वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
६८ वेदान्तसार (क) आनन्दमयकोष-आत्मा के आच्छादक होने के कारण अथवा समूह में स्थित होने के कारण ही इन्हें कोष की संज्ञा प्रदान की गई है। इन पञ्चकोषों में प्रथम आनन्दमयकोष की स्थिति सृष्टि के विकास की प्रथम कारणावस्था में विद्यमान होती है। निर्गुणब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होता है तो वही कारणशरीर, ईश्वर तथा आनन्द की प्रचुरता के कारण आनन्दमय कोष कहलाता है। प्रलय की अवस्था में भी यह विद्यमान रहता है। यही सूक्ष्मशरीर का लयस्थान भी है। इसीलिए इस अवस्था को सुषुप्ति कहा गया है। ये ही सब स्थितियाँ ब्रह्म के मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होने पर 'जीव' पक्ष में भी होती हैं। (द्रष्टव्य चित्र संख्या-1) (ख) विज्ञानमयकोष-जीव की स्वप्नावस्था में स्थित 'सूक्ष्मशरीर' में तीन कोषों की स्थिति को स्वीकार किया गया है, विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय। इन तीन कोषों के मिलने पर ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण होता है। इनमें विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से उत्पन्न श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, रसना और घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धितत्त्व विद्यमान रहता है। अन्तःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति 'बुद्धि' द्वारा ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ नियन्त्रित होती हैं। अतः इस कोष का कार्य 'निश्चय' करना है। (ग) मनोमयकोष-सूक्ष्मशरीर में स्थित तीन कोषों में से इसका द्वितीय स्थान है। इसके अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुणप्रधान अंशों से उत्पन्न वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मन की स्थिति विद्यमान रहती है। मन के संकल्प-विकल्पात्मक होने के कारण मनोमयकोष का कार्य संकल्पविकल्प माना गया है। दूसरे शब्दों में यह कोष इच्छाशक्ति से युक्त होता है। (घ) प्राणमयकोष-यह सूक्ष्मशरीर में ही स्थित तृतीयकोष है। शरीर के विभिन्नस्थानों पर रहने वाले प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान नाम पञ्चवायु एवं वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर इस कोष का निर्माण होता है। क्रियाशीलता प्राण का धर्म है अतः इनके प्रभाव से ही कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को सम्पादित करती हैं। इस दृष्टि से इस कोष में क्रियाशीलता का प्राधान्य कहा जा सकता है। वैसे भी पञ्चप्राणों की उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से मानी
भूमिका ६९ गई है। चञ्चलता, गति रजोगुण की विशेषता है। इसीलिए प्राणों में गतिशीलता देखी जाती है तथा प्राणों के सान्निध्य से कर्मेन्द्रियाँ गतिशील होती हैं। इसीकारण प्राणमयकोष को गतिशील अथवा क्रियाशीलकोष माना गया है। विज्ञानमय तथा मनोमयकोष की क्रियाशीलता केवल अनुभव का विषय होती है, अतः अप्रत्यक्ष होती है। जबकि इसकी क्रियाशीलता को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय ये तीनों कोष जीव की स्वप्नावस्था में विद्यमान होते हैं। (ङ) अन्नमयकोष-पञ्चम एवं अन्तिम अन्नमयकोष होता है। यह जीव की जाग्रत अवस्था में विद्यमान रहता है। अतः इसीको जाग्रत भी कहते हैं। अन्न के विकार का बाहुल्य होने से इसे अन्नमय कहा गया है तथा आत्मा का आच्छादक होने से इसे कोष संज्ञा प्रदान की गई है। जीव इसी कोष के माध्यम से विषयों का उपभोग करता है। भोगों के उपभोग में सभीप्रकार की इन्द्रियाँ भी सहायक होती हैं। इस कोष का निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों से होता है। उपर्युक्त पञ्चकोषों को एक साथ इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-८
मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान त्वक् चक्षु रसना पाणि पाद पायु (ब्रह्म) (ब्रह्म) (बुद्धि) (मन) (अ) ईश्वर (ब) ईश्वर श्रोत्र घ्राण वाक् उपस्थ (१) आनन्दमय कोष (२) विज्ञानमय कोष (३) मनोमय कोष बुद्धि + पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन + पञ्चकर्मेन्द्रिय प्राण पाणि अग्नि अपान + वाक् पाद वायु | जल (उदान / पञ्चप्राण) प्राणमयकोष (पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा) व्यान (४) पायु आकाश | पृथिवी समान उपस्थ [(५) अन्नमय कोष]
(१२) पञ्चीकरणप्रक्रिया-स्थूलसृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया में अद्वैतवेदान्त पञ्चीकरण के सिद्धान्त को महत्ता प्रदान करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार आकाश आदि पञ्चभूतों की तन्मात्राओं के संयोग से
७० वेदान्तसार स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। यहाँ प्रत्येक भूत में अन्य चार भूतों के मिश्रण को पञ्चीकरण कहा गया है। अर्थात् जो पाँच नहीं है, उन्हें पाँच बना देने का नाम ही पञ्चीकरण है। पञ्चीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए आचार्य सदानन्द ने पञ्चदशी की निम्नकारिका को उद्धृत किया है— द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्व स्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात् पञ्च पञ्च ते॥1/27॥ अर्थात् सबसे पहले आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूतों में प्रत्येक को दो-दो समान भागों में विभाजित कर लेते हैं। इसप्रकार विभक्त पञ्चतन्मात्राओं के दस भागों में से पहले पाँच को, छोड़कर दूसरे पाँच भागों को फिर से बराबर चार-चार भागों में विभाजित करते हैं। तत्पश्चात् उन चार बराबर भागों में से एक-एक भाग को अपने-अपने दूसरे आधे भाग को छोड़कर दूसरे चार भूतों के दूसरे अर्धभाग में मिलाने पर एक-एक पञ्चीकृत महाभूत का निर्माण होता है। वेदान्तदर्शन की भाषा में इसी प्रक्रिया को पञ्चीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। इस सम्पूर्णप्रक्रिया को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-९ अपञ्चीकृत पञ्चीभूत [चित्र: पाँच चक्र - आकाश (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), वायु (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), अग्नि (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), जल (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), पृथिवी (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8)] | आकाश सूक्ष्मतन्मात्रा | | वायु सूक्ष्मतन्मात्रा | | अग्नि सूक्ष्मतन्मात्रा | | जल सूक्ष्मतन्मात्रा | | पृथिवी सूक्ष्मतन्मात्रा | चित्र-१० पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत [चित्र: पाँच चक्र - आ. 1/2 + चार 1/8 भाग, वायु 1/2 + चार 1/8 भाग, अग्नि 1/2 + चार 1/8 भाग, जल 1/2 + चार 1/8 भाग, पृथिवी 1/2 + चार 1/8 भाग] | आकाश | | वायु | | अग्नि | | जल | | पृथिवी | (1) स्थूल आकाश= 1/2 आकाश + 1/8 अग्नि + 1/8 वायु+1/8जल+1/8 पृथ्वी (2) स्थूल वायु= 1/2 वायु + 1/8 आकाश / 1/8 अग्नि+1/8 जल+ 1/8पृथ्वी। (3) स्थूल अग्नि=1/2 अग्नि+1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी
भूमिका ७१ (4) स्थूल जल=1/2 जल +1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 अग्नि + 1/8 पृथ्वी (5) स्थूल पृथिवी= 1/2 पृथिवी +1/8 आकाश+1/8 वायु+1/8 अग्नि+1/8 जल इसप्रकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया से प्रत्येक सूक्ष्मभूत महाभूत होकर पिण्ड के रूप में एक इकाई बन जाता है। अतः इस प्रक्रिया के पश्चात् आकाश मात्र आकाश नहीं रहता, अपितु उसमें आकाशीयतत्त्व आधा रहता है तथा शेष चार भूतों में से प्रत्येक का भी 1/8 भाग होने से इस स्थूलभूत में उनके गुण भी विद्यमान रहते हैं। ठीक यही स्थिति शेष चार महाभूतों की भी होती है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जिस भूत में जिस अंश की प्रधानता रहती है, उसी के आधार पर उसका नामकरण होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से चौदहभुवन तथा उनमें निवास करने वाले सम्पूर्ण प्राणिवर्ग अर्थात् चारप्रकार के स्थूलशरीरों का निर्माण होता है। चित्र-११ आकाशादि पञ्चीकृत स्थूलमहाभूतों द्वारा निर्माण चौदह भुवन | चतुर्विध स्थूलशरीर | 14' 1 2 3 4 सप्त उर्ध्व लोक सप्त अधःलोक | ↓ | | | 1 2 3 4 5 6 7 जरायुज | | | | | | | (मनुष्य पशु) भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् अण्डज 1 2 3 4 5 6 7 ↓ (पक्षी सर्प) | | | | | | | स्वेदज अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल पाताल (जूं, मच्छर) उद्भिज्ज (वृक्ष-लता) पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् ही आकाश में शब्दगुण की, वायु में शब्द एवं स्पर्श की, अग्नि में शब्द, स्पर्श, रूप और रस की, तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक गुणों की अभिव्यक्ति होती है। (१३) त्रिवृत्करण-वेदान्तसार के लेखक आचार्य सदानन्द ने पञ्चीकरण प्रक्रिया के प्रसंग में ही त्रिवृत्करण का उल्लेख करते हुए इसे पञ्चीकरण का ही उपलक्षण माना है—“अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युपलक्षणत्वात्” त्रिवृत्करण वस्तुतः उपनिषदों
७२ वेदान्तसार में प्रतिपादित सिद्धान्त है। छान्दोग्योपनिषद् की टीका करते हुए आचार्य आनन्दगिरि लिखते हैं- प्रथममेकैकां देवतां द्विधा विभज्य, पुनरेकैकं भागं द्विधा द्विधा कृत्वा तदितरभागयोर्निक्षिप्य त्रिवृत्करणं विवक्षितम् (6/3/2-3) इसके अनुसार अग्नि, जल, पृथिवी इन तीन भूतों में से सर्वप्रथम एक-एक को दो-दो भागों में विभाजित करके पुनः प्रत्येक एक-एक भाग के दो-दो विभाग करके उन्हें परस्पर इसप्रकार संयुक्त किया जाए- चित्र-१२
(चित्र विवरण: ऊपर: [वृत्त १: 1/2, 1/4, 1/4] अग्नि | [वृत्त २: 1/2, 1/4, 1/4] जल | [वृत्त ३: 1/2, 1/4, 1/4] पृथिवी नीचे: [वृत्त १: 1/2 अग्नि, 1/4 जल, 1/4 पृथिवी] | [वृत्त २: 1/2 जल, 1/4 अ., 1/4 पृथिवी] | [वृत्त ३: 1/2 पृथिवी, 1/4 अ., 1/4 जल])
त्रिवृत्करण इसप्रकार करने पर अग्नि, जल और पृथिवी में प्रत्येक का आधा अपना-अपना भाग होता है तथा शेष दो भूतों का चौथाई-चौथाई भाग होता है। अतः प्रत्येक भूत में अपना प्राधान्य तथा अन्य दो भूतों का गौणभाव होता है। इनके नामकरण का आधार भी यह गुणप्राधान्य ही है। यद्यपि पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख श्रुति में भी हुआ है, तथापि प्रयोग की सरलता की दृष्टि से उपनिषद्ग्रन्थों में त्रिवृत्करण का कथन किया गया है, क्योंकि पञ्चीकरण की प्रक्रिया कुछ जटिल होने के कारण सामान्य- व्यक्ति के लिए सरलतापूर्वक बोधगम्य नहीं है। वस्तुतः त्रिवृत्करण की प्रक्रिया भी पञ्चीकरण की ओर ही संकेत करती है। अतः इसकी प्रामाणिकता में संदेह नहीं करना चाहिए। (१४) प्रमाण- प्रमा अर्थात् यथार्थज्ञान के कारण को दार्शनिक भाषा में प्रमाण कहते हैं। यहाँ किसी भी कथन की सत्यता का आधार प्रमाण को माना गया है। अन्य दर्शनों के समान वेदान्तदर्शन भी प्रमाणों को मान्यता प्रदान करता है। उसकी दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म पूर्णतया सत्य, नित्य एवं
भूमिका ७३ पारमार्थिक सत्तावान् है, शेष सम्पूर्णजगत् भ्रान्तिभासिकसत्तावान् होने से अनित्य एवं मिथ्या है (ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या)। साथ ही वेदान्तदर्शन व्यावहारिकदृष्टि से सभी सांसारिकवस्तुओं के अस्तित्व को स्वीकार करता है। अतः उन सभी की सिद्धि के लिए यहां भी अन्य दर्शनों के समान प्रमाणों को स्वीकार किया गया है। यहाँ इनकी संख्या छः रही है- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति एवं अभावप्रमाण। अब हम इनका क्रमशः वर्णन करेंगे- (i) प्रत्यक्ष- यथार्थज्ञान का कारण प्रत्यक्षप्रमाण को माना गया है। दूसरे शब्दों में इसे प्रत्यक्षरूप से होने वाला यथार्थ-अनुभव भी कहा जा सकता है। यह अनुभव वस्तु के ज्ञानेन्द्रियों के साथ सम्पर्क के परिणामस्वरूप होता है। घट-पट आदि कोई वस्तु जब नेत्र आदि इन्द्रिय के सम्पर्क में आती है तो मन एवं बुद्धिरूप अन्तरिन्द्रिय उस वस्तु तक पहुँचते हैं तथा वे उस वस्तु के आकार से आकारित हो जाते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को निश्चयात्मिकाबुद्धि द्वारा उसके घट (घड़ा) अथवा पट (कपड़ा) होने का यथार्थज्ञान होता है। इस प्रत्यक्षप्रक्रिया में वस्तु का इन्द्रिय के साथ सम्पर्क होना अत्यावश्यक है। जिसके परिणामस्वरूप 'चित्' आभास से आभासित अन्तःकरणवृत्ति अपने वस्तुविषयक अज्ञान को विनष्ट कर देती है और हमें वस्तु का यथार्थप्रत्यक्ष (ज्ञान) होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार यह प्रत्यक्ष ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि किसी दीपक का प्रकाश वहाँ फैले अन्धकार को अपने प्रभाव से विनष्ट भी करता है तथा वहाँ स्थित घट आदि वस्तुओं को प्रकाशित भी करता है। इस सम्पूर्ण व्यापार में चिद्वृत्ति अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है। जिसे पञ्चदशीकार ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है- “बुद्धितत्स्थाचिदाभासो द्वावेतौ व्याप्नुतो घटम्। तत्राज्ञानं धिया पश्येदाभासेन घटः स्फुरेत्॥” वस्तुओं का यह प्रत्यक्ष निर्विकल्पक एवं सविकल्पकभेद से दो प्रकार का होता है। (तच्च प्रत्यक्षं द्विविधं, सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात्)। वस्तु के नाम, रूप, जाति, योजना आदि से रहित ज्ञान निर्विकल्पक होता है। जो वस्तु के प्रथमज्ञान के समय होता है। तदनन्तर उसके नाम, रूप, जाति, गुण आदि से युक्त ज्ञान को सविकल्पक कहा गया है।
७४ वेदान्तसार प्रत्यक्षज्ञानविषयक यह प्रक्रिया सम्पूर्ण सांसारिकपदार्थों के सम्बन्ध में होती है। इसके विपरीत ब्रह्म-साक्षात्कार आदि के सम्बन्ध में इसमें आंशिक भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। घटादि सांसारिकपदार्थों के अचेतन होने से उन्हें भासित करने का कार्य चिद्वृत्ति को करना पड़ता है। जबकि ब्रह्म के स्वयं चेतन तथा ज्योतिस्वरूप होने के कारण उसके साक्षात्कार में चिद्वृत्ति द्वारा ब्रह्मगत अज्ञान नष्ट कर दिये जाने पर ब्रह्मतत्त्व स्वयं ही प्रकाशित हो उठता है। इस प्रत्यक्ष में इन्द्रियों का विषय से सन्निकर्ष नहीं होता है। इसप्रकार इन्द्रिय-सन्निकर्ष के आधार पर वेदान्तदर्शन में प्रत्यक्ष के दो भेद कहे जा सकते हैं-(1) इन्द्रियजन्य तथा (2) इन्द्रियाजन्य। सुखदुःख आदि का प्रत्यक्ष भी इन्द्रिय अजन्य ज्ञान (प्रत्यक्ष) की कोटि में आता है, क्योंकि सुख-दुःख आदि भी बाह्यसांसारिकपदार्थों के समान नहीं हैं, अपितु वे अन्तःकरण के धर्म हैं। अतः अन्तःकरण द्वारा ही उनका प्रत्यक्ष होता है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन में बुद्धि एवं मन को इन्द्रिय की कोटि में नहीं रखा गया है। इसीकारण सुखदुःख का प्रत्यक्ष यहाँ इन्द्रिय अजन्य कहा गया है। (ii) अनुमान- वेदान्तशास्त्र की दृष्टि में दूसरा प्रमाण अनुमान है। अनेकशः अनुमिति भी प्रमा अर्थात् यथार्थ-अनुभव (ज्ञान) का कारण बनती है। अतः इसे प्रमाण की कोटि में रखा गया है। इसका मुख्यहेतु व्याप्तिज्ञान को स्वीकार किया गया है। किन्हीं दो पदार्थों का दैनिकजीवन में हमेशा एक साथ देखना तथा कभी भी विपरीतस्थिति के दर्शन न करना ही 'व्याप्ति' कहलाती है। जिसप्रकार हम अपने दैनिकजीवन में हमेशा धूम और अग्नि के साहचर्य के दर्शन करते हैं। अर्थात् जहाँ-जहाँ भी हमें धूम दिखायी देता है, वहाँ-वहाँ हमें अग्नि अवश्य दृष्टिगोचर होती है। हमें ऐसा कभी भी देखने को नहीं मिला कि धुआँ तो हो, किन्तु अग्नि वहाँ न मिली हो। इसप्रकार का व्यभिचार (नियम का वैपरीत्य) रहित दर्शन करने पर हमारे मन में यह बात दृढ़रूप से स्थापित हो जाती है कि 'यत्र-यत्र धूमः, तत्र तत्र वह्निः'। दृढ़रूप में स्थापित यही सिद्धान्त, यही मान्यता दर्शन की भाषा में व्याप्ति कहलाती है। इसी व्याप्ति के सहयोग से जब हम एक या दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित पर्वत में धुआँ उठता हुआ देखते हैं तो हम निःशंक होकर कह उठते
भूमिका ७५ हैं कि 'यह पर्वत अग्निवाला है।' यद्यपि उस अग्नि का हम प्रत्यक्ष नहीं कर रहे हैं, वह हमें दिखायी नहीं दे रही है, तथापि हमारे कथन में सत्यता है, वह प्रामाणिक है तथा इसे प्रमाणित करने वाला प्रमाण ही अनुमानप्रमाण है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि न्यायदर्शन के समान वेदान्त अन्वयव्यतिरेक व्याप्तियों को स्वीकार नहीं करता है। यहाँ केवल अन्वय- व्याप्ति ही आवश्यक है, क्योंकि इनके मत में व्यतिरेकव्याप्ति अभाव को सिद्ध करती है, भाव को नहीं। अतः यहाँ उसकी व्यर्थता स्वतःसिद्ध है। अभाव को सिद्ध करने के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है, जिसका हम आगे उल्लेख करेंगे। इसलिए अनुमानप्रमाण में वेदान्तीलोग न्यायदर्शन के समान पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग न करके केवल तीन अवयवों में ही व्याप्ति एवं पक्षधर्मता की सिद्धि स्वीकार करते हैं जैसे- (क) यह पर्वत वह्नि वाला है (पर्वतोऽयं वह्निमान्) प्रतिज्ञावाक्य (ख) क्योंकि यह धूमवान् है (धूमवानोऽयम्) हेतुवाक्य (ग) जहाँ जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है, जैसाकि- रसोईघर (यत्र-यत्र धूमः तत्र तत्र वह्निः' यथा महानसः) उदाहरणवाक्य अतः यहाँ तीन अवयवों में ही पक्षधर्मता की सिद्धि हो जाती है। किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं साधन-धूम एवं साध्य-अग्नि का साहचर्य देखकर व्याप्ति ग्रहण करके दूर पर्वतप्रदेश में उठते हुए अग्नि के लिङ्ग (चिह्न) धूम को देखकर स्वयं ही वहाँ अग्नि की उपस्थिति का 'निश्चय' अनुमानप्रमाण द्वारा किया जाता है। अतः इसे स्वार्थानुमान की श्रेणी में रखा जाएगा। इसके विपरीत यदि यही ज्ञान अज्ञानीव्यक्ति को किसी ज्ञानी व्यक्ति द्वारा कराया जाता है तो इसी प्रक्रिया से गुजरने पर वह परार्थानुमान की कोटि में माना जाएगा। परार्थानुमान में व्यक्ति स्वयं अनुमान नहीं करता, अपितु किसी अन्य को उसका ज्ञान कराने के लिए त्रि-अवयवी वाक्यों का उसीप्रकार ग्रहण करता है। इसी आधार पर अनुमानप्रमाण के दो भेद कहे गये हैं-(1) स्वार्थानुमान एवं परार्थानुमान। इसमें परार्थानुमान का प्रयोग वेदान्ती प्रायः ब्रह्मभिन्न सम्पूर्णजगत् का मिथ्यात्व सिद्ध करने के लिए करते हैं। (iii) उपमान- सादृश्य के आधार पर प्रमा के कारणस्वरूप 'उपमान' को भी वेदान्तदर्शन स्वतन्त्रप्रमाण के रूप में मान्यता प्रदान करता है। उनकी
७६ वेदान्तसार उपमान विषयक यह परिकल्पना लगभग नैयायिकों के समान ही है। इस प्रक्रिया में हम पहले देखी गई किसी वस्तु की समानता के आधार पर अन्य वस्तु का प्रामाणिकज्ञान प्राप्त करते हैं। इसप्रकार इस प्रमाण का मुख्यहेतु अथवा आधार सादृश्य है, जो हमें यथार्थज्ञान (प्रमा) कराता है। वेदान्तदर्शन में भी न्यायदर्शन के समान ही इस प्रमाण को समझाने की दृष्टि से गो एवं गवय को उदाहरणरूप में लिया है। इस प्रमाण को उदाहरण द्वारा इसप्रकार समझाया जा सकता है। किसी व्यक्ति का लड़का किसी दूसरे शहर में जाने की तैयारी कर रहा है। उसके मार्ग में एक जंगल पड़ता है। व्यक्ति अपने लड़के को समझाते हुए कहता है कि-बेटा! जंगल में 'गवय' से सावधान रहना। लड़का पूछता है-बापू! गवय कैसा होता है? इसपर व्यक्ति जवाब देता है कि तुमने गाय देखी है? बस वैसा ही गवय होता है, जो खतरनाक होता है। उससे बचकर रहना चाहिए। पिता की बात सुनकर वह लड़का जंगल से गुजरता है और वह गाय के समान दिखायी देने वाले एक जानवर को देखता है। उसे देखकर उसे अपने पिता द्वारा बतायी गई सभी बातें याद आती हैं और वह समझ जाता है कि यही गवय है। इस यथार्थज्ञान के होने पर वह उसकी दृष्टि में बिना पड़े सावधानीपूर्वक निकल जाता है। इसप्रकार 'गवय गाय के समान होता है', ऐसा ज्ञान प्राप्त किया हुआ, वह लड़का 'गवय' के दिखायी देने पर 'यह प्राणी ही गवय है', ऐसा निश्चय कर लेता है। अतः यथार्थज्ञान (प्रमा) कराने में यहाँ सादृश्य (उपमान) की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इसीकारण इसे उपमानप्रमाण कहा गया है। (तत्र सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्) (iv) आगम-वेदान्तशास्त्र में आगम अर्थात् शब्दप्रमाण को भी मान्यता प्रदान की गई है। इतना ही नहीं यह दर्शन निर्गुण, निराकार एवं शाश्वत- सत्ता ब्रह्म का ज्ञान कराने में प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आदि प्रमाणों की असमर्थता स्वीकार करते हुए एकमात्र आगमप्रमाण को ही सार्थक मानता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-ब्रह्म का ज्ञान कराने में एकमात्र आगमप्रमाण ही समर्थ प्रमाण है। अन्य किसी प्रमाण से इसके अस्तित्व की सिद्धि असम्भव है। तदनुसार- वेद एवं श्रुतिवचनों को अपौरुषेय मानकर उन्हें शब्दप्रमाण के अन्तर्गत स्वीकार करना चाहिए।
भूमिका ७७ यहाँ इन्होंने शब्द को पौरुषेय एवं अपौरुषेय दो श्रेणियों में रखा है। पौरुषेय लौकिक एवं अपौरुषेय वैदिकवाक्य हैं। वेदान्तदर्शन के आचार्यों ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए, उसकी पुष्टि एवं समर्थन के लिए हेतु के रूप में पद-पद पर श्रुतिवचनों को उद्धृत किया है, क्योंकि उनके मत में श्रुति (आगम) से प्रबल एवं उत्कृष्ट कोई अन्यप्रमाण नहीं है। अतः वेदान्त की दृष्टि में वेद (श्रुति) का स्वतःप्रामाण्य सिद्ध होता है। इनके मत में सूर्य के प्रकाश के समान वेद स्वतःसिद्ध हैं, उन्हें प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है। स्मृति, पुराण, इतिहास आदि भी वेदसम्मत होने से स्वतःप्रमाण की ही श्रेणी में आते हैं। वेदान्तदर्शन वेदमन्त्रों को विभिन्नऋषियों द्वारा दर्शन किए हुए मानता है। उसके मत में वेदमन्त्र किसी की रचना नहीं है। अतः इनके अपौरुषेय होने में संशय करना उचित नहीं है। शङ्कराचार्य के अनुसार वेद दीपक के समान सत्य का प्रकाशन करने वाले हैं। (v) अर्थापत्ति- यहाँ 'अर्थापत्ति' को अलग से प्रमाणरूप में मान्यता प्रदान की गई है। वेदान्तदर्शन के अनुसार-कार्य को देखकर उसके कारण की परिकल्पना करना ही अर्थापत्ति कही गई है (अर्थस्य आपत्तिः अर्थापत्तिः) अथवा प्रत्यक्षरूप में कार्य-कारण में दिखायी देने वाले विरोध के परिहार के लिए कार्य के औचित्य की दृष्टि से अन्यकारण की परिकल्पना को ही 'अर्थापत्ति' माना गया है। पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते (देवदत्त मोटा है, किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है) इत्यादि वाक्य में देवदत्त का मोटापन् भोजन के अभाव में सम्भव नहीं है। अतः प्रत्यक्षरूप से कार्य-कारण में विरोध प्रतीत होता है। इसके परिहार के लिए अर्थौचित्य की दृष्टि से अन्यकारण 'रात्रौ भुङ्क्ते' (यदि वह दिन में नहीं खाता तो अवश्य ही रात्रि में खाता होगा) इस अर्थ की परिकल्पना वेदान्तियों के मत में 'अर्थापत्तिप्रमाण' का विषय है। उनके अनुसार व्यक्ति का रात्रिभोजन प्रत्यक्षप्रमाण का विषय हो नहीं सकता, क्योंकि उसे भोजन करते हुए किसी ने प्रत्यक्षतः देखा ही नहीं है। साथ ही व्याप्ति के अभाव में अनुमानप्रमाण का भी यह क्षेत्र नहीं होगा। इसीप्रकार शब्द (आगम) एवं उपमानप्रमाण भी सादृश्य आदि के अभाव में सम्भव नहीं है। अतः इसके लिए अर्थापत्तिप्रमाण को मानना आवश्यक है।
७८ वेदान्तसार अर्थापत्ति के दो भेद माने गए हैं—(1) दृष्टार्थापत्ति (2) श्रुतार्थापत्ति (सा चार्थापत्तिर्द्विविधा-दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति"। इनमें दृष्टार्थापत्ति के अन्तर्गत वस्तु या व्यक्ति को देखकर विरोध के परिहार के लिए स्वयं अन्य कारण की परिकल्पना की जाती है। जैसे-उक्त उदाहरण में प्रतिदिन देवदत्त के दिवाभोजन को न देखकर, उसके स्थूलत्व को देखते हुए व्यक्ति स्वयं ही उसके रात्रिभोजनरूप अर्थ की परिकल्पना कर लेता है। अतः यह दृष्टार्थापत्ति प्रमाण का विषय कहलाएगा। इसके विपरीत इसीविषय को स्वयं न देखकर किसी अन्य व्यक्ति से देवदत्त का स्थूलत्व एवं दिवाभोजन का अभाव सुनकर उसके रात्रिभोजन की परिकल्पना श्रुतार्थापत्ति का विषय कहलाएगी। इसीको अन्य उदाहरण द्वारा भी इसप्रकार समझ सकते हैं। (जीवित) श्याम नामक व्यक्ति घर में नहीं है। अतः वह घर से बाहर होगा। उसका घर से बाहर होना रूप अर्थ श्रुतार्थापत्ति का विषय माना जाएगा। (vi) अनुपलब्धि (अभाव)— अभावरूप अर्थ की सिद्धि के लिए वेदान्तदर्शन 'अनुपलब्धि' नामक प्रमाण को मान्यता प्रदान करता है। संख्या की दृष्टि से इस दर्शन में यह छटा प्रमाण है। वेदान्तदर्शन किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति के अभाव को कारणजन्य न होने के कारण प्रत्यक्ष आदि पूर्व में कहे गए पाँच प्रमाणों द्वारा ज्ञान कराने में असमर्थ मानता है। उनके मत में घट का अभाव इन्द्रियसन्निकर्ष के अभाव में प्रत्यक्षप्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं हो सकता। व्याप्तिसम्बन्ध के अभाव में इसे अनुमान द्वारा भी ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इसीप्रकार सादृश्यज्ञान न होने से घट के अभाव के ज्ञान को उपमानप्रमाण से भी स्वीकार नहीं कर सकते हैं। साथ ही शब्दप्रमाण भी आप्तवाक्य के अभाव में 'वस्तु के अभाव' रूप ज्ञान को कराने में सक्षम नहीं है। अतः इसके लिए 'अनुपलब्धि' रूप छठे प्रमाण को मान्यता प्रदान करना आवश्यक है। इस प्रसङ्ग में यह विशेषरूप से उल्लेखनीय है कि वेदान्तदर्शन घट आदि पदार्थों के अभाव के ज्ञान में अनुपलब्धि से अभिप्राय सामान्य अनुपलब्धि से नहीं, अपितु योग्य अनुपलब्धि से ग्रहण करता है। इनके मत में-अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा इन्द्रिय आदि द्वारा प्रत्यक्ष करने योग्य घट-पट आदि के अभाव का ज्ञान ही सम्भव है, ऐसे पदार्थ जो इन्द्रियों की पहुँच
भूमिका ७९ से बाहर हैं पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि के अभाव को इस प्रमाण द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इनके मत में यह अनुपलब्ध अर्थात् अभाव चार प्रकार का होता है-(1) प्राग्-अभाव (2) प्रध्वंस-अभाव (3) अत्यन्त-अभाव तथा (4) अन्योन्य-अभाव। इन चारों प्रकार का अभावों को हम अनुपलब्धिप्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं। चित्र-१३ अनुपलब्धि प्रमाण 1 | 2 | 3 | 4 प्राक्-अभाव | प्रध्वंस-अभाव | अत्यन्त-अभाव | अन्योन्य-अभाव (उत्पत्ति से पहले | (निर्माण के बाद | (कालत्रय में रहने वाला | (एक वस्तु में अन्य मृत्पिण्ड में कार्य | दण्ड आदि से विनष्ट | अभाव - यथा वायु | वस्तु का यथा-घट रूप घट का अभाव) | घट का अभाव) | में रूप का) | में पट का) उपर्युक्त प्रदर्शन से स्पष्ट है कि किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पहले अपने कारण में स्थितिरूप अभाव का ज्ञान 'प्राग्-अभाव' है जो अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्राह्य होगा। जैसे-घट के निर्माण से पूर्व वह अपने कारणरूप मृत्पिण्ड में विद्यमान रहता है, किन्तु दृश्यमानजगत् में उसका अभाव प्रतीत होता है। अतः इस अभाव को केवल अनुपलब्धि प्रमाण से ही ग्रहण कर सकते हैं। इसीप्रकार किसी वस्तु के निर्माण के बाद कारणविशेष से विनष्ट होने के पश्चात् होने वाले अभाव को 'प्रध्वंसाभाव' कहा जाएगा जो अनुपलब्धि प्रमाण से ही ग्रहण किया जा सकता है। जैसे-घट के बनने के बाद किसी व्यक्ति द्वारा उसे डण्डे से तोड़ देने के परिणामस्वरूप होने वाला अभाव प्रध्वंसाभाव होगा। इसके अतिरिक्त जो भूत-भविष्य और वर्तमान तीनों कालों में विद्यमान रहने वाला है, इसप्रकार के अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं जिसे हम अनुपलब्धिप्रमाण द्वारा ही ग्रहण कर सकते हैं। इस अभाव को वायु में रूप के अभावरूप उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है, क्योंकि वायु में रूप (दिखायी देने) का गुण नहीं होता और यह अभाव तीनों कालों में रहने वाला है। अतः अत्यन्ताभाव की कोटि में आएगा।
८० वेदान्तसार चतुर्थ, अन्योन्याभाव एक वस्तु में दूसरी वस्तु के अभाव को कहते हैं। जैसे घट में कभी भी पट विद्यमान नहीं रह सकता। अतः इसप्रकार के अभाव का ज्ञान प्राप्त करने के लिए 'अनुपलब्धि' नामक षष्ठप्रमाण की आवश्यकता होगी ही, क्योंकि उक्त चारों प्रकार के अभावों के ज्ञान को हम प्रत्यक्षादि शेष पाँच प्रमाणों द्वारा ग्रहण नहीं कर सकते हैं। (१५) कार्यकारणसिद्धान्त- कार्यकारणसिद्धान्त भारतीय दर्शनशास्त्र का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है। यही सिद्धान्त किसी भी दर्शन की सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है। चार्वाकदर्शन को छोड़कर प्रायः सभी दर्शनों ने इस विषय पर प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षरूप से विचार किया है। पुनरपि सांख्य एवं न्यायदर्शन में इस सिद्धान्त की विस्तार से चर्चा की गई है। कार्यकारणसिद्धान्त को लेकर प्रचलित मतों को मुख्यरूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- (क) सत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से ही सत् कार्य की उत्पत्ति हो सकती है। इसलिए उत्पत्ति से पहले कार्य अपने कारण में विद्यमान रहता है। इस मान्यता को सांख्यदर्शन ने विस्तारपूर्वक प्रस्थापित किया, जिसे सत्कार्यवाद के नाम से जाना जाता है। (ख) असत् से सत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार-उत्पत्ति से पहले कार्य का अपने कारण में प्राग्भाव रहता है। अतः असत् कारण से सत् कार्य की उत्पत्ति होती है। इस मान्यता के अनुसार कारणविशेष से कार्यविशेष स्वभाववश उत्पन्न होता है। इसमें किसी अन्य हेतु की परिकल्पना उचित नहीं है। इस सिद्धान्त के मानने वालों में न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध तथा मीमांसादर्शन विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। (ग) सत् से असत् की उत्पत्ति-इसके अनुसार सत् पदार्थ (कारण) से असत् (कार्य) की उत्पत्ति होती है। वेदान्तदर्शन ने इसी मान्यता को प्रस्थापित किया, क्योंकि यह दर्शन सत् ब्रह्म से असत् जगत् की उत्पत्ति को स्वीकार करता है। यही सिद्धान्त इसकी सृष्टिप्रक्रिया का मुख्य आधार है। यहाँ किसी भी कार्य की उत्पत्ति के लिए मूल आधारभूत कारण उपादान है, जैसे घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी। साथ ही जिनके सहयोग से कार्य उत्पन्न होता है, वे निमित्तकारण कहलाते हैं, जैसे-कुम्हार, तुरी, वेमा आदि।
भूमिका ८१ वेदान्तदर्शन ब्रह्म को दृश्यमानजगत् का उपादान और निमित्त दोनों कारण मानता है। ठीक उसीप्रकार जैसे-मकड़ी स्वयं द्वारा बनाए गए जाले के लिए उपादान और निमित्त दोनों कारण होती है, क्योंकि जाले के निर्माण में काम आने वाला मुख्य आधाररूप तरलपदार्थ मकड़ी के शरीर से निकलता है। इस दृष्टि से मकड़ी जाल की उपादानकारण हुई तथा अपने पैरों द्वारा जाले की संरचना करने के कारण यही मकड़ी निमित्तकारण भी बनी। विद्वानों ने इसे सत्कार्यवाद का द्वितीयरूप विवर्तवाद नाम दिया, जिसकी स्थापना के लिए वेदान्तदर्शन मायावाद का आश्रय लेता है। इसका विस्तृत वर्णन हम सृष्टिप्रक्रिया में आगे करेंगे। उनके मत में-जब वस्तु अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही दूसरे रूप में प्रतीत होने लगती है, तो यह विवर्त कहलाता है तथा इस सिद्धान्त को विवर्तवाद कहते हैं। इसका उदाहरण रज्जु में सर्प की भ्रान्ति के रूप में दिया जाता है, क्योंकि उस स्थिति में रस्सी अपने स्वरूप का परित्याग किए बिना ही सर्प के रूप में प्रतीत होने लगती है और यह प्रतीति वस्तुतः मिथ्या होती है। ब्रह्म में दिखायी देने वाली जगत् की प्रतीति को भी वेदान्त इसीप्रकार विवर्त के रूप में स्वीकार करता है। इसप्रकार निष्कर्षरूप में हम कह सकते हैं कि वेदान्त यद्यपि सत्कार्यवाद को स्वीकार करता है, क्योंकि यह सत्तत्त्वब्रह्म से मिथ्याजगत् की उत्पत्ति को मानता है, तथापि इसका सत्कार्यवाद सांख्य के सत्कार्यवाद से भिन्न है, क्योंकि सांख्य सत्कार्यवाद के परिणामवादी स्वरूप को मान्यता प्रदान करता है, जैसे दूध से दही का बनना। इस प्रसंग में यह ध्यातव्य है कि वेदान्तदर्शन ने दूध के परिवर्तितरूप दही को अयथार्थ माना है। उनके अनुसार हम इसे दही सम्बोधन तो करते हैं, किन्तु वास्तव में यह दूध ही है, मात्र अवस्था एवं कालभेद के कारण इसे नया नाम दिया गया है। कुछ विद्वानों ने सांख्य के परिणामवाद को विवर्तवाद का पूर्वभूमि भी माना है। उनके मत में जिसप्रकार दूसरी मञ्जिल पर पहुँचने के लिए पूर्व मञ्जिल को पार करना पड़ता है। उसीप्रकार विवर्तवाद तक पहुँचने के लिए परिणामवाद की मञ्जिल तय करनी पड़ती है- विवर्तभावस्य हि पूर्वभूमिः वेदान्तवादे परिणामवादः। व्यवस्थितेऽस्मिन् परिणामवादे स्वयं समायाति विवर्तवादः॥ (सर्वज्ञात्ममुनि-संक्षेपशारीरक-2/69)
८२ वेदान्तसार (१६) समष्टि-व्यष्टि सिद्धान्त-वेदान्तदर्शन एवं इसकी सृष्टि-प्रक्रिया को भलीभाँति समझने के लिए इसमें प्रतिपादित समष्टि-व्यष्टि के सिद्धान्त को समझना आवश्यक है। जिसका हम यहाँ संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं। इस दर्शन के अनुसार-एक का कथन करने की विवक्षा में व्यष्टि तथा समूह का कथन करने की विवक्षा होने पर समष्टि अभिप्राय होता है। इसे उदाहरण द्वारा हम इसप्रकार समझ सकते हैं। जब हम किसी व्यक्ति विशेष के बारे में कुछ कहते हैं तो यह व्यष्टि कहलाएगा, किन्तु जब हम लोगों के समूह को इंगित करते हैं तो यह समष्टि माना जाएगा। वेदान्तदर्शन में इन दोनों शब्दों का अनेकशः प्रयोग किया गया है। आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में इन शब्दों की इसप्रकार व्याख्या की है- "यथा वृक्षाणां समष्ट्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा जलानां समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगताज्ञानानां समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्व व्यपदेशः।।" अर्थात् जिसप्रकार वृक्षों को समुदाय की दृष्टि से 'वन' कहकर एक संख्यासूचक शब्द का व्यवहार करते हैं अथवा जिसप्रकार जल के कणों के समूह की विवक्षा में 'जलाशय' ऐसा कहते हैं। ठीक उसीप्रकार अनेक संख्या में प्रतीत होने वाले जीवों में स्थित अज्ञान के समूह को समष्टि कहा जाता है। यह वस्तुतः इस सबमें ऐक्य का सूचक है। अन्तर केवल इतना है कि व्यष्टि की अपेक्षा यहाँ समष्टि को उत्कृष्ट अथवा उन्नत उपाधि वाली कहा है, क्योंकि समष्टि रागादिदोष से शून्य शुद्धसत्त्वप्रधान होती है (इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्वप्रधाना)। इसीलिए यहाँ व्यष्टिगत अज्ञान की अपेक्षा समष्टिगत अज्ञान को उत्कृष्ट बताया गया है, क्योंकि इसमें विशुद्धसत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। वस्तुतः यहाँ अज्ञान में स्थित सत्त्वगुण, रजस् एवं तमस् को अभिभूत किए रहता है, स्वयं पराभूत नहीं होता है। उत्कृष्ट उपाधि से युक्त चैतन्य को इसीकारण सर्वज्ञाता, सबका ईश्वर सर्वनियन्ता, अव्यक्त, अन्तर्यामी तथा संसार का कारणरूप कहा गया है। सबका मूलभूतकारण होने से ईश्वर की यह समष्टि कारणशरीर, आनन्द की प्रचुरता होने के कारण आनन्दमयकोष तथा स्थूल एवं सूक्ष्मजगत् प्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण सुषुप्ति कहलाती है।
भूमिका ८३ इसीप्रकार किसी वन के वृक्षों को यदि हम अलग-अलग कहना चाहें तो वृक्ष कहा जाएगा। साथ ही जलाशय में स्थित जल को अलग-अलग कहने की दृष्टि से 'अनेक जल' ऐसा प्रयोग करेंगे। ठीक उसीप्रकार अज्ञान को व्यष्टिरूप में कहने की इच्छा से 'अनेक अज्ञान' कहकर उसमें बहुत्व का व्यवहार करेंगे। अतः सिद्ध होता है कि व्यक्तिगत तथा समुदायगत व्यापक भाव के कारण ही अनेकता (व्यष्टि) तथा एकता (समष्टि) का व्यवहार किया जाता है। अज्ञान की यह व्यष्टि, समष्टि की अपेक्षा निकृष्ट उपाधि से युक्त होने के कारण मलिनसत्त्वप्रधान मानी गयी है। साथ ही इस निकृष्ट उपाधि से आवृत्त चैतन्य में अल्पज्ञता, अनीश्वरत्व आदि गुण होने के कारण तथा एक ही अज्ञान को प्रकाशित करने वाला होने से 'प्राज्ञ' कहा गया है। इस दृष्टि से ईश्वर और प्राज्ञ (जीव) में केवल समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद है, तात्त्विकदृष्टि से दोनों एक हैं, क्योंकि चैतन्य दोनों में विद्यमान है। अज्ञान की निकृष्ट उपाधि से युक्त इस जीव की यह उपाधि, अहंकार आदि का कारण होने से 'कारणशरीर' आनन्द का प्राचुर्य तथा शुद्धचैतन्य को कोष के समान ढक लेने से 'आनन्दमयकोष' एवं स्थूलसूक्ष्मप्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण 'सुषुप्ति' कहलाती है। वेदान्त की दृष्टि में सृष्टिविकास की तीन दशाओं में आत्मा और जगत् के भिन्न-भिन्न रूप होते हैं, जिन्हें तीन अवस्था (सुषुप्ति, स्वप्न, जाग्रत) तीन शरीर (कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल) तथा प्रपञ्च कोषों को आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, अन्नमय) नामों से व्यवहृत किया जाता है। इन सभी स्थितियों में समष्टि-व्यष्टिगत भेद से चैतन्य को अलग-अलग नामों से कहा जाता है। इसका मुख्यकारण भिन्न-भिन्न स्थितियों में अलग-अलग शरीर के प्रति चैतन्य का अहंभाव रहता है। जैसे-समष्टि में कारणशरीर के प्रति चैतन्य को अहंभाव के कारण इसे ईश्वर, इसी स्थिति में सूक्ष्मशरीर के प्रति उसके अहंभाव के कारण इसे हिरण्यगर्भ तथा स्थूलशरीर के प्रति विद्यमान अहंभाव के कारण इसे वैश्वानर या विराद् इस नाम से जाना जाता है। इसके विपरीत व्यष्टिदशा में कारणशरीर के प्रति चैतन्य के अहंभाव के कारण इसे 'प्राज्ञ', सूक्ष्मशरीर के प्रति अहंभाव के कारण 'तैजस्' तथा स्थूलशरीर के प्रति अहंकार के कारण इसे 'विश्व' कहा जाता है। इस
८४ $\hspace{10cm}$ वेदान्तसार सम्पूर्ण भिन्नता का मूल आधार समष्टि एवं व्यष्टिगत भेद ही है, जो मात्र समुदाय एवं वैयक्तिक दृष्टि है। तात्त्विकदृष्टि से इसमें कोई अन्तर नहीं है। उपर्युक्त सम्पूर्ण स्थिति को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-१४ समष्टि $\qquad$ $\fbox{तुरीय (ब्रह्म)}$ $\qquad$ व्यष्टि शुद्धसत्त्वप्रधान अविद्या से आवृत्त $\qquad$ मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त अहंभाव ईश्वर $\longleftrightarrow$ कारणशरीर में आनन्दमय कोष $\longleftrightarrow$ प्राज्ञ (जीव) — सुषुप्ति अवस्था हिरण्यगर्भ $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ सूक्ष्मशरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव तैजस् — स्वप्नावस्था $\fbox{विज्ञानमय मनोमय प्राणमय कोष}$ वैश्वानर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ स्थूल शरीर $\longleftrightarrow$ अहंभाव $\longleftrightarrow$ विश्व — जाग्रदावस्था अन्नमय कोष $\fbox{भोगायतन}$ समष्टि व्यष्टि एवं इनके अभेद को विभिन्न उदाहरणों द्वारा इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है— चित्र १५ $\fbox{तात्त्विक दृष्टि से अभेद}$ वन $\longleftarrow \hspace{7cm} \longrightarrow$ वृक्ष जलाशय $\longleftarrow \hspace{6.5cm} \longrightarrow$ जल वनगत आकाश $\longleftarrow \hspace{5.5cm} \longrightarrow$ वृक्षगत आकाश जलाशयगत आकाश $\hspace{4.5cm} \longrightarrow$ जलगत आकाश व्यक्ति समूह (भीड़) $\longleftarrow \hspace{4.5cm} \longrightarrow$ व्यक्ति $\fbox{समष्टि}$ $\hspace{8cm}$ $\fbox{व्यष्टि}$ (१७) सत्ता के त्रिविधरूप—वेदान्तदर्शन तीन प्रकार की सत्ता को मान्यता प्रदान करता है—(1) प्रातिभासिक (2) व्यावहारिक
भूमिका ८५
(3) पारमार्थिक सत्ता। ये तीनों वेदान्त की सृष्टिप्रक्रिया को समझने में सहायक हैं। अतः हम यहाँ इनका संक्षिप्तपरिचय प्रस्तुत कर रहे हैं- (क) प्रातिभासिक सत्ता-उसे कहते हैं जो प्रतीति के समय तो सत्य प्रतीत होती है, किन्तु कुछ समय के बाद किसी अन्य ज्ञान द्वारा बाधित हो जाती है। जैसे-रस्सी में साँप की प्रतीति। अनेकबार मार्ग में पड़ी हुई रस्सी को हम अन्धकार आदि के कारण सर्प समझ लेते हैं, किन्तु अगले ही क्षण प्रकाश आदि होने से रस्सी की यथार्थसत्ता का ज्ञान होता है। अतः अन्धकार आदि के कारण भ्रान्तिवश रस्सी में जो सर्पज्ञान था, वह यथार्थस्थिति (रज्जु) का ज्ञान होने पर बाधित हो जाता है। इसलिए किसी पदार्थ में अन्यपदार्थ की काल्पनिकसत्ता बाधित होने से पूर्व जितने समय तक विद्यमान रहती है। उसे वेदान्तदर्शन ने प्रतिभासिकसत्ता कहा है। यह प्रतीति वस्तुतः अज्ञानादि के कारण कल्पित होती है, जो उत्तरकाल में यथार्थज्ञान के साथ समाप्त हो जाती है। वेदान्त की दृष्टि में सीपी में चाँदी की प्रतीति भी वस्तुतः ऐसी ही 'प्रतिभासिक सत्ता' है। जो यथार्थज्ञान के साथ स्वतः समाप्त हो जाती है। (ख) व्यावहारिक सत्ता-इसके अन्तर्गत इसप्रकार के विषय आते हैं जो व्यवहार के समय सत् प्रतीत होते हैं। प्रत्यक्षरूप से देखने पर उनकी सत्ता को नकारा नहीं जा सकता, किन्तु ब्रह्मज्ञान की स्थिति में इसका बाध हो जाता है। शङ्कराचार्य के अनुसार-यह जगत् एकान्ततः सत्य न होकर केवल व्यवहारकाल में सत्य होता है (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-2/1/14)। अतः इसे व्यावहारिक सत्ता वाला कहा जाएगा। संसार के घट-पट आदि सभी पदार्थ दूसरे शब्दों में सम्पूर्णजगत् इसका उदाहरण है। प्रातिभासिक सत्ता की अपेक्षा इसका अस्तित्व अधिक लम्बे समय तक बना रहता है। अतः अधिक स्थायी है, किन्तु इसे पूर्णतया सत्य नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मज्ञान होने पर सम्पूर्ण संसार एवं उसमें स्थित सभी पदार्थों का मिथ्यात्व स्वतःसिद्ध हो जाता है। (ग) पारमार्थिक सत्ता-वेदान्तदर्शन के अनुसार यह पूर्णतया सत्य और शाश्वत है। भूत, भविष्य एवं वर्तमान तीनों कालों में इसका अस्तित्व विद्यमान रहता है। यह भौतिकपदार्थों की सत्ता से विलक्षण है। संसार के घट-पट आदि पदार्थ आज हैं कल नहीं रहेंगे, अतः अनित्य हैं। इसीलिए उनकी सत्ता व्यावहारिक कही गई है, पारमार्थिक नहीं। इसके विपरीत
८६ वेदान्तसार वेदान्त का ब्रह्म तीनों कालों में अवस्थित रहता है। उसमें किसी भी समय किसी भी प्रकार का विकार परिलक्षित नहीं होता। इसीकारण वह अविकारी है। अतः एकमात्र ब्रह्म की ही पारमार्थिकसत्ता बतायी गयी है। उपर्युक्त विवरण को संक्षेप में इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र १६ सत्ता के विविध रूप ┌───────────────┬────────────────┬───────────────┐ प्रातिभासिक व्यावहारिक पारमार्थिक │ │ │ (रज्जु में सर्प की प्रतीति घट-पट आदि ब्रह्म सीप में चाँदी की प्रतीति) व्यावहारिक जगत् │ │ │ ┌─────┴──────┐ ┌───┴───────────────┐ ┌─┴───────────────┐ │ नित्य शाश्वत│ │क्षणिक अस्तित्व, यथार्थज्ञान│ │अपेक्षाकृत अधिक लम्बे│ │त्रिकालिक, स्थिति│ │के बाद समाप्ति │ │समय तक अस्तित्व, │ └────────────┘ └───────────────────┘ │ब्रह्मज्ञान होने पर समाप्ति│ └─────────────────┘ (१८) जीव की अवस्थाएँ-वेदान्तदर्शन के प्रसिद्ध आचार्य गौडपाद ने जीव की चार अवस्थाओं को मान्यता प्रदान की है-(अ) जाग्रत, (ब) स्वप्न (स) सुषुप्ति (द) तुरीय। इनमें चतुर्थ, तुरीय अवस्था के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। उनके मत में इस अवस्था में तो जीव शुद्धचैतन्य- स्वरूप ही हो जाता है। इसलिए इसे जीव की अवस्था न मानकर ब्रह्म की अवस्था कहना चाहिए। पुनरपि व्यावहारिकजीव की जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीन अवस्थाएँ तो निर्विवाद रूप से स्वीकार्य हैं। अतः हम इनका यहाँ विस्तार से उल्लेख कर रहे हैं- (अ) जाग्रत् अवस्था-इस अवस्था में जीव अपने मन एवं इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यसांसारिकपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इसमें स्थूल शरीर, इन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि सभी सचेष्ट रहते हैं। इनके द्वारा जीव बाह्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है तथा उनका उपभोग भी करता है। इस अवस्था में जीव अन्नमयकोष में आबद्ध रहता है। आचार्य सुरेश्वर इस अवस्था का विवरण इसप्रकार प्रस्तुत करते हैं- बाह्यान्तःकरणैरेव देवतानुग्रहान्वितैः। स्वं स्वं च विषयज्ञानं तज्जागरितमुच्यते॥ (पञ्चीकरण वार्तिक-२९) अर्थात् इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण अपने-अपने अधिष्ठाता देवता से युक्त होकर अपने-अपने विषय को ग्रहण
भूमिका ८७ करते हैं। जीव का व्यवहार मुख्यरूप से बाह्यसांसारिकपदार्थों के साथ रहता है। उनका ज्ञान प्राप्त करके उनके उपभोगादि में ही जीव की रुचि रहती है। (ब) स्वप्नावस्था-इस अवस्था में जीव की इन्द्रियाँ एवं शरीर दोनों विश्राम करते हैं, किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। जाग्रत अवस्था में मन पर पड़े हुए संस्कारों को लेकर वह काल्पनिकजगत् की संरचना करता है। इसमें जीव विज्ञानमय, मनोमय, एवं प्राणमय कोशों से आबद्ध होता है तथा उसका सम्बन्ध सूक्ष्मशरीर के साथ रहता है। मन की वासना के अनुरूप कार्य करने के कारण इसे अन्तःप्रज्ञ भी कहते हैं। सूक्ष्मविषयों का उपभोग करने से इसको 'प्रविविक्तभुक्' भी कहा जाता है। आचार्य शङ्कर के अनुसार-जाग्रत् अवस्था में इन्द्रिय, मन और बुद्धि बाह्य एवं अन्तः आलोक से आलोकित रहती हैं, जबकि स्वप्नावस्था में इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं। सूर्य के प्रकाश का अभाव हो जाता है। उस समयं एकमात्र विशुद्ध आत्मज्योतिः विद्यमान रहती है। जाग्रत अवस्था के साथ इस अवस्था का एक यह भी अन्तर है कि वहाँ बाह्यसांसारिकपदार्थ विद्यमान रहते हैं, जबकि इस अवस्था में वे सभी पदार्थ काल्पनिक होते हैं। (स) सुषुप्ति अवस्था-इस अवस्था में जीव का सम्पर्क न तो बाह्य सांसारिकपदार्थों से होता है और न ही वह स्वप्निल संसार में विचरण करता है, अपितु इसमें वह आनन्द का भोक्ता बनकर चेतोमुख रहता है। जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था में वह सुख-दुःख दोनों का अनुभव करता है, जबकि इस अवस्था में आनन्द का ही प्राचुर्य रहता है। इस सम्बन्ध में उपनिषदकार का कथन है- “सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोभिभूतः सुखरूपमेति।” (कैवल्योपनिषद्-13) इस अवस्था में स्थूलशरीर (ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ, मन एवं बुद्धि आदि कुछ भी कार्य नहीं करते हैं। साथ ही प्रमाणप्रमेय का व्यवहार भी समाप्त हो जाता है। इसमें बुद्धि अविद्या में इसप्रकार स्थित रहती है जैसे, वट वृक्ष के बीज में वृक्ष। आनन्दमयकोष में आबद्ध यह अवस्था वस्तुतः मोक्ष से पूर्व की अवस्था कही जा सकती है- ज्ञानेनानुपसंहारो बुद्धेः कारणतास्थितिः। वट बीजे वटस्यैव सुषुप्तिरभिधीयते।। (पञ्चीकरणवार्तिक, 42) (द) तुरीयावस्था-इस अवस्था में सब प्रकार के प्रपञ्चों की पूर्णतया शान्ति हो जाती है। यह नित्यशुद्धचैतन्य ब्रह्म की निर्लिप्त अवस्था है। इसमें