सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
न० १० ]
गारीरस्थानम्
३६३
और बचा से सिद्ध दूध देवे । रक्त के बहुत अधिक बहने पर कोष्ठगारिका ( दिवारों में जो कीड़ा मिट्टी का घर बनाता है ) नामक जन्तु के घर की मिट्टी, मजीठ, धाय के फूल, वनमालिका, गेरु, राळ, रसोत इनका चूर्ण मधु से चढ़ाये । बरगद आदि क्षीर वृक्षों की छाल या कोमल पत्ते जो मिल सकें उनको पीसकर दूध से पिठाये । उत्प्लादि गण के कल्क को पीसकर दूध के साथ देवे । कसेरू, विषाड़ा, कमलकन्द, इनके कल्क को गरम किये दूध से देवे । गुलूर के फल, पानी के कन्द इनके क्वाथ में शर्करा और मधु मिलाकर इससे चावलों को पीसकर देवे । बरगद आदि के क्वाथ में मिंगोये वृक्ष के टुकड़े को योनि में रखे । यदि न दिखाई देने पर वेदना हो मुलहठी, देवदारू, मजीठ, विदारी से सिद्ध दूध पिलाये । अथवा अश्मन्तक, शतावरी, विदारी से या शालपर्णी आदिगण से सिद्ध दूध पिलाये । कटेरी, बड़ी कटेरी, कमल, शतावरी, सारिवा, विदारी और मुलहठी से सिद्ध दूध देवे । इस प्रकार करने से वेदनार्थ शान्त होती हैं, और गर्भ पुष्ट होता है । गर्भ के स्थिर हो जाने पर गुलूर के कच्चे फलों से सिद्धकिये गाय के दूध से भोजन देवे । गर्भपात हो जाने पर लवण और स्नेहों से रक्षित उद्हाल्क ( कोदो ) से बनाई यवागू को पाचनीय (पञ्चकोल आदि) द्रव्यों से मिलाकर, जितने मास का गर्भ पात हुआ हो, उतने दिनों तक पिलाये । वस्ति में शूल होने पर दीपनीय द्रव्यों से युक्त पुराना गुड या अरिष्ट देवे । वायु के उपद्रवों के कारण गर्भ छोतों में छिपा रहता है, फिर वहाँ बहुत दिन रहने पर मर जाता है, इसमें मृदु स्नेहन आदि विधि से चिकित्सा करे ।
उत्कोश—( कुरर ) के मांस रस में बनाई यवागू में प्रचुर पी डालकर पिलाये । उड्डद, तिल, कच्चे बिल्वफल से सिद्ध किये कुलमाषों ( अर्ध स्वित्तु गेहूँ या जौ ) को खाये । मधु मद्य माध्वीक मद्य पीछे से पीये । इस प्रकार सात दिन करे । समय ( प्रसव समय तथा ६ या १० मास ) के बीत जाने पर भी स्थिर रहे । गर्भ में—ऊखल में धान्य डालकर मुसल से कूटे । विषम सवारी या आसन ( स्थिता ) को बरते । वायु से पीड़ित गर्भ सूख जाता है; यह गर्भ माता की कोख को पूरा नहीं भरता और धीमे से गति करता है । इस गर्भ की बृंहणीय द्रव्यों से सिद्ध दूध से और मांस रस से चिकित्सा करे । शुक्र और आर्तव के वायु से आक्रान्त होने पर जीवात्मा का अवतरण हो जाने पर उदर फूलता है, यह गर्भ जब कभी बिना किसी कारण के हो शान्त हो जाता है ( बैठ जाता है या मर जाता है ), तब इसको नेगमेघ ने ले लिया है, ऐसा कहते हैं । यही गर्भ जब भी छिपा रहता है, तब इसको नागोदर कहते हैं, इसमें भी लीनगर्भ की भाँति चिकित्सा करे ।
वक्तव्य—“पुष्पदर्शनादेवेनां मृयात्—शयनं तावन्मृदु-सुखशिशिरास्तरणसंस्तीर्णमोषदवनतशिरस्कं प्रतिपश्यतेति । ततो यथीमधुकरसर्पिभ्यां परमशिशिरेवारिंसंस्थिताभ्यां पितृमाच्छान्यो-पश्यसमोपे स्थापयेत् । तथा शतवौतसहस्रवौताभ्यां सर्पिभ्यांमधो नामेः सर्वतः प्रदिद्यात् ॥ ( २ ) यस्याः पुनरुष्णतीर्णोपयोगाद् गर्भिण्या महति गर्भे जातसारे पुष्पदर्शनं स्यात् अन्यो वा योनि-खाद्यः तस्याः गर्भो बृद्धिं न प्राप्नोति, निःसृतत्वात् । सकालमव-तिष्ठतेऽतिमात्रम् । तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवासव्रत-कर्मपरायाः, पुनः कदाहारायाः स्नेहद्वेषिण्या वातप्रकोपणोक्ता-न्यासेवमानाया गर्भो न बृद्धिं प्राप्नोति, परिशुष्कत्वात् । स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रम् । तन्नागोदरमित्याचक्षते” ॥ चरक० ॥
जैसे गान्धारी का गर्भ समय के बहुत पीछे तक प्रसव नहीं हुआ था—फिर उसने गुस्से में उसे निकाल दिया था । जिस को महर्षि व्यास ने फिर बाहर रखकर पाठा था । ( ३ ) गर्भ नष्ट होना—
असृङ्ग निरुद्धं पवनेन नायाः
गर्भं व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
तदनिनसूर्यश्रमशोकोर्गैः
उष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ॥
दृष्ट्वासूगेवं न च गर्भसंज्ञं
केचिन्नरा भूतद्वतं वदन्ति ॥ चरक ॥
दूध पाक का नियम—
द्रव्यादष्टगुणं क्षीरं क्षीराचोथं चतुर्गुणम् ।
क्षीरावशेषः कर्तव्यः क्षीरपाके स्वयं विधिः ॥ ५७ ॥
अत ऊर्ध्वं मासानुमासिकं वक्ष्यामः—॥ ५८ ॥
मधुर्कं शाकबीजं च पयस्या सुरदारु च ।
अश्मन्तकस्तिलाः कृष्णास्ताम्रवज्रौ शतावरी ॥ ५९ ॥
वृक्षादनी पयस्या च लता सौपलसारिवा ।
अनन्ता सारिवा रास्ता पद्मा मधुकमेव च ॥ ६० ॥
बृहत्स्यो कारमरी चापि क्षीरयुक्तास्त्वच्चो घृतम् ।
पृथिनपर्णी बला शिम्भः श्वदृष्टा मधुपर्णिका ॥ ६१ ॥
शृंगाटकं बिसं द्राक्षा कशेरु मधुर्कं सिता ।
वत्सैते सम योगाः स्युरधरंश्लोकसमापनाः ॥
यथासंख्यं प्रयोक्तव्या गर्भच्छावे पयोयुताः ॥ ६२ ॥
इसके पश्चात् प्रत्येक मास में देने योग्य औषधियाँ कहते हैं । मुलहठी, सागोन के बीज, विदारी और देवदारू, पहले महीने में; अश्मन्तक, तिल, पिप्ली, मजीठ और शतावर, दूसरे मास में; वोदा, विदारी, प्रियंगु, कमलगट्टा, और अनन्त-मूल, तीसरे महीने में; अनन्ता (डुवों या डुरालभा), सारिवा, रास्ता, भागी, और मुलहठी, चौथे मास में । कटेरी, बड़ीकटेरी,
३६४
शारीरस्थानम्
[ अ० १० ]
गम्भारी, बरगद आदि क्षीर वृक्षों के कोमले पत्ते और छाल, घृत, इनको पाँचवें मास में । पृश्निपर्णी, बला, सहजन, गोखरु और गिलोय छठे मास में । सिंधाड़ा, विस, द्राक्षा, कसेरु, मुल्हठी और मिश्री सातवें मास में, प्रत्येक मास में दूध के साथ इनको देवे । ये सात योग आधे श्लोक में कहे गये हैं । गर्भ खाव में क्रमशः दूध के साथ इनको बरतना चाहिये ॥
कपित्थवृहतीबिल्वपटोलेलुनिदिग्धिकाः ।
मूलानि क्षीरसिद्धानि पाययेद्विषगृहमे ॥ ६३ ॥
नवमे मधुकानन्तापयस्यासारिवाः पिवेत ।
क्षीरं शुण्टीपयस्याभ्यां सिद्धं स्यादशमे हितम् ॥ ६४ ॥
सखीरा वा हिता शुण्टी मधुकं सुरदारु च ।
एवमाप्यायते गर्भस्तीव्रा रुक् चोपशाम्यति ॥ ६५ ॥
आठवें मास में—कैय, बड़ी कटेरी, बेल, परवर, ईख, छोटी कटेरी, की जड़ से सिद्ध किया दूध देवे । नवम मास में—मुल्हठी, दूवा, क्षीर विदारी और अतन्त मूल से सिद्ध दूध पीये । दसवें मास में—सोठ और क्षीरकाकोली से सिद्ध किया दूध देना चाहिये । अथवा सोठ, मुल्हठी, देवदारु से सिद्ध किया दूध देवे । इस प्रकार से गर्भ पृष्ठ होता है, और तीव्र वेदना शान्त होती है ॥ ६३-६५ ॥
निवृत्तप्रसवायास्तु पुनः षड्भ्यो वर्षभ्य ऊर्ध्वं प्रसव-मानायां नार्याः कुमारोऽल्पयुर्भवति ॥ ६६ ॥
प्रसव निवृत्ति के पीछे यदि छः साल के ऊपर प्रसूति हो तो बालक अल्पायु होता है ।
वक्तव्य—गर्भाशय या योनि दोष के कारण ही प्रसव-या गर्भाधान होना रुकता है । इनकी चिकित्सा न करने पर यदि आहार-विहार के कारण अचानक गर्भ रहकर प्रसव होता है, तो वह अल्पायु होता है ।
वि० मन्तव्य—किसी २ को १५-२० वर्ष पश्चात् सन्तान होती है या होनी प्रारम्भ हो जाती है ॥ ६६ ॥
अथ गर्भिणी व्याध्युत्पत्तावत्यये छद्वेयेन्मधुरास्लेनात्रो-पहितेनानुलोमयेच्छ, संक्रमनीयं च मृदु विदध्यादनपानयोः, अन्नीयाच्च मृदुवोयं मधुरप्रायं गर्भाविरुद्धं च, गर्भाविरुद्धाच्च क्रिया यथायोगं विदधीत मृदुप्रायाः ॥ ६७ ॥
गर्भवती स्त्री को यदि कोई महान् भयानक रोग उत्पन्न हो जाय तो मधुर-अम्ल अन्न के साथ वमन करे और मधुर-अम्ल अन्न से उसे अनुलोमन कराये । संशमनीय चिकित्सा करे । खान पान में नरम वस्तु देवे । मृदुवीर्य, प्रायः करके मधुर, गर्भ के लिये अविरोधि भोजन करे । गर्भ के अपतिकूल एवं कोमल जो योग्य क्रियायें—उपचार हों, उनको बरते ।
वि० मन्तव्य—सामान्यतः गर्भिणी को वमन विरेचन का निषेध है, तथापि अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर करना चाहिये, यथा—अलसक विलम्बिका आदि विषविकारों में तथा कफजनित विकारों में—वमन तथा पित्तज विकारों में एवं पुरीषरोध आदि में विरेचन आवश्यक होता है ॥ ६७ ॥
सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा ।
मत्स्याक्षकः शंखपुष्पी मधु सर्पिः सकाच्छनम् ॥ ६८ ॥
अर्कपुष्पी मधु घृतं चूर्णितं कनकं वचा ।
हेमचूर्णाणि कैडर्यः श्वेता दूर्वा घृतं मधु ॥ ६९ ॥
चत्वारोऽभिहिताः प्राशाः श्लोकाधृषु चतुष्वर्षि ।
कुमारार्णां वपुर्मधाबलवृद्धिविवर्धनाः ॥ ७० ॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिगोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
तृतीयं शारीरस्थानं समाप्तम् ॥ ३ ॥
( १ ) सुवर्णं भरम, कूठ, मधु घृत और वच इनका उत्तम चूर्ण, ( २ ) ब्राह्मी, शंखपुष्पी, मधु, घी और सुवर्णभरम, ( ३ ) अर्कपुष्पी, मधु, घी, सुवर्ण भरम और वच, ( ४ ) स्वर्ण भरम, वकायन, श्वेता ( अपराजिता ), दूर्वा, घी और मधु, ये चार प्राश आधे श्लोकों से बताये गये हैं । ये योग बालकों के शरीर-मेधा, बल और बुद्धि को बढ़ाते हैं ।
वक्तव्य—कैडर्य का अर्थ गम्भारी उत्तम है । क्योंकि कहा भी है—
गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् ।
शिताकाश्मर्यमधुकैः, हितमुत्थापने पयः ॥ ६८ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां शारीरस्थाने गर्भिणीव्याकरणं
शारीरं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
शारीरकोषुकानि
पंचविशतितत्वानि
२५ पुरुषः
१ अन्यकाम
२ महान्
३ अहंकार
वैकारिकः
( तेजससहायः )
१४ एकादशेन्द्रियाणि
तेजसः
भूतादिः
( तेजससहायः )
१६ पंचतन्मात्राणि
( पञ्चदुर्दोन्द्रियाणि उभयार्थकं मतः )
पञ्चकर्मैन्द्रियाणि
१. शब्दतन्मात्रम् २. स्पर्शतन्मात्रम् ३. रूपतन्मात्रम् ४. रसतन्मात्रम् ५. गन्धतन्मात्रम्
१. श्रोत्रम् २. त्वक् ३. चक्षुः
४. जिह्वा ५. प्राणम्
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
विषयाः—शब्दः स्पर्शः
रसः, गन्धः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
रूपम्,
रसः, गन्धः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
विषयाः—वचनम् - आदानम्, आनन्दम्, विषयीः, विहरणम्
१. वाक् २. हस्तः ३. उपस्थम् ४. पायुः ५. पादः
२०. आकाशं २१. अनिलः २२. अग्नः २३. जलम् २४. उर्वी
२५. उर्वी
३६६
सुश्रुतसंहिता
त्वचां विभागाः
तस्य स्वरवेवंप्रवृत्तस्य ( भूतात्माधिष्ठितस्य ) त्वचः मु० शा० शुक्रशोणितस्याभिपच्यमानस्य वीरस्येव सन्तानिकाः सप्त त्वचो भवन्ति
| संख्या | नाम | कार्यक्रमम् | प्रमाणम् | अधिष्ठानम् |
|---|---|---|---|---|
| प्रथमा | अवभासिनी | सर्ववर्णानवभासयति | ||
| पंचविधां छायां | ||||
| च प्रकाशयति | ब्रीहेरष्टादशभागप्रमाणा | सिध्मपञ्चकटकौ | ||
| द्वितीया | लोहित्वा | ब्रीहिषोडशभागप्रमाणा | तिलकालकन्यच्छव्यंगानि | |
| तृतीया | श्वेता | ब्रीहिद्रादशभागप्रमाणा | चर्मदलम् अजगल्ली मशकः | |
| चतुर्थी | ताम्बा | ब्रीहेरष्टभागप्रमाणा | विविधकिलासकुष्ठानि | |
| पञ्चमी | वेदिनी | ब्रीहिर्पञ्चभागप्रमाणा | कुष्ठविसर्पौ | |
| षष्ठी | रोहिणी | ब्रीहिप्रमाणा | ग्रन्थिः, अपची, अर्मुदम्, रुली | |
| पदम्, गलगण्डम् | ||||
| सप्तमी | मांसधरा | ब्रीहिद्रयप्रमाणा | भगन्दरः, विद्रधिः अर्शः |
कलाः ( सप्त ) ( मु० शा० अ० ४.५. २३ )
धातवाशयान्तरमर्यादाः
| संख्या | नाम | अधिष्ठानम् | कार्यम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | मांसधरा | मांसम् | यस्यां सिरास्त्राद्युधमनीक्षोतसां प्रताना भवन्ति । |
| द्वितीया | रक्तधरा | मांसस्य अभ्यन्तरतः | तस्यां शोणितं विशेषतश्च सिरासु यकृतस्त्रीहानश्च भवन्ति । |
| तृतीया | मेदोधरा | उदरस्थमण्वस्थिषु | |
| चतुर्थी | श्लेष्मधरा | सर्वसन्धिषु | स्नेहाभ्यक्तं यथा हृक्षचक्रं साधु प्रवर्तते संघयः साधु वर्तन्ते संरिलघाः श्लेष्माणः तथा । |
| पञ्चमी | पुरीषधरा | पक्वाशयस्था | या अन्तःकोष्ठे मलमभिभिभजत् यकृतसमन्तात् कोष्ठं च, तथाऽन्नाणि समाश्रिता (सा) उपद्रुकस्थं विभजते मलम् । |
| षष्ठी | पित्तधरा | पक्वामाशयमध्यस्था | या चतुर्विधमन्नपानमुपसुक्तमाशयात् प्रच्युतं पक्वाशयोः पस्थितं धारयति (पाकार्यम्) । |
| सप्तमी | शुक्रधरा | सर्वधारीरन्यापिनी | यथा पयसां सपिस्तु गृहं चेक्षी रसो यथा शरीरेषु तथा शुक्रं विद्यात् । |
शारीरस्थानम्
३६७
अस्थिसंख्याविवरणम्—१
| अस्थिनामानि | संप्रहे | चरके | सुश्रुते | प्रत्यक्षशारीरे |
|---|---|---|---|---|
| नखानि | २० | २० | न गणितानि | न गणितानि |
| अंगुल्यस्थीनि | ६० | ६० | ६० | ५६ |
| अंगुलिशलाकाः | २० | २० | { तलास्थीनि २० | |
| कूर्च-२० | ||||
| गुल्फयोः २० | २० | |||
| अंगुलिशलाकावन्धने | ४ | ४ | पादकूर्चेषु १४ | |
| अंगुलिशलाकाकूर्चास्थीनि | ८ | — | हस्तकूर्चेषु १६ = ३० | |
| गुल्फास्थीनि | ४ | ४ | २ | |
| मणिवन्धवास्थीनि | ४ | २ | २ | |
| पाण्यस्थीनि | २ | २ | — | |
| मणिवन्धौ | २ | — | ||
| — | — | जानुकपालिके २ | ४ | — |
| जंघास्थीनि | ४ | ४ | ४ | ४ |
| प्रकोष्ठास्थीनि | ४ | ४ | ४ | ४ |
| जान्वस्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| कूर्चरी | २ | — | २ | — |
| ज्वरस्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| प्रगण्डास्थीनि | २ | २ | २ | २ |
| पवम् शाखास्थीनि | ||||
| पश्चाः | १४० | १२८ | १२० | १२० |
| पशुकास्थालकानि | २४ | २४ | २४ | २४ |
| पशुकास्थालकावृदानि | २४ | २४ | २४ | — |
| पुष्टे | २४ | २४ | २४ | — |
| उरसि | ३० | ४५ | ३० | कशेदका २४ |
| भंगारिध | ८ | १४ | ८ | उरःफलम् १ |
| त्रिकास्थिनी | १ | १ | १ | — |
| नितंबास्थिनी | १ | — | १ | १ |
| अक्षकास्थिनी | २ | २ | २ | २ |
| अंघास्थिनी | २ | २ | — | २ |
| अंघफलकास्थिनी | २ | — | — | — |
| गुदास्थि | २ | २ | २ | २ |
| — | — | — | १ | १ |
| — | — | — | — | कण्ठास्थि १ |
| पवमन्तराघौ | १२० | १३८ | १७ | ५८ |
३६८
सुश्रुतसंहिता
अस्थिसंख्याविवरणम् (२)
| अस्थिनामानि | संप्रदे | चरके | सुश्रुते | प्रत्यक्षशारीरे |
|---|---|---|---|---|
| ग्रीवायाम् | १३ | १५ | ६ | पृष्ठवंशे |
| कंठनाड्याम् | ४ | — | ४ | गणितानि |
| हनुबन्धने | २ | २ | ३२ | ऊर्ध्वहनु |
| दन्ताः | ३२ | ३२ | ||
| दन्तोद्गुलानि | ३२ | ३२ | नगणिता | |
| नासायाम् | ३ | १ | ३ | |
| शिरसि | ६ | शिरःकपाठानि ४ | ६ | शिरःकपाठानि |
| गण्डास्थिनी | २ | १ | २ | |
| कर्णास्थिनी | २ | — | २ | |
| जनु | २ | २ | — | |
| ताणु | १ | १ | १ | |
| हृन्वस्थि | १ | १ | — | |
| ललाटास्थि | — | — | ||
| — | ||||
| जतुकास्थि | ||||
| क्षभर्रास्थि | ||||
| नासाशुक्रिके | ||||
| नासामध्यसिरिका | ||||
| अभुपीठे | ||||
| एवं ग्रीवाशिरोस्थीनि, | १०० | ६४ | ६३ | केवल शिरोस्थीनि |
| एवम् शरीरेऽस्थि— | ||||
| संख्या— | ३६० | २६० | ३०० | †२०० |
† केवल वृत्तसंख्याकानि कर्णितरास्थीन्यन्तर्गम्य २०६ संख्यामस्यां नृवते ।
अंगप्रत्यंगानि ।
Labels for the human figure (अंगप्रत्यंगानि):
- Head: शिरः (Shira:), अग्नतनम् (Agnatana:), शिरोधरा (Shirodhara), अंसः (Ansa:), स्कन्धाः (Skandha:), उरः (Ura:).
- Neck: रुलाटम् (Rulata:), नासा (Nasa), ओष्ठः (Ostha:), अग्न्यम् (Agnya:), चिबुकः (Chibuka:).
- Torso: प्रवाहुः (Pravahu:), कक्षा (Kaksha), प्रपाणिः (Prapani:), स्तनपर्यन्तः (Stanaparyanta:), स्तनान्तरम् (Stanantar:), हृदयम् (Hridaya:), उदरम् (Udara:), कटिः (Kati:), बस्तिशिः (Bastishira:), मुष्कः (Mushka:), उरुः (Uru:), पाणिः (Pani:), मेदः (Meda:).
- Limbs: अंगुष्ठः (Angusta:), भदेशिनी (तज्जनी) (Badesini (Tajjani)), सङ्कला (Sankala), अनामिका (Anamika), कनिष्ठिका (Kanisthika), जानु (Janu), जङ्घा (Janga), गुल्फः (Gulfa:), पादः (Pada:), पाषाणिः (Pashani:), पादतलम् (Padatala:), प्रपदम् (Prapada:), अङ्गुष्ठः (Angusta:), कनिष्ठिका (Kanisthika), अनामिका (Anamika), मध्यमा (Madhyama), प्रदेशिनी (Pradeshini).
- Grouping: शरीरम् (Sharira:).
This image shows a blank, aged page with a light beige or cream-colored background. The surface has a subtle texture and a few small, faint brown spots or blemishes, particularly towards the bottom left. A thin, dark vertical line runs along the right edge, likely representing the binding or the edge of the paper. There is no text or other content on the page.
This image shows a blank, aged page with a light beige or off-white background. The surface has a subtle texture and shows signs of wear, including minor blemishes, faint smudges, and slight discoloration, particularly towards the edges. There is no text or other content on the page.
मर्मशारीरम् ।
The diagram illustrates the locations of vital points (Marmas) on the human body, labeled in Sanskrit. The labels are as follows:
- Upper Body:
- कुपिरम् (Kupiram) - Shoulder
- ऊर्वी (Urvī) - Axilla
- फुणा (Phuna) - Neck
- लोहिताक्षः (Lohitaakṣaḥ) - Eye
- अपालापः (Apalapah) - Breast
- अपाङ्गः (Apangah) - Navel
- स्थपनी (Sthapnī) - Pubis
- शुङ्गटकानि (Shungatakanī) - Genitalia
- फुणा (Phuna) - Genitalia
- अंसः (Ansah) - Ear
- Lower Body:
- नाभिः (Nabhiḥ) - Navel
- बस्तिः (Bastiḥ) - Groin
- ऊर्वी (Urvī) - Thigh
- जानु (Janu) - Knee
- गुल्फः (Gulphah) - Ankle
- क्षिप्रम् (Kṣipram) - Heel
- Arms:
- हृदयम् (Hṛdayam) - Heart
- इन्द्रवस्तिः (Indravastiḥ) - Elbow
- मणिबन्धः (Maṇibandhah) - Wrist
- Foot:
- कूर्चक्षिरः (Kūrčakṣirah) - Heel
- तलहृदयम् (Talahṛdayam) - Sole
- कूर्चः (Kūrčah) - Sole
- दिप्रम् (Dipram) - Sole
मर्मशारीरम् ।
The diagram illustrates the locations of vital points (Marmas) on the human back and legs. The labels are as follows:
- Right side labels (from top to bottom):
- विधुरम् (Vidhura)
- कृकारिका (Krukarika)
- अंसः (Asa)
- अंसफलकः (Asaphalaka)
- बृहती (Bhuti)
- कूपरम् (Kupa)
- पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
- नितम्बः (Nitamba)
- कुकुन्दरे (Kukundra)
- क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
- गुदम् (Gudam)
- कूर्व (Kurva)
- आणिः (Agni)
- जानु (Janu)
- इन्द्रवस्ति (Indravasti)
- गुल्फः (Gulfa)
- Left side labels (from top to bottom):
- कृकारिका (Krukarika)
- अंसः (Asa)
- अंसफलकः (Asaphalaka)
- बृहती (Bhuti)
- कूपरम् (Kupa)
- पार्श्वसन्धि (Parshvasandhi)
- नितम्बः (Nitamba)
- मणिबन्धः (Manibandha)
- क्रीकतस्त्रणम् (Krikatrasna)
- उर्वी (Urva)
- आणिः (Agni)
- जानु (Janu)
- इन्द्रवस्ति (Indravasti)
- गुल्फः (Gulfa)
This image shows a blank page with a light beige or off-white background. There are several small, dark specks scattered across the surface, which appear to be scanning artifacts or dust. A faint vertical line is visible along the right edge of the page. The overall texture is slightly grainy, typical of a scanned document.
This image shows a blank, aged page from a book or document. The paper has a light beige or off-white color with a slightly textured appearance. There are subtle signs of aging, including faint yellowing and some minor discoloration, particularly along the left edge where it might have been bound. The overall surface is smooth but shows the natural grain of the paper. No text, illustrations, or other markings are present on the page.
मर्मशारीरम् ।
The diagram illustrates the 'Marmashariram' (Vital Points and Organs) of the human body. The labels are as follows:
- Head and Neck:
- अश्वघातः (Ashvaghata) - Forehead
- स्वपनी (Svapani) - Temple
- अपाङ्गः (Apanga) - Side of head
- मन्या (Manya) - Side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
- नीला (Nila) - Side of head
- आवर्तो (Aavarto) - Back of head
- उदक्षेत्रो (Udaksheetro) - Back of head
- शङ्खः (Shanka) - Side of head
- मन्या (Manya) - Side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Side of head
- नीला (Nila) - Side of head
- Upper Body:
- अपस्तम्भः (Apastambha) - Neck
- स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Right breast
- उर्वी (Urvī) - Right breast
- स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Right breast
- कक्षाधरः (Kshadhar) - Right shoulder
- हृदयम् (Hridayam) - Right heart
- उर्वी (Urvī) - Right heart
- अगणिः (Agaṇi) - Right arm
- नाभिः (Nabhi) - Navel
- बस्तिः (Basti) - Right arm
- इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Right arm
- माणबन्धः (Maṇabandha) - Right arm
- कूर्चशिरः (Kurchasira) - Right arm
- कूर्चः (Kurcha) - Right arm
- तलहृदयम् (Talahridayam) - Right arm
- रक्षिमम् (Rakshimam) - Right arm
- उर्वी (Urvī) - Right arm
- आगणिः (Agaṇi) - Right arm
- जानु (Janu) - Right leg
- Lower Body:
- लोहिताक्षम् (Lohitaaksham) - Left breast
- विटपम् (Vitapam) - Left breast
- मणिबन्धः (Maṇibandha) - Left arm
- कूर्परम् (Koorparam) - Left arm
- स्तनमूलम् (Stanamoolam) - Left breast
- उर्वी (Urvī) - Left breast
- स्तनरोहितम् (Stanarohitam) - Left breast
- अपस्तम्भः (Apastambha) - Left neck
- नीला (Nila) - Left side of head
- सिरासातृका (Sirasatruka) - Left side of head
- मन्या (Manya) - Left side of head
- अपाङ्गः (Apanga) - Left side of head
- स्वपनी (Svapani) - Left temple
- अश्वघातः (Ashvaghata) - Left forehead
- गुल्फः (Gulfa) - Left foot
- जानु (Janu) - Left leg
- आगणिः (Agaṇi) - Left leg
- तलहृदयम् (Talahridayam) - Left leg
- कूर्चः (Kurcha) - Left leg
- माणबन्धः (Maṇabandha) - Left leg
- इन्द्रबस्तिः (Indrabasti) - Left leg
- बस्तिः (Basti) - Left leg
- नाभिः (Nabhi) - Navel
- अगणिः (Agaṇi) - Left leg
- गुल्फः (Gulfa) - Left foot
४७
गारीरस्थानम्
३६६
अस्थिसन्धयः २१०
(दशोत्तरे द्वे शते)
सन्धिसंख्यास्थिराः
चेष्टावन्तः
| १ शाखासु | = ६८ |
|---|---|
| २ कोष्ठे | = ५६ |
| ३ मूर्धनि | ८३ |
| २१० = |
| ० | ६८ | |
|---|---|---|
| ५६ | ३ | |
| ७३ | + | १० |
| १२६ | ८१ |
(१) शाखासु—(६८)
अस्थिसन्धिविस्तारवर्णनम्
एकस्मिन् सन्धिन् एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां ३ × ४ = १२
सन्धिसंख्या
(२) अन्तराधी—(५६)
| अंगुष्ठे | = | २ |
|---|---|---|
| गुल्फ, जानुनि वक्षणे, | = | ३ |
| १ १ १ | = | १७ |
| एवं तिसृषु शाखासु | = | १७ × ४ = |
| कटिकपालेषु | = | ३ |
| पृष्ठवशे | = | २४ |
| पार्श्वयोः | = | २४ |
| उरसि | = | ८ |
| ५६ = |
६८
(३) मूर्धनि—(८३)
| श्रीवायाम् | = | ८ |
|---|---|---|
| कंठनाञ्चाम् | = | ३ |
| हृदययकृतकलोमनाडीषु | ||
| कंठनाडीनिबद्धाः | = | १८ |
५६
| दन्तमूलेषु | = | ३२ |
|---|---|---|
| काकलनासामूर्ध्नि | = | ३ |
| १ १ १ |
गंड-कर्ण-शंख-वर्त्त-नेत्र-हनुसंघिषु = १२ २, २, २, २, २, २,
| भ्रुवास्परिघात् | = | २ |
|---|---|---|
| शिखरःकपालेषु | = | ५ |
| ८३ = |
८३
२१०
२१०
३७०
सुश्रुतसंहिता
स्नायूनां नवशतानि [६००]
| १ ग्राखासु | ६०० | एकस्मिन् सविधन | स्नायुसंख्या | |
|---|---|---|---|---|
| एकैकस्यां पादांगुल्याम् | ६ × ५ — ३० | |||
| तलकूर्चगुरुफेषु | १० × ३ — ३० | |||
| जंघायाम् | — ३० | |||
| जानुनि | — १० | |||
| ऊरौ | — १० | |||
| वंशणे | — ३० | |||
| १५० × ४ — ६०० | ||||
| २ कोष्ठे | २३० | कव्याम् | — ६० | ६०० |
| पृष्ठे | — ८० | |||
| पाश्चवयोः | — ६० | |||
| उरसि | — ३० | |||
| २३० | ||||
| ३ ग्रीवां प्रत्युर्ध्वम | ७० | ग्रीवायाम् | — ३६ | २३० |
| मूर्ध्नि | — ३४ | |||
| ७० | ||||
| ६०० | ७० | |||
| ६०० |
द्विविधाः स्नायवः
१ बाह्याः
२ आभ्यन्तराः
चतुर्विधाः स्नायवः
१ प्रतानवत्यः
शाखासु—
२ वृत्ताः
सर्वसंक्षिपु—
३ पृथव्यः
पाश्चोरसि, पृष्ठे शिरसि | आमपक्काशयान्तेषु, वस्तौ
२ सुषिराः
स्नायुकर्मे
एवमेव शरीरेऽस्मिन् यावन्तः सन्धयः स्मृताः । स्नायुमिवदुमिर्बद्धास्तेन भारसहा नराः ॥
शारीरस्थानम्
३७१
पेशीनां पंचशतानि [ ५०० ]
( मांसावयवसंघातः परस्परं विभक्तः 'पेशी' इत्युच्यते )
| (१) शाखासु — ४०० | पेशी संख्या | (३) ग्रीवां प्रत्युर्ध्वम् = ३४ | पेशी संख्या |
|---|---|---|---|
| एकरिमन् सकिध्न — | ग्रीवायाम् — ४ | ||
| एकैकस्यां पादांगुल्यां ३ × ५ = १५ | हन्वोः — ८ | ||
| प्रपदे — १० | काकलकगलयोः — २ | ||
| पादोपरि कूर्चसन्निविष्टाः — १० | १ | ||
| गुल्फ-तलयोः — १० | तालुनि — २ | ||
| ५ ५ | जिह्वायाम् — १ | ||
| गुल्फजान्वन्तरे — २० | ओष्ठयोः — २ | ||
| जातुनि — ५ | नासायाम् — २ | ||
| ऊरौ — २० | नेत्रयोः — २ | ||
| वक्षणे — १० | गण्डयोः — ४ | ||
| १०० × ४ | कर्णयोः — २ | ||
| ४०० | ललाटे — ४ | ३४ | |
| शिरसि — १ | |||
| (२) क्रोष्टे ६६ | ५०० | ||
| पायी — १ | क्षीणां तु विशतिरधिकः | ||
| मेदुं — १ | स्तनयोः ५ × २ = १० | ||
| सेवन्याम् — ३ | अपत्यपथे — ४ | ||
| वृषणयोः — २ | गर्भच्छिद्रसंश्रिताः — ३ | ||
| स्फिनोः ५ × ५ = १० | शुक्रार्तवप्रवेशिन्यः — ३ | ||
| नस्तिशिरसि — २ | ३० | ||
| उदरे — ५ | |||
| नाभ्याम् — १ | |||
| पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टादीर्घाः ५ + ५ = १० | |||
| पाशर्वयोः — ६ | |||
| वक्षसि — १० | |||
| अक्षकांसौ प्रतिसमन्तात् — ७ | |||
| हृदयामाशययोः — २ | |||
| यकृतप्लीहोण्डुकेषु — ६ | |||
| ६६ | |||
| ६६ |
पेशीनां स्थानवशात् नानास्वरूपत्वम् ( प्रकाराः )
१. बहलाः | ७. हृस्वाः | सन्ध्यस्यसिराः स्नायुप्रच्छादकाः पेशीभिः संवृतान्यत्र | पेशीकर्म । सन्वयश्च शरीरिणाम् । बलवन्ति भवन्त्यतः ॥ ---|---|---|--- २. पेलवाः | ८. दीर्घाः ३. स्थूलाः | ९. स्थिराः ४. अणवः | १०. मृदवः ५. प्रथवः | ११. रल्लुणाः ६. वृत्ताः | १२. कर्कशाः
३७२
सुश्रुतसंहिता
सिरासंख्याविवरणम् ( सुश्रुतात् )
( सिरासंख्या-७०० )
मूला सिरा-४०
वातवाहिन्यः १० (अरुणाः)
वातस्थानगताः
१७५
पित्तवाहिन्यः १० (उष्णाः नीलाः)
पित्तस्थानगताः
१७५
कफवाहिन्यः १० (शोताः गौर्घः स्थिराः)
कफस्थानगताः
१७५
रक्तवाहिन्यः १० (नास्त्युष्णशोतलाः रोहिण्यः)
रक्त-(यकृत् प्लीहा) स्थानगताः
१७५
वातवाहिन्यः सिराः १७५
एकस्मिन् सविध्न
२५ × ४ = १००
१००
कोष्ठे—
शोण्याम् गुदमेदाश्रितः
८
पार्श्वयोः द्वे द्वे
४
पुष्टे षट्
६
३४
उदरे षट्
६
वक्षसि दश
१०
जत्रुणः ऊर्ध्वम्
श्रीवायाम्
१४
कर्णयोः
४
जिह्वायाम्
६
नासिकायाम्
६
४१
नेत्रयोः
८
१७५
एवम् पित्तकफरक्तवाहिसिरासु बोद्धव्यम् = ७००
विशेषः पित्तवाहिषु-कर्णयोः २ नेत्रयोः १०
सिराः सप्तशतानि ( ७०० )
व्यधनीयाः सिराः
अव्यधनीयाः सिराः
सिरासंख्याः
| (१) शाखागताः | ३७४ | १६ | ४०० |
|---|---|---|---|
| (२) अन्तराधिगताः | १०४ | ३२ | १३६ |
| (३) मूर्धगताः | ११४ | ५० | १६४ |
| ६०२ | ६८ | ७०० |
शारीरस्थानम्
१७३
व्यधनीयाव्यधनीयसिराणां विस्तारवर्णनम्
सिरासंख्या (७००) (१) शाखागता:— एकस्मिन् सकृन् शतं सिरा: १०० X ४ = ४०० | अव्यधनीयसिरासंख्या (६८) जालन्धरा १ ऊर्वासिजे २ लोहिताक्षसंज्ञा १ ४ X ४ = १६ | ---|---|--- (२) अन्तराधिगता:— श्रोण्याम् ३२ (गुदमेद्वाश्रया: ) | वक्षगुणयो: ( विटपयो: ) ४ कटीकतक्षणयो: ४ ८ | पार्श्वगता: १६ | पार्श्वयो: तयोरुध्वंगाम् एककाम् १ पार्श्वसंधिसंज्ञाम् ( मर्मणि ) १ २ | पृष्ठगता: २४ | पृष्ठवंशमुभयत: द्वे द्वे २ ऊध्वंगामिन्यो २ ४ | ३२ उदरगता: २४ | मेदस्थोपरि रोमराजीमुभयतो २ द्वे द्वे २ ४ | वक्षोगता: ४० १३६ | हृदये द्वे = २ स्तनमूल्यो: = ४ स्तनरोहितयो: = ४ अपस्तम्भयो: = २ अपालापयो: = २ १४ |
१७४
सुश्रुतसंहिता
(३) मूषंगता:— श्रीवागता: | २४ | नीले २ मन्त्र्ये २ = ४ मातुका = ८ कृकाटिकयो: = २ विधुरयो: = २
१६ ---|---|--- हतुगता: | १६ | सन्धिषसंबन्धिन्यौ = २ जिह्वागता: | १६ | रसवेदिन्यौ = २ वाक्प्रवर्तिन्यौ = २
४ नासागता: | २४ | गन्धवेदिन्यौ = २ ताखुनि = १
३ नेत्रगता: ललाटे नासानेत्रगता: | ५६ | उन्मेष निमेषक्रिये अपांगा = ६ २ २ २ केशान्तानुगता आवर्त स्थपनि = ७ ४ २ १
१३ कर्णगता: | १६ | शब्दवाहिन्यौ शंखसंधिगते = ४ २ २ शिरोगता: | १२
१६४
७०० | उत्क्षेपयो: सीमन्तेषु अधिपति = ८ २ ५ १
५०
६८