वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
ओ३म् वैशेषिकदर्शनम् कणादमुनिप्रणीतम् यच्च तुलसीरामस्वामिना सरलभाषानुवादेन सङ्कलय्य स्वीये स्वामिमेशीनयन्त्रालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम् मेरठ फ़रवरी सन् १८९२ ई० मूल्यम् ॥=), कच्ची जिल्द ॥≡)
ओ३म् भूमिका वैशेषिकदर्शन कणाद् मुनि का बनाया दर्शन है, जिस का "वैशेषिक" नाम इस अन्वर्थ संज्ञा से पड़ा कि- अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ४।३।८७ सूत्रानुसार विशेषों का अधिकार करके जो ग्रन्थ बनाया गया, उसका नाम "वैशेषिक" रक्खा गया । अभेदवादी वा मायावादी अद्वैतियों का मत इस शास्त्र के सर्वथा प्रतिकूल है, क्योंकि भेद के विना गौ और घोड़े में विशेष नहीं हो सकता । यह दर्शन विशेषों का व्याख्यान करता है, लिये अद्वैतवादियों ने इस का खण्डनाऽऽभास किया है । अद्वैतसिद्धि वैशेषिकदर्शनोक्त विशेषवाद वा भेदवाद के विरुद्ध कैसे असभ्य और कटु शब्दों में कथन किया है सो श्रीमधुसूदनसरस्वती की अद्वैतसिद्धि द्वि- तीचे के श्लोक से जाना जायगा- इह कुमतिरतत्त्वे तत्त्ववादी वराकः प्रलपति यदकाण्डे खण्डनाभाससमुच्चैः । प्रतिवचनममुष्मै तस्य को वक्तु विद्वान् नहि रुतमनुरौति ग्रामसिंहस्य सिंहः ॥ १ ॥ अर्थ-जो कि अवसर में अतत्त्व में तत्त्व बताने वाला बेचारा कुमा- (वैशेषिकादि का अनुयायी) उच्च खण्डनाभास को बकता है, यहां कौन विद्वा- उस का उत्तर देवे, क्योंकि कुत्ते के भौंकने पर सिंह उत्तर में नहीं भौंकता- धन्य हैं संसार को मिथ्या बताने वाले मिथ्यामायावादी विद्वान् जो मत की इतने कटु शब्दों में ईर्ष्या करते हैं । वेदान्तदर्शन का भाष्य अ- चारम्भ करने का विचार है, उस में जहां २ वैशेषिक वा अन्य शास्त्रों तिरस्कार अद्वैतवादियों ने किया है, वहां उस का समाधान किया जायगा- इस वैशेषिकदर्शन भाषानुवाद के पढ़ने वाले इस भ्रान्ति में नहीं पड़ेंगे षड्दर्शनों में परस्पर खण्डन है । ईश्वर की कृपा से अब न्याय, वैशेषि- सांख्य, योग-इन ४ दर्शनों का अनुवाद और भाष्य पूर्ण होगया । आ- है कि पाठक इस से भी न्यायादि के समान रुचिपूर्वक लाभ उठावेंगे ॥ तुलसीराम स्वा-
काणादे सूत्रजाते तदनु च वितनोम्य़ार्य्यभाषानुवादं
ओ३म् व्याख्याय न्यायशास्त्रं तदनु च सुधियो ! योगशास्त्रं क्रमेण तत्पश्चात् सांख्यशास्त्रं कपिलमुनिकृतं व्याकृतं व्याख्यया तत् । काणादे सूत्रजाते तदनु च वितनोम्य़ार्य्यभाषानुवादं यं दृष्ट्वा भद्रसामाजिकजनहृदये ज्ञानसूर्योदयःस्यात् ॥ १ ॥ अथ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवादः तत्र प्रथमोऽध्यायः मोक्ष के असाधारण हेतुभूत तत्त्वज्ञान का उपदेश करने के लिये कणाद मुनि तत्त्वज्ञान के हेतु धर्म के व्याख्यान की प्रतिज्ञा करते हैं:— १-अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ ( अथ ) अब ( अतः ) इस से आगे ( धर्मं ) धर्म को ( व्याख्यास्यामः ) हम व्याख्यात करेंगे ॥ १ ॥ आगे धर्म का लक्षण करते हैं:— २-यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥ २ ॥ ( यतः ) जिस से ( अभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः ) भोग मोक्ष की सिद्धि हो ( सः ) वह ( धर्मः ) धर्म है ॥ उन वेदोक्त शुभकर्मानुष्ठान और तत्त्वज्ञानोपदेशक वेदादि शास्त्राभ्यास का नाम धर्म है, जिन से सांसारिक ( ऐहिक, आमुष्मिक सब प्रकार के सुख भोग और अन्त में धर्मानुष्ठान से अन्तःकरण शुद्ध होने पर उपजे ब्रह्मज्ञान से निःश्रेयस=मुक्ति भी सिद्ध हो सके ॥ २ ॥ ३-तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ ३ ॥ ( तद्वचनात् ) उस धर्म का वचन होने से ( आम्नायस्य ) वेदादि शास्त्र का ( प्रामाण्यम् ) प्रामाण्य है ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद क्योंकि वेदादि शास्त्र धर्म का वखान करते हैं, इस कारण लोक उन प्रमाण मानता है ॥ यदि वेदादि शास्त्र में अभ्युदय और मोक्ष के साधन धर्म का वर्णन न होता तो लोक उस को निरर्थक जान कर प्रमाण न करता, परन्तु वेदादि शास्त्र में धर्म का निरूपण है और धर्म मनुष्य के ऐहिक आमुष्मिक कल्याण का साधन है, इस लिये लोक वेदादिशास्त्र में प्रामाण्यबुद्धि रखता है और रखनी चाहिये भी ॥ यही बात मीमांसादर्शन १ । १ । २ में कही गई है कि- "चोदनाल- क्षणोऽर्थो धर्मः" जिस की प्रेरणा वेद आदि शास्त्र करता है, वह धर्म है। तथा मनु २ । १३ में भी यही कहा है कि "धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः" धर्म के जिज्ञासुओं को परम प्रमाण वेद है। मनु ४ । १४ में भी कहा है कि- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ अर्थात् वेदप्रतिपादित स्वधर्म का अनुष्ठान निरालस्य होकर सदा करे क्योंकि यथाशक्ति उस का करने वाला परम गति (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है ॥४॥ वेदादि शास्त्रोक्त धर्म किस रीति वा क्रम से मनुष्य की मुक्ति का हेतु है, सो वर्णन करते हैं:- ४-धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसम- वायानां पदार्थानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् ॥ ४ ॥ (धर्मविशेषप्रसूतात्) पुण्यविशेष से उत्पन्न हुये, (द्रव्यगुणकर्मसामान्य- विशेषसमवायानाम्) १-द्रव्य २-गुण ३-कर्म ४-सामान्य ५-विशेष और ६- समवाय (पदार्थानाम्) ६ पदार्थों के (साधर्म्यवैधर्म्याभ्याम् : साधर्म्य और वैधर्म्य से होने वाले (तत्त्वज्ञानात्) तत्त्वज्ञान से (निःश्रेयसम्) मोक्ष होता है। तत्त्वज्ञान से मोक्ष होता है, यह फलितार्थ है। तत्त्वज्ञान का १ विशे- षण 'धर्मविशेषप्रसूत' है अर्थात् वह तत्त्वज्ञान जो कि पुण्यविशेष से उत्पन्न हुआ है, २-विशेषण-विशेष्य तत्त्वज्ञान से अन्वित यह है कि "द्रव्यगुण- वैधर्म्याभ्याम् तत्त्व०" द्रव्यादि ६ पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य से तत्त्व CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
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(याथार्थ्य) को जानना। इसी से मुक्ति होती है। द्रव्यादि छहों पदार्थों को निर्देशलक्षणपूर्वक आगे स्वयं ५ वें सूत्र से कहा है। द्रव्यादि छहों के समान धर्म वा अनुगत धर्म वा साधारण धर्म को साधर्म्य समझो, और इन के विशेष धर्म वा व्यावृत्त धर्म वा असाधारण धर्म को वैधर्म्य कहते हैं ॥ बहुत लोग जिज्ञासा करेंगे कि पृथिव्यादि द्रव्य और गुण कर्मादि लौ- किक पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्षसिद्धि का कथन तो एक अनौखी बात है, अन्य सब शास्त्र तो ब्रह्मज्ञान से मोक्ष मिलना मानते हैं। इस का उत्तर यह है कि आत्मा अनात्मा के भेद से पदार्थ दो प्रकार के हैं, जब तक पृथि- व्यादि अनात्म पदार्थों का तत्त्व न समझ पड़े तब तक इन से विलक्षण अती- न्द्रिय आत्मपदार्थ का तत्त्वज्ञान दुर्घट वा दुर्लभ है, इस लिये इस शास्त्र ने आत्मा और अनात्मा सभी पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्षप्राप्ति होना वर्णित किया है। आत्मतत्त्व के ज्ञान होने पर परमात्मतत्त्व का ज्ञान होता है, जिस से मोक्ष में आनन्द का अनुभव किया जाता है। न्यायादि ५ दर्शनों में बड़ी प्रबलता से विविक्तात्मतत्त्वज्ञान का उपदेश करके मुमुक्षु को फिर वेदान्त द्वारा साक्षात् परमात्मतत्त्व का उपदेश होता है ॥ वैशेषिकाचार्य कणाद मुनि जी ने द्रव्यादि छः ही पदार्थ लिखे हैं, परन्तु नवीन लोग उदयनाचार्य्यादि ने एक ७ वां पदार्थ अभाव भी माना है। तर्क- संग्रह से आरम्भ करने वाले इसी ७ पदार्थ के विवाद में पड़कर न्याय वैशे- षिक के तत्त्व को न समझ कर वृथा वाग्जाल में फंसे रह जाते हैं। सब प्रकार के अभावपदार्थ वैशेषिक के "पृथक्त्व" नामक गुण के अन्तर्गत हैं और इसी से आचार्य्य ने पृथक् नहीं गिने। पृथक्त्व=अयोग=वैलक्षण्य=अनेकता; इन शब्दों का एक ही तात्पर्य्य है। इस लिये प्रागभावादि ३ अभाव तो अयोग के अन्तर्गत हैं, चौथा अन्योन्याभाव वैलक्षण्य के अन्तर्गत है॥ नवीन आचार्यों के वर्णित अभाव के भेदों को पाठकों के परिचयार्थ यहां लिखे देते हैं। यथा-अभाव ४ प्रकार का है। १ प्रागभाव, २-प्रध्वंसाभाव, ३-अत्यन्ताऽभाव और ४-अन्योन्याऽभाव। १-प्रागभाव उस को कहते हैं कि जो कार्य की उत्पत्ति से पूर्व उस (कार्य) का अभाव है, यह अभाव यद्यपि अनादि है तो भी नाशवान् है, क्योंकि घट की उत्पत्ति होने पर उस का प्रागभाव नष्ट होगया, नहीं रहा। इस लिये फल यह हुवा कि नाश- वान् अभाव को प्रागभाव कहते हैं। २-प्रध्वंसाभाव है जो कार्य के नाश
४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
से पश्चात् उस का अभाव है । जैसे घट के नष्ट होने पर घट का अभाव है। यह अभाव सादि अनन्त है, क्योंकि घट के नाश से पहले घट का प्रध्वंसा- भाव न था, अतः सादि हुवा और घट के नाशक्षण से आरम्भ होकर अनन्तकाल के लिये अभाव हो गया । इस कारण यह प्रध्वंसाऽभाव सादि अनन्त हुवा । तब फलितार्थ यह निकला कि जन्य=कार्य के नाशोत्पन्न अभाव को प्रध्वंसाऽभाव कहते हैं । ३-किसी सद्बस्तु का एक देश को छोड़ कर अन्य देश में त्रैकालिक अभाव=अत्यन्ताऽभाव है । यह अनादि अनन्त है, क्योंकि यह अभाव तीनों कालों में एक सा रहता है, जो वस्तु जहां न थी न है, न होगी, उसका वहां अत्यन्ताऽभाव कहा जायगा । इस का तात्पर्य यह हुवा कि नित्यसंसर्ग के अभाव को अत्यन्ताऽभाव कहते हैं । ये तीनों अभाव अभाववादियों के मत में संसर्गाऽभाव कहलाते हैं। ४-एक वस्तु का अन्य वस्तु में जो अभाव है उस को अन्योन्याऽभाव कहते हैं। जैसे घट तौ पट नहीं, और पट घट नहीं । घट में पट और पट में घट के अभाव को अन्योन्याऽभाव कहेंगे । इसी को 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकाऽभाव' भी कहते हैं । कोई लोग एक ५ वें प्रकार का अभाव भी मानते हैं, वह यह है कि- वृद्धि और क्षयवाला, समय विशेष में प्रतीत होने वाला='सामयिकाऽभाव ' कहाता है । उदयनाचार्य के मत में यह अत्यन्ताऽभाव के अन्तर्गत है, परन्तु इस की प्रतीति समयविशेष में इस प्रकार समझी जाती है कि घट वाले भूभाग में घटसम्बन्ध के प्रागऽभाव और प्रध्वंसाऽभाव तौ वर्तमान नहीं हैं, और अत्यन्ताऽभाव नित्य भी है तौ भी घट वाले भूभाग में बुद्धिस्थ नहीं होता, इस लिये सामयिकाऽभाव एक पांचवां जान पड़ता है । अभाव का अभाव तौ भाव ही है, अन्य कुछ नहीं, जैसा कि वाचस्पतिमिश्र तात्पर्य- टीका में कहते हैं कि-" नो खल्वभावऽभावोनाम कश्चिदन्योभावात, नाऽपि भावाभावोऽन्योऽभावात् ।" इस को नवीन लोग तीसरा अत्यन्ता- भाव बताते हैं । परन्तु उसके प्रागऽभाव स्वरूप होने से अनवस्था दोष नहीं । सामान्याऽभाव तौ विशेषाऽभावसमुदाय से भिन्न ही है, इस में सब को समानता है । अभाव क्या है ? इस के उत्तर में कोई तौ कहते हैं कि भाव से भिन्न अभाव है। कोई कहते हैं कि निषेधात्मक प्रतीति का विषय होगा अभाव है । तथा अन्य कहते हैं कि-द्रव्यादि छः पदार्थों में से एक में दूसरे का अभाव वाला ही अभाव है । किन्हीं का कथन है कि समवाय से अन्य
प्रथमोऽध्याय ५ असमवायी वा अनन्वित होना = अभाव है। और नवीन लोग इसको "तादात्म्य सम्बन्धाऽवच्छिन्नप्रतियोगिताकत्वाऽवच्छिन्नभावनिष्ठप्रतियोगितानिरूपितानुयोगिता विशेष वाला होना", कहते हैं ॥ ऊपर लिखा नव्य मतमतान्तराद् श्री स्वामी हरिप्रसाद जी कृत वैशे- षिकदर्शन वैदिक वृत्ति के आश्रय पर लिखा गया है ॥ ४ ॥ अब प्रथम गिनाये छः ६ पदार्थों में से पहिले द्रव्य पदार्थ के विभाग कहे जाते हैं - ५-पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ ५ ॥ (पृथिवी) पृथिवी (आपः) जल (तेजः) अग्नि (वायुः) वायु (आकाशं) आकाश (कालः) समय (दिक्) दिशा (आत्मा) आत्मा (मनः) और मन (इति) ये (द्रव्याणि) ९ द्रव्य कहलाते हैं ॥ ये नौ "द्रव्य" कुछ तत्त्ववाचक नहीं हैं, किन्तु वैशेषिक शास्त्र में "द्रव्य" संज्ञा इन ९ पदार्थों की है। सांख्य, योग, वेदान्त की परिभाषा में पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन को प्रकृति का कार्य होने से प्रकृति के अन्तर्गत माना है। जिस को यहां न्याय और वैशेषिक में 'आत्मा' कहा है उसी जीवात्मा परमात्मा (आत्मद्वय) को सांख्य में पुरुष कहा है। बहुत टीकाकारों ने इन ९ द्रव्यों में नित्य, अनित्य द्रव्यों का विभाग किया है, कोई कहते हैं कि पृथ्व्यादि ४ अनित्य, शेष नित्य हैं, कोई ३ अनित्य शेष नित्य मानते हैं, परन्तु वैशेषिक शास्त्रकार ने स्वयं नित्य वा अनित्य कुछ नहीं कहा, सब यही समझना ठीक है कि सांख्यादि अन्यशास्त्रोक्तसिद्धान्तानुसार जिस को वैशेषिक, न्याय, मीमांसा में परमाणु और सांख्य, योग, वेदान्त में प्रकृति माना है, एक वह नित्य है, दूसरा आत्मा नित्य है जिस को न्याय, वैशेषिक में आत्मा, सांख्य में पुरुष, योग में चेतन वा चिति कहा है। आत्मा व पुरुष वा चिति में जीवात्मा परमात्मा दोनों का वा किसी एक का प्रकरणानुसार ग्रहण किया जाता है। शेष सब अनित्य अर्थात् प्रकृति का कार्य हैं ॥ ५ ॥ द्रव्यों का विभाग कहकर अब गुणों का विभाग कहा जाता है। यथा- ६-रूपरसगन्धस्पर्शाःसंख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वाऽपरत्वे बुद्धयः सुखदुःखे इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥ ६ ॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद ( रूप-स्पर्शाः ) १-रूप २ रस ३ गन्ध ४ स्पर्श ( संख्याः ) ५ संख्यायें ( परिमाणानि ) ६-नाप तोल आदि ( पृथक्त्वम् ) ७- पृथक् होना ( संयो- गविभागौ ) ८ संयोग और ९ वियोग ( परत्वाऽपरत्वे ) १० परे होना और ११ वरे होना ( बुद्धयः ) १२ बुद्धियें ( इच्छाद्वेषौ ) १३ इच्छा और १४ द्वेष ( च ) और ( प्रयत्नाः ) १५ अनेक प्रयत्न ( गुणाः ) ये गुण हैं ॥ पं० शङ्कर मिश्रकृत वैशेषिकसूत्रोपस्कार, पं० स्वामी हरिप्रसाद जी कृत वैशेषिकसूत्रवैदिकवृत्ति और पं० आर्यमुनिकृत वैशेषिकार्यभाष्यादि नये और पुराने भी सब टीकाकारों ने सूत्रस्थ ( च ) शब्द से १ गुरुत्व=भारीपन २- द्रवत्व=बहने वाला पतलापन ३ स्नेह=चिकनापन ४-संस्कार=वेगादि ५ धर्म ६ अधर्म और ७-शब्द; ये ७ गुण और मानकर सूत्र में कहे १५ गुणों सहित २२ गुण माने हैं ॥ नीचे लिखी कारिकाओं में जो वै० वै० वृत्ति में से उद्धृत हैं, कौन २ किस २ के गुण हैं, प्रकट होगा- स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्यः संस्कारोमरुतोगुणाः । स्पर्शाद्यष्टौ रूपवेगौ द्रवत्वं तेजसोगुणाः ॥ १॥ स्पर्शादयोऽष्टौ वेगश्च द्रवत्वं च गुरुत्वकम् । रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिएयेते चतुर्दश ॥ २ ॥ स्नेहहीना गन्धयुताः क्षितावेते चतुर्दश । बुद्ध्यादिषट्कं संख्यादि-पञ्चकं भावनां तथा ॥ ३ ॥ धर्माऽधर्मौ गुणाएते आत्मनः स्युश्चतुर्दश । संख्यादिपञ्चकं कालदिशोः शब्दश्च ते च खे ॥४॥ संख्यादिपञ्चकं बुद्धिरिच्छा यत्नोऽपि चेश्वरे । परत्वाऽपरत्वे संख्यादि पञ्च वेगश्च मानसे ॥ ५ ॥ अर्थ-स्पर्शादि ८-( स्पर्श १ संख्या २ परिमाण ३ पृथक्त्व ४ संयोग ५ वियोग ६ परत्व ७ अपरत्व ८) और ९ वां वेगनामक संस्कार; ये वायु के गुण हैं । स्पर्शादि ८ और ९ रूप, १० वेग और ११ द्रवत्व अग्नि के गुण हैं ॥ १ ॥ स्पर्शादि ८ और ९ वेग १० द्रवत्व ११ गुरुत्व १२ रूप १३ रस और १४ स्नेह; ये CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
प्रथमोऽध्यायः ७ जल में १४ गुण हैं ॥ २ ॥ उक्त १४ जल के गुणों में से १ स्नेह को छोड़ कर शेष १३ और १४ वां गन्ध; ये १४ पृथिवी में गुण हैं। बुद्धि आदि ६ (बुद्धि १ सुख २ दुःख ३ इच्छा ४ द्वेष ५ और प्रयत्न ६) और संख्यादि ५ सब ११ तथा १२ भावना ॥ ३ ॥ १३ धर्म १४ अधर्म; ये १४ गुण आत्मा (जीवात्मा) के हैं। संख्या आदि ५ काल और दिशा के गुण हैं। तथा संख्यादि ५ और ६ शब्द, ये ६ आकाश के गुण हैं ॥ ४ ॥ संख्यादि ५ बुद्धि ६ इच्छा ७ और यत्न ८ ये ईश्वर में गुण हैं। १ परत्व २ अपरत्व ३-७ तक संख्यादि पांच और ८ वां वेग; ये मन में गुण हैं ॥ ५ ॥ कोई लोग शक्ति को भी गुण कहते हैं, कोई उस को एक प्रकार का द्रव्य कहते हैं। परन्तु वैशेषिक के अपने मत में तो जिस पदार्थ की जो शक्ति है, वह उस का स्वरूप ही है, भिन्न कुछ नहीं ॥ कोई लोग लघुत्व को एक पृथक् गुण बताते हैं, यह ठीक भी जान पड़ता है, क्योंकि जैसे संयोग और विभाग एक दूसरे के विरोधी समझ कर पृथक् २ गिने गये, इसी प्रकार गुरुत्व का विरोधी लघुत्व (भारी का विरोधी हलका) भी पृथक् गिनाने योग्य जान पड़ता है, परन्तु और गहरी बुद्धि से विचार करें तो लघुत्व (हलकापन) भी गुरुत्व के अन्तर्गत है, क्योंकि हलकी से हलकी वस्तु में भी कोई बोझ (भारीपन वा गुरुत्व) अवश्य है, तब गुरुत्व ही तो अपेक्षाकृत लघुत्व भी हुआ, भिन्न नहीं ॥ तथा मृदुत्व=नर्मी, कठिनत्व=सख़्ती=कड़ापन, ये दोनों गुण इस लिये नहीं गिनाये गये कि अवयवों के संयोगविशेषरूप हैं, पृथक् नहीं ॥ शूरता, उदारता, दया, चातुर्य, उद्यता इत्यादि अन्य गुण भी प्रयत्नादि के अन्तर्गत होने से पृथक् नहीं गिनाये गये। क्योंकि बलवान् शत्रु के भी पराजय करने को यत्न करना शूरता है, जो यत्न के अन्तर्गत हुई। सदा सन्मार्ग में रहने वाली बुद्धि ही उदारता है। पराये दुःख दूर करने की इच्छा ही दया है। तत्त्व के भीतर प्रवेश करने वाली बुद्धि ही चातुर्य है। अपने में उद्धत की बुद्धि ही उद्यता है। इस प्रकार देखा जावे तो शूरतादि सब प्रय- त्नादि से पृथक् गिनाने योग्य नहीं ॥ ६ ॥ अब कर्म के विभाग कहे जाते हैं- ७-उत्क्षेपणमवक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ ७ ॥
(उत्क्षेपणम्) ऊपर को उठाना (अवक्षेपणम्) नीचे को दबाना (आकु- ञ्चनम्) सिकोड़ना (प्रसारणम्) फैलाना और (गमनम्) चलना; ये ५ (कर्माणि) कर्म हैं ॥ ७ ॥ द्रव्यों, गुणों और कर्मों का विभाग कह कर अब द्रव्य गुण कर्म का साधर्म्य किन बातों में है, सो कहते हैं:- ८-सद़नित्यं द्रव्यवतकार्यं कारणं सामान्यविशेषवदिति द्रव्यगुणकर्मणःऽविशेषः ॥ ८ ॥ (सत्) सत्ता वाला होना (अनित्यम्) होकर न रहने वाला होना (द्रव्यवत्) किसी समवायी द्रव्य वाला होना (कार्यम्) उत्पन्न होने वाला होना (कारणम्) किसी का उत्पादक होना (सामान्यविशेषवत्) किसी से समानता और किसी से विशेषता वाला होना इति) यह (द्रव्यगुणकर्मणाम्) द्रव्यों, गुणों और कर्मों का (अविशेषः) सामान्य वा साधर्म्य है ॥ प्र०-आत्मा भी तो द्रव्य है, तब क्या वह भी इस सूत्र के अनुसार अनित्य है ? उ०-इस सूत्र में सभी द्रव्यों वा सभी गुणों का साधर्म्य वा सामान्य नहीं कहा गया है, किन्तु जिन २ में संभव है, उन २ का विवक्षित है। क्योंकि यदि सूत्रकार अनित्य न कह कर नित्य कहते तौ कर्म के नित्य न होने से उस से साधर्म्य कहना अयुक्त होता। वास्तव में न तौ-सब द्रव्य अनित्य हैं, न सब गुण अनित्य हैं, कोई द्रव्य नित्य हैं, कोई अनित्य हैं। जो नित्य हैं, उन के गुण भी नित्य हैं। जैसे आत्मा नित्य है, उस का बुद्धि (चेतना=ज्ञान) गुण भी उस का समवायी सार्थी नित्य है। जो मन आदि द्रव्य अनित्य हैं, उन के गुण भी अनित्य हैं। बस इस सूत्र में जो अनित्य शब्द है, वह द्रव्यमात्र की अनित्यता का बोध नहीं कराता, किन्तु जो अनित्य हैं, उन का अनित्य गुणों तथा अनित्य (अवश्य अनित्य) कर्मों से साधर्म्य है। जो नहीं, उन का साधर्म्य भी नहीं। जिन २ द्रव्यों में अनित्यता है, उन का कर्मों और गुणों से साधर्म्य होता है, केवल इतना ही विवक्षित है। इसी बात को स्वामी श्री हरिप्रसाद जी ने वैदिकवृत्ति में और आर्यमुनि जी ने आर्यभाष्य में तौ स्वीकार किया ही है, किन्तु इन से पुराने श्री शङ्कर मिश्र ने भी अपने वैशेषिकसूत्रोपस्कार में लिखा है कि- “अनित्यमिति ध्वंसप्रतियोगित्वं यद्यपि न परमाण्वादि साधारणं तथापि ध्वंसप्रतियोगिवृत्तिपदार्थविभाजकोपा- धिमत्त्वं विवक्षितम्” ॥ ८ ॥
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प्रथमोऽध्याय ९ अब केवल द्रव्य और गुण में कितना साधर्म्य हो जाता है, सो बताते हैं:- ९-द्रव्यगुणयोः सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम् ॥ ९ ॥ (द्रव्यगुणयोः) द्रव्यों और गुणों में (सजातीयारम्भकत्वम्) अपने सजातियों को बनाने वाला होना (साधर्म्यम्) सामान्य है ॥ ९॥ अर्थात्- १०-द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारभन्ते गुणाश्च गुणान्तरम् ॥ १० ॥ (द्रव्याणि) द्रव्य (द्रव्यान्तरम्) दूसरे द्रव्य को (आरभन्ते) अपने में से बनाते हैं (च) और (गुणाः) गुण (गुणान्तरम्) अन्य गुण को [बनाते हैं] ॥ यद्यपि ८ वें सूत्र में कहे "अविशेष" शब्द की अनुवृत्ति से ही सूत्र ९ में साधर्म्य का अर्थ चल जाता, परन्तु अविशेष का और भी स्पष्ट करने के लिये तथा वाक्य के लालित्य प्रकाशनार्थ दूसरे शब्द "साधर्म्य" का प्रयोग आचार्य ने किया जान पड़ता है, जैसा कि आचार्य ने ९ वें सूत्र के भाष्यरूप इस १० वें सूत्र को लिख दिया है ॥ १० ॥ तौ जिस प्रकार द्रव्यों से द्रव्य बनते हैं, इसी प्रकार क्या कर्मों से कर्म भी बनते हैं ? उत्तर- ११-कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते ॥ ११ ॥ (कर्मसाध्यं) जिस का कर्म साध्य हो वह (कर्म) कर्म (न) नहीं (विद्यते) है ॥ ऐसा कर्म कोई नहीं है जिस से कर्मान्तर बनता हो क्योंकि 'कर्म' उत्पन्न होते ही 'विभाग' को उत्पन्न करता है, तो फिर वह स्वयं उत्पन्न कर्म किसी अन्य कर्म को क्या उत्पन्न करेगा ? प्रश्न-एक बारं कन्दुक (गेंद) को पृथिवी पर गट्टा देते हैं, वह एक कर्म है, फिर गेंद उछल कर पृथिवी पर गिरती और फिर उछलती है, तब क्या उछलना कर्म, कर्म से ही उत्पन्न नहीं हुवा ? यदि हुवा तो कर्मसाध्य कर्म क्यों नहीं ? उत्तर-गेंद को गट्टा देकर उस में वेगाख्य संस्कार उत्पन्न किया गया था, संस्कार गुणों में है, कर्मों में गिना नहीं गया, उस वेग ने कर्म उत्पन्न किया, न कि कर्म ने कर्मान्तर ॥ ११ ॥ द्रव्यों, गुणों और कर्मों का साधर्म्य कह कर अब गुणों, कर्मों और द्रव्यों का वैधर्म्य कहते हैं- २
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१० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद १२-न द्रव्यं कार्यं कारणं च बध्नाति ॥ १२ ॥ ( कार्यं ) कार्य ( च ) और (कारणं) कारण (द्रव्यं) द्रव्य को (न) नहीं ( बध्नाति ) नष्ट करता ॥ कोई कार्य कार्यद्रव्य का नाश नहीं करता, और कोई कारण, कारण द्रव्य का नाश नहीं करता । 'बध्नाति' यह आर्ष प्रयोग 'हिनस्ति' के स्थान में है ॥ १२ ॥ अब गुणों का प्रकार बताते हैं- १३-उभयथा गुणाः ॥१३ ॥ ( गुणाः ) गुण ( उभयथा ) दोनों प्रकार के हैं ॥ अर्थात् गुणों में दोनों प्रकार हैं, वे कार्य का नाश भी करते हैं, तथा कारण का भी । जैसे शब्द एक गुण है; उस पहले शब्द को उस का कार्य ( दूसरा शब्द ) नष्ट कर देता है । और अन्त के शब्द को उस का कारण वही उपान्त्य (अन्त से पूर्वला ) शब्द नष्ट कर देता है ॥ १३ ॥ प्रश्न-और कर्म कैसा होता है ? उत्तर- १४-कार्यविरोधि कर्म ॥ १४ ॥ ( कार्यविरोधि ) जिस का विरोधी कार्य हो, ऐसा ( कर्म ) कर्म है ॥ कोई कर्म ऐसा नहीं होता जिस का नाश उस के कार्य से न हो जाय । सभी कर्म अपने कार्य से नष्ट होजाते हैं । क्योंकि कर्म, विभाग को उत्पन्न करके और अगले संयोग को उत्पन्न करके अवश्य स्वयं नष्ट होजाता है ॥ १४॥ प्रश्न-जिस द्रव्य का यह प्रकार कहा गया कि उस को न तो कार्य नष्ट करता, न कारण, उस ( द्रव्य ) का लक्षण क्या है ? उत्तर- १५-क्रियागुणवत् समवायिकारणमिति द्रव्यलक्षणम् ॥१५॥ जो ( क्रियागुणवत् ) क्रिया वाला और गुणों वाला हो, ( समवायि कारणं ) संग रहने वाला कारण हो ( इति ) यह ( द्रव्यलक्षणम् ) द्रव्य का लक्षण=पहचान है ॥ यदि-एकला क्रिया वाला कहते तो आकाश क्रिया वाला नहीं, तब उस में अव्याप्ति दोष आता, इस लिये दूसरा लक्षण गुणों वाला कहा गया और नैयायिक कहते हैं कि "जायमानं हि द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति "=कार्य द्रव्य
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प्रथमोऽध्याय ११ जब उत्पन्न होते हैं उस क्षण में गुणरहित होते हैं, तब उत्पद्यमान घटादि कार्य द्रव्यों में उस क्षण भर को गुण वाला न होने से लक्षण अव्याप्त रहता, इस कारण तीसरा विशेषण ' समवायिकारण ' लिखा गया । क्योंकि उत्प- द्यमान घटादि भी अपने उत्पत्स्यमान गुणों के प्रति समवायिकारण होते हैं ॥ किसी एक लक्ष्य में लक्षण का न घटना अव्याप्ति दोष कहाता है। लक्ष्य से अन्यत्र भी लक्षण का घट जाना अतिव्याप्ति कहाता है तथा लक्ष्य मात्र में ही लक्षण का सर्वथा न घटना असंभव कहाता है । ये तीनों दोष न हों, तब निर्दोष लक्षण होता है । द्रव्य का लक्षण जो इस सूत्र में कहा है, तीनों दोषों से रहित ठीक है ॥ १५ ॥ अब गुण का लक्षण करते हैं:- १६-द्रव्याश्रय्यऽगुणवान् संयोगविभागेष्वकारण मऽनपेक्ष इति गुणलक्षणम् ॥ १६ ॥ जो ( द्रव्याश्रयी ) द्रव्य के आश्रय वाला हो, ( अगुणवान् ) अन्य गुणों वाला न हो, (संयोगविभागेषु) संयोगों और विभागों में (अनपेक्षः) अपेक्षा रहित ( अकारणम् ) कारण न हो, (इति) यह ( गुणलक्षणम् ) गुण का लक्षण है ॥ गुण उन को कहते हैं जो किसी द्रव्य का आश्रय अवश्य करते हों, द्रव्य के विना कहीं न पाये जाते हों, तथा जैसे गुण किसी द्रव्य का गुण है, वैसे गुण का गुण कोई न हो और जैसे कर्म, संयोग विभागों का सापेक्ष कारण होता है, वैसा न हो अर्थात् गुण, संयोग विभागों को उत्पन्न नहीं करता है । यह गुण का लक्षण है । यद्यपि सामान्यादि भी गुणों में रहते हैं परन्तु सामान्य, विशेष को आचार्य ने स्पष्ट भिन्न पदार्थ कह कर छः पदार्थ गिनाये हैं, जिस से प्रतीत होता है कि आचार्य भी यह भाव रखते थे कि द्रव्यादि पदार्थ और सामान्यादि उपपदार्थ हैं ॥ १६ ॥ आगे कर्म का लक्षण करते हैं:- १७-एकद्रव्यमऽगुणं संयोगविभागेष्वन- पेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम् ॥ १७ ॥ जो (एकद्रव्यम्) एक द्रव्य वाला हो, अनेक द्रव्याश्रयी न हो, (अगुणम्) जो गुणवान् न हो, (संयोगविभागेषु) संयोगों और विभागों में (अनपेक्ष कारणम्) निरपेक्ष स्वतन्त्र कारण हो, (इति) यह (कर्मलक्षणम्) कर्म का लक्षण है ॥
कर्म जब स्वयं उत्पन्न होता है तब किसी न किसी संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है, और संयोग विभागों के उत्पादन में यद्यपि कर्म, सम- वायि द्रव्य की और पूर्व संयोग के नाश की अपेक्षा रखता है तथापि न तो वह द्रव्य, कर्म की उत्पत्ति के पश्चात् उत्पन्न होता, न पूर्व संयोगनाशाभाव है, इस कारण संयोग विभागों में निरपेक्ष कारण ही है ॥ १७ ॥ अब इन द्रव्य गुण कर्मों का साधर्म्य बतलाते हैं:- १८-द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यं कारणं सामान्यम् ॥ १८ ॥ (द्रव्य-णाम्) द्रव्यों, गुणों और कर्मों का (द्रव्यं कारणं) द्रव्य कारण होता है (सामान्यम्) यह समानता है ॥ द्रव्य गुण कर्म तीनों एक द्रव्य के आश्रय रहते हैं, यही इन तीनों का साधर्म्य वा सामान्य है ॥ १८ ॥ १९-तथा गुणः ॥ १९ ॥ (तथा) इसी प्रकार (गुणः) गुण हैं ॥ जिस प्रकार द्रव्य गुण कर्मों का कारण एक द्रव्य होता है, इसी प्रकार गुण भी उन तीनों का कारण होता है। यथा कारण द्रव्यों का 'संयोग'= गुण, कार्य द्रव्य का कारण हुआ, कार्य रूपादि गुणों का कारण भी कारण रूपादि हुवे और गुरुत्वादि गुण, उत्क्षेपणादि कर्मों का कारण हुवे, इस प्रकार सब द्रव्य गुण कर्मों का कारण कोई न कोई गुण हुआ । यह भी द्रव्य- गुण कर्मों का गुण के साथ साधर्म्य है ॥ १९ ॥ अब और भी साधर्म्य कहते हैं:- २०-संयोगविभागवेगानां कर्म समानम् ॥ २० ॥ (संयो-नाम्) संयोग, विभाग और वेगों का [कारण] (कर्म) कर्म है (समानम्) यह समान है ॥ संयोगों का कारण कर्म है, विभागों का कारण भी कर्म है और वेगों का कारण भी कर्म है। इस बात में संयोग, विभाग, वेग; तीनों समान हैं कि उन तीनों का कारण एक कर्म है। यही इन तीनों का साधर्म्य है ॥ जैसे बाण आदि में संधानादि=कर्म ही बाण से धनुष् के संयोग का कारण हुआ, प्रत्यञ्चा का खींचना (कर्म), बाण से धनुष् के वियोग का कारण हुआ, तथा
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बाण में वेग के उत्पादन करने से वेग का भी कारण हुआ। इस प्रकार संयोग, विभाग और वेग का कारण कर्म है ॥ २० ॥ यदि कहो कि संयोग, विभाग और वेग; इन तीन का ही क्यों, द्रव्यों का कारण भी तौ कर्म हैं, सो सूत्र में क्यों न कहा ? तौ उत्तर— २१-न द्रव्याणां कर्म ॥ २१ ॥ ( द्रव्याणां ) द्रव्यों का [ कारण ] (कर्म) कर्म (न) नहीं होता ॥ २१ ॥ क्योंकि— २२-व्यतिरेकात् ॥ २२ ॥ ( व्यतिरेकात् ) अभाव होने से ॥ द्रव्यों की उत्पत्ति के समय कर्म व्यतिरिक्त (अभावप्राप्त) होता है। क्यों कि कर्म तौ द्रव्य के आरम्भ करने वाले संयोग को उत्पन्न करके स्वयं प्रध्वं- साऽभाव को प्राप्त हो जाता है, फिर संयोग उस द्रव्य का कारण हो, पर कर्म साक्षात् किसी कार्य द्रव्य का कारण नहीं बन सकता। यद्यपि कर्म संयोग का कारण और संयोग कार्यद्रव्योत्पत्ति का कारण हो, इस प्रकार परम्परा से चाहे कर्म कारण रहो, परन्तु साक्षात् नहीं। यही सूत्रकार की विवक्षा है ॥ २२ ॥ कारण का सामान्य कह कर अब कार्य का सामान्य कहते हैं:— २३-द्रव्याणां द्रव्यं कार्यं सामान्यम् ॥ २३ ॥ (द्रव्याणां) द्रव्यों का (द्रव्यं) द्रव्य (कार्यं) कार्य होता है, यह (सामान्यं) समानता है ॥ जिस प्रकार द्रव्यों का कारण द्रव्य होते हैं, इसी प्रकार द्रव्यों का कार्य भी द्रव्य होते हैं, यह सामान्य है ॥ जैसे घट दो कपालों का कार्य द्रव्य है, पट तन्तुओं का कार्य द्रव्य है ॥ २३ ॥ प्रश्न-तौ क्या जिस प्रकार गुण द्रव्यों का आश्रय करते हैं, उसी प्रकार कर्म भी द्रव्यों का आश्रय करते हैं, तब जैसे गुणों का कार्य गुण होना सामान्य है, वैसे कर्मों का कार्य कर्म हो, यह सामान्य भी है ? उत्तर-नहीं ? क्योंकि- २४-गुणवैधर्म्यान्न कर्मणां कर्म ॥ २४ ॥ ( गुणवैधर्म्यात् ) गुण की विरुद्धता से (कर्मणां) कर्मों का (कर्म) कर्म [ कार्य हो, यह सामान्य ] ( न ) नहीं है ॥
१४ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद गुणों का साधर्म्य यह है कि वे सजातीय गुणान्तर के आरम्भक (कारण) होते हैं, जहां इस का विरोध हो, वह वैधर्म्य होगा, अथवा गुणों का सा- धर्म्य यह है कि वे द्रव्याश्रयी होते हैं, इस के विरुद्ध कर्मपन को वैधर्म्य कहेंगे । इस लिये कर्मों का कार्य कर्म नहीं होते । अर्थात् यद्यपि द्रव्याश्रयत्व में कर्म को कर्मान्तर से समानता है, तो भी जैसे कारणगुण रूपादिक, अपने कार्य रूपादि का आरम्भ करते हैं, वैसे अवयव के कर्म अवयवी में कर्मोत्पादक नहीं होते । यह बात पूर्व सूत्र ११ वें में कह भी आये थे, तथापि यहां पुन- रुक्ति दोष इस कारण नहीं मानना चाहिये कि ११ वें सूत्र में कारण सामान्य का निषेध किया था, और इस सूत्र में कार्य सामान्य का निषेध करते हैं ॥ २४ ॥ द्रव्यों का कार्य द्रव्य कह कर अब द्रव्यों का कार्य जो कईएक गुण हैं, उन का कथन करते हैं:- २५-द्वित्वप्रभृतयः संख्याः पृथक्त्वसंयोगविभागाश्च ॥ २५ ॥ २३ वें सूत्र में से "द्रव्याणां, कार्यं" की अनुवृत्ति चली ही आती है (द्वित्वप्रभृतयः) द्वित्वादि (संख्याः) संख्यायें, (पृथक्त्वसंयोगविभागाः) पृथक्त्व, संयोग और विभाग (च) भी [द्रव्यों का कार्य हैं, यह सामान्य है]। एकत्व संख्या तौ किसी द्रव्य का कार्य नहीं, क्योंकि एकत्व तो सभी में अनुगत होने से किसी का कार्य नहीं हो सकती, हां द्वित्व त्रित्व आदि संख्यायें अनेक द्रव्यों के मेल से उत्पन्न होती है, अतः वे द्रव्यों का कार्य होती हैं, तथा पृथक् होना, जुड़ना, और विछुड़ना; ये भी द्रव्यों के कार्य हैं ॥ २५॥ तौ क्या जिस प्रकार द्वित्वादि, द्रव्यों का कार्य हैं, वैसे कर्म भी हैं ? उत्तर-नहीं, क्योंकि- २६-असमवायात्सामान्यकार्यं कर्म न विद्यते ॥ २६ ॥ (असमवायात्) समवाय सम्बन्ध न होने से (कर्म) कर्म (सामान्य- कार्यं) सामान्य कार्य (न) नहीं (विद्यते) है ॥ कर्मों का द्रव्यों से समवाय सम्बन्ध नहीं, अर्थात् नित्य संबन्ध नहीं इस लिये कर्म द्रव्यों के कार्य सामान्य में नहीं गिनाये जा सकते ॥ २६ ॥ २७-संयोगानां द्रव्यम् ॥ २७ ॥
प्रथमोऽध्याय १५ (संयोगानां) संयोगों का (द्रव्यम्) द्रव्य [कार्य सामान्य होता है] ॥ संयोगों से कार्य द्रव्य बनते हैं। यह स्पष्ट ही है ॥ २८-रूपाणां रूपम् ॥ २८ ॥ (रूपाणां) रूपों का (रूपं) रूप [कार्य सामान्य है] ॥ इसी से यह भी समझ लेना चाहिये कि जिस प्रकार कारण रूपों का कार्य सामान्य कार्य रूपों में है, इसी प्रकार रस, गन्ध, स्पर्श, स्नेह, सांसि- द्धिक, द्रवत्व, एकत्व, पृथक्त्व, परिमाण, वेग, स्थितिस्यापक, और गुरुत्व; इन सब कारणों का कार्य सामान्य अपने २ कार्य रसादि में है ॥ २८ ॥ यह कह कर कि गुणों का गुण एक कार्य सामान्य है, अब यह कहते हैं कि गुणों का एक कर्म कार्य-सामान्य है । यथा- २९-गुरुत्वप्रयत्नसंयोगानामुत्क्षेपणम् ॥ २९ ॥ (गुरु-नां) गुरुत्व, प्रयत्न और संयोग, इन का (उत्क्षेपणं) एक उत्क्षे- पण नामक कर्म [कार्य सामान्य है] ॥ उत्क्षेपण=उछाल को कहते हैं, जो गुरुत्व= वज़न, प्रयत्न=हरकत और संयोग से उत्पन्न होता है। यह स्पष्ट ही देखा जाता है ॥ २९ ॥ गुणों का कार्य कह कर अब कर्मों का कार्य कहते हैं:- ३०-संयोगविभागाश्च कर्मणाम् ॥ ३० ॥ (संयोगविभागाः) संयोग, विभाग (च) और वेग (कर्मणां) कर्मों का [कार्य सामान्य हैं] ॥ च शब्द से आचार्य ने वेग का समुच्चय किया जान पड़ता है क्योंकि कर्म से ही संयोग विभाग और वेग उत्पन्न होते हैं ॥ ३० ॥ यदि कहो कि जब संयोगविभागादिक ही कर्म का कार्य हैं, द्रव्य और कर्म नहीं, तब यही क्यों न कह दिया कि “संयोग और विभाग तो कर्मों के कार्य हैं, द्रव्य और कर्म नहीं”, तो उत्तर- ३१-कारणसामान्ये द्रव्यकर्मणां कर्माऽकारणमुक्तम् ॥ ३१॥ (कारणसामान्ये) कारण की समानता में (कर्म) कर्म को (द्रव्यकर्म- णाम्) द्रव्यों और कर्मों का (अकारणम्) कारण न होना (उक्तम्) कहा है ॥
१६ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद पूर्व सूत्र २१ में-"न द्रव्याणां कर्म" और ११ में-"कर्म कर्मसाध्यं न विद्यते" कह चुके हैं, जिन का तात्पर्य यही है कि न तो कर्म कर्मों का कारणकार्य- भाव होता, न द्रव्यों का कारण कर्म होता। इस लिये यहां उस के पुनर्वार कहने की आवश्यकता नहीं ॥ ३१ ॥ श्री स्वामी हरिप्रसाद जी का श्लोक इस आह्निक का संक्षिप्त आशय बताने और याद रखने में बड़ा उपयोगी है। इस लिये उस को ज्यों का त्यों उद्धृ- धृत करता हूं कि पाठक लाभ उठावें- “मेयोद्देशो विभागोऽथ सामान्यं च विशेषकम् । अर्थस्य लक्षणं चास्मिन्नान्हिके संप्रकीर्त्तितम् ॥ १॥” अर्थात् इस आन्हिक में प्रमेय पदार्थों के नाम और विभाग, सामान्य और विशेष और अर्थ का लक्षण वर्णन किया गया ॥ इति प्रथमाऽध्यायस्य प्रथममाह्निकम् ॥ अथ प्रथमाऽध्याये द्वितीयमाह्निकम् पूर्व आन्हिक में यह तो कहा गया कि द्रव्य गुण कर्म का कारण सामान्य यह है, कार्य सामान्य यह है, परन्तु कार्य कारण का स्वरूप नहीं बताया गया, इस कारण कारण कार्य सामान्य का समझना कठिन रहा, उस को सरल करने के लिये इस आन्हिक में कार्य कारण स्वरूपादि का ही वर्णन आरम्भ करते हैं:- ३२-कारणाऽभावात्कार्याऽभावः ॥ १ ॥ (कारणाभावात्) कारण के अभाव से (कार्याभावः) कार्य का अभाव होता है ॥ अन्य सामग्री के होते हुवे भी जिस के अभाव में जो न हो सके वह उस का कारण (उपादान) होता है तथा वह स्वयं कार्य कहाता है, यह कार्यकारण का स्वरूप बताया गया अर्थात् यह निश्चल नियम है कि कारण के बिना कार्य नहीं हो सकता। कारण हो तभी कार्य हो सकता है। इस लिये जिस पूर्व वर्त्तमान पदार्थ के भाव से उत्तर भावी पदार्थ का भाव हो सके, वही पूर्ववृत्ति पदार्थ उस उत्तरवर्त्ती पदार्थ का कारण कहावेगा और
१ अध्याय २ आन्हिक १७
१ अध्याय २ आन्हिक १७ उत्तरवर्त्ती कार्य कहावेगा । यह कार्य कारण का स्वरूप है। जैसे बीज कारण और अङ्कुर कार्य है ॥ १ ॥ ३३-न तु कार्याऽभावात्कारणाऽभावः ॥ २ ॥ (तु) परन्तु (कार्याऽभावात्) कार्य के अभाव से (कारणाऽभावः) कारण का अभाव (न) नहीं होता ॥ जिस प्रकार कारण के अभाव से कार्य हो नहीं सकता, इसी प्रकार कार्य के अभाव में कारण भी न हो, यह नियम नहीं। मिट्टी के अभाव में घड़ा तौ अवश्य न होगा, परन्तु घड़े के अभाव में मिट्टी का अभाव आवश्यक नहीं। मिट्टी (कारण), घड़े (कार्य) के बिना भी होती है ॥ २ ॥ द्रव्य गुण कर्मों के लक्षण और स्वरूप को समझने के लिये उन का परस्पर साधर्म्य, वैधर्म्य भी कहा गया । कार्य क्या है, कारण क्या है, यह भी भले प्रकार बताया गया। अब अध्याय १ सूत्र ४ चतुर्थोक्त क्रम से द्रव्य गुण कर्म से अगले सामान्य और विशेष के लक्षण और परीक्षा को आगे कहना चाहते हुये आचार्य्य, इस विषय में अनेक वादियों की विप्रतिपत्तियें जानकर प्रथम सामान्य विशेष के होने में प्रमाण कहते हैं:- ३४-सामान्यं विशेष इति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ ३ ॥ (सामान्यं) सामान्य (विशेषः) विशेष (इति) यह दोनों (बुद्ध्यपेक्षम्) समझ की अपेक्षा से हैं ॥ द्रव्यादि पदार्थों में एक दूसरे से भेद होने पर जो हमारी समझ में समानता आती है, वही सामान्य पदार्थ है। जैसे द्रव्य सत् है, गुण भी सत् है, कर्म भी सत् है, तीनों में सत्ता (होना) समान है, बस यही उन में सामान्य है। अब द्रव्य से गुण में भेद करने वाले लक्षण जैसे (अगुणवान्) गुणान्तर रहित होना, यह द्रव्य से गुण का विशेष है, इसी से हम समझते हैं कि द्रव्य और गुण भिन्न २ दो पदार्थ हैं। इसी प्रकार कर्म में सत्तामात्र के सामान्य रहते भी अध्याय १ सूत्र १७ की विशेषता कि एक द्रव्य वाला, गुणरहित, संयोग विभाग में निरपेक्ष कारण होना कर्म की विशेषता (विशेष) हैं, जिन से हम कर्म को द्रव्यादि से पृथक् समझते हैं। यह जो हमारी समझ है, यही ३ .
१८ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद सामान्य विशेष पदार्थ के होने में प्रमाण है ॥ जो कि व्यावहारिक नित्य समानता अनेक व्यक्तियों में समवाय सम्बन्ध से वर्त्तमान है, उसी को वैशेषिक दर्शन का लाक्षणिक सामान्य जानिये, जो कि भिन्न २ वस्तुओं में समान बुद्धि को उत्पन्न करता है। इस से अतिरिक्त जो एक पदार्थ से दूसरे के भेद की बुद्धि को उत्पन्न करता है, वह विशेष है। जैसे एक स्थान में चार मनुष्य बैठे हैं, उन चारों में मनुष्यपना एकसा या समान है, इस समानता की पहचान कराने वाला जो पदार्थ है, वही यहां वैशेषिकदर्शन में "सामान्य" कहाता है। जब उन्हीं चारों में एक बालक है, दूसरा युवा है, तीसरा वृद्ध है और चौथा रोगी है। तौ वह पहचान जिस से कि एक को बालक, दूसरे को युवा, तीसरे को वृद्ध और चौथे को रोगी समझते हैं, जिस से हम बालक को युवा नहीं समझते, युवा को वृद्ध नहीं समझते, वा वृद्ध को रोगी भी नहीं समझते, इस पहचान का कराने वाला, बालक से युवा, युवा से वृद्ध और वृद्ध से रोगी के भेद को जताने वाला जो कोई पदार्थ है, वही वैशेषिक दर्शन में विशेष कहाता है। इस प्रकार विशेष में सामान्य व्यापक हुवा करता है, परन्तु विशेष व्याप्य हुवा करता है, जैसे बालक होने पर भी और युवा से भिन्न होने पर भी मनुष्यपना दोनों में पाया जाता है, बालक भी मनुष्य है, युवा भी मनुष्य है, वृद्ध भी मनुष्य है और रोगी भी मनुष्य है, परन्तु बालक, युवा नहीं, युवा वृद्ध नहीं, वृद्ध रोगी नहीं, तब बालकत्व युवत्व वृद्धत्व और रोगित्व तौ विशेष कहायेगा, तथा मनुष्यत्व सामान्य है ॥ इस सामान्य विशेष को बुद्धयपेक्ष इस लिये कहा है कि जो पदार्थ एक बुद्धि की अपेक्षा सामान्य कहा है, वही दूसरी बुद्धि की अपेक्षा विशेष भी बनजाता है। जैसे जो मनुष्यपना बाल युवा वृद्ध में सामान्य है, वही मनुष्यपना, पशु पने वा पक्षिपने में विशेष भी है । बालक, युवा, वृद्ध और रोगियों में हमारी बुद्धि मनुष्यत्व को समान जानती थी, परन्तु मनुष्य, पशु, पक्षियों में, जहां तीनों हों, वहां हमारी बुद्धि पशु और पक्षियों से मनुष्य को भिन्नता से पहिचानने के लिये व्यावर्तक=विशेष निश्चित करती है। इस लिये सामान्य और विशेष प्रति नियत पदार्थ नहीं, किन्तु बुद्धयपेक्ष हैं। क्योंकि जो कुछ एक वस्तु की दूसरे वस्तु के साथ समानता है, वही एक