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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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१२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

जाता था।

“उनके आदेश के बाद कहीं भी आचार्य हुआ जा सकता है और लेक्चर भी दिया जा सकता है। जिसको उनका आदेश मिलता है, उसे उनकी शक्ति भी मिलती है; तब वह आचार्य का कठिन काम कर सकता है।

“एक बड़े जमींदार से उसकी एक प्रजा मुकदमा लड़ रही थी। तब लोग समझ गए कि उस प्रजा के पीछे कोई जोरदार आदमी है; सम्भव है कि कोई बड़ा जमींदार ही उसकी ओर से मुकदमा चला रहा हो। मनुष्य साधारण जीव है, ईश्वर की शक्ति के बिना आचार्य जैसा कठिन काम वह नहीं कर सकता।”

सच्चिदानन्द ही गुरु और मुक्तिदाता है

विजय – महाराज, ब्राह्मसमाज में जो उपदेश दिए जाते हैं, क्या उनसे लोगों का उद्धार नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण – मनुष्य में वह शक्ति कहाँ कि वह दूसरे को संसारबन्धन से मुक्त कर सके? यह भुवनमोहिनी माया जिनकी है, वे ही इस माया से मुक्त कर सकते हैं। सच्चिदानन्द गुरु को छोड़ और दूसरी गति नहीं है। जिसको ईश्वर-दर्शन नहीं हुआ, उनका आदेश नहीं मिला, जो ईश्वर की शक्ति से शक्तिशाली नहीं है, उसकी क्या मजाल कि जीवों का भवबन्धन-मोचन कर सके?

“मैं एक दिन पंचवटी के निकट झाऊतल्ले की ओर जा रहा था। एक मेढ़क की आवाज सुनायी दी – जान पड़ा कि साँप ने पकड़ा है। काफी देर बाद जब लौटने लगा तब भी उस मेढ़क की पुकार शुरू ही थी। बढ़कर देखा तो दिखायी दिया की एक कौड़ियाला साँप उस मेढ़क को पकड़े हुए है – न छोड़ सकता है, न निगल सकता है उस मेढ़क की भी भवव्यथा दूर नहीं हो रही है। तब मैंने सोचा कि यदि कोई असल साँप पकड़ता तो तीन ही पुकार में इसको चुप हो जाना पड़ता। इस कौड़ियाले ने पकड़ा है, इसीलिए साँप की भी दुर्दशा है और मेढ़क की भी!

“यदि सद्गुरु हो तो जीव का अहंकार तीन ही पुकार में दूर होता है। गुरु कच्चा हुआ तो गुरु की भी दुर्दशा है और शिष्य की भी। शिष्य का अहंकार दूर नहीं होता, न उसके भवबन्धन की फाँस ही कटती है। कच्चे गुरु के पल्ले पड़ा तो शिष्य मुक्त नहीं होता।”

(६)

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। (गीता, ३।२७)

माया या अहंबुद्धि का नाश और ईश्वर-दर्शन

विजय – महाराज, हम लोग इस तरह बद्ध क्यों हो रहे हैं? ईश्वर को क्यों नहीं देख पाते?

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१४ दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद १९ | १२५

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श्रीरामकृष्ण – जीव का अहंकार ही माया है। यही अहंकार कुल आवरणों का कारण है। ‘मैं’ मरा कि बला टली। यदि ईश्वर की कृपा से ‘मैं अकर्ता हूँ’ यह ज्ञान हो गया तो वह मनुष्य तो जीवन्मुक्त हो गया। फिर उसे कोई भय नहीं।

“यह माया या ‘अहं’ मेघ की तरह है। मेघ का एक छोटासा ही टुकड़ा क्यों न हो, पर उसके कारण सूर्य नहीं दीख पड़ते। उसके हट जाने से ही सूर्य दीख पड़ते हैं। यदि श्रीगुरु की कृपा से एक बार अहंबुद्धि दूर हो जाय तो फिर ईश्वर के दर्शन होते हैं।

“सिर्फ ढाई हाथ की दूरी पर श्रीरामचन्द्र हैं, जो साक्षात् ईश्वर हैं; पर बीच में सीतारूपिणी माया का पर्दा पड़ा हुआ है, इसी कारण लक्ष्मणरूपी जीव को ईश्वर के दर्शन नहीं होते। यह देखो तुम्हारे मुँह के आगे मैं इस अँगोछे की ओट करता हूँ। अब तुम मुझे नहीं देख सकते। पर हूँ मैं तुम्हारे बिलकुल निकट। इसी तरह औरों की अपेक्षा भगवान् निकट हैं, परन्तु इस माया-आवरण के कारण तुम उनके दर्शन नहीं पाते।

“जीव तो स्वयं सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, परन्तु इसी माया या अहंकार से वे नाना उपाधियों में पड़े हुए अपने स्वरूप को भूल गए हैं।

“एक एक उपाधि होती है, और जीवों का स्वभाव बदल जाता है। किसी ने काली धारीदार धोती पहनी कि देखना, प्रेमगीतों की तान मुँह से आप ही आप निकल पड़ती है, और ताश खेलना, सैरसपाटे के लिए निकलना तो हाथ में छड़ी लेकर – ये सब आप ही आप जुट जाते हैं! चाहे दुबला-पतला ही हो परन्तु बूट पहनते ही सीटी बजाना शुरू हो जाता है; सीढ़ियों पर चढ़ते समय साहबों की तरह उछलकर चढ़ता है! मनुष्य के हाथ में कलम रहे तो उसका यह गुण है कि कागज का जैसा-तैसा टुकड़ा पाते ही वह उस पर कलम घिसना शुरू कर देता है।

“रुपया भी एक विचित्र उपाधि है। रुपया होते ही मनुष्य एक दूसरी तरह का हो जाता है। वह पहले जैसा नहीं रह जाता। यहाँ एक ब्राह्मण आया जाया करता था। बाहर से वह बड़ा विनयी था। कुछ दिन बाद हम लोग कोन्नगर गए, हृदय साथ था। हम लोग नाव पर से उतरे कि देखा, वही ब्राह्मण गंगा के किनारे बैठा हुआ है। शायद हवाखोरी के लिए आया था। हम लोगों को देखकर बोला, ‘क्यों महाराज, कहो कैसे हो?’ उसकी आवाज सुनकर मैंने हृदय से कहा, ‘हृदय, सुना, इसके धन हो गया है, इसी से आवाज किरकिराने लगी’ हृदय हँसने लगा।

“किसी मेढ़क के पास एक रुपया था। वह एक बिल में रखा रहता था। एक हाथी उस बिल को लाँघ गया। तब मेढ़क बिल से निकलकर बड़े गुस्से में आकर लगा हाथी को लात दिखाने! और बोला, तुझे इतनी हिम्मत कि मुझे लाँघ जाय!’ रुपये का इतना अहंकार होता है!

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अहंकार कब जाता है? – ब्रह्मज्ञान की अवस्था सप्तभूमि

“ज्ञानलाभ होने से अहंकार दूर हो सकता है। ज्ञानलाभ होने से समाधि होती है। जब समाधि होती है, तभी अहंकार जाता है। ऐसा ज्ञानलाभ बड़ा कठिन है।

“वेदों में कहा है कि मन सप्तम भूमि पर जाने से समाधि होती है। समाधि होने से ही अहंकार दूर हो सकता है। मन प्रायः प्रथम तीन भूमियों में रहता है। लिंग, गुदा और नाभि ये ही वे तीन भूमियाँ हैं। तब मन संसार की ओर – कामिनी-कांचन की ओर खिंचा रहता है। जब मन हृदय में रहता है तब ईश्वरी ज्योति के दर्शन होते हैं। वह मनुष्य ज्योति देखकर कह उठता है – ‘यह क्या, यह क्या है!’ इसके बाद मन कण्ठ में आता है। तब केवल ईश्वर की ही चर्चा करने और सुनने की इच्छा होती है। कपाल या भौंहों के बीच में जब मन आता है तब सच्चिदानन्द-रूप दीख पड़ता है। उस रूप को गले लगाने और उसे छूने की इच्छा होती है, परन्तु छुआ नहीं जाता। लालटेन के भीतर की बत्ती को कोई चाहे देख ले पर उसे छू नहीं सकता, जान पड़ता है कि छू लिया, परन्तु छू नहीं पाता। जब सप्तम भूमि पर मन जाता है तब अहं नहीं रह जाता, समाधि होती है।”

विजय – वहाँ पहुँचने पर जब ब्रह्मज्ञान होता है, तब मनुष्य क्या देखता है?

श्रीरामकृष्ण – सप्तम भूमि में मन के जाने पर क्या होता है, मुँह से नहीं कहा जा सकता। नमक की गुड़िया समुंदर नापने गई। किन्तु जैसे पानी में उतरी वैसेही गल गई अब समुंदर के गहराई की खबर कौन देगी? जो देगी वही तो उसके साथ मिल गई। सप्तम भूमि में मन का नाश होता है, समाधि होती है। क्या अनुभव होता है वह मुँह से कहा नहीं जाता।

‘अहं’ जाता नहीं है। ‘बदमाश मैं।’ ‘दास मैं।’

“जो ‘मैं’ संसारी बनता है, कामिनी-कांचन में फँसता है, वह बदमाश ‘मैं’ है। जीव और आत्मा में भेद सिर्फ इसलिए है कि बीच में यह ‘मैं’ जुड़ा हुआ है। पानी पर अगर लाठी डाल दी जाए तो पानी दो हिस्सों में बँटा हुआ दीख पड़ता है। परन्तु वास्तव में है वह एक ही पानी; लाठी के कारण उसके दो हिस्से नजर आते हैं।

“यह लाठी ‘अहं’ ही है। लाठी उठा लो, वही एक जल रह जायगा।

“‘बदमाश मैं’ वह है जो कहता है, ‘मुझे नहीं जानते हो! मेरे इतने रुपये हैं, क्या मुझसे भी कोई बड़ा आदमी है?’ यदि किसी ने दस रुपये चुरा लिये तो पहले वह चोर से रुपये छीन लेता है, फिर चोर की ऐसी मरम्मत करता है कि पसली पसली ढीली कर देता है; इतने पर भी उसको नहीं छोड़ता, पहरेवाले के हाथ सौंपता है और सजा दिलवाता है! ‘बदमाश मैं’ कहता है, ‘अरे, इसने मेरे दस रुपये चुराये थे, उफ, इतनी हिम्मत!’”

विजय – यदि बिना ‘अहं’ के दूर हुए सांसारिक भोगों से पिण्ड नहीं छूटने का –

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समाधि नहीं होने की, तो ज्ञानमार्ग पर आना ही अच्छा है, क्योंकि उससे समाधि होगी। यदि भक्तियोग में 'अहं' रह जाता है तो ज्ञानयोग ही अच्छा ठहरा।

श्रीरामकृष्ण – समाधि प्राप्त होकर एक दो मनुष्यों का अहंकार जाता है अवश्य, परन्तु प्रायः नहीं जाता। लाख विचार करो, पर देखना कि 'अहं' घूम-घामकर फिर उपस्थित है। आज बरगद का पेड़ काट डालो, कल सुबह को उसमें अंकुर निकला हुआ ही देखोगे। ऐसी दशा में यदि 'मैं' नहीं दूर होने का तो रहने दो साले को 'दास मैं' बना हुआ। 'हे ईश्वर! तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ' इसी भाव में रहो। 'मैं दास हूँ', 'मैं भक्त हूँ' ऐसे 'मैं' में दोष नहीं। मिठाई खाने से अम्लशूल होता है, पर मिश्री मिठाइयों में नहीं गिनी जाती।

“ज्ञानयोग बड़ा कठिन है। देहात्मबुद्धि का नाश हुए बिना ज्ञान नहीं होता। कलियुग में प्राण अन्नगत है, अतएव देहात्मबुद्धि, अहंबुद्धि नहीं मिटती। इसलिए कलियुग के लिए भक्तियोग है। भक्तिपथ सीधा पथ है। हृदय से व्याकुल होकर उनके नाम का स्मरण करो, उनसे प्रार्थना करो, भगवान् मिलेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

“मानो जलराशि पर बिना बाँस रखे ही एक रेखा खींची गयी है, मानो जल के दो भाग हो गये हैं; परन्तु वह रेखा बड़ी देर तक नहीं रहती। 'दास मैं' या 'भक्त का मैं' अथवा 'बालक का मैं' ये सब 'मैं' की रेखाएँ मात्र हैं।”

(७)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ (गीता, १२।५)

भक्तियोग ही युगधर्म है। ज्ञानयोग की विशेष कठिनता

'दास मैं' – 'भक्त मैं' और 'बालक मैं'

विजय – महाराज, आप 'बदमाश मैं' को दूर करने के लिए कहते हैं, तो क्या 'दास मैं' में दोष नहीं?

श्रीरामकृष्ण – नहीं। 'दास मैं' अर्थात् 'मैं ईश्वर का दास हूँ', 'मैं उनका भक्त हूँ' इस अभिमान में दोष नहीं, बल्कि इससे भगवान् मिलते हैं।

विजय – अच्छा, तो 'दास मैं' वाले के काम-क्रोधादि कैसे होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – अगर उसके भाव में पूरी सच्चाई आ जाय तो काम-क्रोधादि का आकार मात्र रह जाता है। यदि ईश्वरलाभ के बाद भी किसी का 'दास मैं' या 'भक्त मैं' बना रहा तो वह मनुष्य किसी का अनिष्ट नहीं कर सकता। पारस पत्थर छू जाने पर तलवार सोना हो जाती है; तलवार का स्वरूप तो रहता है, पर वह किसी की हिंसा नहीं करती।

“नारियल के पेड़ का पत्ता झड़ जाता है, उसकी जगह सिर्फ दाग बना रहता है,

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जिससे यह समझ लिया जाता है कि कभी यहाँ पत्ता लगा हुआ था। इसी तरह जिसको ईश्वर मिल गये हैं उसके अहंकार का चिह्न भर रह जाता है, काम-क्रोध का स्वरूप मात्र रह जाता है, उसकी बालक जैसी अवस्था हो जाती है। बालक सत्व, रज, तम में से किसी गुण के बंधन में नहीं आता। बालक जितनी जल्दी किसी वस्तु पर अड़ जाता है, उतनी ही जल्दी वह उसे छोड़ भी देता है। एक पाँच रुपये की कीमत का कपड़ा चाहे तुम धेले के खिलौने पर रिझाकर फुसला लो। पहले तो वह बहककर कहेगा, 'नहीं, मैं न दूँगा, मेरे बाबूजी ने मोल ले दिया है।' और लड़के के लिए सभी बराबर हैं। ये बड़े हैं, यह छोटा है, यह ज्ञान उसे नहीं; इसीलिए उसे जाति-पाँति का विचार भी नहीं है। माँ ने कह दिया है, 'वह तेरा दादा है', फिर चाहे वह कलार हो, वह उसी के साथ बैठकर रोटी खाता है। बालक को घृणा नहीं, शुचि और अशुचि पर ध्यान नहीं, शौच के लिए जाकर हाथ नहीं मटियाता।

“कोई कोई समाधि के बाद भी 'भक्त का मैं', 'दास का मैं' लेकर रहते हैं। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं भक्त हूँ, तुम भगवान् हो।' यह अभिमान भक्तों का बना रहता है। ईश्वरलाभ के बाद भी रहता है। सम्पूर्ण 'मैं' नहीं दूर होता। और फिर इसी अभिमान का अभ्यास करते करते ईश्वर-प्राप्ति भी होती है। यही भक्तियोग है।

“भक्ति के मार्ग पर चलने से भी ब्रह्मज्ञान होता है। भगवान् सर्वशक्तिमान हैं। वे इच्छा करें तो ब्रह्मज्ञान भी दे सकते हैं। भक्त प्रायः ब्रह्मज्ञान नहीं चाहते। 'मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो', 'मैं बच्चा हूँ, तू माँ हैं' वे ऐसा अभिमान रखना चाहते हैं।”

विजय – जो लोग वेदान्त-विचार करते हैं, वे भी तो उन्हें पाते हैं?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, विचारमार्ग से भी वे मिलते हैं। इसी को ज्ञानयोग कहते हैं। विचारमार्ग बड़ा कठिन है। सप्तभूमि की बात तो तुम्हें बतलायी है। सप्तम भूमि पर मन के पहुँचने से समाधि होती है, 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' यह बोध होने पर मन का लय होता है, समाधि होती है। परन्तु कलि में जीवों का प्राण अन्नगत है 'ब्रह्म सत्य, जगत् मिथ्या' का बोध फिर कैसे हो सकता है? ऐसा बोध देहबुद्धि के बिना दूर हुए नहीं हो सकता। 'मैं न शरीर हूँ, न मन हूँ, न चौबीस तत्त्व हूँ, मैं सुख और दुःख से परे हूँ, मुझे फिर कैसा रोग, कैसा शोक, कैसी जरा, कैसी मृत्यु?' – ऐसा बोध कलिकाल में होना कठिन है। चाहे जितना विचार करो, देहात्मबुद्धि कहीं न कहीं से आ ही जाती है। बड़ के पेड़ को काट डालो, तुम तो सोचते हो कि जड़समेत उखाड़ फेंका, पर दूसरे दिन सबेरे उसमें कनखा निकला ही हुआ देखोगे! देहाभिमान नहीं दूर होता; इसीलिए कलिकाल में भक्तियोग अच्छा है, सीधा है।

“और 'मैं चीनी बन जाना नहीं चाहता, चीनी खाना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है।' मेरी कभी यह इच्छा नहीं होती कि कहूँ 'मैं ही ब्रह्म हूँ।' मैं तो कहता हूँ 'तुम भगवान् हो,

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मैं तुम्हारा दास हूँ।' पाँचवीं और छठी भूमि के बीच में चक्कर काटना अच्छा है। छठी भूमि को पार कर सप्तम भूमि में अधिक देर तक रहने की मेरी इच्छा नहीं होती। मैं उनका नामगुण-कीर्तन करूँगा, यही मेरी इच्छा है। सेव्य-सेवक भाव बड़ा अच्छा है। और देखो, ये तरंगें गंगा ही की हैं, परंतु तरंगों की गंगा है ऐसा कोई नहीं कहता। 'मैं वही हूँ' यह अभिमान अच्छा नहीं। देहात्मबुद्धि के रहते ऐसा अभिमान जिसको होता है उसकी बड़ी हानि होती है, फिर वह आगे बढ़ नहीं सकता, गिरे पतित हो जाता है। वह दूसरों की आँखों में धूल झोंकता है, साथ ही अपनी आँख में भी; अपनी स्थिति का हाल वह नहीं समझ पाता।

भक्ति के दो प्रकार – उत्तम अधिकारी – ईश्वर दर्शन का उपाय

"परन्तु भेड़ियाधसान की भक्ति से ईश्वर नहीं मिलते, उन्हें पाने के लिए 'प्रेमाभक्ति' चाहिए। 'प्रेमाभक्ति' का एक और नाम है 'रागभक्ति'। प्रेम या अनुराग के बिना भगवान् नहीं मिलते। ईश्वर पर जब तक प्यार नहीं होता तब तक उन्हें कोई प्राप्त नहीं कर सकता।

"और एक प्रकार की भक्ति है उसका नाम है 'वैधीभक्ति'। इतना जप करना होगा, उपवास करना होगा, तीर्थयात्रा करनी होगी, इतने उपचारों से पूजा करनी होगी, बलिदान देना होगा – यह सब वैधीभक्ति है। इसका बहुत-कुछ अनुष्ठान करते करते क्रमशः रागभक्ति होती है। जब तक रागभक्ति न होगी, तब तक ईश्वर नहीं मिलेंगे। उन्हें प्यार करना चाहिए। जब संसारबुद्धि बिलकुल चली जाएगी – सोलह आना मन उन्हीं पर लग जाएगा, तब वे मिलेंगे।

"परन्तु किसी किसी को रागभक्ति अपने आप ही होती है। स्वतःसिद्ध, बचपन से ही। बचपन से ही वह ईश्वर के लिए रोता है, जैसे प्रह्लाद। 'विधिवादीय' भक्ति कैसी है? जैसे हवा लगने के लिए पंखा झलना। हवा के लिए पंखे की जरूरत है। ईश्वर पर अनुराग उत्पन्न करने के लिए जप, तप, उपवास आदि विधियाँ मानी जाती हैं; परन्तु जब दक्षिणी हवा आप बह चलती है तब लोग पंखा रख देते हैं। ईश्वर पर अनुराग, प्रेम, आप आ जाने से जप, तप आदि कर्म छूट जाते हैं। भगवत्प्रेम में मस्त हो जाने से वैध कर्म करने के लिए फिर किसको समय है?

"जब तक उन पर प्यार नहीं होगा, तब तक वह भक्ति कच्ची भक्ति है। जब उन पर प्यार होता है, तब वह भक्ति पक्की भक्ति कहलाती है।

"जिसकी भक्ति कच्ची है वह ईश्वर की कथा और उपदेशों की धारणा नहीं कर सकता। पक्की भक्ति होने पर ही धारणा होती है। फोटोग्राफ के शीशे पर अगर स्याही (Silver Nitrate) लगी हो तो जो चित्र उस पर पड़ता है वह ज्यों का त्यों उतर जाता है,


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१३०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर १८८२

परन्तु सादे शीशे पर चाहे हजारों चित्र दिखाए जाए, एक भी नहीं उतरता। शीशे पर से चित्र हटा कि वही ज्यों का त्यों सफेद शीशा! ईश्वर पर प्रीति हुए बिना उपदेशों की धारणा नहीं होती।”

विजय – महाराज, ईश्वर को कोई प्राप्त करना चाहे, उनके दर्शन करना चाहे, तो क्या सिर्फ भक्ति से काम सध जाएगा?

श्रीरामकृष्ण – हाँ, भक्ति ही से उनके दर्शन हो सकते हैं। परन्तु पक्की भक्ति, प्रेमाभक्ति, रागभक्ति चाहिए। उसी भक्ति से उन पर प्रीति होती है, जैसा बच्चों का माँ पर प्यार, माँ का बच्चे पर प्यार और पत्नी का पति पर प्यार होता है।

“इस प्यार, इस रागभक्ति के होने पर, स्त्री-पुत्र और आत्मीय परिवार की ओर पहले जैसा आकर्षण नहीं रह जाता, फिर तो उन पर दया होती है। घर-द्वार विदेश जैसा जान पड़ता है, उसे देखकर सिर्फ एक कर्मभूमि का ख्याल जागता है; जैसे घर देहात में और कलकत्ता है कर्मभूमि, कलकत्ते में किराये के मकान में रहना पड़ता है कर्म करने के लिए। ईश्वर पर प्यार होने से संसार की आसक्ति – विषयबुद्धि – बिलकुल जाती रहेगी!

“विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। दियासलाई अगर भीगी हो तो चाहे जितना रगड़ो वह जलती ही नहीं – बीसों दियासलाई व्यर्थ ही बरबाद हो जाती हैं। विषयासक्त मन भीगी दियासलाई है।

“श्रीमती (राधिका) ने जब कहा, ‘मैं सर्वत्र कृष्णमय देखती हूँ’, तब सखियाँ बोलीं, ‘कहाँ, हम तो उन्हें नहीं देखतीं तुम प्रलाप तो नहीं कर रही हो?’ श्रीमती बोलीं, ‘सखियों, नेत्रों में अनुराग का अंजन लगा लो, तभी उन्हें देखोगी।’ (विजय से) तुम्हारे ब्राह्मसमाज ही के भजन में है – ‘प्रभो, बिना अनुराग के यज्ञ-यागादि करके क्या तुम्हें जाना जा सकता है?’

“यह अनुराग, यह प्रेम, यह सच्ची भक्ति, यह प्यार यदि एक बार भी हो तो साकार और निराकार दोनों मिल जाते हैं।”

ईश्वर-दर्शन उनकी कृपा बिना नहीं होता

विजय – महाराज, क्या किया जाय जो ईश्वर-दर्शन हो।

श्रीरामकृष्ण – चित्तशुद्धि के बिना ईश्वर के दर्शन नहीं होते। कामिनी-कांचन में पड़कर मन मलिन हो गया है, उसमें जंग लग गया है। सुई में कीच लग जाने से उसे चुम्बक नहीं खींच सकता, मिट्टी साफ कर देने ही से चुम्बक खींचता है। मन का मैल नेत्रजल से धोया जा सकता है। ‘हे ईश्वर, अब ऐसा काम न करूँगा’ यह कहकर यदि कोई अनुताप करता हुआ रोये तो मैल धुल जाता है। तब ईश्वररूपी चुम्बक मनरूपी सुई को खींच लेता है। तब समाधि होती है, ईश्वर के दर्शन होते हैं।

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“परन्तु चेष्टा चाहे जितनी करो, बिना उनकी कृपा के कुछ नहीं होता। उनकी कृपा बिना उनके दर्शन नहीं मिलते। और कृपा भी क्या सहज ही होती है? अहंकार का सम्पूर्ण त्याग कर देना चाहिए। मैं कर्ता हूँ, इस ज्ञान के रहते ईश्वर-दर्शन नहीं होते। भाण्डार में अगर कोई हो, और तब घर के मालिक से अगर कोई कहे कि आप खुद चलकर चीजें निकाल दीजिए, तो वह यही कहता है, ‘है तो वहाँ एक आदमी, फिर मैं क्यों जाऊँ?’ जो खुद कर्ता बन बैठा है, उसके हृदय में ईश्वर सहज ही नहीं आते।

“कृपा होने से दर्शन होते हैं। वे ज्ञानसूर्य हैं। उनकी एक ही किरण से संसार में यह ज्ञानालोक फैला हुआ है। उसी से हम एक-दूसरे को पहचानते हैं और संसार में कितनी ही तरह की विद्याएँ सीखते हैं। अपना प्रकाश यदि वे एक बार अपने मुँह के सामने रखें तो दर्शन हो जाएँ। सार्जेण्ट रात को अंधेरे में हाथ में लालटेन लेकर घूमता है, पर उसका मुँह कोई नहीं देख पाता। पर उसी लालटेन के उजाले में वह सब को देखता है और आपस में सभी एक दूसरे का मुँह देखते हैं।

“यदि कोई सार्जेण्ट को देखना चाहे तो उससे विनती करे, कहे – ‘साहब, जरा लालटेन अपने मुँह के सामने लगाइए; आपको एक नजर देख लूँ।’

“ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवन्, एक बार कृपा करके आप अपना ज्ञानालोक अपने श्रीमुख पर धारण कीजिए, मैं आपके दर्शन करूँगा।

“घर में यदि दीपक न जले तो वह दारिद्र का चिह्न है। हृदय में ज्ञान का दीपक जलाना चाहिए। ‘हृदय-मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाकर ब्रह्ममयी का श्रीमुख देखो’।”

विजय अपने साथ दवा भी लाए हैं। श्रीरामकृष्ण के सामने पीएँगे। दवा पानी में मिलाकर पी जाती है। श्रीरामकृष्ण ने पानी मँगवाया। श्रीरामकृष्ण अहेतुक कृपासिन्धु हैं; विजय किराये की गाड़ी या नाव द्वारा आने में असमर्थ हैं, इसलिए कभी कभी वे खुद आदमी भेजकर उन्हें बुला लेते हैं। इस बार बलराम को भेजा था। किराया बलराम देंगे। विजय बलराम के साथ आए हैं। शाम के समय विजय, नवकुमार और उनके दूसरे साथी बलराम की नाव पर चढ़े। बलराम उन्हें बागबाजार के घाट पर उतार देंगे। मास्टर भी साथ हो गए।

नाव बागबाजार के अन्नपूर्णाघाट पर लगायी गयी। जब ये लोग उतरकर बागबाजार में बलराम के मकान के निकट पहुँचे तब चाँदनी फैलने लगी थी। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी है। ठण्डी का मौसम है, थोड़ी थोड़ी ठण्डी लग रही है।

हृदय में श्रीरामकृष्ण की आनन्दमय मूर्ति का चिन्तन तथा उनके अमृतोपम उपदेशों का मनन करते हुए विजय, बलराम, मास्टर आदि अपने अपने घर पहुँचे।

□ □ □

परिच्छेद २०

परिच्छेद २०

भक्तों के प्रति उपदेश

बाबूराम आदि के साथ 'स्वाधीन इच्छा' के सम्बन्ध में वार्तालाप।

श्री तोतापुरी का आत्महत्या का संकल्प

श्रीरामकृष्ण तीसरे प्रहर के बाद दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे के पश्चिमवाले बरामदे में वार्तालाप कर रहे हैं। साथ बाबूराम, मास्टर, रामदयाल आदि हैं। दिसम्बर १८८२ ई.। बाबूराम, रामदयाल तथा मास्टर आज रात को यहीं रहेंगे। बड़े दिनों की छुट्टी हुई है। मास्टर कल भी रहेंगे। बाबूराम नये नये आये हैं।

श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) - “ईश्वर सब कुछ कर रहे हैं, यह ज्ञान होने पर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। केशव सेन शम्भु मल्लिक के साथ आया था। मैंने उससे कहा, वृक्ष के पत्ते तक ईश्वर की इच्छा के बिना नहीं हिलते। 'स्वाधीन इच्छा' है कहाँ? सभी ईश्वर के अधीन हैं। नंगा* उतने बड़े ज्ञानी थे जी, वे भी पानी में डूबने गए थे! यहाँ पर ग्यारह महीने रहे। पेट की पीड़ा हुई, रोग की यन्त्रणा से घबड़ाकर गंगा में डूबने गए थे। घाट के पास काफी दूर तक जल कम था। जितना ही आगे बढ़ते हैं, घुटनेभर से अधिक जल नहीं मिलता। तब उन्होंने समझा; समझकर लौट आए। एक बार अत्यन्त अधिक बीमारी के कारण मैं बहुत ही जिद्दी हो गया था। गले में छुरी लगाने चला था! इसलिए कहता हूँ, 'माँ, मैं यन्त्र हूँ, तुम यन्त्री; मैं रथ हूँ, तुम रथी; जैसा चलाती हो वैसा ही चलता हूँ, जैसा कराती हो वैसा ही करता हूँ'।”

श्रीरामकृष्ण के कमरे में गाना हो रहा है। भक्तगण गाना गा रहे हैं; उसका भावार्थ इस प्रकार है :-

(१) “हे कमलापति, यदि तुम हृदयरूपी वृन्दावन में निवास करो तो हे भक्तिप्रिय, मेरी भक्ति सती राधा बनेगी। मुक्ति की मेरी कामना गोपनारी बनेगी। देह नन्द की पुरी बनेगा, और प्रीति माँ यशोदा बन जाएगी। हे जनार्दन, मेरे पापसमूहरूपी गोवर्धन को धारण करो। इसी समय काम आदि कंस के छः चरों को विनष्ट करो। कृपा की बंसरी बजाते


* श्री तोतापुरी (श्रीरामकृष्णदेव के वेदान्त-साधना के गुरू); नागा, सम्प्रदाय के होने कारण श्रीरामकृष्ण उन्हें 'नंगा' कहते थे।

दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद २० | १३३

दिसम्बर १८८२ | परिच्छेद २० | १३३

हुए मेरे मनरूपी गाय को वशीभूत कर मेरे हृदयरूपी चरागाह में निवास करो। मेरी इस कामना की पूर्ति करो, यही प्रार्थना है। इस समय मेरे प्रेमरूपी यमुना के तट पर आशारूपी वट के नीचे कृपा करके प्रकट होकर निवास करो। यदि कहो कि गोपालों के प्रेम में बन्दी होकर ब्रजधाम में रहता हूँ, तो यह अज्ञानी ‘दाशरथि’ तुम्हारा गोपाल, तुम्हारा दास बनेगा।”

(२) “हे मेरे प्राणरूपी पिंजरे के पक्षी, गाओ न। ब्रह्मरूपी कल्पतरु पर बैठकर, हे पक्षी, तुम प्रभु के गुण गाओ न। और साथ ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष-रूपी पके फलों को खाओ न।”

नन्दनबागान के श्रीनाथ मित्र अपने मित्रों के साथ आये हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर कहते हैं, “यह देखो, इनकी आँखों में से भीतर का सब कुछ दिखायी पड़ रहा है, खिड़की के काँच में से जिस प्रकार कमरे के भीतर की सभी चीजें देखी जाती हैं।' श्रीनाथ, यज्ञनाथ ये लोग नन्दनबागान के ब्राह्मपरिवार के हैं। इनके मकान पर प्रतिवर्ष ब्राह्मसमाज का उत्सव होता था। बाद में श्रीरामकृष्ण उत्सव देखने गये थे।

सायंकाल को मन्दिर में आरती होने लगी। कमरे में छोटे तखत पर बैठकर श्रीरामकृष्ण ईश्वर-चिन्तन कर रहे हैं। धीरे धीरे भावमग्न हो गए। भाव शान्त होने पर कहते हैं, “माँ, उसे भी खींच लो। वह इतने दीन भाव से रहता है, तुम्हारे पास आना-जाना कर रहा है!”

श्रीरामकृष्ण भाव में क्या बाबूराम की बात कह रहे हैं?

बाबूराम, मास्टर, रामदयाल आदि बैठे हैं। रात के आठ-नौ बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण समाधि-तत्त्व समझा रहे हैं। जड़ समाधि, चेतन समाधि, स्थित समाधि, उन्मना समाधि।

विद्यासागर और चंगेजखान। क्या ईश्वर निष्ठुर हैं? श्रीरामकृष्ण का उत्तर

सुख-दुःख की बात चल रही है। ईश्वर ने इतना दुःख क्यों बनाया?

मास्टर – विद्यासागर प्रेमकोप से कहते हैं, “ईश्वर को पुकारने की क्या आवश्यकता है! देखो चंगेजखाँ ने जिस समय लूटमार करना आरम्भ किया उस समय उसने अनेक लोगों को बन्द कर दिया। धीरे धीरे करीब एक लाख कैदी इकट्ठे हो गए। तब सेनापतियों ने आकर कहा, 'हुजूर, इन्हें खिलाएगा कौन? इन्हें साथ रखने पर भी हमारे लिए विपत्ति है। क्या किया जाए? छोड़ने पर भी विपत्ति है।' उस समय चंगेजखाँ ने कहा, 'तो फिर क्या किया जाए? उनका वध कर डालो।' इसलिए कचाकच काट डालने का आदेश हो गया! इस हत्याकाण्ड को तो ईश्वर ने देखा। कहाँ, निवारण भी तो नहीं किया। वे हैं, तो रहें। मुझे उनकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। मेरा तो कोई भला न हुआ!”

१३४श्रीरामकृष्णवचनामृतदिसम्बर १८८२

श्रीरामकृष्ण – क्या ईश्वर का काम, वे किस उद्देश्य से क्या करते हैं समझा जा सकता है? वे सृष्टि, पालन, संहार सभी कर रहे हैं। वे क्यों संहार कर रहे हैं, हम क्या समझ सकते हैं? मैं कहता हूँ, माँ, मुझे समझने की आवश्यकता भी नहीं है। बस, अपने चरणकमल में भक्ति दो। मनुष्य-जीवन का उद्देश्य है इसी भक्ति को प्राप्त करना। और सब माँ जानें। बगीचे में आम खाने को आया हूँ, कितने पेड़, कितनी शाखाएँ, कितने करोड़ पत्ते हैं – यह सब हिसाब करने से मुझे क्या मतलब? मैं आम खाता हूँ, पेड़ और पत्तों के हिसाब से मेरा क्या सम्बन्ध?

आज रात में बाबूराम, मास्टर और रामदयाल श्रीरामकृष्ण के कमरे में जमीन पर सोये।

आधी रात, दो-तीन बजे का समय होगा, श्रीरामकृष्ण के कमरे में बत्ती बुझ गयी है। वे स्वयं बिस्तर पर बैठे बीच बीच में भक्तों के साथ बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण और बाबूराम, मास्टर प्रभृति भक्त – दया और माया – कठिन साधना और ईश्वर दर्शन

श्रीरामकृष्ण (मास्टर आदि भक्तों के प्रति) – देखो, दया और माया ये दो पृथक् पृथक् चीजें हैं। माया का अर्थ है, आत्मीयों के प्रति ममता – जैसे बाप, माँ, भाई, बहन, स्त्री, पुत्र इन पर प्रेम। दया का अर्थ है सर्व भूतों में प्रेम, समदृष्टि। किसी में यदि दया देखो, जैसे विद्यासागर में, तो उसे ईश्वर की दया जानो। दया से सर्वभूतों की सेवा होती है। माया भी ईश्वर की ही है। माया द्वारा वे आत्मीयों की सेवा करा लेते हैं। पर इसमें एक बात है। माया अज्ञानी बनाकर रखती है और बद्ध बनाती है। परन्तु दया से चित्तशुद्धि होती है और धीरे धीरे बन्धन-मुक्ति होती है।

चित्तशुद्धि हुए बिना भगवान् के दर्शन नहीं होते। काम, क्रोध, लोभ, इन सब पर विजय प्राप्त करने से उनकी कृपा होती है, तब उनके दर्शन होते हैं। तुम लोगों को बहुत ही गुप्त बातें बता रहा हूँ। काम पर विजय प्राप्त करने के लिए मैंने बहुतकुछ किया था। आनन्द-आसन के चारों ओर 'जय काली' जय काली' कहते हुए कई बार प्रदक्षिणा की थी।

“मेरी दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में, जब उस देश में था, उस समय वह स्थिति-समाधि की स्थिति – प्राप्त हुई थी। मैदान में से जाते जाते जो कुछ देखा उससे मैं विह्वल हो पड़ा था। ईश्वरदर्शन के कुछ लक्षण हैं। ज्योति देखने में आती है, आनन्द होता है, हृदय के बीच में गुर-गुर करके महावायु उठती है।”

दूसरे दिन बाबूराम, रामदयाल घर लौट गए। मास्टर ने वह दिन व रात्रि श्रीरामकृष्ण के साथ बितायी। उस दिन उन्होंने मन्दिर मे ही प्रसाद पाया।

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परिच्छेद २१

परिच्छेद २१

मारवाड़ी भक्तों के साथ

तीसरा पहर बीत गया है। मास्टर तथा दो-एक भक्त बैठे हैं। कुछ मारवाड़ी भक्तों ने आकर प्रणाम किया। वे कलकत्ते में व्यापार करते हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण से कहा, "आप हमें कुछ उपदेश कीजिए।" श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मारवाड़ी भक्तों के प्रति) - देखो 'मैं और मेरा' दोनों अज्ञान हैं। 'हे ईश्वर, तुम कर्ता हो और यह सब तुम्हारा है' इसका नाम ज्ञान है। और 'मेरा' क्योंकर कहोगे? बगीचे का कर्मचारी कहता है, 'मेरा बगीचा', परन्तु कोई अपराध करने पर मालिक उसे निकाल देता है। उस समय ऐसा साहस नहीं होता कि वह आम की लकड़ी का बना अपना सन्दूक भी बगीचे से बाहर ले जाय! काम, क्रोध आदि जाने के नहीं। ईश्वर की और उनका मुँह घुमा दो। कामना, लोभ करना हो तो ईश्वर को पाने के लिए कामना, लोभ करो। विचार करके उन्हें भगा दो। हाथी जब दूसरों के केले के पेड़ खाने जाता है, तो महावत उसे अंकुश मारता है।

"तुम लोग तो व्यापार करते हो। जानते हो कि धीरे धीरे उन्नति करनी होती है। कोई पहले अण्डी पीसने की घानी खोलता है और फिर अधिक धन होने पर कपड़े की दूकान खोलता है। इसी प्रकार ईश्वर के पथ में आगे बढ़ना पड़ता है। बने तो बीच बीच में कुछ दिन निर्जन में रहकर उन्हें अच्छी तरह से पुकारो।

"फिर भी जानते हो? समय न होने पर कुछ नहीं होता। किसी किसी का भोग-कर्म काफी बाकी रह जाता है। इसीलिए देरी होती है, फोड़ा कच्चा रहते चीरने पर हानि पहुँचाता है। पककर जब मुँह निकलता है, उस समय डाक्टर चीरता है। लड़के ने कहा था, 'माँ, अब मैं सोता हूँ। जब मुझे शौच लगे तब तुम जगा देना।', माँ ने कहा, 'बेटा, शौच लगने पर तुम खुद ही उठ जाओगे मुझे उठाना न पड़ेगा' "(सब हँसते हैं)।

मारवाड़ी भक्त और व्यापार में मिथ्या वचन - रामनाम संकीर्तन

मारवाड़ी भक्तगण बीच बीचमें श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए मिठाई, फल, सुगंधि मिश्री आदि लाते हैं। परन्तु श्रीरामकृष्ण साधारणतः उन चीजों का सेवन नहीं करते। कहते हैं, वे लोग अनेक झूठी बातें कहकर धन कमाते हैं। इसलिए उपस्थित मारवाड़ियों को

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१३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत

वार्तालाप के भीतर से उपदेश दे रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - देखो, व्यापार करने में सत्य की टेक नहीं रहती। व्यापार में तेजी-मन्दी होती रहती है। नानक की कहानी में है, उन्होंने कहा, "असाधु की चीजें खाने गया तो मैंने देखा कि वे सब खून से लथपथ हो गयी हैं!' साधु को शुद्ध चीज देनी चाहिए। मिथ्या उपाय से प्राप्त की हुई चीजें नहीं देनी चाहिए। सत्यपथ द्वारा ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।'*

"सदा उनका नाम लेना चाहिए। काम के समय मन को उनके हवाले कर देना चाहिए। जिस प्रकार मेरी पीठ पर फोड़ा हुआ है, सभी काम कर रहा हूँ, परन्तु मन फोड़े में ही है। रामनाम लेना अच्छा है। जो राम दशरथ का बेटा है, उन्होंने जगत् की सृष्टि की है, वे सर्वभूतों में हैं। और वे अत्यन्त निकट हैं, वे ही भीतर और बाहर हैं।

“वही राम दशरथ का बेटा, वही राम घट-घट में लेटा। वही राम जगत् पसेरा वही राम सब से न्यारा।।”


* सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यक् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। (मुण्डकोपनिषद् ३।१।५) सत्यमेव जयते नानृतम्। - (मुण्डकोपनिषद्, ३।१।६)

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

परिच्छेद २२

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परिच्छेद २२

राखाल. प्राणकृष्ण, केदार आदि भक्तों के साथ

(१)

समाधि में

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के अपने कमरे में भक्तों के साथ बैठे हैं। दिनरात भगवत्प्रेम में – ब्रह्ममयी माता के प्रेम में – मस्त रहते हैं।

फर्श पर चटाई बिछी है। आप उसी पर आकर बैठ गए। सामने हैं प्राणकृष्ण और मास्टर। श्री राखाल* भी कमरे में बैठे हुए हैं। हाजरा महाशय घर के बाहर दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में बैठे हुए हैं।

जाड़े का मौसम है – पूस का महीना। सोमवार, दिन के आठ बजे हैं। पहली जनवरी १८८३। श्रीरामकृष्ण शाल ओढ़े हुए हैं।

इस समय श्रीरामकृष्ण के अनेक अन्तरंग भक्त आने-जाने लगे हैं। लगभग सालभर से नरेन्द्र, राखाल, भवनाथ, बलराम, मास्टर, बाबूराम, लाटू आदि भक्त सदा आते-जाते रहते हैं। इनके आने के सालभर पूर्व से राम, मनोमोहन, सुरेन्द्र और केदार आया करते हैं।

लगभग पाँच महीने हुए होंगे, जब श्रीरामकृष्ण विद्यासागर के ‘बादुड़बागान’ वाले मकान में पधारे थे। दो महीने पूर्व आप श्री केशव सेन के साथ विजय आदि ब्राह्मभक्तों को लेकर नाव पर आनन्द करते हुए कलकत्ता गए थे।

श्री प्राणकृष्ण मुखोपाध्याय कलकत्ते के श्यामपुकुर मुहल्ले में रहते हैं। पहले इनका जनाई मौजे में निवास था। ये ‘एक्सचेंज’ विभाग के बड़े बाबू हैं। नीलाम के काम की देखरेख करते हैं। पहली पत्नी के कोई सन्तान न होने के कारण उनकी सम्मति से उन्होंने दूसरी बार विवाह किया था। दूसरी पत्नी के एक पुत्र हुआ है। वही इनकी इकलौती सन्तान है। श्रीरामकृष्ण पर इनकी बड़ी भक्ति है। शरीर कुछ स्थूल होने के कारण कभी कभी


* इन्हें श्रीरामकृष्ण की अभीष्टदेवी काली ने श्रीरामकृष्ण को उनका मानस पुत्र बतलाया था; ये ही बाद में स्वामी ब्रह्मानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए और रामकृष्ण संघ के प्रथम संचालक हुए थे।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

१३८श्रीरामकृष्णवचनामृत१ जनवरी, १८८३

श्रीरामकृष्ण इन्हें ‘मोटा ब्राह्मण’ कहकर पुकारते थे। ये बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। लगभग नौ महीने हुए होंगे, श्रीरामकृष्ण ने भक्तों के साथ इनका निमन्त्रण स्वीकार किया था। इन्होंने बड़े आदर से सब को भोजन कराया था।

श्रीरामकृष्ण जमीन पर बैठे हुए हैं। पास ही टोकरीभर जलेबियाँ रखी हैं – किसी भक्त ने लायी हैं। आपने जलेबी का एक टुकड़ा तोड़कर खाया।

श्रीरामकृष्ण (प्राणकृष्ण आदि से हँसते हुए) – देखा, मैं माता का नाम जपता हूँ, इसीलिए ये सब चीजें खाने को मिलती हैं। (हास्य)

“परन्तु वे लौकी-कोहड़े जैसे फल नहीं देती – वे देतीं हैं अमृतफल – ज्ञान, प्रेम, विवेक, वैराग्य!”

कमरे में छः-सात साल की उम्र का एक लड़का आया। इधर श्रीरामकृष्ण की भी बालकों जैसी अवस्था है। जैसे एक बालक किसी दूसरे बालक को देखकर खाने की चीज छिपा लेता है जिससे वह छीनाझपटी न करे, वैसे ही श्रीरामकृष्ण की अवस्था उस बालक को देखकर होने लगी। वे उस जलेबियों की टोकरी को हाथों से ढककर छिपाने लगे। फिर धीरे से उन्होंने उसे एक ओर हटाकर रख दिया।

प्राणकृष्ण गृहस्थ तो हैं परन्तु वे वेदान्तचर्चा भी करते हैं, कहते हैं, “ब्रह्म ही सत्य है, संसार मिथ्या; मैं वही हूँ – सोऽहम्।” श्रीरामकृष्ण उन्हें समझाते हैं – “कलिकाल में प्राण अन्नगत है, कलिकाल में नारदीय भक्ति चाहिए।

“वह विषय भाव का है, बिना भाव के कौन उसे पा सकता है?”

बालकों की तरह हाथों से जलेबियों की टोकरी छिपाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये।

(२)

भावराज्य व रूपदर्शन

श्रीरामकृष्ण समाधि में मग्न हैं। काफी समय हुआ, भाव के आवेश में पूर्ण बने बैठे हैं। न देह डुलती है, न पलकें गिरती हैं; साँस भी चलती है या नहीं, जान नहीं पड़ता।

बड़ी देर बाद आपने एक लम्बी साँस छोड़ी – मानो इन्द्रियराज्य में फिर लौट रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (प्राणकृष्ण से) – वे केवल निराकार नहीं, साकार भी हैं। उनके रूप के दर्शन होते हैं। भाव और भक्ति से उनके अनुपम रूप के दर्शन मिलते हैं। माँ अनेक रूपों में दर्शन देती हैं।

“कल माँ को देखा, गेरुए रंग का अँगरखा पहने हुए। मेरे साथ बातें कर रही थीं।

“और एक दिन मुसलमान लड़की के रूप में मेरे पास आयी थीं। कपाल पर

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १३९

१ जनवरी, १८८३परिच्छेद २२१३९

तिलक, पर शरीर पर कपड़ा नहीं। – छः-सात साल की बालिका, मेरे साथ साथ घूमने और मुझसे हँसी-ठट्ठा करने लगी।

गौरांग-दर्शन – रति की माँ के वेष में माँ

“जब मैं हृदय के घर पर था तब गौरांग के दर्शन हुए थे, वे काली धारीदार धोती पहने थे।

“हलधारी कहता था, वे भाव और अभाव से परे हैं। मैंने माँ से जाकर कहा, 'माँ', हलधारी ऐसी बात कह रहा है, तो क्या रूप आदि मिथ्या हैं?' माँ रति की माँ के रूप में मेरे पास आयीं और बोलीं, 'तू भाव में ही रह।' मैंने भी हलधारी से यही कहा।

“कभी कभी यह बात भूल जाता हूँ, इसलिए कष्ट भोगना पड़ता है। भाव में न रहने के कारण दाँत टूट गए। अतएव 'दैववाणी' या 'प्रत्यक्ष' न होने तक भाव में ही रहूँगा – भक्ति ही लेकर रहूँगा। क्यों – तुम क्या कहते हो?”

प्राणकृष्ण – जी हाँ।

भक्ति का अवतार क्यों? राम की इच्छा

श्रीरामकृष्ण – और तुम्हीं से क्यों पूछूँ? इसके भीतर कोई एक रहता है। वही मुझे इस तरह चला रहा है। कभी कभी मुझमें देवभाव का आवेश होता था, तब बिना पूजा किये चित्त शान्त न होता था।

“मैं यन्त्र हूँ, और वे यन्त्री। वे जैसा कराते हैं, वैसा ही करता हूँ। जो कुछ बुलवाते हैं, वही बोलता हूँ।”

श्रीरामकृष्ण ने भक्त रामप्रसाद के एक गीत की पंक्तियाँ उदाहरण के लिए कहीं; उसका अर्थ यह है –

‘भवसागर में अपना डोंगा बहाकर उस पर बैठा हुआ हूँ। जब ज्वार आयगी, तब पानी के साथ साथ मैं भी चढ़ता जाऊँगा और जब भाटा हो जायगा, तब उतरता जाऊँगा।’

श्रीरामकृष्ण – जूठी पत्तल हवा के झोंके से उड़कर कभी तो अच्छी जगह पर गिरती हैं, कभी नाली में गिर जाती है – हवा जिधर ले जाती है उधर ही चली जाती है।

“जुलाहे ने कहा – राम की मर्जी से डाका डाला गया, राम ही की मर्जी से मुझे छोड़ दिया।

“हनुमान ने कहा – हे राम, मैं शरणागत हूँ, शरणागत हूँ; – यही आशीर्वाद दीजिये कि आपके पादपद्मों में मेरी शुद्धा भक्ति हो, फिर कभी आपकी भुवनमोहिनी माया में मुग्ध न होऊँ।

“मेढक मरते हुए बोला – राम, जब साँप पकड़ता है, तब तो 'राम, रक्षा करो' कहकर चिल्लाता हूँ, परन्तु अब जब कि राम ही के धनुष से बिंधकर मर रहा हूँ, तो चुप्पी

१४०श्रीरामकृष्णवचनामृत१ जनवरी, १८८३

साधनी ही पड़ी।

“पहले प्रत्यक्ष दर्शन होते थे – इन्हीं आँखों से, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ। अब भावावेश में दर्शन होते हैं।

“ईश्वर-लाभ होने पर बालकों का-सा स्वभाव हो जाता है। जो जिसका चिन्तन करता है, वह उसकी सत्ता को भी पाता है। ईश्वर का स्वभाव बालकों जैसा है। खेलते हुए बालक जैसे घरौंदा बनाते, बिगाड़ते और उसे फिर से बनाते हैं, उसी तरह वे भी सृष्टि, स्थिति और प्रलय कर रहे हैं। बालक जैसे किसी गुण के वश में नहीं है, उसी प्रकार वे भी सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हैं।

“इसीलिए जो परमहंस होते हैं, वे दस-पाँच बालक अपने साथ रखते हैं – अपने पर उनके स्वभाव का आरोप करने के लिए।”

आगरपाड़ा से एक बीस-बाईस साल का लड़का आया हुआ है। जब यह आया है, श्रीरामकृष्ण को इशारा करके एकान्त में ले जाता है और वहीं चुपचाप अपने मन की बात कहता है। यह अभी हाल ही में आने-जाने लगा है। आज वह निकट आकर फर्श पर बैठा।

प्रकृतिभाव तथा कामजय। सरलता और ईश्वरलाभ

श्रीरामकृष्ण (उसी लड़के से) – आरोप करने पर भाव बदल जाता है। प्रकृति के भाव का आरोप करो तो धीरे धीरे कामादि रिपु नष्ट हो जाते हैं। ठीक स्त्रियों के-से हाव-भाव हो जाते हैं। नाटक में जो लोग स्त्रियों का काम करते हैं, उन्हें नहाते समय देखा है, – स्त्रियों की ही तरह दाँत माँजते और बातचीत करते हैं।

“तुम किसी शनिवार या मंगलवार को आओ।”

(प्राणकृष्ण से) – “ब्रह्म और शक्ति अभिन्न हैं। शक्ति न मानो तो संसार मिथ्या हो जाता है; हम, तुम, घर, परिवार – सब मिथ्या हो जाते हैं। आद्याशक्ति के रहने ही के कारण संसार का अस्तित्व है। बिना आधार के कोई चीज कभी ठहर सकती है? बिना खूँटियों के न तो ढाँचा खड़ा रह सकता है और न उस पर सुन्दर मूर्ति ही बन सकती है।

“विषयबुद्धि का त्याग किये बिना चैतन्य नहीं होता है – ईश्वर नहीं मिलते। उसके रहने ही से कपटता आ जाती है। बिना सरल हुए कोई उन्हें पा नहीं सकता।

‘ऐसी भक्ति करो घट भीतर, छोड़ कपट चतुराई।
सेवा बन्दी और अधीनता, सहज मिलें रघुराई।।’

“जो लोग विषयकर्म करते हैं, आफिस का काम या व्यवसाय करते हैं, उन्हें भी सच्चाई से रहना चाहिए। सच बोलना कलिकाल की तपस्या है।

प्राणकृष्ण –

“अस्मिन् धर्मे महेशि स्यात् सत्यवादी जितेन्द्रियः।
परोपकारनिरतो निर्विकारः सदाशयः।।”

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १४१

१ जनवरी, १८८३ | परिच्छेद २२ | १४१

“यह महानिर्वाणतन्त्र में लिखा है।”

श्रीरामकृष्ण – हाँ, इसकी धारणा करनी चाहिए।

(३)

श्रीरामकृष्ण का यशोदा-भाव तथा समाधि

श्रीरामकृष्ण अपनी छोटी खाट पर जा बैठे हैं। भाव में तो सदा ही पूर्ण रहते हैं। भावनेत्रों से राखाल को देख रहे हैं। देखते देखते हृदय में वात्सल्यरस उमड़ने लगा, अंग पुलकित होने लगे। क्या यशोदामाता इन्हीं नेत्रों से गोपाल को देखा करती थीं?

देखते ही देखते फिर आप समाधिलीन हो गए। कमरे के भीतर जितने भक्त बैठे हुए थे, वे सभी आश्चर्य से चकित और स्तब्ध होकर श्रीरामकृष्ण के भाव की यह अद्भुत अवस्था देख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण कुछ प्रकृतिस्थ होकर कहते हैं, – “राखाल को देखकर इतनी उद्दीपना क्यों होती हैं? जितना ही ईश्वर की ओर बढ़ते जाओगे, ऐश्वर्य की मात्रा उतनी ही घटती जाएगी। साधक पहले दशभुजा मूर्ति देखता है। वह ईश्वरी मूर्ति है। इसमें ऐश्वर्य का प्रकाश अधिक रहता है। इसके बाद द्विभुजा मूर्ति देखता है। तब दस हाथ नहीं रहते – इतने अस्त्र-शस्त्र नहीं रहते। इसके बाद गोपाल-मूर्ति के दर्शन होते हैं, कोई ऐश्वर्य नहीं – केवल एक छोटे बच्चे की मूर्ति। इससे भी परे है – केवल ज्योति-दर्शन।

यथार्थ ब्रह्मज्ञान की अवस्था – विचार और आसक्ति का त्याग

“उन्हें प्राप्त कर लेने पर, उनमें समाधिमग्न हो जाने पर, फिर ज्ञान-विचार नहीं रह जाता।

“ज्ञान-विचार तो तभी तक है, जब तक अनेक वस्तुओं की धारणा रहती है – जब तक जीव, जगत्, हम, तुम, यह ज्ञान रहता है। जब एकत्व का यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब चुप हो जाना पड़ता है। जैसे त्रैलंगस्वामी।

“ब्रह्मभोज के समय नहीं देखा? पहले खूब गुलगपाड़ा मचता है। ज्यों-ज्यों पेट भरता जाता है, त्यों-त्यों आवाज घटती जाती है। जब दही आया, तब सुप्-सुप्, बस और कोई शब्द नहीं। इसके बाद ही निद्रा – समाधि! तब आवाज जरा भी नहीं रह जाती!

(मास्टर और प्राणकृष्ण से) – “कितने ही ऐसे हैं जो ब्रह्मज्ञान की डींग मारते हैं परन्तु नीचे स्तर की वस्तुएँ लेकर मग्न रहते हैं। – घर-द्वार, धनमान, इन्द्रियसुख। मोनूमेण्ट (Monument) के नीचे जब तक रहा जाता है, तब तक गाड़ी, घोड़ा, साहब, मेम – यही सब दीख पड़ते हैं। ऊपर चढ़ने पर सिर्फ आकाश, समुद्र लहराता हुआ दीख पड़ता है। तब घर-द्वार, घोड़ा-गाड़ी, आदमी – इन पर मन नहीं रमता, ये सब चींटी जैसे

१४२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १ जनवरी, १८८३

नजर आते हैं।

“ब्रह्मज्ञान होने पर संसार की आसक्ति चली जाती है, काम-कांचन के लिए उत्साह नहीं रहता – सब शान्त हो जाता है। काठ जब जलता है तब उसमें चटाचट आवाज होती है और कडुवा धुआँ भी निकलता है। जब सब जलकर खाक हो जाता है, तब फिर शब्द नहीं होता। आसक्ति के जाते ही उत्साह भी चला जाता है। अन्त में केवल शान्ति रह जाती है।

“ईश्वर की ओर कोई जितना ही बढ़ता है, उतनी ही शान्ति मिलती है। शान्तिः शान्तिः शान्तिः प्रशान्तिः। गंगा के निकट जितना ही जाया जाता है, उतना ही शीतलता का अनुभव होता जाता है। नहाने पर और भी शान्ति मिलती है।

“परन्तु जीव, जगत, चौबीस तत्त्व, इनकी सत्ता उन्हीं की सत्ता से भासित हो रही है। उन्हें छोड़ देने पर कुछ भी नहीं रह जाता। एक के बाद शून्य रखने से संख्या बढ़ जाती है। एक को निकाल डालो तो शून्य का कोई अर्थ नहीं रह जाता।”

प्राणकृष्ण पर कृपा करने के लिए श्रीरामकृष्ण अपनी अवस्था के सम्बन्ध में कह रहे हैं।

ब्रह्मज्ञान के उपरान्त ‘भक्ति का मैं’

श्रीरामकृष्ण – ब्रह्मज्ञान के पश्चात् समाधि के पश्चात्, कोई कोई नीचे उतरकर ‘विद्या का मैं’, ‘भक्ति का मैं’ लेकर रहते हैं। हाट का क्रय-विक्रय समाप्त हो जाने पर भी कुछ लोग अपनी इच्छानुसार हाट में ही रह जाते हैं, जैसे नारद आदि। वे ‘भक्ति का मैं’ लेकर लोकशिक्षा के लिए संसार में रहते हैं। शंकराचार्य ने लोकशिक्षा के लिए ‘विद्या का मैं’ रखा था।

“आसक्ति का नाममात्र भी रहते वे नहीं मिल सकते। सूत के रेशे निकले हुए हों तो वह सुई के भीतर नहीं जा सकता।

“जिन्होंने ईश्वर को प्राप्त कर लिया है, उनके काम-क्रोध नाममात्र के हैं, जैसे जली रस्सी, – रस्सी का आकार तो है परन्तु फूकने से ही उड़ जाती है।

“मन से आसक्ति के चले जाने पर उनके दर्शन होते हैं। शुद्ध मन से जो निकलेगी, वह उन्हीं की वाणी है। शुद्ध मन जो है, शुद्ध बुद्धि भी वही है और शुद्ध आत्मा भी वही है; क्योंकि उन्हें छोड़ कोई दूसरा शुद्ध नहीं है।

“परन्तु उन्हें पा लेने पर लोग धर्माधर्म को पार कर जाते हैं।”

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से भक्त रामप्रसाद का एक गीत गाने लगे। उसका मर्म यह है –

“मन, चल, सैर करने चले। कालीरूपी कल्पलता के नीचे तुझे चारों फल मिल

१ जनवरी, १८८३

परिच्छेद २२

१४३

जायेंगे। अपनी प्रवृत्ति और निवृति, इन दो पत्नियों में से तू निवृति को साथ लेना और उसी के पुत्र विवेक से तत्त्व की बातें पूछना।।”

(४)

श्रीरामकृष्ण का श्रीराधा-भाव

श्रीरामकृष्ण दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे में आकर बैठे हैं। प्राणकृष्ण आदि भक्त भी साथ साथ आये हैं। हाजरा महाशय बरामदे में बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हुए प्राणकृष्ण से कह रहे हैं –

“हाजरा कुछ कम नहीं है। अगर यहाँ (स्वयं को लक्ष्य करके) कोई बड़ी दरगाह हो तो हाजरा छोटी दरगाह है!” (सब हँसते हैं।)

नवकुमार आकर बरामदे के दरवाजे में खड़े हुए और भक्तों को देखते ही चले गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहंकार की मूर्ति है!”

दिन के आठ बज चुके हैं। प्राणकृष्ण ने प्रणाम करके चलने की आज्ञा ली; उन्हें कलकत्ते के मकान में लौट जाना है।

एक वैरागी गोपीयन्त्र (एकतारे की सूरत-शकल का) लेकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में गा रहे हैं। गीतों का आशय यह है –

(१) “नित्यानन्द का जहाज आया है। तुम्हें पार जाना हो तो इस पर आ जाओ। छः गोरे इसमें सदा पहरा देते हैं। उनकी पीठ ढाल से घिरी हुई है और कमर में तलवार लटक रही है। सदर दरवाजा खोलकर वे धनरत्न लुटा रहे हैं।”

(२) “इस समय घर छा लेना। इस बार वर्षा जोरों की होगी, सावधान हो जाओ, अदरक का पानी पीकर अपने काम पर डट जाओ। जब श्रावण लग जायगा तब कुछ भी न सूझेगा। छप्पर का टाट सड़ जायगा। फिर तुम घर न छा सकोगे। जब झकोरे लगेंगे, तब छप्पर उड़ जायगा। घर वीरान हो जायगा। तुम्हें भी फिर स्थान बदलना ही पड़ेगा।”

(३) “किसके भाव में नदिये में आकर दीन वेश धारण कर तुम स्वयं हरि होते हुए भी हरिनाम गा रहे हो? किसका भाव लेकर तुमने यह भाव और ऐसा स्वभाव धारण किया? कुछ समझ में नहीं आता।”

श्रीरामकृष्ण गाना सुन रहे हैं, इसी समय श्री केदार चटर्जी आये और उन्होंने प्रणाम किया। वे आफिस की पोशाक में – चोगा, अचकन पहने और घड़ी चेन लगाये हुए आये हैं। परन्तु ईश्वरचर्चा होती है तो आपकी आँखों से आँसुओ की झड़ी लग जाती है। आप बड़े प्रेमी हैं। हृदय में गोपीभाव विराजमान है।

केदार को देखकर श्रीरामकृष्ण के मन में वृन्दावन की लीला का उद्दीपन होने लगा। आप प्रेमोन्मत्त हो गये। खड़े होकर केदार को सुनाते हुए इस मर्म का गाना गाने लगे –