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तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

११६ | तैत्तिरीयोपनिषद् | [ वल्ली २

११६तैत्तिरीयोपनिषद्[ वल्ली २

गतेन सर्वात्मना नित्यब्रह्मात्म- | प्रकारसे सर्वज्ञ सर्वगत सर्वात्मक स्वरूपेण धर्मादिनिमित्तानपेक्षां- | एवं नित्यब्रह्मात्मस्वरूपसे, धर्मादि श्चक्षुरादिकरणनिरपेक्षांश्च सर्वा- | निमित्तकी अपेक्षासे रहित तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंसे भी निरपेक्ष सम्पूर्ण भोगोंको एक साथ ही प्राप्त कर लेता है—यह इसका तात्पर्य है । विपश्चित्—मेधावी अर्थात् सर्वज्ञ ब्रह्मरूपसे । ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व है वही उसकी विपश्चित्ता (विद्वत्ता) है। उस सर्वज्ञस्वरूप ब्रह्मरूपसे ही वह उन्हें भोगता है । मूलमें ‘इति’ शब्द मन्त्रकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। न्कामान्सहैवाश्नुत इत्यर्थः । | विपश्चिता मेधाविना सर्वज्ञेन । | तद्धि वैपश्चित्यं यत्सर्वज्ञत्वं तेन | सर्वज्ञस्वरूपेण ब्रह्मणाश्नुत इति । | इतिशब्दो मन्त्रपरिसमाप्त्यर्थः । | सर्व एव वल्ल्यर्थो ब्रह्मविदा- | ‘ब्रह्मविदाप्नोति परम्’ इस ब्राह्मण- प्नोति परमिति ब्राह्मणवाक्येन | वाक्यद्वारा इस सम्पूर्ण वल्लीका अर्थ सूत्ररूपसे कह दिया है । उस सूत्रभूत अर्थकी ही मन्त्रद्वारा संक्षेप- सूत्रितः । स च सूत्रितोऽर्थः | संक्षेपतो मन्त्रेण व्याख्यातः । | से व्याख्या कर दी गयी है । अब पुनस्तस्यैव विस्तरेणार्थनिर्णयः | फिर उसीका अर्थ विस्तारसे निर्णय कर्तव्य इत्युत्तरस्तद्वृत्तिस्थानीयो | करना है—इसीलिये उसका वृत्तिरूप ग्रन्थ आरभ्यते तस्माद्वा एतस्मा- | ‘तस्माद्वा एतस्मात्’ इत्यादि आगेका दित्यादिः । | ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है । तत्र च सत्यं ज्ञानमनन्तं | उस मन्त्रमें सबसे पहले ‘सत्यं ^(सत्यं ज्ञानमनन्तं) ब्रह्मेत्युक्तं मन्त्रादौ | ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ऐसा कहा है । वह ^(ब्रह्मेति मीमांस्यते) तत्कथं सत्यं ज्ञान- | सत्य, ज्ञान और अनन्त किस प्रकार मनन्तं चेत्यत आह । तत्र | है ? सो बतलाते हैं—अनन्तता त्रिविधं ह्यानन्त्यं देशतः कालतो | तीन प्रकारकी है—देशसे, कालसे वस्तुतश्चेति । तद्यथा देशतो- | और वस्तुसे । उनमें जैसे आकाश ऽनन्त आकाशः। न हि देशतस्तस्य | देशतः अनन्त है । उसका देशसे


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ परिच्छेदोऽस्ति । न तु काल- | परिच्छेद नहीं है । किन्तु कालसे तश्चानन्त्यं वस्तुतश्चाकाशस्य । | और वस्तुसे आकाशकी अनन्तता कस्मात्कार्यत्वात् । नैवं ब्रह्मण | नहीं है । क्यों नहीं है ? क्योंकि वह आकाशवत्कालतोऽप्यन्तवत्त्वम- | कार्य है । किन्तु आकाशके समान कार्यत्वात् । कार्यं हि वस्तु | किसीका कार्य न होनेके कारण कालेन परिच्छिद्यते । अकार्यं | ब्रह्मका इस प्रकार कालसे भी च ब्रह्म । तस्मात्कालतोऽस्यानन्त्यम् । | अन्तवत्त्व नहीं है । जो वस्तु किसी- | का कार्य होती है वही कालसे | परिच्छिन्न होती है । और ब्रह्म | किसीका कार्य नहीं है, इसलिये | उसकी कालसे अनन्तता है । तथा वस्तुतः । कथं पुनर्वस्तुत | इसी प्रकार वह वस्तुसे भी आनन्त्यं सर्वानन्यत्वात् । भिन्नं हि | अनन्त है । वस्तुसे उसकी अनन्तता वस्तु वस्त्वन्तरस्यान्तो भवति, | किस प्रकार है ? क्योंकि वह सबसे वस्त्वन्तरबुद्धिर्हि प्रसक्ताद्वस्त्व- | अभिन्न है । भिन्न वस्तु ही किसी न्तरान्निवर्तते । यतो यस्य बुद्धे- | अन्य भिन्न वस्तुका अन्त हुआ र्विनिवृत्तिः स तस्यान्तः । तद्यथा | करती है; क्योंकि किसी भिन्न वस्तुमें गोत्वबुद्धिरश्वत्वाद्विनिवर्तत इति | गयी हुई बुद्धि ही किसी अन्य प्रसक्त अश्वत्वान्तं गोत्वमित्यन्तवदेव | वस्तुसे निवृत्त की जाती है । जिस भवति । स चान्तो भिन्नोषु वस्तुषु | [ पदार्थसम्बन्धिनी ] बुद्धिकी जिस दृष्टः । नैवं ब्रह्मणो भेदः । अतो | पदार्थसे निवृत्ति होती है वही उस वस्तुतोऽप्यानन्त्यम् । | पदार्थका अन्त है । जिस प्रकार | गोत्वबुद्धि अश्वत्वबुद्धिसे निवृत्त होती | है, अतः गोत्वका अन्त अश्वत्व हुआ, | इसलिये वह अन्तवान् ही है और | उसका वह अन्त भिन्न पदार्थोंमें ही | देखा जाता है । किन्तु ब्रह्मका ऐसा | कोई भेद नहीं है । अतः वस्तुसे | भी उसकी अनन्तता है ।

११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

११८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


[वाम भाग / संस्कृत मूल एवं भाष्य]

कथं पुनः सर्वानन्यत्वं ब्रह्मण [ब्रह्मणः सर्वात्म्यं निरूप्यते] इत्युच्यते—सर्व- वस्तुकारणत्वात् । सर्वेषां हि वस्तूनां कालाकाशा- दीनां कारणं ब्रह्म । कार्यापेक्षया वस्तुतोऽन्तवत्त्वमिति चेन्न; अनृतत्वात्कार्यवस्तुनः । न हि कारणव्यतिरेकेण कार्यं नाम वस्तुतोऽस्ति यतः कारणबुद्धि- र्विनिवर्तेत । “वाचारम्भणं वि- कारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६ । १ । ४) एवं सदेव सत्यमिति श्रुत्य- न्तरात् । तस्मादाकाशादिकारणत्वाद्दे- शतस्तावदनन्तं ब्रह्म । आकाशो ह्यनन्त इति प्रसिद्धं देशतः, तस्येदं कारणं तस्मात्सिद्धं देशत आत्मन आनन्त्यम् । न ह्यसर्व- गतात्सर्वगतमुत्पद्यमानं लोके किंचिद् दृश्यते । अतो निरति- शयमात्मन आनन्त्यं देशतस्तथा-


[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]

किन्तु ब्रह्मकी सबसे अभिन्नता किस प्रकार है ? सो बतलाते हैं— क्योंकि वह सम्पूर्ण वस्तुओंका कारण है—ब्रह्म काल-आकाश आदि सभी वस्तुओंका कारण है । यदि कहो कि अपने कार्यकी अपेक्षासे तो उसका वस्तुसे अन्तवत्त्व हो ही जायगा, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कार्यरूप वस्तु तो मिथ्या है—वस्तुतः कारणसे भिन्न कार्य है ही नहीं जिससे कि कारणबुद्धिकी निवृत्ति हो “वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है” इसी प्रकार “सत् ही सत्य है”—ऐसा एक अन्य श्रुतिसे भी सिद्ध होता है । अतः आकाशादिका कारण होनेसे ब्रह्म देशसे भी अनन्त है । आकाश देशतः अनन्त है—यह तो प्रसिद्ध ही है, और यह उसका कारण है; अतः आत्माका देशतः अनन्तत्व सिद्ध ही है; क्योंकि लोकमें असर्वगत वस्तुसे कोई सर्वगत वस्तु उत्पन्न होती नहीं देखी जाती । इसलिये आत्माका देशतः अनन्तत्व निरतिशय है [ अर्थात् उससे बड़ा और कोई नहीं है ] । इसी प्रकार


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ ══════════════════════════════════════════════════════════════════════ कार्यत्वात्कालतः, तद्भिन्नवस्त्व- | किसीका कार्य न होनेके कारण वह | कालतः और उससे भिन्न पदार्थका न्तराभावाच्च वस्तुतः । अत एव | सर्वथा अभाव होनेके कारण वस्तुतः | भी अनन्त है । इसलिये आत्माका निरतिशयसत्यत्वम् । | सबसे बढ़कर सत्यत्व है । * | तस्मादिति मूलवाक्यसूत्रितं | [ मन्त्रमें ] 'तस्मात्' ( उससे ) ब्रह्म परामृश्यते । | इस पदद्वारा मूलवाक्यमेंसे सूत्र- सृष्टिक्रमः | रूपसे कहे हुए 'ब्रह्म' पदका एतस्मादितिमन्त्र- | परामर्श किया जाता है । तथा इसके | अनन्तर 'एतस्मात्' इत्यादि मन्त्र- वाक्येनानन्तरं यथालक्षितम् । | वाक्यसे भी पूर्वनिर्दिष्ट ब्रह्मका ही | उल्लेख किया गया है । [ तात्पर्य यह यद्ब्रह्मादौ ब्राह्मणवाक्येन सूत्रितं | है— ] जिस ब्रह्मका पहले ब्राह्मण- | वाक्यद्वारा सूत्ररूपसे उल्लेख किया यच्च सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेत्य- | गया है और जो उसके पश्चात् | 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस प्रकार नन्तरमेव लक्षितं तस्मादेतस्मा- | लक्षित किया गया है उस इस ब्रह्म | —आत्मासे, अर्थात् 'आत्मा' शब्द- द्व्रह्मण आत्मन आत्म- | वाच्य ब्रह्मसे—क्योंकि “तत् सत्यं स | आत्मा” इत्यादि एक अन्य श्रुतिके शब्दवाच्यात् । आत्मा हि | अनुसार वह सबका आत्मा है; अतः तत्सर्वस्य “तत्सत्यं स आत्मा” | यहाँ ब्रह्म ही आत्मा है—उस इस ( छा० उ० ६ । ८–१६ ) इति | आत्मस्वरूप ब्रह्मसे आकाश संभूत— श्रुत्यन्तरादतो ब्रह्मात्मा । तस्मा- | उत्पन्न हुआ । देतस्माद्ब्रह्मण आत्मस्वरूपादाका- | शः संभूतः समुत्पन्नः । | आकाशो नाम शब्दगुणोऽव- | जो शब्द-गुणवाला और समस्त | मूर्त्त पदार्थोंको अवकाश देनेवाला है काशकरो मूर्तद्रव्याणाम् । तस्माद् | उसे 'आकाश' कहते हैं । उस ──────────────────────────────────────────────────────────────────────

  • क्योंकि जो वस्तु अनन्त होती है वही सत्य होती है, परिच्छिन्न पदार्थ कभी सत्य नहीं हो सकता । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१२० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ आकाशात्स्वेन स्पर्शगुणेन पूर्वेण | आकाशसे अपने गुण 'स्पर्श' और च कारणगुणेन शब्देन द्विगुणो | अपने पूर्ववर्ती आकाशके गुण वायुः संभूत इत्यनुवर्तते । | 'शब्द' से युक्त दो गुणवाला वायु वायोश्च स्वेन रूपगुणेन पूर्वाभ्यां | उत्पन्न हुआ । यहाँ प्रथम वाक्यके च त्रिगुणोऽग्निः संभूतः । अग्नेः | 'सम्भूतः' ( उत्पन्न हुआ ) इस स्वेन रसगुणेन पूर्वैश्च त्रिभिश्चतु- | क्रिया पदकी [ सर्वत्र ] अनुवृत्ति की र्गुणा आपः संभूताः । अद्भ्यः | जाती है । वायुसे अपने गुण 'रूप' स्वेन गन्धगुणेन पूर्वैश्चतुर्भिः | और पहले दो गुणोंके सहित तीन पञ्चगुणा पृथिवी संभूता । पृथि- | गुणवाला अग्नि उत्पन्न हुआ । तथा व्या ओषधयः । ओषधीभ्यो- | अग्निसे अपने गुण 'रस' और ऽन्नम् । अन्नाद्रेतोरूपेण परिणतात् | पहले तीन गुणोंके सहित चार पुरुषः शिरःपाण्याद्याकृतिमान् । | गुणवाला जल हुआ । और जलसे स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयो- | अपने गुण 'गन्ध' और पहले चार ऽन्नरसविकारः । पुरुषाकृति- | गुणोंके सहित पाँच गुणवाली पृथिवी भावितं हि सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः | उत्पन्न हुई । पृथिवीसे ओषधियाँ, संभूतं रेतो बीजम्; तस्माद्यो | ओषधियोंसे अन्न और वीर्यरूपमें जायते सोऽपि तथा पुरुषाकृतिरेव | परिणत हुए अन्नसे शिर तथा हाथ- स्यात् । सर्वजातिषु जायमानानां | पाँवरूप आकृतिवाला पुरुष उत्पन्न | हुआ । | वह यह पुरुष अन्नरसमय अर्थात् | अन्न और रसका विकार है । | पुरुषाकारसे भावित [ अर्थात् पुरुष- | के आकारकी वासनासे युक्त ] तथा | उसके सम्पूर्ण अङ्गोंसे उत्पन्न हुआ | तेजोरूप जो शुक्र है वह उसका | बीज है । उससे जो उत्पन्न होता | है वह भी उसीके समान पुरुषाकार | ही होता है; क्योंकि सभी जातियोंमें | उत्पन्न होनेवाले देहोंमें पिताके


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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१

[वाम भाग / Left Column - मूल पाठ]

जनकाकृतिनियमदर्शनात् । सर्वेषामप्यन्नरसविकारत्वे ब्र- ह्मवंशयत्वे चाविशिष्टे कस्मात्पुरुष एव गृह्यते ? प्राधान्यात् । किं पुन: प्राधान्यम् ? कर्मज्ञानाधिकार: । पुरुष एव [कथं पुरुषस्य प्राधान्यम्] हि शक्तत्वाद- र्थित्वादपर्युदस्त- त्वाच्च कर्मज्ञानयोरधिक्रियते— “पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा स हि प्रज्ञानेन संपन्नतमो विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वस्तनं वेद लोकालोकौ मर्त्ये- नामृतमीक्षतीत्येवं संपन्न: । अथेतरेषां पशूनामशनायापिपासे एवाभिविज्ञानम् ।” इत्यादि- श्रुत्यन्तरदर्शनात् ।


[दक्षिण भाग / Right Column - हिन्दी भाष्यार्थ]

समान आकृति होनेका नियम देखा जाता है । शङ्का—सृष्टिमें सभी शरीर समान- रूपसे अन्न और रसके विकार तथा ब्रह्माके वंशमें उत्पन्न हुए हैं; फिर यहाँ पुरुषको ही क्यों ग्रहण किया गया है ? समाधान—प्रधानताके कारण । शङ्का—उसकी प्रधानता क्या है ? समाधान—कर्म और ज्ञानका अधिकार ही उसकी प्रधानता है । [ कर्म और ज्ञानके साधनमें ] समर्थ, [ उनके फलकी ] इच्छावाला और उससे उदासीन न होनेके कारण पुरुष ही कर्म और ज्ञानका अधिकारी है । “पुरुषमें ही आत्माका पूर्णतया आविर्भाव हुआ है; वही प्रकृष्ट ज्ञानसे सबसे अधिक सम्पन्न है । वह जानी-बूझी बात कहता है, जाने-बूझे पदार्थोंको देखता है, वह कल होनेवाली बात भी जान सकता है, उसे उत्तम और अधम लोकोंका ज्ञान है तथा वह कर्म-ज्ञानरूप नश्वर साधनके द्वारा अमर पदकी इच्छा करता है—इस प्रकार वह विवेकसम्पन्न है । उसके सिवा अन्य पशुओंको तो केवल भूख- प्यासका ही विशेष ज्ञान होता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति देखनेसे भी [ पुरुषकी प्रधानता सिद्ध होती है ] ।


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१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१२२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २


वाम भाग (संस्कृत पाठ)

स हि पुरुष इह विद्ययान्तर- तमं ब्रह्म संक्रामयितुमिष्टः । तस्य च बाह्याकारविशेषेष्वनात्मस्वा- त्मभाविता बुद्धिरनालम्ब्य विशेषं कंचित्सहसान्तरतमप्रत्यगात्म- विषया निरालम्बना च कर्तु- मशक्येति दृष्टशरीरात्मसामान्य- कल्पनया शाखाचन्द्रनिदर्शन- वदन्तः प्रवेशयन्नाह — तस्येदमेव शिरः । तस्यास्य पुरुषस्यान्नरसमय- स्येदमेव शिरः प्रसिद्धम् । प्राणमयादिष्वशिरसां शिरस्त्वदर्शनादिहापि तत्प्रसङ्गो मा भूदितीदमेव शिर इत्युच्यते । एवं पक्षादिषु योजना । अयं


पार्श्व-टिप्पणी (Marginal Note)

पक्ष्यात्मनान्न- मयस्य निरूपणम्


दक्षिण भाग (हिन्दी अनुवाद)

उस पुरुषको ही यहाँ ( इस वल्लीमें ) विद्याके द्वारा सबकी अपेक्षा अन्तरतम ब्रह्मके पास ले जाना अभीष्ट है । किन्तु उसकी बुद्धि, जो बाह्याकार विशेषरूप अनात्म पदार्थोंमें आत्मभावना किये हुए है, किसी विशेष आलम्बनके बिना एकाएक सबसे अन्तरतम प्रत्य- गात्मसम्बन्धिनी तथा निरालम्बना की जानी असम्भव है; अतः इस दिखलायी देनेवाले शरीररूप आत्मा- की समानताकी कल्पनासे शाखा- चन्द्र दृष्टान्तके समान उसका भीतरकी ओर प्रवेश कराकर श्रुति कहती है— उसका यह [ शिर ] ही शिर है । उस इस अन्नरसमय पुरुषका यह प्रसिद्ध शिर ही [ शिर है ] । [ अगले अनुवाकमें ] प्राणमय आदि शिररहित कोशोंमें भी शिरस्त्व देखा जानेके कारण यहाँ भी वही बात न समझी जाय [ अर्थात् इस अन्नमय कोशको भी वस्तुतः शिररहित न समझा जाय ] इसलिये 'यह प्रसिद्ध शिर ही उसका शिर है'—ऐसा कहा जाता है । इसी प्रकार पक्षादिके विषयमें लगा लेना चाहिये । पूर्वाभि-


पाद-लेख (Footer)

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अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३

दक्षिणो बाहुः पूर्वाभिमुखस्य | मुख व्यक्तिका यह दक्षिण [ दक्षिण दक्षिणः पक्षः । अयं सव्यो बाहु- | दिशाकी ओरका ] बाहु दक्षिण रुत्तरः पक्षः । अयं मध्यमो देह- | पक्ष है, यह वाम बाहु उत्तर पक्ष भाग आत्माङ्गानाम् । "मध्यं | है तथा यह देहका मध्यभाग अङ्गों- ह्येषामङ्गानामात्मा" इति श्रुतेः । | का आत्मा है; जैसा कि "मध्यभाग इदमिति नाभेरधस्ताद्यदङ्गं | ही इन अङ्गोंका आत्मा है" इस तत्पुच्छं प्रतिष्ठा । प्रतितिष्ठत्यन- | श्रुतिसे प्रमाणित होता है । और येति प्रतिष्ठा पुच्छमिव पुच्छम् | यह जो नाभिसे नीचेका अङ्ग है अधोलम्बनसामान्याद्यथा गोः | वही पुच्छ—प्रतिष्ठा है । इसके पुच्छम् । | द्वारा वह स्थित होता है, इसलिये यह एतत्प्रकृत्योत्तरेषां प्राणमया- | उसकी प्रतिष्ठा है । नीचेकी ओर दीनां रूपकत्वसिद्धिः; मूषानिषि- | लटकनेमें समानता होनेके कारण क्तद्रुतताम्रप्रतिमावत् । तदप्येष | वह पुच्छके समान पुच्छ है; जैसे श्लोको भवति । तत्तस्मिन्नेवार्थे | कि गौकी पूँछ । ब्राह्मणोक्तेऽन्नमयात्मप्रकाशक | इस अन्नमय कोशसे आरम्भ एष श्लोको मन्त्रो भवति ॥ १ ॥ | करके ही साँचेमें डाले हुए पिघले | ताँबेकी प्रतिमाके समान आगेके | प्राणमय आदि कोशोंके रूपकत्वकी | सिद्धि होती है । उसके विषयमें ही | यह श्लोक है; अर्थात् अन्नमय | आत्माको प्रकाशित करनेवाले उस | ब्राह्मणोक्त अर्थमें ही यह श्लोक | अर्थात् मन्त्र है ॥ १ ॥

इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां प्रथमोऽनुवाकः ॥ १ ॥

द्वितीय अनुवाक अन्नकी महिमा तथा प्राणमय कोशका वर्णन अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीꣳ- श्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्य- न्ततः । अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नꣳ हि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद्भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयाद्- न्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ अन्नसे ही प्रजा उत्पन्न होती है। जो कुछ प्रजा पृथिवीको आश्रित करके स्थित है वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है; फिर वह अन्नसे ही जीवित रहती है और अन्तमें उसीमें लीन हो जाती है; क्योंकि अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ (अग्रज—पहले उत्पन्न होनेवाला) है। इसीसे वह सर्वौषध कहा जाता है। जो लोग 'अन्न ही ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करते हैं वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न प्राप्त करते हैं। अन्न ही प्राणियोंमें बड़ा है; इसलिये वह सर्वौषध कहलाता है। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते हैं। अन्न CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५

प्राणियोंद्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हींको खाता है । इसीसे वह 'अन्न' कहा जाता है । उस इस अन्नरसमय पिण्डसे, उसके भीतर रहनेवाला दूसरा शरीर प्राणमय है । उसके द्वारा यह ( अन्नमय कोश ) परिपूर्ण है। वह यह ( प्राणमय कोश ) भी पुरुषाकार ही है । उस ( अन्नमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । उसका प्राण ही शिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है । आकाश आत्मा ( मध्यभाग ) है और पृथिवी पुच्छ—प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥ अन्नाद्रसादिभावपरिणतात्, | रसादिरूपमें परिणत हुए अन्नसे [अन्नमयोपासन-] वा इति स्मरणार्थः, | ही स्थावर-जङ्गमस्वरूप प्रजा उत्पन्न [फलम्] प्रजाः स्थावरजङ्ग- | होती है । 'वै' यह निपात स्मरणके माः प्रजायन्ते । याः काश्चा- | अर्थमें है । जो कुछ प्रजा अविशेष विशिष्टाः पृथिवीं श्रिताः पृथि- | भावसे पृथिवीको आश्रित किये हुए है वीमाश्रितास्ताः सर्वा अन्नादेव | वह सब अन्नसे ही उत्पन्न होती है । प्रजायन्ते । अथो अपि जाता | और फिर उत्पन्न होनेपर वह अन्नसे अन्नेनैव जीवन्ति प्राणान्धार- | ही जीवित रहती—प्राण धारण यन्ति वर्धन्त इत्यर्थः । अथाप्ये- | करती अर्थात् वृद्धिको प्राप्त होती है । नदन्नमपियन्त्यपिगच्छन्ति । | और अन्तमें—जीवनरूप वृत्तिकी अपिशब्दः प्रतिशब्दार्थे । | समाप्ति होनेपर वह अन्नमें ही लीन अन्नं प्रति प्रलीयन्त इत्यर्थः । | हो जाती है । [ 'अपियन्ति' इसमें ] अन्ततोऽन्ते जीवनलक्षणाया | 'अपि' शब्द 'प्रति' के अर्थमें है । वृत्तेः परिसमाप्तौ । | अर्थात् वह अन्नके प्रति ही लीन | हो जाती है । कस्मात् ? अन्नं हि यस्माद् | इसका कारण क्या है ? क्योंकि भूतानां प्राणिनां ज्येष्ठं प्रथमजम् । | अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ यानी अन्नमयादीनां हीतरेषां भूतानां | अग्रज है । अन्नमय आदि जो इतर | प्राणी हैं उनका कारण अन्न ही है ।

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१२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१२६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणमन्नमतोऽन्नप्रभवा अन्न- | इसलिये सम्पूर्ण प्रजा अन्नसे उत्पन्न होनेवाली, अन्नके द्वारा जीवित रहनेवाली और अन्नमें ही लीन हो जानेवाली है । क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये अन्न सर्वौषध—सम्पूर्ण प्राणियोंके देहके सन्तापको शान्त करनेवाला कहा जाता है । जीवना अन्नप्रलयाश्च सर्वाः प्रजाः। यस्माच्चैवं तस्मात्सर्वौषधं सर्व- प्राणिनां देहदाहप्रशमनमन्न- मुच्यते । अन्नब्रह्मविदः फलमुच्यते— | अन्नरूप ब्रह्मकी उपासना करनेवालेका [ प्राप्तव्य ] फल बतलाया जाता है—वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न-समूहको प्राप्त कर लेते हैं । कौन ? जो उपर्युक्त अन्नकी ही ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं । किस प्रकार [ उपासना करते हैं ] ? इस तरह कि मैं अन्नसे उत्पन्न, अन्नस्वरूप और अन्नमें ही लीन हो जानेवाला हूँ; इसलिये अन्न ब्रह्म है । सर्वं वै ते समस्तमन्नजात- माप्नुवन्ति । के ? येऽन्नं ब्रह्म यथोक्तमुपासते । कथम् ? अन्नजो- ऽन्नात्मान्नप्रलयोऽहं तस्मादन्नं ब्रह्मेति । कुतः पुनः सर्वान्नप्राप्तिफल- | 'अन्न ही आत्मा है' इस प्रकारकी उपासना किस प्रकार सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्तिरूप फलवाली है, सो बतलाते हैं—अन्न ही प्राणियोंका ज्येष्ठ है—प्राणियोंसे पहले उत्पन्न होनेके कारण, क्योंकि वह उनसे ज्येष्ठ है इसलिये वह सर्वौषध कहा जाता है। अतः सम्पूर्ण अन्नकी आत्मारूपसे उपासना करनेवालेके लिये सम्पूर्ण अन्नकी प्राप्ति उचित ही है। अन्नसे प्राणी उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न मन्नात्मोपासनमित्युच्यते । अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् । भूतेभ्यः पूर्वं निष्पन्नत्वाज्ज्येष्ठं हि यस्मा- त्तस्मात्सर्वौषधमुच्यते । तस्मादुप- पन्ना सर्वान्नात्मोपासकस्य सर्वा- न्नप्राप्तिः। अन्नाद्भूतानि जायन्ते ।

अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७

संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी भाष्यार्थ
जातान्यन्नेन वर्धन्त इत्युपसंहा-होनेपर अन्नसे ही वृद्धिको प्राप्त होते
रार्थं पुनर्वचनम् ।हैं—यह पुनरुक्ति उपासनाके
उपसंहारके लिये है ।
इदानीमन्ननिर्वचनमुच्यते—अब 'अन्न' शब्दकी व्युत्पत्ति
(अन्नशब्द-निर्वचनम्) अद्यते भुज्यते चैव यद्भूतैरन्नमत्ति चकही जाती है—जो प्राणियोंद्वारा 'अद्यते'— खाया जाता है और जो स्वयं भी प्राणियोंको 'अत्ति' खाता
भूतानि स्वयं तस्माद्भूतैर्भु-है, इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंका भोज्य
और उनका भोक्ता होनेके कारण
ज्यमानत्वाद्भूतभोक्तृत्वाच्चान्नंभी वह 'अन्न' कहा जाता है ।
तदुच्यते । इतिशब्दः प्रथमकोश-इस वाक्यमें 'इति' शब्द प्रथम
कोशके विवरणकी परिसमाप्तिके
परिसमाप्त्यर्थः ।लिये है ।
अन्नमयादिभ्य आनन्दमया-अनेक तुषाओंवाले धानोंको
तुषरहित करके जिस प्रकार चावल
(अन्नमयकोश-निरासः) न्तेभ्य आत्मभ्योऽभ्यन्तरतमं ब्रह्मनिकाल लिये जाते हैं उसी प्रकार अन्नमयसे लेकर आनन्दमय कोश-
विद्यया प्रत्यगात्मत्वेन दिदर्श-पर्यन्त सम्पूर्ण शरीरोंकी अपेक्षा
आन्तरतम ब्रह्मको विद्याके द्वारा अपने
यिषुः शास्त्रमविद्याकृतपञ्चकोशा-प्रत्यगात्मरूपसे दिखलानेकी इच्छा-
पनयेनानेकतुषकोद्रववितुषी-वाला शास्त्र अविद्याकल्पित पाँच
करणेनेव तदन्तर्गततण्डुलान्कोशोंका बाध करता हुआ 'तस्माद्वा
प्रस्तौति तस्माद्वा एतस्मादन्नरस-एतस्मादन्नरसमयात्' इत्यादि वाक्य-
मयादित्यादि ।से आरम्भ करता है—
तस्मादेतस्माद्यथोक्तादन्नरस-उस इस पूर्वोक्त अन्नरसमय
पिण्डसे अन्य यानी पृथक् और
(प्राणमयकोश-निर्वचनम्) मयात्पिण्डादन्यो व्यतिरिक्तोऽन्तरो-उसके भीतर रहनेवाला आत्मा, जो अन्नरसमय पिण्डके समान मिथ्या
ऽभ्यन्तर आत्मा पिण्डवदेव मिथ्याही आत्मारूपसे कल्पना किया हुआ

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१२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ परिकल्पित आत्मत्वेन प्राणमयः | है, प्राणमय है। प्राण-वायु उससे प्राणो वायुस्तन्मयस्तत्प्रायः । तेन | युक्त अर्थात् तत्प्राय [ यानी उसमें प्राणमयेनान्नरसमय आत्मैष पूर्णो | प्राणकी ही प्रधानता है ]। जिस | प्रकार वायुसे धोंकनी भरी रहती है वायुनेव दृतिः । स वा एष प्राण- | उसी प्रकार उस प्राणमयसे यह | अन्नरसमय शरीर भरा हुआ है। मय आत्मा पुरुषविध एव पुरुषा- | वह यह प्राणमय आत्मा पुरुषविध | अर्थात् शिर और पक्षादिके कारण कार एव, शिरःपक्षादिभिः । | पुरुषाकार ही है। किं स्वत एव, नेत्याह । | क्या वह स्वतः ही पुरुषाकार | है ? इसपर कहते हैं—नहीं, [प्राणमयस्य] प्रसिद्धं तावदन्नरस- | अन्नरसमय शरीरकी पुरुषाकारता तो [पुरुषविधत्वम्] मयस्यात्मनः पुरुष- | प्रसिद्ध ही है; उस अन्नरसमय- विधत्वम् । तस्यान्नरसमयस्य पुरुष- | की पुरुषविधता—पुरुषाकारताके | अनुसार साँचेमें ढली हुई प्रतिमाके विधतां पुरुषाकारतामनु अयं | समान यह प्राणमय कोश भी प्राणमयः पुरुषविधो मूषानिषिक्त- | पुरुषाकार है—स्वतः ही पुरुषाकार प्रतिमावन्न स्वत एव । एवं पूर्वस्य | नहीं है। इसी प्रकार पूर्व-पूर्वकी | पुरुषाकारता है और उसके अनुसार पूर्वस्य पुरुषविधतामनूत्तरोत्तरः | पीछे-पीछेका कोश भी पुरुषाकार है; पुरुषविधो भवति पूर्वः पूर्व- | तथा पूर्व-पूर्व कोश पीछे-पीछेके श्चोत्तरोत्तरेण पूर्णः । | कोशसे पूर्ण ( भरा हुआ ) है। कथं पुनः पुरुषविधतास्य | इसकी पुरुषाकारता किस प्रकार | है ? सो बतलायी जाती है—उस इत्युच्यते। तस्य प्राणमयस्य प्राण | प्राणमयका प्राण ही शिर है। एव शिरः । प्राणमयस्य वायु- | वायुके विकाररूप प्राणमय कोशका विकारस्य प्राणो मुखनासिका- | मुख और नासिकासे निकलनेवाला | प्राण, जो मुख्य प्राणकी वृत्तिविशेष निसरणो वृत्तिविशेषः शिर एव | है, श्रुतिके वचनानुसार शिररूपसे ही

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अनु० २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९ परिकल्प्यते वचनात् । सर्वत्र | कल्पना किया जाता है । इसके वचनादेव पक्षादिकल्पना । | सिवा आगे भी श्रुतिके वचनानुसार व्यानो व्यानवृत्तिर्दक्षिणः पक्षः । | ही पक्ष आदिकी कल्पना की गयी | है । व्यान अर्थात् व्यान नामकी अपान उत्तरः पक्षः । आकाश | वृत्ति दक्षिण पक्ष है, अपान उत्तर | पक्ष है, आकाश आत्मा है। यहाँ आत्मा । य आकाशस्थो वृत्ति- | प्राण-वृत्तिका अधिकार होनेके कारण विशेषः समानाख्यः स आत्मेवा- | [ 'आकाश' शब्दसे ] आकाशमें त्मा; प्राणवृत्त्यधिकारात् । | स्थित जो समानसंज्ञक प्राणकी | वृत्ति है वही आत्मा है । अपने मध्यस्थत्वादितराः पर्यन्ता वृत्ती- | आसपासकी अन्य सब वृत्तियोंकी रपेक्ष्यात्मा । "मध्यं ह्येषामङ्गा- | अपेक्षा मध्यवर्तिनी होनेके कारण नामात्मा" इति श्रुतिप्रसिद्धं | वह आत्मा है । "इन अंगोंका मध्य | आत्मा है" इस श्रुतिसे मध्यवर्ती अंग- मध्यमस्थस्यात्मत्वम् । | का आत्मत्व प्रसिद्ध ही है । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । | पृथिवी पुच्छ-प्रतिष्ठा है। 'पृथिवी' पृथिवीति पृथिवीदेवताध्यात्म- | इस शब्दसे पृथिवीकी अधिष्ठात्री कस्य प्राणस्य धारयित्री स्थिति- | देवी समझनी चाहिये; क्योंकि | स्थितिकी हेतुभूत होनेसे वही हेतुत्वात् । "सैषा पुरुषस्यापान- | आध्यात्मिक प्राणको भी धारण मवष्टभ्य" (प्र० उ० ३।८) इति हि | करनेवाली है । इस विषयमें "वह | पृथिवी-देवता पुरुषके अपानको श्रुत्यन्तरम् । अन्यथोदानवृत्त्यो- | आश्रय करके" इत्यादि एक दूसरी र्ध्वगमनं गुरुत्वाच्च पतनं वा | श्रुति भी है । अन्यथा प्राणकी | उदानवृत्तिसे या तो शरीर ऊपरको स्याच्छरीरस्य। तस्मात्पृथिवी देवता | उड़ जाता अथवा गुरुतावश गिर पुच्छं प्रतिष्ठा प्राणमयस्यात्मनः । | पड़ता । अतः पृथिवी-देवता ही | प्राणमय शरीरकी पुच्छ-प्रतिष्ठा है । तत्तस्मिन्नेवार्थे प्राणमयात्मविषय | उसी अर्थमें अर्थात् प्राणमय आत्माके एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ | विषयमें ही यह श्लोक प्रसिद्ध है ॥१॥ इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां द्वितीयोऽनुवाकः ॥ २ ॥ तै० उ० १७-१८- CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

तृतीय अनुवाक प्राणकी महिमा और मनोमय कोशका वर्णन प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूता- नामायुः । तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मात्प्राणमयाद्- न्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधतामन्वयं पुरुष- विधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १ ॥ देवगण प्राणके अनुगामी होकर प्राणन-क्रिया करते हैं तथा जो मनुष्य और पशु आदि हैं [ वे भी प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं ] । प्राण ही प्राणियोंकी आयु ( जीवन ) है । इसीलिये वह 'सर्वायुष' कहलाता है । जो प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना करते हैं वे पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । प्राण ही प्राणियोंकी आयु है । इसलिये वह 'सर्वायुष' कहलाता है । उस पूर्वोक्त ( अन्नमय कोश ) का यही देहस्थित आत्मा है । उस इस प्राणमय कोशसे दूसरा इसके भीतर रहनेवाला आत्मा मनोमय है । उसके द्वारा यह पूर्ण है । वह यह [ मनोमय कोश ] भी पुरुषाकार ही है । उस ( प्राणमय कोश ) की पुरुषाकारताके अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । यजुः ही उसका शिर है, ऋक् दक्षिण पक्ष है, CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

[Page Header] अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१


साम उत्तर पक्ष है, आदेश आत्मा है तथा अथर्वाङ्गिरस पुच्छ— प्रतिष्ठा है । उसके विषयमें ही यह श्लोक है ॥ १ ॥


[बायाँ स्तम्भ - संस्कृत भाष्य]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । [हाशिया: प्राणस्य प्राधान्यम्] देवा अग्न्यादयः प्राणं वाय्वात्मानं प्राणनशक्तिमन्तमनु तदात्म- भूताः सन्तः प्राणन्ति प्राणन- कर्म कुर्वन्ति प्राणनक्रियया क्रियावन्तो भवन्ति । अध्यात्मा- धिकाराद्देवा इन्द्रियाणि प्राणमनु प्राणन्ति मुख्यंप्राणमनु चेष्टन्त इति वा । तथा मनुष्याः पशवश्च ये ते प्राणनकर्मणैव चेष्टावन्तो भवन्ति । अतश्च नान्नमयैनैव परिच्छि- न्नेनात्मनात्मवन्तः प्राणिनः । किं तर्हि ? तदन्तर्गतेन प्राणमये- नापि साधारणेनैव सर्वपिण्ड- व्यापिनात्मवन्तो मनुष्यादयः । एवं मनोमयादिभिः पूर्वपूर्वव्या- पिभिरुत्तरोत्तरैः सूक्ष्मैरानन्दम- यान्तैराकाशादिभूतारब्धैरविद्या- कृतैरात्मवन्तः सर्वे प्राणिनः । तथा स्वाभाविकेनाप्याकाशादि-


[दायाँ स्तम्भ - हिन्दी भाष्यार्थ]

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति—अग्नि आदि देवगण प्राणनशक्तिमान् वायु- रूप प्राणके अनुगामी होकर अर्थात् तद्रूप होकर प्राणन-क्रिया करते हैं; यानी प्राणन-क्रियासे क्रियावान् होते हैं । अथवा यहाँ अध्यात्म- सम्बन्धी प्रकरण होनेसे [ यह समझना चाहिये कि ] देव अर्थात् इन्द्रियाँ प्राणके पीछे प्राणन करती यानी मुख्य प्राणकी अनुगामिनी होकर चेष्टा करती हैं । तथा जो भी मनुष्य और पशु आदि हैं वे ही प्राणन-क्रियासे ही चेष्टावान् होते हैं । इससे जाना जाता है कि प्राणी केवल परिच्छिन्नरूप अन्नमय कोशसे ही आत्मवान् नहीं हैं । तो क्या है ? वे मनुष्यादि जीव उसके अन्तर्वर्ती सम्पूर्ण पिण्डमें व्याप्त साधारण प्राणमय कोशसे भी आत्मवान् हैं । इस प्रकार पूर्व-पूर्व कोशमें व्यापक मनोमयसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त, आकाशादि भूतोंसे होनेवाले अविद्याकृत कोशों- से सम्पूर्ण प्राणी आत्मवान् हैं । इसी प्रकार वे स्वभावसे ही


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१३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ कारणेन नित्येनाविकृतेन सर्व- | आकाशादिके कारण, नित्य, गतेन सत्यज्ञानानन्तलक्षणेन | निर्विकार, सर्वगत, सत्य, ज्ञान एवं | अनन्तरूप, पञ्चकोशातीत सर्वात्मासे पञ्चकोशातिगेन सर्वात्मनात्म- | भी आत्मवान् हैं। वही परमार्थतः वन्तः। स हि परमार्थत आत्मा | सबका आत्मा है—यह बात भी सर्वेषामित्येतदप्यर्थादुक्तं भवति। | इस वाक्यके तात्पर्यसे कह ही दी | गयी है। प्राणं देवा अनु प्राणन्तीत्युक्तं | देवगण प्राणके पीछे प्राणन- तत्कस्मादित्याह । प्राणो हि | क्रिया करते हैं—ऐसा पहले कहा यस्माद्भूतानां प्राणिनामायुर्जीव- | गया। ऐसा क्यों है? सो बतलाते नम् । “यावद्ध्यस्मिञ्शरीरे प्राणो | हैं—क्योंकि प्राण ही प्राणियोंका वसति तावदायुर” (कौ० उ० | आयु—जीवन है। “जबतक इस ३। २) इति श्रुत्यन्तरात्। | शरीरमें प्राण रहता है तभीतक तस्मात्सर्वायुषम् । सर्वेषामायुः | आयु है” इस एक अन्य श्रुतिसे भी सर्वायुः सर्वायुरेव सर्वायुषमित्यु- | यही सिद्ध होता है। इसीलिये वह च्यते । प्राणापगमे मरणप्रसिद्धेः। | ‘सर्वायुष’ है। सबकी आयुका नाम प्रसिद्धं हि लोके सर्वायुष्ट्वं | ‘सर्वायु’ है, ‘सर्वायु’ ही ‘सर्वायुष’ प्राणस्य । | कहा जाता है; क्योंकि प्राण-प्रयाण- | के अनन्तर मृत्यु हो जाना प्रसिद्ध | ही है। प्राणका सर्वायु होना तो | लोकमें प्रसिद्ध ही है। अतोऽस्माद्वाह्यादसाधारणाद- | अतः जो लोग इस बाह्य प्राणोपासन- न्नमयादात्मनोऽप- | असाधारण (व्यावृत्तरूप) अन्नमय फलम् क्रम्यान्तः साधा- | कोशसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसके | अन्तर्वर्ती और साधारण [सम्पूर्ण रणं प्राणमयमात्मानं ब्रह्मोपासते | इन्द्रियोंमें अनुगत] प्राणमय कोश- येऽहमस्मि प्राणः सर्वभूताना- | को ‘मैं प्राण सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ मात्मायुर्जीवनहेतुत्वादिति ते । और उनके जीवनका कारण होनेसे सर्वमेवायुरस्मिँल्लोके यन्ति; नाप- । उनकी आयु हूँ' इस प्रकार ब्रह्मरूपसे मृत्युना म्रियन्ते प्राक्प्राप्तादायुष । उपासना करते हैं वे इस लोकमें इत्यर्थः । शतं वर्षाणीति तु युक्तं । पूर्ण आयुको प्राप्त होते हैं । अर्थात् “सर्वमायुरेति” ( छा० उ० २ । । प्रारब्धवश प्राप्त हुई आयुसे पूर्व ११–२०, ४ । ११–१३ ) इति । अपमृत्युसे नहीं मरते । “पूर्ण आयु- श्रुतिप्रसिद्धेः । । को प्राप्त होता है” ऐसी श्रुति-प्रसिद्धि किं कारणं प्राणो हि भूता- । होनेके कारण यहाँ [ 'सर्वायु' नामायुस्तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति । । शब्दसे ] सौ वर्ष समझने चाहिये । । [ प्राणको सर्वायु समझनेका ] यो यद्गुणं ब्रह्मोपास्ते स तद्- । क्या कारण है ? क्योंकि प्राण ही । प्राणियोंकी आयु है इसलिये वह गुणभागभवतीति विद्याफलप्राप्ते- । 'सर्वायुष' कहा जाता है । जो । व्यक्ति जैसे गुणवाले ब्रह्मकी उपासना हेत्वर्थं पुनर्वचनं प्राणो हीत्यादि । । करता है वह उसी प्रकारके गुणका । भागी होता है—इस प्रकार विद्याके तस्य पूर्वस्यान्नमयस्यैष एव । फलकी प्राप्तिके इस हेतुको प्रदर्शित । करनेके लिये 'प्राणो हि भूताना- शारीरेऽन्नमये भवः शारीर । मायुः' इत्यादि वाक्यकी पुनरुक्ति की । गयी है । यही उस पूर्वकथित आत्मा । कः ? य एष प्राणमयः । । अन्नमय कोशका शारीर—अन्नमय । शरीरमें रहनेवाला आत्मा है । कौन ? । जो कि यह प्राणमय है । तस्माद्वा एतस्मादित्युक्तार्थ- । 'तस्माद्वा एतस्मात्' इत्यादि शेष [मनोमयकोश-] मन्यत् । अन्यो- । पदोंका अर्थ पहले कह चुके हैं । [निर्वचनम्] ऽन्तर आत्मा मनो- । दूसरा अन्तर-आत्मा मनोमय है । । संकल्प-विकल्पात्मक अन्तःकरणका मयः । मन इति संकल्पाद्यात्म- । नाम मन है; जो तद्रूप हो उसे कमन्तःकरणं तन्मयो मनोमयो । मनोमय कहते हैं; जैसे

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २

१३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २ यथान्नमयः । सोऽयं प्राणमय- होनेके कारण ] अन्नमय कहा गया स्याभ्यन्तर आत्मा । तस्य यजु- है । वह इस प्राणमयका अन्तर्वर्ती आत्मा है । उसका यजुः ही शिर रेव शिरः । यजुरित्यनियताक्षर- है । जिनमें अक्षरोंका कोई नियम पादावसानो मन्त्रविशेषस्तज्जा- नहीं है ऐसे पादोंमें समाप्त होनेवाले मन्त्रविशेषका नाम यजुः है । उस तीयवचनो यजुःशब्दस्तस्य जातिके मन्त्रोंका वाचक 'यजुः' शिरस्त्वं प्राधान्यात् । प्राधान्यं च शब्द है । उसे प्रधानताके कारण शिर कहा गया है । यागादिमें यागादौ संनिपत्योपकारकत्वात् । संनिपत्य उपकारक * होनेके कारण यजुषा हि हविर्दीयते स्वाहाका- यजुः-मन्त्रोंकी प्रधानता है; क्योंकि स्वाहा आदिके द्वारा यजुर्मन्त्रोंसे ही रादिना । हवि दी जाती है । वाचनिकी वा शिरआदि- अथवा इन सब प्रसंगोंमें शिर आदिकी कल्पना श्रुतिवाक्यसे ही कल्पना सर्वत्र । मनसो हि समझनी चाहिये । अक्षरोंके [उच्चारणके] स्थान, [आन्तरिक] प्रयत्न, स्थानप्रयत्ननादस्वरवर्णपदवाक्य- [उससे उत्पन्न हुआ] नाद, [उदात्तादि] स्वर, [अकारादि] वर्ण, [उनसे रचे हुए] विषया तत्संकल्पात्मिका पद और [पदोंके समूहरूप] वाक्यसे सम्बन्ध रखनेवाली तथा उन्हींके तद्भाविता वृत्तिः श्रोत्रादिकरण- संकल्प और भावसे युक्त जो श्रवणादि इन्द्रियोंके द्वारा उत्पन्न होनेवाली द्वारा यजुःसंकेतविशिष्टा यजुः 'यजुः' संकेतविशिष्ट मनकी वृत्ति है

  • यज्ञाङ्ग दो प्रकारके होते हैं—एक संनिपत्य उपकारक और दूसरे आरात् उपकारक । उनमें जो अङ्ग साक्षात् अथवा परम्परासे प्रधान यागके कलेवरकी पूर्ति कर उसके द्वारा अपूर्वकी उत्पत्तिमें उपयोगी होते हैं वे संनिपत्य उपकारक कहलाते हैं । यजुर्मन्त्र भी यागशरीरको निष्पन्न करनेवाले होनेसे संनिपत्य उपकारक हैं । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप

अनु० ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

इत्युच्यते । एवमृगेवं साम | वही 'यजुः' कही जाती है । इस च । | प्रकार 'ऋक्' और ऐसे ही 'साम' | को भी समझना चाहिये ।* एवं च मनोवृत्तित्वे मन्त्राणां | इस प्रकार मन्त्रोंके मनोवृत्तिरूप | होनेपर ही उस वृत्तिका आवर्तन वृत्तिरेवावर्त्यत इति मानसो जप | करनेसे उनका मानसिक जप किया | जाना ठीक हो सकता है । अन्यथा उपपद्यते । अन्यथाविषयत्वान्म- | घटादिके समान मनके विषय न | होनेके कारण तो मन्त्रोंकी आवृत्ति न्त्रो नावर्तयितुं शक्यो घटादि- | भी नहीं की जा सकती थी और | उस अवस्थामें मानसिक जप होना वदिति मानसो जपो नोपपद्यते । | सम्भव ही नहीं था । किन्तु मन्त्रोंकी | आवृत्तिका तो बहुत-से कर्मोंमें विधान मन्त्रावृत्तिश्च चोद्यते बहुशः | किया ही गया है [ इससे उसकी | असम्भावना तो सिद्ध हो नहीं कर्मसु । | सकती ] ।

  • 'यजुः' आदि शब्दोंसे यजुर्वेद आदि ही समझे जाते हैं । परन्तु यहाँ जो उन्हें मनोमय कोशके शिर आदि रूपसे बतलाया गया है उसमें यह शंका होती है कि उनका उससे ऐसा क्या सम्बन्ध है जो वे उसके अङ्गरूपसे बतलाये गये हैं ? इस वाक्यमें भगवान् भाष्यकारने उसी बातको स्पष्ट किया है । इसका तात्पर्य यह है कि यजुः, साम अथवा ऋक् आदि मन्त्रोंके उच्चारणमें सबसे पहले अन्यान्य शब्दोंके उच्चारणके समान मनका ही व्यापार होता है । पहले कण्ठ अथवा तालु आदि स्थानोंसे जठराग्निद्वारा प्रेरित वायुका आघात होता है, उससे अस्फुट नादकी उत्पत्ति होती है; फिर क्रमशः स्वर और अकारादि वर्ण अभि- व्यक्त होते हैं । वर्णोंके संयोगसे पद और पदसमूहसे वाक्यकी रचना होती है । इस प्रकार मानसिक सङ्कल्प और भावसे ही यजुः आदि मन्त्र अभिव्यक्त होकर श्रोत्रेन्द्रियसे ग्रहण किये जाते हैं । अतः मनोवृत्तिसे उत्पन्न होनेवाले होनेके कारण ही यहाँ यजुर्विषयक मनोवृत्तिको 'यजुः', ऋग्विषयक वृत्तिको 'ऋक्' और सामविषयक वृत्तिको 'साम' कहा गया है; तथा इस प्रकारकी यजुर्वृत्ति ही मनोमय कोशकी शीर्षस्थानीय है । CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri