हैं, चाहे जगत्के विषयी लोगोंके मध्य वे श्रेष्ठ माने जाते हों। श्रीकृष्णभजनको त्यागकर श्रीचैतन्यभजनमें भी श्रीचैतन्यचन्द्रकी दया नहीं है, क्योंकि ऐसा भजन कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है। उसी प्रकार निरीश्वर स्मार्त्त अथवा पञ्चोपासक समाजका अनुगमनकर क्षुद्र नश्वर स्वार्थसिद्धिके लिये विष्णुपूजाका प्रयास करनेवालोंकी श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक (चैःचः आदिलीला 1/1 में वर्णित) छह तत्त्वोंमें किसी एक तत्त्वको त्यागकर अन्य एक तत्त्वके प्रति जो श्रद्धा अथवा पूजा है, अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभुको श्रीकृष्णसे भिन्न सामान्य मर्त्य जीवोंमें श्रेष्ठ समझकर गौरनाम, गौरमन्त्र और गौरशक्तिके प्रति जो अश्रद्धा है, वह भी आसुरिक धर्म अर्थात् कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है॥12॥ अमृताणुकणिका-इस अध्यायके 6-12 पयार संख्यामें वर्णित है कि जो श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक छह तत्त्वोंको नहीं मानते, वे असुर ही हैं-ऐसा शाब्दिक अर्थ ग्रहण करनेपर शैव-शाक्त-धर्म-सम्प्रदायके लोग, योग-ज्ञानमार्ग अवलम्बी साधक, यहाँ तक कि महाप्रभुके अनुगत वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य वैष्णव सम्प्रदायके लोग भी असुर ही कहलायेंगे, परन्तु यह श्रील कविराज गोस्वामीका उद्देश्य नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धुमें श्रील रूप गोस्वामीने कहा है-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः” अर्थात् ज्ञानमार्गमें भजनसे मुक्ति सुलभ है। चैःचः (मध्य 20/157) में कहा गया है- “ज्ञान, योग, भक्ति,-तिन साधनेर वशे। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्-त्रिविध प्रकाशे॥” इस पयारमें भी ज्ञानमार्ग, योगमार्ग और सभी प्रकारके भक्तिमार्गोंकी सार्थकता स्वीकार हुई है। इसलिये गौड़ीय वैष्णवोंका मत यही है कि अन्य प्रमाणिक सम्प्रदायके भक्त परव्योम स्थित अपने-अपने इष्ट भगवद्-स्वरूपका भजन करके वैकुण्ठमें सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करते हैं। परम उदार वैष्णवशास्त्र सभी साधक सम्प्रदायोंके प्रति यथायोग्य मर्यादाका प्रदर्शन करते हैं, कहीं भी सङ्कीर्णताको आश्रय नहीं देते। श्रुतियोंमें कहा गया है कि परतत्त्व वस्तु एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकाशित होती है (एकोऽपि सन् यो बहुधावभाति) और वह रसस्वरूप है (रसो वै सः)। उसमें अनन्त वैचित्री है और वह रसामृतसिन्धु है। नारायण, राम, नृसिंहादि विभिन्न भगवद्-स्वरूप उसकी रस वैचित्रीके विभिन्न रूपमात्र हैं। विभिन्न रसवैचित्री जिस प्रकार अखिलरसामृत-सिन्धु परतत्त्व वस्तुमें ही अवस्थित है, उसी प्रकार ये सब रसवैचित्रीके विभिन्न रूप या विग्रह भी उस परतत्त्व वस्तु अखिलरसामृत-घन विग्रहके ही अन्तर्भुक्त हैं, उससे स्वतन्त्र विग्रह नहीं हैं। जैसे, नारायण जिस रसवैचित्रीके मूर्त्तरूप हैं, उसी रस वैचित्रीके उपासक भक्तोंके निकट परतत्त्व वस्तु अपने विग्रहमें नारायण रूपको प्रकट करती है। इसी बातको महाप्रभुने (चैःचः मध्यलीला 9/156) में कहा है- “एक ईश्वर-भक्तेर ध्यान-अनुरूप। एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप॥” अर्थात् एक ही ईश्वर भक्तोंके ध्यानके अनुरूप एक ही विग्रहमें नाना प्रकारके रूप प्रकट करते हैं। लीलामें श्रीकृष्णने अपने वासुदेव-विग्रहमें ही अर्जुनको विश्वरूप दिखलाया और श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने विग्रहमें लक्ष्मी, दुर्गा, महेश, वराह, नृसिंह, बलदेवादि विभिन्न भगवद्-स्वरूपके रूपोंको नदीयावासी भक्तोंको दिखलाया। (‘बहुमूर्त्येकमूर्तिकम्’ भाः 10/40/7)-इस प्रकार परतत्त्व वस्तु एक मूर्तिमें बहुमूर्ति और बहुमूर्तिमें आठवाँ अध्याय | 5

[ 8/12-15 एकमूर्ति है; इन सब विभिन्न रूपोंमें तत्त्वके विचारसे कोई भी भेद नहीं है, क्योंकि सभी एक ही परतत्त्व वस्तुके एक ही विग्रहकी विभिन्न अभिव्यक्ति हैं। जो किसी भी भगवद्-स्वरूपके प्रति अवज्ञा प्रदर्शन नहीं करते अथवा उनमें पृथक् भगवद्-भेद बुद्धि नहीं करते, अपने उपास्य-स्वरूपके अतिरिक्त अन्य भगवद्-स्वरूपोंका भजन नहीं करनेपर भी वे निज भजन अनुरूप अभीष्ट वस्तुको ही प्राप्त करते हैं। जैसे हनुमानजी श्रीरामचन्द्रके सेवक हैं और वे श्रीकृष्णका भजन नहीं करते हैं, तथापि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णको अभिन्न भगवद्-तत्त्व स्वीकार करनेपर वे श्रीरामचन्द्रकी सेवासे वञ्चित नहीं होते। किन्तु जरासन्धादि राजा श्रीकृष्ण-स्वरूपकी भगवत्ताको ही स्वीकार नहीं करते, विष्णु-भजन करनेपर भी उन्हें श्रीविष्णुकी कृपा प्राप्त नहीं होती है, इसलिये उनकी गणना असुरोंमें होती है। महाप्रभुने कहा है (चैःचः मध्यलीला 9/155)- “ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध॥” एक ही ईश्वर-तत्त्वमें भेद माननेसे अपराध होता है। श्रीचैतन्यदेव भी भगवद्-स्वरूप हैं, उनकी अवज्ञा करना भगवद्-स्वरूपकी अवज्ञा ही है। इसलिये श्रीचैतन्यदेवकी अतुलनीय करुणाके अभिभूत होकर श्रीकविराज गोस्वामी जो वचन कह रहे हैं, उनका तात्पर्य यह है-“श्रीचैतन्यदेवकी अवज्ञा करके अन्य भगवद्-स्वरूपका भजन करनेपर भी लोग असुरोंमें गणित होते हैं॥” 12॥ श्रीगौर-नित्यानन्दके भजन-निमित्त सभीको कविराज गोस्वामीका आदेश सहित अनुरोध :- अतएव पुनः कहों उर्ध्वबाहु हञा। चैतन्य-नित्यानन्द भज कुतर्क छाड़िया॥ 13॥ अनुवाद-इसलिये मैं (कृष्णदास) भुजाओंको ऊपर उठाकर पुनः कहता हूँ कि सब कुतर्कोंको त्यागकर श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका भजन करो॥ 13॥ अमृतानुकणिका-भगवान्‌के जितने गुण जीवके चित्तको आकृष्ट करते हैं, उनके मध्य करुणा ही जीवोंके पक्षमें सर्वश्रेष्ठ है। भगवान् रस-स्वरूप और रसिकशेखर होनेपर भी यदि वे करुणा करके उसकी उपलब्धि करनेकी योग्यता जीवको नहीं दें, तो जीवको क्या लाभ? करुणाकी अभिव्यक्ति जिस भगवद्-स्वरूपमें जितनी अधिक होती है, वह भगवद्-स्वरूप ही जीवके चित्तको उतना ही अधिक आकृष्ट करता है। यह करुणा श्रीगौर-नित्यानन्दमें सर्वापेक्षा अधिक रूपमें अभिव्यक्त होती है, इसलिये ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी सभीको पुकारकर कह रहे हैं कि कुतर्कको छोड़कर तुम सब श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करो। परन्तु श्रीकृष्णका भजन त्यागकर श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करना इस पयारका अभिप्राय नहीं है। श्रीचैतन्य-नित्यानन्द प्रभु पुनः पुनः श्रीकृष्ण भजनका आदेश दे रहे हैं, इसलिये उनकी अवज्ञा करनेपर उनकी कृपा लाभ नहीं होगी। इस पयारका अभिप्राय यह है-श्रीगौर-नित्यानन्दके आदेशानुसार श्रीकृष्ण-भजनके साथ-साथ श्रीगौर- नित्यानन्दका भी भजन करना चाहिये॥ 13॥ प्रत्यक्ष और अनुमानवादी तार्किकोंको भी उपदेश :- यदि वा तार्किक कहे, - 'तर्क से प्रमाण। तर्कशास्त्रे सिद्ध येइ, सेइ सेव्यमान॥' 14॥ श्रीगौरकी दया समस्त दयाकी अपेक्षा अधिकतर चमत्कारी :- श्रीकृष्णचैतन्य-दया करह विचार। विचार करिले चित्ते पाबे चमत्कार॥ 15॥ अनुवाद-यदि कोई तार्किक कहे कि तर्क ही प्रमाण है (अर्थात् श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्दके भजनकी क्या आवश्यकता है?) और तर्कशास्त्रसे जो सिद्ध हुए हैं, वे ही सेव्य हैं अर्थात् भजन करने योग्य हैं, (तो) श्रीकृष्णचैतन्यकी दयाका विचार करो। अच्छी प्रकारसे विचार करनेपर तुम्हारे चित्तमें चमत्कार होगा॥ 14-15॥ 6 | श्रीचैतन्यचरितामृत