सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
सुगम चिकित्सा
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३ सरण वटी—सूखा जमीकन्द दो तोला, चीते की छाल सोलह तोला, सोठ चार तोला, काली मिरच दो तोला, लेकर सबको कूट पीसकर चूर्ण करे, चूर्ण के बराबर गुड़ मिलाकर गोली बनावे, यह बवासीर की अच्छी दवा है। सब प्रकार की बवासीर को आराम करती है।
४ चन्द्रप्रभा वटी—कचूर, कच, नागरमोथा, चिरायता, गिलोय, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारु हल्दी, पीपरामूल, चीते की छाल, धनिया, हरड, बहेड़ा, आँवला, चन्य, वायविङ्ग, राज पीपल, सोठ, काली मिरच, पीपल, स्वर्ण मालिक भस्म, सज्जी, जवाखार, सेधा नमक, काला नमक, विङ्ग नमक, ये २७ दवाइयाँ चार-चार माशा। निसोत, दन्ती, तमाल पत्र, दालचीनी, इलायची दाना, वंशलोचन, ये छः दवा सोलह-सोलह माशा। लोह भस्म दो तोला, मिश्री चार तोला, शिलाजीत आठ तोला, गुगल आठ तोला, इन सबको एकत्र कूट पीसकर एक जीव करके बेर के समान गोली बनावे। यह सब रोगों पर चलती है। प्रमेह, मूत्र कृच्छ्र, मूत्राघात, पथरी, कण्ड, पेट फूलना, शूल, प्रमेह, अपेडकोप की वृद्धि, पाँडू रोग, कामला, हलीमक, कमर पीड़ा, साँस, खांसी, कोढ़, बवासीर, खाज, तिल्ली, भगंदर, दांत के रोग, नेत्र रोग, खियों के रजोधर्म-सम्बन्धी रोग, पुरुषों के वीर्य विकार, मन्दान्न, अरुचि, आदि आराम होते हैं।
५ योगराज गुगल—सोठ, मिरच, पीपल, चन्य, पीपल मूल, चीते की छाल, भुनी हींग, अजमोद, सरसों, जीरा, काला जीरा,
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काम के शास्त्रीय नुसखे
रेणुका, इन्द्रजौ, वाद, वायविडङ्ग, गजपीपल, कुटकी, अतीत, भारंगी, वच, मूर्ची, जवासा चार-चार माशा । सबसे दूना त्रिफला सबको कूट चूर्ण कर, सब चूर्ण के बराबर शुद्ध गुगल सबको खरल में डालकर खूब चारीक पीस गुड़ के समान पाककर मिलावे, फिर वंग, चांदी भस्म, नागेश्वर, लोहसार, अम्रक, मण्डूर और रस सिन्दूर प्रत्येक चार-चार ताला लेकर गूगल में डाले, और अच्छी तरह कूटे । घी का हाथ लगाता जाय, फिर चार-चार माशे की गोली बनावे । यह गूगल त्रिदोष नाशक और रसायन है । बिना पथ्य के भी गुण करता है । इससे सम्पूर्ण वायुरोग, कोढ़, ववासीर, संग्रहणी, प्रमेह, वातरक्त, नाभिशूल, भगन्दर, उदावर्त क्षय, गुल्म, भृगी, उरोग्रह, मन्दाग्नि, खांसी, खास, अरुचि ये सब रोग नष्ट होते हैं । धातु विकार को दूर करता है । और स्त्रियों के रजोदर्शन सम्बन्धी स्नेगों को दूर करता है । पुरुषों की धातु वृद्धि करके उन्हें पुत्र देता है । वॉम्फ स्त्रियों को गर्भ देता है । रास्तादि काढ़े के साथ सेवन करने से समस्त वात रोग को दूर करता है । दारुहल्दी के काढ़े के साथ प्रमेह को दूर करता है । गो-मूत्र के साथ सेवन करने से पाण्डु रोग को आराम करता है । शहद के साथ सेवन करने से मेंदुरोग को गुण करता है । नीम की छाल के काढ़े में कुछ को फायदा करता है । वातरक्त रोग में गिलोय के काढ़े के साथ खाय । शूल और सूजन में पीपल के काढ़े से सेवन करे । वातरक्त में गिलोय के काढ़े से खाय । नेत्ररोग में त्रिफला के काढ़े के साथ सेवन करे । उदररोग में पुनर्नवादि काढ़े के साथ
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खाय। नेत्ररोग में त्रिफला के काढ़े से सेवन करे। इसी प्रकार अपनी बुद्धि से भिन्न-भिन्न रोगों पर इसे देना चाहिए।
६ गोल्डरादि गुगल—११२ तोला गोखरू जौकूट करके छः गुने पानी में चढ़ाकर आधा शेष रहने पर उतारले, तब शुद्ध गूगल २८ तोला अच्छी तरह कूटकर उसमें मिला दे। फिर उसका गुड़ के समान पाक करे। गाढ़ा होने पर ये दवाइयाँ मिलावें। सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेड़ा, आँवला, नागरमोथा चार-चार तोला। बाद में कूटकर भरबेर के समान गोली बनाले। इसके सेवन करने से पेशाब रुकना, पथरी की बीमारी, मूत्रकृच्छ्र, प्रदर रोग, सूत्राधात, वातरक्त, वादी के रोग, धातु विकार आदि आराम होते हैं।
७ काँचना गुगल—कचनार की छाल ४० तोला, हरड, बहेड़ा, आँवला, आठ-आठ तोला, वरना चार तोला, इलायची, दारचीनी, तमालपत्र एक-एक तोला लेना। फिर सब को कूट-छानकर चार-चार मास की गोली बनाना। मुण्डी या खैरसार के काढ़े में प्रातः काल खाने से कण्ठ माला में बहुत फायदा करती है। अपची, अर्घुद्ध गाँठ, गोला, भगन्दर, आदि रोग भी इससे दूर होते हैं।
अवलहे
१ न्यवन प्राश—पाठा, अरनी, काश्मरी, चेले की छाल, स्योना पाठा, गोखरू, शालपर्णी, प्रष्टिपर्णी, दोनों कटेहली, तीनों पीपल, काकड़ासीगी, दाख, गिलोय, हरड खरेटी, भूमि आँवला, अदूसा, असगन्ध, सतावर, कचूर, जीवक, ऋपभक, नागरमोथा,
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पोकरमूल, कौवाडोंडी, मूगपर्णी, मापपर्णी, विद्यारीकन्द, साठ की जड़, कमल मेदा, महामेदा, छोटी इलायची, अगर, चन्दन, प्रत्येक चार-चार तोला । इन्हें थोड़ा कूटकर रखले । फिर बड़े-बड़े आँवले ५००, बड़े मटके में पोटली बाँध, डालकर उसमें १०२४ तोला पानी में दवा डालकर पकाओ । जब दवा का रस पानी में आजाय और आँवला गल जाय तब पोटली से आँवला निकालकर गुठली दूर करके कपड़े में रगड़ कर छान ले । फिर उसे २८ तोला मीठे तेल में बाद में उतने ही घी में भूने । जब पानी का अंश न रहे तब उतारे । अब काढ़े में तीन सेर खाँड़ डालकर चाशनी करे । जब दो तार की चाशनी होजाय तब उसमें उपरोक्त आँवला डाल कर पकावे । जब दीवले पड़ने लगे तब उतार ले । ठण्डा होने पर नीचे लिखी दवाइयाँ मिलादे । पीपल आठ तोला, वंशलोचन सोलह तोला, दारचीनी, इलायची, तेजपात नौ-नौ माशा । शहद चौबीस तोला । बस च्यवनप्राश तैयार है । क्षीण पुरुष को मोटा-ताजा बनाने में अपूर्व है । यह अबलेह बालक, वृद्ध, जख्मी, नपुंसक, शोपरोगी, हृद्दोगी, और स्वर क्षीण को लाभकारी है । खास, कास, प्यास, चातरक्त, उरोग्रह, वीर्य दोष, मूत्र दोष, सब को दूर करता है । इसके प्रयोग से बुद्धि स्मरण-शक्ति, रमण-शक्ति, शरीर कान्ति और वर्ण प्राप्त होता है । अजीर्ण का नाश होता है ।
२ मूसलीपाक—मूसली सफेद का चूर्ण बीस तोला । गाय का दूध चार सेर । दोनों को पकाकर मावा करे, फिर आध सेर ताजे घी में भूने । इसके बाद छेड़ सेर खाँड़ की चाशनी कर उसमें मिलादे ।
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साथ ही नीचे लिखी दवाइयों कूटकर कपडछान कर डालदे । गोद बवूल बत्तीस माशा, बादाम की मींग बत्तीस माशा, गोला कतरा हुआ बत्तीस माशा, जायफल, जावत्री, लौंग, केसर, चाव, डेवर, बालछड़, कोंच के बीज, तज, पत्रज, सफेद इलायची, नाग- केसर, मिर्च काली, पीपल, सोठ, जावची, सालम मिश्री, चोबचीनी पिस्ता, चिरोंजी; प्रत्येक सोलह-सोलह माशा । कुलीजन, अजमोद भुत्ता, पौदीना, मस्तगी, उशथ, मूंग की भस्म आठ-आठ माशा । कस्तूरी दो माशा, मोती एक माशा, वर्क चाँदी बीस नग, वर्क सोना बीस नग, गोद धी में भून लेना चाहिए । अन्तमें चार माशा अम्रक भस्म मिलाकर ढाई तोले का लडू बनाना चाहिए । अत्यन्त पुष्टिकारक, वीर्य वर्धक, और ताकत देनेवाला है । पेशाब की ज्यादती को रोकता है ।
३ चोबचीनी पाक—चोबचीनी पाँच तोला, असगन्ध नागौरी बारह माशा, मूसली सफेद, लौंग, जावत्री, कहरवा, वंशलोचन, प्रत्येक बारह-बारह तोला । विडिया कन्द, सतावर, कोंच के बीज की मींग, जायफल, अकरकरा, कुलीजन, केसर, अजवान, हालों, मेथी, मस्तगी, ढाक का गोद, सत गिलोय, सफेद इलायची दारचीनी पत्रज, बड़ी इलायची के दाने, कमल गट्टे की मींग, तोदरी सफेद, जीरा गुलाब का, जीरा काला, मूंग की भस्म, प्रत्येक आठ-आठ माशा । अम्बर, बालछड़, अगर, नदोली, छः-छः माशा, किशमिश सोलह माशा, बादाम गिरी अंडतालीस माशा, वहसन दोनों सोलह माशा, पिस्ता अंडतालीस माशा, कस्तूरी तीन माशा, उशापा ग्यारह
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काम के शास्त्रीय नुसखे
माशा, मोती छः माशा, चाँदी के बर्क नौ माशा, बर्क सोने के साढ़े तीन माशा, अम्बर दो माशा, संगेयशव चार माशा, गोखरु वड़े छः माशा, ताल-मखाना छः माशा । सबको कपड़छान चूर्ण करके शहद में मिलाकर चालीस दिन, दो तोला रोज खाय, खटाई गुड़ का परहेज रखले तो चालीस दिन में विगड़ा हुआ खून शुद्ध होजाय ।
४ मुहाग सोठ—कसेरू, सिंधाड़ा, कमलगट्टा, मोथा, जीरा, काला जीरा, जायफल, जावत्री, लौंग, नागकंसर, तेजपात, दार-चीनी, कचूर, धाव के फूल, इलायची, सोआ, धनिया, गजपीपल, पीपल, मिर्च, सतावर, प्रत्येक चार-चार तोला । साँठ का चूर्ण एक सेर, मिश्री १२० तोला । घी एक सेर, दूध गाय का आठ सेर । पहले दूध में साँठ डालकर मावा पकावे, फिर इसे घी में भूने, इसके बाद चाशनी कर सब दवाइयों का चूर्ण उसमें मिलादे ।
५ सुपारी पाक—बीस तोला चिकनी सुपारी, कूटकर कपड़छान करे; फिर उन्हें दाई सेर गाय के दूध में पकाकर मावा पकावे । जब मावा जम-जाय तो आध सेर ताजा घी डालकर उसे भून ले । इसके बाद नोचे लिखी दवा कूटछान कर मिलादे । चिराँजी, गोला, दो-दो तोला, जायफल, जावत्री, लौंग, नागकंसर, तेजपात, इलायची छोटी, वंशलोचन चार-चार माशा मिलाकर पाक सिद्ध करे । मात्रा दो तोला । खियाँ के प्रदर रोग की बहुत उम्दा दवा है ।
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तेल
१ विपगर्भ तेल—भिलावा, मालकाँगनी, धतूरे का पंचांग, और मीठा तेलिया, सब एक-एक तोला। तेल तिल का आध सेर, मिलाकर पकाओ। जब भिलावे जलकर तैरने लगे और उनमें सौंक छिद जाय, तब उसे उतारकर छानकर काम में लो। यह सब प्रकार की वायु की बीमारी दर्द आदि के लिए उत्तम है।
२ नारायण तेल—असगन्ध, गंगेरन की छाल, बेलगिरी, पाठा, कटेहली, बड़ी कटेहली, गोखरू, अतिवला, नीम की छाल, देह, पुनर्नवा, पसरन, अरन्ती; प्रत्येक आध-आध सेर। इन्हें जोपुट कर के सोलह सेर पानीमें पकाकर चार सेर रखे। फिर काढ़े को छान कर काढ़े में एक सेर तिल का तेल, चार सेर सतावर का रस और चार सेर गाय का दूध उसमें मिलादे। तथा नीचे लिखी दवाइयों की लुगदी पीसकर मिलादे। कूठ, इलायची बड़ी, सफेद चन्दन, मूर्ण, वच, जटामांसी, संधा नमक, असगन्ध, गभेरन, रास्ता, सोंफ, देवदारु, शालपर्णी, पृष्ठपर्णी, मावपर्णी, मुग्दपर्णी, और तगर। ये सब मिलाकर बीस तोला लिए जायें। फिर सबको पकाकर तेल रहने पर छान लिया जाय। यह प्रसिद्ध नारायण तेल है। इसे सूँघने, खाने, मालिश करने आदि के काम में लिया जा सकता है। इससे लकवा, वातन्याधि, अधर्गण वायु, कमर का दर्द, कम्प वात, पंगुता आदि सभी रोग दूर होते हैं।
३ मीरवादि तेल—काली मिरच, हरताल, निसोत, लालचन्दन नागरमोथा, मन्सिल, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु,
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काम के शास्त्रीय नुसखे
इन्द्रायन की जड़, कनेर की जड़, कूट, आक का दूध, गाय के गोबर का रस । सब एक-एक तोला । शुद्ध भीठा तेलिया दो तोला, सरसों का तेल एक सेर, और तेल से दूना गाय का पेशाब, सबको पकावे । जब तेल रह जाय तब छानकर रक्खो । यह कोढ़, खाज, चकत्ता, फोड़ा, दाद, छाजन, सबको आराम करता है ।
४ लाड़ादि तेल—चार सेर लाख को सोलह सेर पानी में पका कर चार सेर बाकी रहने पर उतारकर छान ले । उसमें एकसेर तिल का तेल तथा चार सेर दही का तोड़ डालकर नीचे लिखी दवाइयों की लुगदी करके मिलादो । सोंफ, असगन्ध, हल्दी, देवदारु, कुटकी, रेणुका, मुर्ची, कूट, मुलेहटी, सफेद चन्दन, नागर-मोथा, और रास्ता, ये सब एक-एक तोला । तेल बाकी रहने पर छानकर काम में लो । पुराने बुखार को दूर करता है । तपेदिक, खाँसी, पीनस, आदि को गुणकारी है ।
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
अक्सर सौ में से पचास बच्चे अपनी आयु के पहले ही वर्ष में मर जाते हैं; और इसका कारण यह होता है कि उनकी ठीक-ठीक परवरिश नहीं होने पाती। माताएँ अक्सर बच्चों के पालन-सम्बन्धी नियमों को नहीं जानतीं। सबसे बड़ी गलती उनसे दूध पिलाने के सम्बन्ध में होती है। अक्सर माताएँ बच्चों को चाहे-जब दूध पिलाने लगती हैं। अगर बालक पेट के दर्द या अजीर्ण से रो रहा हो तो भी उसके मुँह में दूधी टूँस देती हैं। इस का यह फल होता है कि अक्सर बालकों को अपच की शिकायत रहा करती है। और वह अन्य सैकड़ों बीमारियों को उत्पन्न कर देती है, जिससे प्रायः बच्चों की जान पर आ बनती है। हमेशा यह खयाल रखना चाहिए कि बच्चा हो या बड़ा उसे बड़ी खुराक फायदा पहुँचावेगी जो भली-भाँति हज़म होगी। खुराक की टूँसा-टूँस करना बच्चे के लिए किसी भी रूप में लाभदायक नहीं है। इसलिए छोटे बच्चों को दूध पिलाने के नियमों की पावनदी बड़ी बारीकी से की जानी चाहिए।
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
दूध पिलाती वार माना को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए—
(१) क्रोध में दूध न पिलावे—यदि ऐसा अवसर हो भी तो थोड़ा जल पीकर जब क्रोध ठण्डा होजाय तब पिलावे ।
(२) पसीने या रहे हों, या मल-मूत्र, वमन आदि का वेग हो तो दूध नहीं पिलाना चाहिए ।
(३) एक स्तन से दूध कभी न पिलावे; क्योंकि दूसरे में दूध इकट्ठा होकर सूजन पड़ जावेगी ।
(४) बच्चे का दूध पीने का समय नियत कर लेना चाहिए । नीचे की सारणी में हम उपयुक्त समय लिखते हैं । इसीके अनुसार बालक को दूध पिलाना चाहिए ।
१ महीने के बालक को एक-घण्टे पीछे
३ महीने " " दो " "
६ महीने " " तीन " "
९ महीने " " चार " "
नौ महीने की अवस्था तक बालक को निरा दूध पिलावे । अन्य कोई वस्तु खाने को न दे । कहा भी है—चौ महीने भरे, और नौ महीने धरे । परन्तु बालक सबल हो और उसकी पाचन शक्ति ठीक तो छोटे महीने में भी अन्न दे सकते हैं । आवश्यलायन सूत्र में लिखा है—
पट्टे मास्यन्नप्राशनम् । १ । घृर्तौदनं तेजस्क्राम । २ ।
दधिभयघृत्त मिश्रितमन्नं प्राशयेत् ॥
अर्थात्—छोटे महीने बालक को अन्नप्राशन संस्कार करावे
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जो अपने बालक को तेजस्वी कराना चाहे वह प्रथम-प्रथम उसे घृत और भात दे। अथवा दही-शहद-घृत मिला अन्न दे।
दूध पिलाने की विधि—माता सीधी पलोथी मारकर बैठे, प्रथम स्तन थोकर एकाध बूँद धरती पर गिरादे, पीछे बालक के मुँह में स्तन दे। प्रथम दाहिना स्तन पिलावे पीछे बाँया। लेटकर दूध कभी नहीं पिलाना चाहिए, इससे बालक का कान बहने लगता है। बालक को गोद में लेकर और एक हाथ उसके मस्तक के नीचे लगाकर मस्तक को ऊँचा रखले, तब पिलावे। नींद में न पिलावे। यदि कोई विशेष बात न हो तो माता ही को बालक को दूध पिलाना चाहिए। जिस माता का बालक दूध नहीं पीते उससे बच्चे को कुछ भी स्नेह नहीं होता। स्त्री बालक को दूध पिलाने से निरोग भी रहती है, बरन ऐसी स्त्री के गर्भश्राव और गर्भपात का रोग भी नहीं होता।
यूरोप में स्त्रियाँ अपना जीवन बनाये रखने के लिए—बच्चों को दूध नहीं पिलातीं—धाय रखती हैं। इसपर हम अधिक टीका-टिप्पणी करना नहीं चाहते। असल में यह बात उन्हीं को शोभा देती है। बालक का दूध एकदम न लुड़ावे—बरन दूध पीने के साथ ही कभी-कभी खीर, खिचड़ी, साबूदाना, भात आदि दे। मिठाई सर्वथा बन्द रखो। मिठाई विप है, यह जान रखो। इससे मेदे में कीड़े पड़ जाते हैं और मेदा सड़ने लगता है। हाँ, फलों का अभ्यास गुणकारी हो सकता है और फल अवश्य बच्चे को समय-समय पर देने चाहिए।
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
दूध छुड़ाने का सुगम उपाय यह है कि माता बालक से कुछ दिन के लिए अलग हो जावे, वा रात को अपने पास न सुलावे । दूसरी स्त्री के पास सुला दे ।
और यदि मातामें शक्ति होतो जबतक गर्भ न रहे, बच्चेको दूध पिलाये जाय । इससे अधिक पौष्टिक और गुणदायक वस्तु संसार में बच्चे के लिए नहीं है । कहावत भी तो है—“देखें तैने अपनी माता का कितना दूध पिया है !”
दूध पिलाकर बालक का मुँह धो डालना चाहिए, जिससे मक्खी आदि काट न खाय । या मुख के रोग न उत्पन्न हों ।
जब ये चिन्ह माता के शरीर में दीखें तो दूध तुरन्त बन्द कर देना चाहिए ।
(१) जब माता के स्तनों में दूध न रहे ।
(२) जब माता के कानों में सनसनाहट मालूम हो ।
(३) आँखों में आँधेरा-सा जान पड़े ।
(४) आँखों में पीड़ा हो ।
(५) मस्तिष्क में धमक और चित्त व्याकुल हो ।
(६) मूर्छा और थकावट जान पड़े, देह कपड़े, भूख न लगे, अजीर्ण हों, पेट में दर्द हो, ज्वर हो, पेट में सनसनाहट हो, मानों पेट बैठा जाता है, चलते-फिरते देह में दर्द हो, सुखपर पीलापन छा रहा हो, टकने सूक्ष्म आये हों ।
छः महीने तक बच्चे की गर्दन नहीं ठहरती । इसलिए गर्दन के पीछे हाथ लगाये रहना चाहिए । असावधानी करने से बालक की गर्दन
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में भटका चला जाता है और बालक मर जाता है। बालक को इन दिनों न सीधा बैठावे, न सीधा गोदी में ले; क्योंकि ऐसा करने से पीठ में कुन्च निकल आता है; क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी बहुत नरम होती है। एक वर्ष से पूर्व बालक को अपने पेरों कभी न खड़ा न करे, इससे पाँव चिथड़ा जाते हैं। जब बालक स्वयं खड़ा होसके तभी खड़ा करे, वा होने दे। उसे अपनी नींद सोने और उठने दे।
परन्तु दूध पी कर ही तुरन्त बालक को न सोने दे, इससे उसका भोजन पचता नहीं है और स्वप्न भी घुरे दीखते हैं। तीन वर्ष की आयु तक तो बालक को दिन में सोने दे; पीछे केवल रात्रि के ही सोने की आदत डाले, दिन में नहीं।
बहुधा स्त्रियाँ काम करने के लालच से बच्चे को अफीम आदि देकर सुलाती हैं। सभी जानते हैं अफीम विष है, सो नन्हें-से बच्चे को विष देना डायन माता ही का काम है, जो बहुत घुरा है। ऐसे नशों से बालकों के मस्तिष्क वचपन से ही निर्बल और खुरक होजाते हैं।
सोती बार माता बालक को अपनी देह से चिपटाकर न सुलावे और यदि ऐसा ही हो तो उसे सदा कर्वट लेकर अर्थात् उसकी पीठ माता की ओर रख कर सुलावे।
विछौना नरम और सूखा रहना चाहिए। कोई वस्तु चुमती न हो। पोतड़े भीगने पर तुरन्त बदल देना चाहिए।
बच्चों को धूल-भिट्टी में न होने देना चाहिए। रात्रि को नीम वा सरसों के तेल का काजल आँखों में लगा दिया करे और प्रभात को
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
काजल मुख धोकर फिर लगा देना चाहिए ।
बहुतेरी माताएँ भूत-प्रेत, डाकनी-मसान के भूषणों से बच्चे को बचाने के लिए वीसियों कठले, गन्ड़े-तावीज से बच्चों का शरीर भर देती हैं; पर इन सबमें मैल भर जाने से छोटे-छोटे कीड़े अरुड़े—दे देते हैं और रोग का जमघट जम जाता है । रोग से बचना तो एक और रहा—ऐसे ही बच्चे सदा रोगी रहते हैं ।
मुख से लार टपककर भी कपड़े अधिक मैले रहते हैं, इससे उचित तो यह है कि एक रूमाल उसके गले में बँधा रहे । उसे रोज धोना और साफ करना चाहिए । यदि अधिक लार बहे तो यह दवा बनाकर रख ले और एक माशा नित्य कई बार चटावे ।
एक पाव मिश्री को एक छटाक गुलाब-जलमें चाशनी करो । जब चाशनी एक तार की आजाय तो उसमें २।। तोला रूमीमस्तगी असली बारीक पीसकर अच्छी तरह मिलादे और किसी इमर्तान में भरकर रखले ।
बच्चों की आँत लटककर अण्डकोप में लटक जाती हैं । इस लिए उचित तो यह है कि कटिबन्धन ( कौंधनी ) पहनाये रखे—जिससे वह नस दबी रहती है । यदि थसक गई हो तो बालक को जाँघिया पहनाये रखे, इससे ठीक रहती है ।
बालक को रोज अमरण कराना चाहिए । जाड़ों में दोपहर और धूप के समय । गर्मी में साँझ-सवेरे; वर्षा में जब बादल न हों वा बूँद न पड़ती हों । हर दशा में बालक को गर्मी-सर्दी दोनों से बचाये रखे ।
सुगम चिकित्सा
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जब बालक तीन वर्ष का होजाय तो उसे नित्य प्रातःकाल नहलाने की वान डालनी चाहिए। यदि वह दुर्बल हो तो उसके नहाने के पानी में संधा नमक डाल दे। इससे थोड़े ही दिन में निर्बल बालक सबल और पुष्ट होजाता है। पानी में मेथी या मेहदी डाल कर गरम करले, उससे स्नान भी गुणकारी होता है।
उनके कान और बालों में चौथे वा पाँचवे दिन कड़वा तेल डालना चाहिए और जिन दिनों में दाँत निकलते हों उन दिनों अवश्य डाले। इससे आँख नहीं दुखती और कनपटी जो इस दशा में भड़का करती है, नहीं भड़कती और चैन पड़ता है।
बालकों के सिर पर मैल जम जाता है उसको भी धोकर निकाल देना चाहिए। पीछे तेल डालदे, इससे मस्तक में तरी रहती है, नींद अच्छी आती है, खुशकी नहीं बढ़ती। ऐसा न करने से प्यास बढ़ जाती है जिससे न तो बाल बढ़ते हैं और न हृद होते हैं, न मस्तक चलवान रहता है जिससे बालक बहुधा मूर्ख और निर्बुद्धि रह जाते हैं।
सँभाले न रखने से बहुधा बच्चों को मिट्टी खाने की आदत पड़ जाती है। जिससे पेट बढ़ जाता है। मूत्र सफेद आने लगता है और अजीण हो जाता है तथा सारे शरीर का रंग सफेद पड़ जाता है। दूसरे-तीसरे दिन बच्चे को थोड़ा गुड़ खिला देना चाहिए।
उन्हें कभी नहीं डराना चाहिए। डरने से बच्चे कभी-कभी ऐसे डर जाते हैं कि वे सदा के लिए डरपोक बन जाते हैं। वह भय कभी उनके हृदय से नहीं निकलता। स्वप्न में वही बात देखकर वे डर उठते
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
हैं, यहाँतक कि मल-मूत्र तक त्याग कर देते हैं इसका प्रभाव आगे बच्चों पर बहुत घुरा पड़ता है।
डरे बालक का उपाय—यदि बालक किसी प्रकार डर गया हो तो उसका उपाय यह है कि उसे डरा-धमकाकर और घुड़की से न बोले, न चिल्लाकर बोले; बरन् बहुत ही स्नेह से धीमी-धीमी तसल्ली दे। उसे अकेला न छोड़े, न अँधेरे में छोड़े; रात्रि-भर दिया जलावे। जिससे आँख खुलने पर वह उजाला ही देखे। अक्सर बालक सोते-सोते चौँक उठते हैं, तब उचित है कि उसकी छाती पर हाथ धरे रहे; कुछ दिन में ऐसा करने से बच्चे का डर जाता रहेगा।
एक काम अवश्य करना चाहिए। प्रति मास बालक को तौलते रहना चाहिए। यह नियम है कि बच्चा जब बीमार होने को होता है उससे बहुत प्रथम से ही उसका वजन घटने लगता है। या बहुत पहले से ही वजन बढ़ना रुक जाता है। वैसी अवस्था में तुरन्त वैद्य को दिखाना और उसकी सम्मति से भोजन या धाय को तुरन्त बदल देना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को बीमार होने की नींव ही नहीं आयगी।
जन्म के सातह में तो बच्चा तौल में कुछ घटता है फिर बढ़ने लगता है। पहले ५ महीने तक तन्दुरुस्त बच्चे को १ तोले से २। तोले तक रोज बढ़ना चाहिए। और इसके बाद में छः-सात महीने तक दस मासों से दो तोला तक बराबर बढ़ना चाहिए, पाँच-छः मास के बच्चे का वजन जन्म से दूना होना चाहिए। और एक साल के बच्चे का जन्म से तिगुना हो जाना चाहिए। इसके बाद वजन
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बढ़ना कुछ कम होजाता है। दूसरे साल पौने तीन सेर तीसरे साल तीन सेर, इसीतरह सातवें साल तक प्रायः दो सेर ही बढ़ता है। आठवें से ग्यारहवें तक तीन सेर सालाना बढ़ता है, ग्यारहवें साल तक लड़के लड़कियों से अधिक बढ़ते हैं। पन्द्रहवें साल तक लड़कियाँ ज्यादा बढ़ती हैं। फिर उसके बाद लड़कों की बारी आती है।
जन्म के समय बच्चा आठ-नौ गिरह लम्बा होता है दो-तीन महीने तक लम्बाई जल्दी-जल्दी बढ़ती है। एक वर्ष पूरा होनेपर बच्चा साढ़े तीन गिरह बढ़ चुकता है और छठे साल जन्म से दूनी ऊँचाई हो जाती है। सात से तेरह वर्ष तक लड़के की ऊँचाई थोड़ी-थोड़ी बढ़ती जाती है। तेरह से सत्रह तक कद जल्दी-जल्दी बढ़ता है। इसके बाद फिर बढ़ना कम होजाता है। लड़कियाँ बारह-से-चौदह तक जल्दी-जल्दी बढ़ती हैं। बच्चों के क्रद में बढ़ने का खयाल अधिक नहीं रखना चाहिए। लम्बाई का खयाल रखना चाहिए; क्योंकि तौल में ही घटने-बढ़ने पर तन्दुरुस्ती की जाँच होती है। पुत्र १६७ पर दिये गये नकशे से इसका ठीक-ठीक ज्ञान होगा।
एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए। अगर दूध छूटने पर बच्चा अन्न खाकर रहने लगे तो उसे चिकना-चुपड़ा मसालेदार खाना कभी न खिलावे; न मिठाई की बान लगावे।
दाँत निकलना—जिन दिनों बालकों को दाँत निकलते हैं उन दिनों उनकी लार बहुत निकलती है। इसलिए उसके गले में एक रुमाल वा अँगोछा बँधा रहना चाहिए। भीगने पर सूखा बदलना चाहिए और उसे धोकर सुखादे। इसी प्रकार हर घड़ी गले में सूखा कपड़ा
१६७ छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
बच्चों की ऊँचाई और वजन का नाप बताने वाला नकशा । (प्रुष्ट १६६ देखिए )
किस उमर तक | औसत लम्बाई | औसत वजन | ---|---|---|--- १ सप्ताह | ६ गिरह | ३ सेर | लड़की की तौल लड़कों की तौल से जाव सेर कम समझना चाहिए । यह औसत तौल है । कम ज्यादा भी हो सकता है । १ मास | ६ गिरह | ४ सेर ३ मास | ६।। गिरह | ५।। सेर ६ मास | ११। गिरह | ७।। सेर ६ मास | ११। गिरह | ६ सेर १ वर्ष | १३ गिरह | १० सेर १।। वर्ष | १३।। गिरह | ११ सेर २ वर्ष | १४।। गिरह | १३ सेर २।। वर्ष | १६ गिरह | १६।। सेर ५ वर्ष | १८ गिरह | २० सेर ६ वर्ष | १६।। गिरह | २२ सेर ८ वर्ष | २१।। गिरह | २७ सेर १० वष | २३ गिरह | ३३ सेर १२ वर्ष | २५ गिरह | ३६ सेर १५ वर्ष | २८ गिरह | ४५ सेर
सुगम चिकित्सा
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बँधा रक्खे । ऐसा करने से बालक की छातीपर ठण्ड नहाँ पहुँचने पाती । छाती में ठण्ड पहुँचने से छाती के अनेक रोग खाँसी इत्यादि उत्पन्न होकर महादुःख देते हैं ।
इन दिनों फेफड़े, मस्तक-पकाशय का काम ठीक नहाँ रहता है । इसी से खाँसी, अपच, अफारा, दस्त, उलटी, फोड़े-फुंसी इत्यादि रोग हो जाते हैं ।
इन दिनों शुद्ध वायु सेवन कराना परमावश्यक है । यह बच्चोंको अमृत की तरह हितकारी है । इसी सिद्धान्त के लिये शास्त्र में चतुर्थ मास में निष्क्रमण संस्कार का विधान किया है ।
अगर माता का दूध सूख गया हो और पूरा दूध न उतरता हो । अथवा दूध को पानी में डालने से वह पानी में घुल न जाय; बल्कि नीचे बैठ जाय तो यह दवा माता को दे:—
(१) वन कपास की जड़, ईख की जड़ बराबर काँजी में पीस कर ६ माशे पिलाना ।
(२) हल्दी, दारुहल्दी, पँबाड़ के बीज (चक्रमर्द) इन्द्रजौ, सुलाहटी, प्रत्येक को छै माशे लेकर एक पाव पानी में काढ़ा करना और दोनों समय पिलाना ।
(३) वच, मोथा, अतीस, देवदारु, सोंठ, सताबर, अनन्तमूल, सब का काढ़ा पूर्ववत बनाकर पिलाना । इससे दूध की वृद्धि होती है ।
खीर, मखाने, किशमिश, दाख, जीरा, आदि पौष्टिक पथ्य खाने को देना चाहिए ।
यदि माता का दूध बहुत ही दूषित हो गया है तो उसका न
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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में
पिलाता ही अच्छा है। वैसी अवस्था में दो ही उपाय हैं—या तो कोई धाय लगाई जाय, और नहीं तो गाय का दूध दिया जाय।
धाय ऐसी हो कि जितने दिन के बालक के लिए धाय चाहिए उतने ही दिन का बालक उसकी गोद का हो। दस-पाँच दिन की न्यूनता की कोई बात नहीं; क्योंकि ऐसा न होने से उसका दूध बच्चे की प्रकृति के अनुकूल न होगा। धाय में इतनी बातें देखनी चाहिए:—
(१) युवा और सुन्दर हो, बहुत मोटी या कूरा नहीं।
(२) उसकी सन्तान भर तो नहीं जाती।
(३) उसे कोई रोग—कोढ़ खाज, दमा, चूय, आदि तो नहीं हैं।
(४) गर्भवती तथा ऋतुमती न हो।
(५) क्रोधी, झूठी, लवार, गन्दी, और वात्सल्यहीना न हो।
(६) सुखीला, हँसमुख, संतोषी हो।
(७) पहलौटी न हो। दूसरे-तीसरे की जती हो। स्तन ऊँचे, कठोर और लम्बे हों।
यदि ऐसी धाय न मिले तो उसे गाय का दूध देना ही ठीक होगा; किन्तु इस दूध को नीचे की विधि से ठीक करना होगा; क्योंकि गाय का दूध भारी और गाढ़ा होता है। सो वह यदि चिना पतला किये बालक को दिया जावेगा तो बच्चे का पेट बिगड़ जावेगा और रोगी हो जायगा।
साधारणतः बराबर गरम पानी मिलाकर दूध को पहले दे। और यदि वह न पचे तो यह विधि करे—
पान में खाने का चूना दो पैसा-भर लेकर एक बड़ी चोतल में