भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

सुगम चिकित्सा

१२६

५—जिसकी हड्डी आदि टूट गई हो, उसे आराम से किसी तरह उपयुक्त स्थान पर पहुँचाना ।

घाव के प्रकार—घाव कई प्रकार के होते हैं ।

१—जिनमें से खून निकले ।

२—जिनमें से खून न निकले ।

३—धारवाले औजार; जैसे छुरी, चाकू, आदि के घाव ।

४—कुचले हुए घाव, जैसे गाड़ी आदि के नीचे आ जाने से हो जाते हैं । जिनमें थोड़ा खून निकलता हो ।

५—नील पड़ना—कुचले घाव में से खून न निकलने से नीला हो जाता है । इसमें नीली दर्दनाक सूजन हो जाती है ।

६—नोकदार शस्त्र के घाव; जैसे तीर, सूरई, काँटा आदि के इन घावों का रूप छोटा होता है, पर बहुत गहरे होते हैं । यदि ये घाव नाड़ी या धमनी तक पहुँचते हैं तो मृत्यु कर देते हैं ।

७—वन्दूक की गोली आदि के घाव । इनमें कभी-कभी हड्डी भी टूट जाती है । आज-कल डाक्टर एक यन्त्र की सहायता से गोली निकाल सकते हैं ।

८—जहरी जानवरों के काटने के घाव; जैसे पागल कुत्ते साँप आदि के ।

अधिक चोट लगने से सूजन बड़ी, लाल और पीड़ावाली होती है और चोट के जगह पर चमड़ी के नीचे खून के इकट्ठे होने

कुचलना

से एक नीले रक्त की दर्दनाक सूजन हो जाती है । मौच आजाने से भी यही बात होती है ।

१२७

चोट और अकस्मात

१—चोट की जगह को शरीर से ऊँचा करलो; यदि पाँव पर चोट हो तो लेट जाना चाहिए और कुछ देर तक चलना बन्द रखना चाहिए। यदि हाथ में हो तो हाथ को उपचार रूमाल से गले में लटका देना चाहिए। सिर के नीचे तकिया न लगाना चाहिए, बल्कि एक आदमी उसकी टाँगें उठाए रहे। अगर जरूरत हो तो नकली ढङ्ग से साँस चलानी चाहिए। अगर वह पानी पी सके तो पानी पीने को दो। पर बेहोशी की हालत में पानी मुँह में मत डालो। बेहोशी की हालत में पानी फेफड़े में चला जाता है, इससे नुकसान पहुँचने का डर है।

मामूली घाव, जिससे खून निकल रहा हो, दो हालतों में प्राण-नाश करते हैं। या तो उनका खून बन्द न हो या घाव में मैल-मिट्टी या कोई जहरीली चीज़ रह जाय। इसलिए उचित है कि उसी वक्त खून बन्द करने और घाव को होशियारी से धोकर साफ़ करने का बन्दोबस्त करना चाहिए। हाथों को घाव में लगाने से पहले राख, मिट्टी या साबुन से धो लेना चाहिए और घावों के आस-पास से कपड़ों को दूर रखना चाहिए।

सबसे अच्छा तो यह है कि घाव को गर्म किये पानी को ठण्डा करके धोना चाहिए। पर ऐसा न बन पड़े तो साफ़ ठण्डे पानी से ही काम लेना चाहिए। पट्टी लगाने के लिए साफ़ रुई और कपड़ा काम में लाना चाहिए। यह पट्टी और रुई छेड़ घण्टे तक पानी में उबाल लिये जायें।

खून बन्द करने का उपाय—पहले यह देखना चाहिए कि खून

— सुगम-चिकित्सा

१२८

नाड़ी, धमनी या-वारीक नाड़ियों-में से किसमें से निकल रहा है। यदि वारीक नाड़ी में से खून निकलता हो तो घबड़ाने की कोई बात नहीं है, वह खुद ही बन्द हो जायगा।

सूजन के लिए चोट के स्थान पर बरफ रखना या ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर लपेट देना चाहिए। दर्द ज्यादा हो या चोट पुरानी पड़ गई हो तो गर्म पानी में कपड़ा भिगोकर और तिचोड़-कर उस जगह को सेकना चाहिए। लेकिन चोट अगर जोड़ पर हो तो जरूर डाक्टर को दिखाने की जल्दी करनी चाहिए।

अगर चोट बड़ी हो, जैसे सिर के बल ऊपर से गिर गया हो, जिससे दिमाग में कुछ नुकसान हो गया हो या पैरों के बल गिर गया हो जिससे कमर में धमक लग गई हो। ऐसा रोगी अगर बेहोश हो गया हो, सांस और नाड़ी की गति धीमी हो गई-हो तो उसकी दशा चिन्ता-जनक समझनी चाहिए। खासकर चोट यदि सिर में हो तो मरने का ज्यादा खतरा है। ऐसे आदमी को जल्दी ही पीठ के बल लिटा देना चाहिए और उसके चारों ओर हरगिज भीड़ न होने देना चाहिए। यदि जङ्गल या सफर में ऐसा मौका हो तो जहाँतक बन पड़े बिना हिलाये किसी डाक्टर के पास पहुँचा देना चाहिए। कपड़े ढीले कर देने चाहिए। पानी पास में हो तो उससे मुँह पर छींटे मारना चाहिए।

नाड़ी से जब खून निकलता है तब उसकी धार बड़े जोर से लेकिन रुक-रुक के निकलती है, जैसे पिचकारी का पानी निकलता है। इस खून का रङ्ग विलकुल लाल होता है। यदि धमनी से खून

१२६

चोट और अकस्मात

निकलता होगा तो वह कुछ गाढ़ा और काला होगा। उसकी धार ऊँची नहीं उछलेगी; जैसे सोते में जल बहता है, उस तरह निकलेगा। ये धमनियाँ चमड़ी के नीचे तमाम शरीर में हैं, किन्तु हाथ-पाँव में ऊपरी भाग में उनके जाल बिछे हैं। वारीक नाड़ियों से बहुत धीरे-धीरे पानी की बूँदों के समान खून घाव के मुँह पर इकट्ठा हो जाता है। ये शरीर के रग-रग में फैली हैं।

वारीक नाड़ियों का खून सिर्फ ठण्डे पानी के धोने से, बरफ लगाने से, या अपने-आप हवा लगाने से, बंद हो जायगा। धमनी से निकलते खून को बंद करने की कोशिश करती बार यह याद रहे कि धमनियाँ में खून हृदय की ओर जाता है। इसलिए हाथ या पाँव को थड् और हृदय से ऊँचा करके घाव के उस तरफ दबाव पहुँचाओ जियर से खून घाव के मुँह पर आ रहा हो। (देखो चित्र नं० ६)

जवतक खून बन्द न हो, हाथ या पाँव उठाये रहना चाहिए। अगर बरफ पास हो तो उसे कपड़े में लपेट कर घाव पर रखना चाहिए। हाथ-पाँव पर कोई गहना बगैरा कोई चीज़ हो तो उसे हटा देना चाहिए। खून बन्द होजने पर उस पर पट्टी लगा देना चाहिए। हाथ के घाव में हाथ को रुमाल से बांध कर लटका देना चाहिए।

नाड़ी से खून निकलना भयंकर है। भटपट खून बन्द करने का उपाय करना चाहिए।

घाववाले अङ्ग को थड् से ऊँचा उठाना ही जरूरी है। फिर

सुगम चिकित्सा

१३०

खास नाड़ी को दवाइयों या घाव में साफ़ उंगली को डालकर कटी हुई नाड़ी के मुँह को दबाना चाहिए। यदि उँगली से भी खून बहना न रुके तो—साफ़ महीन कपड़े का टुकड़ा या रुमाल घाव में भरकर उसे खून दबाना चाहिए। यदि हो सके तो किसी डाक्टर को फौरेन बुलवा लो। पर यदि घायल को किसी सेवारी में डालकर अस्पताल लेजाया जाय तो यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि थंड या हृदय से घाववाली जगह ऊँची रहे (देखो चित्र नं० ७)

पर अगर निकट अस्पताल बगैरा न हो तो यही ठीक है कि कपड़े या रूई की एक गेंद-सी बनाकर उसे घाव पर खून दबा कर बांध देनी चाहिए।

यदि रूई या बरछ न हो तो धोती या तौलिया में एक गॉठ देकर वही बाँध पर बाध देना चाहिए। या रुपया, ठीकरा, या साफ पत्थर का टुकड़ा ही रुमाल बगैरा में लपेटकर उसी तरह बांध देना चाहिए।

परन्तु यदि घाव गर्दन में है, तो घाव में उंगली देकर दबाने के अलावा दूसरा उपाय नहीं है। क्योंकि ऊपर बताई हुई रीति से कपड़ा लपेटने से तो मृत्यु ही होने का भय है।

गले और कन्धे के घाव के लिए यथासम्भव शीघ्र चिकित्सक बुला लेना ही ठीक है।

हाथ या पाँवों में से यदि खून किसी तरह बन्द न हो तो हाथ या पाँव के ऊपर रबर का मोटा चौड़ा फीता या नली खून कसकर बाँध देना चाहिए। यह न मिले तो एक रुमाल को ही ऐंट कर

चित्र नं० ७ घाववाला अङ्ग 'धड़' हृदय से ऊपर रहना चाहिए, इससे खून कम बहेगा।

चित्र नं० ८ घाव का खून बन्द करने विधि

A blank white page with a small black speck near the top center.

१२१

चोट और अकस्मात

बांध देना चाहिए। फिर एक लकड़ी लेकर उसे खून मरोड़िये जब तक कि खून निकलना बन्द न हो। (देखो चित्र नं० ८) पर यह जान लेना चाहिए कि हाथ पैर को इस तरह कसना खतरनाक है। यदि दो-दोई घण्टे इस तरह हाथ-पांव कसे रहे तो नीचे का भाग मुर्दा हो जाता है। इसलिए यह उपाय तभी काम में लाना चाहिए कि जब और उपाय काम न दें।

जब घाव का खून बन्द होजाय तब उसे सावधानी से धोना चाहिए, जिससे घाव में मैल-मिट्टी न रहे। आइडोफार्म ( पीले रङ्ग की मीठी गन्धवाली अंग्रेजी दवा ) मिल जाय तो थोड़ी घाव पर छिड़क कर और साफ रूई लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिए।

यदि घायल बेहोश हो तो खून बन्द कर चुकने पर पट्टी बाँधने के बाद उसे होश में लाने के उपाय करने चाहिए। यदि वह पानी पी सकता हो तो माशा-भर नमक पानी में घोलकर उसे पिलाना चाहिए, फिर नीचा सिर और ऊँचा पैर करके लिटा दीजिए। यानी तकिया सिर की जगह पांवों के नीचे लगा दीजिए। ऐसा करने से मस्तक में रक्त पहुँचने से जल्दी होश आयागा।

कभी-कभी रेल बगैरा से हाथ-पाँव विलकुल कट जाने पर विलकुल खून नहीं निकलता। ऐसी हालत में ठण्डे पानी से घाव को धीरे-धीरे धोकर साफ रूई कपड़े में कटे हाथ-पाँव को लपेट देना चाहिए। परन्तु जल्दी-से-जल्दी उसे अस्पताल पहुँचा दो क्योंकि ऐसे घाव जल्दी सड़ने लगते हैं, जिससे रोगी को बहुत तकलीफ होती है।

सुगम वाक्य

१३२

कभी-कभी आदमी पेट के बल पत्थर बगैरा पर गिर पड़े, तो अमाशय से खून की उल्टी होती है। यह खून काले रक्त का आता है। पर यदि लाल रक्त का आवे तो समझना खून की कय कि खून मुँह फेफड़े या गले से आया है। ऐसे आदमी को ठण्डा पानी या बरफ देना चाहिए।

पट्टी डेढ़ या ढाई इञ्च चौड़ी, पतली गजी की हो, जो धोबी की धुली हो पर जिनमें कलफ न हो। उन्हें आध घण्टे तक पानी में पकाकर सुखा लेना चाहिए, रुई भी बहुत साफ धुनी हुई हो। परन्तु कुसमय में रुमाल, धोती, तौलिया बगैरा से भी काम चल सकता है। पर हर हालत में पट्टी रंगीन न होनी चाहिए। पट्टी बाँधने की सब से सरल विधि-कपड़े को तिकोना करके सरलता से बाँध देना है। आवश्यकता होने पर इसके कई पत करके, लम्बी पट्टी के समान भी बाँधा जा सकता है।

सिर के धावों के लिए भी पट्टी, बड़े रुमाल व अंगोष्ठि से, दोनों किनारों के बीच थोड़ा फाड़ने से बना लेना चाहिए।

परन्तु गले में हाथ बाँधने के लिए या कुहनों में कूले, हाथ पैर आदि धावों के लिए इस तरह बाँधने की जरूरत नहीं, सिर्फ हाथ को एक रुमाल या अंगोष्ठि में लटकाना लेना चाहिए।

कम चौड़े स्थानों पर जैसे उँगलियों, हाथ-पाँव, जाँघ, धड़ आदि के लिए इन पट्टियों की जरूरत पड़ती है।

इन पट्टियों का बाँधना और लपेटना जरा मुश्किल है। पट्टियों

पट्टियां बांधने के जुदे-जुदे तरीके

सिर पर पट्टी बांधना

चित्र नं० ६

चित्र नं० १०

चित्र नं० ११

चित्र नं० १२ कोहनी और घुटने पर पट्टी बांधने की विधि

चित्र नं० १३ कलाई पर पट्टी बांधने की विधि

१३३

चोट और अकस्मात

पहले से लपेटकर तैयार रखनी चाहिए, फिर उन्हें पिन या गॉठ बाँधकर रहने दो। पट्टी बाँधने से घाव के किनारे मिले रहते हैं, दवाव पड़ने से खून कम निकलता है, और मक्खी, थूल आदि से घाव सुरक्षित रहता है। (पट्टी बाँधने के अलग-अलग तरीकों के लिए सामने के पृष्ठ पर चित्र नं० ६ से १७ तक देखिए)।

छत से गिर जाने या पेड़ पर से गिर जाने पर हड्डी टूट जाय या जोड़ उखड़ जाय तो सावधान रहो जोड़ और हड्डियों में चोट और जोड़ बैठाने का काम अनाड़ी आदमी से न कराओ। बरना रोगी हमेशा के लिए अयोग्य हो जायगा।

मोच प्रायः टखने या कलाई में आती है। सन्धि के एकदम मुड़ जाने से उसको बाँधने वाली नसें थोड़ी खिंचकर फट जाती हैं।

मोच कभी-कभी वारीक नालियां और कभी जोड़ की थैली के फट जाने से मोच की जगह सूज जाती है। खून और सन्धि का पानी जमा हो जाने से ऐसा होता है। गॉठ पर दर्द होता है, पर जोड़ हिल सकता है। मोच आते ही जल्द-से-जल्द हृदय की ओर दवाकर मालिश शुरू कर दो। इस-पन्द्रह मिनट तक ऐसा करने से दर्द, संजुन कम हो जाती है। अगर दर्द बहुत ही ज्यादा हो तो ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर जोड़ पर दवाकर लपेट दो।

जोड़ पर बहुत जोर पड़ने से जोड़ उखड़ जाता है। सबसे अधिक कन्धे के कूले के जोड़ हट जाया करते जोड़ हट जाना है। कभी-कभी जबड़े और कुहनी तथा घुटने के जोड़ भी उखड़ जाते हैं।

सुगम चिकित्सा

१३४

इतका उपाय यह है कि उसड़े जोड़ों को खून अच्छी तरह मिलाओ। हाथ का जोड़ उसड़ गया हो तो अंगोढ़्या बाँधकर हाथ गले में लटकाओ। और चौबीस घंटे के भीतर-भीतर जोड़ डाक्टर को दिखा दो।

जोड़ उसड़े हुए मरीज को उठने न दो और न उसे हाथ-पाँव फैलाने या सीधा करने दो, उसड़ी जगह पर गीला कपड़ा लपेट दो। और भटपट अस्पताल पहुँचा दो। अगर बढ़त पर चुस्त कपड़ा हो तो उसे उतारो मत, फाड़ डालो। अगर दर्द ज्यादा हो और आदमी मजबूत हो तो उसे कुछ नशा खिला दो।

हड्डी टूटने के दो प्रकार होते हैं; एक वह जिसमें हड्डी टूटकर भी घाव नहीं होता; दूसरे घाव होकर हड्डी बाहर आ जाती है।

पिछले प्रकार में प्राण का भय है। अगर जरा भी गड़-बड़ हुई तो जखम के सड़ जाने का अन्देशा है। अगर विघ्न न हुआ तो बालक और जवान की हड्डी डेढ़ मास में जुड़ जायगी। बूढ़ों को कुछ ज्यादा कष्ट होगा। दूटी हड्डी की पहचान यह है कि वह अङ्ग हिल नहीं सकता, दर्द बहुत होता है और नीचे का हिस्सा फूल जाता है।

अगर सिर्फ एक ही हड्डी टूटी हो तो उस हिस्से को चारों ओर से किसी चीज़ से लपेट दो। बाँस की खपच्चियाँ या पंखे इस काम के लिए अच्छी हैं। अगर घाव हो तो पहले घाव को बाँध दो और बीमार को भटपट अस्पताल पहुँचा दो।

चित्र नं० १४ हाथ में चोट लगने पर गले में हाथ लटकाने की विधि

चित्र नं० १५ रगत में पट्टी बांधने की विधि

चित्र नं० १६ उँगली पर पट्टी बांधने की विधि

चित्र नं० १७ पैर में पट्टी बांधने की विधि

A completely blank white page with no visible content, text, or markings.

१३५

चोट और अकस्मात

अकस्मात—

अक्सर अचानक कभी-कभी दुर्घटनायें हो जाती हैं। उनके कुछ घरेलू उपाय भी यहाँ लिखते हैं।

अगर कपड़ों में आग लग जाय तो फौन धरती में लेट जाना चाहिए। आग फौन बुझ जायगी। भागना नहीं चाहिए, भागने से हवा लग-लग कर आग और फैलेगी। कोई कम्बल, टाट, लाजम, या मोटा कपड़ा शरीर पर लपेट लिया जाय। जो अङ्ग जल जाय वहाँ यह दवा लगावे।

१—आधसेर चूना के पानी में आधसेर नारियल का तेल डाल कर हिलाओ, और रूई के फाये से लगाओ। बार-बार लगाते रहने से ठण्डक पहुँचेगी और रोगी को आराम हो जायगा। आलू को पानी में घिसकर लगाने से भी फायदा होता है। जख्म होजाय तो उसपर तिल के तेल को फाये से चुपड़कर इसली की छाल का चूर्ण वुरक दे। नारियल का तेल दो छटाँक, रात पिसी हुई दो छटाँक, कपूर तीन तोला, मिलाकर खूब घोटो, फिर इसमें समाये उतना पानी मिलाओ, इस मरहम से जले को फौन आराम होता है।

पानी में डूबने से आदमी इसलिए मर जाता है कि हवा फँफड़े में नहीं पहुँचती। अगर डूबता आदमी निकाल पानी में डूबना लिया जाय तथा साँस लेता हो तो वह बच जायगा।

पानी में डूबे आदमी को भटपट पानी से निकालकर शरीर से कपड़ा दूर-कर शरीर को पोंछ डालो, देखो शरीर गर्म हो तो

सुगम चिकित्सा

१२६

इलाज करो, बरना फजूल है। अक्सर इूवे हुए आदमी की नब्ज और साँस बन्द हो जाती है। इससे घबराओ मत, होशियारी से उसके आँखों की पुतली देखो। अगर तुम्हारी परछाई उसमें दीखे तो जीवित समझो बरना मृतक।

पहले मुंह और नथुनों को साफ करो। मुंह खोलो और जीभ को धीरे-धीरे आगे कोखोंको जिससे हवा भीतर जाय। गर्दन और छाती पर से कसा हुआ कपड़ा हटा दो।

रोगी को चित्त लिटाकर तकिया लगा दो, कि सिर और कन्धे उभर जाँय, फिर रोगी के हाथ कोहनी पर से पकड़कर यहाँ तक उठाओ कि सिर के ऊपर मिल जाय। दो सेकन्ड बाद पीछे वाहें नीचे झुका दो और पसलियें मिलाकर कंस कर दवाओ। एक घण्टे तक तथा जरूरत हो तो और देर तक करते रहो। एक मिनट में १५ बार यह कसरत कराओ, इससे रोगी का साँस चलने लगेगा।

इस तरकीब से साँस चलने लगे और दिल काम करने लगे; तो रोगी को रूई के गर्म फायों से या ऊनी कपड़े की गद्दी से या गर्म पानी की बोटलों से सेको। और गुनगने तेल की मालिश करो, तथा गर्म विछौने पर सुलादो। होश में आने पर गर्म दूध पीने को दो।

गर्मी में बहुत देर कड़ी धूप में काम करना या रास्ता चलने से अत्यन्त प्यास, ज्वर, बेहोशी, आँखें लाल, लू लगना भ्रम आदि होकर बीमार बेहोश हो जाता है।

इसीको लू लगना कहते हैं।

१३७

चोट और श्रकस्मान

ऐसे बीमार को ठण्डी जगह में लिटाओ, फिर केले आदि के पत्ते से ठण्ढे पानी के छींटे दो, चन्दन या नीम की लकड़ी घिसकर बार-बार पिलाओ। कभी कैरी आग में भून उसका पना बना कर पिलाओ। सुगन्धित चीज सुंघाओ।

अगर स्वास बन्द होजाय तो ऊपर लिखी विधि से सांस चलाओ। गले में कुछ अटक फाँसी लगना या गला घुटना रहा होतो धीरे-धीरे गुद्दी में सुकी मारो कि वह चीज नीचे को खिसक जाय।

ठण्ढे पानी के छींटे दो। इससे फायदा न हो तो कोई तेज बेहोशी सूथनी नाक में फूंक दो। पान में खाने का चूना और नवसादर मिलाकर सुंघाओ। सांस बन्द हो गया हो तो ऊपर लिखी क्रिया करो।

इसमें पहला काम तो यह है कि उल्टी करादो। एक बड़े चम्मच में राई या नमक गर्म पानी में मिलाकर खूब पिलाने से उल्टी हो जायगी। अफीम और धतूरे से गहरी नींद आती जहर और नशे हैं। इसमें बीमार को सोने मत दो। टहलाओ, मुंह पर पानी के छींटे दो। खाने की तम्बाकू पानी में घोलकर पिलाने से भी उल्टी हो जाती है। संखिया खा लिया हो तो फौन एक पाव-भर घी पिला दो। संखिया थोड़ा होगा तो पच जायगा वरना उल्टी हो जायगी।

घी बार-बार पिलाते रहो। प्यास हो तो दूध पिलाओ। दूध और घी संखिये की परम औषध है। भँग का नशा होने पर

सुगम चिकित्सा

१३८

अरहर की दाल पानी में भिगोकर पिलाओ। शराब का जशा चढ़ गया हो तो नीबू या इमली पानी में मिलाकर पिलाओ। पीतल के वर्तन में पितलाया हुआ पदार्थ खाने से जो जहर चढ़ गया हो तो मीठा तेल गर्म दूध में पिलाओ।

काटे हुए स्थान के दो अंगुल ऊपर तुरन्त कसकर डोरी से बांध दो, फिर जहाँ तक दोनों दांतों का घाव हो उसकी साँप काटना जड़ तक का मांस काट डालो। या लाल लोहे से जलादो। गर्म पानी डालते रहो जिससे खून बहना रुक जाय। अगर जहर शरीर में रम गया हो तो यह दवा दोः—

रीठा दो नग, नवसादर एक माशा, चौटेनी पाँच नग, एक तोला रेशम के कपड़े में पोटली बाँधो और कोयलों पर जला लो, जब धुआँ न रहे तब पोटली उठाकर ठण्डा कर तीन हिस्से करो; एक हिस्सा दवा दस तोला घी में मिलाकर रोगी को चटादो, कुछ घाव पर लगादो। दो-दो घण्टे बाद फिर दोनों खुराक देदो। फायदा होगा। साँप के काटे का शक हो तो नीम के पत्ते खिलाओ। मीठा लगे तो समझो साँप ने काटा है। मरीच को सोने मत दो। पास काँसी की थाली रख, जोर-जोर से बजाओ इससे खून में लहर पैदा न होगी। बीमार को दौड़ाओ। याद रखो साँप के काटे को सोने देना मौत को बुलाना है। साँप का काटा आदमी सोकर फिर नहीं उठता।

विच्छू—एक छटाँक पानी में एक छटाँक नमक पीसकर घोल दो। और काटे हुए स्थान पर बार-बार मलो।

१३६

चोट और श्रंक्स्मात

फौरन जख्म चीरकर खून निकाल दो या लोहे से दाग दो । जख्म को लाल मिर्च या सुर्मा पीसकर पागल कुत्ता या सियार भर दो । और ऐसे बीमारों के जो अस्प- ताल हैं, वहाँ रोगी को पहुँचा दो ।

बर्—जहाँ डंक सारे वहाँ नमक का पानी मलों, या कपूर का तेल मलों ।

किसी जानवर का दांत या नाखून का जहर—पीपल, गूलार, नीम या बड़ की छाल घिसकर लेप कर देने अच्छा हो जाता है ।

काम के नुसखे—

१—काले उर्द हुक्के में रखकर पीने से ह्रिचकी में आराम होता है ।

२—पुरानी चलनी का चमड़ा जलाकर उसकी राख गुदा पर छिड़कने से वृन्नों की काँच निकलना आराम होता है ।

३—नीम के पत्ते जलाकर राख पानी में घोलकर निथार लो, पीछे पानी जलाकर खार बनालोगे । दो भाशे खाने से पथरी और गुरदे का दर्द आराम होता है ।

४—टेसू के फूल पानी में झौटाकर पेड़ पर सेक करने से पेशाब का घनद खुलता है ।

५—लहसुन को दूध में झौटाओ, जब खोआ होजाय तो घी में भुनो, पीछे शहद मिलाकर अबलेह बनालोगे । सब प्रकार की वादी और लकवे को फायदा करता है ।

६—इमली का चीन्ना भाड़ में भुनवाकर छिलका निकाल लो,