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उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पार्थिवप्रकरणम् १४७ भी परमार्थतत्त्व का अर्थात् देहातिरिक्त आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर अभिमानरहित होता हुआ इस अत्यन्त निर्मल ज्ञान को प्राप्त कर पुरुष सर्वथा मुक्त हो जाता है। अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यभूत संस्कारों से रहित होकर परमानन्दानुभवरूप ब्रह्मात्मस्वरूप हो जाता है ॥ ७३ ॥ न हीह लाभोऽभ्यधिकोऽस्ति कश्चन स्वरूपलाभात् स इतो हि नान्यतः । न देयमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकं स्वरूपलाभं त्वपरीक्ष्य यत्नतः ॥७४॥ नहीति—इस संसार में स्वरूपलाभ (आत्मलाभ) से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। वह लाभ वेदान्त- वाक्यों से ही हो सकता है, किसी अन्य उपाय (साधन) से नहीं। अतः इस आत्मलाभ को, जो इन्द्रलोक के राज्य से भी बढ़कर है, उसे प्रयत्न पूर्वक परीक्षा किये बिना किसी को नहीं देना चाहिये ॥ ७४ ॥ हृदयस्पर्शिनी गुणविशेषविशिष्ट शिष्य की परीक्षा करने की गुरु को आवश्यकता क्यों होती है ? जिस किसी भी आये हुए शिष्य को यह आत्मविद्या क्यों नहीं दी जाती ? इस संसार (देव-मनुष्यादि जन्मपरंपरा) में आत्मतत्त्वज्ञान (स्वरूपलाभ) से बढ़कर कोई दूसरा लाभ नहीं है१। और वह लाभ वेदान्तवाक्यों से ही हो सकता है, अर्थात् तत्त्व मस्यादि वाक्य का पदार्थविवेक करनेवाले मुमुक्षु को ही निःसंदिग्ध (निर्विचिकित्स) ‘अहं ब्रह्म’ इस प्रकार साक्षात्कार- रूप ज्ञान, जो वेदान्तवाक्य से उत्पन्न हुआ है, वही मोक्ष प्राप्त कराने में हेतु होता है; किसी अन्य शास्त्रान्तरों से नहीं होता है। इस कारण शिष्य की प्रयत्नपूर्वक परीक्षा किये बिना इस स्वरूपलाभ कराने वाले ज्ञान को नहीं देना चाहिये। क्योंकि यह लाभ इन्द्रलोक के राज्य से भी कहीं अधिक बढ़कर है। अतः ऐसे-वैसे किसी भी अनधिकारी शिष्य को यह ज्ञान कभी भी न दे। श्रुति ने भी यही आज्ञा दी है२ ॥ ७४ ॥ ॥ इति षोडशम्पार्थिवप्रकरणं समाप्तम् ॥ १. ‘आत्मलाभान्न परं विद्यते’—(आप. ध. १।२२।२) २. ‘प्राणाय्याय वान्तेवासिने नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूयः’—(छां. उ. ३।११।६)

पद्यभाग १७: सम्यङ्मतिप्रकरणम्

सम्यङ्मतिप्रकरणम् आत्मा ज्ञेयः परो ह्यात्मा यस्मादन्यन्न विद्यते । सर्वज्ञः सर्वदृक् शुद्धस्तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ॥१॥ आत्मेति—तत्त्वजिज्ञासु मनुष्य को आत्मज्ञान अवश्य प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि सांसारिक जितने भी ज्ञेय पदार्थ हैं, उन सब से वह उत्कृष्ट है। तथा उससे पृथक् कोई अन्य पदार्थ है ही नहीं। वह (आत्मा) सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा (सर्वसाक्षी) और शुद्ध है। उस ज्ञातव्य (ज्ञेय) स्वरूप आत्मा को मेरा नमस्कार है ॥ १ ॥ हृदयस्पार्शिनी मोक्षसाधनभूत ज्ञान को परपक्ष का निराकरण करते हुए अभी तक बताया गया, अब अपनी प्रक्रिया के अनुसार भी उसे व्यक्त करने की इच्छा से प्रकरणान्तर का आरम्भ कर देवताभक्ति को विद्याप्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन बताते हुए प्रणाम करने के व्याज से प्रकरणप्रतिपाद्य अर्थ को संक्षेप से बता रहे हैं। आत्मा का ज्ञान स्वरूपतः प्राप्त करना चाहिये। किन्तु घटज्ञान में ज्ञान का विषय मानकर घट का ज्ञान प्राप्त करते हैं, उस तरह आत्मज्ञान को नहीं मानना चाहिये। वह (आत्मा) यच्चयावत् समस्त ज्ञेय पदार्थों से उत्कृष्ट है। वह (आत्मा) ज्ञेयत्वधर्म से रहित है। क्योंकि उस आत्मा (स्वरूप) से भिन्न कोई अन्य पदार्थ, या उसका धर्म वस्तुतः नहीं है। तथाच—रूपरहित होने से चक्षुरादि इन्द्रिय का वह गोचर (विषय) नहीं है। तथा अपने तुल्य (स्व-समानजातीय) किसी अन्य व्यक्ति का प्रत्यक्ष न रहने से (प्रत्यक्ष व्यक्त्यन्तर के अभाव के कारण) व्याप्तिग्रह (व्याप्तिज्ञान) के न हो पाने के कारण अनुमान तथा अर्थापत्ति प्रमाण का भी वह विषय नहीं है। उसके सदृश अन्य वस्तु के न होने के कारण वह उपमान का भी विषय नहीं है। जाति, गुण, क्रिया आदि धर्मों के न होने से शब्दप्रमाण का भी वह विषय नहीं है। और ज्ञाता तो स्वरूप (आत्मा) ही है, उस कारण 'नास्ति'-नहीं है—यह भी स्वीकार नहीं कर सकते। परिशेषात् विषयभूत देह, इन्द्रिय, अन्तःकरण आदि का प्रत्याख्यान (निषेध) करते हुए अन्वेषण करने पर विषय के स्वरूप से रहित बल्कि समस्त विषयों का साक्षी ऐसा स्वयंप्रकाश आत्मा जानने योग्य है, अर्थात् ज्ञेय है। एवं त्वंपदार्थ शोधन कर, वह (त्वम्) तत् पदार्था्रूप ही है, और वही वाक्यार्थ है, यह बताने के लिये 'तत्' पदार्थ को बता रहे हैं—ग्रन्थकार ने 'सर्वज्ञ' और 'सर्वदृक्' दो शब्दों का प्रयोग किया है। उनमें 'सर्वज्ञ' उसे कहते हैं, जो सामान्यतः सब जानता है— 'सामान्यतः सर्वं जानातीति सर्वज्ञः'। और विशेषतः जो सब देखता है, उसे 'सर्वदृक्' कहते हैं—'विशेषतः सर्वं पश्यतीति सर्वदृक्'। सर्वज्ञत्व को उपलक्षण (तटस्थलक्षण) बताकर उसके स्वरूपलक्षण को कह रहे हैं कि वह अनृत, जड़, परिच्छिन्न, दुःखादि प्रपञ्च के संसर्ग से रहित, सत्य-ज्ञान-अनन्त-आनन्दरूप है। और 'तत्'-'त्वम्' इन दो पदार्थों का जो ऐक्य (एकता) वही वाक्यार्थ है। ऐसे सर्वज्ञत्त्वाद्युपलक्षित सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्द, सर्वसाक्षी, शुद्ध, ज्ञेयस्वरूप आत्मा के लिये प्रणाम (प्रह्वीभाव) है। यहाँ पर 'भेददृष्टि का विलय' होना ही 'नमः' शब्द का अर्थ है ॥ १ ॥ पदवाक्यप्रमाणज्ञैर्दीपभूतैः प्रकाशितम् । ब्रह्म वेदरहस्यं यैस्तान्नित्यं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥२॥ पदवाक्येति—पद (व्याकरण), वाक्य (मीमांसा), और प्रमाण (न्यायशास्त्र) अर्थात् पद-वाक्य-प्रमाण- पारावारीण प्रदीपस्वरूप जिन गुरुजनों ने ब्रह्म (परब्रह्म और वेद) के रहस्य को प्रकाशित किया है, उनके चरणा- रविन्दों में मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥

सम्यङ्मतिकरणम् १४९ हृदयस्पशिनी देवताभक्ति की तरह गुरुभक्ति भी विद्या प्राप्ति¹ का अन्तरङ्ग साधन है। कहा भी है— 'यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः²' ।। इतना बताकर गुरुपरम्परा को प्रणाम कर रहे हैं। पद, वाक्य और प्रमाण के रहस्य को जानने वाले अर्थात् पदों की शक्ति और वाक्यों की तात्पर्यमर्यादा के अनुसार प्रमाणों को जानने वाले (पद-वाक्य-प्रमाणज्ञ) अथवा पद-वाक्य और अनुमानादि को जानने वाले दीपकस्वरूप अर्थात् बिना आयास के ही सर्वार्थप्रकाशक जिन गुरुचरणों ने वेद के रहस्य को प्रकट किया है, उन्हें मैं सर्वदा प्रणाम करता हूँ ।। २ ।। यद्वाक्सूर्यांशुसंपातप्रणष्टध्वान्तकल्मषः । प्रणम्य तान् गुरून् वक्ष्ये ब्रह्मविद्याविनिश्चयम् ।।३।। यदिदिति—जिनकी वाणी स्वरूप रविरश्मियों के संस्पर्श से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का ध्वंस हो गया है, उन गुरुचरणों में प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या के निश्चायक न्याय को बता रहा हूँ ।। ३ ।। हृदयस्पशिनी सामान्यतया आचार्यपरम्परा को प्रणाम करके विशेषतया अपने गुरु को प्रणाम करते हुए अपने उद्देश्य की प्रतिज्ञा करते हैं—जिसके वाक्यरूप रविकिरणों के सम्पर्क से मेरे अज्ञानरूप पापराशि का नाश हो गया, उस श्री गुरु को प्रणाम कर मैं ब्रह्मविद्या का निश्चय कराने वाले एक विशेष न्याय को बताऊँगा ।। ३ ।। आत्मलाभात्परो नान्यो लाभः कश्चन विद्यते । यदर्था वेदवादाश्च स्मार्ताश्चापि तु याः क्रियाः ।।४।। आत्मेति—संसार में आत्म लाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसे प्राप्त करने के लिये ही सम्पूर्ण वेदवाद और स्मृतिप्रतिपादित क्रियाएँ ( कर्मकाण्ड ) हैं ।।४।। हृदयस्पशिनी ब्रह्मविद्या का विनिश्चय किसलिये बताया जायगा ? उत्तर यही होगा कि आत्मलाभ से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं है। जिसके लिये समस्त वेदवचन हैं और समस्त स्मार्तवचन हैं, और जो वेद-स्मृतिविदित कर्म- परक वचन हैं, वे भी चित्तशुद्धिपरम्परया आत्मलाभ के लिये ही हैं ।। ४ ।। आत्मार्थोऽपि हि यो लाभः सुखायेष्टो विपर्ययः । आत्मलाभः परः प्रोक्तो नित्यत्वाद्व्रह्मवेदिभिः ।।५।। आत्मार्थ इति—संसार में जिस लाभ ( स्त्री-पुत्र-धन-गृह-आदि ) को सुख का कारण समझा जाता है, वह भी सब आत्मा के लिये ही होता है। वे ही सुखसाधनीभूत पदार्थ, किसी समय, किसी-किसी के लिये दुःखप्रद भी हो जाते हैं। परन्तु ब्रह्मज्ञ विद्वानों ने आत्मलाभ को परम लाभ कहा है, क्योंकि वह नित्य सुखमय है ।। ५ ।। हृदयस्पशिनी पुत्र आदि के लाभ से आत्मलाभ श्रेष्ठ रहने पर भी पुत्रादि का परित्याग करना आवश्यक होने के कारण आत्मलाभ के उपाय का आश्रय करना उचित नहीं है, क्योंकि वह (पुत्रादिकों का आश्रय करना) भी आत्म- सुख में हेतु है—इस प्रकार की आशंका होती है, किन्तु उसका समाधान यही है कि संसार में सुख के लिये जिस १. 'शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात्'—(मुं. उ. १।१।१२) भाष्ये तथा 'असम्प्रदायवित् सर्वशास्त्रविदपि- मूर्खवदेव उपेक्षणीयः—(गीताभाष्ये १३।२) २. ( श्वे. उ. ६।२३ )

१५० उपदेशसाहस्री पुत्र-धनादिविषयक लाभ को अभीष्ट समझा जाता है, वह भी आत्मसुख के लिये ही है। इस पर भी पुनः शंका हो सकती है कि यदि पुत्र-धनादि के लाभ से ही आत्मसुख की प्राप्ति हो जाती है तो आत्मलाभार्थ आत्मज्ञान के लिये इच्छा क्यों रखनी चाहिये ? क्योंकि आत्मसुख दोनों में समान ही है । इस शंका का समाधान यह होगा कि संसार में पुत्र-धन आदि का लाभ, जो सुख का हेतु माना गया है, दुःख का हेतु भी हो जाया करता है, कदाचित् किसी के दुःख का हेतु उसका पुत्र ही बन जाता है। तस्मात् अन्यान्य लाभों की अपेक्षा आत्मलाभ ही परम श्रेष्ठ है। इसलिये सर्वसंगपरित्याग करके भी आत्मज्ञान का ही सम्पादन करना चाहिये । उसके नित्य होने से उसमें विपर्यय की आशंका होने का प्रश्न ही नहीं है। इसलिये ब्रह्मवेत्ताओं ने आत्मलाभ को परम लाभ कहा है। श्रुति भी कह रही है—‘तदेतत्प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा । स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुक्तं भवति१ इति ॥ ५ ॥ स्वयं लब्धस्वभावत्वाल्लाभस्तस्य न चान्यतः । अन्यापेक्षस्तु यो लाभः सोऽन्यदृष्टिसमुद्भवः ॥६॥ स्वयमिति—वह आत्मा तो स्वाभाविक रूप से नित्य प्राप्त ही है। उसको प्राप्त करने के लिये किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि अन्य सांसारिक (लौकिक) साधन से आत्मलाभ की प्राप्ति नहीं होती । जिस लाभ की प्राप्ति में किसी अन्य साधन की अपेक्षा रहती है, उस लाभ की उत्पत्ति परापेक्ष (पराधीन) होती है। उस लौकिक अन्य (पर) साधन के न होने पर वह लौकिक लाभ भी क्षीण (नष्ट) हो जाता है, अतः वह लौकिक लाभ अनित्य है, किन्तु आत्मलाभ नित्य है, क्योंकि उसे किसी अन्य उपाय की अपेक्षा नहीं है, वह नित्य लब्ध (प्राप्त) ही है ॥ ६ ॥ हृदयस्पशिनी आत्मसुख के लाभ की पूर्वोक्त नित्यता को सिद्ध कर रहे हैं—वह आत्मलाभ, किसी अन्य के द्वारा प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह नित्यप्राप्तस्वरूप है अर्थात् वह किसी साधन (उपाय) से साध्य (प्राप्य) होने वाला नहीं है। जो लाभ अन्य की अपेक्षा रखता है, वह अन्य साधनों से उत्पन्न होने वाला होता है। उन अन्य साधनों का अभाव रहने पर उसका भी अभाव हो जाता है। अतः वह पुत्र-धन आदि से होने वाला सुखलाभ अनित्य है ॥६॥ अन्यदृष्टिस्त्वविद्या स्यात्तन्नाशो मोक्ष उच्यते । ज्ञानेनैव तु सोऽपि स्याद्विरोधित्वान्न कर्मणा ॥७॥ अन्यदृष्टिरिति—अनात्मा (जड़ पदार्थों) में आत्मदृष्टि अर्थात् अन्यदृष्टि को ही अविद्या कहते हैं, और उस अविद्या के विनाश को मोक्ष कहते हैं। उस मोक्ष की प्राप्ति (अविद्या का विनाश) ज्ञान से ही हो सकता है, कर्म से नहीं, क्योंकि वह ज्ञान ही 'अज्ञान' का विरोधी है ॥ ७ ॥ हृदयस्पशिनी उपर्युक्त श्लोक में अन्यापेक्ष लाभ को अन्यदृष्टिसमुद्भव कहा है। अर्थात् अनात्मलाभ अन्यदृष्टि- समुद्भव है। परन्तु यह 'अन्यदृष्टि' क्या है ? और अन्यदृष्टिसमुद्भव होने से अन्य पुत्रादि लाभ के अनित्य होने में क्या हानि है ? इस शंका के समाधान में कहते हैं कि 'अन्यस्मिन् अनात्मनि दृष्टिः प्रतीतिः यस्याः सा अन्यदृष्टिः'—अनात्मविषयक प्रतीति जिससे होती है, वह अविद्या ही यहाँ पर 'अन्यदृष्टि' शब्द से विवक्षित है। अर्थात् अनात्मा में आत्मदृष्टि रखना ही 'अन्यदृष्टि' है। ततश्च पुत्र-धनादि की प्राप्ति में ही जिस लाभ की प्रतीति होती है, वह अविद्याकृत भ्रान्ति के कारण होती है। वह लाभ की प्रतीति, स्वप्न के तुल्य है, उससे नित्य आत्मसुख की हानि होगी। तथाच अविद्या की निवृत्ति हुए बिना आत्मस्वरूप के नित्य सुख का लाभ होना संभव नहीं। अतः अविद्यानाश को ही मोक्ष कहा जाता है। अर्थात् नित्य निरतिशय परमानन्दाविर्भाव, जो अविद्या के नाश से ही होता है, १. (बृ० उ० १।४।८)

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५१ वह अविद्यानाशरूपी मोक्ष, 'ज्ञान' से ही हो सकता है; 'कर्म' से नहीं, क्योंकि ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है; कर्म नहीं। तस्मात् सर्वकर्मपरित्याग करके आत्मज्ञान का संपादन करे ॥ ७ ॥ कर्मकार्यस्त्वनित्यः स्यादविद्याकामकारणः । प्रमाणं वेद एवात्र ज्ञानस्याधिगमे स्मृतः ॥ ८ ॥ कर्मेति—कर्म से उत्पन्न होनेवाला फल (कर्मकार्य) अनित्य होता है, अविद्याजनित कामना ही उसकी कारण होती है। इस ज्ञान की प्राप्ति (अधिगम) में वेद को ही प्रमाण माना गया है ॥ ८ ॥ हृदयस्पर्शिनी विरोध न रहने से कार्यसहित अविद्यानिवृत्तिरूप मोक्ष, कर्म के द्वारा भले ही न हो, तथापि स्वर्गप्राप्ति के समान कर्म के द्वारा नित्य पुरुषार्थ रूप मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी, तब ज्ञान की क्या आवश्यकता ? इस शंका का समाधान यह है कि कर्म का फल अनित्य होता है, क्योंकि अविद्याजन्य कामना (इच्छा) ही उसमें हेतु है। ज्ञानसाध्य फल ही नित्य होता है, इसमें वेद ही प्रमाण हैं। तथाहि—'तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते' १, 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' २, 'तरति शोकमात्मवित्' ३ इत्यादि वेदवाक्यों को ही विद्वानों ने कर्मसाध्य के अनित्य होने में तथा ज्ञानसाध्य मोक्ष के नित्य होने में प्रमाण माना है ॥ ८ ॥ ज्ञानैकार्थपरत्वात्तं वाक्यमेकं ततो विदुः । एकत्वं ह्यात्मनो ज्ञेयं वाक्यार्थप्रतिपत्तितः ॥ ९ ॥ ज्ञानेति—वह वेद वस्तुतः एकवाक्य ही है, क्योंकि उसका, 'ज्ञान' ही एकमात्र फल है। उस एकवाक्य [महा- वाक्य] के अवान्तरवाक्य और महावाक्य के अर्थज्ञान से आत्मा की एकता ही जाननी चाहिये। अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ हृदयस्पर्शिनी किंच—सम्पूर्ण वेद, अध्ययन-विधि से उपात्त होने के कारण उसका अपुरुषार्थ में पर्यवसान न होने से, परमपुरुषार्थ में ही पर्यवसान कहना होगा। तब सम्पूर्ण वेद को आत्मैक्यज्ञानपरक समझना होगा, जिससे उसका महातात्पर्य 'कर्म' में नहीं हो सकेगा। वाक्यप्रमाणकोविद लोग वेद को एकवाक्यरूप मानते हैं, क्योंकि ज्ञान ही उसका एकमात्र प्रयोजन है। वेद के 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' आदि अवान्तर वाक्यार्थप्रतिपत्ति द्वारा 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों से आत्मा का एकत्व ही ज्ञेय है अर्थात् ब्रह्मैकत्व ज्ञेय है। क्योंकि आत्मतत्त्वज्ञान ही परम पुरुषार्थ का हेतु है। कर्मकाण्ड भी तत्त्वज्ञान के लिये अपेक्षित चित्तशुद्धि में हेतुभूत कर्मविधान द्वारा परम्परया परमपुरुषार्थ के साधन के रूप में स्वीकृत होता है। उस कारण एकार्थ में ही पर्यवसान होने से वेदवाक्य को एक ही वाक्य मानना युक्तियुक्त है ॥ ९ ॥ वाच्यभेदात्तु तद्भेदः कल्प्यो वाच्योऽपि तच्छ्रुतेः । त्रयं त्वेतत्ततः प्रोक्तं रूपं नाम च कर्म च ॥ १० ॥ वाच्यभेदादिति—वाच्य (अर्थ) के भेद से शब्द (वाचक) भेद होता है, और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना की जाती है। अतएव भगवती श्रुति ने समस्त प्रपञ्च को नाम, रूप और कर्म त्रयरूप कहा है ॥ १० ॥ १. (छां. उ. ८।१।६) २. (तै. उ. २।१) ३. (छां. उ. ७।१।३)

१५२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी यदि कहें कि 'आत्मा', 'ब्रह्म' आदि शब्द एक-दूसरे के पर्याय न होने के कारण उनके वाच्य 'आत्मा' और 'ब्रह्म' में अभेद नहीं हो सकता, अर्थात् 'आत्मा' और 'ब्रह्म' दोनों में एकत्व (ऐक्य) ज्ञान का होना उपपन्न नहीं हो सकता। किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वाच्यों के भेद से शब्दभेद और शब्दभेद से वाच्यभेद की कल्पना करने पर ही वाच्यभूत जीव-ब्रह्म का भेद होने पर तद्वाचक दोनों शब्दों का अपर्यायत्व सिद्ध होता है। तथा अपर्यायत्व के सिद्ध होने पर वाच्यरूप जीव-ब्रह्म का भेद सिद्ध हो पाता है। अतः अन्योन्याश्रय (इतरेतराश्रय) दोष उपस्थित होता है। अभिप्राय यह है कि स्वरूपतः (स्वरूप से) भेद की कल्पना करने में कोई प्रमाण नहीं है। इस पर प्रश्नकर्ता ने पुनः प्रश्न किया कि यदि भेद के अप्रामाणिक होने से एकत्व ज्ञान को उपपन्न कहो तो भेद भी प्रमाणसिद्ध है। क्योंकि “त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म” १ इस श्रुति ने उस आत्मा के अतिरिक्त (भिन्न) रूप, नाम और कर्म भी बताये हैं। अतः अनेकत्व (भेद) ही वेदार्थ है। उस पर सिद्धान्ती, भेदवाद का खण्डन कर एकत्व को सिद्ध कर रहा है—वह कहता है कि 'त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म' इस श्रुति में समस्त शब्दविशेष का वाङ्मात्रत्व, रूपविशेष का चक्षुर्मात्रत्व, और कर्मविशेष का शरीर- मात्रत्व बताया गया है। ये तीनों एक दूसरे से कल्पित हैं अर्थात् परस्परसापेक्षसिद्धि वाले हैं। इसलिये ये तीनों असत् हैं। भेद अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त होने के कारण उस (भेद) को वस्तुतः जानना शक्य नहीं। अतः उसमें प्रामाणिकता नहीं है, तथापि कथञ्चित् लोकव्यवहारसिद्ध जो मिथ्या भेद है, उसीका केवल अनुवाद मात्र श्रुति ने वैराग्य पैदा करने के लिये किया है। अतः अद्वैत ज्ञान के होने में कोई विरोध नहीं है। अथवा—सम्पूर्ण वेद को एकार्थज्ञानपरक होने मात्र से एकवाक्य कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि अपुनरुक्त शब्दभेद के कारण अर्थभेद की प्रतीति हो रही है। ऐसी शंका यदि कोई करे तो सिद्धान्ती कहता है कि शंका करने वाले की शंका करना उचित है, तथापि उन अपुनरुक्त शब्दों का तात्पर्य अर्थभेद में नहीं है। क्योंकि भेद (द्वैत) तो प्रमाणों से, युक्तियों से बाधित हो चुका है। वाच्यभेद के प्रामाणिक रहनेपर उसमें तात्पर्य रखने वाले शब्दों के भेद से अनेक वाक्य सिद्ध हुआ करते हैं। वाच्यभेद भी वाचक- शब्दभेद के श्रवण से कल्प्य है, अन्यथा वाच्यभेद को सिद्ध करने का अन्य कोई प्रकार नहीं है। अर्थतत्त्व का निश्चय करना शब्द के अधीन नहीं होता, क्योंकि आरोपित विषय में भी शब्दभेद (भिन्न शब्द) दिखाई पड़ते हैं तथा शब्द- निश्चय करना भी अर्थ के अधीन नहीं है, क्योंकि एक ही पुरुष व्यक्ति में पिता, भ्राता, मातुल, जामाता, पितृव्य इत्यादि उपाधिभेदों से अपुनरुक्त शब्दभेद दिखाई देते हैं। उक्त उदाहरण में प्रतियोग्युपाधिभेद के बिना वस्तु का भेद नहीं हुआ है। तथाच अनादि अविद्या से कल्पित अनेक उपाधियों के भेद से युक्त अनेक कर्त्रादि कारक भेद का अनुवाद कर, ज्ञान के लिये अपेक्षित अन्तःकरणशुद्धि के साधनभूत कर्मविधिपरक होने से कर्मकाण्ड और आत्मतत्त्व- ज्ञानकाण्ड के वाक्यों की एकवाक्यता उपपन्न हो जाती है। और निरतिशयानन्द तथा आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप फल की इच्छा सभी को स्वाभाविक रूप से रहती है। उस इच्छा की पूर्ति का उपाय एकमात्र आत्मतत्त्वज्ञान ही है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः अविद्या के समान अवस्थारूप उपाधि के भेद से अधिकारी का भेद और प्रयोग का भेद उपपन्न हो जाता है। एवं च एकपुरुषापेक्षित एकमात्र परमपुरुषार्थ के एकमात्र साधन का प्रकाशक होने से वेद की एकवाक्यता (वेद को एक महावाक्य) कहना उचित ही है। इस रीति से द्वैत के अविद्याकल्पित होने में युक्ति बताकर अब प्रमाण भी बताते हैं। जबकि इस प्रपञ्च के आकारभेद का निरूपण नहीं किया है, उस कारण यह जो सम्पूर्ण दृश्य नाम, रूप और कर्म है, इन तीनों को सामूहिक रूप में (राशि के रूप में) श्रुति ने कह दिया है। और हेतु बताते हुए तत्तद्विशेषों का प्रविलापन कर अर्थात् भेद का निराकरण कर उसे सामान्य रूप से इनका त्रित्व बता कर ये तीनों (यह त्रय) एकमात्र 'सत्' आत्मा ही है, इस प्रकार अन्त में यह स्पष्ट बताया है कि यह एकमात्र सत्स्वरूप आत्मा ही है, ये तीन नहीं हैं और यह सम्पूर्ण जगत् एक आत्मस्वरूप ही है, इसमें तात्त्विक भेद नहीं है ॥१०॥ असदेतत्त्रयं *तस्मादन्योन्येन हि कल्पितम् । कृतो †वर्णो यथा शब्दाच्छ्रुतोऽन्यत्र धिया बहिः ॥११॥ १. (बृ. उ. १।६।१ )

  • यस्मा—पाठान्तरम् । † रूपां०—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५३ असदिति-ये तीनों (नाम, रूप, कर्म) कल्पित (मिथ्या) हैं, क्योंकि इन तीनों की कल्पना, परस्पर एक दूसरे से की जाती है। जैसे शब्द के द्वारा श्रुत तथा बुद्धिपूर्वक बाहर भित्ती आदि पर लिखे हुए वर्ण मिथ्या होते हैं॥ ११॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में सम्पूर्ण प्रपञ्च को समग्र रूप से 'नाम, रूप, और कर्म'-इस प्रकार त्रिविध बताया। इन तीनों की परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से कल्पना की जाती है, उस कारण ये मिथ्या हैं। जिस प्रकार शब्द द्वारा सुने गये वर्ण अर्थात् इन्द्रादि रूपविशेष सहस्राक्ष, वज्रबाहुत्व आदि की अपनी बुद्धि से कल्पना कर बाहर भित्ति आदि पर काढ़े हुए वर्ण की तरह कल्पित मिथ्या होते हैं। निष्कर्ष यह है कि जब हम चित्र में किसी देवता आदि का (सहस्राक्ष- वज्रबाहु वाला) रूपविशेष देखते हैं, वैसा ही वास्तविक रूप इन्द्र का नहीं रहता है। अतः शब्द, मिथ्या अर्थ को बताता है॥ ११॥ दृष्टं चापि यथा रूपं बुद्धेः शब्दाय कल्पते। एवमेतज्जगत्सर्वं भ्रान्तिबुद्धिविकल्पितम् ॥१२॥ दृष्टमिति-जिस प्रकार चित्र में किसी देवता आदि का रूप देखते हैं, तब वह देखा हुआ (दृष्ट) रूप, 'यह राम, कृष्ण' आदि देवता का ज्ञान (बुद्धि) उत्पन्न कराता है, और वह ज्ञान शब्दव्यवहार का कारण बन जाता है, किन्तु वह कल्पनाजनित होने के कारण मिथ्या ही है। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि के द्वारा ही कल्पित हैं, अतः भ्रमजनित होने के कारण मिथ्या ही है॥ १२॥ हृदयस्पर्शिनी शब्द से मिथ्या अर्थकल्पना को बताकर अब मिथ्या अर्थ से शब्दकल्पना को बताते हैं। किसी भित्ति पर या कपड़े पर चित्रित किये गये देवता रूप को देखने से संस्कृत हुई बुद्धि में ठीक उसी तरह वह रूप समा जाता है और तदनुसार शब्दव्यवहार किया जाता है। उसी तरह यह सम्पूर्ण जगत् भ्रान्त बुद्धि से कल्पित हुआ है। जैसे भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) शुक्ति में रजत की कल्पना की जाती है, वैसे ही आत्मा में विविध नाम-रूप-कर्मात्मक जगत् की भ्रान्त बुद्धि से (मिथ्या ज्ञान से) कल्पना की गई है, वस्तुतः वह 'सत्' नहीं है॥ १२॥ असदेतत्ततो युक्तं *संविन्मात्रं न कल्पितम्। वेदश्चापि स एवाद्यो वेद्यं चान्यत्तु कल्पितम् ॥१३॥ असदिति-अतः इस प्रपञ्च को मिथ्या कहना उचित ही है। केवल सत्-चित् स्वरूप आत्मा ही ऐसा है, जो कल्पित नहीं है। उसी तरह पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद है जो ज्ञान का हेतुभूत है। और वही वेद्य (ज्ञेय) है, उसके अतिरिक्त सभी कल्पित है। अतः सब मिथ्या है। ज्ञान के हेतुभूत श्रुति (वेद) और आचार्य भी आत्मस्वरूप ही हैं। क्योंकि आत्मा के अतिरिक्त अनात्म (जड़) पदार्थों में अर्थ को प्रकट करने की शक्ति नहीं होती॥ १३॥ हृदयस्पर्शिनी जगत् को मिथ्या सिद्ध कर देने पर यही कहना होगा कि सभी यदि कल्पित हैं तो बौद्धों के शून्यवाद में और सभी को कल्पित कहने में अन्तर ही क्या रहा ? इस शंका के उत्तर में बता रहे हैं कि बिना अधिष्ठान (निरधि- ष्ठान) कल्पना नहीं होती। समस्त कल्पनाओं के करने योग्य अधिष्ठान सचिन्मात्र (प्रत्यक् तत्त्व) है, वह सब का साक्षी होने से समस्त कल्पनाओं के पूर्व से ही सिद्ध है, अतः वही एकमात्र कल्पित नहीं है। किन्तु पुनः शंका होती है कि आत्मतत्त्वज्ञान के हेतुभूत वेद और आचार्य भी कल्पित नहीं हैं, तब सचिन्मात्र को ही अकल्पित कैसे कहा गया ? सचिन्त्स्वरूप आत्मा कल्पित नहीं और पूर्वसिद्ध आत्मा ही वेद और वेद्य भी है। वही श्रुति तथा आचार्य के रूप में माया के द्वारा प्रकट किया जाता है क्योंकि अर्थप्रकाशन की शक्ति का होना जड़ पदार्थ में कभी संभव नहीं। अग्नि की प्रकाशन शक्ति से भिन्न कोई अन्य (अपर) प्रकाशनशक्ति दीपक की नहीं हुआ करती। आत्मतत्त्व ही एकमात्र वेद्य है, वही पूर्वसिद्ध है। उसके अतिरिक्त जो भी विशेष है, वह सभी कल्पित है। तथाच कल्पित विशेष का अनुगत

  • सच्चिन्मात्रं०-पाठान्तरम्। २०

१५४ उपदेशसाहस्री होने के कारण आत्मा ही बोधक है और समस्त कल्पनाओं के अपवाद (बाध) की अवधि होने के कारण वह आत्मा ही बोध्य है, यह समझना चाहिये ॥ १३ ॥ येन वेत्ति स वेदः स्यात्स्वप्ने सर्वं तु मायया । येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ॥१४॥ येनेति—स्वप्नावस्था में पदार्थों का ज्ञान जिसके द्वारा होता है, उसे वेद (आत्मा) कहते हैं। उस स्वप्न में जो वेद्य (ज्ञेय) है, वह भी माया से कल्पित है, उसे देखने वाला (स्वप्नद्रष्टा) वह आत्मा ही है। उस समय जिसके द्वारा वह आत्मा (जीव) देखता है, उसे चक्षु कहते हैं और जिसके द्वारा वह सुनता है, उसे श्रोत्र कहते हैं ॥ १४ ॥ हृदयस्पशिनी इसी कथन को स्वप्न का दृष्टान्त देकर समझाते हैं—वही पूर्वसिद्ध आत्मा, आद्य (वेद) और वेद्य है। स्वप्नावस्था में जिसके द्वारा समस्त स्वाप्न पदार्थों का ज्ञान होता है, वही वेद है। स्वप्न में चिदात्मा के अतिरिक्त अन्य कोई भासक नहीं है। उस समय आदित्यादि ज्योतियों का उपरम रहता है। यह आत्मा तो स्वयं ज्योतिःस्वरूप१ है। उस स्वप्नावस्था में जो भी कुछ है वह सब माया के कारण वेद्य है। अतः वह आत्मा भी वेद्य है। स्वप्न में अवकाश न रहने से कोई बाह्य विषय नहीं रहता। तथाच (आत्मा की) स्वसाक्ष्यभूत मायाकृत उपाधि के भेद से युक्त हुआ वह आत्मा ही अपने से (आत्मना) वेद्य होता है। और उसमें अनुस्यूत चिद्रूप से वेदनरूप भी होता है, इस प्रकार 'वेद्य-वेदितृभाव' मायिक है। स्वप्नावस्था में चक्षुरादि इन्द्रियों का उपरम होने से स्वप्नगत आत्मा, जिससे रूप देखता है, वही चक्षु है ऐसा समझना चाहिये । तथा जिसके द्वारा सुनता है, वह श्रोत्र कहलाता है ॥ १४ ॥ येन स्वप्नगतो वक्ति सा वाग्घ्राणं तथैव च । रसनस्पर्शने चैव मनश्चान्यत्तथेन्द्रियम् ॥१५॥ येनेति—जिसके द्वारा स्वप्न में बोलता है, वह वाणी है, और जिससे सूँघता है, वह घ्राण कहलाता है। इसी प्रकार रसना, त्वचा और मनरूप अन्य इन्द्रियों को भी समझना चाहिये ॥ १५ ॥ कल्प्योपाधिभिरेवैतद्भिन्नं ज्ञानमनेकधा । आधिभेदाद्यथा भेदो मणेरेकस्य जायते ॥१६॥ कल्प्येति—जिस प्रकार नील-पीत आदि उपाधियों के भेद से एक ही मणि में भेद की प्रतीति होने लगती है, उसी प्रकार स्वप्नकल्पित चक्षु-श्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण यह एक ही 'ज्ञान' चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है ॥ १६ ॥ हृदयस्पशिनी एकरूप चैतन्य अर्थात् एक ही ज्ञान वेदादिरूप से अर्थात् वेद्य-वेदक-चक्षुरादि रूप से अनेक प्रकार के भेदों को कैसे प्राप्त होता है ? स्वप्न-कल्पित अनेक उपाधियों के कारण यह एक ही ज्ञान अनेक प्रकार के भेदों को प्राप्त हो जाता है। जैसे नील-पीतादि उपाधियों के भेद से एक ही स्फटिकमणि में अनेक भेदों की प्रतीति होती है। वस्तुतः ज्ञान एक ही है, किन्तु चक्षुःश्रोत्रादि विभिन्न उपाधियों के कारण चाक्षुष ज्ञान, श्रावण ज्ञान आदि विभिन्न रूप से व्यवहार किया जाता है ॥ १६ ॥ जाग्रतश्च *तथा भेदो ज्ञानस्यास्य विकल्पितः । बुद्धिस्थं व्याकरोत्यर्थं भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः ॥१७॥ १. (बृ. उ. ४।३।९) ३. (बृ. उ. ४।३।९)

  • यथा०—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५५ जाग्रत इति—जिस प्रकार स्वप्न में कल्पित उपाधियों के कारण एक ही ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था के ज्ञान का भेद भी आरोपित है, जिसमें अज्ञानवश कामनाजनित क्रिया की प्रतीति होती है, और यह जीव (आत्मा) बुद्धि में स्थित विषय को आत्मगत (अपना) समझ कर व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ हृदयस्पर्शिनी जैसे स्वप्न में कल्पित अनेक उपाधियों के कारण निर्भेद ज्ञान समस्त व्यवहार के योग्य रहता है, उसी प्रकार जागरित में भी उसकी अशेष व्यवहारास्पदता उपपन्न है। अर्थात् जाग्रत् अवस्था के चिद्रूप ज्ञान का भेद भी आरोपित है। अज्ञान से आवृत आत्मा प्रथमतः बुद्धि की कल्पना करता है, तब बुद्धि के आवरण को धारण करता है और अविवेक के कारण भ्रान्त होकर बुद्धिस्थित अर्थ (पदार्थ) को स्वात्मगत समझ बैठता है, उस कारण तदनुसार व्यवहार करने लगता है अर्थात् भ्रमप्रयुक्त तृष्णादि (इच्छा) से उत्पन्न हानोपादानव्यवहाररूप क्रिया करता है। तात्पर्य यह है कि अविद्या के कारण उपस्थापित अन्तःकरण, परिणामावस्था को अवभासित करता हुआ अविवेक के कारण अनेकरूप प्रपञ्च की अपने में कल्पना करता हुआ व्यवहार करता रहता है ॥ १७ ॥ स्वप्ने तद्वत्प्रबोधे यो बहिश्चान्तस्तथैव च । आलेख्याध्ययने यद्वत्तद्द्द्वयोन्योन्यधियो*द्भवम् ॥१८॥ स्वप्न इति—जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, उसी प्रकार जाग्रत् में भी होता है। तथा स्वप्न में जैसे आन्तर-बर्हिभाव की कल्पना होती है, वैसे ही जाग्रत् में भी आन्तर-बहिर्भाव की कल्पना हुआ करती है। जिस प्रकार लोकव्यवहार में किसी कागज आदि पर क-ख-ग आदि वर्ण लिखे जाते हैं, उसी तरह उन वर्णों को पढ़ा जाता है अर्थात् पढ़ पाना, लिखने पर निर्भर है और लिखना पढ़ने वाले के पढ़ने पर (बोलने वाले के बोलने पर) निर्भर है। अतः वे दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं। वस्तुतः 'वर्ण' नित्य और विभु हैं। उनको पत्रादि पर लिखना अथवा पढ़ना संभव नहीं है। तथापि विभु वर्ण को रेखाओं के रूप में पत्र आदि पर लिखते ही हैं और उसे देख कर पढते भी हैं ॥ १८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जिस प्रकार स्वप्न में व्यवहार होता है, वैसे ही जाग्रत में भी होता है। इसी तरह स्वप्न के समान जाग्रत् में भी अन्तर्बहिर्भाव की कल्पना की जाती है। अर्थात् अन्तर्बहिर्भाव से प्रकट होने वाला व्यवहार स्वप्नवत् कल्पित है। उसी में अन्य दृष्टान्त बताते हैं—जिस प्रकार स्वप्नावस्था में चित्त के भीतर कल्पना किये जाने वाले और बाहर इन्द्रियों द्वारा गृहीत होने वाले दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं, उसी प्रकार जाग्रत् अवस्था में भी दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं। लोक में जिस समय क, ख आदि वर्ण पत्र पर लिखे जाते हैं, उस समय उन वर्णों की अपेक्षा से उन्हें पढ़ा जाता है और उनके पाठ की अपेक्षा से लिखा जाता है। अतः वे परस्पर के ज्ञान द्वारा कल्पित होने के कारण मिथ्या हैं, क्योंकि वस्तुतः वर्ण विभु और नित्य हैं। उन निरवयव वर्णों को पत्रादि पर लिखना या पढ़ना संभव नहीं है। तो भी विभु वर्ण को रेखा के रूप में पत्रादि पर लिखते ही हैं और उसे देखकर पढ़ते भी हैं ॥ १८ ॥ यदाऽयं कल्पयेद्भेदं तत्कामः सन् यथाक्रतुः । यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं यत्तत्प्रपद्यते ॥१९॥ यदेति—यह जीवात्मा जिस समय भेद की कल्पना करता है, उस समय वैसी कामना वाला होकर वैसा ही संकल्प करता है। इस प्रकार कामना के अनुसार ही संकल्प करके अपने अनुष्ठित कर्म का फल पाता है ॥ १९ ॥ हृदयस्पर्शिनी बुद्धिनिष्ठ अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए “भ्रान्त्या तृष्णोद्भवक्रियः” (श्लो. १७) के द्वारा उक्त अर्थ को अधिक स्पष्ट कर रहे हैं—जिसे यह आत्मा पूर्वभ्रान्तिसंस्कारवशात् बुद्धि से आवृत्त हुआ अविद्या के कारण

  • द्वयः—पाठान्तरम् ।

भेद की कल्पना करता है, उस समय अध्यस्त विषय के प्रति उसके शोभन होने के कारण इच्छुक होता है और इच्छुक होने के कारण वैसा संकल्प करने लगता है। अर्थात् 'मैं इसे प्राप्त करूँगा' इस प्रकार अध्यवसायरूप संकल्प करता है। एवंच जैसी कामना, तदनुकूल संकल्प और तदनुसार कर्म, ततश्च तदनुरूप फल को प्राप्त करता है। अर्थात् कामना-संकल्प-कर्म-फल इस रीति से अन्योन्य की अपेक्षा से हेतु-फल के रूप में कल्पित संसार का अनुभव करता रहता है। श्रुति भी कह रही है—"अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथा कामो भवति तथा क्रतुर्भवति, यथा क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते¹।" ॥ १९ ॥

अविद्याप्रभवं सर्वमसत्तस्मादिदं जगत्। तद्वता दृश्यते यस्मात्सुषुप्ते न च गृह्यते ॥२०॥

अविद्येति—यह सम्पूर्ण जगत् अविद्या से उत्पन्न हुआ है, उस कारण वह मिथ्या है। क्योंकि वह अविद्यावान् पुरुष को ही दिखाई देता है, और सुषुप्ति में उसकी प्रतीति भी नहीं होती ॥ २० ॥

विद्याऽविद्ये श्रुतिप्रोक्ते एकत्वान्यधियो हि नः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शास्त्रे विद्या विधीयते ॥२१॥

विद्येति—भगवती श्रुति आत्मैक्यज्ञान को ही 'ज्ञान' और भेदज्ञान को ही 'अज्ञान' शब्द से हमें बताती है। अज्ञान (अविद्या) के समान ज्ञान (विद्या) का अनुभव सर्वसाधारण लोगों को नहीं होता है। ज्ञान (विद्या) का प्रतिपादन शास्त्र में ही किया गया है। अतः सर्वथा प्रयत्नपूर्वक शास्त्र के अध्ययन में अपने को तत्पर रखना चाहिये ॥ २१ ॥

हृदयस्पशिनी जगत् की हेतुभूत अविद्या का स्वरूप क्या है? और उसकी निवर्तक विद्या का स्वरूप क्या है? तथा उस विद्या और अविद्या को कौन जानता है? उत्तर यह है कि 'एकत्वधी' विद्या है और 'अन्यधी' अविद्या है। अर्थात् ब्रह्मात्मकत्व बुद्धि को विद्या कहते हैं और उनकी भेदबुद्धि को अविद्या कहते हैं। यही उनका स्वरूप है। विद्या और अविद्या के स्वरूप को श्रुति ने बताया है। "अथ योऽन्यां देवताम्²" इस श्रुति ने भेद-धी (भेदबुद्धि) को अविद्या कहा है। लोकानुभवसिद्ध भेद के अनुवादरूप में यह बताया गया है—"किमु तद्ब्रह्मावेत्³" इस प्रकार आक्षेप कर "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि⁴" यह अप्रसिद्धार्थबोधक श्रुति प्रमाणभूत है। इसने भी एकत्वज्ञान को ही विद्या बताया है। अज्ञान के समान ज्ञान का सर्वसाधारण को अनुभव नहीं है। इस कारण शास्त्र प्रयत्नपूर्वक अध्यारोप और अपवाद के द्वारा विद्या (ज्ञान) का प्रतिपादन करता है। अतः मुमुक्षु को सर्वदा शास्त्रतत्पर रहना चाहिये ॥ २१ ॥

चित्ते ह्यादर्शवद्यस्माच्छुद्धे विद्या प्रकाशते । यमैर्नित्यैश्च *यज्ञैश्च तपोभिस्तस्य शोधनम् ॥२२॥

चित्त इति—जिस प्रकार दर्पण में मुख आदि का प्रकाश, दर्पण की शुद्धता (निर्मलता) पर निर्भर होता है, उसी प्रकार चित्त की शुद्धता (निर्मलता) रहने पर ही उसमें ज्ञान का प्रकाश होता है, अन्यथा नहीं। अतः यम, नियम, यज्ञ और तप के द्वार चित्त की शुद्धि करनी चाहिये ॥ २२ ॥

१. (बृ. उ. ४।४।७ माध्यंदिन. पाठ.), 'तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति' इति काण्व पाठः (बृ. उ. ४।४।५ ) २. (बृ. उ. १।४।१० ) ३. (बृ. उ. १।४।९ ) ४. (बृ. उ. १।४।१० )

  • नियमैस्तपो०—पाठान्तरम् ।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ दिया गया है:

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५७ हृदयस्पर्शिनी यदि शास्त्र अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक विद्या को बताता है, तो सभी लोग शास्त्र के प्रति प्रवृत्त क्यों नहीं होते ? तथा प्रवृत्त होने पर भी उन्हें विद्या की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? इत्यादि शंकाओं का उत्तर एक ही है कि ‘चित्त की शुद्धि न होने से' प्रवृत्ति नहीं होती और यथाकथंचित् प्रवृत्ति हो भी जाय तो भी विद्या की प्राप्ति नहीं होती । इसलिये चित्तशुद्धि करनी चाहिये । ज्ञान का प्रकाश, दर्पण के समान शुद्ध चित्त में ही पड़ता है । यम, नियम, यज्ञ, और तप के द्वारा चित्त की शुद्धि करनी चाहिये । अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि को ‘यम' कहते हैं । नित्य शौच आदि को ‘नियम' कहते हैं । स्वाश्रमविहित धर्म को 'यज्ञ' कहते हैं। ईश्वर साक्षात्कार कराने वाले साधनों को ‘तप' कहते हैं। इनके अनुष्ठान से चित्त को निर्मल बनाया जा सकता है ॥ २२ ॥ शारीरादितपः कुर्याच्चित्तशुद्ध्यर्थमुत्तमम् । मन आदिसमाधानं तत्तद्देहविशेषणम् ॥२३॥ शारीरादीति—चित्त को निर्मल (शुद्ध) बनाने के लिये शारीरादि ( कायिक-वाचिक-मानसिक ) उत्तम तप करना चाहिये । मन और बाह्येन्द्रियों को निश्चल करना चाहिये । तथा भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये ॥ २३ ॥ हृदयस्पर्शिनी अन्तःकरण (चित्त-मन) की शुद्धि (निर्मलता) के लिये शास्त्रविहित पद्धति (उत्तम प्रकार) से शारीरिक (कायिक), मानसिक और वाचिक तप करना चाहिये । तथा मन और इन्द्रियों को निश्चल (समाधान = निश्चलता) एवं भिन्न-भिन्न ऋतुओं में शीतोष्णादि को सहन करते हुए शरीर को कृश करना चाहिये । भगवान् ने शारीरिक तप का स्वरूप बताया है—“देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥” उसी प्रकार वाचिक (वाङ्मय) तप का स्वरूप—“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥” तथा मानसिक (मानस) तप का स्वरूप- “मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते १ ॥” इति । 'देवता, ब्राह्मण, गुरु और ब्रह्मज्ञानियों की पूजा, बाहर और भीतर की शुद्धि, कर्तव्य कर्म में एवं साधुजनों के विषय में सर्वत्र मन, वचन, और देह के व्यापारों की एकरूपता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा-यह शारीरिक तप कहलाता है ।' 'उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारक वाक्य और स्वाध्याय का अभ्यास वाङ्मय तप कहलाता है ।' 'मन की प्रसन्नता, सौम्यत्व, ध्यानपरायणता, मन का निग्रह और अन्तःकरण की शुद्धि- यह सब मानस तप कहलाता है ।' इन तीनों तपों का सात्त्विकता के साथ अनुष्ठान करना चाहिये, राजस-तामसरूप में नहीं । सात्त्विक तप का स्वरूप यह है- "श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ।।'—'जिनका एकाग्र चित्त है और जिनकी कर्मफलों में स्पृहा नहीं है, ऐसे पुरुषों द्वारा श्रद्धा से किये गये तीन प्रकार के तप को मुनि लोग सात्त्विक तप कहते हैं ।२' ॥ २३ ॥ “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर उच्यते” ॥२४॥ मनस इति-मनु ने मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को 'परम तप' बताया है । उसे समस्त धर्मों की अपेक्षा उत्कृष्ट बताया है और उसी को परम धर्म कहा है ॥ २४ ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार आरादुपकारक३ तप को बताकर श्रवण आदि में संनिपत्योपकारक तप के अनुष्ठानार्थ स्मृति- वाक्य को उपस्थित कर रहे हैं- “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः । तज्ज्यायः सर्वधर्मेभ्यः स धर्मः पर १. ( भ. गी. १७।१४-१७ ) २. ( भ. गी. १७।१७ ) ३. आरादुपकारक और संनिपत्योपकारक—ये पूर्व मीमांसा शास्त्र में अंगों की पारिभाषिक संज्ञाएँ हैं । 'यानि अंगानि साक्षात्

१५८ उपदेशसहस्री उच्यते१॥” मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को ही परम तप कहते हैं। वह समस्त धर्मों से उत्कृष्ट है और उसी को परम धर्म कहते हैं। श्रुत्युक्त वस्तु में मनन द्वारा चित्त की स्थिरता को ही एकाग्र (एकाग्रता) कहते हैं। उसकी अवश्यकर्तव्यता के बोधनार्थ ‘तज्ज्याय:’ कहकर उसकी प्रशंसा की गई है ॥ २४ ॥ दृष्टं जागरितं विद्यात्स्मृतं स्वप्नं तदेव तु । सुषुप्तं तदभावं च स्वस्वात्मानं परं पदम् ॥२५॥ दृष्टमिति—बाह्य इन्द्रियों से जो दिखाई देता है, उ से जाग्रत् समझना चाहिये, उसी को स्मरण किये जाने पर उसे स्वप्न कहना चाहिये, और उसके अभाव को सुषुप्ति कहते हैं। उक्त तीनों अवस्थाओं के साक्षीस्वरूप आत्मा को परमपद (सत्य-ज्ञानादिलक्षण) 'मैं ब्रह्म हूँ'—यह समझना चाहिये ॥ २५ ॥ हृदयस्पर्शिनी उक्त साधनों से निर्मलचित्त (शुद्धचित्त) हुआ मुमुक्षु, श्रवणादि में तत्पर होकर तीनों अवस्थाओं से उनके साक्षी को पृथक् समझ कर वेदान्तवाक्य से अपने को ब्रह्मरूप समझे। बाह्य इन्द्रियों से जो कुछ देखा जाता है अर्थात् बाह्यार्थ की उपलब्धि की जाती है, उसे जागरित (जाग्रत्) अवस्था समझो। वही; जो ‘दृष्ट’ शब्द से वाच्य है, उसीको स्मरण किये जानेपर स्वप्न कहते हैं, अर्थात् संस्कारवशात् निद्रा-दशा में जिसका भान होता है, उसे स्वप्न समझो । और उस दृष्ट तथा स्मृत का अभाव जिसमें हो, उसे सुषुप्त समझो। इस प्रकार तीनों दृश्यों को पृथक् कर उस (दृश्य) के साक्षी स्वयं स्वरूपभूत आत्मा को ही परम पद अर्थात् सत्यज्ञानादिलक्षण परब्रह्म समझो अर्थात् ‘अहं ब्रह्मास्मि’ मैं ब्रह्म हूँ—ऐसा समझो ॥ २५ ॥ सुषु*प्ताख्यं तमोऽज्ञानं बीजं स्वप्नप्रबोधयोः । स्वात्मबोधप्रदग्धं स्याद्बीजं दग्धं यथाऽभवम् ॥२६॥ सुषुप्ताख्यमिति—सुषुप्तिसंज्ञक तम को ही अज्ञान कहते हैं। वही स्वप्न और जाग्रत् (प्रबोध) का मूल कारण है। उसका आत्मज्ञान (स्वात्मबोध) के द्वारा जब दाह हो जाता है, तब जले हुए बीज के समान वह फलो- त्पादक नहीं होता ॥ २६ ॥ हृदयस्पर्शिनी अवस्थात्रय के हेतुभूत अज्ञान के रहते तद्विविक्ततया प्रत्यगात्मा में ब्रह्मत्व कैसे उपपन्न हो सकता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि सुषुप्तिसंज्ञक जो तम है, वही अज्ञान है। वह स्वप्न और जाग्रत् का मूल अर्थात् उपादान (बीज) कारण है। आत्मज्ञानरूप अग्नि से उस अज्ञानरूप बीज का जब दाह हो जाता है, तब वह दग्ध हुए बीज के समान फल को पैदा नहीं कर पाता। अज्ञान में ‘तम’ को विशेषण कहने से अज्ञान की भावरूपता बताई गई है। भावरूप होनेपर ही उसमें बीजत्व उपपन्न हो सकता है। जैसे दग्ध बीज अभव अर्थात् भवशून्य यानी कार्योत्पादक नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञानाग्नि से दग्ध हुआ ज्ञान पुनः अवस्थाप्ररोहकर नहीं होता, उस कारण प्रत्यगात्मा का ब्रह्मत्व कथन उचित ही है ॥ २६ ॥ परंपरया वा विहितफलसाधनयागशरीरं निष्पाद्य तद्द्वारा तदुत्पत्त्यपूर्वोपयोगीनि,—तानि सन्निपत्योपकारकाणि अङ्गानि । सन्निपत्य—द्रव्यादिद्वारेण यागशरीरघटकीभूय, उपकारकाणि यागापूर्वोपयोगीनीत्यर्थः । और ‘आत्मसमवेतापूर्वजनकानि आरादुपकारकाणि अङ्गानि । आरात्—दूरे स्थित्वा यागशरीरमप्राप्येति यावत्, उपकारकाणि स्वापूर्वद्वारा यागापूर्वो- पयोगीनीत्यर्थः । अत्र सन्निपत्य = साक्षात्, आरात् = परम्परया । १. (मोक्ष धर्म २५०।४, वन प. २६०।२५ )

  • पत्या०—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १५९. तदेवेकं त्रिधा ज्ञेयं मायाबीजं पुनः क्रमात् । मायाव्यात्माऽविकारोऽपि बहुधैको जलार्कवत् ॥२७॥ तदेवेति — उस एक मायाबीज (अज्ञान) को ही सुषुप्ति आदि अवस्थाओं के क्रम से त्रिविध (तीन प्रकार का) समझना चाहिये। यद्यपि माया (अविद्या) का आश्रयभूत 'आत्मा' तो निर्विकार है, तथापि जल में प्रतिबिम्बित हुए सूर्य के समान वह एक होता हुआ भी अनेक-सा प्रतीत होता है॥ २७॥ हृदयस्पर्शिनी अज्ञान (माया) को अवस्थाओं का बीज कहा गया था, उसी का उपपादन करते हुए बता रहे हैं कि अज्ञान की निवृत्ति से ही सम्पूर्ण संसाररूप उपाधि की निवृत्ति हो जाती है, उसकी निवृत्ति के लिए अन्य कोई यत्न समर्थ नहीं है। यह एक मायाबीज ही जागरित अवस्था में विश्व-वैश्वानररूप से, स्वप्नावस्था में तैजस-हिरण्यगर्भरूप से, सुषुप्त अवस्था में प्राज्ञ-अव्याकृतरूप से त्रिधा होता है। किन्तु वेदान्तवाक्य के श्रवणादि अनुष्ठानक्रम से उत्पन्न ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से उस मायाबीज (अज्ञान) की सम्पूर्णतया (अशेषतया) निवृत्ति हो जाती है। तथाच तम (अज्ञान- माया) के दाह से ही स्वप्नादि अवस्थाओं का दाह हो जाता है, उनके दाह के लिए पृथक् प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि ये स्वप्नादि अवस्थाएँ तमोमात्र (तमःस्वरूप) ही तो हैं। अतः तम की निवृत्ति से उनकी निवृत्ति होना उचित ही है। यथोक्त तम स्वयं स्वतन्त्र न होने से उसे आश्रय की अपेक्षा रहती है और कूटस्थ, असङ्ग, अद्वितीय आत्मा को वह अपना आश्रय बनाता है। आत्मा के स्वभाव (स्वरूप) को देखने से उसके साथ तम का संसर्ग न रहने पर भी तम का कोई अन्य आश्रय न होने से उस आत्मा में ही वह आश्रित रहता है। अतः आत्मा कूटस्थ, अद्वितीय रहने पर भी तम के सम्बन्ध के कारण ही तत्तत्पात्रस्थित जल के सम्बन्ध से सूर्य के तुल्य वह सचल, अनेक-सा प्रतीत होता है। तात्पर्य यह है कि ब्रह्म एक ही है, अनेक नहीं है, तथापि अनादि अनिर्वाच्य अज्ञान के सम्बन्ध से वह अन्यथा ही प्रतीत होता है। 'मायावी' कहकर यह सूचित किया है कि वह (आत्मा) मायाशब्दवाच्य अज्ञान का आश्रय है॥ २७॥ बीजं चैकं यथा भिन्नं प्राणस्वप्नादिभिस्तथा । स्वप्नजाग्रच्छरीरेषु तद्वच्चात्मा जलेन्दुवत् ॥२८॥ बीजमिति — जिस प्रकार एक ही कारणरूपा (बीजरूपा) माया अव्याकृत (प्राण), स्वप्न और जाग्रत् आदि अवस्थाओं के रूप में भिन्न-भिन्न हो जाती है, उसी प्रकार जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान स्वप्न और जाग्रत् आदि शरीरों में एक ही आत्मा समष्टि, व्यष्टि के भेद से तैजस, हिरण्यगर्भ एवं वैश्वानरादि भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकाशित होता है ॥२८॥ हृदयस्पर्शिनी श्लोक में 'प्राण' शब्द से अव्याकृत अवस्था बताई गयी है और 'स्वप्नादिभिः' से जाग्रदवस्था, मूर्छावस्था गृहीत की गई है। जिस प्रकार एक ही अविद्या, माया आदि संज्ञाओं से कहा जानेवाला बीज, अर्थात् एक ही कारणरूप माया स्वप्न एवं जाग्रदादि अवस्थाओं के रूप में भेद को प्राप्त हो रही है, वैसे ही जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा के समान स्वप्न एवं जाग्रदादि शरीरों (मोहकल्पित समष्टि-व्यष्टि स्थूल-सूक्ष्म शरीरों) में एक ही आत्मा (चिदाभास) भिन्न प्रतीत होता है, अर्थात् उस समय उन शरीरों का अधिष्ठानभूत चिदात्मा उपाधिगत आभास की तरह अविवेक के कारण भिन्न-सा प्रतीत होता है। अर्थात् तैजस-हिरण्यगर्भ, एवं विश्व-वैश्वानर आदि भेदरूप से प्रकाशित होता है॥ २८॥ मायाहस्तिनमारुह्य मायाव्येको यथा व्रजेत् । आगच्छंस्तद्वदेवात्मा प्राणस्वप्नादिगोचरः* ॥२९॥

  • गौऽचलः—पाठान्तरम् ।

१६० उपदेशसहस्री मायेति—जिस प्रकार कोई मायावी (जादूगर) अपनी माया (जादू) से निर्मित किये हुए हाथी पर सवार होकर किसी दूसरे देश में जाकर पुनः अपने देश में वापस आता है, ऐसा दर्शकों को दिखाई देता है, उसी प्रकार सुषुप्ति एवं स्वप्नादि अवस्थाओं में आत्मा आता-जाता हुआ प्रतीत होता है, तथापि अचल मायावी के समान वह आत्मा अचल (कूटस्थ) ही है—यह समझना चाहिये ॥ २९ ॥ हृदयस्पर्शिनी उस पर शंका होती है कि माया (मोह) कल्पित उपाधियों में आत्मा का बहुत्व (अनेकत्व) यदि लक्षित होता है तो उसमें व्यापार भी (व्यापारवत्त्व भी) लक्षित होगा, तब उसे कूटस्थ कैसे कहा जायगा ? उक्त शंका का समाधान यह है कि जिस प्रकार कोई मायावी (जादूगर) अपने निर्माण किये हुए मायिक हाथी पर आरूढ़ होकर किसी दूसरे देश में जाय और पुनः अपने अभीष्ट देश में आ जाय, इस प्रकार गमनागमन करता हुआ-सा भासित होता रहता है, तथापि वास्तव में वह अचल ही है। उसी प्रकार प्राण (सुषुप्ति) एवं स्वप्नादि अवस्थाओं में आता-जाता हुआ लक्षित होनेपर भी वस्तुतः वह (आत्मा) कूटस्थ ही है ॥ २९ ॥ न हस्ती न तदारूढो मायाव्यन्यो यथा स्थितः । न प्राणादि न तद्द्रष्टा तथा ज्ञोऽन्यः सदादृशिः ॥३०॥ न हस्तीति—जिस प्रकार मायावी की माया से निर्मित हाथी या उस पर सवार हुआ माया से निर्मित पुरुष केवल दिखाई मात्र देता है, वस्तुतः न हाथी है और न उस पर सवार हुआ कोई पुरुष ही है, उन दोनों से भिन्न वह मायावी (जादूगर) ही केवल है। उसी प्रकार अव्याकृतादि (प्राण-स्वप्नादि) अवस्था और उनका साक्षी ये दोनों ही वस्तुतः नहीं हैं, केवल नित्यज्ञानस्वरूप वह आत्मा ही है, जो उनसे भिन्न है ॥ ३० ॥ हृदयस्पर्शिनी पूर्व श्लोक में आत्मा के प्राणादि उपाधिसम्बन्ध को मानकर कहा गया था किन्तु अब वह उपाधिसम्बन्ध भी उसे वस्तुतः नहीं है, यह बता रहे हैं। जिस प्रकार गज (हाथी) या उसपर आरूढ हुआ पुरुष—ये दोनों नहीं हैं, अपितु उससे भिन्न मायावी ही है। उसी प्रकार अव्याकृतादि अवस्था और उनका साक्षी ये दोनों नहीं हैं, अपितु नित्य- ज्ञानस्वरूप कूटस्थ आत्मा, उनसे भिन्न ही है ॥ ३० ॥ अबद्धचक्षुषो नास्ति माया मायाविनोऽपि वा । बद्धाक्षस्यैव सा मायाऽमायाव्येव ततो भवेत् ॥३१॥ अबद्धेति—जादूगर (मायावी) के द्वारा जिस दर्शक की दृष्टि नहीं बाँधी गयी है, उस दर्शक पुरुष की दृष्टि मायावी की माया से प्रभावित नहीं है और मायावी की दृष्टि में भी उसका अभाव है अर्थात् उस जादूगर की बुद्धि में भी उस पुरुष का अस्तित्व ही नहीं है। उसकी माया का प्रभाव तो उन्हीं दर्शकों पर है, जिनकी दृष्टि को उसने अपनी जादू (माया) से बाँध दिया है। अतः आत्मा अमायावी (माया से उपलक्षित उसका आधारमात्र) ही है ॥ ३१ ॥ हृदयस्पर्शिनी वस्तुतः प्राणादि उपाधियों का संबन्ध न रहने पर भी माया का संबन्ध तो अपरिहार्य ही है, ऐसा यदि कोई कहे तो उसका उत्तर यह होगा—जिसके नेत्र बँधे हुए नहीं है, उस (लौकिक) पुरुष की दृष्टि में जिस प्रकार माया नहीं है, उसी प्रकार मायावी की दृष्टि में भी चक्षुर्बन्ध न होने से माया का अभाव ही है, अर्थात् माया नहीं है । 'मायाविनोऽपि' यहां 'अपि' शब्द से यह सूचित किया गया है कि अवस्तुत्व का निश्चय होने से वह मोहित नहीं होता, इस प्रकार व्यतिरेक के द्वारा बताया । अब अन्वय के द्वारा भी बताते हैं—जिसकी आंख बँधी हुई है, उसी के लिये वह माया भयहेतु अर्थात् हाथी आदि के रूप में भासती है। वह माया तो केवल उसी की दृष्टि में है, जिसके नेत्र बँधे हुए हैं। अतः यह आत्मा अमायावी है, अर्थात् माया से उपलक्षित उसका आधारमात्र ही है। माया से अनावृत चित्स्वभाव,

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६१ मायावी के रूप में लक्षित रहता हुआ भी उसके साथ माया का कोई संबंध नहीं रहता । क्योंकि माया तो व्यामोह को पैदा करती है। अर्थात् व्यामोह की हेतु रहती है। वह आत्मा में कैसे रह सकेगी ? क्योंकि आत्मा तो 'अहं परब्रह्म अस्मि' इस रूप में प्रकाशमान् है, अतः प्रकाश और व्यामोह की हेतुभूत माया इन दोनों से विरोध रखने से वाले आत्मा में नहीं रह सकती । तथाच ज्ञान की अवस्था में कदाचित् प्राणादि आकारों का ग्रहण करनेवाली माया को देखता हुआ भी वह अज्ञान अवस्था के समान मोहित नहीं होता, किन्तु सुषुप्त के समान निर्विकार ही रहता है ॥ ३१ ॥ *साक्षादेव स विज्ञेयः साक्षादात्मेति च श्रुतेः । भिद्यते हृदयग्रन्थिर्न चेदित्यादितः श्रुतेः ॥३२॥ साक्षादिति—'यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म', “य आत्मा सर्वान्तरः”—यह साक्षात् आत्मा है, इत्यादि श्रुतिवचन के अनुसार उस आत्मा को ही साक्षात् ब्रह्म समझना चाहिये । 'उसको जान लेने पर हृदय को ग्रन्थि टूट जाती है', 'यदि उसे नहीं जाना तो महती हानि है' इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है ॥ ३२ ॥ हृदयस्पर्शिनी तस्मात् साक्षात् ब्रह्मात्मज्ञान से यह अमायावी माया और उसके कार्य और उसके कार्यसम्बन्ध से मुक्त हो जाता है, अतः मुमुक्षु को श्रुतिसिद्ध आत्मा पर ही श्रद्धा रखनी चाहिये । “यत्साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः”१—वह साक्षात् आत्मा है इत्यादि श्रुति के अनुसार उस आत्मा को ही साक्षात् ब्रह्म समझना चाहिए । “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे”२—उसको जान लेने पर हृदय की ग्रन्थि टूट जाती है, “न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः”३—यदि उसे न जाना तो बड़ी हानि है, इत्यादि श्रुतियों से भी यही सिद्ध होता है। वह आत्मा, समस्त विकारों का साक्षी और कूटस्थ है। वह 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’४ है। आत्म- विज्ञान में ही लाभ है, और अविज्ञान में हानि है । 'आदि' शब्द से अन्यान्य श्रुतियों को भी समझ लेना चाहिए, जैसे “एकधैवानुद्रष्टव्यम्”५, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति”६ । जो इसमें नाना के तुल्य देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है। एवंच आत्मा का अपरोक्षज्ञान ही परमार्थज्ञान है और उसी से मोक्ष होता है ॥ ३२ ॥ अशब्दादित्वतो नास्य ग्रहणं चेन्द्रियैर्भवेत् । सुखादिभ्यस्तथाऽन्यत्वाद्बुद्ध्या वाऽपि कथं भवेत् ॥३३॥ अशब्दादीति—अशब्दादिरूप होने के कारण इसका इन्द्रियों से भी ग्रहण नहीं हो सकता और सुखादि से भिन्न होने के कारण बुद्धि से भी इसका किस प्रकार ग्रहण हो सकता है ? बाह्य तथा अन्तः दोनों करणों ( इन्द्रियों से ) जबकि आत्मा ग्राह्य नहीं हो सकता है तो उसका साक्षात् विज्ञान कैसे होगा ? इस प्रकार पूर्व श्लोक से बताये गये साक्षात् आत्मविज्ञान पर आक्षेप किया गया है ॥ ३३ ॥ अदृश्योऽपि यथा राहुश्चन्द्रे बिम्बं यथाऽम्भसि । सर्वगोऽपि तथैवाऽऽत्मा बुद्धावेव स गृह्यते ॥३४॥ अदृश्योऽपीति—यद्यपि राहु अदृश्य है तथापि चन्द्रमा में और जल में उसके प्रतिबिम्ब का ग्रहण होता ही है, उसी प्रकार सर्वव्यापक रहते हुए भी आत्मा का बुद्धि में ग्रहण होता ही है ॥ ३४ ॥ १. ( बृ. उ. ३।४।१ ) २. ( मुं. उ. २।२।८ ) ३. ( के. उ. १३ ) ४. ( बृ. उ. ३।९।२७ ) ५. ( बृ. उ. ४।४।२० ) ६. ( बृ. उ. ४।४।१९ )

  • साक्षाद्देवः—पाठान्तरम् । २१

१६२ उपदेशसाहस्री हृदयस्पर्शिनी उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—जिस प्रकार स्वरूप से अदृश्य होनेपर भी चन्द्रमण्डल में राहु का अथवा जल में चन्द्रबिम्ब का ग्रहण होता है, उसी प्रकार चक्षुराद्यगोचर वह परमात्मा सर्वव्यापक होनेपर भी ‘तत्त्व- मसि’ आदि महावाक्य से उत्पन्न हुई बुद्धि में ही प्रतिबिम्बित होता है, और उसका (आत्मा का) ग्रहण होता हैं। उस बुद्धि में प्रतिबिम्बित होने से उसका स्वतः स्फुरणात्मक ही ग्रहण होता है, विषयरूप में उसका ग्रहण नहीं होता । शास्त्रैकगम्य रहने पर भी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण, राहु के दृष्टान्त से बताया गया है। सर्वत्र सबके सन्निहित भासमान रहने पर भी यथावत् उसका स्फुरण नहीं होता, तथापि उपाधिविशेष के रहने पर यथावत् स्फुरण में प्रतिबिम्ब का दृष्टान्त दिया गया है ॥ ३४ ॥ भानोर्बिम्बं यथा चौष्ण्यं जले दृष्टं न चाऽम्भसः । बुद्धौ बोधो न तद्धर्मस्तथैव स्याद्विधर्मतः ॥३५॥ भानोरिति—जल में दृश्यमान सूर्यबिम्ब और उसकी उष्णता, जल के धर्म नहीं हैं, उसी प्रकार बुद्धि में प्रकाशमान 'ज्ञान' भी बुद्धि का धर्म नहीं है, क्योंकि बुद्धि, उसके विपरीत धर्मवाली हैं, अर्थात् जड़ है ॥ ३५ ॥ हृदयस्पर्शिनी यदि बुद्धि में बोधरूप आत्मा का ग्रहण होता है तो वह बोध तो बुद्धि का धर्म होगा, इस शंका का निरास एक दृष्टान्त देकर कर रहे हैं—जिस प्रकार जल में दिखाई देनेवाला सूर्य का बिम्ब और उष्णता सूर्य के ही हैं, जल के धर्म नहीं कहलाते, क्योंकि जल का धर्म (स्वभाव) तो शैत्य (शीतलता) होता है। उसी तरह बुद्धि में स्फुरित (प्रकाशित) होनेवाला बोध (ज्ञान) बुद्धि का धर्म नहीं है। क्योंकि बुद्धि उससे विपरीत धर्मवाली है अर्थात् जाड्यधर्म वाली (जड़) है ॥ ३५ ॥ चक्षुर्युक्ता धियो वृत्तिर्या तां पश्यन्नलुप्तदृक् । दृष्टेर्द्रष्टा भवेदात्मा श्रुतेः श्रोता तथा *भवेत् ॥३६॥ चक्षुरिति—यह जीवात्मा, नेत्रेन्द्रिय से युक्त हुई बुद्धि की वृत्ति को देखता रहता है, इस कारण, वह ‘अलुप्तदृक्’ कहलाता है। इस प्रकार वह आत्मा, 'दृष्टि' का द्रष्टा और 'श्रवण' का श्रोता समझा जाता है ॥ ३६ ॥ हृदयस्पर्शिनी केवल शास्त्रीय बुद्धि में ही चिद्धातु परमात्मा स्फुरित नहीं होता, किन्तु लौकिक विषयाकार बुद्धिवृत्ति में भी वह आत्मा स्वतः अपरोक्ष होता हुआ साक्षी के रूप में स्फुरित होता रहता है। चक्षुरिन्द्रिय के माध्यम से रूपाकार हुई बुद्धिवृत्ति को प्रकाशित करने के कारण यह आत्मा अकुण्ठितज्ञानशक्ति होता हुआ दृष्टि का द्रष्टा और श्रवण का श्रोता माना जाता है ॥ ३६ ॥ केवलां मनसो वृत्तिं पश्यन् मन्ता मतेरजः । विज्ञाताऽलुप्तशक्तित्वात्तथा शास्त्रं न हीयतेः ॥३७॥ केवलामिति—वह अजन्मा विकाररहित आत्मा केवल मन की वृत्ति को देखता है, उस कारण उसे मति का मनन करनेवाला और उसका विज्ञाता कहते हैं, क्योंकि उसकी चैतन्यशक्ति अकुण्ठित है। इसी बात को 'विज्ञाता के विज्ञान का लोप नहीं होता है'—यह श्रुतिवचन बता रहा है ॥ ३७ ॥ हृदयस्पर्शिनी बाह्येन्द्रिय की अपेक्षा किये बिना ही यह आत्मा, धीवृत्ति का साक्षी होता है। अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों के माध्यम से बाहर प्रवृत्त हुए बिना ही भीतर ही भीतर विषयाकार होनेवाली बुद्धिवृत्ति (मनोवृत्ति) को देखने के

  • श्रुतेः—पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६३ कारण वह अज (विकाररहित) है। और मति (बुद्धि) का मनन करनेवाला एवं उसका विज्ञाता है, क्योंकि वह अलुप्त चिच्छक्ति से युक्त अर्थात् अकुण्ठित चैतन्यशक्ति से युक्त है। इस विषय में “नहि द्रष्टुर्दृष्टेः”१ से आरंभ कर “नहि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते”१ यह श्रुति भी है। श्लोक में ‘नहीत्यतः’ यहां पर ‘एतत्’ के अर्थ में ‘अतः’ शब्द है। क्योंकि ‘तसिल्’ प्रत्यय सार्वविभक्तिक माना गया है। कुछ लोग सप्तमी के अर्थ में इसे कहते हैं। दृष्टि के द्रष्टा होने में “न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः। एष त आत्मा सर्वान्तरः”२ यह श्रुति भी है ॥ ३७ ॥ ध्यायतीत्यविकारित्वं तथा लेलायतीत्यपि । अत्र स्तेनेति शुद्धत्वं *तथाऽनन्वागतश्रुतेः ॥३८॥ ध्यायतीति—‘ध्यायतीव लेलायतीव’३—आत्मा मानो ध्यान करता है, वह मानो चेष्टा करता है, इन श्रुति वचनों से आत्मा का अविकारित्व स्पष्ट होता है। तथा इस अवस्था में चोर ‘अचोर’ हो जाता है ‘वह पुण्य से रहित है, पाप से रहित है’—इत्यादि श्रुतियों से उसका शुद्धत्व स्पष्ट प्रतीत होता है ॥ ३८ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में द्रष्टृत्वादि के व्यपदेश से विकारित्व, अशुद्धत्व की प्रसक्ति होगी, ऐसी शंका करने पर उत्तर देते हैं—श्रुति में ‘इव’ शब्द का प्रयोग करने से ध्यान और चलन में आभासत्व बताया गया है। अर्थात् ‘आत्मा मानो ध्यान करता है’, ‘वह मानो चेष्टा करता है’३ इन श्रुतियों से आत्मा का अविकारित्व सिद्ध होता है। तथा “अत्र स्तेनो- ऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा”४—इस अवस्था में चोर, चोरी न करनेवाला हो जाता है, बालघाती भी बालहत्या न करनेवाला हो जाता है, एवं “अनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन”५—वह पुण्य से रहित है, पाप से रहित है—इत्यादि श्रुतियों से उसका शुद्धत्व सिद्ध होता है ॥ ३८ ॥ शक्त्यलोपात्सुषुप्ते ज्ञस्तथा बोधेऽविकारतः । ज्ञेयस्यैव विशेषस्तु यत्र वेति श्रुतेर्वचः ॥३९॥ शक्त्यलोपादिति—सुषुप्ति अवस्था में उसकी शक्ति का लोप न होने से वह (आत्मा) ज्ञान स्वरूप है। विशेष भाव तो केवल ‘ज्ञेय’ में ही है। इसके सम्बन्ध में “जहाँ अन्य-सा होता हैं, वहाँ अन्य ‘अन्य’ को देखता है”—इत्यादि श्रुति वचन प्रमाण है ॥ ३९ ॥ हृदयस्पर्शिनी जबकि सुषुप्ति में ज्ञान का अभाव रहता है और जाग्रत् तथा स्वप्न में ज्ञान का अस्तित्व रहता है, तब आत्मा को अविकारी कैसे कहा जाय ? इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं— सुषुप्ति अवस्था में शक्ति का लोप न होने के कारण आत्मा ज्ञान(ज्ञ)स्वरूप है६। उसी प्रकार बोध दशा (जाग्रत् और स्वप्न अवस्था) में भी वह ज्ञानस्वरूप है क्योंकि वह निरवयव होने से उसमें विकार अनुपपन्न है। विशेष- भाव तो केवल ज्ञेय में ही है। तीनों अवस्थाओं में यदि आत्मा निर्विशेष चिद्रूप है, तो ‘न अज्ञासिषम्’—मैंने नहीं जाना, यह सुषुप्ति परामर्श कैसे होता है ? और बोध अवस्था में ‘जानामि’—मैं जानता हूँ, यह अनुभव कैसे होता है ? इन १. ( बृ. उ. ४।३।२३-३० ) २. ( बृ. उ. ३।४।२ ) ३. ( बृ. उ. ४।३।७ ) ४. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ५. ( बृ. उ. ४।३।२२ ) ६. ‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति’—( बृ. उ. ४।३।२३-३० )

  • गतं श्रुतेः—पाठान्तरम् ।

१६४ उपदेशसाहस्री प्रश्नों का समाधान यह है कि विषय का उपरम और विषय का अनुपरम ही उसमें कारण है। पूर्वोक्त परामर्श और अनुभव दोनों स्वरूपनिबन्धन नहीं हैं। बृहदारण्यक श्रुति ने भी इसका समर्थन किया है१॥ ३९ ॥ व्यवधानाद्धि पारोक्ष्यं लोकदृष्टेर्नात्मनः । दृष्टेरात्मस्वरूपत्वात्प्रत्यक्षं ब्रह्म *तत्स्मृतम् ॥४०॥ व्यवधानादिति- घट-पटादि अनात्म (जड़) पदार्थों को ग्रहण करने वाली चक्षुरादि लौकिक दृष्टि है। वह दृष्टि देश-काल आदि से व्यवहित होने के कारण 'परोक्ष' है। और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। यह दृष्टि स्वयं आत्मस्वरूपा होने से ब्रह्मज्ञानी विद्वान् 'ब्रह्म' को प्रत्यक्ष बताते हैं। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म में अभेद होने से (भेद न रहने से) 'ब्रह्म' सर्वदा ही प्रत्यक्ष है ॥ ४० ॥ हृदयस्पर्शिनी इस प्रकार 'आत्मा नित्य और चैतन्यस्वरूप होने से नित्य अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) और निर्विकार है', यह बताया गया है, उसी को विस्तृत रूप से अब आगे तीन श्लोकों में बता रहे हैं-अनात्मरूप घट-पटादि विषय को ग्रहण करने- वाली चक्षुरादि लोकदृष्टि, देश-काल आदि से व्यवहित (सन्निकृष्ट न) होने के कारण परोक्ष है, किन्तु स्वयं दृष्टि आत्मस्वरूपा है। इस कारण आत्मा में दृष्टि का व्यवधान नहीं है। आत्मा तो ब्रह्मरूप ही है। वह ब्रह्म तो स्वतः ही सदा प्रत्यक्ष है, ऐसा ब्रह्मज्ञ लोग कहते हैं। अभिप्राय यह है-लौकिक और अलौकिक दो प्रकार की दृष्टि होती है। चक्षुरादि इन्द्रियों से होनेवाली दृष्टि (ज्ञान) लौकिक है, और आत्मस्वरूपभूता ज्ञानदृष्टि अलौकिक है। चक्षुरादि इन्द्रिय से उसके विषय कहलानेवाले घट-पटादि में देश-काल आदि का व्यवधान रहता है, इसलिये वह परोक्ष दृष्टि है, किन्तु आत्मा और ब्रह्म में अभेद रहने से ब्रह्म सर्वदा प्रत्यक्ष है। वह दृष्टि भी आत्मस्वरूपा है। अतः उसे परोक्ष नहीं कहा जाता ॥ ४० ॥ न हि दीपान्तरापेक्षा यद्वद्दीपप्रकाशने । बोधस्यात्मस्वरूपत्वान्न बोधोऽन्यस्तथेष्यते ॥४१॥ नहीति-जैसे दीपक को प्रकाशित करने के लिये अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'बोध' आत्म- स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने प्रकाश के लिये किसी अन्य बोध की अपेक्षा नहीं होती है ॥ ४१ ॥ हृदयस्पर्शिनी स्वरूपप्रकाश अनन्यपेक्ष होता है, इसे दृष्टान्त के द्वारा स्पष्ट कर रहे हैं-जिस प्रकार किसी दीपक को प्रकाशित करने के लिये किसी दूसरे दीपक की आवश्यकता (अपेक्षा) नहीं रहती, उसी प्रकार बोध (ज्ञान) आत्म- स्वरूप होने के कारण उसे भी अपने को प्रकाशित करने में किसी दूसरे बोध (ज्ञान) की अपेक्षा नहीं होती ॥ ४१ ॥ विषयत्वं विकारित्वं नानात्वं वा न हीष्यते । न हेयो नाप्युपादेय आत्मा नान्येन वा ततः ॥४२॥ विषयत्वमिति-इस प्रकार आत्मा (ज्ञान) को अपरोक्षता को स्पष्ट करके उसके अविकारित्व और निर्वि- शेषता को बता रहे हैं- आत्मा का विषयत्व, विकारित्व और नानात्व का भी स्वीकार नहीं किया जा सकता । इस कारण आत्मा अपने अथवा किसी अन्य के द्वारा ग्राह्य या त्याज्य भी नहीं है ॥ ४२ ॥ सबाह्याभ्यन्तरोऽजीर्णो जन्ममृत्युजरातिगः । अहमात्मेति यो वेत्ति कुतो न्वेव बिभेति सः ॥४३॥ १. 'यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्' - (बृ. उ. ४।३।२१) तथा 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्'- (बृ. उ. ४।५।१५)

  • यत्स्मृतम्-पाठान्तरम् ।

सम्यङ्मतिप्रकरणम् १६५ स बाह्य ति—जो यह जान लेता है कि 'मैं बाहर, भीतर विद्यमान हूँ, मैं जीर्ण-शीर्ण नहीं हूँ, मैं जन्म-मृत्यु तथा वार्धक्य से रहित हूँ, ऐसा मैं ही आत्मा हूँ', तब वह किसी से क्यों डर सकता है ? ॥४३॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा की निर्विकारता कैसे हो सकती है ? क्योंकि नरकपात आदि का भय होने से उसकी निवृत्ति के लिये धर्मानुष्ठान बताया गया है। पदार्थ के सम्यक् शोधन के द्वारा जो आत्मतत्त्व को जानता है, वह किससे भयभीत हो सकता है ? क्योंकि भय के हेतुभूत द्वितीय तो बाधित है । अर्थात् अज्ञानावस्था में ही भीति और तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान होता है। ज्ञानावस्था में न भय है और न तन्निवृत्त्यर्थ धर्मानुष्ठान है। मैं बाहर-भीतर विद्यमान, प्राचीनता से रहित और जन्म, मृत्यु, जरा से शून्य आत्मा हूँ, ऐसा जो जानता है, उसे किसी से भय नहीं होता ॥ ४३ ॥ प्रागेवैतद्विधेः कर्म वर्णित्वादेरपोहनात् । तदस्थूलादिशास्त्रेभ्यस्तत्त्वमेवेति निश्चयात् ॥४४॥ प्रागेवेति—'आत्मा अस्थूल है, अनणु है, इस श्रुति के द्वारा कर्माधिकार की प्राप्ति में कारणभूत वर्णित्वादि का निराकरण (बाध) किया गया है, उस कारण और 'तत् त्वमसि' तुम वह (ब्रह्म) हो, इस महावाक्य के द्वारा अपने ब्रह्मत्व का निश्चय होने से पूर्व ही 'यावज्जीवन अग्निहोत्र करे'—इस श्रुतिवचन से बताया गया कर्मानुष्ठान आवश्यक है ॥ ४४ ॥ हृदयस्पर्शिनी ज्ञानी के लिये भी वेदविहित अग्निहोत्रादि कर्मों का अनुष्ठान यावज्जीवन करने के लिये कहा गया है, और उसके न करनेपर प्रत्यवाय का भय ज्ञानी (विद्वान्) के लिये भी है, तत्परिहारार्थ ज्ञानी को भी अनुष्ठान करना ही होगा, इस आशंका का समाधान इस प्रकार होगा—ब्रह्मात्मरूप के प्रतिपादन के पूर्व ही अग्निहोत्रादि कर्म बताये गये हैं, उसके बाद नहीं, क्योंकि ब्रह्मात्मज्ञान से तो कर्मानुष्ठान के प्रयोजक वर्णित्व, आश्रमित्व आदि के अभिमान का बाध हो जाता है। यदि कहें कि वर्णाश्रमादि से युक्त अधिकारी को कर्मानुष्ठान का त्याग करना उचित नहीं है, किन्तु उसका समाधान यह है कि अस्थूलादि लक्षण वह ब्रह्म तू ही है, इस प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य से निश्चय होने के कारण कर्मानुष्ठान के अधिकारी को 'अहं ब्रह्म' मैं ब्रह्म हूँ—इस प्रकार बोध (ज्ञान) हो जाने पर उसके लिये कर्मानुष्ठान नहीं है। क्योंकि कर्माधिकार की प्राप्ति में कारण तो वर्णाश्रमित्व है, उसका अस्थूलादि शास्त्र से अपोहन (बाध) हो जाता है। तब वह कर्मानुष्ठान का अधिकारी ही नहीं रहता। अतः जिसका जो अनधिकारी है, उसे उसके न करनेपर प्रत्यवाय का होना संभव ही नहीं है। एवं च ब्रह्मज्ञानी के लिये कर्मानुष्ठान प्राप्त ही नहीं है ॥ ४४ ॥ पूर्वदेहपरित्यागे जात्यादीनां प्रहाणतः । देहस्यैव तु जात्यादिस्तस्याप्येवं ह्यनात्मता ॥४५॥ पूर्वदेहेति—देह का त्याग होनेपर उसकी जाति आदि का भी त्याग हो जाता है। अतः ये जाति आदि देह के ही धर्म हैं। वे आत्मा के धर्म नहीं हैं, क्योंकि ये आगमापायी हैं। उसी तरह देह भी आगमापायी होने से वह भी अनात्मा है ॥ ४५ ॥ हृदयस्पर्शिनी आत्मा में वर्णाश्रमित्वादि की प्रतीति अध्यास के बल पर होती है। देह का परित्याग करने पर तत्सम्बद्ध जाति का भी परित्याग होता है। अतः जाति आदि आगमापायी हैं, इस कारण उन्हें आत्मा के धर्म नहीं कह सकते; वे जाति आदि तो देह के ही धर्म हैं। यदि देह को ही आत्मा कहें तो वह भी उचित नहीं है, क्योंकि देह भी आगमापायी होने से उसे भी आत्मा नहीं मान सकते। एवं च देह भी अनात्मस्वरूप ही है। देह को जो कर्माधिकार प्राप्त होता है, वह भी वर्णाश्रम के अनुरोध से ही है। अतः आत्मा में कर्माधिकार के हेतुभूत वर्णाश्रम के न होने से उसे स्वभावतः ही कर्मकर्तृत्व नहीं है ॥ ४५ ॥

१६६ उपदेशसाहस्री ममाहं चेत्यतोऽविद्या शरीरादिष्वनात्मसु । आत्मज्ञानेन हेया स्यादसुराणामिति श्रुतेः ॥४६॥ ममाहमिति—अतः शरीरादि अनात्म पदार्थों में जो ममता और अहंता होती रहती है, उसी को अविद्या कहते हैं। उसका आत्मज्ञान के द्वारा (आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान के द्वारा) बाध (नाश) करना चाहिये। इस प्रकार की देहात्मदृष्टि को आसुरी सम्पत्ति कहा है, उसकी निन्दा भगवती श्रुति ने की है ॥ ४६ ॥ हृदयस्पर्शिनी शरीरादि में आत्मा-आत्मीय होने का अभिमान तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही है, उसे हेय (त्याज्य) कैसे कहा जाय ? इस आशंका का समाधान यह है कि देह के आगमापायी रहने से उसका अनात्मत्व तो निश्चित ही है। उस कारण शरीरादि अनात्माओं में जो ममता और अहंता का अभिमान है, वह मिथ्या प्रत्यय है, अर्थात् उसी का नाम अविद्या है, उसका आत्मतत्त्वब्रह्मात्मानुसन्धान (आत्मज्ञान) के द्वारा बाध करना चाहिये। देहात्मदृष्टि (ज्ञान) को आसुर ज्ञान कहा गया है, इसी कारण श्रुति ने उसकी निन्दा की है। इस ज्ञान को असुरों की उपनिषद् कहा गया है¹। अतः देहात्मदर्शन को हेय समझना चाहिये ॥ ४६ ॥ दशाहाशौचकार्याणां पारिव्राज्ये निवर्तनम् । यथा ज्ञानस्य संप्राप्तौ तद्वज्जात्यादिकर्मणाम् ॥४७॥ दशाहेति—शास्त्रविधि के अनुसार संन्यास (पारिव्राज्य) ग्रहण करनेपर सपिण्डता का अभिमान नष्ट हो जाने से किसी सपिण्ड की अथवा उसीकी मृत्यु होने के कारण जो दशाह (दस दिन) के अशौचादि कार्य होते हैं, वे किसी को अथवा उस संन्यासी को नहीं करने पड़ते। उसी प्रकार आत्मज्ञान के होनेपर जाति आदि का अभिमान नष्ट हो जाने के कारण उस ज्ञानी पुरुष को कर्मानुष्ठान नहीं करना पड़ता ॥ ४७ ॥ हृदयस्पर्शिनी तत्त्वज्ञान के पश्चात् कोई कर्मानुष्ठान नहीं और न ही तत्प्रयोजक जाति आदि का सम्बन्ध आत्मा से है, इसे दृष्टान्त देकर समझाते हैं—जिस प्रकार संन्यासाश्रम ग्रहण करने पर सपिण्डताभिमान के न होने से संन्यासी को अशौचादि प्राप्त नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्मात्मज्ञान की प्राप्ति होने पर जात्यादि का अभिमान न रहने से विद्वान् को कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती ॥ ४७ ॥ यत्कामस्तत्क्रतुर्भूत्वा कृतं त्वज्ञः प्रपद्यते । यदा स्वात्मदृशः कामाः प्रमुच्यन्तेऽमृतस्तदा ॥४८॥ यत्कामइति—अज्ञानी पुरुष अपनी कामना (फल की इच्छा) के अनुसार ही सङ्कल्प करता है, तदनुरोधेन ही कर्म करके फल प्राप्त करता है, किन्तु जिस समय आत्मज्ञानी की समस्त कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, उस समय वह अमर अर्थात् संसारबन्धन से मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥ हृदयस्पर्शिनी जब कि ब्रह्मात्मता के अज्ञान के कारण आत्मा के लिये यह संसार देहाध्यासनिबन्धक रहता है, उस कारण तत्त्वज्ञान होने से पूर्व कामादि से युक्त हुआ वह आत्मा धर्माधर्म के कारण संसरण करता रहता है, किन्तु ब्रह्मात्मज्ञान होने पर कामादि का अभाव हो जाने से वह मुक्त हो जाता है। अज्ञानी पुरुष तो जैसी कामना करता है, उसी प्रकार १. 'असुराणां ह्येषोपनिषद्'—(छां उ. ८।८।५)