भारतकोश
संग्रह पर लौटें

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ७ Abstaining from activity with regard to directions, country, and purposeless sin, periodical concentration, fasting at regular intervals, limiting consumable and non-consumable things, and partaking of one’s food after feeding an ascetic, are the minor or supplementary vows. मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता ॥२२॥ व्रतधारी श्रावक [ मारणान्तिकीं ] मरण के समय होने वाली [ सल्लेखनां ] सल्लेखना को [ जोषिता ] प्रीतिपूर्वक सेवन करें। The householder courts voluntary death at the end of his life. शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः ॥२३॥ [ शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः ] शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टि की प्रशंसा और अन्यदृष्टि का संस्तव - ये पाँच [ सम्यग्दृष्टेः अतिचाराः ] सम्यग्दर्शन के अतिचार हैं। 102

अध्याय - ७ Doubt in the teachings of the Jina, desire for worldly enjoyment, repugnance or disgust at the afflicted, admiration for the knowledge and conduct of the wrong believer, and praise of wrong believers, are the five transgressions of the right believer. व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥२४॥ [ व्रतशीलेषु ] व्रत और शीलों में भी [ यथाक्रमं ] अनुक्रम से प्रत्येक में [ पञ्च पञ्च ] पाँच-पाँच अतिचार हैं। There are five, five transgressions respectively for the vows and the supplementary vows. बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥२५॥ [ बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ] बन्ध, वध, छेद, अधिक भार लादना और अन्न-पान का निरोध करना - ये पाँच अहिंसाणुव्रत के अतिचार हैं। Binding, beating, mutilating limbs, overloading, and withholding food and drink. 103

अध्याय - ७ मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार- साकारमन्त्रभेदाः ॥२६॥ [ मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार- साकारमन्त्रभेदाः ] मिथ्या उपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखाक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रभेद - ये पाँच सत्याणुव्रत के अतिचार हैं। Perverted teaching, divulging what is done in secret, forgery, misappropriation, and proclaiming others’ thoughts. स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिक- मानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥२७॥ चोरी के लिये चोर को प्रेरणा करना या उसका उपाय बताना, चोर से चुराई हुई वस्तु खरीदना, राज्य की आज्ञा के विरुद्ध चलना, देने-लेने के बाँट तराजू आदि कम-ज्यादा रखना और कीमती वस्तु में कम कीमत की वस्तु मिलाकर असली भाव से बेचना - ये अचौर्याणुव्रत के अतिचार हैं। Prompting others to steal, receiving stolen goods, under-buying in a disordered state, using false weights and measures, and deceiving others with artificial or imitation goods. 104

अध्याय - ७ परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीताऽपरिगृहीता- गमनानंगक्रीड़ाकामतिव्राभिनिवेशाः ॥२८॥ दूसरे के पुत्र-पुत्रियों का विवाह करना-कराना, पति-सहित व्यभिचारिणी स्त्रियों के पास आना-जाना, लेन-देन रखना, रागभाव पूर्वक बात-चीत करना, पति-रहित व्यभिचारिणी स्त्री (वेश्यादि) के यहाँ आना-जाना, लेन-देन आदि का व्यवहार रखना, अनंगक्रीड़ा अर्थात् कामसेवन के लिये निश्चित् अंगों को छोड़कर अन्य अंगों से कामसेवन करना और कामसेवन की तीव्र अभिलाषा - ये पाँच ब्रह्मचर्या वृत के अतिचार हैं। Bringing about marriage, intercourse with an unchaste married woman, cohabitation with a harlot, perverted sexual practices, and excessive sexual passion. क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्य- प्रमाणातिक्रमाः ॥२९॥ [ क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रमाः ] क्षेत्र और रहने के स्थान के परिमाण का उल्लंघन करना, [ हिरण्यसुवर्णप्रमाणातिक्रमाः ] चाँदी और सोने के परिमाण का उल्लंघन करना, [ धनधान्यप्रमाणातिक्रमाः ] धन (पशु आदि) तथा धान्य के 105

अध्याय - ७ परिमाण का उल्लंघन करना, [ दासीदासप्रमाणातिक्रमाः ] दासी और दास के परिमाण का उल्लंघन करना तथा [ कुप्यप्रमाणातिक्रमाः ] वस्त्र, बर्तन आदि के परिमाण का उल्लंघन करना - ये पाँच अपरिग्रह अणुव्रत के अतिचार हैं। Exceeding the limits set by oneself with regard to cultivable lands and houses, riches such as gold and silver, cattle and corn, men and women servants, and clothes. ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥३०॥ [ ऊर्ध्वव्यतिक्रमः ] माप से अधिक ऊंचाई वाले स्थलों में जाना, [ अधःव्यतिक्रमः ] माप से नीचे (कुँआ, खान आदि) स्थानों में उतरना, [ तिर्यग्व्यतिक्रमः ] समान स्थान के माप से बहुत दूर जाना, [ क्षेत्रवृद्धिः ] की हुई मर्यादा में क्षेत्र को बढ़ा लेना और [ स्मृत्यन्तराधानं ] क्षेत्र की की हुई मर्यादा को भूल जाना - ये पाँच दिग्व्रत के अतिचार हैं। Exceeding the limits set in the directions, namely upwards, downwards and horizontally, enlarging the boundaries in the accepted directions, and forgetting the boundaries set, are the five transgressions of the minor vow of direction. 106

अध्याय - ७ आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः ॥३१॥ [ आनयनं ] मर्यादा से बाहर की चीज को मंगाना, [ प्रेष्यप्रयोगः ] मर्यादा से बाहर नौकर आदि को भेजना, [ शब्दानुपातः ] खांसी, शब्द आदि से मर्यादा के बाहर जीवों को अपना अभिप्राय समझा देना, [ रूपानुपातः ] अपना रूप आदि दिखाकर मर्यादा के बाहर के जीवों को इशारा करना और [ पुद्गलक्षेपाः ] मर्यादा के बाहर कंकर, पत्थर आदि फेंककर अपने कार्य का निर्वाह कर लेना - ये पाँच देशव्रत के अतिचार हैं। Sending for something outside the country of one’s resolve, commanding someone there to do thus, indicating one’s intentions by sounds, by showing oneself, and by throwing clod etc.


कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग- परिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥ [ कन्दर्प ] राग से हास्यसहित अशिष्ट वचन बोला, [ कौत्कुच्यं ] शरीर की कुचेष्टा करके अशिष्ट वचन बोलना, [ मौखर्यं ] धृष्टतापूर्वक जरूरत से ज्यादा बोलना, [ असमीक्ष्याधिकरणं ] बिना प्रयोजन मन, वचन, काय की ••••••••••••••••••••••••• 107

अध्याय - ७ प्रवृत्ति करना और [ उपभोग-परिभोगानर्थक्यं ] भोग-उपभोग के पदार्थों का जरूरत से ज्यादा संग्रह करना - ये पाँच अनर्थदंडव्रत के अतिचार हैं। Vulgar jokes, vulgar jokes accompanied by gesticulation, garrulity, unthinkingly indulging in too much action, keeping too many consumable and non-consumable objects, are the five transgressions of the vow of desisting from unnecessary sin. योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३३॥ [ योगदुष्प्रणिधानं ] मन सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना, वचन सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना, काय सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना, [ अनादर ] सामायिक के प्रति उत्साह रहित होना, [ स्मृत्यनुपस्थानं ] एकाग्रता के अभाव को लेकर सामायिक के पाठ आदि भूल जाना - ये पाँच सामायिक शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Misdirected three-fold activity, lack of earnestness, and fluctuation of thought, are the five transgressions of concentration. 108

अध्याय - ७ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान- संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥३४॥ [ अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादर- स्मृत्यनुपस्थानानि ] बिना देखी, बिना शोधी जमीन में मल-मूत्रादि क्षेपण करना, बिना देखे, बिना शोधे पूजन के उपकरण ग्रहण करना, बिना देखे, बिना शोधे जमीन पर चटाई, वस्त्र आदि बिछाना, भूख आदि से व्याकुल हो आवश्यक धर्म-कार्य उत्साह-रहित होकर करना और आवश्यक धर्म-कार्यों को भूल जाना - ये पाँच प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Excreting, handling sandalwood paste, flowers etc., and spreading mats and garments without inspecting and cleaning the place and the materials, lack of earnestness, and lack of concentration. सचित्तसम्बन्धसम्मिश्राभिषवदुःपक्वाहाराः ॥३५॥ 1- सचित्त-जीववाले (कच्चे फल आदि) पदार्थ, 2- सचित्त पदार्थ के साथ सम्बन्ध वाले पदार्थ, 3- सचित्त पदार्थ से मिले हुये पदार्थ, 4- अभिषव - गरिष्ठ पदार्थ, और 5- दुःपक्व अर्थात् आधे पके या अधिक पके हुए या बुरी 109

अध्याय - ७ तरह से पके पदार्थ - इनका आहार करना - ये पाँच उपभोग-परिभोग परिमाण शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Victuals containing (one-sensed) organisms, placed near organisms, mixed with organisms, stimulants, and ill-cooked food. सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥ [ सचित्तनिक्षेपः ] सचित्त पत्र आदि में रखकर भोजन देना, [ सचित्तापिधानं ] सचित्त पत्र आदि से ढके हुये भोजन आदि को देना [ परव्यपदेशः ] दूसरे दातार की वस्तु को देना [ मात्सर्य ] अनादरपूर्वक देना अथवा दूसरे दातार की वस्तु को ईर्ष्यापूर्वक देना और [ कालातिक्रमः ] योग्य काल का उल्लंघन करके देना - ये पाँच अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत के अतिचार हैं। Placing the food on things with organisms such as green leaves, covering it with such things, food of another host, envy, and untimely food. 110

अध्याय - ७ जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥ [ जीविताशंसा ] सल्लेखना धारण करने के बाद जीने की इच्छा करना, [ मरणाशंसा ] वेदना से व्याकुल होकर शीघ्र मरने की इच्छा करना, [ मित्रानुरागः ] अनुराग के द्वारा मित्रों का स्मरण करना, [ सुखानुबन्ध ] पहले भोगे हुये सुखों का स्मरण करना और [ निदानं ] निदान करना अर्थात् आगामी विषय-भोगों की वांछा करना - ये पाँच सल्लेखनाव्रत के अतिचार हैं। Desire for life, desire for death, recollection of affection for friends, recollection of pleasures, and constant longing for enjoyment. अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥ [ अनुग्रहार्थं ] अनुग्रह-उपकार के हेतु से [ स्वस्यातिसर्गः ] धन आदि अपनी वस्तु का त्याग करना सो [ दानं ] दान है। Charity is the giving of one’s wealth to another for mutual benefit. विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३९॥ [ विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात् ] विधि, द्रव्य, दातृ और पात्र की विशेषता से [ तद्विशेषः ] दान में विशेषता होती है। 111

अध्याय - ७ The distinction with regard to the effect of a gift consists in the manner, the thing given, the nature of the giver, and the nature of the recipient. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥ 112

अध्याय ७: पञ्च महाव्रत, अणुव्रत व शीलाचरण

अध्याय - ८ अथ अष्टमोऽध्यायः Bondage of Karma मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥ [ मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगाः ] मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग - ये पाँच [ बंधहेतवः ] बन्ध के कारण हैं। Wrong belief, non-abstinence, negligence, passions, and activities are the causes of bondage. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥२॥ [ जीवः सकषायत्वात् ] जीव कषायसहित होने से [ कर्मणः योग्यान्पुद्गलान् ] कर्म के योग्य पुद्गल परमाणुओं को [ आदत्ते ] ग्रहण करता है [ स बन्धः ] वह बन्ध है। The individual self attracts particles of matter which are fit to turn into karma, as the self is actuated by passions. This is bondage. प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥ [ तत् ] उस बन्ध के [ प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशाः ] प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध [ विधयः ] ये चार भेद हैं। 113

अध्याय - ८ Bondage is of four kinds according to the nature or species of karma, duration of karma, fruition of karma, and the quantity of space-points of karma. आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नाम- गोत्रान्तरायाः ॥४॥ [ आद्यो ] पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध [ ज्ञानदर्शनावरण- वेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ] ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय - इन आठ प्रकार का है। The type-bondage is of eight kinds, knowledge- obscuring, perception-obscuring, feeling-producing, deluding, life-determining, name-determining (physique-making), status-determining, and obstructive karmas. पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥ [ यथाक्रमम् ] उपरोक्त ज्ञानावरणादि आठ कर्मों के अनुक्रम से [ पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदाः ] पाँच, नव, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच भेद हैं। 114

अध्याय - ८ The subdivisions are five, nine, two, twenty-eight, four, forty-two, two, and five kinds respectively. मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥ [ मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ] मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण, ये ज्ञानावरण कर्म के पाँच भेद हैं। Karmas which obscure sensory knowledge, scriptural knowledge, clairvoyance, telepathy, and omniscience, are the five kinds of knowledge- obscuring karmas. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचला- प्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ॥७॥ [ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां ] चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरण [ निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ] निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला और स्त्यानगृद्धि - ये नव भेद दर्शनावरण कर्म के हैं। 115

अध्याय - ८ सदसद्वेद्ये ॥८॥ [ सदसद्वेद्ये ] सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो वेदनीय कर्म के भेद हैं। दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनव- षोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन- विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥ [ दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्याः ] दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और

अध्याय - ८ कषायवेदनीय - ये चार भेदरूप मोहनीय कर्म के हैं और इसके अनुक्रम से [ त्रिद्विनवषोडशभेदाः ] तीन, दो, नव और सोलह भेद हैं। वे इस प्रकार से हैं - [ सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयानि ] सम्यक्त्व मोहनीय, मिथ्यात्व मोहनीय और सम्यग्मिथ्यात्वमोहनीय - ये दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं; [ अकषायकषायौ ] अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय ये दो भेद चारित्र मोहनीय के हैं; [ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदाः ] हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद - ये अकषायवेदनीय के नव हैं; और [ अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाः च ] अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान तथा संज्वलन के भेद से तथा [ एकशः क्रोधमानमायालोभाः ] इन प्रत्येक के क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार प्रकार - ये सोलह भेद कषायवेदनीय के हैं। इस तरह मोहनीय कर्म के कुल अट्ठाईस भेद हैं। The deluding karmas are of twenty-eight kinds. These are the three subtypes of faith-deluding karmas¹, the two types of conduct-deluding karmas ¹ The three subtypes of faith-deluding karmas are wrong belief, mixed right and wrong belief, and right belief slightly clouded by wrong belief. 117

अध्याय - ८ which cause (and which are caused by) the passions and quasi-passions, the subtypes of the passions² and the quasi-passions³ being sixteen and nine respectively. नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥ [ नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ] नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु – ये चार भेद आयुकर्म के हैं। (The life-karmas determine the quantum of life in the states of existence as) infernal beings, plants and animals, human beings, and celestial beings. गतिजातशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥११॥ ² The passions are four – anger, pride, deceitfulness, and greed. Each of these four is further divided into four classes, namely that which leads to infinite births, that which hinders partial abstinence, that which disturbs complete self-restraint, and that which interferes with perfect conduct. Thus the passions make up sixteen. ³ The quasi-passions are nine, namely laughter, liking, disliking, sorrow, fear, disgust, the male sex-passion, the female sex-passion, and the neuter sex-passion. 118

अध्याय - ८ [ गतिजातिशरीरांगोपांगनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थान- संहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यगुरुलघूपघात- परघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः ] गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, आनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति - ये इक्कीस, तथा [ प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्ति- स्थिरादेययशःकीर्तिसेतराणि ] प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय और यशःकीर्ति - ये दस तथा इनसे उलटे दस अर्थात् साधारण शरीर, स्थावर, दुर्भग, दुस्वर, अशुभ, बादर (-स्थूल), अपर्याप्ति, अस्थिर, अनादेय और अपयशःकीर्ति - ये दस, [ तीर्थकरत्वं च ] और तीर्थकरत्व, इस तरह नामकर्म के कुल ब्यालीस भेद हैं। The name (physique-making) karmas comprise the state of existence, the class, the body, the chief and secondary parts, formation, binding (union), molecular interfusion, structure, joint, touch, taste, odour, colour, movement after death, neither heavy nor light, self-annihilation, annihilation by others, emitting warm splendour, emitting cool lustre, respiration, gait, individual body, mobile being, amiability, a melodious voice, beauty of form, minute body, complete development (of the organs), firmness, lustrous body, glory and renown, and the •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• 119

अध्याय - ८ opposites of these (commencing from individual body), and Tīrthakaratva. उच्चैर्नीचैश्च ॥१२॥ [ उच्चैर्नीचैश्च ] उच्चगोत्र और नीचगोत्र - ये दो भेद गोत्र कर्म के हैं। The high and the low. दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥१३॥ [ दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ] दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय - ये पाँच भेद अन्तराय कर्म के हैं। प्रकृतिबन्ध के उपभेदों का वर्णन यहाँ पूर्ण हुआ। The obstructive karmas are of five kinds, obstructing the making of gifts, gain, enjoyment of consumable things, enjoyment of non-consumable things, and effort (energy). आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥१४॥ 120

अध्याय - ८ [ आदितस्तिसृणाम् ] आदि से तीन अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, तथा वेदनीय [ अन्तरायस्य च ] और अन्तराय - इन चार कर्मों की [ परा स्थितिः ] उत्कृष्ट स्थिति [ त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः ] तीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। The maximum duration of the three main types (primary species) from the first and obstructive karmas is thirty sāgaropama kotīkotī. सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥१५॥ [ मोहनीयस्य ] मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ सप्ततिः ] सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर की है। Seventy sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the deluding karmas. विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥१६॥ [ नामगोत्रयोः ] नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति [ विंशतिः ] बीस कोड़ाकोड़ी सागर की है। Twenty sāgaropama kotīkotī is the maximum duration of the name-karma and the status- determining karma. 121