सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
सुगम चिकित्सा
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परवाल—
१८—पहले वालों को उखाड़ लो, फिर नवसादर वकरी के पिन्ने में मिलाकर पतला-पतला लेप करें।
सिर दर्द कई कारणों से होता है। कभी-कभी गर्मी से भी होजाता है और बहुधा कब्ज से होता है। सिर के रोग इसलिए पहले उसके कारणों को दूर करे।
१—नौसादर, हल्दी तथा पान का चूना मिलाकर सूँघने से आधासीसी और दूसरे प्रकार का दर्द आराम होता है।
२—जौ का आटा पानी में घोल सिर पर लेप करने से गर्मी का सिर दर्द आराम होता है।
मिर्गी-पागलपन, हिस्टीरिया
या मिर्गी की बीमारी बच्चों और बड़ों को भी होती है। ऐसे आदमी चलते-चलते गिर जाते हैं। हाथ-पैर फेंकते हैं, मुंह से भाग गिराते हैं और आँखों की पुतली फैल जाती है। दाँती भिंच जाती है। बेसुध होजाते हैं। इस रोग के दौरे कभी-कभी तो कई दिनों में और कभी-कभी दिन में कई बार होते हैं।
१—जब मिरगी के दौरे हों तो सौंठ, मिर्च, पीपल, नौसादर, इन्द्रायन, कलौंजी इनमें जो-जो चीज मिल जाय, बारीक पीसकर नाक में फूँक दो। ठण्डे पानी के छींटे मुंह पर दे।
२—कूठ, सौंठ, कबाब चीनी, देवदारु प्रत्येक दस माशा। काला मोंगरा, काली मिर्च, अकरकरा, गजपीपल और सने के
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बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
बीज प्रत्येक दो तोला आठ माशा और सब दवाईयों के बराबर गूगल लेकर कूट-छान शहद में मिलाकर गोली बनावे। सात मासों की मात्रा है। सौंफ-सबेरे गुनगुने पानी के साथ लिंगले। यह मिरगी की बहुत अच्छी दवा है।
३—एक आत्मा-भर बच का चूर्ण शहद के साथ रोज़ चाटने से मुरगी आराम होती है।
४—मादा भेड़ के दाँत गले में लटकाने से बच्चों को मिरगी आराम होती है।
वह बीमारी है जो सिकं औरतों को ही होती है। इसकी शक्ति तो मिरगी जैसी ही होती है, पर इसका कारण गर्भाशय की हिस्टीरिया खराबी है। इस बीमारी के शुरु में छाती में दर्द, मन मँला रहना आदि लक्षण होते हैं। कोई-कोई स्त्री रोगी-चिलाती और हँसती है। अपने पर या दूसरों पर द्रोणारीयण करती है। लोग यह देख भूत-प्रेत का शक करने लगते हैं। यह रोग पुराना होने पर फिर नहीं आराम होता। इस का इलाज किसी स्त्री डाक्टर से कराना चाहिए। ब्राह्मी वृटी इस रोग की अच्छी दवा है। पेट की सफाई और मासिक धर्म को सफाई ठीक-ठीक होती चाहिए।
यह कई प्रकार का होता है। किसीमें रोगी को क्रोध और चिन्ता बनी रहती है। कोई-कोई रोगी हँसने-खेलने में पस्त रहता है। इस रोग में नींद बहुत कम आती है। पागल आदमी को बारम्बार जुलाब देना
पागलपन
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चाहिए। उसे अकेला न रहने दे, न डरावे, धमकावे। इस बीमारी के अलग-अलग सरकारी शफ़ाखाने बने होते हैं। यहाँ एक नुसखा देते हैं, यह पागलपन को बहुत आराम करता है—
बच, छोटी हरड, कूठ कडुआ, शतावर, गिलोय, चिरचिटा, वायविड्डङ्ग, शेखाहूली सब बराबर लेकर चूर्ण बनाना। चार माशा की मात्रा घी के साथ चाटना। इससे मय प्रकार के पागल को आराम होता है।
मुजाक होने से पेशाब की नाली में पहले जलन होती है फिर सफ़ेद और पीले रङ्ग का मवाद निकलता है। यह बीमारी जिस खी-पुरुष को होती है, उसके साथ सहवास करने से, उसकी धोती, तौलिया जिसमें मवाद लग गया हो, इस्तेमाल करने से या जहाँ उसने पेशाब, पाखाना किया हो, वहाँ से यह रोग लग जाता है। पर ऐसा बहुत कम होता है। मुख्य रोग लगने का कारण सहवास ही है।
सहवास के तीसरे दिन रोग के लक्षण जाहिर होते हैं। पहले पेशाब की नाली में खुजली और जलन तथा चुभने जैसा दर्द होता है। पेशाब करते समय तकलीफ़ होती है, और पतला पानी के जैसी चीज पेशाब की नाली से निकलती है। कुछ दिन बाद यही चीज गाढ़े मवाद के रूप में निकलने लगती है। इस बीमारी का अगर ठीक इलाज हो तो दो महीने में अच्छा हो जाता है। अगर सूजन पेशाब की नाली में पड़ गई तो महीनों और सालों तक बीमारी बनी रहती है। इस बीमारी से दिल में जोड़ों
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बड़ी-बड़ी बीमारियाँ
में, हड्डियों में और गुर्दे में बीमारियाँ हो जाती हैं, जो बहुत खतरनाक हैं। अगर इसका मवाद आँखों में छू जाय तो उसके अन्धे होजाने का खतरा है। बीमार को आराम से लेटना चाहिए। पानी बहुत पीना चाहिए। पानी में नींबू चिचोड़कर पीना फायदा करता है। दस्त में कब्ज़ हो तो दस्त साफ़ लाने की दवा लेनी चाहिए। इन्हीं में दर्द और सूजन ज्यादा हो तो गर्म पानी में थोड़ी-थोड़ी देर में भिगोना चाहिए। इससे दर्द मिटेगा। हाथ को साफ़ रखना चाहिए। खाने का सोड़ा दिन में दो-तीन बार आधा चम्मच, आधा गिलास पानी में मिलाकर पीना चाहिए। यह दवा भोजन के बाद एक या दो घण्टे बाद पीना चाहिए। और किसी अच्छे डाक्टर-वैद्य का इलाज करना चाहिए। नीचे लिखी दवा दुर्जाक की बहुत बड़िया दवा है—माजूफल, कल्था पपरिया, वंशलोचन, एक-एक तोला लेकर कपड्डहन कर चन्दन के तेल तीन तोला में मिला २४ गोली बनाना। प्रतिदिन चार से छः गोली तक पानी के साथ खाना और सिर्फ़ दूध-भात भोजन करना चाहिए। दो हफ़्ते में आराम हो जायगा।
वैरोन्जे का तेल जो अंग्रेजी दवावालों के यहाँ मिलता है इस बीमारी में बहुत फायदा करता है। पाँच से २० बूँदें तक वताशे या मिश्री में, दिन में पाँच-छ बार खाना चाहिए।
खियों में पुरषों से यह रोग लग जाता है। बे शुरु में शर्म से कहती नहीं। पीछे उन्हें अनेक रोग लग जाते हैं। ऐसी खियों को प्रमेह और बाँफ़ का रोग हो जाता है। उन्हें खाने में बड़ी दवा
सुगम चिकित्सा
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जो पुरुषों को दी जाती है देना चाहिए। और योनि-स्थान में पिच्छकारी देनी चाहिए। तथा जबतक आराम न हो पूरा विश्राम करना चाहिए, गर्म जल में बैठना भी फायदेमन्द है।
यह बड़ी धिनोनी बीमारी है। यह इस रोग के रोगी स्त्री-पुरुष के साथ सहवास करने से लग जाती है। यदि माता की बीमारी हुई और उसके गर्भ रह गया तो गर्भ में ही बालक को गर्मी भी वह बीमारी लग जाती है। यह रोग भी छूत से लग जाता है। अतः थोमास का हुस्का, कपड़े, विछौना इस्तैमाल न करना चाहिए।
सबसे पहले अण्डकोषों में या इन्द्री की सुपारी पर एक छोटी-सी फुन्सी उठती है। यह लक्षण सहवास के पाँच-छः दिन बाद होता है। इसके छः-सात हफ्ते बाद खसरे-खसरे जैसे दाने सारे शरीर पर निकल आते हैं। सिर दर्द, मितली होती है, भूख बन्द हो जाती है। गला बैठ जाता है। बगल और गुदा के आस-पास चेपवाले घाव दीख पड़ते हैं। बाल भड़ने लगते हैं।
महीनों और वरसों रोग के गुजर जाने पर रोग की तीसरी अवस्था आती है, जब बड़े गहरे घाव शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में निकलते हैं। नाक सड़ जाती है, और गिर पड़ती है। नाक की जगह सिर्फ छेद रह जाता है। खोपड़ी की हड्डी गल जाती है। अङ्ग की, और कर्हा की भी हड्डी गल सकती है। कभी-कभी इन्द्रिय गल-सड़ कर गिर जाती है।
रोग हुआ है, यह मालूम होते ही भट्ट-पट इलाज कर लेना
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बड़ी बड़ी बीमारियाँ
चाहिए। और अच्छे वैद्य-डाक्टर का इलाज करना चाहिए,, सटर-पटर दवा देकर रोगी का जीवन खतरे में न डालना चाहिए। फिर भी हम यहाँ एक अच्छा नुसखा लिखते हैं, और कोई उपाय न हो तो फिर यही नुसखा देना चाहिए।
१—पारा शुद्ध, अजवान खुरासानी, भिलावा, अजमोद, अस्पर्ज, प्रत्येक तीन-तीन माशा लेना, गुड़ पुराना तीन तोला चार माशा कूट-छानकर जंगली बेर के वरावर गोली बनाना। एक-एक गोली दोनों समय इस तरह निगलना कि दाँतों से न लगे। खिचड़ी, दाल-भात और गेहूँ का फुलका फीका खाय। खटाई वादी से बचे, पाँच दिन में आराम हो।
भिलावा और पारा शुद्ध करके डालना चाहिए। इनके शुद्ध करने की विधि अन्यत्र लिखी है। इस दवा को शुरू करने से पहले आधा जुलाव लेना जरूरी है। आराम होने पर खून साफ करने की यह दवा पीवे।
२—चिरायता, शाहतरा, छः-छः माशा, रात को मिट्टी के शकौरे में आघपाव पानी में भिगोदो। सुबह मल-छानकर शहद मिलाकर पियो। अगर ऊपर की दवा से सुँह आ जाय तो फटकरी के गराये करे। आराम होने पर भी परहेज रखे। घी ज्यादा खाय।
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स्त्रियों की बीमारियाँ
यह बीमारी अक्सर स्त्रियों को होती है। इसके कई कारण हैं। जो यहाँ विस्तार से नहीं लिखे जा सकते। लेकिन इसके दो मुख्य कारण होते हैं। या तो किसी बीमारी मासिक-धर्म को गड़बड़ी की वजह से खून की कमी होजाय, या किसी कारण से गर्भाशय और स्त्री अण्डकोषों का ठीक-ठीक काम न हो। इस बीमारी में कभी तो बहुत देर में श्राव होता है, या जल्द-जल्द होता है। कमर में दर्द, बेचैनी, भारीपन और सिर दर्द, की शिकायत रहती है।
१—बायविड्डः पाँच माशा, अजखर पाँच माशा, गुड़ पुराना तिवरसा तीन तोला, दालचीनी तीन माशा, गुलाब के फूल दो तोला सबको पाँच छटाँक पानी में पकाओ। दो छटाँक रहे तो गुनगुना छानकर पिलाओ। मासिक-धर्म के दिनों में दिन में दो बार देना चाहिए। सब प्रकार के कष्ट दूर होंगे। मासिक खुलकर होगा। वदन गर्म रखना चाहिए।
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स्त्रियों की बीमारियाँ
२—गर्भ पानी में बैठाना या पिचकारी लगाना भी अच्छा है। अक्सर औरतें इन दिनों गन्दी रहती हैं तथा गन्दे कपड़े का चिथड़ा काम में लाती हैं, यह बहुत बुरी बात है। कपड़ा साफ लिया जाय और बदल भी साफ रखवा जाय तथा ताजा और हल्का भोजन किया जाय।
इस रोग में चिकना, बदबूदार पतला या गाढ़ा लुआव-सा योनि से निकालता रहता है, कमर में दर्द, कभी-कभी भदर हल्का बुखार बना रहता है। यह श्राव कभी-कभी काला-पीला गर्भ फेनीला या लाल रंग का निकलता है।
शुरु-शुरु में इस रोग में हर तीसरे दिन फिनाइल की पिचकारी देना चाहिए। दो सेर गुनगुने पानी में दस बूँद फिनाइल डी काफी है। इसके बाद यह दवा देना चाहिए।
१—आंवला सूला एक पाव लेकर घी में धीमी आंचपर भून लो, बाद में चरावर कच्ची खांड मिला, कूट छानकर शहद में चटनी-सी बनालो। एक-एक तोला सुबह-शाम खाने से बहुत फायदा करता है।
२—मूँगे की भस्म भी बहुत गुणकारी है।
३—सुपारी पाक इस रोग की बढ़िया दवा है।
४—कच्चा पका केला तथा गूलर खाना बहुत गुण करता है। रक्तभदर—जिसे पैर जाना भी कहते हैं। अगर खून बहुत ज्यादा निकलता है, तो रोगी को ठण्डे पानी के टव में बैठाना।
शुभम चिकित्सा
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१—पुराने घड़े का ठीकरा पानी में घिसकर दे ।
२—चूल्हे की लाल मिट्टी चार माशा पानी के साथ फँकी दो ।
३—रसौत, आम की गुठली, जाम की गुठली, छाप के फूल, चौलाई की जड़, मुलहटी, वरावर लेकर, कूट-छान चूर्ण बनाकर छः-छः माशा सुबह-शाम चावल के धोवन के साथ दो ।
४—पुराना रक्त-प्रदर होने पर ये लड्डू बहुत गुण करते हैं ।
खिले हुए चने का बेसन एक पाव, घी ताजा एक पाव धीरे-धीरे आग पर भूने । पीछे ठण्डा करके एक पाव कच्ची खांड और दस तोला सेलखड़ी पीसकर मिला, एक छटांक के लड्डू बनालो । एक लड्डू रोज़ खाना चाहिए । खुराक ताजा और हल्की ।
गर्भावस्था में औरतों को बहुत से रोग होजाते हैं । बुखार,
गर्भिया सूजन, दस्त लगना, उल्टी, सिर घूमना, खून जाना, गर्भ में तकलीफ़ आदि । इनका इलाज
भी खास होता है । नहीं तो गर्भ गिरजाने का खतरा रहता है ।
१—बुखार होने पर लाल चन्दन, खस, मुलहटी, पद्मराख, तेजपात का काढ़ा, शहद और चीनी मिलाकर पिलाना चाहिए । दूध पीने को देना ।
२—दस्त लगने पर आम और जामुन की छाल का काढ़ा, चीनी, शहद मिलाकर पिलाना, धान की खील पानी में भिगोकर खाने को देना ।
३—कब्ज़ होनेपर दो तोला अरण्डी का तेल दूध में मिलाकर देना ।
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जियों की बीमारियाँ
४—सूजन होने पर—सूखी मूली, विसखपरा, गोखरू, ककड़ी के बीज, खीरे के बीज का काढ़ा चीनी मिलाकर देना।
५—सेहुड के पत्ते का रस सूजन पर मलने से या उपले की राख रगड़ने से सूजन आराम होती है।
६—जल्दी होने में जरा-सी अजवाइन गर्म पानी से फँकी करना चाद में एक पाव गर्म दूध पीना।
७—सिर दर्द करे या भारी हो तो बादाम या कद्दू का तेल सिर पर मालिश करना।
१—पहले महीने में धन्वा दीखे तो मुलहटी, सागवान के बीज और देयदारु छः-छः माशा लेकर पोटली बना एक पाव दूध में बराबर पानी मिला, ओंटाकर जब पानी जल गर्म श्राव जाय तब देना।
२—दूसरे महीने में काले तिल, मजीठ और सनावर पका कर देना।
३—तीसरे में अनन्तमूल और चौथे में मुलहटी और सौंफ़। पाँचवें में कटहली और खिरनी की छाल पकाकर देना।
४—सातवें महीने में सिंघाड़ा, कमल की डण्डी, किसमिस, कसेरु और मुलहटी। आठवें में कैयचेल, कटहली, ईख की जड़। और नवें में मुलहटी, अनन्तमूल पकाकर पिलाना।
५—अगर गर्भपात न रुके तो मुलतानी मिट्टी पानी में भिगोकर बही पानी लगतातर पीने को देना। डलीमें कपड़े की गद्दी भिगोकर पेड़ पर रखना। पलङ्ग का पायता ऊँचा रखना चाहिए।
सुगम चिकित्सा
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अगर बच्चा होते-होते रुक जाय, तो फौरेन डाक्टर को बुलाना चाहिए। अगर डाक्टर न मिले और रोगी की बच्चा होने में देर जान पर आबनी हो तथा बच्चा जिन्दा हो तो पाँच तोला अरपडी का तेल गर्भ दूध में रोगिणी को पिलाओ। दस मिनट में बच्चा हो जायगा।
बच्चा पेट में भर जाय तो—सेहुड़ का दूध गर्भणी के सिर में लगाना।
नाल न गिरे तो—सॉप की कॉचली की धूनी योनि में दो।
शूल—बच्चा होनेपर ज्यादा शूल हो तो जवाखार गर्भ पानी से देना।
बच्चा पैदा होने पर जबा को कम-से-कम छः तोला सोंठ जरूर खिला देनी चाहिए। यह काम पुरानी स्त्रियाँ खूब जानती हैं।
बच्चा होने के तीन-चार दिन बाद ज्वर चढ़े और लगातार कई दिन तक उतरे नहीं, तेज होता जाय तो भय है कि कहीं प्रसूत-ज्वर न हो गया हो, यह भयानक होता है। और प्रसूत-ज्वर जबा के प्राण पर खतरा होता है अतः उसका इलाज अच्छे वैद्य-डाक्टर से कराना चाहिए।
१—दशमूल का काढ़ा इसकी सबसे अच्छी दवा है। किसी अच्छे वैद्य से दशमूल खरीदना चाहिए।
थनेल—कभी-कभी दूध पीते-पीते बच्चा दुखी में सिर-मार देता है, तब थनेल का रोग हो जाता है। स्तन इसमें सूज जाता है।
१—धतूर का पत्ता और हल्दी पीसकर लेप करना चाहिए।
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स्त्रियों की श्रीमार्गियाँ
२—गर्म पानी से सेक करनी चाहिए ।
कभी-कभी दूध में खराबी हो जाती है, जिसे पीने से बच्चा बीमार हो जाता है । दूध की बूँद काँच की शीशी में पानी भरकर दूध दूषित हो टपकानी चाहिए । दूध घुल जाय तो अच्छा और नीचे बैठ जाय, तार-तार हो जाय तो खराब ।
१—दशमूल, नीम का पत्ता, सतावर, लाल चन्दन का काढ़ा पिलाने से दूध शुद्ध हो जाता है ।
२—दूध सूख जाने पर बन कपास की जड़, और ईख की जड़ें बराबर कांजी में पीसकर आधा तोला खाने को देना ।
३—सुहाग सोंठ, बघा पैदा होने पर खिलााने से जच्चा को बहुत गुण दिखाती है, ताकत देती है, शरीर को ठीक रखती है ।
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बच्चों की बीमारियाँ
बच्चों की बीमारी को पहचानने की रीति—बालक रोता हो और उसके मुँह में भाग आवे तो समझ लेना चाहिए कि उसके कपड़ों में जूँ है, जो बच्चों को काटती है। उसे ढूँढ निकाल देना चाहिए।
अगर बालक बार-बार अपने पैरों को पेट की ओर समेटे और पेट को दवाने या छूने न दे, बराबर रोता ही रहे तो जानना चाहिए कि पेट में दर्द है। आग पर गर्म हाथ करके पेट को सुहाता-सुहाता सेके। या रोगान गुल को गर्म करके पेट पर मल दे। बालक सोकर उठे और जीभ निकाले, इधर-उधर सिर हिलावे तो जानना चाहिए कि वह भूखा है; उसे तुरन्त दूध पिला देना चाहिए। एक करबट देर तक सोने से कोई चीज चुभने से या चींटी अथवा मच्छर के काटने से भी बालक रोता है, इसको अच्छी तरह देख-भाल लेना चाहिए। जो बालक ऐं-ऐं किये ही चला जाय, चुप न हो, रोता रहे तो समझना चाहिए कि कहीं न कहीं दर्द है। जहाँ दर्द होगा
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बच्चों की बीमारियाँ
वहाँ वह बारबार लुयेगा। वहाँ अगर दूसरा आदमी लुयेगा तो वह ज्यादा रोवेगा। जब बालक के मिर में दर्द होता है तो वह अपनी आँखें मुँद लेता है।
गुदा में दर्द होने से बालक को प्यास ज्यादा लगती है और वह बेहोश हो जाता है। दस्त बढ़वृद्धार आने लगे और उसका रक्त बदल जाय तो समझना चाहिए कि उसके पेट में कब्ज़ या बढ़हज्मी है। तब उसे रेवनचीनी का छिलका कूटकर सात रत्ती माँ के दूध या पानी में देना चाहिए। दस्त का रक्त भी बदल जायगा और पेट भी शाफ हो जायगा।
अगर दस्त का रक्त सफेद हो तो छोटी इलायची, पोदीता, पीपल, कालीमिर्च, कालानमक, सब चीजें बराबर ले कूटकर छान प्रतिदिन दोनों समय तीन-चार रत्ती देना चाहिए।
अगर बालक को मामूली दस्त आवे और जरा-जरा सा आवे खुलकर न हो तो गर्मपानी में थोड़ा अरएडी का तेल मिलाकर पिलाओ।
अगर पेंचिश हो तो साँफ को जरा-से पानी में पीसकर गुन-गुना पिला दो।
जब बालक के पेट में कीड़े पड़ जाते हैं तो वह बार-बार मूत्रेन्द्रिय को हाथ लगाता है, मलता है, सोतीवार गुदा और नाक को खुजाता है, दाँत किसकिसाता है। मेसी हालत में पहले एरएड का तेल गर्मपानी में पिलाओ। इससे आराम न हो तो यह काढ़ा पिलाओ—मोथा, नूहाकानी, त्रिफला, देवदारू, सैंजने के बीज इसके
सुगम चिकित्सा
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काढ़े में पीपल का चूर्ण और वायविडङ्ग का चूर्ण एक-एक रत्ती मिलाकर पिलावे। सब दवाइयों एक मारो, सबसे आठ गुना पानी लेना चाहिए। जब बालक रात को सोकर उठे और पेशाब करे तो उसके पिशाब का रङ्ग देखना चाहिए। अगर सफेद हो और जम जाय तो अजीर्ण समझना, लाल है तो ज्वर। ऐसी हालत में आठ माशा पानी में एक रत्ती क्लमीशोरा पोसकर देना चाहिए। या सोंफ का अर्क एक तोला, भुनी फिटकरी एक रत्ती, संतगिलोय एक रत्ती मिलाकर पिलाना। या गोखरू के काढ़े में आधा रत्ती शिलाजीत दें।
२ टूंडी पकना—नाल खींचने से बालक की टूंडी पक जाती है। उसमें यह मरहम महीन कपड़े पर लगावे। मोम एक तोला, अलसी का तेल ढाई तोला, जांगर एक माशा, पीसकर आग पर हल कर लो। जो सूजन हो तो पीली मिट्टी का एक ढेला आग में लालकर उसपर दूध डालो और टूंडी को बकारा दो।
३ खाल लग जाना—काँख, कोहनी, घोंट्ट, रान वा जांघ में ऐसे, कहींकी खाल विपक जाती है तो इसमें सरसों का तेल नित्य चुपड़ना चाहिए।
४ दूध डालना—पान का चूना एक तोला आध सेर गर्म पानी में घोल दो। जब नीचे बैठ जाय, पानी निथार लो। यह पानी कई बार दिन में पिलाना चाहिए।
५ दूध न पीना—बच्चा यदि दुखी न दावे तो या तो उसके पेट में दर्द है या मन्दगति है। कारण देखकर उसका इलाज करो।
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बच्चों की बीमारियाँ
६ हंसली जाना—यह हंसली एक हड्डी है, जो हंसली की भाँति गले में दोनों कन्धों से लगी है। बच्चे को गोद में लेती बार उसकी गर्दन में हाथ न लगाने से या झटका लग जाने से यह उतर जाती है। ऐसे बच्चों के गले में चाँदी की हंसली पहनाना चाहिए जो वोम को सम रखे। और किसी होशियार दाई से सुतवा दो।
७ काग गिरजाना—यह गर्मी से होता है। बालक दूध पीना छोड़ देता है या पीकर तुरन्त डाल देता है। बहुत रोता है पर रोया नहीं जाता।
चूल्हे की राख और कालीमिर्च उंगली पर लगाकर उंगली से चतुराई से ऊपर उठा दो।
गर्म चीज़ खाने को न दो, मुलातानी मिट्टी सिरके में पीसकर तालुए पर लगा दो।
८ श्राव दुखना—पहले तीन दिन कुछ न करो। छोटा बच्चा हो तो कड़ुआ तेल कान में डाल दो और तालू पर भी मल दो, पाँच रस्ती फटकी घारीक पीसकर एक तोला गुलाब जल में घोल दो, उसकी कई घूँटें दिनभर टपकाओ, या धीगुवार का गूदा, हल्दी, रसौत, सब मिलाकर पैर के तलुओं से बांध दो।
९ खाँसी—यह बहुत घुरी बीमारी है। अगर तर हो तो आक की मुँहवन्द डोंडी गिनकर जितनी हों उतनी ही कालीमिर्च गिनकर, पाँचों नोन डाल, कुल्हिया में रख, कपरीटीकर आग में फूंक लो; इसे बच्चे को चटाओ।
कूकर खाँसी बच्चे को बहुत कष्ट देती है। बालक खाँसते-खाँसते
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उल्टी कर देता है। यठ खाँसी दूसरे बच्चों को लग जाती है। इसकी अच्छी दवा यह है, कि कालीमिर्च एक तोला, पीपल छः भाशा, अनारदाना आठ तोला, पुराना गुड़ सोलह तोला, जवाखार एक तोला सबको इकट्ठा कर भसल-छान गोली बनाओ, इससे भयानक-से-भयानक खाँसी भी आराम होजाती है।
बच्चों को खाँसी, दस्त और बुखार साथ-साथ हो तो यह करे-काकड़ासींगी, पीपल, अतीस, मोथा पीसकर चटावे। अगर सिर्फ खाँसी और बुखार हो तो सुहागा अधभुना बराबर कालीमिर्च पीस, धीगुआर के रस में चने बराबर गोली बनाओ। बहुत फायदा होगा।
१०. पेट चलना—अगर दाँतों के कारण हो तो कुछ उपाय न करे। और कारण से हो तो सोंठ, अतीस, नागरमोथा, नेत्रवाला इन्द्र जो इनका काढ़ा पिलावे।
अगर दस्त के साथ ज्वर भी हो तो यह काढ़ा दे। अतीस, काकड़ासींगी, पीपल इनका चूर्ण शहद में चटाओ। अगर प्यास ज्यादा हो तो मोथा, सोंठ, अतीस, इन्द्रजो, खस इनका काढ़ा दो। अगर आँब हो तो वायविडङ्ग, अजमोद, पीपल, बारीक पीस ठण्डे पानी से दो। अथवा सोंठ, अतीस, मुनी हींग, मोथा, बुड़े की छाल, चीता इनका चूर्ण गर्म पानी के साथ दो। अगर खून भी आवे तो पाखान भेद सोंठ पानी में घिसकर दो। अफाए हो तो सेन्धानमक, सोंठ, इलायची बड़ी मुनी हींग, और अरुणडी महीन पीसकर गर्म पानी के साथ पिलाओ।
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बच्चों की बीमारियाँ
११. कान बहना—बालक के माँ के दूध की धार बच्चे के कान में डालो। या पठानी लोघ बारीक पीस कान में फूँक दो। सुदर्शन के पत्ते का रस टपकाओ।
१२. गला आजाना—शहतूत का शर्बत चटाओ।
१३. कोहे आजाना—उसे कहते हैं जिससे आँख की वाहरी कोर लाल पड़ जाती है। दुर्द होता है, खाज चलती है, घाव बढ़ता जाता है। इसका उपाय यह है कि कपड़े की पोटलों-सी बनाकर हाथ पर रगड़ो। अथवा मुँह की फूँक से गर्म करो, फिर आँख को सेको या काजल में सफैदा रगड़कर और डंगलियों में भरकर दिए की लौ पर डंगलियों को तनिक सेको तथा गर्म-गर्म ही आँख पर आँजलो।
१४. रोह—रोहों से आँख यदि बहुत सूज गई हो तो चाकसू उबाल कर छीलकर घिसकर आँख में आँजे। दिनमें दो-तीन बार।
१५. तालू पक जाना—या बैठ जाना। मुलतानी मिट्टी कई बार घिसकर दिन में कई बार तालुए पर रखलो।
१६. डुकास—इस रोग में बच्चा बार-बार पानी माँगता है। छुहारे की गुठली घिसकर पिलाओ।
१७. मुँह के छाले—सफेद हों और मुँह लाल होगा या हो तो पहले घुट्टी दे, फिर वंशलोचन पपरिया कल्या और छोटी इलाके बीज की बारीक बुरकी बनाकर बुरक दो।
१८—ज्वर बच्चों की सबसे भयानक बीमारी है, इसका इलाज किसी अच्छे डाक्टर-वैद्य से कराना चाहिए। क्योंकि ज्वर के
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स्वरूप
कारण को समझना कठिन है। ठीक-ठीक नहीं समझने से न जाने क्या विकार पैदा हो। फिर भी रुग्ण हो तो एरपड का तेल दो। नीम की हरी-हरी सींक छिलका छीलकर पचीस लो उसमें सात काली मिर्च डाल पानी में पीसलो। तीन दिन दोनों समय पिलाओ बच्चों के मुखार की बहुत गुणकारी दवा है। यह मात्रा बड़े आदमी के लिए है। बच्चे की उम्र के लिहाज से पिलाओ।
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चोट और अकस्मात्
बहुधा ऐसा होता है, कि सफ़र और जङ्गल में, समय-कुसमय कभी ऊँची जगह से गिर जाने, कुचल जाने आदि से या अन्य किसी अकस्मात् से चोटें लग जाती हैं। प्रायः ऐसे स्थानों में डाक्टर का मिलना संभव नहीं होता। ऐसी दशा में यह उचित है कि प्रत्येक मनुष्य को ऐसे अवसर पर कुछ कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए, जिससे यदि कभी ऐसी दुर्घटना हो जाय तो, जबतक डाक्टर की सहायता न मिले तबतक रोगी की उपयुक्त व्यवस्था होसके। सबसे प्रथम नीचे लिखी बातों पर ध्यान देना चाहिए।
१—घाव से निकलते लोह को सबसे पहले बन्द करो।
२—घाव में किसी तरह की मैल काँटा, शीशे का टुकड़ा आदि न रहने देना चाहिए।
३—घाव में मक्खी आदि न बैठने देना चाहिए।
४—बेहोश घायल के चारों तरफ भीड़ न होने देना चाहिए।